श्वेताश्वतरोपनिषद

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कृष्ण यजुर्वेद शाखा के इस उपनिषद में छह अध्याय हैं। इनमें जगत का मूल कारण, ॐकार-साधना, परमात्मतत्त्व से साक्षात्कार, ध्यानयोग, योग-साधना, जगत की उत्पत्ति, संचालन और विलय का कारण, विद्या-अविद्या, जीव की नाना योनियों से मुक्ति के उपाय, ज्ञानयोग और परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन किया गया है।

प्रथम अध्याय

दूसरा अध्याय

तीसरा व चौथा अध्याय

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरत्नय: पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्रन्नन्योऽभिचाकशीति॥-(चतुर्थ अध्याय 6)

पांचवां व छठा अध्याय

विद्या-अविद्या

नश्वर जगत का ज्ञान 'अविद्या' है और अविनाशी जीवात्मा का ज्ञान 'विद्या' है। जो विद्या और अविद्या पर शासन करता है, वही परमसत्ता है। वह समस्त योनियों का अधिष्ठाता है। विद्या-अविद्या से परे वह परमतत्त्व है। वह सम्पूर्ण जगत का कारण है। वह 'परब्रह्म' है। वह जिस शरीर को भी ग्रहण करता है, उसी के अनुरूप हो जाता है।

वह सर्वज्ञ है।

एको देव: सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्ष सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता केवली निर्गुणश्च॥ -(छठा अध्याय-11)

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