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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>राज्यपाल</title>
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		<updated>2011-04-13T06:54:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'भारत का संविधान संघात्मक है। इसमें संघ तथा राज्यो...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[भारत]] का संविधान संघात्मक है। इसमें संघ तथा राज्यों के शासन के सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है। संविधान के भाग 6 में राज्य शासन के लिए प्रावधान है। यह प्रावधान [[जम्मू-कश्मीर]] को छोड़कर सभी राज्यों के लिए लागू होता है। जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के कारण उसके लिए अलग संविधान है। संघ की तरह राज्य की भी शासन पद्धति संसदीय है। राज्य की कार्यपालिका का प्रमुख राज्यपाल होता है, जो कि मंत्रीपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है। कुछ मामलों में राज्यपाल की विवेकाधिकार दिया गया है, ऐसे मामले में वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना कार्य करता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==राज्यपाल की योग्यता==&lt;br /&gt;
'''अनुच्छेद 157''' के अनुसार राज्यपाल पद पर नियुक्त किये जाने वाले व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यता आपेक्षित है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#वह भारत का नागरिक हो&lt;br /&gt;
#वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो&lt;br /&gt;
#वह राज्य सरकार या केन्द्र सरकार या इन राज्यों के नियंत्रण के अधीन किसी सार्वजनिक उपक्रम में लाभ के पद पर न हो&lt;br /&gt;
#वह राज्य विधानसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==राज्यपाल की नियुक्ति==&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति [[भारत के राष्ट्रपति|राष्ट्रपति]] के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से की जाएगी, किन्तु वास्तव में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा [[भारत के प्रधानमंत्री|प्रधानमंत्री]] की सिफ़ारिश पर की जाती है। राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में यह प्रथा बन गयी थी कि:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नहीं नियुक्त किया जाएगा, जिसका वह निवासी है&lt;br /&gt;
#राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किया जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रथा [[1950]] से [[1967]] तक अपनायी गयी, लेकिन [[1967]] के चुनावों में जब कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, तब दूसरी प्रथा को समाप्त कर दिया गया और मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की जाने लगी। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==राज्यपाल की पदावधि==&lt;br /&gt;
यद्यपि राज्यपाल की पदावधि उसके पद ग्रहण की तिथि से पाँच वर्ष तक होती है, लेकिन इस पाँच वर्ष की अवधि के समापन के बाद वह तब तक अपने पद पर बना रहता है, जब तक उसका उत्तराधिकारी पद नहीं ग्रहण कर लेता (अनुच्छेद 156)। जब राज्यपाल पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद पद पर रहता है, तब वह प्रतिदिन के वेतन के आधार पर पद पर बना रहता है। ऐसे कई उदाहरण है जब राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति न किये जाने के कारण अपने पद पर बने रहे हैं। इन उदाहरणों में [[हरियाणा]] के राज्यपाल 'बी. एन. चक्रवर्ती' का उदाहरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये अपनी पदावधि के समापन के बाद उत्तराधिकारी की नियुक्ति न होने के कारण 3 वर्ष तक प्रतिदिन के वेतन के आधार पर पद पर बने रहे थे।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इसके अतिरिक्त राज्यपाल अपनी पदावधि की समाप्ति के पूर्व राष्ट्रपति को त्यागपत्र देकर अपना पद छोड़ भी सकता है या राष्ट्रपति उसे पदमुक्त कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, [[1980]] में [[तमिलनाडु]] के राज्यपाल 'प्रभुदास पटवारी', [[1981]] में [[राजस्थान]] के राज्यपाल रघुकुल तिलक, 1992 में नागालैंण्ड के राज्यपाल एम. एम. थामस को राष्ट्रपति ने बर्ख़ास्त कर दिया था। इसके अतिरिक्त कई बार राज्यपालों को त्यागपत्र देने के लिए विवश किया गया है या उनसे त्यागपत्र मांग लिया गया है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल के द्वारा शपथ ग्रहण–&lt;br /&gt;
राज्यपाल को सम्बन्धित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है (अनुच्छेद 159)।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल के वेतन एवं भत्ते–&lt;br /&gt;
11 सितम्बर, 2008 को लिये गये निर्णय के अनुसार राज्यपाल का वेतन 36,000 रुपये से बढ़ाकर 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है। यह वेतनमान जनवरी, 2006 से प्रभावी माना गया है। इसके पूर्व 10 जनवरी, 2008 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने राज्यपाल का वेतन 75,000 रुपये प्रतिमाह करने का निर्णय लिया था। राज्यपाल ऐसे भत्ते का भी हकदार है, जिस संसद के द्वारा नियत किया जाए। इसके अतिरिक्त उसे रहने के लिए सरकारी आवास मिलता है। जिसके लिये उसे किराया नहीं देना पड़ता। यदि दो या दो से अधिक राज्यों का एक ही राज्यपाल है, तब उसे दोनों राज्यपालों का वेतन उस अनुपात में दिया जाएगा, जैसा कि राष्ट्रपति निर्धारित करें। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल का स्थानान्तरण–&lt;br /&gt;
संविधान में राज्यपाल के स्थानान्तरण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन राज्यपाल का स्थानान्तरण किया जाता है और यह कुछ हद तक एक प्रथा बन गयी है। केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की सरकार ने मार्च, 1998 में बिहार के राज्यपाल डॉ. ए. आर. किदवई को स्थानान्तरित कर पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया था। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल की उन्मुक्तियाँ तथा विशेषाधिकार–&lt;br /&gt;
राज्यपाल को निम्नलिखित विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं–&lt;br /&gt;
	I. वह अपने पद की शक्तियों के प्रयोग तथा कर्तव्यों के पालन के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है।&lt;br /&gt;
	II. राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्यवाही प्रारम्भ नहीं की जा सकती।&lt;br /&gt;
	III. जब वह पद पर आरूढ़ हो, तब उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी भी न्यायालय से कोई आदेशिका जारी नहीं की जा सकती। &lt;br /&gt;
	IV. राज्यपाल का पद ग्रहण करने से पूर्व या के पश्चात उसके द्वारा व्यक्तिगत क्षमता में किये गये कार्य के सम्बन्ध में कोई सिविल कार्यवाही करने के पहले उसे दो मास पूर्व सूचना देनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल की शक्तियाँ तथा कार्य–&lt;br /&gt;
जिस प्रकार केन्द्र में कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, उसी प्रकार राज्य में कार्यपालिका की शक्ति राज्यपाल में निहित है। राज्यपाल की शक्तियाँ तथा कार्य निम्नलिखित हैं–&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(1)कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य–&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्यपाल के पास कार्यपालिका सम्बन्धी निम्नलिखित कार्य हैं–&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(क)राज्यपाल राज्य सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष है तथा राज्य की कार्यपालिका सम्बन्धि शक्ति का प्रयोग वह अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों के माध्यम से कराता है। वह सरकार की कार्यवाही सम्बन्धी नियम बनाता है तथा मंत्रियों में कार्यों का विभाजन करता है। &lt;br /&gt;
(ख)राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा मुख्यमंत्री की सलाह से उसके मंत्रिपरिषद के सदस्यों को नियुक्त करता है तथा उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। &lt;br /&gt;
(ग)राज्यपाल, राज्य के उच्च अधिकारियों, जैसे–महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है तथा राज्य के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को परामर्श देता है। &lt;br /&gt;
(घ)राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह राज्य के प्रशासन के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री से सूचना प्राप्त करे। &lt;br /&gt;
(ड)जब राज्य का प्रशासन संवैधानिक तंत्र के अनुसार न चलाया जा सके, तो राज्यपाल राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश करता है। जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाता है, तब राज्यपाल केन्द्र सरकार के अभिकर्ता के रूप में राज्य का प्रशासन चलाता है।&lt;br /&gt;
(च)राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है तथा उप कुलपतियों को भी नियुक्त करता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(2)विधायी अधिकार–&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधायी अधिकार प्रदान करता है। राज्यपाल राज्य विधान मण्डल का एक अभिन्न अंग है और इसे विधायिका के सम्बन्ध में निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं–&lt;br /&gt;
(क)वह राज्य विधान मण्डल के सत्र को आहूत कर सकता है, स्थगित कर सकता है तथा राज्य विधानसभा को भंग कर सकता है। &lt;br /&gt;
(ख)यदि राज्यपाल को ऐसा प्रतीत हो कि राज्य विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह आंग्ल भारतीय समुदाय के एक व्यक्ति को राज्यविधानसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत कर सकता है। वह राज्य विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या के सदस्य के एक छठवें भाग के लिए सदस्यों, जिनका विज्ञान, साहित्य, कला, समाज सेवा, सहकारी आंदोलन आदि के क्षेत्र में विशेष ज्ञान, अनुभव या योगदान हो, को नियुक्त कर सकता है। &lt;br /&gt;
(ग)यदि राज्य विधानसभा के किसी सदस्य की अयोग्यता का प्रश्न उत्पन्न होता है तो अयोग्यता सम्बन्धी विवाद का निर्धारण राज्यपाल चुनाव आयोग से परामर्श करके करता है।&lt;br /&gt;
(घ)वह सामान्य आम चुनाव के बाद प्रारम्भ होने वाले तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम विधानमण्डल के प्रथम सत्र को सम्बोधित करता है तथा सदनों को अपना संदेश भी भेज सकता है। &lt;br /&gt;
(ड)वह राज्य विधान मण्डल द्वारा पारित किसी विधेयक पर हस्ताक्षर करता है और राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही विधेयक अधिनियम के रूप में प्रवृत्त होता है। &lt;br /&gt;
(च)राज्यपाल धन विधेयक के अतिरिक्त किसी विधेयक को पुन: विचार के लिए राज्य विधान मण्डल के पास भेज सकता है तथा राज्य विधान मण्डल द्वारा विधेयक को पुन: पारित किये जाने पर वह उस पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य है। &lt;br /&gt;
(छ)राज्य विधानसभा में धन विधेयक तभी पेश किया जाता है, जब राज्यपाल ने विधेयक पेश करने के लिए अपनी अनुमति दे दी हो। &lt;br /&gt;
(ज)विभिन्न आयोगों, उच्च तथा स्वायत्त संस्थाओं के वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपे जाते हैं और वह उन्हें विचारार्थ राज्य विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करता है। &lt;br /&gt;
(झ)कुछ विशिष्ट प्रकार के विधेयकों को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है–&lt;br /&gt;
	I. व्यक्तिगत सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से सम्बन्धित विधेयक,&lt;br /&gt;
	II. उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में कमी से सम्बन्धित विधेयक,&lt;br /&gt;
	III. संसद द्वारा निर्मित क़ानून के अधीन आवश्यक घोषित वस्तु पर करारोपण से सम्बन्धित विधेयक,&lt;br /&gt;
	IV. समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों से सम्बन्धित विधेयक (जब संसद द्वारा निर्मित क़ानून से संघर्ष की सम्भावना हो), तथा&lt;br /&gt;
	V. अन्य कोई विधेयक, जिसके कारण केन्द्रीय सरकार या अन्य राज्यों की सरकार से विवाद होने की सम्भावना हो। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(3)अध्यादेश जारी करने की शक्ति–&lt;br /&gt;
अनुच्छेद 213 के अनुसार जब राज्य विधान मण्डल या राज्य विधानसभा सत्र में न हो तथा संविधान की सातवीं अनुसूची में अन्तर्विष्ट राज्यसूची में वर्णित विषयों में से किसी विषय पर क़ानून बनाना आवश्यक हो, तब राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर अध्यादेश जारी कर सकता है। इस प्रकार जारी किया गया अध्यादेश केवल 6 मास तक प्रभावी रहता है और 6 मास की अवधि समाप्त होने के पूर्व ही राज्य विधानमण्डल या राज्य विधानसभा का सत्र प्रारम्भ हो जाए, तो अध्यादेश को 6 सप्ताह के अन्दर विधानमण्डल या विधानसभा द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए और यदि 6 सप्ताह के अन्दर अनुमोदित नहीं किया जाता है तो अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाएगा। जिन विधेयकों पर राज्यपाल अनुमति देने के पूर्व उन्हें राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखता है, उन विधेयकों से सम्बन्धित विषय पर राज्यपाल अध्यादेश जारी नहीं कर सकता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(4)वित्तीय अधिकार–&lt;br /&gt;
संविधान द्वारा राज्यपाल को निम्नलिखित वित्तीय अधिकार प्रदान किये गये हैं–&lt;br /&gt;
(क)राज्यपाल की सिफ़ारिश के बिना राज्य विधानसभा में धन विधेयक को पेश नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 161 (1)।&lt;br /&gt;
(ख)राज्य की आकस्मिक निधि से व्यय राज्यपाल की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 203(3)।&lt;br /&gt;
(ग)राज्यपाल राज्य के वित्तमंत्री के माध्यम से राज्य विधानसभा में राज्य का वार्षिक बजट पेश कराता है (अनुच्छेद 202)।&lt;br /&gt;
(घ)किसी प्रकार के अनुदान की मांग को या करों के प्रस्ताव को राज्यपाल के अनुमोदन से विधानसभा में पेश किया जाता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(5) न्यायिक अधिकार–&lt;br /&gt;
राज्यपाल के न्यायिक अधिकार निम्नलिखित हैं–&lt;br /&gt;
(क)वह ज़िला न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण तथा पदान्न्ति से सम्बन्धित मामलों का निर्णय करता है। राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग उच्च न्यायालय के परामर्श से करता है (अनुच्छेद 233)।&lt;br /&gt;
(ख)वह न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किये गये अपराधियों को क्षमा करने, उनके दण्ड को कम करने या निलम्बन करने या विलम्बित करने की शक्ति रखता है। लेकिन इस शक्ति का प्रयोग उसके द्वारा उसी सीमा तक किया जा सकता है, जिस सीमा तक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है (अनुच्छेद 161)।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(6) विवेकाधिकार&lt;br /&gt;
संविधान के द्वारा राज्यपाल को निम्नलिखित विवेकाधिकार प्रदान किया गया है–&lt;br /&gt;
(क)राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का प्रमुख होता है। राज्य कार्यपालिका की शक्ति उसमें निहित है। जिसका प्रयोग वह अपने प्राधिकारियों के माध्यम से कराता है। यहाँ अधीनस्थ प्राधिकारियों का तात्पर्य मंत्रिपरिषद से है। मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करता है। मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की भी नियुक्ति करता है। सामान्यत: राज्यपाल उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है, जो विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता हो या जिसे बहुमत प्राप्त करने के लिए कई दलों का समर्थन प्राप्त हो। &lt;br /&gt;
लेकिन यदि विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तथा किसी भी व्यक्ति को कई दलों का समर्थन प्राप्त न हो या कई दलों के गठबन्धन ने मिलकर चुनाव में बहुमत न प्राप्त किया हो, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करने में अपने विवेक का प्रयोग करता है। राज्यपालों द्वारा मुख्यमंत्री को नियुक्त करने में प्रयोग किये गये विवेकाधिकार से इस विवेकाधिकार के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो सिद्धान्तों का विकास हुआ है–&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
	I. अनुमान न लगाने का सिद्धान्त–&lt;br /&gt;
	इस सिद्धान्त को &amp;quot;प्रकासा सिद्धान्त&amp;quot; नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इस सिद्धान्त का प्रयोग सबसे पहले 1952 में मद्रास के राज्यपाल प्रकासा द्वारा 1952 में मद्रास के चुनाव के पश्चात किया गया था। इस सिद्धान्त के अनुसार जब आम चुनाव में किसी भी दल को बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तब राज्यपाल विधानसभा के सबसे बड़े दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है। इस सिद्धान्त का प्रयोग 1952 में मद्रास, पेप्सू तथा ट्राबनकोर कोचीन में, 1957 में उड़ीसा में, 1967 में राजस्थान में, 1974 में पाण्डिचेरी में, 1982 में हरियाणा में तथा 1988 में तमिलनाडु में किया गया था। लेकिन यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस सिद्धान्त का प्रयोग केवल तब किया गया है, जब कांग्रेस दल को सरकार बनाने का अवसर मिला है। जब अन्य दल को सरकार बनाने का अवसर मिल रहा था, तब इस सिद्धान्त का अनुसरण नहीं किया गया। उदाहरणार्थ, जब 1957 में केरल में भारतीय साम्यवादी दल, 1965 में केरल में मार्क्सवादी साम्यवादी दल, 1971 में पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी साम्यवादी दल को इस सिद्धान्त के अनुसार सरकार बनाने का अवसर मिला था, तब इस सिद्धान्त का अनुसरण नहीं किया गया।&lt;br /&gt;
	 &lt;br /&gt;
	II. अनुमान लगाने का सिद्धान्त–&lt;br /&gt;
	इस सिद्धान्त के अनुसार जब आम चुनाव में किसी भी राजनैतिक दल को विधानसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, तब राज्यपाल अनुमान लगाता है कि किस दल का नेता स्थायी सरकार का गठन कर सकता है और इसके आधार पर यह निर्णय करता है कि किस नेता को मंत्रिमण्डल बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए। इस सिद्धान्त का प्रयोग 1954 में ट्रावनकोर कोचीन, 1957 तथा 1965 में केरल, 1967 में उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान, 1969 में बिहार, 1971 में उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल, 1974 में नागालैण्ड, 1975 में गुजरात, 1978 में महाराष्ट्र तथा 1982 में कर्नाटक में किया गया। राज्यपाल अनुमान लगाने में लिस्ट पद्धति तथा परेड पद्धति को अपनाते हैं। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
लिस्ट पद्धति–&lt;br /&gt;
राज्यपालों के द्वारा लिस्ट पद्धति का अनुसरण तब किया गया, जब मुख्यमंत्री पद के एक से अधिक दावेदार थे। ऐसी स्थिति में राज्यपाल दावेदारों से अपने समर्थकों की सूची पेश करने के लिए कहे और यदि विधायक का नाम एक से अधिक सूचियों में पाया जाए, तो राज्यपाल द्वारा उस विधायक का साक्षात्कार लिया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, 1967 में विश्वनाथ दास ने उत्तर प्रदेश में, हुकुम सिंह ने राजस्थान में, 1974 में बी. के. नेहरू ने नागालैण्ड में तथा 1978 में सादिक अली ने महाराष्ट्र में इस पद्धति का प्रयोग किया था। लेकिन कुछ राज्यपालों ने इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया है। उदाहरणार्थ 1969 तथा 1970 में बिहार में नित्यानन्द कानूनगो तथा 1984 में आंध्र प्रदेश में रामलाल ने लिस्ट पद्धति का अनुसरण नहीं किया।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
परेड पद्धति–&lt;br /&gt;
परेड पद्धति के अनुसार मुख्यमंत्री पद के दावेदार अपने समर्थकों की परेड राज्यपाल के समक्ष करवाते हैं और परेड में शामिल विधायकों के आधार पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति की जाती है। इस पद्धति का सबसे पहले प्रयोग 1970 में पंजाब में किया गया था। इसके बाद इस पद्धति का प्रयोग 1974 में मणिपुर में, 1978 में बम्बई तथा 1984 में जम्मू-कश्मीर में किया गया।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(ख)मंत्रिपरिषद को भंग करना–&lt;br /&gt;
राज्यपाल को मंत्रिपरिषद को भंग करने का अधिकार प्राप्त है। राज्यपाल निम्नलिखित स्थितियों में मंत्रिपरिषद को भंग कर सकता है–&lt;br /&gt;
	a. जब राज्यपाल को विश्वास हो जाए, कि मंत्रिपरिषद का विधानमण्डल में बहुमत नहीं रह गया है,&lt;br /&gt;
	b. जब मंत्रिपरिषद के विरुद्ध विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे और मंत्रिपरिषद त्यागपत्र न दे। &lt;br /&gt;
	c. जब मंत्रिपरिषद संविधान के प्रावधानों के अनुसार कार्य न कर रहा हो या मंत्रिपरिषद की नीतियों से राष्ट्र का अहित सम्भाव्य हो या केन्द्र से संघर्ष होने की सम्भावना हो। &lt;br /&gt;
	d. जब किसी स्वतंत्र अधिकरण ने जांच के पश्चात मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार मं आलिप्त पाया हो। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(ग)विधानसभा का अधिवेशन बुलाना–&lt;br /&gt;
सामान्यतया राज्यपाल मंख्यमंत्री की सलाह पर विधानसभा का अधिवेशन बुलाता है, लेकिन यदि असाधारण परिस्थिति उत्पन्न हो जाएँ, तब राज्यपाल विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुला सकता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(घ)विधानसभा को भंग करना–    &lt;br /&gt;
सामान्यतया राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर ही विधानसभा को भंग करता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में वह मुख्यमत्री की सलाह के बिना भी विधानसभा का भंग कर सकता है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
(ड)मुख्यमंत्री को अभियोजित करने की अनुमति देना–&lt;br /&gt;
राज्यपाल कार्यरत या भूतपूर्व मुख्यमंत्री के विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही करने की अनुमति दे सकता है। यदि वह भ्रष्टाचार या किसी षड़यंत्र या आपराधिक कार्य में संलिप्त हो।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल के सम्बन्ध में सिफ़ारिशें&lt;br /&gt;
प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफ़ारिशें–&lt;br /&gt;
राज्यपाल की नियुक्ति तथा भूमिका के सम्बन्ध में प्रशासनिक सुधार आयोग की प्रमुख सिफ़ारिश निम्नवत् हैं–&lt;br /&gt;
1-ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त किया जाना चाहिए, जिसका सार्वजनिक जीवन और प्रशासन के विषय में लम्बा अनुभव हो और जिसका दलीय पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने की क्षमता में विश्वास हो। अपने कार्यकाल की समाप्ति पर वह दोबारा राज्यपाल नियुक्त किये जाने के योग्य नहीं होना चाहिए। सेवा निवृत्त होने के बाद न्यायाधीशों को राज्यपाल नहीं बनाया जाना चाहिए। लेकिन एक न्यायाधीश, जो सेवानिवृत्त होने के बाद सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है और विधायक बन जाता है अथवा निर्वाचित पद पर है, तो उसे राज्यपाल की नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं मानना चाहिए। &lt;br /&gt;
2-राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री से परामर्श की परम्परा एक स्वस्थ परम्परा है। जिसे बनी रहनी चाहिए।&lt;br /&gt;
3-राज्यपालों के द्वारा किस प्रकार स्वविवेक की शक्तियों का प्रयोग किया जाए, इस विषय में निर्देश-संकेतों को केन्द्र की स्वीकृति पर राष्ट्रपति के नाम से जारी किया जाना चाहिए। उन्हें संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना चाहिए। &lt;br /&gt;
4-राज्यपाल को राष्ट्रपति के पास पाक्षिक रिपोर्ट भेजने के साथ ही, जब भी आवश्यकता हो, तदर्थ रिपोर्ट भेजनी चाहिए। राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली रिपोर्ट बनाते समय राज्यपाल को स्वविवेक और स्वनिर्णय के आधार पर काम करना चाहिए। इसी प्रकार राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयकों को सुरक्षित रखने के विषय में भी स्वनिर्णय का प्रयोग करना चाहिए।&lt;br /&gt;
5-जब भी राज्यपाल के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि मंत्रिमण्डल का विधानसभा में बहुमत नहीं रहा है, तो इसका अन्तिम निर्णय उसे विधानसभा का सत्र बुलाकर मंत्रिमण्डल के समर्थन को देखकर करना चाहिए। जब भी यह प्रश्न उठे कि मंत्रिमण्डल को सदन में बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं है और मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने के उद्देश्य से, यदि उचित समझे तो विधानसभा सत्र को स्वयं बुला सकता है।&lt;br /&gt;
6-जब कोई मंत्रिमण्डल किसी बड़े नीति निर्माण सम्बन्धी विषय पर सदन में पराजित हो जाता है और यदि हारने वाला मुख्यमंत्री राज्यसभा भंग करने की सलाह देता है, ताकि वह मतदाताओं से निर्णय ले सके, तो राज्यपाल को उसकी सलाह मान लेनी चाहिए। अन्य मामलों में वह स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है। &lt;br /&gt;
7-राज्यपाल को न केवल अनुच्छेद 167 के प्रावधान के अनुकूल सूचना प्राप्त करनी चाहिए, बल्कि अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों को प्रभावी तौर पर पूरा करने के लिए ऐसा करना चाहिए।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राज्यपाल समिति का प्रतिवेदन–&lt;br /&gt;
प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपने 1969 के प्रतिवेदन में राष्ट्रपति के नाम से उन निर्देशों को जारी करने की सिफ़ारिश की थी, जिनके अनुसार राज्यपाल स्वविवेक शक्तियों का प्रयोग करें। 1970 में राज्यपाल सम्मेलन में इस सिफ़ारिश को स्वीकार कर लिया गया और निर्देशों को निश्चित करने के लिए जम्मू कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल भगवान सहाय की अध्यक्षता में 5 सदस्यों की समिति गठित की गयी। समिति के अन्य सदस्य थे–बी. गोपाल रेड्डी, अलीयावर जंग, विश्वनाथन तथा एम. एम. धवन। इस समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें निम्नलिखित हैं–&lt;br /&gt;
1.यदि विधानसभा का विश्वास प्राप्त करने के विषय में कोई मुख्यमंत्री विधानसभा का अधिवेशन बुलाने से इन्कार करता है, तो राज्यपाल मंत्रिमण्डल को बर्ख़ास्त कर सकता है। &lt;br /&gt;
2.मंत्रिमण्डल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त है या नहीं, इसका निर्धारण विधानसभा के द्वारा किया जाना चाहिए। यदि कोई मुख्यमंत्री विधानसभा द्वारा बहुमत के प्रश्न को निर्धारित करने से इन्कार करता है तो यह माना जाना चाहिए कि मंत्रिमण्डल को बहुमत प्राप्त नहीं है। &lt;br /&gt;
3.यदि मुख्यमंत्री के त्यागपत्र या बर्ख़ास्तगी के बाद राज्य में वैकल्पिक सरकार बनाने की सम्भावना न हो, तो राज्यपाल के पास राष्ट्रपति को विधानसभा भंग करने की रिपोर्ट देनी चाहिए।&lt;br /&gt;
4.यदि कोई व्यक्ति राज्य विधानसभा का सदस्य न हो या विधानसभा का मनोनीत सदस्य हो, तो उसे मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाना चाहिए।&lt;br /&gt;
5.यदि कई दलों के गठबंधन सरकार का कोई भागीदार दल मुख्यमंत्री से मतभेद होने के कारण सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेता है, तो यह आवश्यक नहीं है कि मुख्मंत्री त्यागपत्र दे, लेकिन यदि मुख्यमंत्री के विधानसभा के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न होता है, तो उससे यह आशा की जाती है कि राज्यपाल से परामर्श करके यथासम्भव शीघ्र विधानसभा का अधिवेशन बुलाये और विधानसभा में अपना बहुमत साबित करे। &lt;br /&gt;
6.राष्ट्रपति सचिवालय में एक विशेष कक्ष की स्थापना की जानी चाहिए और इस कक्ष द्वारा विभिन्न राज्यों में समय-समय पर घटित होने वाली राजनीतिक और संवैधानिक घटनाओं के सम्बन्ध में आधिकाधिक सूचनाएँ एकत्र की जानी चाहिए। इस कक्ष को विशेष मामलों के सम्बन्ध में राष्ट्रपति की अनुमति से समस्त जानकारी राज्यपाल को दी जानी चाहिए, जिससे राज्यपाल को किसी निर्णय में आसानी हो।&lt;br /&gt;
7.राज्यपाल अपने राज्य का अध्यक्ष होता है, न कि राष्ट्रपति का अभिकर्ता और संविधान द्वारा राज्यपाल के कर्तव्य को निर्धारित किया गया है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
राजमन्नार समिति रिपोर्ट की सिफ़ारिशें–&lt;br /&gt;
इस समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें निम्नलिखित हैं–&lt;br /&gt;
	i. राज्यपाल की नियुक्ति सदैव राज्य मंत्रिमण्डल से परामर्श करके की जानी चाहिए तथा इसके लिए सदैव वैकल्पिक व्यवस्था यह हो सकती है कि राज्यपाल की नियुक्ति इस प्रयोजन के लिए गठित एक उच्च शक्ति प्राप्त संगठन की सलाह के आधार पर किया जाए।&lt;br /&gt;
	ii. एक बार राज्यपाल पद पर रह चुके व्यक्तियों को इसी पद पर दूसरे कार्यकाल अथवा सरकार के अधीन किसी अन्य पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। राज्यपाल को अपने कार्यकाल में पद से तब तक नहीं हटाया जाना चाहिए, जब तक उच्चतम न्यायालय द्वारा जांच के बाद उसके द्वारा दुर्व्यवहार या उसकी अक्षमता न साबित हो जाए।&lt;br /&gt;
	iii. संविधान में विशेष प्रावधान शामिल किया जाना चाहिए, जो राष्ट्रपति को राज्यपालों के लिए निर्देश देने का अधिकार प्रदान करे। ये लिखित निर्देश उन मामलों के विषय में दिशा-निर्देश करेंगे, जिनमें राज्यपाल को केन्द्र सरकार से परामर्श करना चाहिए अथवा जिनमें केन्द्र सरकार उसे निर्देश दे सकती है। उन निर्देशों के द्वारा उन सिद्धान्तों को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए, जिनके सन्दर्भ में राज्यपाल को कार्य करना चाहिए। इन कार्यों में राज्य के प्रमुख के रूप में राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों के क्रियान्वयन का अवसर शामिल है।&lt;br /&gt;
	iv. संविधान में शामिल इस प्रावधान को तत्काल निकाल दिया जाना चाहिए कि मंत्रिमण्डल राज्यपाल के प्रसाद के पर्यन्त पद पर रहेगा। &lt;br /&gt;
	v. संविधान में विशेष रूप से निम्नलिखित निर्देशों को शामिल करना चाहिए–&lt;br /&gt;
(क)राज्यपाल को राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करना चाहिए। &lt;br /&gt;
(ख)जहाँ राज्यपाल को विधानसभा में किसी एक दल के स्पष्ट बहुमत के सम्बन्ध में समाधान न हो, वहाँ पर राज्यपाल को विधानसभा का अधिवेशन मुख्यमंत्री के चयन के लिए बुलाना चाहिए और अधिवेशन में चुने गये व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करना चाहिए।&lt;br /&gt;
(ग)यदि मुख्यमंत्री किसी मंत्री को बर्ख़ास्त करने की सलाह राज्यपाल को देता है, तो उसे मुख्यमंत्री की सलाह मान लेनी चाहिए।&lt;br /&gt;
(घ)यदि राज्यपाल को यह प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बहुमत खो दिया है, तो राज्यपाल को तत्काल विधानसभा का अधिवेशन बुलाकर मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए। यदि मुख्यमंत्री बहुमत साबित करने में असफल रहता है, तो राज्यपाल को मुख्यमंत्री को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशें–&lt;br /&gt;
सरकारिया आयोग ने राज्यपाल के सन्दर्भ में निम्न सिफ़ारिशें की हैं–&lt;br /&gt;
1.राज्यपाल के रूप में नियुक्त किये जाने वाले व्यक्ति को राज्य, जिसमें वह नियुक्त किया जाए, के बाहर का व्यक्ति होना चाहिए तथा उसे राज्य की राजनीति में रुचि नहीं रखना चाहिए।&lt;br /&gt;
2.उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो सामान्य रूप से या विशेष रूप से नियुक्त किये जाने के पहले राजनीति में सक्रिय भाग न ले रहा हो।&lt;br /&gt;
3.राज्यपाल का चयन करते समय अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्तियों को समुचित अवसर दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
4.राज्यपाल के रूप में किसी व्यक्ति का चयन करते समय राज्य के मुख्यमंत्री से प्रभावी सलाह लेने की प्रक्रिया को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;
5.किसी ऐसे व्यक्ति को राज्य के राज्यपाल के रूप में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए, जो कि केन्द्र में सत्तारूढ़ का दल का सदस्य हो, जिसमें शासन किसी अन्य दल के द्वारा चलाया जा रहा हो।&lt;br /&gt;
6.यदि राजनीतिक कारणों से किसी राज्य की संवैधानिक व्यवस्था टूट रही हो, तो राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि क्या उस राज्य में विधानसभा में बहुमत वाली सरकार का गठन हो सकता है। &lt;br /&gt;
7.यदि नीति सम्बन्धी किसी प्रश्न पर राज्य की सरकार विधानसभा में पराजित हो जाती है तो शीघ्र चुनाव कराये जा सकने की स्थिति में राज्यपाल को चुनाव तक पुराने मंत्रीमण्डल को कार्यकारी सरकार के रूप में कार्य करते रहने देना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
8.यदि राज्य सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो देती है तो राज्यपाल को सबसे बड़े विरोधी दल को सरकार बनाने का आमंत्रण देना चाहिए, और विधानसभा में बहुमत साबित करने का निर्देश देना चाहिए। यदि सबसे बड़ा दल सरकार गठित करने की स्थिति में न हो, तो राज्यपाल को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफ़ारिश करनी चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<title>बकसर बिहार</title>
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		<updated>2011-04-08T06:29:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बकसर [[बिहार]] प्रदेश के शाहाबाद ज़िले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। प्राचीन काल में यह स्थान सिद्धाश्रम कहा जाता था। [[विश्वामित्र|महर्षि विश्वामित्र]] का आश्रम यहीं पर था, जहाँ [[राम]]-[[लक्ष्मण]] ने [[मारीच]]], सुबाहु आदि को मारकर ऋषि के यज्ञ की रक्षा की थी। आज भी [[गंगा]] के तट पर पुराने चरित्रवान का कुछ थोड़ा अवशेष बचा हुआ है, जो महर्षि विश्वामित्र का यज्ञस्थल है। &lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
बकसर में संगमेश्वर सोमेश्वर, चित्ररथेश्वर, रामेश्वर, सिद्धनाथ और गौरी-शंकर नामक प्राचीन मन्दिर हैं। बकसर की पंचकोशी परिक्रमा में सभी तीर्थ आ जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बिहार के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:बिहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रानीखेत, [[उत्तराखंड]] राज्य के [[अल्मोड़ा ज़िला|अल्मोड़ा ज़िले]] के अंतर्गत एक स्थान है। देवदार और बलूत के वृक्षों से घिरा रानीखेत बहुत ही रमणीक एक लघु हिल स्टेशन है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 85 किमी. की दूरी पर स्थित यह अच्छी पक्की सड़क से जुड़ा है। इस स्थान से हिमाच्छादित मध्य हिमालयी श्रेणियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। रानीखेत से सुविधापूर्वक भ्रमण के लिए पिण्डारी ग्लेशियर, कौसानी, चौबटिया और कालिका पहुँचा जा सकता है। चौबटिया में प्रदेश सरकार के फलों के उद्यान हैं। इस पर्वतीय नगरी का मुख्य आकर्षण यहाँ विराजती नैसर्गिक शान्ति है। रानीखेत में फ़ौजी छावनी भी है और गोल्फ़ प्रेमियों के लिए एक सुन्दर पार्क भी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रानीखेत, उत्तराखंड राज्य के [[अल्मोड़ा ज़िला|अल्मोड़ा ज़िले]] के अंतर्गत एक स्थान है। देवदार और बलूत के वृक्षों से घिरा रानीखेत बहुत ही रमणीक एक लघु हिल स्टेशन है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 85 किमी. की दूरी पर स्थित यह अच्छी पक्की सड़क से जुड़ा है। इस स्थान से हिमाच्छादित मध्य हिमालयी श्रेणियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। रानीखेत से सुविधापूर्वक भ्रमण के लिए पिण्डारी ग्लेशियर, कौसानी, चौबटिया और कालिका पहुँचा जा सकता है। चौबटिया में प्रदेश सरकार के फलों के उद्यान हैं। इस पर्वतीय नगरी का मुख्य आकर्षण यहाँ विराजती नैसर्गिक शान्ति है। रानीखेत में फ़ौजी छावनी भी है और गोल्फ़ प्रेमियों के लिए एक सुन्दर पार्क भी है। &lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रानीखेत, उत्तराखंड राज्य के [[अल्मोड़ा ज़िला|अल्मोड़ा ज़िले]] के अंतर्गत एक स्थान है। देवदार और बलूत के वृक्षों से घिरा रानीखेत बहुत ही रमणीक एक लघु हिल स्टेशन है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 85 किमी. की दूरी पर स्थित यह अच्छी पक्की सड़क से जुड़ा है। इस स्थान से हिमाच्छादित मध्य हिमालयी श्रेणियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। रानीखेत से सुविधापूर्वक भ्रमण के लिए पिण्डारी ग्लेशियर, कौसानी, चौबटिया और कालिका पहुँचा जा सकता है। चौबटिया में प्रदेश सरकार के फलों के उद्यान हैं। इस पर्वतीय नगरी का मुख्य आकर्षण यहाँ विराजती नैसर्गिक शान्ति है। रानीखेत में फ़ौजी छावनी भी है और गोल्फ़ प्रेमियों के लिए एक सुन्दर पार्क भी है। &lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'रानीखेत, उत्तराखंड राज्य के [[अल्मोड़ा ज़िला|अल्मोड...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रानीखेत, उत्तराखंड राज्य के [[अल्मोड़ा ज़िला|अल्मोड़ा ज़िले]] के अंतर्गत एक स्थान है। देवदार और बलूत के वृक्षों से घिरा रानीखेत बहुत ही रमणीक एक लघु हिल स्टेशन है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 85 किमी. की दूरी पर स्थित यह अच्छी पक्की सड़क से जुड़ा है। इस स्थान से हिमाच्छादित मध्य हिमालयी श्रेणियाँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं। रानीखेत से सुविधापूर्वक भ्रमण के लिए पिण्डारी ग्लेशियर, कौसानी, चौबटिया और कालिका पहुँचा जा सकता है। चौबटिया में प्रदेश सरकार के फलों के उद्यान हैं। इस पर्वतीय नगरी का मुख्य आकर्षण यहाँ विराजती नैसर्गिक शान्ति है। रानीखेत में फ़ौजी छावनी भी है और गोल्फ़ प्रेमियों के लिए एक सुन्दर पार्क भी है। &lt;br /&gt;
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		<title>गढ़मुक्तेश्वर</title>
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		<updated>2011-04-08T06:16:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गढ़मुक्तेश्वर [[मेरठ]] से 42 किलोमीटर दूर स्थित है और [[गंगा नदी]] के दाहिने किनारे पर बसा है। प्राचीनकाल में यह [[हस्तिनापुर]] का ही एक भाग था। मुक्तेश्वर शिव का एक मन्दिर और प्राचीन शिवलिंग '''कारखण्डेश्वर''' यहीं पर स्थित है। कीर्ति की पूर्णिमा को यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{शिव2}}&lt;br /&gt;
{{शिव}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:शिव]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>गढ़मुक्तेश्वर</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'गढ़मुक्तेश्वर मेरठ से 42 किलोमीटर दूर स्थित है और [[ग...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गढ़मुक्तेश्वर [[मेरठ]] से 42 किलोमीटर दूर स्थित है और [[गंगा नदी]] के दाहिने किनारे पर बसा है। प्राचीनकाल में यह [[हस्तिनापुर]] का ही एक भाग था। मुक्तेश्वर शिव का एक मन्दिर और प्राचीन शिवलिंग '''कारखण्डेश्वर''' यहीं पर स्थित है। कीर्ति की पूर्णिमा को यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:Category:शिव]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>बकसर बिहार</title>
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		<updated>2011-04-08T06:12:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'बकसर बिहार प्रदेश के शाहाबाद ज़िले में स्थित प्रस...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बकसर [[बिहार]] प्रदेश के शाहाबाद ज़िले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। प्राचीन काल में यह स्थान सिद्धाश्रम कहा जाता था। [[विश्वामित्र|महर्षि विश्वामित्र]] का आश्रम यहीं पर था, जहाँ [[राम]]-[[लक्ष्मण]] ने [[मारीच]]], सुबाहु आदि को मारकर ऋषि के यज्ञ की रक्षा की थी। आज भी [[गंगा]] के तट पर पुराने चरित्रवान का कुछ थोड़ा अवशेष बचा हुआ है, जो महर्षि विश्वामित्र का यज्ञस्थल है। &lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
बकसर में संगमेश्वर सोमेश्वर, चित्ररथेश्वर, रामेश्वर, सिद्धनाथ और गौरी-शंकर नामक प्राचीन मन्दिर हैं। बकसर की पंचकोशी परिक्रमा में सभी तीर्थ आ जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बिहार के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>बंजारा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Nomads-Gujarat.jpg|thumb|250px|बंजारे, गुजरात]]&lt;br /&gt;
बंजारा-घुमक्कड़ कबायली जाति। संस्कृत रूप 'वाणिज्यकार'। ये व्यापारी घूम-घूमकर अन्न आदि विक्रेय वस्तु देशभर में पहुँचाते थे। इनकी संख्या [[1901]] ई. की [[भारत की जनसंख्या|भारतीय जनगणना]] में 7,65,861 थी। इनका व्यवसाय रेलवे के चलने से कम हो गया है और अब ये मिश्रित जाति हो गये हैं। ये लोग अपना जन्म सम्बन्ध उत्तर [[भारत]] के ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वर्ण से जोड़ते हैं। दक्षिण में आज भी ये अपने प्राचीन विश्वासों एवं रिवाजों पर चलते देखे जाते हैं, जो द्रविड़वर्ग से मिलते-जुलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बंजारों का [[धर्म]] जादूगरी है और ये गुरु को मानते हैं। इनका पुरोहित भगत कहलाता है। सभी बीमारियों का कारण इनमें भूत-प्रेत की बाधा, जादू-टोना आदि माना जाता है। इनके देवी-देवताओं की लम्बी तालिका में प्रथम स्थान मरियाई या [[महाकाली]] का है (मातृदेवी का विकराल रूप)। यह देवी भगत के शरीर में उतरती है और फिर वह चमत्कार दिखा सकता है। अन्य हैं, [[गुरु नानक]], बालाजी या [[कृष्ण]] का बालरूप, तुलजा देवी (दक्षिण भारत की प्रसिद्ध तुलजापुर की भवानी माता), शिव भैया, सती, मिट्ठू भूकिया आदि। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्य भारत के बंजारों में एक विचित्र वृषपूजा का भी प्रचार है। इस जन्तु को हतादिया (अवध्य) तथा बालाजी का सेवक मानकर पूजते हैं, क्योंकि बैलों का कारवाँ ही इनके व्यवसाय का मुख्य सहारा होता है। लाख-लाख बैलों की पीठ पर बोरियाँ लादकर चलने वाले 'लक्खी बंजारे' कहलाते थे। छत्तीसगढ़ के बंजारे 'बंजारा' देवी की पूजा करते हैं, जो इस जाति की मातृशक्ति की द्योतक हैं। सामान्यता ये लोग हिन्दुओं के सभी देवताओं की आराधना करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>बंजारा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'बंजारे, गुजरात बंजारा-घुमक्कड़ कबा...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Nomads-Gujarat.jpg|thumb|बंजारे, गुजरात]]&lt;br /&gt;
बंजारा-घुमक्कड़ कबायली जाति। संस्कृत रूप 'वाणिज्यकार'। ये व्यापारी घूम-घूमकर अन्न आदि विक्रेय वस्तु देशभर में पहुँचाते थे। इनकी संख्या [[1901]] ई. की [[भारत की जनसंख्या|भारतीय जनगणना]] में 7,65,861 थी। इनका व्यवसाय रेलवे के चलने से कम हो गया है और अब ये मिश्रित जाति हो गये हैं। ये लोग अपना जन्म सम्बन्ध उत्तर [[भारत]] के ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वर्ण से जोड़ते हैं। दक्षिण में आज भी ये अपने प्राचीन विश्वासों एवं रिवाजों पर चलते देखे जाते हैं, जो द्रविड़वर्ग से मिलते-जुलते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बंजारों का धर्म जादूगरी है और ये गुरु को मानते हैं। इनका पुरोहित भगत कहलाता है। सभी बीमारियों का कारण इनमें भूत-प्रेत की बाधा, जादू-टोना आदि माना जाता है। इनके देवी-देवताओं की लम्बी तालिका में प्रथम स्थान मरियाई या [[महाकाली]] का है (मातृदेवी का विकराल रूप)। यह देवी भगत के शरीर में उतरती है और फिर वह चमत्कार दिखा सकता है। अन्य हैं, [[गुरु नानक]], बालाजी या [[कृष्ण]] का बालरूप, तुलजा देवी (दक्षिण भारत की प्रसिद्ध तुलजापुर की भवानी माता), शिव भैया, सती, मिट्ठू भूकिया आदि। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्य भारत के बंजारों में एक विचित्र वृषपूजा का भी प्रचार है। इस जन्तु को हतादिया (अवध्य) तथा बालाजी का सेवक मानकर पूजते हैं, क्योंकि बैलों का कारवाँ ही इनके व्यवसाय का मुख्य सहारा होता है। लाख-लाख बैलों की पीठ पर बोरियाँ लादकर चलने वाले 'लक्खी बंजारे' कहलाते थे। छत्तीसगढ़ के बंजारे 'बंजारा' देवी की पूजा करते हैं, जो इस जाति की मातृशक्ति की द्योतक हैं। सामान्यता ये लोग हिन्दुओं के सभी देवताओं की आराधना करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<title>लॉर्ड कर्ज़न</title>
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		<updated>2011-04-08T05:56:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: /* पुलिस सुधार */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
[[लॉर्ड एल्गिन]] के बाद 1899 ई. में लॉर्ड कर्ज़न [[भारत]] का वायसराय बनकर आया। भारत का वायसराय बनने के पूर्व भी कर्ज़न चार बार भारत आ चुका था। भारत में वायसराय के रूप में उसका कार्यकाल काफ़ी उथल-पुथल का रहा है। कर्ज़न के विषय में पी. राबर्टस ने लिखा है कि '''भारत में किसी अन्य वायसराय को अपना पद सम्भालने से पूर्व भारत की समस्याओं का इतना ठीक ज्ञान नहीं था जितना कि लॉर्ड कर्ज़न को। कर्ज़न ने जनमानस की आकांक्षाओं की पूर्णरूप से अवहेलना करते हुए भारत में ब्रिटिश हुकूमत को पत्थर की चट्टान पर खड़ा करने का प्रयास किया।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कर्ज़न के महत्त्वपूर्ण सुधार इस प्रकार है:-&lt;br /&gt;
==पुलिस सुधार==&lt;br /&gt;
'पुलिस सुधार' के अन्तर्गत कर्ज़न ने 1902 ई. में सर एण्ड्रयू फ़्रेज़र की अध्यक्षता में एक पुलिस आयोग की स्थापना की। 1903 ई. में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट मेम आयोग ने [[भारतीय पुलिस|पुलिस]] विभाग की आलोचना करते हुए कहा कि यह विभाग पूर्णत: अक्षम, प्रशिक्षण से रहित, भ्रष्ट एवं दमनकारी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा सुधार==&lt;br /&gt;
शैक्षिक सुधारों के अन्तर्गत कर्ज़न ने 1902 ई. में सर टामस रैले की अध्यक्षता में '''विश्वविद्यालय आयोग''' का गठन किया। आयोग द्वारा दिये गए सुझावों के आधार पर भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 पारित किया गया।&lt;br /&gt;
==आर्थिक सुधार==&lt;br /&gt;
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत कर्ज़न ने 1899-1900 ई. में पड़े अकाल व सूखे की स्थिति के विश्लेषण के लिए सर एण्टनी मैकडॉनल की अध्यक्षता में एक [[अकाल आयोग]] की नियुक्ति की। आयोग ने कहा कि अकाल सहायता व अनुदान में दी गई सहायता पर अनावश्यक बल दिया गया। आयोग ने कहा कि कार्य करने में सक्षम लोगों को उनके कार्य में ही सहयोग करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सैनिक सुधार==&lt;br /&gt;
सैनिक सुधार के अन्तर्गत कर्ज़न ने सेनापति किचनर के सहयोग से सेना का पुनर्गठन किया। भारतीय सेना को उत्तरी व दक्षिणी कमानों में बाँटा गया।&lt;br /&gt;
==कलकत्ता निगम अधिनियम==&lt;br /&gt;
कर्ज़न ने 'कलकत्ता निगम अधिनियम 1899' के द्वारा चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या में कमी कर दी, परन्तु निगम एवं उसकी समितियों में अंग्रेज़ लोगों की संख्या बढ़ा दी गई। परिणाम यह हुआ कि [[कलकत्ता]] नगर निगम मात्र एक ऐंग्लो-इण्डियन सभा के रूप में ही रह गया। 28 चुने गये सदस्यों द्वारा इसका विरोध करने पर भी कर्ज़न विचलित नहीं हुआ और 1903 ई. में एक भोज के दौरान अपने उद्गार में कहा, '''मै वायसराय पद से निवृत्त होने के पश्चात्त कलकत्ता नगर निगम का महापौर होना पसंद करुंगा।&lt;br /&gt;
==प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम==&lt;br /&gt;
'प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904' के द्वारा कर्ज़न ने भारत में पहली बार ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा एवं मरम्मत की ओर ध्यान देते हुए 50,000 पौण्ड की धनराशि का आबंटन किया। इस कार्य के लिए कर्ज़न ने 'भारतीय पुरातत्त्व विभाग' की स्थापना की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अंग्रेज़ गवर्नर जनरल और वायसराय}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अंग्रेज़ी शासन]]&lt;br /&gt;
[[Category:औपनिवेशिक काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>भारतीय पुलिस</title>
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		<updated>2011-04-08T05:53:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'सर्वप्रथम ब्रिटिश भारत में इस विभाग की स्थापना [[गव...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;सर्वप्रथम ब्रिटिश [[भारत]] में इस विभाग की स्थापना [[गवर्नर-जनरल]] लार्ड कार्नवालिस (1786-93 ई.) ने की। [[कलकत्ता]], ढाका, [[पटना]] तथा मुर्शिदाबाद में चार अधीक्षकों के अधीन पुलिस रखी गई। क्रमश: प्रत्येक ज़िले में एक पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति हुई। उसके अधीन प्रत्येक सब-डिवीजन में एक उप-पुलिस अधीक्षक, प्रत्येक सर्किल में एक पुलिस इंसपेक्टर तथा प्रत्येक थाने में एक थानाध्यक्ष होता था। थानाध्यक्ष के अधीन कई कांस्टेबल होते थे। इन सबको राज्य से वेतन दिया जाता था और वे सामूहिक रूप से अपने-अपने क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए ज़िम्मेदार होते थे। गाँवों में चौकीदार रखे जाते थे, जिन्हें सरकार मामूली वेतन दिया करती थी। उनका काम अपने क्षेत्र के बदमाशों पर नज़र रखना और कोई दंडनीय अपराध होने पर उसकी सूचना थानाध्यक्ष को देना होता था। [[कलकत्ता]], [[बम्बई]] तथा [[मद्रास]] के प्रेसीडेंसी नगरों में पुलिस कमिश्नर के अधीन एक संयुक्त पुलिसदल होता था। पुलिस कमिश्नर सीधे पुलिस विभाग से सम्बन्धित मंत्री के अधीन होता था और क़ानून तथा व्यवस्था बनाये रखना तथा तथा विभागीय प्रशिक्षण प्रदान करना उसकी ज़िम्मेदारी होती थी। अब भारतीय प्रशासकीय सेवा के सदस्यों की भाँति पुलिस अधीक्षकों की भरती भी मुख्य रूप से अखिल भारतीय प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर होती है। किन्तु अभी तक कोई अखिल भारतीय पुलिस सेवा नहीं गठित की गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[1861]] ई. के पुलिस एक्ट के द्वारा पुलिस को प्रान्तीय संगठन बना दिया गया और उसका प्रशासन सम्बन्धित प्रान्तीय सरकारों के ज़िम्मे कर दिया गया। प्रत्येक प्रान्त के पुलिस संगठन का प्रधान पुलिस महानिरीक्षक होता है, जो कि उसका नियंत्रण करता है। सारे देश में पुलिस संगठन का सबसे बड़ा दोष यह था कि पुलिस अफ़सरों में शिक्षा का अभाव तथा भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता था। [[1902]] ई. में पुलिस प्रशासन की जाँच करने के लिए एक कमीशन की नियुक्ति की गई और उसकी सिफ़ारिशों के आधार पर पुलिस दल में सुधार करने और उसका मनोबल ऊँचा उठाने के लिए क़दम उठाये गये। एक ख़फ़िया जाँच विभाग की स्थापना की गई तथा अंतरप्रान्तीय समन्वय के लिए केन्द्रीय सरकार के गृह विभाग के अधीन केन्द्रीय ख़ुफ़िया विभाग गठित किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पुलिस दल में अधिक शिक्षित व्यक्तियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से वेतन मान में सुधार कर दिया गया है और सुविधाओं में भी वृद्धि कर दी गई है। पुलिस दलों के सदस्यों में यह भावना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है कि वे जनता के सेवक हैं, किन्तु इसमें सीमित सफलता ही मिली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
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|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6&amp;diff=148682</id>
		<title>उत्तर प्रदेश</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6&amp;diff=148682"/>
		<updated>2011-04-08T05:43:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Uttar Pradesh Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=166,052,859&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=689&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=240928 km²&lt;br /&gt;
|मंडल=18&lt;br /&gt;
|ज़िले=71&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|महानगर=[[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[लखनऊ]], [[इलाहाबाद]], [[आगरा]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[कानपुर]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[हिन्दी भाषा]], [[उर्दू भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1950/01/12&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[वाराणसी]], [[आगरा]], [[इलाहाबाद]], [[कन्नौज]], [[कुशीनगर]], [[कौशाम्बी]], [[चित्रकूट]], झांसी, फ़ैज़ाबाद, [[मेरठ]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[आगरा]], [[वाराणसी]], [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
|मुख्य धर्म-सम्प्रदाय=[[हिन्दू धर्म|हिन्दू]], [[इस्लाम धर्म|इस्लाम]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]], [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]], [[जैन धर्म|जैन]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:898&lt;br /&gt;
|साक्षरता=57.36&lt;br /&gt;
|स्त्री=42.97&lt;br /&gt;
|पुरुष=70.22&lt;br /&gt;
|जलवायु=उष्णदेशीय मानसून&lt;br /&gt;
|तापमान=31 °C&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=5°C&lt;br /&gt;
|उच्च न्यायालय=[[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[बी. एल. जोशी]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[मायावती]]&lt;br /&gt;
|नेता विरोधी दल=[[शिवपाल सिंह यादव]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=404&lt;br /&gt;
|विधान परिषद सदस्य संख्या=100&lt;br /&gt;
|लोकसभा क्षेत्र=80&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://upgov.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:56, 25 मार्च 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Uttar Pradesh Logo.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश''' [[भारत]]  का  जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। [[लखनऊ]] प्रदेश की प्रशासनिक राजधानी और [[इलाहाबाद]] न्यायिक राजधानी है। उत्तर प्रदेश के दूसरे महत्त्वपूर्ण नगर- [[आगरा]], [[अलीगढ़]], [[अयोध्या]], [[बरेली]], [[मेरठ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[गोरखपुर]], [[ग़ाज़ियाबाद]], [[मुरादाबाद]], [[सहारनपुर]], फ़ैज़ाबाद, [[कानपुर]]  हैं। इस राज्य के पड़ोसी राज्य हैं - [[उत्तराखंड|उत्तरांचल]], [[हिमाचल प्रदेश]], [[हरियाणा]], [[दिल्ली]], [[राजस्थान]], [[मध्य प्रदेश]], [[छत्तीसगढ़]], [[झारखण्ड]], [[बिहार]]। उत्तर प्रदेश की पूर्वोत्तर दिशा में [[नेपाल]] देश है। उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल 2,40,927 वर्ग किमी. है। यह भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। 9 नवम्बर, 2000 को इसमें से अलग कर उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया।&lt;br /&gt;
26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र बनने पर राज्य को अपना वर्तमान नाम उत्तर प्रदेश मिला था।&lt;br /&gt;
==सघन आबादी वाला राज्य==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश सघन आबादी वाले''' [[गंगा नदी]] और [[यमुना नदी]] के मैदान में बसा है। लगभग 16 करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तर प्रदेश केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला उपराष्ट्रीय प्रदेश है। समूचे विश्व के सिर्फ़ पांच राष्ट्रों [[चीन]], भारत, [[संयुक्त राज्य अमरीका|संयुक्त अमरीका]], इंडोनिशिया और ब्राज़ील की जनसंख्या ही उत्तर-प्रदेश की जनसंख्या से अधिक है। उत्तर प्रदेश का भारतीय एवं [[हिन्दू धर्म]] के इतिहास में बहुत योगदान है। उत्तर प्रदेश आधुनिक इतिहास और राजनीति का सदैव से केन्द्र बिन्दु रहा है। यहाँ के निवासियों ने [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन]] में प्रमुख भूमिका निभायी थी। [[इलाहाबाद]] शहर में विख्यात नेताओं- [[मोतीलाल नेहरू]], पुरुषोत्तमदास टन्डन और [[लालबहादुर शास्त्री]] आदि प्रमुख नेताओं का घर था। यह शहर देश के आठ प्रधानमन्त्रियों- [[जवाहरलाल नेहरू]], [[इंदिरा गाँधी]], [[लालबहादुर शास्त्री]], [[चौधरी चरण सिंह]], [[विश्वनाथ प्रताप सिंह]], [[चन्द्रशेखर सिंह|चन्द्रशेखर सिंह]], [[राजीव गांधी]] और [[अटल बिहारी वाजपेयी]] का चुनाव क्षेत्र भी रहा है। इंदिरा गांधी के पुत्र स्वर्गीय संजय गांधी का चुनाव-क्षेत्र भी यही था और आजकल भू.पू. प्रधानमंत्री स्व. राजीव गाँधी की पत्नी श्रीमती [[सोनिया गांधी]] भी [[रायबरेली]] से चुनाव लड़तीं हैं और उनके पुत्र [[राहुल गाँधी]] भी अमेठी से चुनाव लड़ते हैं।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश का इतिहास बहुत प्राचीन है'''। उत्तर प्रदेश के इतिहास को पाँच कालों में बाँटा जा सकता है-प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल (लगभग 600 ई.पू. तक), [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] ([[ब्राह्मण]]) काल (लगभग 600 ई.पू. से लगभग 1200 ई.), मुस्लिम काल (लगभग 1200 से 1775 ई.), ब्रिटिश काल (लगभग 1775 से 1947 ई.), स्वतंत्रता पश्चात का काल (1947 से वर्तमान तक)। गंगा के मैदान के बीचोंबीच की अपनी स्थिति के कारण उत्तर प्रदेश समूचे उत्तरी भारत के इतिहास का केन्द्र बिन्दु रहा है। उत्तर वैदिक काल में इसे 'ब्रहर्षि देश' या 'मध्य देश' के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश वैदिक काल में कई महान [[ऋषि]]-[[मुनि|मुनियों]], जैसे - [[भारद्वाज]], [[गौतम]], [[याज्ञवल्क्य]], [[वसिष्ठ]], [[विश्वामित्र]] और [[वाल्मीकि]] आदि की तपोभूमि रहा है। कई पवित्र पुस्तकों की रचना भी यहीं हुई। भारत के दो मुख्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] की कथा भी यहीं की है। [[चित्र:Vishwanath-Temple-Varanasi.jpg|thumb|left|[[विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग|विश्वनाथ मन्दिर]], [[वाराणसी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Vishwanath Temple, Varanasi]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर प्रदेश में दो नए धर्मों - [[जैन]] और [[बौद्ध]]  का विकास हुआ। [[बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश [[सारनाथ]] में दिया और [[बौद्ध धर्म]] की शुरूआत की। उत्तर प्रदेश के ही [[कुशीनगर]] में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उत्तर प्रदेश के कई नगर जैसे- [[अयोध्या]], [[प्रयाग]], [[वाराणसी]] और [[मथुरा]] विद्या अध्ययन के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। मध्य काल में उत्तर प्रदेश मुस्लिम शासकों के अधीन हो गया था, जिससे [[हिन्दू]] और [[इस्लाम धर्म]] के पास आने से एक नई मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ। [[तुलसीदास]], [[सूरदास]], [[रामानंद]] और उनके मुस्लिम शिष्य [[कबीर]] के अतिरिक्त अन्य कई संत पुरुषों ने [[हिन्दी]] और अन्य भाषाओं के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना है, जब [[आर्य]] यहाँ आये और वैदिक सभ्यता का आरम्भ हुआ, तभी से यहाँ का इतिहास मिलता है। आर्य [[सिन्धु नदी|सिन्धु]] और [[सतलुज नदी|सतलुज]] के मैदानी भागों से यमुना और गंगा के मैदानी भाग की ओर बढ़े। इन्होंने यमुना और गंगा के मैदानी भाग और [[घाघरा नदी|घाघरा]] क्षेत्र को अपना घर बनाया। इन्हीं आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम '[[आर्यावर्त]]' अथवा 'भारतवर्ष' (भरत आर्यों के एक चक्रवर्ती राजा थे, जिनके नाम और ख्याति से यह देश भारतवर्ष के नाम से जाना गया) पड़ा।&lt;br /&gt;
==प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक काल==&lt;br /&gt;
'''पुरातत्व ने उत्तर प्रदेश की आरम्भिक सभ्यता''' पर नई रौशनी डाली है। दक्षिणी ज़िले प्रतापगढ़ में पाई गई मानव खोपड़ियों के अवशेष लगभग 10,000 ई. पू. के बताए गए हैं। वैदिक साहित्य और दो महाकाव्यों, [[रामायण]] व [[महाभारत]] से इस क्षेत्र के सातवीं शताब्दी ई. पू. के पहले की जानकारी मिलती है। जिसमें गंगा के मैदानों का वर्णन उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत किया गया है। महाभारत की पृष्ठभूमि राज्य के पश्चिमी हिस्से [[हस्तिनापुर]] के आसपास है, जबकि रामायण की पृष्ठभूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य में भगवान [[राम]] का जन्मस्थान [[अयोध्या]] है। राज्य में दे अन्य पौराणिक स्रोत हैं-[[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के आसपास के क्षेत्र जहाँ [[कृष्ण]] का जन्म हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण में हिन्दुओं के भगवान राम का प्राचीन राज्य [[कौशल]] इसी क्षेत्र में था, अयोध्या कौशल राज्य की राजधानी थी। [[हिन्दू धर्म]] के अनुसार भगवान [[विष्णु]] के आठवें अवतार भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में हुआ था। विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाने वाला वाराणसी शहर भी इसी प्रदेश में है। वाराणसी के समीप सारनाथ का [[स्तूप]] भगवान [[बुद्ध]] के लिए प्रसिद्ध है। समय के साथ साथ यह विशाल क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया और [[गुप्त]], [[मौर्य]] और [[कुषाण]] साम्राज्यों का भाग बन गया। 7वीं शताब्दी में [[कन्नौज]] गुप्त साम्राज्य का प्रमुख केन्द्र बन गया था।&lt;br /&gt;
==बौद्ध-हिन्दू (ब्राह्मण) काल==&lt;br /&gt;
'''सातवीं शताब्दी ई. पू. के अन्त से भारत और उत्तर प्रदेश''' का व्यवस्थित इतिहास आरम्भ होता है, जब उत्तरी भारत में 16 महाजनपद श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल थे, इनमें से सात वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के अंतर्गत थे। [[बुद्ध]] ने अपना पहला उपदेश वाराणसी (बनारस) के निकट [[सारनाथ]] में दिया और एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जो न केवल भारत में, बल्कि [[चीन]] व [[जापान]] जैसे सुदूर देशों तक भी फैला। कहा जाता है कि, बुद्ध को [[कुशीनगर]] में परिनिर्वाण (शरीर से मुक्त होने पर [[आत्मा]] की मुक्ति) प्राप्त हुआ था, जो पूर्वी ज़िले देवरिया में स्थित है। पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से छठी शताब्दी ई. तक उत्तर प्रदेश अपनी वर्तमान सीमा से बाहर केन्द्रित शक्तियों के नियंत्रण में रहा, पहले [[मगध]], जो वर्तमान [[बिहार]] राज्य में स्थित था, और बाद में [[उज्जैन]], जो वर्तमान [[मध्य प्रदेश]] राज्य में स्थित है। इस राज्य पर शासन कर चुके इस काल के महान शासकों में [[चन्द्रगुप्त प्रथम]] (शासनकाल लगभग 330-380 ई.) व [[अशोक]] (शासनकाल लगभग 268 या 265-238), जो मौर्य सम्राट थे और [[समुद्रगुप्त]] (लगभग 330-380 ई.) और [[चन्द्रगुप्त द्वितीय]] हैं (लगभग 380-415 ई., जिन्हें कुछ विद्वान विक्रमादित्य मानते हैं)। एक अन्य प्रसिद्ध शासक [[हर्षवर्धन]] (शासनकाल 606-647) थे। जिन्होंने कान्यकुब्ज (आधुनिक [[कन्नौज]] के निकट) स्थित अपनी राजधानी से समूचे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, [[पंजाब]] और [[राजस्थान]] के कुछ हिस्सों पर शासन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काल के दौरान बौद्ध और हिन्दू (ब्राह्मण) संस्कृति, दोनों का उत्कर्ष हुआ। अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध कला के स्थापत्य व वास्तुशिल्प प्रतीक अपने चरम पर पहुँचे। गुप्त काल (लगभग 320-550) के दौरान हिन्दू कला का भी अधिकतम विकास हुआ। लगभग 647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद हिन्दूवाद के पुनरुत्थान के साथ ही बौद्ध धर्म का धीरे-धीरे पतन हो गया। इस पुनरुत्थान के प्रमुख रचयिता दक्षिण [[भारत]] में जन्में शंकर थे, जो वाराणसी पहुँचे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैदानों की यात्रा की और [[हिमालय]] में [[बद्रीनाथ]] में प्रसिद्ध मन्दिर की स्थापना की। इसे हिन्दू मतावलम्बी चौथा एवं अन्तिम मठ (हिन्दू संस्कृति का केन्द्र) मानते हैं।&lt;br /&gt;
==मुस्लिम काल==&lt;br /&gt;
'''इस क्षेत्र में हालांकि 1000-1030 ई. तक''' मुसलमानों का आगमन हो चुका था, लेकिन उत्तरी भारत में 12वीं शताब्दी के अन्तिम दशक के बाद ही मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, जब [[मुहम्मद ग़ोरी]] ने गहड़वालों (जिनका उत्तर प्रदेश पर शासन था) और अन्य प्रतिस्पर्धी वंशों को हराया था। लगभग 600 वर्षों तक अधिकांश भारत की तरह उत्तर प्रदेश पर भी किसी न किसी मुस्लिम वंश का शासन रहा, जिनका केन्द्र [[दिल्ली]] या उसके आसपास था। 1526 ई. में [[बाबर]] ने दिल्ली के सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हराया और सर्वाधिक सफल मुस्लिम वंश, [[मुग़ल]] वंश की नींव रखी। इस साम्राज्य ने 200 वर्षों से भी अधिक समय तक उपमहाद्वीप पर शासन किया। इस साम्राज्य का महानतम काल [[अकबर]] (शासनकाल 1556-1605 ई.) का काल था, जिन्होंने [[आगरा]] के पास नई शाही राजधानी [[फ़तेहपुर सीकरी]] का निर्माण किया। उनके पोते [[शाहजहाँ]] (शासनकाल 1628-1658 ई.) ने आगरा में [[ताजमहल]] (अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा, जो प्रसव के दौरान चल बसी थीं) बनवाया, जो विश्व के महानतम वास्तु शिल्पीय नमूनों में से एक है। शाहजहाँ ने आगरा व दिल्ली में भी वास्तुशिल्प की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण इमारतें बनवाईं थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में केन्द्रित मुग़ल साम्राज्य ने एक नई मिश्रित संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया। अकबर इसके महानतम प्रतिपादक थे, जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने दरबार में वास्तुशिल्प, [[साहित्य]], चित्रकला और [[संगीत]] विशेषज्ञों को नियुक्त किया था। हिन्दुत्व और इस्लाम के टकराव ने कई नए मतों का विकास किया, जो इन दोनों और [[भारत]] की विभिन्न जातियों के बीच आम सहमति क़ायम करना चाहते थे। [[भक्ति आन्दोलन]] के संस्थापक रामानन्द (लगभग 1400-1470 ई.), जिनका दावा था कि, मुक्ति लिंग या जाति पर आश्रित नहीं है और सभी धर्मों के बीच अनिवार्य एकता की शिक्षा देने वाले [[कबीर]] ने उत्तर प्रदेश में मौजूद धार्मिक सहिष्णुता के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई केन्द्रित की। 18वीं शताब्दी में मुग़लों के पतन के साथ ही इस मिश्रित संस्कृति का केन्द्र दिल्ली से लखनऊ चला गया, जो अवध (औध, वर्तमान अयोध्या) के नवाब के अन्तर्गत था और जहाँ साम्प्रदायिक सदभाव के माहौल में [[कला]], साहित्य, संगीत और काव्य का उत्कर्ष हुआ।&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश काल==&lt;br /&gt;
'''लगभग 75 वर्ष की अवधि में वर्तमान उत्तर प्रदेश''' के क्षेत्र का [[ईस्ट इण्डिया कम्पनी]] (ब्रिटिश व्यापारिक कम्पनी) ने धीरे-धीरे अधिग्रहण किया। विभिन्न उत्तर भारतीय वंशों 1775, 1798 और 1801 में नवाबों, 1803 में सिंधिया और 1816 में [[गोरखा|गोरखों]] से छीने गए प्रदेशों को पहले बंगाल प्रेज़िडेन्सी के अन्तर्गत रखा गया, लेकिन 1833 में इन्हें अलग करके पश्चिमोत्तर प्रान्त (आरम्भ में आगरा प्रेज़िडेन्सी कहलाता था) गठित किया गया। 1856 ई. में कम्पनी ने [[अवध]] पर अधिकार कर लिया और आगरा एवं अवध संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के समरूप) के नाम से इसे 1877 ई. में पश्चिमोत्तर प्रान्त में मिला लिया गया। 1902 ई. में इसका नाम बदलकर संयुक्त प्रान्त कर दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857-1859 ई. के बीच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध हुआ विद्रोह मुख्यत: पश्चिमोत्तर प्रान्त तक सीमित था। 10 मई, 1857 ई. को [[मेरठ]] में सैनिकों के बीच भड़का विद्रोह कुछ ही महीनों में 25 से भी अधिक शहरों में फैल गया। 1858 ई. में विद्रोह के दमन के बाद पश्चिमोत्तर और शेष ब्रिटिश भारत का प्रशासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी से ब्रिटिश ताज को हस्तान्तरित कर दिया गया। 1880 ई. के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ संयुक्त प्रान्त स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी रहा। प्रदेश ने भारत को [[मोतीलाल नेहरू]], [[मदन मोहन मालवीय]], [[जवाहरलाल नेहरू]] और पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी राजनीतिक नेता दिए। 1922 में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने के लिए किया गया [[महात्मा गांधी]] का [[असहयोग आन्दोलन]] पूरे संयुक्त प्रान्त में फैल गया, लेकिन चौरी चौरा गाँव (प्रान्त के पूर्वी भाग में) में हुई हिंसा के कारण महात्मा गांधी ने अस्थायी तौरर पर आन्दोलन को रोक दिया। संयुक्त प्रान्त [[मुस्लिम लीग]] की राजनीति का भी केन्द्र रहा। ब्रिटिश काल के दौरान रेलवे, नहर और प्रान्त के भीतर ही संचार के साधनों का व्यापक विकास हुआ। अंग्रेज़ों ने यहाँ आधुनिक शिक्षा को भी बढ़ावा दिया और यहाँ पर लखनऊ विश्वविद्यालय (1921 में स्थापित) जैसे विश्वविद्यालय व कई महाविद्यालय स्थापित किए।&lt;br /&gt;
==स्वतंत्रता पश्चात का काल==&lt;br /&gt;
'''1947 में संयुक्त प्रान्त नव स्वतंत्र भारतीय गणराज्य की एक''' प्रशासनिक इकाई बना। दो साल बाद इसकी सीमा के अन्तर्गत स्थित, टिहरी गढ़वाल और रामपुर के स्वायत्त राज्यों को संयुक्त प्रान्त में शामिल कर लिया गया। 1950 में नए संविधान के लागू होने के साथ ही संयुक्त प्रान्त का नाम उत्तर प्रदेश रखा गया और यह भारतीय संघ का राज्य बना। स्वतंत्रता के बाद से [[भारत]] में इस राज्य की प्रमुख भूमिका रही है। इसने देश को जवाहर लाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी सहित कई [[प्रधानमंत्री]], सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक आचार्य नरेन्द्र देव, जैसे प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी (अल्पसंख्यक) दलों के नेता और भारतीय जनसंघ, बाद में भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री [[अटल बिहारी वाजपेयी]] जैसे नेता दिए हैं। राज्य की राजनीति, हालांकि विभाजनकारी रही है और कम ही मुख्यमंत्रियों ने पाँच वर्ष की अवधि पूरी की है।&lt;br /&gt;
==राज्य का विभाजन==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के गठन के तुरन्त बाद''' [[उत्तराखण्ड]] क्षेत्र (गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र द्वारा निर्मित) में समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। इस क्षेत्र के लोगों को लगा कि, विशाल जनसंख्या और वृहद भौगोलिक विस्तार के कारण लखनऊ में बैठी सरकार के लिए उनके हितों की देखरेख करना सम्भव नहीं है। बेरोज़गारी, ग़रीबों और सामान्य व्यवस्था व पीने के पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी और क्षेत्र के अपेक्षाकृत कम विकास ने लोगों को एक अलग राज्य की माँग करने पर विवश कर दिया। शुरू-शुरू में विरोध कमज़ोर था, लेकिन 1990 के दशक में इसने ज़ोर पकड़ा व आन्दोलन तब और भी उग्र हो गया, जब 2 अक्टूबर 1994 को मुज़फ़्फ़रनगर में इस आन्दोलन के एक प्रदर्शन में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में 40 लोग मारे गए। अन्तत: नवम्बर, 2000 में उत्तर प्रदेश के पश्चिमोत्तर हिस्से से उत्तरांचल के नए राज्य का, जिसमें कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे, गठन किया गया।&lt;br /&gt;
==प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम==&lt;br /&gt;
'''सन 1857 में अंग्रेज़ी फ़ौज के भारतीय सिपाहियों ने''' बग़ावत कर दी थी। यह बग़ावत लगभग एक वर्ष तक चली और धीरे धीरे यह बग़ावत पूरे उत्तर भारत में फ़ैल गयी। इसी बग़ावत को [[भारत]] का [[सिपाही स्वतंत्रता संग्राम|प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम]] नाम दिया गया। यह बग़ावत [[मेरठ]] शहर से शुरू हुई। जिसका कारण [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] द्वारा [[गाय]] और सुअर की चर्बी से बने कारतूस थे। इस बग़ावत की वज़ह लॉर्ड डलहौज़ी की राज्य हड़पने की नीति भी थी। यह संग्राम मुख्यतः [[दिल्ली]], [[लखनऊ]], [[कानपुर]], [[झाँसी]] और [[बरेली]] में लड़ा गया। इस संग्राम में [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], [[अवध]] की [[बेगम हज़रत महल]], बख़्त खान, [[नाना साहब|नाना साहेब]], [[तात्या टोपे]] आदि अनेक देशभक्तों ने भाग लिया। [[चित्र:Ganga-River-Aarti.jpg|thumb|250px|आरती, [[गंगा नदी]], [[इलाहाबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Aarti, Ganga River, Allahabad]] उत्तर प्रदेश राज्य की बौद्धिक श्रेष्ठता ब्रिटिश शासन काल में भी बनी रही। सन [[1902]] में 'नार्थ वेस्ट प्रोविन्स' का नाम बदल कर 'यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एण्ड अवध' कर दिया गया। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे 'यू. पी.' कहा गया। सन [[1920]] में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद के स्थान पर लखनऊ बना दिया गया। प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक न्यायपीठ शाखा (हाईकोर्ट बैंच) स्थापित की गयी। बाद में 1935 में इसका संक्षिप्त नाम 'संयुक्त प्रांत' प्रचलित हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 12 जनवरी [[1950]] में 'संयुक्त प्रांत' का नाम बदल कर ‘उत्तर प्रदेश’ रखा गया। [[गोविंद बल्लभ पंत]] इस प्रदेश के प्रथम मुख्य मन्त्री बने। अक्टूबर [[1963]] में सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश और भारत की 'प्रथम महिला मुख्यमन्त्री' बनीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन [[2000]] में भारतीय [[संसद]] ने उत्तर-प्रदेश के उत्तर पश्चिमी, पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश के मुख्यतः पहाड़ी भाग गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल को मिला कर उत्तर प्रदेश को विभाजित कर उत्तरांचल राज्य का निर्माण किया, जिसका नाम बाद में बदल कर [[उत्तराखंड]] कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश की अधिकांश [[उत्तर प्रदेश की झीलें|झीलें]] कुमाऊँ क्षेत्र में हैं।&lt;br /&gt;
==प्रदेश का भूगोल==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रमुख भूगोलीय तत्व इस प्रकार से हैं-&lt;br /&gt;
====भूमि====&lt;br /&gt;
*'''भू-आकृति''' - उत्तर प्रदेश को दो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों, गंगा के मध्यवर्ती मैदान और दक्षिणी उच्चभूमि में बाँटा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा गंगा के मैदान में है। मैदान अधिकांशत: गंगा व उसकी सहायक नदियों के द्वारा लाए गए जलोढ़ अवसादों से बने हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में उतार-चढ़ाव नहीं है, यद्यपि मैदान बहुत उपजाऊ है, लेकिन इनकी ऊँचाई में कुछ भिन्नता है, जो पश्चिमोत्तर में 305 मीटर और सुदूर पूर्व में 58 मीटर है। गंगा के मैदान की दक्षिणी उच्चभूमि अत्यधिक विच्छेदित और विषम [[विंध्य पर्वतमाला]] का एक भाग है, जो सामान्यत: दक्षिण-पूर्व की ओर उठती चली जाती है। यहाँ ऊँचाई कहीं-कहीं ही 305 से अधिक होती है।&lt;br /&gt;
====अपवाह====&lt;br /&gt;
यह राज्य उत्तर में [[हिमालय]] और दक्षिण में विंध्य पर्वतमाला से उदगमित नदियों के द्वारा भली-भाँति अपवाहित है। [[गंगा]] एवं उसकी सहायक नदियों, [[यमुना नदी]], [[रामगंगा नदी]], [[गोमती नदी]], [[घाघरा नदी]] और [[गंडक नदी]] को हिमालय के हिम से लगातार पानी मिलता रहता है। विंध्य श्रेणी से निकलने वाली [[चंबल नदी]], [[बेतवा नदी]] और [[केन नदी]] [[यमुना नदी]] में मिलने से पहले राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बहती है। विंध्य श्रेणी से ही निकलने वाली [[सोन नदी]] राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में बहती है और राज्य की सीमा से बाहर [[बिहार]] में गंगा नदी से मिलती है।&lt;br /&gt;
====मृदा====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग दो-तिहाई भाग गंगा तंत्र की धीमी गति से बहने वाली नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी की गहरी परत से ढंका है। अत्यधिक उपजाऊ यह जलोढ़ मिट्टी कहीं रेतीली है, तो कहीं चिकनी दोमट। राज्य के दक्षिणी भाग की मिट्टी सामान्यतया मिश्रित [[लाल रंग|लाल]] और [[काला रंग|काली]] या लाल से लेकर [[पीला रंग|पीली]] है। राज्य के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में मृदा कंकरीली से लेकर उर्वर दोमट तक है, जो महीन रेत और ह्यूमस मिश्रित है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में घने जंगल हैं।&lt;br /&gt;
====जलवायु====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है। राज्य में औसत तापमान जनवरी में 12.50 से 17.50 से. रहता है, जबकि मई-जून में यह 27.50 से 32.50 से. के बीच रहता है। पूर्व से (1,000 मिमी से 2,000 मिमी) पश्चिम (610 मिमी से 1,000 मिमी) की ओर वर्षा कम होती जाती है। राज्य में लगभग 90 प्रतिशत वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है, जो जून से सितम्बर तक होती है। वर्षा के इन चार महीनों में होने के कारण बाढ़ एक आवर्ती समस्या है, जिससे ख़ासकर राज्य के पूर्वी हिस्से में फ़सल, जनजीवन व सम्पत्ति को भारी नुक़सान पहुँचता है। मानसून की लगातार विफलता के परिणामस्वरूप सूखा पड़ता है व फ़सल का नुक़सान होता है।&lt;br /&gt;
====वनस्पति एवं प्राणी जीवन====&lt;br /&gt;
राज्य में वन मुख्यत: दक्षिणी उच्चभूमि पर केन्द्रित हैं, जो ज़्यादातर झाड़ीदार हैं। विविध स्थलाकृति एवं जलवायु के कारण इस क्षेत्र का प्राणी जीवन समृद्ध है। इस क्षेत्र में शेर, तेंदुआ, [[हाथी]], जंगली सूअर, घड़ियाल के साथ-साथ कबूतर, फ़ाख्ता, जंगली बत्तख़, तीतर, मोर कठफोड़वा, नीलकंठ और बटेर पाए जाते हैं। कई प्रजातियाँ, जैसे-गंगा के मैदान से सिंह और तराई क्षेत्र से गैंडे अब विलुप्त हो चुके हैं। वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सरकार ने 'चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य' और 'दुधवा अभयारण्य' सहित कई अभयारण्य स्थापित किए हैं।&lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
'''इससे एक अलग राज्य के गठन होने के बावजूद''' उत्तर प्रदेश अभी भी जनसंख्या के मामले में सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों से काफ़ी आगे है। 2001 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या 25.80 प्रतिशत बढ़ी। जनसंख्या का लौकिक अनुपात (प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या) 898 दर्ज किया गया है, जो 1991 के 876 के मुक़ाबले बेहतर है। गंगा का मैदान, जहाँ जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है, राज्य की 80 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करता है। इसकी तुलना में हिमालय क्षेत्र व दक्षिणी उच्चभूमि में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है।&lt;br /&gt;
==जातीय एवं भाषाई संघटन==&lt;br /&gt;
'''राज्य की अधिकांश जनसंख्या''' [[आर्य]]-[[द्रविड़]] जातीय समूह से सम्बद्ध है। यहाँ की जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा [[हिन्दू]], लगभग 20 प्रतिशत [[मुसलमान]] व एक प्रतिशत से भी कम अन्य धार्मिक समुदायों, [[सिक्ख]], [[बौद्ध]], [[ईसाई धर्म|ईसाई]] व [[जैन]] मतावलम्बियों का है। [[हिन्दी]] (राज्य की राजकीय भाषा) 85 प्रतिशत व [[उर्दू]] 15 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है। लोगों द्वारा बोले जाने वाली हिन्दुस्तानी भाषा में दोनों ही भाषाओं के सामान्य शब्द हैं, जिसे राज्य भर में समझा जाता है।&lt;br /&gt;
==आवासीन रचना==&lt;br /&gt;
'''राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या''' ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण आवासों की विशेषताएँ हैं-राज्य के पश्चिमी हिस्से में पाए जाने वाले घने बसे हुए गाँव, पूर्वी क्षेत्र में पाए जाने वाले छोटे गाँव और मध्य क्षेत्र में दोनों का समूह होता है, जिसकी छत फूस या मिट्टी के खपड़ों से बनी होती है। [[चित्र:Tajmahal-1.jpg|thumb|250px|[[ताजमहल]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Tajmahal, Agra]]  इन मकानों में हालांकि आधुनिक जीवन की बहुत कम सुविधाएँ हैं, लेकिन शहरों के पास बसे कुछ गाँवों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। सीमेंट से बने घर, पक्की सड़कें, बिजली, रेडियो, टेलीविजन जैसी उपभोक्ता वस्तुएँ पारम्परिक ग्रामीण जीवन को बदल रही हैं। शहरी जनसंख्या का आधे से अधिक हिस्सा एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में रहता है। [[कानपुर]] [[लखनऊ]], [[वाराणसी]] (बनारस), [[आगरा]] और [[इलाहाबाद]] उत्तर प्रदेश के पाँच सबसे बड़े नगर हैं। कानपुर उत्तर प्रदेश के मध्य क्षेत्र में स्थित प्रमुख औद्योगिक शहर है। कानपुर के पूर्वोत्तर में 48 किमी. की दूरी पर राज्य की राजधानी लखनऊ स्थित है। हिन्दुओं का सर्वाधिक पवित्र शहर वाराणसी विश्व के प्राचीनतम सतत आवासीय शहरों में से एक है। एक अन्य पवित्र शहर [[इलाहाबाद]] गंगा, यमुना और पौराणिक [[सरस्वती नदी]] के संगम पर स्थित है। राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित आगरा में [[मुग़ल]] बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा अपनी बेगम की याद में बनवाया गया मक़बरा [[ताजमहल]] स्थित है। यह [[भारत]] के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के निम्न साधन हैं-&lt;br /&gt;
====संसाधन====&lt;br /&gt;
आर्थिक तौर पर उत्तर प्रदेश देश के अत्यधिक अल्पविकसित राज्यों में से एक है। यह मुख्यत: [[कृषि]] प्रधान राज्य है और यहाँ की तीन-चौथाई (75 प्रतिशत) से अधिक जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है। राज्य में औद्योगिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की कमी है। यहाँ पर केवल सिलिका, चूना पत्थर व कोयले जैसे खनिज पदार्थ ही उल्लेखनीय मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा यहाँ जिप्सम, मैग्नेटाइट, फ़ॉस्फ़ोराइट और बॉक्साइट के अल्प भण्डार भी पाए जाते हैं।&lt;br /&gt;
====कृषि एवं वानिकी====&lt;br /&gt;
राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। [[चावल]], [[गेहूँ]], [[ज्वार]], [[बाजरा]], [[जौ]] और [[गन्ना]] राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। 1960 के दशक से गेहूँ व चावल की उच्च पैदावार वाले बीजों के प्रयोग, उर्वरकों की अधिक उपलब्धता और सिंचाई के अधिक इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया है। यद्यपि किसान दो प्रमुख समस्याओं से ग्रस्त हैं: आर्थिक रूप से अलाभकारी छोटे खेत और बेहतर उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए अपर्याप्त संसाधन, राज्य की अधिकतम कृषि भूमि किसानों को मुश्किल से ही भरण-पोषण कर पाती है। पशुधन व डेयरी उद्योग आय के अतिरिक्त स्रोत हैं, हालांकि प्रति [[गाय]] [[दूध]] का उत्पादन कम है।&lt;br /&gt;
====उद्योग====&lt;br /&gt;
राज्य में काफ़ी समय से मौजूद वस्त्र उद्योग व चीनी प्रसंस्करण उद्योग में राज्य के कुल मिलकर्मियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगा है। राज्य की अधिकांश मिलें पुरानी व अक्षम हैं। अन्य संसाधन आधारित उद्योगों में वनस्पति तेल, जूट व सीमेंट उद्योग शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने यहाँ पर भारी उपकरण, मशीनें, इस्पात, वायुयान, टेलीफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उर्वरकों के उत्पादन वाले बहुत से बड़े कारख़ाने स्थापित किए हैं। यहाँ [[मथुरा]] में एक तेल परिष्करणशाला और राज्य के दक्षिण-पूर्वी [[मिर्ज़ापुर]] ज़िले में कोयला क्षेत्र का विकास केन्द्र सरकार की दो प्रमुख परियोजनाएँ हैं। राज्य सरकार ने मध्यम और लघु स्तर के उद्योगों को प्रोत्साहन दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हस्तशिल्प, क़ालीन, पीतल की वस्तुएँ, जूते-चप्पल, चमड़े व खेल का सामान राज्य के निर्यात में प्रमुखता के साथ योगदान देते हैं। भदोई व मिर्ज़ापुर के क़ालीन दुनिया भर में सराहे जाते हैं। [[वाराणसी]] का रेशम व ज़री का काम, [[मुरादाबाद]] की पीतल की खूबसूरत वस्तुएँ, [[लखनऊ]] की चिकनकारी, नागुआ का आबनूस की लकड़ी का काम, [[फ़िरोज़ाबाद]] की काँच की वस्तुएँ और [[सहारनपुर]] का नक़क़ाशीदार लकड़ी का काम भी उल्लेखनीय है। उत्तर प्रदेश बिजली की भीषण कमी का शिकार है। 1951 से स्थापित अन्य विद्युत उत्पादन केन्द्रों से क्षमता बढ़ी है, लेकिन माँग और आपूर्ति के बीच अन्तर बढ़ता ही जा रहा है। भारत के अधिकतम तापविद्युत केन्द्रों में से एक ओबरा-रिहंद (दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश), राज्य के कई अन्य हिस्सों में स्थित विभिन्न पनबिजली संयंत्रों और बुलंदशहर के [[परमाणु]] बिजलीघर में बिजली का उत्पादन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 2004-05 में उत्तर प्रदेश में कुल 5,21,835 लघु उद्योग इकाइयाँ थीं, जिनमें लगभग 5,131 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश था और लगभग 20,01,000  लोग काम कर रहे थे। वर्ष 2004-05 में राज्य में लगभग 45.51 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश राज्य में 68 कपड़ा मिलें और 32 आटोमोबाइल के कारखाने हैं, जिनमें 5,740 करोड़ रुपये की पूंजी का निवेश है। [[चित्र:Krishna Birth Place Mathura-13.jpg|thumb|250px|left|[[कृष्ण जन्मभूमि]], [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Shri Krishna's Janm Bhumi, Mathura]] सन [[2011]] तक 'नोएडा प्राधिकरण' के अंतर्गत 102 सेक्टर विकसित करने की योजना चल रही है। इस प्राधिकरण में औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र, ग्रुप हाउसिंग क्षेत्र, आवासीय भवन, व्यावसायिक परिसंपत्तियां और संस्थागत शिक्षा क्षेत्र शामिल हैं। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की भांति ही राज्य में अन्य स्थानों पर औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने के लिए कार्य किये जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
[[File:Buland-Darwaja-Fatehpur-Sikri-Agra.jpg|thumb|300px|[[बुलंद दरवाज़ा]], [[फ़तेहपुर सीकरी]], [[आगरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Buland Darwaja, Fatehpur Sikri, Agra]] &lt;br /&gt;
*[[14 जनवरी]], 2000 को 'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' का पुनर्गठन करके 'उत्तर प्रदेश विद्युत निगम', 'उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन' तथा 'उत्तर प्रदेश पनबिजली निगम' को स्थापित किया गया है।&lt;br /&gt;
*2004 - 05 में राज्य की सिंचाई क्षमता बढ़ाकर 319.17 लाख हेक्टेयरतक करने के लिए 98,715 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। &lt;br /&gt;
*'उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड' की स्थापना के समय पन बिजलीघरों और ताप बिजलीघरों की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 2,635 मेगावाट थी जो आज बढ़कर 4,621 मेगावाट तक हो गई है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
'''राज्य के प्रमुख शहर व नगर''' सड़कों व रेल सम्पर्क से जुड़े हैं, फिर भी आमतौर पर सड़कों की स्थिति ख़राब है और रेल की पटरियों की भिन्न लाइनों (बड़ी और छोटी) के बीच सामंजस्य न होने के कारण रेल प्रणाली भी प्रभावित हुई है। [[लखनऊ]] उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन है। उत्तर प्रदेश के मुख्य नगर वायुमार्ग द्वारा [[दिल्ली]] व भारत के अन्य शहरों से जुड़े हुए हैं। राज्य के भीतर के परिवहन तंत्र में गंगा, यमुना और घाघरा नदियों की अंतर्देशीय जल परिवहन व्यवस्था भी शामिल है। [[चित्र:Uttar-Pradesh-Map-1.jpg|thumb|250px|उत्तर प्रदेश का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt; Map Of Uttar Pradesh]]&lt;br /&gt;
====सड़कें====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्मित सड़कों की कुल लंबाई 1,18,946 किलोमीटर है। इसमें 3,869 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग, 9,097 किलोमीटर प्रांतीय राजमार्ग, 1,05,980 किलोमीटर अन्य ज़िला सड़कें और 72,931 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें हैं।&lt;br /&gt;
====रेलवे मार्ग====&lt;br /&gt;
रेलवे का उत्तरी नेटवर्क का मुख्य जंक्शन राजधानी [[लखनऊ]] है। अन्य महत्त्वपूर्ण रेल जंक्शन- [[आगरा]], [[कानपुर]], [[इलाहाबाद]], मुग़लसराय, [[झाँसी]], [[मुरादाबाद]], [[वाराणसी]], टूंडला, [[गोरखपुर]], गोंडा, फ़ैज़ाबाद, [[बरेली]] और सीतापुर हैं।&lt;br /&gt;
====उड्डयन विभाग====&lt;br /&gt;
प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, आगरा, झांसी, बरेली, [[ग़ाज़ियाबाद]], गोरखपुर, [[सहारनपुर]] और रायबरेली में हवाई अड्डे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नदियाँ==&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में अनेक नदियाँ है जिनमें गंगा, घाघरा, गोमती, यमुना, चम्बल, सोन आदि मुख्य है। प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रवाहित होने वाली इन नदियों के उदगम स्थान भी भिन्न-भिन्न है, अतः इनके उदगम स्थलों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
#हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#गंगा के मैदानी भाग से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
#दक्षिणी पठार से निकलने वाली नदियाँ&lt;br /&gt;
==झील==&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की झीलें}}&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में झीलों का अभाव है। यहाँ की अधिकांश झीलें [[कुमाऊँ]] क्षेत्र में हैं जो कि प्रमुखतः भूगर्भीय शक्तियों के द्वारा भूमि के धरातल में परिवर्तन हो जाने के परिणामस्वरूप निर्मित हुई हैं। &lt;br /&gt;
==नहर==&lt;br /&gt;
{{main|उत्तर प्रदेश की नहरें}}&lt;br /&gt;
नहरों के वितरण एवं विस्तार क दृष्टि से उत्तर प्रदेश का अग्रणीय स्थान है। यहाँ की कुल सिंचित भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग नहरों के द्वारा सिंचित होता है। यहाँ की नहरें भारत की प्राचीनतम नहरों में से एक हैं।&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं सामाज==&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश के प्रशासन एवं समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-&lt;br /&gt;
====सरकार====&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सरकार का संसदीय स्वरूप है, जिसमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका शामिल है। कार्यपालिका में [[राज्यपाल]] होता है, जिसकी सहायता एवं सलाह के लिए [[मुख्यमंत्री]] के नेतृत्व में एक मंत्रिमण्डल होता है। विधायिका द्विसदनीय है: एक स्थायी निकाय विधान परिषद, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। [[विधान सभा]], जिसके सदस्य पाँच वर्ष के लिए चुने जाते हैं। न्यायपालिका में [[उच्च न्यायालय]] शामिल है, जिसका प्रमुख मुख्य न्यायाधीश होता है। राज्य का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में है, राजधानी लखनऊ में भी इसकी एक पीठ है। राज्य स्तर के नीचे स्थानीय प्रशासन के लिए 70 ज़िले हैं।&lt;br /&gt;
====शिक्षा====&lt;br /&gt;
राज्य में 16 विश्वविद्यालय, 400 से अधिक सम्बद्ध महाविद्यालय, कई चिकित्सा महाविद्यालय और विशिष्ट अध्ययनों व शोध के लिए कई संस्थान हैं। 1950 के दशक के बाद से राज्य में विद्यालयों व सभी स्तरों पर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के बावजूद राज्य की जनसंख्या का 75.36 प्रतिशत हिस्सा ही साक्षर है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम [[हिन्दी]] (कुछ निजी विद्यालयों में माध्यम अंग्रेज़ी) है, उच्चतर विद्यालय के विद्यार्थी हिन्दी व अंग्रेज़ी में पढ़ाई करते हैं। जबकि विश्वविद्यालय स्तर पर आमतौर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है। 1991 के 40.71 प्रतिशत के मुक़ाबले 2001 में राज्य की कुल साक्षरता दर बढ़कर 57.36 प्रतिशत हो गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य में एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (कानपुर), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (लखनऊ), एक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और काफ़ी संख्या में पॉलीटेक्निक, इंजीनियरिंग व औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं।&lt;br /&gt;
====स्वास्थ्य एवं जन कल्याण====&lt;br /&gt;
राज्य में स्वास्थ्य सेवाएँ विभिन्न सरकारी अस्पतालों व चिकित्सालयों, निजी एलोपैथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सों के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। कुछ प्रमुख अस्पतालों को छोड़कर राज्य के अस्पतालों व चिकित्सालयों में प्रदान की जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर आमतौर पर ख़राब है। राज्य की जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अनुसूचित जाति व जनजाति का है। आज़ादी के बाद बहुत से केन्द्रीय व राज्य स्तर के कल्याणकारी कार्यक्रमों ने शिक्षा, रोज़गार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में इन लोगों को बेहतर अवसर प्रदान किए हैं।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक जीवन==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता का उदगम स्थल है'''। वैदिक साहित्य महाकाव्य [[रामायण]] और [[महाभारत]] (जिसमें [[श्रीमद्भागवदगीता]] शामिल है) के उल्लेखनीय हिस्सों का मूल यहाँ के कई आश्रमों में है। [[बौद्ध]]-[[हिन्दू]] काल (लगभग 600 ई. पू.-1200 ई.) के ग्रन्थों व वास्तुशिल्प ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत में बड़ा योगदान दिया है। 1947 के बाद से भारत सरकार का चिह्न मौर्य सम्राट [[अशोक]] के द्वारा बनवाए गए चार सिंह युक्त स्तम्भ ([[वाराणसी]] के निकट [[सारनाथ]] में स्थित) पर आधारित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तुशिल्प, चित्रकारी, [[संगीत]], [[नृत्यकला]] और दो भाषाएँ ([[हिन्दी]] व [[उर्दू]]) [[मुग़ल]] काल के दौरान यहाँ पर फली-फूली। इस काल के चित्रों में सामान्यतया धार्मिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों का चित्रण है। यद्यपि [[साहित्य]] व संगीत का उल्लेख प्राचीन [[संस्कृत]] ग्रन्थों में किया गया है और माना जाता है कि [[गुप्त काल]] (लगभग 320-540) में संगीत समृद्ध हुआ। संगीत परम्परा का अधिकांश हिस्सा इस काल के दौरान उत्तर प्रदेश में विकसित हुआ। [[तानसेन]] व [[बैजू बावरा]] जैसे संगीतज्ञ मुग़ल शहंशाह [[अकबर]] के दरबार में थे, जो राज्य व समूचे देश में आज भी विख्यात हैं। भारतीय संगीत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध वाद्य, [[सितार]] (वीणा परिवार का तंतु वाद्य) और [[तबला|तबले]] का विकास इसी काल के दौरान इस क्षेत्र में हुआ। 18वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में [[वृन्दावन]] व [[मथुरा]] के मन्दिरों में भक्तिपूर्ण नृत्य के तौर पर विकसित शास्त्रीय नृत्य शैली कथक उत्तरी भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय गीत व नृत्य भी हैं। सबसे प्रसिद्ध लोकगीत मौसमों पर आधारित हैं।&lt;br /&gt;
==हिन्दी भाषा का जन्मस्थल==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश भारत की राजकीय भाषा हिन्दी''' की जन्मस्थली है। शताब्दियों के दौरान हिन्दी के कई स्थानीय स्वरूप विकसित हुए हैं। साहित्यिक हिन्दी ने 19वीं शताब्दी तक खड़ी बोली का वर्तमान स्वरूप (हिन्दुस्तानी) धारण नहीं किया था। वाराणसी के [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] (1850-1885 ई.) उन अग्रणी लेखकों में से थे, जिन्होंने हिन्दी के इस स्वरूप का इस्तेमाल साहित्यिक माध्यम के तौर पर किया था।&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक संस्थान==&lt;br /&gt;
'''उत्तर प्रदेश के कला संग्रहालयों में''' [[लखनऊ]] स्थित राज्य संग्रहालय, मथुरा स्थित पुरातात्विक संग्रहालय, बौद्ध पुरातात्विक संग्रहालय, सारनाथ संग्रहालय प्रमुख हैं। लखनऊ स्थित [[कला]] एवं हिन्दुस्तानी संगीत के महाविद्यालय और इलाहाबाद स्थित प्रयाग संगीत समिति ने देश में कला व शास्त्रीय संगीत के विकास में बहुत योगदान दिया है। नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तानी अकादमी हिन्दी साहित्य के विकास में सहायक रही हैं। हाल ही में उर्दू साहित्य के संरक्षण व समृद्धि के लिए राज्य सरकार ने उर्दू अकादमी की स्थापना की है।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
समय समय पर सभी धर्मों के त्योहार मनाये जाते हैं-&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में प्रत्येक बारहवें वर्ष में कुंभ का मेला आयोजित किया जाता है जो कि संभवत: दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त इलाहाबाद में प्रत्येक 6 साल बाद अर्द्ध कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kumbh mela.jpg|thumb|250px|left|[[इलाहाबाद]] में [[कुम्भ मेला]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kumbh Mela, Allahabad]]&lt;br /&gt;
*इलाहाबाद में ही प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में [[माघ मेला]] भी आयोजित किया जाता है, जहां बडी संख्या में लोग [[संगम इलाहाबाद|संगम]] में नहाते हैं। &lt;br /&gt;
*अन्य मेलों में [[मथुरा]], [[वृन्दावन]] व [[अयोध्या]] में अनेक पर्वों के मेले और झूला मेले लगते हैं, जिनमें प्रभु की प्रतिमाओं को सोने एवं चांदी के झूलों में रखकर झुलाया जाता है। ये झूला मेले लगभग एक पखवाडे तक चलते हैं।  &lt;br /&gt;
*कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर [[गंगा नदी]] में डुबकी लगाना अत्यंत आस्था से परिपूर्ण है और बहुत ही पवित्र माना जाता है और इसके लिए [[गढ़मुक्तेश्वर]], [[सोरों]], [[राजघाट]], काकोरा, बिठूर, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, और अयोध्या में बडी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा ज़िले के [[बटेश्वर उत्तर प्रदेश|बटेश्वर]] कस्बे में पशुओं का प्रसिद्ध मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*[[बाराबंकी]] ज़िले का [[देवा मेला]] मुस्लिम संत वारिस अली शाह के कारण काफ़ी प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त यहाँ हिन्दू तथा मुस्लिमों के सभी प्रमुख त्योहारों को पूरे राज्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ganga-Varanasi.jpg|thumb|250px|[[वाराणसी]] में [[गंगा नदी]] के घाट &amp;lt;br /&amp;gt; Ganga River, Varanasi]]&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश में सभी के लिए आकर्षण की कई चीजें हैं। &lt;br /&gt;
*[[ताजमहल]], [[आगरा]],&lt;br /&gt;
*प्राचीन तीर्थ स्थानों में [[वाराणसी]], विंध्याचल, [[अयोध्या]], [[चित्रकूट]], [[प्रयाग]], [[नैमिषारण्य]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[देवा शरीफ]] आदि है।&lt;br /&gt;
*[[फ़तेहपुर सीकरी]] में [[सलीम चिश्ती|शेख़ सलीम चिश्ती]] की दरगाह, &lt;br /&gt;
*[[सारनाथ]], [[श्रावस्ती]], [[कुशीनगर]], संकिसा / बसंतपुर (ज़िला एटा, उत्तर प्रदेश), कांपिल/ वर्तमान फ़र्रूख़ाबाद, [[पिपरावा]] और [[कौशांबी]] प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
*आगरा, अयोध्या, सारनाथ, वाराणसी, लखनऊ, झांसी, गोरखपुर, [[जौनपुर]], कन्नौज, [[महोबा उत्तर प्रदेश|महोबा]] , देवगढ, बिठूर और विंध्याचल  हिन्दू एवं मुस्लिम वास्तुशिल्प और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण खजाने से भरा हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Fatehpur-Sikri-Agra-2.jpg&lt;br /&gt;
|height =200&lt;br /&gt;
|alt =फ़तेहपुर सीकरी&lt;br /&gt;
|caption=शेख़ [[सलीम चिश्ती]] की दरगाह ([[फ़तेहपुर सीकरी]]) का विहंगम दृश्य&amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View Of Shekh Salim Chishti Shrine (Fatehpur Sikri)&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Kusum-sarovar-01.jpg|[[कुसुम सरोवर गोवर्धन|कुसुम सरोवर]], [[गोवर्धन]]&lt;br /&gt;
चित्र:Imambara-Lucknow.JPG|[[बड़ा इमामबाड़ा लखनऊ|बड़ा इमामबाड़ा]], [[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
चित्र:Anandha-Bhawan-Allahabad.jpg|[[आनंद भवन इलाहाबाद|आनंद भवन]], [[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
चित्र:Nirvana-Temple-Kushinagar.jpg|निर्वाण मंदिर, [[कुशीनगर]]&lt;br /&gt;
चित्र:Vishram-Ghat-13.jpg|[[यमुना]] स्नान, [[विश्राम घाट मथुरा|विश्राम घाट]], [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Sarnath-Stupa.jpg|[[सारनाथ]] [[स्तूप]]&lt;br /&gt;
चित्र:Red-Fort-Agra.jpg|[[लाल क़िला आगरा|लाल क़िला]], [[आगरा]]&lt;br /&gt;
चित्र:Govind-dev-temple-6.jpg|[[गोविन्द देव मन्दिर वृन्दावन|गोविन्द देव मन्दिर]], [[वृन्दावन]]&lt;br /&gt;
चित्र:Rumi-Darwaza-Lucknow.jpg|[[रूमी दरवाज़ा लखनऊ|रूमी दरवाज़ा]], [[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=148681</id>
		<title>राहुल गांधी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B2_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=148681"/>
		<updated>2011-04-08T05:43:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Rahul-Gandhi.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=राहुल गाँधी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[19 जून]], [[1970]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=[[राजीव गाँधी|स्व.श्री राजीव गांधी]] और [[सोनिया गांधी|श्रीमती सोनिया गांधी]]&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=अविवाहित&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[काँग्रेस-इं]]&lt;br /&gt;
|पद=भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव &lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]], [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एम.फिल. ([[दर्शन शास्त्र]])&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rahulgandhi.us/ आधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|14:23, 25 सितंबर 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
*'''राहुल गांधी''' भारतीय युवा नेता और अमेठी, [[उत्तर प्रदेश]] से [[लोकसभा]] के सांसद हैं। राहुल गांधी 'नेहरू गाँधी' परिवार से हैं जो [[भारत]] का प्रमुख राजनीतिक परिवार है। &lt;br /&gt;
*[[2009]] के आम चुनावों में राहुल गांधी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी और उसमें मिली भारी सफलता का श्रेय उन्हें दिया जाता है। राजनीतिक जीवन में उन्होंने भारत की ग्रामीण जनता से बहुत निकट का संबंध स्थापित किया और कांग्रेस दल के संगठन को मजबूती दी।&lt;br /&gt;
*सतह से जुड़ने, अनुभव प्राप्त करने और भारत को निकट से जानने के लिए उन्होंने [[मनमोहन सिंह]] के नेतृत्व की सरकार में कोई भी पद लेने से मना कर दिया।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
[[भारत]] के पूर्व [[प्रधानमंत्री]] [[राजीव गाँधी]] और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष [[सोनिया गांधी|श्रीमती सोनिया गांधी]] को 19 जून 1970 को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम बहुत प्यार और उम्मीदों के साथ राहुल रखा गया। उनकी छोटी बहन [[प्रियंका गांधी]] हैं। राहुल गांधी की प्रारम्भिक शिक्षा [[दिल्ली]] के 'मॉर्डन स्कूल' में हुई। इसके बाद वह शिक्षा के लिए 'दून स्कूल' भेजे गये जहाँ पर उनके पिता श्री राजीव गांधी ने भी शिक्षा प्राप्त की थी। सुरक्षा कारणों से 1981 से 1983 तक उन्होंने घर पर ही शिक्षा प्राप्त की। 'फ्लोरिडा' के हावर्ड विश्वविद्यालय से 1994 में उन्होंने 'कला स्नातक' की परीक्षा दी और सफलता प्राप्त की। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Rahul-Gandhi-3.jpg|thumb|250px|left|राहुल गांधी&amp;lt;br /&amp;gt; Rahul Gandhi]]&lt;br /&gt;
1995 में अपनी शिक्षा में उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से [[दर्शन शास्त्र]] में एम. फिल. किया। इसके पश्चात तीन साल तक माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी 'मानीटर ग्रुप' के साथ कार्य किया। इस कंपनी में वह 'रॉस विंसी' नाम से कार्य करते थे और उनके सहकर्मियों को उनके विषय में जानकारी नहीं थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 2002 में वह भारत लौट आये और [[मुंबई]] से 'अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी' से संबंधित कंपनी चलायी। राहुल गांधी के राजनीति में प्रवेश को लेकर समाचारपत्रों में समाचार छपते रहे किंतु उन्होंने इसकी कभी पुष्टि नहीं की। सार्वजनिक उत्सवों और कांग्रेस की बैठकों में वह अपनी माँ सोनिया गांधी के साथ दिखायी देते थे और बहिन प्रियंका गांधी के साथ एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला देखने सदभावना यात्रा पर [[पाकिस्तान]] भी गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीति में प्रवेश==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
2004 में जब प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने अपने पिता स्व॰ राजीव गांधी के क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, जो इस समय उनकी माता सोनिया गांधी का भी क्षेत्र है, उस समय उनके राजनीति में प्रवेश को लेकर मीडिया में अटकलें रहीं। किंतु उन्होंने स्पष्ट कहा - ' मैं राजनीति के विरुद्ध नहीं हूँ। मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूँगा और वास्तव में, करूँगा भी कि नहीं।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्च 2004 में राहुल गांधी ने मई में होने वाले चुनाव में भाग लेकर राजनीति में प्रवेश की घोषणा की और अपने पिता के चुनाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश के अमेठी क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा। अमेठी  सोनिया गांधी के  नेतृत्व में था। उस समय कांग्रेस संकट में थी। कांग्रेस के पास 80 में से 10 सीट थीं। उस समय राजनीति विशेषज्ञों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वह प्रियंका गांधी के राजनीति में आने की अपेक्षा कर रहे थे। उनका यह क़दम आश्चर्य जनक था। मीडिया में चर्चा थी कि क्या भारत के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार का युवा सदस्य भारत की युवा आबादी के बीच में क्या [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] पार्टी की राजनीति को पुनर्जीवित करेगा?  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मीडिया के साथ अपने पहले इंटरव्यू में, राहुल गांधी ने विभाजनकारी राजनीति की निंदा की और कहा कि वह भारतीय जाति व्यवस्था और धार्मिक तनाव को कम करने का प्रयत्न करेंगे। उनके इस क़दम का अमेठी के लोगों ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। अमेठी का इस परिवार के साथ एक लंबा संबंध था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'उन्होंने कहा कि अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा है। राहुल ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा रिश्ता केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि परिवार जैसा है। यह रिश्ता मेरी दादी इंदिरा गाँधी और पिता राजीव गाँधी के समय से है। मेरा प्रयास हमेशा यह रहेगा कि मैं अमेठी के विकास को सुनिश्चित कर सकूँ। कांग्रेस के पक्ष में मतदान की अपील करते हुए राहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह अपना काम बहुत अच्छी तरह कर रहे है और वे आपके समर्थन के हकदार हैं। मुझे भी आपका स्नेह चाहिए। बचपन के एक किस्से को याद करते हुए राहुल ने बताया कि मैं जब दस बारह साल का था तब अपने पिता के साथ पहली बार यहाँ आया था। तेज़ गर्मी के दिन थे और रास्ते बहुत खराब थे। जब मेरे पिता गाँव में घूम रहे थे तब मैं भी उनके साथ था। अचानक मेरी नज़र एक जले हुए मकान पर पड़ी, जिसमें जला हुआ अनाज और यहाँ तक कि बर्तन भी जले हुए थे। तभी मेरी नज़र एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जिसने मुझे एक चॉकलेट भी दी थी और तभी से मेरे मन में अमेठी के लिए एक ख़ास अपनापन पैदा हो गया। अमेठी के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए राहुल ने कहा जहाँ तक अमेठी का सवाल है, मैं आपके लिए और अमेठी के विकास के लिए लड़ता रहा हूँ और जो प्यार मुझे आपसे मिला है, उसके दम पर संघर्ष को आगे भी जारी रखूँगा।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hindi.webdunia.com/news/election2009/loksabha/0904/18/1090418093_1.htm अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा-राहुल]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने कहा कभी-कभी मैं यह सोच कर उदास हो जाता हूँ कि चुनाव प्रचार में यहाँ केवल एक दिन के लिए आ पाया और इस नाते मै अपनी बहन प्रियंका को धन्यवाद भी देना चाहता हूँ, जो यहाँ काफ़ी समय दे रही हैं। राहुल गाँधी ने अमेठी और [[रायबरेली]] के विकास के लिए किए गए कार्य और प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा मेरे पिता अपने दोनों हाथों से इस क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाते थे, मगर मेरा एक हाथ बंधा हुआ है। कारण, मुझे राज्य सरकार से सहयोग नहीं मिल पा रहा है, बल्कि वह विकास में बाधा डालती है। उन्होंने जनता से अपील की कि हम चाहते हैं आपके सहयोग से उत्तरप्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार बने और मैं दोनों हाथों से आपकी मदद कर सकूँ।'उन्होंने कहा कि अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा है। राहुल ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा रिश्ता केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि परिवार जैसा है। यह रिश्ता मेरी दादी इंदिरा गाँधी और पिता राजीव गाँधी के समय से है। मेरा प्रयास हमेशा यह रहेगा कि मैं अमेठी के विकास को सुनिश्चित कर सकूँ। कांग्रेस के पक्ष में मतदान की अपील करते हुए राहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह अपना काम बहुत अच्छी तरह कर रहे है और वे आपके समर्थन के हकदार हैं। मुझे भी आपका स्नेह चाहिए। बचपन के एक किस्से को याद करते हुए राहुल ने बताया कि मैं जब दस बारह साल का था तब अपने पिता के साथ पहली बार यहाँ आया था। तेज़ गर्मी के दिन थे और रास्ते बहुत खराब थे। जब मेरे पिता गाँव में घूम रहे थे तब मैं भी उनके साथ था। अचानक मेरी नज़र एक जले हुए मकान पर पड़ी, जिसमें जला हुआ अनाज और यहाँ तक कि बर्तन भी जले हुए थे। तभी मेरी नज़र एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जिसने मुझे एक चॉकलेट भी दी थी और तभी से मेरे मन में अमेठी के लिए एक ख़ास अपनापन पैदा हो गया। अमेठी के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए राहुल ने कहा जहाँ तक अमेठी का सवाल है, मैं आपके लिए और अमेठी के विकास के लिए लड़ता रहा हूँ और जो प्यार मुझे आपसे मिला है, उसके दम पर संघर्ष को आगे भी जारी रखूँगा।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hindi.webdunia.com/news/election2009/loksabha/0904/18/1090418093_1.htm अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा-राहुल]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rahul-Gandhi-2.jpg|thumb|250px|राहुल गांधी&amp;lt;br /&amp;gt; Rahul Gandhi]]&lt;br /&gt;
उन्होंने कहा कभी-कभी मैं यह सोच कर उदास हो जाता हूँ कि चुनाव प्रचार में यहाँ केवल एक दिन के लिए आ पाया और इस नाते मै अपनी बहन प्रियंका को धन्यवाद भी देना चाहता हूँ, जो यहाँ काफ़ी समय दे रही हैं। राहुल गाँधी ने अमेठी और रायबरेली के विकास के लिए किए गए कार्य और प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा मेरे पिता अपने दोनों हाथों से इस क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाते थे, मगर मेरा एक हाथ बंधा हुआ है। कारण, मुझे राज्य सरकार से सहयोग नहीं मिल पा रहा है, बल्कि वह विकास में बाधा डालती है। उन्होंने जनता से अपील की कि हम चाहते हैं आपके सहयोग से उत्तरप्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार बने और मैं दोनों हाथों से आपकी मदद कर  सकूँ।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hindi.webdunia.com/news/election2009/loksabha/0904/18/1090418093_1.htm अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा-राहुल]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कांग्रेस के नेता==&lt;br /&gt;
इस चुनाव में राहुल गांधी विशाल बहुमत से जीते। 1,00,000 मतों के बड़े अंतर से उनकी जीत हुई। इस अभियान उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर उनके साथ थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.telegraphindia.com/1060520/asp/nation/story_6246911.asp द टेलीग्राफ]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
सन 2006 तक उन्होंने कोई अन्य पद ग्रहण नहीं किया और निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। भारत और अंतरराष्ट्रीय प्रेस में व्यापक रूप से  थी चर्चा कि सोनिया गांधी उन्हें राष्ट्रीय स्तर का कांग्रेस नेता बनाने के लिए तैयार कर रही हैं।&amp;lt;ref&amp;gt; [http://www.tribuneindia.com/2004/20040822/main1.htm द ट्रिब्यून]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी ने 2006 के चुनाव में  रायबरेली से पुनः निर्वाचित होने के लिए अपनी माँ सोनिया गांधी के चुनव अभियान को सम्भाला और सोनिया गांधी 4,00,000 मतों से विजित हुईं।&lt;br /&gt;
'दिवंगत राजीव गांधी की इस मंशा और उनके सपनों को उनके पुत्र और अमेठी के सांसद राहुल गांधी ने पढा है जिसे वह निरन्तर अमेठी की ज़मीन पर उतारने में अपना क़दम बढाते जा रहे हैं। राहुल गांधी की भी मंशा नई तकनीक और विज्ञान की हर लाभकारी योजना अमेठी के अन्तिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। साफ्टवेयर के बादशाह बिल गेट्स का राहुल के साथ दौरा अमेठी में कम्प्यूटर योजना को उतारने का ही संकेत माना जा रहा है।&lt;br /&gt;
दिवंगत राजीव गांधी ने ।985 में अमेठी में विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन कर अमेठी की जनता में विज्ञान के प्रति जागरुकता पैदा करना तथा विकसित हो रही नयी तकनीक के प्रति उस समय पैदा किये जा रहे भ्रम को दूर करना था। इस प्रदर्शनी में विज्ञान के करीब-क़रीब सारे प्रयोगों के माडल व उनके कार्य व्यवहार ,लाभ-हानि को दर्शाया गया था। उस समय कम्प्यूटर और मोबाइल संचार क्रांति का सूत्रपात नहीं हुआ था।'&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.aajkikhabar.com/news/69415/69415.html अमेठी में राजीव के सपनो पर बढते राहुल के क़दम]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
जनवरी 2006 में, हैदराबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलन में, कांग्रेस पार्टी के हज़ारों कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी को पार्टी में महत्त्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका के लिए प्रोत्साहित किया और प्रतिनिधियों को सम्बोधित करने की मांग की। राहुल गांधी ने कहा- 'मैं आपकी भावनाओं और समर्थन के लिए आप सबका आभारी हूँ। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं आपको निराश नहीं करूँगा,'। उन्होंने कहा कि धैर्य बनाये रखें और महत्त्वपूर्ण पद लेने से मना कर दिया।  &lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, जो 2007 में हुए, वह कांग्रेस अभियान में प्रमुख व्यक्ति थे।  इस चुनाव में कांग्रेस ने 22 सीटें जीती, इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का वर्चस्व रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
24 सितंबर 2007 में राहुल गांधी को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया। इसी समय उन्हें युवा कांग्रेस और भारत का राष्ट्रीय छात्र संघ का निरीक्षण अधिकार दिया गया और इस तरह राहुल गांधी को युवा नेतृत्व का अवसर मिला। युवा नेता के रूप में नवम्बर 2008 को उन्होंने नई दिल्ली में अपने आवास पर साक्षात्कार आयोजित किया जिसमें चुने गये युवा  भारतीय युवा कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं।&lt;br /&gt;
==लोकसभा चुनाव 2009==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sonia-Gandhi-Rahul-Gandhi.jpg|thumb|250px|[[सोनिया गाँधी]] और राहुल गांधी&amp;lt;br /&amp;gt;Sonia Gandhi and Rahul Gandhi]]&lt;br /&gt;
लोकसभा चुनाव 2009 में उन्होंने अपनेंइर्वाचन क्षेत्र अमेठी से अपने प्रतिद्वंदी को 3,33,000 मतों के भारी अंतर से पराजित किया। इन चुनावों में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 सीट जीतकर पुनर्जीवन प्राप्त किया और इसका श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। इस चुनाव में उन्होंने छह सप्ताह में 125 जन सभाओं को सम्बोधित  किया था।&lt;br /&gt;
==व्यक्तिगत जीवन==&lt;br /&gt;
राहुल गांधी अविवाहित हैं। ऍप्रल 28, 2004 में इंडियन एक्सप्रेस में स्पेन की एक वास्तुकार 'वरौनिका' के साथ उनके संबंध होने की सूचना छ्पी थी। दोनों विश्वविद्यालय में मिले थे।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.expressindia.com/news/fullstory.php?newsid=30839  इंडियन एक्सप्रेस  My girlfriend is Spanish: Rahul Gandhi]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आलोचना==&lt;br /&gt;
*2006  में 'न्यूज़वीक' ने कहा कि उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अपनी डिग्री पूरी नहीं की हैं, तब राहुल गांधी ने क़ानूनी नोटिस भेजा, बाद में न्यूज़वीक इस बात से मुकर गया।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.indianexpress.com/news/newsweek-apologises-to-rahul-gandhi/21088 Newsweek apologises to Rahul Gandhi]&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*राहुल गांधी ने 'बांग्लादेश मुक्ति युद्ध' को, अपने परिवार की 'सफलताओं' में माना। इस बयान से भारत के कई राजनीतिक दलों को आलोचना करने का अवसर मिला। &lt;br /&gt;
*2007 के उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान में उन्होंने कहा- 'यदि गांधी-नेहरू परिवार से कोई राजनीति में सक्रिय होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती।' 1992 में मस्जिद के विध्वंस के समय भारत के प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंह राव थे, गांधी के इस बयान को नरसिंह राव की आलोचना कहा गया।  &lt;br /&gt;
*2008  में, राहुल गांधी की शक्ति का पता चला। राहुल गांधी को चंद्रशेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय में छात्रों को संबोधित करने के लिए सभागार का उपयोग करने से रोका गया, मुख्यमंत्री मायावती की राजनीतिक चालबाजियों के कारण बाद में, विश्वविद्यालय के कुलपति वी.के.सूरी को राज्यपाल श्रीटी.वी.राजेश्वर,जो कुलाधिपति भी थे, ने बाहर कर दिया, जो गांधी परिवार के समर्थक थे। इस घटना को शिक्षा की राजनीति के रूप में जाना गया और टाइम्स ऑफ इंडिया में एक हास्यचित्र में लिखा गया: 'वंश संबंधित प्रश्न का उत्तर राहुल जी के पैदल सैनिकों द्वारा दिया जा रहा है.'&amp;lt;ref&amp;gt;[http://timesofindia.indiatimes.com/articleshowpics/3638569.cms Just Like That]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जनवरी 2009 में ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड मिलीबैंड के साथ, उत्तर प्रदेश में उनके संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में, अमेठी के पास एक गाँव में, उनकी 'ग़रीबी यात्रा' के लिए आलोचना की गई। &lt;br /&gt;
{| width=100% &lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+राहुल गांधी का संक्षिप्त परिचय &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!क्रम      &lt;br /&gt;
!विवरण&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| 1- संक्षिप्त परिचय    &lt;br /&gt;
| राहुल गांधी कांग्रेस के स्टार युवा नेता हैं। गांधी-नेहरू वंश परंपरा में वह पांचवी पीढ़ी के सदस्य हैं। वह कांग्रेस के महासचिव भी हैं।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- जन्मतिथि / जन्मस्थान    &lt;br /&gt;
| 19 जून 1970, दिल्ली&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- वर्तमान में    &lt;br /&gt;
| लोकसभा से सांसद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- चुनाव क्षेत्र    .&lt;br /&gt;
| अमेठी, उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- पार्टी &lt;br /&gt;
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,लोकप्रिय नाम कांग्रेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- शिक्षा          &lt;br /&gt;
| ट्रिनिटी कॉलिज, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एम.फिल.(डिवेलपमेंट इकनॉमिक्स)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|7- कैरियर  &lt;br /&gt;
| राजनीति में प्रवेश से पहले राहुल गांधी ने लंदन के मॉनिटर ग्रुप में फाइनैंशल कन्सल्टैंट के तौर पर काम किया।वह 2002 में भारत लौटे और राजनीति में मां की मदद के लिए जुट गए। 2004 के चुनाव में वह अमेठी लोकसभा सीट से जीते। उन्हें 2007 में कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया। उन्हें 'यूथ कांग्रेस' और 'नेशनल स्टूडैंट्स यूनियन ऑफ इंडिया' के नेतृत्व की जिम्मेवारी भी मिल गई।     &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|8- निजी जीवन           &lt;br /&gt;
| राहुल गांधी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाधी और मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता जवाहर लाल नेहरू भी भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। जवाहर लाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू भारत की आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे थे। राहुल अभी अविवाहित हैं।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|9- रुचियां            &lt;br /&gt;
|पढ़ना, इंटरनेट, संगीत, शतरंज और फ्लाइंग। उन्हें तेज़ बाइक चलाने का भी शौक़ है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|10- वेबसाइट           &lt;br /&gt;
|[http://www.rahulgandhi.us/ आधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.nns24.net/khabar/article_detail.php?id=70&amp;amp;type=3&amp;amp;pg=11&amp;amp;nav=next राहुल गांधी की मीठी-मीठी बातें]&lt;br /&gt;
*[http://www.patrika.com/news.aspx?id=428269 &amp;quot;राजीव गांधी से प्रतिभाशाली है राहुल&amp;quot;]&lt;br /&gt;
*[http://www.congress.org.in/new/hindi/2Speeches%20of%20Congress%20Leaders-hn.php विश्वास मत पर बहस के दौरान भाषण]&lt;br /&gt;
*[http://www.newsweek.com/2009/05/30/the-quiet-revolutionary.html  The Quiet Revolutionary]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{नेहरू परिवार}}&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>शारदा सागर की नहर</title>
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		<updated>2011-04-08T05:43:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*यह [[उत्तर प्रदेश]] की एक नहर है।&lt;br /&gt;
*[[पीलीभीत ज़िला|पीलीभीत ज़िले]] में शारदा सागर बाँध के विस्तार के उपरान्त 1115 किलोमीटर लम्बी नहरें निकाली गई हैं। &lt;br /&gt;
*जिनसे बाराबंकी, [[रायबरेली]], सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और [[जौनपुर]] की लगभग 1.85 लाख एकड़ भूमि पर सिंचाई की जाती है। &lt;br /&gt;
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		<title>शारदा सागर की नहर</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*यह [[उत्तर प्रदेश]] की एक नहर है।&lt;br /&gt;
*[[पीलीभीत ज़िला|पीलीभीत ज़िले]] में शारदा सागर बाँध के विस्तार के उपरान्त 1115 किलोमीटर लम्बी नहरें निकाली गई हैं। &lt;br /&gt;
*जिनसे बाराबंकी, [[रायबरेली]], सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर की लगभग 1.85 लाख एकड़ भूमि पर सिंचाई की जाती है। &lt;br /&gt;
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		<title>रायबरेली</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रायबरेली [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, [[लखनऊ]] से 80 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। रायबरेली उत्तर प्रदेश राज्य का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र है। यहाँ पर अनेक प्राचीन इमारतें हैं। जिनमें क़िला, महल और कुछ सुन्दर मस्ज़िदें हैं। [[इंदिरा गांधी|स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी]] का निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण इस नगर का तीव्र गति से विकास हुआ है। यहाँ अनेक उद्योगों की स्थापना की गई है। जिनमें केन्द्र सरकार की '''इंण्डियन टेलीफ़ोन इण्डस्ट्रीज मुख्य''' है। &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>हापुड़</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'हापुड़ उत्तर प्रदेश राज्य, मेरठ से लगभग 30 किलोमीट...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;हापुड़ [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, [[मेरठ]] से लगभग 30 किलोमीटर दूर यह नगर स्थित है। जो कि रेलवे का जंक्शन भी है। यह ग़ाजियाबाद ज़िले की प्रसिद्ध व्यपारिक मण्डी है। यहाँ पर तिलहन, गुड़, गल्ले और कपास का व्यापार अधिक होता है। &lt;br /&gt;
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		<updated>2011-04-08T05:27:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;फ़र्रुख़ाबाद [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, [[गंगा]] के बाँए किनारे पर स्थित प्राचीन नगर है और रेलों का जंक्शन है। यहाँ पर पीतल बर्तनों के कारख़ाने, शीत भण्डार और तेल की मिलें हैं। ताँबे-पीतल के बर्तन, पर्दे, साड़ी, छीटों आदि की छपाई यहाँ पर अच्छी होती है। [[आलू]], तम्बाकू और [[ख़रबूज|ख़रबूजों]] के लिए भी यह नगर प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
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		<title>फ़र्रुख़ाबाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=148645"/>
		<updated>2011-04-08T05:26:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश राज्य, गंगा के बाँए कि...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;फ़र्रुख़ाबाद [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, [[गंगा]] के बाँए किनारे पर स्थित प्राचीन नगर है और रेलों का जंक्शन है। यहाँ पर पीतल बर्तनों के कारख़ाने, शीत भण्डार और तेल की मिलें हैं। ताँबे-पीतल के बर्तन, पर्दे, साड़ी, छीटों आदि की छपाई यहाँ पर अच्छी होती है। [[आलू]], तम्बाकू और [[ख़रबूज|ख़रबूजों]] के लिए भी यह नगर प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>हिमालय</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AF&amp;diff=148637"/>
		<updated>2011-04-08T05:21:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Himalayas-5.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
*हिमालय [[संस्कृत]] के हिम तथा आलय से मिल कर बना है जिसका शब्दार्थ 'बर्फ का घर' होता है। हिमालय [[भारत]] की धरोहर है। हिमालय पर्वत की एक चोटी का नाम बन्दरपुच्छ है। यह चोटी [[उत्तर प्रदेश]] के टिहरी-गढ़वाल ज़िले में स्थित है। इसकी ऊँचाई 20,731 फुट है। इसे सुमेरु भी कहते हैं। &lt;br /&gt;
*हिमालय एक पर्वत श्रृंखला है जो भारतीय उपमहाद्वीप और [[तिब्बत]] को अलग करता है। &lt;br /&gt;
*भारतवर्ष का सबसे ऊँचा पर्वत जो उत्तर में देश की लगभग 2500 किलोमीटर लंबी सीमा बनाता है और देश को उत्तर [[एशिया]] से पृथक् करता है। [[कश्मीर]] से लेकर [[असम]] तक इसका विस्तार है।  &lt;br /&gt;
*हिमालय पर्वतमाला की गणना वैज्ञानिक विश्व की नवीन पर्वत मालाओं से करते हैं। इसका निर्माण सागर-तल के उठने से आज से पाँच-छह करोड़ वर्ष पहले हुआ। हिमालय को अपनी पूरी ऊँचाई प्राप्त करने में 60 से 70 लाख वर्ष लगे।&lt;br /&gt;
*हिमालय अपनी ऊँची चोटियों के लिये प्रसिद्ध है। विश्व का सर्वोच्च शिखर [[माउंट एवरेस्ट]] हिमालय की ही एक चोटी है। विश्व के 100 सर्वोच्च शिखरों में कई हिमालय की चोटियाँ हैं। अन्य पर्वतों की अपेक्षा यह काफ़ी नया है। &lt;br /&gt;
*हिमालय से सम्बद्ध पहली पर्वत श्रृंखला [[पीर पंजाल पर्वतश्रेणी]] है। &lt;br /&gt;
*हिमालय के एक भाग का नाम कलिंद है। यहीं से [[यमुना नदी|यमुना]] निकलती है। इसी से यमुना का नाम कलिंदजा और [[कालिंदी नदी|कालिंदी]] भी है। दोनों का मतलब कलिंद की बेटी होता है। यह जगह बहुत सुन्दर है, पर यहाँ पहुँचना बहुत कठिन है। &lt;br /&gt;
*अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमगारों और हिंम मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई तथा पहाड़ी ढलानों पर से अत्यन्त तीव्रता पूर्वक उतरती हुई इसकी धारा यमुनोत्तरी पर्वत 20,731 फीट ऊँचाई से प्रकट होती है।&lt;br /&gt;
*हिमालय पर्वतश्रेणी के अतिरिक्त [[अनाई शिखर]] [[भारत]] की सबसे ऊँची चोटी है।&lt;br /&gt;
==हिमालय के पौराणिक संदर्भ==&lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार हिमालय मैना का पति और [[पार्वती देवी|पार्वती]] का पिता है। [[गंगा नदी|गंगा]] इसकी सबसे बड़ी पुत्री है। भगवान [[शंकर]] का निवास कैलाश यहीं है। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] के अनुसार [[पांडव]] स्वर्गारोहण के लिए यहीं आए थे। [[युधिष्ठर]] देवरथ में बैठकर जब सशरीर स्वर्ग जाने लगे तो उनकी [[इन्द्र]] से भेंट यहीं हुई थी। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-8.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
==गहन प्रभाव==&lt;br /&gt;
हज़ारों वर्षों तक हिमालय ने दक्षिण एशिया के लोगों पर वैयक्तिक और गहन प्रभाव डाला है, जो उनके साहित्य, राजनीति, अर्थव्यवस्था और पौराणिक कथाओं में भी प्रतिबिंबित होता है। इसकी विस्तृत बर्फ़ीली चोटियाँ लंबे समय से प्राचीन भारत के पर्वतारोही तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती रही हैं, जिन्होंने इस विशाल पर्वत श्रृंखला का [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] में नामकरण किया। आधुनिक काल में हिमालय विश्व भर के पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण और महानतम चुनौती है। &lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप की उत्तरी सीमा का निर्धारण करने और उत्तर की भूमि के लिए लगभग अगम्य अवरोध बनाने वाली यह पर्वतश्रेणी एक विशाल पर्वत पट्टिका का हिस्सा है जो उत्तरी अफ़्रीका से दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रशांत तट तक लगभग आधी दुनिया में फैली हुई है। हिमालय पर्वतश्रेणी लगभग 2,500 किलोमीटर तक पश्चिम से पूर्व दिशा में [[जम्मू-कश्मीर]] क्षेत्र के [[नंगा पर्वत]] (8,126 मीटर) से तिब्बत में नामचा बरवा (7,756 मीटर) तक निर्बाध रूप से फैली हुई है। पूर्व और पश्चिम के इन दो सुदूर छोरों के बीच दो हिमालयी देश, नेपाल और भूटान, स्थित हैं। हिमालय के पश्चिमोत्तर में हिंदुकुश और कराकोरम पर्वतश्रेणियाँ और उत्तर में तिब्बत का ऊँचा पठार है। दक्षिण से उत्तर तक हिमालय की चौड़ाई 201 से 402 किलोमीटर के बीच परिवर्तित होती रहती है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 5,94,400 वर्ग किलोमीटर है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक विशेषताएँ== &lt;br /&gt;
हिमालय की प्रमुख लाक्षणिक विशिष्टता इसकी बुलंद ऊँचाइयाँ, खड़े किनारों वाले नुकीले शिखर, घाटियाँ, पर्वतीय हिमनदियाँ, जो अक्सर विशाल होती हैं, अपरदन द्वारा गहरी कटी हुई स्थलाकृति, अथाह प्रतीत होती नदी घाटियाँ, जटिल भौगर्भिक संरचना और ऊँची पट्टियों (या क्षेत्रों) की श्रृंखला है, जिनमें विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ, जंतुजीवन और जलवायु हैं। दक्षिण की ओर से देखने पर हिमालय विशालकाय अर्द्ध चंद्र प्रतीत होता है, जिसका मूल अक्ष हिमरेखा से ऊपर स्थित है, जहाँ हिमक्षेत्र, पर्वतीय हिमनदियाँ और हिमस्खलन निचली घाटियों की उन हिमनदियों का हिस्सा बनते हैं, जो हिमालय से निकलने वाली अधिकांश नदियों के स्रोत हैं। लेकिन हिमालय का बड़ा हिस्सा हिमरेखा के नीचे स्थित है। इस श्रेणी का निर्माण करने वाली पर्वत-निर्माण प्रक्रिया अब भी क्रियाशील है, जिसमें धाराओं के भारी अपरदन और विशाल भूस्खलन जैसी गतिविधियाँ भी शामिल हैं। हिमालय पर्वतश्रेणी को चार समानांतर, लंबवत, भिन्न चौड़ाई वाली पर्वत-पट्टिकाओं में विभक्त किया जा सकता है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी भौगोलिक विशिष्टता तथा अपना अलग भूगर्भशास्त्रीय इतिहास है। इन्हें दक्षिण से उत्तर की ओर इस प्रकार बाँटा गया है- बाहरी या उप-हिमालय; लघु या निम्न हिमालय; उच्च या वृहत हिमालय; और टेथिस या तिब्बती हिमालय, इससे आगे उत्तर में तिब्बत में परा-हिमालय है, जो कुछ सुदूर उत्तरी हिमालयी श्रेणियों का पूर्व दिशा में विस्तार है। पश्चिम से पूर्व की ओर हिमालय को मोटे तौर पर तीन पर्वतीय क्षेत्रों में बाँटा गया है-&lt;br /&gt;
*पश्चिमी &lt;br /&gt;
*मध्यवर्ती &lt;br /&gt;
*पूर्वी&lt;br /&gt;
==भौगर्भिक इतिहास== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-2.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
हिमालय पर्वतश्रेणी आल्प्स से दक्षिण-पूर्व एशिया के पहाड़ों तक फैले यूरेशियाई पर्वतश्रेणी के विस्तार का हिस्सा है, जिसका निर्माण पिछले 6.5 करोड़ वर्षों में सार्वभौमिक प्लेट-विवर्तनिक शाक्तियों के कारण पृथ्वी की ऊपरी सतह पर विशालकाय उभारों के बनने से हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग 18 करोड़ वर्ष पहले, ज्यूरैसिक काल में, जब टेथिस सागर नामक एक गहरी भू- अभिनति यूरेशिया के समूचे दक्षिणी किनारे को घेरे हुए थी, पुराने विशाल महाद्वीप गोंडवाना (गोंडवानालैंड) के विखंडन की प्रक्रिया शुरू हुई। अगले 13 करोड़ वर्षों में इसका एक खंड, भारतीय उपमहाद्वीप का निर्माण करने वाली स्थलमंडलीय प्लेट के रूप में, उत्तर दिशा की ओर यूरेशियाई प्लेट से टकराने के मार्ग की ओर बढ़ा, इस भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट ने धीरे-धीरे अपने और यूरेशियाई प्लेट के बीच स्थित टेथिस खाई को विशालकाय चिमटे की भाँति जकड़ लिया। जैसे-जैसे टेथिस खाई संकरी होती गई, बढ़ते हुए दबाव की शाक्तियों ने इसके समुद्री तलछट में कई विवर्तनिक उभारों, गढ्डों और अंतर्ग्रथित भ्रंशों को जन्म दिया और ग्रेनाइट तथा बैसाल्ट के भंडार इसके गहराइयों से कमज़ोर हो चुके तलछट की ऊपरी सतह पर उभर आए। तृतीय महाकल्प (लगभग पाँच करोड़ वर्ष पहले) के आरंभ में भारत, अंततः यूरेशिया से टकरा गया। भारत, नीचे की ओर टेथिस खाई के नीचे लगातार बढ़ने वाली अक्षनति के साथ अपरूपित हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले तीन करोड़ वर्षों में टेथिस सागर में भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट के डूबने के कारण इसका समुद्र तल ऊपर की ओर उठ गया तथा इसके कम गहरे हिस्से पानी से ऊपर निकल आए। इससे तिब्बत के पठार की रचना हुई। पठार के दक्षिणी किनारे पर सीमांत पर्वत, आज की पराहिमालय पर्वतश्रेणी, इस क्षेत्र का पहला बड़ा जलविभाजक बना और इतनी ऊँचाई तक उपर उठा कि जलवायवीय अवरोध बन सके। दक्षिणी तीखी ढलानों पर भारी वर्षा होने के साथ उत्तर दिशा में पुरानी अनुप्रस्थ खाइयों में बढ़ती हुई शाक्ति के साथ प्रमुख दक्षिणवर्ती नदियों का शीर्ष जल की ओर अपरदन  बढ़ता गया और ये पठार पर बहने वाली धाराओं में शामिल हो गईं। इस प्रकार, आज की जल अपवाह प्रणाली की रूपरेखा तैयार हुई। दक्षिण की ओर अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के पुराने मुहाने प्राचीन सिंधु, गंगा और [[ब्रह्मपुत्र]] नदियों द्वारा बहाकर लाई गई सामग्री से तेज़ी से भर गए। विस्तृत अपरदन और निक्षेपण की प्रक्रिया आज भी जारी है और ये नदियाँ प्रतिदिन भारी मात्रा में सामग्री बहाकर ले जाती हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;'नापे' की रचना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
अंततः लगभग तीन करोड़ वर्ष पहले मध्यनूतन युग (माइओसीन एपॉक) में दोनों प्लेटों के बीच टूटते हुए जुड़ने की प्रक्रिया में तेज़ी से वृद्धि हुई और इसके फलस्वरूप हिमालय पर्वत की निर्माण प्रक्रिया का वास्तविक आरंभ हुआ। भारतीय उपमहाद्वीपीय प्लेट का टेथिस खाई में डूबना जारी रहा और प्राचीन गोंडवाना रूपांतरित चट्टानें दक्षिण में लम्बी क्षैतिज दूरी तक छिलके की तरह निकलकर अपने ही ढेर पर एकत्र होती रहीं और इसा प्रकार 'नापे' की रचना हुई। भारतीय भूमि क्षेत्र पर दक्षिण दिशा में 97 किलोमीटर की दूरी तक नापे की तह बिछती गई। प्रत्येक नए नापे में पहले के नापे के मुक़ाबले ज़्यादा पुरानी गोंडवाना चट्टानें थीं। कालक्रम में ये नापे वलयाकार हो गए और इससे भूतपूर्व खाई, पहले के मुक़ाबले लगभग 402 क्षैतिज किलोमीटर (कुछ विद्वान इसे 805 किलोमीटर बताते हैं) तक सिकुड़ गए। इस बीच, नीचे की ओर बहने वाली नदियाँ भी उत्थान की दर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में इकठ्टा हो रहा था। इस अवसाद के वज़न से वहाँ गढ्डे बन गए, जिससे और अधिक अवसाद एकत्र होता गया। गंगा के मैदान के नीचे कुछ स्थानों पर जलोढक 7,620 मीटर से भी अधिक है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
पिछले मात्र 6 लाख वर्षों के दौरान, अत्यंत नूतन युग (प्लाइस्टोसीन एपॉक, 16 लाख से 10 हज़ार वर्ष पहले तक) में ही हिमालय पृथ्वी की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला बनी। यदि मध्य नूतन युग और अतिनूतन युग की विशेषता शक्तिशाली क्षैतिज बल थी, तो अत्यंत नूतन युग की ख़ासियत ज़बरदस्त उत्थान शक्ति थी। सुदूर उत्तरी नापे के मध्यवर्ती हिस्से में और इसके ठीक बाद नवीन पट्टिताश्म तथा ग्रेनाइट युक्त रवेदार चट्टानें उभरीं, जिनसे आज दिखाई देने वाले ऊँचे शिखरों का निर्माण हुआ। माउंट एवरेस्ट जैसी कुछ चोटियों पर रवेदार चट्टानों ने प्राचीन जीवाश्मों से युक्त उत्तर दिशा के टेथिस अवसाद को शिखर पर जमा कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;जलवायवीय अवरोध&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
एक बार विशाल हिमालय जलवायवीय अवरोध बन गया, तो उत्तर में स्थित सीमांत पर्वत वर्षा से वंचित हो गए तथा तिब्बत के पठार की तरह सूख गए। इसके विपरित नम दक्षिणी कगारों पर नदियाँ इतनी अपरदनकारी शक्तियों के साथ प्रकट हुईं कि उन्होंने शीर्ष रेखा को धीरे-धीरे उत्तर दिशा में ढकेल दिया। साथ ही हिमालय से फूटने वाली विशाल अनुप्रस्थ नदियों ने इन विशाल नदियों के अलावा अन्य सभी को उनकी निचली धाराओं में परिवर्तन के लिए बाध्य किया, क्योंकि जैसे-जैसे उत्तरी शिखर ऊपर उठ रहा था, वैसे ही विशाल नापे का दक्षिणी सिरा भी उठ रहा था। इन शक्तियों तथा वलयों से शिवालिक श्रेणी का निर्माण हुआ तथा निम्न हिमालय क्षेत्र में संवलित होकर मध्यवर्ती क्षेत्र की उत्पत्ति हुई। इस दौरान दक्षिण की ओर बहाव में अवरोध आ जाने से अधिकांश छोटी नदियाँ पूर्व या पश्चिम में मध्यवर्ती क्षेत्र के संरचनात्मक तौर पर कमज़ोर हिस्सों के ज़रिये नए दक्षिणी अवरोध को तोड़ने या किसी बड़ी धारा में मिलने तक बहती रहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कश्मीर घाटी और नेपाल की काठमांडू घाटी जैसी कुछ घाटियों में अस्थाई रूप से झीलों का निर्माण हुआ, जिनमें अत्यंत नूतन युग (प्लाइस्टोसीन) का निक्षेप एकत्र हो गया। लगभग 2 लाख साल पहले सूखने के बाद काठमांडू घाटी कम से कम 198 मीटर तक ऊपर उठी है, जो लघु हिमालय क्षेत्र में स्थानीय उत्थान का सूचक है। &lt;br /&gt;
==भू-आकृति विज्ञान== &lt;br /&gt;
बाह्य हिमालय में समतल भूमि वाली संरचनात्मक घाटियाँ और हिमालय पर्वतश्रेणी की दक्षिणी सीमा पर स्थित शिवालिक भारत पर स्थित [[शिवालिक पहाड़ियाँ]] हैं। पूर्व के कुछ छोटे दर्रों को छोड़कर शिवालिक भारत के हिमाचल प्रदेश में अधिकतर 110 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ हिमालय की पूरी लंबाई तक फैला हुआ है। आमतौर पर 274 मीटर की समोच्च रेखा इसकी दक्षिणी सीमा निर्धारित करती है। उत्तर भारत में इसकी ऊँचाई 762 मीटर तक है। मुख्य शिवालिक श्रेणी का दक्षिणी हिस्सा भारतीय मैदानों की ओर तीखी ढलान वाला है और उत्तर की ओर समतल भूमि वाले बेसिन, जिन्हें दून कहा जाता है की ढाल कम तीखी है। इनमें से सबसे विख्यात उत्तरांचल का पर्वतीय क्षेत्र [[देहरादून]] है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;लघु हिमालय&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
लघु हिमालय को आंतरिक हिमालय, निम्न हिमालय या मध्य हिमालय भी कहलाता है। हिमालय पर्वत श्रृंखला का मध्यवर्ती भाग, दक्षिण-पूर्वी दिशा में उत्तरी [[पाकिस्तान]], उत्तर भारत, [[नेपाल]], [[सिक्किम]] (भारत) और [[भूटान]] तक विस्तृत है। यह श्रृंखला वृहद (उत्तर) और [[शिवालिक पहाड़ियाँ|शिवालिक]] या बाह (दक्षिण) हिमालय श्रृंखलाओं के बीच स्थित है। इसकी औरत ऊँचाई 3,700 से 4,500 मीटर तक है। इसमें [[पंजाब]], [[कुमाऊँ]], [[नेपाल]] और असम के हिमालय क्षेत्र शामिल हैं। उत्तर में शिवालिक श्रेणी 80 किलोमीटर चौड़े एक विशाल पर्वतीय क्षेत्र से लगी हुई है। जिसे निम्न या लघु हिमालय कहते हैं। यहाँ 4,572 मीटर ऊँचाई वाले पर्वत तथा 914 मीटर की ऊँचाई वाली घाटियाँ विभिन्न दिशाओं में फैली हुई हैं। इसके आसपास के शिखरों की ऊँचाई में आमतौर पर समानता है, जो एक अत्यंत विच्छेदित पठार का आभास देती है। लघु हिमालय की तीन प्रमुख श्रेणियाँ, नाग टिब्बा, धौलाधर और पीर पंजाल हैं, जो सुदूर उत्तर स्थित उच्च हिमालयी श्रेणियों से प्रस्फुटित हुई हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;नाग टिब्बा&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-1.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
इन तीन श्रेणियों में सबसे पूर्व में नाग टिब्बा का पूर्वी सिरा नेपाल में लगभग 8,169 मीटर ऊँचा है और यह गंगा व यमुना नदियों के बीच उत्तराखंड में जलविभाजक क्षेत्र का निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;संरचनात्मक बेसिन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
पश्चिम में कश्मीर की ख़ूबसूरत घाटी है, जो एक संरचनात्मक बेसिन है (एक वलयाकार बेसिन, जिसमें चट्टानी परत केंद्रीय बिंदु की ओर झुकी हुई है) और लघु हिमालय के एक महत्त्वपूर्ण खंड का निर्माण करती है। यह दक्षिण-पूर्व से पूर्वोत्तर की ओर लगभग 160 किलोमीटर तक फैली हुई है और इसकी चौड़ाई 80 किलोमीटर तक है। इसकी औसत ऊँचाई 1,554 मीटर है। इस बेसिन से होकर तिर्यक रूप से सर्पाकार [[झेलम नदी]] बहती है जो जम्मू-कश्मीर की विशाल मीठे पानी की वूलर झील से होकर बहती है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;उच्च हिमालय श्रेणी&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
समूचे पर्वतीय क्षेत्र की रीढ़ उच्च हिमालय श्रेणी है, जो सतत हिमरेखा से ऊपर तक उठी हुई हैं। यह पर्वतश्रेणी नेपाल में अपनी अधिकतम ऊँचाई तक पहुँचती है, जहाँ विश्व की 14 सबसे ऊँची चोटियों में से 9 स्थित हैं। इनमें से प्रत्येक की ऊँचाई 7,925 मीटर से अधिक है। पश्चिम से पूर्व की ओर इनके नाम हैं। धौलागिरि-1, अन्नपूर्णा-1, मनासलू-1, चो यू, ग्याचुंग कांग-1, माउंट एवरेस्ट, ल्होत्से, मकालू-1 और कंचनजंगा-1। आगे पूर्व में भारत का हिस्सा बन चुके प्राचीर हिमालयी राज्य सिक्किम में प्रवेश करते समय यह श्रेणी दक्षिण-पूर्वी दिशा से पूर्व दिशा अपना लेती है। इसके बाद यह अगले 418.34 किलोमीटर तक भूटान और [[अरुणाचल प्रदेश]] के पूर्वी हिस्से में कांग्टो शिखर (7,090 मीटर) तक यह पूर्व दिशा में बढ़ती है और अंतत: पूर्वोत्तर में मुड़कर नामचा बरवा में समाप्त हो जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उच्च हिमालय और इसके उत्तर की श्रेणियों, पठारों तथा बेसिनों के बीच कोई स्पष्ट सीमारेखा नहीं है और इन्हें आमतौर पर टेथिस हिमालय तथा सुदूर उत्तर में तिब्बत के रूप में समूहबद्ध किया जाता है। कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में टेथिस सबसे चौड़े हैं, जिनसे स्पीति बेसिन और ज़ास्कर पर्वतों का निर्माण होता है। इसके सबसे ऊँचे शिखर दक्षिण-पूर्व दिशा में सतलुज नदी के उत्तर में शिपकी दर्रे के सामने स्थित लियो पार्गियाल 6,791 मीटर और शिल्ला 7,026 मीटर हैं।&lt;br /&gt;
==अपवाह==&lt;br /&gt;
हिमालय के अपवाह में 19 प्रमुख नदियाँ हैं। जिनमें ब्रह्मापुत्र व सिंधु सबसे बड़ी है, दोनों में से प्रत्येक का पर्वतों में 2,59,000 वर्ग किलोमीटर विस्तृत जलसंग्राहक बेसिन है। अन्य नदियों में से पाँच, [[झेलम नदी|झेलम]], [[चेनाब नदी|चेनाब]], [[रावी नदी|रावी]], [[व्यास नदी|व्यास]], और [[सतलुज नदी|सतलुज]] सिंधु तंत्र की नदियाँ हैं। जिनका कुल जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1,32,090 वर्ग किलोमीटर है। नौ नदियाँ, [[गंगा नदी|गंगा]], [[यमुना नदी|यमुना]], [[रामगंगा नदी|रामगंगा ]], [[काली नदी|काली]], [[करनाली नदी|करनाली]], [[राप्ती नदी|राप्ती]], [[गंडक नदी|गंडक]], [[बागमती नदी|बागमती]] व [[कोसी नदी|कोसी]], गंगा तंत्र की हैं, जिनका जलग्रहण क्षेत्र 2,17,560 वर्ग किलोमीटर है और [[तीन]], [[तिस्ता]], [[रैदक व मनास]], बह्मपुत्र तंत्र की हैं जो 1,83,890 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-6.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
प्रमुख हिमालयी नदियाँ पर्वतश्रेणी के उत्तर से निकलती हैं और गहरे महाखड्डों से होती हुई बहती हैं, जो आमतौर पर कुछ भौगोर्भिक संरचनात्मक नियंत्रण को स्पष्ट करता है। सिंधु तंत्र की नदियों का बहाव एक नियम की तरह पश्चिमोत्तर है, जबकि गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र से बहते हुए पूर्वी मार्ग अपनाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के उत्तर में कराकोरम श्रेणी, जिसके पश्चिम में हिंदुकुश व पूर्व में लद्दाख़ श्रेणी है, एक विशाल जलविभाग बनाती है जो सिंधु तंत्र को मध्य एशिया की नदियों से अलग करता है। इस विभाजन के पूर्व में कैलाश श्रेणी और पूर्व की ओर आगे निआनकिंग तंग्गुला पर्वत हैं, जो ब्रह्मपुत्र, उच्च हिमालय श्रेणी के महाखड्ड को पार करने से पहले पूर्व की ओर लगभग 1,488 किलोमीटर बहती है। इसकी बहुत सी तिब्बती सहायक नदियाँ विपरीत दिशा में बहती हैं और संभवतः कभी ब्रह्मपुत्र की भी यही दिशा रही होगी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;जल-विभाजन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
उच्च हिमालय, जो सामान्यः अपनी समूची लंबाई में प्रमुख जल-विभाजन है, कुछ सीमित क्षेत्रों में ही जल-विभाजन का काम करता है। इसका कारण यह है कि प्रमुख हिमालयी नदियाँ, जैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र सतलुज और गंगा की दो प्रमुख धाराएँ, अलकनंदा व भागीरथी उन पर्वतों से भी पुरानी हैं, जिन्हें वे काटती हैं। ऐसा विश्वास है कि हिमालय इतनी धीमी गति से उठा कि पुरानी नदियों को धाराओं में बहते रहने में कोई परेशानी नहीं हुई और हिमालय के उठने से उनके बहाव ने गति पकड़ ली, जिससे वे घाटियों का कटाव तेज़ी से कर पाईं। इस प्रकार हिमालय का उन्नयन और घाटियों का गहरा होना साथ-साथ जारी रहा, परिणामस्वरूप, पर्वतश्रेणियों के साथ पूर्णतः विकसित नदी तंत्र का उद्भव हुआ, जो गहरे अनुप्रस्थ महाखण्डों में कटा था। इनकी गहराई 1,524 से 4,877 मीटर व चौड़ाई 10 से 48 किलोमीटर है। अपवाह तंत्र का आरंभिक मूल इस अनोखे तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्रमुख नदियाँ न केवल उच्च हिमालय की दक्षिणी ढालों को, बल्कि एक विशाल सीमा तक इसकी उत्तरी ढालों को भी अपवाहित करती हैं, क्योंकि जल-विभाजक क्षेत्र शीर्ष रेखा के उत्तर में स्थित है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;हिमनद&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
एक जल-विभाजक के रूप में उच्च हिमालय श्रेणी की भूमिका को सतलुज व सिंधु घाटी के बीच के 579 किलोमीटर के क्षेत्र में देखा जा सकता है। उत्तरी ढालों में उत्तर की ओर बहने वाली ज़ॉस्कर व द्रास नदियाँ हैं, जो सिंधु नदी में अपवाहित होती हैं। ग्लेशियर (हिमनद) भी ऊँचे क्षेत्रों को अपवाहित करने व हिमालयी नदियों के पोषण (पानी देने) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उत्तराखंड में अनेक हिमनद हैं, जिनमें से सबसे बड़ा गंगोत्री हिमनद 32 किलोमीटर लंबा है और गंगा के स्रोतों में से एक है। खुंबु हिमनद नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र को अपवाहित करता है और इस पर्वत की चढ़ाई का सबसे लोकप्रिय मार्ग है। हिमालय क्षेत्र के हिमनदों की गति की दर उल्लेखनीय रूप से भिन्न है। कराकोरम श्रेणी में बाल्टोरो हिमनद प्रतिदिन दो मीटर खिसकता है, जबकि खुंबु जैसे अन्य हिमनद प्रतिदिन केवल लगभग 30 सेंटीमीटर तक ही खिसक पाते हैं। हिमालय के अधिकांश हिमनद सिकुड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मिट्टी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-3.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
हिमालय की मिट्टी के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उत्तरमुखी ढलानों पर मिट्टी की अच्छी-ख़ासी मोटी परत है, जो कम ऊँचाइयों पर घने जंगलों तथा अधिक ऊँचाई पर घास का पोषण करती है। जंगल की मिट्टी गहरे भूरे रंग की है तथा इसकी बनावट चिकनी दोमट है। यह फलों के वृक्ष उगाने के लिए आदर्श मिट्टी है। पर्वतीय घास स्थली की मिट्टी भलीभाँति विकसित है, लेकिन इसकी मोटाई तथा रासायनिक गुण अलग-अलग हैं। पूर्वी हिमालय में इस तरह की नम, गहरी और उच्चभूमि की मिट्टी में, उदाहरणार्थ [[दार्जिलिंग]] की पहाड़ियों और असम घाटी में खाद की मात्रा अधिक होती है जो [[चाय]] की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है। ऊसर मिट्टी (अनुपजाऊ) हिमालय पर्वतश्रेणी के उत्तर में सिंधु तथा इसकी सहायक श्योक नदी की घाटियों में लगभग 644 किलोमीटर की पट्टी में और हिमाचल प्रदेश में कहीं-कहीं पाई जाती है। सुदूर पूर्व में लद्दाख़ क्षेत्र के शुष्क, ऊँचे मैदानों में लवणीय मिट्टी पाई जाती है। जो मिट्टियाँ किसी ख़ास क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, उनमें जलोढ़ मिट्टी (बहते हुए पानी द्वारा निक्षेपित) सबसे उपजाऊ है, हालांकि यह बहुत कम क्षेत्रों में पाई जाती है, जैसे कश्मीर घाटी, देहरादून में और हिमालय की घाटियों के साथ स्थित ऊँचे कगारों पर। अश्ममृदा, जिसमें अपूर्ण रूप से विघटित चट्टानों के टुकड़े होते हैं और खाद की कमी होती है, अधिक ऊँचाई वाले विस्तृत क्षेत्रों में पाई जाती है और यह सबसे कम उपजाऊ मिट्टी है। &lt;br /&gt;
==जलवायु== &lt;br /&gt;
हवा और जल संचरण की विशाल प्रणालियों को प्रभावित करने वाले विशाल जलवायवीय विभाजक के रूप में हिमालय दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप और उत्तर में मध्य एशियाई उच्चभूमि की मौसमी स्थितियों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। अपनी स्थिति और विशाल ऊँचाई के कारण हिमालय पर्वतश्रेणी सर्दियों में उत्तर की ओर से आने वाली ठंडी यूरोपीय वायु को भारत में प्रवेश करने से रोकती है और दक्षिण-पश्चिम मॉनसूनी हवाओं को पर्वतश्रेणी को पार करके उत्तर में जाने से पहले अधिक वर्षा के लिए भी बाध्य करती है। इस प्रकार, भारतीय क्षेत्र में भारी मात्रा में वर्षा (बारिश और हिमपात) होती है, लेकिन वहीं तिब्बत में मरुस्थलीय स्थितियां हैं। दक्षिणी ढलानों पर [[शिमला]] और पश्चिमी हिमालय के मसूरी में औसत सालाना वर्षा 1,530 मिमी तथा पूर्वी हिमालय के दार्जिलिंग में 3,048 मिमी होती है। उच्च हिमालय के उत्तर में सिन्धु घाटी के कश्मीर क्षेत्र में स्थित स्कार्दू गिलगित और लेह में सिर्फ़ 76 से 152 मिमी वर्षा होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्थानीय ऊँचाई और स्थिति से न सिर्फ़ हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु में भिन्नता का निर्धारण होता है, बल्कि एक ही श्रेणी की विभिन्ना ढलानों पर भी अलग-अलग जलवायु होती है। उदाहरण के लिए, देहरादून के सामने [[मसूरी पर्वत]] पर 1,859 मीटर की ऊँचाई पर स्थित [[मसूरी]] शहर में अनुकूल स्थिति के कारण सालाना 2,337 मिमी तक वर्षा होती है जबकि वहाँ से 145 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में पर्वतस्कंध श्रृंखलाओं के पीछे 2,012 मीटर की ऊँचाई पर स्थित [[शिमला]] में सिर्फ़ 1,575 मिमी बारिश होती है। पूर्वी हिमालय, जो पश्चिमी हिमालय के मुक़ाबले कम ऊँचाई पर है, अपेक्षाकृत गर्म है। शिमला में दर्ज न्यूनतम तापमान- 25डिग्री. सेल्सियस है। 1,945 मीटर की ऊँचाई वाले दार्जिलिंग में मई महीने में औसत न्यूनतम तापमान- 11 डिग्री सेल्सियस रहता है। इसी महीने में 5,029 मीटर की ऊँचाई पर [[माउंट एवरेस्ट]] के पास न्यूनतम तापमान लगभग- 8 डिग्री सेल्सियस होता है, 5,944 मीटर पर यह- 22 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है और यहाँ सबसे कम न्यूनतम तापमान- 29 डिग्री सेल्सियस होता है, अक्सर 161 किलोमीटर से अधिक रफ़्तार से बहने वाली हवाओं से सुरक्षित क्षेत्रों में दिन के समय सुदूर ऊँचाइयों पर भी अक्सर सूर्य की गर्माहट ख़ुशनुमा होती है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-7.jpg|thumb|250px|left|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
इस क्षेत्र में आर्द्र मौसम के दो कालखंड हैं, जाड़े में होने वाली वर्षा और दक्षिण-पश्चिमी मॉनसूनी हवाओं द्वारा लाई गई वर्षा। शीतकालीन वर्षा पश्चिम की ओर से भारत में आने वाले कम दबाव की मौसमी प्रणालियों के आगे बढ़ने के कारण होती है, जिसके कारण भारी हिमपात भी होता है। जिन क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव होता है, वहाँ सतह से 3,048 मीटर की ऊँचाई पर हवा की ऊपरी परतों में संघनन होता है, परिणामस्वरूप ऊँचे पर्वतों पर अधिक वर्षा या हिमपात होता है। इसी मौसम में हिमालय की ऊँची चोटियों पर बर्फ़ एकत्र होती है और पश्चिमी हिमालय में पूर्वी हिमालय के मुक़ाबले अधिक वर्षा या हिमपात होता है। उदाहारण के लिए, जनवरी में पश्चिम स्थित मसूरी में लगभग 76 मिमी वर्षा या हिमपात दर्ज़ किया जाता है जबकि पूर्व में दार्जिलिंग में यह 25 मिमी से भी कम होता है। [[मई]] के अंत तक मौसमी परिस्थितियाँ उलट जाती हैं। पूर्वी हिमालय के ऊपर से गुज़रने वाली दक्षिण-पश्चिम मॉनसूनी हवाएँ 5,486 मीटर की ऊँचाई पर वर्षा और हिमपात का कारण बनती हैं, इसलिए [[जून]] में दार्जिलिंग में लगभग 610 मिमी और मसूरी में 203 मिमी से कम वर्षा या हिमपात दर्ज होता है। [[सितंबर]] में बारिश ख़त्म हो जाती है, जिसके बाद [[दिसंबर]] में जाड़े के मौसम की शुरूआत से पहले तक हिमालय में सबसे अच्छा मौसम रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वनस्पति जीवन== &lt;br /&gt;
हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पति को ऊँचाई और बारिश के आधार पर मुख्यतः चार क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है- उष्ण, उपोष्ण, शीतोष्ण और आम्लीय। ऊँचाई तथा जलवायु में स्थानीय भिन्नता तथा सूर्य के प्रकाश और हवा के कारण प्रत्येक क्षेत्र के वानस्पतिक जीवन में काफ़ी भिन्नता पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय वर्षा प्रचुर वन, पूर्वी और मध्य हिमालय की नम तराइयों तक सीमित है। सदाबहार डिप्टेरोकार्प्स, इमारती लकड़ी और राल उत्पाद करने वाले वृक्ष आम हैं। इनकी विभिन्न प्रजातियाँ, विभिन्न मिट्टियों तथा भिन्न ढालों वाली पर्वतीय ढलानों पर उगती हैं। आयरनवुड (मेसुआ फ़ेरिया) 183 और 732 मीटर की ऊँचाइयों के बीच छिद्रदार मिट्टी के क्षेत्र में पाया जाता है। तीखी ढलानों पर बांस उगते हैं, ओक और चेस्टनट 1,097 से 1,737 मीटर की ऊँचाइयों पर पश्चिम में हिमाचल प्रदेश से मध्य नेपाल तक बलुई पत्थरों को ढकने वाली अश्ममृदा में उगते हैं। तीखी ढलानों पर जलधाराओं के किनारे एल्डर के वृक्ष पाए जाते हैं। अधिक ऊँचाई पर इनका स्थान पर्वतीय से वन ले लेते हैं, जिनमें सामान्य सदाबहार प्रजाति पेंडानस फ़रकेटस है, जो एक प्रकार का स्क्रू पाइन (केतकी) है। पूर्वी हिमालय में अनुमानतः इन वृक्षों के अलावा लगभग 4,000 प्रजातियों के फूलदार पौधे पाए जाते हैं, जिनमें से 20 खजूर जाति के हैं। पश्चिम की ओर घटती हुई वर्षा और बढ़ती हुई ऊँचाई के साथ-साथ वर्षा वनों का स्थान उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन ले लेते हैं,  जहाँ बहुमूल्य इमारती वृक्ष साल (शोरिया रोबस्टा) प्रमुख प्रजाति है, साल 914 मीटर (नम साल) से 1,372 मीटर (शुष्क साल) की ऊँचाइयों तक के ऊँचे पठारों में फलता-फूलता है। इसके और आगे पश्चिम में क्रमशः स्तेपी वन (विस्तृत मैदानों में स्थित वन) उपोष्ण कटिबंधीय काँटेदार स्तेपी और उपोष्ण कटिबंधीय उपमरुस्थलीय वनस्पति पाई जाती है। शीतोष्ण वन लगभग 1,372 से 3,353 मीटर की ऊँचाइयों के बीच फैले हुए हैं और इनमें शंकुधारी तथा चौड़ी पत्तियों वाले शीतोष्ण कटिबंधीय वृक्ष पाए जाते हैं। ओक तथा शंकुधारी वृक्षों के सदाबहार जंगलों की सुदूर पश्चिमी पर्वतीय सीमा पाकिस्तान में रावलपिंडी के लगभग 48 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में मढ़ी के ऊपर के पहाड़ों पर स्थित है। ये वन निम्न हिमालय की विशिष्टता हैं, जो भारत में कश्मीर के पीर पंजाल की बाहरी ढलानों पर स्पष्ट दिखते हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;चीड़ पाइन&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
823 से 1,646 मीटर की ऊँचाई तक चीड़ पाइन (पाइनस रॉक्सबर्घी) प्रमुख प्रजाति है। अंदरूनी घाटियों में यह प्रजाति 1,920 मीटर की ऊँचाई तक भी पाई जा सकती है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;देवदार&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवदार, जो काफ़ी महत्त्वपूर्ण स्थानीय प्रजाति है, मुख्यतः पर्वतश्रेणी के पश्चिमी हिस्से में पाई जाती है। यह प्रजाति 1,920 से 2,743 मीटर की ऊँचाई के बीच उगती है तथा सतलुज व गंगा नदियों की ऊपरी घाटियों में और अधिक ऊँचाई पर भी उग सकती है। अन्य शंकुधारी वृक्षों में ब्लू पाइन व स्प्रूस के वृक्ष लगभग 2,225 और 3,048 मीटर के बीच पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आल्पीय क्षेत्र 3,200 और 3,566 मीटर की ऊँचाइयों के बीच वृक्ष रेखा से ऊपर का क्षेत्र है और पश्चिमी हिमालय में लगभग 4,176 मीटर तथा पूर्वी हिमालय में 4,450 मीटर की ऊँचाई तक फैला है। इस क्षेत्र में सभी प्रकार की नम आल्पीय वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। जूनिपर कई क्षेत्रों में होता है, विशेषकर धूपदार, तीखी और चट्टानी ढलानों तथा शुष्क क्षेत्रों में इसका आधिक्य है। नंगा पर्वत पर यह 3,886 मीटर की ऊँचाई पर भी पाया जाता है। रोडोडेंड्रोन हर जगह होता है, लेकिन पूर्वी हिमालय के नम हिस्सों में इसकी बहुतायत है, जहाँ यह वृक्षों से लेकर छोटी झाड़ियों तक हर आकार में उगता है। निचले क्षेत्रों में जहाँ नमी की अधिकता है, वहाँ काई और शैवाक (लाइकेन) उगते हैं, अधिक ऊँचाई, विशेषकर नंगा पर्वत और माउंट एवरेस्ट पर फूलदार पौधे भी पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
==प्राणी जीवन== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Himalayas-4.jpg|thumb|250px|हिमालय &amp;lt;br /&amp;gt; Himalayas]]&lt;br /&gt;
पूर्वी हिमालय में पशु जीवन का उद्भव मुख्यतः दक्षिणी चीन और भारतीय-चीनी क्षेत्र से हुआ है। इसमें प्राथमिक रूप से उष्णकटिबंधीय वनों में पाया जाने वाला पशु जीवन है और अनुपूरक रूप से ऊँचे क्षेत्रों में व्याप्त उपोष्ण, पर्वतीय और शीतोष्ण परिस्थितियों तथा शुष्क पश्चिमी क्षेत्रों के लिए अनुकूलित हुए जंतु हैं। लेकिन पश्चिमी हिमालय में पशु जीवन भूमध्य सागरीय, इथियोपियाई और तुर्कमेनियाई क्षेत्रों से ज़्यादा निकटता प्रदर्शित करता है। अतीत में इस क्षेत्र में जिराफ़ और दरियाई घोड़े जैसे अफ़्रीकी जानवरों की मौजूदगी का पता बाह्य हिमालय के शिवालिक निक्षेप में पाए जाने वाले जीवाश्मों से लगाया जा सकता है। वृक्ष रेखा से ऊपर की ऊँचाई पर पाया जाने वाला पशु जीवन लगभग पूर्णतः स्थानीय प्रजाति का है, जो ठंड के अनुकूलित हो चुके हैं और इनका विकास हिमालय की ऊँचाई बढ़ने के बाद स्तेपी के वन्य जीवन से हुआ है। हाथी, पहाड़ी भैंसा और गैंडा मुख्यतः दक्षिणी नेपाल के निचले पर्वतीय क्षेत्र में वनाच्छादित तराई के कुछ हिस्सों तक सीमित हैं, जो नम या दलदली क्षेत्र हैं और इनमें से अधिकांश अब सूख चुके हैं। एक समय हिमालय के समूचे तराई क्षेत्र में भारतीय गैंडे की बहुतायत थी लेकिन अब ये विलुप्त होने के कगार पर हैं। कस्तूरी मृग और कश्मीरी मृग या हंगुल भी लुप्तप्राय हैं। हिमालय का काला भालू, मेघवर्णी तेंदुआ, लंगूर (लंबी पूछ वाला एशियाई बंदर) और विडाल परिवार की प्रजातियाँ हिमालय के जंगलों में पाए जाने वाले कुछ अन्य जानवर हैं। हिमालयी बकरी और तहर जैसे मृग भी इनमें पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृक्ष रेखा से ऊपर की ऊँचाई पर कभी-कभार हिम तेंदुआ, भूरे भालू, लाल पांडा और तिब्बती याक देखे जा सकते हैं। याक को पालतू बना लिया गया है और लद्दाख में इसे बोझ ढोने वाले पशु के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वृक्ष रेखा से ऊपर की ऊँचाई में रहने वाले विशेष निवासियों में विभिन्न प्रकार के कीड़े, मकड़ियाँ और बरूथी (चिंचड़ी) हैं, जो 6,309 मीटर की ऊँचाई में रहने में सक्षम प्राणी हैं। जपालुरा वंश की छिपकलियाँ भी कई इलाक़ो में पाई जाती हैं। आमतौर पर ग्लिप्टोथोरेक्स मूल की मछलियाँ अधिकांश हिमालयी धाराओं में रहती हैं और किनारों पर पानी में रहने वाले हिमालयी छछूंदर पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय में एक प्रकार का अंधा सांप टाईफ़्लोप्स भी पाया जाता है। हिमालय में पाई जाने वाली तितलियाँ सुंदर और विभिन्न प्रकार की होती हैं, विशेषकर ट्रोईडेस वंश मूल की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ का पक्षी जीवन भी काफ़ी समृद्ध है लेकिन पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में यह अधिक परिलक्षित होता है। अकेले नेपाल में लगभग 800 प्रजातियों को देखा जा सकता है। हिमालय में आमतौर पर पाए जाने वाले पक्षियों में विभिन्न प्रजातियों की मैना (काली पूँछ वाली, नीली और रैकेट पूँछ वाली), गंगरा, चौघ (कौवे से संबंधित), कस्तूरिका और थिरथिरा शामिल हैं। यहाँ कुछ शक्तिशाली उड़ाके, जैसे दाढ़ीदार गिद्ध (लेमरगियर), काले कानों वाली चील और हिमालयी ग्रिफ़ोन (पुरानी दुनिया का गिद्ध) भी दिखाई देते हैं। हिम तीतर और कार्निश चौघ 5,669 मीटर की ऊँचाई पर पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
==लोग==&lt;br /&gt;
भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले चार प्रमुख जातीय समूहों, भारतीय-यूरोपीय, तिब्बती-बर्मी, ऑस्ट्रो-एशियाई और द्रविड़ में से पहले दो समूह हिमालय क्षेत्र में काफ़ी संख्या में पाए जाते हैं, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में ये अलग-अलग अनुपात में घुले-मिले हुए हैं। इनका वितरण पश्चिम से यूरोपीय समूहों, दक्षिण से भारतीय लोगों और पूर्व व उत्तर से एशियाई जनजातियों की घुसपैठ के लंबे इतिहास का परिणाम है। हिमालय के मध्यवर्ती तिहाई हिस्से नेपाल में ये समूह अंतमिश्रित हैं। लघु हिमालय में घुसपैठ से दक्षिण एशिया के नदी मैदानों के रास्तों में और उनसे होते हुए प्रवास का मार्ग प्रशस्त हुआ। आमतौर पर यह कहा जा सकता है कि उच्च हिमालय तथा टेथिस हिमालय में तिब्बती व अन्य तिब्बती-बर्मी लोगों का निवास है तथा निम्न हिमालय में लंबे, गोरे भारोपीय लोगों का वास है। जम्मू-कश्मीर के बाह्य हिमालय क्षेत्र में भारोपीय लोगों को डोगरी वंश का कहा जाता है। कश्मीर घाटी में यह समूह कश्मीरी लोगों के रूप में है। लघु हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले गद्दी और गूजर भी यूरोपीय समूह से संबंध रखते हैं। गद्दी निश्चित रूप से पर्वतीय लोग हैं, वे भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े झुंड पालते हैं। और सिर्फ़ जाड़े में बाह्य हिमालय के अपने बर्फ़ीले इलाक़े से नीचे आते हैं तथा जून में वे फिर सबसे ऊँचे चरागाहों में लौट जाते हैं। गूजर लोग प्रवासी चरगाहे होते हैं। जो अपनी भेड़ों, बकरियों और कुछ मवेशियों पर गुज़ारा करते हैं। और पशुओं की आवश्यकतानुसार विभिन्न ऊँचाइयों पर स्थित चरागाहों की खोज करते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंपा लद्दाखी, बाल्टी और दर्दीय लोग उच्च हिमालय पर्वतश्रेणी के उत्तर में कश्मीर हिमालय में रहते हैं। दर्दीय भारतीय-यूरोपीय मूल के हैं, जबकि अन्य तिब्बती-बर्मी मूल के हैं। चंपा लोग ऊपरी सिंधु घाटी में बंजारे चरवाहों का जीवन व्यतीत करते हैं, लद्दाखी लोग कश्मीर में सिंधु के कगारों तथा जलोढ़ क्षेत्रों में निवास करते हैं। बाल्टी लोग सिंधु घाटी में अधिक नीचे तक फैले हुए हैं। उन्होंने [[इस्लाम धर्म]] अपना लिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग 200 वर्षों तक सिक्किम और भूटान पूर्वी नेपाल की अतिरिक्त जनसंख्या को अपने में समोकर सुरक्षा वॉल्व का काम करते रहे हैं। माउंट एवरेस्ट के गृहक्षेत्र के मुक़ाबले कहीं अधिक संख्या में शेरपा लोग (नेपाल तथा सिक्किम के पर्वत क्षेत्र में रहने वाले लोग) दार्जिलिंग क्षेत्र में रहते हैं। पहाड़ी लोग नेपाल से भारत के सिक्किम राज्य तथा भूटान देश में आए। इस प्रकार, सिक्किम के लोग [[लेप्चा]], भूटिया और पहाड़ी, तीन भिन्न जातीय समूहों के हैं। आमतौर पर नेपाली और लेप्चा पश्चिमी भूटान में तथा तिब्बती मूल के भूटिया पूर्वी भूटान में रहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरुणाचल प्रदेश में औबोर या आदि, आका, आप्तानी, [[डफला (जाति)|डफला]], खंपती, खोवा, मिशमी मोंबा, मिरी और सिंग्फो आदि कई समूहों का आवास है। जातीय रूप से ये सभी समूह भारतीय-एशियाई हैं। भाषाई रूप से ये तिब्बती-बर्मी हैं। प्रत्येक समूह एक अलग नदी घाटी में रहता है और ये झूम खेती करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था== &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;संसाधन&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिमालय की आर्थिक परिस्थितियाँ इस विभिन्न परिस्थिति वाले विस्तृत और विषम क्षेत्र के सीमित संसाधनों के अनुरूप हैं। यहाँ की मुख्य गतिविधि पशुपालन है, लेकिन वनोपज का दोहन और व्यापार भी महत्त्वपूर्ण है। हिमालय में प्रचुर आर्थिक संसाधन हैं। इनमें उपजाऊ कृषि योग्य भूमि, विस्तृत घास के मैदान व वन, खनन योग्य खनिज भंडार और आसानी से दोहन योग्य जलविद्युत शक्ति शामिल हैं। पश्चिमी हिमालय में सबसे उत्पादक कृषि योग्य भूमि कश्मीर घाटी, कांगड़ा सतलुज नदी के बेसिन और उत्तराखंड में गंगा व यमुना नदियों के कगारी क्षेत्र के सीढ़ीदार खेतों में है। इन क्षेत्रों में चावल, मक्का, गेहूँ, ज्वार-बाजरा का उत्पादन होता है। मध्य हिमालय में नेपाल में दो-तिहाई कृषि योग्य भूमि तराई और इससे लगे मैदानी क्षेत्र में है। इस भूमि में देश के कुल चावल उत्पादन का अधिकांश हिस्सा पैदा होता है। इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मक्का, गेहूँ, आलू और गन्ने की भी खेती की जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालय क्षेत्र के अधिकांश फलों के बगीचे कश्मीर घाटी और हिमालय प्रदेश की कुल्लू घाटी में स्थित हैं। सेब, आडू, नाशपाती और चेरी की बड़े पैमाने पर खेती होती है, जिनकी भारतीय नगरों में भारी माँग है। कश्मीर में डल झील के किनारे अंगूर के बाग़ हैं, जहाँ अच्छे क़िस्म के अंगूर होते हैं, जिनसे शराब और ब्रांडी तैयार होती है। कश्मीर घाटी के चारों तरफ़ स्थित पहाड़ों पर अख़रोट और बादाम के वृक्ष हैं, जिनकी गिरियों से तेल निकाला जाता है। भूटान में भी फलों के बगीचे हैं और वहाँ से भारत को संतरों का निर्यात किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बागानी फ़सलों में [[चाय]] मुख्यतः पहाड़ों और दार्जिलिंग में तराई के मैदानों में उगाई जाती है। कांगड़ा घाटी में भी कुछ मात्रा में [[चाय]] की खेती होती है। सिक्किम भूटान और दार्जिलिंग के पहाड़ों में इलायची के भी बाग़ हैं। उत्तरांचल के उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ ज़िलों में स्थित बाग़ानों में औषधीय वनस्पतियाँ भी उगाई जाती हैं। गर्मी के मौसम में कश्मीर के 'मार्ग' नामक चरागाहों में व्यापक पैमाने पर ऋतुप्रवास (मवेशियों का मौसमी प्रवास) होता है यहाँ उपलब्ध विषम चरागाह भूमि में भेड़, बकरी और याक पाले जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालय क्षेत्र में 1940 के दशक से शुरू हुई तेज़ जनसंख्या वृद्धि ने कई इलाक़ों में जंगलों पर ज़बरदस्त दबाव डाला है। कृषि के लिए जंगलों की सफ़ाई करने और ईंधन के लिए लकड़ी काटने से ऊपरी क्षेत्र की खड़ी ढलानों पर भी जंगल ख़त्म हो रहे हैं, जिससे पर्यावरण को क्षति पहुँच रही है। सिर्फ़ सिक्किम और भूटान में ही बड़े इलाक़ों में सघन वन बचे हुए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालय खनिज पदार्थों से समृद्ध क्षेत्र है हालांकि इनका दोहन अपेक्षाकृत सुगम क्षेत्रों तक ही सीमित है। जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में खनिजों का सर्वाधिक मात्रा में संकेंद्रण है। ज़ास्कर पहाड़ों में नीलम पाया जाता है और निकटस्थ सिंधु नदी के थाले में जलोढ़ीय सोना पाया जाता है। बाल्टिस्तान में ताम्र अयस्क के भंडार हैं और कश्मीर घाटी में लौह अयस्क भी पाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में बॉक्साइट भी मिलता है। नेपाल, भूटान और सिक्किम में कोयला, अभ्रक, जिप्सम के भंडार और लौह, ताम्र, सीसा तथा जस्ते के अयस्क के विशाल भंडार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालय की नदियों में जलविद्युत उत्पादन की ज़बरदस्त क्षमता है और भारत में [[1950]] के दशक से ही इसका व्यापक दोहन किया जा रहा है। बाह्य हिमालय में सतलुज नदी पर भाखड़ा नांगल में विशालकाय बहुउद्देशीय परियोजना स्थित है। [[1963]] में तैयार इस बांध के जलाशय की क्षमता लगभग 10 अरब क्यूबिक मीटर है और यहाँ इसकी मूल विद्युत उत्पादन क्षमता कुल 1,050 मेगावाट है। हिमालय की तीन अन्य नदियों, कोसी, गंडक (नारायणी) और जलधाक, का भी भारत में दोहन होता है और इनसे नेपाल तथा भूटान में विद्युत आपूर्ति होती हैं। &lt;br /&gt;
==यातायात== &lt;br /&gt;
इस क्षेत्र में सड़क यातायात सुस्थापित है, जिससे उत्तर तथा दक्षिण, दोनों दिशाओं से हिमालय में पहुँचना सुगम है। नेपाल के तराई क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम दिशा में एक राजमार्ग स्थित है। यह देश के कई जलग्रहण बेसिनों तक जाने वाले मार्गों को जोड़ता है। राजधानी [[काठमांडू]] लघु हिमालय राजमार्ग के ज़रिये पोखरा से जुड़ी हुई है, जबकि कोडारी दर्जे से गुज़रने वाला एक निचला हिमालयी राजमार्ग नेपाल को तिब्बत के [[ल्हासा]] से जोड़ता है। पश्चिमोत्तर में [[पाकिस्तान]] एक राजमार्ग से [[चीन]] से जुड़ा हुआ है। हिमाचल प्रदेश से गुज़रने वाले हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सड़कों का निर्माण&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
483 किलोमीटर लंबा यह राजमार्ग, भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी रह चुकी शिमला से होकर गुज़रता है और [[पंजाब]] के मैदानों को शिपकी दर्जे के पास भारत-तिब्बत सीमा से जोड़ता है। कुल्लू घाटी में [[मनाली हिमाचल प्रदेश|मनाली]] से एक राजमार्ग न सिर्फ़ उच्च हिमालय से गुज़रता है, बल्कि यह ज़ास्कर श्रेणी से होता हुआ ऊपरी सिंधु घाटी में लेह तक जाता है। कश्मीर घाटी में श्रीनगर मार्ग द्वारा भी लेह भारत से जुड़ा हुआ है। श्रीनगर से लेह तक का रास्ता 5,404 मीटर की ऊँचाई पर स्थित खार डुंगला दर्रे से गुज़रता है, जो भारत से मध्य एशिया में आने वाले ऐतिहासिक कारवां मार्ग में पड़ने वाला पहला ऊँचा दर्रा है। हाल के वर्षों में अनेक नई सड़कों का निर्माण हुआ है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;सड़क मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
पंजाब के मैदान से कश्मीर घाटी के लिए एकमात्र रास्ता भारत के पंजाब राज्य के [[जालंधर]] से जम्मू-बनिहाल, [[श्रीनगर]] और [[बारामूला]] से गुज़रते हुए [[उरी]] जाने वाले राजमार्ग के ज़रिये है। यह बनिहाल स्थित एक सुरंग से पीर पंजाल श्रेणी को पार करता है। पाकिस्तान में [[रावलपिंडी]]  से श्रीनगर को जोड़ने वाला पुराना मार्ग अपनी पहले वाली महत्ता खो चुका है। [[गंगटोक]] से गुज़रने वाला ऐतिहासिक कलीमपोंग-ल्हासा कारवां व्यापार मार्ग हिमालय के सिक्किम क्षेत्र में स्थित है। [[1950]] के दशक के मध्य से पहले तिस्सा नदी पर गंगटोक से रोंग्फू तक 48 किलोमीटर लंबा सिर्फ़ एक वाहन योग्य मार्ग था, जो वहाँ से आगे दक्षिण में 113 किलोमीटर दूर [[सिलीगुड़ी]] तक जाता था। तब से अब तक सिक्किम के दक्षिणी हिस्से में जीप से गुज़रने लायक़ कई सड़कें बनाई गई हैं और उत्तरी सिक्किम में एक राजमार्ग गंगटोक को लाचेन (लाछुंग) से जोड़ता है। नामसांई से चौखाम, सादिया से रोईंग, पासीघाट से डिब्रूगढ़, सोनारी घाट के किनारे उत्तरी लखीमपुर से हपोली और तेजपुर से बमडीला को जाने वाली सड़कें अरुणाचल प्रदेश को ब्रह्मपुत्र नदी घाटी से जोड़ती हैं। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रेल मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
भारत के मैदानों से सिर्फ़ दो मुख्य रेलमार्ग (दोनो छोटी लाइन) लघु हिमालय को भेदते हुए जाते हैं। एक पश्चिमी हिमालय में कालका और शिमला के बीच और दूसरा पूर्वी हिमालय में सिलीगुड़ी तथा दार्जिलिंग के बीच है। नेपाल में एक और छोटी लाइन भारत में [[बिहार]] के [[रक्सौल]] से लगभग 48 किलोमीटर दूर अमलेखगंज को जोड़ती है और वहाँ से विद्युत चालित हवाई रज्जु मार्ग द्वारा राजधानी काठमांडू तक टोकरियों में सामान की ढुलाई होती है। बाह्य हिमालय में दो अन्य छोटे रेलमार्ग हैं-  &lt;br /&gt;
*कुल्लू घाटी में, [[पठानकोट]] से जोगिंदरनगर रेलमार्ग &lt;br /&gt;
*[[हरिद्वार]] से देहरादून रेलमार्ग, [[वजीराबाद]] से [[सियालकोट]] होते हुए जम्मू तक जाने वाला रेलमार्ग अब स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;हवाई मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिमालय में दो प्रमुख हवाई पट्टियाँ हैं, एक काठमांडू में और दूसरी कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में है। काठमांडू हवाई अड्डे से अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय उड़ानें उपलब्ध हैं। इनके अलावा नेपाल के पहाड़ी और तराई क्षेत्र में स्थानीय महत्त्व की हवाई पट्टियों की संख्या बढ़ रही है, जो एस.टी. ओ. एल. (शार्ट टेक ऑफ़ ऐंड लैंडिग) विद्वानों के अनुकूल हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हवाई और भूमि यातायात में हुए सुधार ने हिमालय की अर्थव्यवस्था में पर्यटन को काफ़ी महत्त्वपूर्ण बना दिया है। विस्तृत और भिन्नताओं से परिपूर्ण हिमालय के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और साथ-साथ वहाँ के पर्यावरण और सांस्कृतिक धरोहरों के साधन के रूप में पर्यटन को मान्यता दी जा रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अध्ययन तथा पर्यवेक्षण== &lt;br /&gt;
हिमालय की आरंभिक यात्राएँ व्यापारियों, चरवाहों और तीर्थयात्रियों द्वारा की गई थीं। तीर्थयात्रियों को विश्वास था कि यात्रा जितनी कष्टकर होगी, वे मोक्ष या निर्वाण के उतने ही क़रीब पहुँच पाएंगे, जबकि व्यापारियों और चरवाहों ने 5,486 से 5,791 मीटर तक की ऊँचाई पर स्थित दर्रों को सामान्य जीवन मार्ग मानकर पार किया, लेकिन अन्य सभी लोगों के लिए हिमालय एक दुर्गम और भयंकर अवरोध था। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;मानचित्र&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिमालय का कुछ हद तक सटीक मानचित्र मुग़ल बादशाह [[अकबर]] के दरबार के स्पेनी दूत एंतोनियों मौनसेरेट ने 1590 में तैयार किया था। फ़्रांसीसी भू-वैज्ञानिक ज्यां बैपतिस्त बॉरगुईग्नोन डी ऑरविले ने व्यवस्थित पर्यवेक्षण के आधार पर तिब्बत और हिमालय पर्वतश्रेणी का पहला मानचित्र तैयार किया। 19वीं सदी के मध्य में सर्वे ऑफ़ इंडिया ने हिमालय की चोटियों की ऊँचाई के सही आकलन के लिए व्यवस्थित कार्यक्रम का आयोजन किया। 1849 से 1855 के बीच नेपाल और उत्तराखंड की चोटियों का सर्वेक्षण कर उनका मानचित्र बनाया गया। नंगा पर्वत और उत्तर में कराकोरम श्रेणी की चोटियों को 1855 से 1859 के बीच सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षकों ने इन खोई गई असंख्य चोटियों को अलग-अलग नाम नहीं दिया, बल्कि अंकों और रोमन संख्याओं से उनकी पहचान की। इस प्रकार, माउंट एवरेस्ट को सर्वप्रथम सिर्फ़ ''एच'' नाम दिया गया। 1849 स 1850 में इसे शिखर x.v कर दिया गया। 1865 में शिखर x.v. का नाम भारत के महासर्वेक्षक रहे सर जार्ज एवरेस्ट (1830 से 1843 तक) के नाम पर रखा गया। 1852 में गणना का इस हद तक विकास नहीं हुआ था कि शिखर x.v. दुनिया के अन्य किसी भी शिखर से ऊँचा है, इसकी जानकारी हो सके। 1862 तक, 5,486 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले 40 शिखरों पर सर्वेक्षण कार्य के लिए आरोहण हो चुका था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वेक्षण अभियानों के अलावा 19वीं शताब्दी में हिमालय में कई वैज्ञानिक अध्ययन भी किए गए। 1848 से 1849 के बीच अंग्रेज़ वनस्पतिशास्त्री जोज़ेफ़ डाल्टन हूकर ने सिक्किम हिमालय क्षेत्र के वनस्पति जीवन का सर्वप्रथम अध्ययन किया। उसके बाद कई लोगों ने उनका अनुसरण किया, जिसमें हिमालय की ऊँचाइयों में रहने वाले जंतुओं के प्राकृतिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण विवरण के लेखक, ब्रिटिश प्रकृतिविद् रिचर्ड डब्ल्यू. जी. हिंग्स्टन (आरंभिक 20वीं शताब्दी) भी शामिल थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से सर्वे ऑफ़ इंडिया ने हवाई चित्रों की मदद से हिमालय के कुछ व्यापक पैमाने के मानचित्र बनाए हैं। जर्मन भूगोलविदों और मानचित्रकारों ने भू-फ़ोटोग्रामेट्री की मदद से हिमालय के कुछ हिस्सों का मानचित्र तैयार किया है। साथ ही, उपग्रहीय सर्वेक्षण का इस्तेमाल ज़्यादा सटीक और ब्योरेवार मानचित्रों के निर्माण में किया जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रिटेन के डब्ल्यू.डब्ल्यू. ग्राहम द्वारा [[1883]] में कई शिखरों पर चढ़ने के दावे के साथ ही [[1880]] के दशक में हिमालय पर्वतरोहण की शुरूआत हुई। हालांकि उनकी रिपोर्ट को संशय की दृष्टि से देखा गया, लेकिन इससे अन्य यूरोपीय पर्वतारोहियों में भी रुचि उत्पन्न हुई। 20वीं सदी के आरंभ में कराकोरम श्रृंखला पर और हिमालय के कुमाऊँ तथा सिक्किम क्षेत्र में पर्वतीय अभियानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के काल में विभिन्न चोटियों के प्रति विभिन्न देशों की प्राथमिकता का विकास हुआ। &lt;br /&gt;
जर्मनों ने नंगा पर्वत और [[कंचनजंगा]], अमेरिकियों ने [[के-2]] (इसे माउंट गॉडविन ऑस्टिन भी कहते हैं) और ब्रिटिश लोगों ने [[माउंट एवरेस्ट]] को चुना। [[1921]] तक माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के दर्जनों प्रयास हो चुके थे। [[मई]], [[1953]] में न्यूज़ीलैंड के पर्वतरोही एडमंड हिलेरी और उनके सहयोगी शेरपा तेनजिंग नोर्गे द्वारा सफलता प्राप्त करने से पहले लगभग दर्जन भर प्रयास हो चुके थे। इसी वर्ष कार्ल-मारिया हेरलिगकोफ़र के नेतृत्व वाली ऑस्ट्रो-जर्मन टीम ने नंगा पर्वत के शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई। जैसे-जैसे ऊँचे शिखरों पर सफलता मिलने लगी, पर्वतारोही अपनी निपुणता और उपकरणों की जाँच के लिए बड़ी चुनौतियाँ ढूंढने लगे तथा उन्होंने अपेक्षाकृत ज़्यादा ख़तरनाक रास्तों से शिखर पर चढ़ने का प्रयास किया। 20 वीं शताब्दी के अंत तक हिमालय पर सालाना पर्वतारोहण अभियानों और पर्यटन यात्राओं की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि कुछ क्षेत्रों में लोगों द्वारा छोड़े गए कचरे के बढ़ते ढेर तथा वनस्पति और जंतु जीवन के विनाश से पर्वतीय पर्यावरण के नाज़ुक संतुलन के ख़तरा उत्पन्न हो गया।                                                                                                                                                       &lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>हिममानव</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{विचाराधीन}}&lt;br /&gt;
==हिममानव का आकार और प्रकार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:bigfoot.jpg|thumb|250px|हिममानव&amp;lt;br /&amp;gt;Bigfoot]]&lt;br /&gt;
हिममानव यानि येति को दिखने का जब भी दावा किया जाता हैं। इसके अस्तित्व पर सवाल उठ खड़े होते हैं। क्या हिममानव का अस्तित्व है और यदि इस बर्फिले इलाके में हिममानव रहता है तो कहां है हिममानव का ठिकाना। साथ ही इस निर्जन बर्फिले इलाके में वो रहस्यमयी जीव कैसे जिंदा रहता है। इस तरह के तमाम सवाल सबके जेहन में उठता है। लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है। दरअसल हिममानव को जब भी देखा गया है, वो थोड़ी देर के लिए तो दिखाई देता है लेकिन पल भर में गायब हो जाता है और वो रहस्यमयी जीव कहां बर्फ में गुम में हो जाता है ये आज भी रहस्य बना हुआ है। हिममानव कितना रहस्यमयी है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत, नेपाल और तिब्बत के दुर्गम और निर्जन हिमालय क्षेत्र में सैकड़ों बर्षों से लोग इसे देखते आ रहे हैं, लेकिन इंसान हिममानव के पहुंच से अब तक दूर है। रहस्यमयी हिममानव यानि येति के अस्तित्व को लेकर तमाम तरह की बातें कही जाती है। लेकिन बर्फिले निर्जन इलाके में दिखने वाला रहस्यमयी हिममानव यानि येति अब तक दुर्गम इलाके में ही देखा गया है। लेकिन निर्जन पहाड़ों के बर्फिली चोटियों के बीच वो कहां गायब हो जाता है, इससे हर कोई अंजान है। येति का यदि बर्फ में ठिकाना है तो हो सकता है कि येति पहाड़ के किसी गुफा में रहता हो या फिर येति बर्फ में छिपने में माहिर हो तभी तो थोड़ी देर दिखने के बाद वो गायब हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत, नेपाल और तिब्बत के दुर्गम तथा निर्जन हिमालयी क्षेत्रों में सैकड़ों वर्षों से रहस्यमयी हिममानव के अस्तित्व को लेकर अनेक किस्से - कहानियां प्रचलित हैं। ‘येति’ नाम से प्रसिद्ध इस कथित हिममानव को अब तक सैकड़ों लोगों द्वारा देखने का दावा किया जाता रहा है। येति को देखने का दावा करने वालों का कहना है कि शरीर पर काले भूरे घने बालों वाला ये रहस्यमयी प्राणी सात से नौ फीट लंबा दिखता है जो किसी दावन की तरह दिखता है, जबकि इसका वजन तकरीबन दो सौ किलो हो सकता है और इसकी खासियत है कि ये इंसान की तरह दो पैरो पर चलता है। इसकी आंखे लाल अंगारे जैसी है और यह भद्दी शकलवाला डरावना भी है, यह हिमालय में पाए जाने वाले जानवरों को मार कर खा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ये रहस्यमयी भीमकाय जीव रात में शिकार करता है और दिन में सोता रहता है लेकिन येति कभी कभार दिन में भी इंसान को दिख जाता है। ऐसे में हो सकता है कि हिममानव इंसान का पूर्वज हो, जो इंसान के विकास की कड़ी हो। इस रहस्मयी प्राणी को हिममानव इस लिए कहा जाता है कि ये ज़्यादातर निर्जन बर्फिले इलाके में ही लोगों को दिखता है। तिब्बत और नेपाल के लोग दो तरह के येति के बारे में बाताते हैं, जिसमें एक इंसान और बंदर के हाईब्रिड यानि वर्णसंकर की तरह दिखता है, ये रहस्यमयी हिममानव दो मीटर लंबा और भूरे वालों वाला होता है और इसका वजन 200 किलो तक होता है। दूसरे किस्म का येति यानि हिममानव समान्य इंसान से छोटे कद का दिखता है, जो लाल भूरे बालों वाला होता है। लेकिन दोनों तरह के हिममानव में सामान्य बात ये पायी जाती है कि ये खड़े होकर इंसान की तरह चलते हैं और इंसान को चकमा देने में माहिर होते हैं। हो सकता है येति की अपनी दुनिया हो, जहां वो इंसान की पहुंच से दूर बर्फ में सैकड़ों की तादाद में रहता हो या ये भी हो सकता है कि हिममानव की तादाद बहुत कम हो और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दुर्गम बर्फिले में छिप कर रहता हो और इंसान के सामने नहीं आना चाहता हो। इसलिए आज तक हिममानव का इंसान से आमना सामना नहीं हो पाया है। हो सकता है हजारों साल से बर्फ में रहने को आदी हो चुके हिमामानव इंसान को दुश्मन समझता हो। इस लिए जब हिममानव और इंसान की नजरें मिलती है, छिपने में माहिर ये प्राणी गायब हो जाता है। लेकिन ये तमाम तरह के कयास है और जब तक इंसान और हिममानव का आमना सामना नहीं हो जाता है या फिर हिममानव का ठिकाना ढुढ नहीं लिया जाता है, हिममानव यानि येति रहस्यमयी प्राणी बना रहेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिममानव का दुनिया - भर में अलग अलग नाम==&lt;br /&gt;
ऐसा नहीं है कि हिमामानव का अस्तित्व सिर्फ़ एशिया में है, दुनिया भर में हिममानव को सैकड़ो साल से लोग देखने का दावा करते आ रहे हैं। इस रहस्यमयी प्राणी को दुनिया भर के कई इलाके में अलग अलग नामों से जाना जाता है। अमेरिका में '''हिममानव को बड़े पैरो वाला प्राणी यानि बिग फूट ( Bigfoot )''', ब्राजील में मपिंगुरे, आस्ट्रेलिया में योवेई, इंडोनेशिया में साजारंग गीगी कहा जाता है। जबकि कनाडा में सास्कयूआच, अमेजन में मपिंगुअरी, और एशिया में - भारत में हिममानव, नेपाल में यति नाम है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येति शेरपा शब्द है, जिसमें येह का मतलब चट्टान और तेह का अर्थ जंतु होता है, यानि चट्टानों का जीव। शेरपा भाषा में इस रहस्यमयी प्राणी को मिरका, कांग और मेह- तेह के नाम से भी जाना जाता है, तिब्बती में इसका अर्थ जादुई प्राणी होता है। ऐसे में पूरी दुनिया में दिखाई देने वाले इस जादुई प्राणी के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन हिममानव का कहां है ठिकाना। ये रहस्य आज भी बरकार है। हो सकता है हिममानव इंसान के विकास कड़ी हो। जो बर्फ में हिममानव के रूप में मौजूद हो। लेकिन इंसान के पास तमाम तरह के अत्याधुनिक साधन होने के बाद भी हिमामानव यानि येति आज भी इंसान की पहुंच से दूर है। दुनिया भर के वैज्ञानिक रिसर्च में जुटे हैं लेकिन हिममानव के अस्तित्व के बारे में कोई भी पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिममानव से जुङी घटनायें==&lt;br /&gt;
हिममानव यानि येति दुर्गम बर्फिले इलाके में सदियों से इंसान को दिखता रहा है, लेकिन हिममानव के रहस्य से परदा नहीं उठ पाया है। आखिर ये हिममानव बर्फिले इलाके में कहां रहता है और कहां गायब हो जाता है इसका पता अबतक नहीं चल पाया है। हिममानव के बारे में दुनिया को '''पहली बार''' तब पता चला। जब 1832 में बंगाल के एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में एक पर्वतारोही बी.एच. होजसन ने येति के बारे में जानकारी दी। जिसमें अपने हिमालय अभियान के अनुभवों में उन्होंने लिखा था कि उत्तरी नेपाल के पहाड़ी इलाके में ट्रैकिंग के दौरान उनके स्थानीय गाइड ने एक ऐसे विशालकाय प्राणी को देखा, जो इंसान की तरह दो पैरो पर चल रहा था, जिसके शरीर पर घने लंबे बाल थे, उस प्राणी को देखते ही वो डर कर भाग गया। होजसन ने साफ लिखा है कि उन्होंने कुछ नहीं देखा, लेकिन इस घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने अनजान प्राणी को यति नाम दिया। इसके बाद यति के देखे जाने और पदचिह्नों की पहचान किए जाने का लंबा इतिहास रहा है। कई पर्वतारोहियों ने अपनी किताबों में इसका उल्लेख किया है। हिमालय क्षेत्र ही नहीं, दुनिया के बाकी हिस्सों से भी ऐसी खबरें आती रहीं। हालांकि कोई भी अपनी बात साबित करने के लिए पुख्ता सबूत नहीं दे सका है। इसके बाद 1889 में एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में पर्वतारोहियों ने बर्फ में ऐसे किसी प्राणी का फूट प्रिंट देखा जो इंसान की तुलना में काफ़ी बड़े थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
20वीं सदी की शुरूआत में येति को देखने के मामले तब ज़्यादा आने शुरू हुए जब पश्चिमी देशों के पर्वतारोहियों ने इस क्षेत्र की चोटियों पर चढ़ने का प्रयास शुरू किया। ऐसे कई पर्वतारोहियों ने यहां विचित्र जंतु और विचित्र पदचिन्ह देखने की बात कही। फिर सन् 1925 में पेशेवर फोटोग्राफर तथा रॉयल ज्योग्रॉफिकल सोसाइटी के एक फोटोग्राफर एम.ए. टॉमबाजी ने 15,000 फीट ऊंचाई वाले जेमू ग्लेशियर ( कंगचनजंघा पर्वत माला ) के पास एक विचित्र प्राणी को देखने की बात कही। उस फोटोग्राफर ने बताया कि उस विचित्र प्राणी को 200 से 300 गज की दूरी से उसने क़रीब एक मिनट तक देखा, जिसकी शारीरिक बनावट ठीक-ठीक इंसान जैसी थी, वो सीधा खड़े होकर चल रहा था, लेकिन शरीर पर बहुत अधिक मात्रा में बाल थे। उसके तन पर कपड़े जैसी कोई चीज नहीं थी। झाड़ियों के सामने रूक-रूक कर पत्तियां खींच रहा था, और बर्फीली पृष्ठभूमि में वह काला दिख रहा था। दो घंटे बाद टॉमबाजी और उसके साथी पहाड़ से नीचे उतर आये थे। रास्ते में उन्हें ऐसे पदचिह्न मिले जो सात इंच लंबे व चार इंच चौड़े थे और जो शायद उसी प्राणी के थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद 1938 में येति एक बार फिर चर्चा में आया, विक्टोरिया मेमोरियल, कलकत्ता के क्यूरेटर एक कैप्टेन ने हिमालय की यात्रा के दौरान देखने का दावा किया। जिसमें कैप्टन ने उसे एक उदार और मददगार प्राणी बताया। कैप्टन के मुताबिक इस यात्रा के दौरान जब वो बर्फीली ढलान पर फिसल कर घायल हो गये थे, तब प्रागैतिहासिक मानव जैसे दिखने वाले एक 9 फीट लंबे प्राणी ने उसे मौत के मुंह से बचाया था। वह प्राणी कैप्टेन को उठाकर कई मील दूर अपनी गुफा में ले गया और तब तक उसकी सेवा करता रहा जब तक कि वह घर जाने लायक़ नहीं हो गया। 1942 में भी साइबेरिया के जेल से भागने वाले कुछ कैदियों ने भी हिमालय पार करते हुए विशाल बंदरों जैसे प्राणी को देखने का दावा किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1950 के दशक में येति में पश्चिमी देशों की दिलचस्पी नाटकीय ढंग से बढ़ गयी। लेकिन पहली बार ठोस सबूत तब मिला जब 1951 में एवरेस्ट चोटी पर चढ़ने का प्रयास करने वाले एक पर्वतारोही एरिक शिप्टन ने 19,685 फीट की ऊंचाई पर बर्फ पर बने पदचिन्हों के तस्वीर फोटो लिए, जिसका आज भी गहन अध्ययन और बहस का विषय हैं। बहुत से लोग मानते हैं ये फोटो येति की वास्तविकता का बेहरतीन सबूत हैं लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि ये किसी दूसरे सांसारिक जीव के हैं और इन्हें तोड़ा-मोड़ा गया है। इतना ही नहीं 1953 में सर एडमंड हिलरी और [[तेनजिंग नोर्गे]] ने भी एवरेस्ट चढ़ाई के दौरान बड़े-बड़े पदचिह्न देखने की बात कही। येति का पता लगाने के लिए 1954 में ‘द डेली मेल एबनोमिनेबल स्नोमैन एक्सपीडिशन’ चलाया गया। पर्वतारोहियों के मुखिया जॉन एंजेलो जैक्सन ने एवरेस्ट से लेकर कंचनजंगा तक पहला रास्ता बनाया और इस प्रक्रिया में थ्यांगबोच गोम्पा में येति की पेंटिंग के फोटो लिए। उन्होंने बर्फ पर बने अनेक पदचिह्नों के फोटो भी लिए। ये पदचिह्न सामान्य से बड़े थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिर 1960 में सर एडमंड हिलेरी के नेतृत्व में एक दल ने येति से संबद्ध सबूतों को एकत्रित करने के लिए हिमालय क्षेत्र की यात्रा की। यह अभियान वर्ल्ड बुक इनसाइक्लोडिया द्वारा प्रायोजित किया गया था जिसमें इंफ्रारेड फोटोग्राफी की मदद ली गयी लेकिन 10 महीने वहां रहने के बाद भी इस दल को येति के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल पाये। उन्हें वहां दो खालें मिलीं जिनमें एक एक सिर की थी। लेकिन जांच में पाया गया कि वे खालें हिमालय में पाये जाने वाले नीले भालू और हिरण जैसी बकरी की थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके एक दशक बाद सन् 1970 में ब्रिटिश पर्वतारोही डॉन व्हिलॉन्स ने दावा किया कि अन्नपूर्णा चोटी पर चढ़ने के दौरान उन्होंने एक विचित्र प्राणी को देखा और रात में कैम्प के नजदीक विचित्र तरह के चीत्कार सुने। उनके शेरपा गाइड ने बताया कि यह आवाज येति की है। सुबह व्हिलॉन्स ने कैम्प के नजदीक मानव के जैसे बड़े पदचिन्ह देखे। उसी शाम उन्होंने दूरबीन की मदद से बंदर की शक्ल के दोपाये जंतु को क़रीब 20 मिनट तक देखा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1974 में जुलाई के महिने में, एवरेस्ट गांव में एक घटना हुई, एक शेरपा चरवाहा लड़की ने यती देखने की बात बताई, जो अपनी याकों को चरा रही थी, लड़की पहले तो उसे देख कर ड़र गई और उसके मुंह से चीख निकल गई, तब बंदर जैसा विशाल प्राणी उसे खींच कर ले जाने लगा। लड़की के जोर - जोर से चिल्लाने पर उसने उसे छोड़ दिया और गुस्से से उस लड़की को उठाकर दूर फेंक दिया और उसके बाद गुस्से में उसने लड़की के दो याकों को मार कर उसका मांस खाता हुआ वह दूर चला गया। इसकी रिपोर्ट पुलिस में की गयी। पुलिस को उसके स्पष्ट पदचिन्ह मिले। खैर! इसे कल्पना भी कैसे कह सकते है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के दिनों में येति देखने की बात करें तो 1998 में एक अमरीकी पर्वतारोही क्रैग कैलोनिया ने एवरेस्ट से चीन की तरफ से उतरते हुए येति के एक जोड़े को देखने का दावा किया, उस पर्वतारोही के मुताबिक दोनों के काले फर थे और वे सीधे खड़े होकर चल रहे थे। दिसंबर 2007 में अमेरिका के एक टीवी शो प्रस्तुतकर्ता जोशुआ गेट्स और उनकी टीम ने भी यति के स्पष्ट पदचिह्न देखने का दावा किया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक पदचिह्न की लंबाई 33 से.मी. थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2008 में भी मेघालय में हिममानव यानि येति को देखने का दावा किया गया। जिसे गारो हिल्स की पहाड़ियों में देखा गया, गारो हिल्स की पहाड़ियों के आसपास रहने वाले गांव वालों ने दावा किया है कि उन्होंने हाल ही में एक ऐसा जीव इस इलाके में घुमते हुए देखा है, जिसकी लंबाई 10 फीट के आसपास और वजन लगभग 300 किलो ग्राम रहा होगा। मेघालय में येति के देखे जाने के दावे के बाद कुछ वैज्ञानिक दलों ने इस दिशा में एक बार फिर काम करना शुरू कर दिया है और खबर है कि कुछ दलों ने गारो हिल्स की पहाड़ियों में येति की खोज भी शुरू कर दी है। येति किसी के ठिक सामने आज तक नहीं आया है। इसके कोई ठोस सबूत आज तक नहीं मिला। हो सकता है इस हिममानव का हिमालय के क्षेत्रो में अस्तित्व हो, जो इंसान के सामने नहीं आना चाहाता हो। ऐसे में जबतक इंसान हिममानव तक नहीं पहुंच जाता, ये प्राणी रहस्यमयी बना रहेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिममानव पर वैज्ञानिको का मत==&lt;br /&gt;
अभी तक दर्जनों लोगों ने यति देखने के दावे किए हैं, लेकिन कोई भी पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाया है और विज्ञान ऐसे किसी सबूत के बिना यति के अस्तित्व पर मुहर नहीं लगा सकता है। दुनिया के अलग अलग इलाकों में देखे गए इस अदभुत जीव के अस्तित्व से जुड़े कई प्रमाण मिल रहे हैं। वैज्ञानिकों की टीम लगातार इस पर रिसर्च कर रही है। वैज्ञानिकों और विद्धानों में येति के अस्तित्व को लेकर मतभेद रहा है। कुछ कह रहे हैं कि प्रमाण इतने नहीं हैं कि यति का होना घोषित कर दिया जाए। कई लोग इसे एक विशालकाय जीव मानते हैं, लेकिन कुछ इन किस्सों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते। उनके मुताबिक येति से जुड़ी सभी कहानियां सिर्फ़ काल्पनिक है। फिर भी विज्ञान के जानकारों का एक वर्ग ऐसा है, जो कह रहा है कि कुछ तो है। अमेरिका के पोकाटेलो में इदाहो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जेफ मेलड्रम का कहना है कि मैंने इस संबंध में मौजूदा सभी वैज्ञानिक प्रमाणों का अध्ययन किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि इस सृष्टि में कोई प्राणी ऐसा जरूर है, जिसकी पहचान होना बाकी है। जिन्होंने येति को देखने का दावा किया, उनके मुताबिक बर्फ पर पाए गए विशालकाय फुटप्रिन्ट्स येति के हैं। जबकि वैज्ञानिकों का तर्क है कि वो किसी जंगली जानवर के हो सकते हैं। जो बर्फ में पिघलकर फैल गए हैं। योति से जुड़े कई ऐसे सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है। उनके पास भी नहीं जो इसे देखने का दावा कर चुके है। कहानियों और विज्ञान के बीच आज भी येति एक सवाल है। जब तक इसके वजूद से जुड़ी सच्चाई सामने नहीं आ जाती इसका रहस्य बरकरार रहेगा। बर्फीले पहाड़ों पर देखे और पहचाने गए विशालकाय वानर शरीर वाले हिममानव के अस्तित्व को लेकर जारी बहस के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी हकीकत का पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जुटाए गए सबूतों की फोरेंसिक जाँच की जा रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिममानव से जुङी जाँचे==&lt;br /&gt;
बालों की जाँच :- 19 मार्च 1954 को अंग्रेज़ी अखबार ‘डेली मेल’ में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें इस मसले पर वैज्ञानिक नजरिए से प्रकाश डाला गया था। असल में वहाँ के प्रोफेसर फ्रेडरिक वुड जोन्स ने यति के बालों के माइक्रोफोटोग्राफ का परीक्षण किया था। उनकी तुलना भालू और दूसरे पहाड़ी जानवरों के बालों से की गई, लेकिन इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका कि आखिर ये बाल किसके हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन् 1957 में यति के मल की जाँच भी गई, लेकिन यह साफ नहीं हो सका कि अगर यह अवशिष्ट पदार्थ यति का नहीं है, तो किस जंतु का है? हाल ही में बीबीसी ने यति के बाल एकत्रित किए गए जाने और जाँच के लिए भेजे जाने की खबर प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में भी पता नहीं चल पाया है कि ये बाल किस पहाड़ी प्राणी के हैं। अब डीएनए विश्लषण किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोपड़ी मिली :-  सन् 1960 में एवरेस्ट के विजेता सर एडमंड हिलेरी को कथित तौर पर हिमालय में यति की खोपड़ी मिली। उन्होंने इसे जाँच के लिए पश्चिमी देशों में भेजा। उस समय यह बताया गया था कि खोपड़ी बर्फीले पहाड़ों पर पाए जाने वाले बकरी जैसे किसी जानवर की है। वैसे बड़ी तादाद में लोगों ने इस रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिममानव - संस्कृतियों में==&lt;br /&gt;
रामायण से जुड़ी कहानी :- नेपाल में यति को राक्षस भी कहा जाता है। कुछ गंथों के मुताबिक कुछ नेपाली और हिमालय की तराई के इलाकों में राम और सीता के बारे में प्रचलित लोक कविताओं और गीतों में भी कई जगह यति का उल्लेख किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति - आम बात है :- इसी तरह यति या हिममानव और मानव की मुलाकातों के कई किस्से हिमालय पर्वतों के अनुभवी बूढ़े सुनाया करते हैं। भूटान में कुछ बुजुर्ग ऐसे हैं, जिनके लिए हिममानव कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उनके मुताबित, उनके जमाने में हिममानव दिखना सामान्य बात थी। 77 साल के सोनम दोरजी का कहना है कि यति का इतिहास सदियों पुराना है और वे आज भी मौजूद हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सांस्कृतिक प्रतीक यतिः नेपाल और तिब्बत में हिममानव को यति कहा जाता है। यति आज सांस्कृतिक प्रतीक बन गया है। अबूझ पहेली बनी सृष्टि की इस रचना पर कई किताबें लिखी गई हैं, वीडियो तथा फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं। &lt;br /&gt;
इस बीच जाने-अनजाने यह अनजान ‘प्रजाति’ आज मशहूर हो गई है। इन्हें किताबों, फ़िल्मों, बच्चों की कामिक्स में तो स्थान मिल ही गया है, अनेक वीडियो गेम्स में मौजूद होकर वह स्थानीय क्षेत्रों में वह लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब तक येति पर कई दिलचस्प फ़िल्में बन चुकी हैं, किताबें लिखी जा चुकी हैं और अनेक वीडियो गेम्स में मौजूद होकर वह स्थानीय क्षेत्रों में वह लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। हिममानव को आमतौर पर एक घृणित शोमैन के रूप में दिखाया गया है। ‘द एबोमिनेबल शोमैन’, ‘डाक्टर हू’, ‘बग्स बनी कार्टून’, ‘देट्स शो घोस्ट’, ‘द माइटी बुश’, ‘काल आफ ए यति’ जैसे टीवी शो में यति को एक शैतान के रूप दिखाया गया है। बालीवुड फ़िल्म ‘अजूबा कुदरत का’ में भी यति को दिखाया गया है। यह ऐसी लड़की की कहानी है, जो यति को दिल दे बैठती है। विदेशों में भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं। आज भी उसे देखने का दावा बहुत से लोग करते हैं लेकिन आज तक वह किसी के ठीक सामने नहीं आया। संभव है अगम्य हिमालयी क्षेत्रों में उसका अस्तित्व हो और किसी के सामने न आना चाहता हो। बहरहाल यह तो तय है कि आज तकनीक जितनी भी विकसित हो जाए पर प्रकृति के कुछ रहस्यों से पर्दा उठना अभी बाकी है।&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<title>तेनजिंग नार्के</title>
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		<title>तेनज़िंग नोर्गे</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर [[माउंट एवरेस्ट]] ([[हिमालय]]) पर पहुँचने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति '''तेनजिंग नोर्गे''' (जन्म- [[1914]] - मृत्यु- [[9 मई]], [[1986]])  [[नेपाल]] के एक निर्धन परिवार में हुआ था। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
तेनजिंग की इस महान विजय यात्रा में सर एडमंड हिलेरी उनके सहयोगी थे। तेनजिंग कर्नल जान हण्ट के नेतृत्व में एक ब्रिटिश पर्वतारोही दल के सदस्य के रूप में हिमालय की यात्रा पर गये थे और दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ते हुए [[29 मई]], [[1953]] को उन्होंने एवरेस्ट के शिखर को स्पर्श किया। तेनजिंग की इस ऐतिहासिक सफलता ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया है। [[भारत]] के अतिरिक्त [[इंग्लैंड]] एवं [[नेपाल]] की सरकारों ने भी उन्हें सम्मानित किया था। 1959 में उन्हें '[[पद्मभूषण]]' से अलंकृत किया गया। वास्तव में [[1936]]-[[1953|53]] तक के सभी एवरेस्ट अभियानों में उनका सक्रिय सहयोग रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेनजिंग [[बौद्ध धर्म]] के अनुयायी थे और [[1933]] में वे भारतीय नागरिक बन गये थे। काफ़ी उनका प्रिय पेय और कुत्ते पालना उनका मुख्य शौक था। बचपन से ही पर्वतारोहण में रुचि होने के कारण वे एक अच्छे एवं कुशल पर्वतारोही बन गये। उनका प्रारम्भिक नाम नामग्याल बांगडी था। वे तेनजिंग खुमजुंग भूटिया भी कहलाते थे। तेनजिंग को अपनी सफलताओं के लिए जार्ज मैडल भी प्राप्त हुआ था। [[1954]] में दार्जिलिंग में 'हिमालय पर्वतारोहण संस्थान' की स्थापना के समय उन्हें इसका प्रशिक्षण निर्देशक बना दिया गया था। तेनजिंग ने अपने अपूर्व साहस से भारत का नाम हिमालय की ऊँचाइयों पर लिख दिया है, जिसके लिय वे सदैव याद किए जाएंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु ==&lt;br /&gt;
[[9 मई]], [[1986]] को इनकी मृत्यु हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<title>माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[माउंट आबू]] [[राजस्थान]] का एकमात्र हिल स्टेशन है। माउंट आबू में अनेक पर्यटन स्थल हैं। इनमें कुछ शहर से दूर हैं तो कुछ शहर के आसपास ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यह अभयारण्य मांउट आबू का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। &lt;br /&gt;
*यहाँ मुख्य रूप से तेंदुए, स्लोथबियर, वाइल्ड बोर, सांभर, चिंकारा और [[लंगूर]] पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*288 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य की स्थापना 1960 में की गई थी। &lt;br /&gt;
*यहाँ पक्षियों की लगभग 250 और पौधों की 110 से ज़्यादा प्रजातियां देखी जा सकती हैं। &lt;br /&gt;
*पक्षियों में रुचि रखने वालों के लिए उपयुक्त जगह है।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
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		<title>संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान</title>
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&lt;div&gt;[[चित्र:Sanjay-Gandhi-National-Park.jpg|thumb|250px|संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान, [[मुंबई]]&amp;lt;br /&amp;gt;Sanjay Gandhi National Park, Mumbai]]&lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] के शहर [[मुंबई]] में कई [[मुम्बई पर्यटन|पर्यटन स्थल]] है जिनमें से एक संजय गांधी नेशनल पार्क है।&lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान को बोरीवली नेशनल पार्क और संजय गांधी नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता था जो मुम्‍बई में बोरीवली उप नगर के आस पास स्थित है।&lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान [[1974]] में अधिसूचित किया गया।&lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान सामान्‍य दर्शनीय स्‍थलों के कारण बड़े शहर का एक आकर्षण बन गया।&lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान आने वालों को कई प्रकार के जीव जंतु दिखाई दे सकते हैं जिसमें चित्तीदार हिरण, ब्‍लैक नेप्‍ड हेयर, बार्किंग डीयर, साही, पाम सिवेट, माउस डीयर, रिसस मेकाक, बोनेट मेकाक, हनुमान [[लंगूर]], पढ़ने वाली भारतीय लोमड़ी और सांभर शामिल है। &lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान लगभग 38 सरीसृप प्रजातियाँ पाई जाती हैं। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों को तुलसी झील में घडियाल और पाइथन देखने को मिल सकते हैं।&lt;br /&gt;
*संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान कोबरा, रसेल वाइपर, बैम्‍बू पिट वाइपर और सिलोनी कैट साँप भी देखे जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<title>रजनीश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर, 1931 को जबलपुर ([[मध्य प्रदे...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रजनीश का जन्म [[11 दिसम्बर]], [[1931]] को [[जबलपुर]] ([[मध्य प्रदेश]]) में हुआ था। उन्हें बचपन में 'रजनीश चन्द्रमोहन' के नाम से जाना जाता था। [[1955]] में जबलपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक एवं सागर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद [[1959]] में व्याख्याता का पद सम्भाला। वह इस समय तक [[धर्म]] एवं [[दर्शन]] शास्त्र के ज्ञाता बन चुके थे। कुछ समय बाद उन्होंने अपने को 'भगवान' घोषित कर दिया। 1980-86 तक के काल में वे 'विश्व-सितारे' बन गये। बड़े-बड़े उद्योगपति, विदेशी धनुकुबेर, फिल्म अभिनेता उनके शिष्य रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रजनीश स्वयं को 20वीं सदी के सबसे बड़े तमाशेबाज़ों में से एक मानते हैं। अपने बुद्धि कौशल से उन्होंने विश्वभर में अपने अनुययियों को जिस सूत्र में बांधा वह काफ़ी हंगामेदार साबित हुआ। उनकी भोगवादी विचारधारा के अनुयायी सभी देशों में पाये जाते हैं। रजनीश ने [[पुणे]] में 'रजनीश केन्द्र' की स्थापना की और अपने विचित्र भोगवादी दर्शन के कारण शीघ्र ही विश्व में चर्चित हो गये। एक दिन बिना अपने शिष्यों को बताए वे चुपचाप अमेरिका चले गए। वहाँ पर भी अपना जाल फैलाया। मई 1981 में उन्होंने ओरेगोन (यू.एस.ए.) में अपना कम्यून बनाया........ओरेगोन के निर्जन भूखण्ड को रजनीश ने जिस तरह आधुनिक, भव्य और विकसित नगर का रूप दिया वह उनके बुद्धि चातुर्य का साक्षी है। रजनीश ने सभी विषयों पर सबसे पृथक और आपत्तिजनक भी विचार व्यक्ति किये हैं, वह उनकी एक अलग छवि बनाते हैं। उन्होंने पुरातनवाद के ऊपर नवीनता तथा क्रान्तिकारी विजय पाने का प्रयास किया है.........रजनीश की कई कृतियाँ चर्चित रहीं हैं, इनमें 'सम्भोग से समाधि तक', 'मृत्यु है द्वार अमृत का', संम्भावनाओं की आहट', 'प्रेमदर्शन', के नाम प्रमुख हैं। अपना निज़ी अध्यात्म गढ़कर उसका 'काम' के साथ समन्वय करके रजनीश ने एक अदभुत मायालोक की सृष्टि की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1985 में रजनीश को अमेरिका छोड़कर [[भारत]] वापस आना पड़ा। वहाँ पर उन पर मुक़दमा भी चलाया गया था। इस वापसी ने उनकी लोकप्रियता को चोट पहुँचाई लेकिन उनके अनुयायी अभी भी अपने 'भगवान' को उसी प्रकार पूजते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>लंगूर</title>
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		<updated>2011-04-07T06:03:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;सर्कोपिथीकाइडिया कुल के प्रेस्बाइटिस, पायगाथ्रिक्स, राइनोपिथैकस और सिमिया वंश के कई पूर्वदेशीय वानरों में से एक। इनसे संबंधित अफ्रीकी गुरेजा की तरह लंगूर का बड़े आकार का आमाशय होता है। जो इसके भोजन, पत्तियों, फलों और अन्य वनस्पतियों आदि को पचाने में अनुकूल सिद्ध होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेस्बाइटिस वंश के लंगूर अथवा पत्तियां खाने वाले लंगूर (जिसे कभी पायगाथ्रिक्स जाति में भी रखा जाता है) की लगभग 14 प्रजातियां हैं, जिसमें [[भारत]] का पूज्य वानर [[हनुमान]] लंगूर (पी. एंटेलस) भी शामिल है। इस वंश के सदस्य समूह में रहने वाले, दिनचर और मूलतः वृक्षवासी होते हैं। इन वानरों की पूंछ लंबी, शरीर सुतवां और हाथ-पैर लंबे व पतले होते हैं। अलग-अलग प्रजातियों के अनुसार इन लंगूरों का सिर और शरीर 40 से 80 सेमी लंबा और पूंछ लगभग 50 से 110 सेमी लंबी होती है। इन बंदरों के लंबे रोय होते हैं और इनकी कई प्रजातियों में तो सिर पर लंबे बालों की टोपी या कलगीनुमा संरचना होती है। वयस्कों के चेहरे का रंग सामान्यतः काला होता है। [[रंग]] अलग-अलग प्रजातियों पर भी निर्भर करता है। लेकिन आमतौर पर यह स्लेटी,भूरा अथवा काला होता है। लगभग 168 दिनों की गर्भावधि के बाद पैदा हुए एकल शिशु का रंग वयस्क के रंग से भिन्न होता है और शायद इसीलिए उसकी मां उसकी रक्षा के लिए प्रेरित होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस वंश का सामान्य बंदर हनुमान लंगूर जन्म के समय लगभग काला और वयस्क होते-होते स्लेटी, धूसर या भूरा हो जाता है। भारत में पवित्र माना जाने वाला यह लंगूर फसलों और व्यापारियों के गोदामों पर धावा बोलते हुए गांव और मंदिरों में स्वतंत्रता से घूमता रहता है। हनुमान लंगूर लगभग 20 से 30 के झुण्ड में रहते हैं। इस जाति में नर का प्रमुख स्थान है। लेकिन मादा का कोई निश्चित स्थान नहीं होता है। मां अपने बच्चे की सुरक्षा का बहुत ध्यान रखती है। लेकिन वह अन्य मादाआं को नवजात शिशु की देखभाल में सहायता की अनुमति दे देती है। डाक लंगूर (पायगाथ्रिक्स नीमियस) दक्षिण पूर्व एशिया के जंगलों में रहने वाला बड़ा बंदर है। इसके शरीर पर छोटे और धूसर रंग के रोएं होते हैं। जिन पर लाल और सफेद निशान बने होते हैं। चपटी-छोटी और मोटी नाक वाले लंगूर (पायगाथ्रिक्स राक्सलनी और एव्यूंक्यूलस) [[चीन]] व उत्तरी वियतनाम के जंगलों में पाये जाते हैं। इनकी नाक ऊपर की ओर मुड़ी होती है और शरीर के लंबे रोएं धूसर काले या भूरे व ऊपर से पीलापन लिए होते हैं। इंडोनेशिया के नम जंगलों में पाए जाने वाले मैकाक जैसे सुअर-पूंछ लंगूर (नैसैलिस कानकलर) की नाक चपटी और रंग भूरा सा होता है। प्रेस्बाइटिस एंटैलस प्रजाति के अतिरिक्स अन्य सभी वर्णित प्रजातियां दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्राणियों के रूप में वर्गीकृत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{जीव जन्तु}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्तनधारी_जीव]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्राणि विज्ञान]]&lt;br /&gt;
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[[Category:वन्य प्राणी]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>लंगूर</title>
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		<updated>2011-04-07T05:59:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: 'सर्कोपिथीकाइडिया कुल के प्रेस्बाइटिस, पायगाथ्रिक्...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;सर्कोपिथीकाइडिया कुल के प्रेस्बाइटिस, पायगाथ्रिक्स, राइनोपिथैकस और सिमिया वंश के कई पूर्वदेशीय वानरों में से एक। इनसे संबंधित अफ्रीकी गुरेजा की तरह लंगूर का बड़े आकार का आमाशय होता है। जो इसके भोजन, पत्तियों, फलों और अन्य वनस्पतियों आदि को पचाने में अनुकूल सिद्ध होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेस्बाइटिस वंश के लंगूर अथवा पत्तियां खाने वाले लंगूर (जिसे कभी पायगाथ्रिक्स जाति में भी रखा जाता है) की लगभग 14 प्रजातियां हैं, जिसमें भारत का पूज्य वानर हनुमान लंगूर (पी0 एंटेलस) भी शामिल है। इस वंश के सदस्य समूह में रहने वाले, दिनचर और मूलतः वृक्षवासी होते हैं। इन वानरों की पूंछ लंबी, शरीर सुतवां और हाथ-पैर लंबे व पतले होते हैं। अलग-अलग प्रजातियों के अनुसार इन लंगूरों का सिर और शरीर 40 से 80 सेमी लंबा और पूंछ लगभग 50 से 110 सेमी लंबी होती है। इन बंदरों के लंबे रोय होते हैं और इनकी कई प्रजातियों में तो सिर पर लंबे बालों की टोपी या कलगीनुमा संरचना होती है। वयस्कों के चेहरे का रंग सामान्यतः काला होता है। रंग अलग-अलग प्रजातियों पर भी निर्भर करता है। लेकिन आमतौर पर यह स्लेटी,भूरा अथवा काला होता है। लगभग 168 दिनों की गर्भावधि के बाद पैदा हुए एकल शिशु का रंग वयस्क के रंग से भिन्न होता है और शायद इसीलिए उसकी मां उसकी रक्षा के लिए प्रेरित होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस वंश का सामान्य बंदर हनुमान लंगूर जन्म के समय लगभग काला और वयस्क होते-होते स्लेटी, धूसर या भूरा हो जाता है। भारत में पवित्र माना जाने वाला यह लंगूर फसलों और व्यापारियों के गोदामों पर धावा बोलते हुए गांव और मंदिरों में स्वतंत्रता से घूमता रहता है। हनुमान लंगूर लगभग 20 से 30 के झुण्ड में रहते हैं। इस जाति में नर का प्रमुख स्थान है। लेकिन मादा का कोई निश्चित स्थान नहीं होता है। मां अपने बच्चे की सुरक्षा का बहुत ध्यान रखती है। लेकिन वह अन्य मादाआं को नवजात शिशु की देखभाल में सहायता की अनुमति दे देती है। डाक लंगूर (पायगाथ्रिक्स नीमियस) दक्षिण पूर्व एशिया के जंगलों में रहने वाला बड़ा बंदर है। इसके शरीर पर छोटे और धूसर रंग के रोएं होते हैं। जिन पर लाल और सफेद निशान बने होते हैं। चपटी-छोटी और मोटी नाक वाले लंगूर (पायगाथ्रिक्स राक्सलनी और एव्यूंक्यूलस) चीन व उत्तरी वियतनाम के जंगलों में पाये जाते हैं। इनकी नाक ऊपर की ओर मुड़ी होती है और शरीर के लंबे रोएं धूसर काले या भूरे व ऊपर से पीलापन लिए होते हैं। इंडोनेशिया के नम जंगलों में पाए जाने वाले मैकाक जैसे सुअर-पूंछ लंगूर (नैसैलिस कानकलर) की नाक चपटी और रंग भूरा सा होता है। प्रेस्बाइटिस एंटैलस प्रजाति के अतिरिक्स अन्य सभी वर्णित प्रजातियां दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्राणियों के रूप में वर्गीकृत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=आधार1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
	</entry>
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		<title>अंधक संघ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%98&amp;diff=148320"/>
		<updated>2011-04-07T05:53:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*मधु राजा के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र, एक यादवराज था।  इसी के कुल में श्री [[कृष्ण]] पैदा हुए थे और इसी कारण 'वार्ष्णेय' कहलाए।  इनका वंश 'वृष्णि वंशीय यादव' कहलाता था।  ये लोग [[द्वारिका]] में निवास करते थे। प्रभास क्षेत्र में यादवों के गृह कलह में यह वंश भी समाप्त हो गया।&lt;br /&gt;
*वृष्णि-गणराज्य [[शूरसेन]]-प्रदेश में स्थित था। वृष्णियों का तथा अंधकों का प्राचीन साहित्य में साथ-साथ उल्लेख है। पाणिनि &amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 4,1,114 तथा 6,2,34&amp;lt;/ref&amp;gt; में वृष्णियों तथा अंधको का उल्लेख हैं।  &lt;br /&gt;
*[[चाणक्य|कौटिल्य]] के अर्थशास्त्र &amp;lt;ref&amp;gt;कौटिल्य का अर्थशास्त्र(पृ. 12)&amp;lt;/ref&amp;gt; में वृष्णियों के संघ-राज्य का वर्णन है।  &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] में अंधक वृष्णियों का कृष्ण के संबंध में वर्णन है।&amp;lt;ref&amp;gt;यादवा: कुकुरा भोजा: सर्वे चान्धकवृष्णय:, त्वय्यासक्ता: महाबाहो लोकालोकेश्वराश्च ये।'महाभारत शांति. 81,29&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*इसी प्रसंग में कृष्ण को संघ मुख्य भी कहा गया है जिससे सूचित होता है कि वृष्णि तथा अंधक गणजातियों के राज्य थे।&amp;lt;ref&amp;gt;भेदाद् विनाश: संघानां संघमुख्योऽसि केशव' महाभारत शाति. 81,25&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
*वृष्णि राजज्ञागणस्य भुभरस्य। ' यह सिक्का वृष्णि-गणराज्य द्वारा प्रचलित किया गया था और इसकी तिथि प्रथम या द्वितीय शती ई.पू. है।&amp;lt;ref&amp;gt;मजुमदार-कार्पोरेट लाइफ इन ऐंशेंट इंडिया–पृ. 280&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*अंधक एवं वृष्णि संघ सम्भवतः यदुवंशियों के राजा [[भीम सात्वत]] के पुत्रों के नाम पर बने थे। कृष्ण वृष्णि थे एवं [[उग्रसेन राजा|उग्रसेन]] और [[कंस]] अंधक थे। &lt;br /&gt;
*[[मथुरा]] में [[तीर्थंकर नेमिनाथ]] भी अंधक कहे गये हैं। कुछ ग्रंथों में कृष्ण को अंधक भी कहा गया है। &lt;br /&gt;
*मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की।&lt;br /&gt;
*श्री [[राम]] के पश्चात जब [[अयोध्या]] की गद्दी पर [[लव कुश|कुश]] थे और [[लव कुश|लव]] युवराज थे, तब मथुरा में भीम सात्वत के पुत्र अंधक राज्य करते थे। उनके बाद अंधक वंशियों का मथुरा पर अधिकार रहा, जो उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक कायम रहा था। भीम सात्वत के दूसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। उनके वंश में उत्पन्न शूर ने [[शौरिपुर]] (वर्तमान [[बटेश्वर उत्तर प्रदेश|बटेश्वर]]) बसा कर अपना पृथक् राज्य स्थापित किया था। शूर के पुत्र [[वसुदेव]] हुए, जिनके पुत्र [[बलराम]] तथा श्री कृष्ण थे। &lt;br /&gt;
{{highright}}&lt;br /&gt;
'''महाभारत शांति पर्व अध्याय-82:'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे देवर्षि ! जैसे पुरुष अग्रिकी इच्छासे अरणी काष्ठ मथता है; वैसे ही उन जाति-लोगों के कहे हुए कठोर वचनसे मेरा हृदय सदा मथता तथा जलता हुआ रहता है ॥6॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे नारद ! बड़े भाई बलराम सदा बल से, गद सुकुमारता से और प्रद्युम्न रूपसे मतवाले हुए है; इससे इन सहायकों के होते हुए भी मैं असहाय हुआ हूँ। ॥7॥&lt;br /&gt;
'''आगे पढ़ें''':-[[कृष्ण नारद संवाद]]&lt;br /&gt;
{{highclose}}&lt;br /&gt;
*वैदिक साहित्य में उत्तरी [[पांचाल]] के पौरव-राजा [[दिवोदास]] और उनके वंशज [[सुदास]] की विजय-गाथाओं का उल्लेख मिलता है। सुदास ने [[हस्तिनापुर]] के पौरव राजा संवरण को उनके नौ साथी राजाओं की विशाल सेना सहित पराजित किया था। 10 राजाओं के उस भीषण संघर्ष को प्राचीन वांग्मय में 'दशहराज्ञ युद्ध' कहा गया है। वीरवर सुदास से पराजित होने वाले उन नौ राजाओं में एक यादव नरेश भी था। &lt;br /&gt;
*श्री कृष्णदत्त वाजपेयी का अनुमान है कि यादव राजा भीम सात्वत का पुत्र अंधक रहा होगा, जो सुदास के समय यादवों की मुख्य शाखा का अधिपति और [[शूरसेन]] जनपद के तत्कालीन गणराज्य का अध्यक्ष था। वह संभवत: अपने पिता भीम के समान वीर नहीं था। अंधक के वंश में कुकुर हुआ था। कुकुर की कई पीढ़ी के बाद आहुक हुआ, जिसके दो पुत्र उग्रसेन और देवक हुए थे। उग्रसेन का पुत्र कंस था और देवक की पुत्री [[देवकी]] थी। उग्रसेन, देवक और कंस अपने पूर्वज अंधक और कुकुर के नाम पर अंधक वंशीय अथवा कुकुर वंशीय कहलाते थे। अंधक के भाई वृष्णि के दो पुत्र हुए, जिनके नाम देवमीढूष और युधाजित थे। देवमीढूष के पुत्र श्र्वफल्क और उनके पुत्र [[अक्रूर]] थे। वृष्णि के वंशज वाष्णि वंशीय अथवा वार्ष्णेय कहलाते थे। &lt;br /&gt;
*अंधक और वृष्णि वंशीय द्वारा शासित शूरसेन प्रदेशांतर्गत मथुरा और शौरिपुर के दोनों राज्य 'गणराज्य' थे। उनका शासन वंश-परंपरागत न होकर समय-समय पर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता था। वे प्रतिनिधि अपने-अपने गणों के मुखिया होते थे, और राजा कहलाते थे। &lt;br /&gt;
*महाभारत युद्ध से पूर्व उन दोनों राज्यों का संघ था, जो 'अंधक-वृष्णि-संघ' कहलाता था। उस संघ में अंधकों के मुखिया आहुक-पुत्र उग्रसेन थे और वृष्णियों के शूर-पुत्र वसुदेव थे। उस संघीय गणराज्य का राष्ट्रपति उग्रसेन था। इस संघ राज्य के केंद्र मन्त्रियों में एक [[उद्धव]] भी थे। उग्रसेन की भतीजी देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था, जिनके पुत्र भगवान कृष्ण थे। उग्रसेन के पुत्र कंस का विवाह उस काल के सर्वाधिक शक्तिशाली [[मगध]] साम्राज्य के अधिपति [[जरासंध]] की दो पुत्रियों के साथ हुआ था। वसुदेव की बहिन [[कुन्ती]] का विवाह [[कुरु]] प्रदेश के प्रतापी महाराजा [[पांडु]] के साथ हुआ था, जिनके पुत्र सुप्रसिद्ध [[पांडव]] थे। वसुदेव की दूसरी बहिन श्रुतश्रवा हैहयवंशी [[चेदि|चेदिराज]] दमघोष को व्याही थी, जिसका पुत्र [[शिशुपाल]] था। इस प्रकार शूरसेन प्रदेश के यादवों का पारिवारिक संबंध भारतवर्ष के कई विख्यात राज्यों के अधिपतियों के साथ था। उग्रसेन का पुत्र कंस बड़ा शूरवीर और महत्त्वाकांक्षी युवक था। फिर उन्हें अपने श्वसुर जरासंध के अपार सैन्य बल का भी अभिमान था। वह गणतंत्र की अपेक्षा राजतंत्र में विश्वास रखता था। उन्होंने अपने साथियों के साथ संघ राज्य के विरुद्ध उपद्रव करना आरम्भ किया। अपनी वीरता और अपने श्वसुर की सहायता से उन्होंने अपने पिता उग्रसेन और बहनोई वसुदेव को शासनाधिकार से वंचित कर उन्हें कारागृह में बन्द कर दिया और स्वयं अंधक-वृष्णि संघ का स्वेच्छाचारी राजा बन गया था। वह यादवों से घृणा करता था और अपने को यादव मानने में लज्जित होता था। उसने मदांध होकर प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार किये थे। अंत में श्री कृष्ण द्वारा उनका अंत हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कृष्ण2}}&lt;br /&gt;
{{कृष्ण}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>अमरकंटक</title>
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		<updated>2011-04-07T05:48:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अमरकंटक''' रीवां से 160 मील और पेंड्रा रेलवे स्टेशन से 15 मील दूर [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] तथा शोण या [[सोन नदी|सोन]] के उदगम-स्थान के रूप में प्रख्यात है। यह [[मध्य प्रदेश]] के अनूपपुर ज़िले में स्थित है। यह पठार समुद्रतट से 2500 फ़ुट से 3500 फ़ुट तक ऊँचा है। नर्मदा का उदगम एक पर्वतकुण्ड में बताया जाता है। अमरकंटक में नर्मदा के उदगम स्थान के पर्वत को सोम भी कहा गया है। अमरकंटक ऋक्षपर्वत का एक भाग है, जो [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित सप्तकुलपर्वतों में से एक है। अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध [[महाभारत]] के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं-इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है। इसे कर्णदहरिया का मन्दिर भी कहते हैं। यह तीन विशाल शिखरयुक्त मन्दिरों के समूह से मिलकर बना है। ये तीनों पहले एक महामण्डप से संयुक्त थे, किन्तु अब यह नष्ट हो गया है। इस मन्दिर के बाद का बना हुआ एक अन्य मन्दिर मच्छींद्र का भी है। इसका शिखर [[भुवनेश्वर]] के मन्दिर के शिखर की आकृति का है। यह मन्दिर कई विशेषताओं में कर्णदहरिया के मन्दिर का अनुकरण जान पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर्मदा का वास्तविक उदगम उपर्युक्त कुण्ड से थोड़ी दूर पर है। बाण ने इसे चंद्रपर्वत कहा है। यहीं से आगे चलकर नर्मदा एक छोटे से नाले के रूप में बहती दिखाई पड़ती है। इस स्थान से प्रायः ढाई मील पर अरंडी संगम तथा एक मील और आगे नर्मदा की कपिलधारा स्थित है। कपिलधारा नर्मदा का प्रथम प्रपात है, जहाँ पर नदी 100 फ़ुट की ऊँचाई से नीचे गहराई में गिरती है। इसके थोड़ा और आगे दुग्धधारा है, जहाँ नर्मदा का शुभ्रजल [[दूध]] के श्वेत फेन के समान दिखाई देता है। शोण या सोन नदी का उदगम नर्मदा के उदगम से एक मील दूर सोन-मूढ़ा नामक स्थान पर से हुआ है। यह भी नर्मदा स्रोत के समान ही पवित्र माना जाता है। [[महाभारत]] वन. 85,9 में नर्मदा-शोण के उदगम के पास ही वंशग़ुल्म नामक तीर्थ का उल्लेख है। यह स्थान प्राचीन काल में [[विदर्भ]] देश के अंतर्गत था। वंशग़ुल्म का अभिज्ञान वासिम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>परिक्रमा</title>
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		<updated>2011-04-07T05:48:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*सामान्य स्थान या व्यक्ति के चारों ओर उसकी दाहिनी तरफ़ से घूमने को परिक्रमा कहते हैं।&lt;br /&gt;
*इसको प्रदक्षिणा करना भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। &lt;br /&gt;
*प्राय: सोमवती [[अमावास्या]] को महिलाएँ पीपल वृक्ष की '''108 परिक्रमाएँ''' करती हैं। &lt;br /&gt;
*इसी प्रकार [[दुर्गा]] देवी की परिक्रमा की जाती है। &lt;br /&gt;
*पवित्र धर्मस्थानों, [[अयोध्या]], [[मथुरा]] आदि पुण्यपुरियों की पंचकोशी (25 कोस की), [[ब्रज]] में [[गोवर्धन पूजा]] की सप्तकोसी, ब्रह्ममंडल की [[ब्रज चौरासी कोस की यात्रा|चौरासी कोस]], [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] जी की [[अमरकंटक]] से समुद्र तक छ:मासी और समस्त [[भारत]] खण्ड की वर्षों में पूरी होने वाली - इस प्रकार की विविध '''परिक्रमाएँ''' भूमि में पद-पद पर दण्डवत लेटकर पूरी की जाती है। यही 108-108 बार प्रति पद पर आवृत्ति करके वर्षों में समाप्त होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>मध्य प्रदेश</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6&amp;diff=148316"/>
		<updated>2011-04-07T05:48:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Madhya-Pradesh-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[भोपाल]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=60348&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=196&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=308,000&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=23.17°N 77.21°E&lt;br /&gt;
|ज़िले=50&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[इंदौर]], [[जबलपुर]], [[ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=920:933&lt;br /&gt;
|साक्षरता=64.1&lt;br /&gt;
|स्त्री=50.6&lt;br /&gt;
|पुरुष=76.5&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[बलराम जाखड़]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[शिवराज सिंह चौहान]]&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.mp.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:51, 12 जून 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Madhya-Pradesh-Seal.gif&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश दूसरा सबसे बड़ा भारतीय राज्‍य है। भौगोलिक दृष्टि से यह देश में केन्‍द्रीय स्‍थान रखता है। इसकी राजधानी [[भोपाल]] है । मध्य का अर्थ बीच में है, मध्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति [[भारत|भारतवर्ष]] के मध्य अर्थात बीच में होने के कारण इस प्रदेश का नाम मध्य प्रदेश दिया गया, जो कभी 'मध्य भारत' के नाम से जाना जाता था। मध्य प्रदेश हृदय की तरह देश के ठीक बीचोंबीच में स्थित है। यह भारत का सबसे विशाल राज्य है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10 प्रतिशत, 3,08,000 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक में फैला हुआ है। छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए इसके उत्तरी ज़िलों को अलग करने के बाद मध्य प्रदेश की राजनीतिक सीमा का वर्ष 2000 में पुननिर्धारण किया गया। यह प्रदेश चारों तरफ से [[उत्तर प्रदेश]],  [[झारखण्ड]],  [[महाराष्ट्र]], [[राजस्थान]], [[गुजरात]], [[बिहार]] और  [[छत्तीसगढ़]] की सीमाओं से घिरा हुआ है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Udaygiri-Caves-Vidisha-1.jpg|left|उदयगिरि की गुफाएँ, [[विदिशा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Udaygiri Caves, Vidisha|thumb]]&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक संस्कृति के अनेक अवशेष, जिनमें पाषाण चित्र और पत्थर व धातु के औज़ार शामिल हैं, नदियों, घाटियों और अन्य इलाक़ों में मिले हैं। वर्तमान मध्य प्रदेश का सबसे प्रारम्भिक अस्तित्वमान राज्य अवंति था, जिसकी राजधानी उज्जैन थी। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में स्थित यह राज्य मौर्य साम्राज्य (चौथी से तीसरी शताब्दी ई. पू.) का अंग था, जो बाद में मालवा के नाम से जाना गया।&lt;br /&gt;
दूसरी शताब्दी ई. पू. से सोलहवीं शताब्दी तक मध्य प्रदेश पर पूर्वी मालवा के शासक शुंग (185 से 73 ई. पू.), आंध्र के सातवाहन, पहली या तीसरी शताब्दी ई. पू. से तीसरी शताब्दी तक, क्षत्रप दूसरी से चौथी शताब्दी तक, नाग दूसरी से चौथी शताब्दी ने राज्य किया। मध्य प्रदेश की [[नर्मदा नदी]] के उत्तर में गुप्त साम्राज्य का शासन था। यह  हूणों और कलचुरियों के सत्ता संघर्ष का स्थल रहा, बाद में मालवा पर कलचुरियों ने कुछ समय के लिए अधिकार किया। छठी शताब्दी के में उत्तरी भारत के शासक [[हर्षवर्द्धन|हर्ष]] ने मालवा पर अधिकार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
10वीं शताब्दी में कलचुरी फिर शक्तिशाली हो गए। उनके समकालीन थे - धार के परमार, ग्वालियर में कछवाहा और झाँसी से 160 किलोमीटर दक्षिण—पश्चिम में खजुराहो में चंदेल। बाद में तोमरों ने ग्वालियर और जनजातीय गोंडों ने शासन किया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Buddha-Stupas.jpg|thumb|left|[[बुद्ध]] [[स्तूप]], सांची&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha Stupa, Sanchi]]&lt;br /&gt;
11वीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण  शुरू हुए। ग्वालियर की हिन्दू रियासत को 1231 में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने [[दिल्ली]] में मिला लिया। 14वीं शताब्दी में ख़िलजी सुल्तानों ने मालवा को बरबाद किया। इसके बाद मुग़ल शासक [[अकबर]] (1556—1605) ने इसे मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मराठा शक्ति ने मालवा पर अधिकार किया और 1760 तक एक बड़ा भूभाग, जो अब मध्य प्रदेश है, मराठों के शासन में आ गया। 1761 में [[पेशवा]] की पराजय के साथ ही ग्वालियर में सिंधिया और दक्षिण—पश्चिम में इंदौर में होल्कर राजवंश का शासन स्थापित हुआ। &lt;br /&gt;
*[[इंदौर]] की रानी [[अहिल्याबाई होल्कर]], गोंड की महारानी कमलापति और [[रानी दुर्गावती]] आदि कुछ महान महिला शासकों ने अपने उत्‍कृष्‍ट शासन के लिए भारतीय इतिहास में अपना नाम स्‍वर्णाक्षरों में लिखवा लिया। &lt;br /&gt;
*मध्‍य प्रदेश की स्‍थापना 1 नवंबर, 1956 को हुई थी। &lt;br /&gt;
*नया राज्‍य [[छत्तीसगढ़]] बनाने के लिए हुए विभाजन के बाद यह अपने वर्तमान स्‍वरूप में 1 नवंबर, 2000 को अस्तित्‍व में आया। &lt;br /&gt;
*मध्‍य प्रदेश के उत्तर में [[उत्तर प्रदेश]], पूर्व में [[छत्तीसगढ़]] तथा पश्चिम में [[राजस्थान]] और [[गुजरात]], दक्षिण में [[महाराष्ट्र]] है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क्षेत्रफल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश 30, 8,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल के साथ भारत का दूसरा बड़ा राज्य है।  &lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
राज्य की कुल जनसंख्या 60,385,118 और औसत जनसंख्या घनत्व भारत के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे कम है।&lt;br /&gt;
1 मार्च 2001 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश की जनसंख्या लगभग 60,385,118 है। पिछली जनगणना की तुलना में 24.34 प्रतिशत की वृद्धि है। मध्य प्रदेश देश के राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में जनसंख्या की दृष्टि से सातवाँ स्थान रखता है। 1991 के लिंग अनुपात (प्रति हज़ार पुरुषों में महिलाओं की संख्या) 912 की अपेक्षा आजकललिंग अनुपात 920 हो गया है। &lt;br /&gt;
अधिकांश लोग हिन्दू हैं, हालाँकि मुसलमानों, जैनियों, ईसाईयों और बौद्धों की आबादी भी संख्या के हिसाब से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर सिक्ख भी जनसंख्या का छोटा सा हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
==भाषा==&lt;br /&gt;
हिन्दी राजकीय और सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। पूर्वी [[हिन्दी]], [[अवधी भाषा|अवधी]] व बघेली बोलियों का प्रतिनिधित्व करती है और बघेलखंड, सतपुड़ा व नर्मदा घाटी में बोली जाती है। बुंदेली पश्चिमी हिन्दी की बोली है और मध्य प्रदेश के मध्यवर्ती व पश्चिमोत्तर ज़िलों में बोली जाती है। भील, भीली और गोंड, गोंडी बोलते हैं। बोलने वालों की संख्या के हिसाब से दूसरी सबसे बड़ी महत्त्वपूर्ण भाषा [[मराठी भाषा|मराठी]] है। [[उर्दू भाषा|उर्दू]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[गुजराती भाषा|गुजराती]] और [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] बोलने वाले लोग भी यहाँ पर काफ़ी संख्या में हैं। इसके अलावा [[तेलुगु भाषा|तेलुगु]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[तमिल भाषा|तमिल]] और [[मलयालम भाषा|मलयालम]] भी बोली जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षा==&lt;br /&gt;
2001 की गणना के अनुसार राज्य में साक्षरता बढ़ी है। 1991 के 44.67 प्रतिशत की तुलना में साक्षरता दर बढ़कर 64.11 प्रतिशत हो गई है। यहाँ प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा के विद्यालय और साथ ही पालिटेक्निक, औद्योगिक कला तथा शिल्प विद्यालय हैं। मध्य प्रदेश में कई विश्वविद्यालय हैं। इनमें सबसे पुराने और विख्यात सागर और उज्जैन हैं। जबलपुर में एक कृषि विश्वविद्यालय भी है। भोपाल में पत्रकारिता और जन—सम्पर्क शिक्षा संस्थान भी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जलवायु==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश की जलवायु मानसून पर निर्भर करती है। ग्रीष्म ऋतु गर्म व शुष्क होती है और गर्म हवाएँ चलती हैं। राज्य का औसत तापमान 29 डिग्री से. रहता है। कुछ भागों में तापमान 48 डिग्री से. तक पहुँच जाता है। &lt;br /&gt;
सर्दियाँ खुशनुमा और शुष्क होती हैं। दिसम्बर और जनवरी में समुचित वर्षा होती है, जिसका सम्बन्ध राज्य के पश्चिमोत्तर भाग में होने वाले उष्णकटिबंधीय विक्षोभ से है। औसत वर्षिक वर्षा 1,117 मिमी होती है। सामान्यतः पश्चिम और उत्तर की ओर वर्षा की मात्रा 60 इंच, पूर्व में इससे अधिक और पश्चिम में 32 इंच तक घटती जाती है। चंबल घाटी में हर साल वर्षा का औसत 30 इंच से कम रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूसंरचना==&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश 100 से 1200 मीटर की ऊँचाई पर है। राज्य के उत्तरी भाग की भूमि उत्तर की ओर उठती है। दक्षिणी भाग पश्चिम की ओर ऊपर उठता है। पर्वत श्रृंखलाओं में पश्चिम व उत्तर में 457 मीटर तक ऊँची विंध्य व कैमूर पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में 914 मीटर से भी अधिक ऊँची [[सतपुड़ा पर्वतश्रेणी|सतपुड़ा]] व महादेव पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। दक्षिण-मध्य प्रदेश में [[पंचमढ़ी]] के समीप स्थित धूपगढ़ शिखर (1350 मीटर) राज्य का सबसे ऊँचा शिखर है। विंध्य पर्वत श्रृंखला के पश्चिमोत्तर में मालवा का पठार (लगभग 457 से 609 मीटर) है। मालवा का पठार विध्य पर्वत श्रृंखला से उत्तर की ओर है। मालवा के पठार के पूर्व में बुंदेलखंड का पठार स्थित है, जो [[उत्तर प्रदेश]] के [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान में जाकर मिल जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khajuraho-Madhya-Pradesh.jpg|[[खजुराहो]], मध्य प्रदेश&amp;lt;br /&amp;gt;  Khajuraho, Madhya Pradesh|thumb]]&lt;br /&gt;
[[राजस्थान]] और [[उत्तर प्रदेश]] के साथ मिलकर 'चंबल' राज्य की उत्तरी सीमा बनाता है। इसकी घाटी की भूमि  ऊबड़ - खाबड़ है। मध्य प्रदेश की मिट्टी को दो भागों में बाँटा जा सकता है-&lt;br /&gt;
#काली मिट्टी- यह मालवा के पठार के दक्षिणी भाग, नर्मदा घाटी और सतपुड़ा के कुछ भागों में मिलती है। इसमें चिकनी मिट्टी का कुछ अंश रहता है, भारी वर्षा या बाढ़ के पानी से सिंचाई से काली मिट्टी जलावरुद्ध हो जाती है। &lt;br /&gt;
#लाल-पीली मिट्टी- इसमें कुछ मात्रा बालू की रहती है। यह शेष मध्य प्रदेश में पाई जाती है।&lt;br /&gt;
कृषि राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था का मुख्य आधार है। राज्‍य की 74.73 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और खेती पर ही निर्भर है। राज्‍य की लगभग 49 प्रतिशत ज़मीन खेती योग्‍य है। 2004-2005 में शुद्ध बुवाई क्षेत्र 1247 लाख हेक्‍टेयर के लगभग था और अनाज का कुल उत्‍पादन 14.10 करोड़ मीट्रिक टन रहा। [[गेहूँ]], चावल, दलहन जैसी प्रमुख फ़सलों का उत्‍पादन भी अच्‍छा रहा। 20 ज़िलों में 'राष्‍ट्रीय बागवानी मिशन' क्रियान्वित किया गया है। बाग़वानी और खाद्य प्रसंस्‍करण विभाग नाम से अलग विभाग का गठन किया गया है।&lt;br /&gt;
कृषि योग्य भूमि चंबल, मालवा का पठार और रेवा के पठार में मिलती हैं। नदी द्वारा बहाकर लाई गई जलोढ़ मिट्टी से ढकी नर्मदा घाटी उपजाऊ इलाक़ा है। मध्य प्रदेश की कृषि की विशेषता कृषि की परम्परागत पद्धति का उपयोग है। कृषि योग्य भूमि का केवल 15 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, राज्य की कृषि वर्षा पर निर्भर है और बहुधा कृषकों को सूखे व लाल-पीली मिट्टी के कारण नमी की कम मात्रा का सामना करना पड़ता है। मध्य प्रदेश में होने वाली सिंचाई मुख्यतः नहरों, कुओं, गाँवों के तालाबों और झीलों से होती है। &lt;br /&gt;
प्रमुख फ़सलें चावल, गेहूँ, ज्वार, दलहन (चना, सेम और मसूर जैसी फलियाँ) और [[मूँगफली]] हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में मुख्यतः चावल उगाया जाता है। पश्चिमी मध्य प्रदेश में गेहूँ और ज्वार अधिक होता है। अन्य फ़सलों में अलसी, तिल, गन्ना और पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला ज्वार-बाजरा प्रमुख है। राज्य अफ़ीम, मंदसौर ज़िले में और मारिजुआना, दक्षिणी-पश्चिमी खांडवा ज़िले में, का उत्पादक राज्य है। &lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश में पशु पालन और कुक्कुट पालन महत्त्वपूर्ण हैं। देश के कुल पशुधन (गाय, भैंस और भेड़ और सूअर) का लगभग सातवां भाग इस राज्य में है। &lt;br /&gt;
==वन संपदा==&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश  के कुछ ही प्रतिशत हिस्से में स्थायी चारागाह या घास के मैदान हैं। प्रमुख वन क्षेत्रों में विंध्य पर्वत श्रृंखला, [[कैमूर पहाड़ियाँ|कैमूर की पहाड़ियाँ]], सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला, बघेलखंड का पठार और दंडकारण्य क्षेत्र शामिल है। महत्त्वपूर्ण वृक्ष सागौन, साल, बाँस, सलाई एवं तेंदूपत्ता हैं। सलाई से निकलने वाला लीसा अगरबत्ती और औषधि बनाने के काम आता है। तेंदू के पत्ते बीड़ी बनाने के काम आते हैं, जिसके प्रसिद्ध केन्द्र जबलपुर और सागर हैं। &lt;br /&gt;
जंगलों में जंगली पशु भरे पड़े हैं। जैसे बाघ, तेंदुआ, जंगली साँड़, [[चीतल]], भालू, जंगली भैंसा, सांभर और काला हिरन। पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियाँ यहाँ पर हैं। &lt;br /&gt;
==राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-1.jpg|[[नर्मदा नदी]]&amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River|thumb]]&lt;br /&gt;
राज्य में अनेक राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्य है।&lt;br /&gt;
#[[कान्हा राष्ट्रीय उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[माधव नेशनल उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[पन्‍ना नेशनल उद्यान]]&lt;br /&gt;
#[[करेरा पक्षी अभयारण्‍य]]&lt;br /&gt;
#[[बोरी वन्‍य जीवन अभयारण्‍य]]&lt;br /&gt;
#[[चंबल अभयारण्य]]&lt;br /&gt;
*वनों की सुरक्षा और विकास के लिए, राज्य सरकार ने बहुत सी वन समितियाँ आसपास के ग्रामीणों को साझेदारों के तौर पर जोड़ने के लिए गठित की है। &lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश ने इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, दूरसंचार, मोटरवाहनों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि उच्‍च तकनीकी उद्योगों के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। दूरसंचार प्रणालियों के लिए यह राज्‍य ऑप्टिकल फाइबर का उत्‍पादन कर रहा है। इंदौर के पास पीठमपुर में बडी संख्‍या में मोटर वाहन उद्योग स्‍थापित हुए है। राज्‍य में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उद्योग है - [[भोपाल]] में 'भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्‍स लि.', [[होशंगाबाद]] में 'सिक्‍योरिटी पेपर मिल', [[देवास]] में नोट छापने की प्रेस, [[नेपानगर]] में अख़बारी [[काग़ज़]] की मिल और [[नीमच]] की अल्‍कालॉयड फैक्‍ट्री।&lt;br /&gt;
*गत वर्ष राज्‍य में सीमेंट का उत्‍पादन 12.49 लाख मीट्रिक टन हुआ। &lt;br /&gt;
*पीठमपुर में जल्‍दी ही एक मालवाहक विमान परिसर स्‍थापित किया जा रहा है। &lt;br /&gt;
*भारत सरकार इंदौर में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्‍थापित कर रही है। समग्र आर्थिक विकास नीति लागू कर प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्‍साहित किया जा रहा है। राज्‍य ने निवेश को आकर्षित करने के लिए आकर्षक छूट देने के लिए औद्योगिक प्रोत्‍सा‍हन नीति की घोषणा की है। अब तक उद्योग लगाने की इच्‍छा जाहिर करने वाले 5200 करोड रुपये के निवेश प्रस्‍ताव प्राप्‍त हुए है। &lt;br /&gt;
*सागर ज़िले के [[बीना]] में काफ़ी समय से लंबित 10,300 करोड़ रुपये की लागत वाली ओमान बीना तेलशोधक परियोजना तैयार है। &lt;br /&gt;
*भारत सरकार ने धार ज़िले के पीठमपुर में एक राष्‍ट्रीय ऑटोमोटिव परीक्षण, अनुसंधान तथा विकास परियोजना को मंजूरी दे दी है।&lt;br /&gt;
*राज्‍य सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक नई सूचना प्रौद्योगिकी नीति लागू की है।&lt;br /&gt;
खनिज उत्‍पादन के क्षेत्र में राज्‍य का विशिष्‍ट स्‍थान है। वर्ष 2005-06 में 5312.65 करोड़ रुपये के खनिजों का उत्‍पादन हुआ। राज्‍य में 21 तरह के खनिज निकाले जाते हैं। 2006 में डोलोमाइट का उत्‍पादन 128 हज़ार मीट्रिक टन, हीरे का उत्‍पादन 44149 हज़ार कैरेट और चूना पत्‍थर का 25865 हज़ार मीट्रिक टन, बॉक्‍साइट का उत्‍पादन 87 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन, ताम्र अयस्‍क का उत्‍पादन 1706 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन और कोयले का उत्‍पादन 54000 हज़ार मिलियन मीट्रिक टन रहा। यह राज्‍य चंदेरी और माहेश्‍वर के पारंपरिक हस्‍तशिल्‍प और हथकरघे से बने कपड़ों के लिए प्रसिद्ध है। मध्यप्रदेश के मंदसौर ज़िले में अवस्थित [[हिंगलाजगढ़]] परमार मूर्तिकला के विशिष्ट केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gwalior-Fort-Gwalior.jpg|[[ग्वालियर का क़िला]], [[ग्वालियर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gwalior Fort, Gwalior|thumb]]&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश में कुछ महत्त्वपूर्ण नदियों का उद्गम होता है- &lt;br /&gt;
#[[नर्मदा नदी|नर्मदा]], &lt;br /&gt;
#[[ताप्ती नदी|ताप्ती]] (तापी), &lt;br /&gt;
#[[महानदी|महानदी]] और &lt;br /&gt;
#[[वेनगंगा नदी|वेनगंगा]] ([[गोदावरी नदी|गोदावरी]] की सहायक नदी), &lt;br /&gt;
#बहुत सी जलधाराएँ [[यमुना नदी|यमुना]] और [[गंगा नदी|गंगा]] की सहायक नदियों के रूप में उत्तर की ओर बहती हैं। &lt;br /&gt;
#अन्य नदियों में यमुना की सहायक नदियाँ—[[बनास नदी|बनास]], [[बेतवा नदी|बेतवा]] व [[केन नदी|केन]] और [[सोन नदी|सोन]] (गंगा की सहायक नदी) आती हैं। &lt;br /&gt;
2004-2005 में कुल 61.9 लाख हेक्‍टेयर इलाके में सिंचाई सुविधा उपलब्‍ध थी। सिंचाई सुविधाओं में 39 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक वृद्धि का लक्ष्‍य है। 30 ज़िलों की विद्यमान सिंचाई प्रणालियों का नवीकरण करके 5 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं की फिर से बहाली के लिए 1919 करोड़ रुपये की जल क्षेत्र पुनर्निर्माण परियोजना पर काम चल रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश में निम्‍न स्‍तर का कोयला प्रचुर मात्रा में होता है, जो बिजली उत्‍पादन के अनुकूल है। पनबिजली उत्‍पादन की भी यहाँ अपार क्षमता है। यहाँ राज्‍य में वर्ष 2005-2006 में विद्युत उत्‍पादन की कुल स्‍थापित क्षमता 7934.85 मेगावाट थी। यहाँ 902.5 मेगावाट बिजली उत्‍पादन क्षमता के आठ पनबिजली केंद्र है। राज्‍य के 51,806 में से 50,475 गांवों में बिजली पहुंच चुकी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विकास की पहल==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश ग्रामीण रोजगार योजना 18 ज़िलों में लागू की गई है। इस योजना को लागू करने में मध्‍य प्रदेश प्रथम पर है। राज्‍य बाग़वानी उत्‍पादन और उत्‍पादकता को बढ़ाने के लिए राष्‍ट्रीय बाग़वानी मिशन शुरू किया गया है।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pachmarhi-Lake.jpg|पचमढ़ी की झील&amp;lt;br /&amp;gt; Pachmarhi Lake|thumb]]&lt;br /&gt;
'''सड़कें''' मध्‍य प्रदेश में सड़कों की कुल लंबाई 73311 किलोमीटर है। राष्‍ट्रीय राजमार्गो की लंबाई 4280 कि.मी और प्रांतीय राजमार्गो की लंबाई 8729 कि.मी. है। राज्‍य में सड़कों के निर्माण तथा सुधार का कार्य बडे पैमाने पर किया जा रहा है तथा लगभग 60 हज़ार कि.मी. सड़कों का निर्माण तथा सुधार का कार्य किया जाएगा। वर्ष 2005 को ‘सडकों का वर्ष’ के रूप में मनाया गया। इस दौरान प्रत्‍येक माह एक महत्‍वपूर्ण सड़क का निर्माण कार्य पूरा किया गया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रेलवे''' उत्‍तर भारत को दक्षिण भारत से जोडने वाला प्रमुख रेलमार्ग मध्‍य प्रदेश से होकर गुजरता हैं। राज्‍य में [[भोपाल]], [[बीना]], [[ग्वालियर]], [[इंदौर]], [[इटारसी]], [[जबलपुर]], [[कटनी]], [[रतलाम]] और [[उज्जैन]] मुख्‍य जंक्‍शन है। रेलवे के क्षेत्रीय मुख्‍यालय भोपाल, रतलाम और [[जबलपुर]] में है। राज्य से गुज़रने वाला प्रमुख रेलमार्ग मूलतः चेन्नई , मुंबई, और कोलकाता बंदरगाहों को राज्य के भीतरी प्रदेश से जोड़ने के लिए बनाया गया था। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वायुमार्ग'''&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश राज्य भारत के अन्य भागों से भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, रीवा और खजुराहो में स्थित हवाई अड्डों व बहुत से राष्ट्रीय राजमार्गों द्वारा भी जुड़ा हुआ है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्‍योहार==&lt;br /&gt;
मध्‍य प्रदेश में कई त्‍योहार और उत्‍सव मनाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
*आदिवासियों का एक महत्‍वपूर्ण त्‍योहार 'भगोरिया' है, जो पंरपरागत हर्षोल्‍लास से मनाया जाता है। &lt;br /&gt;
*खजुराहो, भोजपुर, [[पंचमढ़ी]] और उज्जैन में शिवरात्रि के पर्व के दौरान स्‍थानीय परंपराओं का रंग दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*[[चित्रकूट]] और [[ओरछा]] में रामनवमी पर्व के आयोजन की अनोखी परंपरा है। ओरछा, मालवा और पचमढ़ी के उत्‍सवों में कला और संस्‍कृति का बडा सुंदर मेल दिखाई देता है। &lt;br /&gt;
*[[ग्वालियर]] के 'तानसेन संगीत समारोह', मैहर के 'उस्‍ताद अलाउद्दीन ख़ाँ संगीत समारोह', उज्जैन के 'कालिदास समारोह' और 'खजुराहों के नृत्‍य समारोह' मध्‍य प्रदेश के कुछ प्रसिद्ध कला उत्‍सव हैं। &lt;br /&gt;
*जबलपुर में संगमरमर की चट्टानों के लिए मशहूर [[भेड़ाघाट]] में इस वर्ष से वार्षिक 'नर्मदा उत्‍सव' की शुरूआत की गई है। *शिवपुरी में इस वर्ष से शिवपुरी उत्‍सव शुरू किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्‍थल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Madhya-Pradesh-Map-1.jpg|thumb|मध्य प्रदेश का मानचित्र&amp;lt;br /&amp;gt; Map of Madhya Pradesh]]&lt;br /&gt;
#[[पचमढ़ी]] का अद्भुत सौंदर्य, मध्य प्रदेश का एकमात्र हिल स्टेशन है।&lt;br /&gt;
#भेडाघाट की चमचमाती संगमरमरी चट्टाने और धुआंधार जलप्रपातों का शोर, &lt;br /&gt;
#कान्‍हा राष्‍ट्रीय उद्यान, जहां अनूठे बारसिंगे रहते हैं, &lt;br /&gt;
#बांधवगढ़ राष्‍ट्रीय उद्यान जहां प्रागैतिहासिक गुफाएं और वन्‍य जीवन है। &lt;br /&gt;
ये सब राज्‍य के प्रमुख आकर्षण हैं। ग्वालियर, [[मांडू मध्यप्रदेश|मांडू]], दतिया, चंदेरी, जबलपुर, ओरछा, रायसेन, सांची, विदिशा, उदयगिरि, भीमबेटका, इंदौर और भोपाल ऐतिहासिक महत्‍व के स्‍थल हैं। माहेश्‍वर, ओंकारेश्‍वर, उज्जैन, चित्रकूट और [[अमरकंटक]] ऐसे स्‍थान हैं, जहां आकर तीर्थयात्रियों के मन को शांति मिलती है। खजुराहो के मंदिर विश्‍व में अनूठे हैं। इसके अलावा ओरछा, [[भोजपुर मध्य प्रदेश|भोजपुर]] और उदयपुर के मंदिर इतिहास में रूचि रखने वाले लोगों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। सतना, सांची, [[विदिशा]], ग्वालियर, इंदौर, मंदसौर, उज्जैन, राजगढ़, भोपाल, जबलपुर, रीवां और अन्‍य अनेक स्‍थानों के संग्रहालयों में पुरातत्‍वीय महत्‍व के भंडारों को संरक्षित रखा गया है। माहेश्‍वर, [[ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग|ओंकारेश्‍वर]] तथा अमरकंटक को उनके धार्मिक महत्‍व के अनुसार समग्र विकास के लिए पवित्र शहर घोषित किया गया है। बुरहानपुर को नए पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;नरवर&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|नरवर}}&lt;br /&gt;
यह ऐतिहासिक नगर [[मध्य प्रदेश]] के [[ग्वालियर]] के समीप है। [[महाभारत]] में वर्णित यह नगर राजा [[नल]] की राजधानी बताया गया है। 12वीं शताब्दी तक इस नगर को नलपुर कहा जाता था। यहाँ स्थित क़िला जो [[विंध्य पर्वतमाला|विंध्य पर्वतश्रेणी]] की एक खड़ी चट्टान पर स्थित है, मध्यकालीन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।&lt;br /&gt;
==जोगीमारा गुफ़ाएं==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|जोगीमारा गुफ़ाएं}}&lt;br /&gt;
*मध्य प्रदेश की पूर्व रियासत सरगुजा में लक्ष्मणपुर से 12 मील की दूरी पर रामगढ़ की पहाड़ी में जोगीमारा नामक शैलकृत गुफ़ाएँ हैं। &lt;br /&gt;
*जिनमें 300 ई,पू. के कुछ रंगीन भित्तिचित्र यहाँ विद्यमान हैं। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-7.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-4.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-5.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-1.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-2.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-3.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-Temple-Madhya-Pradesh-6.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
चित्र:Khajuraho-15.jpg|[[खजुराहो|खजुराहो मन्दिर]], मध्य प्रदेश&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [http://www.mp.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के नगर}}{{मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__ __INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>दशार्ण नदी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;दशार्ण की पहचान आधुनिक &amp;quot;धसन' नामक नदी से की जाती है, जो [[भोपाल]] से प्रवाहित होती हुई बेतवा ( वेत्रवती ) नदी में गिरती है । [[मार्कण्डेय पुराण]] में, दशार्ण देश के नाम की उत्पत्ति का कारण, दशार्णा नदी को ही बतलाया गया है, जो इस क्षेत्र से होकर प्रवाहित होती है । [[वायु पुराण]] में इस नदी के बारे में कहा गया है कि इसका उद्गम स्थल पर्वत है । प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता एस0 एम0 अली ने पुराणों के आधार पर विंध्यक्षेत्र के तीन जनपदों - विदिशा, दशार्ण एवं करुष का सोन-केन से समीकरण किया है । इसी प्रकार त्रिपुरी लगभग ऊपरी नर्मदा की घाटी तथा जबलपुर, मंडला तथा नरसिंहपुर ज़िलों के कुछ भागों का प्रदेश माना है. इतिहासकार जयचंद्र विद्यालंकार ने ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टियों को संतुलित करते हुए बुंदेलखंड को कुछ रेखाओं में समेटने का प्रयत्न किया है, विंध्यमेखला का तीसरा प्रखंड बुंदेलखंड है जिसमें [[बेतवा]] ( वेत्रवती ), धसान (दशार्ण) और [[केन नदी|केन]] (शुक्तिगती) के काँठे, [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] की ऊपरली घाटी और पचमढ़ी से [[अमरकंटक]] तक ॠक्ष पर्वत का हिस्सा सम्मिलित है। उसकी पूरबी सीमा टोंस (तमसा) नदी है।&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>बुंदेलखंड</title>
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		<updated>2011-04-07T05:47:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Orchha-Fort-Bundelkhand.jpg|thumb|300px|[[ओरछा क़िला]], बुंदेलखंड&amp;lt;br /&amp;gt; Orchha Fort, Bundelkhand]]&lt;br /&gt;
बुंदेलखंड [[उत्तर प्रदेश]] के दक्षिण और [[मध्य प्रदेश]] के पूर्वोत्तर में स्थित है। यह एक पहाड़ी इलाका है, जिसमें पूर्व स्वातंत्रय युग में अनेक छोटी बड़ी इमारतें थी। बुंदेलखंड का अधिकांश भूभाग अब उत्तर प्रदेश में है, किन्तु कुछ भाग मध्यप्रदेश में भी मिला है।&lt;br /&gt;
यह उस भूखण्ड का नाम है, जिसके उत्तर में [[यमुना नदी|यमुना]] और दक्षिण में [[विन्ध्याचल पर्वत|विन्ध्य पर्वत श्रृंखला]], पूर्व में [[बेतवा नदी|बेतवा]] और पश्चिम में [[टौंस नदी|टौंस]] अथवा [[तमसा नदी]] स्थित है। &lt;br /&gt;
एक कवि ने अपनी कविता में बुंदेलखंड का परिचय इस प्रकार दिया है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;खजुराहो, देवगढ़ का दुनिया भर में बखान ।&lt;br /&gt;
पत्थर की मूर्तियों को मानो निल गए प्रान।।&lt;br /&gt;
चन्देरी, ग्वालियर की ऐतिहासिक कीर्ति-छटा।&lt;br /&gt;
तीर्थ [[अमरकंटक]], चित्रकूट, बालाजी महान।।&lt;br /&gt;
सोनागिरि, पावा गिरि, पपौरा के धर्म-स्थल।&lt;br /&gt;
अपने धर्म-संस्कृति पर हमको भारी घमंड।।&lt;br /&gt;
जय जय भारत अखंड जय बुंदेलखंड ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
बुंदेलों का पूर्वज [[पंचम बुंदेला]] था। बुंदेलखंड बुंदेल राजपूतों के नाम पर प्रसिद्ध है जिनके राज्य की स्थापना 14वीं शती में हुई थी। इससे पूर्व यह प्रदेश 'जुझौती' अथवा 'जजाकभुक्ति' नाम से जाना जाता था और [[चंदेल वंश|चन्देलों]] द्वारा नवीं से चौदहवीं शताब्दी तक शासित होता रहा। श्री गोरेलाल तिवारी का मत है कि बुंदेलखंड नाम 'विंध्येलखंड' का अपभ्रंश है। राज्य के प्रमुख नगर थे- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''महोबा-ज़िला हमीरपुर तथा कालंजर'''  कालंजर में राज्य की सुरक्षा के लिए एक मजबूत क़िला था। [[शेरशाह सूरी|शेरशाह]] इस क़िले की घेराबन्दी के समय 1545 ई. के समय यहीं मारा गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बाँदा ज़िला'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुंदेली माटी में जन्‍मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम ख़ूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। [[आल्हाखण्ड|आल्हा-ऊदल]], [[ईसुरी]], [[पद्माकर|कवि पद्माकर]], [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], डॉ. हरिसिंह गौर आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से संबद्ध हैं। अनेक इतिहास पुरुषों और आल्हा की बाबन लड़ाईयाँ बुंदेलखंड का प्रमाण हैं। यहाँ के वीर योद्धा बुन्देला कहलाए। बुन्देली यहाँ की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना की बोली रही है। यहाँ के लोग बुन्देली बोली बोलने के कारण ही बुन्देला कहलाए। बुन्देलखण्ड के रुपायन का गहरा सम्बन्ध महाराजा छत्रसाल के महत्त्वपूर्ण स्थान [[जेजाकभुक्ति]] से  है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मध्यकाल से पहले बुंदेलखंड शब्द इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। आधुनिक युग में ही इसके अन्य नाम और उनके उपयोग हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में  बुंदेलखंड का इतिहास महाराज रायबहादुर सिंह ने लिखा था। इसमे बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि &amp;quot;[[कृष्ण]]&amp;quot; तथा दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड का इतिहास लिखा परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बुंदेलखंड का इतिहास|बुंदेलखंड का क्रमवार इतिहास]]:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड पौराणिक इतिहास|पौराणिक इतिहास]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड मौर्यकाल |मौर्यकाल]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड वाकाटक और गुप्तशासन|वाकाटक और गुप्तशासन]] &lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड कलचुरियों का शासन|कलचुरियों का शासन]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड चन्देलों का शासन|चन्देलों का शासन]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड बुंदेलों का शासन|बुंदेलों का शासन]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड ओरछा के बुंदेला|ओरछा के बुंदेला]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड मराठों का शासन|मराठों का शासन]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड राजविद्रोह|बुंदेलखंड में राजविद्रोह]]&lt;br /&gt;
*[[बुंदेलखंड अंग्रेज़ी राज्य में विलयन|अंग्रेज़ी राज्य में विलयन]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्योग और व्यापार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Nrisinghdev-palace-Bundelkhand.jpg|thumb|300px|[[नृसिंहदेव पैलेस]], बुंदेलखंड&amp;lt;br /&amp;gt;Nrisinghdev Palace, Bundelkhand]]&lt;br /&gt;
दस्तकारी के लिए बुंदेलखंड की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। [[चंदेरी]] के कपड़े और ज़री के काम के लिए, गऊ कपड़े बुनने के लिए तथा [[दतिया]], [[ओरछा]], [[पन्ना]] और [[छतरपुर]] मिट्टी के बर्तन तथा लकड़ी और पत्थर के काम के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ कोरियों के द्वारा जाजम, दरी, कालीन, लोहारों के द्वारा बन्दूक के कुन्दे और नाल, गड़रियों के द्वारा कंबल तथा बजीरों के द्वारा चटाईयाँ, बच्चों के लेटने के लिए चँगेला, टोकनियाँ, चुलिया-टिपारे और पँखे आदि बड़ी कुशलता से बनाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अवधारणा के अनुसार==&lt;br /&gt;
एक प्रचलित अवधारणा के अनुसार वह क्षेत्र जो उत्तर में [[यमुना नदी|यमुना]], दक्षिण में विन्ध्य प्लेटों की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में [[चम्बल नदी|चम्बल]] और दक्षिण पूर्व में [[पन्ना]], और [[आज़मगढ़]] श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुन्देलखण्ड के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*इसमें उत्तर प्रदेश के चार ज़िले- [[जालौन]], [[झाँसी]], [[हमीरपुर]] और [[बांदा]]  &lt;br /&gt;
*मध्यप्रेदश के चार ज़िले- [[दतिया]], [[टीकमगढ़]], [[छत्तरपुर]] और [[पन्ना]] &lt;br /&gt;
के अलावा उत्तर-पश्चिम में चम्बल नदी तक प्रसरित विस्तृत प्रदेश के नाम था। [[कनिंघम]] ने &amp;quot;बुन्देलखण्ड के विस्तार के समय इसमें [[गंगा नदी|गंगा]] और यमुना का समस्त दक्षिणी प्रदेश जो पश्चिम में [[बेतवा नदी]] से पूर्व में चन्देरी और [[सागर]] के ज़िलों सहित [[विन्ध्यवासिनी देवी]] के मन्दिर तक तथा दक्षिण में [[नर्मदा नदी]] के मुहाने के निकट बिल्हारी तक प्रसरित था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संस्कृति==&lt;br /&gt;
बुंदेली संस्कृति के रंग अत्यधिक समृद्ध और विविधवर्णी है। डॉ. नर्मदाप्रसाद गुप्त के द्वारा लिखा गया है कि यहाँ की लोक संस्कृति पुलिंद, निषाद शबर, रामठ, दाँगी आदि आर्येतर संस्कृतियों के द्वारा प्रभावित थी। आर्य ॠषियों की आश्रमी संस्कृति [[रामायण]] काल में फली-फूली थी। और वन्य संस्कृति [[महाभारत]] काल में भी बनी रही थी। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति की नींव नाग वाकाटक काल में रखी गई थी। लोक संस्कृति और लोक कलाओं को इस काल में जितना निखार और उत्कर्ष प्राप्त हुआ है, उतना इन सात-आठ सौ वर्षों में कभी नहीं दिखाई दिया है। बुंदेली लोक संस्कृति और लोक कलाओं की धारा इन समस्त परिवर्तनों और परिवर्द्धनों में भी अजस्त्र रूप से बहती रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुंदेलखंड शौर्य, साहस और श्रृंगार के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध अंचल है। [[भारत]] के मध्य भाग में स्थित होने के कारण यहाँ की भूमि पर अनेक जातियों- जनजातियों का  हमेशा से आवागमन रहा है। यहाँ अनेक संस्कृतियाँ आती जाती रही है, इसके कारण बुंदेलखंड की संस्कृति में कई जातियों की संस्कृति के बहुत से तत्त्व मिलते हैं, जिनमे योद्धा जातियों- जनजातियों के लोगों की संस्कृतियों का आवागमन अधिक रहा है। इसके कारण यहाँ के लोगों में शौर्य और साहस जैसी प्रवृत्तियों का विकास हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''खजुराहो के कला मन्दिर''' इन मंदिरों में बुंदेलखंड की ही नहीं, विश्व की अप्रतिम धरोहर हैं। [[खजुराहो]] के मन्दिर में एक तरफ़ [[नृत्य कला|नृत्य]], [[संगीत]] और उत्सव आयोजन के दृश्य उत्कीर्ण किये जाते हैं तो दूसरी तरफ़ आखेट, हस्ति युद्ध आदि के दृश्य उत्कीर्ण किये जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''राजशेखर ने काव्य मीमांसा में''' बुंदेलखंड के नर्तक, गायक, वादक, चारण, चितेरे, विट, वेश्या, इन्द्रजालिक के अतिरिक्त हाथ के तालों पर नाचने वाले, तैराक, रस्सों पर नाचने वाले, दाँतों से खेल दिखाने वाले, पहलवान, पटेबाज और मदारियों का उल्लेख किया है। &lt;br /&gt;
पूरे बुंदेलखंड में उत्सव-महोत्सव मनाने की प्रथा चली आ रही है। इसका उल्लेख [[अलबेरूनी|अलबरुनी]] ने किया है-&lt;br /&gt;
*चैत की एकादशी को झूले का दिन &lt;br /&gt;
*पूर्णिमा को वसन्तोत्सव &lt;br /&gt;
*आश्विन पूर्णिमा को पशुओं का त्योहार और कुश्तियों का आयोजन &lt;br /&gt;
*कार्तिक प्रतिपदा को [[दीपावली]] का उत्सव तथा &lt;br /&gt;
*फाल्गुन पूर्णिमा में स्त्रियों का दोलोत्सव एवं [[होली]], आदि मनाये जाते हैं, और यह सब बुंदेलखंड की भूमि पर आज भी सहज उपलब्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बुंदेलखंड का भोजन, पेय व वस्त्राभरण'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महुआ और बेर बुंदेलखंड के लोगों का सबसे प्रिय भोजन है। ये दोनों वृक्ष इस जगह के लोकप्रिय वृक्ष हैं। यहाँ महुआ को मेवा, बेर को कलेवा (नास्ता) और गुलचुल का सबसे बढ़िया मिष्ठान माना जाता है, जैसा कि इस पंक्ति से स्पष्ट होता है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मउआ मेवा बेर कलेवा गुलचुल बड़ी मिठाई।&lt;br /&gt;
इतनी चीजें चाहो तो गुड़ाने करो सगाई।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''लटा''' मछुओं को भूनकर और उसके बाद कूट कर उनमें गरी, चिरौंजी आदि मेवा मिला कर छोटी- छोटी कुचैया की तरह बनाया जाता है, यह इस जगह का विशेष भोजन रहा है। यहाँ के लोग बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए इसी भोजन को परोसते थे। यहाँ के लोगों की एक कहावत अधिक प्रचलित हैं कि '''खानें को मउआ, पैरबै में अमोआ''' इस बात का संकेत देती है कि स्थानीय लोगों में मउआ और अमोआ दोनों काफ़ी लोकप्रिय रहा है। भोजन के संबंध में अनेक लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं:-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;चैत मीठी चीमरी बैसाख मीठो मठा&lt;br /&gt;
	जेठ मीठी डोबरी असाढ़ मीठे लठा।&lt;br /&gt;
	सावन मीठी खीर- खँड़ यादों भुजें चना,&lt;br /&gt;
	क्वाँर मीठी कोकरी ल्याब कोरी टोर के।&lt;br /&gt;
	कातिक मीठी कूदई दही डारो मारे कों।&lt;br /&gt;
	अगहन खाव जूनरी मुरी नीबू जोर कें।&lt;br /&gt;
	पूस मीठी खिचरी गुर डारो फोर कों।&lt;br /&gt;
	मोंव मीठी मीठे पोड़ा बेर फागुन होरा बालें।&lt;br /&gt;
	समै- समै की मीठी चीजें सुगर खबैया खावें।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
बुंदेलखंडवासियों में हर मौसम में अलग भोजन खाने का प्रचलन था। ये लोग भोजन खाने में कभी- कभी काफ़ी सावधानी से काम लेते हैं। बुंदेलखंड के लोगों में बेर का बहुत ही विशेष महत्त्व था। यहाँ की एक कहावत है &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मुखें बेर, अघाने पोंड़ा'''  ये लोग भोजन खाने से पहले बेर ज़रूर खाते थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कनी उर भाला की अनी''' यहाँ के लोगों का मानना था कि कच्चे चावल की नोंक भाले की नोंक के बराबर हानिकारक होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुंदेलखंड के लोगों के भोजन का प्रभाव लोक संस्कृति पर दिखाई देता था। इसलिए वह लोग यह मानते थे कि जैसा भोजन किया जाएगा, वैसा ही मन होगा। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;जैसो अनजल खाइये, तैसोई मन होये।&lt;br /&gt;
	जैसो पानी पीजिए, तैसी बानी होय।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''टेसू और सांझी का खेल'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बच्चों को कैसे कलात्मक गतिविधियों द्वारा संस्कारित करना है, यह लोक समुदाय अच्छी तरह समझता था। शायद तभी कुछ ऐसे अवसर जुटाये गये जिनसे बालक बालिकाओं को अपनी परम्पओं का ज्ञान हो सके। ऐसे ही दो अवसर हैं सांझी और टेसू के खेल। वैसे तो यह दोनों खेल अधिकांश उत्तर भारत में लोकप्रिय है परन्तु बुंदेलखंड में इनकी अपनी ही छटा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''टेसू और सांझी की कहानी'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहुत साल पहले जंगल के किनारे गाँव में एक ब्राह्मण अपनी पुत्री के साथ रहता था। उस जंगल में एक राक्षस भी रहता था। ब्राह्मण की रुपवान कन्या को राक्षस ने देख लिया और उस पर मोहित हो गया। उसने लड़की से उसका परिचय लिया और उसके पिता से मिलने की इच्छा प्रकट की ब्राह्मण बहुत घबराया उसने सोचा यह राक्षस मना करने पर भी मानने वाला नहीं है। इससे उसने राक्षस से कहा कि विवाह तो हो जायेगा। परन्तु कुछ रस्में पूरी करनी पड़ेगी इसलिये कुछ दिन का समय लगेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन दिनों ब्राह्मण की लड़की जो खेल गोबर की थपलियों से खेली वह सांझी या चन्दा तरैयाँ कहलाया और तभी से सांझी खेलने की परम्परा का आरंभ हुआ। क्वार माह के यह सोलह दिन सोलह श्राद्ध के दिन माने जाते हैं। और सोलह दिन बीतने पर राक्षस आया परन्तु ब्राह्मण के परिवार वाले नहीं पहुँचे। उसने फिर बहाना बनाया कि अब उसकी लड़की नौ दिन मिट्टी के गौर बनाकर खेलेगी। राक्षस नौ दिन बाद फिर वापिस आने की कह कर चला गया। तभी से यह नौ दिन नौरता कहलाये और इन दिनों सुअटा खेलने की प्रथा शुरू हुई। नौ दिन भी खत्म हो गये, ब्राह्मण ने उससे कहा अब पाँच दिन तुम और मेरी बेटी घर-घर भीख माँगोगे तब शरद पूर्णिमा के दिन तुम्हारी शादी हो सकेगी, राक्षस इस बात के लिये भी मान गया और तभी से दशहरे से पूर्णिमा तक उस राक्षस के नाम पर टेसू और ब्राह्मण की लड़की के नाम पर सांझी माँगने की प्रथा का आरंभ हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार जब भीख माँगते पाँच दिन बीत गये और ब्राह्मण के परिवार के लोग नहीं आये तो ब्राह्मण को कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया। शरद पूर्णिमा के दिन उसने विवाह निश्चित कर दिया। लेकिन विवाह के साढ़े तीन फेरे ही पड़े थे कि ब्राह्मण के परिवार के लोग आ गये और उन्होंने उस राक्षस को मार डाला। उनकी लड़की का आधा विवाह राक्षस से हो चुका था, इसलिये उसे भ्रष्ट मान कर उन्होंने उसे भी मार डाला इसलिये टेसू और सांझी का पूरा विवाह नहीं होने दिया जाता है। उन्हें बीच में फोड़ दिया जाता है। ब्राह्मण के भाइयों ने सोचा न उनका छोटा भाई घर छोड़ कर भागता और न हीं उनके कुल को इस प्रकार दाग़ लगता इसलिये उन्होंने उस ब्राह्मण को भी मार डाला। इसीलिये नौरता में मिट्टी के गौर बनाकर खेला जाने वाला सुआटा, टेसू के विवाह के बाद उस ब्राह्मण पिता के प्रतीक सुअटा के रूप में फोड़ दिया जाता है।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! टेसू का गीत&lt;br /&gt;
! सांझी का गीत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| &amp;lt;poem&amp;gt;टेसू भैया बड़े कसाई&lt;br /&gt;
आँख फोड़ बन्दूक चलाई&lt;br /&gt;
सब बच्चन से भीख मँगाई&lt;br /&gt;
दोनों मर गए लोग लुगाई।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
| &amp;lt;poem&amp;gt;मेरी सांझी भोग ले भोग ले&lt;br /&gt;
और की सांझी लोय ले लोग ले&lt;br /&gt;
मेरी सांझी पलका लोटे लोटे&lt;br /&gt;
और की सांझी घूरो लेटे लेटे&lt;br /&gt;
मेरी सांझी पान खाये पान खाये&lt;br /&gt;
और की सांझी कुत्ता को कान खाये&lt;br /&gt;
मेरी सांझी पलका लोटे&lt;br /&gt;
और की सांझी टाट ओढ़े।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बुन्देलखण्ड की महिमा== &lt;br /&gt;
इस कविता के द्वारा बुंदेलखंड की महिमा इस प्रकार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;यह बुन्देलखण्ड की धरती है, हीरे उपजाया करती है।&lt;br /&gt;
कालिन्दी शशिमुख की वेणी, चम्बल, सोन खनकते कंगना।&lt;br /&gt;
विन्ध्य उरोज साल बन अंचल, निर्मल हँसी दूधिया झरना।&lt;br /&gt;
केन, धसान रजत कर धौनी, वेत्रवती साड़ी की सिकुड़न।&lt;br /&gt;
धूप छांह की मनहर अंगिया, खजुराहो विलास गृह उपवन।&lt;br /&gt;
पहिन मुखर नर्मदा पैंजनी, पग-पग शर्माया करती है।&lt;br /&gt;
यह बुन्देलखण्ड की धरती, हीरे उपजाया करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमानन्द दिया ही इसने, यहीं राष्ट्रकवि हमने पाया।&lt;br /&gt;
इसी भूमि से चल तुलसी ने, धर-धर सीताराम रमाया।&lt;br /&gt;
चित्रकूट देवगढ़ यहीं पर, पावन तीर्थ प्रकृति रंगशाला।&lt;br /&gt;
झांसी के रण-बीचि यहीं पर, धधकी प्रथम क्रान्ति की ज्वाला।&lt;br /&gt;
पीछें रहकर यह स्वदेश को, नेता दे जाया करती है।&lt;br /&gt;
यह बुन्देलखण्ड की धरती, हीरे उपजाया करती है।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बुंदेलखंड की कला==&lt;br /&gt;
हमें आज भी बुंदेलखंड के बीते वैभव की झलक उक्त भूमि पर छिटकी हुई पाषाण काल से प्राप्त होती है। इस कला ने बुंदेलखंड की भूमि पर कितना आदर पाया और इस कला का यहाँ कितना विकास हुआ, यह बात पुरातत्व-विशेषज्ञों से छिपी हुई नहीं है। बुंदेलखंड से प्रागैतिहासिक काल कि आदिवासियों द्वारा पूजी जाने वाली मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इनका मूल्य कला की दृष्टि से अधिक नहीं है, किंतु मूर्तिकला के आदि रूप का इनसे अच्छा ज्ञान प्राप्त होता है। ये मूर्तियाँ बहुत मायने रखती हैं और अमूल्य हैं।&lt;br /&gt;
बुंदेलखंड के अन्य स्थानों में पक्के रंग की चित्रकारी भी मिलती है। इन चित्रकारियों का रंग इतना पक्का है कि अब तक किसी प्रकार भूमि से मिट नहीं  पाया है। इन चित्रकारियों में मनुष्यों और घोड़ों के भद्दे चित्र हैं। शिला-भित्तियों पर  देवरा के निकट  गैरिक रंग के बने हुए चित्र मानव प्रकृति की आदिम अनुभूतियों के साक्षी हैं। इन चित्रों में पशुओं का प्रदर्शन किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[रामायण]] तथा [[महाभारत]] के स्वर्ण युगों की कला-कृतियों का संबंध जहाँ तक है, बुंदेलखंड की क्या सारे [[भारत]] में वे नहीं के बराबर है। [[युधिष्ठिर]] के सभा-भवन का निर्माण महाभारत युग में  जिस कुशलता से दानव आदि कलाकारों ने किया था, उसका वर्णन ग्रंथों में ही सीमित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कलिं और खजुराहो की कला कृतियाँ== &lt;br /&gt;
तृतीय शताब्दी से तेहरवीं शताब्दी तक इस प्रांत में उस स्थापत्य कला का सृजन हुआ जो कलिं और खजुराहो की कृत्तियों में जीवन्त रूप में आज भी वर्तमान हैं। कलिं की कला चंदेली काल की है। खजुराहो की उससे भी पहले की है, खजुराहो में चीनी यात्री [[हुएनसांग]], जो कि [[हर्षवर्धन]] के राज्य-काल में आया था, ने भी मंदिर का होना लिखा है। खजुराहो का विशाल मन्दिर, देवगढ़ की विष्णु मूर्ति, दतिया का पुराना महल, पन्ना का बृहस्पति कुण्ड, जतारा का मदनसागर आदि वास्तुकला के प्रमाण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खजुराहो में बीस मन्दिरों के समूह की कवि कल्पना की मूर्तियों को बना के पृथ्वी पर उतारा गया है। इस मन्दिर के बाहर और भीतर दोनों ओर की दीवारों को देवताओं, अप्सराओं, सुंदरियों, विद्याधरों, युगल-मिथुनों, गज और [[शार्दूल]] की सुन्दर कला-कृतियों से सजाया गया है। खजुराहो के शिल्पी अनुपम कृतित्व हैं, उसकी नारी प्रतिमाएँ इतनी सुंदर हैं कि उनको देख कर ऐसा लगता है मानो जड़ में चेतन अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ जाग उठा हो। इतना सम्मोहन है कि पाषाण में जीवन सपंदन का भ्रम होने लगता है।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बुंदेलखंड}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:मध्य_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=148312</id>
		<title>नर्मदा नदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=148312"/>
		<updated>2011-04-07T05:47:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Narmada-River.jpg|नर्मदा नदी&amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River|thumb|350px]]&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
नर्मदा [[भारत]] के मध्यभाग में पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली मध्य प्रदेश और [[गुजरात]] राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है, जो [[गंगा नदी|गंगा]] के समान पूजनीय है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। नर्मदा सर्वत्र पुण्यमयी नदी बताई गई है तथा इसके उद्भव से लेकर संगम तक दस करोड़ तीर्थ हैं।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।&lt;br /&gt;
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, आदिखण्ड 13-6-7&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*नर्मदा संगम यावद् यावच्चामरकण्टकम् ।&lt;br /&gt;
तत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्थिता: ॥&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, आदिखण्ड 21/42&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसका उद्गम [[विंध्याचल पर्वत|विंध्याचल]] की मैकाल पहाड़ी श्रृंखला में [[अमरकंटक]] नामक स्थान में है । मैकाल से निकलने के कारण नर्मदा को मैकाल कन्या भी कहते हैं । [[स्कंद पुराण]] में इस नदी का वर्णन रेवा खंड के अंतर्गत किया गया है । [[कालिदास]] के ‘[[मेघदूतम्]]’ में नर्मदा को रेवा का संबोधन मिला है , जिसका अर्थ है—पहाड़ी चट्टानों से कूदने वाली। वास्तव में नर्मदा की तेजधारा पहाड़ी चट्टानों पर और भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों के ऊपर से उछलती हुई बहती है । अमरकंटक में सुंदर सरोवर में स्थित शिवलिंग से निकलने वाली इस पावन धारा को रुद्र कन्या भी कहते हैं, जो आगे चलकर नर्मदा नदी का विशाल रूप धारण कर लेती हैं । पवित्र नदी नर्मदा के तट पर अनेक तीर्थ हैं , जहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । इनमें कपिलधारा, शुक्लतीर्थ, मांधाता, भेड़ाघाट, शूलपाणि, भड़ौंच उल्लेखनीय हैं । अमरकंटक की पहाड़ियों से निकल कर [[छत्तीसगढ़]], [[मध्य प्रदेश]], [[महाराष्ट्र]] और गुजरात से होकर नर्मदा क़्ररीब 1310 किमी का प्रवाह पथ तय कर भरौंच के आगे खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है । परंपरा के अनुसार नर्मदा की परिक्रमा का प्रावधान हैं, जिससे श्रद्धालुओं को पुण्य की प्राप्ति होती है । [[पुराण|पुराणों]] में बताया गया है कि नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश होता है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलो मीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे बसा शहर [[जबलपुर]] उल्लेखनीय है। इस नदी के मुहाने पर डेल्टा नहीं है। जबलपुर के निकट भेड़ाघाट का नर्मदा जलप्रपात काफ़ी प्रसिद्ध है । [[वेद|वेदों]] में नर्मदा का कोई उल्लेख नहीं है। गंगा के उपरान्त [[भारत]] की अत्यन्त पुनीत नदियों में नर्मदा एवं [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के नाम आते हैं। '''रेवा''' नर्मदा का दूसरा नाम है और यह सम्भव है कि 'रेवा' से ही 'रेवोत्तरस' नाम पड़ा हो।&lt;br /&gt;
==ग्रंथों में उल्लेख==&lt;br /&gt;
वैदिक साहित्य में नर्मदा के विषय में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता।&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] तथा [[महाभारत]] और परवर्ती ग्रंथों में इस नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*गुप्तकालीन अमरकोश में भी नर्मदा को सोमोद्भवा कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;’रेवातुनर्मदा सोमोद्भवा मेकलकन्यका’, पौराणिक अनुश्रुति&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] ने भी नर्मदा को सोमप्रभवा कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;’तथेत्युपस्यृश्य पय: पवित्रं सोमोद्भवाया: सरितो नृसोम:’ रघुवंश 5,59&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[रघुवंश]] में नर्मदा का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;'स नर्मदारोधसि सीकराद्रैर्मरुद्भिरानर्तितनक्तमाले, निवेशयामास विलंघिताध्वा क्लांतं रजोधूसरकेतू सैन्यम्’, रघुवंश 5,42&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मेघदूत में रेवा या नर्मदा का सुन्दर वर्णन है।&amp;lt;ref&amp;gt;(दे. रेवा)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River2.jpg|thumb|250px|left|नर्मदा नदी &amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River]]&lt;br /&gt;
*[[वाल्मीकि रामायण]] में भी नर्मदा का उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’पश्यमानस्ततो विध्यं रावणोनर्मदां ययौ, चलोपलजलां पुण्यां पश्चिमोदधिगामिनीम्’, वाल्मीकि रामायण-उत्तरकाण्ड, 31,19&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके पश्चात के श्लोकों में नर्मदा का एक युवती नारी के रूप में सुंदर वर्णन है&amp;lt;ref&amp;gt;’चकवाकै: सकारण्डै: सहंसजलकुक्कुटै:, सारसैश्च सदामत्तै: कूजदिभ: सुसमावृताम्।&amp;lt;br /&amp;gt; फुल्लद्रु मकृत्तोत्तंसां चकवाकयुगस्तनीम्, विस्तीर्णपुलिनश्रोणीं हंसावलि सुमेखलाम्।&amp;lt;br /&amp;gt; पुष्परेण्वनुलिप्तांगींजलफेनामलांशुकाम् जलावगाहसुस्पर्शां फुल्लोत्पल शुभेक्षणाम् पुष्पकादवरुह् याशु नर्मदां सरितां वराम्, इष्टामिव वरां नारीमवगाह्य दशानन्:’, [[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तरकाण्ड]] 31,21-22-23-24&amp;lt;/ref&amp;gt;। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*महाभारत में नर्मदा को ॠक्षपर्वत से उद्भूत माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;’पुरश्चपश्चाच्च यथा महानदी तमृक्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा’, शान्तिपर्व 52,32&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;(दे. वनपर्व 82,52)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[भीष्म पर्व महाभारत|भीष्मपर्व]] में नर्मदा का [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के साथ उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’गोदावरीं नर्मदां च बाहुदां च महानदीम्’, भीष्मपर्व 9,14&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*श्रीमद्भागवत में रेवा और नर्मदा दोनों का ही एक स्थान पर उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;’तापी रेवा सरसा नर्मदा चर्मण्वती सिंधुरन्ध: शोणश्च नदौ’, श्रीमद्भागवत 5,19,18&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[शतपथ ब्राह्मण]]&amp;lt;ref&amp;gt;शतपथ ब्राह्मण, 12.9.3.1&amp;lt;/ref&amp;gt; ने रेवोत्तरस की चर्चा की है, जो पाटव चाक्र एवं स्थपति (मुख्य) था, जिसे सृञ्जयों ने निकाल बाहर किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;रेवोत्तरसमुह पाटवं चाक्रं स्थपतिसृञ्जया अपरुरुधु:। शतपथब्राह्मण (12.9.3.1)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
*[[पाणिनि]]&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 4.2.87&amp;lt;/ref&amp;gt; के एक वार्तिक ने 'महिष्मत्' की व्युत्पत्ति 'महिष' से की है, इसे सामान्यत: नर्मदा पर स्थित माहिष्मती का ही रूपान्तर माना गया है। इससे प्रकट होता है कि सम्भवत: वार्तिककार को (लगभग ई.पू. चौथी शताब्दी में ) नर्मदा का परिचय था। &lt;br /&gt;
*रघुवंश&amp;lt;ref&amp;gt;रघुवंश 96.43&amp;lt;/ref&amp;gt; में रेवा (अर्थात् नर्मदा) के तट पर स्थित माहिष्मती को अनूप की राजधानी कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जान पड़ता है कि कहीं-कहीं साहित्य में इस नदी के पूर्वी या पहाड़ी भाग को रेवा (शाब्दिक अर्थ—उछलने-कूदने वाली) और पश्चिमी या मैदानी भाग को नर्मदा  (शाब्दिक अर्थ—नर्म या सुख देने वाली) कहा गया है। (किन्तु महाभारत के उपर्युक्त उद्धरण में उदगम के निकट ही नदी को नर्मदा नाम से अभिहित किया गया है)। नर्मदा के तटवर्ती प्रदेश को भी कभी-कभी नर्मदा नाम से ही निर्दिष्ट किया जाता था। विष्णुपुराण के अनुसार इस प्रदेश पर शायद गुप्तकाल से पूर्व आभीर आदि शूद्रजातियों का अधिकार था।&amp;lt;ref&amp;gt;’नर्मदा मरुभूविषयांश्च-आभीर शूद्राद्या: भोक्ष्यन्ति’, विष्णुपुराण 4,24&amp;lt;/ref&amp;gt; वैसे नर्मदा का नदी के रूप में उल्लेख है।&amp;lt;ref&amp;gt;तैश्चोक्तं पुरुकुत्साय भूभुजे नर्मदा तटे, सारस्वताय तेनापि मह्यं सारस्वतेन च’; ‘नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विंध्याद्रिनिर्गता;’, [[विष्णु पुराण]] 1,2,9; 2,3,11&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;दे. रेवा, सोमोद्भवा।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
== नर्मदा की महत्ता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-2.jpg|thumb|250px|नर्मदा नदी &amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River]]&lt;br /&gt;
महाभारत एवं कतिपय [[पुराण|पुराणों]] में नर्मदा की चर्चा बहुधा हुई है। [[मत्स्य पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;अध्याय 186-194,554 श्लोक&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[पद्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;आदिखण्ड, अध्याय 13-23, 739 श्लोक, जिनमें बहुत से मत्स्य पुराण के ही श्लोक हैं&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कूर्म पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;उत्तरार्ध, अध्याय 40-42, 189 श्लोक&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नर्मदा की महत्ता एवं उसके तीर्थों का वर्णन किया है। मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 194.45&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पद्म पुराण आदि&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, 21.44&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा आया है कि उस स्थान से जहाँ नर्मदा सागर में मिलती है, अमरकण्टक पर्वत तक, जहाँ से वह निकलती है, 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्नि पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;अग्नि पुराण 113.2&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं कूर्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्म पुराण, 2.40.13&amp;lt;/ref&amp;gt; के मत से क्रम से 60 करोड़ एवं 60 सहस्र तीर्थ हैं। [[नारद पुराण|नारदीय पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;उत्तरार्ध, अध्याय 77&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है कि नर्मदा के दोनों तटों पर 400 मुख्य तीर्थ हैं&amp;lt;ref&amp;gt;श्लोक 1&amp;lt;/ref&amp;gt;, किन्तु अमरकण्टक से लेकर साढ़े तीन करोड़ हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्लोक 4 एवं 27-28&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;यद्यपि रेवा एवं नर्मदा सामान्यत: समानार्थक कही जाती हैं, किन्तु [[भागवत पुराण]], 5.19.18 ने इन्हें पृथक्-पृथक् (तापी-रेवा-सुरसा-नर्मदा) कहा है, और [[वामन पुराण]], 13.25 एवं 29-30 का कथन है कि रेवा विन्ध्य से तथा नर्मदा ऋक्षपाद से निकली है। सार्धत्रिकोटितीर्थानि गदितानीह वायुना। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च रेवायां तानि सन्ति च॥ नारदीय पुराण (उत्तर, 77.27-28)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[वन पर्व महाभारत|वन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;वन पर्व, 188.103 एवं 222.24&amp;lt;/ref&amp;gt; ने नर्मदा का उल्लेख गोदावरी एवं दक्षिण की अन्य नदियों के साथ किया है। उसी पर्व&amp;lt;ref&amp;gt;वन पर्व, 89.1-3&amp;lt;/ref&amp;gt; में यह भी आया हैं कि नर्मदा [[आनर्त]] देश में है, यह प्रियंगु एवं आम्र-कुञ्जों से परिपूर्ण है, इसमें वेत्र लता के वितान पाये जाते हैं, यह पश्चिम की ओर बहती है और तीनों लोकों के सभी तीर्थ यहाँ (नर्मदा में) स्नान करने को आते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में गुजरात एवं [[काठियावाड़]] को आनर्त कहा जाता था। [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग पर्व]], 97-6 में [[द्वारका]] को आनर्त–नगरी कहा गया है। नर्मदा आनर्त में होकर बहती मानी गयी है अत: ऐसी कल्पना की जाती है कि [[महाभारत]] के काल में आनर्त के अन्तर्गत [[गुजरात]] का दक्षिणीभाग एवं काठियावाड़ दोनों सम्मिलित थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; मत्स्य पुराण एवं पद्म पुराण ने उद्घोष किया है कि गंगा कनखल में एवं [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] [[कुरुक्षेत्र]] में पवित्र है, किन्तु नर्मदा सभी स्थानों में, चाहे ग्राम हो या वन। नर्मदा केवल दर्शन-मात्र से पापी को पवित्र कर देती है; सरस्वती (तीन दिनों में) तीन स्नानों से, [[यमुना नदी|यमुना]] सात दिनों के स्नानों से और गंगा केवल एक स्नान से।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण, 186.10-11=पद्म पुराण, आदि, 13.6-7=कूर्म पुराण 2.40.7-8&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र, 85.8&amp;lt;/ref&amp;gt; ने [[श्राद्ध]] के योग्य तीर्थों की सूची दी हैं, जिसमें नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के योग्य ठहराया है। नर्मदा को रुद्र के शरीर से निकली हुई कहा गया है, जो इस बात का कवित्वमय प्रकटीकरण मात्र है कि यह अमरकण्टक से निकली है जो महेश्वर एवं उनकी पत्नी का निवास-स्थल कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण, 188.19&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt; नर्मदा सरितां श्रेंष्ठा रुद्रदेहाद्विनि:सृता। तारयेंत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ मत्स्य पुराण (190.17= कूर्म पुराण 2.40.5= पद्म पुराण, आदिखण्ड 17.13)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;वायु पुराण, 977.32&amp;lt;/ref&amp;gt; में ऐसा उद्घोषित है कि नदियों में श्रेष्ठ पुनीत नर्मदा पितरों की पुत्री है और इस पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;पितृणां दुहिता पुण्या नर्मदा सरितां वरा। तत्र श्राद्धानि दत्तानि अक्षयाणि भवन्त्युत॥ वायुपुराण (77.32)।&amp;lt;/ref&amp;gt; मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि यह 100 योजन लम्बी एवं दो योजन चौड़ी है।&amp;lt;ref&amp;gt;योजनानां शतं सग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा। विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता॥ कूर्म पुराण (2.40.12=मत्स्य पुराण 186.24-25)। और देखिए अग्नि पुराण (113।2)।&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रो.के.वी. रंगस्वामी आयंगर ने कहा है कि मत्स्य पुराण की बात ठीक है, क्योंकि नर्मदा वास्तव में लगभग 800 मील लम्बी है।&amp;lt;ref&amp;gt;उनके द्वारा सम्पादित कल्पतरु, पृ. 199&amp;lt;/ref&amp;gt; किन्तु दो योजन (अर्थात् उनके मतानुसार 16 मील) की चौड़ाई भ्रामक है। मत्स्य पुराण एवं कूर्म पुराण का कथन है कि नर्मदा अमरकण्टक से निकली हैं, जो कलिंग देश का पश्चिमी भाग है।&amp;lt;ref&amp;gt;कलिंगदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके। पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ कूर्म पुराण (2.40.9) एवं मत्स्य पुराण (186.12)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मन्त्र का जप एवं उपवास==&lt;br /&gt;
विष्णुपुराण ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रात एवं दिन में और जब अन्धकारपूर्ण स्थान में उसे जाना हो तब 'प्रात:काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार! हे नर्मदा, तुम्हें नमस्कार; मुझे विषधर साँपों से बचाओं' इस मन्त्र का जप करके चलता है तो उसे साँपों का भय नहीं होता।&amp;lt;ref&amp;gt;नर्मदायै नम: प्रातर्नर्मदायै नमो निशि। नमोस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पत:॥ विष्णुपुराण (4.3.12-13)।&amp;lt;/ref&amp;gt; कूर्म पुराण एवं मत्स्य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जो [[अग्निदेव|अग्नि]] या जल में प्रवेश करके या उपवास करके (नर्मदा के किसी तीर्थ पर या अमरकण्टक पर) प्राण त्यागता है वह पुन: (इस संसार में) नहीं आता।&amp;lt;ref&amp;gt;अनाशकं तु य: कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप। गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायतें पुमान् ॥ मत्स्य. (194.29-30); परित्यजति य: प्राणान् पर्वत्तेऽमरकण्टके। वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयतें॥ मत्स्य पुराण (186.53-54)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==प्राचीन लेख==&lt;br /&gt;
टॉलेमी ने नर्मदा को 'नमडोज' कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;पृ0 102&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा की चर्चा करने वाले शिलालेखों में एक अति प्राचीन लेख है एरन प्रस्तरस्तम्भाभिले, जो बुधगुप्त के काल&amp;lt;ref&amp;gt;गुप्त संवत् 165= 484-85 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; का है।&amp;lt;ref&amp;gt;देखिए कार्पस इंस्क्रिप्शनम इण्डिकेरम जिल्द 3, पृ. 89&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा में मिलने वाली कतिपय नदियों के नाम मिलते हैं, यथा- &lt;br /&gt;
*[[कपिला नदी]]&amp;lt;ref&amp;gt;दक्षिणी तट पर, मत्स्य पुराण 186.40 एवं पद्म पुराण 1.13.35&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*विशल्या&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 186.46= पद्म पुराण 2.35-39&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Narmada-River-1.jpg|thumb|250px|left|नर्मदा नदी &amp;lt;br /&amp;gt; Narmada River]]&lt;br /&gt;
*[[एरण्डी नदी]]&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 191.42-43 एवं पद्म पुराण 1.18.44&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*इक्षु-नादी&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 191.49 एवं पद्म पुराण 1.18.47&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[कावेरी नदी]]।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 189.12-13 एवं पद्म पुराण 1.16.6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;नर्मदा की उत्तरी शाखा जहाँ 'ओंकार' नामक द्वीप अवस्थित है 'कावेंरी' नाम से प्रसिद्ध है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपतीर्थ==&lt;br /&gt;
बहुत-से उपतीर्थों के नाम आते हैं जिनमें दो या तीन का यहाँ उल्लेख किया जायगा। जो है- &lt;br /&gt;
*महेश्वरतीर्थ (अर्थात् ओंकार), जहाँ से एक तीर द्वारा रुद्र ने बाणासुर की तीन नगरियाँ जला डालीं&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 188.2 एवं पद्म पुराण 1.15.2&amp;lt;/ref&amp;gt;,&lt;br /&gt;
* शुक्ल-तीर्थ&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 192.3 द्वारा अति प्रशंसित और जिसके बारे में यह कहा जाता है कि राजर्षि चाणक्य ने यहाँ सिद्धि प्राप्त की थी&amp;lt;/ref&amp;gt;, &lt;br /&gt;
*भृगुतीर्थ:-जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य पाप-मुक्त हो जाता है, जिसमें स्नान करने से स्वर्ग मिलता है और जहाँ मरने से संसार में पुन: लौटना नहीं पड़ता, &lt;br /&gt;
*जामदग्न्य तीर्थ:-जहाँ नर्मदा समुद्र में गिरती है और जहाँ भगवान जनार्दन ने पूर्णता प्राप्त की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरकण्टक पर्वत एक तीर्थ है जो ब्रह्महत्या के साथ अन्य पापों का मोचन करता है और यह विस्तार में एक योजन है।&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण 189.89 एवं 98&amp;lt;/ref&amp;gt; नर्मदा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तीर्थ है माहिष्मती, जिसके स्थल के विषय में विद्वानों में मतभेद रहा है। अधिकांश लेखक यही कहते हैं कि यह ओंकार मान्धाता है जो [[इन्दौर]] से लगभग 40 मील दक्षिण नर्मदा में एक द्वीप है। इसका इतिहास पुराना है। [[बौद्ध]] ग्रन्थों में ऐसा आया है कि अशोक महान् के राज्यकाल&amp;lt;ref&amp;gt;लगभग 274 ई.पू.&amp;lt;/ref&amp;gt; में मोग्गलिपुत्त तिस्स ने कई देशों में धार्मिक दूत-मण्डल भेजे थे, जिनमें एक दूतमण्डल महिषमण्डल को भी भेजा गया था। डा. फ्लीट ने महिषमण्डल को माहिष्मती कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;जे. आर. ए. एस्., पृ. 425-477, सन् 1910&amp;lt;/ref&amp;gt; महाभाष्यकार को माहिष्मती का ज्ञान था&amp;lt;ref&amp;gt;पाणिनि 3.1.26, वार्तिक 10&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कालिदास]] ने इसे रेवा से घिरी हुई कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;रघुवंश 6.43&amp;lt;/ref&amp;gt; उद्योगपर्व&amp;lt;ref&amp;gt;उद्योगपर्व, 19.23-24 एवं 166.4&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन पर्व]]&amp;lt;ref&amp;gt;अनुशासन पर्व, 166.4&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[भागवत पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;भागवतपुराण, 10.79.21&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं पद्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;पद्म पुराण, 2.92.32&amp;lt;/ref&amp;gt; में माहिष्मती को नर्मदा या रेवा पर स्थित माना गया है। एक अन्य प्राचीन नगर है भरुकच्छ या भृगुकच्छ (आधुनिक भड़ोच)।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत की नदियाँ]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>मिकल</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*विंध्य पर्वत का एक भाग जो रीवा के आसपास है और जिसमें [[अमरकंटक]] है। &lt;br /&gt;
*[[नर्मदा नदी]] यहीं से निकली है। &lt;br /&gt;
*यह मेखला के आकार का है, इसी से इसे मेखल भी कहते हैं।&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्वत}}&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>अमरकंटक</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अमरकंटक''' रीवां से 160 मील और पेंड्रा रेलवे स्टेशन से 15 मील दूर [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] तथा शोण या [[सोन नदी|सोन]] के उदगम-स्थान के रूप में प्रख्यात है। यह [[मध्य प्रदेश]] के अनूपपुर ज़िले में स्थित है। यह पठार समुद्रतट से 2500 फ़ुट से 3500 फ़ुट तक ऊँचा है। नर्मदा का उदगम एक पर्वतकुण्ड में बताया जाता है। अमरकंटक में नर्मदा के उदगम स्थान के पर्वत को सोम भी कहा गया है। अमरकंटक ऋक्षपर्वत का एक भाग है, जो [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित सप्तकुलपर्वतों में से एक है। अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध [[महाभारत]] के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं-इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है। इसे कर्णदहरिया का मन्दिर भी कहते हैं। यह तीन विशाल शिखरयुक्त मन्दिरों के समूह से मिलकर बना है। ये तीनों पहले एक महामण्डप से संयुक्त थे, किन्तु अब यह नष्ट हो गया है। इस मन्दिर के बाद का बना हुआ एक अन्य मन्दिर मच्छींद्र का भी है। इसका शिखर [[भुवनेश्वर]] के मन्दिर के शिखर की आकृति का है। यह मन्दिर कई विशेषताओं में कर्णदहरिया के मन्दिर का अनुकरण जान पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर्मदा का वास्तविक उदगम उपर्युक्त कुण्ड से थोड़ी दूर पर है। बाण ने इसे चंद्रपर्वत कहा है। यहीं से आगे चलकर नर्मदा एक छोटे से नाले के रूप में बहती दिखाई पड़ती है। इस स्थान से प्रायः ढाई मील पर अरंडी संगम तथा एक मील और आगे नर्मदा की कपिलधारा स्थित है। कपिलधारा नर्मदा का प्रथम प्रपात है, जहाँ पर नदी 100 फ़ुट की ऊँचाई से नीचे गहराई में गिरती है। इसके थोड़ा और आगे दुग्धधारा है, जहाँ नर्मदा का शुभ्रजल [[दूध]] के श्वेत फेन के समान दिखाई देता है। शोण या सोन नदी का उदगम नर्मदा के उदगम से एक मील दूर सोन-मूढ़ा नामक स्थान पर से हुआ है। यह भी नर्मदा स्रोत के समान ही पवित्र माना जाता है। [[महाभारत]] वन. 85,9 में नर्मदा-शोण के उदगम के पास ही वंशग़ुल्म नामक तीर्थ का उल्लेख है। यह स्थान प्राचीन काल में [[विदर्भ]] देश के अंतर्गत था। वंशग़ुल्म का अभिज्ञान वासिम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>अमरकंटक</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: ''''अमरकंटक''' रीवां से 160 मील और पेंड्रा रेलवे स्टेशन से 1...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अमरकंटक''' रीवां से 160 मील और पेंड्रा रेलवे स्टेशन से 15 मील दूर [[नर्मदा]] तथा शोण या [[सोन नदी|सोन]] के उदगम-स्थान के रूप में प्रख्यात है। यह [[मध्य प्रदेश]] के अनूपपुर ज़िले में स्थित है। यह पठार समुद्रतट से 2500 फ़ुट से 3500 फ़ुट तक ऊँचा है। नर्मदा का उदगम एक पर्वतकुण्ड में बताया जाता है। अमरकंटक में नर्मदा के उदगम स्थान के पर्वत को सोम भी कहा गया है। अमरकंटक ऋक्षपर्वत का एक भाग है, जो [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित सप्तकुलपर्वतों में से एक है। अमरकंटक में अनेक मन्दिर और प्राचीन मूर्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध [[महाभारत]] के पाण्डवों से बताया जाता है। किन्तु मूर्तियों में से अधिकांश पुरानी नहीं हैं। वास्तव में प्राचीन मन्दिर थोड़े ही हैं-इनमें से एक त्रिपुरी के कलचुरि नरेश कर्णदेव (1041-1073 ई.) का बनवाया हुआ है। इसे कर्णदहरिया का मन्दिर भी कहते हैं। यह तीन विशाल शिखरयुक्त मन्दिरों के समूह से मिलकर बना है। ये तीनों पहले एक महामण्डप से संयुक्त थे, किन्तु अब यह नष्ट हो गया है। इस मन्दिर के बाद का बना हुआ एक अन्य मन्दिर मच्छींद्र का भी है। इसका शिखर [[भुवनेश्वर]] के मन्दिर के शिखर की आकृति का है। यह मन्दिर कई विशेषताओं में कर्णदहरिया के मन्दिर का अनुकरण जान पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर्मदा का वास्तविक उदगम उपर्युक्त कुण्ड से थोड़ी दूर पर है। बाण ने इसे चंद्रपर्वत कहा है। यहीं से आगे चलकर नर्मदा एक छोटे से नाले के रूप में बहती दिखाई पड़ती है। इस स्थान से प्रायः ढाई मील पर अरंडी संगम तथा एक मील और आगे नर्मदा की कपिलधारा स्थित है। कपिलधारा नर्मदा का प्रथम प्रपात है, जहाँ पर नदी 100 फ़ुट की ऊँचाई से नीचे गहराई में गिरती है। इसके थोड़ा और आगे दुग्धधारा है, जहाँ नर्मदा का शुभ्रजल [[दूध]] के श्वेत फेन के समान दिखाई देता है। शोण या सोन नदी का उदगम नर्मदा के उदगम से एक मील दूर सोन-मूढ़ा नामक स्थान पर से हुआ है। यह भी नर्मदा स्रोत के समान ही पवित्र माना जाता है। [[महाभारत]] वन. 85,9 में नर्मदा-शोण के उदगम के पास ही वंशग़ुल्म नामक तीर्थ का उल्लेख है। यह स्थान प्राचीन काल में [[विदर्भ]] देश के अंतर्गत था। वंशग़ुल्म का अभिज्ञान वासिम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>अंगकोरवाट</title>
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&lt;div&gt;यह प्राचीन कंबुज (कम्बोडिया) में स्थित संसार-प्रसिद्ध विष्णुमन्दिर है। इसका निर्माण कंबुज नरेश सूर्यवर्मन ने बारहवीं शती ई. के प्रथम चरण में करवाया था। सूर्यवर्मन विष्णुभक्त था और उसने अपने गुरु दिवाकर पंण्डित की प्ररेणा से अनेक यज्ञ किए थे। [[वास्तुकला]] के आश्चर्य, इस देवालय के चारों ओर एक गहराई है, जिसकी लम्बाई ढाई मील और चौड़ाई 650 फ़ुट है। खाई पर पश्चिम कि ओर एक पत्थर का पुल है। मन्दिर के पश्चिमी द्वार के समीप से पहली वीथि तक बना हुआ मार्ग 1560 फ़ुट लम्बा है और भूमितल से सात फ़ुट ऊँचा। पहली वीथि पूर्व से पश्चिम 800 फ़ुट और उत्तर से दक्षिण 675 फ़ुट लम्बी है। मन्दिर के मध्यवर्ती शिखर की ऊँचाई भूमितल से 210 फ़ुट से भी अधिक है। अंगकोरवाट की भव्यता तो उल्लेखनीय है ही, इसके शिल्प की सूक्ष्म विदगधता, नक़्शे की ससमिति, यथार्थ अनुपात तथा सुन्दर अलंकृत मूर्तिकारी भी उत्कृष्ट कला की दृष्टि से कम प्रशंसनीय नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>अंगकोरवाट</title>
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&lt;div&gt;यह प्राचीन कंबुज (कम्बोडिया) में स्थित संसार-प्रसिद्ध विष्णुमन्दिर है। इसका निर्माण कंबुज नरेश सूर्यवर्मन ने बारहवीं शती ई. के प्रथम चरण में करवाया था। सूर्यवर्मन विष्णुभक्त था और उसने अपने गुरु दिवाकर पंण्डित की प्ररेणा से अनेक यज्ञ किए थे। [[वास्तुकला]] के आश्चर्य, इस देवालय के चारों ओर एक गहराई है, जिसकी लम्बाई ढाई मील और चौड़ाई 650 फ़ुट है। खाई पर पश्चिम कि ओर एक पत्थर का पुल है। मन्दिर के पश्चिमी द्वार के समीप से पहली वीथि तक बना हुआ मार्ग 1560 फ़ुट लम्बा है और भूमितल से सात फ़ुट ऊँचा। पहली वीथि पूर्व से पश्चिम 800 फ़ुट और उत्तर से दक्षिण 675 फ़ुट लम्बी है। मन्दिर के मध्यवर्ती शिखर की ऊँचाई भूमितल से 210 फ़ुट से भी अधिक है। अंगकोरवाट की भव्यता तो उल्लेखनीय है ही, इसके शिल्प की सूक्ष्म विदगधता, नक़्शे की ससमिति, यथार्थ अनुपात तथा सुन्दर अलंकृत मूर्तिकारी भी उत्कृष्ट कला की दृष्टि से कम प्रशंसनीय नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>मद्रास विश्वविद्यालय</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:University-of-Madras.jpg|thumb|250px|मद्रास विश्वविद्यालय, [[चेन्नई]]]]&lt;br /&gt;
'''मद्रास विश्वविद्यालय''' को दो सिद्धांतों ने विलक्षण बनाया है, वे हैं शोध, और सभी के लिए शिक्षा। चेन्नै के मरीना समुद्र तट पर अन्ना मेमोरियल और एमजीआर मेमोरियल के सामने स्थित विक्टोरिया काल की खूबसूरत इमारत में इस विश्वविद्यालय को अंग्रेजों ने 1857 में स्थापित किया था। [[1912]] में इस विश्वविद्यालय में केवल 17 विभाग, 30 अध्यापक और 69 शोध छात्र थे, लेकिन आज यह विशाल शिक्षा केन्द्र बन गया है, जहाँ 18 स्कूल, पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई व शोध के 72 विभाग, 152 संबद्ध कालेज और 52 स्वीकृत शोध संस्थान हैं। यहाँ अध्यापक-छात्र अनुपात भी बहुत अच्छा है-1,75,000 छात्रों के लिए 4,000 से ज्यादा अध्यापक हैं। यहाँ 4,000 से ज्यादा छात्र शोध कर रहे हैं। इसलिए ताज़्ज़ुब की बात नहीं कि यह [[विज्ञान]] एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से वैज्ञानिक कार्यों के मामले में 35 सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय संस्थानों में यह 15वें नम्बर पर है। इसके कुलपति कर्नल डा. जी. तिरुवासगम कहते हैं, &amp;quot;शोध और विकास के क्षेत्र में विलक्षणता हमारी ताकत है, हम शोध पर ज़ोर देते हैं और यहाँ हर अध्यापक को कम-से-कम आठ शोध छात्रों को लेना होता है। हम कम क़ीमत पर कैंसर और पर्किसन जैसी भयानक बीमारियों के लिए दवाओं की खोज करके स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
मद्रास विश्वविद्यालय ने 21 उद्योग और सेवा संगठनों के अलावा 85 विदेशी और 18 भारतीय विश्वविद्यालयों के साथ सहमति पत्र पर दस्तख़त किए हैं। क़रीब 95 प्रायोजित शोध कार्यक्रम, जिन्हें विभिन्न एजेंसियों से आर्थिक सहायता मिल रही है, विभिन्न विभागों में चलाए जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मद्रास विश्विविद्यालय इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे कोई विश्वविद्यालय सरकारी नियंत्रण में होते हुए भी शोध और विकास के मामले में क़माल कर सकता है। 152 वर्ष पुराने इस विश्वविद्यालय ने ज्ञान के क्षेत्र में लाज़वाब उपलब्धियाँ हासिल की हैं। यहाँ पर सभी के लिए, ख़ासकर ग्रामीण छात्रों के लिए शैक्षणिक विकास पर ज़ोर देने के लिए नियमित रूप से पाठ्यक्रम को संवर्धित किया जाता है। विश्वविद्यालय ने निःशुल्क शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया है। जिसके तहत् आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के लिए विभिन्न कालेजों में 10 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें आरक्षित होती हैं। विश्वविद्यालय की ओर से चलाए जा रहे रोजग़ारपरक पाठ्यक्रमों में छात्रों के बहुमुखी विकास पर ज़ोर दिया जाता है, ताकि उनके अन्दर की प्रतिभा को निख़ारा जा सके। यहाँ के छात्र भी ज्ञान की पिपासा रखते हैं। विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों से जुड़ी सामान्य परीक्षा प्रणाली पर ज़ोर नहीं देता है। इस विश्वविद्यालय की स्पष्ट धारणा है कि पढ़ाई से छात्र की स्वाभाविक प्रतिभा बढ़ती है और यहाँ से निकले विद्वानों, वैज्ञानिकों और नेताओं की लम्बी सूची पर नज़र डाले तो यह बात अकाट्य सत्य साबित होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान}}{{विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
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[[Category:राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>चित्र:Women-Mahabalipuram.jpg</title>
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		<title>दिल्ली</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{लेख सूची|लेख का नाम=दिल्ली |पर्यटन=दिल्ली पर्यटन |ज़िला=दिल्ली ज़िला}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Colaj-delhi.jpg|thumb|300px|दिल्ली के विभिन्न द्रश्य]]&lt;br /&gt;
दिल्ली भारत की राजधानी एवं महानगरीय क्षेत्र है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। महान ऐतिहासिक महत्त्व वाला यह महानगरीय क्षेत्र महत्त्वपूर्ण व्यापारिक, परिवहन एवं सांस्कृतिक हलचलों से भरा है। दिल्ली देश के उत्तरी मध्य भाग मे [[गंगा नदी|गंगा]] की एक प्रमुख सहायक [[यमुना नदी|यमुना नदी]] के दोनों तरफ बसी है। दिल्ली देश का तीसरा बड़ा शहर है। अनुश्रुति है कि इसका वर्तमान नाम राजा ढीलू के नाम पर पड़ा जिसका आधिपत्य ई.पू पहली शताब्दी मे इस क्षेत्र पर था। बहरहाल बिजोला अभिलेखों (1170ई.) मे उल्लेखित ढिल्ली या ढिल्लिका सबसे पहला लिखित उद्धरण है। [[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाकाव्य-महाभारत काल से ही दिल्ली का विशेष उल्लेख रहा है। दिल्ली का शासन एक वंश से दूसरे वंश को हस्तांतरित होता गया। यह [[मौर्य वंश|मौर्यों]] से आरंभ होकर [[पल्लव|पल्लवों]] तथा मध्य भारत के गुप्तों से होता हुआ 13 वीं से 15 वीं सदी तक तुर्क और अफगान और अंत में 16 वीं सदी में [[मुग़ल|मुगलों]] के हाथों में पहुँचा। 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली में अंग्रेज़ी शासन की स्थापना हुई। 1911 में कोलकाता से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित होने पर यह शहर सभी तरह की गतिविधियों का केंद्र बन गया। 1956 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। दिल्ली के इतिहास में 69 वां संविधान संशोधन विधेयक एक महत्त्वपूर्ण घटना है। जिसके फलस्वरुप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 में लागू हो जाने से दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Red-Fort.jpg|thumb|250px|left|[[लाल क़िला दिल्ली|लाल क़िला]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Red Fort, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली का पुरातात्विक परिदृश्य अत्यंत दिलचस्प है व सहस्राब्दियों पुराने स्मारक कदम-कदम पर खड़े नजर आते हैं। नए या पुराने क़िलेबंद स्थान पर निर्मित 13 शहरों ने दिल्ली–अरावली त्रिकोण के लगभग 180 वर्ग किलोमीटर के एक सीमित क्षेत्र में अपनी मौज़ूदगी के निशान छोड़े हैं। दिल्ली के बारे मे यह किंवदंती प्रचलित है कि जिसने भी यहाँ नया शहर बनाया, उसे इसे खोना पड़ा। सबसे पुराना नगर इंद्रप्रस्थ, करीब 1400 ई.पू निर्मित किया गया था और वेद व्यास रचित महाकाव्य [[महाभारत]] में इसका वर्णन [[पांडव|पांडवो]] की राजधानी के रुप में मिलता है। इस त्रिकोण मे निर्मित दिल्ली का दूसरा शहर है अनंगपुर या आनंदपुर, जिसकी स्थापना लगभग 1020 ई. मे तोमर राजपूत नरेश अनंग पाल ने राजनिवास के रुप मे की थी। यह शहर अर्द्धवृत्ताकार निर्मित तालाब सूरजकुंड के आसपास बसा था। अनंग पाल ने बाद मे इसे 10 किलोमीटर पश्चिम की ओर लालकोट पर स्थापित एक दुर्ग मे स्थानांतरित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संभवत: एक चौहान राजपूत विशाल देव द्वारा 1153 मे इसे जीतने के पूर्व लाल कोट पर लगभग एक शताब्दी तक तोमर राजाओं का आधिपत्य रहा। विशाल देव के पौत्र [[पृथ्वीराज तृतीय]] या राय पिथोरा ने 1164 ई. मे लाल कोट के चारों ओर विशाल परकोट बनाकर इसका विस्तार किया। यह दिल्ली का तीसरा शहर कहलाता है। और क़िला राय पिथोरा के नाम से जाना गया। कई इतिहासकार इसे दिल्ली के सात शहरों में प्रथम मानते हैं। 1192 की लड़ाई मे मुस्लिम आक्रमणकारी [[मुहम्मद ग़ोरी]] ने पृथ्वीराज की हत्या कर दी। ग़ोरी यहाँ से दौलत लूटकर चले गए और अपने गुलाम [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] को यहाँ का उपशासक नियुक्त कर गए। 1206 मे ग़ोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वंय को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया और लालकोट को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया। अगली तीन शताब्दियों तक यहाँ छोटे अंतंरालों के साथ सुल्तान वंश का शासन रहा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाल कोट को एक और महत्त्वपूर्ण स्मारक कुतुब मीनार दिया। यह विजय का स्मारक था और संभवत: एक मस्जिद की मीनार थी लेकिन कुतुबुमीनार के वर्तमान स्वरुप का निर्माण [[फ़िरोज शाह तुग़लक़|फ़िरोज शाह]] ने पूरा करवाया, जिसमें उन्होंने संगमरमर के अलंकरण के काम के साथ–साथ दो और मंजिलें बनवाई जिसमे उसकी ऊँचाई 74 मीटर हो गई। एक तरफ से यह भारत मे सुल्तान वंश के गौरवपूर्ण व विजयी आगमन का प्रतीक थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख़लजी शासन (1290-1321) के दौरान दिल्ली पर मंगोल लुटेरों ने आक्रमण कर इसके असुरक्षित उपनगरों को ध्वस्त कर दिया। 1303 में अलाउद्दीन ने इसके चारों ओर 1.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक नया वृत्ताकार क़िलाबंद शहर बनवाया ताकि मंगोल पुन आक्रमण कर उपनगरों व बगीचों को ध्वस्त न कर सकें।&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-gate.jpg|thumb|[[इंडिया गेट]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt;India Gate, Delhi]]&lt;br /&gt;
कुतुब-लाल कोट संकुल के विपरीत जो शहर देहली-ए-कुहना (पुरानी दिल्ली) कहलाता था, प्रारंभ मे लश्कर या लश्करगाह (सैनिक छावनी) के नाम से जाना गया। लाल कोट के साथ जुड़ी इस चारदीवारी से घिरी नगरी को बाद मे सिरी नाम दिया गया तथा इसे ख़लजी राजधानी (दारुल ख़िलाफ़ा) के रुप में जाना गया। इसकी परिधि की दीवार लगभग 1.5 किलोमीटर लंबी थी और उसमे कई मीनार व दरवाजे बने हुए थे। सिरी की गणना आमतौर पर दिल्ली के दूसरे शहर के रुप मे होती है, किंतु यह मुस्लिम विजेताओं द्वारा भारत में स्थापित पहला पूर्णत: नया शहर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार 14 वीं शताब्दी की दिल्ली में कुतुबु-लाल कोट संकुल स्थित देहली-ए-कुहना या पुरानी दिल्ली; ग़यासपुर– किलोखड़ी स्थित शहर-ए-नउ या नया शहर और सिरी स्थित दारुल ख़िलाफ़ा या राजधानी सम्मिलित थे। 1321 मे दिल्ली तुग़लक़ों के हाथों में चली गई, क्योंकि ख़लजी वंश के अंतिम शासक की मृत्यु बिना पुरुष उत्तराधिकारी के हो गई थी। 11 तुग़लक़ शासकों ने दिल्ली पर शासन की किया लेकिन वास्तुशिल्प में केवल तीन ने रुचि दिखाई उनमे से प्रत्येक ने दिल्ली त्रिकोण में स्थित वर्तमान शहरी समूह में एक नए शहर का राजधानी के रुप मे निर्माण किया। यह शहर सुल्तानों की सैन्य प्रकृति और सुरक्षा के प्रति तुग़लक़ों की दीवानगी को दर्शाते हैं। पहले एक दुर्ग तथा बाद मे एक शहर के रुप मे विकसित इन राजधानियों मे पहला गयासुद्दीन तुग़लक़ द्वारा निर्मित किलाबंद नगर – दुर्ग तुग़लक़ाबाद (1321-25) था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहम्मद बिन तुग़लक़ (शासनकाल 1325-51) ने एक ऐसी राजधानी की कल्पना की थी, जो साम्राज्य की इनकी योजना को प्रतिबिंबित करे। यह योजना विस्तार की अपेक्षा उसे सुदृढ़ बनाने के लिए थी। सीमा पर आक्रमण अभी रुके नहीं थे, इसलिए उन्होंने कुतुबु दिल्ली, सिरी तथा तुग़लक़ाबाद के चारों ओर एक रक्षा दीवार बनाई और जहाँपनाह नामक एक नये शहर का निर्माण करवाया। अपने निर्माण के शीघ्र बाद ही यह शहर अव्यवस्था का शिकार हो गया। अचानक मुहम्मद तुग़लक़ ने दक्कन में हाल ही में विजित क्षेत्र पर निगरानी रखने के लिए अपनी राजधानी देवगिरी ले जाने का निश्चय किया, जिसका नाम उन्होंने दौलताबाद रखा। 1338 में जहाँपनाह की आबादी को नई राजधानी के लिए कूच करने के आदेश मिले। उजाड़ दिल्ली छोटे–छोटे टुकड़ो में बंट गई और इसके खंडहर नए शहर फ़िरोज़ाबाद के लिए ईटों के भंडार साबित हुए। जो तीसरा और अंतिम तुग़लक़ कालीन शहर था। 1354 में यमुना के किनारे स्थापित यह शहर, सिरी से लगभग 8 किलोमीटर पूर्वोत्तर मे स्थित था। यह शहर यानी पाँचवीं दिल्ली फ़िरोज़ शाह, (1351-88) द्वारा बसाई गई और उन्हीं के नाम से जानी गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहा जाता है कि 14 वीं सदी की दिल्ली मे तुग़लक़ाबाद सैन्य प्रतिष्ठान था, निजामुदीन फ़क़ीरों का इलाक़ा था और उपनगर हौज़ख़ास विद्वानों की बस्ती थी। मंगोल विजय के बाद समरकंद और मध्य एशिया के विश्वविद्यालयों से शिक्षित शरणार्थी दिल्ली मे आ बसे। उच्च शिक्षा के लिए हौज़ख़ास के मदरसे की ख्याति पूरी सल्तनत में फैली हुई थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Raj-Ghat-Delhi.jpg|thumb|250px|राज घाट, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Raj Ghat, Delhi|left]]&lt;br /&gt;
तुग़लक़ों के परवर्ती सैयद (1414-1444) और लोदी (1451-1526) शासकों ने स्वयं को फ़िरोज़ाबाद तक सीमित रखा। उनके शासन काल के दौरान लगातार उपद्रव चलते रहे और उन्हे नए शहर बसाने का समय नहीं मिला। 1526 में भारत के पहले मुग़ल शासक बाबर का प्रवेश हुआ और उन्होंने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। 1530 में उनके बेटे हुमायूं गद्दी पर बैठे और उन्होंने 10 संघर्षमय वर्षो तक दिल्ली पर राज किया। 1553 में उन्होंने अपने शासन की स्थापना के उपलक्ष्य में नए शहर दीनपनाह का निर्माण किया इसके लिए बड़ी सावधानी से यमुना के किनारे एक स्थान चुना गया। अब इस शहर का नामोनिशान नहीं है। क्योंकि शेरशाह सूरी ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले दो मुग़ल शासकों अकबर और जहाँगीर ने आगरा को राजधानी बनाकर भारत पर शासन करना पसंद किया लेकिन दिल्ली के महत्त्व को समझकर वे बीच–बीच मे दिल्ली आते रहे। 1636 में शाहजहाँ ने अभियंताओं, वास्तुविदों तथा ज्योतिषियों को आगरा व लाहौर के बीच अच्छे जलवायु वाले स्थान के चयन का निर्देश दिया। यमुना के पश्चिमी किनारे पर पुराने क़िले के उत्तर में सुल्तानों की हजरत दिल्ली का चयन किया गया। शाहजहाँ ने यहाँ उर्दू –ए-मौला नामक एक क़िले को केंद्र में रखकर नई राजधानी का निर्माण शुरु करवाया। लाल क़िले के नाम से विख्यात यह क़िला आठ वर्षो में पूर्ण हुआ और 19 अप्रैल 1648 को शाहजहाँ ने अपनी इस नई राजधानी शाहजहाँनाबाद के क़िले में नदी के सामने वाले द्वार से प्रवेश किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहौर गेट क़िले का भव्य प्रवेशद्वार है। यहाँ से शहर की प्रमुख सड़क शुरु होकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक जाती है। 36 मीटर चौड़ी यह सड़क शहर की मुख्य धुरी थी रात को बीच के जलाशय पर पड़ती चंद्रमा की रुपहरी रोशनी ने इस स्थान को चांदनी चौक नाम दिया। यह सड़क दिल्ली का सामारोह स्थल थी। शाहजहां और औरंगजेब यहाँ अपना शाही जुलूस निकालते थे, नादिरशाह और अहमद शाह अब्दाली विद्रोही घुड़सवार के रुप में निकले थे और मराठा व रोहिल्लाओं ने विजय उल्लास मनाया था। ब्रिटिश शासनकाल में जब दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया, तो लॉर्ड हार्डिंग का जुलूस भी इसी मार्ग से निकला था। जामा मस्जिद का निर्माण 1644 में प्रारंभ हुआ और नगर प्राचीर का निर्माण 1651 से 1658 के बीच हुआ ये शहर में बनने वाले अगले महत्त्वपूर्ण स्मारक थे। अर्द्धचंद्राकार आकृति की यह दीवार 8 मीटर ऊँची, 3.5 मीटर चौड़ी व 6 किलोमीटर लंबी थी और यह लगभग 6.4 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को घेरे हुए थी। इस में सात विशाल दरवाजे थे (कश्मीरी, मोरी, काबुनी, लाहौरी, अजमेरी, तुर्कमानी और अकबराबादी) नदी की ओर की दीवार में भी तीन दरवाजे (राजघाट, किलाघाट और निगमबोधघाट) थे। शहर के प्रमुखमार्ग इन द्वारों तक जाते थे। छोटी पहाड़ी पर स्थित शाहजहाँनाबाद की जामा मस्जिद जो बादशाही मस्जिद के नाम से भी जानी जाती थी। भारत की सबसे बड़ी मस्जिद थी। 1662 में दिल्ली में हुए एक भीषण अग्निकांड में 60 हजार और 1716 में भारी वर्षा के कारण मकान ध्वस्त होने से 23 हजार लोग मारे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाहजहाँनाबाद के निर्माण के 10 वर्ष बाद ही शाहजहाँ के पुत्र औरंगज़ेब ने शहर पर कब्ज़ा करके उन्हें आगरा के क़िले में नजरबंदकर दिया और जुलाई 1658 में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। औरंगज़ेब को विरासत में एक सघन और समृद्ध राजधानी मिली थी। लेकिन धीरे– धीरे इस शहर की अवनति शुरु हो गई, क्योंकि इसका नया शासक इसके संस्थापक के विपरीत एकदम भिन्न स्वभाव वाला था। शाहजहाँ ने कला को बढावा दिया और जिंदगी का लुत्फ उठाया औरंगज़ेब इन दोनों से दूर रहते थे। उन्हे शहर को सुदंर बनाने में न तो दिलचस्पी थी। न ही उन्हें इसका अवसर मिला। वह स्थायी रुप से शाहजहाँनाबाद में रहे ही नहीं। उनके उत्तराधिकारियों को एक विभाजित और निर्बल राज्य शासन करने को मिला। फ़ारस के लुटेरे नादिरशाह के जघन्य आक्रमण ने इस शहर पर अंतिम प्रहार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1803 में अग्रेज़ शासकों ने जब दिल्ली पर कब्ज़ा किया तब यह वाणिज्य एवं व्यवसाय का प्रमुख केंद्र थी, यद्यपि क़िलाबंद शहर भव्य कितु जीर्ण–शीर्ण गंदी बस्ती में बदल चुका था। चारदीवारी क्षेत्र में लगभग एक लाख तीस हज़ार और उपनगरों में लगभग 20 हज़ार लोग रहते है। सुरक्षा और स्थान की द्दष्टि से ब्रिटिश कमांडरों ने ईस्ट इंडिया कपनी के कार्यालय लाल क़िले के आसपास के क्षेत्र में स्थापित किए जो घनी आबादी वाला नहीं था। उत्तरी भाग में रेज़िडेंसी बनाई गई, जहाँ छावनी, अस्तबल, वनस्पति क्षेत्र, शरत्रागार और बारुद भंडार, सीमा शुल्क कार्यालय एक बैंक दो अस्पताल, कुछ बंग़ले तथा एक गिरजाघर भी बनाए गए। नई सैन्य ज़रुरतों के हिसाब से क़िलेबंद मे कुछ परिर्वतन किए गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क़िलेबंद शहर से अधिक क्षेत्र मे विस्तृत छावनी को 1828 में पश्चिमोत्तर 'रिज' पर स्थानांतरित किया गया। पहाड़ी के एक ऊँचे स्थल पर पारंपरिक एवं गॉथिक शैली में वैकल्पिक रेज़िडेंसी का निर्माण किया गया, जिसके पश्चात और भी विशाल मैटकॉफ़ हाउस बनाया गया उसका स्वामी बाद में रेज़िडेंट के स्थान पर 'एजेंट ऑफ़ डेल्ही' बना। 1840 के दशक मे छावनी क्षेत्र के आसपास आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रुप से पृथक आवासीय उपनगर का विकास हुआ, जिसे नागरिक क्षेत्र कहा गया। विलियम फ़्रेज़र तथा चाल्स मेट कॉफ़ जैसे दिल्ली के प्रारंभिक अंग्रेज़ शासक यहाँ  की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से सम्मोहित थे मुग़ल राजदरबार को पारंपरिक समारोह को मनाने की अनुमति थी तथा बादशाहों के नाम पर सिक्के ढाले जाते थे। कितु 1857 के भारतीय ग़दर के पश्चात सब कुछ यहाँ तक कि दिल्ली के प्रति ब्रिटिश शासन का रवैया भी बदल गया। विद्रोह के बाद मुग़ल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय को रंगून (वर्तमान यागून) निर्वासित कर दिया गया तथा उनके परिवारजन की हत्या कर दी गई। सेना ने राजमहल पर क़ब्ज़ा करके इसे क़िले मे बदल दिया।  क़िले के आसपास तथा परकोटे के समीप स्थित 457 मीटर क्षेत्र को सैन्य क्षेत्र घोषित कर दिया और इसके व जामा मस्जिद के बीच की तमाम इमारतें गिराकर मैदान बना दी गईं। काश्मीरी गेट से दरियागंज तक की अधिग्रहित भूमि पर छावनी को पुन: शहर में लाया गया। यह क्षेत्र पूर्व मे चारदीवारी पश्चिम में मैदान (एस्पलेनेड) व नदी के किनारे तक फैला है। क़िलेबंद शहर के एक तिहाई क्षेत्र मे छावनी बस गई। कई यूरोपीय विदेशी शहर से बाहर सिविल लाइंस में चले गए और दरियागंज के निवासी चाँदनी चौक आ गए। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jama-Masjid-Delhi.jpg|thumb|250px|जामा मस्जिद, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Jama Masjid, Delhi]]&lt;br /&gt;
जैसे ही दिल्ली के प्रशासन पर ब्रिटिश ताज का क़ब्ज़ा हुआ, तीन क्रियाशील ‘इकाइयों’ मूल नगर छावनी तथा आमतौर पर सिविल लाइंस कहलाने वाला नगरीय क्षेत्र के साथ इसके भौतिक स्वरुप ने पारंपरिक औपनिवेशिक नगर का रुप ले लिया। धीरे-धीरे दिल्ली का आधुनिकीकरण होने लगा। [[1867]] में [[कलकत्ता]] से दिल्ली के लिए पहली नियमित रेल चली। [[1910]] तक नगर मे नगरीय निकाय के शासन की स्थापना, जल वितरण और मल– जल निकास प्रणाली, दूरभाष और टेलीग्राफ़ लाइनें तथा बिजली की व्यवस्था हो गई। चाँदनी चौक में विक्टोरिया घंटाघर बनाया गया, यहाँ की नहर पाट दी गई और इसके ऊपर विद्युत ट्राम मार्ग का निर्माण हुआ। [[1877]] में [[भारत]] पर ब्रिटेन के आधिपत्य को दर्शाने के लिए ब्रिटिश महान दरबारों की श्रृंखला के पहले दरबार का आयोजन हुआ। दूसरा दरबार 1903 में एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में आयोजित हुआ। तीसरा दरबार 1911 में हुआ, जो दिल्ली के लिए एक मोड़ साबित हुआ समारोह के दौरान जॉज वी. ने घोषणा की कि भारत की राजधानी कलकत्ता से पुन: दिल्ली लाई जाएगी। इस निर्णय को राजनीतिक और प्रशासकीय, दोनों आधारों पर सही ठहराया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जनवरी]] [[1912]] मे राजनीतिक निर्णय के व्यावहारिक कार्यांवन के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई। प्रसिद्ध वास्तुविद सर एडविन लुटियंस इसके सदस्य थे जिन्होंने अंतत इस शहर को नया स्वरुप दिया। इस समिति ने स्थल चयन का कार्य प्रारंभ किया। समिति ने फसील के दक्षिण में स्थित रायसीना पहाड़ी चुनी जो न तो बहुत दूर थी और न ही बहुत पास।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिसंबर 1912 में समिति ने दिल्ली शहर के लिए लुटियंस की योजना को मंजूर कर लिया इस योजना के अनुसार, कलकत्ता के विपरीत वाइसरॉय हाउस, संसद भवन और सचिवालय को एक जगह बनाना था तथा इनका निर्माण इस योजना के केंद्र बिंदु रायसीना पहाड़ी पर नगरकोट  (एक्रोपॉलिस) में किया जाना था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हार्डिंग ने घोषणा की कि नई राजधानी का वास्तुशिल्प पूर्व और पश्चिम शैली का मिलाजुला रुप होगा। वाइसरॉय भवन से मुख्य केंद्रीय मार्ग राजपथ (किंग्सवे) प्रारंभ होता था। जो 3.2 किलोमीटर लंबा था और नदी की ओर जाता था। यह मार्ग बीच मे उत्तर– दक्षिण की ओर अपेक्षाकृत कम भव्य मार्ग से दो भागों में विभाजित होता है। जो क्वींसवे कहलाया। मुख्य मार्ग की समाप्ति एक विजय– तोरण, इंडिया गेट पर होती थी। जो प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए शूरवीरों की स्मृति का सूचक था। जब यह राजनीतिक स्थित स्पष्ट हो गई कि सत्ता वाइसरॉय से विधान सभा को हस्तांतरित की जानी है, तो लुटियंस के सहयोगी सर हरबर्ट बेकर को संसद भवन की अभिकल्पना तैयार करने के निर्देश दिए गए। बेकर ने गोलाकार भवन का डिजाइन बनाया और इसका स्थान लाल क़िले के पश्चिमोत्तर मे पुराने शहर की ओर जाने वाले मार्ग पर नियत किया गया। एक अन्य गोलाकार भवन वाणिज्यिक केंद्र कनॉट प्लेस मे भी बना, जिसकी अभिकल्पना इंग्लैड के बाथ स्थित एक भवन जैसी है। नई राजधानी का शुभारंभ जनवरी [[1931]] में हुआ।  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Lotus-Temple.jpg|thumb|250px|left|[[लोटस मंदिर दिल्ली|लोटस मंदिर]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Lotus Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
नई दिल्ली की सड़क योजना ज्योमितिय सौंदर्यशास्त्र की धारणा पर आधारित है। समग्र योजना मे राजपथ (किंग्सवे) को मुख्य आधार मानकर बनाई गई षट्भुजों की एक श्रंखला और 96 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़के हैं। ये षटकोण तीन मार्गों के बीच स्थित थे जो गवर्नर हाउस से निकलकर ऐतिहासिक जामा मस्जिद, इंद्रप्रस्थ और सफ़दरजग के मक़बरे की ओर जाते थे तथा वर्तमान को अतीत से जोड़ते थे। शहर के आवासीय ढांचे की योजना का उदेश्य निवास की सुविधा को व्यवस्थित करना था। जगह-जगह बाग़-बगीचों का निर्माण भी किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के तत्कालीन वाइसरॉय बेरन चार्ल्स हार्डिंग चाहते थे कि पुरानी और नई दिल्ली का संयोजन एक हो। उन्होंने निर्देश दिए कि दोनों की योजना एक शहर के रुप में हो न कि दो अलग-अलग शहरों के रुप में किंतु लुटियंस अपने संकीर्ण शहरी सौंदर्यीकरण पर जमे हुए थे। उनकी विराट योजना मे पुरानी दिल्ली महज एक महत्त्वहीन ध्वस्त होता शहरी क्षेत्र था और वह चाहते थे कि उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया जाए। यह पूर्वाग्रह पुरानी दिल्ली के लिए घातक सिद्ध हुआ, जिसे [[1941]] और [[1951]] के बीच आए लगभग एक लाख शरणार्थियों को निवास प्रदान करना था। जहाँ नई दिल्ली के निवासी 6-8 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर के घनत्व से अपने रहन सहन आदर्श बना रहे थे, वहीं  पुरानी दिल्ली 336 से 400 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर के बोझ से दबी जा रही थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नई और पुरानी दिल्ली के बीच यह विसंगति शुरु से ही योजनाकारों के लिए रुकावट साबित हुई। प्रथम नगर योजना मे दिल्ली को एक गंदी बस्ती के रुप मे चित्रित किया गया और [[1980]] के दशक में ही जब दूसरी नगर योजना बनी उसे विरासत क्षेत्र के रुप मे कुछ महत्त्व दिया गया। लुटियंस  की दिल्ली को सदैव परम पावन क्षेत्र समझा गया और इसकी मूल योजना तथा जनसंख्या में परिर्वतन के सुझावों का जनता एवं योजना दोनों के द्वारा विरोध किया गया। [[1970]] और [[1980]] के दशक में डी.डी.ए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) ने आवास व्यवसाय पर एकाधिकार कर लिया और वर्तमान शहरी केंद्र के आसपास विशाल भवन संकुल खड़े कर दिये गए। उच्च आय, मध्य आय और निम्न आय वर्ग के समूहों के आधार पर आवास उपलब्ध कराए गए। जो इस आय वर्ग से बाहर थे, वे अनाधिकृत बस्तियों या झुग्गी झोपड़ियों (गंदी बस्तियों) में इफ़ाज़ा कर रहे हैं। जो अब जे.जे कॉलोनी जानी जाती है। 567 अनाधिकृत बस्तियाँ राजनीतिक दबाव में वैध घोषित की जा चुकी हैं। दिल्ली की आबादी के उमड़ते सैलाब को यमुना के पूर्वी तट पर बसाया गया है। जहाँ धीरे-धीरे  एक अलग ही दिल्ली आकार ले रही है। कई बड़े बाजार आवासीय भवन और धनाढ्य लोगों की कोठियाँ शहर की दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तरी परिधि में बनाई जा चुकी है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्राचीन नगरों में गणना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun's-Tomb-Delhi.jpg|thumb|250px|[[हुमायूँ का मक़बरा दिल्‍ली|हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Humayun's Tomb, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की संसार के प्राचीन नगरों में गणना की जाती है। महाभारत के अनुसार दिल्ली को पहली बार पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम से बसाया था&amp;lt;ref&amp;gt;(देखिए: इंद्रप्रस्थ)&amp;lt;/ref&amp;gt; किंतु आधुनिक विद्दानों का मत है कि दिल्ली के आसपास उदाहरणार्थ रोपड़ ([[पंजाब]]) के निकट [[सिंधु घाटी सभ्यता]] के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। और पुराने क़िले के निम्नतम खंडहरों में आदिम दिल्ली के अवशेष मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं वास्तव में देश में अपनी मध्यवर्ती स्थिति के कारण तथा उत्तरपश्चिम से भारत के चतुर्दिक भागों को जाने वाले मार्गों के केंद्र पर बसी होने से दिल्ली भारतीय इतिहास में अनेक साम्राज्यों की राजधानी रही है। महाभारत के युग में [[कुरुप्रदेश]] की राजधानी [[हस्तिनापुर]] थी। इसी काल में पांडवो ने अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ में बनाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जातकों के अनुसार इंद्रप्रस्थ सात कोस के घेरे में बसा हुआ था। पांडवों के वंशजों की राजधानी इंद्रप्रस्थ में कब तक रही यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता किंतु [[पुराण|पुराणों]] के साक्ष्य के अनुसार परीक्षित तथा जनमेजय के उत्तराधिकारियों ने हस्तिनापुर में भी बहुत समय तक अपनी राजधानी रखी थी और इन्हीं के वंशज निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा में बह जाने पर अपनी नई राजधानी प्रयाग के निकट [[कौशाम्बी]] में बनाई&amp;lt;ref&amp;gt;(देखिए: पार्जिटर, डायनेस्टीज़ ऑव दिकलि एज –पृष्ठ 5)&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मौर्य काल]] में दिल्ली या इंद्रप्रस्थ का कोई विशेष महत्त्व न था क्योंकि राजनैतिक शक्ति का केंद्र इस समय [[मगध]] में था। [[बौद्ध धर्म]] का जन्म तथा विकास भी उत्तरी भारत के इसी भाग तथा पाश्रर्ववर्ती प्रदेश में हुआ इसी कारण बौद्ध-धर्म की प्रतिष्ठा बढने के साथ ही भारत की राजनीतिक सत्ता भी इसी भाग (पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार) में केंद्रित रही। मौर्यकाल के पश्चात लगभग 13 सौ वर्ष तक दिल्ली और उसके आसपास का प्रदेश अपेक्षाकृत महत्त्वहीन बना रहा। हर्ष के साम्राज्य के छिन्न भिन्न होने के पश्चात उत्तरीभारत में अनेक छोटी मोटी राजपूत रियासतें बन गईं और इन्हीं में 12 वीं शती में पृथ्वीराज चौहान की भी एक रियासत थी जिसकी राजधानी दिल्ली बनी। दिल्ली के जिस भाग में कुतुब मीनार है वह अथवा महरौली का निकटवर्ती प्रदेश ही पृथ्वीराज के समय की दिल्ली है। वर्तमान जोगमाया का मंदिर मूल रुप से इन्हीं चौहान नरेश का बनवाया हुआ कहा जाता है। एक प्राचीन जनश्रुति के अनुसार [[चौहान वंश|चौहानों]] ने दिल्ली को तोमरों से लिया था जैसा कि 1327 ई. के एक अभिलेख से सूचित होता है&amp;lt;ref&amp;gt;देशोस्ति हरियानाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्निभ: ढिलिकाख्या पुरी यत्र तोमरैरस्ति निर्मिता। चाहमाना नृपास्तत्र राज्यं निहितकंटकम तोमरातरं चत्र्कु:प्रजापालनतत्परा:&amp;lt;/ref&amp;gt; यह भी कहा जाता है कि चौथी शती ई. में अनंगपाल तोमर ने दिल्ली की स्थापना की थी। इन्होने इंद्रप्रस्थ के क़िले के खंडहरों पर ही अपना किला बनवाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भौतिक एव मानव भूगोल==&lt;br /&gt;
दिल्ली एक जलसंभर पर स्थित है। जो गंगा तथा सिंध नदी प्रणालियों को विभाजित करता है। दिल्ली की सबसे महत्त्वपूर्ण स्थालाकृति विशेषता पर्वत स्कंध (रिज) है, जो [[राजस्थान]] प्रांत की प्राचीन अरावली पर्वत श्रेणियों का चरम बिंदु है। अरावली संभवत: दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत माला है, लेकिन अब यह पूरी तरह वृक्ष विहीन हो चुकी है। पश्चिमोत्तर पश्चिम तथा दक्षिण मे फैला और तिकोने परकोट की दो भुजाओं जैसा लगने वाला यह स्कंध क्षेत्र 180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे फैला है। कछारी मिट्टी के मैदान को आकृति की विविधता देता है तथा दिल्ली को कुछ उत्कृष्ट जीव व वनस्पतियाँ उपलब्ध कराता है। यमुना नदी त्रिभुजाकार परकोटे का तीसरा किनारा बताती है। इसी त्रिकोण के भीतर दिल्ली के प्रसिद्ध सात शहरो की उत्पत्ति ई.पू. 1000 से 17 वीं शताब्दी के बीच हुई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:A-View-Of-India-Gate.jpg|thumb|250px|left|[[इंडिया गेट]] का एक दृश्य, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; A View Of India Gate, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सिंचाई&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के गाँवों का तेजी से शहरीकरण होने की वजह से सिंचाई के अंतर्गत आने वाली खेती योग्‍य भूमि धीरे-धीरे कम होती जा रही है। राज्‍य में ‘केशोपुर प्रवाह सिंचाई योजना चरण तृतीय’ तथा ‘जल संशोधन संयंत्र से सुधार एवं प्रवाह विस्‍तार सिंचाई प्रणाली’ नामक दो योजनाएं चलाई जा रही है। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्‍ली के ग्रामीण क्षेत्र में 350 हेक्‍टेयर की सिंचाई राज्‍य नलकूपों द्वारा और 1,376 हेक्‍टेयर की सिंचाई अतिरिक्‍त पानी द्वारा की जा रही है। इसके अलावा 4,900 हेक्‍टेयर भूमि की सिंचाई हरियाणा सरकार के अधीन पश्चिमी यमुना नहर द्वारा की जा रही है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बिजली&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के लिए इसकी अपनी उत्‍पादन इकाइयों- राजघाट बिजली घर, इंद्रप्रस्‍थ स्‍टेशन और बदरपुर ताप बिजलीघर सहित गैस टरबाइन पर आधारित इकाई से 850-900 मेगावाट बिजली प्राप्‍त होती है। शेष बिजली उत्तर क्षेत्रीय ग्रिड से प्राप्‍त की जाती है। दिल्‍ली में कई बिजली उत्‍पादन इकाइयां शुरू करने की योजना है। इंद्रप्रस्‍थ एस्‍टेट में प्रगति कंबाइंड पावर प्रोजेक्‍ट स्‍थापित किया जा चुका है। 330 मेगावाट प्रगति पावर परियोजना निर्माणाधीन है और जल्‍दी ही चालू होने वाली है। इसके 100 मेगावाट वाले प्रथम चरण को परीक्षण के लिए शुरू कर दिया गया है। बिजली वितरण को सुचारू बनाने के लिए दिल्‍ली विद्युत बोर्ड का निजीकरण कर दिया गया है और दिल्‍ली की बिजली व्‍यवस्‍था अब देश की दो जानी मानी-संस्‍थाओं- बी.एस.ई.एस. तथा टाटा पावर (एन.डी.पी.एल) द्वारा देखी जा रही है।&lt;br /&gt;
==जलवायु==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|thumb|[[क़ुतुब मीनार]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Qutub Minar, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की जलवायु उपोष्ण है। जो इसके भीतर प्रदेश होने की भू- स्थिति से प्रभावित है। दिल्ली में गर्मी के महीने [[मई]] तथा [[जून]] बेहद शुष्क और झुलसाने वाले होते है। दिन का तापमान कभी-कभी 43-45 तक पहुँच जाता है। मानसून [[जुलाई]] मे आता है। और तापमान को कम करता है। लेकिन [[सितंबर]] के अंत तक मौसम गर्म, उमस भरा और कष्टप्रद रहता है। यहाँ की वार्षिक औसत वर्षा लगभग 660 मिमी है। [[अक्टूबर]] से [[मार्च]] के बीच का मौसम काफ़ी सुहावना रहता है। हालांकि [[दिसंबर]] तथा [[जनवरी]] के महीने खूब ठंडे व कोहरे से भरे होते है। और कभी-कभी वर्षा भी हो जाती है। शीतकाल में प्रतिदिन का औसत न्यूनतम तापमान 7 डिग्री से. के आसपास रहता है, लेकिन कुछ रातें अधिक सर्द होती है।&lt;br /&gt;
==वनस्पति== &lt;br /&gt;
दिल्ली की परिवर्तनशील जलवायु के कारण तीन वानस्पतिक काल होते है। वर्षा की कमी तथा भूमिगत जलस्तर के नीचे से प्राकृतिक वनस्पति का प्रर्याप्त विकाश नहीं हो पाता। फूलों के करीब 1,000 प्रजातियाँ, जिनमे से अधिकाशं स्वदेशी मूल के है। यह यहाँ के वातावरण के अनुरुप ढल चुकी हैं, और दिल्ली शहर तथा आसपास के वातावरण मे फलफूल रहे हैं। पहाड़ियों एव नदी के तटवर्ती भूभाग की वनस्पतियाँ स्पष्टत: भिन्न है। स्कंध क्षेत्र में पाई जाने वाली पर्वतीय वनस्पतियों मे बबूल, जंगली खजूर तथा सघन झाड़ियाँ हैं। जिनमें कुछ फूलदार प्रजातियाँ भी शामिल हैं। यहाँ घास, बेले तथा लिपटने वाली अल्पायु लताएँ भी होती हैं, जो केवल बरसात के मौसम मे पनपती हैं। दूसरी ओर नदी के तट के रेतीले एव क्षारीय भूभाग में विशेषकर मानसून व ठंड के महीने में वनस्पतियाँ समृद्ध एवं भिन्न हैं।&lt;br /&gt;
==प्राणी जीवन== &lt;br /&gt;
दिल्ली में प्राणी जीवन खासा विपुल, विविध तथा देशज है तथा प्राणी विज्ञान की दृष्टि से सिस–गंगा की श्रेणी में आता है। मांसाहारी जीव प्रमुख रुप से देशी स्तनपायी हैं। लकड़बग्घे, भेड़िऐ, लोमड़ी, सियार तथा तेंदुए, जो पहले निचले जंगलों मे विचरण करते थे, अब दर्रों तथा शहर की सीमांत पहाड़ी चोटियों पर पाए जाते हैं। हिरन तथा वराह खुरदार प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अब अपनी प्राकृतिक पर्यावास में कम ही मिलते हैं। साही खरगोश, चूहे व गिलहरियां शहर के कृतंकजीव हैं तथा चमगादड़ कांटाचूहा और छछूंदर दिल्ली के कीट भक्षी प्राणी हैं। जो अक्सर मंदिरों तथा ऐतिहासिक खंडहरों के आसपास पाए जाते हैं। दिल्ली का पक्षी जीवन भी समृद्ध एवं विविध है। घरेलू कबूतर, गौरैया, चीलें, कौवे, तोते जंगली बटेर, तीतर, पूरे साल पाए जाते हैं। दिल्ली के आसपास की झीलें शीतकाल में कई प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती है। यमुना नदी में मछलियों की 65 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं नियोजन==&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्रशासनिक व्यवस्था&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
दिल्ली ने प्रशासनिक व्यवस्था मे कई फेरबदल देखे हैं। [[2 अगस्त]], [[1858]] को ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम पारित किया, जिसने भारत की अंग्रेज़ी सत्ता को [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] से ब्रिटिश राज में स्थानांतरित कर दिया। [[1876]] में महारानी विक्टोरिया के शासनाधिकार में 'भारत की सम्राज्ञी' पदवी शामिल हो गई। [[1947]] तक दिल्ली मुख्य आयुक्त की अध्यक्षता में ब्रिटिश प्रांत रही। आज़ादी के बाद [[1952]] में यह केन्द्रशासित राज्य बनी लेकिन [[1956]] में इसका दर्जा बदल गया तथा यह केंद्र सरकार के अधीन केन्द्रशासित प्रदेश हो गई। [[1958]] में शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक एकीकृत नियम की स्थापना की गई। दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिनियम [[1966]] के तहत फिर परिवर्तन किया गया तथा तीन स्तरीय प्रणाली लागू की गई, जो एक उपराज्यपाल और एक कार्यकारी परिषद, एक निर्वाचित महानगरीय परिषद तथा नगर को मिलाकर बनाई गई है। संविधान के 69 वें संशोधन द्वारा इसे [[1991]] में विशिष्ट राज्य का दर्जा एवं निर्वाचित विधान सभा दी गई। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत उप–राज्यपाल दिल्ली का प्रमुख होता है और प्रशासन मुख्यमंत्री चलाता है, जो निर्वाचित दल द्वारा नियुक्त किया जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sansad-Bhawan.jpg|thumb|250px|left|[[संसद भवन]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Parliament House, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्तरों का समूह&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली राज्य प्रशासनिक एवं नियोजन क्षेत्रों के कई स्तरों का समूह है। इसका दायरा 1,485 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें शहरी संकेंद्रण तथा 209 गाँव आते हैं। जो दिल्ली महरौली तहसीलों में बटे हैं। वृहद स्तर पर यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) का ही भाग है। जो नगर एव ग्रामीण संगठन (टी.सी.पी.ओ.) द्वारा [[1971]] में एक नियोजन क्षेत्र के रुप मे अलग किया गया, ताकि दिल्ली के इर्द –गिर्द भावी विकाश को दिशा दी जा सके। एन. सी. आर के अंतर्गत दिल्ली राज्य तथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान के सीमावर्ती ज़िले या तहसीलें आती हैं। यह क्षेत्र दिल्ली महानगर के आसपास लगभग 100 किलोमीटर अर्द्धव्यास में फैला है। तथा इसमे 30,242,वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आता है। क्षेत्र के भावी संतुलित विकास के लिए एक समंवित मास्टर प्लान तैयार करने हेतु [[1985]] में एन.सी.आर.बोर्ड का गठन किया गया। दिल्ली महानगर क्षेत्र उपवृहद स्तर पर है। जिनमें दिल्ली तथा निकटवर्ती राज्यों के सटे हुए शहरी भाग आते हैं। जो 3,182 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। लघु स्तर पर दिल्ली का शहरी समूह आता है, जिसका क्षेत्रफल 446 वर्ग किलोमीटर है। इसमें तीन नगरीय क्षेत्र आते हैं: नई दिल्ली नगर पालिका समिति (एन.डी.एम.सी.), नगर निगम दिल्ली (शहर), एम.सी.डी. (यू) तथा दिल्ली छावनी के साथ-साथ सेंसस द्वारा वर्गीकृत 23 उपनगर।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;महानगरीय अधिशासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली का महानगरीय अधिशासन मुख्य रुप से नई दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली नगर निगम तथा छावनी परिषद के अधीन है। दिल्ली नगर निगम निर्वाचित निकाय है। नई दिल्ली नगरपालिका (एन.डी.एम.सी.) के सदस्य शासन द्वारा मनोनीत होते हैं। नगर निगम के दायरे में अनिवार्य नागरिक एवं उचित कल्याणकारी कार्य आते हैं। गंदी बस्तियों को हटाना एवं सुधार इसके मुख्य कार्य हैं यह अपना काम क्षेत्रीय समितियों के माध्यम से करती है। जो स्थानीय पार्षदों तथा एक या अधिक पौर–मुख्य से गठित होती है, नई दिल्ली नगर पालिका का गठन [[1933]] में हुआ यह केवल नई दिल्ली (इसे यह स्वरुप वास्तुविद् एडविन लूटियंस ने दिया था) तथा इससे लगे हुए क्षेत्रो के प्रति उत्तरदायी हैं। छावनी क्षेत्र के स्थानीय कार्य रक्षा मंत्रालय के प्रशासन में आते हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;योजना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
महानगरीय दिल्ली की योजना की ज़िम्मेदारी दिल्ली विकाश प्राधिकरण (डी.डी.ए.) के अधीन है, जिसका गठन [[1957]] के एक संसदीय अधिनियम के तहत हुआ। शहर के प्रथम 20 वर्षों की नगर योजना (मास्टर प्लान) टी.सी.पी.ओ. द्वारा तैयार की गई तथा इसे दिल्ली की बेतरतीब वृद्धि को नियंत्रित करने तथा आम लोगों की क्रय–क्षमता योग्य एवं उपयुक्त आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वीकृत आधारों पर डी.डी.ए. द्वारा [[1962]] में लागू किया गया। शासन द्वारा 24 हजार हेक्टेयर क्षेत्र का अधिकरण करके शहरी विकाश के लिए डी.डी.ए. को सौंपा गया। इस तरह डी. डी.ए साम्यवादी विश्व से बाहर राष्ट्रीयकृत भूमि का सबसे बड़ा विकासक बन गया। विलंबित दूसरी नगर योजना [[1986]] में प्रभाव में आई तथा यह उद्योगीकरण को धीमा करने, विकेंद्रीकरण, अनेक स्थानोंको जोड़ते लोक परिवहन के प्रावधान तथा कम ऊँचाई वाली किंतु घनी आवासीय व्यवस्था पर केंद्रित थी।&lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal Nehru Stadium.jpg|thumb|250px|[[जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru Stadium, Delhi]]&lt;br /&gt;
अन्य राजधानियों की तरह दिल्ली महानगर की गतिविधियाँ भी अत्यंत सक्रिय हैं। 19 वीं सदी के अंत [[मुग़ल]] शासन काल का वैभव समाप्त हो चुका था, दिल्ली की आबादी मुश्किल से पाँच लाख थी, लेकिन धीरे-धीरे यह किसी दानव की तरह बढ़ती गई। वर्ष [[2001]] में दिल्ली की शहरी आबादी 1 करोड़ 28 लाख के लगभग पहुँच चुकी है और दिल्ली राज्य की कुल आबादी 1 करोड़ 37 लाख के लगभग पहुँच गई है। जनसांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार 90 प्रतिशत आबादी शहरी है। इनमें भी 85 प्रतिशत लोग तीन स्थायी नगरो मे बसते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2001 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली की आबादी में लिंग अनुपात (प्रति1,000 पुरुषों पर महिलाएं) शहरी क्षेत्र मे 821 है, जिसमें [[1991]] के 827 के मुक़ाबले कमी आई है। यह इस बात का सूचक है कि पुरुषों का शहरों की तरफ पलायन अधिक है। दिल्ली में साक्षरता का प्रतिशत 81.82 है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। अगर हम दिल्ली के जनसांख्यिकी इतिहास पर नजर डालें, तो [[1947]] का कालखंड एक संक्रांति काल की तरह हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। इस काल मे हजारों शरणार्थी पाकिस्तान से दिल्ली आए। इनकी वजह से न केवल यहाँ का जनसांख्यिकी ढांचा बदला, बल्कि दिल्ली के सामाजिक– सांस्कृतिक और आर्थिक स्वरुप में भी परिर्वतन आया। तब से शहर प्रवासियों की वजह से फैलता गया। हाल के दशकों मे यहाँ जन्म-दर गिरी है, लेकिन प्रवासियों की आबादी का एक–तिहाई से अधिक हिस्सा प्रवासियों का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहर के मुख्य धार्मिक समूहों में (1991 की जनगणना के अनुसार) [[हिंदू धर्म|हिंदू]] (लगभग 83 प्रतिशत), [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]] (लगभग नौ प्रतिशत) हैं। जनसंख्या के शेष चार प्रतिशत का निर्माण [[जैन धर्म|जैन]], [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]]ईसाई, [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]] और अन्य लोग करते हैं। अधिकांश लोग हिंदी या उसका परिवर्तित रुप हिंदुस्तानी बोलते हैं। [[पंजाबी भाषा]] पंजाबियों द्वारा बोली जाती है। तथा [[उर्दू]] मुसलमानों द्वारा बोली जाती है। विभिन्न प्रांतों से आए आप्रवासी अपनी-अपनी भाषा बोलते हैं, लेकिन कामचलाऊ हिंदी सीखने की कोशिश करते हैं। शिक्षित वर्ग द्वारा अंग्रेज़ी समझी व बोली जाती है।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था== &lt;br /&gt;
किसी भी ऐतिहासिक राजधानी की तरह दिल्ली भी वैविध्यपूर्ण केंद्र है, जिसमे प्रशासन, सेवाएं और निर्माण अच्छी तरह मिले–जुले हैं। दिल्ली कला एव हस्तकौशल की प्रचुर विविधता का केंद्र रहा है। मुग़ल काल में दिल्ली रत्न और आभूषण, धातु पच्चीकारी, कसीदाकारी, सोने की पच्चीकारी, रेशम और जरी का काम, मीनाकारी और शिल्प, मूर्तिकला और चित्रकला के लिए विख्यात थी। &lt;br /&gt;
दिल्ली का वर्तमान प्रशासकीय महत्व उस समय से है, जब भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया और [[ब्रिटिश साम्राज्य]] की राजधानी, वाणिज्यिक और सेवा केन्द के रुप में विकसित हो गई। यहाँ की लगभग तीन–चौथाई आबादी व्यापार लोक प्रशासन, सामुदायिक, सामाजिक और निजी सेवाओं में संलग्न है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कृषि और खनिज&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
गेहूँ, बाजरा, ज्‍वार, चना और मक्‍का की प्रमुख फसलें हैं, लेकिन अब किसान अनाज वाली फसलों की बजाय फलों और सब्जियों, दुग्‍ध उत्‍पादन, मुर्गी पालन, फूलों की खेती को ज्‍यादा महत्‍व दे रहे हैं। ये गतिविधियाँ खाद्यान्‍नों, फसलों के मुक़ाबले अधिक लाभदायक साबित हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Akshardham-Temple-Delhi.jpg|thumb|250px|left|[[अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली|अक्षरधाम मंदिर]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Akshardham Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;उद्योग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली न केवल उत्तर भारत का सबसे बड़ा व्‍यावसायिक केंद्र है, बल्कि यह लघु उद्योगों का भी सबसे बडा केंद्र है। इनमें टेलीविजन, टेपरिकार्डर, हल्‍का इंजीनियरिंग साज-सामान, मशीनें, मोटरगाडियों के हिस्‍से पुर्जे, खेलकूद का सामान, साइकिलें, पी.वी.सी. से बनी वस्‍तुएं जूते-चप्‍पल, कपडा, उर्वरक, दवाएं, हौजरी का सामान, चमड़े की वस्‍तुएं, साफ्टवेयर आदि विभिन्‍न वस्‍तुएं बनाई जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
20 वीं सदी के प्रारंभ में यहाँ आधुनिक उद्योगों का प्रवेश हुआ। यहाँ के बड़े उद्योगों मे कपास की ओटाई, कताई और बुनाई; आटा एव मैदा की मिलें पैकिंग; गन्ने व तेल का प्रसंस्करण प्रमुख थे। लघु उद्योगों में मुद्रण, जूता निर्माण, कसीदाकारी, बेकरी, शराब निर्माण लोहा तथा पीतल का काम होता है। [[1980]] के दशक से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि शुरु हुई। [[1981]] में 50 हजार पंजीकृत औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढकर [[1990]] में 81 हजार हो गई। इस कालखंड में औद्योगिक निवेश, उत्पादन और रोजगार मे भी लगभग दुगुनी वृद्धि हुई। 1990 के दशक मे इस शहर के आर्थिक स्वरुप मे महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया और पुरानी दिल्ली ने उत्तर भारत के थोक वाणिज्यिक केंद्र के रुप में अपनी पहचान को और अधिक सुद्ढ़ बना लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्‍ली की नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेलीकम्‍यूनि‍केशन, सॉफ्टवेयर उद्योग तथा सूचना प्रौद्योगिकी को समर्थ सेवा बनाने वाले उद्योग लगाने पर बल दिया गया है। दिल्‍ली में ऐसी औद्योगिक इकाइयां लगाने को प्रोत्‍साहन दिया जा रहा है, जिनसे प्रदूषण नहीं फैलता और जिनमें कम कामगारों की आवश्‍यकता होती है। दिल्‍ली राज्‍य औद्योगिक विकास निगम ओखला स्थित व्‍यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र के भवन में रत्‍न, आभूषण और परख तथा मीनाकारी का एक प्रशिक्षण संस्‍थान खोल रहा है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;परिवहन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Metro-Delhi-1.jpg|thumb|250px|मेट्रो रेल, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Metro Train, Delhi]]&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने दिल्‍ली शहर में बढ़ते वाहन प्रदूषण और यातायात की अस्‍त-व्‍यस्‍त स्थिति को देखते हुए मास रैपिड ट्रांजिट प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया। यह परियोजना कार्यान्वित की जा रही है और इसमें अति आधुनिक तकनीक का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली मेंमेट्रो रेल परियोजना आ गई है। अब दिल्‍ली मेट्रो के प्रथम चरण में तीन मेट्रो कारीडोर हैं जो रिकार्ड समय में पूरे होकर काम भी करने लगे हैं। शाहदरा से रिठाला और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से‍ कें‍द्रीय सचिवालय के बीच लाइनें बिछ गई हैं और इन पर गाडियाँ भी चलने लगी हैं। बाराखंभा और द्वारका के बीच तीसरी लाइन भी चालू हो गई है। दिल्‍ली मेट्रो के द्वितीय चरण को भी स्‍वीकृत मिल गई है जिससे राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र के यात्रियों को बेहतर संपर्क सुविधा प्राप्‍त हो सकेगी। दिल्‍ली सडकों, रेल लाइनों और विमान सेवाओं के जरिये भारत के सभी भागों से भलीभांति जुड़ी हुई है। यहाँ तक तीन हवाई अड्डे हैं। इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डा अंतर्राष्‍ट्रीय उड़ानों के लिए पालम हवाई अड्डा घरेलू उड़ानों के लिए तथा सफदरजंग हवाई अडडा प्रशिक्षण उड़ानों के लिए इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली में तीन महत्‍वपूर्ण रेलवे स्‍टेशन भी हैं। ये दिल्‍ली जंक्‍शन, नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन और निजामुद्दीन रेलवे स्‍टेशन के नाम से जाने जाते हैं। तीन अंतर्राष्‍ट्रीय बस अड्डे- कश्‍मीरी गेट, सराय काले खां और आनंद विहार में हैं।&lt;br /&gt;
==वास्तुकला==&lt;br /&gt;
दिल्ली के वैविध्यपूर्ण इतिहास ने विरासत में इसे समृद्ध वास्तुकला दी है। शहर के सबसे प्राचीन भवन सल्तनत काल के हैं और अपनी संरचना व अलंकरण मे भिन्नता लिए हुए हैं। प्राकृतिक रुपाकंनों, सर्पाकार बेलों और कुरान के अक्षरों के घुमाव में हिंदू राजपूत कारीगरों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। मध्य एशिया से आए कुछ कारीगर कवि और वास्तुकला की सेल्जुक शैली की विशेषताएं मेहराब की निचली कोर पर कमल- कलियों की पंक्ति, उत्कीर्ण अलंकरण और बारी-बारी से आड़ी और खड़ी ईटों की चिनाई है। ख़लज़ी शासन काल तक इस्लामी वास्तुकला में प्रयोग तथा सुधार का दौर समाप्त हो चुका था और इस्लामी वास्तुकला में एक विशेष पद्धति और उपशैली स्थापित हो चुकी थी जिसे पख्तून शैली के नाम से जाना जाता है। इस शैली की अपनी लाक्षणिक विशेषताएं हैं। जैसे घोड़े के नाल की आकृति वाली मेहराबें, जालीदार खिड़कियां, अलंकृत किनारे बेल बूटों का काम (बारीक विस्तृत रुप रेखाओं में) और प्रेरणादायी, आध्यात्मिक शब्दांकन बाहर की ओर अधिकांशत: लाल पत्थरों का तथा भीतर सफ़ेद संगमरमर का उपयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तुकला की परंपरा में बदलाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-International-Airport-Delhi.jpg|thumb|250px|left|इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Indira Gandhi International Airport, Delhi]]&lt;br /&gt;
तुग़लकों ने वास्तुकला की परंपरा में बदलाव कर अलंकरण का तत्व समाप्त कर दिया इस काल मे स्लेटी पत्थरों वाले सीधे सपाट निर्माण को प्राथमिकता दी गई उनकी इमारतों मे एक दूसरे पर आधारित छतों वाली सादी मेहराबों कुरान की आयत से खुदे किनारों और भट्टी मे रंगी टाइलों को प्रभावशाली ढंग से शामिल किया गया। तुग़लकों ने अपने भवनों मे सजावट पर कम, और उनकी आकृति की भव्यता पर अधिक जोर दिया। सैयद और लोदी काल में गुंबदीय ढांचे की दो जटिल शैलियां प्रचलित हुईं। निम्न अष्टभुजाकार आकृति वाली शैली जिसका जमीनी क्षेत्रफल काफ़ी विशाल होता था। और ऊँची वर्गाकार शैली जिसमें भवन का अग्रभाग चारो ओर से गुजरने वाली पट्टी और फलक  श्रंखला रुपी सजावटी तत्त्व से विभाजित होता था, जो इन्हे दो या तीन मंजिल जैसे होने का रुप देती प्रतीत होती थी। लोदी काल में बगीचे वाले मकबरों का निर्माण भी हुआ। इस काल की मस्जिदों में मीनारें नहीं होती थी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तविक गौरव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली की वास्तुकला का वास्तविक गौरव मुग़ल कालीन है। दिल्ली में [[हुमायूँ]] का मक़बरा मुगल वास्तुकला का प्रथम महत्त्वपूर्ण नमूना है। हुमायूं के मकबरे को 1565 ई. में उसकी बेग़म हमीदा बानू ने बनवाया था। इसमें हमीदा की क़ब्र भी हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न कालों में बनी [[दारा शिकोह]] फ़ुरुख़सियर तथा आलमगीर द्वितीय आदि की भी क़ब्रें यहीं स्थित हैं। कहा जाता है कि मुग़ल परिवार के तथा उससे संबंधित 90 से अधिक व्यक्तियों की क़ब्रें यहाँ हैं। 1857 की राज्यकांति में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह को मुग़लों ने यहीं क़ैद किया था। ताजमहल का अग्रगामी यह निर्माण भारत का पहला पूर्ण विकसित बगीचे वाला मक़बरा भी है। इसने भारतीय वास्तुकला में ऊँची मेहराबों और दोहरे गुंबदों की शुरुआत की जो मुगल वास्तुकला के प्रतिनिधि नमूने लाल क़िले में दिखाई देते हैं। इसमें निर्मित नक़्क़ारख़ाने, दीवार-ए-आम और दीवार-ए-ख़ास, महल तथा मनोरंजन कक्ष, छज्जे, हमाम, आंतरिक नहरें और ज्यामितीय सौंदर्यबोध के साथ निर्मित बगीचे तथा एक अलंकृत मस्जिद देखते ही बनते हैं। जामा मस्जिद मुग़लकालीन मस्जिदों की वास्तविक प्रतिनिधि है। यह पहली मस्जिद है, जिनमें मीनारें भी हैं। अधिकांश भवनों में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। जिनमें नक़्क़ाशी तथा बहुरंगी पत्थरों की सजावट के नायाब नमूने हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;आंग्ल वास्तुकला&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली की आंग्ल वास्तुकला औपनिवेशिक तथा मुग़लकालीन कला का प्रतीक है। यह वाइसरॉय के आवास संसद भवन और सचिवालय के विशाल भवनों से लेकर आवासीय बंगली और दफ्तरों जैसी उपयोगी इमारतों तक वैविध्यपूर्ण है। स्वतंत्र भारत में वास्तुकला ने अपनी अलग उपशैली विकसित करने का प्रयास किया है। देशज तथा पश्चिमी शैली के मिश्रित स्वरुप में स्थानीय उपशैलीयों की छटा दिखाई देती है। सर्वोच्च न्यायालय भवन, विज्ञान भवन विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालय कनॉट प्लेस के आसपास की इमारतें इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हाल ही में दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कुछ वास्तुकार हुए जिन्होंने दिल्ली के परिदृश्य में कुछ आकर्षण भवन जोड़े हैं। जिन्हें उत्तर-आधुनिक कहा जाता है। टीकाकरण संस्थान, भारतीय जीवन बीमा निगम का मुख्यालय और बहाई मंदिर इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं।&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lotus-Temple.jpg|thumb|250px|[[लोटस मंदिर दिल्ली|लोटस मंदिर]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Lotus Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
{{मुख्य|दिल्ली पर्यटन}}&lt;br /&gt;
दिल्‍ली एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। दिल्‍ली में मंदिरों से लेकर मॉल तक, किलों से लेकर उद्यान और अनेक ऐतिहासिक इमारतें और क़िले हैं जो इतिहास की जीवंत निशानियाँ हैं। प्रतिवर्ष लाखों सैलानी दिल्‍ली आते हैं और यहाँ की मिश्रित संस्‍कृति को जानने की कोशिश करते हैं। दिल्‍ली राज्‍य पर्यटन और परिवहन विकास निगम पर्यटकों को यहाँ के विभिन्‍न स्‍थानों की सैर कराने के लिए विशेष बस सेवाएं चलाता है। निगम ने पैरा सेलिंग, रॉक क्‍लाइंबिंग और बोटिंग जैसी साहसिक गतिविधियों के लिए सुविधाएं विकसित की हैं। निगम ने ’दिल्‍ली हाट’ का विकास किया है, जहाँ काफ़ी और विभिन्‍न राज्‍यों की खाद्य वस्‍तुएँ एक जगह उपलब्‍ध हैं। दिल्‍ली के विभिन्‍न भागों में ऐसी ही 'हाट' बनाने की योजना है। &lt;br /&gt;
==खानपान==&lt;br /&gt;
दिल्‍ली में खाने पीने की बहुत सी दुकानें और भोजमनालय हैं। देश के विभिन्‍न प्रांतों के व्‍यंजनों का स्‍वाद लेने के लिए दिल्‍ली हाट का रुख कर सकते हैं। यहां देश के लगभग हर भाग का भोजन मिलता है। कुल मिलाकर दिल्‍ली में हर तरह के भोजन का जायका लिया जा सकता है। दिल्‍ली में चाँदनी चौक एक जगह है जो फ्रूट चाट, गोल गप्‍पों, पकौड़ों और बहुत सी चीजों के लिए मशहूर है। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''पराठें वाली गली'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्‍ली की पराठें वाली गली के पराठे सालों से लोगों की पसंद रहे हैं। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''मिठाई'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाँदनी चौक के पास ही दिल्‍ली में मिठाइयों की सबसे पुरानी दुकान घंटेवाला है। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''चिकन करी'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोका रोड पर बने आंध्र भवन की चिकन करी बहुत की पसंद की जाती है। &lt;br /&gt;
==खरीददारी==&lt;br /&gt;
दिल्‍ली में छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शोरूम भी हैं। उच्‍च वर्ग को साउथ एक्‍स और करोल बाग का बाज़ार पंसद आता है, वहीं टैंक रोड, सरोजनी नगर, जनपथ, पालिका बाज़ार, मॉनेस्‍ट्री, गफार मार्केट आदि मध्‍यम वर्ग को लुभाता है। साउथ एक्‍स में सभी अंतर्राष्‍ट्रीय ब्रैंड के कपड़े और अन्‍य सामान मिलता है। गफ्फार मार्केट मुख्‍य रूप से बिजली के सामान के लिए जानी जाती है। चांदनी चौक और उसके आसपास हाथ से तराशे हुए सोने चांदी के बेहतरीन जेवर मिल जाएंगे। दरियागंज में रविवार को लगने वाली किताबों की दुकानों में आपको कार्ल मार्क्‍स से लेकर जवाहर लाल नेहरु तक पर लिखी किताबें मिल सकती हैं।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|250px|बस, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt;Bus, Delhi]] &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''वायु मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देश के लगभग सभी हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है। विदेशों से भी विमान यहाँ आती हैं।&lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''रेल मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली में पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन, सराय रोहिल्ला और दिल्ली छावनी स्टेशन हैं जो दिल्ली को अन्य शहरों से जोड़ते हैं। सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रैस दिल्ली से [[कलकत्ता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]], [[बैंगलोर]] और [[हैदराबाद]] महानगरों के बीच चलती हैं। शताब्दी एक्सप्रैस दिल्ली को प्रमुख राज्यों की राजधानियों [[भोपाल]], [[अमृतसर]] और [[लखनऊ]] से जोड़ती है।&lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''सड़क मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से [[बर्धमान]], [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और [[आगरा]] के रास्ते कोलकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते मुंबई से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए अमृतसर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से [[रामपुर]] और [[मुरादाबाद]] के रास्ते लखनऊ से जुड़ी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्‍योहार==&lt;br /&gt;
महानगर होने की वजह से दिल्ली में भारत के सभी प्रमुख त्‍यौहार मनाए जाते हैं। दिल्‍ली पर्यटन और परिवहन विकास निगम कुछ वार्षिक उत्‍सवों का भी आयोजन करते हैं। ये रोशनआरा उत्‍सव, शालीमार उत्‍सव, कुतुब उत्‍सव, शीतकालीन मेला, उद्यान और पर्यटन मेला, जहाने-खुसरो उत्‍सव तथा आम महोत्‍सव हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://delhigovt.nic.in/index.asp अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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		<title>दिल्ली</title>
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		<updated>2010-11-10T12:49:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{लेख सूची|लेख का नाम=दिल्ली |पर्यटन=दिल्ली पर्यटन |ज़िला=दिल्ली ज़िला}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Colaj-delhi.jpg|thumb|300px|दिल्ली के विभिन्न द्रश्य]]&lt;br /&gt;
दिल्ली भारत की राजधानी एवं महानगरीय क्षेत्र है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। महान ऐतिहासिक महत्त्व वाला यह महानगरीय क्षेत्र महत्त्वपूर्ण व्यापारिक, परिवहन एवं सांस्कृतिक हलचलों से भरा है। दिल्ली देश के उत्तरी मध्य भाग मे [[गंगा नदी|गंगा]] की एक प्रमुख सहायक [[यमुना नदी|यमुना नदी]] के दोनों तरफ बसी है। दिल्ली देश का तीसरा बड़ा शहर है। अनुश्रुति है कि इसका वर्तमान नाम राजा ढीलू के नाम पर पड़ा जिसका आधिपत्य ई.पू पहली शताब्दी मे इस क्षेत्र पर था। बहरहाल बिजोला अभिलेखों (1170ई.) मे उल्लेखित ढिल्ली या ढिल्लिका सबसे पहला लिखित उद्धरण है। [[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
महाकाव्य-महाभारत काल से ही दिल्ली का विशेष उल्लेख रहा है। दिल्ली का शासन एक वंश से दूसरे वंश को हस्तांतरित होता गया। यह [[मौर्य वंश|मौर्यों]] से आरंभ होकर [[पल्लव|पल्लवों]] तथा मध्य भारत के गुप्तों से होता हुआ 13 वीं से 15 वीं सदी तक तुर्क और अफगान और अंत में 16 वीं सदी में [[मुग़ल|मुगलों]] के हाथों में पहुँचा। 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली में अंग्रेज़ी शासन की स्थापना हुई। 1911 में कोलकाता से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित होने पर यह शहर सभी तरह की गतिविधियों का केंद्र बन गया। 1956 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। दिल्ली के इतिहास में 69 वां संविधान संशोधन विधेयक एक महत्त्वपूर्ण घटना है। जिसके फलस्वरुप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 में लागू हो जाने से दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Red-Fort.jpg|thumb|250px|left|[[लाल क़िला दिल्ली|लाल क़िला]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Red Fort, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली का पुरातात्विक परिदृश्य अत्यंत दिलचस्प है व सहस्राब्दियों पुराने स्मारक कदम-कदम पर खड़े नजर आते हैं। नए या पुराने क़िलेबंद स्थान पर निर्मित 13 शहरों ने दिल्ली–अरावली त्रिकोण के लगभग 180 वर्ग किलोमीटर के एक सीमित क्षेत्र में अपनी मौज़ूदगी के निशान छोड़े हैं। दिल्ली के बारे मे यह किंवदंती प्रचलित है कि जिसने भी यहाँ नया शहर बनाया, उसे इसे खोना पड़ा। सबसे पुराना नगर इंद्रप्रस्थ, करीब 1400 ई.पू निर्मित किया गया था और वेद व्यास रचित महाकाव्य [[महाभारत]] में इसका वर्णन [[पांडव|पांडवो]] की राजधानी के रुप में मिलता है। इस त्रिकोण मे निर्मित दिल्ली का दूसरा शहर है अनंगपुर या आनंदपुर, जिसकी स्थापना लगभग 1020 ई. मे तोमर राजपूत नरेश अनंग पाल ने राजनिवास के रुप मे की थी। यह शहर अर्द्धवृत्ताकार निर्मित तालाब सूरजकुंड के आसपास बसा था। अनंग पाल ने बाद मे इसे 10 किलोमीटर पश्चिम की ओर लालकोट पर स्थापित एक दुर्ग मे स्थानांतरित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संभवत: एक चौहान राजपूत विशाल देव द्वारा 1153 मे इसे जीतने के पूर्व लाल कोट पर लगभग एक शताब्दी तक तोमर राजाओं का आधिपत्य रहा। विशाल देव के पौत्र [[पृथ्वीराज तृतीय]] या राय पिथोरा ने 1164 ई. मे लाल कोट के चारों ओर विशाल परकोट बनाकर इसका विस्तार किया। यह दिल्ली का तीसरा शहर कहलाता है। और क़िला राय पिथोरा के नाम से जाना गया। कई इतिहासकार इसे दिल्ली के सात शहरों में प्रथम मानते हैं। 1192 की लड़ाई मे मुस्लिम आक्रमणकारी [[मुहम्मद ग़ोरी]] ने पृथ्वीराज की हत्या कर दी। ग़ोरी यहाँ से दौलत लूटकर चले गए और अपने गुलाम [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] को यहाँ का उपशासक नियुक्त कर गए। 1206 मे ग़ोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वंय को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया और लालकोट को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया। अगली तीन शताब्दियों तक यहाँ छोटे अंतंरालों के साथ सुल्तान वंश का शासन रहा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाल कोट को एक और महत्त्वपूर्ण स्मारक कुतुब मीनार दिया। यह विजय का स्मारक था और संभवत: एक मस्जिद की मीनार थी लेकिन कुतुबुमीनार के वर्तमान स्वरुप का निर्माण [[फ़िरोज शाह तुग़लक़|फ़िरोज शाह]] ने पूरा करवाया, जिसमें उन्होंने संगमरमर के अलंकरण के काम के साथ–साथ दो और मंजिलें बनवाई जिसमे उसकी ऊँचाई 74 मीटर हो गई। एक तरफ से यह भारत मे सुल्तान वंश के गौरवपूर्ण व विजयी आगमन का प्रतीक थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख़लजी शासन (1290-1321) के दौरान दिल्ली पर मंगोल लुटेरों ने आक्रमण कर इसके असुरक्षित उपनगरों को ध्वस्त कर दिया। 1303 में अलाउद्दीन ने इसके चारों ओर 1.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक नया वृत्ताकार क़िलाबंद शहर बनवाया ताकि मंगोल पुन आक्रमण कर उपनगरों व बगीचों को ध्वस्त न कर सकें।&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-gate.jpg|thumb|[[इंडिया गेट]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt;India Gate, Delhi]]&lt;br /&gt;
कुतुब-लाल कोट संकुल के विपरीत जो शहर देहली-ए-कुहना (पुरानी दिल्ली) कहलाता था, प्रारंभ मे लश्कर या लश्करगाह (सैनिक छावनी) के नाम से जाना गया। लाल कोट के साथ जुड़ी इस चारदीवारी से घिरी नगरी को बाद मे सिरी नाम दिया गया तथा इसे ख़लजी राजधानी (दारुल ख़िलाफ़ा) के रुप में जाना गया। इसकी परिधि की दीवार लगभग 1.5 किलोमीटर लंबी थी और उसमे कई मीनार व दरवाजे बने हुए थे। सिरी की गणना आमतौर पर दिल्ली के दूसरे शहर के रुप मे होती है, किंतु यह मुस्लिम विजेताओं द्वारा भारत में स्थापित पहला पूर्णत: नया शहर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार 14 वीं शताब्दी की दिल्ली में कुतुबु-लाल कोट संकुल स्थित देहली-ए-कुहना या पुरानी दिल्ली; ग़यासपुर– किलोखड़ी स्थित शहर-ए-नउ या नया शहर और सिरी स्थित दारुल ख़िलाफ़ा या राजधानी सम्मिलित थे। 1321 मे दिल्ली तुग़लक़ों के हाथों में चली गई, क्योंकि ख़लजी वंश के अंतिम शासक की मृत्यु बिना पुरुष उत्तराधिकारी के हो गई थी। 11 तुग़लक़ शासकों ने दिल्ली पर शासन की किया लेकिन वास्तुशिल्प में केवल तीन ने रुचि दिखाई उनमे से प्रत्येक ने दिल्ली त्रिकोण में स्थित वर्तमान शहरी समूह में एक नए शहर का राजधानी के रुप मे निर्माण किया। यह शहर सुल्तानों की सैन्य प्रकृति और सुरक्षा के प्रति तुग़लक़ों की दीवानगी को दर्शाते हैं। पहले एक दुर्ग तथा बाद मे एक शहर के रुप मे विकसित इन राजधानियों मे पहला गयासुद्दीन तुग़लक़ द्वारा निर्मित किलाबंद नगर – दुर्ग तुग़लक़ाबाद (1321-25) था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुहम्मद बिन तुग़लक़ (शासनकाल 1325-51) ने एक ऐसी राजधानी की कल्पना की थी, जो साम्राज्य की इनकी योजना को प्रतिबिंबित करे। यह योजना विस्तार की अपेक्षा उसे सुदृढ़ बनाने के लिए थी। सीमा पर आक्रमण अभी रुके नहीं थे, इसलिए उन्होंने कुतुबु दिल्ली, सिरी तथा तुग़लक़ाबाद के चारों ओर एक रक्षा दीवार बनाई और जहाँपनाह नामक एक नये शहर का निर्माण करवाया। अपने निर्माण के शीघ्र बाद ही यह शहर अव्यवस्था का शिकार हो गया। अचानक मुहम्मद तुग़लक़ ने दक्कन में हाल ही में विजित क्षेत्र पर निगरानी रखने के लिए अपनी राजधानी देवगिरी ले जाने का निश्चय किया, जिसका नाम उन्होंने दौलताबाद रखा। 1338 में जहाँपनाह की आबादी को नई राजधानी के लिए कूच करने के आदेश मिले। उजाड़ दिल्ली छोटे–छोटे टुकड़ो में बंट गई और इसके खंडहर नए शहर फ़िरोज़ाबाद के लिए ईटों के भंडार साबित हुए। जो तीसरा और अंतिम तुग़लक़ कालीन शहर था। 1354 में यमुना के किनारे स्थापित यह शहर, सिरी से लगभग 8 किलोमीटर पूर्वोत्तर मे स्थित था। यह शहर यानी पाँचवीं दिल्ली फ़िरोज़ शाह, (1351-88) द्वारा बसाई गई और उन्हीं के नाम से जानी गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहा जाता है कि 14 वीं सदी की दिल्ली मे तुग़लक़ाबाद सैन्य प्रतिष्ठान था, निजामुदीन फ़क़ीरों का इलाक़ा था और उपनगर हौज़ख़ास विद्वानों की बस्ती थी। मंगोल विजय के बाद समरकंद और मध्य एशिया के विश्वविद्यालयों से शिक्षित शरणार्थी दिल्ली मे आ बसे। उच्च शिक्षा के लिए हौज़ख़ास के मदरसे की ख्याति पूरी सल्तनत में फैली हुई थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Raj-Ghat-Delhi.jpg|thumb|250px|राज घाट, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Raj Ghat, Delhi|left]]&lt;br /&gt;
तुग़लक़ों के परवर्ती सैयद (1414-1444) और लोदी (1451-1526) शासकों ने स्वयं को फ़िरोज़ाबाद तक सीमित रखा। उनके शासन काल के दौरान लगातार उपद्रव चलते रहे और उन्हे नए शहर बसाने का समय नहीं मिला। 1526 में भारत के पहले मुग़ल शासक बाबर का प्रवेश हुआ और उन्होंने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। 1530 में उनके बेटे हुमायूं गद्दी पर बैठे और उन्होंने 10 संघर्षमय वर्षो तक दिल्ली पर राज किया। 1553 में उन्होंने अपने शासन की स्थापना के उपलक्ष्य में नए शहर दीनपनाह का निर्माण किया इसके लिए बड़ी सावधानी से यमुना के किनारे एक स्थान चुना गया। अब इस शहर का नामोनिशान नहीं है। क्योंकि शेरशाह सूरी ने इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले दो मुग़ल शासकों अकबर और जहाँगीर ने आगरा को राजधानी बनाकर भारत पर शासन करना पसंद किया लेकिन दिल्ली के महत्त्व को समझकर वे बीच–बीच मे दिल्ली आते रहे। 1636 में शाहजहाँ ने अभियंताओं, वास्तुविदों तथा ज्योतिषियों को आगरा व लाहौर के बीच अच्छे जलवायु वाले स्थान के चयन का निर्देश दिया। यमुना के पश्चिमी किनारे पर पुराने क़िले के उत्तर में सुल्तानों की हजरत दिल्ली का चयन किया गया। शाहजहाँ ने यहाँ उर्दू –ए-मौला नामक एक क़िले को केंद्र में रखकर नई राजधानी का निर्माण शुरु करवाया। लाल क़िले के नाम से विख्यात यह क़िला आठ वर्षो में पूर्ण हुआ और 19 अप्रैल 1648 को शाहजहाँ ने अपनी इस नई राजधानी शाहजहाँनाबाद के क़िले में नदी के सामने वाले द्वार से प्रवेश किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहौर गेट क़िले का भव्य प्रवेशद्वार है। यहाँ से शहर की प्रमुख सड़क शुरु होकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक जाती है। 36 मीटर चौड़ी यह सड़क शहर की मुख्य धुरी थी रात को बीच के जलाशय पर पड़ती चंद्रमा की रुपहरी रोशनी ने इस स्थान को चांदनी चौक नाम दिया। यह सड़क दिल्ली का सामारोह स्थल थी। शाहजहां और औरंगजेब यहाँ अपना शाही जुलूस निकालते थे, नादिरशाह और अहमद शाह अब्दाली विद्रोही घुड़सवार के रुप में निकले थे और मराठा व रोहिल्लाओं ने विजय उल्लास मनाया था। ब्रिटिश शासनकाल में जब दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया, तो लॉर्ड हार्डिंग का जुलूस भी इसी मार्ग से निकला था। जामा मस्जिद का निर्माण 1644 में प्रारंभ हुआ और नगर प्राचीर का निर्माण 1651 से 1658 के बीच हुआ ये शहर में बनने वाले अगले महत्त्वपूर्ण स्मारक थे। अर्द्धचंद्राकार आकृति की यह दीवार 8 मीटर ऊँची, 3.5 मीटर चौड़ी व 6 किलोमीटर लंबी थी और यह लगभग 6.4 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को घेरे हुए थी। इस में सात विशाल दरवाजे थे (कश्मीरी, मोरी, काबुनी, लाहौरी, अजमेरी, तुर्कमानी और अकबराबादी) नदी की ओर की दीवार में भी तीन दरवाजे (राजघाट, किलाघाट और निगमबोधघाट) थे। शहर के प्रमुखमार्ग इन द्वारों तक जाते थे। छोटी पहाड़ी पर स्थित शाहजहाँनाबाद की जामा मस्जिद जो बादशाही मस्जिद के नाम से भी जानी जाती थी। भारत की सबसे बड़ी मस्जिद थी। 1662 में दिल्ली में हुए एक भीषण अग्निकांड में 60 हजार और 1716 में भारी वर्षा के कारण मकान ध्वस्त होने से 23 हजार लोग मारे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाहजहाँनाबाद के निर्माण के 10 वर्ष बाद ही शाहजहाँ के पुत्र औरंगज़ेब ने शहर पर कब्ज़ा करके उन्हें आगरा के क़िले में नजरबंदकर दिया और जुलाई 1658 में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया। औरंगज़ेब को विरासत में एक सघन और समृद्ध राजधानी मिली थी। लेकिन धीरे– धीरे इस शहर की अवनति शुरु हो गई, क्योंकि इसका नया शासक इसके संस्थापक के विपरीत एकदम भिन्न स्वभाव वाला था। शाहजहाँ ने कला को बढावा दिया और जिंदगी का लुत्फ उठाया औरंगज़ेब इन दोनों से दूर रहते थे। उन्हे शहर को सुदंर बनाने में न तो दिलचस्पी थी। न ही उन्हें इसका अवसर मिला। वह स्थायी रुप से शाहजहाँनाबाद में रहे ही नहीं। उनके उत्तराधिकारियों को एक विभाजित और निर्बल राज्य शासन करने को मिला। फ़ारस के लुटेरे नादिरशाह के जघन्य आक्रमण ने इस शहर पर अंतिम प्रहार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1803 में अग्रेज़ शासकों ने जब दिल्ली पर कब्ज़ा किया तब यह वाणिज्य एवं व्यवसाय का प्रमुख केंद्र थी, यद्यपि क़िलाबंद शहर भव्य कितु जीर्ण–शीर्ण गंदी बस्ती में बदल चुका था। चारदीवारी क्षेत्र में लगभग एक लाख तीस हज़ार और उपनगरों में लगभग 20 हज़ार लोग रहते है। सुरक्षा और स्थान की द्दष्टि से ब्रिटिश कमांडरों ने ईस्ट इंडिया कपनी के कार्यालय लाल क़िले के आसपास के क्षेत्र में स्थापित किए जो घनी आबादी वाला नहीं था। उत्तरी भाग में रेज़िडेंसी बनाई गई, जहाँ छावनी, अस्तबल, वनस्पति क्षेत्र, शरत्रागार और बारुद भंडार, सीमा शुल्क कार्यालय एक बैंक दो अस्पताल, कुछ बंग़ले तथा एक गिरजाघर भी बनाए गए। नई सैन्य ज़रुरतों के हिसाब से क़िलेबंद मे कुछ परिर्वतन किए गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क़िलेबंद शहर से अधिक क्षेत्र मे विस्तृत छावनी को 1828 में पश्चिमोत्तर 'रिज' पर स्थानांतरित किया गया। पहाड़ी के एक ऊँचे स्थल पर पारंपरिक एवं गॉथिक शैली में वैकल्पिक रेज़िडेंसी का निर्माण किया गया, जिसके पश्चात और भी विशाल मैटकॉफ़ हाउस बनाया गया उसका स्वामी बाद में रेज़िडेंट के स्थान पर 'एजेंट ऑफ़ डेल्ही' बना। 1840 के दशक मे छावनी क्षेत्र के आसपास आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रुप से पृथक आवासीय उपनगर का विकास हुआ, जिसे नागरिक क्षेत्र कहा गया। विलियम फ़्रेज़र तथा चाल्स मेट कॉफ़ जैसे दिल्ली के प्रारंभिक अंग्रेज़ शासक यहाँ  की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से सम्मोहित थे मुग़ल राजदरबार को पारंपरिक समारोह को मनाने की अनुमति थी तथा बादशाहों के नाम पर सिक्के ढाले जाते थे। कितु 1857 के भारतीय ग़दर के पश्चात सब कुछ यहाँ तक कि दिल्ली के प्रति ब्रिटिश शासन का रवैया भी बदल गया। विद्रोह के बाद मुग़ल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय को रंगून (वर्तमान यागून) निर्वासित कर दिया गया तथा उनके परिवारजन की हत्या कर दी गई। सेना ने राजमहल पर क़ब्ज़ा करके इसे क़िले मे बदल दिया।  क़िले के आसपास तथा परकोटे के समीप स्थित 457 मीटर क्षेत्र को सैन्य क्षेत्र घोषित कर दिया और इसके व जामा मस्जिद के बीच की तमाम इमारतें गिराकर मैदान बना दी गईं। काश्मीरी गेट से दरियागंज तक की अधिग्रहित भूमि पर छावनी को पुन: शहर में लाया गया। यह क्षेत्र पूर्व मे चारदीवारी पश्चिम में मैदान (एस्पलेनेड) व नदी के किनारे तक फैला है। क़िलेबंद शहर के एक तिहाई क्षेत्र मे छावनी बस गई। कई यूरोपीय विदेशी शहर से बाहर सिविल लाइंस में चले गए और दरियागंज के निवासी चाँदनी चौक आ गए। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jama-Masjid-Delhi.jpg|thumb|250px|जामा मस्जिद, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Jama Masjid, Delhi]]&lt;br /&gt;
जैसे ही दिल्ली के प्रशासन पर ब्रिटिश ताज का क़ब्ज़ा हुआ, तीन क्रियाशील ‘इकाइयों’ मूल नगर छावनी तथा आमतौर पर सिविल लाइंस कहलाने वाला नगरीय क्षेत्र के साथ इसके भौतिक स्वरुप ने पारंपरिक औपनिवेशिक नगर का रुप ले लिया। धीरे-धीरे दिल्ली का आधुनिकीकरण होने लगा। [[1867]] में [[कलकत्ता]] से दिल्ली के लिए पहली नियमित रेल चली। [[1910]] तक नगर मे नगरीय निकाय के शासन की स्थापना, जल वितरण और मल– जल निकास प्रणाली, दूरभाष और टेलीग्राफ़ लाइनें तथा बिजली की व्यवस्था हो गई। चाँदनी चौक में विक्टोरिया घंटाघर बनाया गया, यहाँ की नहर पाट दी गई और इसके ऊपर विद्युत ट्राम मार्ग का निर्माण हुआ। [[1877]] में [[भारत]] पर ब्रिटेन के आधिपत्य को दर्शाने के लिए ब्रिटिश महान दरबारों की श्रृंखला के पहले दरबार का आयोजन हुआ। दूसरा दरबार 1903 में एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में आयोजित हुआ। तीसरा दरबार 1911 में हुआ, जो दिल्ली के लिए एक मोड़ साबित हुआ समारोह के दौरान जॉज वी. ने घोषणा की कि भारत की राजधानी कलकत्ता से पुन: दिल्ली लाई जाएगी। इस निर्णय को राजनीतिक और प्रशासकीय, दोनों आधारों पर सही ठहराया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जनवरी]] [[1912]] मे राजनीतिक निर्णय के व्यावहारिक कार्यांवन के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई। प्रसिद्ध वास्तुविद सर एडविन लुटियंस इसके सदस्य थे जिन्होंने अंतत इस शहर को नया स्वरुप दिया। इस समिति ने स्थल चयन का कार्य प्रारंभ किया। समिति ने फसील के दक्षिण में स्थित रायसीना पहाड़ी चुनी जो न तो बहुत दूर थी और न ही बहुत पास।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिसंबर 1912 में समिति ने दिल्ली शहर के लिए लुटियंस की योजना को मंजूर कर लिया इस योजना के अनुसार, कलकत्ता के विपरीत वाइसरॉय हाउस, संसद भवन और सचिवालय को एक जगह बनाना था तथा इनका निर्माण इस योजना के केंद्र बिंदु रायसीना पहाड़ी पर नगरकोट  (एक्रोपॉलिस) में किया जाना था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हार्डिंग ने घोषणा की कि नई राजधानी का वास्तुशिल्प पूर्व और पश्चिम शैली का मिलाजुला रुप होगा। वाइसरॉय भवन से मुख्य केंद्रीय मार्ग राजपथ (किंग्सवे) प्रारंभ होता था। जो 3.2 किलोमीटर लंबा था और नदी की ओर जाता था। यह मार्ग बीच मे उत्तर– दक्षिण की ओर अपेक्षाकृत कम भव्य मार्ग से दो भागों में विभाजित होता है। जो क्वींसवे कहलाया। मुख्य मार्ग की समाप्ति एक विजय– तोरण, इंडिया गेट पर होती थी। जो प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए शूरवीरों की स्मृति का सूचक था। जब यह राजनीतिक स्थित स्पष्ट हो गई कि सत्ता वाइसरॉय से विधान सभा को हस्तांतरित की जानी है, तो लुटियंस के सहयोगी सर हरबर्ट बेकर को संसद भवन की अभिकल्पना तैयार करने के निर्देश दिए गए। बेकर ने गोलाकार भवन का डिजाइन बनाया और इसका स्थान लाल क़िले के पश्चिमोत्तर मे पुराने शहर की ओर जाने वाले मार्ग पर नियत किया गया। एक अन्य गोलाकार भवन वाणिज्यिक केंद्र कनॉट प्लेस मे भी बना, जिसकी अभिकल्पना इंग्लैड के बाथ स्थित एक भवन जैसी है। नई राजधानी का शुभारंभ जनवरी [[1931]] में हुआ।  &lt;br /&gt;
[[चित्र:Lotus-Temple.jpg|thumb|250px|left|[[लोटस मंदिर दिल्ली|लोटस मंदिर]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Lotus Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
नई दिल्ली की सड़क योजना ज्योमितिय सौंदर्यशास्त्र की धारणा पर आधारित है। समग्र योजना मे राजपथ (किंग्सवे) को मुख्य आधार मानकर बनाई गई षट्भुजों की एक श्रंखला और 96 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़के हैं। ये षटकोण तीन मार्गों के बीच स्थित थे जो गवर्नर हाउस से निकलकर ऐतिहासिक जामा मस्जिद, इंद्रप्रस्थ और सफ़दरजग के मक़बरे की ओर जाते थे तथा वर्तमान को अतीत से जोड़ते थे। शहर के आवासीय ढांचे की योजना का उदेश्य निवास की सुविधा को व्यवस्थित करना था। जगह-जगह बाग़-बगीचों का निर्माण भी किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत के तत्कालीन वाइसरॉय बेरन चार्ल्स हार्डिंग चाहते थे कि पुरानी और नई दिल्ली का संयोजन एक हो। उन्होंने निर्देश दिए कि दोनों की योजना एक शहर के रुप में हो न कि दो अलग-अलग शहरों के रुप में किंतु लुटियंस अपने संकीर्ण शहरी सौंदर्यीकरण पर जमे हुए थे। उनकी विराट योजना मे पुरानी दिल्ली महज एक महत्त्वहीन ध्वस्त होता शहरी क्षेत्र था और वह चाहते थे कि उसे ज्यों का त्यों छोड़ दिया जाए। यह पूर्वाग्रह पुरानी दिल्ली के लिए घातक सिद्ध हुआ, जिसे [[1941]] और [[1951]] के बीच आए लगभग एक लाख शरणार्थियों को निवास प्रदान करना था। जहाँ नई दिल्ली के निवासी 6-8 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर के घनत्व से अपने रहन सहन आदर्श बना रहे थे, वहीं  पुरानी दिल्ली 336 से 400 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर के बोझ से दबी जा रही थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नई और पुरानी दिल्ली के बीच यह विसंगति शुरु से ही योजनाकारों के लिए रुकावट साबित हुई। प्रथम नगर योजना मे दिल्ली को एक गंदी बस्ती के रुप मे चित्रित किया गया और [[1980]] के दशक में ही जब दूसरी नगर योजना बनी उसे विरासत क्षेत्र के रुप मे कुछ महत्त्व दिया गया। लुटियंस  की दिल्ली को सदैव परम पावन क्षेत्र समझा गया और इसकी मूल योजना तथा जनसंख्या में परिर्वतन के सुझावों का जनता एवं योजना दोनों के द्वारा विरोध किया गया। [[1970]] और [[1980]] के दशक में डी.डी.ए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) ने आवास व्यवसाय पर एकाधिकार कर लिया और वर्तमान शहरी केंद्र के आसपास विशाल भवन संकुल खड़े कर दिये गए। उच्च आय, मध्य आय और निम्न आय वर्ग के समूहों के आधार पर आवास उपलब्ध कराए गए। जो इस आय वर्ग से बाहर थे, वे अनाधिकृत बस्तियों या झुग्गी झोपड़ियों (गंदी बस्तियों) में इफ़ाज़ा कर रहे हैं। जो अब जे.जे कॉलोनी जानी जाती है। 567 अनाधिकृत बस्तियाँ राजनीतिक दबाव में वैध घोषित की जा चुकी हैं। दिल्ली की आबादी के उमड़ते सैलाब को यमुना के पूर्वी तट पर बसाया गया है। जहाँ धीरे-धीरे  एक अलग ही दिल्ली आकार ले रही है। कई बड़े बाजार आवासीय भवन और धनाढ्य लोगों की कोठियाँ शहर की दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तरी परिधि में बनाई जा चुकी है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्राचीन नगरों में गणना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Humayun's-Tomb-Delhi.jpg|thumb|250px|[[हुमायूँ का मक़बरा दिल्‍ली|हुमायूँ का मक़बरा]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Humayun's Tomb, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की संसार के प्राचीन नगरों में गणना की जाती है। महाभारत के अनुसार दिल्ली को पहली बार पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम से बसाया था&amp;lt;ref&amp;gt;(देखिए: इंद्रप्रस्थ)&amp;lt;/ref&amp;gt; किंतु आधुनिक विद्दानों का मत है कि दिल्ली के आसपास उदाहरणार्थ रोपड़ ([[पंजाब]]) के निकट [[सिंधु घाटी सभ्यता]] के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। और पुराने क़िले के निम्नतम खंडहरों में आदिम दिल्ली के अवशेष मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं वास्तव में देश में अपनी मध्यवर्ती स्थिति के कारण तथा उत्तरपश्चिम से भारत के चतुर्दिक भागों को जाने वाले मार्गों के केंद्र पर बसी होने से दिल्ली भारतीय इतिहास में अनेक साम्राज्यों की राजधानी रही है। महाभारत के युग में [[कुरुप्रदेश]] की राजधानी [[हस्तिनापुर]] थी। इसी काल में पांडवो ने अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ में बनाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जातकों के अनुसार इंद्रप्रस्थ सात कोस के घेरे में बसा हुआ था। पांडवों के वंशजों की राजधानी इंद्रप्रस्थ में कब तक रही यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता किंतु [[पुराण|पुराणों]] के साक्ष्य के अनुसार परीक्षित तथा जनमेजय के उत्तराधिकारियों ने हस्तिनापुर में भी बहुत समय तक अपनी राजधानी रखी थी और इन्हीं के वंशज निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा में बह जाने पर अपनी नई राजधानी प्रयाग के निकट [[कौशाम्बी]] में बनाई&amp;lt;ref&amp;gt;(देखिए: पार्जिटर, डायनेस्टीज़ ऑव दिकलि एज –पृष्ठ 5)&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मौर्य काल]] में दिल्ली या इंद्रप्रस्थ का कोई विशेष महत्त्व न था क्योंकि राजनैतिक शक्ति का केंद्र इस समय [[मगध]] में था। [[बौद्ध धर्म]] का जन्म तथा विकास भी उत्तरी भारत के इसी भाग तथा पाश्रर्ववर्ती प्रदेश में हुआ इसी कारण बौद्ध-धर्म की प्रतिष्ठा बढने के साथ ही भारत की राजनीतिक सत्ता भी इसी भाग (पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार) में केंद्रित रही। मौर्यकाल के पश्चात लगभग 13 सौ वर्ष तक दिल्ली और उसके आसपास का प्रदेश अपेक्षाकृत महत्त्वहीन बना रहा। हर्ष के साम्राज्य के छिन्न भिन्न होने के पश्चात उत्तरीभारत में अनेक छोटी मोटी राजपूत रियासतें बन गईं और इन्हीं में 12 वीं शती में पृथ्वीराज चौहान की भी एक रियासत थी जिसकी राजधानी दिल्ली बनी। दिल्ली के जिस भाग में कुतुब मीनार है वह अथवा महरौली का निकटवर्ती प्रदेश ही पृथ्वीराज के समय की दिल्ली है। वर्तमान जोगमाया का मंदिर मूल रुप से इन्हीं चौहान नरेश का बनवाया हुआ कहा जाता है। एक प्राचीन जनश्रुति के अनुसार [[चौहान वंश|चौहानों]] ने दिल्ली को तोमरों से लिया था जैसा कि 1327 ई. के एक अभिलेख से सूचित होता है&amp;lt;ref&amp;gt;देशोस्ति हरियानाख्य: पृथिव्यां स्वर्गसन्निभ: ढिलिकाख्या पुरी यत्र तोमरैरस्ति निर्मिता। चाहमाना नृपास्तत्र राज्यं निहितकंटकम तोमरातरं चत्र्कु:प्रजापालनतत्परा:&amp;lt;/ref&amp;gt; यह भी कहा जाता है कि चौथी शती ई. में अनंगपाल तोमर ने दिल्ली की स्थापना की थी। इन्होने इंद्रप्रस्थ के क़िले के खंडहरों पर ही अपना किला बनवाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भौतिक एव मानव भूगोल==&lt;br /&gt;
दिल्ली एक जलसंभर पर स्थित है। जो गंगा तथा सिंध नदी प्रणालियों को विभाजित करता है। दिल्ली की सबसे महत्त्वपूर्ण स्थालाकृति विशेषता पर्वत स्कंध (रिज) है, जो [[राजस्थान]] प्रांत की प्राचीन अरावली पर्वत श्रेणियों का चरम बिंदु है। अरावली संभवत: दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत माला है, लेकिन अब यह पूरी तरह वृक्ष विहीन हो चुकी है। पश्चिमोत्तर पश्चिम तथा दक्षिण मे फैला और तिकोने परकोट की दो भुजाओं जैसा लगने वाला यह स्कंध क्षेत्र 180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे फैला है। कछारी मिट्टी के मैदान को आकृति की विविधता देता है तथा दिल्ली को कुछ उत्कृष्ट जीव व वनस्पतियाँ उपलब्ध कराता है। यमुना नदी त्रिभुजाकार परकोटे का तीसरा किनारा बताती है। इसी त्रिकोण के भीतर दिल्ली के प्रसिद्ध सात शहरो की उत्पत्ति ई.पू. 1000 से 17 वीं शताब्दी के बीच हुई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:A-View-Of-India-Gate.jpg|thumb|250px|left|[[इंडिया गेट]] का एक दृश्य, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; A View Of India Gate, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सिंचाई&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के गाँवों का तेजी से शहरीकरण होने की वजह से सिंचाई के अंतर्गत आने वाली खेती योग्‍य भूमि धीरे-धीरे कम होती जा रही है। राज्‍य में ‘केशोपुर प्रवाह सिंचाई योजना चरण तृतीय’ तथा ‘जल संशोधन संयंत्र से सुधार एवं प्रवाह विस्‍तार सिंचाई प्रणाली’ नामक दो योजनाएं चलाई जा रही है। राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्‍ली के ग्रामीण क्षेत्र में 350 हेक्‍टेयर की सिंचाई राज्‍य नलकूपों द्वारा और 1,376 हेक्‍टेयर की सिंचाई अतिरिक्‍त पानी द्वारा की जा रही है। इसके अलावा 4,900 हेक्‍टेयर भूमि की सिंचाई हरियाणा सरकार के अधीन पश्चिमी यमुना नहर द्वारा की जा रही है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;बिजली&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली के लिए इसकी अपनी उत्‍पादन इकाइयों- राजघाट बिजली घर, इंद्रप्रस्‍थ स्‍टेशन और बदरपुर ताप बिजलीघर सहित गैस टरबाइन पर आधारित इकाई से 850-900 मेगावाट बिजली प्राप्‍त होती है। शेष बिजली उत्तर क्षेत्रीय ग्रिड से प्राप्‍त की जाती है। दिल्‍ली में कई बिजली उत्‍पादन इकाइयां शुरू करने की योजना है। इंद्रप्रस्‍थ एस्‍टेट में प्रगति कंबाइंड पावर प्रोजेक्‍ट स्‍थापित किया जा चुका है। 330 मेगावाट प्रगति पावर परियोजना निर्माणाधीन है और जल्‍दी ही चालू होने वाली है। इसके 100 मेगावाट वाले प्रथम चरण को परीक्षण के लिए शुरू कर दिया गया है। बिजली वितरण को सुचारू बनाने के लिए दिल्‍ली विद्युत बोर्ड का निजीकरण कर दिया गया है और दिल्‍ली की बिजली व्‍यवस्‍था अब देश की दो जानी मानी-संस्‍थाओं- बी.एस.ई.एस. तथा टाटा पावर (एन.डी.पी.एल) द्वारा देखी जा रही है।&lt;br /&gt;
==जलवायु==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|thumb|[[क़ुतुब मीनार]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Qutub Minar, Delhi]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की जलवायु उपोष्ण है। जो इसके भीतर प्रदेश होने की भू- स्थिति से प्रभावित है। दिल्ली में गर्मी के महीने [[मई]] तथा [[जून]] बेहद शुष्क और झुलसाने वाले होते है। दिन का तापमान कभी-कभी 43-45 तक पहुँच जाता है। मानसून [[जुलाई]] मे आता है। और तापमान को कम करता है। लेकिन [[सितंबर]] के अंत तक मौसम गर्म, उमस भरा और कष्टप्रद रहता है। यहाँ की वार्षिक औसत वर्षा लगभग 660 मिमी है। [[अक्टूबर]] से [[मार्च]] के बीच का मौसम काफ़ी सुहावना रहता है। हालांकि [[दिसंबर]] तथा [[जनवरी]] के महीने खूब ठंडे व कोहरे से भरे होते है। और कभी-कभी वर्षा भी हो जाती है। शीतकाल में प्रतिदिन का औसत न्यूनतम तापमान 7 डिग्री से. के आसपास रहता है, लेकिन कुछ रातें अधिक सर्द होती है।&lt;br /&gt;
==वनस्पति== &lt;br /&gt;
दिल्ली की परिवर्तनशील जलवायु के कारण तीन वानस्पतिक काल होते है। वर्षा की कमी तथा भूमिगत जलस्तर के नीचे से प्राकृतिक वनस्पति का प्रर्याप्त विकाश नहीं हो पाता। फूलों के करीब 1,000 प्रजातियाँ, जिनमे से अधिकाशं स्वदेशी मूल के है। यह यहाँ के वातावरण के अनुरुप ढल चुकी हैं, और दिल्ली शहर तथा आसपास के वातावरण मे फलफूल रहे हैं। पहाड़ियों एव नदी के तटवर्ती भूभाग की वनस्पतियाँ स्पष्टत: भिन्न है। स्कंध क्षेत्र में पाई जाने वाली पर्वतीय वनस्पतियों मे बबूल, जंगली खजूर तथा सघन झाड़ियाँ हैं। जिनमें कुछ फूलदार प्रजातियाँ भी शामिल हैं। यहाँ घास, बेले तथा लिपटने वाली अल्पायु लताएँ भी होती हैं, जो केवल बरसात के मौसम मे पनपती हैं। दूसरी ओर नदी के तट के रेतीले एव क्षारीय भूभाग में विशेषकर मानसून व ठंड के महीने में वनस्पतियाँ समृद्ध एवं भिन्न हैं।&lt;br /&gt;
==प्राणी जीवन== &lt;br /&gt;
दिल्ली में प्राणी जीवन खासा विपुल, विविध तथा देशज है तथा प्राणी विज्ञान की दृष्टि से सिस–गंगा की श्रेणी में आता है। मांसाहारी जीव प्रमुख रुप से देशी स्तनपायी हैं। लकड़बग्घे, भेड़िऐ, लोमड़ी, सियार तथा तेंदुए, जो पहले निचले जंगलों मे विचरण करते थे, अब दर्रों तथा शहर की सीमांत पहाड़ी चोटियों पर पाए जाते हैं। हिरन तथा वराह खुरदार प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अब अपनी प्राकृतिक पर्यावास में कम ही मिलते हैं। साही खरगोश, चूहे व गिलहरियां शहर के कृतंकजीव हैं तथा चमगादड़ कांटाचूहा और छछूंदर दिल्ली के कीट भक्षी प्राणी हैं। जो अक्सर मंदिरों तथा ऐतिहासिक खंडहरों के आसपास पाए जाते हैं। दिल्ली का पक्षी जीवन भी समृद्ध एवं विविध है। घरेलू कबूतर, गौरैया, चीलें, कौवे, तोते जंगली बटेर, तीतर, पूरे साल पाए जाते हैं। दिल्ली के आसपास की झीलें शीतकाल में कई प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती है। यमुना नदी में मछलियों की 65 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।&lt;br /&gt;
==प्रशासन एवं नियोजन==&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;प्रशासनिक व्यवस्था&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
दिल्ली ने प्रशासनिक व्यवस्था मे कई फेरबदल देखे हैं। [[2 अगस्त]], [[1858]] को ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम पारित किया, जिसने भारत की अंग्रेज़ी सत्ता को [[ईस्ट इंडिया कंपनी]] से ब्रिटिश राज में स्थानांतरित कर दिया। [[1876]] में महारानी विक्टोरिया के शासनाधिकार में 'भारत की सम्राज्ञी' पदवी शामिल हो गई। [[1947]] तक दिल्ली मुख्य आयुक्त की अध्यक्षता में ब्रिटिश प्रांत रही। आज़ादी के बाद [[1952]] में यह केन्द्रशासित राज्य बनी लेकिन [[1956]] में इसका दर्जा बदल गया तथा यह केंद्र सरकार के अधीन केन्द्रशासित प्रदेश हो गई। [[1958]] में शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक एकीकृत नियम की स्थापना की गई। दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिनियम [[1966]] के तहत फिर परिवर्तन किया गया तथा तीन स्तरीय प्रणाली लागू की गई, जो एक उपराज्यपाल और एक कार्यकारी परिषद, एक निर्वाचित महानगरीय परिषद तथा नगर को मिलाकर बनाई गई है। संविधान के 69 वें संशोधन द्वारा इसे [[1991]] में विशिष्ट राज्य का दर्जा एवं निर्वाचित विधान सभा दी गई। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत उप–राज्यपाल दिल्ली का प्रमुख होता है और प्रशासन मुख्यमंत्री चलाता है, जो निर्वाचित दल द्वारा नियुक्त किया जाता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sansad-Bhawan.jpg|thumb|250px|left|[[संसद भवन]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Parliament House, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्तरों का समूह&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली राज्य प्रशासनिक एवं नियोजन क्षेत्रों के कई स्तरों का समूह है। इसका दायरा 1,485 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें शहरी संकेंद्रण तथा 209 गाँव आते हैं। जो दिल्ली महरौली तहसीलों में बटे हैं। वृहद स्तर पर यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) का ही भाग है। जो नगर एव ग्रामीण संगठन (टी.सी.पी.ओ.) द्वारा [[1971]] में एक नियोजन क्षेत्र के रुप मे अलग किया गया, ताकि दिल्ली के इर्द –गिर्द भावी विकाश को दिशा दी जा सके। एन. सी. आर के अंतर्गत दिल्ली राज्य तथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान के सीमावर्ती ज़िले या तहसीलें आती हैं। यह क्षेत्र दिल्ली महानगर के आसपास लगभग 100 किलोमीटर अर्द्धव्यास में फैला है। तथा इसमे 30,242,वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आता है। क्षेत्र के भावी संतुलित विकास के लिए एक समंवित मास्टर प्लान तैयार करने हेतु [[1985]] में एन.सी.आर.बोर्ड का गठन किया गया। दिल्ली महानगर क्षेत्र उपवृहद स्तर पर है। जिनमें दिल्ली तथा निकटवर्ती राज्यों के सटे हुए शहरी भाग आते हैं। जो 3,182 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। लघु स्तर पर दिल्ली का शहरी समूह आता है, जिसका क्षेत्रफल 446 वर्ग किलोमीटर है। इसमें तीन नगरीय क्षेत्र आते हैं: नई दिल्ली नगर पालिका समिति (एन.डी.एम.सी.), नगर निगम दिल्ली (शहर), एम.सी.डी. (यू) तथा दिल्ली छावनी के साथ-साथ सेंसस द्वारा वर्गीकृत 23 उपनगर।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;महानगरीय अधिशासन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली का महानगरीय अधिशासन मुख्य रुप से नई दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली नगर निगम तथा छावनी परिषद के अधीन है। दिल्ली नगर निगम निर्वाचित निकाय है। नई दिल्ली नगरपालिका (एन.डी.एम.सी.) के सदस्य शासन द्वारा मनोनीत होते हैं। नगर निगम के दायरे में अनिवार्य नागरिक एवं उचित कल्याणकारी कार्य आते हैं। गंदी बस्तियों को हटाना एवं सुधार इसके मुख्य कार्य हैं यह अपना काम क्षेत्रीय समितियों के माध्यम से करती है। जो स्थानीय पार्षदों तथा एक या अधिक पौर–मुख्य से गठित होती है, नई दिल्ली नगर पालिका का गठन [[1933]] में हुआ यह केवल नई दिल्ली (इसे यह स्वरुप वास्तुविद् एडविन लूटियंस ने दिया था) तथा इससे लगे हुए क्षेत्रो के प्रति उत्तरदायी हैं। छावनी क्षेत्र के स्थानीय कार्य रक्षा मंत्रालय के प्रशासन में आते हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;योजना&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
महानगरीय दिल्ली की योजना की ज़िम्मेदारी दिल्ली विकाश प्राधिकरण (डी.डी.ए.) के अधीन है, जिसका गठन [[1957]] के एक संसदीय अधिनियम के तहत हुआ। शहर के प्रथम 20 वर्षों की नगर योजना (मास्टर प्लान) टी.सी.पी.ओ. द्वारा तैयार की गई तथा इसे दिल्ली की बेतरतीब वृद्धि को नियंत्रित करने तथा आम लोगों की क्रय–क्षमता योग्य एवं उपयुक्त आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वीकृत आधारों पर डी.डी.ए. द्वारा [[1962]] में लागू किया गया। शासन द्वारा 24 हजार हेक्टेयर क्षेत्र का अधिकरण करके शहरी विकाश के लिए डी.डी.ए. को सौंपा गया। इस तरह डी. डी.ए साम्यवादी विश्व से बाहर राष्ट्रीयकृत भूमि का सबसे बड़ा विकासक बन गया। विलंबित दूसरी नगर योजना [[1986]] में प्रभाव में आई तथा यह उद्योगीकरण को धीमा करने, विकेंद्रीकरण, अनेक स्थानोंको जोड़ते लोक परिवहन के प्रावधान तथा कम ऊँचाई वाली किंतु घनी आवासीय व्यवस्था पर केंद्रित थी।&lt;br /&gt;
==जनजीवन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jawaharlal Nehru Stadium.jpg|thumb|250px|[[जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम]], दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Jawaharlal Nehru Stadium, Delhi]]&lt;br /&gt;
अन्य राजधानियों की तरह दिल्ली महानगर की गतिविधियाँ भी अत्यंत सक्रिय हैं। 19 वीं सदी के अंत [[मुग़ल]] शासन काल का वैभव समाप्त हो चुका था, दिल्ली की आबादी मुश्किल से पाँच लाख थी, लेकिन धीरे-धीरे यह किसी दानव की तरह बढ़ती गई। वर्ष [[2001]] में दिल्ली की शहरी आबादी 1 करोड़ 28 लाख के लगभग पहुँच चुकी है और दिल्ली राज्य की कुल आबादी 1 करोड़ 37 लाख के लगभग पहुँच गई है। जनसांख्यिकीय विश्लेषण के अनुसार 90 प्रतिशत आबादी शहरी है। इनमें भी 85 प्रतिशत लोग तीन स्थायी नगरो मे बसते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2001 की जनगणना के अनुसार, दिल्ली की आबादी में लिंग अनुपात (प्रति1,000 पुरुषों पर महिलाएं) शहरी क्षेत्र मे 821 है, जिसमें [[1991]] के 827 के मुक़ाबले कमी आई है। यह इस बात का सूचक है कि पुरुषों का शहरों की तरफ पलायन अधिक है। दिल्ली में साक्षरता का प्रतिशत 81.82 है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। अगर हम दिल्ली के जनसांख्यिकी इतिहास पर नजर डालें, तो [[1947]] का कालखंड एक संक्रांति काल की तरह हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। इस काल मे हजारों शरणार्थी पाकिस्तान से दिल्ली आए। इनकी वजह से न केवल यहाँ का जनसांख्यिकी ढांचा बदला, बल्कि दिल्ली के सामाजिक– सांस्कृतिक और आर्थिक स्वरुप में भी परिर्वतन आया। तब से शहर प्रवासियों की वजह से फैलता गया। हाल के दशकों मे यहाँ जन्म-दर गिरी है, लेकिन प्रवासियों की आबादी का एक–तिहाई से अधिक हिस्सा प्रवासियों का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहर के मुख्य धार्मिक समूहों में (1991 की जनगणना के अनुसार) [[हिंदू धर्म|हिंदू]] (लगभग 83 प्रतिशत), [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]] (लगभग नौ प्रतिशत) हैं। जनसंख्या के शेष चार प्रतिशत का निर्माण [[जैन धर्म|जैन]], [[सिक्ख धर्म|सिक्ख]]ईसाई, [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]] और अन्य लोग करते हैं। अधिकांश लोग हिंदी या उसका परिवर्तित रुप हिंदुस्तानी बोलते हैं। [[पंजाबी भाषा]] पंजाबियों द्वारा बोली जाती है। तथा [[उर्दू]] मुसलमानों द्वारा बोली जाती है। विभिन्न प्रांतों से आए आप्रवासी अपनी-अपनी भाषा बोलते हैं, लेकिन कामचलाऊ हिंदी सीखने की कोशिश करते हैं। शिक्षित वर्ग द्वारा अंग्रेज़ी समझी व बोली जाती है।&lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था== &lt;br /&gt;
किसी भी ऐतिहासिक राजधानी की तरह दिल्ली भी वैविध्यपूर्ण केंद्र है, जिसमे प्रशासन, सेवाएं और निर्माण अच्छी तरह मिले–जुले हैं। दिल्ली कला एव हस्तकौशल की प्रचुर विविधता का केंद्र रहा है। मुग़ल काल में दिल्ली रत्न और आभूषण, धातु पच्चीकारी, कसीदाकारी, सोने की पच्चीकारी, रेशम और जरी का काम, मीनाकारी और शिल्प, मूर्तिकला और चित्रकला के लिए विख्यात थी। &lt;br /&gt;
दिल्ली का वर्तमान प्रशासकीय महत्व उस समय से है, जब भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया और [[ब्रिटिश साम्राज्य]] की राजधानी, वाणिज्यिक और सेवा केन्द के रुप में विकसित हो गई। यहाँ की लगभग तीन–चौथाई आबादी व्यापार लोक प्रशासन, सामुदायिक, सामाजिक और निजी सेवाओं में संलग्न है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;कृषि और खनिज&amp;lt;/u&amp;gt;==== &lt;br /&gt;
गेहूँ, बाजरा, ज्‍वार, चना और मक्‍का की प्रमुख फसलें हैं, लेकिन अब किसान अनाज वाली फसलों की बजाय फलों और सब्जियों, दुग्‍ध उत्‍पादन, मुर्गी पालन, फूलों की खेती को ज्‍यादा महत्‍व दे रहे हैं। ये गतिविधियाँ खाद्यान्‍नों, फसलों के मुक़ाबले अधिक लाभदायक साबित हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Akshardham-Temple-Delhi.jpg|thumb|250px|left|[[अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली|अक्षरधाम मंदिर]], दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt;Akshardham Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;उद्योग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्‍ली न केवल उत्तर भारत का सबसे बड़ा व्‍यावसायिक केंद्र है, बल्कि यह लघु उद्योगों का भी सबसे बडा केंद्र है। इनमें टेलीविजन, टेपरिकार्डर, हल्‍का इंजीनियरिंग साज-सामान, मशीनें, मोटरगाडियों के हिस्‍से पुर्जे, खेलकूद का सामान, साइकिलें, पी.वी.सी. से बनी वस्‍तुएं जूते-चप्‍पल, कपडा, उर्वरक, दवाएं, हौजरी का सामान, चमड़े की वस्‍तुएं, साफ्टवेयर आदि विभिन्‍न वस्‍तुएं बनाई जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
20 वीं सदी के प्रारंभ में यहाँ आधुनिक उद्योगों का प्रवेश हुआ। यहाँ के बड़े उद्योगों मे कपास की ओटाई, कताई और बुनाई; आटा एव मैदा की मिलें पैकिंग; गन्ने व तेल का प्रसंस्करण प्रमुख थे। लघु उद्योगों में मुद्रण, जूता निर्माण, कसीदाकारी, बेकरी, शराब निर्माण लोहा तथा पीतल का काम होता है। [[1980]] के दशक से औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि शुरु हुई। [[1981]] में 50 हजार पंजीकृत औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढकर [[1990]] में 81 हजार हो गई। इस कालखंड में औद्योगिक निवेश, उत्पादन और रोजगार मे भी लगभग दुगुनी वृद्धि हुई। 1990 के दशक मे इस शहर के आर्थिक स्वरुप मे महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया और पुरानी दिल्ली ने उत्तर भारत के थोक वाणिज्यिक केंद्र के रुप में अपनी पहचान को और अधिक सुद्ढ़ बना लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्‍ली की नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेलीकम्‍यूनि‍केशन, सॉफ्टवेयर उद्योग तथा सूचना प्रौद्योगिकी को समर्थ सेवा बनाने वाले उद्योग लगाने पर बल दिया गया है। दिल्‍ली में ऐसी औद्योगिक इकाइयां लगाने को प्रोत्‍साहन दिया जा रहा है, जिनसे प्रदूषण नहीं फैलता और जिनमें कम कामगारों की आवश्‍यकता होती है। दिल्‍ली राज्‍य औद्योगिक विकास निगम ओखला स्थित व्‍यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र के भवन में रत्‍न, आभूषण और परख तथा मीनाकारी का एक प्रशिक्षण संस्‍थान खोल रहा है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;परिवहन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Metro-Delhi-1.jpg|thumb|250px|मेट्रो रेल, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Metro Train, Delhi]]&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने दिल्‍ली शहर में बढ़ते वाहन प्रदूषण और यातायात की अस्‍त-व्‍यस्‍त स्थिति को देखते हुए मास रैपिड ट्रांजिट प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया। यह परियोजना कार्यान्वित की जा रही है और इसमें अति आधुनिक तकनीक का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली मेंमेट्रो रेल परियोजना आ गई है। अब दिल्‍ली मेट्रो के प्रथम चरण में तीन मेट्रो कारीडोर हैं जो रिकार्ड समय में पूरे होकर काम भी करने लगे हैं। शाहदरा से रिठाला और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से‍ कें‍द्रीय सचिवालय के बीच लाइनें बिछ गई हैं और इन पर गाडियाँ भी चलने लगी हैं। बाराखंभा और द्वारका के बीच तीसरी लाइन भी चालू हो गई है। दिल्‍ली मेट्रो के द्वितीय चरण को भी स्‍वीकृत मिल गई है जिससे राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र के यात्रियों को बेहतर संपर्क सुविधा प्राप्‍त हो सकेगी। दिल्‍ली सडकों, रेल लाइनों और विमान सेवाओं के जरिये भारत के सभी भागों से भलीभांति जुड़ी हुई है। यहाँ तक तीन हवाई अड्डे हैं। इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डा अंतर्राष्‍ट्रीय उड़ानों के लिए पालम हवाई अड्डा घरेलू उड़ानों के लिए तथा सफदरजंग हवाई अडडा प्रशिक्षण उड़ानों के लिए इस्‍तेमाल किया जा रहा है। दिल्‍ली में तीन महत्‍वपूर्ण रेलवे स्‍टेशन भी हैं। ये दिल्‍ली जंक्‍शन, नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन और निजामुद्दीन रेलवे स्‍टेशन के नाम से जाने जाते हैं। तीन अंतर्राष्‍ट्रीय बस अड्डे- कश्‍मीरी गेट, सराय काले खां और आनंद विहार में हैं।&lt;br /&gt;
==वास्तुकला==&lt;br /&gt;
दिल्ली के वैविध्यपूर्ण इतिहास ने विरासत में इसे समृद्ध वास्तुकला दी है। शहर के सबसे प्राचीन भवन सल्तनत काल के हैं और अपनी संरचना व अलंकरण मे भिन्नता लिए हुए हैं। प्राकृतिक रुपाकंनों, सर्पाकार बेलों और कुरान के अक्षरों के घुमाव में हिंदू राजपूत कारीगरों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। मध्य एशिया से आए कुछ कारीगर कवि और वास्तुकला की सेल्जुक शैली की विशेषताएं मेहराब की निचली कोर पर कमल- कलियों की पंक्ति, उत्कीर्ण अलंकरण और बारी-बारी से आड़ी और खड़ी ईटों की चिनाई है। ख़लज़ी शासन काल तक इस्लामी वास्तुकला में प्रयोग तथा सुधार का दौर समाप्त हो चुका था और इस्लामी वास्तुकला में एक विशेष पद्धति और उपशैली स्थापित हो चुकी थी जिसे पख्तून शैली के नाम से जाना जाता है। इस शैली की अपनी लाक्षणिक विशेषताएं हैं। जैसे घोड़े के नाल की आकृति वाली मेहराबें, जालीदार खिड़कियां, अलंकृत किनारे बेल बूटों का काम (बारीक विस्तृत रुप रेखाओं में) और प्रेरणादायी, आध्यात्मिक शब्दांकन बाहर की ओर अधिकांशत: लाल पत्थरों का तथा भीतर सफ़ेद संगमरमर का उपयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तुकला की परंपरा में बदलाव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Indira-Gandhi-International-Airport-Delhi.jpg|thumb|250px|left|इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt; Indira Gandhi International Airport, Delhi]]&lt;br /&gt;
तुग़लकों ने वास्तुकला की परंपरा में बदलाव कर अलंकरण का तत्व समाप्त कर दिया इस काल मे स्लेटी पत्थरों वाले सीधे सपाट निर्माण को प्राथमिकता दी गई उनकी इमारतों मे एक दूसरे पर आधारित छतों वाली सादी मेहराबों कुरान की आयत से खुदे किनारों और भट्टी मे रंगी टाइलों को प्रभावशाली ढंग से शामिल किया गया। तुग़लकों ने अपने भवनों मे सजावट पर कम, और उनकी आकृति की भव्यता पर अधिक जोर दिया। सैयद और लोदी काल में गुंबदीय ढांचे की दो जटिल शैलियां प्रचलित हुईं। निम्न अष्टभुजाकार आकृति वाली शैली जिसका जमीनी क्षेत्रफल काफ़ी विशाल होता था। और ऊँची वर्गाकार शैली जिसमें भवन का अग्रभाग चारो ओर से गुजरने वाली पट्टी और फलक  श्रंखला रुपी सजावटी तत्त्व से विभाजित होता था, जो इन्हे दो या तीन मंजिल जैसे होने का रुप देती प्रतीत होती थी। लोदी काल में बगीचे वाले मकबरों का निर्माण भी हुआ। इस काल की मस्जिदों में मीनारें नहीं होती थी। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वास्तविक गौरव&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली की वास्तुकला का वास्तविक गौरव मुग़ल कालीन है। दिल्ली में [[हुमायूँ]] का मक़बरा मुगल वास्तुकला का प्रथम महत्त्वपूर्ण नमूना है। हुमायूं के मकबरे को 1565 ई. में उसकी बेग़म हमीदा बानू ने बनवाया था। इसमें हमीदा की क़ब्र भी हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न कालों में बनी [[दारा शिकोह]] फ़ुरुख़सियर तथा आलमगीर द्वितीय आदि की भी क़ब्रें यहीं स्थित हैं। कहा जाता है कि मुग़ल परिवार के तथा उससे संबंधित 90 से अधिक व्यक्तियों की क़ब्रें यहाँ हैं। 1857 की राज्यकांति में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह को मुग़लों ने यहीं क़ैद किया था। ताजमहल का अग्रगामी यह निर्माण भारत का पहला पूर्ण विकसित बगीचे वाला मक़बरा भी है। इसने भारतीय वास्तुकला में ऊँची मेहराबों और दोहरे गुंबदों की शुरुआत की जो मुगल वास्तुकला के प्रतिनिधि नमूने लाल क़िले में दिखाई देते हैं। इसमें निर्मित नक़्क़ारख़ाने, दीवार-ए-आम और दीवार-ए-ख़ास, महल तथा मनोरंजन कक्ष, छज्जे, हमाम, आंतरिक नहरें और ज्यामितीय सौंदर्यबोध के साथ निर्मित बगीचे तथा एक अलंकृत मस्जिद देखते ही बनते हैं। जामा मस्जिद मुग़लकालीन मस्जिदों की वास्तविक प्रतिनिधि है। यह पहली मस्जिद है, जिनमें मीनारें भी हैं। अधिकांश भवनों में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। जिनमें नक़्क़ाशी तथा बहुरंगी पत्थरों की सजावट के नायाब नमूने हैं। &lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;आंग्ल वास्तुकला&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
दिल्ली की आंग्ल वास्तुकला औपनिवेशिक तथा मुग़लकालीन कला का प्रतीक है। यह वाइसरॉय के आवास संसद भवन और सचिवालय के विशाल भवनों से लेकर आवासीय बंगली और दफ्तरों जैसी उपयोगी इमारतों तक वैविध्यपूर्ण है। स्वतंत्र भारत में वास्तुकला ने अपनी अलग उपशैली विकसित करने का प्रयास किया है। देशज तथा पश्चिमी शैली के मिश्रित स्वरुप में स्थानीय उपशैलीयों की छटा दिखाई देती है। सर्वोच्च न्यायालय भवन, विज्ञान भवन विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालय कनॉट प्लेस के आसपास की इमारतें इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। हाल ही में दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कुछ वास्तुकार हुए जिन्होंने दिल्ली के परिदृश्य में कुछ आकर्षण भवन जोड़े हैं। जिन्हें उत्तर-आधुनिक कहा जाता है। टीकाकरण संस्थान, भारतीय जीवन बीमा निगम का मुख्यालय और बहाई मंदिर इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं।&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lotus-Temple.jpg|thumb|250px|कमल मन्दिर (लोटस मन्दिर), दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Lotus Temple, Delhi]]&lt;br /&gt;
{{मुख्य|दिल्ली पर्यटन}}&lt;br /&gt;
दिल्‍ली एक आकर्षक पर्यटन स्थल है। दिल्‍ली में मंदिरों से लेकर मॉल तक, किलों से लेकर उद्यान और अनेक ऐतिहासिक इमारतें और क़िले हैं जो इतिहास की जीवंत निशानियाँ हैं। प्रतिवर्ष लाखों सैलानी दिल्‍ली आते हैं और यहाँ की मिश्रित संस्‍कृति को जानने की कोशिश करते हैं। दिल्‍ली राज्‍य पर्यटन और परिवहन विकास निगम पर्यटकों को यहाँ के विभिन्‍न स्‍थानों की सैर कराने के लिए विशेष बस सेवाएं चलाता है। निगम ने पैरा सेलिंग, रॉक क्‍लाइंबिंग और बोटिंग जैसी साहसिक गतिविधियों के लिए सुविधाएं विकसित की हैं। निगम ने ’दिल्‍ली हाट’ का विकास किया है, जहाँ काफ़ी और विभिन्‍न राज्‍यों की खाद्य वस्‍तुएँ एक जगह उपलब्‍ध हैं। दिल्‍ली के विभिन्‍न भागों में ऐसी ही 'हाट' बनाने की योजना है। &lt;br /&gt;
==खानपान==&lt;br /&gt;
दिल्‍ली में खाने पीने की बहुत सी दुकानें और भोजमनालय हैं। देश के विभिन्‍न प्रांतों के व्‍यंजनों का स्‍वाद लेने के लिए दिल्‍ली हाट का रुख कर सकते हैं। यहां देश के लगभग हर भाग का भोजन मिलता है। कुल मिलाकर दिल्‍ली में हर तरह के भोजन का जायका लिया जा सकता है। दिल्‍ली में चाँदनी चौक एक जगह है जो फ्रूट चाट, गोल गप्‍पों, पकौड़ों और बहुत सी चीजों के लिए मशहूर है। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''पराठें वाली गली'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्‍ली की पराठें वाली गली के पराठे सालों से लोगों की पसंद रहे हैं। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''मिठाई'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाँदनी चौक के पास ही दिल्‍ली में मिठाइयों की सबसे पुरानी दुकान घंटेवाला है। &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''चिकन करी'''&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोका रोड पर बने आंध्र भवन की चिकन करी बहुत की पसंद की जाती है। &lt;br /&gt;
==खरीददारी==&lt;br /&gt;
दिल्‍ली में छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शोरूम भी हैं। उच्‍च वर्ग को साउथ एक्‍स और करोल बाग का बाज़ार पंसद आता है, वहीं टैंक रोड, सरोजनी नगर, जनपथ, पालिका बाज़ार, मॉनेस्‍ट्री, गफार मार्केट आदि मध्‍यम वर्ग को लुभाता है। साउथ एक्‍स में सभी अंतर्राष्‍ट्रीय ब्रैंड के कपड़े और अन्‍य सामान मिलता है। गफ्फार मार्केट मुख्‍य रूप से बिजली के सामान के लिए जानी जाती है। चांदनी चौक और उसके आसपास हाथ से तराशे हुए सोने चांदी के बेहतरीन जेवर मिल जाएंगे। दरियागंज में रविवार को लगने वाली किताबों की दुकानों में आपको कार्ल मार्क्‍स से लेकर जवाहर लाल नेहरु तक पर लिखी किताबें मिल सकती हैं।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|250px|बस, दिल्ली &amp;lt;br /&amp;gt;Bus, Delhi]] &lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''वायु मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देश के लगभग सभी हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है। विदेशों से भी विमान यहाँ आती हैं।&lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''रेल मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली में पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन, सराय रोहिल्ला और दिल्ली छावनी स्टेशन हैं जो दिल्ली को अन्य शहरों से जोड़ते हैं। सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रैस दिल्ली से [[कलकत्ता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]], [[बैंगलोर]] और [[हैदराबाद]] महानगरों के बीच चलती हैं। शताब्दी एक्सप्रैस दिल्ली को प्रमुख राज्यों की राजधानियों [[भोपाल]], [[अमृतसर]] और [[लखनऊ]] से जोड़ती है।&lt;br /&gt;
*&amp;lt;u&amp;gt;'''सड़क मार्ग'''&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से [[बर्धमान]], [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और [[आगरा]] के रास्ते कोलकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते मुंबई से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए अमृतसर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से [[रामपुर]] और [[मुरादाबाद]] के रास्ते लखनऊ से जुड़ी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्‍योहार==&lt;br /&gt;
महानगर होने की वजह से दिल्ली में भारत के सभी प्रमुख त्‍यौहार मनाए जाते हैं। दिल्‍ली पर्यटन और परिवहन विकास निगम कुछ वार्षिक उत्‍सवों का भी आयोजन करते हैं। ये रोशनआरा उत्‍सव, शालीमार उत्‍सव, कुतुब उत्‍सव, शीतकालीन मेला, उद्यान और पर्यटन मेला, जहाने-खुसरो उत्‍सव तथा आम महोत्‍सव हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://delhigovt.nic.in/index.asp अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>सोनू</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%9B%E0%A4%A0&amp;diff=83872</id>
		<title>कार्तिक छठ</title>
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		<updated>2010-11-10T12:41:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;सोनू: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
हिन्दू चंद्रमास में [[कार्तिक]] माह के छठे दिन छठ त्यौहार मनाया जाता है। छठ दो शब्दों के मेल से बना है जिसमें छः अर्थात हाथ-हाथ योग (तपस्या विज्ञान) को दर्शाता है। इसमें सूर्य की अराधना की जाती है। भगवान [[सूर्य देवता|सूर्य देव]] की आराधना का सबसे बड़ा पर्व छठ सूर्य देव को अर्ग देने का स्वर्णिम अवसर होता है। सभी नदियों और घाटों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है तो यह समझते देर नहीं लगती कि छठ पर्व आ गया है। उत्तर [[भारत]] के [[बिहार]], [[उत्तर प्रदेश]] में छठ श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाने वाला सबसे बड़ा पर्व है। &lt;br /&gt;
*पूजा का पहला दिन नहाय-खाय जिसमें [[गंगा नदी]] में नहाया जाता है और वहाँ के पानी से घर को पवित्र किया जाता है। &lt;br /&gt;
*पर्व का दूसरा दिन खरना है जिसमें सूर्यास्त के बाद शाम को पूजा के पश्चात प्रसाद ग्रहण किया जाता है इसमें गेहूँ के आटे, केले, खीर और चावल का ग्रहण प्रसाद के रुप में किया जाता है। उसके पश्चात पूरे घर के सदस्य दिन के पूर्व सध्या में नदी के किनारे प्रसाद या डूबते सूर्य को अर्घ्य देते है। इस डूबते सूर्य की आराधना में व्रती नदी में खड़े होते हैं और सभी सदस्य बारी-बारी से अर्घ्य देते हैं। यह पर्व उगते सूर्य को अर्ध्य देने के साथ समाप्त हो जाता है, जिसके पश्चात सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं। &lt;br /&gt;
==अनुष्ठान==&lt;br /&gt;
त्यौहार का अनुष्ठान अत्यंत कठोर होता हैं जिसमें व्रती या उपासक को उपवास रखना होता है। उन्हें लंबे समय तक पानी में खड़े रहना पड़ता है। इस पर्व में शाकाहारी भोजन किया जाता है और नमक, लहसुन और प्याज तक से परहेज किया जाता है। पूजा के दौरान बांस से बने सूप में मिठाई, फल, बांस एवं इससे बनीं सामग्री, फूल, नारियल, गेहूँ से बने ठेकुए, गन्ना, गुड़, अगरबत्ती इत्यादि को रखा जाता है और इससे पूजा की जाती है। इस दौरान महिलाएं भगवान सूर्य का गुणगान करती हैं स्वादिष्ठ पकवान, अंगूर, नारियल, मिठाई त्यौहार का मुख्य हिस्सा हैं। &lt;br /&gt;
==सूर्य की उपासना==&lt;br /&gt;
सूर्य की उपासना भारतीय संस्कृति का सदा से ही अभिन्न अंग रही है। कार्तिक मास में होने वाली छठ पूजा वस्तुतः सूर्यदेव की ही आराधना है। सूर्य की उपासना के तर्क भी हैं। सूर्य मानवमात्र के लिए अत्यंत उपयोगी है। हमारी संस्कृति में पालन-पोषण करने वाले और मुश्किलों से बाहर्व निकालने वाले को ही भगवान मानकर पूजा जाता है। सूर्यनारायण बिना किसी भेद-भाव के सबको नित्य दर्शन, ऊर्जा और आरोग्यता देते हैं। वे जीवन के देवता हैं। पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ और मनुष्य सभी उनसे ही अनुप्राणित हैं। प्रकाश, ताप और ऊर्जा के अक्षय स्त्रोत भगवान सूर्य के प्रति मानव आदिकाल से ही श्रद्धावतन रहा है। सूर्य की जीवनीशाक्ति और अक्षय ऊर्जा के कारण उनकी पूजा की प्रथा संसार की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं- [[मिस्त्र]], [[मेसोपोटामिया]], भारत, [[चीन]] आदि में मिलती है। [[ऋग्वेद]] में भी सूर्य-महिमा का उल्लेख है। सूर्य देव आकाश में उदित होकर गरीब- अमीर, सभी को अपनी रश्मियों से ऊर्जा प्रदान करते हैं। &lt;br /&gt;
==पुराणों में उल्लेख==&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] में उल्लेख है कि सूर्य की आराधना से तन-मन स्वस्थ रहता है। यह तथ्य सबसे पहले शुक्लयजुर्वेद में प्रतिपादित हुआ है। [[अथर्ववेद]] ने भी सूर्य की रश्मियों में आरोग्यदायिनी शाक्ति होने की पुष्टि की। बाद में वैज्ञानिकों ने भी इसे माना और सूर्य चिकित्सा की पद्धति विकसित हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाल्मीकि [[रामायण]] में [[रावण]] पर विजय प्राप्त करने से पूर्व भगवान [[श्रीराम]] के द्वारा सूर्योपासना किए जाने का विवरण मिलता है। मान्यता है कि सूर्योपासना से आत्मविश्वास जागता है और मनोबल पुष्ट होता है। &lt;br /&gt;
==डूबते सूर्य को अर्घ्य==&lt;br /&gt;
कार्तिक शुक्ल अष्टमी को हम सूर्यदेव के अनंत उपकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। इसी माह में धान की बालियां पकने लगती हैं। अधिकांश वृक्ष फलों से लद आते हैं। खेतों में रस भरी ईखें झूमने लगती हैं। शकरकंद, सिंघाड़ा आदि फल तथा कंद मूल पक जाते हैं। केले के फल पीताभ हो आते हैं। ये प्राकृतिक वस्तुएँ सूर्यदेव को अर्पित होती हैं। ये सूर्य द्वारा ही तो प्रदत्त हैं। त्वदीयं वस्तु गोविन्द, तुम्यमेव समर्पये के भाव से उन्हें प्रातः एवं सायं जल में खड़े होकर अर्पित करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्य को प्रथम अर्घ्य संध्या में प्रदान किया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लोक में कहावत चलती है। कि उगते सूर्य को तो सभी नमस्कार करते हैं, डूबते सूर्य को कोई नहीं पूछता। इसके विपरित छठ पर्व यह संदेश देता है कि जो परोपकारी हैं, उसे सदा श्रद्धा दो। उसके अवसान के समय, उससे मुख नहीं मोड़ो। यह संदेश नई पीढ़ी के लिए है, जो अपने वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा करते हैं। इस पावन आयोजन से शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता है। केवल घाटों की शोभा निहार कर तथा प्रसाद पालन से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। इस पर्व पर सांस्कृतिक छटा देखने लायक होती हैं। नदी-सरोवर के घाट इस सूर्य-महोत्सव के समय खूब सजाये जाते हैं। सरकार भी घाटों की स्वच्छता में योगदान देने लगी हैं। व्रती कदल-स्तंभों के तोमर एवं आम्र-पत्रों तथा [[भारत के पुष्प|पुष्पों]] के वंदनकार बनाते हैं। रंग-बिरंगे बल्बों से घाटों को अद्भुत आकर्षण मिलता है। संगीत एवं वाद्य के स्वर वातावरण को गुंजायमान कर दर्शकों को बरबस खींच लाते हैं। छठ लोक पर्व है, अतः इससे संबंधित मधुर लोक गीत भी खूब लिखे गए हैं। महिला कंठों से निस्सृत हो यह लोक संगीत छठ पर्व के प्रमुख आकर्षणों में है। घाट पर जाते समय एवं वहाँ से लौटते समय उन गीतों के स्वर से संपूर्ण परिवेश अद्भुत होकर लोगों के मन-प्राणों को प्रभावित कर देता है। एक लोक गीत की छटा देखें-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कहवां की सूरज के जनमवां, कहवा ही होखे ला अंजोरा &lt;br /&gt;
स्वर्ग में ही सूरज के जनमवा, कुरु खेते होखे ला अंजोर &lt;br /&gt;
गरजी के बोललन सूरज भल, के करहीं वरत हमार॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्व और त्योहार}}&lt;br /&gt;
{{व्रत और उत्सव}}&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्व और त्योहार]]&lt;br /&gt;
[[Category:व्रत और उत्सव]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>सोनू</name></author>
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