अकलंकदेव  

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आचार्य अकलंकदेव

  • आचार्य अकलंकदेव ईसा 7वीं, 8वीं शती के तीक्ष्णबुद्धिएवं महान् प्रभावशाली तार्किक हैं।
  • ये जैन न्याय के प्रतिष्ठाता कहे जाते हैं।
  • अनेकांत, स्याद्वाद आदि सिद्धान्तों पर जब तीक्ष्णता से बौद्ध और वैदिक विद्वानों द्वारा दोहरा प्रहार किया जा रहा था तब सूक्ष्मप्रज्ञ अकलंकदेव ने उन प्रहारों को अपने वाद-विद्याकवच से निरस्त करके अनेकांत, स्याद्वाद, सप्तभंगी आदि सिद्धान्तों को सुरक्षित किया था तथा प्रतिपक्षियों को सबल जवाब दिया था।
  • इन्होंने सैकड़ों शास्त्रार्थ किये और जैनन्याय पर बड़े जटिल एवं दुरूह ग्रन्थों की रचना की है। उनके वे न्यायग्रन्थ निम्न हैं-
  1. न्याय-विनिश्चय,
  2. सिद्धि-विनिश्चय,
  3. प्रमाण-संग्रह,
  4. लघीयस्त्रय,
  5. देवागम-विवृति (अष्टशती),
  6. तत्त्वार्थवार्तिक व उसका भाष्य आदि।
  • इनमें तत्त्वार्थवार्तिक व भाष्य तत्त्वार्थसूत्र की विशाल, गम्भीर और महत्पूवर्ण वार्तिक रूप में व्याख्या है।
  • इसमें अकलंकदेव ने सूत्रकार गृद्धपिच्छाचार्य का अनुसरण करते हुए सिद्धांत, दर्शन और न्याय तीनों का विशद विवेचन किया है।
  • विद्यानन्द ने सम्भवत: इसी कारण 'सिद्धेर्वात्राकलंकस्य महतो न्यायवेदिन:[1] वचनों द्वारा अकलंक को 'महान्यायवेत्ता' जस्टिक-न्यायधीश कहा है।



टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. त0 श्लो0 पृ0 277

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