होमियोपैथी  

होमियोपैथी (अंग्रेज़ी: Homeopathy) 19वीं शताब्दी में विशेष रूप से लोकप्रिय चिकित्सा विज्ञान की एक पद्धति है। सिमिलिया सिमिलिबस क्यूरेंटर के घोषित सिद्धांत, 'जैसे को तैसा ठीक करता है' पर आधारित यह पद्धति मरीज़ों के लिए उन दवाओं अथवा अन्य इलाजों की अनुशंसा करती है, जो स्वस्थ मनुष्यों में उन्हीं बीमारियों के लक्षण पैदा करते हैं, जिनका उपचार किया जा रहा है।

शुरुआत

'समानता के सिद्धांत' पर आधारित चिकित्सा विज्ञान की इस प्रद्धति की शुरुआत जर्मन चिकित्सक सैम्युअल हैनिमैन ने 1796 में की थी। उन्होंने दावा किया कि मलेरिया के उपचार के लिए प्रयुक्त कुनैन की एक बड़ी मात्रा ने उनमें मलेरिया के रोगियों के समान लक्षण पैदा किए। अत: उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सभी व्याधियां उन्हीं दवाओं से सबसे अच्छी तरह उपचारिक होती हैं, जो स्वस्थ मनुष्यों में इन व्याधियों के लक्षण पैदा करें। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने कई प्रकार की दवाओं के प्रयोग भी आरंभ किए। हैनिमैन मानते थे कि दवा की उच्च मात्रा बीमारी को बढ़ाती है। इसलिए औषधियों की प्रभावशीलता तनुकरण के साथ बढ़ती है। इसी के अनुसार अधिकांश होमियोपैथिक चिकित्सक औषधि की कम मात्राओं के प्रभाव पर विश्वास करते हैं। कई रोगियों और कुछ चिकित्सकों के लिए होमियोपैथी रक्तस्त्राव, शोधन, बहुऔषध विज्ञान और उस समय की अन्य कठोर चिकित्सा प्रणलियों का एक सुखद विकल्प थी। हालांकि 20वीं शताब्दी में कुछ लोग होमियोपैथी को अधिक महत्त्व नहीं देते थे और उसमें व्याधि के कारणों की अपेक्षा उसके लक्षणों पर ध्यान केंद्रित करने के कारण आलोचना करते थे। इसके बावजूद अब भी बहुत से लोग होमिथोपैथी को मानते हैं और इसकी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समितियां हैं, जिनमें इंटरनेशनल होमियोपैथिक मेडिकल लीग, जिसका मुख्यालय ब्लोमेंडाल, नीदरलैंड में है, भी शामिल है।

भारत में होमियोपैथी

कहा जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में होमियोपैथी एक जर्मन यात्री के साथ 1801 में उस समय पहुंची, जब हैनिमैन ने ओर्गेनोन डर रेशनेलेन डीलकुंडे का अपना पहला संस्करण प्रकाशित किया ही था। वास्तव में प्राचीन हिंदू चिकित्सक तथाकथित समानता के सिद्धांत को उपचार के सिद्धांतों में से एक मानते थे। भागवत पुराण में एक संस्कृत श्लोक में पूछा गया है 'क्या यह सत्य नहीं है कि जब किसी सजीव प्राणी द्वारा ग्रहण किया गया कोई पदार्थ किसी व्याधि का कारण बनता है, तो वही पदार्थ किसी विशेष प्रकार से अनुशंसित किए जाने पर उसी प्रकार की व्याधि को दूर करता है।?'

इतिहास

होमियोपैथी चिकित्सा के आरंभ का अधिक स्पष्ट प्रमाण 1839 का है, जब पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की स्वर-नलिका के लकवे व शोफ (ईडीमा) का इलाज लाहौर यात्रा पर आए एक यात्री डॉ. मार्टिन होनिबर्गर ने किया, जिन्हें महाराजा की चिकित्सा करने को कहा गया था। स्थानीय चिकित्सक उन्हें राहत दिलाने में विफल रहे थे, लेकिन होनिगर्बर महाराजा को डल्कमारा (एक होमियोपैथी औषधि) की कुछ छोटी खुराकों के माध्यम से ठीक करने में सफल रहे। होनिबर्गर ट्रांसिल्वानिया के रहने वाले थे। उन्होंने संभवत: डॉ. एस. हैनिमैन के संपर्क में आकर होमियोपैथी के आधार तत्त्वों को ग्रहण किया था। उन्हें औषधीय पौधों का भी अच्छा ज्ञान था, जो उनकी पुस्तक थर्टी फ़ाइव इयर्स इन द ईस्ट से स्पष्ट है। वह लगभग 1835 में लाहौर आए और वहां लगभग 15 वर्षों तक रहे। महाराजा का सफल उपचार करने के कारण उन्हें राजवैद्य नियुक्त किया गया। उन्होंने कश्मीर की यात्रा कर उस क्षेत्र के औषधीय पौधों की विशेषताओं और गुणों का अध्ययन भी किया था। राजवैद्य के रूप में रहते हुए होनिबर्गर ने उन पद्धतियों और प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया, जिनसे आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सक रोगियों का उपचार करते थे। उन्होंने उनकी गतिविधियों और वह कैसे महाराजा द्वारा होनिबर्गर पर किए गए अनुग्रह से जलाने लगे, इसक रोचक विवरण दिया है। होनिबर्गर को बारूद कारख़ाने और बंदूक़ निर्माण कारख़ाने का अधीक्षक नियुक्त कर दिया गया। उन्हें नगर में बने चिकित्सालय (दारुल-शफ़ा) का प्रभार नहीं दिया गया, जिसका प्रबंधन दो धनी फ़क़ीरों द्वारा किया जाता था। बाद में जब अंग्रेज़ भारत आए, उन्होंने नगर के बाहर एक चिकित्सालय बनाने का आदेश दिया और इस संस्थान का प्रबंध होनिबर्गर को सौंपा। उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा, 'उनका प्रतीक्षा कक्ष रोगियों से हमेशा भरा रहता था, जो न केवल औषधियों की मोहक बाह्याकृति दवाओं के मीठे स्वाद और सुंदर लकड़ी के डिब्बों, जिनमें वे दी जाती थीं, से आकर्षित होते थे; बल्कि उस प्रभावशीलता के कारण भी, जो उन्होंने इन मिठाइयों में पाई।' बाद में दरबार ने उन्हें लाहौर कारागृह में भी एक चिकित्सालय स्थापित करने का आदेश दिया, जो उसी स्थान पर था, जहां कुछ समय पूर्व उन्होंने बारूद का कारख़ाना बनाया था, उन्होंने यह भी लिखा कि अंतिम दो वर्षो में उन्होंने 800 रोगियों का उपचार किया और 12 माह में केवल 21 रोगियों की मृत्यु हुई, जिनकी मृत्यु हुई, उन्हें गंभीर घाव, सूखा रोग या पेचिश थी। होनिबर्गर ने 1849 में पंजाब छोड़ दिया और कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) चले गए।

होमियोपैथी उपचार

बंगाल, विशेषकर कलकत्ता में कुछ चिकित्सकों ने होमियोपैथी उपचार आरंभ कर दिया था। डॉ. टोनर उनमें से एक थे। दक्षिण में जर्मन धर्म प्रचारक लीनर, ग्रीनर और हेविच 1834 में होमियोपैथी औषधियों का प्रयोग निर्धनों के लिए कर रहे थे। उनके बाद फ़ारद म्यूलर आए, जिन्होंने मैंगलोर में चिकित्सा कार्य आरंभ किया। उस समय फ़ादर म्यूलर द्वारा रोपित छोटे बीज अब बड़े होकर एक उच्च ख्याति प्राप्त होमियोपैथी महाविद्यालय का भाग बन गर हैं। उन्होंने होमियोपैथिक औषधियों के निर्माण की एक छोटी इकाई भी शुरू की थी। यह इकाई भी अब बहुत बड़ी हो गई है। कलकत्ता में एक विद्वान, लेकिन अविशेषज्ञ, बाबू राजेंद्र लाल दत्त ने होमियोपैथी औषधियों के प्रभाव का अध्ययन किया और गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए बहुत प्रसिद्ध हुए। 1863 में ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन की बंगाल शाखा के शुभारंभ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में एलोपैथिक चिकित्सा के स्तातक डॉ. एम.एल. सरकार ने होमियोपैथी की तीव्र निंदा करते हुए एक भाषण दिया। उन्हें संगठन का पहला सचिव और तीन वर्ष बाद उसका उपाध्यक्ष चुन लिया गया।

डॉ. सरकार

यह वह भाषण था, जिसमें की गई होमियोपैथी की तीव्र निंदा ने राजेंद्र बाबू का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने डॉ. सरकार को होमियोपैथी की वैज्ञानिक प्रकृति का विश्वास दिखाने का निश्चय किया, क्योंकि इसके प्रभाव के बारे में आश्वस्त करने पर ऐसा व्यक्ति इसे विज्ञान का प्रबल समर्थक हो सकता था। डॉ. सरकार राजेंद्र बाबू के पड़ासी थे और उन्होंने राजेंद्र बाबू द्वारा बड़ी संख्या में रोगियों का इलाज होते और उन्हें ठीक होते देखा था। उन्होंने कुछ असाध्य कहलाने वाली व्याधियों का भी राजेंद्र बाबू द्वारा सफल उपचार होता देखा था। डॉ. सरकार विज्ञान के भूलभूत सिद्धांतों के प्रति समर्पित एक शुद्ध अंत:करण वाले व्यक्ति थे। एक बार राजेंद्र बाबू के उपचार की ओर आकृष्ट होने की बाद उन्होंने होमियोपैथी औषधीयों के दर्शन व उनके प्रभाव का संपूर्ण अध्ययन किया और इस पद्धति से इलाज शुरू कर दिया। वह होमियोपैथी की ओर उन्मुख हो गए और 1867 में इसके बारे में एक स्पष्ट व खुला बयान दिया। उनके परिवर्तन की ख़बर सुनकर कलकत्ता का समूचा एलोपैथी समुदाय हैरत में पड़ गया। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के चिकित्सा के दूसरे स्नातकोत्तर विद्यार्थी थे और चिकित्साशास्त्र के प्रतिभावान छात्र रहे थे। उन्हें मेडिकल एसोसिएशन से निकाल दिया गया और विश्वविद्यालय से त्यागपत्र देने पर विवश किया गया। कहा जाता है कि आगे चलकर वह होमियोपैथी के सबसे महान् व्यक्तित्वों व पथ-प्रदर्शकों में से एक बने। उन्होंने राजेंद्र दत्त के कार्य को आगे बढ़ाया और होमियोपैथी औषधियों के वैज्ञानिक चिकित्सा कार्य को स्थापित किया। डॉ. सरकार आगे चलकर 19वीं शताब्दी में भारत के सर्वाधिक जाने-माने होमियोपैथी चिकित्सकों में से एक बनें।

विकास केंद्र

कलकत्ता, भारत में होमियोपैथी का विकास केंद्र बना। यहां के डॉ. पी.सी. मजूमदार ने अमेरिका के एक होमियोपैथी चिकित्सा महाविद्यालय से होमियोपैथी चिकित्सा में अर्हता प्राप्त की। बाद में उन्होंने भारत में पहले होमियोपैथीक मेडिलक इंस्टिट्यूशन की स्थापना की और 1881 में प्रसिद्ध कलकत्ता होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की, जिसने सारे देश के विद्यार्थियों में होमियोपैथी के ज्ञान के प्रसार में सहायता की। होमियोपैथी औषधियों की आपूर्ति के क्षेत्र में एक रसायनविज्ञानी व औषधि निर्माण डॉ. महेश चंद्र भट्टाचार्य ने वैज्ञानिक आधार पार अच्छी गुणवत्ता वाली होमियोपैथी औषधियों का निर्माण प्रारंभ किया। उन्होंने पहला होमियोपैथी औषध-संग्रह अंग्रेज़ी और बांग्ला, दोनों में प्रकाशित किया। दुर्भाग्य से कई होमियोपैथी चिकित्सक अर्हता प्राप्त नहीं थी और आरंभिक पथ-प्रदर्शकों में से अधिकांश एलोपैथी चिकित्सक थे, जो होमियोपैथी औषधियों के साथ प्रयोग करने के बाद होमियोपैथी की ओर उन्मुख हुए थे।

होमियोपैथी की शिक्षा

बंगाल में ही होमियोपैथी चिकित्सा के लिए शिक्षा का स्तर निर्धारित करने की नींव रखी गई और 1943 में जनरल काउंसिल ऐंड स्टेट फ़ैकल्टी ऑफ़ होमियोपैथीक मेडिसिन का गठन किया गया। डॉ. एस.डब्ल्यू. यूनान, डॉ. जे.एन. मजूदार, डॉ. जे.एम. घोष, डॉ. एस.के. नाग और डॉ. एन.एम. चौधरी जैसे प्रमुख नाम इससे जुड़े थे। भारत के विभाजन से पहले कुछ प्रारंभिक पुरोगामी होमियोपैथी चिकित्सक कलकत्ता होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज से उत्तीर्ण हुए और उन्हें जनरल काउंसिल ऐंड स्टेट फ़ैकल्टी द्वारा डिग्री/डिप्लोमा दिए गए। विभाजन के बाद इनमें से कुछ चिकित्सकों ने अपना चिकित्सा कार्य पाकिस्तान और बांग्लादेश में जमाया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • भारत ज्ञानकोश खंड-6 | पृष्ठ संख्या- 260

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