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हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ -शंकरराव लोंढे  

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लेखक- शंकरराव लोढि

हिन्दी प्रचार-प्रसार के कार्य में स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि हिन्दी प्रचार का कार्य स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं ने ही शुरू किया था। हिन्दी सदैव राष्ट्रीय एकता की कड़ी रही है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर हिन्दीतर क्षेत्रों के महापुरुषों ने भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के साथ-साथ राष्ट्रीयता के सिद्धांत के रूप में हिन्दी को अपनाने में बल दिया। इन महापुरुषों में स्वामी दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, केशवचंद्र सेन, राजा राममोहन राय, नवीनचंद राय, जस्टिस शारदाचरण मित्र, महात्मा गांधी आदि ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का प्रयास किया। इन महापुरुषों की मातृभाषा हिन्दी नहीं थी फिर भी इन्होंने देश में हिन्दी का व्यापकता को देखते हुए इसके प्रचार-प्रसार के लिए कार्य किया।
सर्वप्रथम वाराणसी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1893 में हुई और उसके द्वारा यह कार्य प्रारंभ किया गया। 1910 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना प्रयाग में हुई। इन संस्थाओं की स्थापना से हिन्दी आंदोलन को काफ़ी बल मिला। स्वतंत्रता की भावना जागृत करने का विचार महात्मा गांधी ने शुरू किया और सारे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता पर विचार किया। सन् 1918 में कांग्रेस के इंदौर अधिवेशन में महात्मा गांधी ने हिन्दी को अपनाने पर बल दिया और उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से उसी वर्ष दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की नींव पड़ी। दक्षिण के राज्यों में इस संस्था के द्वारा हिन्दी का प्रचार-प्रसार होने लगा और अन्य प्रदेशों में हिन्दी का प्रचार करने के लिए 1937 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना वर्धा में हुई।
स्वतंत्रतापूर्व के युग में हिन्दी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुई। वह राष्ट्रीयता का प्रतीक बनी। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का प्रचार करने के लिए हर प्रदेश की आवश्यकता और अनुकूलता के अनुसार विभिन्न संस्थाओं की स्थापना हुई। इस समय भारत में 17 ऐसी स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं जो परिक्षाओं का संचालन करती हैं और इनकी परीक्षाओं को भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है। ये संस्थाएँ असम, आंध्र, कर्नाटक, केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओडिसा, बिहार और उत्तर प्रदेश में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में कार्यरत है। इसके अतिरिक्त इन संस्थाओं को शाखाओं के द्वारा देश के अन्य प्रदेशों में जम्मू-कश्मीर, बंगाल, अरुणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम, लक्षयद्वीप समूह आदि में हिन्दी प्रचार-प्रसार का कार्य किया जा रहा है। इन शिक्षण-संस्थाओं के अतिरिक्त सैंकड़ों ऐसी भी कई संस्थाएँ है जो पुस्तकालय, साहित्य-सृजन आदि से हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।

मान्यता प्राप्त स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाएँ

असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी

सन् 1934 में महात्मा गांधी जी के अनुयायी उत्तर प्रदेश के जननेता व समाज सेवक, स्वर्गीय बाबा राघवदास जी ने बापू के आदेश से असम में हिन्दी प्रचार प्रारंभ किया। लेकिन उस समय असम में समिति की स्थापना नहीं हुई थी। बाद में इसकी ज़रूरत महसूस की जाने लगी, अत: स्वर्गीय गोपीनाथ बरदलैजी के आग्रह से 3 नवंबर, 1938 को ‘असम हिन्दी प्रचार समिति’ नामक एक संस्था कायम की गई। बाद में इसका नाम ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ पड़ा। यह संस्था प्राथमिक स्तर से स्नातक स्तर तक – परिचय, प्रथमा, प्रवेशिका, प्रबोध, विशारद, और प्रवीण छ: परीक्षाएँ चलाती है। प्रबोध, विशारद और प्रवीण परीक्षाओं को भारत सरकार द्वारा क्रमश: मैट्रिक, इंटर और बी.ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष स्थायी मान्यता मिली हुई है।

  • समिति का अपना एक केंद्रीय पुस्तकालय है जिसे भाषा गवेषणागार का रूप दिया गया है। अब तक इस में हिन्दी, असमिया, बंगला, उर्दू आदि की लगभग दस हजार पुस्तकें हैं।
  • इस समिति ने अखिल भारतीय हिन्दी परिषद की सर्वोच्च उपाधि हिन्दी ‘पारंगत’ परीक्षा के शिक्षण के लिए सन् 1953 में 'हिन्दी विद्यापीठ' की स्थापना गुवाहाटी शहर में की।
  • इस दृष्टि से असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने सन् 1940 से अपनी तरफ से साहित्य-निर्माण तथा प्रकाशन की योजनाओं को अपने हाथ में लिया। राज्य के हिन्दी तथा अहिन्दीभाषी स्कूलों की पाठ्य-पुस्तकें भी समिति की तरफ से प्रकाशित की गईं।
  • राष्ट्रभाषा प्रचार के उद्देश्यों की पूर्ति और सामासिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु सन् 1951 से समिति का त्रैमासिक मुखपत्र राष्ट्र सेवक प्रकाशित होता है।

ओड़िया राष्ट्रभाषा परिषद्, जगन्नाथधाम, पुरी

सन् 1932 में पुरी में प्रस्तावित कांग्रेस अधिवेशन के कर्मियों को हिन्दी सिखाने के उद्देश्य से महात्मा गांधी जी के सहयोगी बाबा राघवदास की प्रेरणा से पंडित अनूसयाप्रसाद पाठक तथा पंडित रामानंद शर्मा पुरी में आए थे। उनके अथक परिश्रम से ‘पुरी राष्ट्रभाषा समिति’ नामक संस्था स्थापित हुई। 1937 से 1954 तक यह वर्धा की सहायता से चलती रही और बाद में वर्धा से अलग होकर ‘ओडिशा राष्ट्रभाषा परिषद्’ के नाम से एक स्वतंत्र संस्था के रूप में आई। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ओड़िसा जैसे अहिन्दीभाषी राज्य में तथा यहाँ के पिछड़े आदिवासी अंचलों में हिन्दी का प्रशिक्षण देना है। इसके अतिरिक्त असम, पश्चिम बंगाल तथा आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी हिन्दी का प्रचार करना है।
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए परिषद् अपने अधीन पाँच परीक्षाओं (राष्ट्रभाषा प्राथमिक, बोधिनी, माध्यमिक, विनोद, प्रवीण और शास्त्री) का संचालन करती है। इन परीक्षाओं को राज्य सरकार और भारत सरकार दोनों से मान्यता मिली है। इस के असम, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, ओड़िसा, आंध्र, कर्नाटक और हरियाणा में कुल मिलाकर 300 परीक्षा केंद्र हैं। अब तक उत्तीर्ण परीक्षाओं की संख्या लगभग एक लाख है। इसके अधीन सात हिन्दी विद्यालयों का संचालन होता है। इसका मुख्य पुस्तकालय पुरी में है। इसमें हिन्दी, ओड़िया और संस्कृत की लगभग 6,000 पुस्तकें हैं। परिषद् के अधीन भुवनेश्वर, कटक, ब्रह्मपुर और कोरापुट में शाखा-पुस्तकालय भी हैं।

कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति, बेंगलूर

'कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति राष्ट्रभाषा प्रचार-प्रसार' की स्थापना 1952 में हुई। इसके निर्माण में श्री शिवानंद स्वामी जी तथा माता आऊबाई जी का योगदान है। हिन्दी क्षेत्र में महिलाओं में अधिक जागृति लाने के उद्देश्य से यह समिति केवल महिलाओं से संगठित हुई। इसकी सभी पदाधिकारी महिलाएँ ही हैं। किंतु कार्य-क्षेत्र केवल महिलाओं के लिए ही सीमित नहीं है। इसके समस्त कार्यक्रमों में स्त्रियाँ तथा पुरुष दोनों कार्य कर रहे हैं। समिति प्रचार, परीक्षा, प्रकाशन साहित्य-निर्माण, पुस्तक बिक्री, शिक्षा विद्यालय, पुस्तकालय, अर्थ व लेख परीक्षा, राज्यस्तरीय हिन्दी लेखक एवं भाषण प्रतियोगिताएँ, नाटक व कला प्रदर्शन, पुनश्चर्या-पाठ्यक्रम आदि कार्य करती है। इसके अतिरिक्त दैनिक समाचारों से छात्रों को अवगत कराने व साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में हिन्दी की प्रगति की जानकारी देने के उद्देश्य से कई केंद्रों में समिति ने दस वाचनालय भी चलाए हैं। इसके अतिरिक्त पुस्तकालयों का भी संचालन किया जा रहा है। समिति ने 60 से अधिक पुस्तकों का भी प्रकाशन किया है। समिति प्रथमा, मध्यमा, उत्तमा, हिन्दी भाषा भूषण, हिन्दी भाषा प्रवीण का संचालन करती है। इन्हें कर्नाटक राज्य से विभिन्न पदों के लिए मान्यता मिली है। असम, गोवा, बंगाल, केरल आदि राज्यों ने भी परीक्षाओं को मान्यता दी है।

केरल हिन्दी प्रचार सभा, तिरुवनंतपुरम

केरल के हिन्दी प्रचारकों में अग्रणी स्व. के. वासुदेवन पिल्ले ने सितंबर, 1934 में इस सभा की स्थापना की। 1948 से पहले यह सभा 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा' (मद्रास) की परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करती रही है। केरल राज्य में राजभाषा हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार करने, हिन्दी परीक्षाएँ चलाने के अतिरिक्त दूसरी संस्थाओं की परीक्षाएँ आयोजित करना भी इस संस्था का उद्देश्य है। सभा की प्रेरणा से केरल भर में अनेक हिन्दी विद्यालय खोले गए हैं और इनमें हजारों विद्यार्थी एवं प्रौढ़ व्यक्ति राष्ट्रभाषा के अध्ययन में जुटे हुए हैं।
हिन्दी साहित्य के प्रति केरलवासियों के मन में रुचि उत्पन्न करने, स्थानीय लेखकों को प्रोत्साहन देने और सर्वोपरि भाषाओं के बीच सद्भावना एवं सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से सभा ‘राष्ट्रवीणा’ नामक एक त्रिभाषा साप्ताहिक (हिन्दी, मलयालम, तमिल) चलाती रही। आर्थिक कठिनाई के कारण इसे बंद करना पड़ा। कुछ समय बाद ‘केरल ज्योति’ नामक एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया गया। केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम में 13 जुलाई, 1962 को सभा के संस्थापक मंत्री की पावन स्मृति में इस ग्रंथालय का नाम 'श्री के. वासुदेवन पिल्ले स्मारक हिन्दी ग्रंथालय' रखा गया है। इस ग्रंथालय में लगभग 10,000 पुस्तकें हैं।

  • केंद्र सरकार की सहायता से सभा ने एक हिन्दी टंकण व आशुलिपि विद्यालय की स्थापन भी की है। गत वर्ष केंद्र सरकार की सहायता से राज्य के विभिन्न् केंद्रों में पंद्रह नि:शुल्क हिन्दी विद्यालय भी खोले हैं जो गावों में हिन्दी का प्रचार करने में अत्यंत उपयोग सिद्व हुए हैं।
  • सभी की ओर से हिन्दी प्रथमा, हिन्दी दूसरी, राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रवेश, हिन्दी भूषण, साहित्याचार्य आदि परीक्षाएँ आयोजित की जाती है। 1960 से लेकर आज तक सभा की विभिन्न परीक्षाओं में लगभग 2 लाख 50 हजार विद्यार्थी सम्मिलित हुए हैं। प्रति वर्ष औसतन 15,000 विद्यार्थी परिक्षाओं में सम्मिलित होते हैं। भारत सरकार ने ‘हिन्दी प्रवेश’ को मैट्रिक, ‘हिन्दी भूषण’ को इंटर तथा साहित्याचार्य परीक्षा को बी.ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष मान्यता दी है।
  • इस समय सभा के अधीन 400 शाखा विद्यालय तथा 600 प्रमाणित प्रचारक हिन्दी प्रचार कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त एक केंद्रीय हिन्दी महाविद्यालय कार्य कर रहा है जिसमें सभा की विभिन्न परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को पढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा केरल विश्वविद्यालय की हिन्दी ‘विद्वान’, साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ‘साहित्य विशारद’, ‘साहित्य रत्न’ आदि परीक्षाओं के लिए भी कक्षाएँ चलाई जाती हैं। अब तक सभा ने लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित की हैं।

गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद

विद्यापीठ की स्थापना 18 अक्तूबर, 1920 को राष्ट्रीय शिक्षण संस्था के तौर पर हुई। तभी से विद्यापीठ के उद्देश्यों में राष्ट्रभाषा हिन्दी का अभ्यास देवनागरी और उर्दू लिपियों में रखा गया। सितंबर, 1949 में संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा स्वीकार कर लिया और लिपि देवनागरी और आंकड़े–हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय रूप – रोमन आंकड़े स्वीकार किए गए। इस प्रस्ताव के पास हो जाने से विद्यापीठ की हिन्दी प्रचार के कार्य में कुछ फर्क पड़ा। फर्क यह था की विद्यापीठ की हिन्दी परीक्षाओं में उर्दू लिपि ऐच्छिक कर दी गई।
हिन्दी तीसरी, हिन्दी विनीत और हिन्दी सेवक परीक्षाएँ चलती हैं जिन्हें क्रमश: हिन्दी स्तर के हाई स्कूल, इंटर तथा बी.ए. के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। संस्था की तरफ से केंद्रीय पुस्तकालय अहमदाबाद में चलता है। विद्यापीठ से ‘संपर्क पत्रिका’ नामक विर्षिक पत्र निकलता है। इसके अतिरिक्त हिन्दी बोलने की शक्ति बढ़े, इसके लिए आए वर्ष भाग लेने वालों की योग्यता के अनुसार हिन्दी वक्तृत्व प्रतियोगिता चलाई जाती है।

बंबई हिन्दी विद्यापीठ, बंबई

12 अक्तूबर, 1938 को बंबई हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना बंबई नगर में हुई। उस समय बंबई में हिन्दी प्रचार कार्य केवल पेरीन बहन केप्टन की देखरेख में होता, जहाँ हिन्दी के साथ उर्दू भी अनिवार्य थी। सरल व बोलचाल की भाषा के प्रचार हेतु प्रचारकों के सहयोग से ‘बंबई हिन्दी विद्यापीठ’ की स्थापना हुई। हिन्दी के अध्ययन केंद्र चलाना, पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित करना तथा प्रचार परीक्षाओं के परीक्षा केंद्र स्थापित करके परीक्षाएँ लेना संस्था की प्रारंभिक गतिविधियाँ थीं और प्रचार क्षेत्र बंबई नगर-उपनगर था।
बंबई हिन्दी विद्यापीठ की ओर से संचालित परीक्षाओं में मान्य स्तर व उपाधि परीक्षाओं में हिन्दी उत्तमा को मैट्रिक (हिन्दी स्तर), हिन्दी-भाषा रत्न को इंटर (हिन्दी स्तर) तथा साहित्य सुधारक परीक्षा को बी.ए. (हिन्दी स्तर) को मान्यता केंद्र सरकार एवं अनेक राज्य सरकारों द्वारा प्राप्त है। विद्यापीठ ने अब तक 10 लाख से अधिक परीक्षार्थियों को हिन्दी-ज्ञान प्रदान करके राष्ट्र भाषा की सेवा की है। विद्यापीठ की मुख्य मासिक पत्रिका ‘भारती’ है। विद्यापीठ ने लगभग एक सौ पुस्तक प्रकाशित की हैं। विद्यापीठ का अपना पुस्तकालय है और इस समय इसमें 8,000 से भी अधिक पुस्तकें संग्रहीत हैं।

कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, बेंगलूर

कर्नाटक राज्य में हिन्दी प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से 1939 में मैसूर रियासत हिन्दी प्रचार समिति का गठन हुआ। समिति सन् 1961 तक दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास के ही पाठ्यक्रम का उपयोग करती रही और सभा की ही परीक्षाओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करती रही। 1961 में बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखकर समिति स्वतंत्र हो गई। तब तक समिति के लगभग 3,00,000 छात्र सभा की परीक्षाओं में सफल हुए थे। अब तक, 5,50,000 से अधिक विद्यार्थी समिति की अपनी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुए हैं।
समिति 125 परीक्षा केंद्रों में अपनी परीक्षाओं का संचालन करती है। समिति की राजभाषा, राजभाषा प्रकाश और राजभाषा विद्वान परीक्षाओं को क्रमश: हाई स्कूल, इंटर तथा बी.ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष भारत सरकार से मान्यता-प्राप्त है। समिति की परीक्षाओं को कर्नाटक, आंध्र प्रदेश की राज्य सरकारों तथा बेंगलूर, मैसूर, कर्नाटक, वेंक्टेश्वर, उस्मानिया आदि विश्वविद्यालयों से भी मान्यता प्राप्त है। भारत सरकार के सहयोग से समिति 50 हिन्दी विद्यालय चलाती है जिनमें से तीस में प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए तथा बीस में उच्च परीक्षाओं के लिए अध्यापन की सुविधा है। समिति द्वारा संचालित स्नातकोत्तर विभाग में एम.ए. का अध्यापन होता है। समिति द्वारा संचालित केंद्रीय हिन्दी पुस्तकालय में लगभग 3000 पुस्तकें हैं। हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषा साहित्यों के आदान-प्रदान को दृष्टि में रखकर समिति ने अनेक कृतियों का प्रकाशन भी किया है जिनमें ये मुख्य हैं: कर्नाटक साहित्य का इतिहास, कर्नाटक दर्शन, चिंतामणि, सम्राट चंद्रगुप्त, कथाभारत, राजभाषा प्रवेश, सात झरोखे, पंपा यात्रा। समिति की ‘भाषा पीयूष’ नाम की त्रैमासिक पत्रिका है।

मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद्, बेंगलूर

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश को स्वावलंबी बनाने और देश में भावात्मक एकता लाने के सदुद्देश्य से जिन रचनात्मक कार्यों का सूत्रपात किया था उनमें से राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार भी एक है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के पुनीत कार्य को संपन्न करने के महान् उद्देश्य को लेकर 1943 में मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद् की स्थापना हुई।
अहिन्दी भाषियों में हिन्दी का प्रचार करना, हिन्दी साहित्य के प्रति रुचि जागृत करना और प्रांतीय भाषाओं से हिन्दी का परस्पर आदान-प्रदान एवं स्नेह बढ़ाना – संस्था के उद्देश्य हैं। परिषद् द्वारा संचालित हिन्दी प्रवेश, हिन्दी उत्तमा और हिन्दी रत्न उच्च परीक्षाएँ हैं। इन तीन परीक्षाओं को क्रमश: हिन्दी स्तर में मैट्रिक, इंटर और बी.ए. के समकक्ष मान्यता केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा प्राप्त है। परिषद् का अपना एक बृहद पुस्तकालय है। इसकी अमूल्य साहित्यिक पुस्तकों का उपयोग स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्र कर रहे है। ‘मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद् पत्रिका’ के नाम से परिषद् एक मासिक पत्रिका भी प्रकाशित करती है।

मणिपुर हिन्दी परिषद्, इम्फाल

मणिपुर हिन्दी परिषद् एक स्वतंत्र संस्था है। इसकी स्थापना सन् 1953 में हुई। 23 वर्षों से परिषद् हिन्दी प्रचार कार्य निष्ठापूर्वक कर रहा है। परिषद् 6 परीक्षाएँ संचालित करती है, 1. हिन्दी प्रारंभिक, 2. हिन्दी प्रवेश, 3. हिन्दी परिचय, 4. हिन्दी प्रबोध, 5. हिन्दी विशारद और 6. हिन्दी रत्न। इनमें उच्चस्तरीय हिन्दी प्रबोध, हिन्दी विशारद और हिन्दी रत्न को केवल हिन्दी स्तर तक के लिए क्रमश: मैट्रिक, इंटर और बी.ए. के समकक्ष भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है। परिषद् का प्रचार विभाग प्रमाणिक प्रचारकों, संबद्ध उपसंस्थानों और स्थानीय हिन्दी विद्यालयों की समितियों की सहायता से हिन्दी का प्रचार करता है। परिषद् का सुव्यवस्थित पुस्तकालय है। पुस्तकालय में हिन्दी पुस्तकों, हिन्दी की विभिन्न मासिक पत्र-पत्रिकाओं और अन्य सामग्रियों की संपूर्ण संख्या इस समय क़रीब दो हजार से अधिक है।

महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे

मराठी-भाषी प्रदेश में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार करने हेतु महात्मा गांधी जी की प्रेरणा से महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे की स्थापना हुई। आचार्य काका साहब कालेलकर जी की अध्यक्षता में तारीख 22 मई, 1937 को पूना में महाराष्ट्र के रचनात्मक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक व सांस्कृतिक नेताओं आदि का सम्मेलन संपन्न हुआ और फिर महाराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा से संबंद्ध रही। फिर 12 अक्तूबर, 1945 को यह समिति ‘महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे’ के नाम से काम करने लगी।
सभा द्वारा संचालित राष्ट्रभाषा प्रबोध, प्रवीण तथा पंडित परीक्षाओं को भारत सरकार द्वारा हिन्दी की योग्यता की दृष्टि से क्रमश: एस. एस. सी., इंटर और बी. ए. के समकक्ष निर्धारित किया गया है। सभा की इन परिक्षाओं में अब तक 5 लाख से अधिक परिक्षार्थी सम्मिलित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त सभा द्वारा संचालित हिन्दी हाई स्कूल की अपनी विशेषता है। संस्था की ओर से कोल्हापुर, सांगली, सोलापुर, नासिक, अहमदाबाद, धुले, रत्नागिरी, औरंगाबाद, नागपुर, नांदेड़ आदि शहरों में शिक्षण केंद्र चलाए जाते हैं। पूना में केंद्रीय राष्ट्रभाषा ग्रंथालय चलाने के साथ-साथ अतिरिक्त विभागीय ग्रंथालय – बंबई, नागपुर तथा औरंगाबाद में तथा ज़िला ग्रंथालय नासिक, अहमदनगर, धुलिया, सांगली, कोल्हापुर, रत्नागिरी, बैंगलोर, लातूर, सातारा, जलगांव तथा नांदेड़ में हैं।

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सन् 1918 में दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार का आंदोलन प्रारंभ किया था। उसके फलस्वरूप दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना सन् 1918 में मद्रास नगर के गोखले हाल में स्व. डॉ. सी. पी. रामस्वामी अय्यर की अध्यक्षता में स्व. डॉ. ऐनी बेसेंट ने की थी। प्रथम हिन्दी वर्ग महात्मा जी के सपुत्र स्व. देवदास गांधी ने शुरू किया। उनके साथ स्व. स्वामी सत्यदेव परिव्राजक भी दक्षिण के हिन्दी प्रचार के कार्य में लग गए। सभा की चार प्रांतीय शाखाएँ हैदराबाद, धारबाड़, तिरूच्चिरापल्ली और एरणाकुलम में स्थापित है, जो क्रमश: आंध्र प्रदेश, मैसूर, तमिलनाडुकेरल राज्यों में हिन्दी प्रचार कार्य करती हैं। सभा का अपना एक शाखा-कार्यालय दिल्ली में भी स्थापित है। वहाँ हिन्दी के माध्यम से दक्षिण की भाषाएँ सिखाने का प्रबंध भी किया जाता है।
‘हिन्दी प्रचार समाचार’ मासिक पत्रिका सभा के मुख्य पत्र के रूप में प्रकाशित होती है। ‘दक्षिण भारत’ नामक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका भी सभा में प्रकाशित होती है। इसमें दक्षिण भारतीय भाषाओं की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद और उच्च स्तर के मौलिक साहित्यिक लेख छपते हैं। सभा के अंतर्गत एक बड़ा हिन्दी पुस्तकालय चलता है, जिसमें इस समय लगभग 30.000 ग्रंथ भिन्न-भिन्न विषयों पर उपलब्ध हैं। इसमें हिन्दी की सभी पत्रिकाएँ हैं।
प्राथमिक, मध्यमा और राष्ट्रभाषा – ये प्रारंभिक परीक्षाएँ है। प्रदेशिका विशारद और प्रवीण – उच्च परीक्षाएँ हैं, जिन्हें भारत सरकार से क्रमश: हाई स्कूल, इंटर तथा बी. ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। विशारद और प्रवीण उपाधि परीक्षाएँ हैं। ‘हिन्दी प्रचारक’ प्रशिक्षण परीक्षा है। हिन्दी साहित्य की उच्चतम शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से सभा की ओर से सन् 1964 में एक उच्च शिक्षा तथा शोध संस्थान खोला गया है। इस विभाग की व्यवस्था स्नातकोत्तर अध्ययन और अनुसंधान परिषद् एवं बोर्ड आफ स्टडीज़ के सुझावों के अनुसार कुलाधिपति, कुलपति, कुलसचिव, हिन्दी विभागाध्यक्ष और प्राध्यापकगण करते हैं। पारंगत और हिन्दी एम. ए. की परीक्षाएँ इस विभाग की ओर से चलाई जाती हैं। शोध कार्य करने वाले छात्र भी इस विभाग में अध्ययन करते हैं। उच्च शिक्षा तथा शोध संस्थान का एक कांपलैक्स हैदराबाद में चलाया जा रहा है।

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा

सन् 1936 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और राजर्षि टंडन जी की प्रेरणा से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हुई थी। देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में जिस समिति का गठन हुआ उसमें महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य नरेंद्र देव, काका कालेलकर, पं. माखन लाल चतुर्वेदी, सेठ जमनालाल बजाज आदि प्रमुख देश के गण्यमान्य नेता थे। हिन्दी प्रचार की यह संस्था राष्ट्रीय भावनाओं की उद्बुद्ध करने एवं समग्र भारतीयों के हृदय में एकात्मकता को उभारने का उद्देश्य लेकर स्थापित हुई। इसी उद्देश्य को दृष्टि में रखकर ‘एक हृदय हो भारत जननी’ को उसने अपना उद्घोष वाक्य बनाया। भारत के विभिन्न प्रदेशों में हिन्दी का प्रचार करने के लिए 17 प्रादेशिक समितियों का गठन किया गया। ये समितियाँ वर्धा समिति से प्रत्यक्ष संपर्क रखकर हिन्दी प्रचार का कार्य कर रही है। इसके अतिरिक्त भारत से बाहर अन्य देशों में भी हिन्दी प्रचार कार्य आगे बढ़ा है जिनमें दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, बर्मा, मारिशस, अरब, चेकोस्लोवाकिया, सूरिनाम आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
समिति द्वारा संचालित राष्ट्रभाषा परिचय, राष्ट्रभाषा कोविद तथा राष्ट्रभाषा रत्न परीक्षाओं को भारत सरकार से क्रमश: एस. एस. सी. इंटर तथा बी. ए. के समकक्ष स्थायी मान्यता प्राप्त है। आज तक समिति की परीक्षाओं में लगभग 63 लाख परीक्षार्थी सम्मिलित हुए हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दीतर प्रदेशों में राष्ट्रभाषा शिक्षण केंद्र, राष्ट्रभाषा विद्यालय एवं राष्ट्रभाषा महाविद्यालय चल रहे हैं। समिति से संबद्ध 674 शिक्षण केंद्र, 3 महाविद्यालय, प्रादेशिक कार्यालयों के अंतर्गत चलते हैं। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन जनवरी 1975 में नागपुर में संपन्न हुआ। सम्मलेन में विभिन्न देशों के विद्वान सम्मिलित हुए थे। इस सम्मेलन की अध्यक्षता मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलाम जी ने की थी तथा इसका उद्घाटन भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के कर कमलों द्वारा हुआ था। श्री कमलापति त्रिपाठी जी की अध्यक्षता में माननीय जगजीवन राम जी के कर कमलों से विश्व हिन्दी विद्यापीठ का शिलान्यास संपन्न हुआ। इसी समिति के तत्वावधान में तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का 1983 में आयोजन किया गया।

सौराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति, राजकोट

सन् 1937 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा महात्मा गांधी जी ने जब विधिवत् हिन्दी प्रचार का काम शुरू किया तब आचार्य काका कालेलकर की प्रेरणा से भावनगर में श्री बजुभाईशाह में हिन्दी प्रचार का श्रीगणेश किया। सरदार बल्लभभाई पटेल ने मई, 1939 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा संचालित परीक्षाओं के वर्गों का भावनगर में उद्घाटन किया था। उन दिनों सौराष्ट्र ‘काठियाबाड़’ कहलाता था। हिन्दी प्रचार का काम ‘काठियाबाड़’ राष्ट्रभाषा प्रचार नामक संस्था नाम से लगा। सन् 1946 में गुजरात में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की नीति के अनुसार गुजरात विद्यापीठ ने राष्ट्रभाषा प्रचार का काम शुरू किया। इसलिए स्वभावत: काठियाबाड़ राष्ट्रभाषा प्रचार ने गुजरात विद्यापीठ के साथ संबंध स्थापित करके हिन्दुस्तानी प्रचार का काम चलाया।
स्वतंत्रता के बाद सौराष्ट्र की रियासतों का अंगीकरण हुआ। नए सौराष्ट्र राज्य का जन्म हुआ। सौराष्ट्र में चल रहे विविध रचनात्मक कामों को सुव्यवस्थित रूप से चलाने तथा गति देने के लिए ‘सौराष्ट्र रचनात्मक समिति’ की स्थापना की गई। हिन्दी के कार्य को बढ़ाने के लिए तथा नई गति देने लिए गुजरात विद्यापीठ ने सौराष्ट्र कच्छ का हिन्दी प्रचार का सारा काम सौराष्ट्र रचनात्मक समिति को सौंपा। काठियाबाड़ राष्ट्रभाषा प्रचार ने ‘सौराष्ट्र हिन्दी समिति’ में परिवर्तित होकर और सौराष्ट्र रचनात्मक समिति तथा गुजरात विद्यापीठ से संबद्ध हो कर हिन्दी के प्रचार कार्यों का नया रूप दिया। सौराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति ‘हिन्दी विनीत’ तथा ‘हिन्दी सेवक’ परीक्षाओं का संचालन कर रही है। अब तक सौराष्ट्र हिन्दी प्रचार समिति द्वारा लगभग 5 लाख लोगों ने हिन्दी सीखी। इसके अलावा समिति उर्दू लिपि की तीन क्रमिक परीक्षाओं का संचालन करती है। जो प्रोढ़ वर्ग हिन्दी नहीं सीखा है, उसके लिए ‘हिन्दी बातचीत’ की एक मौखिक परीक्षा का संचालन भी यह समिति करती है।

हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, बंबई

सन् 1938 में पूज्य महात्मा गांधी जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की स्थापना बंबई में हुई। महात्माजी भारत की ऐसी राष्ट्रभाषा चाहते थे, जिसे आम जनता आसानी से समझ सके और जो नागरी और उर्दू दोनों लिपियों में लिखी जाए तथा हिन्दी और उर्दू दोनों के मिश्रण से बनी हो। ऐसी भाषा को महात्माजी ‘हिन्दुस्तानी’ कहते थे। सभा की परिक्षाएँ साल में दो बार (फरवरी और सितंबर) में ली जाती है। परीक्षाओं के नाम हैं: लिखावट, प्रवेश, परिचय, पहली, दूसरी, तीसरी, काबिल और विद्वान। अंतिम तीन परीक्षाओं को केंद्रीय सरकार से क्रमश: हाई स्कूल, इंटर तथा बी. ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। अब तक इसमें लगभग दो लाख विद्यार्थियों ने हिन्दुस्तानी की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अलावा हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के नि:शुल्क वर्ग हाई स्कूलों और म्युनिसिपल स्कूलों में स्थान-स्थान पर चलाए जाते हैं। उर्दू लिपि न जानने वालों के लिए सभा नि:शुल्क रूप में विशेष कक्षाएँ चलती है।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा का एक भाग ‘महात्मा गांधी मैमोरियल रिसर्च सेंटर और लायब्रेरी’ भी है। इस समय लायब्रेरी में 20563 पुस्तकें हैं। ये पुस्तकें हिन्दी, उर्दू और फारसी साहित्य और भाषाविज्ञान संबंधी हैं। लायब्रेरी में हिन्दी, उर्दू और भाषाशास्त्र से संबंधित लगभग 2000 पत्रिकाओं के प्राचीन संस्करण मौजूद हैं। रिसर्च सेंटर ‘हिन्दुस्तानी जबान’ नाम से एक त्रैमासिक द्विभाषी अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन करता है। यह पत्रिका हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं तथा लिपियों का रूप सामने रखती हुई हिन्दुस्तानी भाषा के मिलेजुले स्वरूप को उजागर करने का प्रयास करती है। इस क्षेत्र में रिसर्च सेंटर ने जो विशेष काम किया है वह ‘हिन्दुस्तानी जबान’ का अमीर ख़ुसरो (जुलाई-अक्टूबर, 1976) विशेषांक है।

हिन्दी विद्यापीठ, देवघर

राष्ट्र संग्राम में सम्मिलित स्थानीय मनीषियों ने सन् 1929 में हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना की। 20 मई, 1934 को विश्वबंधु महात्मा गांधी ने विद्यापीठ का परिदर्शन किया। देवनागरी लिपि में हिन्दी भाषा का विकास करना और राष्ट्रीय भावनाओं पर आधारित हिन्दी शिक्षा का प्रसार मुख्य उद्देश्य थे। इनकी पूर्ति के लिए 1935 में अपने विद्यालय में कई विभाग – समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास एवं गणित तथा भाषाओं में तेलुगु और बंगला के विभाग खोले गए और विद्यालय को गोवर्धन साहित्य महाविद्यालय के रूप में स्थापित किया गया। विद्यापीठ द्वारा संचालित परीक्षाएँ, प्रवेशिका, साहित्यभूषण और साहित्यालंकार, ये तीन स्तर के पाठ्यक्रम हैं। प्रवेशिका उच्चतर माध्यमिक स्तर के, साहित्य भूषण बी. ए. स्तर के और साहित्यालंकार एम. ए. हिन्दी स्तर के समकक्ष हैं। ये परीक्षाएँ भारत सरकार और अन्य राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त हैं। अध्यापनव्यवस्था को वर्गीकृत कर स्कूली शिक्षा के तीन विद्यालय अलग खोल गए – कुमार विद्यालय (प्रारंभिक, हिन्दी विद् की पढ़ाई के लिए) माध्यमिक स्तर (प्रदेशिका) की शिक्षा के लिए। विद्यापीठ का अपना पुस्तकालय है जिसमें लगभग 10 हजार किताबें हैं।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग

अक्तूबर, 1910 में पूरे भारत के हिन्दी विद्वानों, प्रेमियों एवं सेवा करने वालों का अधिवेशन नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी के प्रांगण में हुआ। इस अधिवेशन में यह निश्चय किया गया कि एक ऐसी केंद्रीय संस्था की स्थापना की जाए जो हिन्दी सेवी संस्थाओं की बिखरी शक्ति को एकत्रित कर हिन्दी भाषा एवं नागरी लिपि का प्रचार-प्रसार करे। इसी अधिवेशन में उक्त संस्था के पदाधिकारियों का निर्वाचन हुआ जिसमें एक वर्ष के लिए महामना मालवीय अध्यक्ष तथा श्री पुरुषोत्तमदास टंडन, प्रधान मंत्री बनाए गए। और इसे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के नाम से संबोधित किया गया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रमुख विभागों में से परीक्षा विभाग सबसे महत्वपूर्ण विभाग है। यह सम्मेलन की मान और प्रतिष्ठा का वाहक है। सम्मेलन की वास्तविक परीक्षाओं का दौर 1918 से प्रारंभ हुआ। सम्मेलन द्वारा प्रथमा, मध्यमा एवं उत्तमा परीक्षाएँ संचालित होती हैं। ये परीक्षाएँ क्रमश: एस. एल. सी., बी. ए. तथा बी. ए. (आनर्स) के समकक्ष हिन्दी स्तर तक मान्य हैं। सम्मेलन की परीक्षाएँ मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम तथा बर्मा एवं गुयाना में भी होती हैं।
‘राष्ट्रभाषा संदेश’ के प्रकाशन में सामग्री संचयन में और राष्ट्रभाषा आंदोलन संबंधी सामग्री को नए ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन का साहित्य विभाग सम्मेलन की साहित्यिक गतिविधियों और साहित्यिक मान्यताओं को विकसित करने का माध्यम है। इस विभाग का मूल उद्देश्य हिन्दी साहित्य संबंधी ग्रंथों का प्रकाशन, ज्ञान की अनुपलब्ध किंतु महत्वपूर्ण कृतियों का प्रकाशन एवं शोध और अनुसंधान संबंधी कार्यों को विकसित करना है। इसके अतिरिक्त यह विभाग सम्मेलन नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन करता है जिसमें साहित्य एवं भाषा संबंधी शोधपत्र प्रकाशित किए जाते हैं।

हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद

सन् 1932 में हिन्दी के प्रतिकूल वातावरण में सभा की स्थापना हुई। निजाम के सामंती शासनकाल में सभा को अनेक कठिनाइयों का समाना करना पड़ा। हिन्दी का काम करना राजद्रोह समझा जाता था। सन् 1948 के पुलिस एक्शन से हैदराबाद की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति में जो परिवर्तन आया उसका सुप्रभाव हिन्दी प्रचार पर भी पड़ा। हैदराबाद में जब लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना हुई तो इस संस्था को शैक्षणिक संस्था के रूप में स्वीकार किया गया। सभा के मुख्य उद्देश्य हैं:

  • अहिन्दी भाषियों में हिन्दी का प्रचार करना,
  • हिन्दी साहित्य के प्रति जनता में रुचि उत्पन्न करना,
  • प्रांतीय भाषाओं से हिन्दी का परस्पर आदान-प्रदान करना, और
  • संविधान की धाराओं के आधार पर केंद्रीय राजकाज तथा अंतप्रांतीय कामकाज के लिए हिन्दी को व्यवहारोपयोगी बनाया है।
  • हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था 200 केंद्रों में होती है। इसके अतिरिक्त जेलों में बंदियों के लिए शिक्षा कि व्यवस्था की जाती है और उन्हें सभा अपनी सभी परीक्षाओं में नि:शुल्क प्रवेश देती है। इन परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने वाले बंदियों की सजा में राज्य सरकार कटौती करती है।
  • सभा द्वारा संचालित विशारद, भाषण तथा विद्वान की परीक्षाओं को भारत सरकार ने क्रमश: मैट्रिक, इंटर तथा बी. ए. के हिन्दी स्तर के समकक्ष स्थायी मान्यता प्रदान की है। आंध्र प्रदेश एवं अन्य प्रदेशों और उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा भी ये परीक्षाएँ मान्य हैं। सभा एम. ए. स्तर की एक उच्च परीक्षा ‘हिन्दी वाचस्पति’ भी चलाती है।

सभा प्रचारात्मक कार्यों के साथ ही साथ सर्जनात्मक कार्य भी नियमित रूप से करती आई है। सभी ने अनेक उपयोगी पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन किया है। इंटरमीडिएट बोर्ड तथा विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सभा की कुछ पाठ्य-पुस्तकों को स्थान प्राप्त हुआ है। सभा ने तेलुगु, मराठी, संस्कृत और कन्नड़ भाषाओं की कुछ साहित्यिक पुस्तकों का हिन्दी में और हिन्दी से प्रादेशिक भाषाओं में प्रकाशन कार्य किया है। केंद्रीय सरकार की सहायता से तेलुगु, उर्दू, कन्नड़ और मराठी साहित्य के इतिहास हिन्दी में तैयार किए गए हैं। तेतुगु और उर्दू साहित्य का इतिहास प्रकाशित हो चुका है। उस्मानिया विश्वविद्यालय की एम. ए. हिन्दी में जो अहिन्दीभाषी छात्र प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम आएगा उसे स्वर्ण पदक दिया जाएगा। यह स्वर्ग पदक ‘हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद’ द्वारा एल. एन. गुप्त के नाम से दिया जाएगा।

अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ

देश में पिछले 60 वर्षों से अधिक समय से राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का प्रचार करने के लिए प्रत्येक प्रदेश की अपनी आवश्यकता और समय की अनुकूलता के अनुसार वहाँ संस्थाएँ स्थापित हुईं और उन्होंने जनता में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति आस्था और अनुकूलता बढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। हिन्दी की परीक्षाओं का संचालन, शिक्षण, प्रकाशन तथा इसी तरह की भिन्न-भिन्न पोषण प्रवृत्तियों द्वारा इन संस्थाओं ने महत्वपूर्ण कार्य किया है और आज भी कर रही है। इनके कार्यों और आपसी संबंधों में सहयोग, समानता, समन्वय और एकसूत्रता लाकर देश में हिन्दी प्रचार के लिए राष्ट्रीय मंच स्थापित करना बहुत जरूरी था। कई वर्षों तक इस दिशा में सरकार के प्रयत्न तथा हिन्दी प्रचार करने वाली परीक्षा मान्यता-प्राप्त संस्थाओं के सहयोग से 4 अगस्त 1964 को दिल्ली में अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ की स्थापना हुई।

  • संघ के सदस्य निम्नलिखित उद्देश्यों के अनुसार होंगे:
  1. उन स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं के दो-दो प्रतिनिधि, जिनकी परीक्षाएँ एल. एल. सी. या उसकी समकक्ष या उसमें उच्च परीक्षा के स्तर तक भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं अथवा भारत सरकार संघ के परामर्श से भविष्य में जिनकी परीक्षाओं को मान्यता दे।
  2. प्रत्येक राज्य सरकार और संघ सरकार का एक-एक प्रतिनिधि।
  3. भारत सरकार के दो प्रतिनिधि (एक शिक्षा मंत्रालय का तथा दूसरा गृह मंत्रालय का)।
  4. सहयोजित सदस्य।

कार्यसमिति को यह अधिकार होगा कि वह हिन्दी के कार्य से संबद्ध किसी संस्था या संस्थाओं को एक-एक प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दे सकती है अथवा उक्त कार्य से संबद्ध किसी प्रमुख व्यक्ति को संस्था के सदस्य के रूप में सहयोजित कर सकती है, किंतु ऐसे प्रतिनिधि और सहयोजित व्यक्तियों की, जो दोनों ही संघ के सहयोजित सदस्य समझे जाएँगे, संख्या कुल मिलाकर चार से अधिक न होगी और उनका कार्यकाल एक बार में तीन वर्ष से अधिक न होगा। जिन संस्थाओं को प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया जाएगा उनसे भी संस्थाओं की तरह सदस्यता शुल्क लिया जाएगा, किंतु सहयोजित व्यक्तियों द्वारा शुल्क देय न होगा। संघ का प्रत्येक सदस्य उसे नामजद करने वाली संस्था जब तक चाहेगी तब तक सदस्य बना रहेगा। किंतु यदि भारत सरकार संबंधित संस्था की परीक्षा की मान्यता को रद्द कर दे तो वह सदस्य संघ का सदस्य नहीं रहेगा।

  • संघ अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निम्नलिखित कार्य कर रहा है:
  1. संघ की ओर से पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण भारत की स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं के कार्य-कलापों का अध्ययन करने, उनकी समस्याओं का अध्ययन एवं समाधान करने, हिन्दी के प्रचार और प्रसार की दृष्टि से आवश्यक योजनाओं को कार्यांन्वित करने के लिए क्षेत्रीय हिन्दी प्रचारकों, कार्यकर्ताओं के शिविरों का आयोजन।
  2. अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन तथा शिविरों का आयोजन।
  3. हिन्दी तथा हिन्दीतर प्रदेशों के विद्वानों के भाषणों की व्यवस्था।
  4. हिन्दीतर भाषी वरिष्ठ साहित्यकारों की हिन्दी प्रदेशों में सद्भावना यात्राएँ।
  5. स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं के कार्यों में समन्वय स्थापित करना।
  6. हिन्दीतर भाषी लेखकों की पुस्तकों की प्रदर्शनी का आयोजन।

इसके अतिरिक्त संघ हिन्दी परीक्षाओं के माध्यम द्वारा होने वाले प्रचार का मूल्यांकन करता है। हिन्दीतर प्रदेशों में हिन्दी शिक्षण और शिक्षकों की कठिनाइयों के बारे में विचार-विनिमय करता हे। संस्थाओं द्वारा होने वाले हिन्दी प्रचार और शिक्षणात्मक कार्यनीति के संबंध में विचार करता है। हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखकों की संगोष्ठियों, सम्मेलनों का आयोजन करता है। हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखकों तथा छात्रों का अभिनंदन करता है। हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखकों की रचनाओं का संस्थाओं के सहयोग से प्रकाशन करता है।
भारत सरकार ने नई परीक्षाओं को मान्यता देने की दृष्टि से सिफारिश करने का काम संघ को सौंपा है। उसके संबंध में संघ ने आवश्यक नीति-नियम निर्धारित किए है। आवश्यकता पड़ने पर संघ की ओर से परीक्षा-मान्यता की इच्छा रखने वाली संस्थाओं का निरीक्षण भी किया जाता है। भारत सरकार की केंद्रीय हिन्दी समिति तथा विभिन्न मंत्रालयों में गठित हिन्दी सलाहकार समितियों, हिन्दी शिक्षा समितियों, परीक्षाओं की मान्यता समिति तथा केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा में संघ के प्रतिनिधि नामित किए जाते हैं। इस प्रकार भारत सरकार, राज्य सरकारों संघराज्य क्षेत्र, सदस्य संस्थाओं, शिक्षा मंत्रालयों तथा केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के साथ संघ सहयोगी सपंर्क रखकर कार्य करता है। संघ ने स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं की परीक्षाओं का स्तर ऊंचा करने, उनमें अधिक व्यवस्था लाने, आवश्यक नियम बनाने तथा कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए जो परीक्षा नियमावली तैयार की है उसे शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने स्वीकार किया है। संघ से संबंधित सभी हिन्दी संस्थाएँ इस परीक्षा नियमावली के अनुसार अपनी परीक्षाओं का संचालन कर रही हैं। इसके अतिरिक्त संघ ने स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं द्वारा संचालित हिन्दी परीक्षाओं के स्तर को ध्यान में रखते हुए एक आदर्श पाठ्यक्रम का निर्माण किया है।
संघ ने राष्ट्रभाषा प्रचार का इतिहास प्रकाशित किया है। इसमें समस्त भारत में हिन्दी प्रचार का प्रारंभ, प्रगति और वर्तमान स्थिति का विवरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त संघ की ओर से ऐसे क्षेत्रों में जहाँ की भाषाएँ और बोलियाँ अलग-अलग है उनके सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पक्षों को देवनागरी लिपि में प्रकाशित करने की योजना बनाई गई है। इस योजना के अंतर्गत पूर्वांचल के मेघालय, अरुणाचल, नागालैंड तथा मिजोरम प्रदेश के संबंध में आवश्यक जानकारी देने के लिए पुस्तकें प्रकाशित की गई हैं। इस प्रकार अखिल भारतीय हिन्दी संस्था संघ की पूर्व–पीठिका, उद्देश्य, नियमावली, गठन, नीति और कार्य-प्रणाली की दृष्टि से हिन्दी और हिन्दीतर प्रदेश की संस्थाओं, सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर होने वाले कार्य तथा सभी दिशाओं में काम करने वाली संस्थाओं का संगम-स्थान है। यह सच्चे अर्थ में हिन्दी प्रचार के लिए राष्ट्रीय एवं सहयोगी मंच है। संघ की सदस्य-संस्थाएँ तथा सरकारी प्रतिनिधि परस्पर स्नेहभाव, सदेच्छा, सहानुभूति के आदान-प्रदान द्वारा सहयोगी पद्धति से काम करते हैं। यह अपने ही में एक अभूतपूर्व और आनंददायी घटना है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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क्रमांक लेख का नाम लेखक
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60. हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाएँ श्री शंकरराव लोंढे
61. राष्ट्रीय प्रचार समिति, वर्धा श्री शंकरराव लोंढे
सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
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