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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>भीम हनुमान भेंट</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Bheem-and-Hanuman.jpg|thumb|[[भीमसेन]] हनुमान की पूंछ उठाते हुए]]&lt;br /&gt;
जब [[पांडव]] वन में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। तभी एक दिन वहां उड़ते हुए एक सहस्त्रदल कमल आ गया उसकी गंध बहुत ही मनमोहक थी उस कमल को [[द्रौपदी]] ने देख लिया। द्रौपदी ने उसे उठा लिया और [[भीम]] से कहा- यह कमल बहुत ही सुंदर है, मैं यह कमल [[युधिष्ठिर|धर्मराज युधिष्ठिर]] को भेंट करूंगी। अगर आप मुझसे प्रेम करते हैं तो ऐसे बहुत से कमल मेरे लिए [[कदलीवन]] से लेकर आइये। &lt;br /&gt;
;भीम का बंदर से मिलना&lt;br /&gt;
द्रौपदी के कहने पर भीम [[पुष्प]] की तलाश में आगे बढ़ते गए। रास्ते में एक बड़ा-सा बंदर लेटा हुआ था। भीम ने गरजकर उसे रास्ता छोड़ने को कहा पर बंदर ने कहा कि मैं बुड्ढा हूँ। तुम्हीं, मेरी पूँछ उठाकर एक ओर रख दो। भीम ने पूँछ उठाने की बहुत कोशिश की, पर भीम से उसकी पूँछ हिली तक नहीं। भीम हाथ जोड़कर उस [[बंदर]] के आगे आ खड़े हो गये और पूछने लगे कृपया अपना परिचय दें।&lt;br /&gt;
;बंदर का भीम को परिचय&lt;br /&gt;
बूढ़े बंदर ने कहा कि मैं राम का दास हनुमान हूँ। तुम मेरे छोटे भाई हो। भीम ने हनुमान से माफी माँगी और प्रार्थना की कि आप मेरे भाई [[अर्जुन]] के नंदिघोष रथ की ध्वजा पर बैठकर [[महाभारत]] का युद्ध देखिए। हनुमान ने भीम की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। &lt;br /&gt;
;पुष्प लाना&lt;br /&gt;
हनुमान ने भीम को कमल सरोवर का पता भी बताया। सरोवर पर पहुँचकर [[भीम]] ने फूल तोड़ने शुरू कर दिए तो सरोवर के राक्षस यक्षों ने उन्हें रोका। भीम राक्षसों को मारने लगे। जब सरोवर के स्वामी कुबेर को पता चला कि [[पांडव]] यहाँ आए हैं, तो प्रसन्नता से वहाँ के फल-फूल पांडवों के पास भेजे। &lt;br /&gt;
;अर्जुन आगमन&lt;br /&gt;
यहीं रहकर पांडव अर्जुन की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय बाद आकाश से एक रथ आया तथा अर्जुन उसमें से उतरे। पांडवों तथा [[द्रौपदी]] की प्रसन्नता की सीमा न रही। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ=={{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम= महाभारत शब्दकोश|लेखक= एस. पी. परमहंस|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= दिल्ली पुस्तक सदन, दिल्ली|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या= 150|url=}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}} &lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]][[Category:महाभारत के चरित्र]][[Category:कृष्ण काल]][[Category:पौराणिक कोश]][[Category:महाभारत शब्दकोश]][[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80&amp;diff=568389</id>
		<title>वाग्देवी</title>
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		<updated>2016-08-31T04:31:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* पुराण उल्लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Vagdevi-1.jpg|250px|thumb|वाग्देवी की प्रतिमा]]&lt;br /&gt;
'''वाग्देवी''' ज्ञान की देवी [[सरस्वती देवी|माँ सरस्वती]] का ही एक अन्य नाम है। ब्राह्मण-ग्रंथों के अनुसार ये ब्रह्मस्वरूपा, [[कामधेनु]] तथा समस्त देवों की प्रतिनिधि हैं। [[हिन्दू]] मान्यताओं के अनुसार ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी मानी जाती हैं। अमित तेजस्वनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की [[पूजा]]-आराधना के लिए [[माघ मास]] की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है।&lt;br /&gt;
==आविर्भाव दिवस==&lt;br /&gt;
[[बसंत पंचमी]] को वाग्देवी का आविर्भाव दिवस माना जाता है। अतः 'वागीश्वरी जयंती' व 'श्रीपंचमी' नाम से भी यह तिथि प्रसिद्ध है। [[ऋग्वेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;ऋग्वेद- 10/125 सूक्त&amp;lt;/ref&amp;gt; में सरस्वती देवी की असीम महिमा व प्रभाव का वर्णन है। माँ सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। [[चित्र:Vagdevi1.jpg|thumb|left|वाग्देवी की प्रतिमा]] कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। बहुत लोग अपना ईष्ट माँ सरस्वती को मानकर उनकी पूजा-आराधना करते हैं। जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे ज्ञानी और विद्या के धनी होते हैं। बसंत पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को ही अर्पित है। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पाण्डालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का विधान चल निकला है।&lt;br /&gt;
====पुराण उल्लेख====&lt;br /&gt;
विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी वाग्देवी को चार भुजा युक्त व [[आभूषण|आभूषणों]] से सुसज्जित दर्शाया गया है। [[स्कंदपुराण]] में सरस्वती जटा-जुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं। रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौम्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है। संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में [[दूध]] के समान [[श्वेत रंग]] वाली सरस्वती के रूप को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|सरस्वती|ज्ञानपीठ पुरस्कार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]][[Category:हिन्दू धर्म]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]][[Category:पौराणिक कोश]][[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>साँचा:हिन्दू देवी देवता और अवतार</title>
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		<updated>2016-08-31T04:26:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:Shiva.jpg|thumb|[[शिव]] &amp;lt;br /&amp;gt;Shiva]]&lt;br /&gt;
{{main| शिव}}&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] का ही नाम पिनाकी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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|+ भगवान शिव के अन्य नाम&lt;br /&gt;
| [[सर्वज्ञ (शिव)|सर्वज्ञ]]&lt;br /&gt;
| [[मारजित् (शिव)|मारजित्]]&lt;br /&gt;
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|}&lt;br /&gt;
{{शब्द संदर्भ लघु&lt;br /&gt;
|हिन्दी=पिनाक धारण करने वाले, प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा जिसमें बजाने के लिए तार लगा रहता था।&lt;br /&gt;
|व्याकरण=पुल्लिंग, [[संज्ञा (व्याकरण)|संज्ञा]]&lt;br /&gt;
|उदाहरण= &lt;br /&gt;
|विशेष=&lt;br /&gt;
|पर्यायवाची=[[महादेव]], [[शिव]]&lt;br /&gt;
|संस्कृत= पिनाक+इनि&lt;br /&gt;
|अन्य ग्रंथ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{शिव2}}&lt;br /&gt;
{{द्वादश ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
{{शिव}}&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यायवाची कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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{{main| शिव}}&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] का ही नाम पिनाकिन् है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान शिव के अन्य नाम&lt;br /&gt;
| [[सर्वज्ञ (शिव)|सर्वज्ञ]]&lt;br /&gt;
| [[मारजित् (शिव)|मारजित्]]&lt;br /&gt;
| [[रुद्र]]&lt;br /&gt;
| [[शम्भू]]&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| [[भगवत् (शिव)|भगवत्]]&lt;br /&gt;
| [[ईशान]]&lt;br /&gt;
| [[शंकर]]&lt;br /&gt;
| [[चन्द्रशेखर (शिव)|चन्द्रशेखर]]&lt;br /&gt;
| [[शर्व (शिव)|शर्व]]&lt;br /&gt;
| [[भूतेश (शिव)|भूतेश]]&lt;br /&gt;
| [[पिनाकिन्]]&lt;br /&gt;
| [[खण्डपरशु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मृड]]&lt;br /&gt;
| [[मृत्युंजय]]&lt;br /&gt;
| [[कृत्तिवासस]]&lt;br /&gt;
| [[गिरिश]]&lt;br /&gt;
| [[प्रमथाधिप]]&lt;br /&gt;
| [[उग्र (शिव)|उग्र]]&lt;br /&gt;
| [[कपर्दिन्]]&lt;br /&gt;
| [[श्रीकण्ठ]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शितकिण्ठ (शिव)|शितकिण्ठ]]&lt;br /&gt;
| [[कपालभृत]]&lt;br /&gt;
| [[वामदेव]]&lt;br /&gt;
| [[महादेव]]&lt;br /&gt;
| [[विरूपाक्ष]]&lt;br /&gt;
| [[त्रिलोचन]]&lt;br /&gt;
| [[कृशानुरेतस्]]&lt;br /&gt;
| [[धूर्जटि]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नीललोहित]]&lt;br /&gt;
| [[हर (शिव)|हर]]&lt;br /&gt;
| [[स्मरहर]]&lt;br /&gt;
| [[भर्ग]]&lt;br /&gt;
| [[त्र्यम्बक]]&lt;br /&gt;
| [[त्रिपुरान्तक]]&lt;br /&gt;
| [[गंगधर]]&lt;br /&gt;
| [[अन्धकरिपु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[क्रतुध्वंसिन]]&lt;br /&gt;
| [[वृषध्वज (शिव)|वृषध्वज]]&lt;br /&gt;
| [[व्योमकेश]]&lt;br /&gt;
| [[भव (शिव)|भव]]&lt;br /&gt;
| [[भीम (शिव)|भीम]]&lt;br /&gt;
| [[स्थाणु]]&lt;br /&gt;
| [[उमापति]]&lt;br /&gt;
| [[गिरीश (शिव)|गिरीश]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[यतिनाथ]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{शब्द संदर्भ लघु&lt;br /&gt;
|हिन्दी=पिनाक धारण करने वाले, प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा जिसमें बजाने के लिए तार लगा रहता था।&lt;br /&gt;
|व्याकरण=पुल्लिंग, [[संज्ञा (व्याकरण)|संज्ञा]]&lt;br /&gt;
|उदाहरण= &lt;br /&gt;
|विशेष=&lt;br /&gt;
|पर्यायवाची=[[महादेव]], [[शिव]]&lt;br /&gt;
|संस्कृत= पिनाक+इनि&lt;br /&gt;
|अन्य ग्रंथ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{शिव2}}&lt;br /&gt;
{{द्वादश ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
{{शिव}}&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यायवाची कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5&amp;diff=568379</id>
		<title>शिव</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5&amp;diff=568379"/>
		<updated>2016-08-31T04:04:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{संबंधित लेख}}&lt;br /&gt;
{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=शिव|लेख का नाम=शिव (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shiva.jpg|thumb|शिव &amp;lt;br /&amp;gt;Shiva]]&lt;br /&gt;
'''शिव''' हिंदू धर्म ग्रंथ [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार भगवान शिव ही समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। उन्हीं से [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं। &lt;br /&gt;
*संक्षेप में यह कथा इस प्रकार है- प्रलयकाल के पश्चात सृष्टि के आरम्भ में भगवान नारायण की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए। ब्रह्मा जी अपने कारण का पता लगाने के लिये कमलनाल के सहारे नीचे उतरे। वहाँ उन्होंने शेषशायी भगवान नारायण को योगनिद्रा में लीन देखा। उन्होंने भगवान नारायण को जगाकर पूछा- 'आप कौन हैं?' नारायण ने कहा कि मैं लोकों का उत्पत्तिस्थल और लयस्थल पुरुषोत्तम हूँ। ब्रह्मा ने कहा- 'किन्तु सृष्टि की रचना करने वाला तो मैं हूँ।' ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने उन्हें अपने शरीर में व्याप्त सम्पूर्ण [[ब्रह्माण्ड]] का दर्शन कराया। इस पर ब्रह्मा जी ने कहा- 'इसका तात्पर्य है कि इस संसार के स्त्रष्टा मैं और आप दोनों हैं।'&lt;br /&gt;
*भगवान विष्णु ने कहा- 'ब्रह्माजी! आप भ्रम में हैं। सबके परम कारण परमेश्वर ईशान भगवान शिव को आप नहीं देख रहे हैं। आप अपनी योगदृष्टि से उन्हें देखने का प्रयत्न कीजिये। हम सबके आदि कारण भगवान सदाशिव आपको दिखायी देंगे। जब ब्रह्मा जी ने योगदृष्टि से देखा तो उन्हें त्रिशूल धारण किये परम तेजस्वी नीलवर्ण की एक मूर्ति दिखायी दी। उन्होंने नारायण से पूछा- 'ये कौन हैं? नारायण ने बताया ये ही देवाधिदेव भगवान [[महादेव]] हैं। ये ही सबको उत्पन्न करने के उपरान्त सबका भरण-पोषण करते हैं और अन्त में सब इन्हीं में लीन हो जाते हैं। इनका न कोई आदि है न अन्त। यही सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं।' इस प्रकार ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की कृपा से सदाशिव का दर्शन किया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Nataraja-Shiva.jpg|thumb|200px|left|नटराज शिव काँस्य प्रतिमा]]&lt;br /&gt;
*भगवान शिव का परिवार बहुत बड़ा है। एकादश रुद्राणियाँ, चौंसठ योगिनियाँ तथा भैरवादि इनके सहचर और सहचरी हैं।&lt;br /&gt;
*माता [[पार्वती देवी|पार्वती]] की सखियों में विजया आदि प्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;
*[[गणेश|गणपति]]-परिवार में उनकी सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ तथा क्षेम और लाभ दो पुत्र हैं। उनका वाहन मूषक है।&lt;br /&gt;
*भगवान [[कार्तिकेय]] की पत्नी देवसेना तथा वाहन मयूर है।&lt;br /&gt;
*भगवती पार्वती का वाहन सिंह है तथा भगवान शिव स्वयं धर्मावतार [[नन्दी]] पर आरूढ़ होते हैं।&lt;br /&gt;
*यद्यपि भगवान शिव सर्वत्र व्याप्त हैं, तथापि [[काशी]] और कैलास- ये दो उनके मुख्य निवास स्थान कहे गये हैं।   &lt;br /&gt;
*भगवान शिव देवताओं के उपास्य तो हैं ही, साथ ही उन्होंने अनेक असुरों- अन्धक, दुन्दुभी, महिष, त्रिपुर, रावण, निवात-कवच आदि को भी अतुल ऐश्वर्य प्रदान किया।&lt;br /&gt;
*[[कुबेर]] आदि लोकपालों को उनकी कृपा से यक्षों का स्वामित्व प्राप्त हुआ। सभी देवगणों तथा ऋषि-मुनियों को दु:खी देखकर उन्होंने कालकूट विष का पान किया। इसी से वे [[नीलकण्ठ महादेव|नीलकण्ठ]] कहलाये। इस प्रकार भगवान शिव की महिमा और नाम अनन्त हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhagwan-Shiv-1.jpg|thumb|शिव, [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[गणेश]] और [[कार्तिकेय]]&amp;lt;br /&amp;gt; Shiv, Parvati, Ganesh and Kartik]]&lt;br /&gt;
*उनके अनेक रूपों में [[उमा-महेश्वर]], [[अर्द्धनारीश्वर]], [[पशुपति]], [[कृत्तिवासा]], [[दक्षिणामूर्ति]] तथा [[योगीश्वर]] आदि अति प्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]], [[आदिपर्व महाभारत|आदिपर्व]] के अनुसार [[पांचाल]] नरेश [[द्रुपद]] की पुत्री [[द्रौपदी]] पूर्वजन्म में एक [[ऋषि]] कन्या थी। उसने श्रेष्ठ पति पाने की कामना से भगवान शिव की तपस्या की थी। शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पाँच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकरजी ने कहा कि अगले जन्म में उसके पाँच भरतवंशी पति होंगे, क्योंकि उसने पति पाने की कामना पाँच बार दोहरायी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 166, 168. &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*भगवान शिव की ईशान, तत्पुरुष, वामदेव, अघोर तथा अद्योजात पाँच विशिष्ट मूर्तियाँ और शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव- ये अष्टमूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं। &lt;br /&gt;
*[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]], [[मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग|मल्लिकार्जुन]], [[महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग|महाकालेश्वर]], [[ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारेश्वर]], [[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारेश्वर]], [[भीमशंकर ज्योतिर्लिंग|भीमशंकर]], [[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वेश्वर]], [[त्र्यंबक ज्योतिर्लिंग|त्र्यंबक]], [[वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग|वैद्यनाथ]], [[नागेश ज्योतिर्लिंग|नागेश]], [[रामेश्वर ज्योतिर्लिंग|रामेश्वर]] तथा [[घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग|घुश्मेश्वर]]– ये प्रसिद्ध [[द्वादश ज्योतिर्लिंग|बारह ज्योतिर्लिंग]] हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान शिव के मन्त्र-उपासना में पंचाक्षर '''नम: शिवाय''' तथा '''महामृत्युंजय''' विशेष प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त भगवान शिव की पार्थिव-पूजा का भी विशेष महत्त्व है।&lt;br /&gt;
*शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं । [[वेद]] में इनका नाम [[रुद्र]] है। यह व्यक्ति की चेतना के अर्न्तयामी हैं । इनकी अर्द्धांगिनी (शक्ति) का नाम [[पार्वती देवी|पार्वती]] और इनके पुत्र [[कार्तिकेय|स्कन्द]] और [[गणेश]] हैं। &lt;br /&gt;
*शिव योगी के रूप में माने जाते हैं और उनकी पूजा लिंग के रूप में होती है । &lt;br /&gt;
*भगवान शिव सौम्य एवं रौद्ररूप दोनों के लिए जाने जाते हैं । &lt;br /&gt;
*सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के [[देवता]] माने जाते हैं । शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे उनका लय और प्रलय दोनों पर समान अधिकार है। &lt;br /&gt;
*भक्त पूजन में [[शिव जी की आरती]] की जाती है।&lt;br /&gt;
*शिव जी के अन्य भक्तों में [[त्रिहारिणी]] भी थे और शिव जी त्रिहारिणी को अपने पुत्रों से भी अधिक प्यार करते थे।&lt;br /&gt;
==शिवताण्डवस्तोत्रम्==&lt;br /&gt;
[[चित्र:ardhnarishwar.jpg|[[अर्द्धनारीश्वर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ardhnarishwar|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background-color:#FFFCF0;border:1px solid black; padding:10px;&amp;quot; valign=&amp;quot;left&amp;quot; |&lt;br /&gt;
जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् .. 1..&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जटा-कटा-हसं-भ्रम भ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. 2..&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धरा-धरेन्द्र-नंदिनी विलास-बन्धु-बन्धुर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि .. 3..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्फणा-मणि प्रभा&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कदम्ब-कुङ्कुम-द्रव प्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि .. 4..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहस्र लोचन प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठभूः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
भुजङ्गराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः .. 5..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
निपीत-पञ्च-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः .. 6..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम … 7..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः .. 8..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे .. 9..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अखर्व सर्व-मङ्ग-लाकला-कदंबमञ्जरी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे .. 10..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजङ्ग-मश्वस-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः .. 11..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. 12..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुञ्ज-कोटरे वसन्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
शिवेति मन्त्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. 13..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. 14..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. 15..&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान शिव के अन्य नाम&lt;br /&gt;
| [[सर्वज्ञ (शिव)|सर्वज्ञ]]&lt;br /&gt;
| [[मारजित् (शिव)|मारजित्]]&lt;br /&gt;
| [[रुद्र]]&lt;br /&gt;
| [[शम्भू]]&lt;br /&gt;
| [[ईश]]&lt;br /&gt;
| [[पशुपति]]&lt;br /&gt;
| [[शूलिन]]&lt;br /&gt;
| [[महेश्वर]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[भगवत् (शिव)|भगवत्]]&lt;br /&gt;
| [[ईशान]]&lt;br /&gt;
| [[शंकर]]&lt;br /&gt;
| [[चन्द्रशेखर (शिव)|चन्द्रशेखर]]&lt;br /&gt;
| [[शर्व (शिव)|शर्व]]&lt;br /&gt;
| [[भूतेश (शिव)|भूतेश]]&lt;br /&gt;
| [[पिनाकी]]&lt;br /&gt;
| [[खण्डपरशु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मृड]]&lt;br /&gt;
| [[मृत्युंजय]]&lt;br /&gt;
| [[कृत्तिवासस]]&lt;br /&gt;
| [[गिरिश]]&lt;br /&gt;
| [[प्रमथाधिप]]&lt;br /&gt;
| [[उग्र (शिव)|उग्र]]&lt;br /&gt;
| [[कपर्दिन्]]&lt;br /&gt;
| [[श्रीकण्ठ]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शितकिण्ठ (शिव)|शितकिण्ठ]]&lt;br /&gt;
| [[कपालभृत]]&lt;br /&gt;
| [[वामदेव]]&lt;br /&gt;
| [[महादेव]]&lt;br /&gt;
| [[विरूपाक्ष]]&lt;br /&gt;
| [[त्रिलोचन]]&lt;br /&gt;
| [[कृशानुरेतस्]]&lt;br /&gt;
| [[धूर्जटि]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नीललोहित]]&lt;br /&gt;
| [[हर (शिव)|हर]]&lt;br /&gt;
| [[स्मरहर]]&lt;br /&gt;
| [[भर्ग]]&lt;br /&gt;
| [[त्र्यम्बक]]&lt;br /&gt;
| [[त्रिपुरान्तक]]&lt;br /&gt;
| [[गंगधर]]&lt;br /&gt;
| [[अन्धकरिपु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[क्रतुध्वंसिन]]&lt;br /&gt;
| [[वृषध्वज (शिव)|वृषध्वज]]&lt;br /&gt;
| [[व्योमकेश]]&lt;br /&gt;
| [[भव (शिव)|भव]]&lt;br /&gt;
| [[भीम (शिव)|भीम]]&lt;br /&gt;
| [[स्थाणु]]&lt;br /&gt;
| [[उमापति]]&lt;br /&gt;
| [[गिरीश (शिव)|गिरीश]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[यतिनाथ]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Shiva-Colag.jpg|250px|शिव के विभिन्न दृश्य|thumb]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{seealso|शिव चालीसा|शिवरात्रि|शिव के अवतार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Bhuteshwar-Mahadev-Temple-2.jpg|[[भूतेश्वर महादेव मथुरा|भूतेश्वर महादेव मन्दिर]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Shiva-1.jpg|शिव की काँस्य प्रतिमा, &amp;lt;br /&amp;gt;ग्युमित संग्रहालय, पेरिस, फ़्रान्स&lt;br /&gt;
चित्र:Natraj.jpg|नटराज शिव&lt;br /&gt;
चित्र:Neelkantheshwar-Temple-Mathura-3.jpg|शिवलिंग, नीलकन्ठेश्वर महादेव मन्दिर, [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Shiva-2.jpg|शिव के मंदिर पर नक़्क़ाशी &lt;br /&gt;
चित्र:Nageshwar-Mahadev-Gujarat-1.jpg|नंगेश्वर महादेव, [[द्वारका]]&lt;br /&gt;
चित्र:Galteshwar-Mahadeva-Temple-2.jpg|[[गर्तेश्वर महादेव मथुरा|गर्तेश्वर महादेव]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Statue-Shiva-Bangalore.jpg|भगवान शिव की मूर्ति, [[बेंगळूरू]]&lt;br /&gt;
चित्र:Mathura-Museum-81.jpg|शिव मूर्ति&amp;lt;br /&amp;gt;[[मथुरा संग्रहालय|राजकीय संग्रहालय]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Rangeshwar-1.jpg| [[रंगेश्वर महादेव मथुरा|रंगेश्वर महादेव मन्दिर]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Chinta-Haran-Ashram-1.jpg|शिवलिंग, चिन्ता हरण आश्रम, [[महावन]]&lt;br /&gt;
चित्र:Shiv Barat Mathura 10.jpg|शिव बारात, [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Shiv Barat Mathura 5.jpg|शिव बारात, [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Lord-Shiva-Statue-Rishikesh.jpg|भगवान शिव की मूर्ति, [[ऋषिकेश]]&lt;br /&gt;
चित्र:Nataraja-Shiva-2.jpg|नटराज शिव काँस्य प्रतिमा&lt;br /&gt;
चित्र:Statue-Shiva.jpg|भगवान शिव की मूर्ति, [[हरिद्वार]]&lt;br /&gt;
चित्र:Shiva-And-Parvati.jpg|शिव और [[पार्वती]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= |माध्यमिक=माध्यमिक2 |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
*[http://www.scribd.com/doc/133662684/Lord-Shiva-and-Shai प्रोफेसर महावीर सरन जैन - भगवान शिव एवं शैव दर्शन]&lt;br /&gt;
{{शिव मंदिर}}{{शिव2}}{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}{{द्वादश ज्योतिर्लिंग}}{{शिव}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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&lt;div&gt;[[चित्र:Shiva.jpg|thumb|[[शिव]] &amp;lt;br /&amp;gt;Shiva]]&lt;br /&gt;
{{main| शिव}}&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] का एक अन्य नाम गंगाधर भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान शिव के अन्य नाम&lt;br /&gt;
| [[सर्वज्ञ (शिव)|सर्वज्ञ]]&lt;br /&gt;
| [[मारजित् (शिव)|मारजित्]]&lt;br /&gt;
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&lt;div&gt;[[चित्र:Shiva.jpg|thumb|[[शिव]] &amp;lt;br /&amp;gt;Shiva]]&lt;br /&gt;
{{main| शिव}}&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] का एक अन्य नाम गंगधर भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<updated>2016-08-30T12:49:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Shiva.jpg|thumb|[[शिव]] &amp;lt;br /&amp;gt;Shiva]]&lt;br /&gt;
{{main| शिव}}&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव]] का ही नाम ईशान है। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान शिव के अन्य नाम&lt;br /&gt;
| [[सर्वज्ञ (शिव)|सर्वज्ञ]]&lt;br /&gt;
| [[मारजित (शिव)|मारजित]]&lt;br /&gt;
| [[रुद्र]]&lt;br /&gt;
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| [[चन्द्रशेखर (शिव)|चन्द्रशेखर]]&lt;br /&gt;
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| [[नीललोहित]]&lt;br /&gt;
| [[हर (शिव)|हर]]&lt;br /&gt;
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| [[त्रिपुरान्तक]]&lt;br /&gt;
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| [[अन्धकरिपु]]&lt;br /&gt;
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| [[उमापति]]&lt;br /&gt;
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|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{शब्द संदर्भ लघु&lt;br /&gt;
|हिन्दी=ऐश्वर्ययुक्त, शासक, प्रभु, ईश्वर, [[शिव]], [[महादेव]], (पद्य आदि में) ग्यारह की संख्या, उत्तर-पूर्व दिशा, स्वामी, धनी।&lt;br /&gt;
|व्याकरण=पुल्लिंग, [[विशेषण]]&lt;br /&gt;
|उदाहरण=ईशान ग्यारह रुद्रों में से एक रुद्र का नाम है।&lt;br /&gt;
|विशेष=ईशानादिपंचमूर्ति- पुल्लिंग- शिव के पाँच नाम- रूप- ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात।&lt;br /&gt;
|पर्यायवाची=धन वैभवशाली, ईश्वर, ऐश्वर्यशाली, पूर्णश्री, दीप्ति, आभा, इंदिरा, उभास, उल्लास, [[ओज]], ओप, कांति, चमक, छटा, जगमगाहट, जगर-मगर, जाज्वल्यता, ज्योति, [[तेज]], त्विषा, दमक, दिव्यता, द्युति, द्युम्न, नुर, प्रतिभा, प्रभा, प्रभास, भर्ग, भाति, भामा, भासता, मयूख, मरीचि, रौनक़, लश, लास, लेश्या, वर्चस, विभा, विलास, शुक्र, शुचि, शुभ्र, श्री, सुप्रभा, सुषमा, हिरण्य।&lt;br /&gt;
|संस्कृत=[ईश् + शानच्] ईशानः [ईश् ताच्छील्ये चानश्], शासक, स्वामी, मालिक, शिव&amp;lt;ref&amp;gt;कु. 7।56&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[सूर्य देवता|सूर्य]] (शिव के रूप में), [[विष्णु]]- नी [[दुर्गा]]&lt;br /&gt;
|अन्य ग्रंथ=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{शिव2}}&lt;br /&gt;
{{द्वादश ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
{{शिव}}&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]  &lt;br /&gt;
[[Category:पर्यायवाची कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>शाण्डिल्योपनिषद</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;br /&gt;
अथर्ववेदीय इस उपनिषद में 'योगविद्या', 'ब्रह्मविद्या' और 'अक्षरब्रह्म' के विषय में ऋषिवर शाण्डिल्य प्रश्न उठाते हैं, जिनका उत्तर महामुनि अथर्वा द्वारा दिया जाता हैं इस उपनिषद में तीन अध्याय हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''प्रथम अध्याय''' में महामुनि अथर्वा 'अष्टांग योग' का ग्यारह खण्डों में विशद विवेचन करते हैं वे यम-नियम , नाड़ी-शोधन की प्रक्रिया, कुण्डलिनी-जागरण, प्राणायाम आदि का विस्तृत विवेचन करते हैं किसी सिद्ध योगी के सान्निध्य और दिशा-निर्देश में ही इस अष्टांग योग की साधना करनी चाहिए। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''दूसरे अध्याय''' में महामुनि अथर्वा 'ब्रह्मविद्या' के विषय में विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करते हैं। वे ब्रह्म की सर्वव्यापकता, उसकी अनिर्वचनीयता, उसका लोकोत्तर स्वरूप तथा उस ब्रह्म को स्वयं साधक द्वारा अपने ही हृदय में जानने की प्रणाली बताते हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''तीसरे अध्याय''' में [[शाण्डिल्य]] ऋषि प्रश्न करते हैं कि जो 'ब्रह्म' एक अक्षर-स्वरूप है, निष्क्रिय है, [[शिव]] है, सत्तामात्र है और आत्म-स्वरूप है, वह जगत का निर्माण, पोषण एवं संहार किस प्रकार कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए महामुनि अथर्वा ब्रह्म के सकल-निष्कल भेद को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 'ब्रह्म' के संकल्प मात्र से ही सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है, विकास होता है और पुन: उसी में विलय हो जाता है। अन्त में [[दत्तात्रेय]] देवपुरुष की स्तुति की स्थापना की गयी है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संस्कृत साहित्य}}&lt;br /&gt;
{{अथर्ववेदीय उपनिषद}}&lt;br /&gt;
[[Category:दर्शन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उपनिषद]][[Category:संस्कृत साहित्य]]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>अकबर का विवाह</title>
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		<updated>2016-08-30T10:38:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अकबर विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक शासक&lt;br /&gt;
|चित्र=Akbar.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=अकबर &lt;br /&gt;
|पूरा नाम=जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=15 अक्टूबर सन् 1542 (लगभग)&amp;lt;ref name=&amp;quot;akbarnama&amp;quot;&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=अकबरनामा |लेखक=शेख अबुल फजल |अनुवादक=डॉ. मथुरालाल शर्मा |आलोचक= |प्रकाशक=राधा पब्लिकेशन, नई दिल्ली |संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=1 |url=|ISBN=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[अमरकोट]], [[सिंध प्रांत|सिन्ध]] ([[पाकिस्तान]])&lt;br /&gt;
|पिता/माता=[[हुमायूँ]], मरियम मक़ानी&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=मरीयम-उज़्-ज़मानी (हरका बाई)&lt;br /&gt;
|संतान=[[जहाँगीर]] के अलावा 5 पुत्र 7 बेटियाँ&lt;br /&gt;
|उपाधि=जलाल-उद-दीन&lt;br /&gt;
|राज्य सीमा=उत्तर और मध्य भारत  &lt;br /&gt;
|शासन काल=27 जनवरी, 1556 - 27 अक्टूबर, 1605&lt;br /&gt;
|शासन अवधि=49 वर्ष&lt;br /&gt;
|धार्मिक मान्यता=नया मज़हब बनाया [[दीन-ए-इलाही]]&lt;br /&gt;
|राज्याभिषेक=14 फ़रबरी 1556 कलानपुर के पास [[गुरदासपुर]]&lt;br /&gt;
|युद्ध=[[पानीपत]], [[हल्दीघाटी]]&lt;br /&gt;
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|सुधार-परिवर्तन=[[जज़िया]] हटाया, [[राजपूत|राजपूतों]] से विवाह संबंध&lt;br /&gt;
|राजधानी= [[फ़तेहपुर सीकरी]] [[आगरा]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|पूर्वाधिकारी=[[हुमायूँ]] &lt;br /&gt;
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|वंश=[[तैमूर लंग|तैमूर]] और [[चंगेज़ ख़ाँ|चंगेज़ ख़ाँ]] का वंश&lt;br /&gt;
|मृत्यु तिथि=27 अक्टूबर सन् 1605 (उम्र 63 वर्ष)&lt;br /&gt;
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|मक़बरा=[[सिकंदरा आगरा|सिकन्दरा]], [[आगरा]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[मुग़ल काल]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर''' [[भारत]] का महानतम मुग़ल शहंंशाह बादशाह था। जिसने मुग़ल शक्ति का भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में विस्तार किया। [[अकबर]] को अकबर-ऐ-आज़म, शहंशाह अकबर तथा महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] से अकबर [[दिसम्बर]] 1556 में [[सरहिन्द]] लौट आया, क्योंकि अभी सिकन्दर सूर सर नहीं हुआ था। [[मई]], 1557 में सिकन्दर ने मानकोट (रामकोट, [[जम्मू]]) के पहाड़ी क़िले में कितनी ही देर तक घिरे रहने के बाद आत्म समर्पण किया। उसे ख़रीद और [[बिहार]] के ज़िले जागीर में मिले, जहाँ पर वह दो वर्ष के बाद मर गया। [[काबुल]] से शाही बेगमें भी मानकोट पहुँची। उनके स्वागत के लिए अकबर दो मंज़िल आगे आया। मानकोट से [[लाहौर]] होते [[जालंधर]] पहुँचने पर बैरम ख़ाँ ने हुमायूँ की भाँजी सलीमा बेगम से विवाह किया। लेकिन यह विवाह कुछ ही समय का रहा, क्योंकि 31 जनवरी, 1561 में बैरम ख़ाँ की हत्या के बाद फूफी की लड़की सलीमा से अकबर ने विवाह किया। सलीमा अकबर की बहुत प्रभावशालिनी बीबी बनी और 1621 ई. में मरी। अक्टूबर, 1558 में अकबर दिल्ली से दल-बल सहित [[यमुना नदी]] से नाव द्वारा आगरा पहुँचा। यद्यपि आगरा एक नगण्य नगर नहीं था। बाबर और सूरी ने भी उसकी क़दर की थी, तथापि उसका भाग्य अकबराबाद बनने के बाद ही जागा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिन्दू राजकुमारी से विवाह==&lt;br /&gt;
एक रात अकबर शिकार के लिए [[आगरा]] के पास के किसी गाँव से जा रहा था। वहाँ कुछ गवैयों को अजमेरी ख्वाजा का गुणगान गाते सुना। उसने मन में ख्वाजा की भक्ति जगी और 1562 की [[जनवरी]] के मध्य में थोड़े से लोगों को लेकर वह [[अजमेर]] की ओर चल पड़ा। आगरा और [[अजमेर]] के मध्य में देबसा में [[आमेर]] (पीछे [[जयपुर]]) के राजा बिहारीमल मिले और अपनी सबसे बड़ी लड़की के विवाह का प्रस्ताव रखा। अजमेर में थोड़ा ठहरकर लौटते वक़्त सांभर में राजकुमारी से अकबर ने विवाह किया। बिहारीमल के ज्येष्ठ पुत्र भगवानदास को कोई लड़का नहीं था, उन्होंने अपने भतीजे [[मानसिंह]] को गोद लिया था। राजा भगवानदास और कुँवर मानसिंह अब अकबर के सगे सम्बन्धी हो गए। इसी [[कछवाहा वंश|कछवाहा]] राजकुमारी का नाम पीछे ‘मरियम जमानी’ पड़ा, जिससे [[जहाँगीर]] पैदा हुआ। अकबर की अपनी माँ हमीदा बानू को ‘मरियम मकानी’ (सदन की मरियम) कहा जाता था। कछवाहा रानी की क़ब्र सिकन्दरा में अकबर की क़ब्र के पास एक रौजे में है, जिससे स्पष्ट है कि वह पीछे हिन्दू नहीं रही। अब तक सल्तनत के स्तम्भ तूरानी समझे जाते थे, अब [[राजपूत]] भी स्तम्भ बने और वह तूरानियों से अधिक दृढ़ साबित हुए। अकबरी दरबार के इतिहासकार '[[अबुल फ़ज़ल]]' कृत '[[आइना-ए-अकबरी]]' में और [[जहाँगीर]] के लिखे आत्मचरित 'तुजुक जहाँगीर' में उसे मरियम ज़मानी ही कहा गया है। यह उपाधि उसे सलीम के जन्म पर सन् 1569 में दी गई थी। कुछ लोगों ने उसका नाम जोधाबाई लिख दिया है, जो सही नहीं है। जोधाबाई [[जोधपुर]] के [[राणा उदयसिंह|राजा उदयसिंह]] की पुत्री थी, जिसका विवाह सलीम के साथ सन् 1585 में हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह सम्राट अकबर की महारानी और जहाँगीर की माता होने से [[मुग़ल]] [[अंत:पुर]] की सर्वाधिक प्रतिष्ठित नारी थी। वह मुस्लिम बादशाह से विवाह होने पर भी [[हिन्दू धर्म]] के प्रति निष्ठावान रही। सम्राट अकबर ने उसे पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी थी। वह हिन्दू धर्म के अनुसार धर्मोपासना, उत्सव−त्यौहार एवं रीति−रिवाजों को करती थी। उसकी मृत्यु सम्राट अकबर के देहावसान के 18 वर्ष पश्चात्‌ सन् 1623 में [[आगरा]] में हुई थी। उसकी याद में एक भव्य स्मारक आगरा के निकटवर्ती [[सिकंदरा आगरा|सिकंदरा]] नामक स्थान पर सम्राट के मक़बरे के समीप बनाया गया, जो आज भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=|माध्यमिक=माध्यमिक2|पूर्णता= |शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मुग़ल साम्राज्य}}{{अकबर के नवरत्न}}{{मुग़ल काल}}{{सल्तनतकालीन प्रशासन}}&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]][[Category:मुग़ल साम्राज्य]][[Category:जीवनी साहित्य]][[Category:मध्य काल]][[Category:इतिहास कोश]][[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>अकबर का विवाह</title>
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		<updated>2016-08-30T10:35:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अकबर विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक शासक&lt;br /&gt;
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|जन्म भूमि=[[अमरकोट]], [[सिंध प्रांत|सिन्ध]] ([[पाकिस्तान]])&lt;br /&gt;
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|शासन काल=27 जनवरी, 1556 - 27 अक्टूबर, 1605&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर''' [[भारत]] का महानतम मुग़ल शहंंशाह बादशाह था। जिसने मुग़ल शक्ति का भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में विस्तार किया। [[अकबर]] को अकबर-ऐ-आज़म, शहंशाह अकबर तथा महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] से अकबर [[दिसम्बर]] 1556 में [[सरहिन्द]] लौट आया, क्योंकि अभी सिकन्दर सूर सर नहीं हुआ था। [[मई]], 1557 में सिकन्दर ने मानकोट (रामकोट, [[जम्मू]]) के पहाड़ी क़िले में कितनी ही देर तक घिरे रहने के बाद आत्म समर्पण किया। उसे ख़रीद और [[बिहार]] के ज़िले जागीर में मिले, जहाँ पर वह दो वर्ष के बाद मर गया। [[काबुल]] से शाही बेगमें भी मानकोट पहुँची। उनके स्वागत के लिए अकबर दो मंज़िल आगे आया। मानकोट से [[लाहौर]] होते [[जालंधर]] पहुँचने पर बैरम ख़ाँ ने हुमायूँ की भाँजी सलीमा बेगम से विवाह किया। लेकिन यह विवाह कुछ ही समय का रहा, क्योंकि 31 जनवरी, 1561 में बैरम ख़ाँ की हत्या के बाद फूफी की लड़की सलीमा से अकबर ने विवाह किया। सलीमा अकबर की बहुत प्रभावशालिनी बीबी बनी और 1621 ई. में मरी। अक्टूबर, 1558 में अकबर दिल्ली से दल-बल सहित [[यमुना नदी]] से नाव द्वारा आगरा पहुँचा। यद्यपि आगरा एक नगण्य नगर नहीं था। बाबर और सूरी ने भी उसकी क़दर की थी, तथापि उसका भाग्य अकबराबाद बनने के बाद ही जागा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिन्दू राजकुमारी से विवाह==&lt;br /&gt;
एक रात अकबर शिकार के लिए [[आगरा]] के पास के किसी गाँव से जा रहा था। वहाँ कुछ गवैयों को अजमेरी ख्वाजा का गुणगान गाते सुना। उसने मन में ख्वाजा की भक्ति जगी और 1562 की [[जनवरी]] के मध्य में थोड़े से लोगों को लेकर वह [[अजमेर]] की ओर चल पड़ा। आगरा और [[अजमेर]] के मध्य में देबसा में [[आमेर]] (पीछे [[जयपुर]]) के राजा बिहारीमल मिले और अपनी सबसे बड़ी लड़की के विवाह का प्रस्ताव रखा। अजमेर में थोड़ा ठहरकर लौटते वक़्त सांभर में राजकुमारी से अकबर ने विवाह किया। बिहारीमल के ज्येष्ठ पुत्र भगवानदास को कोई लड़का नहीं था, उन्होंने अपने भतीजे [[मानसिंह]] को गोद लिया था। राजा भगवानदास और कुँवर मानसिंह अब अकबर के सगे सम्बन्धी हो गए। इसी [[कछवाहा वंश|कछवाहा]] राजकुमारी का नाम पीछे ‘मरियम जमानी’ पड़ा, जिससे [[जहाँगीर]] पैदा हुआ। अकबर की अपनी माँ हमीदा बानू को ‘मरियम मकानी’ (सदन की मरियम) कहा जाता था। कछवाहा रानी की क़ब्र सिकन्दरा में अकबर की क़ब्र के पास एक रौजे में है, जिससे स्पष्ट है कि वह पीछे हिन्दू नहीं रही। अब तक सल्तनत के स्तम्भ तूरानी समझे जाते थे, अब [[राजपूत]] भी स्तम्भ बने और वह तूरानियों से अधिक दृढ़ साबित हुए। अकबरी दरबार के इतिहासकार '[[अबुल फ़ज़ल]]' कृत '[[आइना-ए-अकबरी]]' में और [[जहाँगीर]] के लिखे आत्मचरित 'तुजुक जहाँगीर' में उसे मरियम ज़मानी ही कहा गया है। यह उपाधि उसे सलीम के जन्म पर सन् 1569 में दी गई थी। कुछ लोगों ने उसका नाम जोधाबाई लिख दिया है, जो सही नहीं है। जोधाबाई [[जोधपुर]] के [[राणा उदयसिंह|राजा उदयसिंह]] की पुत्री थी, जिसका विवाह सलीम के साथ सन् 1585 में हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह सम्राट अकबर की महारानी और जहाँगीर की माता होने से [[मुग़ल]] [[अंत:पुर]] की सर्वाधिक प्रतिष्ठित नारी थी। वह मुस्लिम बादशाह से विवाह होने पर भी [[हिन्दू धर्म]] के प्रति निष्ठावान रही। सम्राट अकबर ने उसे पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी थी। वह हिन्दू धर्म के अनुसार धर्मोपासना, उत्सव−त्यौहार एवं रीति−रिवाजों को करती थी। उसकी मृत्यु सम्राट अकबर के देहावसान के 18 वर्ष पश्चात्‌ सन् 1623 में [[आगरा]] में हुई थी। उसकी याद में एक भव्य स्मारक आगरा के निकटवर्ती [[सिकंदरा आगरा|सिकंदरा]] नामक स्थान पर सम्राट के मक़बरे के समीप बनाया गया, जो आज भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=|माध्यमिक=माध्यमिक2|पूर्णता= |शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मुग़ल साम्राज्य}}{{अकबर के नवरत्न}}{{मुग़ल काल}}{{सल्तनतकालीन प्रशासन}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>हनुमान बजरंग बाण</title>
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		<updated>2016-08-30T10:15:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Hanuman.jpg|thumb|250px|[[हनुमान]]&amp;lt;br /&amp;gt; Hanuman]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दोहा'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करें सनमान ।&lt;br /&gt;
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चौपाई'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: maroon&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;जय हनुमन्त सन्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।&lt;br /&gt;
जन के काज विलम्ब न कीजै । आतुर दौरि महासुख दीजै ।।&lt;br /&gt;
जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा । सुरसा बदन पैठि विस्तारा ।।&lt;br /&gt;
आगे जाई लंकिनी रोका । मारेहु लात गई सुर लोका ।।&lt;br /&gt;
जाय विभीषण को सुख दीन्हा । सीता निरखि परमपद लीन्हा ।।&lt;br /&gt;
बाग़ उजारि सिन्धु महँ बोरा । अति आतुर जमकातर तोरा ।।&lt;br /&gt;
अक्षयकुमार को मारि संहारा । लूम लपेट लंक को जारा ।।&lt;br /&gt;
लाह समान लंक जरि गई । जय जय धुनि सुरपुर में भई ।।&lt;br /&gt;
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी । कृपा करहु उर अन्तर्यामी ।।&lt;br /&gt;
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता । आतुर होय दुख हरहु निपाता ।।&lt;br /&gt;
जै गिरिधर जै जै सुखसागर । सुर समूह समरथ भटनागर ।।&lt;br /&gt;
जय हनु हनु हनुमंत हठीले । बैरिहिंं मारु बज्र की कीले ।।&lt;br /&gt;
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो । महाराज प्रभु दास उबारो ।।&lt;br /&gt;
ऊँकार हुंकार प्रभु धावो । बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ।।&lt;br /&gt;
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा । ऊँ हुं हुं हनु अरि उर शीशा ।।&lt;br /&gt;
सत्य होहु हरि शपथ पाय के । रामदूत धरु मारु जाय के ।।&lt;br /&gt;
जय जय जय हनुमन्त अगाधा । दुःख पावत जन केहि अपराधा ।।&lt;br /&gt;
पूजा जप तप नेम अचारा । नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ।।&lt;br /&gt;
वन उपवन, मग गिरिगृह माहीं । तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ।।&lt;br /&gt;
पांय परों कर ज़ोरि मनावौं । यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।&lt;br /&gt;
जय अंजनिकुमार बलवन्ता । शंकरसुवन वीर हनुमन्ता ।।&lt;br /&gt;
बदन कराल काल कुल घालक । राम सहाय सदा प्रतिपालक ।।&lt;br /&gt;
भूत प्रेत पिशाच निशाचर । अग्नि बेताल काल मारी मर ।।&lt;br /&gt;
इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की । राखु नाथ मरजाद नाम की ।।&lt;br /&gt;
जनकसुता हरिदास कहावौ । ताकी शपथ विलम्ब न लावो ।।&lt;br /&gt;
जय जय जय धुनि होत अकाशा । सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा ।।&lt;br /&gt;
चरण शरण कर ज़ोरि मनावौ । यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।&lt;br /&gt;
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई । पांय परों कर ज़ोरि मनाई ।।&lt;br /&gt;
ॐ चं चं चं चं चपत चलंता । ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ।।&lt;br /&gt;
ऊँ हँ हँ हांक देत कपि चंचल । ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल ।।&lt;br /&gt;
अपने जन को तुरत उबारो । सुमिरत होय आनन्द हमारो ।।&lt;br /&gt;
यह बजरंग बाण जेहि मारै । ताहि कहो फिर कौन उबारै ।।&lt;br /&gt;
पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षा करै प्राण की ।।&lt;br /&gt;
यह बजरंग बाण जो जापै । ताते भूत प्रेत सब कांपै ।।&lt;br /&gt;
धूप देय अरु जपै हमेशा । ताके तन नहिं रहै कलेशा ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दोहा'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान ।&lt;br /&gt;
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|हनुमान चालीसा|हनुमान जी की आरती|संकटमोचन हनुमानाष्टक}}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}{{हनुमान2}}{{हनुमान}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू_धर्म_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:हनुमान]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=568295</id>
		<title>राम स्तुति</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=568295"/>
		<updated>2016-08-30T09:55:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ramayana.jpg|श्री [[राम]], [[लक्ष्मण]] और [[सीता]]&amp;lt;br /&amp;gt; Shri Ram, Laxman And Sita|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: maroon&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;श्री रामचंद्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणम् |&lt;br /&gt;
नवकंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कन्जारुणम्‌ ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कंदर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरज सुन्दरम्‌ |&lt;br /&gt;
पटपीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकंदनम |&lt;br /&gt;
रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथनन्दनम्‌ ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं |&lt;br /&gt;
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्‌ |&lt;br /&gt;
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खल दल गंजनम्‌ ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरो |&lt;br /&gt;
करुणानिधान सुजान शील सनेह जानत रावरो ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली |&lt;br /&gt;
तुलसी भवानिहिंं पूँजि पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहीं | &lt;br /&gt;
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे || &lt;br /&gt;
 ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|राम|राम चालीसा|रामचंद्र जी की आरती|}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राम]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=568293</id>
		<title>गायत्री मन्त्र</title>
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		<updated>2016-08-30T09:35:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* गायत्री मंत्र पर महापुरुषों के विचार */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Gayatri-Mantra.jpg|thumb|गायत्री मन्त्र|200px]]&lt;br /&gt;
'''गायत्री मन्त्र''' [[हिन्दू]] [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] का मूल मंत्र है, विशेषकर उनका जो [[जनेऊ]] धारण करते हैं। इस मंत्र के द्वारा वे देवी का आह्वान करते हैं। यह मंत्र [[सूर्य देव|सूर्य भगवान]] को समर्पित है। इसलिए इस मंत्र को सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पढ़ा जाता है। वैदिक शिक्षा लेने वाले युवकों के [[उपनयन संस्कार|उपनयन]] और जनेऊ संस्कार के समय भी इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है। ऐसी शिक्षा को 'गायत्री दीक्षा' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
==सबसे पवित्र मन्त्र==&lt;br /&gt;
'[[गायत्री]]', 'सावित्री' और 'सरस्वती' एक ही ब्रह्मशक्ति के नाम हैं। इस संसार में सत-असत जो कुछ हैं, वह सब ब्रह्मस्वरूपा गायत्री ही हैं। भगवान [[व्यास]] कहते हैं- &amp;quot;जिस प्रकार [[पुष्प|पुष्पों]] का सार मधु, [[दूध]] का सार [[घृत]] और रसों का सार पय है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार है। गायत्री [[वेद|वेदों]] की जननी और पाप-विनाशिनी हैं, गायत्री मन्त्र से बढ़कर अन्य कोई पवित्र [[मन्त्र]] [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] पर नहीं है। गायत्री मन्त्र ऋक्, यजु, साम, काण्व, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय आदि सभी वैदिक संहिताओं में प्राप्त होता है, किन्तु सर्वत्र एक ही मिलता है। इसमें चौबीस अक्षर हैं। मन्त्र का मूल स्वरूप इस प्रकार है-&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;'''ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।'''&amp;lt;ref&amp;gt;वाजसनेयी सं0 3।35&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् 'सृष्टिकर्ता प्रकाशमान  परमात्मा के प्रसिद्ध पवणीय तेज़ का (हम) ध्यान करते हैं, वे परमात्मा हमारी बुद्धि को (सत् की ओर) प्रेरित करें।&lt;br /&gt;
( अर्थः- उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। )&lt;br /&gt;
==महत्त्व==&lt;br /&gt;
गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मंत्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मंत्र से हो सकता है, गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। समस्त धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा एक स्वर में कही गयी है। [[अथर्ववेद]] में गायत्री को आयु, विद्या, संतान, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है। [[विश्वामित्र|विश्वामित्र ऋषि]] ने कहा है, &amp;quot;गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। संपूर्ण [[वेद]], [[यज्ञ]], दान, तप गायत्री की एक कला के समान भी नहीं हैं।&amp;quot;&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://www.prabhasakshi.com/ShowArticle.aspx?ArticleId=120329-113601-140010|title= सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना गया है गायत्री को|accessmonthday= 31 जनवरी|accessyear= 2015|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= प्रभा साक्षी|language= हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==24 अक्षर==&lt;br /&gt;
गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में अनेक ज्ञान-विज्ञान छिपे हुए हैं। गायत्री साधना द्वारा [[आत्मा]] का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि-सिद्धियां परिलक्षित होने लगती हैं। गायत्री उपासना से तुरंत आत्मबल बढ़ता है। गायत्री साधना एक बहुमूल्य दिव्य संपत्ति है। इस संपत्ति को इकट्ठी करके साधक उसके बदले में सांसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों का गुंथन ऐसा विचित्र एवं रहस्यमय है कि उनके उच्चारण मात्र से जिव्हा, कंठ, तालु एवं मूर्धा में अवस्थित नाड़ी तंतुओं का एक अद्भुत क्रम में संचालन होता है। इस प्रकार गायत्री के जप से अनायास ही एक महत्वपूर्ण योग साधना होने लगती है और उन गुप्त शक्ति केंद्रों के जागरण से आश्चर्यजनक लाभ मिलने लगता है।&lt;br /&gt;
====भगवान का नारी स्वरूप 'गायत्री'====&lt;br /&gt;
'[[गायत्री देवी|गायत्री]]' भगवान का नारी रूप है। भगवान की [[माता]] के रूप में उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज़ की तरह वे भी हमारे लिए उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। गायत्री को &amp;quot;भूलोक की कामधेनु&amp;quot; कहा गया है। गायत्री को 'सुधा' भी कहा गया है, क्योंकि जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण हैं। गायत्री को 'पारसमणि' कहा गया है, क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अंत:करणों का शुद्ध [[स्वर्ण]] जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को '[[कल्पवृक्ष]]' कहा गया है, क्योंकि इसकी छाया में बैठकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिए उचित एवं आवश्यक है। श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का आंचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणपरक होता है। गायत्री को 'ब्रह्मास्त्र' कहा गया है, क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता है।&lt;br /&gt;
==साधना के नियम==&lt;br /&gt;
गायत्री साधना के नियम बहुत सरल हैं। [[स्नान]] आदि से शुद्ध होकर प्रात:काल पूर्व की ओर, सायंकाल पश्चिम की ओर मुंह करके, आसन बिछाकर जप के लिए बैठना चाहिए। पास में [[जल]] का पात्र तथा [[धूपबत्ती]] जलाकर रख लेनी चाहिए। जल और [[अग्नि]] को साक्षी रूप में समीप रखकर जप करना उत्तम है। आरम्भ में गायत्री के चित्र का पूजन अभिवादन या [[ध्यान]] करना चाहिए, पीछे जप इस प्रकार आरम्भ करना चाहिए कि कंठ से [[ध्वनि]] होती रहे, होंठ हिलते रहें, पर पास बैठा हुआ भी दूसरा मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से न सुन समझ सके। तर्जनी उंगली से माला का स्पर्श करना चाहिए। एक माला पूरी होने के बाद उसे उलट देना चाहिए। कम से कम 108 मंत्र नित्य जपने चाहिए। जप पूरा होने पर पास में रखे हुए जल को [[सूर्य]] के सामने अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए। [[रविवार]] गायत्री का दिन है, उस दिन उपवास या हवन हो सके तो उत्तम है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==गायत्री मंत्र पर महापुरुषों के विचार==&lt;br /&gt;
*&amp;quot;गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त ह्रदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।&amp;quot; -[[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&amp;quot;ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमको दिऐ हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है।&amp;quot; -[[मदन मोहन मालवीय|महामना मदन मोहन मालवीय]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&amp;quot;भारतवर्ष को जगाने वाला जो मंत्र है, वह इतना सरल है कि एक ही श्वाँस में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह मंत्र है गायत्री मंत्र।&amp;quot; -[[रवींद्रनाथ टैगोर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&amp;quot;गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है, जो महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकती है।&amp;quot; -[[अरविंद घोष|योगी अरविंद]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&amp;quot;गायत्री का जप करने से बडी‍-बडी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।&amp;quot; -[[रामकृष्ण परमहंस|स्वामी रामकृष्ण परमहंस]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&amp;quot;गायत्री सद्‌बुद्धि का मंत्र है, इसलिए उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है।&amp;quot; -[[विवेकानंद|स्वामी विवेकानंद]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|गायत्री|गायत्री चालीसा|गायत्री माता की आरती}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]][[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%AF_%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=568292</id>
		<title>महामृत्युंजय मन्त्र</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%AF_%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=568292"/>
		<updated>2016-08-30T09:27:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*महर्षि [[वसिष्ठ]] ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण [[मन्त्र]] की रचना की थी जो महामृत्युंजय मन्त्र कहलाता है। &lt;br /&gt;
*इससे लम्बी आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु से रक्षा हो जाती है। &lt;br /&gt;
*[[ऋग्वेद]] में यह मन्त्र इस प्रकार उपलब्ध है –&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
''' ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंं पुष्टिवर्धनम्'''&lt;br /&gt;
'''उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय्‌ मामृतात्‌॥'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=568291</id>
		<title>श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B6%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=568291"/>
		<updated>2016-08-30T09:19:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ramayana.jpg|thumb|[[रामायण]] में [[राम]], [[लक्ष्मण]] और [[सीता]]]]&lt;br /&gt;
;श्री लक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: maroon&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली&lt;br /&gt;
ॐ प्रकृत्यै नमः । ॐ विकृत्यै नमः । ॐ विद्यायै नमः । ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ विभूत्यै नमः । ॐ सुरभ्यै नमः । ॐ परमात्मिकायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ वाचे नमः । ॐ पद्मालयायै नमः । ॐ पद्मायै नमः । ॐ शुचये नम ।  &lt;br /&gt;
ॐ स्वाहायै नमः । ॐ स्वधायै नमः । ॐ सुधायै नमः । ॐ धन्यायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ हिरण्मय्यै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । ॐ नित्यपुष्टायै नमः । ॐ विभावर्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ अदित्यै नमः । ॐ दित्ये नमः । ॐ दीपायै नमः । ॐ वसुधायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ वसुधारिण्यै नमः । ॐ कमलायै नमः । ॐ कान्तायै नमः । ॐ कामाक्ष्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ क्रोधसंभवायै नमः । ॐ अनुग्रहप्रदायै नमः । ॐ बुद्धये नमः । ॐ अनघायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ हरिवल्लभायै नमः । ॐ अशोकायै नमः । ॐ अमृतायै नमः । ॐ दीप्तायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ लोकशोकविनाशिन्यै नमः । ॐ धर्मनिलयायै नमः । ॐ करुणायै नमः । ॐ लोकमात्रे नमः । &lt;br /&gt;
ॐ पद्मप्रियायै नमः । ॐ पद्महस्तायै नमः । ॐ पद्माक्ष्यै नमः । ॐ पद्मसुन्दर्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ पद्मोद्भवायै नमः । ॐ पद्ममुख्यै नमः । ॐ पद्मनाभप्रियायै नमः । ॐ रमायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ पद्ममालाधरायै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ पद्मिन्यै नमः । ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ पुण्यगन्धायै नमः । ॐ सुप्रसन्नायै नमः । ॐ प्रसादाभिमुख्यै नमः ।ॐ प्रभायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ चन्द्रवदनायै नमः । ॐ चन्द्रायै नमः । ॐ चन्द्रसहोदर्यै नमः । ॐ चतुर्भुजायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ चन्द्ररूपायै नमः । ॐ इन्दिरायै नमः । ॐ इन्दुशीतलायै नमः । ॐ आह्लादजनन्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ पुष्टयै नमः । ॐ शिवायै नमः । ॐ शिवकर्यै नमः । ॐ सत्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ विमलायै नमः । ॐ विश्वजनन्यै नमः । ॐ तुष्टयै नमः । ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ प्रीतिपुष्करिण्यै नमः । ॐ शान्तायै नमः । ॐ शुक्लमाल्यांबरायै नमः । ॐ श्रियै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ भास्कर्यै नमः । ॐ बिल्वनिलयायै नमः । ॐ वरारोहायै नमः । ॐ यशस्विनयै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ वसुन्धरायै नमः । ॐ उदारांगायै नमः । ॐ हरिण्यै नमः । ॐ हेममालिन्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ धनधान्यकर्ये नमः । ॐ सिद्धये नमः । ॐ स्त्रैणसौम्यायै नमः । ॐ शुभप्रदाये नमः । &lt;br /&gt;
ॐ नृपवेश्मगतानन्दायै नमः । ॐ वरलक्ष्म्यै नमः । ॐ वसुप्रदायै नमः । ॐ शुभायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ हिरण्यप्राकारायै नमः । ॐ समुद्रतनयायै नमः । ॐ जयायै नमः । ॐ मंगलादेव्यै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ विष्णुवक्षस्स्थलस्थितायै नमः । ॐ विष्णुपत्न्यै नमः । ॐ प्रसन्नाक्ष्यै नमः । ॐ नारायणसमाश्रितायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ दारिद्र्यध्वंसिन्यै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ सर्वोपद्रव वारिण्यै नमः । ॐ नवदुर्गायै नमः । &lt;br /&gt;
ॐ महाकाल्यै नमः । ॐ ब्रह्माविष्णुशिवात्मिकायै नमः । ॐ त्रिकालज्ञानसंपन्नायै नमः । ॐ भुवनेश्वर्यै नमः ।&lt;br /&gt;
इति श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशत सहस्रनामावली ॥ &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]][[Category:हिन्दू धर्म]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=568274</id>
		<title>गुप्त नवरात्र</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=568274"/>
		<updated>2016-08-30T07:42:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* घट स्थापना */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा त्योहार&lt;br /&gt;
|चित्र=Durga-Mata.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देवी दुर्गा&lt;br /&gt;
|अन्य नाम =माघी नवरात्र, आषाढ़ी नवरात्र&lt;br /&gt;
|अनुयायी =[[हिन्दू]], भारतीय&lt;br /&gt;
|उद्देश्य = &lt;br /&gt;
|प्रारम्भ = &lt;br /&gt;
|तिथि=गुप्त नवरात्र [[माघ मास]] में [[शुक्ल पक्ष]] व [[आषाढ़ मास]] के शुक्ल पक्ष में आते हैं। &lt;br /&gt;
|उत्सव =इन दिनों में [[दुर्गा|देवी दुर्गा]] के व्रत रखे जाते हैं और स्थान–स्थान पर माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष [[पूजा]] की जाती है।&lt;br /&gt;
|अनुष्ठान =&lt;br /&gt;
|धार्मिक मान्यता =&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि =&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[शैलपुत्री प्रथम|शैलपुत्री]], [[ब्रह्मचारिणी द्वितीयं|ब्रह्मचारिणी]], [[चंद्रघंटा तृतीय|चंद्रघंटा]], [[कूष्माण्डा चतुर्थ|कूष्माण्डा]], [[स्कन्दमाता पंचम|स्कन्दमाता]], [[कात्यायनी षष्टम|कात्यायनी]], [[कालरात्रि सप्तम|कालरात्रि]], [[महागौरी अष्टम|महागौरी]] और [[सिद्धिदात्री नवम|सिद्धिदात्री]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=विवरण&lt;br /&gt;
|पाठ 1='चैत्र' या 'वासंतिक नवरात्र' और 'आश्विन' या 'शारदीय नवरात्र' के अतिरिक्त भी दो और [[नवरात्र]] होते हैं, जिन्हें 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=महत्त्व&lt;br /&gt;
|पाठ 2=गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, जैसे- [[विवाह]], नौकरी, रोग, धन-सम्पदा, [[ग्रह|ग्रहों]] का विपरीत प्रभाव आदि।&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&amp;quot;शिवसंहिता&amp;quot; के अनुसार गुप्त नवरात्र भगवान [[शंकर]] और आदिशक्ति [[पार्वती|माँ पार्वती]] की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''गुप्त नवरात्र''' [[हिन्दू धर्म]] में उसी प्रकार मान्य हैं, जिस प्रकार 'शारदीय' और 'चैत्र नवरात्र'। [[आषाढ़ मास|आषाढ़]] और [[माघ मास|माघ माह]] के [[नवरात्र|नवरात्रों]] को &amp;quot;गुप्त नवरात्र&amp;quot; कह कर पुकारा जाता है। बहुत कम लोगों को ही इसके ज्ञान या छिपे हुए होने के कारण इसे 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है। गुप्त नवरात्र मनाने और इनकी साधना का विधान 'देवी भागवत' व अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रों के महत्त्व को बतलाते हुए कहा है कि- &amp;quot;जिस प्रकार वासंतिक नवरात्र में भगवान [[विष्णु]] की [[पूजा]] और शारदीय नवरात्र में देवी शक्ति की नौ देवियों की पूजा की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं। यदि कोई इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करें, तो जीवन धन-धान्य, राज्य सत्ता और ऐश्वर्य से भर जाता है।&lt;br /&gt;
==तिथि==&lt;br /&gt;
सामान्यत: लोग [[वर्ष]] में पड़ने वाले केवल दो नवरात्रों के बारे में ही जानते हैं- 'चैत्र' या 'वासंतिक नवरात्र' व 'आश्विन' या 'शारदीय नवरात्र', जबकि इसके अतिरिक्त दो और [[नवरात्र]] भी होते हैं, जिनमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। कम लोगों को इसका ज्ञान होने के कारण या इसके छिपे हुए होने के कारण ही इसको &amp;quot;गुप्त नवरात्र&amp;quot; कहते हैं। वर्ष में दो बार गुप्त नवरात्र आते हैं- [[माघ मास]] के [[शुक्ल पक्ष]] व [[आषाढ़ मास]] के शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार कुल मिला कर वर्ष में चार नवरात्र होते हैं। यह चारों ही नवरात्र ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं। इस विशेष अवसर पर अपनी विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-पाठ आदि किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
==महत्त्व==&lt;br /&gt;
गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधना काल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। &amp;quot;दुर्गावरिवस्या&amp;quot; नामक [[ग्रंथ]] में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता [[दुर्गा]] की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। &amp;quot;शिवसंहिता&amp;quot; के अनुसार ये नवरात्र भगवान [[शंकर]] और आदिशक्ति [[पार्वती|माँ पार्वती]] की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.patrika.com/article.aspx?id=40352|title=सिद्धिदायक हैं- गुप्त नवरात्र|accessmonthday=06 जून|accessyear=2013|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt; गुप्त नवरात्रों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से कई बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं, जैसे-&lt;br /&gt;
====विवाह बाधा====&lt;br /&gt;
वे कुमारी कन्याएँ जिनके [[विवाह]] में बाधा आ रही हो, उनके लिए गुप्त नवरात्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। कुमारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इन नौ दिनों में माता [[कात्यायनी]] की [[पूजा]]-उपासना करनी चाहिए। &amp;quot;दुर्गास्तवनम्&amp;quot; जैसे प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि इस [[मंत्र]] का 108 बार जप करने से कुमारी कन्या का विवाह शीघ्र ही योग्य वर से संपन्न हो जाता है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।&lt;br /&gt;
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*इसी प्रकार जिन पुरुषों के विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें भी [[लाल रंग]] के पुष्पों की माला देवी को चढ़ाकर निम्न मंत्र का 108 बार जप पूरे नौ दिन तक करने चाहिए-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।&lt;br /&gt;
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
==देवी की महिमा==&lt;br /&gt;
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज [[हिमालय]] की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना और जीवन शक्ति संसार में जहाँ कहीं भी दिखाई देती है, वहाँ देवी का ही दर्शन होता है। [[ऋषि|ऋषियों]] की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता [[दुर्गा]] ही [[महाकाली]], [[महालक्ष्मी]] और [[सरस्वती देवी|महासरस्वती]] के रूप में प्रकट होती है। 'देवीभागवत' में लिखा है कि- &amp;quot;देवी ही [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] तथा [[महेश]] का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। जगन्माता दुर्गा सुकृती मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में अलक्ष्मी, विद्वानों-वैष्णवों के [[हृदय]] में बुद्धि व विद्या, सज्जनों में श्रद्धा व [[भक्ति]] तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा एवं मर्यादा के रूप में निवास करती है। 'मार्कण्डेयपुराण' कहता है कि- &amp;quot;हे देवि! तुम सारे [[वेद]]-शास्त्रों का सार हो। भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली माँ लक्ष्मी-शशिशेखर भगवान [[शंकर]] की महिमा बढ़ाने वाली माँ तुम ही हो।&amp;quot;&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सरस्वती पूजा महोत्सव==&lt;br /&gt;
माघी नवरात्र में [[पंचमी]] तिथि सर्वप्रमुख मानी जाती है। इसे '[[श्रीपंचमी]]', '[[वसंत पंचमी]]' और 'सरस्वती महोत्सव' के नाम से कहा जाता है। प्राचीन काल से आज तक इस दिन माता सरस्वती का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह त्रिशक्ति में एक माता शारदा के आराधना के लिए विशिष्ट दिवस के रूप में शास्त्रों में वर्णित है। कई प्रामाणिक विद्वानों का यह भी मानना है कि जो छात्र पढ़ने में कमज़ोर हों या जिनकी पढ़ने में रुचि नहीं हो, ऐसे विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। देववाणी [[संस्कृत भाषा]] में निबद्ध शास्त्रीय ग्रंथों का दान संकल्प पूर्वक विद्वान [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] को देना चाहिए।&lt;br /&gt;
;महानवमी को पूर्णाहुति&lt;br /&gt;
गुप्त नवरात्र में संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए [[अष्टमी]] और [[नवमी]] तिथि को आवश्यक रूप से देवी के पूजन का विधान शास्त्रों में वर्णित है। माता के संमुख &amp;quot;जोत दर्शन&amp;quot; एवं कन्या भोजन करवाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्त्री रूप में देवी पूजा==&lt;br /&gt;
'[[कूर्मपुराण]]' में [[पृथ्वी]] पर देवी के बिंब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति के रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या &amp;quot;[[शैलपुत्री]]&amp;quot;, कौमार्य अवस्था तक &amp;quot;[[ब्रह्मचारिणी]]&amp;quot; व [[विवाह]] से पूर्व तक [[चंद्रमा]] के समान निर्मल होने से &amp;quot;[[चंद्रघंटा तृतीय|चंद्रघंटा]]&amp;quot; कहलाती है। नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने से &amp;quot;[[कूष्मांडा]]&amp;quot; व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री &amp;quot;[[स्कन्दमाता पंचम|स्कन्दमाता]]&amp;quot; होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री &amp;quot;[[कात्यायनी]]&amp;quot; व पतिव्रता होने के कारण पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से &amp;quot;[[कालरात्रि सप्तम|कालरात्रि]]&amp;quot; कहलाती है। संसार का उपकार करने से &amp;quot;[[महागौरी अष्टमं|महागौरी]]&amp;quot; व धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार को सिद्धि का आशीर्वाद देने वाली &amp;quot;[[सिद्धिदात्री नवम|सिद्धिदात्री]]&amp;quot; मानी जाती हैं।&lt;br /&gt;
====घट स्थापना====&lt;br /&gt;
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता [[दुर्गा]] की जो तस्वीर मिल जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, परंतु देवी की असली प्रतिमा &amp;quot;घट&amp;quot; है। घट पर [[घी]]-[[सिंदूर]] से कन्या चिह्न और [[स्वस्तिक]] बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दायीं ओर [[जौ]] व सामने हवनकुंड रखा जाता है। नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर [[स्नान]], वस्त्र व गंध आदि से षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। नैवेद्य में बताशे और [[नारियल]] तथा [[खीर]] का भोग होना चाहिए। पूजन और हवन के बाद &amp;quot;दुर्गा सप्तशती&amp;quot; का पाठ करना श्रेष्ठ है। साथ ही [[धर्म]], अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए नवदुर्गा के प्रत्येक रूप की प्रतिदिन पूजा-स्तुति करनी चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य राज्यों में==&lt;br /&gt;
*[[गुजरात]] में सभी [[हिन्दू]] त्योहार विक्रमी चांद्र वर्ष की तिथियों के अनुसार [[भारत]] के अन्य प्रदेशों की तरह मनाए जाते हैं और इस चांद्र वर्ष का आरंभ [[चैत्र मास]] के [[शुक्ल पक्ष]] की [[प्रतिपदा]] से माना जाता है। किंतु लोहाना वंश के गुजरातियों के कुची, हलारी तथा ठक्कर गोत्र के लोग अपना [[नववर्ष]] 'आषाढ़  बीज' (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को मनाते हैं। 'लोहाना समाज' अपना मूल स्थान [[लाहौर]] ([[पाकिस्तान]]) के समीपस्थ लोहाना नामक ग्राम बताते हैं। समूचे भारत में जहाँ नववर्ष का आरंभ चैत्र माह की [[शुक्ल पक्ष]] की प्रतिपदा से माना जाता है और उसी दिन से वासंतिक नवरात्र आरंभ हो जाते हैं; फिर भी सिन्धी समाज नववर्ष के आरंभ का बोधक 'चेटी चांद महोत्सव' चैत्र शुक्ला द्वितीया को मनाता है। विचित्र संयोग की बात है कि लोहाना समाज का नववर्ष भी द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, भले ही महीना चैत्र के स्थान पर आषाढ़ हो। वस्तुत: यह 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' का दूसरा दिन होता है। संयोग की बात है कि [[उड़ीसा]] प्रांत में स्थित [[जगन्नाथपुरी]] की [[रथयात्रा पुरी|रथयात्रा]] का उत्सव भी 'आषाढ़ी गुप्त नवरात्र' की [[द्वितीया]] तिथि को मनाया जाता है। इस मंदिर में भगवान [[श्रीकृष्ण]] अपनी पत्नी या [[रासलीला]] वाली सहेली [[राधा]] के साथ नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई [[बलराम]] तथा बहन [[सुभद्रा]] के साथ मूर्तिमान रहते हैं। इन तीनों की चल मूर्तियों को आषाढ़ द्वितीया वाली शोभा-यात्रा में अलग-अलग रथों पर सजाया जाता है। इन रथों का निर्माण कार्य प्रतिवर्ष '[[अक्षय तृतीया]]' के शुभ दिन से ही आरंभ होता है, जबकि उस दिन [[वृंदावन]], [[मथुरा]], [[उत्तर प्रदेश]] वाले '[[बांके बिहारी मन्दिर वृन्दावन|बांके बिहारी मंदिर]]' में स्थापित भगवान कृष्ण की मूर्ति को [[चंदन]] का लेप करके सजाया जाता है। उन दोनों भाइयों समेत सुभद्रा की [[पूजा]] वहीं पर होती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;bb&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://dainiktribuneonline.com/2012/06/%E0%A4%86%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE/|title=गुप्त नवरात्र |accessmonthday=06 जून|accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] के 'वारकरी संप्रदाय' के श्रद्धालुगण भगवान श्रीकृष्ण को 'विट्ठलनाथ', 'विठोबा' अथवा 'प्रभु पुण्डरीक' पुकारते हैं। महाराष्ट्र के [[पुणे]] के [[पंढरपुर]] नामक स्थान पर विट्ठलनाथ का प्राचीनतम मंदिर है, जिसकी यात्रा [[आषाढ़ मास|आषाढ़ माह]] की [[एकादशी]] अर्थात् '[[देवशयनी एकादशी]]' से आरंभ हो जाती है। जनश्रुति है कि विट्ठलनाथ जी अपनी पटरानी [[रुक्मिणी]] जी को बताए बिना गुप्त रूप में पंढरपुर चले आए थे। वे उन्हें ढ़ूंढ़ती हुई पंढरपुर पहुंच गई थीं। अत: विट्ठलनाथ जी की मूर्ति के साथ मंदिर में रुक्मिणी जी भी विद्यमान रहती हैं।&lt;br /&gt;
*[[बंगाल]] में आषाढ़ की [[शुक्ल पक्ष]] [[द्वितीया]] को 'मनोरथ द्वितीया व्रत' कहा जाता है। उस दिन स्त्रियाँ [[दुर्गा]] से अपनी मनोकामनाएँ पूर्ति हेतु व्रत रखती हैं। आषाढ़ शुक्ल [[षष्ठी]] को बंगाल में 'कर्दम षष्ठी', 'कुसुंभा षष्ठी' तथा '[[स्कन्द षष्ठी]]' भी कहा जाता है। उस दिन भगवान [[शिव]] और माता [[पार्वती]] के छोटे पुत्र [[स्कंद]] और उनकी पत्नी षष्ठी देवी की पूजा की जाती है। आषाढ़ माह की शुक्ल [[सप्तमी]] को [[भारत]] के पूर्वी भाग में [[सूर्य]] की पूजा का उत्सव मनाया जाता है। आषाढ़ शुक्ल [[अष्टमी]] को [[त्रिपुरा]] में खरसी-पूजा उत्सव मनाया जाता है। तत्संबंधी प्रसिद्ध मेला खवेरपुर नामक कस्बे में मनाया जाता है, जिसमें अधिकतर सन्न्यासी ही भाग लेते हैं। सन्न्यास धारिणी स्त्रियाँ [[तंबाकू]] से भरी हुई चिलम में कश लगाकर, धुआँ छोड़कर लोगों को आश्चर्यचकित कर देती हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;bb&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[तमिलनाडु]] में आषाढ़ मास की अष्टमी को मनाए जाने वाले महोत्सव को 'अदिपुरम' कहा जाता है। आषाढ़ मास को [[तमिल भाषा]] में 'अदि' और 'पर्व' को 'पुरम' कहा जाता है। उस दिन लोग अपने परिवार की सुख-शांति हेतु शक्ति-देवी की [[पूजा]] करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आषाढ़ शुक्ल नवमी गुप्त नवरात्र का अंतिम दिन होता है। उस दिन [[भारत]] के [[कश्मीर]] के भवानी मंदिर में विशाल मेला लगता है। उसी दिन 'हरि जयंती' के कारण [[वैष्णव]] [[भक्त]] व्रत भी रखते हैं और वैष्णव मंदिरों में मनोकामनाओं की पूर्ति और दर्शनार्थ जाते हैं। उसी दिन 'भडल्या नवमीं' पर व्रतधारिणी स्त्रियाँ भी घर में अथवा देवी-मंदिर में पूजा करती हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;bb&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2|माध्यमिक=|पूर्णता=|शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य संबंधित लिंक==&lt;br /&gt;
{{Navdurga2}}{{Navdurga}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}&lt;br /&gt;
[[Category:व्रत और उत्सव]][[Category:पर्व_और_त्योहार]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]][[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>ब्रह्मचारिणी द्वितीय</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Brahmacharini.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=ब्रह्मचारिणी देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के दूसरे दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के दूसरे स्वरूप 'ब्रह्मचारिणी' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1= पूजन समय&lt;br /&gt;
|पाठ 1= [[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[द्वितीया]] को प्रात: काल&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2= धार्मिक मान्यता&lt;br /&gt;
|पाठ 2= इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
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|पाठ 3= &lt;br /&gt;
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|अन्य जानकारी= इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होती है। सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
माँ [[दुर्गा]] की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है। अपने पूर्व जन्म में जब ये [[हिमालय]] के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं, तब [[नारद]] के उपदेश से इन्होंने भगवान [[शंकर]] जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। इन्होंने एक हज़ार वर्ष तक केवल फल खाकर व्यतीत किए और सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्भर रहीं। उपवास के समय खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के विकट कष्ट सहे, इसके बाद में केवल ज़मीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को खाकर तीन हज़ार वर्ष तक भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। कई हज़ार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार रह कर व्रत करती रहीं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पत्तों को भी छोड़ देने के कारण उनका नाम '[[अपर्णा]]' भी पड़ा। इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया था। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मैना देवी अत्यन्त दुखी हो गयीं। उन्होंने उस कठिन तपस्या विरत करने के लिए उन्हें आवाज़ दी उमा, अरे नहीं। तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम 'उमा' पड़ गया था। उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। देवता, ॠषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्यकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह [[ब्रह्मा]] जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा- 'हे देवी । आज तक किसी ने इस प्रकार की ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन पूर्ण होगी। भगवान चन्द्रमौलि [[शिव]] जी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ।' &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
माँ दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होती है। सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।&lt;br /&gt;
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥&lt;br /&gt;
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गांं त्रिनेत्राम।&lt;br /&gt;
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥&lt;br /&gt;
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।&lt;br /&gt;
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।&lt;br /&gt;
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।&lt;br /&gt;
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कवच====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।&lt;br /&gt;
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥&lt;br /&gt;
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥&lt;br /&gt;
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।&lt;br /&gt;
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:हिन्दू धर्म के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>वार्ता:ब्रह्मचारिणी द्वितीय</title>
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&lt;hr /&gt;
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		<title>ब्रह्मचारिणी द्वितीयं</title>
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		<title>ब्रह्मचारिणी द्वितीय</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Brahmacharini.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=ब्रह्मचारिणी देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के दूसरे दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के दूसरे स्वरूप 'ब्रह्मचारिणी' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1= पूजन समय&lt;br /&gt;
|पाठ 1= [[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[द्वितीया]] को प्रात: काल&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2= धार्मिक मान्यता&lt;br /&gt;
|पाठ 2= इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3= &lt;br /&gt;
|पाठ 3= &lt;br /&gt;
|शीर्षक 4= &lt;br /&gt;
|पाठ 4= &lt;br /&gt;
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|शीर्षक 10=&lt;br /&gt;
|पाठ 10=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी= इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होती है। सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
माँ [[दुर्गा]] की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है। अपने पूर्व जन्म में जब ये [[हिमालय]] के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं, तब [[नारद]] के उपदेश से इन्होंने भगवान [[शंकर]] जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। इन्होंने एक हज़ार वर्ष तक केवल फल खाकर व्यतीत किए और सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्भर रहीं। उपवास के समय खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के विकट कष्ट सहे, इसके बाद में केवल ज़मीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को खाकर तीन हज़ार वर्ष तक भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। कई हज़ार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार रह कर व्रत करती रहीं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पत्तों को भी छोड़ देने के कारण उनका नाम '[[अपर्णा]]' भी पड़ा। इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया था। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मैना देवी अत्यन्त दुखी हो गयीं। उन्होंने उस कठिन तपस्या विरत करने के लिए उन्हें आवाज़ दी उमा, अरे नहीं। तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम 'उमा' पड़ गया था। उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। देवता, ॠषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्यकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह [[ब्रह्मा]] जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा- 'हे देवी । आज तक किसी ने इस प्रकार की ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन पूर्ण होगी। भगवान चन्द्रमौलि [[शिव]] जी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ।' &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
माँ दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होती है। सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्घकृत शेखराम्।&lt;br /&gt;
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥&lt;br /&gt;
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।&lt;br /&gt;
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥&lt;br /&gt;
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।&lt;br /&gt;
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।&lt;br /&gt;
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।&lt;br /&gt;
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कवच====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।&lt;br /&gt;
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥&lt;br /&gt;
पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥&lt;br /&gt;
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।&lt;br /&gt;
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A4%AE&amp;diff=568267</id>
		<title>शैलपुत्री प्रथम</title>
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		<updated>2016-08-30T07:08:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* सती की कथा */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Shailputri.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=शैलपुत्री देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के पहले दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के पहले स्वरूप 'शैलपुत्री' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=पूजन विधि&lt;br /&gt;
|पाठ 1=कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या [[मिट्टी]] की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=पूजन समय&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] को प्रात: काल&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=धार्मिक मान्यता&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी= इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
शारदीय [[नवरात्र]] आरम्भ होने पर [[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] के दिन कलश स्थापना के साथ ही माँ [[दुर्गा]] की पूजा शुरू की जाती है। पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज [[हिमालय]] के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बायें हाथ में [[कमल]] सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम [[सती]] था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]]जी से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गईं तो वहाँ अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी [[शिव]]जी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्त्व और शक्तियाँ अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। इस स्वरूप का आज के दिन पूजन किया जाता है। आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे। किसी एकान्त स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोये जाते हैं। उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।&lt;br /&gt;
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥&lt;br /&gt;
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥&lt;br /&gt;
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।&lt;br /&gt;
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।&lt;br /&gt;
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥&lt;br /&gt;
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।&lt;br /&gt;
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥&lt;br /&gt;
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।&lt;br /&gt;
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कवच====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।&lt;br /&gt;
ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥&lt;br /&gt;
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।&lt;br /&gt;
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।&lt;br /&gt;
फट्कार पात सर्वांंगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सती की कथा==&lt;br /&gt;
[[मार्कण्डेय पुराण]] के अनुसार यहीं नवदुर्गाओं में प्रथम [[दुर्गा]] हैं। अपने पूर्व जन्म में प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थी। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]] से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सभी देवताओं को यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमन्त्रित किया लेकिन शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमन्त्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने की लिए मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकर जी को बतायी। उन्होंने कहा प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं, अपने [[यज्ञ]] में उन्होंने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया है उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं, किन्तु हमें नहीं बुलाया है। ऐसी परिस्थिति में तुम्हारा वहां जाना श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकर जी के इस उपदेश से सती को बोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, माता और बहनों से मिलने की व्यग्रता और उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की आज्ञा दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास का भाव था। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को संताप हुआ। उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा था। दक्ष ने उनके पति शंकर जी के प्रति कुछ अपमानजनक  वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। उन्हें लगा भगवान शंकर की बात न मान यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की है।  वह अपने पति का अपमान सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान उस दारुण दु:खद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया। सती ने अगले जन्म में शैलराज [[हिमालय]] की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुईं। [[पार्वती देवी|पार्वती]], हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। [[उपनिषद]] की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हेमवती स्वरूप से देवताओं का गर्वभंजन किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>शैलपुत्री प्रथम</title>
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		<updated>2016-08-30T07:00:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* कवच */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Shailputri.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=शैलपुत्री देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के पहले दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के पहले स्वरूप 'शैलपुत्री' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=पूजन विधि&lt;br /&gt;
|पाठ 1=कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या [[मिट्टी]] की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। &lt;br /&gt;
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|अन्य जानकारी= इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
शारदीय [[नवरात्र]] आरम्भ होने पर [[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] के दिन कलश स्थापना के साथ ही माँ [[दुर्गा]] की पूजा शुरू की जाती है। पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज [[हिमालय]] के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बायें हाथ में [[कमल]] सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम [[सती]] था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]]जी से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गईं तो वहाँ अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी [[शिव]]जी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्त्व और शक्तियाँ अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। इस स्वरूप का आज के दिन पूजन किया जाता है। आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे। किसी एकान्त स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोये जाते हैं। उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।&lt;br /&gt;
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥&lt;br /&gt;
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥&lt;br /&gt;
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।&lt;br /&gt;
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।&lt;br /&gt;
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥&lt;br /&gt;
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।&lt;br /&gt;
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥&lt;br /&gt;
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।&lt;br /&gt;
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====कवच====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।&lt;br /&gt;
ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥&lt;br /&gt;
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।&lt;br /&gt;
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।&lt;br /&gt;
फट्कार पात सर्वांंगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सती की कथा==&lt;br /&gt;
[[मार्कण्डेय पुराण]] के अनुसार यहीं नवदुर्गाओं में प्रथम [[दुर्गा]] हैं। अपने पूर्व जन्म में प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थी। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]] से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सभी देवताओं को यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमन्त्रित किया लेकिन शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमन्त्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने की लिए मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकर जी को बतायी। उन्होंने कहा प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं, अपने [[यज्ञ]] में उन्होंने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया है उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं, किन्तु हमें नहीं बुलाया है। ऐसी परिस्थिति में तुम्हारा वहां जाना श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकर जी के इस उपदेश से सती को बोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, माता और बहनों से मिलने की व्यग्रता और उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की आज्ञा दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास का भाव था। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को संताप हुआ। उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा था। दक्ष ने उनके पति शंकर जी के प्रति कुछ अपमानजनक  वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। उन्हें लगा भगवान शंकर की बात न मान यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की है।  वह अपने पति का अपमान सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान उस दारुण दु:खद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया। सती ने अगले जन्म में शैलराज [[हिमालय]] की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुईं। [[पार्वती देवी|पार्वती]], हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। [[उपनिषद]] की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हेमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व भंजन किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>शैलपुत्री प्रथम</title>
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		<updated>2016-08-30T06:58:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* ध्यान */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Shailputri.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=शैलपुत्री देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के पहले दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के पहले स्वरूप 'शैलपुत्री' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=पूजन विधि&lt;br /&gt;
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|अन्य जानकारी= इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
शारदीय [[नवरात्र]] आरम्भ होने पर [[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] के दिन कलश स्थापना के साथ ही माँ [[दुर्गा]] की पूजा शुरू की जाती है। पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। पर्वतराज [[हिमालय]] के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। भगवती का वाहन वृषभ, दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बायें हाथ में [[कमल]] सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम [[सती]] था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]]जी से हुआ था। एक बार वह अपने पिता के यज्ञ में गईं तो वहाँ अपने पति भगवान शंकर के अपमान को सह न सकीं। उन्होंने वहीं अपने शरीर को योगाग्नि में भस्म कर दिया। अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी [[शिव]]जी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्त्व और शक्तियाँ अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस दिन उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योगसाधना का आरम्भ होता है। इस स्वरूप का आज के दिन पूजन किया जाता है। आवाहन, स्थापन और विसर्जन ये तीनों आज प्रात:काल ही होंगे। किसी एकान्त स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ गेंहू बोये जाते हैं। उस पर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृत शेखराम्।&lt;br /&gt;
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥&lt;br /&gt;
पूर्णेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥&lt;br /&gt;
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।&lt;br /&gt;
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====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
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प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।&lt;br /&gt;
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सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥&lt;br /&gt;
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ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।&lt;br /&gt;
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥&lt;br /&gt;
श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।&lt;br /&gt;
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।&lt;br /&gt;
फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सती की कथा==&lt;br /&gt;
[[मार्कण्डेय पुराण]] के अनुसार यहीं नवदुर्गाओं में प्रथम [[दुर्गा]] हैं। अपने पूर्व जन्म में प्रजापति [[दक्ष]] की कन्या के रूप में उत्पन्न हुईं थी। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान [[शंकर]] से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सभी देवताओं को यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमन्त्रित किया लेकिन शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में निमन्त्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने की लिए मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकर जी को बतायी। उन्होंने कहा प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं, अपने [[यज्ञ]] में उन्होंने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया है उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं, किन्तु हमें नहीं बुलाया है। ऐसी परिस्थिति में तुम्हारा वहां जाना श्रेयस्कर नहीं होगा। शंकर जी के इस उपदेश से सती को बोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, माता और बहनों से मिलने की व्यग्रता और उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की आज्ञा दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास का भाव था। परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को संताप हुआ। उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा था। दक्ष ने उनके पति शंकर जी के प्रति कुछ अपमानजनक  वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से भर उठा। उन्हें लगा भगवान शंकर की बात न मान यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की है।  वह अपने पति का अपमान सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान उस दारुण दु:खद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया। सती ने अगले जन्म में शैलराज [[हिमालय]] की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुईं। [[पार्वती देवी|पार्वती]], हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। [[उपनिषद]] की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हेमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व भंजन किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>चंडी</title>
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		<updated>2016-08-30T06:54:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Chandi-Devi.jpg|thumb|चंडी देवी (प्राचीन फुलकारी कढ़ाई, [[पंजाब]])]]&lt;br /&gt;
*चंडी '''चंडिका देवी''' भी कहलाती है, यह [[हिन्दू|हिंदुओं]] की देवी शक्ति का रूप मानी जाती है। &lt;br /&gt;
*चंडी देवी दानव-विनाशिनी है, जो पूर्वी [[भारत]] में विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।&lt;br /&gt;
*चंडी देवी को विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे महामाया, अभया और यह, विशेषकर देवी महामाया की, स्थानीय मान्यताओं तथा [[संस्कृत]] परंपरा में संयुक्त रूप में प्रस्तुत होती हैं। उनकी प्रस्तुति शक्ति के दूसरे रूप [[दुर्गा]] के समान ही है। &lt;br /&gt;
*चंडी देवी को आठ या दस भुजाओं से युक्त [[सिंह]] की सवारी करता हुआ दर्शाया जाता है। &lt;br /&gt;
*सैकड़ों लोककथाओं और गीतों में उनके पराक्रमों का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*वह चंडीमंगल नामक मध्यकालीन [[बांग्ला साहित्य]] की केंद्रीय चरित्र हैं, जिनमें से सबसे विख्यात कृति मुकुंदराम चक्रवर्ती (लगभग 16वीं शताब्दी) की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>कालरात्रि सप्तम</title>
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		<updated>2016-08-30T06:48:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* स्तोत्र पाठ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{नवरात्र}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Kaalratri.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=कालरात्रि देवी&lt;br /&gt;
|विवरण=[[नवरात्र]] के सातवें दिन [[दुर्गा|माँ दुर्गा]] के सातवें स्वरूप 'कालरात्रि' की पूजा होती है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=स्वरूप वर्णन&lt;br /&gt;
|पाठ 1= इनके शरीर का [[रंग]] [[काला रंग|काला]], बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो [[ब्रह्माण्ड]] की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में [[खड्ग]] है। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=पूजन समय&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[चैत्र]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[सप्तमी]] को प्रात: काल&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=धार्मिक मान्यता&lt;br /&gt;
|पाठ 3= भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। इनकी कृपा से [[अग्निदेव|अग्नि]] भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4= &lt;br /&gt;
|पाठ 4= &lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 9=&lt;br /&gt;
|पाठ 9=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=&lt;br /&gt;
|पाठ 10=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[काली|काली देवी]]&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी= इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[दुर्गा]] की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से [[अग्निदेव|अग्नि]] की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में [[खड्ग]] है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए। दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णत: मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है, उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह अधिकारी होता है, उसकी समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। इनकी कृपा से [[अग्निदेव|अग्नि]] भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं। कालरात्रि माता भक्तों को अभय प्रदान करती है।  &lt;br /&gt;
====ध्यान====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।&lt;br /&gt;
कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥&lt;br /&gt;
दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।&lt;br /&gt;
अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥&lt;br /&gt;
महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।&lt;br /&gt;
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥&lt;br /&gt;
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।&lt;br /&gt;
एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====स्तोत्र पाठ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ह्रीं कालरात्रि श्रींं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।&lt;br /&gt;
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥&lt;br /&gt;
कामबीजजपान्दा कामबीजस्वरूपिणी।&lt;br /&gt;
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥&lt;br /&gt;
क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।&lt;br /&gt;
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====कवच====&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।&lt;br /&gt;
ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥&lt;br /&gt;
रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।&lt;br /&gt;
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥&lt;br /&gt;
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।&lt;br /&gt;
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक3|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}} {{Navdurga2}}{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{Navdurga}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=568262</id>
		<title>काली</title>
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		<updated>2016-08-30T06:41:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=काली|लेख का नाम=काली (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भगवती श्री काली'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kali-shiv.jpg|thumb|250px|भगवती श्री काली&amp;lt;br /&amp;gt; Kali]]&lt;br /&gt;
परमात्मा की पराशक्ति भगवती निराकार होकर भी [[देवता|देवताओं]] का दु:ख दूर करने के लिये युग-युग में साकार रूप धारण करके अवतार लेती हैं। उनका शरीर ग्रहण उनकी इच्छा का वैभव कहा गया है। सनातन शक्ति जगदम्बा ही महामाया कही गयी हैं। वे ही सबके मन को खींच कर मोह में डाल देती हैं। उनकी माया से मोहित होने के कारण [[ब्रह्मा]]दि समस्त देवता भी परम तत्त्व को नहीं जान पाते, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है? वे परमेश्वरी ही सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणों का आश्रय लेकर समयानुसार सम्पूर्ण विश्व का सृजन, पालन और संहार किया करती हैं। [[शिव पुराण]] के अनुसार उनके काली रूप में अवतार की कथा इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा==&lt;br /&gt;
प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत के जलमग्न होने पर भगवान [[विष्णु]] योगनिद्रा में शेषशय्या पर शयन कर रहे थे। उन्हीं दिनों भगवान विष्णु के कानों के मल से दो असुर प्रलयकाल के [[सूर्य देवता|सूर्य]] की भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ों के कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण विश्व को खा डालने के लिये उद्यम हों। उन दोनों ने भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को मारने के लिये तैयार हो गये।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
ब्रह्माजी ने देखा कि ये दोनों मेरे ऊपर आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान विष्णु समुद्र के जल में शेषशय्या पर सो रहे हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये महामाया परमेश्वरी की स्तुति की और उनसे प्रार्थना किया- 'अम्बिके! तुम इन दोनों असुरों को मोहित करके मेरी रक्षा करो और अजन्मा भगवान नारायण को जगा दो।'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मधु और कैटभ के नाश के लिये ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर सम्पूर्ण विद्याओं की अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या काली फाल्गुन शुक्ला द्वादशी को त्रैलोक्य-मोहिनी शक्ति के रूप में पहले आकाश में प्रकट हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई 'कमलासन ब्रह्मा डरो मत। युद्ध में मधु-कैटभ का विनाश करके मैं तुम्हारे संकट दूर करूँगी।' फिर वे महामाया भगवान श्रीहरि के नेत्र, मुख, नासिका और बाहु आदि से निकल कर ब्रह्मा जी के सामने आ खड़ी हुईं। उसी समय भगवान विष्णु भी योगनिद्रा से जग गये। फिर देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने अपने सामने मधु और कैटभ दोनों दैत्यों को देखा। उन दोनों महादैत्यों के साथ अतुल तेजस्वी भगवान विष्णु का पाँच हज़ार वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। अन्त में महामाया के प्रभाव से मोहित होकर उन असुरों ने भगवान विष्णु से कहा कि 'हम तुम्हारे युद्ध से अत्यन्त प्रभावित हुए। तुम हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग लो।'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान विष्णु ने कहा- 'यदि तुम लोग मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों से हो।' उन असुरों ने देखा कि सारी [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] एकार्णव जल में डूबी है। यदि हम सूखी धरती पर अपने मृत्यु का वरदान इन्हें देते हैं, तब यह चाह कर भी हम को नहीं मार पायेंगे और हमें वरदान देने का श्रेय भी प्राप्त हो जायेगा। अत: उन दोनों ने भगवान विष्णु से कहा कि 'तुम हमको ऐसी जगह मार सकते हो, जहाँ जल से भीगी हुई धरती न हो।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु ने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघ पर उनके मस्तकों को रखकर काट डाला। इस प्रकार भगवती महाकाली की कृपा से उन दैत्यों की बुद्धि भ्रमित हो जाने से उनका अन्त हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|काली माता की आरती|कालीघाट काली मंदिर}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>काली</title>
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		<updated>2016-08-30T06:39:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=काली|लेख का नाम=काली (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भगवती श्री काली'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kali-shiv.jpg|thumb|250px|भगवती श्री काली&amp;lt;br /&amp;gt; Kali]]&lt;br /&gt;
परमात्मा की पराशक्ति भगवती निराकार होकर भी [[देवता|देवताओं]] का दु:ख दूर करने के लिये युग-युग में साकार रूप धारण करके अवतार लेती हैं। उनका शरीर ग्रहण उनकी इच्छा का वैभव कहा गया है। सनातन शक्ति जगदम्बा ही महामाया कही गयी हैं। वे ही सबके मन को खींच कर मोह में डाल देती हैं। उनकी माया से मोहित होने के कारण [[ब्रह्मा]]दि समस्त देवता भी परम तत्त्व को नहीं जान पाते, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है? वे परमेश्वरी ही सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणों का आश्रय लेकर समयानुसार सम्पूर्ण विश्व का सृजन, पालन औ संहार किया करती हैं। [[शिव पुराण]] के अनुसार उनके काली रूप में अवतार की कथा इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा==&lt;br /&gt;
प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत के जलमग्न होने पर भगवान [[विष्णु]] योगनिद्रा में शेषशय्या पर शयन कर रहे थे। उन्हीं दिनों भगवान विष्णु के कानों के मल से दो असुर प्रलयकाल के [[सूर्य देवता|सूर्य]] की भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ों के कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण विश्व को खा डालने के लिये उद्यम हों। उन दोनों ने भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को मारने के लिये तैयार हो गये।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
ब्रह्माजी ने देखा कि ये दोनों मेरे ऊपर आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान विष्णु समुद्र के जल में शेषशय्या पर सो रहे हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये महामाया परमेश्वरी की स्तुति की और उनसे प्रार्थना किया- 'अम्बिके! तुम इन दोनों असुरों को मोहित करके मेरी रक्षा करो और अजन्मा भगवान नारायण को जगा दो।'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मधु और कैटभ के नाश के लिये ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर सम्पूर्ण विद्याओं की अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या काली फाल्गुन शुक्ला द्वादशी को त्रैलोक्य-मोहिनी शक्ति के रूप में पहले आकाश में प्रकट हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई 'कमलासन ब्रह्मा डरो मत। युद्ध में मधु-कैटभ का विनाश करके मैं तुम्हारे संकट दूर करूँगी।' फिर वे महामाया भगवान श्रीहरि के नेत्र, मुख, नासिका और बाहु आदि से निकल कर ब्रह्मा जी के सामने आ खड़ी हुईं। उसी समय भगवान विष्णु भी योगनिद्रा से जग गये। फिर देवाधिदेव भगवान् विष्णु ने अपने सामने मधु और कैटभ दोनों दैत्यों को देखा। उन दोनों महादैत्यों के साथ अतुल तेजस्वी भगवान विष्णु का पाँच हज़ार वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। अन्त में महामाया के प्रभाव से मोहित होकर उन असुरों ने भगवान विष्णु से कहा कि 'हम तुम्हारे युद्ध से अत्यन्त प्रभावित हुए। तुम हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग लो।'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान विष्णु ने कहा- 'यदि तुम लोग मुझ पर प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों से हो।' उन असुरों ने देखा कि सारी [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] एकार्णव जल में डूबी है। यदि हम सूखी धरती पर अपने मृत्यु का वरदान इन्हें देते हैं, तब यह चाह कर भी हम को नहीं मार पायेंगे और हमें वरदान देने का श्रेय भी प्राप्त हो जायेगा। अत: उन दोनों ने भगवान विष्णु से कहा कि 'तुम हमको ऐसी जगह मार सकते हो, जहाँ जल से भीगी हुई धरती न हो।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु ने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघ पर उनके मस्तकों को रखकर काट डाला। इस प्रकार भगवती महाकाली की कृपा से उन दैत्यों की बुद्धि भ्रमित हो जाने से उनका अन्त हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|काली माता की आरती|कालीघाट काली मंदिर}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80_(%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%80)&amp;diff=568260</id>
		<title>काली (बहुविकल्पी)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80_(%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%80)&amp;diff=568260"/>
		<updated>2016-08-30T06:31:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्पी शब्द}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#[[काली ]] - हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवियों में से एक हैं।&lt;br /&gt;
#[[काली (काशीराज कन्या)]] - महाभारत के अनुसार काशीराज की कन्या थी।&lt;br /&gt;
#[[काली (वेदव्यास की माता)]] - पुराणों के उल्लेखानुसार वेदव्यास की माता थी।&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>हनुमान चालीसा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B8%E0%A4%BE&amp;diff=568258"/>
		<updated>2016-08-30T05:59:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* मूल पाठ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Hanuman-Chalisa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम='हनुमान चालीसा'&lt;br /&gt;
|विवरण='हनुमान चालीसा' [[गोस्वामी तुलसीदास]] की काव्यात्मक कृति है, जिसमें भगवान [[श्रीराम]] के परम [[भक्त]] [[हनुमान]] का गुणगान किया गया है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=रचनाकार&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[गोस्वामी तुलसीदास]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=मूल शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 2=हनुमान चालीसा&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=मुख्य पात्र&lt;br /&gt;
|पाठ 3=[[हनुमान]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
|पाठ 6=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=&lt;br /&gt;
|पाठ 8=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=विषय&lt;br /&gt;
|पाठ 9=स्तुति&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=विशेष&lt;br /&gt;
|पाठ 10='हनुमान चालीसा' के नित्य पाठ से साधारण व्यक्ति भी बिना किसी विशेष [[पूजा]]-अर्चना के अपनी समस्त परेशानियों से मुक्ति पा सकता है। &lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[हनुमान]], [[तुलसीदास]], [[श्रीराम]]&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=सम्पूर्ण [[भारत]] में 'हनुमान चालीसा' का पाठ बेहद लोकप्रिय है, किन्तु विशेष रूप से [[उत्तर भारत]] में यह बहुत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय है। लगभग सभी [[हिन्दू|हिन्दुओं]] को यह कंठस्थ होती है।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हनुमान चालीसा''' [[गोस्वामी तुलसीदास]] द्वारा रचित एक प्रसिद्ध काव्यात्मक कृति है। यह कृति भगवान [[श्रीराम]] के [[भक्त]] [[हनुमान]] को समर्पित है, जिसमें उनके गुणों आदि का बखान किया गया है। [[हिन्दू धर्म]] में हनुमान जी की आराधना हेतु 'हनुमान चालीसा' का पाठ सर्वमान्य साधन है। इसका पाठ सनातन जगत में जितना प्रचलित है, उतना किसी और वंदना या पूजन आदि में नहीं दिखाई देता। 'श्री हनुमान चालीसा' के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी माने जाते हैं। इसीलिए '[[रामचरितमानस]]' की भाँति यह हनुमान गुणगाथा फलदायी मानी गई है। यह अत्यन्त लघु रचना है, जिसमें पवनपुत्र हनुमान की सुन्दर स्तुति की गई है। बजरंग बली‍ की भावपूर्ण वंदना तो इसमें है ही, साथ ही भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व भी सरल शब्दों में उकेरा गया है।&lt;br /&gt;
==अमर कृति==&lt;br /&gt;
गोस्वामी तुलसीदास ने राम भक्ति के द्वारा न केवल अपना ही जीवन कृतार्थ किया वरन्‌ समूची मानव जाति को भगवान श्रीराम के आदर्शों से जोड़ दिया। तुलसीदास जी कि 'हनुमान चालीसा' अमर कृतियों में गिनी जाती है। [[संवत]] 1554 को [[श्रावण मास]] में [[शुक्ल पक्ष]] की [[सप्तमी|सप्तमी तिथि]] को अवतरित गोस्वामी तुलसीदास ने सगुण भक्ति की राम भक्ति धारा को ऐसा प्रवाहित किया कि आज गोस्वामी जी राम भक्ति के पर्याय बन गए हैं। यह गोस्वामी तुलसीदास की ही देन है, जो आज [[भारत]] के कोने-कोने में '[[रामलीला]]' का मंचन होता है। कई [[संत]] राम कथा के माध्यम से समाज को जागृत करने में सतत्‌ लगे हुए हैं। तुलसीदास जी 'रामचरितमानस' के ही नहीं अपितु विश्व में सबसे ज्यादा पड़ी जानें वाली प्रार्थना 'हनुमान चालीसा' के भी रचियता थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[उत्तर प्रदेश]] में [[चित्रकूट]] के राजापुर में [[तुलसीदास]] की जन्म स्थली में आज भी उनके हाथ का लिखा '[[रामचरितमानस]]' ग्रंथ का एक भाग 'अयोध्याकांड' सुरक्षित है। इसके दर्शन के लिये पूरी दुनिया से लोग आते हैं। तुलसीदास की 11वीं पीढी के लोग एक धरोहर की तरह इसे संजो कर रखे हुये हैं। कभी अपने परिवार से ही उपेक्षित कर दिये गये अबोध राम बोला आज पूरे विश्व में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। संत तुलसीदास चित्रकूट में अपने गुरु स्थान नरहरिदास आश्रम पर कई वर्षो तक रहे और यहाँ पर उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम [[श्रीराम]] व उनके भ्राता [[लक्ष्मण]] के दो बार साक्षात् दर्शन भी किये थे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2011/08/blog-post_06.html|title=हनुमान चालीसा के रचयिता-गोस्वामी तुलसीदास|accessmonthday= 07 अक्टूबर|accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==लोकप्रियता==&lt;br /&gt;
यद्यपि पूरे [[भारत]] में 'हनुमान चालीसा' का पाठ लोकप्रिय है, किन्तु विशेष रूप से [[उत्तर भारत]] में यह बहुत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय है। लगभग सभी हिन्दुओं को यह कंठस्थ होता है। कहा जाता है कि इसके पाठ से भय दूर होता है, क्लेश मिटते हैं। इसके गंभीर भावों पर विचार करने से मन में श्रेष्ठ ज्ञान के साथ भक्ति-भाव जाग्रत होता है। इस रचना के साथ विशेष बात यह है कि [[दक्षिण भारत]] के मंदिरों में भी यह वहाँ की [[लिपि]] में लिखा हुआ देखा जा सकता है, तथा दक्षिण के [[हनुमान]] भक्त यदि [[हिन्दी]] न भी जानते हों तो भी इसे एक [[मंत्र]] के समान याद रखते हैं। उल्लेखनीय है कि [[संस्कृत]] के तो अनेक स्तोत्र उत्तर-दक्षिण में प्राचीन काल से ही समान रूप से लोकप्रिय हैं, परन्तु भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी की विरली ही रचनाओं को यह गौरव प्राप्त हो सका है।&lt;br /&gt;
==मूल पाठ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि ।&lt;br /&gt;
बरनऊँ रघुवर विमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥&lt;br /&gt;
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार ।&lt;br /&gt;
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: maroon&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥&lt;br /&gt;
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥&lt;br /&gt;
महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमिति के संगी ॥&lt;br /&gt;
कंचन बरन विराज सुवेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा ॥&lt;br /&gt;
हाथ बज्र औ ध्वजा विराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥&lt;br /&gt;
शंकर सुवन केसरीनंदन । तेज़ प्रताप महा जग बंदन ॥&lt;br /&gt;
विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥&lt;br /&gt;
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥&lt;br /&gt;
सूक्ष्म रूप धरि सियहीं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥&lt;br /&gt;
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्रजी के काज सँवारे ॥&lt;br /&gt;
लाय सजीवन लखन जियाये । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥&lt;br /&gt;
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि समभाई ॥&lt;br /&gt;
सहस बदन तुम्हरो जस गावै । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावै ॥&lt;br /&gt;
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥&lt;br /&gt;
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥&lt;br /&gt;
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥&lt;br /&gt;
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥&lt;br /&gt;
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानु ॥&lt;br /&gt;
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥&lt;br /&gt;
दु्र्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥&lt;br /&gt;
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥&lt;br /&gt;
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ॥&lt;br /&gt;
आपन तेज़ सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥&lt;br /&gt;
भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महावीर जव नाम सुनावैं ॥&lt;br /&gt;
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥&lt;br /&gt;
संकट ते हनुमान छुड़ावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥&lt;br /&gt;
सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥&lt;br /&gt;
और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥&lt;br /&gt;
चारो जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥&lt;br /&gt;
साधु संत के तुम रखबारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥&lt;br /&gt;
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस वर दीन जानकी माता ॥&lt;br /&gt;
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥&lt;br /&gt;
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥&lt;br /&gt;
अंत काल रघुवर पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥&lt;br /&gt;
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥&lt;br /&gt;
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरे हनुमत बलबीरा ॥&lt;br /&gt;
जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥&lt;br /&gt;
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महासुख होई ॥&lt;br /&gt;
जो यह पढै हनुमान चलीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥&lt;br /&gt;
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।&lt;br /&gt;
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ समाप्त ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: blue&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;ॐ नमः हनुमंताये ॐ नमः वासुदेवाये ॐ नमः हरि प्रिय पद्मा&lt;br /&gt;
जय श्री हनुमान जय श्री सीया राम लखन&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महत्त्व==&lt;br /&gt;
वर्तमान युग में [[हनुमान]] भगवान [[शिव]] के एक ऐसे [[अवतार]] हैं, जो अति शीघ्र प्रसन्न होते है और जो अपने भक्तों के समस्त दु:खों को हरने मे समर्थ हैं। हनुमान का नाम स्मरण करने मात्र से ही भक्तों के सारे संकट दूर हो जाते हैं। क्योंकि इनकी [[पूजा]]-अर्चना अति सरल है, इसी कारण हनुमान जी जन साधारण में अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनके मंदिर देश-विदेश सभी जगह स्थित हैं। अतः भक्तों को पहुँचने में अत्यधिक कठिनाई भी नहीं आती है। हनुमान को प्रसन्न करना अति सरल है। 'हनुमान चालीसा' और 'बजरंग बाण' के पाठ के माध्यम से साधारण व्यक्ति भी बिना किसी विशेष पूजा-अर्चना से अपनी दैनिक दिनचर्या से थोडा-सा समय निकाल ले, तो उसकी समस्त परेशानी से मुक्ति मिल जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|हनुमान बजरंग बाण|हनुमान जी की आरती|संकटमोचन हनुमानाष्टक}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}{{हनुमान2}}{{हनुमान}}{{तुलसीदास की रचनाएँ}}{{भक्ति कालीन साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]][[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:तुलसीदास]][[Category:पद्य साहित्य]][[Category:सगुण भक्ति]][[Category:भक्ति साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:हनुमान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&amp;diff=568257</id>
		<title>ब्रह्मा</title>
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		<updated>2016-08-30T04:59:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: /* सम्बंधित कथाएं */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:God-Brahma.jpg|ब्रह्मा&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
*सर्वश्रेष्ठ पौराणिक त्रिदेवों में ब्रह्मा, [[विष्णु]] एवं [[शिव]] की गणना होती है। इनमें ब्रह्मा का नाम पहले आता है, क्योंकि वे विश्व के आद्य सृष्टा, प्रजापति, पितामह तथा हिरण्यगर्भ हैं।&lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] में जो ब्रह्मा का रूप वर्णित मिलता है वह वैदिक प्रजापति के रूप का विकास है। प्रजापति की समस्त वैदिक गाथाएँ ब्रह्मा पर आरोपित कर ली गयी हैं। प्रजापति और उनकी दुहिता की कथा पुराणों में ब्रह्मा और [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] के रूप में वर्णित हुई है। &lt;br /&gt;
*पुराणों के अनुसार क्षीरसागर में शेषशायी [[विष्णु]] के नाभिकमल से ब्रह्मा की स्वयं उत्पत्ति हुई, इसलिए ये '''स्वयंभू''' कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
*घोर तपस्या के पश्चात इन्होंने [[ब्रह्माण्ड]] की सृष्टि की थी। वास्तव में सृष्टि ही ब्रह्मा का मुख्य कार्य है। &lt;br /&gt;
*[[सावित्री देवी|सावित्री]] इनकी पत्नी, सरस्वती पुत्री और हंस वाहन है। &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्म पुराण|ब्राह्म पुराणों]] में ब्रह्मा का स्वरूप [[विष्णु]] के सदृश ही निरूपित किया गया है। ये ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अज, महान तथा सम्पूर्ण प्राणियों के जन्मदाता और अन्तरात्मा बतलाये गये हैं। कार्य, कारण और चल, अचल सभी इनके अन्तर्गत हैं। समस्त कला और विद्या इन्होंने ही प्रकट की हैं। ये त्रिगुणात्मिका माया से अतीत ब्रह्म हैं। ये हिरण्यगर्भ हैं और सारा ब्रह्माण्ड इन्हीं से निकला है।&lt;br /&gt;
*यद्यपि ब्राह्म पुराणों में त्रिमूर्ति के अन्तर्गत ये अग्रगण्य और प्रथम बने रहे, किन्तु धार्मिक सम्प्रदायों की दृष्टि से इनका स्थान [[विष्णु]] , [[शिव]], [[शक्ति]] , [[गणेश]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] आदि से गौण हो गया, इनका कोई पृथक् सम्प्रदाय नहीं बन पाया। &lt;br /&gt;
*ब्रह्मा के मन्दिर भी थोड़े ही हैं। सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा का तीर्थ अजमेर के पास [[पुष्कर]] है। वृद्ध पिता की तरह देव परिवार में इनका स्थान उपेक्षित होता गया।  &lt;br /&gt;
*[[मार्कण्डेय पुराण]] के [[मधु कैटभ|मधु-कैटभ]]वध प्रसंग में विष्णु का उत्कर्ष और ब्रह्मा की विपन्नता दिखायी गयी है। ब्रह्मा की पूजामूर्ति के निर्माण का वर्णन [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण(249.40-44&amp;lt;/ref&amp;gt; में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma-Kund-Vrindavan-3.jpg|ब्रह्मा जी, ब्रह्म कुण्ड, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma Ji, Brahma Kund, Vrindavan|thumb|220px|left]]&lt;br /&gt;
*महाप्रलय के बाद भगवान नारायण दीर्घ काल तक योगनिद्रा में निमग्न रहे। योगनिद्रा से जगने के बाद उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। जिसकी कर्णिकाओं पर स्वयम्भू ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने अपने नेत्रों को चारों ओर घुमाकर शून्य में देखा। इस चेष्टा से चारों दिशाओं में उनके चार मुख प्रकट हो गये। जब चारों ओर देखने से उन्हें कुछ भी दिखलायी नहीं पड़ा, तब उन्होंने सोचा कि इस कमल पर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ तथा यह कमल कहाँ से निकला है? &lt;br /&gt;
*दीर्घ काल तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी को शेषशय्या पर सोये हुए भगवान विष्णु के दर्शन हुए। अपने एवं विश्व के कारण परम पुरुष का दर्शन करके उन्हें विशेष प्रसन्नता हुई और उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा कि अब आप तप:शक्ति से सम्पन्न हो गये हैं और आपको मेरा अनुग्रह भी प्राप्त हो गया है। अत: अब आप सृष्टि करने का प्रयत्न कीजिये। &lt;br /&gt;
*भगवान विष्णु की प्रेरणा से सरस्वती देवी ने ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण [[वेद|वेदों]] का ज्ञान कराया। &lt;br /&gt;
*सभी पुराणों तथा स्मृतियों में सृष्टि-प्रक्रिया में सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। वे मानसिक संकल्प से प्रजापतियों को उत्पन्न कर उनके द्वारा सम्पूर्ण प्रजा की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे प्रजापतियों के भी पति कहे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*[[मरीचि]], [[अत्रि]], [[अंगिरा]], [[पुलस्त्य]], [[पुलह]], [[क्रतु]], [[भृगु]], [[वसिष्ठ]], [[दक्ष]] तथा [[कर्दम]]- ये दस मुख्य प्रजापति हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Brhma-Kund-1.jpg|ब्रह्म कुण्ड, [[गोवर्धन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma Kund, Govardhan|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
*भागवतादि पुराणों के अनुसार भगवान [[रुद्र]] भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए। मानव-सृष्टि के मूल महाराज [[स्वयंभुव मनु|मनु]] उनके दक्षिण भाग से उत्पन्न हुए और वाम भाग से [[शतरूपा]] की उत्पत्ति हुई। स्वायम्भुव मनु और महारानी शतरूपा से मैथुनी-सृष्टि प्रारम्भ हुई। &lt;br /&gt;
*सभी [[देवता]] ब्रह्मा जी के पौत्र माने गये हैं, अत: वे पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं। यों तो ब्रह्मा जी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं, फिर भी वे विशेष रूप से धर्म के पक्षपाती हैं। इसलिये जब देवासुरादि संग्रामों में पराजित होकर देवता ब्रह्मा के पास जाते हैं, तब ब्रह्मा जी धर्म की स्थापना के लिये भगवान विष्णु को अवतार लेने के लिये प्रेरित करते हैं। अत: भगवान विष्णु के प्राय: चौबीस अवतारों में ये ही निमित्त बनते हैं। &lt;br /&gt;
*[[शैव मत|शैव]] और शाक्त आगमों की भाँति ब्रह्मा जी की उपासना का भी एक विशिष्ट सम्प्रदाय है, जो वैखानस सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इस वैखानस सम्प्रदाय की सभी सम्प्रदायों में मान्यता है। पुराणादि सभी शास्त्रों के ये ही आदि वक्ता माने गये हैं। &lt;br /&gt;
*ब्रह्माजी की प्राय: अमूर्त अपासना ही होती है। सर्वतोभद्र, लिंगतोभद्र आदि चक्रों में उनकी पूजा मुख्य रूप से होती है, किन्तु मूर्तरूप में मन्दिरों में इनकी पूजा पुष्कर-क्षेत्र तथा ब्रह्मार्वत-क्षेत्र (विठुर) में देखी जाती है। &lt;br /&gt;
*[[माध्व सम्प्रदाय]] के आदि आचार्य भगवान ब्रह्मा ही माने जाते हैं। इसलिये उडुपी आदि मुख्य मध्वपीठों में इनकी पूजा-आराधना की विशेष परम्परा है। देवताओं तथा असुरों की तपस्या में प्राय: सबसे अधिक आराधना इन्हीं की होती है। विप्रचित्ति, तारक, [[हिरण्यकशिपु]], [[रावण]], गजासुर तथा त्रिपुर आदि असुरों को इन्होंने ही वरदान देकर अवध्य कर डाला था। देवता, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, किन्नर तथा विद्याधर गण इनकी आराधना में निरंतर तत्पर रहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[मत्स्य पुराण]] के अनुसार ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। वे अपने चार हाथों में क्रमश: वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, [[वेद]] तथा कमण्डलु धारण किये हैं। उनका वाहन हंस है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित कथाएं==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma-Astride-A-Crane.jpg|thumb|250px|सारस पर बैठे ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
*सावित्री, [[गायत्री]], [[श्रद्धा]], [[मेधा]] और [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] ब्रह्मा की कन्याएं हैं। इनमें से एक कन्या त्रिभुवन सुंदरी थी। ब्रह्मा स्वयं ही निर्माण करके उस पर आसक्त हो गये। वह मृगी के रूप में भाग गयी । ब्रह्मा ने मृग का रूप धारण करके उसका पीछा किया। [[शिव]] ने धर्मसंकट में देख मृगवधिक का रूप धारण करके ब्रह्मा को रोका। ब्रह्मा ने वह कन्या विवस्वत मनु को दे दी। पांचों कन्याएं डरकर महानदी [[गंगा नदी|गंगा]] में जा मिलीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण, 102।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद छिड़ गया कि दोनों में से कौन बड़ा है। [[महादेव]] की ज्योतिर्मयी मूर्ति दोनों  मध्य प्रकट हुई, साथ ही आकाशवाणी हुई कि जो उस मूर्ति का अंत देखेगा, वही श्रेष्ठ माना जायेगा। विष्णु नीचे की चरम सीमा तथा ब्रह्मा ऊपर की अंतिम सीमा देखने के लिए बढ़े। विष्णु तो शीघ्र लौट आये। ब्रह्मा बहुत दूर तक [[शिव]] की मूर्ति का अंत देखने गये। उन्होंने लौटते समय सोचा कि अपने मुंह से झूठ नहीं बोलना चाहिए, अत: गधे का एक मुंह (जो कि ब्रह्मा का पांचवां मुंह  कहलाता है) बनाकर उससे बोले- 'हे विष्णु! मैं तो शिव की सीमा देख आया।' तत्काल शिव और विष्णु के ज्योतिर्मय स्वरूप एक रूप हो गये। ब्रह्मा की झूठी वाणी, वाणी नामक नदी के रूप में प्रकट हुई। उन दोनों को आराधना से प्रसन्न करके वह नदी [[सरस्वती नदी]] के नाम से [[गंगा नदी|गंगा]] से जा मिली और तब वह शापमुक्त हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण, 135।–&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma.jpg|thumb|350px|left|ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
*सृष्टि के पूर्व में संपूर्ण विश्व जलप्लावित था। श्री नारायण शेषशैय्या पर निद्रालीन थे। उनके शरीर में संपूर्ण प्राणी सूक्ष्म रूप से विद्यमान थे। केवल कालशक्ति ही जागृत थी क्योंकि उसका कार्य जगाना था। कालशक्ति ने जब जीवों के कर्मों के लिए उन्हें प्रेरित किया तब उनका ध्यान लिंग शरीर आदि सूक्ष्म तत्त्व पर गया- वही कमल के रूप में उनकी नाभि से निकला। उस पर ब्रह्मा स्वयं प्रकट हुए। अत: स्वयंभू कहलाये। ब्रह्मा विचारमग्न हो गये कि वे कौन हैं, कहां से आये, कहां हैं, अत: कमल की नाल से होकर विष्णु की नाभि के निकट तक चक्कर लगाकर भी वे विष्णु को नहीं देख पाये। योगाभ्यास से ज्ञान प्राप्त होने पर उन्होंने शेषशायी विष्णु के दर्शन किये। विष्णु की प्रेरणा से उन्होंने तप करके, भगवत ज्ञान अनुष्ठान करके, सब लोकों को अपने अंत:करण में स्पष्ट रूप से देखा। तदनंतर विष्णु अंतर्धान हो गये और ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। सरस्वती उनके मुंह से उत्पन्न पुत्री थी, उसके प्रति काम-विमोहित हो, वे समागम के इच्छुक थे। प्रजापतियों की रोक-टोक से लज्जित होकर उन्होंने उस शरीर का त्याग कर दूसरा शरीर धारण किया। त्यक्त शरीर अंधकार अथवा कुहरे के रूप में दिशाओं में व्याप्त हो गया। उन्होंने अपने चार मुंह से चार वेदों को प्रकट किया। ब्रह्मा को 'क' कहते हैं- उन्हीं से विभक्त होने के कारण शरीर को काम कहते हैं। उन दोनों विभागों से स्त्री-पुरुष एक-एक जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष मनु तथा स्त्री शतरूपा कहलायी। उन दोनों की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि प्रजापतियों की सृष्टि का सुचारू विस्तार नहीं हो रहा था।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवत, तृतीय स्कंध, 8-10,12&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*भगवान [[बुद्ध]] बोधिसत्त्व प्राप्त करके भी चिंताग्रस्त थे। वे सोचते थे कि उनके धर्मोपदेश को कोई मानेगा कि नहीं। प्रजापति ब्रह्मा ने यह ताड़ लिया। अत: वे 'ब्रह्मलोक' से अंतर्धान होकर भगवान के सामने प्रकट हुए तथा उन्हें धर्मोपदेश के लिए प्रेरित किया।&amp;lt;ref&amp;gt;बुद्ध चरित, 1।4।-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&amp;diff=568256</id>
		<title>ब्रह्मा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE&amp;diff=568256"/>
		<updated>2016-08-30T04:48:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:God-Brahma.jpg|ब्रह्मा&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma|thumb|200px]]&lt;br /&gt;
*सर्वश्रेष्ठ पौराणिक त्रिदेवों में ब्रह्मा, [[विष्णु]] एवं [[शिव]] की गणना होती है। इनमें ब्रह्मा का नाम पहले आता है, क्योंकि वे विश्व के आद्य सृष्टा, प्रजापति, पितामह तथा हिरण्यगर्भ हैं।&lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] में जो ब्रह्मा का रूप वर्णित मिलता है वह वैदिक प्रजापति के रूप का विकास है। प्रजापति की समस्त वैदिक गाथाएँ ब्रह्मा पर आरोपित कर ली गयी हैं। प्रजापति और उनकी दुहिता की कथा पुराणों में ब्रह्मा और [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] के रूप में वर्णित हुई है। &lt;br /&gt;
*पुराणों के अनुसार क्षीरसागर में शेषशायी [[विष्णु]] के नाभिकमल से ब्रह्मा की स्वयं उत्पत्ति हुई, इसलिए ये '''स्वयंभू''' कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
*घोर तपस्या के पश्चात इन्होंने [[ब्रह्माण्ड]] की सृष्टि की थी। वास्तव में सृष्टि ही ब्रह्मा का मुख्य कार्य है। &lt;br /&gt;
*[[सावित्री देवी|सावित्री]] इनकी पत्नी, सरस्वती पुत्री और हंस वाहन है। &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्म पुराण|ब्राह्म पुराणों]] में ब्रह्मा का स्वरूप [[विष्णु]] के सदृश ही निरूपित किया गया है। ये ज्ञानस्वरूप, परमेश्वर, अज, महान तथा सम्पूर्ण प्राणियों के जन्मदाता और अन्तरात्मा बतलाये गये हैं। कार्य, कारण और चल, अचल सभी इनके अन्तर्गत हैं। समस्त कला और विद्या इन्होंने ही प्रकट की हैं। ये त्रिगुणात्मिका माया से अतीत ब्रह्म हैं। ये हिरण्यगर्भ हैं और सारा ब्रह्माण्ड इन्हीं से निकला है।&lt;br /&gt;
*यद्यपि ब्राह्म पुराणों में त्रिमूर्ति के अन्तर्गत ये अग्रगण्य और प्रथम बने रहे, किन्तु धार्मिक सम्प्रदायों की दृष्टि से इनका स्थान [[विष्णु]] , [[शिव]], [[शक्ति]] , [[गणेश]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] आदि से गौण हो गया, इनका कोई पृथक् सम्प्रदाय नहीं बन पाया। &lt;br /&gt;
*ब्रह्मा के मन्दिर भी थोड़े ही हैं। सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा का तीर्थ अजमेर के पास [[पुष्कर]] है। वृद्ध पिता की तरह देव परिवार में इनका स्थान उपेक्षित होता गया।  &lt;br /&gt;
*[[मार्कण्डेय पुराण]] के [[मधु कैटभ|मधु-कैटभ]]वध प्रसंग में विष्णु का उत्कर्ष और ब्रह्मा की विपन्नता दिखायी गयी है। ब्रह्मा की पूजामूर्ति के निर्माण का वर्णन [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण(249.40-44&amp;lt;/ref&amp;gt; में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma-Kund-Vrindavan-3.jpg|ब्रह्मा जी, ब्रह्म कुण्ड, [[वृन्दावन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma Ji, Brahma Kund, Vrindavan|thumb|220px|left]]&lt;br /&gt;
*महाप्रलय के बाद भगवान नारायण दीर्घ काल तक योगनिद्रा में निमग्न रहे। योगनिद्रा से जगने के बाद उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। जिसकी कर्णिकाओं पर स्वयम्भू ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने अपने नेत्रों को चारों ओर घुमाकर शून्य में देखा। इस चेष्टा से चारों दिशाओं में उनके चार मुख प्रकट हो गये। जब चारों ओर देखने से उन्हें कुछ भी दिखलायी नहीं पड़ा, तब उन्होंने सोचा कि इस कमल पर बैठा हुआ मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ तथा यह कमल कहाँ से निकला है? &lt;br /&gt;
*दीर्घ काल तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी को शेषशय्या पर सोये हुए भगवान विष्णु के दर्शन हुए। अपने एवं विश्व के कारण परम पुरुष का दर्शन करके उन्हें विशेष प्रसन्नता हुई और उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा कि अब आप तप:शक्ति से सम्पन्न हो गये हैं और आपको मेरा अनुग्रह भी प्राप्त हो गया है। अत: अब आप सृष्टि करने का प्रयत्न कीजिये। &lt;br /&gt;
*भगवान विष्णु की प्रेरणा से सरस्वती देवी ने ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण [[वेद|वेदों]] का ज्ञान कराया। &lt;br /&gt;
*सभी पुराणों तथा स्मृतियों में सृष्टि-प्रक्रिया में सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। वे मानसिक संकल्प से प्रजापतियों को उत्पन्न कर उनके द्वारा सम्पूर्ण प्रजा की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे प्रजापतियों के भी पति कहे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*[[मरीचि]], [[अत्रि]], [[अंगिरा]], [[पुलस्त्य]], [[पुलह]], [[क्रतु]], [[भृगु]], [[वसिष्ठ]], [[दक्ष]] तथा [[कर्दम]]- ये दस मुख्य प्रजापति हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Brhma-Kund-1.jpg|ब्रह्म कुण्ड, [[गोवर्धन]]&amp;lt;br /&amp;gt; Brahma Kund, Govardhan|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
*भागवतादि पुराणों के अनुसार भगवान [[रुद्र]] भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए। मानव-सृष्टि के मूल महाराज [[स्वयंभुव मनु|मनु]] उनके दक्षिण भाग से उत्पन्न हुए और वाम भाग से [[शतरूपा]] की उत्पत्ति हुई। स्वायम्भुव मनु और महारानी शतरूपा से मैथुनी-सृष्टि प्रारम्भ हुई। &lt;br /&gt;
*सभी [[देवता]] ब्रह्मा जी के पौत्र माने गये हैं, अत: वे पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं। यों तो ब्रह्मा जी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं, फिर भी वे विशेष रूप से धर्म के पक्षपाती हैं। इसलिये जब देवासुरादि संग्रामों में पराजित होकर देवता ब्रह्मा के पास जाते हैं, तब ब्रह्मा जी धर्म की स्थापना के लिये भगवान विष्णु को अवतार लेने के लिये प्रेरित करते हैं। अत: भगवान विष्णु के प्राय: चौबीस अवतारों में ये ही निमित्त बनते हैं। &lt;br /&gt;
*[[शैव मत|शैव]] और शाक्त आगमों की भाँति ब्रह्मा जी की उपासना का भी एक विशिष्ट सम्प्रदाय है, जो वैखानस सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इस वैखानस सम्प्रदाय की सभी सम्प्रदायों में मान्यता है। पुराणादि सभी शास्त्रों के ये ही आदि वक्ता माने गये हैं। &lt;br /&gt;
*ब्रह्माजी की प्राय: अमूर्त अपासना ही होती है। सर्वतोभद्र, लिंगतोभद्र आदि चक्रों में उनकी पूजा मुख्य रूप से होती है, किन्तु मूर्तरूप में मन्दिरों में इनकी पूजा पुष्कर-क्षेत्र तथा ब्रह्मार्वत-क्षेत्र (विठुर) में देखी जाती है। &lt;br /&gt;
*[[माध्व सम्प्रदाय]] के आदि आचार्य भगवान ब्रह्मा ही माने जाते हैं। इसलिये उडुपी आदि मुख्य मध्वपीठों में इनकी पूजा-आराधना की विशेष परम्परा है। देवताओं तथा असुरों की तपस्या में प्राय: सबसे अधिक आराधना इन्हीं की होती है। विप्रचित्ति, तारक, [[हिरण्यकशिपु]], [[रावण]], गजासुर तथा त्रिपुर आदि असुरों को इन्होंने ही वरदान देकर अवध्य कर डाला था। देवता, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, किन्नर तथा विद्याधर गण इनकी आराधना में निरंतर तत्पर रहते हैं। &lt;br /&gt;
*[[मत्स्य पुराण]] के अनुसार ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। वे अपने चार हाथों में क्रमश: वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, [[वेद]] तथा कमण्डलु धारण किये हैं। उनका वाहन हंस है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्बंधित कथाएं==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma-Astride-A-Crane.jpg|thumb|250px|सारस पर बैठे ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
*[[सावित्री]], [[गायत्री]], [[श्रद्धा]], [[मेधा]] और [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] ब्रह्मा की कन्याएं हैं। इनमें से एक कन्या त्रिभुवन सुंदरी थी। ब्रह्मा स्वयं ही निर्माण करके उस पर आसक्त हो गये। वह मृगी के रूप में भाग गयी । ब्रह्मा ने मृग का रूप धारण करके उसका पीछा किया। [[शिव]] ने धर्मसंकट में देख मृगवधिक का रूप धारण करके ब्रह्मा को रोका। ब्रह्मा ने वह कन्या विवस्वत मनु को दे दी। पांचों कन्याएं डरकर महानदी [[गंगा नदी|गंगा]] में जा मिलीं।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण, 102।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद छिड़ गया कि दोनों में से कौन बड़ा है। [[महादेव]] की ज्योतिर्मयी मूर्ति दोनों  मध्य प्रकट हुई, साथ ही आकाशवाणी हुई कि जो उस मूर्ति का अंत देखेगा, वही श्रेष्ठ माना जायेगा। विष्णु नीचे की चरम सीमा तथा ब्रह्मा ऊपर की अंतिम सीमा देखने के लिए बढ़े। विष्णु तो शीघ्र लौट आये। ब्रह्मा बहुत दूर तक [[शिव]] की मूर्ति का अंत देखने गये। उन्होंने लौटते समय सोचा कि अपने मुंह से झूठ नहीं बोलना चाहिए, अत: गधे का एक मुंह (जो कि ब्रह्मा का पांचवां मुंह  कहलाता है) बनाकर उससे बोले- 'हे विष्णु! मैं तो शिव की सीमा देख आया।' तत्काल शिव और विष्णु के ज्योतिर्मय स्वरूप एक रूप हो गये। ब्रह्मा की झूठी वाणी, वाणी नामक नदी के रूप में प्रकट हुई। उन दोनों को आराधना से प्रसन्न करके वह नदी [[सरस्वती नदी]] के नाम से [[गंगा नदी|गंगा]] से जा मिली और तब वह शापमुक्त हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण, 135।–&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[चित्र:Brahma.jpg|thumb|350px|left|ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
*सृष्टि के पूर्व में संपूर्ण विश्व जलप्लावित था। श्री नारायण शेषशैय्या पर निद्रालीन थे। उनके शरीर में संपूर्ण प्राणी सूक्ष्म रूप से विद्यमान थे। केवल कालशक्ति ही जागृत थी क्योंकि उसका कार्य जगाना था। कालशक्ति ने जब जीवों के कर्मों के लिए उन्हें प्रेरित किया तब उनका ध्यान लिंग शरीर आदि सूक्ष्म तत्त्व पर गया- वही कमल के रूप में उनकी नाभि से निकला। उस पर ब्रह्मा स्वयं प्रकट हुए। अत: स्वयंभू कहलाये। ब्रह्मा विचारमग्न हो गये कि वे कौन हैं, कहां से आये, कहां हैं, अत: कमल की नाल से होकर विष्णु की नाभि के निकट तक चक्कर लगाकर भी वे विष्णु को नहीं देख पाये। योगाभ्यास से ज्ञान प्राप्त होने पर उन्होंने शेषशायी विष्णु के दर्शन किये। विष्णु की प्रेरणा से उन्होंने तप करके, भगवत ज्ञान अनुष्ठान करके, सब लोकों को अपने अंत:करण में स्पष्ट रूप से देखा। तदनंतर विष्णु अंतर्धान हो गये और ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। सरस्वती उनके मुंह से उत्पन्न पुत्री थी, उसके प्रति काम-विमोहित हो, वे समागम के इच्छुक थे। प्रजापतियों की रोक-टोक से लज्जित होकर उन्होंने उस शरीर का त्याग कर दूसरा शरीर धारण किया। त्यक्त शरीर अंधकार अथवा कुहरे के रूप में दिशाओं में व्याप्त हो गया। उन्होंने अपने चार मुंह से चार वेदों को प्रकट किया। ब्रह्मा को 'क' कहते हैं- उन्हीं से विभक्त होने के कारण शरीर को काम कहते हैं। उन दोनों विभागों से स्त्री-पुरुष एक-एक जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष मनु तथा स्त्री शतरूपा कहलायी। उन दोनों की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि प्रजापतियों की सृष्टि का सुचारू विस्तार नहीं हो रहा था।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवत, तृतीय स्कंध, 8-10,12&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*भगवान [[बुद्ध]] बोधिसत्त्व प्राप्त करके भी चिंताग्रस्त थे। वे सोचते थे कि उनके धर्मोपदेश को कोई मानेगा कि नहीं। प्रजापति ब्रह्मा ने यह ताड़ लिया। अत: वे 'ब्रह्मलोक' से अंतर्धान होकर भगवान के सामने प्रकट हुए तथा उन्हें धर्मोपदेश के लिए प्रेरित किया।&amp;lt;ref&amp;gt;बुद्ध चरित, 1।4।-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]] [[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू देवी-देवता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू भगवान अवतार]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>पद्मनाभ (बहुविकल्पी)</title>
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		<updated>2016-08-28T13:47:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्पी शब्द}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#[[पद्मनाभ (धृतराष्ट्र पुत्र)]] - राजा धृतराष्ट्र का एक पुत्र था।&lt;br /&gt;
#[[पद्मनाभ (महानाग)]] - एक धर्मात्मा महानाग था।&lt;br /&gt;
#[[पद्मनाभ]] - भगवान विष्णु का एक नाम है ।&lt;br /&gt;
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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>पद्मनाभ</title>
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		<updated>2016-08-28T13:38:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=पद्मनाभ|लेख का नाम=पद्मनाभ (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:God-Vishnu.jpg|thumb|150px|भगवान [[विष्णु]]&amp;lt;br /&amp;gt;God Vishnu]]&lt;br /&gt;
{{main|विष्णु}}&lt;br /&gt;
*भगवान [[विष्णु]] का नाम पद्मनाभ भी है।&lt;br /&gt;
*चार भुजाधारी भगवान [[विष्णु]] के दाहिनी एवं ऊर्ध्व भुजा के क्रम से अस्त्र विशेष ग्रहण करने पर केशव आदि नाम होते हैं अर्थात, दाहिनी ओर का ऊपर का हाथ, दाहिनी ओर का नीचे का हाथ, बायीं ओर का ऊपर का हाथ और बायीं ओर का नीचे का हाथ- इस क्रम से चारों हाथों में शंख, चक्र आदि आयुधों को क्रम या व्यतिक्रमपूर्वक धारण करने पर भगवान की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ होती हैं। उन्हीं संज्ञाओं का निर्देश करते हुए यहाँ भगवान का पूजन बतलाया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान विष्णु के अन्य नाम&lt;br /&gt;
|[[उग्र (विष्णु)|उग्र]]&lt;br /&gt;
|[[शर्व (विष्णु)|शर्व]]&lt;br /&gt;
|[[भगवत् (विष्णु)|भगवत्]]&lt;br /&gt;
|[[नारायण]]&lt;br /&gt;
|[[कृष्ण]]&lt;br /&gt;
|[[वैकुण्ठ (विष्णु)|वैकुण्ठ]]&lt;br /&gt;
|[[विष्टरश्रवस्]]&lt;br /&gt;
|[[जिन (विष्णु)|जिन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[ह्रषिकेश]]&lt;br /&gt;
|[[केशव (विष्णु)|केशव]]&lt;br /&gt;
|[[माधव (विष्णु)|माधव]]&lt;br /&gt;
|[[स्वभू]]&lt;br /&gt;
|[[दैत्यारि]]&lt;br /&gt;
|[[पुण्डरीकाक्ष]]&lt;br /&gt;
|[[गोविन्द (विष्णु)|गोविन्द]]&lt;br /&gt;
|[[गरुड़ध्वज]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[पीताम्बर (विष्णु)|पीताम्बर]]&lt;br /&gt;
|[[अच्युत (विष्णु)|अच्युत]]&lt;br /&gt;
|[[शार्गिं]]&lt;br /&gt;
|[[विष्वक्सेन]]&lt;br /&gt;
|[[जनार्दन]]&lt;br /&gt;
|[[दामोदर]]&lt;br /&gt;
|[[इन्द्रावरज]]&lt;br /&gt;
|[[चक्रपाणि]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[चतुर्भुज]]&lt;br /&gt;
|[[मुकुन्द]]&lt;br /&gt;
|[[मधुरिपु]]&lt;br /&gt;
|[[भीम (विष्णु)|भीम]]&lt;br /&gt;
|[[त्रिविक्रम]]&lt;br /&gt;
|[[देवकीनन्दन (विष्णु)|देवकीनन्दन]]&lt;br /&gt;
|[[शौरि]]&lt;br /&gt;
|[[श्रीपति]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[पुरुषोत्तम (विष्णु)|पुरुषोत्तम]]&lt;br /&gt;
|[[वनमालिन्]]&lt;br /&gt;
|[[बलिध्वंसिन्]]&lt;br /&gt;
|[[कंसाराति]]&lt;br /&gt;
|[[अधोक्षज]]&lt;br /&gt;
|[[विश्वम्भर]]&lt;br /&gt;
|[[कैटभजित्]]&lt;br /&gt;
|[[विधु (विष्णु)|विधु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[श्रीवत्सलाञ्छन]]&lt;br /&gt;
|[[पुराणपुरुष]]&amp;lt;ref&amp;gt;अन्य पुस्तकों में 'पुराणपुरुष' से लेकर 'मुदमर्दन' तक श्लोक नहीं है, अतः वहाँ केवल 39 ही नाम गिनाये गए हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
|[[यज्ञपुरुष]]&lt;br /&gt;
|[[नरकान्तक]]&lt;br /&gt;
|[[जलशायिन्]]&lt;br /&gt;
|[[विश्वरूप (विष्णु)|विश्वरूप]]&lt;br /&gt;
|[[उपेन्द्र (विष्णु)|उपेन्द्र]]&lt;br /&gt;
|[[मुरमर्दन (विष्णु)|मुरमर्दन]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दशावतार2}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
{{दशावतार}}&lt;br /&gt;
[[Category:विष्णु]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यायवाची कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>पद्मानाभ</title>
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		<updated>2016-08-28T13:33:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: पद्मनाभ को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[पद्मनाभ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>पद्मनाभ</title>
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		<updated>2016-08-28T13:32:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रितेश शर्मा: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:God-Vishnu.jpg|thumb|150px|भगवान [[विष्णु]]&amp;lt;br /&amp;gt;God Vishnu]]&lt;br /&gt;
{{main|विष्णु}}&lt;br /&gt;
*भगवान [[विष्णु]] का नाम पद्मनाभ भी है।&lt;br /&gt;
*चार भुजाधारी भगवान [[विष्णु]] के दाहिनी एवं ऊर्ध्व भुजा के क्रम से अस्त्र विशेष ग्रहण करने पर केशव आदि नाम होते हैं अर्थात, दाहिनी ओर का ऊपर का हाथ, दाहिनी ओर का नीचे का हाथ, बायीं ओर का ऊपर का हाथ और बायीं ओर का नीचे का हाथ- इस क्रम से चारों हाथों में शंख, चक्र आदि आयुधों को क्रम या व्यतिक्रमपूर्वक धारण करने पर भगवान की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ होती हैं। उन्हीं संज्ञाओं का निर्देश करते हुए यहाँ भगवान का पूजन बतलाया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ भगवान विष्णु के अन्य नाम&lt;br /&gt;
|[[उग्र (विष्णु)|उग्र]]&lt;br /&gt;
|[[शर्व (विष्णु)|शर्व]]&lt;br /&gt;
|[[भगवत् (विष्णु)|भगवत्]]&lt;br /&gt;
|[[नारायण]]&lt;br /&gt;
|[[कृष्ण]]&lt;br /&gt;
|[[वैकुण्ठ (विष्णु)|वैकुण्ठ]]&lt;br /&gt;
|[[विष्टरश्रवस्]]&lt;br /&gt;
|[[जिन (विष्णु)|जिन]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[ह्रषिकेश]]&lt;br /&gt;
|[[केशव (विष्णु)|केशव]]&lt;br /&gt;
|[[माधव (विष्णु)|माधव]]&lt;br /&gt;
|[[स्वभू]]&lt;br /&gt;
|[[दैत्यारि]]&lt;br /&gt;
|[[पुण्डरीकाक्ष]]&lt;br /&gt;
|[[गोविन्द (विष्णु)|गोविन्द]]&lt;br /&gt;
|[[गरुड़ध्वज]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[पीताम्बर (विष्णु)|पीताम्बर]]&lt;br /&gt;
|[[अच्युत (विष्णु)|अच्युत]]&lt;br /&gt;
|[[शार्गिं]]&lt;br /&gt;
|[[विष्वक्सेन]]&lt;br /&gt;
|[[जनार्दन]]&lt;br /&gt;
|[[दामोदर]]&lt;br /&gt;
|[[इन्द्रावरज]]&lt;br /&gt;
|[[चक्रपाणि]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[चतुर्भुज]]&lt;br /&gt;
|[[मुकुन्द]]&lt;br /&gt;
|[[मधुरिपु]]&lt;br /&gt;
|[[भीम (विष्णु)|भीम]]&lt;br /&gt;
|[[त्रिविक्रम]]&lt;br /&gt;
|[[देवकीनन्दन (विष्णु)|देवकीनन्दन]]&lt;br /&gt;
|[[शौरि]]&lt;br /&gt;
|[[श्रीपति]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[पुरुषोत्तम (विष्णु)|पुरुषोत्तम]]&lt;br /&gt;
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|[[बलिध्वंसिन्]]&lt;br /&gt;
|[[कंसाराति]]&lt;br /&gt;
|[[अधोक्षज]]&lt;br /&gt;
|[[विश्वम्भर]]&lt;br /&gt;
|[[कैटभजित्]]&lt;br /&gt;
|[[विधु (विष्णु)|विधु]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[श्रीवत्सलाञ्छन]]&lt;br /&gt;
|[[पुराणपुरुष]]&amp;lt;ref&amp;gt;अन्य पुस्तकों में 'पुराणपुरुष' से लेकर 'मुदमर्दन' तक श्लोक नहीं है, अतः वहाँ केवल 39 ही नाम गिनाये गए हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
|[[यज्ञपुरुष]]&lt;br /&gt;
|[[नरकान्तक]]&lt;br /&gt;
|[[जलशायिन्]]&lt;br /&gt;
|[[विश्वरूप (विष्णु)|विश्वरूप]]&lt;br /&gt;
|[[उपेन्द्र (विष्णु)|उपेन्द्र]]&lt;br /&gt;
|[[मुरमर्दन (विष्णु)|मुरमर्दन]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दशावतार2}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दू देवी देवता और अवतार}}&lt;br /&gt;
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[[Category:विष्णु]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यायवाची कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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		<title>साँचा:पौराणिक चरित्र</title>
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		<updated>2016-08-28T13:20:28Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{scrollopen}}&lt;br /&gt;
{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=पौराणिक चरित्र&lt;br /&gt;
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[[लिखित]] '''·''' [[द्युमत्सेन]] '''·''' [[इक्ष्वाकु (क्षुप पुत्र)|इक्ष्वाकु]] '''·''' [[विंश]] '''·''' [[वसुचन्द्र]] '''·''' [[व्यश्व]] '''·''' [[काली (वेदव्यास की माता)|काली]] '''·''' [[सुमना (दैत्य)|सुमना]] '''·''' [[वीरधर्मा]] '''·''' [[वसुहोम]] '''·''' [[केतुमान राजा]] '''·''' [[पृथुश्रवा ऋषि]] '''·''' [[अर्चिष्मती]] '''·''' [[पोत]] '''·''' [[इषुपाद]] '''·''' [[पैलगग]] '''·''' [[जय (राजा)|जय राजा]] '''·''' [[वीरिणी]] '''·''' [[वाक्षी]] '''·''' [[वारिसेन]] '''·''' [[पुण्डरीक नाग]] '''·''' [[संवर्त्तक (अग्निदेव)|संवर्त्तक]] '''·''' [[द्युमत्सेन (शाल्व नरेश)|द्युमत्सेन]] '''·''' [[मधु (राजा)|मधु]] '''·''' [[काली (काशिराज कन्या)|काली]] '''·''' [[ऐरावत सर्प]] '''·''' [[संवर्त्तक (नाग)|संवर्त्तक नाग]] '''·''' [[क्रतु अग्नि]] '''·''' [[प्रदाता]] '''·''' [[प्रच्छाण्डक]] '''·''' [[सनातन (मुनि)|सनातन]] '''·''' [[जम्भ]] '''·''' [[सुमना (सर्प)|सुमना]] '''·''' [[केरल राजा]] '''·''' [[सत्यधर्मा]] '''·''' [[सत्यकर्मा]] '''·''' [[केतुमान (कौरव पक्षीय योद्धा)|केतुमान]] '''·''' [[जरा (राक्षसी)|जरा]] '''·''' [[द्युमत्सेन (राजा)|द्युमत्सेन]] '''·''' [[जम्भ राक्षस]] '''·''' [[कृष्णा (अग्नि जिव्हा)|कृष्णा]] '''·''' [[कैलास सर्प]] '''·''' [[प्रभाकर (नाग)|प्रभाकर]] '''·''' [[ऋषिक (राजर्षि)|ऋषिक]] '''·''' [[कृश सर्प]] '''·''' [[पूर्णायु]] '''·''' [[भीष्म (राजा)|भीष्म]] '''·''' [[अनिकेत]] '''·''' [[विरूपाश्व]] '''·''' [[केतुमान (दनु पुत्र)|केतुमान]] '''·''' [[संतर्जन]] '''·''' [[संचारक]] '''·''' [[विद्युत्पर्णा]] '''·''' [[संतानिका]] '''·''' [[पृथुश्रवा (नाग)|पृथुश्रवा]] [[गौराश्व]] '''·''' [[नमुचि]] '''·''' [[वज्रबाहु]] '''·''' [[कालवेग]] '''·''' [[विगाहन]] '''·''' [[विक्रम]] '''·''' [[वातस्कन्ध]] '''·''' [[प्रमिति]] '''·''' [[भीमबल (असुर)|भीमबल]] '''·''' [[बर्हि]] '''·''' [[प्रमोद]] '''·''' [[जलसन्ध (कौरव पक्ष योद्धा)|जलसन्ध]] '''·''' [[पृषत]] '''·''' [[संहतापन]] '''·''' [[केशी (असुर)|केशी]] '''·''' [[आजानेय]] '''·''' [[सुरजा]] '''·''' [[अनीकविदारण]] '''·''' [[ज्योतिष्मान]] '''·''' [[ज्वाला]] '''·''' [[अनिल (गरुड़)|अनिल]] '''·''' [[सनत्कुमार]] '''·''' [[संहनन]] '''·''' [[श्वेत (नाग)|श्वेत नाग]] '''·''' [[ऋद्धि (कुबेर पत्नि)|ऋद्धि]] '''·''' [[भीमबल]] '''·''' [[रोचनामुख]] '''·''' [[सत्यवान (सेनापति)|सत्यवान]] '''·''' [[गृत्समद]] '''·''' [[संवृत्ति]] '''·''' [[संवृत्त]] '''·''' [[लक्षणा]] '''·''' [[संवह]] '''·''' [[शैव्या (सगर की रानी)|शैव्या]] '''·''' [[कलि (राजा)|कलि]] '''·''' [[दधिमुख (नाग)|दधिमुख]] '''·''' [[प्रचेता (वरुण)|प्रचेता]] '''·''' [[पुरन्दर]] '''·''' [[पुष्पानन]] '''·''' [[पूर्णभद्र]] '''·''' [[शंखशिरा]] '''·''' [[पूर्वपाली]] '''·''' [[शिखावर्त]] '''·''' [[कुमुद वानर]] '''·''' [[एकचक्र]] '''·''' [[एकत]] '''·''' [[शैव्या (द्युमत्सेन की रानी)|शैव्या]] '''·''' [[जय (अनुचर)|जय अनुचर]] '''·''' [[पिंगलक]] '''·''' [[ऋक्ष (अरिह पुत्र)|ऋक्ष]] '''·''' [[प्रशमी]] '''·''' [[द्विविद]] '''·''' [[पुण्डरीयक]] '''·''' [[सनातन (ब्रह्मा पुत्र)|सनातन]] '''·''' [[पुण्डरीका]] '''·''' [[अनिमिष]] '''·''' [[कालिकेय]] '''·''' [[वज्री]] '''·''' [[कुमुद (गज)|कुमुद]] '''·''' [[वहीनर]] '''·''' [[कम्बल (सर्प)|कम्बल]] '''·''' [[हुहु]] '''·''' [[प्रमोद (अनुचर)|प्रमोद]] '''·''' [[ऋक्ष (संवरण पिता)|ऋक्ष]] '''·''' [[प्रताप (राजकुमार)|प्रताप]] '''·''' [[हीक]] '''·''' [[ईलिन]] '''·''' [[असित (सर्प)|असित]] '''·''' [[कुमुद गरुड़]] '''·''' [[चैद्य]] '''·''' [[चाम्पेय]] '''·''' [[अनेना]] '''·''' [[वाहिनी]] '''·''' [[स्थूणकर्ण]] '''·''' [[चान्द्रमसी]] '''·''' [[चारुचित्र]] '''·''' [[वध्रयश्व]] '''·''' [[पताकी]] '''·''' [[सुहस्त ]] '''·''' [[इक्ष्वाकु]] '''·''' [[पूर्णांगद]] '''·''' [[सुयज्ञ]] '''·''' [[उशना]] '''·''' [[अनेना (ककुत्स्थ पुत्र)|अनेना]] '''·''' [[क्रोधवश]] '''·''' [[पृथुवेग]] '''·''' [[लय]] '''·''' [[पुण्ड्रक]] '''·''' [[जठर]] '''·''' [[अक्रोधन]] '''·''' [[पुष्प नाग]] '''·''' [[पृथाश्व]] '''·''' [[असित (राजर्षि)|असित]] '''·''' [[आयाति]] '''·''' [[आर्जव (शकुनि भ्राता)|आर्जव]] '''·''' [[जठर (अग्नि)|जठर]] '''·''' [[संयाति]] '''·''' [[स्थूण]] '''·''' [[जटासुर]] '''·''' [[चित्रकुण्डल]] '''·''' [[विभु (शकुनि भाई)|विभु]] '''·''' [[चीरवासा]] '''·''' [[कुमुद सर्प]] '''·''' [[क्राथ]] '''·''' [[विशोक (सारथि)|विशोक]] '''·''' [[महाशिरा]] '''·''' [[पुण्डरीक (राजा)|पुण्डरीक]] '''·''' [[चैत्ररथ]] '''·''' [[इरावत]] '''·''' [[चीरवासा (राजा)|चीरवासा]] '''·''' [[कुमुद (अनुचर)|कुमुद]] '''·''' [[निष्ठुरक]] '''·''' [[सनातन (सूर्य)|सनातन]] '''·''' [[जय (नाग)|जय नाग]] '''·''' [[पताकी (सर्प)|पताकी]] '''·''' [[जटासुर (असुर)|जटासुर]] '''·''' [[देवापि (राजर्षि)|देवापि]] '''·''' [[मन्दपाल]] '''·''' [[स्थाणु (ब्रह्मा पुत्र)|स्थाणु]] '''·''' [[मनोरमा (कुबेर पत्नी)|मनोरमा]] '''·''' [[पूर्णमुख]] '''·''' [[कैवल]] '''·''' [[प्रजागरा]] '''·''' [[कृशक]] '''·''' [[अनाधृष्टि]] '''·''' [[पद्म]] '''·''' [[महाशिरा (राक्षस)|महाशिरा]] '''·''' [[अय:शंक]] '''·''' [[अश्मक (राजा)|अश्मक]] '''·''' [[अघ]] '''·''' [[पद्म (निधि)|पद्म]] '''·''' [[मनोरमा अप्सरा]] '''·''' [[अनाधृष्टि (पांडव पक्षीय योद्धा)|अनाधृष्टि]] '''·''' [[पूर्णमुख (प्राधा पुत्र)|पूर्णमुख]] '''·''' [[कृतवेग]] '''·''' [[विशालक]] '''·''' [[वराहकर्ण]] '''·''' [[शोणितोद]] '''·''' [[प्रवालक]] '''·''' [[कोटिश]] '''·''' [[उपचित्र]] '''·''' [[कोपवेग]] '''·'''  [[पद्म (राजा)|पद्म]] '''·''' [[इन्द्र]] '''·''' [[हरिद्रक]] '''·''' [[कृश]] '''·''' [[अश्वग्रीव]] '''·''' [[पृथुलाक्ष]] '''·''' [[कृति]] '''·''' [[कृति (विश्वेदेवा)|कृति]] '''·''' [[अलर्क ऋषि]] '''·'''  [[पुलोमा]] '''·''' [[प्रलम्ब]] '''·''' [[अश्वपति (दनु पुत्र)|अश्वपति]] '''·''' [[कुण्डल (सर्प)|कुण्डल]] '''·''' [[क्रोधवश (राक्षस)|क्रोधवश]] '''·''' [[स्थाणु ऋषि]] '''·''' [[सद:सुवाक]] '''·''' [[मुंजकेतु]] '''·''' [[और्व (च्यवन पुत्र)|और्व]] '''·''' [[वायुभक्ष]] '''·''' [[कुमुदाक्ष]] '''·''' [[कृष्ण सर्प]] '''·''' [[क्राथ सर्प]] '''·''' [[विभीषण (यक्ष)|विभीषण]] '''·''' [[कृष्ण द्वैपायन]] '''·''' [[कोकिल]] '''·''' [[क्रोधवश (देवगण)|क्रोधवश]] '''·''' [[हूहू]] '''·''' [[कोटरक]] '''·''' [[मन्युमान]] '''·''' [[क्राथ वानर]] '''·''' [[फणधारी]] '''·''' [[पूर्वचित्ति]] '''·''' [[शतायु]] '''·''' [[कृतक्षण]] '''·''' [[कृकणेयु]] '''·''' [[वराहक]] '''·''' [[पुलोमा (दिति की पुत्री)|पुलोमा]] '''·''' [[क्राथ राजा]] '''·''' [[कृश ऋषि]] '''·''' [[कृतकाम]] '''·''' [[इन्द्राणी]] '''·''' [[कच]] '''·''' [[शतायु (योद्धा)|शतायु]] '''·''' [[शरद्वान गौतम]] '''·''' [[पुरूरवा (दीप्ताक्षवंशी राजा)|पुरूरवा]] '''·''' [[राक्षस]] '''·''' [[ऋचीक]] '''·''' [[अलंबुषा (प्राधा पुत्री)|अलंबुषा]] '''·''' [[अपान्तरतमा]] '''·''' [[चीन (जाति)|चीन]] '''·''' [[अय:शिरा]] '''·''' [[ऋचीक ऋषि]] '''·''' [[इला]] '''·''' [[वंशा]] '''·''' [[वरूथिनी]] '''·''' [[मणिवाहन]] '''·''' [[मणिभद्र]] '''·''' [[धनद]] '''·''' [[कौरव्य]] '''·''' [[वसु (निषाद)|वसु]] '''·''' [[कृती]] '''·''' [[सावित्री (सूर्य की पुत्री)|सावित्री]] '''·''' [[मकरी]] '''·''' [[भव (राजा)|भव]] '''·''' [[ऋचीक (भुमन्यु पुत्र)|ऋचीक]] '''·''' [[विरजा]] '''·''' [[कलि]] '''·''' [[सुनन्दा (सर्वसेन पुत्री)|सुनन्दा]] '''·''' [[चिरकारी]] '''·''' [[अनिल]] '''·''' [[सिंहिका]] '''·''' [[भव (विश्वेदेवा)|भव]] '''·''' [[पंचशिख (ब्रह्मा पुत्र)|पंचशिख]] '''·''' [[पुलोमा (दनु का पुत्र)|पुलोमा]] '''·''' [[गोपाली]] '''·''' [[वज्रवेग]] '''·''' [[भीम (ईलिन पुत्र)|भीम]] '''·''' [[वर्गा]] '''·''' [[क्राथ (कौरव पक्षीय योद्धा)|क्राथ]] '''·''' [[अनिरुद्ध (राजा)|अनिरुद्ध]] '''·''' [[दुर्मुख (धृतराष्ट्र पुत्र)|दुर्मुख]] '''·''' [[पद्मनाभ (धृतराष्ट्र पुत्र)]] '''·''' [[पुलोमा (राक्षस)|पुलोमा]] '''·''' [[पद्मनाभ (महानाग)|पद्मनाभ]] '''·''' [[भीम (मुनि पुत्र)|भीम]] '''·''' [[तुम्बुरु]] '''·''' [[कुम्भीनसि]] '''·''' [[संकोच]] '''·''' [[कुम्भीनसी]] '''·''' [[तुम्बुरु (गन्धर्व)|तुम्बुरु]] '''·''' [[पटवासक]] '''·''' [[गोवासन]] '''·''' [[कैतव]] '''·''' [[कोटिक]] '''·''' [[वदान्य]] '''·''' [[कौत्स]] '''·''' [[उपसुंद]] '''·''' [[मारुत]] '''·''' [[क्रोधहन्ता]] '''·''' [[मुण्डवेदांग]] '''·''' [[क्रोधशत्रु]] '''·''' [[पुलिंदगण]] '''·''' [[सत्यजित]] '''·''' [[अनिरुद्ध (रोचना पति)|अनिरुद्ध]] '''·''' [[सुनन्दा (प्रतीप पत्नी)|सुनन्दा]] '''·''' [[शंखपिण्ड]] '''·''' [[ताराक्ष]] '''·''' [[उग्रसेन]] '''·''' [[कृषीबल]] '''·''' [[कृतबन्धु]] '''·''' [[पुण्यकृत]] '''·''' [[कृतप्रज्ञ]] '''·''' [[कृतचेता]] '''·''' [[सुनाभ]] '''·''' [[सुषेण]] '''·''' [[कीर्तिधर्मा]] '''·''' [[कीर्तिमान ]] '''·''' [[उत्तरा]] '''·''' [[सुवर्चा (पाञ्जजन्य पुत्र)|सुवर्चा]] '''·''' [[मुरु]] '''·''' [[उपदानवी]] '''·''' [[अलर्क (कीड़ा)|अलर्क]] '''·''' [[मधुच्छन्दस]] '''·''' [[पंचवीर्य]] '''·''' [[शतधन्वा]] '''·''' [[चित्राश्व]] '''·''' [[वज्रशीर्ष]] '''·''' [[कसेरुमान]] '''·''' [[कीर्तिमान (विश्वेदेवा)|कीर्तिमान]] '''·''' [[सुवर्चा (गरुड़ पुत्र)|सुवर्चा]] '''·''' [[कौधिक (सेनापति)|कौधिक]] '''·''' [[कौधिक (हैमवती के पति)|कौधिक]]  '''·''' [[कौधिक (ब्राह्मण)|कौधिक]] '''·''' [[पटुश]] '''·''' [[कौधिक]] '''·''' [[सत्यसंध]] '''·''' [[कौण्डिन्य]] '''·''' [[कौणिकुत्स्य]] '''·''' [[कराल (गन्धर्व)|कराल]] '''·''' [[रथन्तरी]] '''·''' [[उत्तानपाद]] '''·''' [[सत्यसंध (अनुचर)|सत्यसंध]] '''·''' [[अनूदर]] '''·''' [[सत्यसंध (धृतराष्ट्र पुत्र)|सत्यसंध]] '''·''' [[सुवर्चा]] '''·''' [[सुवर्चा (सुकेतु पुत्र)|सुवर्चा]] '''·''' [[अयुतनायी]] '''·''' [[कारीषि]] '''·''' [[मालय]] '''·''' [[अनघ (गरुड़)|अनघ]] '''·''' [[काक्षीवान]] '''·''' [[मिथ्या वासुदेव]] '''·''' [[मिश्रकेशी]] '''·''' [[चारुशीर्ष]] '''·''' [[उद्दालक]] '''·''' [[उग्रश्रवा (धृतराष्ट्र पुत्र)|उग्रश्रवा]] '''·''' [[सत्यधृति]] '''·''' [[अरूपा]] '''·''' [[कलशपोत]] '''·''' [[सत्यधृति (क्षेम पुत्र)|सत्यधृति]] '''·''' [[सुषेण (नाग)|सुषेण]] '''·''' [[रैभ्य]] '''·''' [[सुनन्दा (वीरबाहु पुत्री)|सुनन्दा]] '''·''' [[सुषेण (परीक्षित पुत्र)|सुषेण]] '''·''' [[उद्धव]] '''·''' [[चित्र (पांडव पक्ष योद्धा)|चित्र]] '''·''' [[उर्मिला]] '''·''' [[अतिस्थिर]] '''·''' [[पीठकर]] '''·''' [[चित्र (पांचाल क्षत्रिय)|चित्र]] '''·''' [[अतिषण्ड]] '''·''' [[सत्यधृति (योद्धा)|सत्यधृति]] '''·''' [[पण्डितक]] '''·''' [[सुषेण (जमदग्नि पुत्र)|सुषेण]]  '''·''' [[सेनानी]] '''·''' [[हरिमेधा]] '''·''' [[अतिश्रृंग]] '''·''' [[चित्र (कौरव पक्ष योद्धा)|चित्र]] '''·''' [[अतिवर्चा]] '''·''' [[सेनानी (शंबर पुत्र)|सेनानी]] '''·''' [[अतिरथ]] '''·''' [[गार्ग्य (विश्वामित्र पुत्र)|गार्ग्य]] '''·''' [[स्वरूप]] '''·''' [[भीम (राजर्षि)|भीम]] '''·''' [[अबल]] '''·''' [[भीम (दमयन्ती पिता)|भीम]] '''·''' [[तार (वानर)|तार]] '''·''' [[अभिभू]] '''·''' [[कीटक]] '''·''' [[सत्यक]] '''·''' [[सुदेव (देवकर पुत्र)|सुदेव]] '''·''' [[वीरबाहु]] '''·''' [[कामन्दक]] '''·''' [[चित्रायुध]] '''·''' [[कृत]] '''·''' [[कूपकर्ण]] '''·''' [[चित्रायुध (राजा)|चित्रायुध]] '''·''' [[कूष्माण्डक]] '''·''' [[चर्मवान]] '''·''' [[चारु (धृतराष्ट्र पुत्र)|चारु]] '''·''' [[महाबाहु]] '''·''' [[माधवी]] '''·''' [[गिरिका]] '''·''' [[कुम्भ योनि]] '''·''' [[गौरवाहन]] '''·''' [[मुंज]] '''·''' [[सुदेव (हर्यश्व पुत्र)|सुदेव]] '''·''' [[अप्सुहोम्य]] '''·''' [[चित्रसेन गन्धर्व|चित्रसेन]] '''·''' [[सत्राजित]] '''·''' [[किर्मीर]] '''·''' [[स्वर्भानु (दनु पुत्र)|स्वर्भानु]] '''·''' [[भीम (असुर)|भीम]] '''·''' [[हेमनेत्र]] '''·''' [[पतन]] '''·''' [[भीम (अनुचर)|भीम]] '''·''' [[हेमगुह]] '''·''' [[चित्रसेन (परीक्षित पुत्र) |चित्रसेन]] '''·''' [[रोमहर्षण]] '''·''' [[महौजा]] '''·''' [[क्रोध]] '''·''' [[क्रव्याद]] '''·''' [[कुमुदमाली]] '''·''' [[कुमारदेव]] '''·''' [[अपोद]] '''·''' [[महाश्व]] '''·''' [[कुम्भरेता]] '''·''' [[सुवर्चा (खनीनेत्र पुत्र)|सुवर्चा]] '''·''' [[ऊर्णनाभ]] '''·''' [[चित्रांग]] '''·''' [[हर्यश्व]] '''·''' [[अतियम]] '''·''' [[सोमकीर्त्ति]] '''·''' [[सुरस]] '''·''' [[सुनाभ (वरुण मंत्री)|सुनाभ]] '''·''' [[चित्र (दिग्गज)|चित्र]] '''·''' [[सुवर्मा]] '''·''' [[मणिनाग]] '''·''' [[उलूपी]] '''·''' [[कुंतिभोज]] '''·''' [[व्याघ्रदत्त]] '''·''' [[चित्र (एक सर्प)|चित्र]] '''·''' [[सुवर्चा (कार्तिकेय पार्षद)|सुवर्चा]] '''·''' [[ह्राद]] '''·''' [[निखर्वट]] '''·''' [[चित्रसेन (कर्ण पुत्र)|चित्रसेन]] '''·''' [[अंग (मनु पुत्र)|अंग]] '''·''' [[सुवर्चा (ब्राह्मण)|सुवर्चा]] '''·''' [[सुदेव (ब्राह्मण)|सुदेव]] '''·''' [[गालव (विश्वामित्र पुत्र)|गालव]] '''·''' [[चित्रसेन]] '''·''' [[निचन्द्र]] '''·''' [[रौद्राश्व]] '''·''' [[सुवर्चा (योद्धा)|सुवर्चा]] '''·''' [[निमिष]] '''·''' [[निधि]] '''·''' [[उर्मिला (यम पत्नी)|उर्मिला]] '''·''' [[उषा]] '''·''' [[सुलोचन]] '''·''' [[ह्री]] '''·''' [[दुर्विषह ]] '''·''' [[भीमवेग]] '''·''' [[वीरसेन]] '''·''' [[सुदेवा (विकुण्ठन की पत्नी)|सुदेवा]] '''·''' [[चित्रसेन (कौरव पक्ष योद्धा)|चित्रसेन]] '''·''' [[हर्यश्व (सुदेव पिता)|हर्यश्व]]  '''·''' [[चिरान्तक]] '''·''' [[महामुख]] '''·''' [[महामती]] '''·''' [[उग्रतप]] '''·''' [[क्रथ]] '''·''' [[क्रतुश्रेष्ठ]] '''·''' [[शतयूप]] '''·''' [[क्रमजित]] '''·''' [[तंसु]] '''·''' [[चार्वाक]] '''·''' [[चारुनेत्रा]] '''·''' [[चित्रा अप्सरा]] '''·''' [[चक्रमन्द]] '''·''' [[चक्रदेव]] '''·''' [[हिमवान]] '''·''' [[काव्य (शुक्राचार्य पुत्र)|काव्य]] '''·''' [[हिरण्यबाहु]] '''·''' [[चार्वाक (राक्षस)|चार्वाक]] '''·''' [[उषा अनिरुद्ध]] '''·''' [[अज (रुद्र)|अज]] '''·''' [[अंग (पुरुवंशी राजा)|अंग]] '''·''' [[हवन (रुद्र)|हवन]] '''·''' [[कामठ]] '''·''' [[राधा (अधिरथ पत्नी)|राधा]] '''·''' [[कक्षसेन]] [[वैणव]] '''·''' [[दुर्धर्ष]] '''·''' [[वैन्य]] '''·''' [[वैकर्त्तन]] '''·''' [[व्याघ्रदत्त (मगध राजकुमार)|व्याघ्रदत्त]] '''·''' [[गौरी (वरुण की पत्नी)|गौरी]] '''·''' [[शुक (गुप्तचर)|शुक]] '''·''' [[सुदेव]] '''·''' [[कुन्द]] '''·''' [[अज (राजा)|अज]] '''·''' [[उपकीचक]] '''·''' [[एकलव्य]] '''·''' [[अनघ]] '''·''' [[अनघ (गन्धर्व)|अनघ]] '''·''' [[तन्तु]] '''·''' [[दुर्मद]] '''·''' [[प्राधा]] '''·''' [[कुशध्वज]] '''·''' [[काल (ध्रुव पुत्र)|काल]] '''·''' [[अज (जहु पुत्र)|अज]] '''·''' [[महाजानु]] '''·''' [[गौरमुख]] '''·''' [[गौरपृष्ठ]] '''·''' [[केशिनी सुंदरी]] '''·''' [[केशिनी (दमयंती की 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[[अमितौजा]] '''·''' [[अमूर्त्तरया]] '''·''' [[अमृता]] '''·''' [[कक्षसेन (राजा)|कक्षसेन]] [[अनूचाना]] '''·''' [[अनुहाद]] '''·''' [[कुमारक]] '''·''' [[क्रोष्टा]] '''·''' [[क्रोधा]] '''·''' [[कामा]] '''·''' [[चित्रसेन (सेनापति)|चित्रसेन]] '''·''' [[कण्व]] '''·''' [[हस्ती]] '''·''' [[हारीत (ऋषि) |हारीत]] '''·''' [[अम्बष्ठक]] '''·''' [[लक्ष्मण (दुर्योधन पुत्र)|लक्ष्मण]] '''·''' [[चित्रबाण]] '''·''' [[चित्र (धृतराष्ट्र पुत्र)|चित्र]] '''·''' [[अर्वावसु]] '''·''' [[व्यूढोरु]] '''·''' [[शालिहोत्र]] '''·''' [[अनन्त (नाग)|अनन्त]] '''·''' [[कालका]] '''·''' [[हस्तिपिंड]] '''·''' [[हस्ती (धृतराष्ट्र पुत्र)|हस्ती]] '''·''' [[चित्रसेन (अभिसार नरेश)|चित्रसेन]] '''·''' [[विंद (धृतराष्ट्र पुत्र)|विंद]] '''·''' [[एकशृंग]] '''·''' [[हस्तिपद]] '''·''' [[घटोदर]] '''·''' [[चन्द्रकेतु]] '''·''' [[चण्डभार्गव]] '''·''' [[चण्डबल]] '''·''' [[चन्द्रवर्मा]] '''·''' [[चन्द्रविनाशन]] '''·''' [[चन्द्रमर्दन]] '''·''' [[माद्रवती]] '''·''' [[आक्रोश]] '''·''' [[बलाकी]] '''·''' [[अलायुध]] '''·''' [[भानुदत्त]] '''·''' [[कौणप]] '''·''' [[विवित्सु]] '''·''' [[सुमीढ]] '''·''' [[पुरुमीढ]] '''·''' [[हस्तिकश्यप]] '''·''' [[हरी]] '''·''' [[शांता]] '''·''' [[केसरी]] '''·''' [[हविष्मान]] [[व्युषिताश्व]] '''·''' [[गांधारी (अजमीढ़ की रानी)|गांधारी]] '''·''' [[तनु]] '''·''' [[कपिल (अग्निदेव)|कपिल]] '''·''' [[कक्ष]] '''·''' [[कालकवृक्षीय]] '''·''' [[आशावह]] '''·''' [[सुमित्र (सारथि)|सुमित्र]] '''·''' [[कपिल]] '''·''' [[मातरिश्वा]] '''·''' [[चित्रशिखण्डी]] '''·''' [[घंटाकर्ण (पार्षद)|घंटाकर्ण]] '''·''' [[वेन]] '''·''' [[अंध्रगण]] '''·''' [[शल (धृतराष्ट्र पुत्र)|शल]] '''·'''  [[अनुमति]] '''·''' [[नंद (नाग)|नंद]] '''·''' [[प्रहस्त]] '''·''' [[घूर्णिका]] '''·''' [[आशावह (राजा)|आशावह]] '''·''' [[कालखंज]] '''·''' [[कुपट असुर]] '''·''' [[वृंदारक (धृतराष्ट्र पुत्र)|वृंदारक]] '''·''' [[मातलि]] '''·''' [[हरि (राक्षस)|हरि]] '''·''' [[शकुंत]] '''·''' [[शक्रवापी]] '''·''' [[कुपट]] '''·''' [[काशिक]] '''·''' [[मनु (अग्नि)|मनु]] '''·''' [[कर्ण]] '''·''' [[हरि (योद्धा)|हरि]] '''·''' [[शल (सोमदत्त पुत्र)|शल]] '''·''' [[सुमित्र (ऋषि पुत्र)|सुमित्र]] '''·''' [[शैव्य (देविका पिता)|शैव्य]] '''·''' [[कश्यप]] '''·''' [[कलिंग (ऋषि पुत्र)|कलिंग]] '''·''' [[शल (साँप)|शल]] '''·''' [[मनु (सरस्वती पति)|मनु]] '''·''' [[शल (परीक्षित पुत्र)|शल]] '''·''' [[चक्रक]] '''·''' [[गौतमी (ब्राह्मणी)|गौतमी]] '''·''' [[हरि (तारकाक्ष पुत्र)|हरि]] '''·''' [[खनीनेत्र]] '''·''' [[अलोलुप]] '''·''' [[ईश्वरसख]] '''·''' [[गौरशिरा]] '''·''' [[चन्द्रहन्ता]] '''·''' [[चन्द्राश्व]] '''·''' [[भानुमती]] '''·''' [[सुबल]] '''·''' [[हंसिका]] '''·''' [[मनु (प्राधा पुत्री)|मनु]] '''·''' [[जानपदी]] '''·''' [[रूमा]] '''·''' [[शतानीक]] '''·''' [[उत्कच]] '''·''' [[उग्रश्रवा]] '''·''' [[कालिंदी]] '''·''' [[दुर्मर्षण ]] '''·''' [[अजमीढ]] '''·''' [[उग्र (राजा)|उग्र]] '''·''' [[हरि (गरुड़)|हरि]] '''·''' [[शैव्य (शिवि पुत्र)|शैव्य]] '''·''' [[नीली]] '''·''' [[सुहोत्र]] '''·''' [[व्रजन]] '''·''' [[उग्र (सर्प)|उग्र]] '''·''' [[स्विष्टकृत]] '''·''' [[यवक्रीत]] '''·''' [[मनु]] '''·''' [[घटजानुक]] '''·''' [[मदिरा (वसुदेव पत्नी)|मदिरा]] '''·''' [[प्रतिश्रवा]] '''·''' [[चन्द्रसेन]] '''·''' [[कालघट]] '''·''' [[कालदंत]] '''·''' [[उग्र (शुक्राचार्य पुत्र)|उग्र]] '''·''' [[कामदेव]] '''·''' [[पराशर (साँप)|पराशर]] '''·''' [[मनस्यु]] '''·''' [[स्वाहा]] '''·''' [[चन्द्रसेन (समुद्रसेन पुत्र)|चन्द्रसेन]] '''·''' [[अग्नितेजस]] '''·''' [[ईरि]] '''·''' [[कपिल (विश्वामित्र पुत्र)|कपिल]] '''·''' [[आहुक]] '''·''' [[अभिष्यन्त]] '''·''' [[अरिष्टनेमि (ऋषि)|अरिष्टनेमि]] '''·''' [[सत्यक]] '''·''' [[स्विष्टकृत (बृहस्पति पुत्र)|स्विष्टकृत]] '''·''' [[पुरूजित]] '''·''' [[चन्द्रसेन (रक्षक)|चन्द्रसेन]] '''·''' [[स्वाहा (बृहस्पति पुत्री)|स्वाहा]] '''·''' [[यवक्रीत (अंगिरा पुत्र)|यवक्रीत]] '''·''' [[कक्षसेन (ऋषि)|कक्षसेन]] '''·''' [[महाभौम]] '''·''' [[नाचिकेत]] '''·''' [[बहाशी]] '''·''' [[खर]] '''·''' [[ऋक्षराज]] '''·''' [[वेन (मनु पुत्र)|वेन]] '''·''' [[कहोल]] '''·''' [[सन्तर्दन]] '''·''' [[कर्णिका (अप्सरा)|कर्णिका]] '''·''' [[दनु]] '''·''' [[वैद्युत]] '''·''' [[उत्क्रोश]] '''·''' [[अर्कपर्ण]] '''·''' [[महाजय]] '''·''' [[निष्कृति]] '''·''' [[मनोहरा]] '''·''' [[निसुन्द]] '''·''' [[परमेष्ठी]] '''·''' [[कपिल (शालिहोत्र पिता)|कपिल]] '''·''' [[गर्दभि]] '''·''' [[सुनन्दा]] '''·''' [[मांडवी]] '''·''' [[कामधेनु]] '''·''' [[वभ्रुवाहन]] '''·''' [[गन्धमादन (राक्षस राज)|गन्धमादन]] '''·''' [[महत्तर]] '''·''' [[भुमन्यु]] '''·''' [[देवापि]] '''·''' [[अरिह]] '''·''' [[पुष्करिणी]] '''·''' [[प्रतीप]] '''·''' [[भुमन्यु (धृतराष्ट्र पुत्र)|भुमन्यु]] '''·''' [[दीर्घरोमा]] '''·''' [[दीर्घबाहु]] '''·''' [[व्योमासुर]] '''·''' [[शतरूपा]] '''·''' [[अरिष्टनेमि (सहदेव पुत्र)|अरिष्टनेमि]] '''·''' [[इन्द्रद्युम्न]] '''·''' [[कार्तिकेय]] '''·''' [[अम्बिका (अप्सरा)|अम्बिका]] '''·''' [[जनमेजय (कुरु पुत्र)|जनमेजय]] '''·''' [[सांब (ब्राह्मण)|सांब]] '''·''' [[औशिज]] '''·''' [[जनमेजय (चंद्रवंशी राजा)|जनमेजय]] '''·''' [[कीचक]] '''·'''  [[कुन्ती]] '''·''' [[वैमित्रा]] '''·''' [[कुबेर]] '''·''' [[अरिह (देवातिथि पुत्र)|अरिह]] '''·''' [[विद्युन्माली]] '''·''' [[जनमेजय (पुरु पुत्र)|जनमेजय]] '''·''' [[विद्युता]] '''·'''  [[रत्नाकर (डाकू)|रत्नाकर]] '''·''' [[व्याघ्रपाद]] '''·''' [[ऐक्ष्वाकी]] '''·''' [[जनमेजय (नाग)|जनमेजय]] '''·''' [[अजमीढ़ (विकुण्ठन पुत्र)|अजमीढ़]] '''·''' [[गन्धमादन]] '''·''' [[स्वन]] '''·''' [[जनमेजय (नीपवंशी राजा)|जनमेजय]] '''·''' [[कालकाक्ष]] '''·''' [[अनुचक्र]] '''·''' [[वैराज]] '''·''' [[स्वयंप्रभा]] '''·''' [[ईश्वर (रुद्र)|ईश्वर]] '''·''' [[गोपति]] '''·''' [[अरिष्टनेमि (राजा)|अरिष्टनेमि]] '''·''' [[हलिक (नागराज)|हलिक]] '''·''' [[तारकासुर]] '''·''' [[ईश्वर (विश्वेदेवा)|ईश्वर]] '''·''' [[जनमेजय (दुर्मुख पुत्र)|जनमेजय]] '''·''' [[शिशिर]] '''·''' [[वृषसेन (बलि पुत्र)|वृषसेन]] '''·''' [[केशिनी अप्सरा]] '''·''' [[अभीरु]] '''·''' [[हरिबभ्रु]] '''·''' [[अमाहठ]] '''·''' [[अनाधृष्य]] '''·''' [[ईश्वर (राजा)|ईश्वर]] '''·''' [[वृषसेन]] '''·''' [[अग्निवेष्य]] '''·''' [[अरिष्टनेमि (विनता पुत्र)|अरिष्टनेमि]] '''·''' [[अयाति]] '''·''' [[अनागतविधाता]] '''·''' [[औशिज (राजा)|औशिज]] '''·''' [[गण्डा]] '''·''' [[महाभिषक]] '''·''' [[अमावसु]] '''·''' [[हलीमक]] '''·''' [[हरिण]] '''·''' [[मणिस्कन्ध]] '''·''' [[अम्भोरुह]] '''·''' [[मतिमान]] '''·''' [[केशिनी]] '''·''' [[मत्स्यगन्धा]] '''·''' [[कालकीर्ति]] '''·''' [[गुड़ाकेश]] '''·'''  [[विश्वानर]] '''·''' [[गरिष्ठ]] '''·''' [[गन्धकाली]] '''·''' [[कुमार ग्रह]] '''·''' [[कर्दम (सर्प)|कर्दम]] '''·''' [[कालपथ]] '''·''' [[गोतम]] '''·''' [[वैराट (धृतराष्ट्र पुत्र)|वैराट]] '''·''' [[सरस्वती (मनु पत्नी)|सरस्वती]] '''·''' [[सरस्वती (मतिनार पत्नी)|सरस्वती]] '''·''' [[गुणकेशी]] '''·''' [[अश्वतर]] '''·''' [[एरक]] '''·''' [[शक्रदेव]] '''·''' [[महाहनु]] '''·''' [[भीमसेन (दिवोदास पिता)|भीमसेन]] '''·''' [[कलिंग (राजा)|कलिंग]] '''·''' [[निरामर्द]] '''·''' [[निरुद्ध]] '''·''' [[नाड़ीजंघ]] '''·''' [[वसु]] '''·''' [[सुरसा]] '''·''' [[किंदम]] '''·''' [[कुब्जा दासी]] '''·''' [[गुप्तक]] '''·''' [[वृक्षवासी]] '''·''' [[वृद्धकन्या]] '''·''' [[अब्जक वृषाकपि]] '''·''' [[भीमसेन (प्रतिश्रवा पिता)|भीमसेन]] '''·''' [[शरभ (रामायण)]] '''·''' [[रुक्मी]] '''·''' [[कृपि]] '''·''' [[हंसचूड़]] '''·''' [[शर्याति]] '''·''' [[कर्णश्रवा]] '''·''' [[करकर्ष]] '''·''' [[गांडीवधन्वा]] '''·''' [[हविष्मती]] '''·''' [[कुम्भकर्ण]] '''·''' 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[[वसु (जमदग्नि पुत्र)|वसु]] '''·''' [[सुशर्मा]] '''·''' [[केसरी वानर राज]] '''·''' [[पौरव]] '''·''' [[विचित्रवीर्य]] '''·''' [[उग्रायुध]] '''·''' [[कैकसी]] '''·'''  [[कैकेयी]] '''·''' [[कलावती]] '''·''' [[कमलाक्ष]] '''·''' [[गविष्ठ]] '''·''' [[गवेषण]] '''·''' [[गार्हपत्य]] '''·''' [[कौशल्या]] '''·''' [[वृषाकपि (ऋषि)|वृषाकपि]] '''·''' [[वृषाकपि रुद्र]] '''·''' [[वृषाकपि]] '''·'''  [[क्रतु]] '''·''' [[अपर्णा]] '''·''' [[अनु]] '''·''' [[अनील]] '''·''' [[उच्छृंग]] '''·''' [[वृषभ (शकुनि भाई)|वृषभ]] '''·''' [[अश्मसारिन]] '''·''' [[नियतायु]] '''·''' [[करम्भि]] '''·''' [[विक्षर]] '''·''' [[विटभूत]] '''·''' [[भीमसेन (विदर्भ)|भीमसेन]] '''·''' [[गार्हपत्य (पितरों का गण)|गार्हपत्य]] '''·''' [[धृष्टकेतु (सुधृति पुत्र)|धृष्टकेतु]] '''·''' [[भीमसेन (राजा)|भीमसेन]] '''·''' [[अश्मदंशना]] '''·''' [[कयाधु]] '''·''' [[निवातकवच]] '''·''' [[निशा]] '''·''' [[केतुमान]] '''·''' [[वसुदान]] '''·''' [[अलंबुषा]] '''·''' [[विरोचन]] '''·''' [[अविक्षित]] '''·''' [[गजमुख]] '''·''' [[नाचिक]] '''·''' [[निशाकर]] '''·''' [[गजकर्ण]] '''·''' [[खर दूषण]] '''·''' [[वृषध्वज (प्रवीरवंशी राजा)|वृषध्वज ]] '''·'''[[उतथ्य]] '''·''' [[गन्धर्वी]] '''·''' [[गन्धवती]] '''·''' [[इल]] '''·''' [[अदीन]] '''·''' [[अद्रिका]] '''·''' [[नंद (धृतराष्ट्र पुत्र)|नंद]] '''·''' [[अद्रि]] '''·''' [[अदृश्यन्ती]] '''·''' [[मधुपर्क]] '''·''' [[युवनाश्व]] '''·''' [[जयत्सेन]] '''·''' [[अवाचीन]] '''·''' [[सार्वभौम]] '''·'''  [[ढुंढा]] '''·''' [[बृहद्रथ]] '''·''' [[वासुकी]] '''·''' [[गांधारी]] '''·''' [[असुर]] '''·''' [[अकंपन]] '''·''' [[कुवलयाश्व]] '''·''' [[अनन्ता]] '''·''' [[अनवद्या]] '''·''' [[अनश्वान]] '''·''' [[अनला]] '''·''' [[बाहु]] '''·''' [[हाहा]] '''·''' [[भगदत्त]] '''·''' [[धृष्टकेतु (नवें मनु पुत्र)|धृष्टकेतु]] '''·''' [[उपवर्ष]] '''·''' [[दृढ़रथाश्रय]] '''·''' [[उपसंग]] '''·''' [[अणीमाण्डव्य]] '''·''' [[अजामिल]] '''·'''  [[गार्गी]] '''·''' [[मधु कैटभ]] '''·''' [[उपबर्हण]] '''·''' [[गंडभेरुंड]] '''·''' [[कालीयक]] '''·''' [[गालव]] '''·'''  [[गौतम]] '''·''' [[प्रलंब असुर]] '''·'''  [[गौरी]] '''·''' [[अश्मक]]  '''·''' [[अक्षकुमार]] '''·''' [[घटोत्कच]] '''·''' [[घोषा]] '''·''' [[अनूरु (विनता पुत्र)|अनूरु]] '''·''' [[अन्ध]] '''·''' [[अन्तर्धामा]] '''·''' [[चरक]] '''·''' [[अनंग]] '''·'''  [[चित्ररथ गंधर्व]] '''·'''  [[चित्रांगदा]] '''·''' [[अनंगवती]] '''·''' [[कशेरक]] '''·''' [[पंचकन्या]] '''·''' [[अस्ति]] '''·''' [[तक्षक]] '''·''' [[च्यवन]] '''·''' [[अश्वसेन]] '''·''' [[धृष्टकेतु (शिशुपाल पुत्र)|धृष्टकेतु]] '''·''' [[अंगहीन]] '''·''' [[करालदन्त]] '''·''' [[मार्कण्डेय]] '''·'''  [[जटायु]] '''·''' [[तिलोत्तमा]] '''·''' [[अनौपम्या]] '''·''' [[जनमेजय]] '''·''' [[जयद्रथ]] '''·''' [[श्रुतकीर्ति (कुशध्वज पुत्री)|श्रुतकीर्ति]] '''·''' [[पुंजिकस्थली]] '''·''' [[जरासंध]] '''·'''  [[जैमिनि]] '''·''' [[अजयपरशु]] '''·''' [[उद्गाता]] '''·''' [[पंचचूड़ा]] '''·''' [[प्रगाथ काण्व]] '''·''' [[नाटकेय]] '''·''' [[नाभागारिष्ट]] '''·''' [[तारक]] '''·'''  [[जामवन्त]] '''·''' [[वृषध्वज]] '''·''' [[बृहद्बल]] '''·''' [[अरण्यदेवी]] '''·''' [[कम्प]] '''·''' [[नागदत्त]] '''·'''  [[ताड़का]] '''·''' [[कुशनाभ]] '''·''' [[धृष्टकेतु]] '''·''' [[तारा (बृहस्पति की पत्नी)]] '''·'''  [[तारामती]] '''·'''  [[त्रिजट मुनि]] '''·''' [[निरामय]] '''·''' [[त्रिशिरा]] '''·''' [[वृषक]] '''·''' [[श्रुतकीर्ति (धृष्टकेतु पत्नी)|श्रुतकीर्ति]] '''·''' [[नलकूवर]] '''·''' [[रति]] '''·'''  [[दक्ष]] '''·''' [[उत्तंग (वेद शिष्य)]] '''·'''  [[दधीचि]] '''·''' [[अजैकपाद]] '''·''' [[दत्तात्रेय]] '''·''' [[वृत्त]] '''·''' [[वृद्धिका]] '''·'''  [[गोकर्ण (ब्राह्मण)|गोकर्ण]] '''·''' [[कबन्ध]]  '''·''' [[कपोतरोमा]] '''·''' [[कमठ]]  '''·''' [[कपट]] '''·''' [[वृषक (सुबल पुत्र)|वृषक]] '''·''' [[दशरथ]] '''·'''  [[दिति]] '''·''' [[विनता]] '''·''' [[नारदी]] '''·''' [[दिलीप]] '''·''' [[प्रियव्रत]] '''·''' [[अजपार्श्व]] '''·'''  [[दुर्योधन]] '''·''' [[दुर्वासा]] '''·'''  [[दुष्यंत]] '''·'''  [[देवकी]] '''·''' [[पंचशिख (ऋषि)]] '''·''' [[द्रुपद]] '''·'''  [[द्रोणाचार्य]] '''·''' [[करम्भा]] '''·''' [[वृषदर्भ]] '''·''' [[द्रौपदी]] '''·''' [[दुष्कर्ण]] '''·''' [[कपिध्वज]] '''·''' [[सुमाली]]  '''·''' [[राधा]] '''·'''  [[बृहद्रथ (मगध नरेश)|बृहद्रथ]] '''·''' [[वृषकेतु]] '''·'''[[धन्वन्तरि]] '''·''' [[खनित्र]] '''·''' [[धृतराष्ट्र]] '''·'''  [[धृष्टद्युम्न]] '''·'''  [[ध्रुव]] '''·''' [[कपाली]] '''·''' [[चण्डकौशिक]] '''·''' [[नंद]] '''·'''  [[नकुल]] '''·'''  [[नल (रामायण)]] '''·'''  [[नन्दी]] '''·'''  [[नील]] '''·'''  [[निमि]] '''·''' [[वेगवान]] '''·''' [[नारद]] '''·''' [[उत्तंग]] '''·'''  [[नाभाग]] '''·'''  [[पराशर]] '''·'''  [[परीक्षित]] '''·''' [[वेगवान (दनुपुत्र)|वेगवान]] '''·''' [[वेगवान नाग|वेगवान]] '''·''' [[पंचशिख (गन्धर्व पुत्र)|पंचशिख]] '''·''' [[पाण्डु]] '''·'''  [[पिप्पलाद]] '''·'''  [[पुलस्त्य]] '''·''' [[पंचजन (शंखासुर)|पंचजन]] '''·''' [[पुलह]] '''·'''  [[प्रद्युम्न]] '''·'''  [[प्रह्लाद]] '''·'''  [[बकासुर]] '''·'''  [[बर्बरीक]] '''·'''  [[बलि|राजा बलि]] '''·'''  [[बाणासुर]] '''·'''  [[बालि]] '''·''' [[श्रुतकीर्ति]] '''·''' [[भीष्म]] '''·''' [[बड़वामुख]] '''·'''  [[भीम]] '''·''' [[भगीरथ]] '''·''' [[बटुक]] '''·'''  [[मंथरा]] '''·''' [[कपिलाश्व]] '''·''' [[मंदोदरी]] '''·''' [[प्रावाहण जैवलि]] '''·'''  [[मेघनाद]] '''·'''  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'''·''' [[हरिश्चंद्र]] '''·'''  [[हिडिंबा]] '''·'''  [[हिडिम्ब]] '''·''' [[हिरण्यकशिपु]] '''·'''  [[हिरण्याक्ष]] '''·'''  [[श्वेतकेतु]] '''·''' [[निशुंभ]] '''·'''  [[होलिका]] '''·'''    [[सुषेण (शूरसेन नरेश)]] '''·'''  [[आम्रपाली]] '''·'''  [[अंधक (दैत्य)]] '''·'''  [[अंधक]] '''·'''  [[रंभा]] '''·'''  [[करंधम]] '''·'''  [[रंतिदेव]] '''·'''  [[भामंडल]] '''·'''  [[पुरूरवा]] '''·''' [[क्षेमवृद्धि]] '''·''' [[क्षेमा]] '''·'''  [[तडित्केशी]] '''·'''  [[उत्पल]] '''·'''  [[सुदास]] '''·'''   [[मधु दैत्य]] '''·'''  [[रेणुका]] '''·'''  [[शकुंतला]] '''·'''  [[पृथा]] '''·'''  [[धौम्य ऋषि|धौम्य]] '''·'''  [[दमयंती]] '''·'''  [[नल|राजा नल]] '''·'''  [[दुःशला]]'''·'''  [[अंगुलिमाल]] '''·''' [[कर्दम ऋषि|कर्दम]] '''·''' [[चन्द्रावली]] '''·''' [[अरिष्टा]] '''·''' [[संवर्तक]] '''·''' [[आरुणि]]  '''·''' [[हारीतक]]  '''·''' [[देवक]]  '''·''' [[संकर्षण]] '''·''' [[शर्मिष्ठा]] '''·''' [[देवयानी]] '''·''' [[आत्रेयी]] '''·''' [[आत्रेय]] '''·''' [[इल्वल]] '''·'''  [[वातापि]] '''·''' [[आतापि]] '''·''' [[अष्टावक्र]] '''·''' [[मैन्द]] '''·''' [[अश्वपति]] '''·''' [[अलर्क]] '''·''' [[अलक्ष्मी]] '''·''' [[दैत्य (दिति पुत्र)]] '''·''' [[दैत्य (मरुत)]] '''·''' [[दस्यु]] '''·''' [[शुन:शेप]] '''·''' [[वृषभासुर]] '''·''' [[अहिरावण]] '''·''' [[उर्वशी]] '''·''' [[असित]] '''·''' [[उत्तर]] '''·''' [[अजक]] '''·''' [[खटवांग]] '''·''' [[कालयवन]] '''·''' [[मुचुकुन्द]] '''·''' [[कृतवर्मा]] '''·''' [[पैल]]  '''·''' [[नलकूबर]] '''·''' [[रेवती (बलराम की पत्नी)|रेवती ]] '''·''' [[गाधि]]  '''·''' [[मरीचि]] '''·''' [[वज्रनाभ राक्षस]] '''·''' [[शंबूक (खरदूषण पुत्र)]] '''·''' [[शंखचूड़ (दंभा पुत्र)]] '''·''' [[बल्वल]] '''·''' [[दीर्घतमा]]  '''·''' [[दुंदुभी दैत्य]] '''·''' [[दुंदुभी (दिति भाई)]] '''·''' [[भीमशंकर]] '''·''' [[पूतना]] '''·''' [[घंटाकर्ण]] '''·''' [[कालनेमि]] '''·''' [[वृषामित्र]] '''·''' [[कालनेमि (राक्षस)]] '''·''' [[दृढ़वर्मा]] '''·''' [[दृढ़क्षत्र]] '''·''' [[मदालसा]] '''·''' [[विश्रवा]] '''·''' [[शशबिन्दु]] '''·''' [[शची]] '''·''' [[पौलोमी]] '''·''' [[क्षेमधन्वा]] '''·''' [[खट्वांग]]  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		<author><name>रितेश शर्मा</name></author>
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