पुष्यमित्र शुंग  

पुष्यमित्र शुंग मौर्य वंश को पराजित करने वाला तथा शुंग वंश (लगभग 185 ई. पू.) का प्रवर्तक था। वह जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय था। मौर्य वंश के अन्तिम राजा बृहद्रथ ने उसे अपना सेनापति नियुक्त कर दिया था। बृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र शुंग ने 36 वर्षों तक राज्य किया था। क्योंकि मौर्य वंश के अंतिम राजा निर्बल थे और कई राज्य उनकी अधीनता से मुक्त हो चुके थे, ऐसे में पुष्यमित्र शुंग ने इन राज्यों को फिर से मगध की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया। उसने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और मगध साम्राज्य का फिर से विस्तार कर दिया।

शुंग वंश की स्थापना

मौर्य वंश का अन्तिम राजा बृहद्रथ था, जिसका सेनापति पुष्यमित्र शुंग था। एक दिन उसने अपनी सब सेना को एकत्र कर उसके प्रदर्शन की व्यवस्था की। सम्राट बृहद्रथ को भी इस प्रदर्शन के अवसर पर निमंत्रित किया गया। सेना पुष्यमित्र के प्रति अनुरक्त थी। सेना के सम्मुख ही पुष्यमित्र द्वारा बृहद्रथ की हत्या कर दी गई, और वह विशाल मगध साम्राज्य का अधिपति बन गया। इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने 'शुंग वंश' की नींव रखी। हर्षचरित में बृहद्रथ को 'प्रतिज्ञादुर्बल' कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि, राज्याभिषेक के समय प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार राजा को जो प्रतिज्ञा करनी होती थी, बृहद्रथ उसके पालन में दुर्बल था। सेना उसके प्रति अनुरक्त नहीं थी। इसीलिए सेनानी पुष्यमित्र का षड़यंत्र सफल हो गया।

  • बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र का राजा बन जाना ठीक उस प्रकार की घटना है, जैसी की राजा बालक को मारकर श्रेणिय भट्टिय का और राजा रिपुञ्जय को मारकर अमात्य पालक का राजा बनना था। महापद्म नन्द भी इसी ढंग से मगध के राजसिंहासन का स्वामी बना था। मगध साम्राज्य की शक्ति उसकी सुसंगठित सेना पर ही आश्रित थी। वहाँ जिस किसी के हाथ में सेना हो, वह राजगद्दी को अपने अधिकार में कर सकता था। जिस षड़यंत्र या क्रान्ति द्वारा मौर्य वंश का अन्त हुआ, वह 185 ई. पू. में हुई थी।

विजय अभियान

पुष्यमित्र का शासनकाल पूरी तरह से चुनौतियों से भरा हुआ था। उस समय भारत पर कई विदेशी आक्रान्ताओं ने आक्रमण किये, जिनका सामना पुष्यमित्र शुंग को करना पड़ा। पुष्यमित्र के राजा बन जाने पर मगध साम्राज्य को बहुत बल मिला था। जो राज्य मगध की अधीनता त्याग चुके थे, पुष्यमित्र ने उन्हें फिर से अपने अधीन कर लिया था। अपने विजय अभियानों से उसने मगध की सीमा का बहुत विस्तार किया।

विदर्भ की विजय

निर्बल मौर्य राजाओं के शासनकाल में जो अनेक प्रदेश साम्राज्य की अधीनता से स्वतंत्र हो गए थे, पुष्यमित्र ने उन्हें फिर से अपने अधीन कर लिया। उस समय 'विदर्भ' (बरार) का शासक यज्ञसेन था। सम्भवतः वह मौर्यों की ओर से विदर्भ के शासक-पद पर नियुक्त हुआ था, पर मगध साम्राज्य की निर्बलता से लाभ उठाकर इस समय स्वतंत्र हो गया था। पुष्यमित्र के आदेश से अग्निमित्र ने उस पर आक्रमण किया, और उसे परास्त कर विदर्भ को फिर से मगध साम्राज्य के अधीन कर लिया। कालिदास के प्रसिद्ध नाटक 'मालविकाग्निमित्र' में यज्ञसेन की चचेरी बहन मालविका और अग्निमित्र के स्नेह की कथा के साथ-साथ विदर्भ विजय का वृत्तान्त भी उल्लिखित है।

खारवेल से युद्ध

मौर्यवंश की निर्बलता से लाभ उठाकर कलिंग देश (उड़ीसा) भी स्वतंत्र हो गया था। उसका राजा खारवेल बड़ा प्रतापी और महत्वाकांक्षी था। उसने दूर-दूर तक आक्रमण कर कलिंग की शक्ति का विस्तार किया। खारवेल के हाथीगुम्फ़ा शिलालेख के द्वारा ज्ञात होता है, कि उसने मगध पर भी आक्रमण किया था। मगध के जिस राजा पर आक्रमण कर खारवेल ने उसे परास्त किया, हाथीगुम्फ़ा शिलालेख में उसका जो नाम दिया गया है, अनेक विद्वानों ने उसे 'बहसतिमित्र' (बृहस्पतिमित्र) पढ़ा है। बृहस्पति और पुष्य पर्यायवाची शब्द हैं, अतः जायसवालजी ने यह परिणाम निकाला था, कि खारवेल ने मगध पर आक्रमण करके पुष्यमित्र को ही परास्त किया था। पर अनेक ऐतिहासिक जायसवालजी के इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका विचार है कि खारवेल ने मगध के जिस राजा पर आक्रमण किया था, वह मौर्य वंश का ही कोई राजा था। उसका नाम बहसतिमित्र था, यह भी संदिग्ध है। हाथीगुम्फ़ा शिलालेख में यह अंश अस्पष्ट है, और इसे बहसतिमित्र पढ़ सकना भी निर्विवाद नहीं है। सम्भवतः खारवेल का मगध पर आक्रमण मौर्य शालिशुक या उसके किसी उत्तराधिकारी के शासनकाल में ही हुआ था।

यवन आक्रमण

मौर्य सम्राटों की निर्बलता से लाभ उठाकर यवनों ने भारत पर आक्रमण शुरू कर दिए थे। पुष्यमित्र के शासनकाल में उन्होंने फिर भारत पर आक्रमण किया। यवनों का यह आक्रमण सम्भवतः डेमेट्रियस (दिमित्र) के नेतृत्व में हुआ था। प्रसिद्ध व्याकरणविद पतञ्जलि ने, जो पुष्यमित्र के समकालीन थे, इस आक्रमण का 'अरुणत् यवनः साकेतम्, अरुणत् यवनः माध्यमिकाम्' (यवन ने साकेत पर हमला किया, यवन ने माध्यमिका पर हमला किया) लिख कर निर्देश किया है। 'अरुणत्' प्रयोग अनद्यतन भूतकाल को सूचित करता है। यह प्रयोग उस दशा में होता है, जब कि किसी ऐसी भूतकालिक घटना का कथन करना हो, जो प्रयोक्ता के अपने जीवनकाल में घटी हो। अतः यह स्पष्ट है, कि पतञ्जलि और पुष्यमित्र के समय में भी भारत पर यवनों का आक्रमण हुआ था, और इस बार यवन सेनाएँ साकेत और माध्यमिका तक चली आई थीं।

यवनों की पराजय

मालविकाग्निमित्र के अनुसार भी पुष्यमित्र के यवनों के साथ युद्ध हुए थे, और उसके पोते वसुमित्र ने सिन्धु नदी के तट पर यवनों को परास्त किया था। जिस सिन्धु नदी के तट पर शुंग सेना द्वारा यवनों की पराजय हुई थी, वह कौन-सी है, इस विषय पर भी इतिहासकारों में मतभेद है। श्री वी. ए. स्मिथ ने यह प्रतिपादन किया था, कि मालविकाग्निमित्र की सिन्धु नदी राजपूताने की सिन्ध या काली सिन्ध नदी है, और उसी के दक्षिण तट पर वसुमित्र का यवनों के साथ युद्ध हुआ था। पर अब बहुसंख्यक इतिहासकारों का यही विचार है, कि सिन्धु से पंजाब की प्रसिद्ध सिन्ध नदी का ही ग्रहण करना चाहिए। पर यह निर्विवाद है, कि यवनों को परास्त कर मगध साम्राज्य की शक्ति को क़ायम रखने में पुष्यमित्र शुंग को असाधारण सफलता मिली थी।

अश्वमेध यज्ञ

अयोध्या में पुष्यमित्र का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उसे 'द्विरश्वमेधयाजी' कहा गया है। इससे सूचित होता है, कि पुष्यमित्र ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किए थे। अहिंसा-प्रधान बौद्ध और जैन धर्मों के उत्कर्ष के कारण इस यज्ञ की परिपाटी भारत में विलुप्त हो गई थी। अब पुष्यमित्र ने इसे पुनरुज्जीवित किया। सम्भवतः पतञ्जलि मुनि इन यज्ञों में पुष्यमित्र के पुरोहित थे। इसलिए उन्होंने 'महाभाष्य' में लिखा है-'इह पुष्यमित्रं याजयामः' (हम यहाँ पुष्यमित्र का यज्ञ करा रहे हैं)। अश्वमेध के लिए जो घोड़ा छोड़ा गया, उसकी रक्षा का कार्य वसुमित्र के सुपुर्द किया गया था। सिन्धु नदी के तट पर यवनों ने इस घोड़े को पकड़ लिया और वसुमित्र ने उन्हें परास्त कर इसे उनसे छुड़वाया। किन विजयों के उपलक्ष्य में पुष्यमित्र ने दो बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है।

वैदिक धर्म का पुनरुत्थान

शुंग सम्राट प्राचीन वैदिक धर्म के अनुयायी थे। उनके समय में बौद्ध और जैन धर्मों का ह्रास होकर वैदिक धर्म का पुनरुत्थान प्रारम्भ हुआ। 'दिव्यावदान' के अनुसार पुष्यमित्र बौद्धों से द्वेष करता था, और उसने बहुत-से स्तूपों का ध्वंस करवाया था, और बहुत-से बौद्ध-श्रमणों की हत्या करायी थी। दिव्यावदान में तो यहाँ तक लिखा है, कि साकल (सियालकोट) में जाकर उसने घोषणा की थी, कि कोई किसी श्रमण का सिर लाकर देगा, तो उसे मैं सौ दीनार पारितोषिक दूँगा। सम्भव है, बौद्ध ग्रंथ के इस कथन में अत्युक्ति हो, पर इसमें सन्देह नहीं कि पुष्यमित्र के समय में यज्ञप्रधान वैदिक धर्म का पुनरुत्थान शुरू हो गया था। उस द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ ही इसके प्रमाण हैं।

शुंग साम्राज्य की सीमा

विदर्भ को जीतकर और यवनों को परास्त कर पुष्यमित्र शुंग मगध साम्राज्य के विलुप्त गौरव का पुनरुत्थान करने में समर्थ हुआ था। उसके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में सिन्धु नदी तक अवश्य थी। दिव्यावदान के अनुसार 'साकल' (सियालकोट) उसके साम्राज्य के अंतर्गत था। अयोध्या में प्राप्त उसके शिलालेख से इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि मध्यदेश पर उसका शासन भली-भाँति स्थिर था। विदर्भ की विजय से उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा नर्मदा नदी तक पहुँच गयी थी। इस प्रकार पुष्यमित्र का साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक और सिन्धु से प्राच्य समुद्र तक विस्तृत था।

  • पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र ने 36 वर्ष (185-149 ई. पू.) तक राज्य किया।

शासक राजा

पुष्यमित्र शुंग के पश्चात् इस वंश में नौ शासक और हुए, जिनके नाम इस प्रकार थे-

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