कर्नाट वंश

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कर्नाट वंश (अंग्रेज़ी: Karnat dynasty) का उदय 1097 ई. में मिथिला में हुआ। जिसकी राजधानी बारा जिले के सिम्रौनगढ़ में थी। कर्नाट वंश का संस्थापक नान्यदेव था। नान्यदेव एक महान शासक था। उनका पुत्र गंगदेव एक योग्य शासक बना। कर्नाट वंश के शासन काल को 'मिथिला का स्वर्णयुग' भी कहा जाता है। इस वंश को 'सिमराँव वंश' या 'देव राजवंश' भी कहा जाता है।

  • नान्यदेव ने कर्नाट की राजधानी सिमराँवगढ़ बनाई। कर्नाट शासकों के वंश काल को 'मिथिला का स्वर्णयुग' भी कहा जाता है।
  • राज्य ने उन क्षेत्रों को नियंत्रित किया, जिन्हें आज हम भारत और नेपाल में तिरहुत या मिथिला के रूप में जानते हैं। यह क्षेत्र पूर्व में महानंदा नदी, दक्षिण में गंगा, पश्चिम में गण्डकी नदी और उत्तर में हिमालय से घिरा है। 1816 में सुगौली संधि के बाद दोनों देशों के बीच सीमा रेखा बनाई गई थी।
  • फ्रांसीसी प्राच्यविद और विशेषज्ञ सिलावैन लेवी के अनुसार, नान्यदेव ने चालुक्य राजा विक्रमादित्य षष्टम की मदद से संभवतः सिमराँवगढ पर अपना वर्चस्व स्थापित किया। 1076 ई. में विक्रमादित्य षष्ठम के शासन के बाद उन्होंने आधुनिक बंगाल और बिहार पर सफल सैन्य अभियान का नेतृत्व किया।
  • ओइनवार वंश के शासन तक मिथिला में स्थिरता और प्रगति हुई। नान्यदेव के साथ सेन वंश राजाओं से युद्ध होता रहता था।
  • कर्नाट वंश के शासक नरसिंह देव बंगाल के शासक से परेशान होकर उसने तुर्की का सहयोग लिया। उसी समय बख्तियार खिलजी भी बिहार आया और नरसिंह देव को धन देकर उसे सन्तुष्ट कर लिया और नरसिंह देव का साम्राज्य तिरहुत से दरभंगा क्षेत्र तक फैल गया।
  • बिहार और बंगाल पर गयासुद्दीन तुगलक ने 1324-25 ई. में आधिपत्य कर लिया। उस समय मिथिला के शासक हरिसिंह देव थे। उन्होंने अपने योग्य मंत्री कामेश्वर झा को अगला राजा नियुक्त किया। इस प्रकार उत्तरी और पूर्व मध्य बिहार से कर्नाट वंश 1626 ई. में समाप्त हो गया और मिथिला में नवीन राजवंश का शासन शुरू कर दिया जो बाद में ओइनवार वंश के नाम से जाना गया।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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