शैवाल  

शैवाल प्राय: पर्णहरित युक्त, संवहन ऊतक रहित, आत्मपोषी तथा सेल्यूलोज भित्ति वाले पौधे होते हैं। इनका शरीर सूकाय के समान होता है, अर्थात् जड़, तना एवं पत्तियों में विभक्त नहीं होता है। शैवाल एक जलीय पौधा है, जो समुद्र में उगता है। कुछ शैवाल अन्य पौधों की जड़ों में भी रहते हैं, जैसे- साइकस की जड़ों में 'एनाबीना' तथा एन्थोसिरोस में 'नोस्टॉक' वास करते हैं। कुछ शैवाल कवकों के साथ मिलकर सहवास करते हैं, जिन्हें लाइकेन कहा जाता है। शैवालों के अध्ययन को 'फ़ाइकोलॉजी' कहते हैं। शैवालों का प्रयोग आज लगभग हर क्षेत्र में होने लगा है। इनका प्रयोग भोजन के रूप में, औषधि निर्माण में, विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक कार्यों आदि में किया जाता है। जहाँ कुछ शैवाल मानव के लिये लाभदायक हैं, वहीं कुछ शैवाल मानव तथा दूसरे जीवों के लिए हानिकारक भी होते हैं।

विभाजन

शैवालों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. रोडोफाइटा या लाल शैवाल - यह एक समुद्री शैवाल है। ये अपनी भित्ति पर कैल्शियम का स्राव तथा संचय करते हैं। इसका लाल रंग फाइकोएस्थिरिन तथा फाइकोसायरिन (फाइकोवायलिन) वर्णकों के कारण होता है।
  2. फियोफाइटा या भूरा शैवाल - ये शैवाल अधिकांशत: समुद्र में पाए जाते हैं। भूरे शैवाल में फ्यूकोजैनथिन तथा क्लोरोफिल नामक वर्णक उपस्थित होते हैं। इस प्रकार के शैवाल से आयोडीन प्राप्त किया जाता है।
  3. क्लोरोफाइटा या हरा शैवाल - हरे शैवाल विभिन्न माप तथा आकार के होते हैं। कुछ हरे शैवाल एककोशिकीय तथा सूक्ष्मदर्शी होते हैं। हरे शैवाल में क्लोरोफिल ‘ए’ तथा क्लोरोफिल ‘बी’ और कुछ वैरोटिनाइड पाया जाता है।

आवास

शैवाल ताज़े जल, समुद्री जल, गर्म जल के झरनों, कीचड़ में तथा नदी, तालाबों आदि में वास करते हैं। कुछ जलीय शैवाल, जैसे- ओडोगोनियम, स्पाइरोगाइरा, कारा आदि हैं। बर्फ़ पर पाये जाने वाले शैवाल को 'क्रिप्टोफाइट्स' कहते हैं। कुछ शैवालों में गति करने के लिए 'फ्लेजेल' पाए जाते हैं।

प्रजनन

शैवालों में तीन तरह की प्रजनन क्रिया होती है-

  1. कायिक प्रजनन - खण्डन द्वारा, हार्मोगोन द्वारा, प्रोटोनीमा द्वारा, एकाइनीट द्वारा कायिक प्रजनन होता है।
  2. अलैंगिक प्रजनन - चलबीजाणु द्वारा, अचलबीजाणु द्वारा, हिप्नोस्पोर द्वारा अलैंगिक प्रजनन होता है।
  3. लैंगिक प्रजनन - लैंगिक प्रजनन निम्न प्रकार का होता है-
(i) समयुग्मक
(ii) विषमयुग्मक

आर्थिक महत्व

शैवाल निम्नलिखित कारणों से मनुष्यों के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं-

भोजन के रूप में

भोजन के रूप में शैवाल निम्नलिखित रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-

  • शैवालों में कार्बोहाइड्रेट, अकार्बनिक पदार्थ तथा विटामिन A.C.D.E. आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते है।
  • पोरफाइरा को जापान में मुख्य रूप से खाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • अल्वा को प्राय: समुद्री सलाद भी कहा जाता है।
  • रोडोमेरिया पल्मेटा स्कॉटलैण्ड में तम्बाकू की भाँति प्रयोग किया जाता है।
  • नोस्टोक चीन में खाया जाने वाला प्रमुख शैवाल है।
  • अम्बलीकस भारत तथा अन्य निकटवर्ती देशों में खाया जाता है।

विभिन्न व्यवसायों में प्रयोग

विभिन्न उद्योगों और व्यवसायों के लिए शैवाल का महत्व निम्नलिखित कारणों से है-

  • ‘एलीजन’ नामक पदार्थ शैवालों से प्राप्त किया जाता है, जो वाल्केनाइजेशन, टाइपराइटरों के रोलरों तथा अज्वलनशील फ़िल्मों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण है।
  • सारगासम नामक शैवाल से जापान में कृत्रिम ऊन का निर्माण किया जाता है।
  • कैराड्रस नामक शैवाल से ‘शृलेष्मिक केरोगेनिन’ नामक पदार्थ तैयार किया जाता है, जो प्रसाधनों (Cosmetic) शैम्पू, जूतों की पॉलिश आदि बनाने में काम में आता है।
  • लेमीनेरिया, फ्यूकस आदि शैवालों का प्रयोग आयोडीन, ब्रोमीन अम्ल, ऐसीटोन आदि बनाने में किया जाता है।
  • ‘अगर-अगर’ (Agar-Agar) नामक पदार्थ लाल शैवालों से प्राप्त किया जाता है, जो प्रयोगशालाओं में पौधों के संवर्धन, तना जैल, आइसक्रीम आदि में प्रयुक्त होता है। यह पदार्थ तापरोधक, ध्वनिरोधक, कृत्रिम रेशे, चमड़ा, सूप, चटनी आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। यह पदार्थ ग्रैसीलेरिया तथा जेलेडियम नामक शैवालों से प्राप्त किया जाता है।

कृषि के लिए उपयोगी

कृषि के क्षेत्र में शैवाल निम्नलिखित रूप से उपयोगी होते हैं-

  • नॉस्टोक, एनाबीना आदि शैवाल वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। इस प्रक्रिया में जीवाणु भी भाग लेते हैं।
  • कुछ शैवालों का प्रयोग खाद के रूप में भी किया जाता है।
  • नीली हरी शैवाल ((Blue Green Algae)) का उपयोग ऊसर भूमि को उपजाऊ भूमि बनाने में किया जाता है। जैसे- नॉस्टॉक।

औषधि के रूप में प्रयोग

औषधि निर्माण के क्षेत्र में भी शैवाल अत्यन्त उपयोगी हैं। इनका प्रयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

  • ‘क्लोरेलीन’ नामक प्रतिजैविक क्लोरेला नामक शैवाल से तैयार की जाती है। यह क्रिस्टलीय होता है। यह ग्राम-पाजिटिव तथा ग्राम निगेटिव (gram-positive & gram-negative) दोनों प्रकार के जीवाणुओं से रक्षा करती है।
  • कारा तथा नाइटेला शैवाल मलेरिया उन्मूलन में सहायक हैं।

हानिकारक शैवाल

  1. कुछ शैवाल जलाशयों में प्रदूषण बढ़ाते हैं, जिससे पानी प्रयोग के योग्य नहीं रह जाता है। ये शैवाल ज़हर पैदा करते हैं, जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और नदियों आदि का प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। इस तरह की शैवालों में माइक्रोसिस्टिस, क्रोकोकस तथा ओस्सिल्लेरिया आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
  2. सिफेल्यूरोस नामक शैवाल की जातियाँ चाय पर ‘लाल किट्ट रोग’ (Red rust of Tea) उत्पन्न करती हैं, जिससे चाय उद्योग को भारी हानि पहुँचती है।
  3. बरसात के दिनों में ज़मीन हरे रंग की दिखने लगती है और फिसलनदार हो जाती है। इस ज़मीन में हरित-नीले शैवाल उग आते हैं, जिसके कारण ऐसा होता है।

कुछ अन्य विशेषताएँ

  1. ट्राइकोडेस्मियम इरीथीयम नामक हरी-नीली शैवाल लाल सागर में जल के ऊपर तैरती है और यह सागर को लाल रंग प्रदान करती है। इसी कारण से सागर को लाल सागर (Red sea) कहते है।
  2. एसिटाबुलेरिया सबसे छोटा एककोशिकीय शैवाल है, जिसकी लम्बाई 6 से 10 सेमी. होती है।
  3. मैक्रोसिस्टिस सबसे बड़ा शैवाल है। इसकी लम्बाई लगभग 50 मीटर होती है। इसी कारण से इसे ‘दैत्याकार समुद्री घास’ कहा जाता है।
  4. नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले शैवाल सामान्य रूप से धान के खेतों में पाये जाते हैं।
  5. सबसे छोटा क्रोमोसोम (गुणसूत्र) शैवाल का होता है।
  6. चट्टानों पर उगने वाले शैवालों को ‘लीथोफाइट्स’ कहते हैं।

शैवालीकरण

जैव उर्वरक के रूप में व्यापक स्तर पर 'नीली हरी शैवाल' (Blue Green Algae) के संवर्द्धन की प्रक्रिया शैवालीकरण कहलाती है। इस शब्द का पहली बार प्रयोग भारत में 1961 में चन्‍द्रशेखर वेंकटरमण के द्वारा किया गया था। इस तकनीक का विकास करने का श्रेय जापान को प्राप्त है। 1960 में भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा शैवालीकरण हेतु उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु तथा नई दिल्ली में एक विशेष कार्यक्रम क्रियान्वित किया गया। शैवालों का प्रयोग जैव उर्वरकों के रूप में किया जाता है। इनके प्रयोग से धान की ऊपज में 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की वृद्धि देखी गई है।

अंतरिक्ष यात्रा में उपयोगी

अंतरिक्ष यान में लम्बी उड़ान के समय केबिन में ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए, जिससे यात्री को ऑक्सीजन व भोजन प्राप्त हो सकें तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) तथा अन्य बेकार पदार्थ बाहर निकल सकें। क्लोरेला नामक शैवाल को केबिन के हौज़ में उगाकर अंतरिक्ष यात्री को प्रोटीनयुक्त भोजन, जल और ऑक्सीजन सभी प्राप्त हो सकते हैं। ये शैवाल शीघ्रता से प्रजनन करते हैं तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड का प्रयोग करके भोजन बनाते हैं। CO2 लेने के उपरान्त शुद्ध ऑक्सीजन छोड़ते हैं। प्रोटीन संश्लेषण के लिए नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में ये शैवाल मूत्र तथा मल से उत्पन्न पदार्थों का उपयोग कर लेते हैं।


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