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		<title>श्रीमाल</title>
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&lt;div&gt;'''श्रीमाल''' का एक अन्य नाम [[भिन्नमाल]] प्रचलित है। [[माउंट आबू|आबू]] पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 12वीं-13वीं शती में रचित प्रभावकचरित नामक [[ग्रंथ]] में [[प्रभाचंद्र]] ने श्रीमाल को गुर्जर देश का प्रमुख नगर कहा है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Point}} विस्तार से पढने के लिए देखें [[भिन्नमाल]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:जोधपुर]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>श्रीप्रस्थ</title>
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		<title>साँचा:आंध्र प्रदेश के नगर</title>
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>नागार्जुनकोंडा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''नागार्जुनकोंडा''' [[आंध्र प्रदेश]] राज्य के [[नलगोंडा ज़िला|नलगोंडा ज़िले]] में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है।&lt;br /&gt;
*[[हैदराबाद]] से 100 मील दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित नागार्जुनकोंडा एक प्राचीन स्थान है। &lt;br /&gt;
*यह [[बौद्ध]] महायान के प्रसिद्ध [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|आचार्य नागार्जुन]] (द्वितीय शताब्दी) ई. के नाम पर प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*प्रथम शताब्दी में यहाँ [[सातवाहन साम्राज्य|सातवाहन]] नरेशों का राज्य था।&lt;br /&gt;
*'हाल' नामक सातवाहन राजा ने [[नागार्जुन]] के लिए श्री पर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। &lt;br /&gt;
*यह स्थान [[बौद्ध धर्म]] की महायान शाखा का भी काफ़ी समय तक प्रचार केन्द्र रहा। &lt;br /&gt;
*[[सातवाहन|सातवाहनों]] के पश्चात इक्ष्वाकु नरेशों ने यहाँ राज्य किया। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु राजाओं के समय एक सुन्दर नगर था। &lt;br /&gt;
*[[कृष्णा नदी]] के [[तट]] पर स्थित तथा चतुर्दिक पर्वत मालाओं से परिवृत्त यह नगर प्राकृतिक सौन्दर्य से समंवित होने के साथ ही दुर्भेद्य दुर्ग की भाँति सुरक्षित भी था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से नौ बौद्ध [[स्तूप|स्तूपों]] के अवशेष लगभग 50 वर्ष पूर्व उत्खनित किये गये थे।&lt;br /&gt;
*ये इस नगर के प्राचीन गौरव एवं ऐश्वर्य के साक्षी हैं। &lt;br /&gt;
*[[उत्खनन]] में प्राप्त यहाँ के अवशेषों में एक स्तूप, दो चैत्य और एक विहार हैं। &lt;br /&gt;
*[[स्तूप]] के निकट [[बुद्ध]] के जीवन के दृश्यों को व्यक्त करने वाले चूने के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। &lt;br /&gt;
*[[हिन्दू धर्म]] के पुनरुत्थान से नागार्गुनकोंडा का महत्त्व घटने लगा।&lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा से प्राप्त [[अभिलेख|अभिलेखों]] से यह ज्ञात होता है, कि पहली शताब्दी ई. में  [[भारत]] का [[चीन]], यूनानी जगत तथा [[लंका]] से सम्बन्ध स्थापित था। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा के एक अभिलेख से स्थविरों के संघों का ज्ञान होता है, जिन्होंने [[कश्मीर]], [[गांधार]], चीन, किरात, तोसलि, [[यवन]], ताम्रपर्णी द्वीपों में बौद्ध धर्म फैलाया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>साँचा:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान</title>
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		<updated>2012-02-09T06:47:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>श्रीपर्वत</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4&amp;diff=252342"/>
		<updated>2012-02-09T06:46:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: नागार्जुनकोंडा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[नागार्जुनकोंडा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>नागार्जुनीकोंडा</title>
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		<updated>2012-02-09T06:46:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: नागार्जुनकोंडा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>श्रीनिवास</title>
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		<updated>2012-02-09T06:42:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: नेवासा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[नेवासा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>श्रमणबेलगोला</title>
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		<updated>2012-02-09T06:25:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: श्रवणबेलगोला मैसूर को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[श्रवणबेलगोला मैसूर]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Ramtek&amp;diff=252323</id>
		<title>Ramtek</title>
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		<updated>2012-02-09T06:20:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: रामटेक को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[रामटेक]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>शैवालगिरि</title>
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		<updated>2012-02-09T06:20:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: रामटेक को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[रामटेक]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
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		<title>रामटेक</title>
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		<updated>2012-02-09T06:20:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''रामटेक''' [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[नागपुर ज़िला|नागपुर ज़िले]] में स्थित एक [[तीर्थ]] स्थान है।&lt;br /&gt;
*वनवास के समय [[राम]] के टिकने का स्थान या पड़ाव को रामटेक कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*[[नागपुर]] से रामटेक स्टेशन 26 मील की दूरी पर है। रामटेक से बस्ती एक मील की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
*रामटेक के पास रामगिरि नामक पर्वत है। [[पर्वत]] के ऊपर श्रीराम मन्दिर है। श्रीराम मन्दिर के सामने [[वराह अवतार|वराह]] भगवान की मूर्ति है। &lt;br /&gt;
*रामटेक से दो मील दूर रामसागर तथा अम्बासागर नामक दो पवित्र सरोवर हैं। इनके किनारे कई मन्दिर हैं। &lt;br /&gt;
*रामटेक में जैन मन्दिर भी है। कुछ विद्वानों का मत है कि [[कालिदास]] के मेघदूत का रामगिरि यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0&amp;diff=252320</id>
		<title>साँचा:महाराष्ट्र के नगर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0&amp;diff=252320"/>
		<updated>2012-02-09T06:19:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=महाराष्ट्र के नगर&lt;br /&gt;
|title =[[:श्रेणी:महाराष्ट्र के नगर|महाराष्ट्र के नगर]]&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:नगर के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF&amp;diff=252312</id>
		<title>श्रृंगगिरि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF&amp;diff=252312"/>
		<updated>2012-02-09T06:11:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: श्रृंगेरी को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[श्रृंगेरी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>सोपारा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=252305"/>
		<updated>2012-02-09T06:08:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: :श्रेणी:भरत के नगर; Adding category :Category:भारत के नगर (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सोपारा''' [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[ठाणे ज़िला|ठाणे ज़िले]]में स्थित एक प्राचीन स्थान है। आजकल सोपारा दादर स्टेशन से वेस्टर्न सबर्बन रेलमार्ग पर लगभग 48 किलोमीटर दूर अंतिम पड़ाव 'विरार' से पहले पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोपारा गाँव में [[अशोक|सम्राट अशोक]] द्वारा ईसा पूर्व तीसरी [[सदी]] में निर्मित [[स्तूप]] भी है। यह स्तूप [[भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग|भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण]] द्वारा संरक्षित है। 'नाल' और 'सोपारा' दो अलग अलग गाँव थे। रेलवे लाइन के पूर्व की ओर 'नाल' है तो पश्चिम में 'सोपारा' गावँ है। वर्तमान में यह एक बड़ा शहर हो गया है। पुराने सोपारा गाँव के क़रीब चारों तरफ हरियाली और बहुत सारे पेड़ हैं। सापोरा स्तूप में [[बुद्ध]]  और साथ ही किसी [[बौद्ध]] भिक्षु की मूर्ति भी थी। यहाँ से निकली मूर्तियाँ, शिलालेख आदि [[औरंगाबाद]] के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं। क्षेत्र में [[वर्ष|वर्षों]] पूर्व  किये गए उत्खनन से पता चलता है कि सोपारा में [[बौद्ध]], [[जैन]] और [[हिन्दू धर्म]] स्थलों की बहुलता थी जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से अब लुप्त हो चली है। स्वर्गीय डा. भगवानलाल इन्द्र जी ने सन 1898 में [[मुंबई]] के [[एशियाटिक सोसाइटी|रॉयल एशियाटिक सोसाइटी]] को सोपारा में बौद्ध स्तूप के अतिरिक्त कई हिन्दू मंदिरों के खंडहरों की जानकारी दी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]][[Category:महाराष्ट्र]][[Category:महाराष्ट्र के नगर]][[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Sopara&amp;diff=252304</id>
		<title>Sopara</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Sopara&amp;diff=252304"/>
		<updated>2012-02-09T06:08:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: सोपारा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[सोपारा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=252300</id>
		<title>साँचा:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=252300"/>
		<updated>2012-02-09T06:07:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान&lt;br /&gt;
|title =[[:Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान|महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
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		<title>साँचा:महाराष्ट्र के नगर</title>
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>सोपारा</title>
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		<updated>2012-02-09T06:07:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सोपारा''' [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[ठाणे ज़िला|ठाणे ज़िले]]में स्थित एक प्राचीन स्थान है। आजकल सोपारा दादर स्टेशन से वेस्टर्न सबर्बन रेलमार्ग पर लगभग 48 किलोमीटर दूर अंतिम पड़ाव 'विरार' से पहले पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोपारा गाँव में [[अशोक|सम्राट अशोक]] द्वारा ईसा पूर्व तीसरी [[सदी]] में निर्मित [[स्तूप]] भी है। यह स्तूप [[भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग|भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण]] द्वारा संरक्षित है। 'नाल' और 'सोपारा' दो अलग अलग गाँव थे। रेलवे लाइन के पूर्व की ओर 'नाल' है तो पश्चिम में 'सोपारा' गावँ है। वर्तमान में यह एक बड़ा शहर हो गया है। पुराने सोपारा गाँव के क़रीब चारों तरफ हरियाली और बहुत सारे पेड़ हैं। सापोरा स्तूप में [[बुद्ध]]  और साथ ही किसी [[बौद्ध]] भिक्षु की मूर्ति भी थी। यहाँ से निकली मूर्तियाँ, शिलालेख आदि [[औरंगाबाद]] के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं। क्षेत्र में [[वर्ष|वर्षों]] पूर्व  किये गए उत्खनन से पता चलता है कि सोपारा में [[बौद्ध]], [[जैन]] और [[हिन्दू धर्म]] स्थलों की बहुलता थी जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से अब लुप्त हो चली है। स्वर्गीय डा. भगवानलाल इन्द्र जी ने सन 1898 में [[मुंबई]] के [[एशियाटिक सोसाइटी|रॉयल एशियाटिक सोसाइटी]] को सोपारा में बौद्ध स्तूप के अतिरिक्त कई हिन्दू मंदिरों के खंडहरों की जानकारी दी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक_स्थान_कोश]][[Category:महाराष्ट्र]][[Category:महाराष्ट्र के नगर]][[Category:महाराष्ट्र के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भरत के नगर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95&amp;diff=252291</id>
		<title>शूपरिक</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95&amp;diff=252291"/>
		<updated>2012-02-09T06:00:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: सोपारा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[सोपारा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>शिवनेरी</title>
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		<updated>2012-02-09T05:39:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Shivneri-Fort-Junnar.jpg|thumb|शिवनेरी दुर्ग,[[जुन्नर]]]]&lt;br /&gt;
'''शिवनेरी''' [[भारत]] के [[महाराष्ट्र]] राज्य के जुन्नर गाँव के पास स्थित एक प्राचीन क़िला है। &lt;br /&gt;
*1627 ई. में [[जुन्नर]] के इस गिरिदुर्ग में जो पहले [[अहमद नगर]] राज्य के अधीन था, महाराष्ट्र-केसरी छत्रपति [[शिवाजी]] का जन्म हुआ था। &lt;br /&gt;
*शिवाजी के पितामह मालोजी को अहमद नगर के सुल्तान ने शिवनेर तथा चाकण के दुर्ग जागीर में दिए थे। &lt;br /&gt;
*इस स्थान पर बालक शिवाजी अधिक समय तक नहीं रह सके थे और उनका पालन-पोषण [[पूना]] के निकट अपने पिता की जागीर में हुआ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Shivneri-Fort.jpg|शिवनेरी दुर्ग&lt;br /&gt;
चित्र:Shivneri-Fort-1.jpg|शिवनेरी दुर्ग&lt;br /&gt;
चित्र:Shivneri-Fort-2.jpg|शिवनेरी दुर्ग&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]][[Category:महाराष्ट्र_के_ऐतिहासिक_स्थान]][[Category:पर्यटन_कोश]][[Category:महाराष्ट्र_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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	<entry>
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		<updated>2012-02-09T05:24:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: सालसेट द्वीप को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[सालसेट द्वीप]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>सालसट द्वीप</title>
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		<updated>2012-02-09T05:24:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: सालसेट द्वीप को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[सालसेट द्वीप]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>शाल्मल द्वीप</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B2_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AA&amp;diff=252272"/>
		<updated>2012-02-09T05:19:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''शाल्मल द्वीप''' पौराणिक भूगोल की संकल्पना के अनुसार [[पृथ्वी]] के सप्तद्वीपों में से एक है।&lt;br /&gt;
*[[विष्णु पुराण]] के अनुसार -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;'जम्बूप्लक्षाहृदयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज, &lt;br /&gt;
कुश: क्रौंचस्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:। &amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] 2,2,5&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
*शाल्मल [[द्वीप]] के सात [[वर्ष]] - श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ माने गये हैं। &lt;br /&gt;
*इक्षुरस का समुद्र इसको परिवृत करता है। -  &lt;br /&gt;
:शाल्मलेन समुद्रौऽसौ द्वीपनेक्षुरसोदक:'&amp;lt;ref&amp;gt; [[विष्णु पुराण]] 2,4,24।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इसके सात पर्वत हैं - कुमुद, उन्नत, बलाहक, द्रोणाचल, कंक, महिष, कुकुद्मान। &lt;br /&gt;
*इस की सात ही नदियाँ, जिनके नाम हैं- योनि, तोया, वितृष्णा, चंद्रा, मुक्ता, विमोचनी और निवृति। &lt;br /&gt;
*इसमें कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण वर्ण के लोग रहते हैं। - &lt;br /&gt;
:'कपिलाश्चारुणा: पीता: कृष्णाश्चैव पृथक पृथक' &amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] 2,4,30।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शाल्मलि के एक महान वृक्ष के यहाँ स्थित होने के कारण इस महाद्वीप को शाल्मल कहा जाता है -&lt;br /&gt;
:'शाल्मलि: सुमहान वृक्षो नाम्ना निवृतिकारक:' &amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] 2,4,33।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*शाल्मल को [[महाभारत]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[भीष्मपर्व महाभारत|भीष्मपर्व]] 11,3&amp;lt;/ref&amp;gt; में शाल्मलि कहा गया है - &lt;br /&gt;
:'शाल्मलिं चैव तत्वेन क्रौंच्द्वीपं तथैव च।&amp;lt;ref&amp;gt; [[महाभारत]], [[भीष्मपर्व महाभारत|भीष्मपर्व]] 11,3&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*श्री नंदलाल डे के अनुसार यह असीरिया या चाल्डिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{cite book | last = माथुर| first = विजयेन्द्र कुमार| title = ऐतिहासिक स्थानावली| edition = द्वितीय संस्करण-1990 | publisher = राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर| location = भारत डिस्कवरी पुस्तकालय | language = हिन्दी | pages = पृष्ठ संख्या- 896| chapter =}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सागर}}&lt;br /&gt;
{{द्वीप}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सागर]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:द्वीप]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>शहबाजगढ़ी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A5%80&amp;diff=252269"/>
		<updated>2012-02-09T05:06:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''शहबाजगढ़ी''' [[पाकिस्तान|प. पाकिस्तान]] के [[पेशावर]] के मरदान से नौ मील दूर स्थित है। &lt;br /&gt;
*इस स्थान पर [[मौर्य]] सम्राट [[अशोक]] के मुख्य [[शिलालेख]] जिनकी संख्या 14 है, एक चट्टान पर उत्कीर्ण हैं। &lt;br /&gt;
*इनकी [[लिपि]] [[खरोष्ठी]] है, जो [[ब्राह्मी]] का उत्तर पश्चिमी रूप है। &lt;br /&gt;
*इन्हीं [[अभिलेख|अभिलेखों]] की एक प्रतिलिपि [[मानसेहरा]] में पायी गयी है, जिसकी लिपि भी खरोष्ठी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{cite book | last = माथुर| first = विजयेन्द्र कुमार| title = ऐतिहासिक स्थानावली| edition = द्वितीय संस्करण-1990 | publisher = राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर| location = भारत डिस्कवरी पुस्तकालय | language = हिन्दी | pages = पृष्ठ संख्या-892 | chapter =}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{विदेशी स्थान}}&lt;br /&gt;
[[Category:विदेशी स्थान]][[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>भारत</title>
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		<updated>2012-02-08T11:29:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सुरक्षा}}{{भारत विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा भारत}}&lt;br /&gt;
'''भारत''' [सम्पूर्ण प्रभुतासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य भारत। ([[अंग्रेज़ी]]: ''India'')]  दुनियाँ की सबसे पुरानी सभ्‍यताओं में से एक है, जो 4,000 से अधिक वर्षों से चली आ रही है और जिसने अनेक रीति-रिवाज़ों और परम्‍पराओं का संगम देखा है। यह देश की समृद्ध संस्‍कृति और विरासत का परिचायक है। आज़ादी के बाद {{#expr:{{CURRENTYEAR}}-1947}}  वर्षों में भारत ने सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत [[कृषि]] में आत्‍मनिर्भर देश है और औद्योगीकरण में भी विश्व के चुने हुए देशों में भी इसकी गिनती की जाती है। यह उन देशों में से एक है, जो [[चंद्र ग्रह|चाँद]] पर पहुँच चुके हैं और परमाणु शक्ति संपन्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Point}}विस्तार में पढ़ने के लिए देखें:[[भारत आलेख]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|भारत का इतिहास}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। इसके पश्चात् एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300 ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। [[हड़प्पा]] की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: [[बलूचिस्तान|बलूचिस्तानी पहाड़ियों]] के गाँवों की [[कुल्ली संस्कृति]] और [[राजस्थान]] तथा [[पंजाब]] की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'भारत का इतिहास' रोमिला थापर) पृष्ठ संख्या-19&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भौतिक विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
मुख्‍य भूभाग में चार क्षेत्र हैं, नामत: महापर्वत क्षेत्र, [[गंगा नदी|गंगा]] और [[सिंधु नदी]] के मैदानी क्षेत्र और मरूस्‍थली क्षेत्र और दक्षिणी प्रायद्वीप।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[हिमालय]] की तीन श्रृंखलाएँ हैं, जो लगभग समानांतर फैली हुई हैं। इसके बीच बड़े - बड़े पठार और घाटियाँ हैं, इनमें [[कश्मीर]] और कुल्‍लू जैसी कुछ घाटियाँ उपजाऊ, विस्‍तृत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हैं। संसार की सबसे ऊंची चोटियों में से कुछ इन्‍हीं पर्वत श्रृंखलाओं में हैं। अधिक ऊंचाई के कारण आना -जाना केवल कुछ ही दर्रों से हो पाता है, जिनमें मुख्‍य हैं - &lt;br /&gt;
*चुंबी घाटी से होते हुए मुख्‍य भारत-तिब्‍बत व्‍यापार मार्ग पर जेलप ला और नाथू-ला दर्रे&lt;br /&gt;
*उत्तर-पूर्व दार्जिलिंग &lt;br /&gt;
*कल्‍पना (किन्‍नौर) के उत्तर - पूर्व में सतलुज घाटी में शिपकी ला दर्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूगर्भीय संरचना==&lt;br /&gt;
{{Main|भारत का भूगोल}}&lt;br /&gt;
भारत के भू‍वैज्ञानिक क्षेत्र व्‍यापक रुप से भौतिक विशेषताओं का पालन करते हैं और इन्‍हें मुख्यत: तीन क्षेत्रों के समूह में रखा जा सकता है: &lt;br /&gt;
# [[हिमालय]] पर्वत श्रृंखला और उनके संबद्ध पर्वत समूह।&lt;br /&gt;
# भारत-गंगा मैदान क्षेत्र। &lt;br /&gt;
# [[प्रायद्वीप|प्रायद्वीपीय क्षेत्र]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारत का संविधान ==&lt;br /&gt;
{{Main|भारत का संविधान}}&lt;br /&gt;
भारत का संविधान [[26 जनवरी]], 1950 को लागू हुआ। इसका निर्माण संविधान सभा ने किया था, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई थी। संविधान सभा ने 26 नवम्बर, 1949 को संविधान को अंगीकार कर लिया था।&lt;br /&gt;
संविधान सभा की पहली बैठक अविभाजित भारत के लिए बुलाई गई थी। 4 अगस्त, 1947 को संविधान सभा की बैठक पुनः हुई और उसके अध्यक्ष [[सच्चिदानन्द सिन्हा]] थे। सिन्हा के निधन के बाद [[डॉ. राजेन्द्र प्रसाद]] संविधान सभा के अध्यक्ष बने। फ़रवरी 1948 में संविधान का मसौदा प्रकाशित हुआ। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान अन्तिम रूप में स्वीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्म==&lt;br /&gt;
{{Main|धर्म}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में विभिन्नता उसका भूषण है। यहाँ हिन्दू धर्म के अगणित रूपों और संप्रदायों के अतिरिक्त, [[बौद्ध]], [[जैन]], [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]], [[इस्लाम धर्म|इस्लाम]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]], यहूदी आदि धर्मों की विविधता का भी एक सांस्कृतिक समायोजन देखने को मिलता है। [[हिन्दू धर्म]] के विविध सम्प्रदाय एवं मत सारे देश में फैले हुए हैं, जैसे [[वैदिक धर्म]], [[शैव सम्प्रदाय|शैव]], [[वैष्णव धर्म|वैष्णव]], [[शाक्त सम्प्रदाय|शाक्त]] आदि पौराणिक धर्म, राधा-बल्लभ संप्रदाय, श्री संप्रदाय, [[आर्य समाज]], समाज आदि। परन्तु इन सभी मतवादों में सनातन धर्म की एकरसता खण्डित न होकर विविध रूपों में गठित होती है। यहाँ के निवासियों में भाषा की विविधता भी इस देश की मूलभूत सांस्कृतिक एकता के लिए बाधक न होकर साधक प्रतीत होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय अर्थव्यवस्था}}&lt;br /&gt;
भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था क्रय शक्ति समानता के आधार पर दुनिया में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है। यह विशाल जनशक्ति आधार, विविध प्राकृतिक संसाधनों और सशक्‍त वृहत अर्थव्‍यवस्‍था के मूलभूत तत्‍वों के कारण व्‍यवसाय और निवेश के अवसरों के सबसे अधिक आकर्षक गंतव्‍यों में से एक है। वर्ष 1991 में आरंभ की गई आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया से सम्‍पूर्ण अर्थव्‍यवस्‍था में फैले नीतिगत ढाँचे के उदारीकरण के माध्‍यम से एक निवेशक अनुकूल परिवेश मिलता रहा है। भारत को आज़ाद हुए {{#expr:{{CURRENTYEAR}}-1947}} साल हो चुके हैं और इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा में ज़बरदस्त बदलाव आया है। औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था का रूप बदल दिया है। आज भारत की गिनती दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होती है। विश्व की अर्थव्यवस्था को चलाने में भारत की भूमिका बढ़ती जा रही है। आईटी सॅक्टर में पूरी दुनिया भारत का लोहा मानती है। &lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
{{Main|कृषि}}&lt;br /&gt;
कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों एवं प्रयासों से कृषि को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में गरिमापूर्ण दर्जा मिला है। कृषि क्षेत्रों में लगभग 64% श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है। 1950-51 में कुल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 59.2% था जो घटकर 1982-83 में 36.4% और 1990-91 में 34.9% तथा 2001-2002 में 25% रह गया। यह 2006-07 की अवधि के दौरान औसत आधार पर घटकर 18.5% रह गया। दसवीं योजना (2002-2007) के दौरान समग्र सकल घरेलू उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि पद 7.6% थी जबकि इस दौरान कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 2.3% रही। 2001-02 से प्रारंभ हुई नव सहस्त्राब्दी के प्रथम 6 वर्षों में 3.0% की वार्षिक सामान्य औसत वृद्धि दर 2003-04 में 10% और 2005-06 में 6% की रही। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खनिज संपदा==&lt;br /&gt;
{{Main|खनिज}}&lt;br /&gt;
[[स्वतंत्रता दिवस|स्वतंत्रता प्राप्ति]] के पश्चात भारत में [[खनिज|खनिजों]] के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हुई है। कोयला, लौह, अयस्क, बॉक्साइड आदि का उत्पादन निरंतर बढ़ा है। 1951 में सिर्फ़ 83 करोड़ रुपये के खनिजों का खनन हुआ था, परन्तु [[1970]]-[[1971|71]] में इनकी मात्रा बढ़कर 490 करोड़ रुपये हो गई। अगले 20 वर्षों में खनिजों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 2001-02 में निकाले गये खनिजों का कुल मूल्य 58,516.36 करोड़ रुपये तक पहुँच गया जबकि 2005-06 के दौरान कुल 75,121.61 करोड़ रुपये मूल्य के खनिजों का उत्पादन किया गया। यदि मात्रा की दृष्टि से देखा जाये, तो भारत में खनिजों की मात्रा में लगभग तिगुनी वृद्धि हुई है, उसका 50% भाग सिर्फ़ पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के कारण तथा 40% कोयला के कारण हुआ है। &lt;br /&gt;
==रक्षा==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय सशस्त्र सेना}}&lt;br /&gt;
भारत की रक्षा नीति का प्रमुख उद्देश्य यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में उसे बढ़ावा दिया जाए एवं स्थायित्व प्रदान किया जाए तथा देश की रक्षा सेनाओं को पर्याप्त रूप से सुसज्जित किया जाए, ताकि वे किसी भी आक्रमण से देश की रक्षा कर सकें। वर्ष 1946 के पूर्व भारतीय रक्षा का पूरा नियंत्रण अंग्रेज़ों के हाथों में था। उसी वर्ष केंद्र में अंतरिम सरकार में पहली बार एक भारतीय देश के रक्षा मंत्री बलदेव सिंह बने। हालांकि कमांडर-इन-चीफ एक अंग्रेज़ ही रहा । 1947 में देश का विभाजन होने पर भारत को 45 रेजीमेंटें मिलीं, जिनमें 2.5 लाख सैनिक थे। शेष रेजीमेंट पाकिस्तान चली गयीं। गोरखा फ़ौज की 6 रेजीमेंटं (लगभग 25,000 सैनिक) भी भारत को मिलीं। शेष गोरखा सैनिक ब्रिटिश सेना में सम्मिलित हो गये। ब्रिटिश सेना की अंतिम टुकड़ी सामरसैट लाइट इन्फैंट्री की पहली बटालियन हो गयी। ब्रिटिश सेना की अंतिम टुकड़ी सामरसैट लाइट इन्फैंट्री की पहली बटालियन भारतीय भूमि से 28 फ़रवरी, 1948 को स्वदेश रवाना हुई। &lt;br /&gt;
==पशु पक्षी जगत==&lt;br /&gt;
{{आँकड़े एक झलक}}&lt;br /&gt;
{{Main|भारत में वन्य जीवन}}&lt;br /&gt;
वन्य जीवन प्रकृति की अमूल्य देन है। भविष्य में वन्य प्राणियों की समाप्ति की आशंका के कारण भारत में सर्वप्रथम 7 जुलाई, 1955 को वन्य प्राणी दिवस मनाया गया । यह भी निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष दो अक्तूबर से पूरे सप्ताह तक वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जाएगा। वर्ष 1956 से वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जा रहा है। भारत के संरक्षण कार्यक्रम की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक मज़बूत संस्थागत ढांचे की रचना की गयी है। &lt;br /&gt;
==भारतीय भाषा परिवार==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय भाषाएँ}}&lt;br /&gt;
भारत की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ विभिन्नता में एकता है। भारत में विभिन्नता का स्वरूप न केवल भौगोलिक है, बल्कि भाषायी तथा सांस्कृतिक भी है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1652 मातृभाषायें प्रचलन में हैं, जबकि संविधान द्वारा 22 भाषाओं को राजभाषा की मान्यता प्रदान की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 344 के अंतर्गत पहले केवल 15 भाषाओं को राजभाषा की मान्यता दी गयी थी, लेकिन 21वें संविधान संशोधन के द्वारा [[सिन्धी भाषा|सिन्धी]] को तथा [[संविधान संशोधन- 71वाँ|71वाँ संविधान संशोधन]] द्वारा [[नेपाली भाषा|नेपाली]], [[कोंकणी भाषा|कोंकणी]] तथा [[मणिपुरी भाषा|मणिपुरी]] को भी [[राजभाषा]] का दर्जा प्रदान किया गया। बाद में [[संविधान संशोधन- 92वाँ|92वाँ संविधान संशोधन]] अधिनियम, 2003 के द्वारा संविधान की [[आठवीं अनुसूची]] में चार नई भाषाओं [[बोडो भाषा|बोडो]], [[डोगरी भाषा|डोगरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]] तथा [[संथाली भाषा|संथाली]] को राजभाषा में शामिल कर लिया गया। इस प्रकार अब संविधान में 22 भाषाओं को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
{{Main|भारत में शिक्षा}}&lt;br /&gt;
1911 में भारतीय जनगणना के समय साक्षरता को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि &amp;quot;एक पत्र पढ़-लिखकर उसका उत्तर दे देने की योग्यता&amp;quot; साक्षरता है। भारत में लम्बे समय से लिखित भाषा का अस्तित्व है, किन्तु प्रत्यक्ष सूचना के अभाव के कारण इसका संतोषजनक विकास नहीं हुआ। [[हड़प्पा]] और [[मोहनजोदड़ो]] की लेखन चित्रलिपि तीन हज़ार वर्ष ईसा पूर्व और बाद की है। यद्यपि अभी तक इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है, तथापि इससे यह स्पष्ट है कि भारतीयों के पास कई शताब्दियों पहले से ही एक लिखित भाषा थी और यहाँ के लोग पढ़ और लिख सकते थे। हड़प्पा और [[अशोक]] के काल के बीच में पन्द्रह सौ वर्षों का ऐसा समय रहा है, जिसमें की कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन [[पाणिनि]] ने उस समय भारतीयों के द्वारा बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं का उल्लेख किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारतीय कला==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय कला}}&lt;br /&gt;
भारतीय कला अपनी प्राचीनता तथा विविधता के लिए विख्यात रही है। आज जिस रूप में '[[कला]]' शब्द अत्यन्त व्यापक और बहुअर्थी हो गया है, प्राचीन काल में उसका एक छोटा हिस्सा भी न था। यदि ऐतिहासिक काल को छोड़ और पीछे प्रागैतिहासिक काल पर दृष्टि डाली जाए तो विभिन्न नदियों की घाटियों में पुरातत्त्वविदों को खुदाई में मिले असंख्य पाषाण उपकरण भारत के आदि मनुष्यों की कलात्मक प्रवृत्तियों के साक्षात प्रमाण हैं। पत्थर के टुकड़े को विभिन्न तकनीकों से विभिन्न प्रयोजनों के अनुरूप स्वरूप प्रदान किया जाता था। &lt;br /&gt;
====भारतीय संगीत====&lt;br /&gt;
{{Main|संगीत}}&lt;br /&gt;
संगीत मानवीय लय एवं तालबद्ध अभिव्यक्ति है। भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए जाना जाता है। वर्तमान भारतीय संगीत का जो रूप दृष्टिगत होता है, वह आधुनिक [[युग]] की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह [[भारतीय इतिहास]] के प्रासम्भ के साथ ही जुड़ा हुआ है। [[वैदिक काल]] में ही भारतीय संगीत के बीज पड़ चुके थे। [[सामवेद]] उन वैदिक ॠचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। प्राचीन काल से ही ईश्वर आराधना हेतु भजनों के प्रयोग की परम्परा रही है। यहाँ तक की यज्ञादि के अवसर पर भी समूहगान होते थे।&lt;br /&gt;
====नृत्य कला====&lt;br /&gt;
{{main|नृत्य कला}}&lt;br /&gt;
भारत में नृत्य की अनेक शैलियाँ हैं। [[भरतनाट्यम]], [[ओडिसी]], [[कुचिपुड़ी]], [[कथकली]], [[मणिपुरी]], [[कथक]] आदि परंपरागत नृत्य शैलियाँ हैं तो [[भंगड़ा]], [[गिद्दा]], नगा, [[बिहू नृत्य|बिहू]] आदि लोक प्रचलित नृत्य है। ये नृत्य शैलियाँ पूरे देश में विख्यात है। [[गुजरात]] का [[गरबा नृत्य|गरबा]] [[हरियाणा]] में भी मंचो की शोभा को बढ़ाता है और [[पंजाब]] का [[भंगड़ा]] [[दक्षिण भारत]] में भी बड़े शौक़ से देखा जाता है। भारत के संगीत को विकसित करने में [[अमीर ख़ुसरो]], [[तानसेन]], [[बैजू बावरा]] जैसे संगीतकारों का विशेष योगदान रहा है। आज भारत के संगीत-क्षितिज पर [[बिस्मिल्ला ख़ाँ‎]], [[ज़ाकिर हुसैन]], [[रवि शंकर]] समान रूप से सम्मानित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संस्कृति==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय संस्कृति}}&lt;br /&gt;
त्योहार और मेले भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। यह भी कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति अपने हृदय के माधुर्य को त्योहार और मेलों में व्यक्त करती है, तो अधिक सार्थक होगा। भारतीय संस्कृति प्रेम, सौहार्द्र, करुणा, मैत्री, दया और उदारता जैसे मानवीय गुणों से परिपूर्ण है। यह उल्लास, उत्साह और विकास को एक साथ समेटे हुए है। आनन्द और माधुर्य तो जैसे इसके प्राण हैं। यहाँ हर कार्य आनन्द के साथ शुरू होता है और माधुर्य के साथ सम्पन्न होता है। भारत जैसे विशाल धर्मप्राण देश में आस्था और विश्वास के साथ मिल कर यही आनन्द और उल्लास त्योहार और मेलों में फूट पड़ता है। त्योहार और मेले हमारी धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक परम्पराओं और आर्थिक आवश्यकताओं की त्रिवेणी है, जिनमें समूचा जनमानस भावविभोर होकर गोते लगाता है। &lt;br /&gt;
== भारतीय भोजन ==&lt;br /&gt;
{{Main|भारतीय भोजन}}&lt;br /&gt;
भारतीय भोजन स्वाद और सुगंध का मधुर संगम है। पूरन पूरी हो या दाल बाटी, तंदूरी रोटी हो या शाही पुलाव, पंजाबी भोजन हो या मारवाड़ी भोजन, ज़िक्र चाहे जिस किसी का भी हो रहा हो, केवल नाम सुनने से ही भूख जाग उठती है। भारत में पकवानों की विविधता भी बहुत अधिक है। [[राजस्थान]] में दाल-बाटी, [[कोलकाता]] में चावल-मछली, [[पंजाब]] में रोटी-साग, दक्षिण में इडली-डोसा। इतनी विविधता के बीच एकता का प्रमाण यह है कि आज दक्षिण भारत  के लोग दाल-रोटी उसी शौक़ से खाते हैं, जितने शौक़ से उत्तर भारतीय इडली-डोसा खाते हैं। सचमुच भारत एक रंगबिरंगा गुलदस्ता है।&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{Main|पर्यटन}}&lt;br /&gt;
भारतवासी अपनी दीर्घकालीन, अनवरत एवं सतरंगी उपलब्धियों से युक्त इतिहास पर गर्व कर सकते हैं। प्राचीन काल से ही भारत एक अत्यन्त ही विविधता सम्पन्न देश रहा है और यह विशेषता आज भी समय की घड़ी पर अंकित है। यहाँ प्रारम्भ से अनेक अध्यावसायों का अनुसरण होता रहा है, पृथक्-पृथक् मान्यताएँ हैं, लोगों के रिवाज़ और दृष्टिकोणों के विभिन्न रंगों से सज़ा यह देश अतीत को भूत, वर्तमान एवं भविष्य की आँखों से देखने के लिए आह्वान कर रहा है। किन्तु बहुरंगी सभ्यता एवं संस्कृति वाले देश के सभी आयामों को समझने का प्रयास इतना आसान नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Point}} विस्तार में पढ़ने के लिए देखें:[[भारत आलेख]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राज्य संरचना==&lt;br /&gt;
{{Main|राज्य संरचना}}&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र3}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}{{top}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_गणराज्य_संरचना]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=252208</id>
		<title>भारत का इतिहास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=252208"/>
		<updated>2012-02-08T11:28:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{भारत विषय सूची}}&lt;br /&gt;
__TOC__&lt;br /&gt;
{| style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{प्रांगण लेख इतिहास}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{इतिहास}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[भारत]] में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण [[केरल]] से मिला है जो '''सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना''' है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देखें: '''शोध ग्रंथ''' {{cite book |last=वेल्स|first=स्पेन्सर|url =http://books.google.ca/books?id=WAsKm-_zu5sC&amp;amp;lpg=PP1&amp;amp;dq=The%20Journey%20of%20Man&amp;amp;pg=PP1#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=true |title=अ जेनेटिक ओडिसी|year=2002|publisher=प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रॅस, न्यू जर्सी, सं.रा.अमरीका|language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]||id=ISBN 0-691-11532-X}} &amp;lt;/ref&amp;gt;इसके पश्चात एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300 ई. पू. के लगभग [[सिन्धु घाटी]] की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। [[हड़प्पा]] की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की [[कुल्ली संस्कृति]] और [[राजस्थान]] तथा [[पंजाब]] की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'भारत का इतिहास' रोमिला थापर) पृष्ठ संख्या-19&amp;lt;/ref&amp;gt; यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत==&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास जानने के स्रोत को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता हैं-&lt;br /&gt;
# साहित्यिक साक्ष्य&lt;br /&gt;
# विदेशी यात्रियों का विवरण&lt;br /&gt;
# पुरातत्त्व सम्बन्धी साक्ष्य&lt;br /&gt;
====साहित्यिक साक्ष्य====&lt;br /&gt;
साहित्यिक साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
;धार्मिक साहित्य&lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है। &lt;br /&gt;
*ब्राह्मण ग्रन्थों में - &lt;br /&gt;
[[वेद]], [[उपनिषद]], [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण]], [[स्मृतियाँ|स्मृति ग्रन्थ]] आते हैं।&lt;br /&gt;
*ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में [[जैन]] तथा [[बौद्ध]] ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
;लौकिक साहित्य &lt;br /&gt;
लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक ग्रन्थ, जीवनी, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धर्म-ग्रन्थ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही [[भारत]] के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म''' - ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वेद'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{main|वेद}}&lt;br /&gt;
वेद एक महत्त्वपूर्ण ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ है। वेद शब्द का अर्थ ‘ज्ञान‘ महतज्ञान अर्थात ‘पवित्र एवं आध्यात्मिक ज्ञान‘ है। यह शब्द [[संस्कृत]] के ‘विद्‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेदों के संकलनकर्ता 'कृष्ण द्वैपायन' थे। कृष्ण द्वैपायन को वेदों के पृथक्करण-व्यास के कारण 'वेदव्यास' की संज्ञा प्राप्त हुई। वेदों से ही हमें आर्यो के विषय में प्रारम्भिक जानकारी मिलती है। कुछ लोग वेदों को अपौरुषेय अर्थात दैवकृत मानते हैं। वेदों की कुल संख्या चार है-&lt;br /&gt;
*[[ऋग्वेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[सामवेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[यजुर्वेद]]- इसमें यागानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है।&lt;br /&gt;
*[[अथर्ववेद]]- यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है।&lt;br /&gt;
====ब्राह्मण ग्रंथ====&lt;br /&gt;
{{main|ब्राह्मण साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। यहां पर 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा प्रस्तुत की गयी है। यह ग्रंथ अधिकतर गद्य में लिखे हुए हैं। इनमें उत्तरकालीन समाज तथा संस्कृति के सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण होते हैं।&lt;br /&gt;
====आरण्यक====&lt;br /&gt;
{{main|आरण्यक साहित्य}}&lt;br /&gt;
आरयण्कों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों यथा, आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का वर्णन होता है। इन ग्रंथों को आरयण्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन ग्रंथों का मनन अरण्य अर्थात वन में किया जाता था। ये ग्रन्थ अरण्यों (जंगलों) में निवास करने वाले संन्यासियों के मार्गदर्शन के लिए लिखे गए थै। आरण्यकों में ऐतरेय आरण्यक, शांखायन्त आरण्यक, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक तथा तवलकार आरण्यक (इसे जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण भी कहते हैं) मुख्य हैं। ऐतरेय तथा शांखायन ऋग्वेद से, बृहदारण्यक शुक्ल यजुर्वेद से, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तवलकार आरण्यक सामवेद से सम्बद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। आरण्यक ग्रन्थों में प्राण विद्या की महिमा का प्रतिपादन विशेष रूप से मिलता है। इनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी हैं, जैसे- तैत्तिरीय आरण्यक में [[कुरु]], [[पंचाल]], [[काशी]], [[विदेह]] आदि [[महाजनपद|महाजनपदों]] का उल्लेख है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====उपनिषद====&lt;br /&gt;
{{main|उपनिषद}}&lt;br /&gt;
उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। लेकिन शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों पर स्पना भाष्य लिखा है, उनको प्रमाणिक माना गया है। ये हैं - ईश, केन, माण्डूक्य, मुण्डक, तैत्तिरीय, ऐतरेय, प्रश्न, छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद। इसके अतिरिक्त श्वेताश्वतर  और कौषीतकि उपनिषद भी महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार 103 उपनिषदों में से केवल 13 उपनिषदों को ही प्रामाणिक माना गया है। भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य '[[सत्यमेव जयते]]' मुण्डोपनिषद से लिया गया है। उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें [[प्रश्नोपनिषद|प्रश्न]], [[माण्डूक्योपनिषद|माण्डूक्य]], [[केनोपनिषद|केन]], [[तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय]], [[ऐतरेयोपनिषद|ऐतरेय]], [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्य]], [[बृहदारण्यकोपनिषद|बृहदारण्यक]] और [[कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद|कौषीतकि उपनिषद]] गद्य में हैं तथा [[केनोपनिषद|केन]], [[ईशावास्योपनिषद|ईश]], [[कठोपनिषद|कठ]] और [[श्वेताश्वतरोपनिषद|श्वेताश्वतर उपनिषद]] पद्य में हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====वेदांग====&lt;br /&gt;
{{main|वेदांग}}&lt;br /&gt;
वेदों के अर्थ को अच्छी तरह समझने में वेदांग काफ़ी सहायक होते हैं। वेदांग शब्द से अभिप्राय है- 'जिसके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को समझने में सहायता मिले'। वेदांगो की कुल संख्या 6 है, जो इस प्रकार है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
1- शिक्षा, 2- कल्प, 3- व्याकरण, 4- निरूक्त, 5- छन्द एवं 6- ज्योतिष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। &lt;br /&gt;
*धर्मशास्त्र में चार साहित्य आते हैं- 1- धर्म सूत्र, 2- स्मृति, 3- टीका एवं 4- निबन्ध।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्मृतियाँ====&lt;br /&gt;
{{main|स्मृतियाँ}}&lt;br /&gt;
स्मृतियों को 'धर्म शास्त्र' भी कहा जाता है- 'श्रस्तु वेद विज्ञेयों धर्मशास्त्रं तु वैस्मृतिः।' स्मृतियों का उदय सूत्रों को बाद हुआ। मनुष्य के पूरे जीवन से सम्बधित अनेक क्रिया-कलापों के बारे में असंख्य विधि-निषेधों की जानकारी इन स्मृतियों से मिलती है। सम्भवतः [[मनुस्मृति]] (लगभग 200 ई.पूर्व. से 100 ई. मध्य) एवं याज्ञवल्क्य स्मृति सबसे प्राचीन हैं। उस समय के अन्य महत्त्वपूर्ण स्मृतिकार थे- [[नारद]], [[पराशर]], [[बृहस्पति]], [[कात्यायन]], [[गौतम]], संवर्त, हरीत, [[अंगिरा]] आदि, जिनका समय सम्भवतः 100 ई. से लेकर 600 ई. तक था। मनुस्मृति से उस समय के [[भारत]] के बारे में राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी मिलती है। [[नारद स्मृति]] से [[गुप्त वंश]] के संदर्भ में जानकारी मिलती है। मेधातिथि, मारूचि, कुल्लूक भट्ट, गोविन्दराज आदि टीकाकारों ने 'मनुस्मृति' पर, जबकि विश्वरूप, अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि ने 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर भाष्य लिखे हैं।&lt;br /&gt;
====महाकाव्य====&lt;br /&gt;
{{main|महाकाव्य}}&lt;br /&gt;
'[[रामायण]]' एवं '[[महाभारत]]', भारत के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं। यद्यपि इन दोनों महाकाव्यों के रचनाकाल के विषय में काफ़ी विवाद है, फिर भी कुछ उपलब्ध साक्ष्यों के आधर पर इन महाकाव्यों का रचनाकाल चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य माना गया है।&lt;br /&gt;
====रामायण====&lt;br /&gt;
{{main|रामायण}}&lt;br /&gt;
रामायण की रचना [[बाल्मीकि|महर्षि बाल्मीकि]] द्वारा पहली एवं दूसरी शताब्दी के दौरान [[संस्कृत|संस्कृत भाषा]] में की गयी । बाल्मीकि कृत रामायण में मूलतः 6000 श्लोक थे, जो कालान्तर में 12000 हुए और फिर 24000 हो गये । इसे 'चतुर्विशिति साहस्त्री संहिता' भ्री कहा गया है। बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- [[बाल काण्ड वा. रा.|बालकाण्ड]], [[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्याकाण्ड]], [[अरण्य काण्ड वा. रा.|अरण्यकाण्ड]], [[किष्किन्धा काण्ड वा. रा.|किष्किन्धाकाण्ड]], [[सुन्दर काण्ड वा. रा.|सुन्दरकाण्ड]], [[युद्ध काण्ड वा. रा.|युद्धकाण्ड]] एवं [[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तराकाण्ड]] नामक सात काण्डों में बंटा हुआ है। रामायण द्वारा उस समय की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है। रामकथा पर आधारित ग्रंथों का अनुवाद सर्वप्रथम [[भारत]] से बाहर [[चीन]] में किया गया। भूशुण्डि रामायण को 'आदिरामायण' कहा जाता है।   	&lt;br /&gt;
====महाभारत====&lt;br /&gt;
{{main|महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[व्यास|महर्षि व्यास]] द्वारा रचित [[महाभारत]] महाकाव्य [[रामायण]] से बृहद है। इसकी रचना का मूल समय ईसा पूर्व चौथी शताब्दी माना जाता है। महाभारत में मूलतः 8800 श्लोक थे तथा इसका नाम 'जयसंहिता' (विजय संबंधी ग्रंथ) था। बाद में श्लोकों की संख्या 24000 होने के पश्चात यह वैदिक जन [[भरत (दुष्यंत पुत्र)|भरत]] के वंशजों की कथा होने के कारण ‘भारत‘ कहलाया। कालान्तर में [[गुप्त काल]] में श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख होने पर यह 'शतसाहस्त्री संहिता' या 'महाभारत' केहलाया। महाभारत का प्रारम्भिक उल्लेख 'आश्वलाय गृहसूत्र' में मिलता है। वर्तमान में इस महाकाव्य में लगभग एक लाख श्लोकों का संकलन है। महाभारत महाकाव्य 18 पर्वो- [[आदि पर्व महाभारत|आदि]], [[सभा पर्व महाभारत|सभा]], [[वन पर्व महाभारत|वन]], [[विराट पर्व महाभारत|विराट]], [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग]], [[भीष्म पर्व महाभारत|भीष्म]], [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोण]], [[कर्ण पर्व महाभारत|कर्ण]], [[शल्य पर्व महाभारत|शल्य]], [[सौप्तिक पर्व महाभारत|सौप्तिक]], [[स्त्री पर्व महाभारत|स्त्री]], [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्ति]], [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन]], [[आश्वमेधिक पर्व महाभारत|अश्वमेघ]], [[आश्रमवासिक पर्व महाभारत|आश्रमवासी]], [[मौसल पर्व महाभारत|मौसल]], [[महाप्रास्थानिक पर्व महाभारत|महाप्रास्थानिक]] एवं [[स्वर्गारोहण पर्व महाभारत|स्वर्गारोहण]] में विभाजित है। महाभारत में ‘हरिवंश‘ नाम परिशिष्ट है। इस महाकाव्य से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
====पुराण====&lt;br /&gt;
{{main|पुराण}}&lt;br /&gt;
प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रंथ को [[पुराण]] कहते हैं। सम्भवतः 5वीं से 4थी शताब्दी ई.पू. तक पुराण अस्तित्व में आ चुके थे। [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] में पुराणों के पांच लक्षण बताये ये हैं। यह हैं- सर्प, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित। कुल पुराणों की संख्या 18 हैं- 1. [[ब्रह्म पुराण]] 2. [[पद्म पुराण]] 3. [[विष्णु पुराण]] 4. [[वायु पुराण]] 5. [[भागवत पुराण]] 6. [[नारद पुराण|नारदीय पुराण]], 7. [[मार्कण्डेय पुराण]] 8. [[अग्नि पुराण]] 9. [[भविष्य पुराण]] 10. [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]], 11. [[लिंग पुराण]] 12. [[वराह पुराण]] 13. [[स्कन्द पुराण]] 14. [[वामन पुराण]] 15. [[कूर्म पुराण]] 16. [[मत्स्य पुराण]] 17. [[गरुड़ पुराण]] और 18. [[ब्रह्माण्ड पुराण]]&lt;br /&gt;
====बौद्ध साहित्य====&lt;br /&gt;
{{main|बौद्ध साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[बौद्ध साहित्य]] को ‘[[त्रिपिटक]]‘ कहा जाता है। [[महात्मा बुद्ध]] के परिनिर्वाण के उपरान्त आयोजित विभिन्न बौद्ध संगीतियों में संकलित किये गये त्रिपिटक (संस्कृत त्रिपिटक) सम्भवतः सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ हैं। वुलर एवं रीज डेविड्ज महोदय ने ‘पिटक‘ का शाब्दिक अर्थ टोकरी बताया है। त्रिपिटक हैं- &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[सुत्तपिटक]], [[विनयपिटक]] और [[अभिधम्मपिटक]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|जैन साहित्य|लौकिक साहित्य}}&lt;br /&gt;
====जैन साहित्य====&lt;br /&gt;
{{main|जैन साहित्य}}&lt;br /&gt;
ऐतिहसिक जानकारी हेतु [[जैन साहित्य]] भी [[बौद्ध साहित्य]] की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक उपलब्ध जैन साहित्य [[प्राकृत]] एवं [[संस्कृत]] भाषा में मिलतें है। जैन साहित्य, जिसे ‘[[आगम]]‘ कहा जाता है, इनकी संख्या 12 बतायी जाती है। आगे चलकर इनके 'उपांग' भी लिखे गये । आगमों के साथ-साथ जैन ग्रंथों में 10 प्रकीर्ण, 6 छंद सूत्र, एक नंदि सूत्र एक अनुयोगद्वार एवं चार मूलसूत्र हैं। इन आगम ग्रंथों की रचना सम्भवतः श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यो द्वारा [[महावीर|महावीर स्वामी]] की मृत्यु के बाद की गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====विदेशियों के विवरण====&lt;br /&gt;
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारियाँ मिलती है। इनको तीन भागों में बांट सकते हैं- &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
# [[यूनानी लेखक|यूनानी-रोमन लेखक]]&lt;br /&gt;
# [[चीनी लेखक]]&lt;br /&gt;
# [[अरबी लेखक]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पुरातत्त्व====&lt;br /&gt;
{{Main|पुरातत्त्व}}&lt;br /&gt;
पुरातात्विक साक्ष्य के अंतर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियां चित्रकला आदि आते हैं। इतिहास निमार्ण में सहायक पुरातत्त्व सामग्री में अभिलेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये अभिलेख अधिकांशतः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं पात्रों, मूर्तियों, गुहाओं आदि में खुदे हुए मिलते हैं। यद्यपि प्राचीनतम अभिलेख मध्य एशिया के ‘बोगजकोई‘ नाम स्थान से क़रीब 1400 ई.पू. में पाये गये जिनमें अनेक वैदिक देवताओं - [[इन्द्र]], मित्र, [[वरुण देवता|वरुण]], नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
{{Main|चित्रकला}}&lt;br /&gt;
[[चित्रकला]] से हमें उस समय के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। [[अजंता की गुफ़ाएँ|अजंता]] के चित्रों में मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। चित्रों में ‘माता और शिशु‘ या ‘मरणशील राजकुमारी‘ जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक पराकाष्ठा का पूर्ण प्रमाण मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{इन्हेंभीदेखें|मूर्ति कला मथुरा|अभिलेख}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाषाण काल==&lt;br /&gt;
{{main|भारत का इतिहास पाषाण काल}}&lt;br /&gt;
समस्त इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा एकता है-&lt;br /&gt;
#प्राक्इतिहास या प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Age)&lt;br /&gt;
#आद्य ऐतिहासिक काल (Proto-historic Age)&lt;br /&gt;
#ऐतिहासिक काल (Historic Age)&lt;br /&gt;
====भारत की आदिम (प्रारंभिक) जातियाँ====&lt;br /&gt;
{{main|भारत की आदिम जातियाँ}}&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक काल में [[भारत]] में कितने प्रकार की जातियां निवास करती थीं, उनमें आपसी सम्बन्घ किस स्तर के थे, आदि प्रश्न अत्यन्त ही विवादित हैं। फिर भी नवीनतम सर्वाधिक मान्यताओं में 'डॉ. बी.एस. गुहा' का मत है। भारतवर्ष की प्रारम्भिक जातियों को छः भागों में विभक्त किया जा सकता है। - &lt;br /&gt;
1. नीग्रिटों 2. प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाईड 3. मंगोलायड 4. भूमध्य सागरीय 5. पश्चिमी ब्रेकी सेफल 6. नॉर्डिक&lt;br /&gt;
==सिंधु घाटी सभ्यता==&lt;br /&gt;
{{main|सिंधु घाटी सभ्यता}}&lt;br /&gt;
आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व [[पाकिस्तान]] के 'पश्चिमी पंजाब प्रांत' के 'माण्टगोमरी ज़िले' में स्थित 'हरियाणा' के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की ज़मीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों का निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हें तब हुआ जब 1856 ई. में 'जॉन विलियम ब्रन्टम' ने कराची से [[लाहौर]] तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।&lt;br /&gt;
====हड़प्पा लिपि====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा लिपि}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई। [[सिंधु लिपि]] में लगभग 64 मूल चिन्ह एवं 205 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। यह लिपि चित्रात्मक थी। यह लिपि अभी तक गढ़ी नहीं जा सकी है। इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में क़रीब 17 चिन्ह हैं। [[कालीबंगा]] के [[उत्खनन]] से प्राप्त मिट्टी के ठीकरों पर उत्कीर्ण चिन्ह अपने पार्श्ववर्ती दाहिने चिन्ह को काटते हैं। इसी आधार पर 'ब्रजवासी लाल' ने यह निष्कर्ष निकाला है - 'सैंधव लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर को लिखी जाती थी।'&lt;br /&gt;
====मृण्मूर्तियां====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की मृण्मूर्तियां}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मृण्मूर्तियों का निर्माण मिट्टी से किया गया है। इन मृण्मूर्तियों पर मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, बकरा, [[बाघ]], सुअर, गैंडा, भालू, [[बन्दर]], [[मोर]], तोता, बत्तख़ एवं [[कबूतर]] की मृणमूर्तियां मिली है। मानव मृण्मूर्तियां ठोस है पर पशुओं की खोखली। नर एवं नारी मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां ठोस हैं, पर पशुओं की खोखली। नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली हैं।&lt;br /&gt;
====हड़प्पा सभ्यता के नगरों की विशेषताएं====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा संस्कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी- इसकी नगर योजना। इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थलों के नगर निर्माण में समरूपता थी। नगरों के भवनो के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे।&lt;br /&gt;
====हडप्पा जनजीवन====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा समाज और संस्कृति}}&lt;br /&gt;
हडप्प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को देखने से ऐसा लगता है कि यह सभ्यता किसी केन्द्रीय शक्ति से संचालित होती थी। वैसे यह प्रश्न अभी विवाद का विषय बना हुआ है, फिर भी चूंकि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग के हाथ में था। &lt;br /&gt;
*ह्नीलर ने सिंधु प्रदेश के लोगों के शासन को 'मध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन' कहा और उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया। &lt;br /&gt;
*स्टुअर्ट पिग्गॉट महोदय ने कहा 'मोहनजोदाड़ों का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक' था। &lt;br /&gt;
*मैके के अनुसार ‘मोहनजोदड़ों का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथों था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रागैतिहासिक काल==&lt;br /&gt;
{{Main|प्रागैतिहासिक काल}}&lt;br /&gt;
भारत का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच [[सिंधु घाटी]] में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष [[मोहन जोदड़ो]] (मुअन-जो-दाड़ो) और [[हड़प्पा]] में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में [[आर्य|आर्यों]] का प्रवेश बाद में हुआ। आर्यों ने पाया कि इस देश में उनसे पूर्व के जो लोग निवास कर रहे थे, उनकी सभ्यता यदि उनसे श्रेष्ठ नहीं तो किसी रीति से निकृष्ट भी नहीं थी। आर्यों से पूर्व के लोगों में सबसे बड़ा वर्ग [[द्रविड़ निवासी|द्रविड़ों]] का था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|आर्य|आर्यावर्त|द्रविड़ निवासी}}&lt;br /&gt;
====महाजनपद युग====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महाजनपद}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''प्राचीन भारतीयों ने कोई तिथि क्रमानुसार इतिहास नहीं सुरक्षित रखा है।''' सबसे प्राचीन सुनिश्चित तिथि जो हमें ज्ञात है, 326 ई. पू. है, जब मक़दूनिया के राजा [[सिकन्दर]] ने भारत पर आक्रमण किया। इस तिथि से पहले की घटनाओं का तारतम्य जोड़ कर तथा साहित्य में सुरक्षित ऐतिहासिक अनुश्रुतियों का उपयोग करके भारत का इतिहास सातवीं शताब्दी ई. पू. तक पहुँच जाता है। इस काल में भारत [[क़ाबुल]] की घाटी से लेकर गोदावरी तक [[सोलह महाजनपद|षोडश जनपदों]] में विभाजित था।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|ब्राह्मण|अंधक संघ|कृष्ण|ब्रज}}&lt;br /&gt;
==प्राचीन भारत==&lt;br /&gt;
{{Main|प्राचीन भारत}}&lt;br /&gt;
1200 ई.पू से 240 ई. तक का भारतीय इतिहास, प्राचीन भारत का इतिहास कहलाता है। इसके बाद के [[भारत]] को [[मध्यकालीन भारत]] कहते हैं जिसमें मुख्यतः मुस्लिम शासकों का प्रभुत्व रहा था।&lt;br /&gt;
====मौर्य और शुंग====&lt;br /&gt;
{{main|मौर्य काल|मौर्य साम्राज्य| शुंग}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|अशोक|अशोक के शिलालेख|बुद्ध|बौद्ध दर्शन|बौद्ध धर्म|फ़ाह्यान|पाटलिपुत्र|तक्षशिला}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शक, कुषाण और सातवाहन====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|शक साम्राज्य|कुषाण साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
{{seealso|राबाटक लेख|कुषाण|कनिष्क|कम्बोजिका|कल्हण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गुप्त====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गुप्त साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्यकालीन भारत==&lt;br /&gt;
{{Main|मध्यकालीन भारत}}&lt;br /&gt;
====तीन साम्राज्यों का युग (8वीं - 10वीं शताब्दी)====&lt;br /&gt;
सात सौ पचास और एक हज़ार ईस्वी के बीच उत्तर तथा दक्षिण [[भारत]] में कई शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय हुआ। नौंवीं शताब्दी तक पूर्वी और उत्तरी भारत में [[पाल साम्राज्य]] तथा दसवीं शताब्दी तक पश्चिमी तथा उत्तरी भारत में [[प्रतिहार साम्राज्य]] शक्तिशाली बने रहे। [[राष्ट्रकूट साम्राज्य|राष्ट्रकूटों]] का प्रभाव दक्कन में तो था ही, कई बार उन्होंने उत्तरी और दक्षिण भारत में भी अपना प्रभुत्व क़ायम किया। यद्यपि ये तीनों साम्राज्य आपस में लड़ते रहते थे तथापि इन्होंने एक बड़े भू-भाग में स्थिरता क़ायम रखी और साहित्य तथा कलाओं को प्रोत्साहित किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|पाल साम्राज्य|राष्ट्रकूट साम्राज्य|पृथ्वीराज चौहान|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य|राजपूत काल|चोल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====इस्लाम का प्रवेश====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|इस्लाम धर्म}}&lt;br /&gt;
इस बीच 712 ई. में भारत में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। [[मुहम्मद-इब्न-क़ासिम]] के नेतृत्व में [[मुसलमान]] अरबों ने [[सिंध]] पर हमला कर दिया और वहाँ के [[ब्राह्मण]] राजा [[दाहिर]] को हरा दिया। इस तरह भारत की भूमि पर पहली बार [[इस्लाम]] के पैर जम गये और बाद की शताब्दियों के [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]] राजा उसे फिर हटा नहीं सके। परन्तु सिंध पर अरबों का शासन वास्तव में निर्बल था और 1176 ई. में [[शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी]] ने उसे आसानी से उखाड़ दिया। इससे पूर्व सुबुक्तगीन के नेतृत्व में मुसलमानों ने हमले करके [[पंजाब]] छीन लिया था और ग़ज़नी के [[महमूद ग़ज़नवी|सुल्तान महमूद]] ने 997 से 1030 ई. के बीच भारत पर सत्रह हमले किये और हिन्दू राजाओं की शक्ति कुचल डाली, फिर भी हिन्दू राजाओं ने मुसलमानी आक्रमण का जिस अनवरत रीति से प्रबल विरोध किया, उसका महत्त्व कम करके नहीं आंकना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|चंगेज़ ख़ाँ|महमूद ग़ज़नवी|मुहम्मद बिन क़ासिम|मुहम्मद ग़ोरी|ग़ोर के सुल्तान|चंदबरदाई|पृथ्वीराज रासो|क़ुतुबुद्दीन ऐबक}}&lt;br /&gt;
====आर्थिक सामाजिक जीवन, शिक्षा तथा धर्म &amp;lt;sub&amp;gt;800 ई. से 1200 ई.&amp;lt;/sub&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{main|भारत की संस्कृति}}&lt;br /&gt;
इस काल में भारतीय समाज में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इनमें से एक यह था कि विशिष्ट वर्ग के लोगों की शक्ति बहुत बढ़ी जिन्हें 'सामंत', 'रानक' अथवा 'रौत्त' ([[राजपूत]]) आदि पुकारा जाता था। इस काल में भारतीय दस्तकारी तथा खनन कार्य उच्च स्तर का बना रहा तथा [[कृषि]] भी उन्नतिशील रही। [[भारत]] आने वाले कई [[अरब देश|अरब]] यात्रियों ने यहाँ की ज़मीन की उर्वरता और भारतीय किसानों की कुशलता की चर्चा की है। पहले से चली आ रही वर्ण व्यवस्था इस युग में भी क़ायम रही। [[स्मृतियाँ|स्मृतियों]] के लेखकों ने [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] के विशेषाधिकारों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर तो कहा ही, शूद्रों की सामाजिक और धार्मिक अयोग्यता को उचित ठहराने में तो वे पिछले लेखकों से कहीं आगे निकल गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====दिल्ली सल्तनत====&lt;br /&gt;
{{main|दिल्ली सल्तनत}}&lt;br /&gt;
दिल्ली सल्तनत की स्थापना भारतीय इतिहास में युगान्तकारी घटना है। शासन का यह नवीन स्वरूप [[भारत]] की पूर्ववर्ती राजव्यवस्थाओं से भिन्न था। इस काल के शासक एवं उनकी [[प्रशासनिक व्यवस्था (सल्तनतकाल)|प्रशासनिक व्यवस्था]] एक ऐसे [[धर्म]] पर आधारित थी, जो कि साधारण धर्म से भिन्न था। शासकों द्वारा सत्ता के अभूतपूर्व केन्द्रीकरण और कृषक वर्ग के शोषण का भारतीय इतिहास में कोई उदाहरण नहीं मिलता है। दिल्ली सल्तनत का काल 1206 ई. से प्रारम्भ होकर 1562 ई. तक रहा। 320 वर्षों के इस लम्बे काल में [[भारत]] में मुस्लिमों का शासन व्याप्त रहा। यह काल [[स्थापत्य एवं वास्तुकला (सल्तनत काल)|स्थापत्य एवं वास्तुकला]] के लिये भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।&lt;br /&gt;
====मामलूक अथवा ग़ुलाम वंश==== &lt;br /&gt;
{{main|ग़ुलाम वंश}}&lt;br /&gt;
ग़ुलाम वंश [[दिल्ली]] में [[कुतुबद्दीन ऐबक]] द्वारा 1206 ई. में स्थापित किया गया था। यह वंश 1290 ई. तक शासन करता रहा। इसका नाम ग़ुलाम वंश इस कारण पड़ा कि इसका संस्थापक और उसके इल्तुतमिश और बलबन जैसे महान उत्तराधिकारी प्रारम्भ में ग़ुलाम अथवा दास थे और बाद में वे दिल्ली का सिंहासन प्राप्त करने में समर्थ हुए। &lt;br /&gt;
====इल्तुतमिश/अल्तमश==== &lt;br /&gt;
{{main|इल्तुतमिश}}&lt;br /&gt;
इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत में ग़ुलाम वंश का एक प्रमुख शासक था। वंश के संस्थापक ऐबक के बाद वो उन शासकों में से था जिससे दिल्ली सल्तनत की नींव मजबूत हुई। वह ऐबक का दामाद भी था। &lt;br /&gt;
====रज़िया सुल्तान ==== &lt;br /&gt;
{{main|रज़िया सुल्तान}}&lt;br /&gt;
रज़िया का पूरा नाम-रज़िया अल्-दीन (1205 – 1240), सुल्तान जलालत उद-दीन रज़िया था। वह इल्तुतमिश की पुत्री तथा भारत की पहली मुस्लिम शासिका थी। &lt;br /&gt;
====बलबन का युग====&lt;br /&gt;
{{main|ग़यासुद्दीन बलबन}} &lt;br /&gt;
ग़यासुद्दीन बलबन (1266-1286 ई.) इल्बारि जाति का व्यक्ति था, जिसने एक नये राजवंश ‘बलबनी वंश’ की स्थापना की थी। ग़यासुद्दीन बलबन ग़ुलाम वंश का नवाँ सुल्तान था। &lt;br /&gt;
====ख़िलजी वंश (1290-1320 ई.)====&lt;br /&gt;
{{main|ख़िलजी वंश}} &lt;br /&gt;
ख़िलजी कौन थे? इस विषय में पर्याप्त विवाद है। इतिहासकार 'निज़ामुद्दीन अहमद' ने ख़िलजी को [[चंगेज़ ख़ाँ]] का दामाद और कुलीन ख़ाँ का वंशज, 'बरनी' ने उसे तुर्कों से अलग एवं 'फ़खरुद्दीन' ने ख़िलजियों को तुर्कों की 64 जातियों में से एक बताया है। फ़खरुद्दीन के मत का अधिकांश विद्वानों ने समर्थन किया है। चूंकि [[भारत]] आने से पूर्व ही यह जाति [[अफ़ग़ानिस्तान]] के हेलमन्द नदी के तटीय क्षेत्रों के उन भागों में रहती थी, जिसे ख़िलजी के नाम से जाना जाता था। सम्भवतः इसीलिए इस जाति को ख़िलजी कहा गया। मामलूक अथवा [[ग़ुलाम वंश]] के अन्तिम सुल्तान [[शमसुद्दीन क्यूमर्स]] की हत्या के बाद ही [[जलालुद्दीन ख़िलजी|जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी]] सिंहासन पर बैठा था, इसलिए इतिहास में ख़िलजी वंश की स्थापना को ख़िलजी क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। &lt;br /&gt;
====तुग़लक़ वंश (1320-1414)====&lt;br /&gt;
{{main|तुग़लक़ वंश}}&lt;br /&gt;
ग़यासुद्दीन ने एक नये वंश अर्थात तुग़लक़ वंश की स्थापना की, जिसने 1412 तक राज किया। इस वंश में तीन योग्य शासक हुए। [[ग़यासुद्दीन तुग़लक|ग़यासुद्दीन]], उसका पुत्र [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] (1324-51) और उसका उत्तराधिकारी [[फ़िरोज शाह तुग़लक़]] (1351-87)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|सैयद वंश|लोदी वंश|तैमूर लंग|विजय नगर साम्राज्य|बहमनी वंश|चंगेज़ ख़ाँ|अलाउद्दीन ख़िलजी|कबीर|भक्ति आन्दोलन}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुग़ल==&lt;br /&gt;
{{main|मुग़ल काल}}&lt;br /&gt;
दिल्ली की सल्तनत वास्तव में कमज़ोर थी, क्योंकि सुल्तानों ने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने का कोई प्रयास नहीं किया। वे धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त कट्टर थे और उन्होंने बलपूर्वक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया। इससे हिन्दू प्रजा उनसे कोई सहानुभूति नहीं रखती थी। इसक फलस्वरूप 1526 ई. में [[बाबर]] ने आसानी से दिल्ली की सल्तनत को उखाड़ फैंका। उसने [[पानीपत]] की  [[पानीपत युद्ध प्रथम |पहली लड़ाई]] में अन्तिम सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हरा दिया और [[मुग़ल वंश]] की प्रतिष्ठित किया, जिसने 1526 से 1858 ई. तक भारत पर शासन किया। तीसरा [[मुग़ल]] बादशाह [[अकबर]] असाधारण रूप से योग्य और दूरदर्शी शासक था। उसने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने की कोशिश की और विशेष रूप से युद्ध प्रिय राजपूत राजाओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। ''''''।&lt;br /&gt;
====बाबर (1526 - 1530)====&lt;br /&gt;
{{main|बाबर}}&lt;br /&gt;
[[मुग़ल वंश]] का संस्थापक &amp;quot;ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर&amp;quot; था। बाबर का पिता 'उमर शेख़ मिर्ज़ा', 'फ़रग़ना' का शासक था, जिसकी मृत्यु के बाद बाबर राज्य का वास्तविक अधिकारी बना। &lt;br /&gt;
====हुमायूँ (1530-1540 और 1555-1556)====&lt;br /&gt;
{{main|हुमायूँ}}&lt;br /&gt;
'नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ' का जन्म बाबर की पत्नी ‘माहम बेगम’ के गर्भ से 6 मार्च, 1508 ई. को [[काबुल]] में हुआ था। बाबर के 4 पुत्रों- हुमायूँ, कामरान, [[अस्करी]] और हिन्दाल में हुमायूँ सबसे बड़ा था। बाबर ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।&lt;br /&gt;
====शेरशाह सूरी====&lt;br /&gt;
{{main|शेरशाह सूरी}}&lt;br /&gt;
शेरशाह सूरी के बचपन का नाम 'फ़रीद ख़ाँ' था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर 1472 ई.) में अपने पिता 'हसन ख़ाँ' की [[अफ़ग़ान]] पत्‍नी से उत्पन्न था। उसका पिता हसन, [[बिहार]] के [[सासाराम]] का ज़मींदार था। &lt;br /&gt;
====अकबर (1556 1605)====&lt;br /&gt;
{{main|अकबर}}&lt;br /&gt;
अकबर महान ने धार्मिक सहिष्णुता तथा मेल-मिलाप की नीति बरती, हिन्दुओं पर से [[जज़िया]] उठा लिया और राज्य के ऊँचे पदों पर बिना भेदभाव के सिर्फ़ योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ कीं।&lt;br /&gt;
{{seealso|अकबरनामा|अबुल फ़ज़ल|तानसेन|बीरबल|रहीम|टोडरमल}}&lt;br /&gt;
====जहाँगीर (1605 - 1627)====&lt;br /&gt;
{{main|जहाँगीर}}&lt;br /&gt;
'नूरुद्दीन सलीम जहाँगीर' का जन्म [[फ़तेहपुर सीकरी]] में स्थित ‘शेख़ सलीम चिश्ती’ की कुटिया में राजा भारमल की बेटी ‘मरियम ज़मानी’ के गर्भ से 30 अगस्त, 1569 ई. को हुआ था। [[अकबर]] सलीम को ‘शेख़ू बाबा’ कहा करता था। सलीम का मुख्य शिक्षक [[रहीम|अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना]] था। &lt;br /&gt;
====शाहजहाँ (1627 - 1658)====&lt;br /&gt;
{{main|शाहजहाँ}}&lt;br /&gt;
शाहजहाँ का जन्म [[जोधपुर]] के शासक राजा उदयसिंह की पुत्री 'जगत गोसाई' (जोधाबाई) के गर्भ से [[5 जनवरी]], 1592 ई. को [[लाहौर]] में हुआ था। उसका बचपन का नाम ख़ुर्रम था। ख़ुर्रम [[जहाँगीर]] का छोटा पुत्र था, जो छल−बल से अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ था। &lt;br /&gt;
====औरंगज़ेब (1658 - 1707)====&lt;br /&gt;
{{main|औरंगज़ेब}}&lt;br /&gt;
'मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब' का जन्म 4 नवम्बर, 1618 ई. में [[उज्जैन]] के ‘दोहद’ नामक स्थान पर मुमताज़ के गर्भ से हुआ था। औरंगज़ेब के बचपन का अधिकांश समय [[नूरजहाँ]] के पास बीता था।&lt;br /&gt;
====बहादुर शाह ज़फ़र (1837- 1858)====&lt;br /&gt;
{{main|बहादुर शाह ज़फ़र}}&lt;br /&gt;
बहादुर शाह ज़फ़र का जन्म [[24 अक्तूबर]] सन् 1775 ई. को [[दिल्ली]] में हुआ था। बहादुर शाह ज़फ़र [[मुग़ल साम्राज्य]] के अंतिम बादशाह थे। इनका शासनकाल 1837-58 तक था। बहादुर शाह ज़फ़र एक कवि, संगीतकार व खुशनवीस थे और राजनीतिक नेता के बजाय सौंदर्यानुरागी व्यक्ति अधिक थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|हेमू|ताजमहल|फ़तेहपुर सीकरी|चित्रकला मुग़ल शैली}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आधुनिक काल==&lt;br /&gt;
====मराठा====&lt;br /&gt;
{{main|मराठा साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
राजपूतों और मुग़लों के योग से उसने अपना साम्राज्य [[कन्दहार]] से [[आसाम]] की सीमा तक तथा [[हिमालय]] की तलहटी से लेकर दक्षिण में [[अहमदनगर]] तक विस्तृत कर दिया। उसके पुत्र [[जहाँगीर]] जहाँ पौत्र [[शाहजहाँ]] के राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार जारी रहा। शाहजहाँ ने [[ताजमहल]] का निर्माण कराया, परन्तु कन्दहार उसके हाथ से निकल गया। अकबर के प्रपौत्र औरंगज़ेब के राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार अपने चरम शिखर पर पहुँच गया और कुछ काल के लिए सारा भारत उसके अंतर्गत हो गया। परन्तु [[औरंगज़ेब]] ने जान-बूझकर अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति त्याग दी और हिन्दुओं को अपने विरुद्ध कर लिया। उसने हिन्दुस्तान का शासन सिर्फ़ मुसलमानों के हित में चलाने की कोशिश की और हिन्दुओं को ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाने का असफल प्रयास किया। इससे राजपूताना, [[बुंदेलखण्ड]] तथा [[पंजाब]] के हिन्दू उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|शिवाजी|तानाजी|अहिल्याबाई होल्कर|जाटों का इतिहास|वास्को द गामा|अंग्रेज़|सिपाही क्रांति 1857}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====ईस्ट इंडिया कम्पनी====&lt;br /&gt;
{{main|ईस्ट इंडिया कम्पनी}}&lt;br /&gt;
अठारहवीं शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों की [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] ने बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) तथा कलकत्ता (कोलकाता) पर क़ब्ज़ा कर लिया। उधर फ्राँसीसियों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने [[माहे]], [[पुदुचेरी|पांडिचेरी]] तथा [[चंद्रानगर]] पर क़ब्ज़ा कर लिया। उन्हें अपनी सेनाओं में भारतीय सिपाहियों को भरती करने की भी इजाज़त मिल गयी। वे इन भारतीय सिपाहियों का उपयोग न केवल अपनी आपसी लड़ाइयों में करते थे बल्कि इस देश के राजाओं के विरुद्ध भी करते थे। इन राजाओं की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और कमज़ोरी ने इनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को जाग्रत कर दिया और उन्होंने कुछ देशी राजाओं के विरुद्ध दूसरे देशी राजाओं से संधियाँ कर लीं। 1744-49 ई. में मुग़ल बादशाह की प्रभुसत्ता की पूर्ण उपेक्षा करके उन्होंने आपस में [[कर्नाटक]] की दूसरी लड़ाई छेड़ी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|मैसूर युद्ध|टीपू सुल्तान|पानीपत युद्ध|रेग्युलेटिंग एक्ट|गवर्नर-जनरल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गवर्नर-जनरलों का समय====&lt;br /&gt;
{{Main|गवर्नर-जनरल}}&lt;br /&gt;
कम्पनी के शासन काल में भारत का प्रशासन एक के बाद एक बाईस [[गवर्नर-जनरल|गवर्नर-जनरलों]] के हाथों में रहा। इस काल के भारतीय इतिहास की सबसे उल्लेखनीय घटना यह है कि कम्पनी युद्ध तथा कूटनीति के द्वारा भारत में अपने साम्राज्य का उत्तरोत्तर विस्तार करती रही। [[मैसूर]] के साथ [[मैसूर युद्ध|चार लड़ाइयाँ]], मराठों के साथ तीन, बर्मा ([[म्यांमार]]) तथा [[सिख|सिखों]] के साथ दो-दो लड़ाइयाँ तथा सिंध के अमीरों, गोरखों तथा [[अफ़ग़ानिस्तान]] के साथ एक-एक लड़ाई छेड़ी गयी। इनमें से प्रत्येक लड़ाई में कम्पनी को एक या दूसरे देशी राजा की मदद मिली। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====प्रथम स्वतंत्रता संग्राम====&lt;br /&gt;
{{Main|प्रथम स्वतंत्रता संग्राम}}&lt;br /&gt;
इस काल में [[सती प्रथा]] का अन्त कर देने के समान कुछ सामाजिक सुधार के भी कार्य किये गये। [[राजा राममोहन राय]] ने [[सती प्रथा]] जैसी अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण [[लॉर्ड विलियम बैंटिक]] 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सका। अंग्रेज़ी के माध्यम से पश्चिम शिक्षा के प्रसार की दिशा में क़दम उठाये गये, अंग्रेज़ी देश की राजभाषा बना दी गयी, सारे देश में समान ज़ाब्ता दीवानी और ज़ाब्ता फ़ौजदारी क़ानून लागू कर दिया गया, परन्तु शासन स्वेच्छाचारी बना रहा और वह पूरी तरह अंग्रेज़ों के हाथों में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|तात्या टोपे|राजा राममोहन राय|सती प्रथा|भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====असहयोग और सत्याग्रह====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|असहयोग आंदोलन}}&lt;br /&gt;
[[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] के कुछ सुधारों से पुराने कांग्रेसजन संतुष्ट हो गये, परन्तु नव युवकों का दल, जिसे [[मोहनदास करमचंद गाँधी]] के रूप में एक नया नेता मिल गया था, संतुष्ट नहीं हुआ। इन सुधारों के अंतर्गत केन्द्रीय कार्यपालिका को केन्द्रीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया गया था और वाइसराय को बहुत अधिक अधिकार प्रदान कर दिये गये थे। अतएव उसने इन सुधारों को अस्वीकृत कर दिया। उसके मन में जो आशंकाएँ थीं, वे ग़लत नहीं थी, यह 1919 के एक्ट के बाद ही पास किये गये [[रौलट एक्ट]] जैसे दमनकारी क़ानूनों तथा [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकांण्ड जैसे दमनमूलक कार्यों से सिद्ध हो गया। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक में [[ऊधमसिंह]] ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। [[चंद्रशेखर आज़ाद]], [[राजगुरु]], [[सुखदेव]] और [[भगतसिंह]] जैसे महान क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए। कांग्रेस ने 1920 ई. में अपने नागपुर अधिवेशन में अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य की स्थापना घोषित कर दी और अपनी माँगों को मनवाने के लिए उसने अहिंसक असहयोंग की नीति अपनायी। चूंकि ब्रिटिश सरकार ने उसकी माँगें स्वीकार नहीं की और दमनकारी नीति के द्वारा वह [[असहयोग आंदोलन]] को दबा देने में सफल हो गयी। इसलिए कांग्रेस ने दिसम्बर 1929 ई. में लाहौर अधिवेशन में अपना लक्ष्य पूर्ण स्वीधीनता निश्चित किया और अपनी माँग का मनवाने के लिए उसने 1930 में [[नमक सत्याग्रह]] आंदोलन शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भारत का विभाजन====&lt;br /&gt;
{{Main|भारत का विभाजन}}&lt;br /&gt;
कुछ ब्रिटिश अफ़सरों ने भारत को स्वाधीन होने से रोकने के लिए अंतिम दुर्राभ संधि की और [[मुसलमान|मुसलमानों]] के लिये भारत विभाजन करके [[पाकिस्तान]] की स्थापना की माँग का समर्थन करना शुरू कर दिया। इसके फलस्वरूप अगस्त 1946 ई. में सारे देश में भयानक सम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये, जिन्हें वाइसराय [[लॉर्ड वेवेल]] अपने समस्त फ़ौजी अनुभवों तथा साधनों बावजूद रोकन में असफल रहा। यह अनुभव किया गया कि भारत का प्रशासन ऐसी सरकार के द्वारा चलाना सम्भव नहीं है। जिसका नियंत्रण मुख्य रूप से [[अंग्रेज़|अंग्रेजों]] के हाथों में हो। अतएव सितम्बर 1946 ई. में लॉर्ड वेवेल ने [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] के नेतृत्व में भारतीय नेताओं की एक अंतरिम सरकार गठित की। ब्रिटिश अधिकारियों की कृपापात्र होने के कारण [[मुस्लिम लीग]] के दिमाग़ काफ़ी ऊँचे हो गये थे। उसने पहले तो एक महीने तक अंतरिम सरकार से अपने को अलग रखा, इसके बाद वह भी उसमें सम्मिलित हो गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|भारत का इतिहास (तिथि क्रम)|सरदार पटेल|महात्मा गाँधी}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक3&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राज्यों का इतिहास}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
{{प्रांगण लेख इतिहास}}&lt;br /&gt;
*[http://www.shangrilagifts.org/hp/indus.html  Comparison of Indus Valley Harappan]&lt;br /&gt;
*[http://ancientscripts.com/indus.html  Indus Script]&lt;br /&gt;
*[http://vimitihas.wordpress.com/2008/08/16/sindhu_sabhyata सिंधुघाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/content/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%83-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%81-%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE  विलुप्त होती सिन्धु घाटी की सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/node/20398 सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://incredible-india.biz/hn/history/ivc सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>वार्ता:कुल्ली संस्कृति</title>
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		<updated>2012-02-08T11:19:09Z</updated>

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		<title>कुल्ली संस्कृति</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=252206"/>
		<updated>2012-02-08T11:18:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: '{{पुनरीक्षण}} '''कुल्ली संस्कृति''' दक्षिण बलूचिस्तान ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''कुल्ली संस्कृति''' दक्षिण [[बलूचिस्तान]] की ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति और तत्युगीन मृद्भाण्ड शैली थी, इसका सर्वप्रथम [[उत्खनन]] ''सर ओरेल स्टाइन'' ने करवाया था। &lt;br /&gt;
*कुल्ली संस्कृति के चाक निर्मित मृद्भाण्ड मुख्यतः [[पीला रंग|पीले रंग]] के हैं, जिन पर [[काला रंग|काले रंग]] से विशेष प्रकार की चित्र रचना की गई है। &lt;br /&gt;
*इन पर लंबे आकार के कूबड़ वाले बैल बने हैं, जिनके ऊपर गोलाकार एवं ज्यामितिक आकृतियों के नीचे बकरों की लघु आकृतियाँ बनी हैं। &lt;br /&gt;
*वृषभ तथा नारी की मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं। &lt;br /&gt;
*कुल्ली के लोग अपने मृतकों का सामान्यतः दाह संस्कार करते थे- यह प्रथा नाल तथा हड़प्पाई मृतक संस्कारों से बिल्कुल विपरीत थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:पुरातत्त्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्राचीन संस्कृति]]&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना जनवरी-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A1%E0%A4%AB%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF)&amp;diff=252203</id>
		<title>डफला (जाति)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A1%E0%A4%AB%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF)&amp;diff=252203"/>
		<updated>2012-02-08T10:57:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''डफला जाति''' के लोग बंगनी भी कहलाते हैं, पूर्वी [[भूटान]] और [[अरुणाचल प्रदेश]] (भूतपूर्व नॉर्थ-ईस्ट फ़्रंटियर एजेंसी, नेफ़ा) के जनजातीय लोग है। &lt;br /&gt;
*ये लोग चीनी-तिब्बती परिवार की तिब्बती-बर्मी [[भाषा]] बोलते हैं। &lt;br /&gt;
*डफला अपना भरण-पोषण झूम खेती, शिकार और [[मछली]] मारकर करते हैं। &lt;br /&gt;
*ये 900 से 1,800 मीटर की ऊँचाई पर बल्लियों पर बने मकानों में रहते हैं। &lt;br /&gt;
*वंश का निर्धारण पैतृक आधार पर किया जाता है, जो 60 या 70 लोगों का एक कुटुंब होता है। &lt;br /&gt;
*यह कुटुंब एक लंबे घर में एक साथ रहता है, जिसमें विभाजित खंड नहीं होते, लेकिन प्रत्येक दंपति के परिवार के लिए एक अलग चूल्हा होता है। &lt;br /&gt;
*इस परंपरागत पितृगृह के अलावा कोई औपचारिक सामाजिक संगठन अथवा ग्राम सरकार नहीं होती। &lt;br /&gt;
*इनके [[धर्म]] में प्रकृति से जुड़ी पवित्र आत्माओं में विश्वास सम्मिलित है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जातियाँ और जन जातियाँ}}{{विदेशी जातियाँ}}{{प्राचीन कुल और क़बीले}}&lt;br /&gt;
[[Category:अरुणाचल प्रदेश]][[Category:जातियाँ और जन जातियाँ]][[Category:विदेशी जातियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
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		<title>ढेबर झील</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A2%E0%A5%87%E0%A4%AC%E0%A4%B0_%E0%A4%9D%E0%A5%80%E0%A4%B2&amp;diff=252202"/>
		<updated>2012-02-08T10:54:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा झील&lt;br /&gt;
|चित्र=Dhebar-Lake.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=ढेबर झील, उदयपुर&lt;br /&gt;
|नाम=ढेबर झील&lt;br /&gt;
|प्रकार=&lt;br /&gt;
|देश=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|राज्य=[[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|नगर= [[उदयपुर]]&lt;br /&gt;
|निर्देशांक=[http://maps.google.com/maps?q=24.266667,74&amp;amp;ll=24.277012,73.917389&amp;amp;spn=0.587112,0.883026&amp;amp;t=m&amp;amp;z=10 उत्तर - 24°16′ ; पूर्व - 74°00]&lt;br /&gt;
|अधिकतम लंबाई=9 मील (लगभग) &lt;br /&gt;
|अधिकतम गहराई=102 फ़ीट (लगभग) &lt;br /&gt;
|अधिकतम चौड़ाई= &lt;br /&gt;
|सतह की ऊँचाई=&lt;br /&gt;
|जल क्षमता=&lt;br /&gt;
|जल का ठहराव समय=&lt;br /&gt;
|गूगल मानचित्र=[http://maps.google.co.in/maps?q=Dhebar+Lake&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=24.337087,73.920135&amp;amp;spn=0.586834,0.883026&amp;amp;oe=utf-8&amp;amp;client=firefox-a&amp;amp;hnear=Jaisamand+Lake&amp;amp;t=m&amp;amp;z=10 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1= &lt;br /&gt;
|पाठ 1= &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2= &lt;br /&gt;
|पाठ 2= &lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=ढेबर झील को जयसमंद झील के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ= &lt;br /&gt;
|अद्यतन= {{अद्यतन|16:24, 8 फ़रवरी 2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''ढेबर झील''' या '''जयसमंद झील''' पश्चिमोत्तर [[भारत]] के दक्षिण-मध्य [[राजस्थान]] राज्य के [[अरावली पर्वतमाला]] के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक विशाल जलाशय है। &lt;br /&gt;
*ढेबर झील पूरी तरह से भरी होती है, तो इसका क्षेत्रफल लगभग 50 वर्ग किमी होता है। &lt;br /&gt;
*ढेबर झील का मूल नाम जय समंद था और यह 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में [[गोमती नदी]] के आर-पार बने एक संगमरमर के बांध द्वारा निर्मित है। &lt;br /&gt;
*पश्चिमी क्षेत्र में स्थित गांवों तक झील से नहरों द्वारा पानी ले जाया जाता है, जहाँ तट पर मछुआरों के गाँव बसे हुए हैं। &lt;br /&gt;
*दक्षिण की ओर स्थित पहाड़ियों पर दो महल खड़े हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Dhebar-Lake.jpg|thumb|250px|left|ढेबर झील, [[उदयपुर]]]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान की झीलें}}&lt;br /&gt;
{{भारत की झीलें}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान की झीलें]][[Category:भारत की झीलें]][[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Dhebar-Lake-1.jpg&amp;diff=252191</id>
		<title>चित्र:Dhebar-Lake-1.jpg</title>
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		<updated>2012-02-08T10:41:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[ढेबर झील]], [[उदयपुर]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/ganuullu/ Ankur Dave]&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<updated>2012-02-08T10:37:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[ढेबर झील]], [[उदयपुर]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/ganuullu/ Ankur Dave]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/ganuullu/6604660709 Dhebar Lake]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
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|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/ganuullu/ ganuullu's photostream]&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=ढेबर झील पश्चिमोत्तर [[भारत]] के दक्षिण-मध्य [[राजस्थान]] राज्य के [[अरावली पर्वतमाला]] के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक विशाल जलाशय है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}}&lt;br /&gt;
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|No Derivative Works={{No Derivative Works}} &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>Dhebar Lake</title>
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		<updated>2012-02-08T10:29:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: ढेबर झील को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[ढेबर झील]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>चित्र:Dhebar-Lake.jpg</title>
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		<updated>2012-02-08T10:27:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>गंगानगर</title>
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		<updated>2012-02-08T10:19:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''गंगानगर''' भूतपूर्व श्रीगंगानगर शहर, सुदूर उत्तरी [[राजस्थान]] राज्य, पश्चिमोत्तर [[भारत]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
==कृषि और खनिज==&lt;br /&gt;
[[1970]] के दशम में यह एक [[कृषि]] वितरण केंद्र के रूप में तेज़ी से विकसित हुआ। इस शहर में [[वस्त्र]], चीनी और [[चावल]] की मिलें हैं। &lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
यहाँ एक मौसम विज्ञान केंद्र तथा राजस्थान विश्वविद्यालय से संबद्ध कई महाविद्यालय हैं। &lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
2001 की जनगणना के अनुसार गंगानगर शहर की कुल जनसंख्या 2,10,788 है; और [[गंगानगर ज़िला|गंगानगर ज़िले]] की कुल जनसंख्या 17,88,427 है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान के नगर]][[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
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		<title>घटम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A4%9F%E0%A4%AE&amp;diff=252162"/>
		<updated>2012-02-08T10:17:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''घटम''' एक भारतीय संगीत [[वाद्य यंत्र|वाद्य]] है। यह मूलत: एक विशेष प्रकार की [[मिट्टी]] से और बड़ी सावधानी से पकाकर बनाया गया पात्र होता है। &lt;br /&gt;
*घटम का उपयोग आमतौर पर लोकसंगीत में होता है, किंतु अब यह [[कर्नाटक]] संगीत में भी लोकप्रिय हो गया है। &lt;br /&gt;
*कर्नाटक संगीत में वादक घटम को अपने पेट पर औंधा रखकर अंगुलियों और हथेलियों से बजाता है। &lt;br /&gt;
*[[कश्मीर]] में इस [[वाद्य यंत्र|वाद्य]] को नूत कहा जाता है और इसे सीधा रखकर ही बजाया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=252158</id>
		<title>टीटागढ़</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=252158"/>
		<updated>2012-02-08T10:14:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''टीटागढ़''', [[उत्तरी चौबीस परगना ज़िला]], दक्षिण-पश्चिम [[पश्चिम बंगाल]] राज्य, पूर्वोत्तर [[भारत]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
*टीटागढ़ [[हुगली नदी]] के ठीक पूर्व में स्थित है और [[कोलकाता]] (भूतपूर्व कलकत्ता) महानगरीय ज़िले के भीतर कोलकाता शहरी संकेंद्रण का हिस्सा है। &lt;br /&gt;
*टीटागढ़ शहर कभी यूरोपीय लोगों का आधुनिक निवास स्थल था। &lt;br /&gt;
*[[1895]] में [[बैरकपुर]] नगरपालिका से अलग कर टीटागढ़ का नगरपालिका के रूप में गठन किया गया। &lt;br /&gt;
*कोलकाता से रेल व सड़क मार्ग से जुड़े इस शहर में [[जूट]] व [[काग़ज़]] की मिलें हैं और यहाँ काँच एवं वस्त्रोद्योग से संबंधित मशीनों का निर्माण तथा [[चाय]] प्रसंस्करण होता है। &lt;br /&gt;
*2001 की जनगणना की अनुसार टीटागढ़ शहर की कुल जनसंख्या 1,24,198 है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पश्चिम बंगाल के नगर}}&lt;br /&gt;
[[Category:पश्चिम बंगाल]][[Category:पश्चिम बंगाल के नगर]][[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=252149</id>
		<title>परिवार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=252149"/>
		<updated>2012-02-08T10:06:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__मुख्यत: परिवार के अंतर्गत पति, पत्नी और उनके बच्चों का समूह माना जाता है, परंतु विश्व के अधिकांश भागों में परिवार का अर्थ एक सम्मिलित रूप से निवास करने वाले रक्त संबंधियों का वह समूह है जिसमें [[विवाह]] और दत्तक प्रथा (गोद लेने) द्वारा परिवार की स्वीकृति प्राप्त व्यक्ति भी सम्मिलित होते हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Family.jpg|thumb|450px]]&lt;br /&gt;
'मानव समाज में परिवार एक बुनियादी तथा सार्वभौमिक इकाई है। यह सामाजिक जीवन की निरंतरता, एकता एवं विकास के लिए आवश्यक प्रकार्य करता है। अधिकांश पारंपरिक समाजों में परिवार सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक गतिविधियों एवं संगठनों की इकाई रही है। आधुनिक औद्योगिक समाज में परिवार प्राथमिक रूप से संतानोंत्पत्ति, सामाजीकरण एवं भावनात्मक संतोष की व्यवस्था से संबंधित प्रकार्य करता है।'&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.brandbihar.com/hindi/literature/amit_sharma/bharat_parivar.html|title=भारत में परिवार|accessmonthday=[[22 अप्रॅल]]|accessyear=2011|last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल|publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
==संस्कार और संस्कृति का हस्तांतरण== &lt;br /&gt;
विश्व के सभी समाजों में शिशु का जन्म और पालन पोषण का उत्तरदायित्व परिवार का ही होता है। शिशुओं को संस्कार देने और समाज के आचार, व्यवहार और नियमों में दीक्षित करने का दायित्व मुख्यत: परिवार का ही होता है। इसी परम्परा और नियम के द्वारा समाज की सांस्कृतिक विरासत और संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वभाविक रूप से हस्तांतरित होती रहती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'भारत में ख़ासकर गांवों में परिवार बड़े हैं। लेकिन शहरों में परिवार छोटे हैं।शहरों में बच्चे को मां बाप के साथ छोटे से मकान में रहना पड़ता है। कुछ परिवारों में बच्चा अपने [[चाचा]], [[चाची]], [[मां]], [[पिता]] के साथ रहता है। परन्तु इन सभी परिवारों में मां बच्चे के बीच सबसे अधिक नजदीकी रिश्ता है। बच्चे के विकास में भी मां की ही सबसे ज़्यादा बड़ी भूमिका रहती है। बच्चा पैदा होने के बाद से मां के आंचल में रहते हुये भी सीखना शुरू कर देता है।मां की लोरियां उसे सिर्फ़ सुलाती ही नहीं उसके अन्दर प्रारंभ से ही सुनने,ध्यान देने और समझने की क्षमता भी विकसित करती हैं। दूसरी ओर मां-पिता या बाबा-[[दादी]], [[नाना]]-[[नानी]] द्वारा सुनायी गयी कहानियां उसका नैतिक,चारित्रिक विकास करने के साथ ही उसके अंदर मानवीय मूल्यों की नींव भी डालती हैं। इसीलिये मां को '''पहली शिक्षक''' भी कहा जाता है।' &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://knol.google.com/k/%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B5-%E0%A4%B0-%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A4%9A-%E0%A4%9A#|title=परिवार में बच्चा|accessmonthday=[[22 अप्रॅल]]|accessyear=[[2011]]|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार का आधार== &lt;br /&gt;
परिवार के सदस्यों की सामाजिक मर्यादा और सीमा परिवार से ही निर्धारित होती है। नर नारी के यौन संबंधों का आधार  मुख्यत: परिवार के अंतर्गत परिवार की सीमा में निहित होता है। वर्तमान में औद्योगिक सभ्यता से उत्पन्न जनसंकुल समाज और नगर को यदि इसके अंतर्गत ना लेकर छोड़ दिया जाए तो व्यक्ति का परिचय मुख्यत: उसके परिवार और कुल पर आधारित ही होता है। &lt;br /&gt;
==परिवार के प्रकार==&lt;br /&gt;
विश्व के विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न कालों में रचना, आकार, संबंध, और कार्य की दृष्टि से परिवार के अनेक भेद किये हैं, परंतु परिवार के उपर्युक्त कार्य सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सनातन हैं। परिवार में देश, [[काल]], प्रथा और परिस्थिति के कारण एक या एक से अधिक पीढ़ियों का, एक या एक से अधिक दंपतियों (पति-पत्नियों) का समूह होना संभव है। किसी भी परिवार के सदस्य एक निश्चित पारिवारिक अनुशासन व्यवस्था के अंतर्गत पति - पत्नी, भाई - बहन, [[दादा]] (पितामह) - पोता ([[पौत्र]]), चाचा - [[भतीजा]], सास - [[पुत्रवधु]] जैसे अनेक संबंधों में बंधा रहता है जिसमें कर्तव्यों एवं अधिकारों से परस्पर बद्ध, अन्य दूसरे सामाजिक समूहों से अलग एक अभिन्न और घनिष्टतम अंतरंग समूह के रूप में एक साथ रहते हैं। &lt;br /&gt;
==परिवार में कार्यविभाजन== &lt;br /&gt;
परिवार के अंतर्गत स्त्री और पुरुष के मध्य कार्य का विभाजन भी सदैव से निश्चित, पारम्परिक और सार्वकालिक है। स्त्रियों का अधिकांश समय सामान्यत: घर में ही व्यतीत  होता है। परिवार के सदस्यों का भोजन बनाना, शिशुओं की देखभाल और पालन पोषण, घर की स्वच्छ्ता का ध्यान रखना, वस्त्रों की सिलाई आदि अनेक ऐसे काम हैं जो परिवार की स्त्री के लिए  होते हैं। पुरुष के लिए हमेशा से बाहरी कार्य और अधिक श्रमसाध्य कार्य निश्चित हैं -  जैसे खेती, व्यापार, उद्योग, पशुओं का पालन, शिकार और युद्ध आदि। परंतु स्त्री पुरुष का यह कार्य विभाजन सब समाजों में समान नहीं है। इसके लिए कोई सामान्य सूची भी बनाना बहुत ही कठिन है क्योंकि कुछ समाजों में स्त्रियाँ भी खेती और शिकार जैसे पुरुषों के कार्यों में समान रूप से भाग लेती हैं।&lt;br /&gt;
==परिवार संस्था का विकास== &lt;br /&gt;
विवाह का परिवार के स्वरूपों से गहन संबंध है। 'लेविस मार्गन' जैसे विकासवादियों का मत है कि मानव समाज की प्रारंभिक अवस्था में विवाह प्रथा प्रचलित नहीं थी और समाज में पूर्ण कामाचार का प्रचलन था। इसके बाद समय के साथ साथ धीरे धीरे सामाजिक विकास के क्रम में 'यूथ विवाह', जिसमें कई पुरुषों और कई स्त्रियों का सामूहिक रूप से पति पत्नी होना), 'बहुपति' विवाह, 'बहुपत्नी' विवाह और 'एक पत्नी' या 'एक पति' की व्यवस्था समाज में विकसित हुई। वस्तुत: 'बहुविवाह' और 'एकपत्नी' की प्रथा असभ्य एवम सभ्य दोनों ही समाजों में पाई जाती है। अत: यह मत सुसंत प्रतीत नहीं होता। मानव शिशु के पालन पोषण के लिए एक दीर्घ अवधि अपेक्षित है। पहले शिशु की बाल्यावस्था में ही दूसरे अन्य छोटे शिशु  उत्पन्न होते रहते हैं। गर्भावस्था और प्रसूति के समय में माता की देख-रेख का होना आवश्यक है। पशुओं की भाँति मनुष्य में रति की कोई विशेष ऋतु निश्चित नहीं है। अत: संभावना है कि मानव समाज के आरंभ में या तो पूरा समुदाय ही या केवल पति पत्नी और शिशुओं का समूह ही परिवार कहलाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार का स्वरूप==&lt;br /&gt;
मानव सम्बंधों पर कार्य कर रहे वैज्ञानिकों को कोई ऐसा समाज नहीं मिला जहाँ विवाह के संबंध परिवार में ही होते हों, इस कारण से परिवार चाहे पितृसत्तात्मक हों या मातृसत्तात्मक, परिवार में पत्नी या पति को अतिरिक्त सदस्यता प्रदान की ही जाती है। युगल परिवार या एकाकी परिवार में पति और पत्नी मिलकर अपनी पृथक घर - गृहस्थी स्थापित करते हैं, परंतु अधिकांशत: समाजों में परिवार 'बृहत्तर कौटुंबिक समूह' का अंग ही माना जाता है और जीवन के विभिन्न प्रसंगों में परिवार के सदस्यों पर घनिष्ट संबध के अतिरिक्त 'बृहत्तर कौटुबिक समूह' का भी नियंत्रण होता है। [[अमेरिका]] जैसे उद्योग प्रधान देशों में कुटुंबियों के सम्मिलित एवं बड़े परिवार के स्थान पर युगल परिवार या एकल की बहुलता हो गई है। अमेरिका का समाज पितृसत्तात्मक है, किंतु वहाँ का युगल परिवार किसी एक 'बृहत्तर कुटुंब' का अंग नहीं माना जाता। एकल या युगल परिवार में पति पत्नी और उनके अविवाहित शिशु सम्मिलित माने जाते हैं। सम्मिलित परिवारों में इनके अतिरिक्त विवाहित बच्चे और उनकी संतान, विवाहित भाई अथवा बहन और उनके बच्चे एक साथ रह सकते हैं। सम्मिलित परिवार में रक्त संबंधियों की मान्यता भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न है। [[भारत]] में एक सम्मिलित परिवार में साधारणत: 10 से लेकर 12 तक सदस्य होते हैं, किंतु कुछ परिवारों में सदस्यों की संख्या 50 - 60  या 100 तक भी होती है। 'समाज के कई बड़े संयुक्त परिवारों से मिलने पर एक बात सामने आई कि इन परिवारों में व्यक्ति से ज़्यादा अहमियत परिवार की होती है। वहां व्यक्तिगत पहचान कोई मुद्दा नहीं होता। परिवार में कुछ बंदिशें होती हैं, जिनका परिवार के सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से पालन करना पड़ता है। समाजशास्त्री मानते हैं कि बडे़ संयुक्त परिवारों को सही ढंग से चलाने के लिए लोगों को खुद से ज़्यादा परिवार को महत्त्वपूर्ण मानना पड़ता है।'&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://rinkusharma88.wordpress.com/2009/08/24/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ |title=परिवार में बदलाव की बयार |accessmonthday=[[22 अप्रॅल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[विवाह]], वंशावली, स्वामित्व और शासनाधिकार के विभिन्न रूपों के आधार पर परिवारों के विभिन्न रूप और प्रकार हो जाते हैं।  &lt;br /&gt;
==मातृसत्तात्मक परिवार==&lt;br /&gt;
मातृस्थानीय परिवार में पति अपनी पत्नी के घर का स्थायी या अस्थायी सदस्य बनता है, मातृस्थानीय परिवार साधारणत: मातृवंशीय होते हैं। बहुधा परिवार की संपत्ति का स्वामित्व मातृस्थानीय परिवार में नारी को प्राप्त है। मातृसत्तात्मक परिवारों में मामा या माता का अन्य सबसे बड़ा रक्तसंबंधी (पुरुष) घर का मुखिया होता है।&lt;br /&gt;
==पितृसत्तात्मक परिवार==&lt;br /&gt;
पितृस्थानीय परिवार में पत्नी पति के घर जाकर रहती है। पितृस्थानीय परिवार पितृवंशीय होते हैं। बहुधा परिवार की संपत्ति का स्वामित्व पितृस्थानीय परिवार में पुरुष को प्राप्त है। पितृसत्तात्मक  परिवारों में साधारणत: पिता अथवा घर का सबसे बड़ा पुरुष घर का मुखिया होता है।&lt;br /&gt;
==संपत्ति का उत्तराधिकारी== &lt;br /&gt;
प्राय: संपत्ति का उत्तराधिकारी परिवार की ज्येष्ठ संतान होती है। परंतु यह आवश्यक नियम नहीं है। भारत की गारो जैसी जनजाति में सबसे छोटी लड़की ही पारिवारिक संपत्ति की स्वामिनी होती है। अनेक समाजों में परिवार के सभी स्त्री या पुरुष सदस्यों में स्वमित्व निहित रहता है और कुछ परिवारों में पुरुष तथा स्त्री दोनों को संपत्ति का समान उत्तराधिकार प्राप्त है। परिवार का शासन अधिकांशत: समाजों में पुरुषों के पास होता है। अंतर बस इतना ही  है कि पितृसत्तात्मक  परिवारों में साधारणत: पिता अथवा घर का सबसे बड़ा पुरुष और मातृसत्तात्मक परिवारों में मामा या माता का अन्य सबसे बड़ा रक्तसंबंधी (पुरुष) घर का मुखिया होता है। अत: संसार के अधिकांश भागों के समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है।&lt;br /&gt;
==परिवार का प्रचलित स्वरूप==&lt;br /&gt;
विश्व में दांपत्य जीवन में प्राय: 'एकपत्नी' परिवार ही सबसे अधिक प्रचलित है, किंतु अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट प्राप्त है। इसके विपरीत [[टोडा जनजाति|टोडा]] और खस जनजातियों में और [[तिब्बत]] के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा, एक प्रकार के यूथ विवाह की प्रथा आज भी प्रचलित है। इसी प्रकार [[भारत]] में [[खासी जाति|खासी]], गारो और [[अमरीका]] में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव==&lt;br /&gt;
आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन आये हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्त्वपूर्ण, मौलिक और संगठित संस्था थी। जीवन के अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से ही संपन्न होते थे। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं रह गयी है, कार्य विभक्त हो गये हैं, जैसे - बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है, भोजन व रसोई का कार्य व्यावसायिक भोजनालयों, जलपानगृहों में चला गया है। मनोरंजन के लिए पृथक संगठन स्थापित हो गए हैं, सामाजिक सुरक्षा का उत्तरदायित्व राज्य के पास चला गया और धर्म के घटते हुए प्रभाव के कारण धार्मिक कृत्यों का स्थान गौण को गया है। पति - पत्नी का अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत होता है। फिर भी परिवार बना हुआ है और उसके द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं, जो परिवार का 'स्थायी' या 'अवशिष्ट कार्य'  कहलाता है।&lt;br /&gt;
==कबीलाई परिवार==&lt;br /&gt;
जनजातियों में, जो सामाजिक विकास क्रम में आदिम अवस्था के अधिक निकट हैं, विवाह और परिवार के लगभग सभी रूप मिलते हैं। इन परिवारों में विकास के क्रम के आधार से पूर्वापर क्रम निर्धारित करना संभव नहीं है। कंदमूल और शिकार पर बसर करनेवाले अंडमानी आदिमवासियों में एकपत्नीत्व का नियम है और वे पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय हैं। उत्तरी अमरीका के खेतिहर होपी कबीले में एकपत्नीत्व या एकपतित्व की प्रथा है किंतु वे मातृवंशीय और मातृस्थानीय है। अधिकांश जनजातीयों में परिवार का संयुक्त रूप है, परंतु जहाँ पति पत्नी अलग घर में रहते हैं, वे भी एक बृहत्तर परिवार का ही अंग होते हैं और इस परिवार की सम्मिलित सम्पत्ति, आर्थिक क्रियाओं, धार्मिक कृत्यों तथा अनेक परिवारिक अधिकारों एवं कर्तव्यों आदि से जुड़ी एक पृथक इकाई भी होती है। वंशावली के दो प्रकारों में से कोई कबीला या जनजाती या तो पितृवंशीय होती है या मातृवंशीय। जो कबीले मातृवंशीय हैं वे प्राय: मातृस्थानीय भी हैं, जहाँ पति परिवार का स्थायी या अस्थायी सदस्य होता है। &lt;br /&gt;
==कबीलों में नारी का स्थान== &lt;br /&gt;
गारो कबीले में तो वह आगंतुक मात्र है, जो रात भर का मेहमान होता है। किंतु मातृवंशीय और मातृस्थानीय कबीले बहुत कम हैं। बहुपतित्व कबीले तो और भी कम हैं। पितृवंशीय कबीलों में ही बहुपति प्रथा पाई गई है और इनमें नारी का स्थान  पुरुष की अपेक्षा हीन है। पितृस्थानीय कबीलों में पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने की प्राय: अनुमति है, किंतु ऐसा बहुत कम होता है। विशिष्ट तथा शक्तिशाली व्यक्ति ही ऐसा कर पाते हैं। ऐसी अवस्था में पत्नियाँ एक घर में भी रहती हैं और पास पास बने अलग अलग घरों में भी। यूथ विवाह अपने शुद्ध रूप में किसी भी कबीले में नहीं मिलता। जौनसार बाबर में भ्रातुक बहुपति प्रथा है। वहाँ सगे भाई कभी कभी एक से अधिक पत्नियाँ रख लेते हैं और वे सब भाइयों की सामूहिक पत्नियाँ होती हैं, जो एक गृहस्थी तथा परिवार का अंग होती हैं। &lt;br /&gt;
==शक्तिशाली वर्ग पुरुष== &lt;br /&gt;
मातृवंशीय और मातृस्थानीय कबीलों में भी शासक व शक्तिशाली वर्ग पुरुष ही है, किंतु नारी के अधिकारों तथा प्रतिष्ठा की दृष्टि से पितृवंशीय और पितृस्थानीय कबीलों की अपेक्षा इन कबीलों में नारी की स्थिति प्राय: अच्छी है। कई पितृवंशीय कबीलों में भी नर और नारी का महत्व समान ही है, किंतु अधिकांश कबीलों में पुरुष की अपेक्षा उसका महत्व कम है। &lt;br /&gt;
==विवाह विच्छेद और पुनर्विवाह==&lt;br /&gt;
कबीलों में विवाह विच्छेद और पुनर्विवाह का पुराना नियम है और इस संबंध से स्त्री और पुरुष को प्राय: समान अधिकार हैं। वास्तव में अधिकांश कबीले पितृवंशीय हैं और नारी को विवाह के बाद पुरुष के परिवार, कुटुंब और बस्ती में जाना पड़ता है, जहाँ पति के माता, पिता, भाई तथा अन्य रक्त संबंधी और मित्र होते हैं। वहाँ उसे पति के परिवार का अंग बनकर परिवार के बड़े लोगों के अनुशासन में रहना होता है और पति के कुलाचार का पालन करना होता है। विवाह विच्छेद की अवस्था में नारी को अपने माता पिता की शरण लेनी पड़ती है। मातृस्थानीय कबीलों में परिवार अधिक स्थायी दिखाई देता  है। यह रक्त संबंधियों का एक नैसर्गिक समूह जान पड़ता है। बहुत कम कबीले ऐसे हैं जहाँ लड़के या लड़कियों के लिए  विवाह के पूर्व ब्रह्मचर्य पालन का नियम हो। कुछ कबीलों में विवाह के पूर्व परीक्षण काल की व्यवस्था भी पायी जाती है। जौनसार बाबर के खसों में अभ्यागतों के स्वागत में परिवार की अविवाहित लड़कियों को संभोग के लिए प्रस्तुत करने की प्रथा है। इससे यह स्पष्ट है कि परिवार का अस्तित्व नर नारी की वासना तृप्ति के लिए नहीं, वरन परिवार द्वारा उसे मर्यादित किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारतीय परिवार==&lt;br /&gt;
भारत मुख्यत: एक [[कृषि]] प्रधान देश है। यहाँ की पारिवारिक रचना कृषि की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गयी है। इसके अतिरिक्त भारतीय परिवार में परिवार की मर्यादा और आदर्श परंपरागत है। विश्व के किसी अन्य समाज़ में गृहस्थ जीवन की इतनी पवित्रता, स्थायीपन, और पिता - पुत्र, भाई - भाई और पति - पत्नी के इतने अधिक व स्थायी संबंधों का उदाहरण प्राप्त नहीं होता। &lt;br /&gt;
विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों, जातियों में सम्पत्ति के अधिकार, विवाह और विवाह विच्छेद आदि की प्रथा की दृष्टि से अनेक भेद पाए जाते हैं, किंतु फिर भी 'संयुक्त परिवार' का आदर्श सर्वमान्य है। संयुक्त परिवार में संबंधी  पति - पत्नी, उनकी अविवाहित संतानों के अति रिक्त अधिक व्यापक होता है। अधिकतर परिवार में तीन पीढ़ियों और कभी कभी इससे भी अधिक पीढ़ियों के व्यक्ति एक ही घर में, अनुशासन में और एक ही रसोईघर से संबंध रखते हुए सम्मिलित संपत्ति का उपभोग करते हैं और एक साथ ही परिवार के धार्मिक कृत्यों तथा संस्कारों में भाग लेते हैं। मुसलमानों और ईसाइयों में संपत्ति के नियम भिन्न हैं, फिर भी संयुक्त परिवार के आदर्श, परंपराएँ और प्रतिष्ठा के कारण इनका  सम्पत्ति के अधिकारों का व्यावहारिक पक्ष परिवार के संयुक्त रूप के अनुकूल ही होता है। संयुक्त परिवार का कारण [[भारत की कृषि]] प्रधान अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त प्राचीन परंपराओं तथा आदर्श में निहित है। [[रामायण]] और [[महाभारत]] की गाथाओं द्वारा यह आदर्श जन जन प्रेषित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवार की स्थिरता==&lt;br /&gt;
कृषि कार्य ने सर्वत्र ही पारिवारिक जीवन की स्थिरता प्रदान की है। अत: भारतीय समाज में परंपरा से उत्पादन कार्य, उपभोग, और सुरक्षा की मूलभूत इकाई परिवार है। अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय समाज पितृवंशीय, पितृस्थानीय और पितृभक्त है। यहाँ पुरुष की अपेक्षा नारी का महत्व कम माना जाता है। संपत्ति पर नारी का बहुत सीमित अधिकार माना गया है। किंतु घर गृहस्थी के अनेक मामलों में उसकी महत्ता स्वीकृत है।&lt;br /&gt;
==एक विवाह की मान्यता== &lt;br /&gt;
साधारणत: एक विवाह की मान्यता प्रचलित है, परंतु पुरुष को एक से अधिक विवाह करने का अधिकार प्राप्त है। परंपरागत आदर्श के अनुसार 'विधवा विवाह' का निषेध किया जाता है, किंतु विधुर का पुनर्विवाह  हो सकता है। 'पतिव्रत धर्म' की बहुत महिमा है और समाज में प्रशंसा की दृष्टि से देखा जाता है। &lt;br /&gt;
==पूजा का महत्व==&lt;br /&gt;
पितर पूजा का भी भारी महत्व है। पितृ कर्मकांड जाते हैं और मृत पितरों की पूजा का भी विधान है। उच्च जातियों को छोड़कर अन्य सभी जातियों में विवाह विच्छेद और विधवा विवाह प्रचलित है, परंतु जब कोई जाति अपनी मर्यादा को ऊँचा करना चाहती है तो इन दोनों प्रथाओं का निषेध कर देती है।  &lt;br /&gt;
==वयोवृद्ध पुरुष मुखिया==&lt;br /&gt;
घर का सबसे अधिक वयोवृद्ध पुरुष, यदि वह कार्यनिवृत्त न हो गया हो तो संयुक्त परिवार का कर्ता धर्ता अथवा मुखिया माना जाता है। कहीं कहीं उसे मालिक या स्वामी भी कहते हैं। यह पुरुष कर्ता अन्य वयोवृद्ध अथवा वयस्क सदस्यों की सलाह से या  बिना सलाह के ही परंपरा के आधार पर परिवार में कार्य का विभाजन, उत्पादन, उपभोग आदि की व्यवस्था करता है और परिवार तथा उसके सदस्यों से संबधित सामाजिक महत्व के कार्य और कार्य पद्धति का निर्णय करता है। &lt;br /&gt;
==वयोवृद्ध नारी महिला वर्ग की मुखिया==&lt;br /&gt;
घर की सबसे वयोवृद्ध नारी परिवार के महिला वर्ग की मुखिया होती है और जो भी कार्य महिलाओं की ज़िम्मेदारी होते हैं, उनकी देखभाल और व्यवस्था करने का प्रयास करती है, जैसे - भोजन तैयार करना, बच्चों का पालन पोषण तथा सिलाई, कताई आदि की व्यवस्था करना इन महिलाओं का मुख्य कार्य है। अधिकतर महिलाएँ खेती के या व्यवसाय के कुछ साधारण  कार्यों में भी पुरुषों का हाथ बँटाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संयुक्त परिवार==&lt;br /&gt;
संयुक्त परिवार में चाचा, ताऊ की विवाहित संतान, उनके विवाहित पुत्र, पौत्र आदि भी हो सकते हैं। साधारणत: पिता के जीवन में उसका पुत्र परिवार से अलग होकर स्वतंत्र गृहस्थी नहीं बसाता है। यह अभेद्य परंपरा नहीं है, कभी कभी अपवाद भी पाये जाते हैं। ऐसा भी समय आता है जब रक्त संबंधों की निकटता के आधार पर एक संयुक्त परिवार दो या अनेक संयुक्त अथवा असंयुक्त परिवारों में विभक्त हो जाता है। असंयुक्त परिवार भी कालक्रम में संयुक्त परिवार का ही रूप ले लेता है और संयुक्त परिवार का क्रम बना रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''समाजशास्त्री''' सुशीला जैन कहती हैं कि 'संयुक्त परिवारों में प्यार का दायरा बड़ा होता है। बच्चों को सभी का लाड-प्यार मिलता है। ज़ाहिर है कि उनका मानसिक विकास ज़्यादा होगा। परिवार में बड़े-बुजुर्ग होने की वजह से बच्चों में संस्कार जल्दी आ जाते हैं। परिवार में यदि कोई विधवा है, तो उसकी देखभाल केवल संयुक्त परिवार में ही हो सकती है। प्यार और सम्मान बच्चों को यहां बचपन से मिल जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://rinkusharma88.wordpress.com/2009/08/24/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ |title=परिवार में बदलाव की बयार |accessmonthday=[[22 अप्रॅल]]|accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संयुक्त परिवार में परिवर्तन== &lt;br /&gt;
भारत के समाज में संयुक्त परिवार प्रणाली बहुत प्राचीन है, यद्यपि इसके आंतरिक स्वरूप में बहुर्विवाह, उत्तराधिकार और  संपत्ति के अधिकार के नियमों में, समयानुसार परिवर्तन होता रहा है। औद्योगिक क्रांति ने पाश्चात्य देशों में परंपरागत संयुक्त परिवार का स्वरूप ही भंग कर दिया है जिसका कारण बढ़ते हुए यंत्रीकरण के फलस्वरूप व्यक्ति को परिवार से बाहर मिली आजीविका, सुरक्षा और उन्नति की सुविधाओं को कारण बताया जाता है। भारत में भी औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप नई अर्थव्यवस्था और नये औद्योगिक तथा आर्थिक संगठनों का आरंभ होने के कारण परिवार संस्था का विघटन प्रारम्भ हो चुका है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि एकल परिवारों में पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बातों पर अहम टकराने लगते हैं। उनके बीच के मनमुटाव को दूर करने के लिए उनके पास कोई तीसरा व्यक्ति नहीं होता है। अक्सर ऐसे मामलों में तलाक की नौबत आ जाती है। जानकार मानते है कि तलाक के ज़्यादातर मामले एकल परिवारों से आते हैं। इसके अलावा आत्महत्या और मानसिक अवसाद से जुड़े ज़्यादातर मामले भी एकल परिवारों की देन हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अकेले रहने वाले व्यक्ति हमेशा एक अज्ञात डर से भयभीत रहते हैं और कई बार यह डर इतना बढ़ जाता है कि नतीजा आत्महत्या के रूप में सामने आता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://rinkusharma88.wordpress.com/2009/08/24/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ |title=परिवार में बदलाव की बयार |accessmonthday=[[22 अप्रॅल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यातायात और संचार के नये साधन उपलब्ध हो रहे हैं, नगरीकरण भी बहुत तेज़ी से हो रहा है। पाश्चात्य विचारधारा और पाश्चात्य शिक्षा दीक्षा और आदर्शों का प्रभाव भी परिवार के स्वरूप को प्रभावित कर रहा है। विशेषकर स्वाधीनता के बाद विवाह, उत्तराधिकार, दत्तकग्रहण और सांपत्तिक अधिकार के विषय में जो क़ानून बनाये जा रहे हैं उन्हें परिवार की संयुक्त प्रणाली के लिए हानिकारक समझा जाता है। इसी प्रकार आयकर के नियम भी इसके प्रतिकूल पड़ते हैं। वयस्क मताधिकार राजनीतिक लोकतंत्र भी संयुक्त परिवार के एकसत्तात्मक और व्यष्टिपरक अस्तित्व पर प्रहार कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब अर्थव्यवस्था और उत्पादन के साधनों में भी मूलभूत परिवर्तन हो रहा है, परिवार के शासन, रचना और कार्यों में परिवर्तन होना अवश्यंभावी है और वह दिखायी भी दे रहा है। अभी यह कहना कठिन है कि परिवार का संयुक्त रूप समाप्त हो रहा है। नगरों और ग्रामों में संयुक्त परिवार पहले से कम हो गए हैं। परिवर्तन के संबंध में विद्वानों में मुख्यत: दो प्रकार की विचारधाराएँ है -  &lt;br /&gt;
#एक विचार के अनुसार परिस्थिति के प्रभावस्वरूप परिवार में कतिपय परिवर्तन होने पर भी उसका संयुक्त रूप नष्ट नहीं हो रहा है। &lt;br /&gt;
#दूसरे विचार के अनुसार औद्योगिक सभ्यता भारत में भी संयुक्त परिवार को बहुत कुछ उसी एकल परिवार के रूप में प्रचलित करेगी जो अमरीका तथा यूरोप में प्रचलित है। वर्तमान पारिवारिक विघटन और परिवर्तनों को इस विकासक्रम की आरंभिक अवस्था बताया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारत में मातृसत्तात्मक परिवार== &lt;br /&gt;
भारत के मालावार प्रदेश में नायर और तिया जाति में मातृ स्थानीय तथा मातृवंशी परिवार वर्तमान तक रहे हैं। ऐसे परिवारों में पति अपने बच्चों के घर में एक अस्थायी आगंतुक होता है। उसके बच्चों की देखभाल उसका मामा करता है और उसके बच्चे अपनी माँ के परिवार का नाम ग्रहण करते हैं। परिवार का रूप संयुक्त है, जिसमें माँ की और उसकी पुत्री अथवा पौत्रियों की संतान होती है। इन परिवारों में घर का मुखिया मातृपक्षीय पुरुष होता है। असम राज्य के गारो और ख़ासी जनजातियों में भी मातृवंशीय और मातृस्थानीय परिवार की प्रथा है। &lt;br /&gt;
==भारत में बहुपति परिवार==&lt;br /&gt;
[[उत्तर प्रदेश]] के जौनसार बाबर में खस नाम की जनजाति में और आस पास के कुछ क्षेत्रों में बहुपति प्रथा है। परिवार में सब भाइयों की एक पत्नी और कभी-कभी एकाधिक सामूहिक पत्नियाँ हेती हैं। नीलगिरि की टोडा जनजाति में भी बहुपति प्रथा है, किंतु यहाँ एक स्त्री के पतियों में भाइयों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं। गैर जनजातीय समाज में कहीं भी बहुपति प्रथा नहीं मिलती।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [http://shaifaly.mywebdunia.com/2008/01/11/1200055080000.html परिवार ओशो की नज़र से]&lt;br /&gt;
* [http://harishbhatt.jagranjunction.com/2010/11/26/%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A4%B2-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A4%B0/ आज जरुरी है संयुक्त परिवार की खुशबू]&lt;br /&gt;
* [http://www.pravakta.com/story/21411 टूटते परिवार दरकते रिश्ते]&lt;br /&gt;
* [http://rinkusharma88.wordpress.com/2009/08/24/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0/ परिवार में बदलाव की बयार]&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{परिवार}}&lt;br /&gt;
[[Category:परिवार]]&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<updated>2012-02-08T09:58:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Art-Manipur.jpg|thumb|250px|[[मणिपुर]] [[कला]], इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय]]&lt;br /&gt;
'''इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय''' [[मध्य प्रदेश]] के [[भोपाल]] शहर की बड़ी झील के पार्श्व में स्थित श्यामला पहाड़ी के शैल शिखरों पर लगभग 200 एकड़ परिक्षेत्र में स्थापित इस संग्रहालय में 32 पारंपरिक एवं प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय भी हैं। &lt;br /&gt;
*संग्रहालय परिसर में वन-प्रान्तों, पर्वतीय, समुद्र-तटीय तथा अन्य क्षेत्रों के मूल निवासियों द्वारा निर्मित या उन क्षेत्रों से प्रतिस्थापित तथा देश की विविध मौलिक समाजों की जीवन पध्दतियों को प्रतिबिम्बित करती सामग्रियों और मूर्त वस्तुओं से युक्त जनजातियों के आवासों के प्रकारों की मुक्ताकाश प्रदर्शनी मानव विकास की अविरल परंपरा से अवगत कराती है। &lt;br /&gt;
*प्रमुख आदिवासी प्रजातियों में [[टोडा जनजाति|टोडा]], बाराली, बाडो, कछरी, कोटा, सोवरा, गदेव, कुटियाक, अगरिया, राजवद, करवी, [[भील]] की झोपड़ियाँ, बस्तर का रथ, मारिया लोगों का घोटुल, 110 फीट लकड़ी की बनी लकड़ी की नाव, शैलचित्र आदि अनेक प्रदर्शन है। &lt;br /&gt;
*मानव संग्रहालय द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के मानव समूहों द्वारा संजोयी हुई धरोहरों, लोकगीतों आदि को जन-सामान्य का परिचय कराने हेतु समय-समय पर विविध समारोहों का आयोजन भी किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://citybhopal.com/IndiraGandhiMusim.html |title=इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय |accessmonthday=[[22 मई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=हमारा शहर भोपाल |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Masks-Manav-Sangrahalaya-Bhopal.jpg|मुखौटे, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय&lt;br /&gt;
चित्र:Masks-Manav-Sangrahalaya-Bhopal-1.jpg|मुखौटे, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय&lt;br /&gt;
चित्र:Mridangam-Manav-Sangrahalaya.jpg|[[मृदंग]], इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय&lt;br /&gt;
चित्र:Utensils-Manav-Sangrahalaya.jpg|घरेलू सामान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय&lt;br /&gt;
चित्र:Radha-Krishna-Manav-Sangrahalaya.jpg|[[राधा]]-[[कृष्ण]], इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{संग्रहालय}}&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भोपाल]]&lt;br /&gt;
[[Category:संग्रहालय]]&lt;br /&gt;
[[Category:संग्रहालय कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>नीलगिरि पहाड़ियाँ</title>
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		<updated>2012-02-08T09:51:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Nilgiri-Hills.jpg|thumb|250px|नीलगिरि पहाड़ियाँ, [[तमिलनाडु]]]]&lt;br /&gt;
'''नीलगिरि पहाड़ियाँ''', [[तमिलनाडु]] राज्य का पर्वतीय क्षेत्र है, दक्षिणी [[भारत]] में स्थित हैं।&lt;br /&gt;
*इन पहाड़ियों पर पश्चिमी एवं पूर्वी घाटों का संगम होता है।&lt;br /&gt;
*दोदाबेटा इसकी सर्वोच्च चोटियों में गिनी जाती है।&lt;br /&gt;
*भारत की [[टोडा जनजाति]] इस पर्वतश्रेणी के ढलानों पर रहती है।&lt;br /&gt;
*नीलगिरि पहाड़ियों को 'ब्लूमाउण्टेन्स' भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*नीलगिरि की चोटियाँ आसपास के मैदानी क्षेत्र से अचानक उठकर 1,800 से 2,400 मीटर की ऊँचाई तक पहुँचती हैं; इनमें से एक 2,637 ऊँचा डोडाबेट्टा तमिलनाडु का शीर्ष बिन्दू है। &lt;br /&gt;
*नीलगिरि पहाड़ियाँ पश्चिमी घाटी का हिस्सा हैं और [[नोयर नदी]] इन्हें [[कर्नाटक]] के पठार (उत्तर) तथा पालघाट घाटी इन्हें [[अन्नामलाई पहाड़ियाँ|अन्नामलाई]], [[पालनी पहाड़ियाँ|पालनी पहाड़ियों]] (दक्षिण) से अलग करती है। &lt;br /&gt;
*नीलगिरि पहाड़ियाँ आसपास के मैदानी क्षेत्र के मुक़ाबले ठंडी और नम हैं। &lt;br /&gt;
*ऊपरी पहाड़ियाँ लहरदार घास के क्षेत्रों का निर्माण करती है। &lt;br /&gt;
*इन पर [[चाय]], सिनकोना (पेड़ और झाड़ियाँ, जिनकी छाल से कुनैन मिलता है), कॉफ़ी और [[सब्जियाँ|सब्ज़ियों]] की व्यापक खेती होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्वत}}&lt;br /&gt;
[[Category:पर्वत]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल शब्दावली]]&lt;br /&gt;
[[Category:तमिलनाडु]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>टोडा जनजाति</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Toda-Ladies.jpg|thumb|250px|टोडा जनजाति की महिलाएँ, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]]]&lt;br /&gt;
'''टोडा जनजाति''' [[दक्षिण भारत]] में [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि पहाड़ियों]] की एक पशुपालक जनजाति है। 1960 के दशक में इनकी संख्या लगभग 800 थी। जो अब बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेज़ी से बढ़ रही है। टोडा भाषा [[द्रविड़ जाति|द्रविड़]] परिवार की भाषा है, किंतु उसमें बाद में सबसे ज्यादा विकृतियाँ आई। &lt;br /&gt;
==अवास==&lt;br /&gt;
टोडा तीन से लेकर सात छोटी-छोटी झोपड़ियों वाली ऐसी बस्तियों में रहते हैं, जो चरागाह ढलानों पर दूर-दूर बिखरी होती हैं। इनकी झोपड़ियों लकड़ी के ढांचों पर खडी होती है तथा छतें अर्द्धबेलनाकार व कमानीदार होती हैं। &lt;br /&gt;
==परंपरा==&lt;br /&gt;
टोडा लोग अपना परंपरागत [[दूध]] का धंधा और बरू व [[बांस]] की वस्तुओं का विनिमय कर नीलगिरि के अन्य लोगों, जैसे बडगा से अनाज, कपड़ा तथा कोटा से औज़ार व [[मिट्टी]] के बर्तन लेते हैं। टोडा शवयात्रा में बाजा बजाने का काम करुंबा नामक वनवासी करते हैं तथा यही उन्हें अन्य वनोपजों की आपूर्ति भी करते हैं। &lt;br /&gt;
====पशुपालक====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mullimunth-Toda-Temple.jpg|thumb|250px|मुल्लिमुन्थ टोडा मन्दिर, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]]]&lt;br /&gt;
टोडा जनजाति का धर्म उनके लिए सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण भैसों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। दूध निकालने से लेकर पशुओं को [[नमक]], चारा खिलाने और [[दही]] मथने, मक्खन निकालने तथा मौसम के अनुसार चरागाहों के बदलने तक, सारी क्रियाओं के साथ कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान जुड़ा रहता है। इसके अलावा, गोपालकों के पुरोहितों के आदेश तथा गौशालाओं के पुननिर्माण, अंत्येष्टि स्थलों की छतों की मरम्मत आदि के लिए भी अनुष्ठान होते है। ये अनुष्ठान तथा विस्तृत अंत्येष्टि क्रियाएँ सामाजिक संपर्क के ऐसे अवसर होते है, जब समुदाय के लिए उपयोगी भैंसों के प्रति संकेत करते हुए जटिल काव्यात्मक गीत रचे और गाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
बहुपति विवाह सामान्य है; अनेक पुरुषों, सामान्यत: भाइयों की एक ही पत्नी हो सकती है। जब भी कोई टोडा स्त्री गर्भवती होती है, उसके पतियों में से कोई एक उसे आनुष्ठानिक रूप से तीर और कमान का खिलौना भेंट करता है और उसके बच्चे का सामाजिक पिता होने की घोषणा करता है। &lt;br /&gt;
==ख़तरे==&lt;br /&gt;
टोडा चरागाहों की बहुत सी ज़मीन हाल ही में अन्य लोगों द्वारा खेती के लिए ले ली गई है और उसमें से बड़े हिस्से पर वृक्षारोपण भी किया जा चुका है। इससे भैंसों की संख्या कम हो रही है, जिससे टोडा संस्कृति को ख़तरा उत्पन्न हो गया है । 20 वीं सदी में एक पृथक टोडा समुदाय ने (1960 में 187 लोगों ने) [[ईसाई धर्म]] अपना लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जातियाँ और जन जातियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:जातियाँ और जन जातियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:दक्षिण भारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:तमिलनाडु]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>साँचा:जातियाँ और जन जातियाँ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%9C%E0%A4%A8_%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81&amp;diff=252134"/>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=जातियाँ और जन जातियाँ&lt;br /&gt;
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|group3=[[भारत की आदिम जातियाँ|आदिम जातियाँ]]&lt;br /&gt;
|group3style=&lt;br /&gt;
|list3= [[नीग्रिटो]] '''·''' [[प्रोटो ऑस्ट्रेलियाड]] '''·''' [[मंगोलॉयड]] '''·''' [[भूमध्यसागरीय द्रविड़]] '''·''' [[पश्चिमी ब्रेकी सेफल]] '''·''' [[नॉर्डिक]] '''·''' [[बोंडा जनजाति|बोंडा]]&lt;br /&gt;
|list3style=&lt;br /&gt;
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>टोडा जनजाति</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Toda-Ladies.jpg|thumb|250px|टोडा जनजाति की महिलाएँ, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]]]&lt;br /&gt;
'''टोडा जनजाति''' [[दक्षिण भारत]] में [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि पहाड़ियों]] की एक पशुपालक जनजाति है। 1960 के दशक में इनकी संख्या लगभग 800 थी। जो अब बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेज़ी से बढ़ रही है। टोडा भाषा [[द्रविड़ जाति|द्रविड़]] परिवार की भाषा है, किंतु उसमें बाद में सबसे ज्यादा विकृतियाँ आई। &lt;br /&gt;
==अवास==&lt;br /&gt;
टोडा तीन से लेकर सात छोटी-छोटी झोपड़ियों वाली ऐसी बस्तियों में रहते हैं, जो चरागाह ढलानों पर दूर-दूर बिखरी होती हैं। इनकी झोपड़ियों लकड़ी के ढांचों पर खडी होती है तथा छतें अर्द्धबेलनाकार व कमानीदार होती हैं। &lt;br /&gt;
==परंपरा==&lt;br /&gt;
टोडा लोग अपना परंपरागत [[दूध]] का धंधा और बरू व [[बांस]] की वस्तुओं का विनिमय कर नीलगिरि के अन्य लोगों, जैसे बडगा से अनाज, कपड़ा तथा कोटा से औज़ार व [[मिट्टी]] के बर्तन लेते हैं। टोडा शवयात्रा में बाजा बजाने का काम करुंबा नामक वनवासी करते हैं तथा यही उन्हें अन्य वनोपजों की आपूर्ति भी करते हैं। &lt;br /&gt;
====पशुपालक====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mullimunth-Toda-Temple.jpg|thumb|250px|मुल्लिमुन्थ टोडा मन्दिर, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]]]&lt;br /&gt;
टोडा जनजाति का धर्म उनके लिए सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण भैसों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। दूध निकालने से लेकर पशुओं को [[नमक]], चारा खिलाने और [[दही]] मथने, मक्खन निकालने तथा मौसम के अनुसार चरागाहों के बदलने तक, सारी क्रियाओं के साथ कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान जुड़ा रहता है। इसके अलावा, गोपालकों के पुरोहितों के आदेश तथा गौशालाओं के पुननिर्माण, अंत्येष्टि स्थलों की छतों की मरम्मत आदि के लिए भी अनुष्ठान होते है। ये अनुष्ठान तथा विस्तृत अंत्येष्टि क्रियाएँ सामाजिक संपर्क के ऐसे अवसर होते है, जब समुदाय के लिए उपयोगी भैंसों के प्रति संकेत करते हुए जटिल काव्यात्मक गीत रचे और गाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
बहुपति विवाह सामान्य है; अनेक पुरुषों, सामान्यत: भाइयों की एक ही पत्नी हो सकती है। जब भी कोई टोडा स्त्री गर्भवती होती है, उसके पतियों में से कोई एक उसे आनुष्ठानिक रूप से तीर और कमान का खिलौना भेंट करता है और उसके बच्चे का सामाजिक पिता होने की घोषणा करता है। &lt;br /&gt;
==ख़तरे==&lt;br /&gt;
टोडा चरागाहों की बहुत सी ज़मीन हाल ही में अन्य लोगों द्वारा खेती के लिए ले ली गई है और उसमें से बड़े हिस्से पर वृक्षारोपण भी किया जा चुका है। इससे भैंसों की संख्या कम हो रही है, जिससे टोडा संस्कृति को ख़तरा उत्पन्न हो गया है । 20 वीं सदी में एक पृथक टोडा समुदाय ने (1960 में 187 लोगों ने) [[ईसाई धर्म]] अपना लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जातियाँ और जन जातियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:जातियाँ और जन जातियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:दक्षिण भारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना जनवरी-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<updated>2012-02-08T09:44:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=मुल्लिमुन्थ टोडा मन्दिर, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/thenilgiris/ snonymousG]&lt;br /&gt;
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|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
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|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/thenilgiris/4230749147 Nilgiris - Mullimunth Toda temple]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=[[टोडा जनजाति]] [[दक्षिण भारत]] में [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि पहाड़ियों]] की एक पशुपालक जनजाति है। 1960 के दशक में इनकी संख्या लगभग 800 थी। जो अब बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेज़ी से बढ़ रही है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}}&lt;br /&gt;
|Share Alike= &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<title>चित्र:Mullimunth-Toda-Temple.jpg</title>
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		<updated>2012-02-08T09:43:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ऋचा</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;ऋचा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[टोडा जनजाति]] की महिलाएँ, [[नीलगिरि पहाड़ियाँ]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/thenilgiris/ snonymousG]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/thenilgiris/4230750847 Nilgiris - Mullimunth Toda ladies]&lt;br /&gt;
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|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/thenilgiris/ snonymousG's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=टोडा जनजाति [[दक्षिण भारत]] में [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि पहाड़ियों]] की एक पशुपालक जनजाति है। 1960 के दशक में इनकी संख्या लगभग 800 थी। जो अब बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेज़ी से बढ़ रही है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
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|Share Alike= &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
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		<title>वार्ता:टोडा जनजाति</title>
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		<author><name>ऋचा</name></author>
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