विजयी भव -अब्दुल कलाम  

विजयी भव -अब्दुल कलाम
विजयी भव का आवरण पृष्ठ
लेखक अब्दुल कलाम, अरुण तिवारी
मूल शीर्षक विजयी भव
प्रकाशक प्रभात प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 1 फरवरी, 2008
ISBN 81-7315-678-6
देश भारत
पृष्ठ: 174
भाषा हिंदी

विजयी भव भारत के ग्याहरवें राष्ट्रपति और 'मिसाइल मैन' के नाम से प्रसिद्ध 'ए.पी.जे. अब्दुल कलाम' की चर्चित पुस्तक है। हम भारतीयों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी ज़रूरी संसाधन पर्याप्त मात्रा में देश में उपलब्ध हैं। हमारे यहाँ बहुत सी नीतियाँ और संस्थाएँ हैं। चुनौती है तो बस शिक्षकों, विद्यार्थियों और तकनीक-विज्ञान को एक सूत्र में पिरोकर एक दिशा में चिंतन करने की। डॉ. कलाम देश के छात्र व युवा-शक्ति को भावानात्मक, नैतिक एवं बौद्धिक विकास की ओर प्रवृत्त होने का संदेश देते हैं। वैज्ञानिक और तकनीक खोजों को सही ढंग से मनुष्य के विकास में उपयोग करने के विचार को बल देते हैं। ‘विजयी भव’ डॉ. कलाम के भारत को महाशक्ति बनाने के स्वप्न को दिशा देनेवाली कृति है। इसमें शिक्षा व शिक्षण की पृष्ठभूमि, मानव जीवन-चक्र, परिवारों के सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध, कार्य की उपयोगिता, नेतृत्व के गुण, विज्ञान की प्रकृति, अध्यात्म तथा नैतिकता पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।

भूमिका

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जी. अब्दुल कलाम द्वारा रचित- ‘विजयी-भव’- के लिए प्राक्कथन लिखना ऐसा सौभाग्य है, जो केवल मुझे ही प्राप्त हुआ है। यह बहुत दुर्लभ अवसर है कि एक विद्वान, वैज्ञानिक, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति के विचारों पर कोई अपने विचार प्रस्तुत करे। काफ़ी हद तक यह चुनौती भी है। जितने गहन विचार इस पुस्तक में दिए गए हैं, उनके आगे मेरे शब्द बहुत हल्के और सामान्य ही दिखेंगे।

‘अनाज और मिट्टी का मिलन’, ‘स्वर्ग की शान्ति की ऊँचाई’, ‘ब्राउनियन गति और देश’ जैसे अध्याय यह बताते हैं कि उन्होंने कितने भिन्न-भिन्न प्रकार के विषयों पर प्रकाश डाला है। शिक्षा व शिक्षण की पृष्ठभूमि पर मानव जीवन-चक्र, परिवार के लोगों के बीच संबंध, कार्य की उपयोगिता, नेतृत्व के गुण, विज्ञान की प्रकृति, अध्यात्म तथा नैतिकता पर बात की गई है। इन विषयों पर विचार करते हुए वे न सिर्फ भारत के आधुनिक व पारंपरिक ज्ञान, बल्कि विश्व के अनेक लेखकों व विचारकों के बारे में अपनी रुचि का सुपरिचय देते हैं।

यह पुस्तक सोचने-विचारने के लिए बहुत सारे आयामों को खोलती है, अनेक व्यावहारिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है और कई महत्त्वपूर्ण सवाल पाठकों के सामने रखती है कि हर पाठक अपनी एक अलग बौद्धिक-यात्रा पर चल पड़ता है। पश्चिमी वातावरण में पढ़ाई-लिखाई करने के कारण इस पुस्तक को पढ़ना मेरे लिए एक चुनौती के साथ-साथ रोमांचकारी भी रहा। यह विश्लेषण से निष्कर्ष तथा व्यक्ति से समूह के बीच बहुत तेजी से पक्ष बदलती है। इससे शिक्षा के मार्गदर्शन के लिए ब्रह्मांड को ही चुन लिया गया है।

वैज्ञानिक और तकनीक खोजों को सही ढंग से मनुष्य के विकास में प्रयोग करने का विचार इस पुस्तक में आरम्भ से लेकर अन्त तक दिखाई देता है। लेखक का यह मानना है कि विज्ञान और तकनीक के लिए ऐसा अवसर पहले कभी नहीं आया, क्योंकि इस शताब्दी के मध्य तक विश्व की आबादी वर्तमान की तुलना में दो गुनी हो जाने की संभावना है। वे यह कहना चाहते हैं कि नई खोजों से इन लोगों के लिए भोजन, घर, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अच्छा जीवन-स्तर प्राप्त किया जा सकता है।

  • डॉ. कलाम लिखते हैं- मेरा ऐसा सपना है कि सन् 2020 के स्कूल इमारतें न होकर एक ऐसे केन्द्र होंगे, जिनमें विश्व भर का ज्ञान शिक्षक, विद्यार्थियों और समाज को आपस में बाँधेगा और सभी के लिए उपलब्ध होगा। किसी भी प्रकार की सीमाएँ इसमें बाधा नहीं बनेंगी। शिक्षक ज्ञान देने के बजाय विद्यार्थियों द्वारा स्वयं सीखने में मदद किया करेंगे। शिक्षक सूचना को ज्ञान में परवर्तित करने में और ज्ञान की समझ में परिवर्तित करने में विद्यार्थियों की मदद किया करेंगे.....। सन् 2020 में भारत को ज्ञान पर आधारित पीढ़ी चाहिए, न कि सूचना पर। और उस समय तक हर उम्र के लोग पढ़ा करेंगे, जिससे वे एक नए विश्व का सामना कर सकें।

वर्तमान में भारत की जो स्थिति है, उससे डॉ. कलाम के स्वप्न को कैसे साकार किया जा सकता है ? यूनेस्को व 'कॉमनवेल्थ ऑफ लर्निंग' में अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय शिक्षा के बारे में जानकर मैं प्रसन्न हुआ। मैंने पाया कि भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सभी ज़रूरी संसाधन इस देश में मौजूद हैं। वास्तव में लेखक भारतीयों को अपनी सफलताओं पर अधिक आत्मविश्वास रखने की वकालत कर रहे हैं। इस देश में बहुत सी नीतियाँ और संस्थाएँ हैं। चुनौती है तो यह है कि इन सबको ऐसी प्रक्रिया में शामिल करे कि जिसमें शिक्षक, विद्यार्थी तथा तकनीक को ऐसे मंच पर लाएँ, जो शिक्षा के लेने-देने के ऐसे आदर्श हों जैसे कि इस महत्त्वाकांक्षी पुस्तक में सुझाए गए हैं।

मैं एड्यूसेट उपग्रह प्रणाली के बारे में भी बात करना चाहूँगा, जिसके संस्थापकों में डॉ. कलाम भी थे। साथ ही, मैं उन व्यवस्थाओं को भी महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, जो भारत अपने विद्यालय व विश्वविद्यालय स्तर पर दूरस्थ शिक्षा के लिए कर रहा है। इस पुस्तक में वर्णित सीखने के समृद्ध वातावरण के सामने दूरस्थ शिक्षा का एक अव्यावहारिक और उपहासपूर्ण बात लगती है। लेकिन इस अव्यावहारिकता के पीछे है एक क्रांतिकारी वास्तविकता, जो उन कई सुधारों के लिए एक वाहक का कार्य कर सकती है, जो इस स्वप्न को पूरा करने के लिए चाहिए।

भारत ने खुले विश्वविद्यालय और स्कूल के रूप में संस्थाएँ, तकनीक और नीतियों का ढाँचा बना रखा है, जो उस परिवर्तन के लिए ज़रूरी है, जिसे डॉ. कलाम लाना चाहते हैं। अब यह दूरदर्शी और प्रेरणादायी लोगों पर निर्भर करता है कि वे इन सभी को सही प्रकार से उपयोग में लाएँ। यह पुस्तक उन सभी के स्वप्नों और प्रेरणाओं को पोषित करेगी।[1]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विजयी भव (हिंदी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 14 दिसम्बर, 2013।
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