घोड़े की नस्ल  

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घोड़े की नस्ल
घोड़ा
जगत जीव-जंतु
संघ कॉर्डेटा (Chordata)
वर्ग मेमेलिया (Mammalia)
गण अर्टिओडाक्टायला (Artiodactyla)
कुल ईक्यूडी (Equidae)
जाति ईक्वस (Equus)
प्रजाति ई. फेरस (E. ferus)
द्विपद नाम ईक्वस फेरस (Equus ferus)
विशेष विवाहोत्सव और धार्मिक जलूसों में सजे-धजे घोड़ों को देखकर उत्साह का संचार हो जाता है। गुरु गोविन्द सिंह जयंती, महाराणा प्रताप जयंती और रामनवमी के शुभ अवसर पर सुसज्जित अश्व भारतीय जनमानस में प्राचीन गौरव को जागृत कर वीरत्व को उत्पन्न करते हैं।
अन्य जानकारी हाथी और ऊँट की भांति घोड़ा भी उपयोगी पशु है। संस्कृत में इसे 'अश्व' और अंग्रेज़ी में 'हॉर्स' (Horse) कहा जाता है। घोड़ा मनुष्य से संबंधित संसार का सबसे प्राचीन पालतू स्तनपोषी प्राणी है, जिसने अज्ञात काल से मनुष्य की किसी न किसी रूप में सेवा की है।
भारत राजा-महाराजाओं का देश रहा है। आज भी देश के कई हिस्सों में राज घराने मौजूद हैं। इन राजा-महाराजाओं के जमाने में आम आदमी के लिए सवारी की बड़ी समस्या थी, उस समय राजघराने ही घोड़ों से चलते थे। जैसे-जैसे ट्रेंड बदला वैसे ही आदतें और तौर तरीके भी बदलते चले गए। जब देश में गाड़ियों का प्रचलन बढ़ा तो सवारी की समस्या भी कम होती चली गयी। जो राजघराने घोड़ों का इस्तेमाल करते थे वो भी अब गाड़ियों से चलने लगे थे। लेकिन घोड़ों के प्रति लगाव कम नहीं हुआ। बेहतर नस्ल वाले घोड़ों को फौज में इस्तेमाल किया जाने लगा। जो लोग घोड़ा पालन करते हैं, वह अच्छी कमाई करते हैं। घोड़ा पालन करने वाले लोग इनका वाणिज्यिक इस्तेमाल करने लगे। यानी बेहतरीन नस्ल वाले घोड़ों को पालकर उनको घुडसवारी के शौक़ीन, खेल में इस्तेमाल करने के लिए बेचते हैं।[1]

प्रसिद्ध नस्ल

घुड़सवारी को एक अन्तराष्ट्रीय खेल का दर्जा प्राप्त है। भारत में घोड़ों का पालन अधिकतर राजस्थान, पंजाब, गुजरात और मणिपुर में किया जाता है। इनकी कई नस्लें भारत में पायी जाती हैं, लेकिन मारवाड़ी, काठियावाड़ी घोड़े को अव्वल दर्जा प्राप्त है।

  • मारवाड़ी घोड़े का इस्तेमाल राजाओं के ज़माने में युद्ध के लिए किया जाता था। इसलिए कहा जाता है कि इन घोड़ों के शरीर में राजघराने का लहू दौड़ता है। मारवाड़ी नस्ल के घोड़े राजस्थान के मारवाड़ में पाए जाते हैं। यही इनका जन्मस्थल भी है। इनकी लम्बाई 130 से 140 से.मी. और ऊँचाई 152 से 160 से.मी. होती है। 22 से.मी. के चौड़े फेस वाले ये घोड़े काफी ताकतवर होते हैं। इनका इस्तेमाल ज्यादातर खेल प्रतियोगिताओं, सेना और राजघराने करते हैं। इस नस्ल के घोड़ों कि कीमत बहुत अधिक होती है। एक घोड़ा कई लाख की क़ीमत में बेचा जाता है। यह भारत में सबसे अव्वल दर्जे का घोड़ा है।
  • कठियावाड़ी घोड़े की नस्ल भी काफी अच्छी मानी जाती है। इस घोड़े की जन्मस्थली गुजरात का सौराष्ट्र इलाका है। यह गुजरात के राजकोट, अमरेली और जूनागढ़ जिलों में पाया जाता है। इसका रंग ग्रे और गर्दन लम्बी होती है। यह घोड़ा 147 से.मी. ऊँचा होता है।
  • स्पीती घोड़ों को पहाड़ी इलाकों के लिए बेहतर माना जाता है। ये ज्यादातर हिमाचल प्रदेश में पाए जाते हैं। इनकी ऊँचाई अधिकतर 127 से.मी. होती है। इस नस्ल के घोड़े पहाड़ी इलाकों में बेहतरीन काम करते हैं।
  • ज़नस्कारी नस्ल के घोड़े भारत के लेह में पाए जाते हैं। यह घोड़े लेह और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में बहुत पाए जाते हैं। इन घोड़ों का इस्तेमाल अधिकतर बोझा ढोने के लिए किया जाता है। इस नस्ल के घोड़ों की संख्या काफी कम है। इनकी नस्ल को बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं।
  • मणिपुरी पोनी घोड़े की नस्ल को काफी अच्छा माना जाता है। इस नस्ल के घोड़े काफी ताकतवर और फुर्तीले होते हैं। इस नस्ल के घोड़ों का इस्तेमाल अधिकतर युद्ध और खेल के लिए किया जाता है। यह घोड़ा 14 अलग-अलग रंगों में पाया जाता है।
  • भूटिया नस्ल के घोड़े ज्यादातर सिक्किम और दार्जिलिंग में पाए जाते हैं। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से दौड़ और सामान ढोने के लिए किया जाता है। इस नस्ल के घोड़े ज्यादातर नार्थ-ईस्ट में मिलते हैं।
  • मालानी नस्ल के घोड़े अपनी श्रेष्ठ गुणवता के कारण देश-विदेश मे पहचान बना चुके हैं और इनकी खरीद-फरोख्त के लिए लोग तिलवाड़ा मेले में पहुँचते है। पोलो एवं रेसकोर्स के लिए इन घोड़ों की माँग लगातार बढ़ रही है। दौड़ते समय मालानी नस्ल के घोड़े के पिछले पैर, अपने पैरों की तुलना में, अधिक गतिशील होने के कारण अगले पैरों से टक्कर मारते हैं, जो इसकी चाल की खास पहचान है। इनके ऊँचे कान आपस में टकराने पर इनका आकर्षण बढ़ जाता हैं और ये घोड़े कानों के दोनों सिरों से सिक्का तक पकड़ लेते हैं। चाल व गति में बेमिसाल इन घोड़ों की सुदरंता, ऊँचा कद, मजबूत कद-काठी देखते ही बनती हैं। इनमें लाल रंग का घोड़ा सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र होता है। मालानी नस्ल की उत्पत्ति काठियावाड़ी और सिंधी नस्ल के घोड़ों से हुई हैं।[2]
  • कच्छी-सिंधी घोड़े की नस्ल को भारत में घोड़ों की सातवीं प्रजाति के रूप में पहचान मिली है। इस नस्ल को बन्नी क्षेत्र के बैलों और खराई के ऊंटों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत किया गया है। 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद' (आईसीएआर) ने कच्छी-सिंधी घोड़े को सातवीं घोड़ों की नस्ल के रूप में पंजीकृत किया है। दिलचस्प बात यह है कि कच्छी-सिंधी नस्ल के 3,136 घोड़े हैं, जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के 1,850 मालिकों के पास हैं। इनकी ब्रीडिंग के लिए एक संघ बनाया गया था, जिसका नाम 'राम रहीम हॉर्स ब्रीडर्स असोसिएशन' था। यह नस्ल अपने धैर्य के स्तर के लिए पहचानी जाती है। यह गर्म और ठंडे मौसम में जीवित रह सकता है। इस घोड़े की कीमत 3 लाख से 14 लाख रुपये के बीच होती है और यह घोड़ा रेसर्स में पसंदीदा है।[3]


इन सब नस्लों में मारवाड़ी, काठियावाड़ी और मणिपुरी नस्ल के घोड़े सबसे बेहतर हैं। इसलिए इनका वाणिज्यिक पालन किया जा रहा है। जिससे कि घोड़ा पालकों को इनकी ऊँची क़ीमत मिलती है। इसके अलावा भारतीय घोड़ों का निर्यात भी किया जाता है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इस नस्ल के घोड़ों की कीमत होती हैं लाखों में... (हिंदी) hindi.krishijagran.com। अभिगमन तिथि: 10 जनवरी, 2018।
  2. मालानी नस्ल के घोड़ों का आकर्षण (हिंदी) hindi.webdunia.com। अभिगमन तिथि: 10 जनवरी, 2018।
  3. कच्छी-सिंधी घोड़े की नस्ल को मिली पहचान (हिंदी) navbharattimes.indiatimes.com। अभिगमन तिथि: 10 जनवरी, 2018।

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