<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%80</id>
	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%80"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8/%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%80"/>
	<updated>2026-06-09T20:36:53Z</updated>
	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%80/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B82&amp;diff=251640</id>
		<title>सदस्य:रूबी/अभ्यास2</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AC%E0%A5%80/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B82&amp;diff=251640"/>
		<updated>2012-02-06T12:33:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Rudra-Veena.jpg|thumb|250px|रुद्रवीणा]]&lt;br /&gt;
'''रुद्रवीणा''' एक ऐसा [[वाद्य यंत्र]] है जिसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत में किया जाता है। &lt;br /&gt;
*रुद्रवीणा 19 वीं सदी में काफी लोकप्रिय था, जो आसानी से धीमी गति से [[ध्रुपद]] शैली के [[राग|रागों]] के आलाप वर्गों को पेश करने के लिए अनुमति में सुरबहार की शुरूआत के कारण गिरावट आई है।&lt;br /&gt;
*रुद्रवीणा 54 और 62 इंच के बीच में लकड़ी या [[बांस]] से बना हुआ होता है।  &lt;br /&gt;
*रुद्रवीणा में एक बड़ी साहसपूर्ण स्ट्रिंग होती है जो हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रयुक्तऔर बहुत पुराना उपकरण है।&lt;br /&gt;
*दो बड़े आकार के दौर गुंजयमान यंत्र, सूखे और खोखले तूमड़ी से बना ट्यूब के तहत जुड़े होते हैं। &lt;br /&gt;
*रुद्रवीणा [[वीणा]] के चार प्रकारों में से एक है और इसके अन्य तीन प्रकार हैं [[विचित्र वीणा]], सरस्वती वीणा, चित्रा वीणा। &lt;br /&gt;
*रुद्रवीणा और विचित्र वीणा को उत्तर भारतीय के शास्त्रीय संगीत में उपयोग किया जाता है और सरस्वती वीणा और चित्रा वीणा को दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251627</id>
		<title>पेन्नार नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251627"/>
		<updated>2012-02-06T12:14:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''पेन्नार नदी''' चिकबल्लारपुर से 11 किमी पश्चिम-दक्षिण पश्चिम में दक्कन के पठार से उदगम, [[कर्नाटक]] राज्य, दक्षिण- पश्चिम भारत में स्थित है। &lt;br /&gt;
*पेन्नार नदी उत्तर दिशा में बहती हुई [[आंध्र प्रदेश]] में प्रवेश करती है और फिर पूर्व दक्षिणपूर्व दिशा में कोरोमंडल तट की ओर मुड़कर नेल्लोर के पास [[बंगाल की खाड़ी]] में मिल जाती है। &lt;br /&gt;
*पापाधन और चित्रावती पेन्नार नदी की सहायक नदियाँ हैं। &lt;br /&gt;
*इसकी निचली घाटी में नहरें निकालकर सिंचाई की जाती है। &lt;br /&gt;
*पेन्नार नदी की उदगम से मुहाने तक की दूरी लगभग 560 किमी है। &lt;br /&gt;
*पेन्नार नदी मौसमी है, बारिश के बाद इसमें उफान आ जाता है और गर्मियों में यह पतली धार बनकर रह जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:कर्नाटक की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar-1.jpg&amp;diff=251624</id>
		<title>चित्र:Qutub-Minar-1.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar-1.jpg&amp;diff=251624"/>
		<updated>2012-02-06T12:00:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[क़ुतुब मीनार]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/city-of-god/ आदित्य सहाय]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/city-of-god/4124191133 Qutb Panorama]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/city-of-god/ Aditya Sahay's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=क़ुतुब मीनार [[लालकोट]] स्मारक के ऊपर स्थित बहुत ऊँची मीनार है, यह [[दिल्ली]] के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] ने 1199 में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी [[इल्तुतमिश|शमशुद्दीन इल्तुतमिश]] ने 1368 में इसे पूरा कराया। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AC_%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=251621</id>
		<title>क़ुतुब मीनार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AC_%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=251621"/>
		<updated>2012-02-06T11:58:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Qutub-Minar-Delhi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=क़ुतुब मीनार, दिल्ली&lt;br /&gt;
|विवरण=इस इमारत का नाम ख़्वाजा क़ुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। &lt;br /&gt;
|राज्य=&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=[[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[नई दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=[[कुतुबुद्दीन ऐबक]]&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=1193-1368&lt;br /&gt;
|स्थापना=1193&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=[http://maps.google.com/maps?q=28.524355,77.185248&amp;amp;t=m&amp;amp;z=17&amp;amp;vpsrc=0 उत्तर- 28.534355; पूर्व- 77.185248]&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=क़ुतुब मीनार, लाला लाजपत राय पथ से 19.5 किमी की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|मौसम=&lt;br /&gt;
|तापमान=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल, बस आदि&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हज़रत निज़ामुद्दीन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=आई. एस. बी. टी, सराय काले ख़ाँ, आनंद विहार &lt;br /&gt;
|यातायात=रिक्शा, टैक्सी, लोकल रेल, मेट्रो रेल, बस&lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[लाल क़िला]], [[इण्डिया गेट]], [[जामा मस्जिद दिल्ली|जामा मस्जिद]], [[राष्ट्रपति भवन]]। &lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=011&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Qutub+Minar,+Mehrauli,+New+Delhi,+Delhi&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=28.524435,77.19552&amp;amp;spn=0.037254,0.055189&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=39.795077,56.513672&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hq=Qutub+Minar,&amp;amp;hnear=Mehrauli,+New+Delhi,+Delhi&amp;amp;t=m&amp;amp;z=14 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=ऐसा माना जाता है कि क़ुतुब मीनार का प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहाँ से अजान दी जाती थी। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|16:09, 21 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''क़ुतुब मीनार''' [[लालकोट]] स्मारक के ऊपर स्थित बहुत ऊँची मीनार है, यह [[दिल्ली]] के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] ने 1199 में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी [[इल्तुतमिश|शमशुद्दीन इल्तुतमिश]] ने 1368 में इसे पूरा कराया। &lt;br /&gt;
*इस इमारत का नाम ख़्वाजा क़ुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। &lt;br /&gt;
*ऐसा माना जाता है कि क़ुतुब मीनार का प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहाँ से अजान दी जाती थी। &lt;br /&gt;
*लाल और हल्के पीले पत्थर से बनी इस इमारत पर [[क़ुरान]] की आयतें लिखी हैं। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से क़ुतुबमीनार सात मंजिल का था लेकिन अब यह पाँच मंजिल का ही रह गया है। &lt;br /&gt;
*क़ुतुब मीनार की कुल ऊँचाई 72.5 मीटर है और इसमें 379 सीढ़ियाँ हैं। समय-समय पर इसकी मरम्मत भी हुई है। &lt;br /&gt;
*इसकी दीवारों पर जिन बादशाहों ने इसकी मरम्मत कराई उनका उल्लेख मिलता है। &lt;br /&gt;
*क़ुतुब मीनार परिसर में और भी कई इमारते हैं। भारत की पहली कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलई दरवाज़ा और इल्तुतमिश का मक़बरा भी यहाँ बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*मस्जिद के पास ही चौथी शताब्दी में बना लौहस्तंभ भी है जो पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है।&lt;br /&gt;
*पाँच मंज़िला इस इमारत की तीन मंज़िलें लाल पत्थरों से एवं दो मंज़िलें संगमरमर एवं लाल पत्थर से निर्मित हैं। प्रत्येक मंज़िल के आगे बालकॉनी होने से भली-भाँति दिखाई देती है।  &lt;br /&gt;
*मीनार में देवनागरी भाषा के [[शिलालेख]] के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] ने ठीक करवाया था। &lt;br /&gt;
*इसके बाद में 1368 में [[फ़िरोज़शाह तुग़लक़]] ने इसकी ऊपरी मंज़िल को हटाकर इसमें दो मंज़िलें और जुड़वा दीं। इसके पास [[इल्तुतमिश|सुल्तान इल्तुतमिश]], [[अलाउद्दीन ख़िलज़ी]], [[बलबन]] व [[अकबर]] की धाय माँ के पुत्र अधम ख़ाँ के मक़बरे स्थित हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub-Minar.jpg|thumb|250px|left|क़ुतुब मीनार, [[दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub-Minar-1.jpg|thumb|thumb|550px|center|क़ुतुब मीनार, [[दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}{{भारत के मुख्य पर्यटन स्थल}}{{विश्व विरासत स्थल2}}&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:विश्‍व विरासत स्‍थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar-1.jpg&amp;diff=251620</id>
		<title>चित्र:Qutub-Minar-1.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar-1.jpg&amp;diff=251620"/>
		<updated>2012-02-06T11:54:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar.jpg&amp;diff=251619</id>
		<title>चित्र:Qutub-Minar.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar.jpg&amp;diff=251619"/>
		<updated>2012-02-06T11:53:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[क़ुतुब मीनार]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/highlandmc/ highlandmc]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/highlandmc/409186218 Qutb Minar]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/highlandmc/ highlandmc's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=क़ुतुब मीनार [[लालकोट]] स्मारक के ऊपर स्थित बहुत ऊँची मीनार है, यह [[दिल्ली]] के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] ने 1199 में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी [[इल्तुतमिश|शमशुद्दीन इल्तुतमिश]] ने 1368 में इसे पूरा कराया। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AC_%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=251618</id>
		<title>क़ुतुब मीनार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AC_%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=251618"/>
		<updated>2012-02-06T11:50:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Qutub-Minar-Delhi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=क़ुतुब मीनार, दिल्ली&lt;br /&gt;
|विवरण=इस इमारत का नाम ख़्वाजा क़ुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। &lt;br /&gt;
|राज्य=&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=[[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[नई दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=[[कुतुबुद्दीन ऐबक]]&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=1193-1368&lt;br /&gt;
|स्थापना=1193&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=[http://maps.google.com/maps?q=28.524355,77.185248&amp;amp;t=m&amp;amp;z=17&amp;amp;vpsrc=0 उत्तर- 28.534355; पूर्व- 77.185248]&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=क़ुतुब मीनार, लाला लाजपत राय पथ से 19.5 किमी की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
|मौसम=&lt;br /&gt;
|तापमान=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल, बस आदि&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हज़रत निज़ामुद्दीन &lt;br /&gt;
|बस अड्डा=आई. एस. बी. टी, सराय काले ख़ाँ, आनंद विहार &lt;br /&gt;
|यातायात=रिक्शा, टैक्सी, लोकल रेल, मेट्रो रेल, बस&lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[लाल क़िला]], [[इण्डिया गेट]], [[जामा मस्जिद दिल्ली|जामा मस्जिद]], [[राष्ट्रपति भवन]]। &lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह &lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=011&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Qutub+Minar,+Mehrauli,+New+Delhi,+Delhi&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=28.524435,77.19552&amp;amp;spn=0.037254,0.055189&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=39.795077,56.513672&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;hq=Qutub+Minar,&amp;amp;hnear=Mehrauli,+New+Delhi,+Delhi&amp;amp;t=m&amp;amp;z=14 गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=ऐसा माना जाता है कि क़ुतुब मीनार का प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहाँ से अजान दी जाती थी। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|16:09, 21 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''क़ुतुब मीनार''' [[लालकोट]] स्मारक के ऊपर स्थित बहुत ऊँची मीनार है, यह [[दिल्ली]] के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] ने 1199 में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी [[इल्तुतमिश|शमशुद्दीन इल्तुतमिश]] ने 1368 में इसे पूरा कराया। &lt;br /&gt;
*इस इमारत का नाम ख़्वाजा क़ुतबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। &lt;br /&gt;
*ऐसा माना जाता है कि क़ुतुब मीनार का प्रयोग पास बनी मस्जिद की मीनार के रूप में होता था और यहाँ से अजान दी जाती थी। &lt;br /&gt;
*लाल और हल्के पीले पत्थर से बनी इस इमारत पर [[क़ुरान]] की आयतें लिखी हैं। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से क़ुतुबमीनार सात मंजिल का था लेकिन अब यह पाँच मंजिल का ही रह गया है। &lt;br /&gt;
*क़ुतुब मीनार की कुल ऊँचाई 72.5 मीटर है और इसमें 379 सीढ़ियाँ हैं। समय-समय पर इसकी मरम्मत भी हुई है। &lt;br /&gt;
*इसकी दीवारों पर जिन बादशाहों ने इसकी मरम्मत कराई उनका उल्लेख मिलता है। &lt;br /&gt;
*क़ुतुब मीनार परिसर में और भी कई इमारते हैं। भारत की पहली कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, अलई दरवाज़ा और इल्तुतमिश का मक़बरा भी यहाँ बना हुआ है। &lt;br /&gt;
*मस्जिद के पास ही चौथी शताब्दी में बना लौहस्तंभ भी है जो पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है।&lt;br /&gt;
*पाँच मंज़िला इस इमारत की तीन मंज़िलें लाल पत्थरों से एवं दो मंज़िलें संगमरमर एवं लाल पत्थर से निर्मित हैं। प्रत्येक मंज़िल के आगे बालकॉनी होने से भली-भाँति दिखाई देती है।  &lt;br /&gt;
*मीनार में देवनागरी भाषा के [[शिलालेख]] के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे [[मुहम्मद बिन तुग़लक़]] ने ठीक करवाया था। &lt;br /&gt;
*इसके बाद में 1368 में [[फ़िरोज़शाह तुग़लक़]] ने इसकी ऊपरी मंज़िल को हटाकर इसमें दो मंज़िलें और जुड़वा दीं। इसके पास [[इल्तुतमिश|सुल्तान इल्तुतमिश]], [[अलाउद्दीन ख़िलज़ी]], [[बलबन]] व [[अकबर]] की धाय माँ के पुत्र अधम ख़ाँ के मक़बरे स्थित हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub-Minar.jpg|thumb|250px|left|क़ुतुब मीनार, [[दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}{{भारत के मुख्य पर्यटन स्थल}}{{विश्व विरासत स्थल2}}&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:विश्‍व विरासत स्‍थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar.jpg&amp;diff=251617</id>
		<title>चित्र:Qutub-Minar.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Qutub-Minar.jpg&amp;diff=251617"/>
		<updated>2012-02-06T11:44:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Satpura-Mountain-Range-1.jpg&amp;diff=251603</id>
		<title>चित्र:Satpura-Mountain-Range-1.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Satpura-Mountain-Range-1.jpg&amp;diff=251603"/>
		<updated>2012-02-06T11:15:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[सतपुड़ा पर्वतश्रेणी]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/city-of-god/ आदित्य सहाय]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/city-of-god/4001037933 Satpura range]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/city-of-god/ Aditya Sahay's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=सतपुड़ा पर्वतश्रेणी पहाड़ियों की श्रृंखला है। सतपुड़ा पर्वतश्रेणी दक्कन पठार का अंग है और [[पश्चिम भारत|पश्चिमी भारत]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;diff=251598</id>
		<title>सतपुड़ा पर्वतश्रेणी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;diff=251598"/>
		<updated>2012-02-06T11:11:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Satpura-Mountain-Range.jpg|thumb|250px|सतपुड़ा पर्वतश्रेणी]]&lt;br /&gt;
'''सतपुड़ा पर्वतश्रेणी''' पहाड़ियों की श्रृंखला है। सतपुड़ा पर्वतश्रेणी दक्कन पठार का अंग है और [[पश्चिम भारत|पश्चिमी भारत]] में स्थित है। &lt;br /&gt;
*[[मध्य प्रदेश]] और [[महाराष्ट्र]] राज्यों में 900 किमी तक प्रायद्वीपीय भारत के सबसे चौड़े क्षेत्र में फैला हिस्सा। &lt;br /&gt;
*सतपुड़ा पर्वतश्रेणी, जिसके नाम का अर्थ सात वलय है, [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] (उत्तर) और [[ताप्ती नदी|ताप्ती]] (दक्षिण) नदियों के बीच जल-विभाजक का काम करती है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Satpura-Mountain-Range-1.jpg|thumb|250px|left|सतपुड़ा पर्वतश्रेणी]]&lt;br /&gt;
*सतपुड़ा पर्वतश्रेणी की चोटियों की ऊंचाई 1,200 मीटर है और इनमें पश्चिम में राजपिपला पहाड़ियाँ, उत्तर में महादेव पहाड़ियाँ एवं पूर्व में मैकाल पहाड़ियाँ शामिल हैं। &lt;br /&gt;
*यद्यपि सतपुड़ा पर्वतश्रेणी आर्थिक रूप से कमज़ोर है, तथापि इसके दक्षिण-पूर्वी हिस्से में [[मैंगनीज]] और कोयले के कुछ भंडार हैं। यह व्यापक रूप से वनाच्छादित है और देश के अन्य [[पठार|पठारों]] से अलग है, इसके जंगलों में पश्चिम में क़ीमती सागौन के पेड़ हैं। &lt;br /&gt;
*[[महादेव पहाड़ियाँ|महादेव पहाड़ियों]] की ऊपरी वैनगंगा एवं पेंछ घाटियों में थोड़ी- बहुत खेती की जाती है और ऊपरी पहाड़ियों पर गोंड जनजाति के लोग झूम खेती करते हैं। मध्य प्रदेश में [[पंचमढ़ी]] एक पर्यटक स्थल है और [[छिंदवाड़ा]] एक छोटा प्रशासनिक केंद्र है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}} &lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्वत}}&lt;br /&gt;
[[Category:पर्वत]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Satpura-Mountain-Range-1.jpg&amp;diff=251596</id>
		<title>चित्र:Satpura-Mountain-Range-1.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Satpura-Mountain-Range-1.jpg&amp;diff=251596"/>
		<updated>2012-02-06T11:08:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251588</id>
		<title>नर्मदा नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251588"/>
		<updated>2012-02-06T11:01:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा नदी&lt;br /&gt;
|चित्र=Narmada-River2.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=नर्मदा नदी &lt;br /&gt;
|अन्य नाम=रेवा&lt;br /&gt;
|देश=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|राज्य=[[गुजरात]], [[छत्तीसगढ़]], [[मध्य प्रदेश]] और [[महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
|प्रमुख नगर=[[जबलपुर]], [[इन्दौर]], [[वड़ोदरा]] &lt;br /&gt;
|प्रवाह समय=&lt;br /&gt;
|उद्गम स्थल=[[विन्ध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] की मैकाल पहाड़ी श्रृंखला में [[अमरकंटक]] नामक स्थान &lt;br /&gt;
|विसर्जन स्थल=&lt;br /&gt;
|लम्बाई=1310 किमी&lt;br /&gt;
|अधिकतम गहराई=&lt;br /&gt;
|अधिकतम चौड़ाई=&lt;br /&gt;
|इससे जुड़ी नहरें=&lt;br /&gt;
|जलचर=&lt;br /&gt;
|सहायक नदियाँ=&lt;br /&gt;
|पौराणिक उल्लेख=[[रामायण]] तथा [[महाभारत]] और परवर्ती ग्रंथों में इस नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं।&lt;br /&gt;
|धार्मिक महत्त्व=[[मत्स्य पुराण]] एवं [[पद्म पुराण]] आदि में ऐसा आया है कि उस स्थान से जहाँ नर्मदा सागर में मिलती है, अमरकण्टक पर्वत तक, 10 करोड़ तीर्थ हैं। &lt;br /&gt;
|ऐतिहासिक महत्त्व=&lt;br /&gt;
|गूगल मानचित्र=[http://maps.google.co.in/maps?q=Narmada+River,+Madhya+Pradesh&amp;amp;hl=en&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=46.024599,56.513672&amp;amp;z=7&amp;amp;iwloc=A नर्मदा नदी]&lt;br /&gt;
|वर्तमान स्थिति=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नर्मदा नदी''' [[भारत]] के मध्यभाग में पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली [[मध्य प्रदेश]] और [[गुजरात]] राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है, जो [[गंगा नदी|गंगा]] के समान पूजनीय है। महाकाल पर्वत के [[अमरकण्टक शिखर]] से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। नर्मदा सर्वत्र पुण्यमयी नदी बताई गई है तथा इसके उद्भव से लेकर संगम तक दस करोड़ तीर्थ हैं।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।&lt;br /&gt;
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]], आदिखण्ड 13-6-7&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*नर्मदा संगम यावद् यावच्चामरकण्टकम् ।&lt;br /&gt;
तत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्थिता: ॥&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]], आदिखण्ड 21/42&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसका उद्गम [[विंध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] की मैकाल पहाड़ी श्रृंखला में [[अमरकंटक]] नामक स्थान में है । मैकाल से निकलने के कारण नर्मदा को मैकाल कन्या भी कहते हैं । [[स्कंद पुराण]] में इस नदी का वर्णन रेवा खंड के अंतर्गत किया गया है । [[कालिदास]] के ‘[[मेघदूतम्]]’ में नर्मदा को रेवा का संबोधन मिला है , जिसका अर्थ है—पहाड़ी चट्टानों से कूदने वाली। वास्तव में नर्मदा की तेजधारा पहाड़ी चट्टानों पर और भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों के ऊपर से उछलती हुई बहती है । अमरकंटक में सुंदर सरोवर में स्थित शिवलिंग से निकलने वाली इस पावन धारा को रुद्र कन्या भी कहते हैं, जो आगे चलकर नर्मदा नदी का विशाल रूप धारण कर लेती हैं । पवित्र नदी नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ हैं , जहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । इनमें कपिलधारा, शुक्लतीर्थ, मांधाता, भेड़ाघाट, शूलपाणि, भड़ौंच उल्लेखनीय हैं । अमरकंटक की पहाड़ियों से निकल कर [[छत्तीसगढ़]], [[मध्य प्रदेश]], [[महाराष्ट्र]] और [[गुजरात]] से होकर नर्मदा क़्ररीब 1310 किमी का प्रवाह पथ तय कर भरौंच के आगे खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है । परंपरा के अनुसार नर्मदा की परिक्रमा का प्रावधान हैं, जिससे श्रद्धालुओं को पुण्य की प्राप्ति होती है । [[पुराण|पुराणों]] में बताया गया है कि नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश होता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलो मीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे बसा शहर [[जबलपुर]] उल्लेखनीय है। इस नदी के मुहाने पर डेल्टा नहीं है। जबलपुर के निकट [[भेड़ाघाट]] का नर्मदा जलप्रपात काफ़ी प्रसिद्ध है। [[वेद|वेदों]] में नर्मदा का कोई उल्लेख नहीं है। [[गंगा]] के उपरान्त [[भारत]] की अत्यन्त पुनीत नदियों में नर्मदा एवं [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के नाम आते हैं। '''रेवा''' नर्मदा का दूसरा नाम है और यह सम्भव है कि 'रेवा' से ही 'रेवोत्तरस' नाम पड़ा हो।&lt;br /&gt;
==ग्रंथों में उल्लेख==&lt;br /&gt;
[[वैदिक साहित्य]] में नर्मदा के विषय में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता।&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] तथा [[महाभारत]] और परवर्ती ग्रंथों में इस नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*गुप्तकालीन अमरकोश में भी नर्मदा को सोमोद्भवा कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;’रेवातुनर्मदा सोमोद्भवा मेकलकन्यका’, पौराणिक अनुश्रुति&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] ने भी नर्मदा को सोमप्रभवा कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;’तथेत्युपस्यृश्य पय: पवित्रं सोमोद्भवाया: सरितो नृसोम:’ रघुवंश 5,59&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[रघुवंश]] में नर्मदा का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;'स नर्मदारोधसि सीकराद्रैर्मरुद्भिरानर्तितनक्तमाले, निवेशयामास विलंघिताध्वा क्लांतं रजोधूसरकेतू सैन्यम्’, रघुवंश 5,42&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मेघदूत में रेवा या नर्मदा का सुन्दर वर्णन है।&amp;lt;ref&amp;gt;दे. रेवा&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River.jpg|नर्मदा नदी|thumb|300px|left]]&lt;br /&gt;
*[[वाल्मीकि रामायण]] में भी नर्मदा का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’पश्यमानस्ततो विध्यं रावणोनर्मदां ययौ, चलोपलजलां पुण्यां पश्चिमोदधिगामिनीम्’, वाल्मीकि रामायण-उत्तरकाण्ड, 31,19&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके पश्चात के श्लोकों में नर्मदा का एक युवती नारी के रूप में सुंदर वर्णन है&amp;lt;ref&amp;gt;’चकवाकै: सकारण्डै: सहंसजलकुक्कुटै:, सारसैश्च सदामत्तै: कूजदिभ: सुसमावृताम्।&amp;lt;br /&amp;gt; फुल्लद्रु मकृत्तोत्तंसां चकवाकयुगस्तनीम्, विस्तीर्णपुलिनश्रोणीं हंसावलि सुमेखलाम्।&amp;lt;br /&amp;gt; पुष्परेण्वनुलिप्तांगींजलफेनामलांशुकाम् जलावगाहसुस्पर्शां फुल्लोत्पल शुभेक्षणाम् पुष्पकादवरुह् याशु नर्मदां सरितां वराम्, इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशानन्:’, [[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तरकाण्ड]] 31,21-22-23-24&amp;lt;/ref&amp;gt;। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*महाभारत में नर्मदा को ॠक्षपर्वत से उद्भूत माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;’पुरश्चपश्चाच्च यथा महानदी तमृक्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा’, शान्तिपर्व 52,32&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;दे. वनपर्व 82,52&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[भीष्म पर्व महाभारत|भीष्मपर्व]] में नर्मदा का [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के साथ उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’गोदावरीं नर्मदां च बाहुदां च महानदीम्’, भीष्मपर्व 9,14&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*श्रीमद्भागवत में रेवा और नर्मदा दोनों का ही एक स्थान पर उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’तापी रेवा सरसा नर्मदा चर्मण्वती सिंधुरन्ध: शोणश्च नदौ’, श्रीमद्भागवत 5,19,18&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण, 12.9.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; ने रेवोत्तरस की चर्चा की है, जो पाटव चाक्र एवं स्थपति (मुख्य) था, जिसे सृञ्जयों ने निकाल बाहर किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;रेवोत्तरसमुह पाटवं चाक्रं स्थपतिसृञ्जया अपरुरुधु:। शतपथब्राह्मण (12.9.3.1)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*[[पाणिनि]]&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 4.2.87&amp;lt;/ref&amp;gt; के एक वार्तिक ने 'महिष्मत्' की व्युत्पत्ति 'महिष' से की है, इसे सामान्यत: नर्मदा पर स्थित माहिष्मती का ही रूपान्तर माना गया है। इससे प्रकट होता है कि सम्भवत: वार्तिककार को (लगभग ई.पू. चौथी शताब्दी में ) नर्मदा का परिचय था। &lt;br /&gt;
*रघुवंश&amp;lt;ref&amp;gt;रघुवंश 96.43&amp;lt;/ref&amp;gt; में रेवा (अर्थात् नर्मदा) के तट पर स्थित माहिष्मती को अनूप की राजधानी कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जान पड़ता है कि कहीं-कहीं साहित्य में इस नदी के पूर्वी या पहाड़ी भाग को रेवा (शाब्दिक अर्थ—उछलने-कूदने वाली) और पश्चिमी या मैदानी भाग को नर्मदा  (शाब्दिक अर्थ—नर्म या सुख देने वाली) कहा गया है। (किन्तु महाभारत के उपर्युक्त उद्धरण में उदगम के निकट ही नदी को नर्मदा नाम से अभिहित किया गया है)। नर्मदा के तटवर्ती प्रदेश को भी कभी-कभी नर्मदा नाम से ही निर्दिष्ट किया जाता था। विष्णुपुराण के अनुसार इस प्रदेश पर शायद गुप्तकाल से पूर्व आभीर आदि शूद्रजातियों का अधिकार था।&amp;lt;ref&amp;gt;’नर्मदा मरुभूविषयांश्च-आभीर शूद्राद्या: भोक्ष्यन्ति’, विष्णुपुराण 4,24&amp;lt;/ref&amp;gt; वैसे नर्मदा का नदी के रूप में उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदा तटे, सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च’; ‘नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विंध्याद्रिनिर्गता;’, [[विष्णु पुराण]] 1,2,9; 2,3,11&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;दे. रेवा, सोमोद्भवा।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
== नर्मदा की महत्ता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-2.jpg|thumb|250px|नर्मदा नदी ]]&lt;br /&gt;
महाभारत एवं कतिपय [[पुराण|पुराणों]] में नर्मदा की चर्चा बहुधा हुई है। [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;अध्याय 186-194,554 श्लोक&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[पद्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;आदिखण्ड, अध्याय 13-23, 739 श्लोक, जिनमें बहुत से मत्स्य पुराण के ही श्लोक हैं&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कूर्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;उत्तरार्ध, अध्याय 40-42, 189 श्लोक&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नर्मदा की महत्ता एवं उसके तीर्थों का वर्णन किया है। मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 194.45&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पद्म पुराण आदि&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, 21.44&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है कि उस स्थान से जहाँ नर्मदा सागर में मिलती है, अमरकण्टक पर्वत तक, जहाँ से वह निकलती है, 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्नि पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;अग्नि पुराण 113.2&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं कूर्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्म पुराण, 2.40.13&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से क्रम से 60 करोड़ एवं 60 सहस्र तीर्थ हैं। [[नारद पुराण|नारदीय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;उत्तरार्ध, अध्याय 77&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि नर्मदा के दोनों तटों पर 400 मुख्य तीर्थ हैं&amp;lt;ref&amp;gt;श्लोक 1&amp;lt;/ref&amp;gt;, किन्तु अमरकण्टक से लेकर साढ़े तीन करोड़ हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्लोक 4 एवं 27-28&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;यद्यपि रेवा एवं नर्मदा सामान्यत: समानार्थक कही जाती हैं, किन्तु [[भागवत पुराण]], 5.19.18 ने इन्हें पृथक्-पृथक् (तापी-रेवा-सुरसा-नर्मदा) कहा है, और [[वामन पुराण]], 13.25 एवं 29-30 का कथन है कि रेवा विन्ध्य से तथा नर्मदा ऋक्षपाद से निकली है। सार्धत्रिकोटितीर्थानि गदितानीह वायुना। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च रेवायां तानि सन्ति च॥ नारदीय पुराण (उत्तर, 77.27-28)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;वन पर्व, 188.103 एवं 222.24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नर्मदा का उल्लेख गोदावरी एवं दक्षिण की अन्य नदियों के साथ किया है। उसी पर्व&amp;lt;ref&amp;gt;वन पर्व, 89.1-3&amp;lt;/ref&amp;gt; में यह भी आया हैं कि नर्मदा [[आनर्त]] देश में है, यह प्रियंगु एवं आम्र-कुञ्जों से परिपूर्ण है, इसमें वेत्र लता के वितान पाये जाते हैं, यह पश्चिम की ओर बहती है और तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ (नर्मदा में) स्नान करने को आते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में गुजरात एवं [[काठियावाड़]] को आनर्त कहा जाता था। [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग पर्व]], 97-6 में [[द्वारका]] को आनर्त–नगरी कहा गया है। नर्मदा आनर्त में होकर बहती मानी गयी है अत: ऐसी कल्पना की जाती है कि [[महाभारत]] के काल में आनर्त के अन्तर्गत [[गुजरात]] का दक्षिणीभाग एवं काठियावाड़ दोनों सम्मिलित थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण ने उद्घोष किया है कि गंगा कनखल में एवं [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] [[कुरुक्षेत्र]] में पवित्र है, किन्तु नर्मदा सभी स्थानों में, चाहे ग्राम हो या वन। नर्मदा केवल दर्शन-मात्र से पापी को पवित्र कर देती है; सरस्वती (तीन दिनों में) तीन स्नानों से, [[यमुना नदी|यमुना]] सात दिनों के स्नानों से और गंगा केवल एक स्नान से।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण, 186.10-11=पद्म पुराण, आदि, 13.6-7=कूर्म पुराण 2.40.7-8&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र, 85.8&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[श्राद्ध]] के योग्य तीर्थों की सूची दी हैं, जिसमें नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के योग्य ठहराया है। नर्मदा को रुद्र के शरीर से निकली हुई कहा गया है, जो इस बात का कवित्वमय प्रकटीकरण मात्र है कि यह अमरकण्टक से निकली है जो महेश्वर एवं उनकी पत्नी का निवास-स्थल कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण, 188.19&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt; नर्मदा सरितां श्रेंष्ठा रुद्रदेहाद्विनि:सृता। तारयेंत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ मत्स्य पुराण (190.17= कूर्म पुराण 2.40.5= पद्म पुराण, आदिखण्ड 17.13)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;वायु पुराण, 977.32&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा उद्घोषित है कि नदियों में श्रेष्ठ पुनीत नर्मदा पितरों की पुत्री है और इस पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पितृणां दुहिता पुण्या नर्मदा सरितां वरा। तत्र श्राद्धानि दत्तानि अक्षयाणि भवन्त्युत॥ वायुपुराण (77.32)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि यह 100 योजन लम्बी एवं दो योजन चौड़ी है।&amp;lt;ref&amp;gt;योजनानां शतं सग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा। विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता॥ कूर्म पुराण (2.40.12=मत्स्य पुराण 186.24-25)। और देखिए अग्नि पुराण (113।2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रो.के.वी. रंगस्वामी आयंगर ने कहा है कि मत्स्य पुराण की बात ठीक है, क्योंकि नर्मदा वास्तव में लगभग 800 मील लम्बी है।&amp;lt;ref&amp;gt;उनके द्वारा सम्पादित कल्पतरु, पृ. 199&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु दो योजन (अर्थात् उनके मतानुसार 16 मील) की चौड़ाई भ्रामक है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि नर्मदा अमरकण्टक से निकली हैं, जो कलिंग देश का पश्चिमी भाग है।&amp;lt;ref&amp;gt;कलिंगदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके। पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ कूर्म पुराण (2.40.9) एवं मत्स्य पुराण (186.12)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मन्त्र का जप एवं उपवास==&lt;br /&gt;
विष्णुपुराण ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रात एवं दिन में और जब अन्धकारपूर्ण स्थान में उसे जाना हो तब 'प्रात:काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार! हे नर्मदा, तुम्हें नमस्कार; मुझे विषधर साँपों से बचाओं' इस मन्त्र का जप करके चलता है तो उसे साँपों का भय नहीं होता।&amp;lt;ref&amp;gt;नर्मदायै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो निशि। नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पत:॥ विष्णुपुराण (4.3.12-13)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कूर्म पुराण एवं मत्स्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जो [[अग्निदेव|अग्नि]] या जल में प्रवेश करके या उपवास करके (नर्मदा के किसी तीर्थ पर या अमरकण्टक पर) प्राण त्यागता है वह पुन: (इस संसार में) नहीं आता।&amp;lt;ref&amp;gt;अनाशकं तु य: कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप। गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायतें पुमान् ॥ मत्स्य. (194.29-30); परित्यजति य: प्राणान् पर्वत्तेऽमरकण्टके। वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयतें॥ मत्स्य पुराण (186.53-54)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==प्राचीन लेख==&lt;br /&gt;
टॉलेमी ने नर्मदा को 'नमडोज' कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;पृ0 102&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा की चर्चा करने वाले शिलालेखों में एक अति प्राचीन लेख है एरन प्रस्तरस्तम्भाभिले, जो बुधगुप्त के काल&amp;lt;ref&amp;gt;गुप्त संवत् 165= 484-85 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; का है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए कार्पस इंस्क्रिप्शनम इण्डिकेरम जिल्द 3, पृ. 89&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा में मिलने वाली कतिपय नदियों के नाम मिलते हैं, यथा- &lt;br /&gt;
*[[कपिला नदी]]&amp;lt;ref&amp;gt;दक्षिणी तट पर, मत्स्य पुराण 186.40 एवं पद्म पुराण 1.13.35&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*विशल्या&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 186.46= पद्म पुराण 2.35-39&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-1.jpg|thumb|250px|left|नर्मदा नदी ]]&lt;br /&gt;
*[[एरण्डी नदी]]&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 191.42-43 एवं पद्म पुराण 1.18.44&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*इक्षु-नादी&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 191.49 एवं पद्म पुराण 1.18.47&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[कावेरी नदी]]।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 189.12-13 एवं पद्म पुराण 1.16.6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;नर्मदा की उत्तरी शाखा जहाँ 'ओंकार' नामक द्वीप अवस्थित है 'कावेंरी' नाम से प्रसिद्ध है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपतीर्थ==&lt;br /&gt;
बहुत-से उपतीर्थों के नाम आते हैं जिनमें दो या तीन का यहाँ उल्लेख किया जायगा। जो है- &lt;br /&gt;
*महेश्वरतीर्थ (अर्थात् ओंकार), जहाँ से एक तीर द्वारा रुद्र ने बाणासुर की तीन नगरियाँ जला डालीं&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 188.2 एवं पद्म पुराण 1.15.2&amp;lt;/ref&amp;gt;,&lt;br /&gt;
* शुक्ल-तीर्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 192.3 द्वारा अति प्रशंसित और जिसके बारे में यह कहा जाता है कि राजर्षि चाणक्य ने यहाँ सिद्धि प्राप्त की थी&amp;lt;/ref&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*भृगुतीर्थ:-जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य पाप-मुक्त हो जाता है, जिसमें स्नान करने से स्वर्ग मिलता है और जहाँ मरने से संसार में पुन: लौटना नहीं पड़ता, &lt;br /&gt;
*जामदग्न्य तीर्थ:-जहाँ नर्मदा समुद्र में गिरती है और जहाँ भगवान जनार्दन ने पूर्णता प्राप्त की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरकण्टक पर्वत एक तीर्थ है जो ब्रह्महत्या के साथ अन्य पापों का मोचन करता है और यह विस्तार में एक योजन है।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 189.89 एवं 98&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तीर्थ है माहिष्मती, जिसके स्थल के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। अधिकांश लेखक यही कहते हैं कि यह ओंकार मान्धाता है जो [[इन्दौर]] से लगभग 40 मील दक्षिण नर्मदा में एक द्वीप है। इसका इतिहास पुराना है। [[बौद्ध]] ग्रन्थों में ऐसा आया है कि अशोक महान् के राज्यकाल&amp;lt;ref&amp;gt;लगभग 274 ई.पू.&amp;lt;/ref&amp;gt; में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने कई देशों में धार्मिक दूत-मण्डल भेजे थे, जिनमें एक दूतमण्डल महिषमण्डल को भी भेजा गया था। डा. फ्लीट ने महिषमण्डल को माहिष्मती कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;जे. आर. ए. एस्., पृ. 425-477, सन् 1910&amp;lt;/ref&amp;gt; महाभाष्यकार को माहिष्मती का ज्ञान था&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 3.1.26, वार्तिक 10&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कालिदास]] ने इसे रेवा से घिरी हुई कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;रघुवंश 6.43&amp;lt;/ref&amp;gt; उद्योगपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;उद्योगपर्व, 19.23-24 एवं 166.4&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासन पर्व, 166.4&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[भागवत पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;भागवतपुराण, 10.79.21&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, 2.92.32&amp;lt;/ref&amp;gt; में माहिष्मती को नर्मदा या रेवा पर स्थित माना गया है। एक अन्य प्राचीन नगर है भरुकच्छ या भृगुकच्छ (आधुनिक भड़ोच)।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Reflist|2}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0&amp;diff=251559</id>
		<title>साँचा:बिहार के नगर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0&amp;diff=251559"/>
		<updated>2012-02-06T10:28:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=बिहार के नगर&lt;br /&gt;
|title =[[:श्रेणी:बिहार के नगर|बिहार के नगर]]&lt;br /&gt;
|titlestyle =background:#d0d5b2;&lt;br /&gt;
|groupstyle =background:#dac0fa;&lt;br /&gt;
|liststyle =padding-left:5px; padding-right:5px; background:#f4f4f4; text-align:center&lt;br /&gt;
|listpadding=0.5em 0em;&lt;br /&gt;
|image= &lt;br /&gt;
|imagestyle= background:#f4f4f4; &lt;br /&gt;
|imageleft =&lt;br /&gt;
|imageleftstyle=&lt;br /&gt;
|style =&lt;br /&gt;
|basestyle= &lt;br /&gt;
|navbar=&lt;br /&gt;
|above=&lt;br /&gt;
|abovestyle=&lt;br /&gt;
|state=&amp;lt;includeonly&amp;gt;uncollapsed&amp;lt;/includeonly&amp;gt;&lt;br /&gt;
|oddstyle=&lt;br /&gt;
|evenstyle=&lt;br /&gt;
|group1 =&lt;br /&gt;
|group1style=&lt;br /&gt;
|list1 = [[आरा]] '''·''' [[कटिहार]] '''·''' [[गया]] '''·''' [[त्रिवेणी नगर बिहार|त्रिवेणी नगर]] '''·''' [[नालन्दा]]  '''·''' [[पटना]] '''·''' [[बक्सर]] '''·''' [[बरौनी]] '''·''' [[बिहार शरीफ़]]  '''·''' [[बेतिया बिहार|बेतिया]] '''·'''  [[भागलपुर]] '''·'''  [[मधुबनी]] '''·''' [[मुंगेर]] '''·''' [[विक्रमशिला]] '''·''' [[सासाराम]] '''·'''  [[सीतामढ़ी]] '''·'''  [[सोनपुर]] '''·''' [[छपरा]] '''·''' [[दानापुर]] '''·''' [[दरभंगा]] '''·'''  [[नवादा]]&lt;br /&gt;
|list1style=&lt;br /&gt;
|group2 =&lt;br /&gt;
|group2style=&lt;br /&gt;
|list2 =&lt;br /&gt;
|group3=&lt;br /&gt;
|group3style=&lt;br /&gt;
|list3=&lt;br /&gt;
|list3style= &lt;br /&gt;
|group4style=&lt;br /&gt;
|list4=&lt;br /&gt;
|list4style=&lt;br /&gt;
|group5=&lt;br /&gt;
|group5style=&lt;br /&gt;
|list5 =&lt;br /&gt;
|list5style=&lt;br /&gt;
|group6=&lt;br /&gt;
|group6style=&lt;br /&gt;
|list6=&lt;br /&gt;
|list6style=&lt;br /&gt;
|group7=&lt;br /&gt;
|group7style=&lt;br /&gt;
|list7=&lt;br /&gt;
|list7style=&lt;br /&gt;
|group8=&lt;br /&gt;
|group8style=&lt;br /&gt;
|list8=&lt;br /&gt;
|list8style=&lt;br /&gt;
|group9=&lt;br /&gt;
|group9style=&lt;br /&gt;
|list9=&lt;br /&gt;
|list9style=&lt;br /&gt;
|group10=&lt;br /&gt;
|group10style=&lt;br /&gt;
|list10 =&lt;br /&gt;
|list10style=&lt;br /&gt;
|group11=&lt;br /&gt;
|group11style=&lt;br /&gt;
|list11=&lt;br /&gt;
|list11style=&lt;br /&gt;
|group12=&lt;br /&gt;
|group12style=&lt;br /&gt;
|list12=&lt;br /&gt;
|list12style=&lt;br /&gt;
|group13=&lt;br /&gt;
|group13style=&lt;br /&gt;
|list13=&lt;br /&gt;
|list13style=&lt;br /&gt;
|group14=&lt;br /&gt;
|group14style=&lt;br /&gt;
|list14=&lt;br /&gt;
|list14style=&lt;br /&gt;
|group15=&lt;br /&gt;
|group15style=&lt;br /&gt;
|list15 =&lt;br /&gt;
|list15style=&lt;br /&gt;
|group16=&lt;br /&gt;
|group16style=&lt;br /&gt;
|list16=&lt;br /&gt;
|list16style=&lt;br /&gt;
|group17=&lt;br /&gt;
|group17style=&lt;br /&gt;
|list17=&lt;br /&gt;
|list17style=&lt;br /&gt;
|group18=&lt;br /&gt;
|group18style=&lt;br /&gt;
|list18=&lt;br /&gt;
|list18style=&lt;br /&gt;
|group19=&lt;br /&gt;
|list19=&lt;br /&gt;
|group20=&lt;br /&gt;
|list20=&lt;br /&gt;
|below=&lt;br /&gt;
|belowstyle=&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:नगर के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251554</id>
		<title>नवादा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251554"/>
		<updated>2012-02-06T10:26:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''नवादा''' [[बिहार]] राज्य के [[पटना]]  शहर के दक्षिण-पूर्व में 93 किमी की दूरी पर स्थित प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता है। नवादा में 1300 फीट ऊँचे हज़ारीबाग़ पर्वत पर 365 कुंड हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सभी कुंडों का निर्माण [[कृष्ण|भगवान कृष्ण]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] के अज्ञातवास के काल में किया था। 103 कुंडों तक तो आसानी से पहुँचा जा सकता है। ऊपर चलने पर 6 नम्बर के कुंड का अपना एक ही ख़ास महत्व है। जनश्रुतियों के अनुसार इसी कुंड पर [[द्रौपदी]] हरण के बाद कृष्ण [[सत्यभामा]] के साथ पधारे थे और पाण्डवों को सांत्वना दी थी। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक महत्व==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन समय में इस जगह पर कई शासकों ने लम्बे समय तक शासन किया था।&lt;br /&gt;
==यातायात व परिवहन==&lt;br /&gt;
;वायु मार्ग&lt;br /&gt;
नवादा का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। पटना से नवादा 112 किमी की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
;रेल मार्ग&lt;br /&gt;
[[भारत]] के कई प्रमुख शहरों से रेलमार्ग द्वारा नवादा पहुँचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन नवादा रेलवे स्टेशन है। &lt;br /&gt;
;सड़क मार्ग&lt;br /&gt;
नवादा सड़क मार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों है।&lt;br /&gt;
*ककोलत&lt;br /&gt;
*प्रजातंत्र द्वार&lt;br /&gt;
*बाबा की मजार&lt;br /&gt;
*हनुमान मंदिर&lt;br /&gt;
*सीतामढ़ी&lt;br /&gt;
*नारद संग्रहालय&lt;br /&gt;
*सेखोदेवरा&lt;br /&gt;
*गुनियाजी तीर्थ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बिहार के नगर}}&lt;br /&gt;
{{बिहार के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना जनवरी-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Nawada&amp;diff=251550</id>
		<title>Nawada</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Nawada&amp;diff=251550"/>
		<updated>2012-02-06T10:24:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: नवादा को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[नवादा]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251547</id>
		<title>वार्ता:नवादा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251547"/>
		<updated>2012-02-06T10:23:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{वार्ता}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251546</id>
		<title>नवादा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE&amp;diff=251546"/>
		<updated>2012-02-06T10:22:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: '{{पुनरीक्षण}} {{tocright}} '''नवादा''' बिहार राज्य के पटना  शहर...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''नवादा''' [[बिहार]] राज्य के [[पटना]]  शहर के दक्षिण-पूर्व में 93 किमी की दूरी पर स्थित प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए जाना जाता है। नवादा में 1300 फीट ऊँचे हज़ारीबाग़ पर्वत पर 365 कुंड हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सभी कुंडों का निर्माण [[कृष्ण|भगवान कृष्ण]] ने [[पाण्डव|पाण्डवों]] के अज्ञातवास के काल में किया था। 103 कुंडों तक तो आसानी से पहुँचा जा सकता है। ऊपर चलने पर 6 नम्बर के कुंड का अपना एक ही ख़ास महत्व है। जनश्रुतियों के अनुसार इसी कुंड पर [[द्रौपदी]] हरण के बाद कृष्ण [[सत्यभामा]] के साथ पधारे थे और पाण्डवों को सांत्वना दी थी। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक महत्व==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह स्थान काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन समय में इस जगह पर कई शासकों ने लम्बे समय तक शासन किया था।&lt;br /&gt;
==यातायात व परिवहन==&lt;br /&gt;
;वायु मार्ग&lt;br /&gt;
नवादा का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पटना स्थित जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। पटना से नवादा 112 किमी की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
;रेल मार्ग&lt;br /&gt;
[[भारत]] के कई प्रमुख शहरों से रेलमार्ग द्वारा नवादा पहुँचा जा सकता है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन नवादा रेलवे स्टेशन है। &lt;br /&gt;
;सड़क मार्ग&lt;br /&gt;
नवादा सड़क मार्ग द्वारा भारत के कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों है।&lt;br /&gt;
*ककोलत&lt;br /&gt;
*प्रजातंत्र द्वार&lt;br /&gt;
*बाबा की मजार&lt;br /&gt;
*हनुमान मंदिर&lt;br /&gt;
*सीतामढ़ी&lt;br /&gt;
*नारद संग्रहालय&lt;br /&gt;
*सेखोदेवरा&lt;br /&gt;
*गुनियाजी तीर्थ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बिहार के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना जनवरी-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251525</id>
		<title>अलकनंदा नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251525"/>
		<updated>2012-02-06T10:07:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Devprayag-Bhagirathi-River.jpg|thumb|250px|अलकनंदा और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम देवप्रयाग, [[उत्तराखंड]]]]&lt;br /&gt;
'''अलकनंदा नदी''' [[कैलास]] और [[बद्रीनाथ]] के निकट बहने वाली [[गंगा नदी]] की एक शाखा है। यह गंगा के चार नामों में से एक है। चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। [[गंगोत्री]] में गंगा को [[भागीरथी]] के नाम से जाना जाता है, [[केदारनाथ]] में [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]] और [[बद्रीनाथ]] में अलकनन्दा के नाम से जाना जाता है। यह [[उत्तराखंड]] में 'शतपथ' और 'भगीरथ खड़क' नामक [[हिमनद|हिमनदों]] से निकलती है। यह स्थान गंगोत्री कहलाता है। [[कालिदास]] ने [[मेघदूत]] में जिस [[अलकापुरी]] का वर्णन किया है वह [[कैलास पर्वत]] के निकट अलकंनदा के [[तट]] पर ही बसी होगी जैसा कि नाम-साम्य से प्रकट भी होता है। कालिदास ने [[अलका नगरी|अलका]] की स्थिति गंगा की गोदी में मानी है और गंगा से यहाँ अलकनंदा का ही निर्देश माना जा सकता है। संभवत: प्राचीन काल में पौराणिक परंपरा में अलकनंदा को ही गंगा का मूलस्रोत माना जाता था क्योंकि गंगा को स्वर्ग से गिरने के पश्चात सर्वप्रथम [[शिव]] ने अपनी अलकों अर्थात् जटाजूट में बाँध लिया था जिसके कारण नदी को शायद 'अलकनंदा' कहा गया। [[आकाशगंगा नदी]] की अलकनंदा की शाखा जान पड़ती है। अलकनंदा का वर्णन [[महाभारत]] [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] के अंतर्गत तीर्थयात्रा प्रसंग में है जहाँ इसे [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] नाम से भी अभिहित किया गया है और इसका उद्गम बदरिकाश्रम के निकट ही बताया गया है।&lt;br /&gt;
:'नर नारायणस्थानं भागीरथ्योपशोभितम्'&amp;lt;ref&amp;gt;[[वनपर्व महाभारत|वनपर्व]] 145, 41&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह भागीरथी अलकनंदा ही है क्योंकि नर नारायण - आश्रम अलकनंदा के तट पर ही है। वास्तव में [[महाभारत]] ने इस स्थान पर गंगा की दोनों शाखाओं- &lt;br /&gt;
*भागीरथी जो गंगोत्री से सीधी देवप्रयाग आती है &lt;br /&gt;
*अलकनंदा जो कैलास और बदरिकाश्रम होती हुई देवप्रयाग में आकर भागीरथी से मिल जाती है- को अभिन्न ही माना है। &lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] 2,2,35&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी अलकनंदा का उल्लेख है- &lt;br /&gt;
:'तथैवालकनंदापि दक्षिणेनैत्यभारतम्'। &lt;br /&gt;
अलकनंदा और नंदा के संगम पर नंदप्रयास स्थित है।&lt;br /&gt;
==सहायक नदियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg|thumb|250px|[[मंदाकिनी नदी]] और अलकनंदा नदी का संगम, रुद्र प्रयाग]]&lt;br /&gt;
अलकनंदा की पाँच सहायक नदियाँ हैं जो गढ़वाल क्षेत्र में 5 अलग अलग स्थानों पर अलकनंदा से मिलकर 'पंच प्रयाग' बनाती हैं। ये हैं-&lt;br /&gt;
*विष्णु प्रयाग जहाँ धौली गंगा अलकनंदा से मिलती है।&lt;br /&gt;
*नंद प्रयाग जहाँ नंदा नदी अलकनंदा से मिलती है।&lt;br /&gt;
*कर्ण प्रयाग जहाँ पिंडारी अलकनंदा से मिलती है।&lt;br /&gt;
*रुद्र प्रयाग जहाँ मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती है।&lt;br /&gt;
*देव प्रयाग जहाँ भागीरथी अलकनंदा से मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गहराई==&lt;br /&gt;
अलकनन्दा नदी कहीं बहुत गहरी, तो कहीं उथली है। नदी की औसत गहराई 5 फुट (1.3 मीटर), और अधिकतम गहराई 14 फीट (4.4 मीटर) है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251522</id>
		<title>मंदाकिनी नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=251522"/>
		<updated>2012-02-06T10:03:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mandakini-River.jpg|thumb|250px|मंदाकिनी नदी]]&lt;br /&gt;
'''मंदाकिनी नदी''' [[उत्तराखण्ड]] राज्य के [[केदारनाथ]] के निकट से गुजरती है और यह [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी है।&lt;br /&gt;
[[रामायण|वाल्मीकि रामायण]] अयोध्याकांड में इसका कई स्थानों पर उल्लेख है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा मंदाकिनी नदी, एकत प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभंवनम्'; 'अथ शैलाद्विनिष्कम्य मैथिलीं कोशलेश्वर:, अदर्शयच्छुभजलां रम्यां मंदाकिनी नदीम्। विचित्र पुलिनां रम्यां हंससारससेविताम् कुसुमैरुपसंपन्नां पश्य मंदाकिनीं नदीम्। नानाविधैस्तीररुहैर्वुतां पुष्पफलमद्रुमै: राजंती राजराजस्य नलिनीमिव सर्वत:। क्वचिन् मणिनिकाशोदां क्वचित् पुलिनशालिनीम्, क्वचित्सिद्धजनाकीर्ण पश्य मंदाकिनी नदीम्। दर्शनं चित्रकूटस्य मदांकिन्याश्च शोभने अधिक पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात्। सखोवच्च विगाहस्व सोते मदांकिनींनदीम् कमलान्यवमज्जंती पुष्कराणि च भामिनि'।&amp;lt;ref&amp;gt;[[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्या]] 93,8; 95,1-3-4-9-12-14&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[श्रीमद्भागवत]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[श्रीमद्भागवत]] 5,19,18&amp;lt;/ref&amp;gt; में मदांकिनी का नामोल्लेख इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
:'कौशिकी मंदाकिनी यमुना.......'। &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] ने [[रघुवंश महाकाव्य|रघुवंश]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[रघुवंश महाकाव्य|रघुवंश]] 13,48&amp;lt;/ref&amp;gt; में मंदाकिनी का विमानारूढ़ राम से ([[चित्रकूट]] के निकट) कितना ह्रदयग्राही वर्णन करवाया है- &lt;br /&gt;
:'एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा सरिद विदूरांतरभावतंवी, मंदाकिनी भाति नगोपकंठे मुक्तावली कंठगतैव भूमे:'। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg|thumb|250px|मंदाकिनी नदी और [[अलकनंदा नदी]] का संगम, रुद्र प्रयाग]]&lt;br /&gt;
*अध्यात्मरामायण अयोध्या&amp;lt;ref&amp;gt;[[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्या]] 63&amp;lt;/ref&amp;gt; में मंदाकिनी को [[गंगा]] कहा गया है- &lt;br /&gt;
:'ऊचुरग्रे गिरे: पश्चाद गंगाया उत्तरतटे विविक्तं रामसदनं रम्यं काननमंडित'। &lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास|तुलसीदास जी]] ने ([[रामचरितमानस]], [[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्या कांड]]) में मंदाकिनी को सुरसरि की धारा कहा है- &lt;br /&gt;
:'सुरसरि धार नाम मंदाकिनी जो सब पातक-पोतक डाकिनी'। &lt;br /&gt;
*तुलसीदास ने मंदाकिनी के संबंध में प्रसिद्ध पौराणिक कथा का भी निर्देश किया है जिसमें इस नदी को अविऋषि की पत्नी अनसूया द्वारा चित्रकूट में लाए जाने का वर्णन है- &lt;br /&gt;
:'नदी पुनीत पुरान बखानी, अत्रिप्रिया निज तपबल आनी'। &lt;br /&gt;
*मंदाकिनी और पयास्विनी नदियों के संगम पर राघवप्रयाग नामक स्थान हैं। &lt;br /&gt;
;अर्थ&lt;br /&gt;
मंदाकिनी शब्द का अर्थ 'मंद-मंद बहने वाली' है। इसके इस विशिष्टि गुण का वर्णन कालिदास ने उपर्युक्त [[श्लोक]] में 'स्तिमित प्रवाहा' कह कर किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg&amp;diff=251520</id>
		<title>चित्र:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg&amp;diff=251520"/>
		<updated>2012-02-06T10:02:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[मंदाकिनी नदी]] और [[अलकनंदा नदी]] का संगम, रुद्र प्रयाग&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/the-hawk/ Hawk Eye]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/the-hawk/4252810169 Rudraprayag]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/the-hawk/ Tathagata Sar's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=मंदाकिनी नदी [[उत्तराखण्ड]] राज्य के [[केदारनाथ]] के निकट से गुजरती है और यह [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike={{Share Alike}} &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg&amp;diff=251509</id>
		<title>चित्र:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River-And-Alakananda-River.jpg&amp;diff=251509"/>
		<updated>2012-02-06T09:57:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River.jpg&amp;diff=251505</id>
		<title>चित्र:Mandakini-River.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River.jpg&amp;diff=251505"/>
		<updated>2012-02-06T09:55:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[मंदाकिनी नदी]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/deen/ Nadine Incoll]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/deen/432123273 Mt Mandakini]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/deen/ deen's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=मंदाकिनी नदी [[उत्तराखण्ड]] राज्य के [[केदारनाथ]] के निकट से गुजरती है और यह [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial={{Noncommercial}} &lt;br /&gt;
|Share Alike= &lt;br /&gt;
|No Derivative Works={{No Derivative Works}} &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River.jpg&amp;diff=251491</id>
		<title>चित्र:Mandakini-River.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Mandakini-River.jpg&amp;diff=251491"/>
		<updated>2012-02-06T09:48:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE&amp;diff=250816</id>
		<title>भारतीय कला</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE&amp;diff=250816"/>
		<updated>2012-02-04T12:31:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: /* भारतीय संगीत के विविध अंग */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{भारत विषय सूची}}&lt;br /&gt;
[[कला]] लोगों की [[संस्कृति]] में एक मूल्यवान विरासत है। जब कोई कला की बात करता है तो आमतौर पर उसका अभिप्राय दृष्टिमूलक कला से होता है। जैसे [[वास्तुकला]], मूर्तिकला तथा [[चित्रकला]]। अतीत में ये तीनों पहलू आपस में मिले हुए थे। वास्तुकला में ही मूर्तिकला एवं चित्रकला का समावेश था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्वानों का मानना है कि भारतीय कला [[धर्म]] से प्रेरित हुई। वैसे इस बारे में कुछ नकारने जैसा भी नहीं है। हो सकता है, कलाकारों और हस्तशिल्पियों ने धर्माचार्यों के निर्देशानुसार काम किया हो, पर स्वयं क अभिव्यक्त करते समय उन्होंने संसार को जैसा देखा, वैसा ही दिखाया। यह सही है कि भारतीय कला के माध्यम से जो पावन दृष्टि को ही अभिव्यक्त किया गया, जो भौतिक संसार के पीछे छिपे दैव तत्वों से, जीवन और प्रकृति की सनातन विषमता और सबसे ऊपर मानवीय तत्व से हमेशा अवगत रहती है। &lt;br /&gt;
==भारतीय कला==&lt;br /&gt;
भारतीय कला अपनी प्राचीनता तथा विवधता के लिए विख्यात रही है। आज जिस रूप में 'कला' शब्द अत्यन्त व्यापक और बहुअर्थी हो गया है, प्राचीन काल में उसका एक छोटा हिस्सा भी न था। यदि ऐतिहासिक काल को छोड़ और पीछे प्रागैतिहासिक काल पर दृष्टि डाली जाए तो विभिन्न नदियों की घाटियों में पुरातत्त्वविदों को खुदाई में मिले असंख्य पाषाण उपकरण [[भारत]] के आदि मनुष्यों की कलात्मक प्रवृत्तियों के साक्षात प्रमाण हैं। पत्थर के टुकड़े को विभिन्न तकनीकों से विभिन्न प्रयोजनों के अनुरूप स्वरूप प्रदान किया जाता था। हस्तकुल्हाड़े, खुरचनी, छिद्रक, तक्षिणियाँ तथा बेधक आदि पाषाण-उपकरण सिर्फ़ उपयोगिता की दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं थे, बल्कि उनका कलात्मक पक्ष भी ज्ञातव्य है। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता गया उसकी जीवन शैली के साथ-साथ उसका कला पक्ष भी मज़बूत होता गया। जहाँ पर एक ओर मृदभांण्ड, भवन तथा अन्य उपयोगी सामानों के निर्माण में वृद्धि हुई वहीं पर दूसरी ओर [[आभूषण]], मूर्ति कला, मुहर निर्माण, गुफ़ा चित्रकारी आदि का भी विकास होता गया। भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में विकसित सैंधव सभ्यता ([[हड़प्पा]] सभ्यता) [[भारत का इतिहास|भारत के इतिहास]] के प्रारम्भिक काल में ही [[कला]] की परिपक्वता का साक्षात् प्रमाण है। खुदाई में लगभग 1,000 केन्द्रों से प्राप्त इस सभ्यता के [[अवशेष|अवशेषों]] में अनेक ऐसे तथ्य सामने आये हैं, जिनको देखकर बरबर ही मन यह मानने का बाध्य हो जाता है कि हमारे पूर्वज सचमुच उच्च कोटि के कलाकार थे। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+विश्व विरासत सूची (यूनेस्को) में शामिल भारतीय धरोहर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! क्रम&lt;br /&gt;
! धरोहर&lt;br /&gt;
! घोषणा वर्ष&lt;br /&gt;
! चित्र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1&lt;br /&gt;
| [[लाल क़िला आगरा|आगरा का लाल क़िला]]&lt;br /&gt;
| [[1983]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Red-Fort-Agra.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 2&lt;br /&gt;
| [[अजंता की गुफ़ाएं|अजन्ता की गुफाएं]]&lt;br /&gt;
| [[1983]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Ajanta-Caves-Aurangabad-Maharashtra-3.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 3&lt;br /&gt;
| [[एलोरा की गुफ़ाएं|एलोरा गुफाएं]]&lt;br /&gt;
| [[1983]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Ellora-Caves-Aurangabad-Maharashtra-3.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 4&lt;br /&gt;
| [[ताजमहल]]&lt;br /&gt;
| [[1983]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Tajmahal-10.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 5&lt;br /&gt;
| [[महाबलीपुरम]] के स्मारक&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Pancha-Rathas-Mahabalipuram-5.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 6&lt;br /&gt;
| [[कोणार्क]] का [[सूर्य मंदिर कोणार्क|सूर्य मंदिर]]&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Sun-Temple-Konark.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 7&lt;br /&gt;
| काजीरंगा नेशनल पार्क&lt;br /&gt;
| [[1985]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Kaziranga-National-Park-Assam.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 8&lt;br /&gt;
| केवलादेव नेशनल पार्क&lt;br /&gt;
| [[1985]]&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 9&lt;br /&gt;
| मानस सेंक्चुरी&lt;br /&gt;
| [[1985]]&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 10&lt;br /&gt;
| [[गोवा]] के चर्च&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Se-Cathedral-Church-Goa-1.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 11&lt;br /&gt;
| [[फ़तेहपुर सीकरी]]&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Buland-Darwaja-Fatehpur-Sikri-Agra.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 12&lt;br /&gt;
| [[हम्पी]] [[अवशेष]]&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Hampi-3.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 13&lt;br /&gt;
| [[खजुराहो]] मंदिर&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-7.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 14&lt;br /&gt;
| [[एलिफेंटा की गुफाएँ]]&lt;br /&gt;
| [[1987]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Elephanta-Caves-Mumbai.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 15&lt;br /&gt;
| चोल मंदिर&lt;br /&gt;
| [[1987]]-[[2004]]&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 16&lt;br /&gt;
| पट्टाडकल के स्मारक&lt;br /&gt;
| [[1987]]&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 17&lt;br /&gt;
| [[सुन्दरवन राष्ट्रीय उद्यान|सुन्दरवन नेशनल पार्क]]&lt;br /&gt;
| [[1987]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Sunderbans-Wildlife-Sanctuary.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 18&lt;br /&gt;
| नंदा देवी और [[फूलों की घाटी]]&lt;br /&gt;
| [[1988]]-[[2005]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Valley-Of-Flowers-National-Park.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 19&lt;br /&gt;
| [[साँची|सांची का स्तूप]]&lt;br /&gt;
| [[1989]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Buddha-Stupas.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 20&lt;br /&gt;
| [[हुमायूं का मक़बरा]]&lt;br /&gt;
| [[1993]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Humayun's-Tomb-Delhi.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 21&lt;br /&gt;
| [[क़ुतुब मीनार]]&lt;br /&gt;
| [[1993]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Qutub-Minar-Delhi.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 22&lt;br /&gt;
| माउन्टेन रेलवे&lt;br /&gt;
| [[1999]]-[[2005]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 23&lt;br /&gt;
| [[बोधगया]] का [[महाबोधी मंदिर]]&lt;br /&gt;
| [[2002]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Buddha-Statue-Bodhgaya-Bihar-2.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 24&lt;br /&gt;
| [[भीमबेटका गुफ़ाएँ भोपाल|भीमबेटका की गुफाएं]]&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Bhimbetka-Caves-Bhopal.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 25&lt;br /&gt;
| चम्पानेर-पावरगढ़ पार्क&lt;br /&gt;
| [[2004]]&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 26&lt;br /&gt;
| [[छत्रपति शिवाजी टर्मिनस]]&lt;br /&gt;
| [[2004]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Chhatrapati-Shivaji-Terminus.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 27&lt;br /&gt;
| [[लाल क़िला]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
| [[2007]]&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Red-Fort.jpg|50px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 28&lt;br /&gt;
| [[ऋग्वेद]] की पाण्डुलिपियां&lt;br /&gt;
| [[2007]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक काल में भारतीय कला में और भी परिपक्वता आई। [[मौर्य काल]], [[कुषाण काल]] और फिर [[गुप्त काल]] में भारतीय कला निरन्तर प्रगति करती गई। [[अशोक]] के विभिन्न [[अशोक के शिलालेख|शिलालेख]], स्तम्भलेख और स्तम्भ कलात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। [[सारनाथ]] स्थित [[अशोक स्‍तम्‍भ]] और उसके चार सिंह व धर्म चक्र युक्त शीर्ष भारतीय कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कुषाण काल]] में विकसित [[गांधार महाजनपद|गांधार]] और [[मथुरा]] कलाओं की श्रेष्ठता जगज़ाहिर है। [[गुप्त काल]] सिर्फ़ राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से ही सम्पन्न नहीं था, कलात्मक दृष्टि से भी वह अत्यन्त सम्पन्न था। तभी तो इतिहासकारों ने उसे प्राचीन [[भारत का इतिहास|भारतीय इतिहास]] का 'स्वर्ण युग' कहा है। पूर्व मध्ययुग में निर्मित विशालकाय मन्दिर, क़िले तथा मूर्तियाँ तथा उत्तर मध्ययुग के इस्लामिक तथा भारतीय कला के संगम से युक्त अनेक भवन, चित्र तथा अन्य कलात्मक वस्तुएँ भारतीय कला की अमूल्य धरोहर हैं। आधुनिक युग में भारतीय कला पर पाश्चात्य कला का प्रभाव पड़ा। उसकी विषय वस्तु, प्रस्तुतीकरण के तरीक़े तथा भावाभिव्यक्ति में विविधता एवं जटिलता आई। आधुनिक कला अपने कलात्मक पक्ष के साथ-साथ उपयोगिता पक्ष को भी साथ लेकर चल रही है। यद्यपि भारत के दीर्घकालिक इतिहास में कई ऐसे काल भी आये, जबकि कला का ह्रास होने लगा, अथवा वह अपने मार्ग से भटकती प्रतीत हुई, परन्तु सामान्य तौर पर यह देखा गया कि भारतीय जनमानस कला को अपने जीवन का एक अंश मानकर चला है। वह कला का विकास और निर्माण नहीं करता, बल्कि कला को जीता है। उसकी जीवन शैली और जीवन का हर कार्य कला से परिपूर्ण है। यदि एक सामान्य भारतीय की जीवनचर्या का अध्ययन किया जाय तो, स्पष्ट होता है कि उसके जीवन का हर एक पहलू कला से परिपूर्ण है। जीवन के दैनिक क्रिया-कलापों के बीच उसके पूजा-पाठ, उत्सव, पर्व-त्योहार, शादी-[[विवाह]] या अन्य घटनाओं से विविध कलाओं का घनिष्ट सम्बन्ध है। इसीलिए भारत की चर्चा तब तक अपूर्ण मानी जाएगी, जब तक की उसके कला पक्ष को शामिल न किया जाय। प्राचीन भारतीय [[ग्रन्थ|ग्रन्थों]] में [[चौंसठ कलाएँ|64 कलाओं]] का उल्लेख मिलता है, जिनका ज्ञान प्रत्येक सुसंस्कृत नागरिक के लिए अनिवार्य समझा जाता था। इसीलिए भर्तृहरि ने तो यहाँ तक कह डाला 'साहित्य, संगीत, कला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः।' अर्थात् [[साहित्य]], [[संगीत]] और [[कला]] से विहीन व्यक्ति पशु के समान है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'कला' शब्द की उत्पत्ति कल् धातु में अच् तथा टापू प्रत्यय लगाने से हुई है (कल्+अच्+टापू), जिसके कई अर्थ हैं—शोभा, अलंकरण, किसी वस्तु का छोटा अंश या [[चन्द्रमा]] का सोलहवां अंश आदि। वर्तमान में कला को [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] के ''आर्ट'' शब्द का उपयोग समझा जाता है, जिसे पाँच विधाओं—संगीतकला, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला और काव्यकला में वर्गीकृत किया जाता है। इन पाँचों को सम्मिलित रूप से ललित कलाएँ कहा जाता है। वास्वत में कला मानवा मस्तिष्क एवं आत्मा की उच्चतम एवं प्रखरतम कल्पना व भावों की अभिव्यक्ति ही है, इसीलिए कलायुक्त कोई भी वस्तु बरबस ही संसार का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है। साथ ही वह उन्हें प्रसन्नचित्त एवं आहलादित भी कर देती है। वास्तव में यह कलाएँ व्यक्ति की आत्मा को झंझोड़ने की क्षमता रखती हैं। यह उक्ति कि भारतीय संगीत में वह जादू था कि [[दीपक राग]] के गायन से [[दीपक]] प्रज्जवलित हो जाता था तथा पशु-पक्षी अपनी सुध-बुध खो बैठते थे, कितना सत्य है, यह कहना तो कठिन है, लेकिन इतना तो सत्य है कि भारतीय संगीत या कला का हर पक्ष इतना सशक्त है कि संवेदनविहीन व्यक्ति में भी वह संवेदना के तीव्र उद्वेग को उत्पन्न कर सकता है।&lt;br /&gt;
{{इन्हेंभीदेखें|पत्रलता }}&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;भारतीय संगीत&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{main|संगीत}}&lt;br /&gt;
संगीत मानवीय लय एवं तालबद्ध अभिव्यक्ति है। भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए जाना जाता है। वर्तमान भारतीय संगीत का जो रूप दृष्टिगत होता है, वह आधुनिक युग की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के प्रासम्भ के साथ ही जुड़ा हुआ है। बैदिक काल में ही भारतीय संगीत के बीज पड़ चुके थे। सामवेद उन वैदिक ॠचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। प्राचीन काल से ही ईश्वर आराधना हेतु भजनों के प्रयोग की परम्परा रही है। यहाँ तक की यज्ञादि के अवसर पर भी समूहगान होते थे।&lt;br /&gt;
====भारतीय संगीत की उत्पत्ति====&lt;br /&gt;
भारतीय संगीत की उत्पत्ति [[वेद|वेदों]] से मानी जाती है। वादों का मूल [[मंत्र]] है - '[[ॐ]]' (ओऽम्) । (ओऽम्) शब्द में तीन अक्षर अ, उ तथा म् सम्मिलित हैं, जो क्रमशः ब्रह्मा अर्थात् सृष्टिकर्ता, [[विष्णु]] अर्थात् जगत् पालक और [[महेश]] अर्थात् संहारक की शक्तियों के द्योतक हैं। इन तीनों अक्षरों को [[ॠग्वेद]], [[सामवेद]] तथा [[यजुर्वेद]] से लिया गया है। संगीत के सात स्वर षड़ज (सा), ॠषभ (र), गांधार (गा) आदि वास्तव में ऊँ (ओऽम्) या ओंकार के ही अन्तविर्भाग हैं। साथ ही [[स्वर (संगीत)|स्वर]] तथा शब्द की उत्पत्ति भी ऊँ के गर्भ से ही हुई है। मुख से उच्चारित शब्द ही संगीत में नाद का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार 'ऊँ' को ही संगीत का जगत माना जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि जो साधक 'ऊँ' की साधना करने में समर्थ होता है, वही संगीत को यथार्थ रूप में ग्रहण कर सकता है। यदि दार्शनिक दृष्टि से इसका गूढ़ार्थ निकाला जाय, तो इसका तात्पर्थ यही है कि ऊँ अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि का एक अंश हमारी आत्मा में निहित है और संगीत उसी आत्मा की आवाज़ है, अंतः संगीत की उत्पत्ति हृदयगत भावों  में ही मानी जाती है। &lt;br /&gt;
====भारतीय संगीत के रूप==== &lt;br /&gt;
प्राचीन काल में भारतीय संगीत के दो रूप प्रचलित हुए-1. मार्गी तथा 2. देशी। कालातर में मार्गी संगीत लुप्त होता गया। साथ ही देशी संगीत्य दो रूपों में विकसित हुआ- (i) शास्त्रीय संगीत तथा (ii) लोक संगीत। शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारीत तथा विद्वानों व कलाकरों के अध्ययन व साधना का प्रतिफल था। यह अत्यंत नियमबद्ध तथा श्रेष्ठ संगीत था। दूसरी ओर लोक संगीत काल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा, अतः यह अधिक विविधतापूर्ण तथा हल्का-फुल्का व चित्ताकर्षक है।&lt;br /&gt;
====भारतीय संगीत के विविध अंग====&lt;br /&gt;
संगीत से सम्बंधित कुछ मूलभूत तथ्यों को जानकर ही संगीत की बारीकियों को समझा जा सकता है। [[ध्वनि]], [[स्वर (संगीत)|स्वर]], लय, ताल आदि इसके अन्तर्गत आते हैं।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot; width=100%&lt;br /&gt;
|+प्रमुख [[वाद्य यंत्र]] एवं कलाकार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! [[वाद्य यंत्र|वाद्य]]&lt;br /&gt;
! वादक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सितार]]&lt;br /&gt;
| [[पंडित रविशंकर]], [[निखिल बैनर्जी]], विलायत ख़ाँ, बंदे हसन, शाहिद परवेज, उमाशंकर मिश्र, बुद्धादित्य मुखर्जी आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[तबला]]&lt;br /&gt;
| [[अल्ला रक्खा ख़ाँ]], गुदई महाराज, (पं. सामता प्रसाद) [[उस्ताद ज़ाकिर हुसैन|ज़ाकिर हुसैन]], लतीफ़ ख़ाँ, किशन महाराज, फ़य्यार ख़ाँ, सुखविंदर सिंह आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बांसुरी]]&lt;br /&gt;
| [[पन्नालाल घोष]], हरि प्रसाद चौरसिया, वी. कुंजमणि, एन. नीला, राजेन्द्र प्रसन्ना, राजेन्द्र कुलकर्णी आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सरोद]]&lt;br /&gt;
| [[अमजद अली ख़ाँ]], [[अली अकबर ख़ाँ]], अलाउद्दीन ख़ाँ, विश्वजीत राय चौधरी, ज़रीन दारूवाला, बुद्धदेव दास गुप्ता, मुकेश शर्मा आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वायलिन]]&lt;br /&gt;
| डॉ. एन. राजन, विष्णु गोविंद जोग, एल. सुब्रह्मण्यम्, संगीता राजन, कुनक्कड़ी वैद्यनाथन, टी. एन. कृष्णन् आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वीणा]]&lt;br /&gt;
| एस. बालचंद्रन, कल्याण कृष्ण भागवतार, बदरूद्दीन डागर, वी. दोरेस्वामी अयंगर आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शहनाई]]&lt;br /&gt;
| [[बिस्मिल्ला ख़ाँ]], दयाशंकर जगन्नाथ, अली अहमद हुसैन ख़ाँ आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[संतूर]]&lt;br /&gt;
| [[शिवकुमार शर्मा]], भजन सोपारी आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|  [[पखावज]]&lt;br /&gt;
| गोपाल दास, उस्ताद रहमान ख़ाँ, छत्रपति सिंह, ठाकुर लक्ष्मण सिंह आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रुद्रवीणा&lt;br /&gt;
| असद अली ख़ाँ, उस्ताद सादिक अली ख़ाँ आदि।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मृदंग]]&lt;br /&gt;
| पालधार रघु, ठाकुर भीकम सिंह, डॉ. जगदीश सिंह आदि।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;नृत्य कला&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{main|नृत्य कला}}&lt;br /&gt;
भारत में [[नृत्य कला|नृत्य]] की अनेक शैलियाँ हैं। [[भरतनाट्यम]], [[ओडिसी]], [[कुचिपुड़ी]], [[कथकली]], [[मणिपुरी]], [[कथक]] आदि परंपरागत नृत्य शैलियाँ हैं तो [[भंगड़ा]], [[गिद्दा]], [[नगा]], [[बिहू नृत्य|बिहू]] आदि लोकप्रचलित नृत्य है। ये नृत्य शैलियाँ पूरे देश में विख्यात है। [[गुजरात]] का [[गरबा नृत्य|गरबा]] [[हरियाणा]] में भी मंचो की शोभा को बढ़ाता है और [[पंजाब]] का भंगड़ा [[दक्षिण भारत]] में भी बड़े शौक़ से देखा जाता है !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के संगीत को विकसित करने में [[अमीर ख़ुसरो]], [[तानसेन]], [[बैजू बावरा]] जैसे संगीतकारों का विशेष योगदान रहा है। आज भारत के संगीत-क्षितिज पर [[बिस्मिल्ला ख़ाँ‎]], [[ज़ाकिर हुसैन]], [[रवि शंकर]] समान रूप से सम्मानित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{नृत्य कला सूची2}}&lt;br /&gt;
==== &amp;lt;u&amp;gt;भारतीय मूर्तिकला&amp;lt;/u&amp;gt; ====&lt;br /&gt;
अन्य कलाओं के समान ही भारतीय मूर्तिकला भी अत्यन्त प्राचीन है। यद्यपि [[पाषाण काल]] में भी मानव अपने पाषाण उपकरणों को कुशलतापूर्वक काट-छाँटकर विशेष आकार देता था और पत्थर के टुकड़े से फलक निकालते हेतु 'दबाव' तकनीक या पटककर तोड़ने की तकनीक का इस्तेमाल करने लगा था, परन्तु भारत में मूर्तिकला अपने वास्तविक रूप में [[हड़प्पा सभ्यता]] के दौरान ही अस्तित्व में आई। इस सभ्यता की खुदाई में अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व ही भारत में मूर्ति निर्माण तकनीक के विकास का द्योतक हैं। भारतीय मूर्ति कला की प्रमुख शैलियाँ इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
#[[सिंधु घाटी सभ्यता]] की मूर्ति कला&lt;br /&gt;
#मौर्य मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#मौर्योत्तर मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#गान्धार कला की मूर्तियाँ&lt;br /&gt;
#मथुरा कला की मूर्तियाँ&lt;br /&gt;
#गुप्तकाल की मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#बाकाटक की मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#मध्यकाल की भारतीय मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#चोल मूर्तिकला&lt;br /&gt;
#आधुनिक मूर्तिकाल&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bodhisatva-maitray-kushan.jpg|thumb|180px|बोधिसत्व मैत्रेय]]&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha-3.jpg|thumb|140px|[[बुद्ध]], [[मथुरा]]]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==भारत के राज्यों की कला==&lt;br /&gt;
;असम &lt;br /&gt;
{{main|असम की कला}}&lt;br /&gt;
*[[कला]] और हस्तशिल्प से सम्बंधित कुटीर उद्योगों के लिए [[असम]] सदैव विख्यात रहा है।&lt;br /&gt;
*हथकरघा, रेशम, बेंत और [[बांस]] की वस्तुएं, गलीचों की बुनाई, काष्ठ शिल्प, पीतल आदि [[धातु|धातुओं]] के शिल्प प्रमुख कुटीर उद्योग हैं। &lt;br /&gt;
;गुजरात &lt;br /&gt;
{{main|गुजरात की कला}}&lt;br /&gt;
[[गुजरात]] की वास्तुकला शैली अपनी पूर्णता और अलंकारिकता के लिए विख्यात है, जो [[सोमनाथ]], [[द्वारका]], मोधेरा, थान, घुमली, गिरनार जैसे मंदिरों और स्मारकों में संरक्षित है। मुस्लिम शासन के दौरान एक अलग ही तरीक़े की भारतीय-इस्लामी शैली विकसित हुई। गुजरात अपनी [[कला]] व शिल्प की वस्तुओं के लिए भी प्रसिद्ध है। इनमें [[जामनगर]] की बांधनी (बंधाई और रंगाई की तकनीक), पाटन का उत्कृष्ट रेशमी वस्त्र पटोला, इदर के खिलौने, पालनपुर का इत्र कोनोदर का हस्तशिल्प का काम और [[अहमदाबाद]] व [[सूरत]] के लघु मंदिरों का काष्ठशिल्प तथा पौराणिक मूर्तियाँ शामिल हैं। &lt;br /&gt;
;गोवा &lt;br /&gt;
{{main|गोवा की कला}}&lt;br /&gt;
*[[गोवा]] राज्‍य को [[कला]] एवं संस्‍कृति निदेशालय द्वारा आईएसओ 9001-2000 प्रमाणपत्र दिया गया है। &lt;br /&gt;
*गोवा में टाइट अकादमी की स्‍थापना की गई है। &lt;br /&gt;
;तमिलनाडु &lt;br /&gt;
{{main|तमिलनाडु की कला}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] की एक प्रमुख [[शास्त्रीय नृत्य]] शैली भरतनाट्यम और कर्नाटक संगीत, दोनों का राज्य में व्यापक प्रचलन है। यद्यपि चित्रकला एवं मूर्तिकला कम विकसित है, फिर भी यहाँ पत्थर एवं कांसे की मूर्तियाँ बनाने की कला की शिक्षा के लिए विद्यालय हैं। तमिल साहित्य ने तेज़ी से लघु कथाओं व उपन्यासों के पश्चिमी साहित्यिक स्वरूप को अपनाया है। सुब्रहमण्यम सी. भारती (1882-1921) पारंपरिक तमिल कविता को आधुनिक बनाने वाले प्रारंभिक कवियों में एक थे। [[1940]] के दशक से चलचित्र जन मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम बना हुआ। यहाँ चलते-फिरते और स्थायी, दोनों प्रकार के सिनेमाघर हैं। भावनात्मक और भव्य फ़िल्मों, जिनमें प्रायः हल्का-फुल्का संगीत और नृत्य होता है, का निर्माण अधिकतर [[चेन्नई]] के आस-पास स्थित स्टूडियो में होता है। &lt;br /&gt;
;दिल्ली &lt;br /&gt;
{{main|दिल्ली की कला}}&lt;br /&gt;
'''वास्तुकला'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] के वैविध्यपूर्ण इतिहास ने विरासत में इसे समृद्ध वास्तुकला दी है। शहर के सबसे प्राचीन भवन सल्तनत काल के हैं और अपनी संरचना व अलंकरण में भिन्नता लिए हुए हैं। प्राकृतिक रुपाकंनों, सर्पाकार बेलों और क़ुरान के अक्षरों के घुमाव में हिन्दू राजपूत कारीगरों का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। मध्य एशिया से आए कुछ कारीगर कवि और वास्तुकला की सेल्जुक शैली की विशेषताएं मेहराब की निचली कोर पर कमल- कलियों की पंक्ति, उत्कीर्ण अलंकरण और बारी-बारी से आड़ी और खड़ी ईटों की चिनाई है। ख़िलज़ी शासन काल तक इस्लामी वास्तुकला में प्रयोग तथा सुधार का दौर समाप्त हो चुका था और इस्लामी वास्तुकला में एक विशेष पद्धति और उपशैली स्थापित हो चुकी थी जिसे [[पख़्तून]] शैली के नाम से जाना जाता है। इस शैली की अपनी लाक्षणिक विशेषताएं हैं। जैसे घोड़े के नाल की आकृति वाली मेहराबें, जालीदार खिड़कियां, अलंकृत किनारे बेल बूटों का काम (बारीक विस्तृत रूप रेखाओं में) और प्रेरणादायी, आध्यात्मिक शब्दांकन बाहर की ओर अधिकांशत: लाल पत्थरों का तथा भीतर सफ़ेद संगमरमर का उपयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
;पश्चिम बंगाल&lt;br /&gt;
{{main|पश्चिम बंगाल की कला}}&lt;br /&gt;
'''संगीत'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पारम्परिक [[संगीत]] भक्ति और सांस्कृतिक गीतों के रूप में है। [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर]] द्वारा लिखित एवं संयोजित ‘रबीन्द्र संगीत’, जिसे विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पारम्परिक लोकगीतों में पिरोया गया है, बंगालियों के सांस्कृतिक जीवन पर सशक्त प्रभाव छोड़ता है।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:कला]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%A4_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=250813</id>
		<title>तत वाद्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%A4_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=250813"/>
		<updated>2012-02-04T12:27:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: /* जंतर */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
जिन [[वाद्य यंत्र|वाद्यों]] को ताँत अथवा तार के संयोग से बजाया जाता है, उन्हें तत वाद्य कहते हैं। जैसे- [[वीणा]], [[सितार]], भपंग, [[इकतारा]], [[सारंगी]], तंदूरा, जंतर और [[रावण हत्था]], चिकारा, चौतारा, दोवारा, कामायचा सारंगी आते है।&lt;br /&gt;
इनका विवरण निम्न प्रकार है-&lt;br /&gt;
==इकतारा==&lt;br /&gt;
इसमें एक गोल तूम्बे में एक [[बाँस]] फँसा दिया जाता है। गोल तूम्बे के ऊपरी भाग को काट कर उस पर चमड़ा मढ़ देते हैं। बाँस के निचले भाग में छेद करके उसमें खूँटी लगा दी जाती है। इसी प्रकार एक खूँटी ऊपरी भाग में होती है। उन दोनों खूँटियों पर तार कस दिया जाता है। इस तार को उँगली से बजाते हैं। यह वाद्य नाथ, कालबेलिया एवं साधू- संन्यासी बजाते हैं।&lt;br /&gt;
==भपंग== &lt;br /&gt;
इसे कटे हुए तूम्बे से बनाया जाता है। तूम्बे के एक भाग पर चमढ़ा मढ़ दिया जाता है। चमड़े में एक छेद निकाल कर इसमें किसी जानवर की आँत का तार अथवा प्लास्टिक की डोरी डालकर उसके सिरे पर लकड़ी का टुकड़ा बाँध दिया जाता है। इस वाद्य को बजाने वाले व्यक्ति एक हाथ से डोरी या तार को खींच कर ढीला छोड़कर उस पर दूसरे हाथ से लकड़ी के टूकड़े से प्रहार करता है। यह अलवर क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है।&lt;br /&gt;
==सारंगी==&lt;br /&gt;
यह सागवान, कैर एवं रोहिड़ा नामक वृक्षों की जड़ से बनाई जाती है। राजस्थान में मीरासी, लंगे, जोगी, मांगणियार आदि कलाकार सारंगी के साथ गाते हैं। सारंगी की तार बकरे की आंत से बनाई जाती है। सारंगी को गज से बजाया जाता है। गज में घोड़े की पूँछ के बाल बंधे होते हैं। राजस्थान के जोगी लोक सारंगी पर लोक वार्ताओं को सुंदर ढंग से गाकर सुनाते हैं।&lt;br /&gt;
==तंदूरा==&lt;br /&gt;
इसे निशान, वेणां और चौतारा आदि नामों से भी जाना जाता है। यह लकड़ी से बनाया जाता है और सितार के समान होता है। किंतु इसकी कुंडी तूम्बे की नहीं होती बल्कि लकड़ी की बनी होती है। वादक इसे बाएँ हाथ से पकड़ता है और दाहिने हाथ से बजाता है। यह वाद्य एक उंगली से बजाया जाता है। कामड़ और नाथ सम्प्रदाय के व्यक्ति इस वाद्य को बजाते हैं। अधोर पंथी, आदिनाथ, बीसनामी, कुंडापंथी, दसनामी आदि व्यक्ति इसे बजाते हैं। तेरहताली नृत्य में भी इस वाद्य को बजाया जाता है।&lt;br /&gt;
==जंतर==&lt;br /&gt;
इस वाद्य यंत्र में वीणा के समान पाँच- छ: तार होते हैं। गूजर भोपे इसे गले में डाल कर खड़े होकर बजाते हैं। इस वाद्य यंत्र में वीणा के समान दो तूम्बे होते हैं और इनके बीच में बाँस की नली लगी रहती है। बगड़ावतों की कथा में इस वाद्य यंत्र को बजाया जाता है।&lt;br /&gt;
[[रावण हत्था]]- इसे आधे कटे नारियल की कटोरी से बनाया जाता है। नारियल की कटोरी पर खाल मढ़ दी जाती है। यह कटोरी बाँस के साथ लगी रहती है। बाँस में लगी खूँटियों पर तार बांध दिये जाते हैं। इसे [[वायलिन]] के समान गज से बजाया जाता है। रावणहत्था को राजस्थान में ढफ भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==डेरूँ==&lt;br /&gt;
इसका आकार डमरू से कुछ बड़ा होता है। इसका निर्माण आम की लकड़ी से किया जाता है तथा इसके दोनों तरफ चमड़ा मढ़ दिया जाता है। इसकी आवाज विशेष प्रकार की होती है। इसे बीच में से दाहिने हाथ से पकड़ते हैं तथा बजाते समय रस्सी को खींचते हैं। इस वाद्य के साथ- साथ कांसी का कटोरा भी बजाया जाता है। भोपे, भील और गोगाजी के पुजारी इसे बजाते हैं।&lt;br /&gt;
==खंजरी==&lt;br /&gt;
यह आम की लकड़ी से बनाई जाती है। यह चंग के समान होती है किंतु इसका आकार अपेक्षाकृत छोटी होता है। चंग के समान इस पर भी चमड़ा मढ़ दिया जाता है। इसे दाहिने हाथ से पकड़ते हैं तथा बायें हाथ से बजाते हैं। इसकी आवाज ढोलक के समान होती है। यह कामड़ भील, कालबेलियों के द्वारा बजाई जाती है।&lt;br /&gt;
==डमरू==&lt;br /&gt;
इसे भगवान शिव का वाद्य माना जाता है। इसे बीच में से पकड़ कर बजाया जाता है। इसके दोनों ओर चमड़ा मढ़ा हुआ होता है। डमरू प्राय: मदारी लोग बजाते हैं। इसके साथ बाँसुरी भी बजाई जाती है। डमरू का घेरा प्राय: लकड़ी से बनाया जाता है।&lt;br /&gt;
==मांदल==&lt;br /&gt;
मांदल की आकृति मृदंग के समान होती है किंतु यह मिट्टी से बनाई जाती है। इसे शिव- गौरी का वाद्य यंत्र माना जाता है। इसके दोनों ओर हिरण या बकरे की खाल मढ़ दी जाती है। गौरी नृत्य में प्राय: मांदल वाद्य का ही प्रयोग किया जाता है। भाट तथा भील लोग इसे बजाया करते हैं थाली भी इसके साथ बजाई जाती है।&lt;br /&gt;
==मृदंग==&lt;br /&gt;
यह सुपारी, बड़, सबन आदि वृक्षों की लकड़ी से बनाई जाती है। इसका एक मुँह चौड़ा और दूसरा सकड़ा होता है। इसके दोनों मुँह बकरे की खाल मढ़ दी जाती है। इसके एक मुँह को नर और दूसरे मुँह को नारी कहा जाता है। इस वाद्य यंत्र का उपयोग प्राय: मंदिरों में किया जाता है।&lt;br /&gt;
==ताशा==&lt;br /&gt;
इसकी आकृति एक चपेट और पतले नगाड़े के समान होती है। इसका पैंदा ताँबे का होता है। इसके ऊपर बकरे का चमढ़ा मढ़ दिया जाता है। इसे पतली बाँस की लकड़ियों से बजाया जाता है। इस वाद्य का प्रयोग प्राय:  जुलूस तथा विवाह आदि अवसरों पर किया जाता है। ताशे एवं झांझ का मेल माना जाता है। मुसलमानों के त्योहार- ताजिये के अवसर पर इसे विशेष रूप से बजाया जाता है।&lt;br /&gt;
==नौबत==&lt;br /&gt;
धातु की लगभग 4 फीट गहरी अर्द्ध अण्डाकार कुण्डली को भैंस की खाल से मढ़ दिया जाता है। इसे चमड़े की डोरियों से कस दिया जाता है। इस वाद्य को लकड़ी के डंडो से बजाया जाता है। इसकी आवाज बहुत तेज होती है। प्राचीन काल में यह वाद्य युद्ध के समय बजाया जाता था। वर्तमान में इसका उपयोग प्राय: मंदिरों में किया जाता है।&lt;br /&gt;
==नगाड़ा==&lt;br /&gt;
यह नौबत के आकार का लेकिन इसकी अपेक्षा छोटा होता है। नगाड़ा प्राय: छोटा या बड़ा होता है। छोटे नगाड़े के साथ एक नगाड़ी भी होती है। इन दोनों को साथ बजाया जाता है। लोक नाट्यों में शहनाई के साथ- साथ नगाड़े का भी प्रयोग किया जाता है। नगाड़े को नकाड़ा, नगारा, नवकारा, बम और टामक भी कहा जाता है। यह वाद्य यंत्र प्राचीनकाल में युद्ध के समय बजाया जाता था। इसे लकड़ी के डंडों से बजाया जाता है। इसका प्रयोग गींदड नृत्य के समय भी किया जाता है। शेखावटी क्षेत्र में राणा और मीरासी लोग इसे बजाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]][[Category:संगीत कोश]][[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A5%82_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C&amp;diff=250812</id>
		<title>बिरजू महाराज</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A5%82_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C&amp;diff=250812"/>
		<updated>2012-02-04T12:27:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: /* शास्त्रीय गायक व वादक */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Birju-Maharaj-2.jpg|thumb|बिरजू महाराज&amp;lt;br /&amp;gt; Birju Maharaj]]&lt;br /&gt;
बिरजू महाराज (जन्म: 4 फ़रवरी 1938) का पूरा नाम '''बृज मोहन मिश्रा''' है। बिरजू महाराज [[नृत्य कला|भारतीय नृत्य]] की '[[कथक नृत्य|कथक]]' शैली के आचार्य और [[लखनऊ]] के कालका – बिंदादीन घराने के एक मुख्य प्रतिनिधि हैं।&lt;br /&gt;
==प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
पिता गुरु अच्छन महाराज की मृत्यु के पश्चात उनके चाचाओं, सुप्रसिद्ध आचार्यो 'शंभू' और 'लच्छू' महाराज ने उन्हें प्रशिक्षित किया। &lt;br /&gt;
==प्रथम प्रस्तुति और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
16 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी प्रथम प्रस्तुति दी और 28 वर्ष की उम्र में कत्थक में उनकी निपुणता ने उन्हें [[संगीत नाटक अकादमी]] का प्रतिष्ठित पुरस्कार दिलवाया।&lt;br /&gt;
==शैली==&lt;br /&gt;
अपनी परिशुद्ध ताल और भावपूर्ण अभिनय के लिये प्रसिद्ध बिरजू महाराज ने एक ऐसी शैली विकसित की है, जो उनके दोनों चाचाओं और पिता से संबंधित तत्वों को सम्मिश्रित करती है। वह पदचालन की सूक्ष्मता और मुख व गर्दन के चालन को अपने पिता से और विशिष्ट चालों (चाल) और चाल के प्रवाह को अपने चाचाओं से प्राप्त करने का दावा करते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Birju-Maharaj.jpg|thumb|left|बिरजू महाराज&amp;lt;br /&amp;gt; Birju Maharaj]]&lt;br /&gt;
==नवीन प्रयोग==&lt;br /&gt;
बिरजू महाराज ने राधाकृष्ण अनुश्रुत प्रसंगों के वर्णन के साथ विभिन्न अपौराणिक और सामाजिक विषयों पर स्वंय को अभिव्यक्त करने के लिये नृत्य की शैली में नूतन प्रयोग किये हैं। उन्होंने कथक शैली में नृत्य रचना, जो पहले भारतीय नृत्य शैली में एक अनजाना तत्त्व था, को जोड़कर उसे आधुनिक बना दिया है और नृत्य नाटिकाओं को प्रचलित किया है।&lt;br /&gt;
==शास्त्रीय गायक व वादक==&lt;br /&gt;
बिरजू महाराज एक निपुण गायक भी हैं और ठुमरी तथा दादरा (शास्त्रीय गायन के प्रकार) का उनका गायन सराहा गया है। वह [[नाद]], [[तबला]] और [[वायलिन]] बजाते हैं। उन्होंने [[सत्यजित राय]] द्वारा निर्देशित फ़िल्म शंतरंज के खिलाड़ी में दो शास्त्रीय नृत्य दृश्यों के लिये संगीत रचा और गायन भी किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पद्मविभूषण==&lt;br /&gt;
गत वर्षो में उन्होंने व्यापक रूप से भ्रमण किया है और कई प्रस्तुतियां व प्रदर्शन व्याख्यान दिए हैं। बिरजू महाराज को [[भारत]] सरकार द्वारा प्रदत्त [[पद्मविभूषण]] सहित अनेक पुरस्कार मिले हैं।    &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[http://www.birjumaharaj-kalashram.com/main.asp आधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म विभूषण]]&lt;br /&gt;
[[Category:गायक और नर्तक]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B2_%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B3%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%82&amp;diff=250811</id>
		<title>चौदिया मेमोरियल बेंगळूरू</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B2_%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B3%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%82&amp;diff=250811"/>
		<updated>2012-02-04T12:27:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''चौदिया मेमोरियल''' [[कर्नाटक]] के [[बेंगळूरू]] शहर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*चौदिया मेमोरियल गायत्री देवी पार्क एक्सटेंशन पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*चौदिया मेमोरियल हॉल का निर्माण [[वायलिन]] के आकार में किया गया है। &lt;br /&gt;
*कर्नाटक के प्रसिद्ध सांरगी आचार्य टी.चौदिया की मृत्यु के बाद इस जगह का नाम उनके नाम पर रखा गया। &lt;br /&gt;
*विभिन्न उद्देश्यों से बने इस वातानुकूलित हॉल में विशेष रूप से परम्परागत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। &lt;br /&gt;
*ऐसा माना जाता है कि यह इमारत पूरे विश्‍व में [[संगीत]] [[वाद्य]] के आकार में बना पहला इमारत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कर्नाटक के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:कर्नाटक]]&lt;br /&gt;
[[Category:कर्नाटक के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बेंगळूरू]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3_%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=250809</id>
		<title>रावण हत्था</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3_%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=250809"/>
		<updated>2012-02-04T12:26:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:ravan-hatta.jpg|thumb]]&lt;br /&gt;
;रावण हत्था / रावण हस्त वीणा या रावणास्त्रम / Ravanastron&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रावण हत्था प्रमुख रूप से [[राजस्थान]] और [[गुजरात]]  में प्रयोग में लाया जाता रहा है। यह राजस्थान का एक लोक वाद्य है। पौराणिक साहित्य और [[हिन्दू]] परम्परा की मान्यता है कि ईसा से 3000 वर्ष पूर्व लंका के राजा [[रावण]] ने इसका आविष्कार किया था और आज भी यह चलन में है। रावण के ही नाम पर इसे रावण हत्था या रावण हस्त वीणा कहा जाता है। यह संभव है कि वर्तमान में इसका रूप कुछ बदल गया हो लेकिन इसे देखकर ऐसा लगता नहीं है। कुछ लेखकों द्वारा इसे [[वायलिन]] का पूर्वज भी माना जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे धनुष जैसी मींड़ और लगभग डेढ़-दो इंच व्यास वाले बाँस से बनाया जाता है। एक अधकटी सूखी लौकी या नारियल के खोल पर पशुचर्म अथवा साँप के केंचुली को मँढ़ कर एक से चार संख्या में तार खींच कर बाँस के लगभग समानान्तर बाँधे जाते हैं। यह मधुर ध्वनि उत्पन्न करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://violin.koopal.com/violin-history.htm वायलिन का इतिहास (अंग्रेज़ी)]&lt;br /&gt;
*[http://chandrakantha.com/articles/indian_music/ravanhastra.html रावणास्त्र (अंग्रेज़ी)]&lt;br /&gt;
*[http://encyclopedia.jrank.org/PYR_RAY/RAVANASTRON.html रावणास्त्रम (अंग्रेज़ी)]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=5nDvRvuTjQ0&amp;amp;feature=player_embedded यू ट्यूब लिंक]&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=kDn9KYZTzfk&amp;amp;feature=player_embedded यू ट्यूब लिंक]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
{{भूले बिसरे शब्द}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूला-बिसरा भारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3&amp;diff=250808</id>
		<title>रावण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3&amp;diff=250808"/>
		<updated>2012-02-04T12:26:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-2.jpg|thumb|250px|दशानन रावण, [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana, Ramlila, Mathura]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
रावण [[रामायण]] का एक विशेष पात्र है। रावण [[लंका]] का राजा था। वह अपने दस सिरों के कारण भी जाना जाता था (साधारण से दस गुणा अधिक मस्तिष्क शक्ति), जिसके कारण उसका नाम दशानन (दश(दस) + आनन(मुख)) भी था। किसी भी कृति के लिये अच्छे पात्रों के साथ ही साथ बुरे पात्रों का होना अति आवश्यक है। किन्तु रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। जीतने वाला हमेशा अपने को उत्तम लिखता है, अतः रावण को बुरा कहा गया है। रावण को चारों [[वेद|वेदों]] का ज्ञाता कहा गया है। संगीत के क्षेत्र में भी रावण की विद्वता अपने समय में अद्वितीय मानी जाती है। वीणा बजाने में रावण सिद्धहस्त था। उसने एक वाद्य बनाया भी था जिसे जो आज के बेला या [[वायलिन]] का ही मूल और प्रारम्भिक रूप है। इस वाद्य को [[रावण हत्था]] कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तथ्य==&lt;br /&gt;
*रावण [[शिव]] भक्त था। [[कैलाश पर्वत]] को उठाने की कथा की मूर्ति [[मथुरा]] में मिली है।&lt;br /&gt;
*रामकथा में रावण ऐसा पात्र है, जो [[राम]] के उज्ज्वल चरित्र को उभारने का काम करता है। &lt;br /&gt;
*रावण ने राम की पत्नी [[सीता]] का हरण किया था। राम ने रावण को युद्ध में मार कर सीता को छुड़ाया।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
रावण रामायण का एक विशेष पात्र है। किसी भी कृति के लिये अच्छे पात्रों के साथ ही साथ बुरे पात्रों का होना अति आवश्यक है। किन्तु रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। यदि रावण न होता तो रामायण की रचना भी न हो पाती। देखा जाये तो रामकथा में रावण ही ऐसा पात्र है, जो राम के उज्वल चरित्र को उभारने काम करता है।&lt;br /&gt;
==रावण का उदय==&lt;br /&gt;
[[पद्म पुराण]], [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत पुराण]], [[कूर्म पुराण]], [[रामायण]], [[महाभारत]], [[आनन्द रामायण]], [[दशावतारचरित]] आदि ग्रंथों में रावण का उल्लेख हुआ है। रावण के उदय के विषय में भिन्न-भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उल्लेख मिलते हैं।&lt;br /&gt;
*पद्मपुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार [[हिरण्याक्ष]] एवं [[हिरण्यकशिपु]] दूसरे जन्म में रावण और [[कुंभकर्ण]] के रूप में पैदा हुए।&lt;br /&gt;
*[[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार रावण [[पुलस्त्य]] मुनि का पोता था अर्थात उनके पुत्र [[विश्वश्रवा]] का पुत्र था। विश्वश्रवा की [[वरवर्णिनी]] और [[कैकसी]] नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के [[कुबेर]] को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने कुबेला में गर्भ धारण किया। इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा [[कुम्भकर्ण]] जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुये।&lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास]] जी के [[रामचरितमानस]] में रावण का जन्म शाप के कारण हुआ था। वे [[नारद]] एवं प्रताप भानु की कथाओं को रावण के जन्म कारण बताते हैं।&lt;br /&gt;
==रावण के गुण==&lt;br /&gt;
*रावण में कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण तथा [[शंकर]] भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।&lt;br /&gt;
*[[वाल्मीकि]] उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में [[हनुमान]] का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आगे वे लिखते हैं &amp;quot;रावण को देखते ही [[राम]] मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्व लक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।&amp;quot;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-9.jpg|thumb|250px|left|रावण दहन, [[रामलीला]], [[मथुरा]]]]&lt;br /&gt;
*रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी [[सीता]] से रावण ने कहा है, &amp;quot;हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।&amp;quot; शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।&lt;br /&gt;
*वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।&lt;br /&gt;
==रावण के अवगुण==&lt;br /&gt;
*वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं। उनके रामायण में रावण के वध होने पर [[मंदोदरी]] विलाप करते हुये कहती है, &amp;quot;अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ-तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास]] जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठ पूर्वक बैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा। &lt;br /&gt;
==रावण द्वारा भगवान शिव की प्रार्थना==  &lt;br /&gt;
रावण सत्ता के मद में उच्छृंखल होकर देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वों को विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगा। एक बार उसने कुबेर पर चढ़ाई करके उसे युद्ध में पराजित कर दिया और अपनी विजय की स्मृति के रूप में कुबेर के [[पुष्पक विमान]] पर अपना अधिकार कर लिया। पुष्पक विमान का वेग मन के समान तीव्र था। वह अपने ऊपर बैठे हुए लोगों को इच्छानुसार छोटा या बड़ा रूप धारण कर सकता था। पुष्पक विमान में मणि और सोने की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और तपाये हुये सोने के आसन बने हुए थे। उस विमान पर बैठकर जब वह 'शरवण' नाम से प्रसिद्ध सरकण्डों के विशाल वन से होकर जा रहा था तो भगवान शंकर के पार्षद नन्दीश्‍वर ने उसे रोकते हुए कहा कि दशग्रीव! इस वन में स्थित पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा करते हैं, इसलिये यहाँ सभी सुर, असुर, यक्ष आदि का आना निषिद्ध कर दिया गया है। नन्दीश्‍वर के वचनों से क्रोद्धित होकर रावण विमान से उतरकर भगवान शंकर की ओर चला। रावण को रोकने के लिये उससे थोड़ी दूर पर हाथ में शूल लिये नन्दी दूसरे शिव की भाँति खड़े हो गये। उनका मुख वानर जैसा था। उसे देखकर रावण ठहाके मारकर हँस पड़ा। इससे कुपित हो नन्दी बोले कि दशानन! तुमने मेरे वानर रूप की अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारे कुल का नाश करने के लिये मेरे ही समान पराक्रमी रूप और तेज से सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे। रावण ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और बोला कि जिस पर्वत ने मेरे विमान की यात्रा में बाधा डाली है, आज मैं उसी को उखाड़ फेंकूँगा। यह कहकर उसने पर्वत के निचले भाग में हाथ डालकर उसे उठाने का प्रयत्न किया। जब पर्वत हिलने लगा तो भगवान शंकर ने उस पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। इससे रावण का हाथ बुरी तरह से दब गया और वह पीड़ा से चिल्लाने लगा। जब रावण किसी प्रकार से हाथ न निकाल सका तो रोत-रोते [[शिव|भगवान शंकर]] की स्तुति और क्षमा प्रार्थना करने लगा। उस दिन से दशग्रिव दशानन का नाम रावण पडगया रख दिया। इस पर भगवान शंकर ने उसे क्षमा कर दिया और उसकी प्रार्थान करने पर उसे एक चन्द्रहास नामक खड्ग भी दिया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravan-Abode-At-Lanka.jpg|thumb|250px|रावण की सोने की लंका]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रावण के दस सिर==&lt;br /&gt;
रावण के दस सिर होने की चर्चा [[रामायण]] में आती है। वह [[कृष्ण पक्ष|कृष्णपक्ष]] की [[अमावस्या]] को युद्ध के लिये चला था तथा एक-एक दिन क्रमशः एक-एक सिर कटते हैं। इस तरह दसवें दिन अर्थात [[शुक्लपक्ष]] की दशमी को रावण का वध होता है। [[रामचरितमानस]] में यह भी वर्णन आता है कि जिस सिर को राम अपने [[बाण अस्त्र|बाण]] से काट देते हैं पुनः उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। विचार करने की बात है कि क्या एक [[अंग]] के कट जाने पर वहाँ पुनः नया अंग उत्पन्न हो सकता है? वस्तुतः रावण के ये सिर कृत्रिम थे- आसुरी माया से बने हुये। [[मारीच]] का चाँदी के बिन्दुओं से युक्त स्वर्ण मृग बन जाना, रावण का [[सीता]] के समक्ष [[राम]] का कटा हुआ सिर रखना आदि से सिद्ध होता है कि राक्षस मायावी थे। वे अनेक प्रकार के इन्द्रजाल (जादू) जानते थे। तो रावण के दस सिर और बीस हाथों को भी कृत्रिम माना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रवण के द्वारा अत्याचार==&lt;br /&gt;
एक दिन जब रावण [[हिमालय]] के प्रदेश में भ्रमण कर रहा था, तब उसने अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि कुशध्वज की कन्या वेदवती को तपस्या करते देखा। रावण उसे देखकर वहीं मुग्ध हो गया और उसके पास आकर उसका परिचय लिया और अविवाहित रहने का कारण पूछा। वेदवती ने अपना परिचय देने के बाद बताया कि मेरे पिता विष्णु से मेरे विवाह करना चाहते थे। इससे क्रोद्धित होकर मेरी कामना करने वाले दैत्यराज शम्भु ने विष्णु का सोते समय वध कर दिया। उनकी मृत्यु पर मेरी माता भी दुःखी हो गई और चिता में प्रविष्ट हो गई। तब से मैं अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिये भगवान [[विष्णु]] की तपस्या कर रही हूँ। उन्हीं को मैंने अपना पति मान लिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहले रावण ने वेदवती को बातों में फुसलाने की कोशिश की, फिर उसने जबरदस्ती करने के लिये उसके केश पकड़ लिए। वेदवती ने रावण द्वारा पकड़े हुए केश को काट दिया।  फिर यह कहती हुई [[अग्नि]] में प्रविष्ट हो गई कि दुष्ट! तूने मेरा अपमान किया है। इस समय तो मैं यह शरीर त्याग रही हूँ, परन्तु तेरा विनाश करने के लिए फिर जन्म लूँगी। अगले जन्म में वह अयोनिजा कन्या के रूप में जन्म लेकर किसी धर्मात्मा की पुत्री बनी। वह कन्या कमल के रूप में उत्पन्न हुई। उस सुन्दर कान्ति वाली कमल कन्या को एक दिन रावण अपने महलों में ले आया। उसे देखकर ज्योतिषियों ने कहा कि राजन्! यदि यह कमल कन्या आपके घर में रही तो आपके और आपके कुल के विनाश का कारण बनेगी। यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। वहाँ से वह भूमि को प्राप्त होकर राजा [[जनक]] के यज्ञमण्डप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुँची। वहाँ राजा द्वारा हल से जोती जाने वाली भूमि से वह कन्या फिर प्राप्त हुई। वही वेदवती [[सीता]] के रूप में राम की पत्‍नी बनी और अंत में सीता ही रावण के कुल के विनाश का कारण बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहस्रकिरण की कथा==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|सहस्रकिरण}}&lt;br /&gt;
*एक बार राजा सहस्रकिरण अपनी रानियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था।&lt;br /&gt;
*उसने जलयंत्र लगाकर पानी रोका हुआ था।&lt;br /&gt;
*उसी नदी के तट पर रावण जिनेश्वर देव की प्रतिमाओं की स्वर्ण सिंहासन पर प्रतिष्ठा करके पूजा कर रहा था।&lt;br /&gt;
*क्रीड़ा के उपरान्त सहस्रकिरण ने यंत्रों से रोका हुआ जल छोड़ दिया तो किनारे पर बाड़-सी आ गई, जिससे रावण की पूजा में व्यवधान पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवताण्डवस्तोत्रम्==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background-color:#FFFCF0;border:1px solid black; padding:10px;&amp;quot; valign=&amp;quot;top&amp;quot; |&lt;br /&gt;
जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् .. 1..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जटा-कटा-हसं-भ्रम भ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. 2..&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धरा-धरेन्द्र-नंदिनी विलास-बन्धु-बन्धुर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि .. 3..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्फणा-मणि प्रभा&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कदम्ब-कुङ्कुम-द्रव प्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि .. 4..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहस्र लोचन प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठभूः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
भुजङ्गराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः .. 5..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
निपीत-पञ्च-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः .. 6..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम … 7..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः .. 8..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे .. 9..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अखर्व सर्व-मङ्ग-लाकला-कदंबमञ्जरी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे .. 10..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजङ्ग-मश्वस-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः .. 11..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. 12..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुञ्ज-कोटरे वसन्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
शिवेति मन्त्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. 13..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम्&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. 14..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. 15..&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-12.jpg|रावण, [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Sita-Haran-Ramlila-Mathura-5.jpg|[[सीता]] हरण, [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kidnapping of Sita, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-7.jpg|[[राम]] रावण युद्ध [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ram Ravana Battle, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-8.jpg|रावण दहन, [[रामलीला]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana Dahan, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रामायण}}{{पौराणिक चरित्र}} &lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक चरित्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] [[Category:प्रसिद्ध चरित्र और मिथक कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=250806</id>
		<title>साँचा:संगीत वाद्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=250806"/>
		<updated>2012-02-04T12:24:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Navbox&lt;br /&gt;
|name=संगीत वाद्य &lt;br /&gt;
|title =[[:श्रेणी:संगीत वाद्य|संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
|titlestyle =background:#eacea4;&lt;br /&gt;
|groupstyle =background:#ceb792;&lt;br /&gt;
|liststyle =padding-left:5px; padding-right:5px; background:#eddcc2;&lt;br /&gt;
|listpadding=0.5em 0em;&lt;br /&gt;
|image=&lt;br /&gt;
|imagestyle=background:#eddcc2;&lt;br /&gt;
|imageleft =&lt;br /&gt;
|imageleftstyle=&lt;br /&gt;
|style =background:white&lt;br /&gt;
|basestyle= &lt;br /&gt;
|navbar=&lt;br /&gt;
|above=&lt;br /&gt;
|abovestyle=&lt;br /&gt;
|state=&amp;lt;includeonly&amp;gt;uncollapsed&amp;lt;/includeonly&amp;gt;&lt;br /&gt;
|oddstyle=&lt;br /&gt;
|evenstyle=&lt;br /&gt;
|group1 =&lt;br /&gt;
|group1style=&lt;br /&gt;
|list1 =&lt;br /&gt;
[[ग्रामोफ़ोन]] '''·''' [[ज़ाइलोफ़ोन]] '''·''' [[झांझ]] '''·''' [[ढोलक]] '''·''' [[तबला]] '''·''' [[तानपुरा]] '''·''' [[धमार]] '''·''' [[ध्रुपद]] '''·''' [[नगाड़ा]] '''·''' [[बाँसुरी]] '''·''' [[मंझीरा]] '''·''' [[मृदंग]] '''·''' [[सितार]] '''·''' [[घटम]] '''·''' [[शहनाई]] '''·''' [[हारमोनियम]] '''·''' [[डफ]] '''·''' [[करताल]] '''·''' [[तत वाद्य|तत]] '''·''' [[सुषिर वाद्य|सुषिर]] '''·''' [[आनद्ध वाद्य|आनद्ध]] '''·''' [[घन वाद्य|घन]] '''·''' [[सारंगी]] '''·''' [[सारिंदा]] '''·''' [[वीणा]] '''·''' [[विचित्र वीणा]] '''·''' [[खरताल]] '''·''' [[घण्टा]] '''·''' [[डमरू]] '''·''' [[रावण हत्था]] '''·''' [[खाल वाद्य]] '''·''' [[ताल वाद्य]] '''·''' [[फूँक वाद्य]] '''·''' [[हिन्दुस्तानी संगीत]] '''·''' [[नादस्वरम]] '''·''' [[अलगोजा]] '''·''' [[संतूर]] '''·''' [[पखावज]] '''·''' [[सरोद]] '''·''' [[एकतारा]] '''·''' [[वायलिन]]&lt;br /&gt;
|list1style=&lt;br /&gt;
|group2 =&lt;br /&gt;
|group2style=&lt;br /&gt;
|list2 =&lt;br /&gt;
|group3=&lt;br /&gt;
|group3style=&lt;br /&gt;
|list3=&lt;br /&gt;
|list3style=&lt;br /&gt;
|group4=&lt;br /&gt;
|group4style=&lt;br /&gt;
|list4=&lt;br /&gt;
|list4style=&lt;br /&gt;
|group5=&lt;br /&gt;
|group5style=&lt;br /&gt;
|list5 =&lt;br /&gt;
|list5style=&lt;br /&gt;
|group6=&lt;br /&gt;
|group6style=&lt;br /&gt;
|list6=&lt;br /&gt;
|list6style=&lt;br /&gt;
|group7=&lt;br /&gt;
|group7style=&lt;br /&gt;
|list7=&lt;br /&gt;
|list7style=&lt;br /&gt;
|group8=&lt;br /&gt;
|group8style=&lt;br /&gt;
|list8=&lt;br /&gt;
|list8style=&lt;br /&gt;
|group9=&lt;br /&gt;
|group9style=&lt;br /&gt;
|list9=&lt;br /&gt;
|list9style=&lt;br /&gt;
|group10=&lt;br /&gt;
|group10style=&lt;br /&gt;
|list10 =&lt;br /&gt;
|list10style=&lt;br /&gt;
|group11=&lt;br /&gt;
|group11style=&lt;br /&gt;
|list11=&lt;br /&gt;
|list11style=&lt;br /&gt;
|group12=&lt;br /&gt;
|group12style=&lt;br /&gt;
|list12=&lt;br /&gt;
|list12style=&lt;br /&gt;
|group13=&lt;br /&gt;
|group13style=&lt;br /&gt;
|list13=&lt;br /&gt;
|list13style=&lt;br /&gt;
|group14=&lt;br /&gt;
|group14style=&lt;br /&gt;
|list14=&lt;br /&gt;
|list14style=&lt;br /&gt;
|group15=&lt;br /&gt;
|group15style=&lt;br /&gt;
|list15 =&lt;br /&gt;
|list15style=&lt;br /&gt;
|group16=&lt;br /&gt;
|group16style=&lt;br /&gt;
|list16=&lt;br /&gt;
|list16style=&lt;br /&gt;
|group17=&lt;br /&gt;
|group17style=&lt;br /&gt;
|list17=&lt;br /&gt;
|list17style=&lt;br /&gt;
|group18=&lt;br /&gt;
|group18style=&lt;br /&gt;
|list18=&lt;br /&gt;
|list18style=&lt;br /&gt;
|group19=&lt;br /&gt;
|group19style=&lt;br /&gt;
|list19=&lt;br /&gt;
|list19style=&lt;br /&gt;
|group20=&lt;br /&gt;
|group20style=&lt;br /&gt;
|list20=&lt;br /&gt;
|list20style=&lt;br /&gt;
|below=&lt;br /&gt;
|belowstyle=&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:संगीत के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Violin.jpg&amp;diff=250805</id>
		<title>चित्र:Violin.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Violin.jpg&amp;diff=250805"/>
		<updated>2012-02-04T12:24:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[वायलिन]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/7147684@N03/ Jason Hollinger]&lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/7147684@N03/921738874/ Violin]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/7147684@N03/ pellaea's photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=वायलिन एक [[वाद्य यंत्र]] है। वायलिन शायद सबसे प्रसिद्ध तथा विश्व में व्यापक रूप से फैला वाद्य यंत्र है। अपने पूर्ववर्तियों के समान, लेकिन अपने संबंधी वायॅल की तरह नहीं, वायलिन में पर्दाविहीन उंगलीपटल होता है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{चयनित चित्र नोट}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial= &lt;br /&gt;
|Share Alike= &lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{चयनित चित्र}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4&amp;diff=250804</id>
		<title>संगीत</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4&amp;diff=250804"/>
		<updated>2012-02-04T12:23:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: /* संगीत की उत्पत्ति */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Folk.jpg|thumb|250px|लोक गीत कलाकार, [[दिल्ली]]]]&lt;br /&gt;
संगीत मानवीय लय एवं तालबद्ध अभिव्यक्ति है। भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए जाना जाता है। वर्तमान भारतीय संगीत का जो रूप दृष्टिगत होता है, वह आधुनिक युग की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के प्रारम्भ के साथ ही जुड़ा हुआ है। वैदिक काल में ही भारतीय संगीत के बीज पड़ चुके थे। [[सामवेद]] उन वैदिक ॠचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। प्राचीन काल से ही ईश्वर आराधना हेतु भजनों के प्रयोग की परम्परा रही है। यहाँ तक की यज्ञादि के अवसर पर भी समूहगान होते थे। ध्यान देने की बात है कि प्राचीन काल की अन्य [[कला|कलाओं]] के समान ही भारतीय कला भी [[धर्म]] से प्रभावित थी। वास्तव में भारतीय संगीत की उत्पत्ति धार्मिक प्रेरणा से ही हुई है। परन्तु धीरे-धीरे यह धर्म को तोड़कर लौकिक जीवन से संबन्धित होती गई और इसी के साथ [[नृत्य कला]], वाद्य तथा गीतों के नये-नये रूपों का आविष्कार होता गया। कालांतर में नाट्य भी संगीत का एक हिस्सा बन गया। समय के साथ संगीत की विभिन्न धाराएँ विकसित होती गई, नये-नये [[राग]], नये-नये [[वाद्य यंत्र]] और नये-नये कलाकार उत्पन्न होते गये। भारतीय संगीत जगत अनेक महान विभूतियों के योगदानों के परिणामस्वरूप ही इतना विशाल रूप धारण कर सका है।&lt;br /&gt;
;संगीत क्या है?&lt;br /&gt;
इस प्रश्न का उत्तर भारतीय संगीतकारों ने विविध रूप से देने का प्रयास किया है। 'संगीत रत्नाकर' के अनुसार '''गीतं वाद्य तथा नृत्य त्रयं सगीतमुच्यते''' - अर्थात् गीत, वाद्य और नृत्य - इन तीनों का समुच्चय ही संगीत है। परन्तु भारतीय संगीत का अध्ययन करने पर यह आभास होता है कि इन तीनों में गीत की ही प्रधानता रही है तथा वाद्य और नृत्य गीत के अनुगामी रहे हैं। एक अन्य परिभाषा के अनुसार, '''सम्यक् प्रकारेण यद् गीयते तत्संगीतम्''' - अर्थात् सम्यक् प्रकार से जिसे गाया जा सके वही संगीत है। अन्य शब्दों में [[स्वर (संगीत)|स्वर]], [[ताल]], शुद्ध, आचरण, हाव-भाव और शुद्ध मुद्रा के गेय विषय ही संगीत है। वास्तव में स्वर और लय ही संगीत का अर्थात् गीत, वाद्य और नृत्य का आधार है। &lt;br /&gt;
==संगीत की परिभाषा==&lt;br /&gt;
'''संगीत वह ललित [[कला]] है, जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं'''। प्रत्येक कला जैसे संगीत, [[मूर्तिकला]], [[चित्रकला]], वास्तुकला में मानव भावनाओं को व्यक्त तो करते हैं, परन्तु प्रत्येक में उसका माध्यम बदला करता है। अगर [[रंग]], पैन्सिल, [[काग़ज़]] आदि के द्वारा भावों को व्यक्त करते हैं तो चित्रकला की रचना होती है। इसी प्रकार यदि स्वर-लय के द्वारा अपने भावों को प्रकट करते हैं तो संगीत की रचना होती है।&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
'संगीत' शब्द 'गीत' शब्द में 'सम्' उपसर्ग लगाकर बना है। 'सम्' यानी 'सहित' और 'गीत' यानी 'गान'। 'गान के सहित' अर्थात् अंगभूत क्रियाओं (नृत्य) व वादन के साथ किया हुआ कार्य 'संगीत' कहलाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नृत्तं वाद्यानुगं प्रोक्तं वाद्यं गीतानुवर्ति च।&lt;br /&gt;
अतो गीतं प्रधानत्वादत्रादाभिधीयते।।&amp;lt;ref&amp;gt;संगीत रत्नाकर 1|24-25&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भारतीय संगीत== &lt;br /&gt;
प्राचीन काल में भारतीय संगीत के दो रूप प्रचलित हुए-1. मार्गी तथा 2. देशी। कालांतर में मार्गी संगीत लुप्त होता गया। साथ ही देशी संगीत दो रूपों में विकसित हुआ- (i) शास्त्रीय संगीत तथा (ii) लोक संगीत। &lt;br /&gt;
*'''शास्त्रीय संगीत''' शास्त्रों पर आधारित तथा विद्वानों व कलाकरों के अध्ययन व साधना का प्रतिफल था। यह अत्यंत नियमबद्ध तथा श्रेष्ठ संगीत था। &lt;br /&gt;
*'''लोक संगीत''' काल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा, अतः यह अधिक विविधतापूर्ण तथा हल्का-फुल्का व चित्ताकर्षक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
भारतीय संगीत की उत्पत्ति [[वेद|वेदों]] से मानी जाती है। वादों का मूल मंत्र है - '[[ॐ]]' (ओऽम्) । (ओऽम्) शब्द में तीन अक्षर अ, उ तथा म् सम्मिलित हैं, जो क्रमशः [[ब्रह्मा]] अर्थात् सृष्टिकर्ता, [[विष्णु]] अर्थात् जगत् पालक और [[महेश]] अर्थात् संहारक की शक्तियों के द्योतक हैं। इन तीनों अक्षरों को [[ॠग्वेद]], [[सामवेद]] तथा [[यजुर्वेद]] से लिया गया है। संगीत के सात स्वर षड़ज (सा), ॠषभ (र), गांधार (गा) आदि वास्तव में ऊँ (ओऽम्) या ओंकार के ही अर्न्तविभाग हैं। साथ ही स्वर तथा शब्द की उत्पत्ति भी ऊँ के गर्भ से ही हुई है। मुख से उच्चारित शब्द ही संगीत में [[नाद]] का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार 'ऊँ' को ही संगीत का जगत माना जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि जो साधक 'ऊँ' की साधना करने में समर्थ होता है, वही संगीत को यथार्थ रूप में ग्रहण कर सकता है। यदि दार्शनिक दृष्टि से इसका गूढ़ार्थ निकाला जाय, तो इसका तात्पर्य यही है कि ऊँ अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि का एक अंश हमारी [[आत्मा]] में निहित है और संगीत उसी आत्मा की आवाज़ है, अंतः संगीत की उत्पत्ति हृदयगत भावों में ही मानी जाती है। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;100%&amp;quot;&lt;br /&gt;
! style=&amp;quot;width:20%&amp;quot;| वाद्य&lt;br /&gt;
! style=&amp;quot;width:75%&amp;quot;| वादक&lt;br /&gt;
! style=&amp;quot;width:5%&amp;quot;| चित्र&lt;br /&gt;
|+प्रमुख वाद्य यंत्र एवं कलाकार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सितार]]&lt;br /&gt;
| [[पंडित रविशंकर]], निखिल बनर्जी, विलायत ख़ाँ, बंदे हसन, शाहिद परवेज, उमाशंकर मिश्र, बुद्धादित्य मुखर्जी आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Sitar.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[तबला]]&lt;br /&gt;
| [[अल्ला रक्खा|अल्ला रक्खा ख़ाँ]], गुदई महाराज, (पं. सामता प्रसाद) [[उस्ताद ज़ाकिर हुसैन|ज़ाकिर हुसैन]], लतीफ़ ख़ाँ, किशन महाराज, फ़य्यार ख़ाँ, सुखविंदर सिंह आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Tabla.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बांसुरी]]&lt;br /&gt;
| [[पन्नालाल घोष]], [[हरि प्रसाद चौरसिया]], वी. कुंजमणि, एन. नीला, राजेन्द्र प्रसन्ना, राजेन्द्र कुलकर्णी आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Bansuri.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सरोद]]&lt;br /&gt;
| अमज़द अली ख़ाँ, [[अली अकबर ख़ाँ]], अलाउद्दीन ख़ाँ, विश्वजीत राय चौधरी, ज़रीन दारूवाला, बुद्धदेव दास गुप्ता, मुकेश शर्मा आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Sarod.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वायलिन]]&lt;br /&gt;
| डॉ. एन. राजन, विष्णु गोविंद जोग, एल. सुब्रह्मण्यम्, संगीता राजन, कुनक्कड़ी वैद्यनाथन, टी. एन. कृष्णन् आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Violin.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[वीणा]]&lt;br /&gt;
| एस. बालचंद्रन, कल्याण कृष्ण भागवतार, बदरूद्दीन डागर, वी. दोरेस्वामी अयंगर आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Veena.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[शहनाई]]&lt;br /&gt;
| [[बिस्मिल्ला ख़ाँ]], दयाशंकर जगन्नाथ, अली अहमद हुसैन ख़ाँ आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Shehnai.jpg|30px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[संतूर]]&lt;br /&gt;
| [[शिवकुमार शर्मा]], भजन सोपारी आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Santoor.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[पखावज]]&lt;br /&gt;
| गोपाल दास, उस्ताद रहमान ख़ाँ, छत्रपति सिंह, ठाकुर लक्ष्मण सिंह आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Pakawaj.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रुद्रवीणा&lt;br /&gt;
| असद अली ख़ाँ, उस्ताद सादिक अली ख़ाँ आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Rudra-Veena.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[मृदंग]]&lt;br /&gt;
| पालधार रघु, ठाकुर भीकम सिंह, डॉ. जगदीश सिंह आदि।&lt;br /&gt;
| [[चित्र:Mridangam.jpg|40px]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत के रूप==&lt;br /&gt;
प्रत्येक कला के मुख्य दो रूप होते हैं-क्रिया और शास्त्र। क्रिया के अंतर्गत उसकी साधना विधि और शास्त्र के अंतर्गत उसका इतिहास, परिभाषिक शब्दों की व्याख्या आदि आती है। संगीत के भी दो रूप हैं-&lt;br /&gt;
====क्रियात्मक रूप====&lt;br /&gt;
संगीत का क्रियात्मक रूप वह है, जिसे हम कानों द्वारा सुनते हैं अथवा नेत्रों द्वारा देखते हैं। दूसरे शब्दों में क्रियात्मक संगीत में गाना, बजाना और नाचना आता है। गायन और वादन को हम सुनते हैं और नृत्य को देखते हैं। क्रियात्मक रूप में राग, गीत के प्रकार, आलाप-तान, सरगम, झाला, रेला, टुकड़ा, आमद, गत, मींड आदि की साधना आती है। संगीत का यह पक्ष बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====शास्त्र पक्ष====&lt;br /&gt;
शास्त्र पक्ष में संगीत सम्बन्धी विषयों का अध्ययन करते हैं। इसके दो प्रकार हैं–क्रियात्मक शास्त्र और शुद्ध शास्त्र। क्रियात्मक शास्त्र में क्रियात्मक संगीत का अध्ययन आता है, जैसे रागों का परिचय, गीत की स्वर-लिपि लिखना, तान-आलाप, मिलते-जुलते रागों की तुलना, टुकड़ा, रेला आदि। इस शास्त्र से क्रियात्मक संगीत में बड़ी सहायता मिलती है। शुद्ध शास्त्र में संगीत, नाद, जाति, आरोह-अवरोह, स्वर, लय, मात्रा, ताल, ख़ाली आदि की परिभाषा, संगीत का इतिहास आदि का अध्ययन आता है। &lt;br /&gt;
==संगीत पद्धतियाँ==&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में मुख्य रूप से दो प्रकार का संगीत प्रचार में है, जिन्हें संगीत की पद्धति कहते हैं। उनके नाम हैं–उत्तरी अथवा हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति और दक्षिणी अथवा [[कर्नाटक]] संगीत पद्धति।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====उत्तरी संगीत पद्धति====&lt;br /&gt;
उत्तरी संगीत पद्धति को हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति भी कहते हैं। यह पद्धति उत्तरी हिन्दुस्तान में–[[बंगाल]], [[बिहार]], [[उड़ीसा]], [[उत्तर प्रदेश]], [[हरियाणा]], [[पंजाब]], [[गुजरात]], [[जम्मू-कश्मीर]] तथा [[महाराष्ट्र]] प्रान्तों में प्रचलित हैं। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====दक्षिणी संगीत पद्धति====&lt;br /&gt;
दक्षिणी संगीत पद्धति को कर्नाटक संगीत पद्धति भी कहते हैं। यह [[तमिलनाडु]], [[मैसूर]], [[आंध्र प्रदेश]] आदि दक्षिण के प्रदेशों में प्रचलित हैं। ये दोनों पद्धतियाँ अलग होते हुए भी इनमें बहुत कुछ समानताऐं है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत के प्रकार==&lt;br /&gt;
भारतीय संगीत के मुख्य दो प्रकार हैं–शास्त्रीय संगीत और भाव संगीत। शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं, जिसमें नियमित शास्त्र होता है और जिसमें कुछ विशिष्ट (ख़ास) नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ, शास्त्रीय संगीत में राग के नियमों का पालन करना पड़ता है, न करने से राग हानि होती है। इसके अतिरिक्त लय-ताल की सीमा में रहना पड़ता है, गीत का कौन सा प्रकार हम गा रहे हैं, उसका निर्वाह भी उसी प्रकार से होना चाहिए, इत्यादि-इत्यादि। भाव संगीत में शास्त्रीय संगीत के समान न कोई बन्धन होता है और न उसका नियमित शास्त्र ही होता है। भाव संगीत का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य कानों को अच्छा लगना है, अत: उसमें कोई बन्धन नहीं रहता-चाहे कोई भी स्वर प्रयोग किया जाए, चाहे जिस ताल में गाया जाए व आलाप, तान, सरगम, आदि कुछ भी प्रयोग किया जाए अथवा न प्रयोग किया जाए। भाव संगीत का मुख्य उद्देश्य रंजकता है। रंजकता के लिए ही कहीं-कहीं शास्त्रीय संगीत का सहारा भी लिया जाता है। भाव संगीत को सुगम संगीत कहते हैं। &lt;br /&gt;
भाव संगीत को मुख्य तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-&lt;br /&gt;
*चित्रपट संगीत,&lt;br /&gt;
*लोक संगीत,&lt;br /&gt;
*भजन-गीत आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चित्रपट संगीत====&lt;br /&gt;
व्यापक अर्थ में जिस किसी गीत का प्रयोग चित्रपट (सिनेमा) में हुआ हो, उसे चित्रपट संगीत कहते हैं। [[बैजू बावरा]] का '''आज गावत मन मेरो''' तथा झनक-झनक पायल बाजे का 'गिरधर गोपाल' दोनों की शैली शास्त्रीय होते हुए भी ये चित्रपट गीत हैं, क्योंकि इनका प्रयोग चित्रपट में हो चुका है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
साधारण फ़िल्मी गीतों की कुछ निजी विशेषताएँ होती हैं, जो कि इस प्रकार हैं–&lt;br /&gt;
*'''स''':- भावानुकूल गीत और आकर्षक रचना&lt;br /&gt;
*'''रे''':- विभिन्न वाद्यों का प्रयोग&lt;br /&gt;
*'''ग''':- श्रृंगार रस के ह्रदयस्पर्शी शब्द&lt;br /&gt;
*'''म''':- सुरीले और आकर्षक कंठों के द्वारा गाया जाना&lt;br /&gt;
*'''प''':- ध्वनि बद्ध (रिकार्ड) करने के पूर्व ठीक प्रकार से जाँचना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिन गीतों में ये विशेषताएँ हों और जिनका प्रयोग चित्रपट में हुआ हो, वे फ़िल्मी गीत कहलाते हैं। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण साधारण जनता फ़िल्मी गीतों की ओर अधिक आकर्षित होती है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====लोक गीत====&lt;br /&gt;
यह ग्रामीणों का गीत है। इन गीतों में सैकड़ों वर्षों से चले आये रीति-रिवाज़ों की झाँकी मिलती है। इसके अंतर्गत शादी के गीत, विभिन्न संस्कारों पर गाये जाने वाले गीत, चैती, कजरी, आल्हा, बिरहा, बाऊल, माहिया, भटियाली, मांझी आदि लोक गीत आते हैं। इनका स्वरूप सरल, भाव छुते गुये, कुछ स्वरों के अन्दर सीमित तथा लय प्रधान होते हैं। इन गीतों को सुनते ही साधारण व्यक्ति ताली देने लगते हैं। इसलिये लोक गीतों के साथ [[ढोलक]] बजाये जाती है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====भजन-गीत आदि====&lt;br /&gt;
इसमें शास्त्रीय संगीत की तरह बन्धन नहीं रहता। जिन गीतों में ईश्वर का गुणगान या उनसे प्रार्थना की जाती है, उन्हें भजन और जिन कविताओं को स्वर-ताल बद्ध करके गाते हैं, उन्हें गीत कहते हैं। राग-ताल नियमों से स्वतंत्र, आकर्षक रचनायें, भावानुकूल शब्दों द्वारा गीत रचना आदि इनकी विशेषताएँ होती हैं। अधिकतर ये दादरा और कहरवा ताल में होते हैं। इनमें और चित्रपट गीतों में मुख्य अन्तर यह है कि इनकी तुलना में चित्रपट गीतों की रचना बहुत चलती-फिरती और शब्द सस्ते ढंग के होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत के विविध अंग==&lt;br /&gt;
संगीत से सम्बंधित कुछ मूलभूत तथ्यों को जानकर ही संगीत की बारीकियों को समझा जा सकता है। ध्वनि, स्वर, लय, ताल आदि इसके अन्तर्गत आते हैं।&lt;br /&gt;
====स्वर====&lt;br /&gt;
{{main|स्वर (संगीत)}}&lt;br /&gt;
ध्वनियों में हम प्राय: दो भेद रखते हैं, जिनमें से एक को 'स्वर' और दूसरे को 'कोलाहल' या 'रव' कहते हैं। कुछ लोग बातचीत की ध्वनि को भी एक भेद मानते हैं। साधारणत: जब कोई ध्वनि नियमित और आवर्त-कम्पनों से मिलकर उत्पन्न होती है, तो उसे 'स्वर' कहते हैं। इसके विपरीत जब कम्पन्न अनियमित तथा पेचीदे या मिश्रित हों तो उस ध्वनि को 'कोलाहल' कहते हैं। बोलचाल की भाषा की ध्वनि को स्वर और कोलाहल के बीच की श्रेणी में रखा जाता है। संक्षेप में यह समझिए की नियमित आन्दोलन संख्यावली ध्वनि 'स्वर' कहलाती है। यही ध्वनि संगीत के काम में आती है, जो कानों का मधुर लगती है तथा चित्त को प्रसन्न् करती है। इस ध्वनि को संगीत की भाषा में 'नाद' कहते हैं। इस आधार पर संगीतोपयोगी नाद 'स्वर' कहलाता है।&lt;br /&gt;
भारतीय संगीतज्ञों ने एक स्वर (ध्वनि) से उससे दुगुनी ध्वनि तक के क्षेत्र में ऐसे संगीतोपयोगी नाद बाईस माने हैं, जिन्हें 'श्रुतियाँ' कहा गया है। ध्वनि की प्रारम्भिक अवस्था 'श्रुति' और उसका अनुरणात्मक (गुंजित) 'स्वर' कहलाता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====शुद्ध स्वर====&lt;br /&gt;
{{main|शुद्ध स्वर}}&lt;br /&gt;
जब '''सा''', '''रे''', '''ग''', '''म''', '''प''', '''ध''', '''नि''' [[स्वर (संगीत)|स्वरों]] में श्रुतियों का क्रम 4, 3, 4, 4, 3, 2, रहता है तो उन स्वरों को '''शुद्ध स्वर''' कहते हैं। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
====शुद्ध तीव्र स्वर====&lt;br /&gt;
{{main|शुद्ध तीव्र स्वर}}&lt;br /&gt;
'''सा''', '''रे''', '''ग''', '''म''', '''प''', '''ध''', '''नि''' शुद्ध स्वर कहे जाते हैं। इनमें '''सा''' और '''प''' तो '''अचल स्वर''' माने गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर क़ायम रहते हैं। बाकी पाँच स्वरों के दो-दो रूप कर दिए गए हैं, क्योंकि ये अपनी जगह पर से हटते हैं, इसलिए इन्हें कोमल व तीव्र नामों से पुकारते हैं। इन्हें '''विकृत स्वर''' भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सप्तक====&lt;br /&gt;
{{main|सप्तक}}&lt;br /&gt;
क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समूह को सप्तक कहते हैं। सातों स्वरों के नाम क्रमश: '''सा''', '''रे''', '''ग''', '''म''', '''प''', '''ध''' और '''नि''' हैं। इसमें प्रत्येक [[स्वर (संगीत)|स्वर]] की आन्दोलन संख्या अपने पिछले स्वर से अधिक होती है। दूसरे शब्दों में सा से जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, स्वरों की आन्दोलन संख्या बढ़ती जाती है। '''रे''' की आन्दोलन संख्या सा से, ग, की, रे, से, व, म, की, ग, से अधिक होती है। इसी प्रकार प, ध और नी की आन्दोलन संख्या अपने पिछले स्वरों से ज़्यादा होती है। &lt;br /&gt;
====ठाट====&lt;br /&gt;
{{main|ठाट}}&lt;br /&gt;
सप्तक के 12 स्वरों में से 7 क्रमानुसार मुख्य स्वरों के उस समुदाय को ठाट कहते हैं, जिससे [[राग]] उत्पन्न होते है। स्वरसप्तक, मेल, थाट, अथवा ठाट एक ही अर्थवाचक हैं। प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रन्थों में मेल शब्द ही प्रयोग किया गया है। '''अभिनव राग मंजरी''' में कहा गया है– मेल स्वर समूह: स्याद्राग व्यंजन शक्तिमान, अर्थात् स्वरों के उस समूह को मेल या ठाट कहते हैं, जिसमें राग उत्पन्न करने की शक्ति हो। &lt;br /&gt;
====राग====&lt;br /&gt;
{{main|राग}}&lt;br /&gt;
कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात [[स्वर (संगीत)|स्वरों]] की वह सुन्दर रचना जो [[कान|कानों]] को अच्छी लगे राग कहलाती है। आजकल राग-गायन ही प्रचार में है। अभिनव राग-मंजरी में राग की परिभाषा इस प्रकार दी गई है–&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;योऽयं ध्वनि-विशेषस्तु स्वर-वर्ण-विभूषित:।&lt;br /&gt;
रंजको जनचित्तानां स राग कथितो बुधै:।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
;अर्थात् &lt;br /&gt;
स्वर और वर्ण से विभूषित [[ध्वनि]], जो मनुष्यों का मनोरंजन करे, राग कहलाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}{{शास्त्रीय गायक कलाकार}}{{पार्श्वगायक}}{{संगीत के अंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत]]&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Violin&amp;diff=250801</id>
		<title>Violin</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=Violin&amp;diff=250801"/>
		<updated>2012-02-04T12:23:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: वायलिन को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[वायलिन]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250800</id>
		<title>वायलिन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250800"/>
		<updated>2012-02-04T12:23:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Violin.jpg|thumb|250px|वायलिन]]&lt;br /&gt;
'''वायलिन''' का उपनाम बेला है। वायलिन कमानयुक्त तार वाद्य है, जो पुनर्जागरण के दौरान पहले के कमानयुक्त वाद्यों, मध्यकालीन ‘फ़िडल’ है। वायलिन की 16वीं सदी की इतालवी प्रशाखा लीरा द ब्राचिओ और रिबेक से विकसित हुआ। वायलिन शायद सबसे प्रसिद्ध तथा विश्व में व्यापक रूप से फैला [[वाद्य यंत्र]] है। अपने पूर्ववर्तियों के समान, लेकिन अपने संबंधी वायॅल की तरह नहीं, वायलिन में पर्दाविहीन उंगलीपटल होता है। &lt;br /&gt;
==वायलिन का इतिहास==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
वायलिन को सबसे पहले विशेष रूप से इसके जन्मस्थान [[इटली]] में इसके गायन स्वर के लिए मान्यता मिली, जहाँ प्रारंभिक निर्माताओं, गास्पारो द सालो, आंद्रिआ ऑमॉती और जोवानी पाओलो माग्गिनी ने 16वीं सदी के अंत से पहले इसके औसत अनुपातों को निर्धारित किया। अपने इतिहास के दौरान वायलिन में कई सुधार हुए, जिन्होंने इसके विकासमान [[संगीत]] उपयोग के लिये इसे क्रमशः अधिक उपयुक्त बनाया। सामान्यतः प्रारंभिक वायलिन उदर और पृष्ठभाग में ज़्यादा गहरी चापित थी; अपेक्षाकृत आधुनिक वायलिन, एंतोनियो स्त्रादिवारी (1644-1737) के अभिनव परिवर्तनों के बाद अधिक उथली थी, जो ज़्यादा सशक्त स्वर निकालती थी। 19वीं सदी में बड़े प्रेक्षागृहों और वायलिन मर्मज्ञों के आगमन से वायलिन की संरचना में अंतिम परिवर्तन किए गए। मेरू ऊँचा किया गया, ध्वनि-स्तंभ एवं ध्वनि-शलाका मोटी की गई तथा शरीर ज़्यादा सपाट हो गया। गर्दन को पीछे मोड़ा गया। ताकि मेरू पर तारों का और अधिक दबाव हो। परिणामस्वरूप, 18वीं सदी के वायलिन को कोमल और अंतरंग स्वर की जगह ज़्यादा शक्तिशाली एवं स्पष्ट स्वर मिला।&lt;br /&gt;
==वायलिन का आकार==&lt;br /&gt;
इसके तार समस्वरण मेखों एवं आखिरी छोर से बंधे होते है, जो एक मेरू के ऊपर से होकर गुज़रते हैं। तारों के दबाब से मेरू अपनी जगह स्थिर रहता है। मेरू तारों के कंपन को वायलिन के उदर या ध्वनिपटल तक पहुँचाता है, जो देवदार का बना होता है एवं [[ध्वनि]] को ऊँचा करता है। वाद्य यंत्र के भीतर, मेरू के नीचे तथा वायलिन उदर एवं मेपल लकड़ी से बने पृष्ठ भाग के बीच में स्वरस्तंभ होता है, जो देवदार की पतली लकड़ी का होता है और तारों के कंपन को पृष्ठभाग को संप्रेषित करता है, जिसके कारण विशिष्ट वायलिन [[स्वर (संगीत)|स्वर]] निकलता है। उदर को नीचे से मंद्रशलाका सहारा देती है, लकड़ी की यह संकरी शलाका लंबवत गुज़रती हुई पतली होकर उदर में समाहित हो जाती है। यह वाद्य के अनुनाद में भी योगदान देती है। पार्श्व दीवारें या पट्टियाँ देवदार की परत वाले मेपल से निर्मित होती हैं।&lt;br /&gt;
==वायलिन का उपयोग==&lt;br /&gt;
प्रारंभिक वायलिनों को लोकप्रिय संगीत और नृत्य संगीत में इस्तेमाल किया जाता था। 17वीं सदी के दौरान इसने कक्ष संगीत के बुनियादी तार वाद्य के रूप में वॉयल का स्थान लिया। इतालवी संगीतकार मोंतेवेर्दी ने अपने गीति नाट्य (ऑपेरा) ऑर्फ़ियो (पहली बार 1607 में प्रदर्शित) के वाद्य-वृंद में वायलिन को शामिल किया गया था। [[फ़्रांस]] में राजसी वाद्य-वृंद, ले 24 वायलंस दु रोइ, 1626 में आयोजित किया गया। प्रवीण वायलिन वादक आरकेंजलो कॉरेली पहले संगीतकारों में से थे, जिन्होंने वायलिन के लिए नया संगीत रचा, विवाल्डी, जे.एस. बाख़ तथा वायलिन वादक जूज़ादे तार्तीनी ने भी यही किया। यही 18वीं सदी से अधिकतर प्रमुख संगीतकारों ने वायलिन के लिए एकल संगीत रचा, इसमें मोज़ार्ट, बीटोवन, शुमैन, ब्राह्म्स, एडवर्ड ग्रेग, पॉल हाइंडमिथ, आरनॉल्ड शोएनबर्ग और एलबन बर्ग शामिल हैं। फ्रांसेस्कों जेमिनियानी, निकोलो पागानिनि, जोसेफ़ योकिम, फ़्रिट्ज़ क्रिस्लर, डेविड ओइस्त्रेख़, यहूदी मेनुहिन और आइज़ेक स्टर्न जैसे मर्मज्ञों ने उत्कृष्ट वायलिन संगीत की रचना को प्रेरित किया। वायलिन को मध्य-पूर्व और [[दक्षिण भारत]] की संगीत कला में समायोजित किया गया तथा फ़िड्ल की तरह यह कई देशों के लोकसंगीत में बजाया जाता है। 16वीं-18वीं सदी के दौरान प्रचलित टेनॉर वायलिन, वॉयला और चेलो के बीच के आकार का था। इसका समस्वरण ‘म-सा-प-रे’ था। टेनॉर वायलिन को कभी-कभी वॉयला भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250797</id>
		<title>वार्ता:वायलिन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250797"/>
		<updated>2012-02-04T12:21:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: '{{वार्ता}}' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{वार्ता}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250796</id>
		<title>वायलिन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8&amp;diff=250796"/>
		<updated>2012-02-04T12:21:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: '{{पुनरीक्षण}} {{tocright}} '''वायलिन''' का उपनाम बेला है। वायलिन ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''वायलिन''' का उपनाम बेला है। वायलिन कमानयुक्त तार वाद्य है, जो पुनर्जागरण के दौरान पहले के कमानयुक्त वाद्यों, मध्यकालीन ‘फ़िडल’ है। वायलिन की 16वीं सदी की इतालवी प्रशाखा लीरा द ब्राचिओ और रिबेक से विकसित हुआ। वायलिन शायद सबसे प्रसिद्ध तथा विश्व में व्यापक रूप से फैला [[वाद्य यंत्र]] है। अपने पूर्ववर्तियों के समान, लेकिन अपने संबंधी वायॅल की तरह नहीं, वायलिन में पर्दाविहीन उंगलीपटल होता है। &lt;br /&gt;
==वायलिन का इतिहास==&lt;br /&gt;
वायलिन को सबसे पहले विशेष रूप से इसके जन्मस्थान [[इटली]] में इसके गायन स्वर के लिए मान्यता मिली, जहाँ प्रारंभिक निर्माताओं, गास्पारो द सालो, आंद्रिआ ऑमॉती और जोवानी पाओलो माग्गिनी ने 16वीं सदी के अंत से पहले इसके औसत अनुपातों को निर्धारित किया। अपने इतिहास के दौरान वायलिन में कई सुधार हुए, जिन्होंने इसके विकासमान [[संगीत]] उपयोग के लिये इसे क्रमशः अधिक उपयुक्त बनाया। सामान्यतः प्रारंभिक वायलिन उदर और पृष्ठभाग में ज़्यादा गहरी चापित थी; अपेक्षाकृत आधुनिक वायलिन, एंतोनियो स्त्रादिवारी (1644-1737) के अभिनव परिवर्तनों के बाद अधिक उथली थी, जो ज़्यादा सशक्त स्वर निकालती थी। 19वीं सदी में बड़े प्रेक्षागृहों और वायलिन मर्मज्ञों के आगमन से वायलिन की संरचना में अंतिम परिवर्तन किए गए। मेरू ऊँचा किया गया, ध्वनि-स्तंभ एवं ध्वनि-शलाका मोटी की गई तथा शरीर ज़्यादा सपाट हो गया। गर्दन को पीछे मोड़ा गया। ताकि मेरू पर तारों का और अधिक दबाव हो। परिणामस्वरूप, 18वीं सदी के वायलिन को कोमल और अंतरंग स्वर की जगह ज़्यादा शक्तिशाली एवं स्पष्ट स्वर मिला।&lt;br /&gt;
==वायलिन का आकार==&lt;br /&gt;
इसके तार समस्वरण मेखों एवं आखिरी छोर से बंधे होते है, जो एक मेरू के ऊपर से होकर गुज़रते हैं। तारों के दबाब से मेरू अपनी जगह स्थिर रहता है। मेरू तारों के कंपन को वायलिन के उदर या ध्वनिपटल तक पहुँचाता है, जो देवदार का बना होता है एवं [[ध्वनि]] को ऊँचा करता है। वाद्य यंत्र के भीतर, मेरू के नीचे तथा वायलिन उदर एवं मेपल लकड़ी से बने पृष्ठ भाग के बीच में स्वरस्तंभ होता है, जो देवदार की पतली लकड़ी का होता है और तारों के कंपन को पृष्ठभाग को संप्रेषित करता है, जिसके कारण विशिष्ट वायलिन [[स्वर (संगीत)|स्वर]] निकलता है। उदर को नीचे से मंद्रशलाका सहारा देती है, लकड़ी की यह संकरी शलाका लंबवत गुज़रती हुई पतली होकर उदर में समाहित हो जाती है। यह वाद्य के अनुनाद में भी योगदान देती है। पार्श्व दीवारें या पट्टियाँ देवदार की परत वाले मेपल से निर्मित होती हैं।&lt;br /&gt;
==वायलिन का उपयोग==&lt;br /&gt;
प्रारंभिक वायलिनों को लोकप्रिय संगीत और नृत्य संगीत में इस्तेमाल किया जाता था। 17वीं सदी के दौरान इसने कक्ष संगीत के बुनियादी तार वाद्य के रूप में वॉयल का स्थान लिया। इतालवी संगीतकार मोंतेवेर्दी ने अपने गीति नाट्य (ऑपेरा) ऑर्फ़ियो (पहली बार 1607 में प्रदर्शित) के वाद्य-वृंद में वायलिन को शामिल किया गया था। [[फ़्रांस]] में राजसी वाद्य-वृंद, ले 24 वायलंस दु रोइ, 1626 में आयोजित किया गया। प्रवीण वायलिन वादक आरकेंजलो कॉरेली पहले संगीतकारों में से थे, जिन्होंने वायलिन के लिए नया संगीत रचा, विवाल्डी, जे.एस. बाख़ तथा वायलिन वादक जूज़ादे तार्तीनी ने भी यही किया। यही 18वीं सदी से अधिकतर प्रमुख संगीतकारों ने वायलिन के लिए एकल संगीत रचा, इसमें मोज़ार्ट, बीटोवन, शुमैन, ब्राह्म्स, एडवर्ड ग्रेग, पॉल हाइंडमिथ, आरनॉल्ड शोएनबर्ग और एलबन बर्ग शामिल हैं। फ्रांसेस्कों जेमिनियानी, निकोलो पागानिनि, जोसेफ़ योकिम, फ़्रिट्ज़ क्रिस्लर, डेविड ओइस्त्रेख़, यहूदी मेनुहिन और आइज़ेक स्टर्न जैसे मर्मज्ञों ने उत्कृष्ट वायलिन संगीत की रचना को प्रेरित किया। वायलिन को मध्य-पूर्व और [[दक्षिण भारत]] की संगीत कला में समायोजित किया गया तथा फ़िड्ल की तरह यह कई देशों के लोकसंगीत में बजाया जाता है। 16वीं-18वीं सदी के दौरान प्रचलित टेनॉर वायलिन, वॉयला और चेलो के बीच के आकार का था। इसका समस्वरण ‘म-सा-प-रे’ था। टेनॉर वायलिन को कभी-कभी वॉयला भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{संगीत वाद्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:वादन]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत वाद्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250665</id>
		<title>चौमहला महल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250665"/>
		<updated>2012-02-04T10:36:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: Adding category :Category:पर्यटन कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chowmahalla-Palace-Hyderabad.jpg|250px|thumb|चौमहला महल, [[हैदराबाद]]]]&lt;br /&gt;
'''चौमहला महल''' [[चारमीनार]] के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।&lt;br /&gt;
*चौमहला महल का शाब्दिक अर्थ चार महल से है और इन चार महलों के नाम निम्‍नलिखित है- अफजल महल, महताब महल, तहनियात महल और आफताब महल। इनमें से अफजल महल दोमंज़िला है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल को असफ़ जाही सल्तनत का पहला महल और निवास स्थान भी कहा जाता है। इस महल के सभी भागों का निर्माण अलग-अलग असफ़ जाही राजाओं के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*दरबार, जिसे खिलवत कहते थे, का निर्माण नवाब निजाम अली खान ने 1780 में करवाया था। &lt;br /&gt;
*खिलवत के दक्षिण में चार मुख्य महल हैं जिनके नाम पर इसका नाम चौमहला महल पड़ा। यह माना जाता है कि इस परिसर का निर्माण नवाब फिजल-उद-दौला बहादुर (असफ़ जाही पंचम [[1857]]-[[1869]]) के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से चौमहला महल 45 एकड़ में बना था, लेकिन अब केवल 14 एकड़ रह गया है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल का प्रयोग मेहमानों की खातिरदारी के लिए किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://www.chowmahalla.com/htm/history.htm चौमहला महल]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:हैदराबाद]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250661</id>
		<title>चौमहला महल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250661"/>
		<updated>2012-02-04T10:35:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: Adding category :Category:हैदराबाद (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chowmahalla-Palace-Hyderabad.jpg|250px|thumb|चौमहला महल, [[हैदराबाद]]]]&lt;br /&gt;
'''चौमहला महल''' [[चारमीनार]] के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।&lt;br /&gt;
*चौमहला महल का शाब्दिक अर्थ चार महल से है और इन चार महलों के नाम निम्‍नलिखित है- अफजल महल, महताब महल, तहनियात महल और आफताब महल। इनमें से अफजल महल दोमंज़िला है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल को असफ़ जाही सल्तनत का पहला महल और निवास स्थान भी कहा जाता है। इस महल के सभी भागों का निर्माण अलग-अलग असफ़ जाही राजाओं के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*दरबार, जिसे खिलवत कहते थे, का निर्माण नवाब निजाम अली खान ने 1780 में करवाया था। &lt;br /&gt;
*खिलवत के दक्षिण में चार मुख्य महल हैं जिनके नाम पर इसका नाम चौमहला महल पड़ा। यह माना जाता है कि इस परिसर का निर्माण नवाब फिजल-उद-दौला बहादुर (असफ़ जाही पंचम [[1857]]-[[1869]]) के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से चौमहला महल 45 एकड़ में बना था, लेकिन अब केवल 14 एकड़ रह गया है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल का प्रयोग मेहमानों की खातिरदारी के लिए किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://www.chowmahalla.com/htm/history.htm चौमहला महल]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:हैदराबाद]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250658</id>
		<title>चौमहला महल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250658"/>
		<updated>2012-02-04T10:34:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: Adding category :Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chowmahalla-Palace-Hyderabad.jpg|250px|thumb|चौमहला महल, [[हैदराबाद]]]]&lt;br /&gt;
'''चौमहला महल''' [[चारमीनार]] के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।&lt;br /&gt;
*चौमहला महल का शाब्दिक अर्थ चार महल से है और इन चार महलों के नाम निम्‍नलिखित है- अफजल महल, महताब महल, तहनियात महल और आफताब महल। इनमें से अफजल महल दोमंज़िला है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल को असफ़ जाही सल्तनत का पहला महल और निवास स्थान भी कहा जाता है। इस महल के सभी भागों का निर्माण अलग-अलग असफ़ जाही राजाओं के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*दरबार, जिसे खिलवत कहते थे, का निर्माण नवाब निजाम अली खान ने 1780 में करवाया था। &lt;br /&gt;
*खिलवत के दक्षिण में चार मुख्य महल हैं जिनके नाम पर इसका नाम चौमहला महल पड़ा। यह माना जाता है कि इस परिसर का निर्माण नवाब फिजल-उद-दौला बहादुर (असफ़ जाही पंचम [[1857]]-[[1869]]) के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से चौमहला महल 45 एकड़ में बना था, लेकिन अब केवल 14 एकड़ रह गया है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल का प्रयोग मेहमानों की खातिरदारी के लिए किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://www.chowmahalla.com/htm/history.htm चौमहला महल]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250653</id>
		<title>चौमहला महल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2&amp;diff=250653"/>
		<updated>2012-02-04T10:33:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: Adding category :Category:आंध्र प्रदेश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chowmahalla-Palace-Hyderabad.jpg|250px|thumb|चौमहला महल, [[हैदराबाद]]]]&lt;br /&gt;
'''चौमहला महल''' [[चारमीनार]] के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।&lt;br /&gt;
*चौमहला महल का शाब्दिक अर्थ चार महल से है और इन चार महलों के नाम निम्‍नलिखित है- अफजल महल, महताब महल, तहनियात महल और आफताब महल। इनमें से अफजल महल दोमंज़िला है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल को असफ़ जाही सल्तनत का पहला महल और निवास स्थान भी कहा जाता है। इस महल के सभी भागों का निर्माण अलग-अलग असफ़ जाही राजाओं के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*दरबार, जिसे खिलवत कहते थे, का निर्माण नवाब निजाम अली खान ने 1780 में करवाया था। &lt;br /&gt;
*खिलवत के दक्षिण में चार मुख्य महल हैं जिनके नाम पर इसका नाम चौमहला महल पड़ा। यह माना जाता है कि इस परिसर का निर्माण नवाब फिजल-उद-दौला बहादुर (असफ़ जाही पंचम [[1857]]-[[1869]]) के शासनकाल में हुआ था। &lt;br /&gt;
*मूल रूप से चौमहला महल 45 एकड़ में बना था, लेकिन अब केवल 14 एकड़ रह गया है। &lt;br /&gt;
*चौमहला महल का प्रयोग मेहमानों की खातिरदारी के लिए किया जाता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://www.chowmahalla.com/htm/history.htm चौमहला महल]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE&amp;diff=250638</id>
		<title>गंगा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE&amp;diff=250638"/>
		<updated>2012-02-04T10:31:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा नदी&lt;br /&gt;
|चित्र=Ganga-River-Varanasi.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=गंगा नदी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|देश=[[भारत]], [[नेपाल]] और [[बांग्लादेश]]&lt;br /&gt;
|राज्य=[[हिमाचल प्रदेश]], [[उत्तराखंड]], [[उत्तर प्रदेश]], [[मध्य प्रदेश]], [[बिहार]] और [[पश्चिम बंगाल]]&lt;br /&gt;
|प्रमुख नगर=[[हरिद्वार]], [[कन्नौज]], [[कानपुर]], [[वाराणसी]], [[भागलपुर]] और [[मुर्शिदाबाद ज़िला]]&lt;br /&gt;
|प्रवाह समय=&lt;br /&gt;
|उद्गम स्थल=[[गंगोत्री]], [[उत्तराखंड]] &lt;br /&gt;
|विसर्जन स्थल=&lt;br /&gt;
|लम्बाई=2,510 किमी&lt;br /&gt;
|अधिकतम गहराई=&lt;br /&gt;
|अधिकतम चौड़ाई=&lt;br /&gt;
|इससे जुड़ी नहरें=&lt;br /&gt;
|जलचर=&lt;br /&gt;
|सहायक नदियाँ=[[यमुना]], [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[ताप्ती नदी|ताप्ती]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि&lt;br /&gt;
|पौराणिक उल्लेख=[[ब्रह्माण्ड पुराण]] के अनुसार गंगा को [[विष्णु]] के पाँव से एवं [[शिव]] के जटाजूट में अवस्थित माना गया है। &lt;br /&gt;
|धार्मिक महत्त्व=[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। &lt;br /&gt;
|ऐतिहासिक महत्त्व=ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), [[बिहार]] में गंगा के तट पर बसा हुआ था। &lt;br /&gt;
|गूगल मानचित्र=[http://maps.google.co.in/maps?q=Ganga+River,+Varanasi,+Uttar+Pradesh&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=25.165795,82.959137&amp;amp;spn=0.424462,0.727158&amp;amp;sll=27.624803,81.604944&amp;amp;sspn=13.273661,23.269043&amp;amp;t=h&amp;amp;z=11&amp;amp;iwloc=A गंगा नदी]&lt;br /&gt;
|वर्तमान स्थिति=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=17:13, 5 अगस्त 2011 (IST)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा, उत्तर भारत के मैदानों की विशाल नदी है। गंगा भारत और [[बांग्लादेश]] में मिलकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई [[उत्तरांचल]] में [[हिमालय]] से निकलकर [[बंगाल की खाड़ी]] में भारत के लगभग एक-चौथाई भू-क्षेत्र को अपवाहित करती है तथा अपने बेसिन में बसे विराट जनसमुदाय के जीवन का आधार बनती है। जिस गंगा के मैदान से होकर यह प्रवाहित होती है, वह इस क्षेत्र का हृदय स्थल है, जिसे हिन्दुस्तान कहते हैं। गंगा नदी को '''उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड''' भी कहा गया है। यहाँ तीसरी [[सदी]] में [[अशोक|अशोक महान]] के साम्राज्य से लेकर 16वीं सदी में स्थापित [[मुग़ल साम्राज्य]] तक सारी सभ्यताएँ विकसित हुईं। गंगा नदी अपना अधिकांश सफ़र भारतीय इलाक़े में ही तय करती है, लेकिन उसके विशाल डेल्टा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश में है। गंगा के प्रवाह की सामान्यत: दिशा उत्तर-पश्चिमोत्तर से दक्षिण-पूर्व की तरफ है और डेल्टा क्षेत्र में प्रवाह आमतौर से दक्षिण मुखी है।&lt;br /&gt;
====नामकरण====&lt;br /&gt;
भारतीय [[भाषा|भाषाओं]] में तथा अधिकृत रूप से गंगा नदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके अंग्रेज़ीकृत नाम ‘द गैंगीज़’ से ही जाना जाता है। गंगा सहस्राब्दियों से [[हिन्दू|हिन्दुओं]] की पवित्र तथा पूजनीय नदी रही है। अपने अधिकांश मार्ग में गंगा एक चौड़ी व मंद धारा है और विश्व के सबसे ज़्यादा उपजाऊ और घनी आबादी वाले इलाक़ों से होकर बहती है। इतने महत्व के बावज़ूद इसकी लम्बाई 2,510 किलोमीटर है, जो एशिया या विश्व स्तर की तुलना में कोई बहुत ज़्यादा नहीं है।&lt;br /&gt;
====पतितपावनी नदी====&lt;br /&gt;
भारत की पावन नदी, जिसकी जलधारा में स्नान से पापमुक्ति और जलपान से शुद्धि होती है। यह प्रसिद्ध नदी, [[हिमाचल प्रदेश]] में [[गंगोत्री]] से निकलकर [[मध्यदेश]] से होती हुई [[पश्चिम बंगाल]] के परे गंगासागर में मिलती है। गंगा की घाटी संसार की उर्वरतम घाटियों में से एक है और [[सरयू नदी|सरयू]], [[यमुना नदी|यमुना]], [[सोन नदी|सोन]] आदि अनेक नदियाँ उससे आ मिलती हैं। उसकी घाटी भारतीय सभ्यता के विकास में अन्यतम रही हैं। गंगा को [[संस्कृति|भारतीय संस्कृति]] में विशिष्ट योगदान के कारण ही उसे असाधारण महिमा मिली है, जिससे वह ‘पतितपावनी’ कहलाती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gangotri.jpg|thumb|[[गंगोत्री]]|left|250px]]&lt;br /&gt;
==उद्गम स्थल==&lt;br /&gt;
3900 मीटर ऊँचा गौमुख ([[गंगोत्री]]) गंगा का उदगम स्थल है। जो [[उत्तराखंड]] राज्य में स्थित है। गंगोत्री में गंगा का उदगम स्रोत यहाँ से लगभग 24 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर में 4,225 मीटर की ऊँचाई पर होने का अनुमान है। गंगा की धारा, जो पहाड़ों में [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]] और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] की धाराओं के सम्मिलन से बनती है, [[हिमालय]] में अत्यन्त क्षीण है और [[हरिद्वार]] के ऊपर कनखल के समीप उत्तरी मैदान में प्रशस्त होकर बहती है और बरसात में उसके [[जल]] का [[वेग]] भयावह हो उठता है। गंगा नदी देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। 2,071 किलोमीटर तक भारत तथा उसके बाद [[बांग्लादेश]] में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। 100 फीट (31 मीटर) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। अपने सौंदर्य और महत्त्व के कारण एक ओर जहाँ [[पुराण और साहित्य में गंगा|पुराण और साहित्य में इसका उल्लेख]] बार-बार मिलता है, वहीं विदेशी साहित्य में भी गंगा नदी के प्रति प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णनों की कमी नहीं।&lt;br /&gt;
==भौतिक विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
====भू-आकृति====&lt;br /&gt;
गंगा का उद्गम दक्षिणी [[हिमालय]] में [[तिब्बत]] सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। इसकी पाँच आरम्भिक धाराओं [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], अलकनन्दा, मंदाकिनी, धौलीगंगा तथा पिंडर का उद्गम [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र, जो [[उत्तर प्रदेश]] का एक संभाग था (वर्तमान उत्तरांचल राज्य) में होता है। दो प्रमुख धाराओं में बड़ी अलकनन्दा का उद्गम हिमालय के [[नंदा देवी पर्वत|नंदा देवी शिखर]] से 48 किलोमीटर दूर तथा दूसरी भागीरथी का उद्गम हिमालय की गंगोत्री नामक [[हिमनद]] के रूप में 3, 050 मीटर की ऊँचाई पर बर्फ़ की गुफ़ा में होता है। गंगोत्री हिन्दुओं का एक तीर्थ स्थान है। वैसे गंगोत्री से 21 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व स्थित गोमुख को गंगा का वास्तविक उद्गम स्थल माना जाता है। [[चित्र:Haridwar.jpg|300px|thumb|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]]  गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो [[कुमाऊँ]] में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;/&amp;gt; गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊँचाई 3140 मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक मंदिर भी है। [[गंगोत्री]] तीर्थ, शहर से 19 किलोमीटर उत्तर की ओर 3892 मीटर (12,770 फीट) की ऊँचाई पर इस हिमनद का मुख है। यह हिमनद 25 किलोमीटर लंबा व 4 किलोमीटर चौड़ा और लगभग 40 मीटर ऊँचा है। इसी ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से गुफ़ानुमा मुख पर अवतरित होती है। इसका जल स्रोत 5000 मीटर ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस बेसिन का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में 3600 मीटर ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं। इस हिमनद में [[नंदा देवी पर्वत]], [[कामत पर्वत]] एवं त्रिशूल पर्वत का हिम पिघल कर आता है। [[अलकनंदा नदी]] की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगा का अलकनंदा से विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह 1372 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। फिर 2805 मीटर ऊँचे नंद प्रयाग में अलकनन्दा का नंदाकिनी नदी से संगम होता है। इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से संगम होता है। फिर [[ऋषिकेश]] से 139 किलोमीटर दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा 1500 फीट पर स्थित देव प्रयाग में संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मिलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मिलित रूप से पंच प्रयाग कहा जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;टीडीआईएल&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/utrn0078.htm|title= उत्तरांचल-एक परिचय|accessmonthday=[[28 अप्रॅल]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार 200 किलोमीटर का संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी [[ऋषिकेश]] होते हुए प्रथम बार मैदानों का स्पर्श [[हरिद्वार]] में करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण [[हिमालय]] से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। हरिद्वार भी हिन्दुओं का तीर्थ स्थान है। नदी के प्रवाह में मौसम के अनुसार आने वाले थोड़े बहुत परिवर्तन के बावज़ूद इसके [[जल]] की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि तब होती है, जब इसमें अन्य सहायक नदियाँ मिलती हैं तथा यह अधिक वर्षा वाले इलाक़े में प्रवेश करती है। एक तरफ [[अप्रॅल]] से [[जून]] के बीच हिमालय में पिघलने वाली बर्फ़ से इसका पोषण होता है, वहीं दूसरी ओर [[जुलाई]] से [[सितम्बर]] के बीच का मानसून इसमें आने वाली बाढ़ों का कारण बनता है। उत्तर प्रदेश राज्य में इसके दाहिने तट की सहायक नदियाँ, यमुना राजधानी [[दिल्ली]] होते हुए [[इलाहाबाद]] में गंगा में शामिल होती हैं तथा टोन्स नदी हैं, जो [[मध्य प्रदेश]] के [[विंध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] से निकलकर उत्तर की तरफ़ प्रवाहित होती है और शीघ्र ही गंगा में शामिल हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश में बाईं तरफ़ की सहायक नदियाँ [[रामगंगा नदी|रामगंगा]], [[गोमती नदी|गोमती]] तथा [[घाघरा नदी|घाघरा]] हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद गंगा [[बिहार]] राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हिमालय क्षेत्र की तरफ़ से  [[गंडक नदी|गंडक]], [[गंडक नदी|बूढ़ी गंडक]], [[कोसी नदी|कोसी]] तथा घुघरी हैं। दक्षिण की तरफ़ से इसकी मुख्य सहायक नदी [[सोन नदी|सोन]] है। यहाँ से यह नदी राजमहल पहाड़ियों का चक्कर लगाती हुई दक्षिण-पूर्व में फरक्का तक पहुँचती है, जो इस डेल्टा का सर्वोच्च बिन्दु है। यहाँ से गंगा भारत में अन्तिम राज्य [[पश्चिम बंगाल]] में प्रवेश करती है, जहाँ उत्तर की तरफ़ से इसमें महानंदा मिलती है (समूचे पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थानीय आबादी गंगा को [[पद्मा नदी|पद्मा]] कहकर पुकारती है)। गंगा के डेल्टा की सुदूर पश्चिमी शाखा [[हुगली नदी|हुगली]] है, जिसके तट पर महानगर [[कोलकाता]] (भूतपूर्व कलकत्ता) बसा हुआ है। स्वयं हुगली में पश्चिम से आकर उसकी दो सहायक नदियाँ [[दामोदर नदी|दामोदर]] व रूपनारायण शामिल होती हैं। बांग्लादेश में ग्वालंदो घाट के निकट गंगा में विशाल [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] शामिल होती है (इन दोनों के संगम के 241 किलोमीटर पहले तक इसे फिर यमुना के नाम से बुलाया जाता है)। गंगा और ब्रह्मपुत्र की संयुक्त धारा ही पद्मा कहलाने लगती है और चाँदपुर के निकट वह मेघना में शामिल हो जाती है। इसके बाद यह विराट जलराशि अनेक प्रवाहों में विभाजित होकर [[बंगाल की खाड़ी]] में समा जाती है। बांग्लादेश की राजधानी ढाका धालेश्वदी नदी की सहायक नदी बूढ़ी गंगा के तट पर स्थित है। जिन नदी शाखाओं से गंगा का डेल्टा बनता है, उसकी हुगली और मेघना के अलावा अन्य शाखाएँ पश्चिम बंगाल में जलांगी और बांग्लादेश में मातागंगा, भैरब, काबाडक, गराई-मधुमती तथा अरियल खान हैं।&lt;br /&gt;
*डेल्टा क्षेत्र में स्थित गंगा की सभी सहायक नदियाँ और शाखाएँ मौसम में परिवर्तनों के कारण अक्सर अपना रास्ता बदल लेती हैं। ये परिवर्तन विशेषकर 1750 ई. के बाद से ज़्यादा होने लगे हैं। ब्रह्मपुत्र 1785 ई. तक मैमनसिंह शहर के पास से बहती थी, अब यह वहाँ से 64 किलोमीटर पश्चिम में गंगा में मिलती है।&lt;br /&gt;
*गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की नदी घाटियों से बहकर आई हुई गाद से बने डेल्टा का क्षेत्रफल 60,000 वर्ग किलोमीटर है तथा उसका निर्माण [[मिट्टी]], रेत तथा [[खड़िया]] की क्रमिक परतों से हुआ है। यहाँ पर सड़ी-गली वनस्पति (पीट) लिग्नाइट (भूरे कोयले) की परतें भी उन इलाक़ों में मिलती हैं, जहाँ पहले घने वन हुआ करते थे। डेल्टा में नहरों के आसपास बाद में प्राकृतिक रूप से बहुत-सा खादर भी जमा हुआ है।&lt;br /&gt;
*गंगा डेल्टा की दक्षिणी सतह का निर्माण तेज़ गति से तथा तुलनात्मक रूप से हाल में बहकर आई गाद की भारी मात्रा से हुआ है। पूरब में समुद्र की तरफ़ इसी गाद के कारण बड़ी तेज़ी से नए-नए भूक्षेत्र (नदी द्वीप) बनते जा रहे हैं, जिन्हें ‘चार’ कहते हैं। वैसे डेल्टा का पश्चिमी समुद्री तट 18वीं सदी के बाद से लगभग अपरिवर्तित है।&lt;br /&gt;
*पश्चिम बंगाल की नदियों का प्रवाह बहुत धीमा है और उनसे काफ़ी कम पानी समुद्र में प्रवाहित होता है। बांग्लादेशी डेल्टा क्षेत्र में नदियाँ चौड़ी तथा गतिमान हैं और उनमें पानी विपुल मात्रा में बहता है। ये नदियाँ अनेक संकरी पहाड़ियों से परस्पर जुड़ी हुई हैं।&lt;br /&gt;
*वर्षा ऋतु (जून से [[अक्टूबर]]) में इस इलाक़े में कृत्रिम रूप से निर्मित उच्चभूमि पर बसाए गए गाँव कई फ़ीट पानी में डूब जाते हैं। इस मौसम में इन बस्तियों के बीच आवागमन का एकमात्र साधन नौकाएँ ही होती हैं।&lt;br /&gt;
*समूचे डेल्टा क्षेत्र का समुद्रतटीय इलाक़ा दलदली है। यह पूरा क्षेत्र सुन्दरवन कहलाता है और [[भारत]] व [[बांग्लादेश]], दोनों ने इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर रखा है।&lt;br /&gt;
*इस डेल्टा के कुछ हिस्सों में जंगली वनस्पतियों तथा धान से निर्मित पीट की परतें हैं। अनेक प्राकृतिक खाइयों (बिलों) में उस पीट के बनने की क्रिया जारी है। जिसका उपयोग स्थानीय किसान खाद, सुखाकर घरेलू तथा औद्योगिक ईधन के रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gaumukh-Gangotri-Glacier.jpg|thumb|250px|left|[[गंगोत्री]] हिमनद में [[गौमुख]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gomukh in Gangotri Himnad]] &lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन में इस उपमहाद्वीप की विशालतम नदी प्रणाली स्थित है। यहाँ [[जल]] की आपूर्ति मुख्यत: [[जुलाई]] से [[अक्टूबर]] के बीच दक्षिण-पश्चिमी मानसून तथा अप्रॅल से जून के बीच ग्रीष्म ऋतु के दौरान पिघलने वाली [[हिमालय]] की बर्फ़ से होती है। नदी के बेसिन में मानसून के उन कटिबंधीय तूफ़ानों से भी वर्षा होती है, जो जून से अक्टूबर के बीच बंगाल की खाड़ी में पैदा होते हैं। [[दिसम्बर]] और [[जनवरी]] में बहुत कम मात्रा में वर्षा होती है। औसत वार्षिक वर्षा बेसिन के पश्चिमी सिरे में 760 मिलीमीटर से लेकर पूर्वी सिरे पर 2,286 मिलीमीटर के बीच होती है ([[उत्तर प्रदेश]] में गंगा के ऊपरी कछार में जहाँ औसत वर्षा 762 से 1,016 मिलीमीटर होती है, वहीं बिहार के मध्यवर्ती मैदान में यह औसत 1,016 से 1,524 मिलीमीटर तथा डेल्टा क्षेत्र में 1,524 से 2,540 मिलीमीटर के बीच है)। डेल्टा क्षेत्र में मानसून के प्रारम्भ ([[मार्च]] से [[मई]]) तथा मानसून के अन्त ([[सितम्बर]] से [[अक्टूबर]]) में ज़ोरदार चक्रवाती समुद्री तूफ़ान आते हैं। इनसे काफ़ी बड़ी मात्रा में मानव जीवन, सम्पत्ति, फ़सलों तथा पशुओं का नुक़सान होता है। ऐसा ही एक भीषण विनाशकारी तूफ़ान [[नवम्बर]], [[1970]] में आया था, जिसमें कम से कम दो लाख और अधिक से अधिक पाँच लाख लोगों की मौत हुई थी। चूँकि गंगा के मैदान में उतार-चढ़ाव लगभग न के बराबर है, अत: नदी प्रवाह की गति धीमी है। [[दिल्ली]] में [[यमुना नदी]] से लेकर बंगाल की खाड़ी के 1,609 किलोमीटर के सम्पूर्ण फ़ासले में भूतल की ऊँचाई में मात्र 213 मीटर की कमी आती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान का कुल विस्तार 7,77,000 वर्ग किलोमीटर है। इस मैदान में मिट्टी की सतह, जो कहीं-कहीं 1,829 मीटर से भी ज़्यादा है, सम्भवत: 10 हज़ार वर्ष से अधिक पुरानी नहीं है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के इलाक़े में कभी घने जंगल हुआ करते थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों से पता चलता है कि 16वीं और 17वीं सदी तक यहाँ जंगली [[हाथी]], गौर, [[बारहसिंगा]], गैंडा, [[बाघ]] तथा [[सिंह|शेर]] का शिकार होता था। गंगा के सम्पूर्ण बेसिन से वहाँ की मूल प्राकृतिक वनस्पतियाँ लुप्त हो गई हैं और वहाँ अब लगातार बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए व्यापक रूप में खेती की जाती है। हिरन, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ तथा कुछ भेड़िए, भालू, सियार और लोमड़ी को छोड़कर जंगली जानवर बहुत कम हैं। डेल्टा के सुन्दरवन इलाक़े में बंगाल टाइगर (शेर), मगरमच्छ तथा दलदली हिरन अब भी मिल जाते हैं। नदियों में, ख़ासतौर से डेल्टा क्षेत्र में मछलियाँ विपुल मात्रा में पाई जाती हैं और स्थानीय निवासियों के भोजन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ पर मैना, तोता, कौआ, चील, तीतर और मुर्ग़ाबी जैसे पक्षियों की भी कई क़िस्में पाई जाती हैं। जाड़े के मौसम में बत्तख़ और चाहा पक्षी ऊँचे हिमालय को पार करके दक्षिण में पानी से घिरे क्षेत्रों की तरफ़ प्रवास करते हैं। बंगाल के इलाक़े में आमतौर से पाई जाने वाली मछलियों में फ़ेदर बैक (नोटोप्टेरिडी), वॉकिंग कैटफ़िश, गोरामि (एनाबैंटिडी) तथा मिल्कफ़िश (चैनिडी), बार्ब (सिप्राइनिडी) आदि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====जनजीवन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Garwhal-Gangotri-Waterfall.jpg|thumb|180px|[[गंगोत्री]] झरना, [[गढ़वाल]]&amp;lt;br /&amp;gt;Gangotri Waterfall, Garhwal]]&lt;br /&gt;
गंगा के बेसिन के निवासी नृजातीय रूप से मिश्रित मूल के हैं। पश्चिम और मध्य बेसिन में वे मूलत: [[आर्य]] पूर्वजों की सन्तान थे। बाद में तुर्क, [[मंगोल]], अफ़ग़ानी, फ़ारसी तथा अरब लोग पश्चिम से आय और अंतमिश्रित हो गए। पूरब और दक्षिण, ख़ासतौर से बंगाल के इलाक़े में तिब्बती, बर्मी तथा विविध नस्ल के पहाड़ी लोग भी मिलते हैं। इनसे भी बाद में आने वाले यूरोपीय लोग यहाँ न तो बसे और न ही स्थानीय लोगों के साथ [[विवाह]] सम्बन्ध बनाये।&lt;br /&gt;
====गंगा का मैदान====&lt;br /&gt;
गंगा, इलाहाबाद (प्रयाग) हरिद्वार से लगभग 800 किलोमीटर मैदानी यात्रा करते हुए [[गढ़मुक्तेश्वर]],सोरों, [[फ़र्रुख़ाबाद]], [[कन्नौज]], [[बिठूर]], [[कानपुर]] होते हुए पहुँचती है। यहाँ इसका संगम [[यमुना नदी|यमुना]] नदी से होता है। यह संगम स्थल हिन्दुओं का एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। इसके बाद हिन्दू धर्म की प्रमुख मोक्षदायिनी नगरी [[काशी]] ([[वाराणसी]]) में गंगा एक वक्र लेती है, जिससे यह यहाँ उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से [[मिर्ज़ापुर]], [[पटना]], [[भागलपुर]] होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियाँ, जैसे [[सोन नदी|सोन]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[घाघरा नदी|घाघरा]], [[कोसी नदी|कोसी]] आदि मिल जाती हैं। [[भागलपुर]] में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के [[मुर्शिदाबाद ज़िला|मुर्शिदाबाद ज़िले]] के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। [[भागीरथी नदी]] गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज ([[1974]] निर्मित) से छनते हुई बंगला देश में प्रवेश करती है। यहाँ से गंगा का डेल्टाई भाग शुरू हो जाता है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम [[हुगली नदी]] है। गंगा का यह मैदान मूलत: एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग 6-4 करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब से इसे हिमालय और [[प्रायद्वीप]] से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर है। इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित नदियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://vimi.wordpress.com/2009/02/22/bharat_sanrachana/|title=भारत की भौतिक संरचना|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=पर्यावरण के विभिन्न घटक|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
=====गंगा के तट पर बसे नगर=====&lt;br /&gt;
गंगा के मैदान में अनेक नगर बसे, जिनमें मुख्य रूप से रूड़की, [[सहारनपुर]], [[मेरठ]], आगरा (मशहूर मक़बरे [[ताजमहल]] का शहर), [[मथुरा]] (भगवान [[श्रीकृष्ण]] की जन्मस्थली के रूप में पूजनीय), [[अलीगढ़]], कानपुर, [[बरेली]], [[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[वाराणसी]] (पवित्र शहर बनारस), [[पटना]], [[भागलपुर]], राजशाही, मुर्शिदाबाद, बर्दवान (वर्द्धमान), कलकत्ता, हावड़ा, ढाका, खुलना और बारीसाल उल्लेखनीय हैं। डेल्टा क्षेत्र में कलकत्ता और उसके उपनगर हुगली के दोनों किनारों पर लगभग 80 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं व भारत के जनसंख्या, व्यापार तथा उद्योग को दृष्टि से सबसे घने बसे हुए इलाक़ों में गिने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सुंदरवन डेल्टा====&lt;br /&gt;
{{Main|सुंदरवन}}&lt;br /&gt;
हुगली नदी [[कोलकाता]], हावड़ा होते हुए [[सुंदरवन]] के भारतीय भाग में सागर से संगम करती है। पद्मा में [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] से निकली शाखा नदी [[जमुना नदी]] एवं मेघना नदी मिलती हैं। अंततः ये 350 किलोमीटर चौड़े सुंदरवन डेल्टा में जाकर [[बंगाल की खाड़ी]] में सागर-संगम करती है। यह डेल्टा गंगा एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई नवीन जलोढ़ से 1,000 वर्षों में निर्मित समतल एवं निम्न मैदान है। यहाँ गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है जिसे गंगा-सागर-संगम कहते हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url= http://www.indianetzone.com/2/ganga_river.htm|title= गंगा रिवर|accessmonthday=[[14 जून]]|accessyear=[[2009]]|format= एचटीएम|publisher=इण्डिया नेट ज़ोन |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt; विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध [[बाघ|बंगाल टाईगर]] का निवास स्थान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;इंडियानेट&amp;quot;/&amp;gt;  यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 15-20 मील (24-32 किलोमीटर) दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। जब डेल्टा का सागर की ओर निरन्तर विस्तार होता है तो उसे प्रगतिशील डेल्टा कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिहं |first=सविन्द्र |title= भौतिक भूगोल |year=जुलाई 2002 |publisher=वसुन्धरा प्रकाशन |location=गोरखपुर |id= |page=247-248 |accessday= 3|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीव-जन्तु==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Haridwar1.jpg|250px|thumb|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&amp;lt;br /&amp;gt;Ganga River, Haridwar]]&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि 16वीं तथा 17वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से ढका हुआ था। इन वनों में जंगली [[हाथी]], भैंस, गेंडा, शेर, [[बाघ]] तथा गवल का शिकार होता था। गंगा का तटवर्ती क्षेत्र अपने शांत व अनुकूल पर्यावरण के कारण रंग-बिरंगे पक्षियों का संसार अपने आंचल में संजोए हुए है। इसमें मछलियों की 140 प्रजातियाँ, 35 सरीसृप तथा इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://jajbat.blogspot.com/2008_05_01_archive.html|title=हमारी नदियों पर मंडराता ख़तरा |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=एच.टी.एम.एल|publisher=जज़्बात|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ की उत्कृष्ट पारिस्थितिकी संरचना में कई प्रजाति के वन्य जीवों जैसे नीलगाय, सांभर, खरगोश, नेवला, चिंकारा के साथ सरीसृप-वर्ग के जीव-जन्तुओं को भी आश्रय मिला हुआ है। इस इलाके में ऐसे कई जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ हैं जो दुर्लभ होने के कारण संरक्षित घोषित की जा चुकी हैं। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू,  लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफ़ी संख्या में मिलते हैं। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीट भी यहाँ पाए जाते हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव में धीरे-धीरे वनों का लोप होने लगा है और गंगा की घाटी में सर्वत्र कृषि होती है फिर भी गंगा के मैदानी भाग में हिरण, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ, भेड़िया, गीदड़, लोमड़ी की अनेक प्रजातियाँ काफ़ी संख्या में पाए जाते हैं। डालफिन की दो प्रजातियाँ गंगा में पाई जाती हैं। जिन्हें [[गंगा डालफिन]] और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाले [[शार्क]] की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है जिसमें बहते हुये पानी में पाई जानेवाली शार्क के कारण विश्व के वैज्ञानिकों की काफ़ी रुचि है।  इस नदी और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर बनने वाले मुहाने को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत-सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का गृहक्षेत्र है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/10/blog-post_131.html|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलामा|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा में [[मछली|मछलियों]] तथा [[सर्प|सर्पों]] की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं और मीठे पानी वाले दुर्लभ [[गंगा डाल्फ़िन|डालफिन]] भी पाए जाते हैं। यह [[कृषि]], [[पर्यटन]], साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित ज़रूरतों  को पूरा करती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु|जीवाणुओं]] व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावज़ूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफ़ाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर, 2008 में [[भारत]] सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.bihartodayonline.com/2008/11/jagran-yahoo-report_04.html|title= गंगा को भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= बिहार टुडे|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.voanews.com/hindi/archive/2008-11/2008-11-04-voa24.cfm|title= गंगा -भारत की राष्ट्रीय नदी |accessmonthday=[[4 नवंबर]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएम|publisher= वॉयस ऑफ अमेरिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (1600 किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last= |first=|title= समकालीन भारत |year=अप्रॅल 2003 |publisher=राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद |location=नई दिल्ली |id= |page=247-248 |accessday= 23|accessmonth= जून|accessyear= 2009}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहायक नदियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Junction-Of-Gange-And-Yamuna-Allahabad.jpg|thumb|350px|मानचित्र में गंगा और [[यमुना नदी|यमुना]] का संगम, [[इलाहाबाद]] ([[1885]])]]&lt;br /&gt;
गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना, रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं तथा दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलने वाली प्रमुख नदियाँ चंबल, सोन, बेतवा, केन, दक्षिणी टोस आदि हैं। यमुना गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है जो हिमालय की बन्दरपूँछ चोटी के आधार पर यमुनोत्री हिमखण्ड से निकली है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bharat.gov.in/knowindia/rivers.php|title=भारत के बारे में जानो|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारत सरकार|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; हिमालय के ऊपरी भाग में इसमें टोंस&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hindi.indiawaterportal.org/?q=content/उत्तराखंड-की-प्रमुख-नदियाँ |title=उत्तराखंड की प्रमुख नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=इंडिया वाटर पोर्टल |language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा बाद में लघु हिमालय में आने पर इसमें गिरि और आसन नदियाँ मिलती हैं। चम्बल, बेतवा, शारदा और केन यमुना की सहायक नदियाँ हैं। चम्बल इटावा के पास तथा बेतवा [[हमीरपुर उत्तर प्रदेश|हमीरपुर]] के पास यमुना में मिलती हैं। [[यमुना नदी|यमुना]] [[इलाहाबाद]] के निकट बायीं ओर से गंगा नदी में जा मिलती है। रामगंगा मुख्य हिमालय के दक्षिणी भाग [[नैनीताल]] के निकट से निकलकर [[बिजनौर]] से बहती हुई [[कन्नौज]] के पास गंगा में मिलती है। करनाली नदी मप्सातुंग नामक हिमनद से निकलकर [[अयोध्या]], फैजाबाद होती हुई बलिया ज़िले की सीमा के पास गंगा में मिल जाती है। इस नदी को पर्वतीय भाग में कौरियाला तथा मैदानी भाग में [[घाघरा नदी|घाघरा]] कहा जाता है। [[गंडक नदी|गंडक]] हिमालय से निकलकर [[नेपाल]] में शालीग्राम नाम से बहती हुई मैदानी भाग में नारायणी नदी का नाम पाती है। यह काली गंडक और त्रिशूल नदियों का जल लेकर प्रवाहित होती हुई सोनपुर के पास गंगा में मिलती है। कोसी की मुख्यधारा अरुण है जो गोसाई धाम के उत्तर से निकलती है। ब्रह्मपुत्र के बेसिन के दक्षिण से सर्पाकार रूप में अरुण नदी बहती है जहाँ यारू नामक नदी इससे मिलती है। इसके बाद [[हिमालय]] के [[कंचनजंगा]] शिखरों के बीच से बहती हुई यह दक्षिण की ओर 90 किलोमीटर बहती है जहाँ पश्चिम से सूनकोसी तथा पूरब से तामूर कोसी नामक नदियाँ इसमें मिलती हैं। इसके बाद कोसी नदी के नाम से यह [[शिवालिक पर्वतश्रेणी|शिवालिक]] को पार करके मैदान में उतरती है तथा बिहार राज्य से बहती हुई गंगा में मिल जाती है। [[अमरकंटक]] पहाड़ी से निकलकर [[सोन नदी]] [[पटना]] के पास गंगा में मिलती है। मध्य-प्रदेश के मऊ के निकट जनायाब पर्वत से निकलकर [[चम्बल नदी]] [[इटावा]] से 38 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी में मिलती है। [[बेतवा नदी]] मध्य प्रदेश में [[भोपाल]] से निकलकर उत्तर हमीरपुर के निकट यमुना में मिलती है। भागीरथी नदी के दायें किनारे से मिलने वाली अनेक नदियों में [[बांसलोई नदी|बाँसलई]], द्वारका, मयूराक्षी, रूपनारायण, कंसावती और रसूलपुर प्रमुख हैं। जलांगी और माथा भाँगा या चूनीं बायें किनारे से मिलती हैं जो अतीत काल में गंगा या पद्मा की शाखा नदियाँ थीं। किन्तु ये वर्तमान समय में गंगा से पृथक होकर वर्षाकालीन नदियाँ बन गई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रदूषण एवं पर्यावरण == &lt;br /&gt;
गंगा नदी विश्व भर में अपनी शुद्धीकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में [[बैक्टीरियोफेज]] नामक [[विषाणु]] होते हैं, जो [[जीवाणु]]ओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु ([[ऑक्सीजन]]) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। एक राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो कार्यक्रम के अनुसार इस कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का ख़तरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;बैक्टीरियोफेज का स्व-शुद्धिकरण प्रभाव, ऑक्सीजन रिटेन्शन रहस्य: [http://www.npr.org/templates/story/story.php?storyId=17134270 मिस्ट्री फ़ैक्टर गिव्स गैन्जेस ए क्लीन रेप्युटेशन] जूलियन क्रैन्डा-2 हॉल्लिक. नेशनल पब्लिक रेडियो। &amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर 3 डिग्री (सामान्य) से बढ़कर 6 डिग्री हो चुका है। गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.patrika.com/article.aspx?id=10912|title=खतरे में गंगा का अस्तित्व|accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=एएसपीएक्स| publisher=पत्रिका|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4126070.cms|title=गंगा को प्रदूषण से बचाएंगे 71 घड़ियाल&lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=नवभारत टाइम्स|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए क़ानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.lokmanch.com/cms/index.php/culture/4089-ganga-pollution-state-government-responsible|title=अब गंगा प्रदूषण मामला राज्य सरकार जिम्मेवार |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=लोकमंच|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://josh18.in.com/hindi/-moneylife/319321/0|title=अब मूर्ति विसर्जन से नहीं होगी गंगा मैली |accessmonthday=[[22 जून]]| accessyear=[[2009]]|format=|publisher=जोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इतना सबकुछ होने के बावज़ूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। 2007 की एक [[संयुक्त राष्ट्र]] रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की 2030 तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा। &amp;lt;ref&amp;gt; [http://www.boston.com/news/world/asia/articles/2007/06/24/global_warming_threatens_to_dry_up_ganges/ बोस्टन.कॉम पर] देखें- वैश्विक ऊष्मीकरण का [[उत्तर प्रदेश]] की गंगा पर प्रभाव।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक रूप से गंगा के मैदान से ही हिन्दुस्तान का हृदय स्थल निर्मित है और वही बाद में आने वाली विभिन्न सभ्यताओं का पालना बना। [[अशोक]] के ई. पू. के साम्राज्य का केन्द्र पाटलिपुत्र ([[पटना]]), बिहार में गंगा के तट पर बसा हुआ था। महान [[मुग़ल साम्राज्य]] के केन्द्र दिल्ली और [[आगरा]] भी गंगा के बेसिन की पश्चिमी सीमाओं पर स्थित थे। सातवीं सदी के मध्य में [[कानपुर]] के उत्तर में गंगा तट पर स्थित [[कन्नौज]], जिसमें अधिकांश उत्तरी भारत आता था, हर्ष के सामन्तकालीन साम्राज्य का केन्द्र था। मुस्लिम काल के दौरान, यानी 12वीं सदी से [[मुसलमान|मुसलमानों]] का शासन न केवल मैदान, बल्कि बंगाल तक फैला हुआ था। डेल्टा क्षेत्र के ढाका और [[मुर्शिदाबाद]] मुस्लिम सत्ता के केन्द्र थे। [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुगली के तट पर कलकत्ता (वर्तमान [[कोलकाता]]) की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे अपने पैर गंगा की घाटी में फैलाए और 19वीं सदी के मध्य में दिल्ली तक जा पहुँचे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा की इस घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ जिसका प्राचीन इतिहास अत्यन्त गौरवमयी और वैभवशाली है। जहाँ ज्ञान, धर्म, अध्यात्म व सभ्यता-संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। पाषाण या प्रस्तर युग का जन्म और विकास यहाँ होने के अनेक साक्ष्य मिले हैं। इसी घाटी में [[रामायण]] और [[महाभारत]] कालीन युग का उद्भव और विलय हुआ। [[शतपथ ब्राह्मण]], [[पंचविंश ब्राह्मण]], [[गोपथ ब्राह्मण]], [[ऐतरेय आरण्यक]], कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और [[महाभारत]] इत्यादि में वर्णित घटनाओं से उत्तर वैदिककालीन गंगा घाटी की जानकारी मिलती है। प्राचीन [[मगध महाजनपद ]] का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ जहाँ से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब [[मौर्य वंश|मौर्य]] और [[गुप्त वंश|गुप्त]] वंशीय राजाओं ने यहाँ शासन किया।&lt;br /&gt;
==आर्थिक महत्त्व==	&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में गंगा नदी के घाट&amp;lt;br /&amp;gt; Ghats of Ganga River in Varanasi]]&lt;br /&gt;
गंगा अपनी उपत्यकाओं में [[भारत]] और [[बांग्लादेश]] के कृषि आधारित अर्थ में भारी सहयोग तो करती ही है, यह अपनी सहायक नदियों सहित बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई के बारहमासी स्रोत भी हैं। इन क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रधान उपज में मुख्यतः [[धान]], [[गन्ना]], [[दाल]], [[तिलहन]], [[आलू]] एवं [[गेहूँ]] हैं। जो भारत की कृषि आज का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल एवं झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसों, तिल, गन्ना और जूट की अच्छी फ़सल होती है। नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत ज़ोरों पर चलता है। गंगा नदी प्रणाली भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। इसमें लगभग 375 मत्स्य प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा [[उत्तर प्रदेश]] व [[बिहार]] में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://fisheries.up.nic.in/manual.htm|title= प्रशिक्षण एवं प्रसार संबंधी मैनुअल|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएम|work= |publisher= मत्स्य विभाग, उत्तर प्रदेश |pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; फरक्का बांध बन जाने से गंगा नदी में हिल्सा मछली के बीजोत्पादन में सहायता मिली है। &amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.cifri.ernet.in/technology.html|title= हिल्सा ब्रीडिंग एण्ड हिल्साह हैचेरी|accessmonthday= |accessyear= |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= |month= |format= |work= |publisher= सी.आई.एफ.आर.आई.|pages= |language= अंग्रेज़ी|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा का महत्त्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल है जो राष्ट्रीय आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा नदी पर रैफ्टिंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है। जो साहसिक खेलों और पर्यावरण द्वारा भारत के आर्थिक सहयोग में सहयोग करते हैं। गंगा तट के तीन बड़े शहर [[हरिद्वार]], [[इलाहाबाद]] एवं [[वाराणसी]] जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते हैं। इस कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। गर्मी के मौसम में जब पहाड़ों से बर्फ़ पिघलती है, तब नदी में पानी की मात्रा व बहाव अच्छा होता है, इस समय उत्तराखंड में ऋषिकेश - बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला से ऋषिकेश के मध्य रैफ्टिंग, क्याकिंग व कैनोइंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है, जो साहसिक खोलों के शौक़ीनों और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर के भारत के आर्थिक सहयोग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.uttara.in/hindi/gmvn/tourist/adv_sports/rafting.html|title= राफ्टिंग |accessmonthday=22 जून |accessyear=2009 |last= |first= |authorlink= |coauthors= |date= |year= 2007|month= |format= एचटीएमएल|work= |publisher=उत्तराखंड पोर्टल|pages= |language=|archiveurl= |archivedate= |quote= }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बाँध एवं नदी परियोजनाएँ====&lt;br /&gt;
गंगा नदी पर निर्मित अनेक बाँध भारतीय जन-जीवन तथा अर्थ व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनमें प्रमुख हैं फ़रक्का बाँध, टिहरी बाँध, तथा भीमगोडा बाँध। फ़रक्का बांध (बैराज) भारत के [[पश्चिम बंगाल]] प्रान्त में स्थित गंगा नदी पर बनाया गया है। इस बाँध का निर्माण [[कोलकाता]] बंदरगाह को गाद (सिल्ट) से मुक्त कराने के लिये किया गया था जो कि 1950 से 1960 तक इस बंदरगाह की प्रमुख समस्या थी। कोलकाता [[हुगली नदी]] पर स्थित एक प्रमुख बंदरगाह है। ग्रीष्म ऋतु में हुगली नदी के बहाव को निरंतर बनाये रखने के लिये गंगा नदी के जल के एक बड़े हिस्से को फ़रक्का बाँध के द्वारा हुगली नदी में मोड़ दिया जाता है। गंगा पर निर्मित दूसरा प्रमुख बाँध टिहरी बाँध टिहरी विकास परियोजना का एक प्राथमिक बाँध है जो [[उत्तराखंड]] प्रान्त के टिहरी ज़िले में स्थित है। यह बाँध गंगा नदी की प्रमुख सहयोगी नदी [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] पर बनाया गया है। टिहरी बाँध की ऊँचाई 261 मीटर है जो इसे विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा बाँध बनाती है। इस बाँध से 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन, 270,000 हेक्टर क्षेत्र की सिंचाई और प्रतिदिन 102.20 करोड़ लीटर पेयजल दिल्ली, उत्तर-प्रदेश एवं उत्तरांचल को उपलब्ध कराना प्रस्तावित है। तीसरा प्रमुख बाँध भीमगोडा बाँध [[हरिद्वार]] में स्थित है जिसको सन 1840 में अंग्रेजो ने गंगा नदी के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिये बनवाया था। यह नहर हरिद्वार के भीमगोडा नामक स्‍थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। प्रारम्‍भ में इस नहर में जलापूर्ति गंगा नदी में एक अस्‍थायी बॉंध बनाकर की जाती थी। वर्षाकाल प्रारम्‍भ होते ही अस्‍थायी बॉंध टूट जाया करता था तथा मानसून अवधि में नहर में पानी चलाया जाता था। इस प्रकार इस नहर से केवल रबी की फ़सलों की ही सिंचाई हो पाती थी। अस्‍थायी बॉंध निर्माण स्‍थल के डाउनस्‍ट्रीम में वर्ष 1978-1984 की अवधि में भीमगोडा बैराज का निर्माण करवाया गया। इसके बन जाने के बाद ऊपरी गंगा नहर प्रणाली से खरीफ की फ़सल में भी पानी दिया जाने लगा।&lt;br /&gt;
====सिंचाई====&lt;br /&gt;
सिंचाई के लिए गंगा के पानी का उपयोग, चाहे बाढ़ का पानी हो या फिर नहरों का, पुरातन काल से ही प्रचलित है। इस तरह की सिंचाई का उल्लेख धर्मग्रन्थों तथा 2,000 से भी ज़्यादा वर्ष पहले लिखे [[पुराण|पुराणों]] में मिलता है। चौथी सदी में [[यूनान]] से भारत आए राजदूत [[मेगस्थनीज़]] ने यहाँ सिंचाई के उपयोग का उल्लेख किया है। 12वीं सदी से मुस्लिम काल में सिंचाई प्रणाली बहुत विकसित थी और [[मुग़ल]] बादशाहों ने बाद में बहुत सी नहरों का निर्माण किया। बाद में ब्रिटिश शासकों ने सिंचाई प्रणाली का और भी विस्तार किया।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Haridwar.jpg|thumb|250px|left|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]]]&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश और [[बिहार]] स्थित गंगा घाटी के [[कृषि]] क्षेत्रों को सिंचाई नहरों की प्रणाली से बहुत लाभ हुआ है। ख़ासतौर से इस विकसित सिंचाई प्रणाली के कारण [[गन्ना]], कपास और तिलहन जैसी नक़दी फ़सलों की पैदावार में वृद्धि सम्भव हुई। पुरानी नहरें मुख्यत: गंगा-यमुना के दौआब इलाक़े में हैं। ऊपरी गंगा नहर [[हरिद्वार]] से शुरू होती है और अपनी सहायक नहरों सहित 9,524 किलोमीटर लम्बी है। निचली गंगा नहर की लम्बाई अपनी सहायक नहरों सहित 8,238 किलोमीटर है और यह नरोरा से प्रारम्भ होती है। [[शारदा नहर]] से उत्तर प्रदेश में [[अयोध्या]] की भूमि सींची जाती है। गंगा के उत्तर में भूमि की ऊँचाई अधिक होने से नहरों के द्वारा सिंचाई करना कठिन होने के कारण भूमिगत जल पम्प द्वारा खींचकर सतह पर लाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के काफ़ी बड़े इलाक़े में हाथ से खोदे हुए [[कुआँ|कुओं]] से निकली नहरों के द्वारा सिंचाई की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बांग्लादेश]] में गंगा-कबाडाक योजना मुख्यत: सिंचाई के लिए ही है और उसमें खुलना, जेशोर और कुश्तिया ज़िलों के वे हिस्से आते हैं, जो डेल्टा के कमज़ोर हिस्से हैं, जहाँ नदियों का मार्ग गाद और घनी झाड़ियों के कारण अवरुद्ध हो चुका है। इस इलाक़े में कुल वार्षिक वर्षा सामान्यत: 1,524 मिलीमीटर से कम होती है तथा शीत ऋतु तुलनात्मक रूप से शुष्क रहती है। यहाँ की सिंचाई प्रणाली भी नहरों तथा भूमिगत जल खींचने वाले विद्युतचालित उपकरणों पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नौकायन====&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में गंगा और इसकी कुछ सहायक नदियाँ, ख़ासतौर से पूरब में, नौकायन के उपयुक्त थीं। मेगस्थनीज़ के अनुसार, चौथी शताब्दी ई. पू. में गंगा और इसकी प्रमुख सहायक नदियों में नौकायन होता था। गंगा के बेसिन में अंतर्देशीय नदी नौकायन 14वीं शताब्दी तक भी फल-फूल रहा था। 19वीं सदी के आते-आते सिंचाई तथा नौकायन के लिए उपयुक्त नहरों की जल परिवहन प्रणाली के प्रमुख मार्ग बन चुके थे। पैंडल स्टीमरों के आगमन से अंतर्देशीय परिवहन में भी जो क्रान्ति आई, उससे बंगाल और बिहार के नील उद्योग को बहुत बढ़ावा मिला। गंगा में कलकत्ता से इलाहाबाद और उससे आगे यमुना में आगरा तक तथा उधर [[ब्रह्मपुत्र नदी|ब्रह्मपुत्र]] तक नियमित स्टीमर सेवाएँ चलने लगीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं सदी के मध्य में रेलमार्गों के बनने से बड़े पैमाने पर जल परिवहन में गिरावट शुरू हो गई। सिंचाई हेतु पानी बहुत अधिक मात्रा में खींच लिए जाने से भी नौकायन विपरीत रूप से प्रभावित हुआ। अब तो नौकायन केवल इलाहाबाद के आसपास के मध्य गंगा बेसिन तक ही सीमित होकर रह गया है, जिसमें से अधिकांश देसी नौकाओं पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्चिम बंगाल तथा बांग्लादेश अब भी [[जूट]], घास, [[चाय]], अनाज तथा अन्य कृषि और ग्रामीण उत्पादों के परिवहन के लिए जलमार्गों पर निर्भर हैं। बांग्लादेश में चालना, खुलना, बारीसाल, चाँदपुर, नारायणगंज, ग्वालंदो घाट, सिरसागंज, भैरव बाज़ार तथा फेंचूगंज और भारत में कोलकाता, गोलपाड़ा, [[धुबुरी]] और डिब्रूगढ़ प्रमुख नदी बंदरगाह हैं। [[1947]] में भारत के विभाजन से बड़े दूरगामी परिवर्तन हुए। कलकत्ता से [[असम]] तक अंतर्देशीय जलमार्गों के द्वारा पहले बड़े पैमाने पर होने वाला व्यापार लगभग बन्द ही हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश में अंतर्देशीय जल परिवहन की ज़िम्मेदारी अंतर्देशीय जल परिवहन प्राधिकरण की है। भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों का नीति निर्धारण केन्द्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन मण्डल (सेंट्रल वॉटर ट्रांसपोर्ट बोर्ड) करता है। लेकिन राष्ट्रीय जलमार्गों की व्यापक प्रणाली का विकास एवं रख-रखाव अंतर्देशीय जलमार्ग (इनलैंड वॉटरवेज़ अथॉरिटी) प्राधिकरण करता है। गंगा के बेसिन में इलाहाबाद से लेकर हल्दिया तक लगभग 1,607 किलोमीटर लम्बा जलमार्ग इस प्रणाली में शामिल है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डेल्टा के मुख पर भारत की सीमा के ठीक भीतर फ़रक्का बाँध का निर्माण बांग्लादेश और भारत के बीच विवाद का कारण बन गया है। भारत का कहना है कि गाद के जमने तथा खारा पानी घुस आने की वजह से कोलकाता बंदरगाह का पतन हो गया है। कोलकाता की स्थिति में सुधार के लिए खारे पानी को निकालकर और जलस्तर को बढ़ाकर भारत ने फ़रक्का बैराज से गंगा को मोड़कर ताज़ा पानी हासिल करने की कोशिश की है। अब एक बड़ी नहर द्वारा पानी [[भागीरथी नदी]] में लाया जाता है, जो कोलकाता से परे [[हुगली नदी]] में समाहित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बांग्लादेश का कहना है कि नदियों के तटवर्ती देशों की परस्पर समृद्धि के लिए यह ज़रूरी है कि अंतर्देशीय नदियों के पानी पर उनका संयुक्त नियंत्रण होना चाहिए। सिंचाई, नौकायन तथा खारे पानी की रोकथाम के लिए गंगा का पानी बांग्लादेश में भी उतना ही आवश्यक है, जितना भारत के लिए। बांग्लादेश के अनुसार, फ़रक्का बाँध ने उसे पानी के एक ऐसे बहुमूल्य स्रोत से वंचित कर दिया है, जो कि उसकी समृद्धि के लिए आवश्यक है। दूसरी तरफ़ [[भारत]] गंगाजल की समस्या के बारे में द्विपक्षीय रवैया अपनाये जाने के पक्ष में है। दोनों देशों के बीच कई अंतरिम समझौते हुए हैं, लेकिन अभी तक इस विवाद का कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया है। भारत के असम में ब्रह्मपुत्र के पानी को बांग्लादेश से होकर एक नहर द्वारा गंगा में मोड़ने के प्रस्ताव के जवाब में बांग्लादेश ने सुझाया है कि पूर्वी [[नेपाल]], पश्चिम बंगाल होते हुए एक नहर बांग्लादेश तक बनाई जाए। किसी भी प्रस्ताव को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। [[1987]] तथा [[1988]] में बांग्लादेश में आई प्रलयंकारी बाढ़ों, जिसमें 1988 की बाढ़ उस देश के इतिहास की सर्वाधिक विनाशकारी बाढ़ थी, इसको देखते हुए विश्व बैंक ने इस क्षेत्र के लिए अब बाढ़ नियंत्रण की एक दूरगामी योजना बनाई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पनबिजली योजना====&lt;br /&gt;
गंगा की लगभग 130 लाख किलोवाट की अनुमानित जलविद्युत क्षमता का 2/5 हिस्सा भारत में तथा शेष नेपाल में है। इस क्षमता में से कुछ का दोहन भारत ने [[चंबल नदी|चंबल]] और रिहंद नदियों द्वारा किया है।&lt;br /&gt;
गंगा का मैदान दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला तथा उपजाऊ इलाक़ों में से एक है। चूँकि इस मैदानी क्षेत्र में अवरोध न के बराबर है, इसीलिए गंगा की धारा अधिकांश इलाक़े में चौड़ी व धीमी गति से प्रवाहित है। उसके कुल अपवाह बेसिन का 9,75,900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल, यानी भारत के कुल क्षेत्र का लगभग चौथाई हिस्सा है और उस पर लगभग 50 करोड़ की आबादी निर्भर करती है। इस बेसिन की भूमि पर गहन खेती होती है। गंगा प्रणाली की जलापूर्ति आंशिक रूप से जुलाई से अक्टूबर के बीच होने वाली मानसून की वर्षा और अप्रॅल से जून के बीच [[हिमालय]] पर गर्मी से पिघलने वाली बर्फ़ पर निर्भर करती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप का यह विस्तृत उत्तर-मध्य खण्ड, जिसे उत्तर भारतीय मैदान भी कहा जाता है, पश्चिम में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी और गंगा के डेल्टा से लेकर [[सिंधु नदी|सिंधु नदी घाटी]] तक फैला हुआ है। इस इलाक़े में इस उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध और सघन जनसंख्या वाले क्षेत्र हैं। इस मैदान का अधिकांश हिस्सा गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के द्वारा पूर्व में सिंध नदी द्वारा पश्चिम में बहकर लाई गई कछारी मिट्टी से बना हुआ है। मैदान के पूर्वी हिस्सों में कम बारिश या सर्दियाँ शुष्क होती हैं। किन्तु मानसून की वर्षा इतनी अधिक होती है कि बड़े-बड़े इलाक़ों में दलदल या उथली झीलें बन जाती हैं। ज्यों-ज्यों पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, यह मैदान शुष्क होता चला जाता है और अन्त में थार के रेगिस्तान में बदल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
[[भारत]] की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को [[देवी]] के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र [[तीर्थस्थल]] गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें [[वाराणसी]] और [[हरिद्वार]] सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://hbash.blogspot.com/2008/11/blog-post.html |title=भारत की मुख्य नदियाँ|accessmonthday=[[21 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=हिन्दी ब्लाग|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; मरने के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना [[मोक्ष]] प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या [[अंतिम संस्कार]] की इच्छा भी रखते हैं। [[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|280px|[[कुम्भ मेला]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumb Fair, Allahabad]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके घाटों पर लोग [[पूजा]] अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए [[मकर संक्राति]], [[कुम्भ मेला|कुंभ]] और [[गंगा दशहरा]] के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हज़ार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम्&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=6127|title= श्रीगंगासहस्त्रनामस्तोत्रम|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;  और आरती&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://bhavishyawani.mywebdunia.com/2009/02/25/gangaji_ki_aarti.html|title= श्रीगंगाजी की आरती|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=वेबदुनया|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। [[उत्तराखंड]] के [[पंच प्रयाग]] तथा [[प्रयाग]]राज जो इलाहाबाद में स्थित है गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं। गंगा नदी का धार्मिक महत्व सम्भवत: विश्व की किसी भी अन्य नदी से ज़्यादा है। आदिकाल से ही यह पूजी जाती रही है और आज भी [[हिंदू|हिन्दुओं]] के लिए यह सबसे पवित्र नदी है। इसे देवी स्वरूप माना जाता है। एक किंवदन्ती के अनुसार, महान तपस्वी [[भगीरथ]] की प्रार्थना पर देवी गंगा को स्वयं भगवान [[विष्णु]] ने इस धरती पर भेजा। लेकिन गंगा जिस [[वेग]] से धरती पर अवतरित हुईं, उससे उनके मार्ग में आने वाली हर वस्तु के जलप्लावित होने का ख़तरा था। इसीलिए भगवान [[शिव]] ने पहले ही उन्हें अपनी जटाओं में लपेटकर उनके वेग को नियंत्रित और शान्त किया। मुक्ति चाहने वाले उसके बाद ही उसमें स्नान कर पाए। हिन्दुओं के तीर्थस्थल वैसे तो समूचे उपमहाद्वीप में फैल हुए हैं, तथापि गंगा तट पर बसे तीर्थ हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इनमें प्रमुख हैं, इलाहाबाद में गंगा और यमुना का संगम, जहाँ एक निश्चित अन्तराल पर जनवरी-फ़रवरी में [[कुम्भ मेला]] आयोजित होता है। इस अनुष्ठान के समय लाखों तीर्थयात्री गंगा में स्नान करते हैं। पवित्र स्नान की दृष्टि से अन्य तीर्थ हैं, [[वाराणसी]], [[काशी]] और [[हरिद्वार]]। कलकत्ता में [[हुगली नदी]] भी पवित्र मानी जाती है। तीर्थयात्रा की दृष्टि से गंगा तट पर [[गंगोत्री]] और [[अलकनन्दा नदी|अलकनन्दा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम भी महत्त्वपूर्ण है। हिन्दू अपने मृतकों की भस्म एवं अस्थियाँ यह मानते हुए यहाँ विसर्जित करते हैं कि ऐसा करने से मृतक सीधे स्वर्ग में जाता है। इसीलिए गंगा के तट पर कई स्थानों पर शवदाह हेतु विशेष घाट बने हुए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा पुनीततम नदी है और इसके तटों पर हरिद्वार, कनखल, [[प्रयाग]] एवं काशी जैसे परम प्रसिद्ध तीर्थ अवस्थित हैं। प्रसिद्ध नदीसूक्त&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] 10, 75, 5-6&amp;lt;/ref&amp;gt; में सर्वप्रथम गंगा का ही आह्वान किया गया है। [[ऋग्वेद]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ऋग्वेद]] (6|45|31&amp;lt;/ref&amp;gt; में ‘गंगय’ शब्द आया है जिसका सम्भवत: अर्थ है ‘गंगा पर वृद्धि करता हुआ।’&amp;lt;ref&amp;gt;अधि बृबु: पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरु:कक्षो न गाङग्य:।। [[ऋग्वेद]] (6|45|31)। अन्तिम पद का अर्थ है ‘गंगा के तटों पर उगी हुई घास या झाड़ी के समान।’&amp;lt;/ref&amp;gt; [[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13|5|4|11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[ऐतरेय ब्राह्मण]] &amp;lt;ref&amp;gt;[[ऐतरेय ब्राह्मण]] (39, 9&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा एवं यमुना के किनारे पर भरत दौष्यंति की विजयों एवं यज्ञों का उल्लेख हुआ है। शतपथ ब्राह्मण&amp;lt;ref&amp;gt;[[शतपथ ब्राह्मण]] (13, 5, 4,11 एवं 13&amp;lt;/ref&amp;gt; में एक प्राचीन गाथा का उल्लेख है- ‘नाडपित् पर अप्सरा शकुन्तला ने भरत को गर्भ में धारण किया, जिसने सम्पूर्ण [[पृथ्वी]] को जीतने के उपरान्त [[इन्द्र]] के पास [[यज्ञ]] के लिए एक सहस्र से अधिक अश्व भेजे।’ [[महाभारत]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] (अनुशासन. 26|26-103&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं [[पुराण|पुराणों]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[पुराण]]  ([[नारद पुराण|नारदीय]], उत्तरार्ध, अध्याय 38-45 एवं 51|1-48; [[पद्म पुराण]]  5|60|1-127; अग्नित्र अध्याय 110; [[मत्स्य पुराण]], अध्याय 180-185; पद्म पुराण, आदिखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की महत्ता एवं पवित्रीकरण के विषय में सैकड़ों प्रशस्तिजनक श्लोक हैं। [[स्कन्द पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, अध्याय 33-37&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा के एक सहस्र नामों का उल्लेख है। यहाँ पर उपर्युक्त ग्रन्थों में दिये गये वर्णनों का थोड़ा अंश भी देना सम्भव नहीं है। अधिकांश भारतीयों के मन में गंगा जैसी नदियों एवं हिमालय जैसे पर्वतों के दो स्वरूप घर कर बैठे हैं-&lt;br /&gt;
#भौतिक &lt;br /&gt;
#आध्यात्मिक&lt;br /&gt;
विशाल नदियों के साथ दैवी जीवन की प्रगाढ़ता संलग्न हो ही जाती है। टायलर ने अपने ग्रन्थ ‘प्रिमिटिव कल्चर’&amp;lt;ref&amp;gt;प्रिमिटिव कल्चर (द्वितीय संस्करण, पृष्ठ 477&amp;lt;/ref&amp;gt; में लिखा है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;‘जिन्हें हम निर्जीव पदार्थ कहते हैं, यथा नदियाँ, पत्थर, वृक्ष, अस्त्र-शस्त्र आदि। वे जीवित, बुद्धिशाली हो उठते हैं, उनसे बातें की जाती हैं, उन्हें प्रसन्न किया जाता है और यदि वे हानि पहुँचाते हैं तो उन्हें दण्डित भी किया जाता है।’&amp;lt;/blockquote&amp;gt; गंगा के महात्म्य एवं उसकी तीर्थयात्रा के विषय में पृथक-पृथक ग्रन्थ प्रणीत हुए हैं। यथा- गणेश्वर (1350 ई.) का गंगापत्तलक, मिथिला के राजा पद्मसिंह की रानी विश्वासदेवी की [[गंगावाक्यावली]], गणपति की [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] एवं वर्धमान की [[गंगाकृत्यविवेक]]। इन ग्रन्थों की तिथियाँ इस महाग्रन्थ के अन्त में दी हुई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गंगा स्नान विधि====&lt;br /&gt;
गंगा स्नान के लिए संकल्प करने के विषय में निबन्धों ने कई विकल्प दिये हैं। [[प्रायश्चित्ततत्त्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 497-498&amp;lt;/ref&amp;gt; में विस्तृत संकल्प दिया हुआ है। [[गंगावाक्यावली]]&amp;lt;ref&amp;gt;अद्यामुके मासि अमुकपक्षे अमुकतिथौ सद्य:पापप्रणाशपूर्वकं सर्वपुण्यप्राप्तिकामोगंगाया स्नानमहं करिष्ये। [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 141)। और देखिए तीर्थचि. (पृष्ठ 206-207), जहाँ गंगास्नान के पूर्वक लिंक संकल्पों के कई विकल्प दिये हुए हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (102&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो स्नान विधि दी हुई है वह सभी वर्णों एवं [[वेद]] के विभिन्न शाखानुयायियों के लिए समान है। मत्स्यपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्यपुराण]] (अध्याय 102&amp;lt;/ref&amp;gt; के वर्णन का निष्कर्ष यों है- बिना स्नान और शरीर की शुद्धि एवं शुद्ध विचारों का अस्तित्व नहीं होता। इसी से मन को शुद्ध करने के लिए सर्वप्रथम स्नान की व्याख्या होती है। कोई किसी कूप या धारा से पात्र में जल लेकर स्नान कर सकता है या बिना इस विधि से भी स्नान कर सकता है। ‘नमो नारायणाय’ मंत्र के साथ बुद्धिमान लोगों को तीर्थस्थल का ध्यान करना चाहिए। हाथ में दर्भ (कुश) लेकर, पवित्र एवं शुद्ध होकर आचमन करना चाहिए। चार वर्गहस्त स्थल को चुनना चाहिए और निम्न मंत्र के साथ गंगा का आवाहन करना चाहिए।&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;तुम विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, तुम विष्णु से भक्ति रखती हो, तुम विष्णु की पूजा करती हो, अत: जन्म से मरण तक किये गए पापों से मेरी रक्षा करो। स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में 35 करोड़ तीर्थ हैं; हे जाह्नवी गंगा, ये सभी देव तुम्हारे हैं। देवों में तुम्हारा नाम नन्दिनी (आनन्द देने वाली) और नलिनी भी है तथा तुम्हारे अन्य नाम भी हैं, यथा- दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, शान्तिप्रदायिनी।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;स्मृतिचन्द्रिका (1, पृष्ठ 182) ने [[मत्स्य पुराण]] (102) के श्लोक (1-8) उद्धृत किये हैं। स्मृतिचन्द्रिका ने वहीं गंगा के 12 विभिन्न नाम दिए हैं। [[पद्म पुराण]] (4|81|17-19) में [[मत्स्य पुराण]] के नाम पाये जाते हैं। इस अध्याय के आरम्भ में गंगा के सहस्र नामों की ओर संकेत किया जा चुका है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; स्नान करते समय इन नामों का उच्चारण करना चाहिए। तब तीन लोकों में बहने वाली गंगा पास में चली आयेगी (भले ही व्यक्ति घर पर ही स्नान कर रहा हो)। व्यक्ति को उस जल को, जिस पर सात बार मंत्र पढ़ा गया हो, तीन या चार या पाँच या सात बार सिर पर छिड़कना चाहिए। नदी के नीचे की मिट्टी का मंत्र पाठ के साथ लेप करना चाहिए। इस प्रकार स्नान एवं आचमन करके व्यक्ति को बाहर आना चाहिए और दो श्वेत एवं पवित्र वस्त्र धारण करने चाहिए। &lt;br /&gt;
====तर्पण====&lt;br /&gt;
इसके उपरान्त उसे तीन लोकों के सन्तोष के लिए [[देवता|देवों]], [[ऋषि|ऋषियों]] एवं पितरों का यथाविधि तर्पण करना चाहिए। तर्पण के दो प्रकार हैं- &lt;br /&gt;
#प्रधान&lt;br /&gt;
#गौण &lt;br /&gt;
प्रधान विद्याध्ययन समाप्त किये हुए द्विजों द्वारा देवों, ऋषियों एवं पितरों के लिए प्रतिदिन किया जाता है। गौण स्नान के अंग के रूप में किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं स्नानमुच्यते। तर्पणं तु भवेत्तस्य अंगत्त्वेन प्रकीर्तितम्।। [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (गंगाभक्ति., 162&amp;lt;/ref&amp;gt; तर्पण स्नान एवं ब्रह्मयज्ञ दोनों का अंग है।  तर्पण अपनी वेद शाखा के अनुसार होता है। दूसरा नियम यह है कि तर्पण तिलयुक्त जल से किसी तीर्थस्थल, [[गया]] में, पितृपक्ष (आश्विन के कृष्णपक्ष) में किया जाता है। विधवा भी किसी तीर्थ में अपने पति या सम्बन्धी के लिए तर्पण कर सकती है। संन्यासी ऐसा नहीं करता। पिता वाला व्यक्ति भी तर्पण नहीं करता। किन्तु विष्णुपुराण के मत से वह तीन अंजिली देवों, तीन ऋषियों को एवं एक प्रजापति (‘देवास्तुप्यन्ताम्’ के रूप में) को देता है। एक अन्य नियम यह है कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;‘श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन दीयते। तर्पणे तूभयं कुर्यादिष एव विधि:स्मृत।।&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात एक हाथ (दाहिने) से [[श्राद्ध]] में या [[अग्नि]] में आहुति दी जाती है, किन्तु तर्पण में दोनों हाथों से जल स्नान करने वाली नदी में डाला जाता है या फिर भूमि पर छोड़ा जाता है। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 57|62-63)’&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त देवर्षिपितृमानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:।। अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मयुभ-नाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्।। &amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात यदि कोई विस्तृत विधि से तर्पण न कर सके तो वह निम्न मंत्रों के साथ (जो [[वायु पुराण]], 110|21-22 में दिये हुए हैं) तिल एवं कुश से मिश्रित जल की तीन अंजलियाँ दे सकता है&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; इसके पश्चात [[सूर्य देवता|सूर्य]] को नमस्कार एवं तीन बार प्रदक्षिणा कर तथा किसी [[ब्राह्मण]], [[सोना]] एवं [[गाय]] का स्पर्श कर स्नानकर्ता को विष्णु मंदिर (या अपने घर, पाठांतर के अनुसार) में जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ यह ज्ञातव्य है कि मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण]] (102|2-31&amp;lt;/ref&amp;gt; के श्लोक, जिनका निष्कर्ष ऊपर दिया गया है, कुछ अन्तरों के साथ पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (पातालखण्ड 81|12-42 एवं सृष्टिखण्ड 20|145-176&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी पाये जाते हैं। प्रायश्चित्ततत्त्व&amp;lt;ref&amp;gt;[[प्रायश्चित्ततत्त्व]] पृष्ठ 502&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा स्नान के समय के मंत्र दिये हुए हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुपादाब्जसम्भूते गंगे त्रिपथगामिनि। धर्मव्रतेति विख्याते पापं में हर जाह्नवी।। श्रद्धया भक्तिसम्पन्ने श्रीमातर्देवि जाह्नवि। अमृतेनाम्बुना देवि भागीरथी पुनीह माम्।। स्मृतिचंद्रिका (1|131); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (502); त्वं देव सरितां नाथ त्वं देवि सरितां वरे। उभयो: संगमे स्नात्वा मुञ्चामि दुरितानि वै।। वही। और देखिए [[पद्म पुराण]] (सृष्टिखण्ड, 60|60&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पौराणिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। कुछ पुराणों ने गंगा को मन्दाकिनी के रूप में स्वर्ग में, गंगा के रूप में पृथ्वी पर और भोगवती के रूप में पाताल में प्रवाहित होते हुए वर्णित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] 6|267|47&amp;lt;/ref&amp;gt; [[विष्णु पुराण|विष्णु]] आदि पुराणों ने गंगा को [[विष्णु]] के बायें पैर के अँगूठे के नख से प्रवाहित माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;वामपादाम्बुजांगुष्ठनखस्रोतोविनिर्गताम्। विष्णोर्बभर्ति यां भक्त्या शिरसाहनिंशं ध्रुव:।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|109); कल्पतरु (तीर्थ, पृष्ठ 161) ने ‘शिव:’ पाठान्तर दिया है। ‘नदी सा वैष्णवी प्रोक्ता विष्णुपादसमुदभवा।’ [[पद्म पुराण]]  (5|25|188)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ पुराणों में ऐसा आया है कि [[शिव]] ने अपनी जटा से गंगा को सात धाराओं में परिवर्तित कर दिया, जिनमें तीन (नलिनी, ह्लदिनी एवं पावनी) पूर्व की ओर, तीन (सीता, चक्षुस एवं [[सिन्धु नदी|सिन्धु]]) पश्चिम की ओर प्रवाहित हुई और सातवीं धारा [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] हुई ([[मत्स्य पुराण]] 121|38-41; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] 2|18|39-41 एवं 1|3|65-66)। [[कूर्म पुराण]] (1|46|30-31) एवं [[वराह पुराण]] (अध्याय 82, गद्य में) का कथन है कि गंगा सर्वप्रथम सीता, [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], सुचक्ष एवं भद्रा नामक चार विभिन्न धाराओं में बहती है। अलकनंदा दक्षिण की ओर बहती है, भारतवर्ष की ओर आती है और सप्तमुखों में होकर समुद्र में गिरती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तथैवालकनंदा च दक्षिणादेत्य भारतम्। प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तम:।। [[कूर्म पुराण]] (1|46|31)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (73|68-69) में गंगा को विष्णु के पाँव से एवं शिव के जटाजूट में अवस्थित माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दूसरे पौराणिक आख्यान के अनुसार गंगा [[हिमालय]] और मैना की पुत्री तथा उमा की भगिनी थीं। महाभारत की एक कथा उसे कुरुराज [[शान्तनु]] की पत्नी और [[भीष्म]] की माता बताती है। जिसमें भीष्म का दूसरा नाम गांगेय भी है। गंगा का सम्बन्ध [[कार्तिकेय]] के मातृत्व से भी है। [[हिंदू|हिन्दुओं]] के जितने तीर्थ इस नदी के तीर पर हैं, उतने कहीं पर नहीं और उसकी पवित्रता का प्रभाव तो भारतीयों पर इतना गहरा पड़ा कि उन्होंने अनेक दूसरी नदियों के नाम भी गंगा रख दिये। जहाँ-जहाँ भारतीय संस्कृति का विस्तार हुआ, वहाँ-वहाँ गंगा की पवित्रता का विविध रूप से उल्लेख हुआ। गंगा की मकर पर आरूढ़ चँवर अथवा कलश धारिणी मूर्तियाँ भी गुप्तकाल में बनने लगी थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]], अध्याय 12, 42, 47, 83-88, 90, 93, 95, 99, 107-109 आदि।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ऋग्वेद]] के नदीसूक्त में गंगा की स्तुति हुई है और [[पुराण|पुराणों]] ने उसकी महिमा का अनन्त बखान किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार विवद्गंगा, [[आकाशगंगा नदी|आकाशगंगा]] अथवा स्वर्गगंगा विष्णु के अँगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण [[भगीरथ]] के स्तवन से [[कपिल मुनि]] द्वारा भस्मीकृत [[राजा सगर]] के 60,000 [[पुत्र|पुत्रों]] की अस्थियों को पवित्र करने के लिए हुआ। भगीरथ के साथ इसी संयोग के कारण गंगा का दूसरा नाम भागीरथी पड़ा। पौराणिक परम्परा है कि स्वर्ग से उतरने के कारण गंगा अत्यन्त कुपित हो उठी थीं और उसके कोप के कारण [[पृथ्वी]] पर उसकी धारा पड़ते ही उनके बहकर नष्ट हो जाने के भय से [[शिव]] ने अपनी जटा में उसे समेट लिया, जिससे उनकी जटाओं में उलझ जाने के कारण धारा पृथ्वी पर सीधी नहीं पड़ी और गंगा की गति मन्द हो गई। इसी सम्बन्ध में शिव का एक नाम गंगाधर भी पड़ा। गंगा का अवतरण तपस्वी जह्नु के यज्ञ के लिए घातक हुआ, जिससे क्रुद्ध होकर उस तापस ने गंगा को पी डाला और प्रार्थना के बाद उसने [[कान]] से गंगा की धारा निकाल दी, जिससे वह जाह्नवी कहलाई हैं। &lt;br /&gt;
====वन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (अध्याय 85&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति में कई श्लोक&amp;lt;ref&amp;gt;[[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]] (श्लोक 88-97&amp;lt;/ref&amp;gt; दिये हैं, जिनमें से कुछ का अनुवाद इस प्रकार है- &amp;quot;जहाँ भी कहीं स्नान किया जाए, गंगा [[कुरुक्षेत्र]] के बराबर है। किन्तु कनखल की अपनी विशेषता है और प्रयाग में इसकी परम महत्ता है। यदि कोई सैकड़ों पापकर्म करके [[गंगाजल]] का अवसिंचन करता है तो गंगाजल उन दुष्कृत्यों को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार से [[अग्नि]] ईधन को जला देती है। [[सत युग]] में सभी स्थल पवित्र थे, [[त्रेता युग]] में [[पुष्कर]] सबसे अधिक पवित्र था, [[द्वापर युग]] में कुरुक्षेत्र एवं [[कलियुग]] में गंगा। नाम लेने पर गंगा पापी को पवित्र कर देती है। इसे देखने से सौभाग्य प्राप्त होता है। जब इसमें स्नान किया जाता है या इसका [[जल]] ग्रहण किया जाता है तो सात पीढ़ियों तक कुल पवित्र हो जाता है। जब तक किसी मनुष्य की अस्थि गंगा जल को स्पर्श करती रहती है, तब तक वह स्वर्गलोक में प्रसन्न रहता है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है और केशन के समान कोई देव। वह देश जहाँ गंगा बहती है और वह तपोवन जहाँ पर गंगा पाई जाती है, उसे सिद्धिक्षेत्र कहना चाहिए, क्योंकि वह गंगातीर को छूता रहता है।&amp;quot;&lt;br /&gt;
====अनुशासन पर्व====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अनुशासन पर्व महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt; [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (36|26, 30-31&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि वे [[महाजनपद|जनपद]] एवं देश, वे [[पर्वत]] एवं [[आश्रम]], जिनसे होकर गंगा बहती है, पुण्य का फल देने में महान हैं। वे लोग, जो जीवन के प्रथम भाग में पापकर्म करते हैं, यदि गंगा की ओर जाते हैं तो परम पद प्राप्त करते हैं। जो लोग गंगा में स्नान करते हैं उनका फल बढ़ता जाता है। वे पवित्रात्मा हो जाते हैं और ऐसा पुण्यफल पाते हैं जो सैकड़ों वैदिक यज्ञों के सम्पादन से भी नहीं प्राप्त होता। [[श्रीमद्भागवदगीता|भगवदगीता]] में भगवान [[श्रीकृष्ण]] ने कहा है कि धाराओं में मैं गंगा हूँ।&amp;lt;ref&amp;gt;स्रोतसामस्मि जाह्नवी, 10|31&amp;lt;/ref&amp;gt; मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (8|92&amp;lt;/ref&amp;gt; ने साक्षी को सत्योच्चारण के लिए जो कहा है उससे प्रकट होता है कि [[मनुस्मृति]] के काल में गंगा एवं [[कुरुक्षेत्र]] सर्वोच्च पुनीत स्थल थे।&amp;lt;ref&amp;gt;यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदि स्थित:। तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून्गम:।। मनु (8|92)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Varanasi-2.jpg|thumb|250px|left|गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]] &lt;br /&gt;
====विष्णु पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|विष्णु पुराण}}&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की है- जब इसका नाम श्रवण किया जाता है, जब कोई इसके दर्शन की अभिलाषा करता है, जब यह देखी जाती है या स्पर्श की जाती है या जब इसका जल ग्रहण किया जाता है या जब कोई उसमें डुबकी लगाता है या जब इसका नाम लिया जाता है (या इसकी स्तुति की जाती है) तो गंगा दिन-प्रतिदिन प्राणियों को पवित्र करती है। जब सहस्रों योजन दूर रहने वाले लोग गंगा नाम का उच्चारण करते हैं, तो तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रुताभिलषिता दृष्टा स्पृष्टा पीतावगाहिता। या पावयति भूतानि कीर्तिता च दिने दिने।। गंगा गंगेति यैनमि योजनानां शतेष्वपि। स्थितैरुच्चारितं हन्ति पापं जन्मत्रयार्जितम्।। [[विष्णु पुराण]] (2|8|120-121); [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 110), तीर्थचि. (पृष्ठ 202), [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] (पृष्ठ 9)। दूसरा श्लोक [[पद्म पुराण]] (6|21|8 एवं 23|12) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (175|82) में कई प्रकार से पढ़ा गया है, यथा- गंगा........यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।। पद्य पुराण (1|31|77) में आया है......शतैरपि। नरो न नरकं याति किं तया सदृशं भवेत्।।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====भविष्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|भविष्य पुराण}}&lt;br /&gt;
भविष्य पुराण में भी ऐसा ही आया है।&amp;lt;ref&amp;gt;दर्शनार्त्स्शनात्पानात् तथा गंगेति कीर्तनात्। स्मरणदेव गंगाया: सद्य: पापै: प्रमुच्यते।। [[भविष्य पुराण]] (तीर्थचि. पृष्ठ 198; [[गंगावाक्यावली]] पृष्ठ 12 एवं [[गंगाभक्तितरंगिणी (गणपति)|गंगाभक्तितरंगिणी]] पृष्ठ 9)। प्रथम पाद [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]] (26|64) एवं [[अग्नि पुराण]] (110|6) में आया है। गच्छंस्तिष्ठञ् जपन्ध्यायन् भुञ्जञ् जाग्रत स्वपन् वदन्। य: स्मरेत् सततं गंगां सोऽपि मुच्येत बन्धनात्।। [[स्कन्द पुराण]] (काशीखण्ड, पूर्वार्ध 27|37) एवं [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 39|16-17)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[कूर्म पुराण|कूर्म]], [[गरुड़ पुराण|गरुड़]] एवं [[पद्म  पुराण|पद्म]] पुराणों का कहना है कि गंगा में पहुँचना सब स्थानों में सरल है, केवल गंगाद्वार ([[हरिद्वार]]), [[प्रयाग]] एवं वहाँ जहाँ यह समुद्र में मिलती है, पहुँचना कठिन है। जो लोग यहाँ पर स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और जो लोग यहाँ पर मर जाते हैं, वे पुन: जन्म नहीं पाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा। गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे।। तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवा:।। [[मत्स्य पुराण]] (106|54);[[कूर्म पुराण]] (1|37|34); [[गरुड़ पुराण]] (पूर्वार्ध, 81|1-2); [[पद्म  पुराण]] (5|60|120)। [[नारदीय पुराण]] (40|26-27) में ऐसा पाठान्तर है- ‘सर्वत्र दुर्लभा गंगा त्रिषु स्थानेषु चाधिका। गंगाद्वारे.......संगमे।। एषु स्नाता दिवं.......र्भवा:।।’&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====नारद पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नारद पुराण}}&lt;br /&gt;
नारद पुराण का कथन है कि गंगा सभी स्थानों में दुर्लभ है, किन्तु तीन स्थानों पर अत्यधिक दुर्लभ है। वह व्यक्ति जो चाहे या अनचाहे गंगा के पास पहुँच जाता है और मर जाता है, स्वर्ग जाता है और नरक नहीं देखता।&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] 107|4&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====कूर्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|कूर्म पुराण}}&lt;br /&gt;
कूर्म पुराण का कथन है कि गंगा [[वायु पुराण]] द्वारा घोषित स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वी में स्थित 35 करोड़ पवित्र स्थलों के बराबर है और वह उनका प्रतिनिधित्व करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;तिस्र: कोट्योर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत्। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तत्सर्व जाह्नवी स्मृता।। [[कूर्म पुराण]] (1|39|8); [[पद्म पुराण]] (1|47|7 एवं 5|60|59); [[मत्स्य पुराण]] (102|5, तानि ते सन्ति जाह्नवि)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
====पद्म पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पद्म पुराण}}&lt;br /&gt;
पद्मपुराण ने प्रश्न किया है- ‘बहुत धन के व्यय वाले [[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कठिन तपों से क्या लाभ, जब कि सुलभ रूप से प्राप्त होने वाली एवं स्वर्ग मोक्ष देने वाली गंगा उपस्थित है!’ नारदीय पुराणों में भी आया है-‘आठ अंगों वाले योग, तपों एवं यज्ञों से क्या लाभ? गंगा का निवास इन सभी से उत्तम है।’&amp;lt;ref&amp;gt;किं यज्ञैर्बहुवित्ताढ्यै: किं तपोभि: सुदुष्करै:। स्वर्ग्मोक्षप्रदा गंगा सुखसौभाग्यपूजिता।। [[पद्म पुराण]] (5|60|39); किमष्टांगेन योगेन किं तपोभि: किमध्वरै:। वास एव हि गंगायां सर्वतोपि विशिष्यते।। [[नारदीय पुराण]] (उत्तर, 38|38); तीर्थचि. (पृष्ठ 194, गंगायां ब्रह्मज्ञानस्य कारणम्); [[प्रायश्चित्ततत्त्व]] (पृष्ठ 494)।&amp;lt;/ref&amp;gt; पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]] (सृष्टि. 60|65&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है कि [[विष्णु]] सभी देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं और गंगा विष्णु का। इसमें गंगा की प्रशस्ति इस प्रकार की गई है-‘[[पिता]], [[पति]], मित्रों एवं सम्बन्धियों के व्यभिचारी, पतित, दुष्ट, चाण्डाल एवं गुरुघाती हो जाने पर या सभी प्रकार के पापों एवं द्रोहों से संयुक्त होने पर क्रम से [[पुत्र]], पत्नियाँ, मित्र एवं सम्बन्धि उनका त्याग कर देते हैं, किन्तु गंगा उन्हें परित्यक्त नहीं करती&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]], सृष्टिखण्ड, 60|25-26)।’&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मत्स्य पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मत्स्य पुराण}}&lt;br /&gt;
मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[मत्स्य पुराण]] (104|14-15&amp;lt;/ref&amp;gt; के दो श्लोक यहाँ वर्णन के योग्य हैं- &amp;quot;पाप करने वाला व्यक्ति भी सहस्रों योजन दूर रहता हुआ गंगा स्मरण से परम पद प्राप्त कर लेता है। गंगा के नाम-स्मरण एवं उसके दर्शन से व्यक्ति क्रम से पापमुक्त हो जाता है एवं सुख पाता है। उसमें स्नान करने एवं जल के पान से वह सात पीढ़ियों तक अपने कुल को पवित्र कर देता है।&amp;quot; काशीखण्ड&amp;lt;ref&amp;gt;काशीखण्ड (27|69&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है कि गंगा के तट पर सभी काल शुभ हैं, सभी देश शुभ हैं और सभी लोग दान ग्रहण करने के योग्य हैं।&lt;br /&gt;
====वराह पुराण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वराह पुराण}}&lt;br /&gt;
वराह पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[वराह पुराण]] (अध्याय 82&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा की व्युत्पत्ति ‘गां गता’ (जो पृथ्वी की ओर गई हो) है। पद्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[पद्म पुराण]](सृष्टि खण्ड, 60|64-65&amp;lt;/ref&amp;gt; ने गंगा के विषय में निम्न मूलमंत्र दिया है-&amp;lt;poem&amp;gt;‘ओं नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:।’&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
====पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल का विस्तार====&lt;br /&gt;
कुछ पुराणों में गंगा के पुनीत स्थल के विस्तार के विषय में व्यवस्था दी हुई है। नारद पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;[[नारद पुराण]]  (उत्तर, 43|119-120&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है- गंगा के तीर से एक गव्यूति तक क्षेत्र कहलाता है, इसी क्षेत्र सीमा के भीतर रहना चाहिए, किन्तु तीर पर नहीं, गंगातीर का वास ठीक नहीं है। क्षेत्र सीमा दोनों तीरों से एक योजन की होती है अर्थात् प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र का विस्तार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;तीराद् गव्यूतिमात्रं तु परित: क्षेत्रमुच्यते। तीरं वसेत्क्षेत्रे तीरे वासो न चेष्यते।। एकयोजनविस्तीर्णा क्षेत्रसीमा तटद्वयात्। [[नारद पुराण]] (उत्तर, 43|119-120)। प्रथम को तीर्थचि. (पृष्ठ 266) ने [[स्कन्द पुराण]] से उदधृत किया है और व्याख्या की है-‘उभयतटे प्रत्येकं कोशदयं क्षेत्रम्।’ अन्तिम पाद को तीर्थचि. (पृष्ठ 267) एवं [[गंगावाक्यावली]] (पृष्ठ 136) ने [[भविष्य पुराण]] से उदधृत किया है। ‘गव्यूति’ दूरी या लम्बाई की माप है जो सामान्यत: दो क्रोश (कोस) के बराबर है। लम्बाई के मापों के विषय में कुछ अन्तर है। अमरकोश के अनुसार ‘गव्यूति’ दो क्रोश के बराबर है, यथा- ‘गव्यूति: स्त्री क्रोशयुगम्।’ [[वायु पुराण]] (8|105 एवं 101|122-123) एवं [[ब्रह्माण्ड पुराण]] (2|7|96-101) के अनुसार 24 अंगुल=एक हस्त, 96 अंगुल=एक धनु (अर्थात् ‘दण्ड’, ‘युग’ या ‘नाली’); 2000 धनु (या दण्ड या युग या नालिका)=गव्यूति एवं 8000 धनु=योजन। [[मार्कण्डेय पुराण]] (46|37-40) के अनुसार 4 हस्त=धनु या दण्ड या युग या नालिका; 2000 धनु=क्रोश, 4 क्रोश=गव्यूति (जो योजन के बराबर है)। और देखिए इस ग्रन्थ का खण्ड 3, अध्याय 5।&amp;lt;/ref&amp;gt; यम ने एक सामान्य नियम यह दिया है कि वनों, पर्वतों, पवित्र नदियों एवं तीर्थों के स्वामी नहीं होते, इन पर किसी का भी प्रभुत्व (स्वामी रूप से) नहीं हो सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मपुराण का कथन है कि नदियों से चार हाथ की दूरी तक नारायण का स्वामित्व होता है और मरते समय भी (कण्ठगत प्राण होने पर भी) किसी को भी उस क्षेत्र में दान नहीं लेना चाहिए। गंगाक्षेत्र के गर्भ (अन्तर्वत्त), तीर एवं क्षेत्र में अन्तर प्रकट किया गया है। गर्भ वहाँ तक विस्तृत हो जाता है, जहाँ तक भाद्रपद के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तक धारा पहुँच जाती है और उसके आगे तीर होता है, जो गर्भ से 150 हाथ तक फैला हुआ रहता है तथा प्रत्येक तीर से दो कोस तक क्षेत्र विस्तृत रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====आठ वसुओं की माँ====&lt;br /&gt;
गंगा-यमुना के मध्य का समस्त भूभाग ययाति ने पुरु को दिया था। गंगा आठ वसुओं की माँ हैं। वसुओं ने गंगा से कहा था कि [[शान्तनु]] से उनके गर्भ धारण करने के उपरान्त उनके जन्मते ही जल में प्रवाहित कर देना। गंगा ने शान्तनु से उत्पन्न सात वसु जल में प्रवाहित कर दिए। आठवें वसु ([[भीष्म]]) को शान्तनु ने बचा लिया। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]], अध्याय 2, 3, 61, 63, 67, 70, 87, 95-10।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==साहित्यिक उल्लेख==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|आरती, गंगा नदी, [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Varanasi|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिन्दी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/hindikavyameganganadii.htm|title=हिन्दी काव्य में गंगा नदी|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अभिव्यक्ति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में 'श्रीगंगालहरी'&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url= http://sujalam.blogspot.com/2007/11/blog-post_73.html|title=गंगा की उपस्थिति |accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=सुजलाम्|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य [[पृथ्वीराज रासो]]&amp;lt;ref&amp;gt;इंदो किं अंदोलिया अमी ए चक्कीवं गंगा सिरे। .................एतने चरित्र ते गंग तीरे&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा वीसलदेव रास&amp;lt;ref&amp;gt;कइ रे हिमालइ माहिं गिलउं। कइ तउ झंफघडं गंग-दुवारि।..................बहिन दिवाऊँ राइ की। थारा ब्याह कराबुं गंग नइ पारि&amp;lt;/ref&amp;gt;नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित [[आल्हाखण्ड]]&amp;lt;ref&amp;gt;प्रागराज सो तीरथ ध्यावौं। जहँ पर गंग मातु लहराय।। / एक ओर से जमुना आई। दोनों मिलीं भुजा फैलाय।। / सरस्वती नीचे से निकली। तिरबेनी सो तीर्थ कहाय।।&amp;lt;/ref&amp;gt; में गंगा, [[यमुना नदी|यमुना]] और [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। श्रृंगारी कवि विद्यापति,&amp;lt;ref&amp;gt;कज्जल रूप तुअ काली कहिअए, उज्जल रूप तुअ बानी। / रविमंडल परचण्डा कहिअए, गंगा कहिअए पानी।।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कबीर]] वाणी और [[जायसी]] के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु [[सूरदास]],&amp;lt;ref&amp;gt;सुकदेव कह्यो सुनौ नरनाह। गंगा ज्यौं आई जगमाँह।। / कहौं सो कथा सुनौ चितलाइ। सुनै सो भवतरि हरि पुर जाइ।।&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[तुलसीदास]] ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है- इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है।&amp;lt;poem&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा कहुँ कोटि उधारे। / देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सवाँरे।&lt;br /&gt;
पूजा को साजु विरंचि रचैं तुलसी जे महातम जानि तिहारे। / ओक की लोक परी हरि लोक विलोकत गंग तरंग तिहारे।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 145)&lt;br /&gt;
ब्रह्म जो व्यापक वेद कहैं, गमनाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनी को। / जो करता, भरता, हरता, सुर साहेबु, साहेबु दीन दुखी को।&lt;br /&gt;
सोइ भयो द्रव रूप सही, जो है नाथ विरंचि महेस मुनी को। / मानि प्रतीति सदा तुलसी, जगु काहे न सेवत देव धुनी को।।(कवितावली-उत्तरकाण्ड 146)&lt;br /&gt;
बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसें पद पापु लहौंगो। / ईस ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभु की समताँ बड़े दोष दहौंगो।&lt;br /&gt;
बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीर को ह्वै तव तीर रहौंगो।  / भागीरथी बिनवौं कर ज़ोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो।।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; रीतिकाल में [[सेनापति]] और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/bund0016.htm|title=बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ &lt;br /&gt;
|accessmonthday=[[23 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=टीडीआईएल|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति&amp;lt;ref&amp;gt;पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार, जहाँ मरि पापी होत सुरपुर पति है।  / देखत ही जाकौ भलो घाट पहचानियत, एक रूप बानी जाके पानी की रहति है।&amp;lt;/ref&amp;gt; कवित्त रत्नाकर में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। [[रसखान]], [[रहीम]]&amp;lt;ref&amp;gt;अच्युत चरण तरंगिणी, शिव सिर मालति माल। हरि न बनायो सुरसरी, कीजौ इंदव भाल।।--रहीम&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए [[भगीरथ]] की 'भगीरथ-तपस्या' से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], [[सुमित्रानन्दन पन्त]] और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |last=सिंह|first=डॉ. राजकुमार  |title=विचार विमर्श|year=जुलाई   |publisher=सागर प्रकाशन|location=मथुरा |id= |page=13-23  |accessday=22 |accessmonth=जून|accessyear=2009 }}&amp;lt;/ref&amp;gt;  छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4|title=नौका-विहार / सुमित्रानंदन पंत|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=कविताकोश|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; में ग्रीष्म कालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/ganga.htm|title=गंगा|accessmonthday=[[22 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=अनुभूति|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ''भारत एक खोज'' (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;quot;The Ganga, especially, is the river of India, beloved of her people, round which are interwined her memories, her hopes and fears, her songs of triumph, her victories and her defeats. She has been a symbol of India's age long culture and civilization, ever changing , ever flowing, and yet ever the same Ganga.&amp;quot; -जवाहरलाल नेहरू&amp;lt;/ref&amp;gt; गंगा की पौराणिक कहानियों को महेन्द्र मित्तल अपनी कृति ''माँ गंगा'' में संजोया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=3944|title=माँ गंगा|accessmonthday=[[30 जून]]|accessyear=[[2009]]|format=|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Seealso|गंगा चालीसा|गंगा माता जी की आरती}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Sunrise.jpg|सूर्योदय के समय गंगा नदी&lt;br /&gt;
चित्र:Haridwar2.jpg|गंगा नदी, [[हरिद्वार]]&lt;br /&gt;
चित्र:Kachla-Ghat.jpg|गंगा नदी, कछला घाट&lt;br /&gt;
चित्र:Devprayag-Bhagirathi-River.jpg|[[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]] और [[भागीरथी नदी|भागीरथी]] का संगम देवप्रयाग, [[उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum-2.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-Devi-Delhi-Crafts-Museum.jpg|[[गंगा|गंगा देवी]] का भित्ति चित्र, हस्त शिल्पकला संग्रहालय, [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
चित्र:Ganga-National-Museum-Delhi.jpg|गंगा देवी प्रतिमा, [[राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली|राष्ट्रीय संग्रहालय]], [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.youtube.com/watch?v=H7nhCTmEq5s&amp;amp;feature=player_embedded गंगा आरती विडियो]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
{{गंगा नदी}}{{राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक}}{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय चिन्ह और प्रतीक]]&lt;br /&gt;
[[Category:गंगा नदी]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250634</id>
		<title>नंदाकिनी नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250634"/>
		<updated>2012-02-04T10:28:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''नंदाकिनी नदी''' [[नंदा देवी पर्वत]] से निकल कर नंदप्रयाग में आकर [[अलकनंदा]] से मिलती है। &lt;br /&gt;
*नंदाकिनी नदी उदगम उत्तराखंड से है।&lt;br /&gt;
*यह सागर तल से 2805 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है ।&lt;br /&gt;
*नंदाकिनी नदी [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]] की सहचरी है जो [[केदारनाथ]] के पहाड़ों से मिलकर अलकनंदा से रुद्रप्रयाग में मिल जाती है।&lt;br /&gt;
*नंदाकिनी नदी [[गंगा नदी]] की पांच आरंभिक सहायक नदियों में से एक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड_की_नदियाँ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=250631</id>
		<title>उत्तराखंड की सिंचाई व्यवस्था</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=250631"/>
		<updated>2012-02-04T10:27:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{लेख विस्तार}}&lt;br /&gt;
[[उत्तराखंड]] [[राज्य]] की लगभग कुल  5,91,418 हेक्टेयर [[कृषि]] भूमि में सिंचाई की जा रही हैं। राज्य में पनबिजली उत्पादन की भरपूर क्षमता है। [[यमुना नदी|यमुना]], [[भागीरथी नदी|भागीरथी]], भीलांगना, [[अलकनंदा नदी|अलकनंदा]], [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]], [[सरयू नदी|सरयू]], गौरी, [[कोसी नदी|कोसी]] और काली नदियों से सिंचाई व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;
;नदियाँ&lt;br /&gt;
[[भारत]] की दो सबसे महत्त्वपूर्ण नदियाँ [[गंगा]] और [[यमुना]] इसी राज्य में जन्म लेतीं हैं, और मैदानी क्षेत्रों तक पहुँचते मार्ग में बहुत से तालाबों, [[झील|झीलों]], [[हिमनद|हिमनदियों]] की पिघली बर्फ़ से जल ग्रहण करती हैं।&lt;br /&gt;
;वन&lt;br /&gt;
उत्तराखण्ड, हिमालय श्रृंखला की दक्षिणी ढलान पर स्थित है, और यहाँ मौसम और वनस्पति में ऊँचाई के साथ बहुत परिवर्तन होता है, जहाँ सबसे ऊँचाई पर हिमनद से लेकर निचले स्थानों पर उपोष्णकटिबंधीय वन हैं। सबसे ऊँचे उठे स्थल हिम और पत्थरों से ढके हुए हैं। उनसे नीचे, 5000 से 3000 मीटर तक घास भूमि और झाड़ी भूमि है। समशीतोष्ण शंकुधारी वन, पश्चिम हिमालयी उपअल्पाइन शंकुधर वन, वृक्षरेखा से कुछ नीचे उगते हैं। 3000 से 2600 मीटर की ऊँचाई पर समशीतोष्ण पश्चिम हिमालयी चौड़ी पत्तियों वाले वन हैं जो 2600 से 1500 मीटर की उँचाई पर हैं। 1500 मीटर से नीचे हिमालयी उपोष्णकटिबंधीय पाइन वन हैं। उंचे गंगा के मैदानों में नम पतझड़ी वन हैं और सुखाने वाले तराई-दुआर सवाना और घासभूमि [[उत्तर प्रदेश]] से लगती हुई निचली भूमि को ढके हुए है। इसे स्थानीय क्षेत्रों में 'भाभर' के नाम से जाना जाता है। निचली भूमि के अधिकांश भाग को खेती के लिए साफ़ कर दिया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://garhwalbati.blogspot.com/2011/01/blog-post_6543.html|title=उत्तराखण्ड का भूगोल|accessmonthday=2 जून|accessyear=201|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तराखंड}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तराखंड]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250629</id>
		<title>आपगा नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%97%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250629"/>
		<updated>2012-02-04T10:27:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आपगा नदी''' के उद्गम का उल्लेख कई जगह आता है। एक ही नाम की अलग-अलग जगह पर कई नदियाँ है जो इस प्रकार है:- &lt;br /&gt;
#आपगा नदी [[पंजाब]] की एक नदी है- 'शाकलं नाम नगरमापगा नाम निम्नगा, अर्तिकानाम वाहीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम्'&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] [[कर्ण पर्व महाभारत|कर्णपर्व]] 44, 10&amp;lt;/ref&amp;gt; अर्थात् वाहीक या आरट्ट देश में शाकल- वर्तमान [[स्यालकोट]]- नाम का नगर और आपगा नाम की नदी है जहाँ जर्तिक नाम के वाहीक रहते हैं, उनका चरित्र अत्यंत निंदित है। इससे स्पष्ट है कि आपगा स्यालकोट ([[पाकिस्तान]]) के पास बहने वाली नदी थी। इसका अभिज्ञान स्यालकोट की 'ऐक' नाम की छोटी-सी नदी से किया गया है। यह [[चिनाब नदी]] की सहायक नदी है। &lt;br /&gt;
#[[वामन पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[वामन पुराण]] 39, 6-8 &amp;lt;/ref&amp;gt; में आपगा नदी का उल्लेख है जो [[कुरुक्षेत्र]] की सात पुण्य नदियों में से है- 'सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी, आपगा च महापुण्या [[गंगा]] [[मंदाकिनी नदी]]। मधुश्रुवा अम्लुनदी कौशिकी पापनाशिनी, दृशद्वती महापुण्या तथा [[हिरण्यवती नदी]]'। कहा जाता है यह नदी जो अब अधिकांश में विलुप्त हो गई है कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसर से एक मील दूर आपगा-सरोवर के रूप में आज भी दृश्यमान है। संभव है, महाभारत और वामनपुराण की नदियाँ एक ही हों, यदि ऐसा है तो नदी के गुणों में जो दोनों ग्रन्थों में वैषम्य वर्णित है वह आश्चर्यजनक है। नदियाँ भिन्न भी हो सकती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:हरियाणा की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250619</id>
		<title>केन नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=250619"/>
		<updated>2012-02-04T10:21:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Ken-River.jpg|thumb|250px|केन नदी]]&lt;br /&gt;
'''केन नदी''' [[यमुना नदी|यमुना]] की एक उपनदी या सहायक नदी है जो [[कैमूर पहाड़ियाँ|कैमूर की पहाड़ियों]] से निकलकर [[बुन्देलखंड]] क्षेत्र से गुजरती है तथा भोजहा के निकट यमुना नदी में मिल जाती है।&lt;br /&gt;
*नदी नदी केवल वर्षा ऋतु में ही जलमग्न रहती है।&lt;br /&gt;
*नदी नदी की कुल लम्बाई 308 किलोमीटर है।&lt;br /&gt;
*गर्मी के मौसम में नदी नदी लगभग सूख जाती है।&lt;br /&gt;
*केन तथा [[मंदाकिनी नदी|मंदाकिनी]] यमुना की अंतिम उपनदियाँ हैं क्योंकि इस के बाद यमुना [[गंगा नदी|गंगा]] से जा मिलती है। &lt;br /&gt;
*केन नदी [[जबलपुर]], [[मध्य प्रदेश]] से प्रारंभ होती है, पन्ना में इससे कई धारायें आ जुड़ती हैं और फिर [[बाँदा]], [[उत्तर प्रदेश]] में इसका यमुना से संगम होता है।&lt;br /&gt;
*यह कर्णवती के नाम से भी विख्यात है।&lt;br /&gt;
*केन नदी का 'शजर' पत्थर मशहूर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ken-River-1.jpg|केन नदी&lt;br /&gt;
चित्र:Ken-River-2.jpg|केन नदी&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल शब्दावली]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80&amp;diff=250616</id>
		<title>सिंधिंया घाट वाराणसी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%B8%E0%A5%80&amp;diff=250616"/>
		<updated>2012-02-04T10:14:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg|thumb|[[मणिकार्णिका घाट वाराणसी|मणिकार्णिका घाट]] और सिंधिंया घाट, [[वाराणसी]]]]&lt;br /&gt;
'''सिंधिंया घाट''' [[वाराणसी]] में स्थित [[गंगा]] नदी का एक घाट है। &lt;br /&gt;
*इस घाट का निर्माण '''महाराजा, ग्वालियर''' ने करवाया है।&lt;br /&gt;
*वाराणसी ([[काशी]]) में गंगा [[तट]]  पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं।&lt;br /&gt;
*वाराणसी में लगभग 84 घाट हैं। ये घाट लगभग 4 मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। &lt;br /&gt;
*[[वाराणसी के घाट|वाराणसी के 84 घाटों]] में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से 'पंचतीर्थ' कहा जाता है। ये हैं [[असी घाट वाराणसी|असी घाट]], [[दशाश्वमेध घाट वाराणसी|दशाश्वमेध घाट]], [[आदिकेशव घाट वाराणसी|आदिकेशव घाट]], [[पंचगंगा घाट वाराणसी|पंचगंगा घाट]] तथा [[मणिकार्णिका घाट वाराणसी|मणिकार्णिका घाट]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{वाराणसी के घाट 2}}{{वाराणसी}}&lt;br /&gt;
[[Category:वाराणसी]]&lt;br /&gt;
[[Category:वाराणसी के घाट]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250615</id>
		<title>चित्र:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250615"/>
		<updated>2012-02-04T10:13:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[मणिकार्णिका घाट वाराणसी|मणिकार्णिका घाट]] और [[सिंधिंया घाट वाराणसी|सिंधिंया घाट]], [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/vaticanus/ Bob K] &lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/4749956619 Manikarnika &amp;amp; Sindhia (collapsed) ghats Varanasi INDIA]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/ vaticanus' photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[वाराणसी के घाट|वाराणसी के 84 घाटों]] में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से 'पंचतीर्थ' कहा जाता है। ये हैं [[असी घाट वाराणसी|असी घाट]], [[दशाश्वमेध घाट वाराणसी|दशाश्वमेध घाट]], [[आदिकेशव घाट वाराणसी|आदिकेशव घाट]], [[पंचगंगा घाट वाराणसी|पंचगंगा घाट]] तथा [[मणिकार्णिका घाट वाराणसी|मणिकार्णिका घाट]]।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial= &lt;br /&gt;
|Share Alike=&lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250608</id>
		<title>चित्र:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250608"/>
		<updated>2012-02-04T10:11:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[सिंधिंया घाट वाराणसी|सिंधिंया घाट]] और [[सिंधिंया घाट वाराणसी|सिंधिंया घाट]], [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/vaticanus/ Bob K] &lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/4749956619 Manikarnika &amp;amp; Sindhia (collapsed) ghats Varanasi INDIA]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/ vaticanus' photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=[[वाराणसी के घाट|वाराणसी के 84 घाटों]] में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से 'पंचतीर्थ' कहा जाता है। ये हैं [[असी घाट वाराणसी|असी घाट]], [[दशाश्वमेध घाट वाराणसी|दशाश्वमेध घाट]], [[आदिकेशव घाट वाराणसी|आदिकेशव घाट]], [[पंचगंगा घाट वाराणसी|पंचगंगा घाट]] तथा [[मणिकार्णिका घाट वाराणसी|मणिकार्णिका घाट]]।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial= &lt;br /&gt;
|Share Alike=&lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250597</id>
		<title>चित्र:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Manikarnika-And-Sindhia-Ghat.jpg&amp;diff=250597"/>
		<updated>2012-02-04T10:03:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Chaumsathi-Ghat.jpg&amp;diff=250596</id>
		<title>चित्र:Chaumsathi-Ghat.jpg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Chaumsathi-Ghat.jpg&amp;diff=250596"/>
		<updated>2012-02-04T09:59:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;रूबी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=[[चौसट्ठी घाट वाराणसी|चौसट्ठी घाट]], [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
|चित्रांकन=[http://www.flickr.com/people/vaticanus/ Bob K] &lt;br /&gt;
|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
|प्रयोग अनुमति=&lt;br /&gt;
|चित्रकार=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/4750599398 Chaumsathi Ghat (far left) Varanasi]&lt;br /&gt;
|प्राप्ति स्थान=&lt;br /&gt;
|समय-काल=&lt;br /&gt;
|संग्रहालय क्रम संख्या=&lt;br /&gt;
|आभार=[http://www.flickr.com/photos/vaticanus/ vaticanus' photostream]&lt;br /&gt;
|आकार=&lt;br /&gt;
|अन्य विवरण=चौसट्ठी घाट वाराणसी में स्थित [[गंगा नदी]] का एक घाट है। इस घाट का निर्माण उदयपुर के राजा ने करवाया है। &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
|Attribution={{Attribution}}&lt;br /&gt;
|Noncommercial= &lt;br /&gt;
|Share Alike=&lt;br /&gt;
|No Derivative Works= &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रूबी</name></author>
	</entry>
</feed>