शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान  

स्वान्त्र्योत्तर हिन्दी कविता में जैसे विषय बदले, वस्तु बदली और कवि की जीवन-दृष्टि बदली वैसे ही शिल्प के क्षेत्र में रूप-विधान के नये आयाम भी विकसित हुए। कविता की समीक्षा के मानदण्डों में एक बारगी युगान्तर आया और नये ढंग पर कविता की इमारत खड़ी की गई। कवि की अनुभूतियाँ नये अप्रस्तुतों और प्रतीकों को खोजते-खोजते बिम्ब के नये धरातलों को उद्‌घाटित करने में समर्थ हुई। कविता की जीवन्तता में प्राणशक्ति के रूप में बिम्ब ने अपना स्थान और महत्व पाया।
          प्रतीक और अप्रस्तुत तो प्रारम्भ से ही कविता की समीक्षा के प्रतिमानों के रूप में स्वीकृत थे, अब बिम्ब भी कविता के मूल्यांकन की कसौटी के रूप में स्वीकारा जाने लगा। यों तो बिम्बों के निर्माण और चयन की प्रक्रिया संस्कृत साहित्य में ही प्रचलित थी, किन्तु तत्कालीन कवियों और समीक्षकों ने, बल्कि आज़ादी से पहले तक हिन्दी के समीक्षकों ने भी बिम्ब को काव्य का प्राणतत्व नहीं माना था। आज़ादी के बाद कई नये संदर्भ, कई नये शैल्पिक प्रतिमान सामने आये। इसका कारण पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव तो था ही, विदेशों में चल रहा बिम्बवादी आन्दोलन भी था। छायावादियों ने भी अप्रत्यक्षतः शिल्प के अंग के रूप में ‘चित्रत्व’ को स्वीकार कर लिया था। सुमित्रानन्दन पन्त ने जब काव्य-भाषा के विवेचन के दौरान चित्रभाषा के प्रयोग की बात कही थी तो प्रकारानतर से बिम्ब को ही काव्य-शिल्प के अंग और आलोचना के प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया था। आचार्य शुक्ल भी बिम्ब को स्वीकृति दे चुके थे। उन्होंने ‘चिन्तामणि’ के एक निबन्ध में लिखा था, “काव्य का काम है कल्पना में बिम्ब या मूर्तभावना उपस्थित करना”[1] : स्पष्ट शब्दों में काव्य कल्पना-चित्र नहीं है, वरन् अनुभूतियों का मूर्तिकरण है।
बिम्ब काव्य-भाषा की तीसरी आँख है, जो मात्र गोचर ही नहीं, किसी अगोचर तत्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व (कालिदास-पहले से जो अवबोधन हो उसकी स्मृति)-रूप से, एक ओर कारयित्री और दूसरी ओर भावयित्री भाषा के लिए उपलब्ध करती है।
बिम्ब शब्द का अर्थ छाया, प्रतिच्छाया, अनुकृति या शब्दों के द्वारा भावांकन है। बिम्ब अंग्रेजी के इमेज शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। सी०डी० लेविस के अनुसार-

“The poetic image is more or less a sensuous picture in words, to some degree metaphorical, with an undernote and some human emotion, in its context but also charged with releasing into the reader a special poetic emotion or passion.”

अर्थात् काव्यात्मक बिम्ब एक संवेदनात्मक चित्र है जो एक सीमा तक अलंकृत-रूपतामक भावात्मक और आवेगात्मक होता है। लीविस ने बिम्ब को भावगर्भित चित्र ही माना है।[2]

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, “बिम्ब किसी अमूर्त विचार अथवा भावना की पुनर्निर्मिति।[3]
एज़रा पाउण्ड के अनुसार, “बिम्ब वह है जो किसी बौद्धिक तथा भावात्मक संश्लेष को समय के किसी एक बिन्दु पर संभव करता है।”[4]
          हिन्दी की नयी कविता-धारा के कवि पश्चिम के काव्य और काव्यान्दोलनों से परिचित थे। ‘तार सप्तक’ में प्रभाकर माचवे ने अपनी कविता को ‘इम्प्रेशनिस्ट’ अथवा बिम्बवादी घोषित किया। फिर भी तीसरी सप्तक के कवि केदारनाथ सिंह से पहले बिम्ब-विधान को किसी ने अपने वक्तव्य में प्रमुखता नहीं दी थी। केदारनाथ सिंह ने घोषित किया कि “कविता में मैं सबसे अधिक ध्यान देता हूँ बिम्ब-विधान पर।”[5]
          एक आधुनिक कवि की श्रेष्ठता की परीक्षा की कसौटी जहाँ अज्ञेय ‘शब्दों का आविष्कार’ को मानते हैं, वहीं केदारनाथ सिंह ‘बिम्बों की आविष्कृति’ को। अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिन्दी में बिम्ब विधान का विकास’ में उन्होंने बिम्ब के प्रतिमान पर छायावाद से लेकर प्रयोगवाद तक के साहित्य की परीक्षा की है। शमशेर की कृतियों में बिम्ब अधिक सजीव और ऐन्द्रिय हैं। उनके समकालीन रचनाकार बच्चन, अज्ञेय, अंचल, दिनकर, नरेन्द्र शर्मा की कृतियाँ अपनी बिम्बात्मक गुणात्मकता के कारण ही मूल्यवान हैं। शमशेर के काव्य में बिम्ब अधिक संश्लिष्ट और गहराई लिए हुए है। भले ही उसका क्षेत्र सीमित हो किन्तु इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि वे अनुभूति और विचार से संबद्ध होने के कारण अपना औचित्य लिए हुए हैं।
          शमशेर के बिम्ब रंग-ध्वनि-गंधपूर्ण हैं। उनके काव्य में नारी की मांसलता और प्रकृति की सुन्दरता के साथ कहीं-कहीं उनके बिम्ब यथार्थपरक स्वच्छन्द दृष्टि के सूचक हैं। शमशेर की कविता में लौकिक बिम्बों के साथ-साथ अलौकिक से बिम्बों की सृष्टि भी हुई है। शमशेर के काव्य में वस्तु या प्राकृतिक उपादानों का मूर्तकरण-मानवीकरण हुआ है, जो एक प्रकार की बिम्बात्मकता ही है। शमशेर कविता में जहाँ कल्पना है, वहाँ बिम्ब अधिक प्रभावशाली हैं। “कल्पना वह शक्ति है जो सर्वप्रथम कवि का वर्ण्य-विषय या वस्तु से सीधा साक्षात्कार कराती है।”[6]
          शमशेर की काव्य-भाषा प्रधानतः बिम्बात्मक है। सतर्कता के कारण वे बिम्बों का चयन बड़ी कुशलतापूर्वक कर सकते हैं। उनकी कुछ कविताएँ और कुछ और कविताएँ कृतियों के अलावा ‘काल तुमसे होड़ है मेरी’, ‘बात बोलेगी’ में भाषिक संवेदना के साथ बिम्बों-प्रतीकों का कौशल बहुत प्रभावशाली है। इस वैशिष्ट्य के बावजूद अपनी बनावट में शमशेर की कविता बिम्बों-प्रतीकों, रूपकों-उपमानों के सूक्ष्म संवेदन और चिन्तन-मनन की गहराई में डूब कर बखूबी समझी जा सकती है। उनकी काव्यात्मक संवेदना और रचनात्मक चेतना जिन वर्ण्य-विषयों को छूती है वे बिम्ब बनते हैं। उनके बिम्ब-विधान को अग्रांकित कोटियों में रख सकते हैं:-

  1. प्रकृति-बिम्ब
  2. गंध बिम्ब
  3. आस्वाद्य बिम्ब
  4. नाद बिम्ब
  5. दृश्य बिम्ब
  6. स्पर्श बिम्ब
  7. आद्य बिम्ब
  8. स्मृति बिम्ब
  9. भाव बिम्ब
  10. अप्रस्तुत बिम्ब

प्रकृति बिम्ब

शमशेर की कविता में प्रायः प्रकृति बिम्बों के साथ अन्य छोटे-छोटे बिम्बों का सुन्दर समन्वय हुआ है। उनके बिम्ब जन-जीवन के साधारण व्यापार को भी कहीं असाधारण अर्थवत्त प्रदान करते हैं। उनके प्रकृति बिम्बों में संश्लिष्ट रोमानी बिम्बों की मोहकता एवं मार्मिकता है। ये या ऐसे बिम्ब कहीं-कहीं कल्पनाजनित होकर भी अंततः यथार्थ से रूबरू कराते हैं, कहीं यथार्थपरक होकर भी कल्पना से लगते हैं। उनमें सघनता संश्लिष्टता है-वे वैज्ञानिक और आधुनिक जीवन से सम्बद्ध हैं। ‘एक नीला दरिया बरस रहा’, ‘सारनाथ की एक शाम’, ‘सागर तट सौन्दर्य’, ‘एक पीली शाम’, ‘ऊषा’, ‘पूर्णिमा का चाँद’, शाम होने को हुई, ‘सुबह रात्रि’, गीली मुलायम लटें’, ‘बसन्त आया’ आदि कविताएँ ऐसी हैं। ‘एक नीला आइना बेठोस’, ‘सूर्यास्त’ और ‘सागर तट’ कविता पंक्तियों में प्रकृति बिम्बों का बड़ा उदात्त चित्रण है-

(i) एक नीला आइना
               बेठोस सी यह चाँदनी
      और अन्दर चल रहा हूँ मैं
               उसी के महातल के मौन में।
मौन में इतिहास का कन किरन जीवित, एक, बस।[7]

“शमशेर के प्रकृति चित्रण में अतियथार्थवादी झलक बार-बार मिलती है। प्रकृति जितनी उनसे बाहर है, उतनी ही भीतर है। यह चित्रण यथार्थ है तो दूसरा अतियथार्थ। कविता में वर्णन की परम्परा और अनुभव का उन्मेष दोनों घुलते-मिलते हैं, पर शमशेर के यहाँ महत्व दूसरे का है। शायद यही कारण है कि प्रकृति चित्रण में उनका लगाव जितना जल था कि आकाश से है उतना मिट्टी से नहीं।”७

(ii) पी गया हूँ दृश्य वर्षा काः
           हर्ष बादल का
           हृदय में भर कर हुआ हूँ। हवा सा हल्का।
           धुन रही थीं सर
           व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें[8]

शमशेर में विराट प्रकृति आत्मीय कैसे हो उठती है, इसका अच्छा साक्ष्य उन की प्रसिद्ध कविता ‘सागर तट’ प्रस्तुत करती है। जल, पर्वत और वर्षा का व्यापक सन्दर्भ लेकर कवि ने उनसे एक घरेलू बिम्ब की रचना की है। प्रेम की मनोभूति पर इनकी अंतर्प्रक्रिया कल्पना को हौले से सक्रिय करती है-

(iii) चाँदनी में धुल गये हैं
               बहुत से तारे बहुत कुछ
               धुल गया हूँ मैं। बहुत कुछ अब।
               चल रहा है जो। शान्त सा इंगित सा
                न जाने किधर......... [9]

(iv) व्योम में फैले हुए मेहराब के विस्तार
       स्तूप औ, मीनार नभ को थामने के लिए
       उठते हुए।
       विकटतम थे अति विकटतम
       विगत के सोपान पर्वत श्रृंग[10]

(v)
पंक्तियों में टूटती-गिरती
चाँदनी में लौटती लहरें
बिजलियों-सी कौधती लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
बार-बार[11]

गंध बिम्ब

घ्राण-विषयी बिम्ब गन्घ-विषयक अप्रस्तुतों के माध्यम से घ्राण-विषय अनुभूति को उद्बद्ध करते हैं और उसके समग्र प्रभाव को संवेदना के आधार पर मूर्तिमत्ता प्रदान करते हैं। दृश्य को प्राणवत्ता देने में गन्ध योजना सहायक सिद्ध होती है।

(i) धुआँ। धुआँ। सुलग रहा[12]
(ii) जल रहा। धुआँ धुआँ
गवालियर के मजूर का हृदय[13]
(iii) सुलगता हुआ पहरा
या फानूस?[14]
(iv) सीने में सूराख हड्डी का।
आँखों में घास-काई की नमी।[15]
(v) थी महक। शराब की[16]

आस्वाद्य बिम्ब

“दृश्य को स्वाद के स्तर पर अनुभव करना तथा कराना कल्पना व्यापार का सबसे कठिन कार्य है।”८ शमशेर के काव्य में स्वाद संवेदना की कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है इसे ‘रासायनिक’ बिम्ब भी कहते हैं। स्वाद-संवेदना के अनेक चित्र उनकी कविता में मिलते हैं-

(i)
हल्की मीठी चा सा दिन
मीठी चुस्की सी बातें
मुलायम बाहों का अपनाव।[17]
शमशेर की कविता पढ़कर ‘अब यह हम पर है, कि हम अपने सामने और चारों ओर की इस अनन्त और अपार लीला को कितना अपने अन्दर घुला सकते हैं।’ ‘दूब’ कविता की ये पंक्तियाँ जैसे शमशेर की अपनी कविता का ही रूप प्रस्तुत करती हैं। शमशेर की समूची काव्य-प्रकृति उनके वर्ण्य, बिम्ब और लय में अभेद है। साहित्य-समीक्षा में यह बार-बार कही जाती है कि कवि की कोई पंक्ति उद्धृत करके अनिवार्यतः यह नहीं कहा जा सकता कि यह उस रचनाकार की संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है।
(ii) आखिर क्यों मुस्कुराते हैं शराबी अधर?[18]
(iii)नमक जैसे मैले संगमरमर का बादल[19]
(iv) अभाव के व्यंग्य से।[20]
जूते चबाता हुआ-सा मानो[21]
(v) दिलों में जैसे मीठी फाँसें [22]

रूप बिम्ब

कवि अपने भावातिरेक से प्रेरित होरक काव्य का सृजन करता है। काव्य की सफलता यही है कि वह वर्ण्य-विषय सम्बन्धी बिम्बों को पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र से घूमने लगते हैं। रोमान्टिक कविताओं में रूप-बिम्ब की प्रधानता होती है।

(i)
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।[23]
ऊषा के जल में झलकता उज्ज्वल प्रतिबिम्ब जैसे राशि-राशि सौन्दर्य को अनन्त नील गहराइयों में परिव्याप्त कर रहा हो, ऊषा की सुन्दरता जादू या रहस्य की तरह फैल गई हो। विशेषता यह है कि जादू यहाँ कोई अतिप्राकृत तत्व नहीं है, वह पूरे तौर पर प्रकृति से उपजता है।
(ii) बादलों की इन्द्रधनुषी हँसियाँ?[24]
(iii)
काला काला
आँख का तिल है
जोत का द्वार![25]
(iv) अपनी अजीब-सी खनक और चमक लिए
गोरी गुलाबी धूप[26]

स्थिर बिम्ब

काव्य में स्थिर बिम्ब वस्तु के आकार, रूप व रंग को प्रस्तुत कर पाठक की राग चेतना को उद्‌बुद्ध कर, उसके मन को वस्तु की कल्पना के लिए प्रेरित करता है। पाठक के आँखों के सामने वस्तु रूपायित होती है। स्थिर बिम्ब में वस्तु, वातावरण, आकृति और अपनी रंग रेखाओं के साथ पाठक के सामने मूर्त रूप में प्रस्तुत होती है। स्थिर बिम्बों के सृजन के लिए कवि संज्ञा पद, विशेषण, अप्रस्तुत योजना, विशेषण, विपर्यय आदि विभिन्न प्रकार के उपकरणों की सहायता लेता है-

(i) ओ शक्ति के साधक अर्थ के साधक
तू धरती को दोनों ओर से थामे हुए[27]
(ii) रवि! कमल के नाल पर बैठा हुआ मानो
एक एड़ी पर टिकाए मौन[28]
(iii) हिलते-चमकते बहुत हरे छोटे-बड़े पेड़
मेरे चारों ओर खड़े।[29]
(iv) जो कि सिकुड़ा हुआ बैठा था, वो पत्थर[30]
(v) एक धुँधली बादल-रेखा पर टिका हुआ[31]
(vi) दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी
इंतजार की ठेले गाड़ियाँ[32]

स्पर्श बिम्ब

स्पर्श बिम्ब का आधार करुणा-जनित वात्सलता है जिससे प्रभावोत्पादकता बढ़ जाती है। स्पर्श बिम्ब के अन्तर्गत मनःस्थितियों, शारीरिक सम्बन्धों, क्रिया-व्यापारों, शरीरस्थ चेतना, संरचण, या अन्तःवृत्ति मांसल अभिव्यक्ति हुई है। इसलिए इसे आंगिक अथवा जैविक बिम्ब भी कहते हैं। ये बिम्ब मातृ-वात्सल्य के परिचायक हैं।

(i) जहाँ, उसने अपना सर रखा था
तुम्हारे वक्ष पर
वह स्थान बहुत ही मुकद्दस है।[33]
(ii) गीली मुलायम लटें, आकाश
साँवलापन रात का गहरा सलोना
स्तनों के बिम्बित उभार लिए[34]
(iii) एक नीला आईना
बेठोस सी यह चाँदनी[35]
(iv) खसर-खसर एक चिकनाहट
हवा में मक्खन-सा घोलती है।[36]

दृश्य बिम्ब

शमशेर की रचनाओं में दृश्य बिम्बों की प्रधानता है। शमशेर की कविता में दीप्ति रंग-बोधक बिम्ब भी दृश्य बिम्बों के अन्तर्गत स्वीकार किए जाएँगे। प्रकृति चित्रों में मानवीकरण की प्रवृत्ति दृश्य बिम्बों को विश्वसनीयता प्रदान करती है। इनमें हवा, साँझ, चाँद, तारे, पर्वत, नदी, घास, धूप आदि के चित्र अकेलेपन को व्यक्त करते हैं। शमशेर कविता में कई दृश्य- बिम्ब स्थिर चित्रों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तो कई दृश्य बिम्ब मनःस्थितियों के द्योतक हैं। दृश्य या चाक्षुक बिम्ब के परिप्रेक्ष्य में शमशेर-कविता में दीप्ति बिम्ब भी सुग्राह्य हैं-

(i)
धूप कोठरी के आइने में खड़ी
हँस रही है![37]
रंग-योजना के प्रयोग में कवि ने विशेषकर लाल, नीला, पीला, हरा आदि रंगों का उपयोग किया है।
(ii)
नील आभा विश्व की
हो रही है प्रतिपल तमस।
विगत संध्या की
रह गई है एक खिडकी खुलीः
झाँकता है विगत किसका भाव।
बादलों के घने नीले केश
चपलतम आभूषणों से भरे
लहरते हैं वायु संग सब ओर।[38]
(iii) धूप में लिपटा हुआ है आसमान[39]
(iv)
गरीब के हृदय
टँगे हुए
कि रोटियाँ लिए निशान[40]
(v)
मैली, हाथ की धुली खादी
सा है
आसमान।[41]

शमशेर-कविता में मनोवैज्ञानिक बिम्बों की सृष्टि सुबोध सुग्राह्य है। कवि मन में सामान्य मनुष्य की तरह भाव-विचार, धारणाएँ और घटनाओं के बिम्ब-प्रतिबिम्ब बनते रहते हैं। मगर जब वह अपनी सृजनात्मक क्षमता से उसे शब्दायित करता है तो बिम्बों की रचना होती है। मनोवैज्ञानिक बिम्ब वाह्य वस्तु, आकार, रूप का प्रतिबिम्ब होते हैं। इसे मानस बिम्ब भी कहते हैं।

नाद बिम्ब

नाद बिम्ब की दृष्टि से प्राकृतिक ध्वनियों, वस्तु-ध्वनियों, संगीत ध्वनियों को शामिल कर सकते हैं। शमशेर-कविता में नाद बिम्बों का प्रयोग प्रभावशाली है।

(i)
मेघ गरजे,
और मोर दूर कई दिशाओं से
बोलने लगे-पीयूअ! पीयूअ![42]
(ii)
हरहरा कर उठ रहा है
नव
जनमहासागर![43]
(iii)
हवा में सन् सन्
ज्योति के जो हरे तीखे बान
चल रहे हैं।[44]
(iv)
पहली-पहली
गुटरग गुटरग [45]

गति बिम्ब

शमशेर को गतिशील बिम्बों के चित्रण में अभूतपूर्व हस्तलाघव प्राप्त है। इनके माध्यम से उन्होंने बहिर्जगत की गति के सन्दर्भ में आन्तरिक जगत की उस गत्वरता को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिसकी ओर इसके पूर्व बहुत कम रचनाकारों की दृष्टि गई थी। कहीं तो गति-अगति के बीच एक निश्चित बिन्दु पर सारे कार्य-व्यापार को केन्द्रित करके उन्होंने अद्भुत चमत्कार का सृजन किया है। ऊषा और संध्या संबंधी बिम्बों के चित्रण में हमने इस पर विचार किया है। शमशेर गति को प्रगति के साथ जोड़ते हैं-

(i) सीप-सी रंगीन लहरों के हृदय में डोल[46]
(ii) अनवरत् बह रही है।[47]
(iii) तैरती आती बहार[48]
(iv)
सुर्ख फूल ओस में
चुपचाप
लुढ़कते चले जाते[49]
(v) वह सागर
सट्ठा जो, उठा, और और और [50]
(vi) जोकि सिकुड़ा हुआ बैठा था वो पत्थर
सजग-सा होकर सरकने लगा आप से आप[51]
(7) यह रात फिसलन से भरी हुई है। [52]

स्मृति बिम्ब

मानव स्वभावतया अतीत प्रेमी होता है। वह अतीत की स्मृतियों को महत्वपूर्ण स्थान देता है। “अतीत कल्पना का लोक है, एक प्रकार का स्वप्न लोक हैः इसमें तो सन्देह नहीं।......स्मृतियॉ। हमें केवल सुखपूवर्ण दिनों की झाँकियाँ नहीं समझ पड़तीं। वे हमें लीन करती हैं, हमारा मर्म स्पर्श करती हैं।”[53]

 
(i)
कहीं दूर पार से
स्मृतियाँ
बहुत-सी
इकट्ठा हो रही हैं।[54]
(ii)
यह आसमान
चूम रहा है मेरी चौखट
मैं चाँद और सूरज को निकाल
अलमारी में रखे हुए एलबम से[55]
(iii)
आज कहाँ वे गीत जो कल थे
गलियों-गलियों में गाए गए[56]

क्रिया बिम्ब

(i)
एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता
पूरब से पश्चिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है।[57]
(ii)
चुम्बन की मीठी पुचकारियाँ
खिल रही कलियों को फूलों को हँसा रही[58]

आद्य बिम्ब

शमशेर के काव्य बिम्बों की व्यंजना विशिष्ट है। उन्होंने मानस बिम्बों के साथ भावमय वैचारिक और रोमानी विविधवर्णीय बिम्बों की उम्दा अभिव्यक्ति की है। इनके अतिरिक्त उनके काव्य में प्राचीन पुराकथाओं (पुराख्यानों) से संबंधित बिम्ब भी प्रस्तुत हुए हैं। “आद्य बिम्ब सामूहिक अचेतन की सृष्टि होते हैं... इनकी प्रकल्पना युग ने की है। ये आदि अनुभूतियों के संस्कार रूप में आज भी मानव जाति के अचेतन मन में विद्यमान हैं, और अनेक प्रकार से अपनी अभि्यक्ति करते हैं।”१० आद्य-मिथ की सृष्टि की दृष्टि से उनके काव्य में सूर्य, चाँद, धूप, मछली, साँप, शिव आदि के बिम्ब आए हैं। आद्य बिम्ब कविता को कालजयी बनाने में सहायक होते हैं। उसे विशिष्ट अर्थ-सौन्दर्य सौंपते हैं। शमशेर की ‘वाम वाम वाम दिशा’ कविता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

(i)
एक ऋतुओं में विहँसते सूर्य
काल में (तम घोर)-[59]
(ii)
क्या शिवलोक के बीच कोई
विभाजक दीवार
खड़ी की जा सकती है
सिवाय सच्चाई की उज्ज्वलता के[60]
(iii) वरुणा के किनारे एक चक्रस्तूप है
शायद वहीं विश्व का केन्द्र है[61]
(iv)
इक मौन कमल खिलता है
और नयी लहरियों में लगातार
हँसता है।[62]
(v)
बिजलियों-सी कौंदली लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
बार-बार [63]

अलंकृत बिम्ब

अलंकृत बिम्ब कल्पनाप्रसूत होते हैं और काव्य में कलात्मक सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। “अलंकृत बिम्बों का एकमात्र आधार कलात्मक सौन्दयै होता है किसी चमत्कारपूर्ण अथवा दूरान्वयी कल्पना द्वारा इस श्रेणी के बिम्बों की सृष्टि होती है।”[64] दरअसल, अलंकृत बिम्ब वर्ण्य वस्तु-प्रसंग-दृश्यांश को अलंकारों के द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं। शमशेर की कविता में भौतिक-प्राकृतिक दोनों तरह के दृश्यों-बिम्बों की अभिव्यक्ति हुई है, जिनसे मानसिक विनोद या रस का अनुभव होता है। अलंकृत बिम्बों में अप्रस्तुत कवि-कथ्य को अर्थवान बनाते हैं। इसमें अनुभूतियों और अर्थों का भाव सूक्ष्म स्तर पर प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी कथ्य-अनुभव का सामान्य वर्णन किया जाए तो वह पाठक को विशेष प्रभावित नहीं कर सकता और न ही उसमें अधिक सम्प्रेषणीयता होती है। काव्य में अलंकार विधान की विशिष्टता प्रतिपादित की गई है। शमशेर की कविता में अप्रस्तुत विधान की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं की अग्रांकित पंक्तियों में विपर्यय का उपयोग कितना सुन्दर हुआ है। “कविता में बिम्ब भिन्न-भिन्न कोणों पर रखे गए दर्पण जैसे होते हैं। ज्यों-ज्यों कविता का विषय विकसित होकर आगे बढ़ता है, वह अपने विविध रूपों में इन दर्पणों में प्रतिच्छायित होता है। ये दर्पण जादू के दर्पण हैं, वे केवल विषय-वस्तु को ही नहीं प्रतिच्छायित करते हैं, वे इसे नाम और रूप भी प्रदान करते हैं।”[65]

(i)
सूर्य मेरी पुतलियों में स्नान करता
केश वन में झिल मिलाकर डूब जाता
स्वप्न-सा निस्तेज गतचेतन कुमार [66]
(ii)
एक नीला दरिया बरस रहा है
और बहुत चौड़ी हवाएँ
मकानात है मैदान
किस कदर ऊबड़-खाबड़
मगर
एक दरिया
और हवाएँ
मेरे सीने में गूँज रही हैं।[67]
(iii)
बादलों के घने नीले केश
चपलतम आभूषणों से भरे
लहरते हैं वायु संग सब ओर।
अल्लमत यदि मैं संस्कृत में
संध्या कर ली तो तू
मुझे दोजख में डालेगा?[68]
(iv)
ईश्वर अगर मैंने अरबी में
प्रार्थना की तू मुझसे
नाराज हो जाएगा।[69]

अप्रस्तुत को प्रस्तुत करने के लिए कवि तुलना, सादृश्य, साम्य, विपर्यय, सान्निध्य, आवेग संकर्षण तथा एकरूपता के संयोग का सामान्यतः उपयोग करता है। छायावादोत्तर कवियों में गिरिजा कुमार माथुर, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध, अंचल, सर्वेश्वर, श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी, धूमिल आदि की कविताओं में इसका प्रायः प्रयोग हुआ है। शमशेर के काव्य में अप्रस्तुत कहीं-कहीं आकारमूलक रूप में भी प्रस्तुत हुआ है-

(v)
शिला का खून पीती थी
वह जड़, जोकि पत्थर थी स्वयं।
सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलती
टहनियों-सी,
और वह पक्का चबूतरा, ढाल में चिकनाः
सुतल था, आत्मा के कल्पतरु का?[70]
जिस प्रकार उन्होंने ‘पक्का चबूतरा’ को उपरोक्त कविता में आकार प्रदान किया है उसी प्रकार ‘सींग और नाखून’ कविता में आलंकारिक बिम्बों को यूँ रूपायित किया है-
(iv)
सींग और नाखून
लोहे के बख्तर कन्धों पर।
सीने में सूराख हड्डी का।
आँखों में घास-काई की नमी।
एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उल्टी कलम थामे।
तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।
जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर।[71]

आकारमूलक अप्रस्तुत विधान की बड़ी प्रभावी प्रस्तुति नागार्जुन, नरेश मेहता, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, जीवन प्रकाश जोशी, जगूड़ी, रमेश गौड़ की कविताओं में हुई है। इन कवियों ने नये पन की तलाश में परम्परा की जीवन्तता को बिम्बायित किया है। उनकी कविता में जन-जीवन समाजधर्मी विविधवर्णीय रूप-रंग के बिम्ब प्रतीक हैं जो उन्हें समकालीन समवयस्क कवियों से अलग करते हैं। शमशेर ने अप्रस्तुत विधान के अन्तर्गत उपमामूलक बिम्बों- चाँदनी, सीपी, मोती, शंख, ओंठ, नारंगी, अधर, कुहरा, धूप, छाँव, आदि के प्रयोग से ताजगी पैदा करने का सार्थक प्रयास किया है-

कुसुमों से चरनों का लोच लिए
थिरक रही हैं
भीनी भीनी सुगन्धियाँ[72]

इसी प्रकार-

और दरिया राग बनते हैं।-कमल
फानूस-रातें मोतियों की डाल-। दिल में
साड़ियों के से नमूने चमन में उड़ते छबीले, वहाँ
गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह-
जागता भी। मौन सोता भी, न जाने
एक दुनिया की। उम्मीद-सा। किस तरह![73]

उक्त बिम्बों के अतिरिक्त शमशेर के काव्य में अप्रसृत और उदात्त बिम्बों का विधान भी है। अप्रसृत बिम्ब उक्त सभी बिम्बों से अलग प्रतीत होता है। इसमें शब्द-विस्तार या शब्द-बाहुल्य नहीं होता। कुल मिलाकर, शमशेर के काव्य का उत्तरार्ध बिम्ब-बहुल है। ये कवि की अनुभूति को गहराई और ऊँचाई प्रदान करते हैं। उनके काव्य में जहाँ एक ओर वस्तुपरक यथार्थ बिम्ब है वहीं दूसरी ओर रोमानी यानी स्वच्छन्द बिम्बों की प्रकल्पना भी की जा सकती है। उनकी विता में प्रकृति के उपादानों और अनुभूतियों का बड़ा अनूठा तालमेल है। कहीं-कहीं साहचर्य-समन्वय भी व्यक्त हुआ है। कल्पना-शक्ति का सौष्ठव देखते ही बनता है। कलागत उपलब्धि के अर्थ में शमशेर की कविता अपना विशिष्ट मूल्य रखती है। इस दृष्टि से उनके काव्य में वाह्य उद्दीपन (शब्द-स्पर्श-रस और गंध बिम्बों) के निर्माण की प्रक्रिया बड़ी सूक्ष्म है। यूँ मूल अनुभूति की अतीतता का ज्ञान उनके बिम्बों में होता है।

बिम्बों का अस्तित्व मानसिक अर्थ में विशेष होता है। यदि बिम्ब स्वतन्त्र रूप से काव्य में आते हैं, तो वे उतने प्रभावी नहीं होते जितने होने चाहिए इसलिए इनकी रचना में सर्जक के विगत अनुभवों का अधिक योगदान रहता है।

शमशेर के काव्य में बिम्ब उसकी रचना तन्त्र के सम्पन्न और भाषा को समृद्ध करते हैं। उनके बिम्ब जीवन्त हैं। उनमें बासीपन नहीं है, ताजगी है। इन बिम्बों में उनका सौन्दर्य बोध निहित है। जहाँ बिम्बात्मकता नहीं है, वहाँ गद्यात्मकता सी आ गयी है। शमशेर के बिम्ब-विधान की विशेषता है कि उनकी कविताओं में वर्ण्य-विषय और बिम्ब अनायास एक दूसरे पर आरोपित हैं। कह सकते हैं कि पूर्ववर्ती रचनाओं की अपेक्षा उत्तरवर्ती रचनाओं में (वायवियत के बावजूद) निर्मित बिम्ब लोकोन्मुखता लिए हैं। भाषा की सार्थक शक्ति-सहयोग पाकर वे पर्याप्त प्रभावशाली और आकर्षक बन गए हैं। उनके बिम्बों-प्रतीकों में विविधता, अर्थगर्भिता और प्रयोगधर्मिता है जो उन्हें छायावादोत्तर विशिष्ट रचनाकारों में एक नयी पहचान देती है।

मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह के शब्दों में, “शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक भारतीय कविता के निर्माताओं में से एक थे, उन्होंने पूरी अर्धशती हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि में समर्पित की। वे अपनी प्रयोगधर्मिता, विशिष्ट बिम्ब विधान और गहन मानवीयता के लिए स्मरण किए जाएँगे।”[74]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चिन्तामणि - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पृ. 228
  2. सी.डी. लेविस - पोयटिक इमेज, पृ. 22
  3. हैलेः डॉ० नगेन्द्र द्वारा उद्धृत काव्यात्मक बिम्ब, पृ. 5
  4. रेनेवेलेक एण्ड अस्टिन वारेन - थिअरी ऑफ लिटरेचर, पृ.187
  5. कविता की तीसरी आँख - प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ. 30
  6. गिरिजा कुमार माथुरः काव्य दृष्टि और अभिव्यंजना -डॉ. राहुल, पृ. 153
  7. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 21 )
  8. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 37)
  9. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 21)
  10. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 33)
  11. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 38)
  12. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 40)
  13. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 41)
  14. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 144)
  15. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 154)
  16. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 68)
  17. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 36)
  18. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 36)
  19. (वही, पृष्ठ- 57)
  20. (शमशेरः प्रतिनिधि कवितायें, पृष्ठ- 19)
  21. (शमशेर प्रति० कवि पृष्ठ- 19)
  22. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 51)
  23. (शमशेर की प्रतिनिधि कविताएँ, पृष्ठ- 102)
  24. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 49)
  25. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 51)
  26. (कुछ और कविताऍं, पृष्ठ- 158)
  27. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 32)
  28. (वही, पृष्ठ- 70)
  29. (वही, पृष्ठ- 85)
  30. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 44)
  31. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 128)
  32. (वही, पृष्ठ- 131)
  33. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 64)
  34. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 48)
  35. (वही, पृष्ठ- 21)
  36. (वही, पृष्ठ- 62)
  37. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 37)
  38. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 87)
  39. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 32)
  40. (वही, पृष्ठ- 41)
  41. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 60)
  42. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 20)
  43. (वही, पृष्ठ- 43)
  44. (चुका भी हूँ मै नहीं, पृष्ठ- 36)
  45. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 71)
  46. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 35)
  47. (वही, पृष्ठ- 45)
  48. (वही, पृ०. 62)
  49. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 32)
  50. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 71)
  51. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 36)
  52. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 142)
  53. आचार्य शुक्ल - चिन्तामणि प्रथम भाग, पृष्ठ- 153
  54. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 53)
  55. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 153)
  56. (काल तुमसे होड़ है मेरी, पृष्ठ- 42)
  57. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 87)
  58. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 62)
  59. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 15)
  60. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 50)
  61. (वही, पृष्ठ- 31)
  62. (वही, पृष्ठ- 107)
  63. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 38)
  64. आधुनिक हिन्दी कविता में शिल्प - कैलाश वाजपेयी, पृष्ठ-284
  65. शमशेरः कवि से बड़े आदमी - सं० महावीर अग्रवाल, पृष्ठ- 113
  66. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 24)
  67. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 17)
  68. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 108)
  69. (चुका भी हूँ मैं नहीं, पृष्ठ- 87)
  70. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 155)
  71. (कुछ और कविताएँ, पृष्ठ- 154)
  72. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 63)
  73. (कुछ कविताएँ, पृष्ठ- 65)
  74. शमशेरः कवि से बड़े आदमी - सं० महावीर अग्रवाल, पृष्ठ- 113

मौर्य, डॉ. मानवी (कुशवाहा)। शमशेर बहादुर सिंह की काव्य भाषा में बिम्ब विधान (हिन्दी) साहित्यकुञ्ज। अभिगमन तिथि: 30 जनवरी, 2015।

बाहरी कड़ियाँ

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