हरियाणी बोली  

  • 'हरियाणा' शब्द की व्युत्पत्ति विवादास्पद है।
  • 'हरि+यान' [1], 'हरि+ अरण्य' (हरा वन), 'हरिण+ अरण्य' [2] तथा 'अहीर + आना' [3] की तरह आदि कई मत दिए गए हैं, किंतु कोई भी सर्वमान्य नहीं है। यों अंतिम की संभावना अधिक है।
  • हरियाणी का विकास उत्तरी शौरसेनी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से हुआ है।
  • खड़ी बोली, अहीर वाटी, मारवाड़ी, पंजाबी से घिरी इस बोली को कुछ लोग खड़ीबोली का पंजाबी से प्रभावित रूप मानते हैं।
  • इसका क्षेत्र मोटे रूप से हरियाणा, पंजाब का कुछ भाग तथा दिल्ली का देहाती भाग है।
  • इसकी मुख्य बोलियाँ जाटू तथा बाँगरू हैं। कुछ लोग 'बाँगरू' नाम का प्रयोग 'हरियाणी' के लिए करते हैं।
  • हरियाणी में केवल लोक- साहित्य है जिसका कुछ अंश प्रकाशित हो भी चुका है। अनेक स्थानों पर ल का ठ्ठ (काठ्ठा, माठ्ठा), एक व्यंजन के स्थान पर दित्व (बाब्बू, मीत्तर, गाड्डी), न का ण (होणा), ड़ का ड (बडा, पेड), सहायक क्रिया हूँ, है, हैं, हो के स्थान पर सूँ, सै, सैं, सो; को के स्थान पर ने (राम ने जाना है) आदि इसकी कुछ मुख्य विशेषताएँ हैं।



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टीका टिप्पणी

  1. कृष्ण का यान इधर से ही द्वारिका गया था
  2. हिरनों का जंगल
  3. राजपूताना, तिलंगाना

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