हिन्दी की अखिल भारतीयता का इतिहास -प्रो. दिनेश्वर प्रसाद  

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लेखक- प्रो. दिनेश्वर प्रसाद

          यद्यपि हिन्दी शब्द का प्रयोग हरियाणा लेकर बिहार तक प्रचलित बाँगरु, कौरवी, ब्रजभाषा, कन्नौजी , राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी, मैथिली आदि कई भाषाओं के लिए यिा जाता है, किंतु वर्तमान शताब्दी में व्यवहार की दृष्टि से इसका अर्थ खड़ी बोली हो गया है। हिन्दी के रूप में यही खड़ी बोली भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत संपर्क भाषा है तथा हिन्दी भाषी राज्यों में राजभाषा। भौगोलिक दृष्टि से विचार करने पर यह दिल्ली, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ आदि थोड़े से ज़िलों तक सीमित भाषा है, जो शताब्दियों तक ब्रजभाषा और अवधी कुल तुलना में उपेक्षितप्राय रही है और ऐतिहासिक कारणों के फलस्वरूप भारतव्यापी हो गई है। ऐतिहासिक कारणों के प्रसाद से ही यह न केवल आधुनिक युग में भारत से बाहर के कई देशों में फैल गई हे, वरन् सुदूर अतीत से ही अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करती रही है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र से समय समय पर पश्चिम की ओर जनसमुदायों का आव्रजन हुआ है, जिनके दो सबसे बड़े साक्ष्य आज भी मौजूद है। वे हैः यूरोप के रोमनी या जिप्सी तथा सोवियत संघ के इंकी या इन्दुस्तानी, जो ताजिकस्तान और उजबेकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करते हैं। जिप्सी या रोमनी भाषा के अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि इसे बोलने वाले सुमुदाय संभवतः हरियाणा से गए होगें। पिछली शताब्दी में सर लाॅरेस ग्रुम ने अपने ‘जिप्सी फोकटेल्स’ (1899 ई.) नामक ग्रंथ की भूमिका में इस भाषा के जो नमूने दिए हैं, वे आज की खड़ी बोली के बहुत ही समीप हैः जैसे ‘जा दिक’, ‘कोन छल वेल वुदर’ (जाओ, देखो तो, कौन लड़का उधर है) और ‘जा देख कोन छल आया द्वार को’ (जाओ देखो, कौन लड़का दरवाज़े पर आया है।) उन्होंने यह संभावना व्यक्त की है कि जिप्सी-भाषी ईसवी सन् की दसवी सदी से बहुत पहले भारत से बाहर गए होगें। इंकी या इन्दुस्तानी नामक भाषा की खोज डाॅ. भोलानाथ तिवारी ने की है। वह इसे ‘ताजुज्बेकी’ कहते हैं। ‘ताजुज्बेकी’ (1970 ई.) में उन्होने यह स्पष्ट किया है कि यह भाषा जिसमें एक, दो, तिन (तीन), में, (मैं), हम, तुम ओ, (वह) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है तथा जिसकी व्याकरणिक संरचना खड़ी बोली के बहुत समीप है, मूलतः हिन्दी है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि आव्रजनों के कारण हिन्दी आधुनिक युग में देशांतरव्यापी हुई, तो आज से बहुत पहले भी इन्ही कारणों से इसका अंतर्राष्ट्रीय प्रसार हुआ है।
          इसके भारतव्यापी प्रसार का इतिहास कम रोचक नहीं है। यद्यपि प्रायः सभी भाषा वैज्ञानिकों ने खड़ी बोली का संबंध शौरसेनी अपभ्रंश से माना है, किंतु ‘हिन्दीशब्दानुशासन’ (1958 ई.) में किशारीदास वाजपेयी ने इस विचार परंपरा का सप्रमाण खंडन किया है। उन्होंने अपेक्षित साक्ष्य प्रस्तुत कर यह बतलाया हैकि प्राचीन कुरु जनपद की इस भाषा की पूर्ववर्ती अपभ्रंश अर्थात् दूसरी प्राकृत के उदाहरण प्राप्त नहीं हैः ‘प्राकृत का रूप प्राप्त नहीं होता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अस्तित्व नहीं होगा। जैसे आज भी बहुत सी भाषाओं में साहित्य रचना नहीं होती, वैसे पहले भी बहुत सी प्राकृत अपभ्रंश भाषाओं में साहित्य नहीं लिखा गया। कुरु जनवद की प्राकृत ऐसी ही थी। बाजपेयी जी इस प्राकृत या अपभ्रंश को ‘कौरवी’ कहते हैं। निश्चय ही प्राचीन कौरवी से विकसित आधुनिक भारतीय कौरवी या खड़ी बोली दसवी शताब्दी से पहले की है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि पड़ोस की ब्रजभाषा और राजस्थानी के बाद ही इसमें साहित्य लेखन प्रारंभ हुआ और वह भी उस समय, जब दिल्ली में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हुई। इसके आरंभिक साहित्यिक नमूने या तो मुसलमान कवियों और लेखकों की रचनाओं में मिलते हैं या देश के विभिन्न भागों के साधुु सन्न्यासियों द्वारा रचित वाणियों में। पौराणिक मतावलंबी भक्त कवियों ने साहित्यिक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इसे महत्व नहीं दिया। इसके कारणों की परीक्षा के लिए हमें उस धार्मिक परिदृश्य पर विचार करना होगा, जिसका निर्माण पुराणों पर आधारित सगुण भक्ति द्वारा हुआ था। चैबीस अवतारों में क्रमशः दस अवतारों को अधिक महत्व मिला, जिसका एक उदाहरण क्षेमेद्रकृत दशावतार चरित है। किंतु इन दस अवतारों में भी राम और कृष्ण अधिक महत्व प्राप्त करते गए और अंततः समस्त उत्तर भारत की दैवत भावना इन्ही में केद्रीभूत हो गई। हिन्दी भाषी क्षेत्र में राम का आवलंबन लेने वाले काव्य की रचना मुख्यतः अवधी में हुई और कृष्ण से सबधित काव्य मुख्यतः ब्रजभाषा में लिखा गया। अवध के साथ राम और ब्रज के साथ कृष्ण के संबंध के कारण ही क्रमशः अवधी और ब्रज के साथ कृष्ण के संबंध के कारण ही क्रमशः अवधी और ब्रजभाषा को इतना महत्व मिला, यद्यपि अवध के सूफी कवियों ने भी अवधी का प्रयोग किया। अपने विशिष्ट धार्मिक आसंगों के कारण ही हिन्दी प्रदेश में ये भाषाएँ इतनी महत्वपूर्ण हो गई कि इनके सामने इस क्षेत्र की अन्य भाषाएँ उपेक्षितप्राय रही। खड़ी बोली ऐसी ही उपेक्षित प्राय भाषा थी, जिसके व्यवहार का कोई औचित्य या प्रारकता तत्कालीन पौराणिक मतावलंबी हिन्दी कवियों के लिए नहीं थी।
          किंतु जिस समय उत्तर भारत में विभिन्न भक्ति संप्रदायों का प्रवेश हुआ था, उससे पूर्व ही दिल्ली में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी। इस साम्राज्य की स्थापना के समय दिल्ली में जो मुसलमान आकर बस गए, उनमें सबसे बड़ी संख्या अविभाजित पंजाब के नव मुस्लिमों की थी, जिनकी बोली का राजधानी और उसके आस पास के क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। राजधानी और उसके आसपास की जनभाषा में परिचय दिल्ली के स्वदेशी और विदेशी मुस्लिम प्रशासकों और सैनिकों के लिएन केवल स्वाभाविक था, वरन् आवश्यक भी। स्थानीय स्त्रियों से विवाह तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण स्थानीय भाषा से परिचय की विवशता इन दो बातों के प्रभाव स्वरूप दो तीन पीढ़ियों में ही दिल्ली के शासकों के घर की बोली खड़ी बोली हो गई और शासक जाति के साहित्यकारों ने फारसी के अतिरिक्त खड़ी बोली में भी काव्य रचना की। आश्चर्य नहीं, यदि अमीर खुसरो (1255-1324) ने हिन्दवी (हिन्दी) को अपनी मातृभाषा कहा और इसमें न केवल कविता की, वरन् इसके माधुर्य और गंभीरता पर गर्व भी प्रकट किया। अमीर खुसरों द्वारा प्रयुक्त होने के बाद खड़ी बोली मुख्यतः मुसलमान कवियों और लेखकों द्वारा ही साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त होती रही।
          खड़ी बोली के भारतव्यापी प्रचार में दिल्ली के मुस्लिम साम्राज्य की राजधानी होने की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है, क्योंकि भारत में मुस्लिम के विस्तार के साथ इसका भी प्रसार हुआ है। खिलजी वंश के राजत्व काल में उत्तर भारत के बंगाल तक का क्षेत्र इस साम्राज्य का अंग बन गया और उत्तर भारतीय नगरों और कस्बों, सैनिक छावनियों ओर छोटे-बड़े प्रशासन केंद्रों की, संपर्क भाषा खड़ी बोली हो गई। इन केंद्रों में दिल्ली और उसके आसपास के खड़ी बोली भाषी मुस्लिम और हिन्दू राजकर्मचारी, सैनिक और व्यापारी बस गए। उनके आवागमन का क्रम कई शताब्दियों तक चलता रहा। इससे उत्तर भारतीय नगरों और कस्बों की शिष्ट संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी की जड़े मजबूत होती चली गई।
          मुस्लिम साम्राज्य के दक्षिण भारत में विस्तार के साथ हिन्दी का प्रसार आंध्र, कर्नाटक आदि प्रदेशों में भी हुआ। अलाउद्दीन ने 1296 ई. में दक्षिण भारत के देवगिरि पर आक्रमण किया। बाद के आक्रमणों द्वारा उसके राजत्व काल में विध्यापर्वत क्षेत्र से लेकर दक्षिण के समुद्र तट की भूमि दिल्ली साम्राज्य के अधीन हो गई। मुहम्मद तुगलक के समय दक्षिण का अधिकांश भाग इस साम्राज्य के अधीन हो गया, जिसे उसने पाँच भागों में विभाजित किया। उसने देवगिरि या दौलताबाद में अपनी राजधानी बनाई, जो मध्यकालीन इतिहास की बहुचर्चित घटनाओं में हैं। यद्यपि उसने परिस्थितियों के दबाव के कारण पुनः दिल्ली को राजधानी बनाया, किंतु उसके साथ बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली के मुसलमानों और हिन्दुओं का आव्रजन दक्षिण भारत में हुआ। उनका एक बड़ा समुदाय दक्षिण में स्थायी रूप में बस गया, किंतु उनके आव्रजन से पूर्व ही, अलाउ्दीन के राजत्वकाल में खड़ी बोली बोलने वाले हिन्दू और मुस्लिम राजकर्मचारियों, सैनिक और व्यापारियों के दल दक्षिण भारत में फैल चुके थे। बाद में अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा और बीदर में निजामशाही, आदिलशाही, कुतुबशाही और बरीदशाही वंशों ने स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की, जिनमें बरीदशाही वंश का अस्तित्व शीघ्र ही समाप्त हो गया। दक्षिण के साथ मुग़लों के युग में भी दिल्ली की राजनीतिक प्रतियोगिताएँ चलती रही तथा आक्रमणों का क्रम अटूट जैसा रहा। परिणाम यह हुआ कि दक्षिण में खड़ी बोली न केवल जड़ पकड़ती गई, बल्कि यह वहाँ के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य का स्वाभाविक अंग बन गई। वहाँ दक्कनी या दक्खिनी के नाम से खड़ी बोली का विपुल साहित्य रचना गया। इसमें न सिर्फ साहित्य लेखन का कार्य हुआ, वरन बीजापुर, गोलकुंडा, आदि मुस्लिम रियासतों में राजकाज की भाषा के रूप में इसे प्रतिष्ठा मिली। उल्लेख्य है कि जिस खड़़ी बोली को भारतीय संविधान द्वारा स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक महत्व मिला है, उसे लगभग प्रायः छह सौ वर्ष पूर्व ही दक्षिण में यह महत्व प्राप्त हो चुका था।
          दकनी या दक्खिनी हिन्दी के रचनाकारों की संख्या बहुत बड़ी है। खड़ी बोली गद्य की पहली प्रप्य पुस्तक ख्वाजा बंदेनवाज गेसूदराज की ‘मिराजुल आशिकीन’ है, जो सूफी विचारधारा से संबंधित है। इसकी रचना पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में हुई है। गेसूदराज की अन्य कई गद्य रचनाओं का भी उल्लेख मिलता है। मुल्ला वजही की ‘सबरस’ (1636 ई.) शायद दक्खिनी गद्य परंपरा की सर्वाेत्तम रचना हे। दक्खिनी में मीराजी, निजामी, मुहम्मदकुली कुतुबशाही आदि ने उत्कृष्ण कोटि की कविता की है। दक्खिनी कोई कृत्रिम भाषा नहीं थी, बल्कि यह वहाँ आव्रजन कर बस गए समुदायों की सहज, स्वाभाविक मातृभाषा थी। इसका प्रमाण मीराजी या शाह मीरन की निम्नलिखित पंक्तियों में मौजूद हैः

हमीं बोल अरबी करे
और फारसी बहुतेरे
यो हिन्दुवी बोले तब
इसका अर्ध भावे सब।
यह भाषा भले सो बोले
पुन इसका भाव खोले
वो अरबी बोल न जाने
न फारसी पछाने।

इन पंक्तियों से यह स्पष्ट है कि अरबी और फारसी इन लोगों के लिए पराई भाषा जैसी थी। हिन्दवी (हिन्दी) बोलकर ही इन्हें अपना आशय समझाया जा सकता था।
आज की खड़ी बोली के इतिहास और इसके वर्तमान स्वरूप के अध्ययन के लिए दक्खिनी का बहुत महत्व है। व्याकरणिक संरचना की दृष्टि से यह बाँगरु के बहुत समीप है। बाँगरु की तरह इसमें भी अकारान्त पुल्लिंग और स्त्रीलिंग संज्ञा शब्दों का बहुवचन रूप आँ लगाकार बनाया जाता है, जैसे घर से घराँ, किताब से किताबाँ आदि। इसमें और के लिए होर का प्रयोग होता है तथा ने का प्रयोग कर्ता कारक के ही प्रसंग में नहीं, वरन् कर्म और संप्रदान कारकों के प्रसंग में भी होता है। ये प्रवृत्यिाँ बाँगरु (और पंजाबी) में आज भी जीवित हे। इसमें से के लिए सूँ, स्यो और स्यौं, को के बदले कूं, कभी के लिए कभू आदि रूप मिलते हैं, जैसेः
(1) अरे ऊधौ सुनौ यह दु:ख हसन सूं।
कहौ टुक जाय परदेसी सजन सूं’
(2) ‘अक्ल अच्दे तो अपस कूं होर दूसरे कूं पछाने।’
उत्तर भारत में सत्रहवी अठारहवीं शताब्दी में खड़ी बोली गद्य की जो रचनाएँ प्रस्तुत हुई, उनमें भी ये भाषिक विशेषताएँ मिलती है, जैसेः कुतुबशतक (1613 ई.), गणेश गोसठ (1658 ई.), भोगलुपुरान (1705 ई.) आदि में दक्खिनी के प्रसंग में यह बात विशेष रूप से रेखांकित करने योग्य है कि उत्तर भारत में लिखित इन गद्य रचनाओं की तरह पंजाबी, राजस्थानी, ब्रज और कन्नौजी आदि के प्रभावों से युक्त होने के बावजूद इसका गद्य आज के खड़ी बोली के गद्य से जितनी समीपता रखता है, उतनी समीपता इन रचनाओं के गद्य की भी नही। कारण यह है कि इनकी भाषा पर ब्रजभाषा का बहुत गहरा प्रभाव है।
यद्यपि दक्खिनी का साहित्य अरबी फारसी लिपि में लिखा गया है और इसमें अरबी और फारसी के शब्दों की संख्या बहुत है, फिर भी इसमें संस्कृत की शब्द संख्या कम विस्तृत नहीं है। दक्षिण में बस गए हिन्दुओं और मुसलमानों की सम्मिलित जनभाषा होने के कारण दक्खिनी आज की हिन्दी और उर्दू का सम्मिलित पूर्व रूप है। किंतु मिलाजुला कर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी शब्दावली आधुनिक हिन्दी की शत्दावली से अधिक समीपता रखती है। निजामी के आख्यान काव्य ‘मसनवी कदमराव वो पदमराव’ की पंक्तियाँ है।

अकास ऊँ, पाताल धरती धई।
जहाँ कुछ न कोई, वहाँ है तुही।।

गोलकुंडा के बादशाह मुहम्मदकली कुतुबशाह की पंक्तियाँ हैः

बिखरे है कुंतल पेशानी ऊपर।
के बादल पड़े फट पानी ऊपर।

कुली कुतुबशाह की रचनाओं में रोमावली, नयन, जल, रतन ओद सैकड़ों शब्दों का बड़े मुक्त रूप से प्रयोग हुआ है। इसलिए यह सोचना स्वाभाविक है कि उत्तर भारत में उर्दू और हिन्दी के नाम से खड़ीबोली की दो भिन्न शैलियों का विकास नहीं होता, तो एक सामासिक भाषा के रूप में इसका स्वरूप बहुत कुछ दक्खिनी जैसा होता।
खड़ीबोली के अखिल भारतीय प्रसार का दूसरा माध्यम विभिन्न मध्यकालीन संत संप्रदायों का प्रचारक समुदाय है। उत्तर और दक्षिण के विभिन्न भाषाभाषी साधु सन्न्यासियों की संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। इनकी हिन्दी न केवल हिन्दी प्रदेश की विभिन्न बोलियों, बल्कि हिन्दीतर क्षेत्र की बोलियों के रंगों से इंद्रधनुषित खड़ीबोली थी, जिसे ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा गया है। कबीर की रचनाओं में इस सधुक्कड़ी का प्रचुर प्रयोग हुआ हे। लेकिन, कबीर से बहुत पहले, लगभग दिल्ली में ग़ुलाम वंश की स्थापना की समानांतर, महाराष्ट्र के महानुभाव पंथ के कवियों द्वारा इसके प्रयोग के उदाहरण मिलने लग जाते हैं। महानुभाव पंथ के दामोदर पंडित (बारवही शताब्दी) और कवयित्री महदायिसा (तेरहवीं चैदहवीं शताब्दी) की कुछ रचनाओं की भाषा हिन्दी है। इस पंथ के चक्रपाणि नीलबंकर ने दक्खिनी में ‘तीसा’ साहित्य रचना, जो देवनागरी लिपि में उपलब्ध हुआ है। नाथपंथ से संबंधित वारकरी संप्रदाय के नामदेव (1271-1351), एकनाथ (1528-1599 ई.) आदि मराठी कवियों की हिन्दी रचनाएँ प्रसिद्ध तो हैं ही । एकनाथ की हिन्दी गद्य रचनाँ खड़ी बोली गद्य के सबसे पुराने और साफ सुथरे उदाहरणों में है। महाराष्ट्र उत्तर और दक्षिण का संधि प्रदेश है और इसने हिन्दी के अखिल भारतीय प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न की है। डाॅ. विनयमोहन शर्मा ने हिन्दी को मराठी संतों की देन नामक ग्रन्थ में सबसे पहले मराठी संतों की हिन्दी रचनाओं का परिचय दिया था और हाल में डाॅ. यू.एम. पठान ने ‘महाराष्ट्र के महानुभाव साहित्यकारों का हिन्दी साहित्य को योगदान’ में इन विषय से संबंधित प्रभूत नई सामग्री दी है। भारत के अन्य प्रदेशों में भी ऐसे भक्त कवि हुए हैं, जिन्होंने साधु समाज में प्रचालित मिश्रित खड़ी बोली या ब्रजभाषा में कुछ न कुछ कविता की है।
विभिन्न संप्रदायों के प्रचारक संत और भक्त कवियों की तरह ही खड़ी बोली के प्रसार में देश के तीर्थयात्रियों की भूमिका भी उल्लेख रही है। उत्तर के तीर्थ यात्री दक्षिण तथा दक्षिण के तीर्थयात्री उत्तर के विभिन्न धामों और तीर्थों की यात्रा शताब्दियों से करते रहे हैं। पिछली शताब्दी के आरंभिक दशकों तक तीर्थयात्राएँ पैदल ही संपन्न होती थी और देश के विभिन्न भागों के धर्म प्राण लोगों को काशी, प्रयाग, अयोध्या, वृंदावन और बदरिकाश्रम वाले हिन्दी क्षेत्र में बहुत लंबे समय तक, मई महीने यात्रा करते हुए रहना पड़ता था। फलतः उनका संपर्क हिन्दी से हो जाता था और जैसे जैसे मुस्लिम साम्राज्य के दृढ़ीकरण के साथ उत्तर भारतीय नगरों की संपर्क भाषा खड़ी बोली होती गई, हिन्दी के रूप में वे उत्तर भारत के यात्रा क्षेत्र के विभिन्न नगरों और कस्बों में बारंबार खड़ीबोली ही सुनने लगे तथा उसका एक व्यावहारिक रूप लेकर अपने अपने प्रदेश लौटने लगे। दक्षिण के तीर्थयात्रियों को, जिनमें से बहुत से लोग दक्खिनी के संपर्क में पहले ही आ चुके होते, महाराष्ट्र से ही एक प्रकार की व्यावाहारिक खड़ी बोली सुनाई देने लगती। उनके द्वारा अर्जित इसकी शब्द संपदा सीमित होने के बावजूद उत्तर भारत की यात्रा की अवधि में उनके लिए अत्यंत उपादेय प्रमाणित होती। तीर्थयात्रियों की यह संपर्क भाषा, जो हिन्दीतर क्षेत्र के पंडे पुरोहितों की सामान्य अजीविका भाषा बनती कई तथा वहाँ की वैकल्पिक बाज़ार भाषा भी बन गई, न केवल उत्तर भारत की यात्रा करने वाले दक्षिण की तीर्थयात्रियों वरन् दक्षिण भारत की यात्रा करने वाले उत्तर की तीर्थयात्रियों के लिए भी उपयोगी बन गई। दक्षिण के विभिन्न तीर्थस्थानों तक जाने वलो विभिन्न मार्गों पर निर्मित धर्मशलाएँ, जहाँ यात्री रात में ठहरते थे, स्थानीय लोगों के साथ हिन्दी के माध्यम से होने वाले संपर्क का केंद्र बन जाती थी। इन धर्मशालाओं में पास पड़ेास के गाँवों के ऐसे लोग एकत्र हुआ करते जो इन यात्रियों के प्रदेश, संस्कृति आदि के विषय में जानकारी लेना चाहते थे और इनकी सेवा कर उस पुण्य के भागी बनना चाहते थे जिसकी वासना धर्मप्राण व्यक्तियों में विद्यमान रहा करती है। ऐसे अवसरों पर उनके बीच वे लोग दुभाष्यिों का काम करते थे, जो उत्तर भारत की यात्रा कर चुके होते और हिन्दी का किसी न किसी रूप में व्यवहार कर सकते थे।
उपर्युक्त राजनीतिक और धार्मिक कारणों से खड़ी बोली सत्रहवीं शताब्दी तक भारतव्यापी हो चुकी थी। इसके साक्षी सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम और अठाहरवीं शताब्दी के दूसरे तीसरे दशकों में यूरोपीय धर्म प्रचारकों के लिए लिखित हिन्दी व्याकरण है। पहला व्याकरण जाॅन जोशुआ कैटलर कृत ‘हिन्दुस्तानी भाषा’ है जिसकी रचना 1698 ई. में आगरा में हुई। दूसरा व्याकरण बेंजमिन शूल्ज का ‘हिन्दुस्तानी व्याकरण’ है, जो 1745 ई. में दक्षिण के हैदराबाद में लिखा गया। तीसरे व्याकरण का नाम ‘अल्फाबेतन ब्रम्हानिकम’ है तीसरे लेखक कैसियानो बेलिगत्ती है। इसकी रचना 1771 ई. में पटना में हुई। देश के तीन सुदूरवर्ती केंद्रों में लिख गए इन व्याकरणों में एक ही बात बार बार कही गई हैः वह यह कि हिन्दी या हिन्दुस्तानी इनके रचना स्थलों आगरा, हैदराबाद और पटना के पार्श्ववर्ती क्षेत्रों की सबसे महत्वपूर्ण संपर्क भाषा है। बेंजामिन शूल्ज ने लिखा है कि इस हिन्दुस्तानी भाषा को देवनागरम् भी कहा जाता है। ‘जब से मुसलमान लोग सारे भारत को जीतकर यहाँ रहने लगे तब से उन्होंने यहाँ की हिन्दुस्तानी को अपनी मातृभाषा के रूप में स्वीकार किया। ‘मुग़लों के विस्तृत राज्य में इस भाषा का प्रचार प्रसार है।[1] बेल्गित्ती ने इसे न केवल पटना के आसपास प्रचलित तथा विदेशी यात्रियों द्वारा प्रयुक्त भाषा कहा हे, बल्कि इसे तत्कालीन भारत की राष्ट्रभाषा (लिंगुआ मीडिया) कहा है।[2]
यही कारण है कि अब जब पिछली सदी में भारतीय पुर्नर्जागरण आरंभ हुआ, तो पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा के रूप में खड़ी बोली के महत्व की ओर राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन और महर्षि दयानंद - जैसे महान् नेताओं का ध्यान गया। ब्रह्मसमाज के प्रवर्तक राजा राममोहन राय ने अपने विचारों के प्रचार के लिए ‘उदंतमार्तण्ड’ नामक हिन्दी पत्र प्रकाशित किया। आर्य समाज के जन्मदाता महर्षि दयानंद ने इसमें अपने विख्यात ‘सत्यार्थ प्रकाश’ तथा अन्य कई पुस्तकों की रचना की और इसे अखिल भारतीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का सबसे पहला सुव्यवस्थित प्रयत्न किया। राजा राममोहन राय के जीवनकाल में ही कलकत्ता में फोर्ट विलियम काॅलेज की स्थापना हुई, जहाँ विदेशियों को हिन्दी सिखलाने के उद्देश्य से गद्य की गई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गई। विदेशी ईसाई धर्म प्रचारकों ने अपने मत के प्रचार के लिए हिन्दी में जो पुस्तकें तैयार की या कराई, हिन्दी के प्रसार में उनकी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है। उल्लेख्य है कि अखिल भारतीय भाषा के रूप में हिन्दी के प्रसार और प्रतिष्ठा की प्रस्तावना सबसे पहले उन महापुरुषों ने की, जो हिन्दीतर प्रदेशों के थे। यह बात भी कम उल्लेख्य नहीं है कि लिखित भाषा के रूप में अपने विकास के आरंभिक युग से ही हिन्दी धर्मनिरपेक्ष भाषा रही है। इसके आरंभिक कवि और लेखक मुसलमान है और मुख्यतः उन्होंने ही इसके दक्खिनी साहित्य की रचना की है। सबसे पहले उन्होंने ही इसे राजकीय व्यवहार की भाषा के रूप में प्रयुक्त किया है। पिछली सदी से लेकर आज तक ईसाई मिशनरियों से साहित्य और शिक्षा की भाषा के रूप में इसकी प्रतिष्ठाा के लिए चिरस्मरणीय कार्य किया है। इसलिए भाषा धर्मविशेष के साथ इसको जोड़ना सही नहीं है।
हिन्दी के लिए पिछली सदी कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इस सदी में हिन्दी गद्य का न केवल विकास हुआ, वरन भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उसे मानक रूप प्रदान किया। इसी सदी में ऐसे महापुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने हिन्दी की पहचान अखिल भारतीय संपर्क सूत्र के रूप में इतिहास द्वारा प्रदत्त भाषा के रूप में की और इसके लिए प्रयत्न आरंभ किया। यह अकारण नहीं है कि महात्मा गांधी ने हिन्दी के प्रश्न को स्वराज्य का प्रश्न माना, कांग्रेस को इसके प्रचार का एक शक्तिशाली माध्यम बनाया और हिन्दी प्रचार संस्थाओं की स्थापना की। पिछले छह सौ वर्षों से भारतीय इतिहास ने जिस भाषा को अखिल भारतीय भाषा बनाने की साधना की, उसे सिद्धि तक ले जाने का सबसे बड़ा श्रेय गाँधी जी को है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी के तीन प्रारंभिक व्याकरणः मैथ्यु बेच्चुर, (पृ. 70)
  2. हिन्दी के तीन प्रारंभिक व्याकरणः मैथ्यु बेच्चुर, पृ. 122

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42. भारत की राजभाषा नीति श्री कृष्णकुमार श्रीवास्तव
43. विदेश दूरसंचार सेवा श्री के.सी. कटियार
44. कश्मीर में हिन्दी : स्थिति और संभावनाएँ प्रो. चमनलाल सप्रू
45. भारत की राजभाषा नीति और उसका कार्यान्वयन श्री देवेंद्रचरण मिश्र
46. भाषायी समस्या : एक राष्ट्रीय समाधान श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी
47. संस्कृत-हिन्दी काव्यशास्त्र में उपमा की सर्वालंकारबीजता का विचार डॉ. महेन्द्र मधुकर
48. द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन : निर्णय और क्रियान्वयन श्री राजमणि तिवारी
49. विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी का स्थान डॉ. रामजीलाल जांगिड
50. भारतीय आदिवासियों की मातृभाषा तथा हिन्दी से इनका सामीप्य डॉ. लक्ष्मणप्रसाद सिन्हा
51. मैं लेखक नहीं हूँ श्री विमल मित्र
52. लोकज्ञता सर्वज्ञता (लोकवार्त्ता विज्ञान के संदर्भ में) डॉ. हरद्वारीलाल शर्मा
53. देश की एकता का मूल: हमारी राष्ट्रभाषा श्री क्षेमचंद ‘सुमन’
विदेशी संदर्भ
54. मारिशस: सागर के पार लघु भारत श्री एस. भुवनेश्वर
55. अमरीका में हिन्दी -डॉ. केरीन शोमर
56. लीपज़िंग विश्वविद्यालय में हिन्दी डॉ. (श्रीमती) मार्गेट गात्स्लाफ़
57. जर्मनी संघीय गणराज्य में हिन्दी डॉ. लोठार लुत्से
58. सूरीनाम देश और हिन्दी श्री सूर्यप्रसाद बीरे
59. हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य श्री बच्चूप्रसाद सिंह
स्वैच्छिक संस्था संदर्भ
60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
स्मृति-श्रद्धांजलि
63. स्वर्गीय भारतीय साहित्यकारों को स्मृति-श्रद्धांजलि डॉ. प्रभाकर माचवे

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