सुन्दरदास खण्डेलवाल  

सुन्दरदास खंडेलवाल भक्तिकाल के कवि थे। उनका जन्म चैत्र शुक्ल 9, संवत 1653 में दौसा नामक स्थान, जयपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम 'परमानंद' और माता का नाम 'सती' था। जब ये 6 वर्ष के थे, तब दादूदयाल दौसा में गए थे। तभी से यह दादूदयाल के शिष्य हो गए और उनके साथ रहने लगे। संवत 1660 में दादूदयाल का देहांत हुआ। तब तक ये नराना में रहे। फिर जगजीवन साधु के साथ अपने जन्मस्थान दौसा में आ गए। वहाँ संवत 1663 तक रहकर फिर जगजीवन के साथ काशी चले आए।

शिक्षा

काशी में सुन्दरदास जी ने 30 वर्ष की अवस्था तक संस्कृत व्याकरण, वेदान्त और पुराण आदि की शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत के अतिरिक्त ये फ़ारसी भाषा भी जानते थे। काशी से लौटने पर वे राजपूताना के फ़तेहपुर और शेखावाटी नामक स्थान पर आकर रहे। वहाँ के नवाब अलिफ़ ख़ाँ इन्हें बहुत मानते थे।

व्यक्तित्व

इनका डीलडौल बहुत अच्छा, रंग गोरा और रूप बहुत सुंदर था। स्वभाव अत्यंत कोमल और मृदुल था। ये बाल ब्रह्मचारी थे और स्त्री की चर्चा से सदा दूर रहते थे।

भाषा शैली

निर्गुण पंथियों में ये ही ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिन्हें समुचित शिक्षा मिली थी और जो काव्य कला की रीति आदि से अच्छी तरह परिचित थे। अत: इनकी रचना साहित्यिक और सरस है। भाषा भी काव्य की मँजी हुई ब्रजभाषा है। भक्ति और ज्ञानचर्चा के अतिरिक्त नीति और देशाचार आदि पर भी इन्होंने बड़े सुंदर पद कहे हैं। दूसरे संतों ने केवल गाने के पद और दोहे कहे हैं, पर इन्होंने सिद्ध हस्त कवियों के समान बहुत से कवित्त, सवैये रचे हैं। यों तो छोटे मोटे इनके अनेक ग्रंथ हैं पर सुन्दरविलास ही सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें कवित्त, सवैये ही अधिक हैं। इन कवित्त सवैयों में यमक, अनुप्रास और अर्थालंकार आदि की योजना बराबर मिलती है। इनकी रचना काव्यपद्धति के अनुसार होने के कारण और संतों की रचना से भिन्न प्रकार की दिखाई पड़ती है। संत तो ये थे ही पर कवि भी थे। इससे समाज की रीति नीति और व्यवहार आदि पर भी इनकी बड़ी विनोदपूर्ण उक्तियाँ हैं, जैसे गुजरात पर आभड़ छोत अतीत सों होत बिलार और कूकर चाटत हाँडी, मारवाड़ पर वृच्छ न नीर न उत्तम चीर सुदेसन में गत देस है मारू, दक्षिण पर राँधत प्याज, बिगारत नाज, न आवत लाज, करै सब भच्छन; पूरब देश पर ब्राह्मन, क्षत्रिय, वैसरु, सूदर चारोइ बर्न के मच्छ बघारत।

निधन

इनका देहांत कार्तिक शुक्ल 8, संवत् 1746 को साँगानेर में हुआ।

रचनाएँ

  • इनकी रचना के कुछ उदाहरण हैं -

गेह तज्यो अरु नेह तज्यो पुनि खेह लगाइ कै देह सँवारी।
मेह सहे सिर, सीत सहे तन, धूप समै जो पंचागिनि बारी।
भूख सही रहि रूख तरे, पर सुंदरदास सबै दु:ख भारी।
डासन छाँड़िकै कासन ऊपर आसन मारयो, पै आस न मारी

  • व्यर्थ की तुकबंदी और ऊटपटाँग बानी इनको रुचिकर न थी। इसका पता इनके इस कवित्त से लगता है -

बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,
ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए।
जोरिए तो तब जब जोरिबै की रीति जानै,
तुक छंद अरथ अनूप जामे लहिए
गाइए तौ तब जब गाइबे को कंठ होय,
श्रवन के सुनत ही मनै जाय गहिए।
तुकभंग, छंदभंग, अरथ मिलै न कछु,

सुंदर कहत ऐसी बानी नहिं कहिए

  • सुशिक्षा द्वारा विस्तृत दृष्टि प्राप्त होने से इन्होंने और निर्गुणवादियों के समान लोकधर्म की उपेक्षा नहीं की है। पातिव्रत्य का पालन करने वाली स्त्रियों, रणक्षेत्र में कठिन कर्तव्य का पालन करने वाले शूरवीरों आदि के प्रति इनके विशाल हृदय में सम्मान के लिए पूरी जगह थी। -

पति ही सूँ प्रेम होय, पति ही सूँ नेम होय,
पति ही सूँ छेम होय, पति ही सूँ रत है।
पति ही जज्ञ जोग, पति ही है रस भोग,
पति ही सूँ मिटै सोग, पति ही को जत है
पति ही है ज्ञान ध्यान, पति ही है पुन्य दान,
पति ही है तीर्थ न्हान, पति ही को मतहै।
पति बिनु पति नाहिं, पति बिनु गति नाहिं,
सुंदर सकल बिधि एक पतिव्रत है

सुनत नगारे चोट बिगसै कमलमुख,
अधिक उछाह फूल्यो मात है न तन में।
फैरै जब साँग तब कोउ नहीं धीर धारै,
कायर कँपायमान होत देखि मन में
कूदि कै पतंग जैसे परत पावक माहिं,
ऐसे टूटि परै बहु सावत के गन में।
मारि घमसान करि सुंदर जुहारै श्याम,
सोई सूरबीर रुपि रहै जाय रन में

  • इसी प्रकार इन्होंने जो सृष्टि तत्व आदि विषय कहे हैं वे भी औरों के समान मनमाने और ऊटपटाँग नहीं हैं, शास्त्र के अनुकूल हैं। इस पद में ब्रह्म के आगे और सब क्रम सांख्य के अनुकूल है -

ब्रह्म तें पुरुष अरु प्रकृति प्रगट भई,
प्रकृति तें महत्तात्तव, पुनि अहंकार है।
अहंकार हू तें तीन गुण सत, रज, तम,
तमहू तें महाभूत बिषय पसार है
रजहू तें इंद्री दस पृथक् पृथक् भई,
सत्ताहू तें मन, आदि देवता विचारहै।
ऐसे अनुक्रम करि शिष्य सूँ कहत गुरु,
सुंदर सकल यह मिथ्या भ्रमजार है


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टीका टिप्पणी और संदर्भ


आचार्य, रामचंद्र शुक्ल “प्रकरण 2”, हिन्दी साहित्य का इतिहास (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: कमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ सं. 70-72।

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