राजस्थानी साहित्य  

राजस्थानी साहित्य की संपूर्ण भारतीय साहित्य में अपनी एक अलग पहचान है। राजस्थानी भाषा का प्राचीन साहित्य अपनी विशालता एवं अगाधता मे इस भाषा की गरिमा, प्रौढ़ता एवं जीवन्तता का सूचक है। अनकानेक ग्रन्थों के नष्ट हो जाने के बाद भी हस्त लिखित ग्रन्थों एवं लोक साहित्य का जितना विशाल भण्डार राजस्थानी साहित्य का है, उतना शायद ही अन्य भाषा का रहा हो।

विभाजन

राजस्थानी साहित्य के निर्माणकर्ताओं को शैलीगत एवं विषयगत भिन्नताओं के कारण पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. जैन साहित्य
  2. चारण, साहित्य
  3. ब्राह्यण साहित्य
  4. संत साहित्य
  5. लोक साहित्य

जैन साहित्य

जैन धर्मावलम्बियों, जैसे- जैन आचार्यों, मुनियों, यतियों एवं श्रावकों तथा जैन धर्म से प्रभावित साहित्यकारों द्वारा वृहद मात्रा में रचा गया साहित्य 'जैन साहित्य' कहलाता है। यह साहित्य विभिन्न प्राचीन मंदिरों के ग्रन्थागारों में संग्रहित है। यह साहित्य धार्मिक साहित्य है, जो गद्य एवं पद्य दोनों में उपलब्ध है।[1]

चारण साहित्य

राजस्थान के चारण आदि विरुद्ध गायक कवियों द्वारा रचित अन्याय कृतियों को सम्मिलित रूप से 'चारण साहित्य' कहा जाता है। चारण साहित्य मुख्यतः पद्य में रचा गया है। इसमें वीर कृतियों का बाहुल्य है।

ब्राह्मण साहित्य

राजस्थानी साहित्य में ब्राह्मण साहित्य अपेक्षाकृत कम मात्रा में उपलब्ध है। 'कान्हड़दे प्रबन्ध', 'हम्मीरायण', 'बीसलदेव रासो', 'रणमल छंद' आदि प्रमुख ग्रंथ इस श्रेणी के अंतर्गत रखे जाते हैं।

संत साहित्य

मध्य काल में भक्ति आन्दोलन की धारा में राजस्थान की शांत एवं सौम्य जलवायु में अनेक निर्गुणी एवं सगुणी संत-महात्माओं का आविर्भाव हुआ। इन उदारमना संतों ने ईश्वर की भक्ति में एवं जन-सामान्य कल्याणार्थ विपुल साहित्य की रचाना यहाँ की लोक भाषा में की है। संत साहित्य अंधिकांशतः पद्यमय ही है।

लौक साहित्य

राजस्थानी साहित्य में सामान्यजन द्वारा प्रचलित लोक शैली में रचे गये साहित्य की भी अपार संख्या विद्यमान है। यह साहित्य लोक गाथाओं, लोकनाट्यों कहावतों, पहेलियों एवं लोक गीतों के रूप में विद्यमान है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. राजस्थानी साहित्य (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 06 मई, 2014।

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