असरानी  

असरानी
असरानी
पूरा नाम गोवर्धन असरानी
प्रसिद्ध नाम असरानी
जन्म 1 जनवरी, 1941
जन्म भूमि जयपुर, राजस्थान
पति/पत्नी मंजू असरानी[1]
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनय
मुख्य फ़िल्में 'दादा', 'सत्यकाम', 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'सीता और गीता', 'रास्ते का पत्थर', 'बनफूल', 'परिचय', 'शोर', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'चोर मचाए शोर', 'आप की कसम', 'रोटी' आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय राजस्थान महविद्यालय, फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार
प्रसिद्धि हास्य अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी असरानी ने 1967 में 'हरे कांच की चूड़ियां' फ़िल्म से इंडस्ट्री में कदम रखा। हालांकि उन्हें पहचान मिली ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'सत्यकाम' (1969) से। हास्य के बूते मिली कामयाबी का दौर जब शुरू हुआ तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अद्यतन‎

असरानी (अंग्रेज़ी: Asrani, जन्म- 1 जनवरी, 1941, जयपुर, राजस्थान) भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के ख्याति प्राप्त हास्य अभिनेता हैं। उनकी असली पहचान अपने समय की सुपरहिट फ़िल्म 'शोले' में निभाए गये उस पुलिस अधिकारी के किरदार के रूप में अधिक है, जो खुद को अंग्रेज़ों के जमाने का जेलर बताने में गौरव महसूस करता है। लगभग सभी बड़े अभिनेताओं और निर्देशकों के साथ काम कर चुके असरानी लंबे समय से आज भी दर्शकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ने में इसलिए सफल हैं, क्योंकि उनके काम में हमेशा नयापन रहता है। वह बहुत ज्यादा फ़िल्में नहीं करते, लेकिन जो भी करते हैं वह यादगार रहती हैं।

परिचय

असरानी का जन्म 1 जनवरी, 1941 को जयपुर, राजस्थान में एक सिंधी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम 'गोवर्धन असरानी' है, लेकिन फ़िल्मों में उन्हें असरानी नाम से पहचान मिली। उनकी चार बहनें और तीन भाई हैं। बचपन से ही फ़िल्मों की ओर रुझान रहने की वजह से उन्होंने राजस्थान महाविद्यालय से अपनी स्नातक करने के बाद 1963 में मुंबई का रुख किया और ऋषिकेश मुखर्जी और किशोर साहू के कहने पर फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे में दाखिला ले लिया। असरानी वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का दामन थामकर राजनीति में उतरे, लेकिन राजनीति के गलियारे में ज्यादा जम नहीं पाए। उन्हें गुजराती फ़िल्म 'सात कैदी' में अभिनय के लिए गुजरात सरकार ने सम्मानित भी किया था।

फ़िल्मी शुरुआत

असरानी ने 1967 में 'हरे कांच की चूड़ियां' फ़िल्म से इंडस्ट्री में कदम रखा। हालांकि उन्हें पहचान मिली ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'सत्यकाम' (1969) से। हास्य के बूते मिली कामयाबी का दौर जब शुरू हुआ तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पिछले साढ़े तीन दशक में वह अब तक 300 से अधिक हिन्दी और गुजराती फ़िल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ चुके हैं। यूं तो उन्होंने अधिकतर फ़िल्मों में हास्य भूमिकाएँ अदा कीं। हालांकि कुछ फ़िल्मों में उनके विविध किरदार भी रहे। 'चुपके चुपके' के प्रशांत, 'अभिमान' के चंद्रू, 'बावर्ची' के बाबू और 'छोटी सी बात' के नागेश के तौर पर उन्होंने अपने गंभीर अभिनय को भी दर्शकों के समक्ष पेश किया।

असरानी ने 'आज की ताजा खबर', 'चुपके-चुपके', 'छोटी सी बात', 'रफू चक्कर', 'बालिका वधू', 'शोले', 'छलिया बाबू', 'रोटी', 'प्रेम नगर', 'फाँसी', 'दिल्लगी', 'हीरालाल-पन्नालाल', 'पति पत्नि और वो', 'जो जीता वही सिकंदर', 'गर्दिश', 'बड़े मियां-छोटे मियां', 'हीरो हिंदुस्तानी', 'घरवाली-बाहरवाली', 'तकदीर वाला' में जबरदस्त अभिनय किया है। उन्होंने अभिनय के अलावा निर्देशन में भी हाथ आजमाया, जिसमें 'उड़ान', 'सलाम मेम साब', 'चला मुरारी हीरो बनने' जैसी फ़िल्में शामिल हैं। गाने की बात करें तो असरानी ने 'कोशिश' और 'तेरी मेहरबानी' फ़िल्मों में गाना भी गाया। हालांकि असरानी को सफलता का स्वाद चखने के लिए कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। वह ऑल इंडिया रेडियो में बतौर वॉइस आर्टिस्ट के रूप में भी काम कर चुके थे। 'आज की ताजा खबर' और 'बालिका वधु' में कॉमेडी के लिए फ़िल्म फेयर अवॉर्ड से भी उन्हें नवाजा जा चुका है। 'आज की ताजा खबर' में अभिनेत्री मंजू बंसल ईरानी से उन्हें प्यार हो गया और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया।

गुजराती, पंजाबी फ़िल्मों में अभिनय

कहा जाता है कि 1967 से 1969 के दौर में उन्हें हिन्दी फ़िल्में नहीं मिलीं तो उन्होंने कई गुजराती फ़िल्मों में भी काम किया। उन्होंने हिन्दी सहित गुजराती और पंजाबी फ़िल्मों भी काम किया है। उन्होंने अपने पांच दशक लंबे कॅरियर में लगभग तीन सौ से अधिक फ़िल्में की हैं और उनके अभिनय का यह सिलसिला अब भी जारी है।

राजेश खन्ना के साथ कार्य

कहा जाता है कि राजेश खन्ना, असरानी से खासे प्रभावित थे और वह निर्देशकों से उन्हें फ़िल्म में लेने की सिफारिश भी करते थे। इसी का नतीजा था कि दोनों ने लगभग 25 फ़िल्में एक साथ की हैं।

साक्षात्कार से दूर

असरानी ने फ़िल्मों के बारे में एक बार कहा था कि- "फ़िल्में भारतीय खाने की तरह होती हैं। जिस तरह भारतीय खाने में नमक, मिर्च, मसाले का तालमेल होता है और इनमें से अगर किसी भी चीज की कमी रह जाए तो खाने का स्वाद फीका पड़ जाता है, ठीक वैसे ही बॉलीवुड में सिर्फ कॉमेडी के दम पर फ़िल्में नहीं बनतीं। कॉमेडी के साथ-साथ एक्शन और रोमांस की भी ज़रूरत पड़ती है।" असरानी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें इंटरव्यू देने से परहेज है और वह इससे बचते हैं। असरानी का मानना है- "अब फ़िल्मों में हास्य कलाकारों के लिए ज्यादा कुछ करने को नहीं रह गया है। पहले की फ़िल्मों में हास्य कलाकार हुआ करते थे, लेकिन आजकल तो फ़िल्में हॉलीवुड से उठा ली जाती हैं। फ़िल्म का हीरो ही सब कुछ कर लेता है।"

प्रमुख फ़िल्में

उनकी अब तक प्रदर्शित फ़िल्मों में दादा, उस्ताद पेडरो, हरे कांच की चूडि़यां, सत्यकाम, पुष्पांजलि, मेरे अपने, गुड्डी, मेम साहब, बावर्ची, सीता और गीता, शादी के बाद, ये गुलिस्तां हमारा, सबसे बड़ा सुख, रास्ते का पत्थर, बनफूल, कोशिश, परिचय, पिया का घर, शोर, गरम मसाला, अचानक, अनामिका, शरीफ बदमाश, छलिया, अभिमान, अनहोनी, आ गले लग जा, नमक हराम, अग्निरेखा, चरित्रहीन, दुनिया का मेला, त्रिमूर्ति, पैसे की गुडि़या, हमशक्ल, पाप और पु.य, अजनबी, आज की ताजा खबर, बिदाई, चोर मचाए शोर, आप की कसम, रोटी, उलझन, चेताली, खुशबू, मिली, मजाक, चुपके चुपके, अपने रंग हजार, आक्रमण, शोले, सुनहरा संसार, राजा, उम्रकैद, रफूचक्कर, छोटी सी बात, महबूबा, आपबीती, उधार का सिंदूर, तपस्या, बालिका वधू, लैला मजनूं, भनवार, चरस, फकीरा, हेराफेरी, बंडलबाज, अब क्या होगा, प्रियतमा, अनुरोध, कर्म, कसम खून की, कोतवाल साहब, कलाबाज, हीरा और पत्थर, दुनियादारी, आशिक हूं बहारों का, आलाप, चलता पुर्जा, जागृति, डीम गर्ल, आपकी खातिर, चांदी सोना, छैला बाबू, ढोंगी, चोर सिपाही, चक्कर पे चक्कर, खून पसीना, साहब बहादुर, देशद्रोही, द बर्निंग ट्रेन, स्वयंवर, थोड़ी सी बेवफाई, निशाना, बंदिश, मांग भरो सजना, आसपास, एक दूजे के लिए, संबंध, हमारी बहू, कामचोर, ये इश्क नहीं आसां, जानी दोस्त, मुझे इंसाफ चाहिए, सरदार और वांटेड आदि प्रमुख तौर पर गिनी जाती हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विवाह से पहले मंजू बंसल ईरानी

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