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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>श्रावस्ती</title>
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		<updated>2011-10-15T12:14:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Jain-Temple-Sravasti.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
|विवरण=[[भारत]] के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य के [[गोंडा ज़िला|गोंडा]]-[[बहराइच ज़िला|बहराइच]] ज़िलों की सीमा पर [[श्रावस्ती ज़िला|श्रावस्ती ज़िले]] में यह [[बौद्ध]] एवं [[जैन]] [[तीर्थ स्थान]] स्थित है। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[श्रावस्ती ज़िला|श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=प्राचीन काल से ही रामायण, महाभारत, जैन, बौद्ध आदि अनेक उल्लेख&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 27.517073°; पूर्व- 82.050619°&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=श्रावस्ती [[बलरामपुर]] से 17 कि.मी., [[लखनऊ]] से 176 कि.मी., [[कानपुर]] से 249 कि.मी., [[इलाहाबाद]] से 262 कि.मी., [[दिल्ली]] से 562 कि.मी. की दूरी पर है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=पुरावशेष। ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल।&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[अक्टूबर]] से [[मार्च]]&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=हवाई जहाज़, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है। &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=लखनऊ हवाई अड्डा&lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=बलरामपुर रेलवे स्टेशन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=मेगा टर्मिनस गोंडा, श्रावस्ती शहर से 50 किलोमीटर की दूरी पर है &lt;br /&gt;
|यातायात=टैक्सी और बस &lt;br /&gt;
|क्या देखें=पुरावशेष&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=&lt;br /&gt;
|क्या खायें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=&lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?q=Shravasti&amp;amp;hl=en&amp;amp;ll=27.599586,82.09259&amp;amp;spn=0.536701,1.352692&amp;amp;client=firefox-a&amp;amp;hq=Shravasti&amp;amp;t=m&amp;amp;z=10&amp;amp;vpsrc=6&amp;amp;iwloc=A गूगल मानचित्र]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[जेतवन श्रावस्ती|जेतवन]], [[शोभनाथ मन्दिर श्रावस्ती|शोभनाथ मन्दिर]], [[कौशल महाजनपद]] आदि&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=[[भाषा]]&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिन्दी]], [[अंग्रेज़ी]] और [[उर्दू भाषा|उर्दू]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी='श्रावस्ती' न केवल [[बौद्ध]] और [[जैन]] धर्मों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था अपितु यह ब्राह्मण धर्म एवं [[वेद|वेद विद्या]] का भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://shravasti.nic.in/ आधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|17:27, 7 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य के [[गोंडा ज़िला|गोंडा]]-[[बहराइच ज़िला|बहराइच]] ज़िलों की सीमा पर यह [[बौद्ध]] [[तीर्थ|तीर्थ स्थान]] है। गोंडा - [[बलरामपुर]] से 12 मील पश्चिम में आधुनिक '''सहेत-महेत''' गाँव ही '''श्रावस्ती''' है। पहले यह [[कौशल]] देश की दूसरी राजधानी थी। भगवान [[राम]] के पुत्र [[लव कुश]] ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। श्रावस्ती [[बौद्ध]] [[जैन]] दोनों का [[तीर्थ]] स्थान है, [[तथागत]] श्रावस्ती में रहे थे, यहाँ के श्रेष्ठी 'अनाथपिण्डिक' ने भगवान [[गौतम बुद्ध|बुद्ध]] के लिये '''जेतवन विहार''' बनवाया था, आजकल यहाँ बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर है।&lt;br /&gt;
==प्राचीन नगर==&lt;br /&gt;
यह [[कौशल|कोसल-जनपद]] का एक प्रमुख नगर था। यहाँ का दूसरा प्रसिद्ध नगर [[अयोध्या]] था। श्रावस्ती नगर [[अचिरावती नदी]] के [[तट]] पर बसा था, जिसकी पहचान आधुनिक [[राप्ती नदी]] से की जाती है। इस सरिता के तट पर स्थित आज का सहेत-महेत प्राचीन श्रावस्ती का प्रतिनिधि है। इस नगर का यह नाम क्यों पड़ा, इस संबंध में कई तरह के वर्णन मिलते हैं। [[बौद्ध धर्म]]-ग्रन्थों के अनुसार इस समृद्ध नगर में दैनिक जीवन में काम आने वाली सभी छोटी-बड़ी चीज़ें बहुतायत में बड़ी सुविधा से मिल जाती थीं, अतएव इसका यह नाम पड़ गया था।&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
प्राचीन श्रावस्ती के अवशेष आधुनिक ‘सहेत’-‘महेत’ नामक स्थानों पर प्राप्त हुए हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्टस, भाग 1,पृष्ठ 330; तत्रैव, भाग 11, पृष्ठ 78 और आगे। &amp;lt;/ref&amp;gt; यह नगर 27°31’ उत्तरी अक्षांश और 82°1’ पूर्वी देशांतर पर स्थिर था।&amp;lt;ref&amp;gt;एम. वेंक्टरम्मैया, श्रावस्ती, आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, दिल्ली 1981, पृष्ठ 1&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘सहेत’ का समीकरण ‘जेतवन’ से तथा ‘महेत’ का प्राचीन 'श्रावस्ती नगर' से किया गया है। प्राचीन टीला एवं भग्नावशेष गोंडा एवं बहराइच ज़िलों की सीमा पर बिखरे पड़े हैं, जहाँ बलरामपुर स्टेशन से पहुँचा जा सकता है। बहराइच एवं बलरामपुर से इसकी दूरी क्रमश: 26 एवं 10 मील है।&amp;lt;ref&amp;gt;विमलचरण लाहा, प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल, उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, लखनऊ, 1972, पृष्ठ 210&amp;lt;/ref&amp;gt; आजकल ‘सहेत’&amp;lt;ref&amp;gt;जेतवन&amp;lt;/ref&amp;gt; का भाग बहराइच ज़िले में और ‘महेत’ गोंडा ज़िले में पड़ता है। बलरामपुर - बहराइच मार्ग पर सड़क से 800 फुट की दूरी पर ‘सहेत’ स्थित है जबकि ‘महेत’ 1/3 मील की दूरी पर स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;दि मेमायर्स ऑफ द आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भाग 50, [[दिल्ली]] 1935 में उद्धृत विमलचरण लाहा का लेख ‘श्रावस्ती इन इंडियन लिटरेचर’, पृष्ठ 1&amp;lt;/ref&amp;gt; विंसेंट स्मिथ ने सर्वप्रथम श्रावस्ती का समीकरण '''चरदा''' से किया था जो ‘सहेत-महेत’ से 40 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, 1900, पृष्ठ 9&amp;lt;/ref&amp;gt; लेकिन जेतवन के [[उत्खनन]] से गोविंद चंद गहड़वाल के 1128 ई. के एक [[अभिलेख]] की प्राप्ति से इसका समीकरण ‘सहेत-महेत’ से निश्चित हो गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस 1907-08, पृष्ठ 131-132; विशुद्धनन्द पाठक, हिस्ट्री ऑफ़ कोशल, मोतीलाल बनारसीदास, [[वाराणसी]], 1963 ई., पृष्ठ 63&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन श्रावस्ती नगर [[अचिरावती नदी]], जिसका आधुनिक नाम [[राप्ती नदी|राप्ती]] है, के तट पर स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;विनय महावग्ग, पृष्ठ 191-192; परमत्थजोतिका, पृष्ठ 511&amp;lt;/ref&amp;gt; यह नदी नगर के समीप ही बहती थी। बौद्ध युग में यह नदी नगर को घेर कर बहती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;[[राहुल सांकृत्यायन]], पुरातत्त्व निबंधावली, [[इलाहाबाद]], 1958), पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt; [[बौद्ध साहित्य]] में श्रावस्ती का वर्णन [[कोशल जनपद]] की राजधानी और [[राजगृह]] से दक्षिण-पश्चिम में कालक और [[अस्सक]] तक जाने वाले राजमार्ग पर [[सावत्थी]] नामक दो महत्त्वपूर्ण पड़ावों के रूप में मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;विमलचरण लाहा, प्राचीन [[भारत]] का ऐतिहासिक भूगोल, [[उत्तर प्रदेश]] हिन्दी ग्रंथ अकादमी, [[लखनऊ]], प्रथम संस्करण, 1972, पृष्ठ 211&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;&amp;gt;{{cite book | last = सिंह| first =डॉ. अशोक कुमार  | title =उत्तर प्रदेश के प्राचीनतम नगर  | edition = | publisher = वाणी प्रकाशन| location =भारतडिस्कवरी पुस्तकालय  | language =[[हिन्दी]]  | pages =98-124  | chapter =}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==नाम की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
'''श्रावस्ती [[कोशल]] का एक प्रमुख नगर''' था। भगवान [[बुद्ध]] के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;भरत सिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संवत् 2018, पृष्ठ 236, दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल, द लाइफ ऑफ द बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसे बुद्धकालीन भारत के 6 महानगरों, [[चंपा]], [[राजगृह]], श्रावस्ती, [[साकेत]], [[कोशांबी]] और [[वाराणसी]] में से एक माना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल, द लाइफ ऑफ द बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री, पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में कई मत प्रतिपादित है। &lt;br /&gt;
*सावत्थी, [[संस्कृत]] श्रावस्ती का [[पालि]] और अर्द्धमागधी रूप है।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt; बौद्ध ग्रन्थों में इस नगर के नाम की उत्पत्ति के विषय में एक अन्य उल्लेख भी मिलता है। इनके अनुसार सवत्थ (श्रावस्त) नामक एक [[ऋषि]] यहाँ पर रहते थे, जिनकी बड़ी ऊँची प्रतिष्ठा थी। इन्हीं के नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्ती पड़ गया था। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti.jpg|thumb|250px|left|[[खत्ती]], श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
*[[पाणिनि]] ने, जिनका समय आज से नहीं कुछ तो चौबीस या पच्चीस सौ साल पहले था, अपने प्रसिद्ध व्याकरण-ग्रन्थ '[[अष्टाध्यायी]]' में साफ लिखा है कि स्थानों के नाम वहाँ रहने वाले किसी विशेष व्यक्ति के नाम के आधार पर पड़ जाते थे। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] [[पालि भाषा|पालि]] के अनुसार श्रावस्ती के नाम की उत्पत्ति का कारण कुछ दूसरा ही था। &lt;br /&gt;
*[[ब्राह्मण साहित्य]], [[महाकाव्य|महाकाव्यों]] एवं [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार श्रावस्ती का नामकरण '''श्रावस्त या श्रावस्तक''' के नाम के आधार पर हुआ था। श्रावस्तक युवनाश्व का पुत्र था और पृथु की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;विश्वगश्वा पृथो: पुत्र पुत्रस्तस्मादार्दश्चजज्ञिवान्। &lt;br /&gt;
आर्द्रात्तु युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्य तु चात्मज:॥ 	&lt;br /&gt;
तस्य श्रावस्तको ज्ञेय श्रावस्ती येन निर्मित:।	&lt;br /&gt;
श्रावतस्य तु दायादो वृहदाश्वो महाबल: ॥[[आदिपर्व महाभारत|महाभारत, आदिपर्व]], अध्याय 201, [[श्लोक]] 3-4;&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt; वही इस नगर के जन्मदाता थे और उन्हीं के नाम के आधार पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया था। &lt;br /&gt;
*[[पुराण|पुराणों]] में श्रावस्तक नाम के स्थान पर श्रावस्त नाम मिलता है। &lt;br /&gt;
*महाभारत में उल्लिखित यह परम्परा उपर्युक्त अन्य परम्पराओं से कहीं अधिक प्राचीन है। अतएव उसी को प्रामणिक मानना उचित बात होगी। &lt;br /&gt;
*[[मत्स्य पुराण|मत्स्य]] एवं [[ब्रह्मपुराण|ब्रह्मपुराणों]] में इस नगर के संस्थापक का नाम श्रावस्तक के स्थान पर श्रावस्त मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रावस्तश्च महातेजा वत्सकस्तत्सुतोऽभवत् 	&lt;br /&gt;
निर्मिता येन श्रावस्ती गौडदेशे द्विजोत्तम्॥ [[मत्स्यपुराण]], अध्याय 12, श्लोक 29 ;&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt; बाद में चल कर कोसल की राजधानी, [[अयोध्या]] से हटाकर श्रावस्ती ला दी गई थी और यही नगर कोसल का सबसे प्रमुख नगर बन गया। &lt;br /&gt;
*एक [[बौद्ध]] [[ग्रन्थ]] के अनुसार वहाँ 57 हज़ार कुल रहते थे और कोसल-नरेशों की आमदनी सबसे ज़्यादा इसी नगर से हुआ करती थी। [[बुद्ध|गौतम बुद्ध]] के समय में भारतवर्ष के 6 बड़े नगरों में श्रावस्ती की गणना हुआ करती थी। यह चौड़ी और गहरी खाई से घिरा हुआ था। इसके अतिरिक्त इसके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा-दीवार भी थी, जिसमें हर दिशा में दरवाजे बने हुये थे। हमारी प्राचीन [[कला]] में श्रावस्ती के दरवाज़ों का अंकन हुआ है। उससे ज्ञात होता है कि वे काफ़ी चौड़े थे और उनसे कई बड़ी सवारियाँ एक ही साथ बाहर निकल सकती थीं। कोसल के नरेश बहुत सज-धज कर बड़े [[हाथी|हाथियों]] की पीठ पर कसे हुये [[चाँदी]] या [[सोना|सोने]] के हौदों में बैठ कर बड़े ही शान के साथ बाहर निकला करते थे। &lt;br /&gt;
*चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाहियान]] और [[हुएन-सांग|हुयेनसांग]] ने भी श्रावस्ती के दरवाज़ों का उल्लेख किया है। श्रावस्ती एक समृद्ध, जनाकीर्ण और व्यापारिक महत्त्व वाली नगरी भी। यहाँ मनुष्यों के उपभोग-परिभोग की सभी वस्तुएँ सुलभी थीं अत: इसे [[सावत्थी]]&amp;lt;ref&amp;gt;सब्ब अत्थि&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;‘यं किं च मनुस्सान उपभोग- परिभोगं सब्बं एत्थ अत्थीति सावत्थो।’ एक किंवदंती के अनुसार एक बार काफ़िले वालों ने आकर यहाँ पूछा कि यहाँ क्या सामान है? किं भण्डं अत्थि ? इसके उत्तर में उनसे कहा गया ‘सब कुछ है।’ सब्बं अत्थीति। ‘सब्बं अतीति वचनमुपादाय सावत्थि’ पपंचसूदनी, भाग 1, पृष्ठ 59-60&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*पहले यह केवल एक धार्मिक स्थान था, किंतु कालांतर में इस नगर का समुत्कर्ष हुआ। [[जैन साहित्य]] में इसके लिए '''चंद्रपुरी'''&amp;lt;ref&amp;gt;जैन [[हरिवंश पुराण]], पृष्ठ 717; विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल पृष्ठ 61&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा '''चंद्रिकापुरी''' नाम भी मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*[[महाकाव्य|महाकाव्यों]] एवं [[पुराण|पुराणों]] में श्रावस्ती को [[राम]] के पुत्र [[लव]] की राजधानी बताया गया है। &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]]&amp;lt;ref&amp;gt;कालिदास, [[रघुवंश महाकाव्य|रघुवंश]], अध्याय 15, श्लोक 97; विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोलीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963), पृष्ठ 59 &amp;lt;/ref&amp;gt; ने इसे ‘शरावती’ नाम से अभिहित किया है। उच्चारण संबंधी समानता के आधार पर ‘श्रावस्ती’ और ‘शरावती’ दोनों एक ही प्रतीत होते हैं और एक निश्चित स्थान की तरफ इंगित भी करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''श्रावस्ती''' न केवल [[बौद्ध]] और [[जैन]] धर्मों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था अपितु यह [[ब्राह्मण|ब्राह्मण धर्म]] एवं [[वेद|वेद विद्या]] का भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ वैदिक शिक्षा केंद्र के कुलपति के रूप में '''जानुस्सोणि''' का नामोल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;दीघनिकाय, (पालि टेक्स्ट सोसायटी, लंदन), भाग 1, पृष्ठ 235; सुमंगलविलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 399; मच्झिमनिकाय, भाग 1, पृष्ठ 16&amp;lt;/ref&amp;gt; कालांतर में बुद्ध के जीवन-काल से संबंधित तथा प्रमुख व्यापारिक मार्गों से जुड़े होने के कारण श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि में वृद्धि हुई।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नगर का विकास== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Stupas-Jetavana.jpg|thumb|250px|जेतवन स्तूप के अवशेष, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
हमारे कुछ प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार कोसल का यह प्रधान नगर सर्वदा रमणीक, दर्शनीय, मनोरम और धनधान्य से संपन्न था। इसमें सभी तरह के उपकरण मौजूद थे। इसको देखने से लगता था, मानो देवपुरी अलकनन्दा ही साक्षात धरातल पर उतर आई हो। नगर की सड़कें चौड़ी थीं और इन पर बड़ी सवारियाँ भली भाँति आ सकती थीं नागरिक श्रृंगार-प्रेमी थे। वे [[हाथी]], घोड़े और पालकी पर सवार होकर राजमार्गों पर निकला करते थे। इसमें राजकीय कोष्ठागार&amp;lt;ref&amp;gt; कोठार&amp;lt;/ref&amp;gt; बने हुये थे जिनमें [[घी]], तेल और खाने-पीने की चीज़ें प्रभूत मात्रा में एकत्र कर ली गई थीं। &lt;br /&gt;
;बौद्ध धर्म अनुयायी &lt;br /&gt;
वहाँ के नागरिक [[गौतम बुद्ध]] के बहुत बड़े भक्त थे। '[[मिलिन्दपन्ह|मिलिन्दप्रश्न]]' नामक ग्रन्थ में चढ़ाव-बढ़ाव के साथ कहा गया है कि इसमें भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी। इसके अलावा वहाँ के तीन लाख सत्तावन हज़ार गृहस्थ [[बौद्ध धर्म]] को मानते थे। इस नगर में '''जेतवन नाम का एक उद्यान''' था जिसे वहाँ के जेत नामक राजकुमार ने आरोपित किया था। इस नगर का अनाथपिण्डिक नामक सेठ जो [[बुद्ध]] का प्रिय शिष्य था, इस उद्यान के शान्तिमय वातावरण से बड़ा प्रभावित था। उसने इसे ख़रीद कर बौद्ध संघ को दान कर दिया था। &lt;br /&gt;
;जेतवन और मठ का निर्माण&lt;br /&gt;
[[बौद्ध साहित्य|बौद्ध ग्रन्थों]] में कथा आती है कि इस पूँजीपति ने '''जेतवन''' को उतनी ही मुद्राओं में ख़रीदी थीं जितनी कि बिछाने पर इसके पूरे फ़र्श को भली प्रकार ढक देती थीं। उसने इसके भीतर एक मठ भी बनवा दिया जो कि श्रावस्ती आने पर बुद्ध का विश्रामगृह हुआ करता था। इसे लोग 'कोसल मन्दिर' भी कहते थे। अनाथपिंडिक ने जेतवन के भीतर कुछ और भी मठ बनवा दिये जिनमें भिक्षु लोग रहते थे। इनमें प्रत्येक के निर्माण में एक लाख मुद्रायें ख़र्च हुई थीं। इसके अतिरिक्त उसने [[कुआँ|कुएँ]], तालाब और चबूतरे आदि का भी वहाँ निर्माण करा दिया था। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि जेतवन में रहने वाले भिक्षु सुबह और शाम [[राप्ती नदी]] में नहाने के लिये आते थे। लगता है कि यह उद्यान इसके तट के समीप ही कहीं स्थित था। अनाथपिंडिक ने अपने जीवन की सारी कमाई बौद्ध संघ के हित में लगा दी थी। उसके घर पर श्रमणों को बहुसंख्या में प्रति दिन यथेष्ट भोजन कराया जाता था। [[गौतम बुद्ध]] के प्रति श्रद्धा के कारण श्रावस्ती नरेशों ने इस नगर में दानगृह बनवा रखा था, जहाँ पर भिक्षुओं को भोजन मिलता था। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti-2.jpg|thumb|250px|left|जेतवन, श्रावस्ती&amp;lt;br /&amp;gt;Jetavana, Sravasti]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाकाव्यों तथा पुराणों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
[[महाकाव्य|महाकाव्यों]] में श्रावस्ती का विशद वर्णन मिलता है। &lt;br /&gt;
*[[वायु पुराण]]&amp;lt;ref&amp;gt;कुशस्य कोशलो राज्यं पुरी वापि कुशस्थली।	रम्या निर्मिता तेन विंध्यपर्वत सानुषु॥ उत्तर कोशले राज्ये लवस्य च महात्मन: श्रावस्ती लोकविख्याता कुशवशं निबोधत॥	[[वायु पुराण]], अध्याय 88, 197-98&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[रामायण|वाल्मीकि रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण उत्तर0 107, 17&amp;lt;/ref&amp;gt;में वर्णन है कि रामचंद्र जी ने (दक्षिण कोसल का अपने पुत्र कुश को और उत्तर कोसल का लव को राजा बनाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसलेषुकुशं वीरमुत्तरेषुतथा लवम्, अभिषिच्य महात्मानावुभौराम: कुशीलवौ' उत्तरकांड, सर्ग 1, 107, 17&amp;lt;/ref&amp;gt;रामायण&amp;lt;ref&amp;gt;  रामायण उत्तरकांड 108,5&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार लव की राजधानी श्रावस्ती में थी&amp;lt;ref&amp;gt; 'श्रावस्तीति पुरीरम्या श्राविता च लवस्यह अयोध्यां विजनां कृत्वा राघवोभरतस्तथा'&amp;lt;/ref&amp;gt;, मधुपुरी में [[शत्रुघ्न]] को सूचना मिली कि लव के लिए श्रावस्ती नामक नगरी [[राम]] ने बसाई है और [[अयोध्या]] को जनहीन करके उन्होंने स्वर्ग जाने का विचार किया है। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात अयोध्या उजड़ गई थी और कोसल की नई राजधानी श्रावस्ती में बनाई गई थीं। [[रामायण]] में दो [[कोशल]] नगरों की चर्चा है:- &lt;br /&gt;
*उत्तर कोशल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी,&lt;br /&gt;
*दक्षिण कोशल जिसकी राजधानी कुशावती थी। &lt;br /&gt;
[[राम]] के शासन काल में इन दोनों राजधानियों का वर्णन मिलता है। राम ने अपने पुत्र [[लव]] को श्रावस्ती का और [[कुश]] को कुशावती का राजा बनाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;मेमायर्स ऑफ़् दि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, भाग 50, पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt; वर्तमान समय में श्रावस्ती [[बलरामपुर]] से 10 मील, [[अयोध्या]] से 58 मील तथा [[राजगीर]] से 720 मील दूर स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;रामायण, उत्तरकांड, अध्याय 121; नंदूलाल डे, दि ज्योग्राफिकल डिक्शनरी आफ ऐंश्येंट एंड मिडिवल इंडिया, पृष्ठ 197&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[मत्स्य पुराण|मत्स्य]], [[लिंग पुराण|लिंग]] और [[कूर्म पुराण|कूर्म पुराणों]] में श्रावस्ती को गौडा में स्थित बतलाया गया है, जिसका समीकरण [[कनिंघम]] ने आधुनिक गोंडा से किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, दि ऐंश्येंट ज्योग्राफी ऑफ़ इंडिया, पृष्ठ 343&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती की संस्थापना श्रावस्तक ने की थी। &lt;br /&gt;
*[[वायु पुराण]] के अनुसार श्रावस्तक के पिता का नाम अंध था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[वायुपुराण]], अध्याय 88, पृष्ठ 24-26; द्रष्टव्य, [[विष्णुपुराण]], अध्याय 4, पृष्ठ 2-12&amp;lt;/ref&amp;gt; [[मत्स्य पुराण|मत्स्य]]&amp;lt;ref&amp;gt; [[मत्स्यपुराण]], अध्याय 12, पृष्ठ 29-30&amp;lt;/ref&amp;gt; और [[ब्रह्म पुराण|ब्रह्म पुराणों]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]], अध्याय 7, पृष्ठ 53;  द्रष्टव्य, मेमायर्स ऑफ़ आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, संख्या 50. पृष्ठ 6&amp;lt;/ref&amp;gt; में श्रावस्त या श्रावस्तक को युवनाश्व का पुत्र और अद्र का पौत्र कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt; [[वायु पुराण]] के अनुसार यह अंध्र तथा [[भागवत पुराण]] के अनुसार चंद्र था&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;भागवतपुराण, अध्याय 9, पृष्ठ 20-21&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] में इनसे अलग सूचना मिलती है। इसमें श्रावस्तक को श्राव का पुत्र तथा युवनाश्व का पौत्र कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[वनपर्व महाभारत|महाभारत, वनपर्व]], 20/3-4; 11/21-22&amp;lt;/ref&amp;gt; कुछ [[पुराण|पुराणों]] में श्रवस्तक या श्रावस्तक को युवनाश्व का पुत्र और अद्र का पौत्र कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;[[ब्रह्मपुराण]], 6, 53; [[मत्स्यपुराण]], 12 29-30  26- मत्स्यपुराण, अध्याय 12, पृष्ठ 29-30&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*बौद्धकाल में श्रावस्ती के पश्चात अयोध्या का उपनगर [[साकेत]], कोसल का दूसरा प्रमुख स्थान था। &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] ने [[रघुवंश]] में लव को '''शरावती''' नामक नगरी का राजा बनाया जाना लिखा है।&amp;lt;ref&amp;gt; 'स निवेश्यकुशावत्यां रिपुनागांकुशं कुशम् शरावत्यां सतांसूक्तैर्जनिताश्रुलवंलवम्, रघुवंश 15, 97 &amp;lt;/ref&amp;gt; इस उल्लेख में '''शरावती''', निश्चय रूप से श्रावस्ती का ही उच्चारण भेद है। श्रावस्ती की स्थापना [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार, '''श्रवस्त''' नाम के सूर्यवंशी राजा ने की थी&amp;lt;ref&amp;gt;  'युग-युग में उत्तर प्रदेश' पृ0 40&amp;lt;/ref&amp;gt; लव ने यहाँ कोसल की नई राजधानी बनाई और श्रावस्ती धीरे-धीरे उत्तर कोसल की वैभवशालिनी नगरी बन गई। सहेत-महेत के खंडहरों से जान पड़ता है कि इस नगर का आकार अर्धचंद्राकार था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जातकों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhakuti-Jetavana-Vihara.jpg|गंधकुटी जेतवन विहार, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
जातकों में श्रावस्ती का विशद वर्णन मिलता है। इनके अनुसार श्रावस्ती का धार्मिक वायुमंडल [[बौद्ध धर्म]] से अधिक प्रभावत था। इस नगर में गौतम बुद्ध के अनेक व्याख्यान हुए थे, जिनसे प्रभावित होकर समस्त वर्गों के अनेक व्यक्तियों ने इस धर्म को अपना लिया था। नगर-श्रेष्ठी अनाथपिंडक बुद्ध का परम भक्त था। उसके घर में पाँच सौ भिक्षुओं के निमित्त प्रतिदिन भोजन तैयार कराया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 4, पृष्ठ 91 (भदंत आनंद कौसल्यायन संस्करण&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा जाता है कि अनाथपिंडक ने अपने द्वारा बनवाए हुए सभी भवनों को बौद्ध संघ को समर्पित कर दिया था। समर्पण की यह क्रिया बड़े समारोह के साथ संपादित हुए थी। इसमें उसने 18 करोड़ मुद्राएँ व्यय की थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; इन निवास गृहों में गंधकुटी, करेरिकुटी तथा कोसंबकुटी उल्लेखनीय हैं। कोसंबकुटी एवं करेरिकुटी का नामकरण उसके समीप करेरि और कोसंब वृक्षों के नाम के आधार पर हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;‘करेरिमंडपो तस्सा कुटिकाय द्वारेथितो तस्मा करेरिकुटिकाय द्वारेथितो तस्म करेरिकुटिका ति वुच्चति’       ‘कोसंबरुक्खस्स द्वारे थित्तता कोसंबकुटिका ति’ सुगंलबिलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 407&amp;lt;/ref&amp;gt; गंधकुटी जेतवन के मध्य बनी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 92 (सो मज्झे गंधकुटीं कारेसि&amp;lt;/ref&amp;gt; पाटिकाराम नामक एक अन्य विहार भी श्रावस्ती के ही समीप था। जब सुनक्षत्र लिच्छवि पुत्र भिक्षु संघ को छोड़कर गया, तब भगवान् इस विहार में ही निवास कर रहे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 1, पृष्ठ 389&amp;lt;/ref&amp;gt; एक अन्य विहार राजकाराम था जो पसेनादि (प्रसेनजित) द्वारा बनवाया गया था। यह नगर के दक्षिण-पश्चिम स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 2, पृष्ठ 15&amp;lt;/ref&amp;gt; यहीं पर आम्रवनों के बीच एक बड़ा तालाब था जिसे जेतवन पोक्खरणि के नाम से जाना जाता था। इसके चारों तरफ उपवन इतने घने थे कि यह एक जंगल के समान प्रतीत होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 4, पृष्ठ 228&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्तीवासियों ने बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को आतिथ्य सत्कार की इच्छा से दान दिया। उन्होंने विहार में एक धर्मघोष&amp;lt;ref&amp;gt;वह भिक्षु जो धर्मोपदेश की घोषणा किया करता था।&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक भिक्षु को नियुक्त किया।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, (भदंत आनंद कौसल्यायन संस्करण), खंड तृतीय, पृष्ठ 15&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से व्यापार का भी उल्लेख जातकों में आया है। व्यापारियों द्वारा एक पुराने जलाशय को खोदने से [[लोहा]], [[जस्ता]], शीशा, [[रत्न]], [[सोना]], मुक्ता और बिल्लौर आदि [[धातु|धातुएँ]] प्राप्त हुई थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 24 जरुदपानं खणमाना, वाणिजा उदकत्थका  अजझगंसू अयोलोहं, तिपुसीसन्ची वाणिजा।  रतनं जातरूपंच मुक्ता बेकुरिया बाहु॥&amp;lt;/ref&amp;gt; कुंभ जातक में श्रावस्ती में सामूहिक सुरा-उत्सव मनाने का उल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, भाग 5, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य में श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ='''श्रावस्ती [[कोशल]] का एक प्रमुख नगर''' था। भगवान [[बुद्ध]] के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;भरत सिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संवत् 2018, पृष्ठ 236, दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल, द लाइफ ऑफ़ द बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसे बुद्धकालीन भारत के 6 महानगरों, [[चंपा]], [[राजगृह]], श्रावस्ती, [[साकेत]], [[कोशांबी]] और [[वाराणसी]] में से एक माना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;दीधनिकाय, पृष्ठ 152; राखिल,  द लाइफ ऑफ़ द बुद्ध लीजेंड एंड हिस्ट्री, पृष्ठ 136&amp;lt;/ref&amp;gt; इसके नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में कई मत प्रतिपादित है।|विचारक=}} &lt;br /&gt;
बुद्ध काल में कौशल जैसे समृद्धशाली जनपद की राजधानी होने के कारण श्रावस्ती का ऊँचा स्थान था। साथ ही [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार का प्रमुख केंद्र होने के कारण [[बौद्ध साहित्य]] में इस नगर का विशद वर्णन मिलता है। &lt;br /&gt;
*[[ललितविस्तर]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ललितविस्तर]] अध्याय 1&amp;lt;/ref&amp;gt; के अनुसार श्रावस्ती [[कोशल जनपद]] की राजधानी थी। यह राजाओं, राजकुमारों, मंत्रियों, सभासदों तथा उनके समर्थकों-[[क्षत्रिय|क्षत्रियों]], [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] एवं गृहस्वामियों से भरी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;विमलचरण लाहा, श्रावस्ती इन इंडियन लिटरेचर, दि मेमायर्स आफ दि आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया भाग 50, पृष्ठ 20&amp;lt;/ref&amp;gt; इस नगर के नागरिक तथागत के बड़े प्रशंसक थे। &lt;br /&gt;
*बौद्ध धर्म के प्रचार की ओर संकेत करते हुए [[मिलिंदपन्ह|मिलिंदपन्हों]] में भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ बतलायी गई है&amp;lt;ref&amp;gt;‘नगरे महाराज पंचकोटिमत्ता अरियसावका भगवती उपासक-उपासिकायो सत्तण्णा सहसानि तोझि सतहससानि अनागामि फले पतित्थिता ने सब्बेऽपि गिही न पच्चजिता।’ मिलिंदपन्हो, पृष्ठ 349&amp;lt;/ref&amp;gt;, जो निश्चय ही अतिरंजना है। &lt;br /&gt;
*बुद्धघोष के अनुसार उस समय श्रावस्ती में 57 हज़ार परिवार निवास करते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;परमत्थजोतिका, भाग 1, पृष्ठ 371; सामंतपासादिका, भाग 3, पृष्ठ 636&amp;lt;/ref&amp;gt; इसी ग्रंथ में यहाँ की जनसंख्या 18 करोड़ बताई गई है, जो स्पष्टत: अतिरंजित है।&amp;lt;ref&amp;gt;46- भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल (हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संवत् 2018), पृष्ठ 237&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यापार का केंद्र====&lt;br /&gt;
श्रावस्ती की भौतिक समृद्धि का प्रमुख कारण यह था कि यहाँ पर तीन प्रमुख व्यापारिक पथ मिलते थे जिससे यह व्यापार का एक महान केंद्र बन गया था। यह नगर पूर्व में [[राजगृह]] से, उत्तर-पश्चिम में [[तक्षशिला]] से और दक्षिण में प्रतिष्ठान से जुड़ा हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;विशुद्धानंद पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी 1963), पृष्ठ 59&amp;lt;/ref&amp;gt; राजगृह से 45 योजन दूर आकर [[बुद्ध]] (शास्ता) ने श्रावस्ती में विहार किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;‘राजगंह कपिलवस्थुतो दूरं सट्ठि योजनानि, सावत्थि पन पंचदश।  सत्था राजगहतो पंचतालीसयोजनं आगन्त्या सावत्थियं विहरति।’ मच्झिमनिकाय, अट्ठकथा, 1/3/4&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से राजगृह का रास्ता [[वैशाली]] से होकर गुजरता था। यह मार्ग सेतव्य, [[कपिलवस्तु]], कुशीनारा&amp;lt;ref&amp;gt;कुशीनगर&amp;lt;/ref&amp;gt;, पावा, भोगनगर और [[वैशाली]] से होकर जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;पावामोतीचंद्र, सार्थवाह, बिहार राष्ट्र-भाषा परिषद, पटना, 1953), पृष्ठ 17&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रतिष्ठान को जाने वाला मार्ग [[साकेत]], [[कोशांबी]], [[विदिशा]], गोनधा और [[उज्जैन]] से होकर गुजरता था। इस नगर का संबंध [[वाराणसी]] से भी था।&amp;lt;ref&amp;gt; सुत्तनिपात (सारनाथ संस्करण), पृष्ठ 212-13&amp;lt;/ref&amp;gt; इन दोनों के मध्य कोटागिरी नामक स्थान पड़ता था।&amp;lt;ref&amp;gt;मच्झिमनिकाय, पालि टेक्स्ट् सोसायटी, लंदन, भाग 1, पृष्ठ 473; मोतीचंद्र, सार्थवाह, पृष्ठ 17&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती से [[तक्षशिला]] का मार्ग [[सोरेय्य]] आधुनिक [[सोरों]] होते हुए जाता था। इस मार्ग में सार्थ निरंतर चलते रहते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 239&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रावस्ती का बौद्ध काल में [[भारत]] के सभी प्रमुख नगरों से घनिष्ट व्यापारिक संबंध था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-2.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती|left|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पालि साहित्य में श्रावस्ती==== &lt;br /&gt;
पालि साहित्य में विभिन्न नगरों से श्रावस्ती की दूरी दी हुई है, जिससे उसका व्यापारिक महत्त्व प्रकट होता है। श्रावस्ती से तक्षशिला 192 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;‘वुक्कसाति नाम कुलपुत्रो (तक्कसलातो) अट्ठ हि उनकानि योजनसतानि गतो जेतवनद्वारकोठकस्थ पर समीपे गच्छत्तो’ मच्झिमनिकाय, अट्ककथा, 3/4/10&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[सांकाश्य|संकाश्य]] (संकीसा) से 30 [[योजन]]&amp;lt;ref&amp;gt;‘सावत्थितो संकस्य नगरं तिसयोजनानि’ धम्मपद अट्ठकथा, 14/2&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[साकेत]] 6 योजन, [[राजगृह]] 60 योजन, मच्छिकासंड 30 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;राहुल सांकृत्यायन, पुरातत्त्व निबंधावली, पृष्ठ 20&amp;lt;/ref&amp;gt; उग्रनगर 120 योजन तथा [[चंद्रभागा नदी]]&amp;lt;ref&amp;gt; चेनाव&amp;lt;/ref&amp;gt; 120 योजन&amp;lt;ref&amp;gt;‘वीसं योजनसतं पच्चुग्गत्वा चंद्रभागाय नदियातोरे’ धम्मपद अट्ठकथा 6/4&amp;lt;/ref&amp;gt; पर थी। प्राचीन भारत में ‘योजन’ की माप निश्चित न होने के कारण श्रावस्ती से इन स्थानों की वास्तविक दूरी निश्चित करना कठिन है। &lt;br /&gt;
;बुद्ध के उपदेश&lt;br /&gt;
श्रावस्ती से भगवान बुद्ध के जीवन और कार्यों का विशेष संबंध था। उल्लेख्य है कि [[बुद्ध]] ने अपने जीवन के अंतिम पच्चीस वर्षों के वर्षावास श्रावस्ती में ही व्यतीत किए थे। [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार की दृष्टि से भी श्रावस्ती का महत्त्वपूर्ण स्थान था। भगवान बुद्ध ने प्रथम निकायों के 871 सुत्तों का उपदेश श्रावस्ती में दिया था, जिनमें 844 जेतवन में, 23 पुब्बाराम में और 4 श्रावस्ती के आस-पास के अन्य स्थानों में उपदिष्ट किए गए।&amp;lt;ref&amp;gt;भरतसिंह उपाध्याय, बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 237&amp;lt;/ref&amp;gt; बौद्ध धर्म प्रचार केंद्र के रूप में श्रावस्ती की ख्याति का ज्ञान यहाँ उपदिष्ट सूत्रों के आधार पर निश्चित हो जाता है। &lt;br /&gt;
====जेतवन====&lt;br /&gt;
{{Main|जेतवन श्रावस्ती}}&lt;br /&gt;
बुद्ध के जीवन-काल में श्रावस्ती के दक्षिण में स्थित जेतवन एवं पुब्बाराम दो प्रसिद्ध वैहारिक अधिष्ठान एवं बौद्धमत के प्रभावशाली केंद्र थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार जेतवन का आरोपण, संवर्धन तथा परिपालन जेत नामक एक राजकुमार द्वारा किया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;तंहि जेतेन राजकुमारेन रोपितं संवर्द्धिंत परिपालित। 	सो च तस्सि सामी अहोसि, तस्मा, जेतवने ति वुच्चति॥ पपंचसूदनी, भाग 1, पृष्ठ 60&amp;lt;/ref&amp;gt; [[राजगृह]] मे वेणुवन और [[वैशाली]] के महावन के ही भाँति जेतवन का भी विशेष महत्त्व था।&amp;lt;ref&amp;gt;उदयनारायण राय, प्राचीन भारत में नगर तथा नगर जीवन, पृष्ठ 118&amp;lt;/ref&amp;gt; इस नगर में निवास करने वाले अनाथपिंडक ने जेतवन में विहार&amp;lt;ref&amp;gt; भिक्षु विश्राम स्थल&amp;lt;/ref&amp;gt;, परिवेण&amp;lt;ref&amp;gt; आँगनयुक्त घर&amp;lt;/ref&amp;gt;, उपस्थान शालाएँ&amp;lt;ref&amp;gt; सभागृह&amp;lt;/ref&amp;gt;, कापिय कुटी&amp;lt;ref&amp;gt; भंडार&amp;lt;/ref&amp;gt;, चंक्रम&amp;lt;ref&amp;gt; टहलने के स्थान&amp;lt;/ref&amp;gt;, पुष्करणियाँ और मंडप बनवाए।&amp;lt;ref&amp;gt;विनयपिटक (हिन्दी अनुवाद), पृष्ठ 462; बुद्धकालीन भारतीय भूगोल, पृष्ठ 240; तुल. विशुद्धानन्द पाठक, हिस्ट्री आफ कोशल, (मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, 1963), पृष्ठ 61&amp;lt;/ref&amp;gt; अनाथपिंडक के निमंत्रण पर भगवान बुद्ध श्रावस्ती स्थित जेतवन पहुँचे। अनाथापिण्डक ने उन्हें खाद्य भोज्य अपने हाथों से अर्पित कर जेतवन को बौद्ध संघ को दान कर दिया। इसमें अनाथ पिंडक को 18 करोड़ मुद्राओं को व्यय करना पड़ा था। उल्लेखनीय है कि इस घटना का अंकन '''भरहुत कला''' में भी हुआ है।&amp;lt;ref&amp;gt;बरुआ, भरहुत, भाग 2, पृष्ठ 31&amp;lt;/ref&amp;gt; [[तथागत]] ने जेतवन में प्रथम वर्षावास बोधि के चौदहवें वर्ष में किया था। इससे यह निश्चित होता है कि जेतवन का निर्माण इसी [[वर्ष]] (514-513 ई. वर्ष पूर्व) में हुआ होगा। उल्लेखनीय है कि जेतवन के निर्माण के पश्चात अनाथपिण्डक ने तथागत को निमंत्रित किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पुब्बाराम====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana.jpg|जेतवन, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
जेतवन के पश्चात दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान पुब्बाराम (पूर्वाराम) था। इसका निर्माण नगर के एक प्रमुख धनिक सेठ मिगार (मृगधर) की पुत्रवधू विशाखा ने कराया था। यह नगर के पूर्वी द्वार के पास स्थित था।&amp;lt;ref&amp;gt;धम्मपदटीका, भाग 1, पृष्ठ 384; अंगुत्तरनिकाय, प्रथम भाग (हिन्दी अनुवाद, भदंत आनंद कौसल्यायन, महाबोधि सभा, कलकत्ता 1957, पृष्ठ 212 मेमायर्स आदि दि आर्कियोलाजिक सर्वे आफ इंडिया भाग 50, पृष्ठ 25&amp;lt;/ref&amp;gt; संभवत: इसीलिए इसका नाम पूर्वाराम पड़ा। इसके निर्माण तथा समर्पण में लगभग 27 करोड़ मुद्राओं का व्यय करना पड़ा था। यह लकड़ी (रुक्ख) तथा पत्थर द्वारा निर्मित था, जिसमें दो मंजिलें थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;[[राहुल सांकृत्यायन]], पुरातत्त्व निबंधावली, पृष्ठ 79&amp;lt;/ref&amp;gt; पूर्वाराम विहार की आधुनिक स्थिति सहेत-महेत के पास उनके पूर्व का हनुमनवा स्थान है।&lt;br /&gt;
====नगर का वर्णन====&lt;br /&gt;
इसके अतिरिक्त [[बौद्ध साहित्य]] में मल्लिकाराम का निर्माण प्रसेनजित की महारानी मल्लिका द्वारा किया गया था। यह एक परिव्राजकाराम था; जहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य शास्त्रार्थ होता था। तीर्थकाराम एक बड़ा आराम था जिसमें 700 से 3000 तक परिव्राजक निवास कर सकते थे। इस नगर की परिखा, प्राकार एवं नगर द्वार के विषय में प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलते हैं। उस समय भवन निर्माण में मुख्यत: लकड़ी का उपयोग होता था। नगर के चारों ओर मिट्टी के प्राकार बने थे। नगर के द्वार एवं राजमार्ग पर्याप्त चौड़े थे। संयुक्त-निकाय में उल्लेख है कि यहाँ के नागरिक [[हाथी]]&amp;lt;ref&amp;gt;हत्थिखंडम् भारोहेय्य&amp;lt;/ref&amp;gt; राजमार्गों पर निकलते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;मज्झिमनिकाय, भाग 2, पृष्ठ 22&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती में मूख्यत: चार दरवाजे थे, जिनमें तीन तो उत्तर-पूर्व एवं दक्षिण दरवाज़ों के नाम से प्रसिद्ध थे। इनमें से जेतवन से नगर में आने का प्रवेश द्वार दक्षिण द्वार था। पूर्वाराम पूर्व दरवाजे के सामने था। इनके अतिरिक्त पश्चिम दरवाजे का होना भी स्वाभाविक है तथापि इसका वर्णन [[त्रिपिटक]] या अट्ठकथा में नहीं मिलता। उल्लेखनीय है इन प्रवेश-द्वारों के अतिरिक्त [[उत्खनन]] से कई अन्य प्रवेश द्वारों का भी पता चला है लेकिन ये दरवाजे वास्तविक नहीं थे। बल्कि समय-समय पर प्रकारों के बिर जाने के कारण सुविधानुसार प्रयोग में लाए गए स्थानापन्न दरवाजे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;देखें, आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====अन्य प्रसिद्ध स्थान====&lt;br /&gt;
इस नगर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों में '''पूर्वाराम और मल्लिकाराम''' उल्लेखनीय हैं। पूर्वाराम का निर्माण नगर के धनिक सेठ मृगधर की पुत्रवधु विशाखा के द्वारा कराया गया था। यह नगर के पूर्वी दरवाजे के पास बना था। संभवत: इसीलिये इसका नाम पूर्वाराम&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थात पूरबी मठ&amp;lt;/ref&amp;gt; पड़ा। यह दो मंज़िला भवन था, जिसमें मज़बूती लाने के लिये पत्थरों की चिनाई की गई थी। लगता है कि मल्लिकाराम इससे बड़ा विश्राम-भवन था, जिसमें ऊपर और नीचे कई कमरे थे। इसका निर्माण श्रावस्ती की मल्लिका नाम की साम्राज्ञी के द्वारा कराया गया था। नगरों में आने वाले [[बौद्ध]] परिव्राजक, निर्ग्रन्थ, [[जैन]] साधु-संन्यासी और नाना धर्मों के अनुयायियों के विश्राम तथा भोजन-वस्त्र की पूरी सुख-सुविधा थी। [[गौतम बुद्ध]] के प्रिय शिष्य [[आनन्द]], सारिपुत्र, मौद्गल्यायन तथा [[महाकाच्यायन|महाकाश्यप]] आदि ने भी वहाँ के नागरिकों को अपने सदुपदेशों से प्रभावित किया था। उनकी अस्थियों के ऊपर यहाँ [[स्तूप]] बने हुये थे। [[अशोक]] धर्म-यात्रा के प्रसंग में श्रावस्ती आया हुआ था। उसने इन [[स्तूप|स्तूपों]] पर भी पूजा चढ़ाई थी।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जैन धर्म== &lt;br /&gt;
इस नगर में [[जैन]] मतावलंबी भी रहते थे। इस धर्म के प्रवर्तक [[महावीर|महावीर स्वामी]] वहाँ कई बार आ चुके थे। नागरिकों ने उनका दिल खोल कर स्वागत किया और अनेक उनके अनुयायी बन गये। वहाँ पर [[ब्राह्मण]] मतावलंबी भी मौजूद थे। [[वेद|वेदों]] का पाठ और [[यज्ञ|यज्ञों]] का अनुष्ठान आदि इस नगर में चलता रहता था। मल्लिकाराम में सैकड़ों ब्राह्मण साधु धार्मिक विषयों पर वादविवाद में संलग्न रहा करते थे। विशेषता यह थी कि वहाँ के विभिन्न धर्मानुयायियों में किसी तरह के सांप्रदायिक झगड़े नहीं थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगता है कि जैसे-जैसे कोसल-साम्राज्य का अध:पतन होने लगा, वैसे-वैसे श्रावस्ती की भी समृद्धि घटने लगी। जिस समय चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाहियान]] वहाँ पहुँचा, उस समय वहाँ के नागरिकों की संख्या पहले की समता में कम रह गई थी। अब कुल मिला कर केवल दो सौ परिवार ही वहाँ रह गये थे। पूर्वाराम, मल्लिकाराम और जेतवन के मठ खंडहर को प्राप्त होने लगे थे। उनकी दशा को देखकर वह दुखी हो गया। उसने लिखा है कि श्रावस्ती में जो नागरिक रह गये थे, वे बड़े ही अतिथि-परायण और दानी थे। [[हुएन-सांग|हुयेनसांग]] के आगमन के समय यह नगर उजड़ चुका था। चारों ओर खंडहर ही दिखाई दे रहे थे। वह लिखता है कि यह नगर समृद्धिकाल में तीन मील के घेरे में बसा हुआ था। आज भी अगर आप को गोंडा ज़िले में स्थित सहेट-महेट जाने का अवसर मिले, तो वहाँ श्रावस्ती के विशाल खंडहरों को देख कर इसके पूर्वकालीन ऐश्वर्य का अनुमान आप लगा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जैन ग्रंथों में वर्णित श्रावस्ती==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-Temple-2.jpg|thumb|250px|जेतवन मठ, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
[[बौद्ध]] मतावलंबियों की भाँति जैन धर्मानुयायी भी इस नगर को इस प्रमुख धार्मिक स्थान मानते थे। वे इसे चंद्रपुरी या चंद्रिकापुरी के नाम से अभिहित करते थे। [[जैन धर्म]] के प्रचार केंद्र के रूप में भी यह विख्यात था। श्रावस्ती जैन धर्म के तीसरे [[तीर्थंकर]] संभवनाथ&amp;lt;ref&amp;gt;जैन [[हरिवंश पुराण]], पृष्ठ 717&amp;lt;/ref&amp;gt; व आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभानाथ&amp;lt;ref&amp;gt;एस. स्टीवेंसन, हार्ट आफ जैनिज्म, (दिल्ली, 1970) पृष्ठ 42&amp;lt;/ref&amp;gt; की जन्मस्थली थी। [[महावीर]] ने भी यहाँ एक वर्षावास व्यतीत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सी. जे. शाह, जैनिज्म इन नार्थ इंडिया, पृष्ठ 26&amp;lt;/ref&amp;gt; जैन साहित्य में '''सावत्थि अथवा सावत्थिपुर''' के प्रचुर उल्लेख मिलते हैं। तृतीय तीर्थंकर संभवनाथ के गर्भ, जनम, तप और केवल ज्ञान कल्याणक यहीं संपन्न हुए थे। एक मत के मतानुसार श्रीवास्त द्वारा इस नगर की स्थापना की गई और इन्हीं के नाम पर इसका श्रावस्ती नाम पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;कोशल, रिसर्च आफ दि इंडियन रिसर्च सोसायटी आफ अवध, भाग 3, पृष्ठ 23&amp;lt;/ref&amp;gt; श्रावस्ती के महाश्रेष्ठि नंदिनीप्रिय, नागदत्त आदि से जैन धर्म के अध्ययनार्थ श्रावस्ती में लोग दूर-दूर से आते थे। इसमें [[कश्यप]] के पुत्र कपिल एवं जैन विद्वान केशी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;तत्रैव, पृष्ठ 24&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैन ग्रंथ भगवती सूत्र (320 ई.पू. से 600 ई. से मध्य) के अनुसार श्रावस्ती नगर आर्थिक क्षेत्र में भौतिक समृद्धि के चरमोत्कर्ष पर थी। यहाँ के व्यापारियों में शंख और मक्खलि मुख्य थे जिन्होंने यहाँ के नागरिकों के भौतिक समृद्धि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था।&amp;lt;ref&amp;gt;योगेन्द्र चंद्र शिकदार, स्टडीज इन भगवती सूत्राज, (रिसर्च इंस्टीट्यूट आफ प्राकृत जैनोलाजी एंड अहिंसा, मुजफ्फरपुर, 1964), पृष्ठ 307&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस नगर में एक बहुत ही धनी श्रेष्ठि मिगार था जो जैन धर्म का प्रबल समर्थक था जबकि उसकी पुत्रवधू विशाखा&amp;lt;ref&amp;gt;बौद्ध धर्म&amp;lt;/ref&amp;gt; की अनुयायी थी।&amp;lt;ref&amp;gt;के.सी.जैन, लार्ड महावीर एंड हिज टाइंस, पृष्ठ 63&amp;lt;/ref&amp;gt; भगवती सूत्र से पता चलता है कि आजीवक संप्रदाय का प्रधान मक्खलिपुत्र गोशाल [[महावीर]] का शिष्य था। जैने स्रोतों से पता चलता है कि कालांतर में श्रावस्ती आजीवक संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र बन गया। हरमन जैकोबी&amp;lt;ref&amp;gt;हरमन याकोबी, से.बु.ई. (जैन सूत्राज), मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1964, पुनर्मुद्रित), भाग 45, पृष्ठ 30&amp;lt;/ref&amp;gt; और बी.एम. बरुआ&amp;lt;ref&amp;gt;बेनी माधव बरुआ, एक हिस्ट्री आफ बुद्धिस्टिक इंडियन फिलासफी, पृष्ठ 300&amp;lt;/ref&amp;gt; का मत है कि कुछ दिनों तक महावीर, मक्खलिपुत्र गोशाल के शिष्य थे। मक्खलिपुत्र गोशाल का जन्म श्रावस्ती में हुआ था। गोशाल महावीर से उम्र में बड़ा था। बाद में सिद्धांतीय मतभेदों के कारण गोशाल ने महावीर का साथ छोड़ दिया और आजीवक संप्रदाय के प्रमुख के रूप में श्रावस्ती में 16 वर्ष व्यतीत किए।&amp;lt;ref&amp;gt;के.सी. जैन, लार्ड महावीर एंड हिज टाइंस, पृष्ठ 165&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====संभवनाथ का मंदिर====&lt;br /&gt;
ईसा के पूर्व ही यहाँ संभवनाथ का एक मंदिर निर्मित हुआ था। [[फ़ाह्यान]] ने जब श्रावस्ती की यात्रा की थी उस समय इस मंदिर का अवशेष मात्र शेष था। इस स्थल पर [[उत्खनन]] से एक नवीन जैन-मंदिर (शोभनाथ) के अवशेष मिले हैं, जिसकी ऊपरी बनावट से यह मध्य युग का प्रतीत होता था। साथ ही बहुत सी [[जैन]] प्रतिमाएँ भी मिली हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ दि रायल एशियाटिक सोसायटी, 1908, पृष्ठ 102&amp;lt;/ref&amp;gt; यह नगर अधिक समय तक श्वेतांबर जैन श्रमणों की केंद्र-स्थली था, किन्तु बाद में यह दिगंबर संप्रदाय का केंद्र बन गया।&amp;lt;ref&amp;gt;वृहत्कथाकोश (ए. एन. उपाध्याय द्वारा संपादित), पृष्ठ8, 348&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|शोभनाथ मन्दिर श्रावस्ती}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====फ़ाह्यान का इतिवृत्त====&lt;br /&gt;
[[फ़ाह्यान]] [[साकेत]] से दक्षिण दिशा की ओर आठ [[योजन]] चलकर कोशल&amp;lt;ref&amp;gt;इस नाम के दो भारतीय राज्य थे- उत्तरी एवं दक्षिणी कोशल। यह उत्तरी कोशल था जो कि [[अवध|आधुनिक अवध]] का एक भाग था।&amp;lt;/ref&amp;gt; जनपद के नगर श्रावस्ती&amp;lt;ref&amp;gt;इसका आधुनिक समीकरण सहेत-महेत हैं; द्रष्टव्य, जेम्स लेग्गे, दि ट्रैवेल्स् आफ फ़ाह्यान, (ओरियंटल पब्लिशर्स, दिल्ली, 1972), पृष्ठ 56&amp;lt;/ref&amp;gt; में पहुँचा था। फ़ाह्यान लिखता है कि नगर में अधिवासियों की संख्या कम है और वे बिखरे हुए हैं। उसकी यात्रा के दौरान यहाँ पर सब मिलाकर केवल दो सौ परिवार ही रह गए थे। वह आगे लिखता है कि इस नगर में प्राचीन काल में राजा प्रसेनजित&amp;lt;ref&amp;gt;यह राजा [[गौतम बुद्ध]] का समकालीन था।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[राज्य]] करते थे। यहाँ पर महा प्रजापति का प्राचीन विहार विद्यमान है। नगर के दक्षिणी द्वार के बाहर 1200 क़दम की दूरी पर वह स्थान है जहाँ वैश्याधिपति अनाथपिंडक (सुदत्त) ने एक विहार बनवाया था। जेतवन विहार से उत्तर-पश्चिम चार [[ली]] की दूरी पर ‘चक्षुकरणी’ नामक एक वन है, जहाँ जन्मांध लोगों को श्री बुद्धदेव की कृपा से ज्योति प्राप्त हुई थी। जेतवन संघाराम के श्रमण भोजनांतर प्राय: इस वन में बैठकर ध्यान लगाया करते थे। फ़ाह्यान के अनुसार जेतवन विहार के पूर्वोत्तर 6.7 ली की दूरी पर माता विशाखा द्वारा निर्मित एक विहार था।&amp;lt;ref&amp;gt;जेम्स लेग्गे, दि ट्रेवल्स आफ फ़ाह्यान, पृष्ठ 59&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Anathapindika-Stupa.jpg|250px|thumb|left|अनाथपिण्डिक स्तूप, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
फ़ाह्यान पुन: लिखता है कि जेतवन विहार के प्रत्येक कमरे में, जहाँ कि भिक्षु रहते है, दो-दो दरवाजे हैं; एक उत्तर और दूसरा पूर्व की ओर। वाटिका उस स्थान पर बनी है जिसे सुदत्त ने [[सोना|सोने]] की मुहरें बिछाकर ख़रीदा था। बुद्धदेव इस स्थान पर बहुत समय तक रहे और उन्होंने लोगों को धर्मोपदेश दिया। [[बुद्ध]] ने जहाँ चक्रमण किया, जिस स्थान पर बैठे, सर्वत्र स्तूप बने हैं, और उनके अलग-अलग नाम है। यहीं पर सुंदरी ने एक मनुष्य का वध करके श्री बुद्धदेव पर दोषारोपण किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;जेम्स लेग्गे, दि ट्रैवेल्स आफ फ़ाह्यान, पृष्ठ 60&amp;lt;/ref&amp;gt; फ़ाह्यान आगे उस स्थान को इंगित करता है जहाँ पर श्री बुद्धदेव और विधर्मियों के बीच शास्त्रार्थ हुआ था। यहाँ एक 60 फुट ऊँचा विहार बना हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====ह्वेनसाँग का इतिवृत्त====&lt;br /&gt;
'''[[ह्वेनसांग|ह्वेनसाँग]] लिखता''' है कि विशोका ज़िले से 500 [[ली]] (100 मील) उत्तर-पूर्व श्रावस्ती देश स्थित था। यह देश 6000 ली परिधि में फैला हुआ था। इस समय यह नगर पूर्णत: विनष्ट एवं जनशून्य हो गया था। जिससे इसकी सीमा निर्धारित करना कठिन है। नगर के दीवारों की परिधि लगभग 20 ली में फैली थी।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस् वाटर्स, आन् युवान् व्चाँग्स् टैवेल्स इन इंडिया (पुनर्मुद्रित, मुंशीराम मनोहरलाल, दिल्ली, प्रथम संस्करण, 1961), भाग 1, पृष्ठ 377&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ की जलवायु अनुकूल थी और अन्नादि की उपज अच्छी होती थी। प्रकृति उत्तम और स्वाभावानुकूल थी तथा मनुष्य शुद्ध आचरण वाले व धर्मिष्ठ थे। यहाँ कई सौ संघाराम थे, जिनमें से अधिकांशत: विनष्ट हो गए हैं। इसके अतिरिक्त 100 देव मंदिर भी हैं, जिसमें असंख्य धर्मावलंबी उपासना करते थे। ह्वेनसाँग के अनुसार राजधानी के पूर्व थोड़ी दूरी पर एक छोटा-सा [[स्तूप]] है जो प्रसेनजित द्वारा [[बुद्ध|भगवान बुद्ध]] के लिए बनवाया गया था। इसके पार्श्व में एक अन्य स्तूप है। यह उसी स्थान पर बना है जहाँ [[अंगुलिमाल]] ने नास्तिकता का परित्याग कर [[बौद्ध धर्म]] को अंगीकृत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, जाइनीज् एकाउंट्स आफ इंडिया, भाग 3 (कलकत्ता, 1958), पृष्ठ 260&amp;lt;/ref&amp;gt; नगर से 5-6 ली दक्षिण जेतवन है जहाँ सुदत्त (अनाथपिंडाद)&amp;lt;ref&amp;gt;सुदत्त का नाम अनाथपिंडाद भी लिखा है, अर्थात् अनाथ और दीन पुरुषों का मित्र।&amp;lt;/ref&amp;gt; द्वारा भगवान बुद्ध के लिए विहार एवं मंदिर बनवाए गए थे। प्राचीन काल में यहाँ एक [[संघाराम]] भी था जो ह्वेनसाँग के समय में पूर्णत: नष्ट हो गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस् वाटर्स, आन युवान च्वाँग्स ट्रैवेल्स इन इंडिया, भाग 1, पृष्ठ 382&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्वेनसाँग के अनुसार जेतवन मठ के पूर्वी प्रदेश-द्वार पर दो 70 फुट ऊँचे प्रस्तर स्तंभ थे। इन स्तंभों का निर्माण [[अशोक]] ने करवाया था। बाएँ खंभे में विजय प्रतीक स्वरूप [[अशोक चक्र|चक्र]] तथा दाएँ खम्भे पर बैल की आकृति बनी हुई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, जाइनीज् एकाउंट्स आफ इंडिया, भाग 3 (कलकत्ता, 1958), पृष्ठ 383&amp;lt;/ref&amp;gt; ह्वेनसाँग आगे लिखता है कि अनाथपिंडाद विहार के उत्तर-पूर्व एक [[स्तूप]] ह यह वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने एक रोगी भिक्षु को स्नान कराकर रोग-निवृत्त किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, जाइनीज् एकाउंट्स आफ इंडिया, भाग 3 (कलकत्ता, 1958), पृष्ठ 387&amp;lt;/ref&amp;gt; स्तूप के निकट ही एक कूप है जिसमें से [[तथागत]] अपनी आवश्यकता के लिए [[जल]] लिया करते थे। '''इसके समीप अशोक निर्मित एक स्तूप है, जिसमें बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए थे।''' इसके अतिरिक्त यहाँ पर कई ऐसे स्थल हैं जहाँ पर बुद्धदेव के टहलने और धर्मोपदेश करने के स्थानों पर स्तूप बने हुए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्वेनसाँग पुन: लिखता है कि जेतवन मठ के 60-70 क़दम की दूरी पर 60 फुट ऊँचा एक विहार है जिसमें पूर्वाभिमुख बैठी हुई भगवान् बुद्ध की एक मूर्ति है। भगवान बुद्ध ने यहाँ पर विरोधियों से शास्त्रार्थ किया था। इस विहार के 5-6 ली पूर्व दिशा में एक स्तूप है जहाँ सारिपुत्र ने तीर्थकों से शास्त्रार्थ किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सेमुअल बील, जाइनीज् एकाउंट्स आफ इंडिया, भाग 3 (कलकत्ता, 1958), पृष्ठ 394&amp;lt;/ref&amp;gt; इस स्तूप के पार्श्व में एक मंदिर है जिसके सामने एक बुद्ध स्तूप है। जेतवन विहार के 3-4 ली उत्तर-पूर्व आप्तनेत्रवन नामक एक जंगल था। इस स्थल पर तथागत भगवान तपस्या करने के लिए आए थे। इसके स्मृतिस्वरूप श्रद्धालुओं ने यहाँ [[शिलालेख|शिलालेखों]] एवं [[स्तूप|स्तूपों]] का निर्माण करवाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस वाटर्स, आन युवॉन च्वाँग्स ट्रैवेल्स इन इंडिया, भाग 1, पृष्ठ 397&amp;lt;/ref&amp;gt; नगर के दक्षिण एक स्तूप है, यह वन स्थान है जहाँ बुद्ध ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता से मिले थे। नगर के उत्तर में भी एक स्तूप है जहाँ बुद्ध के स्मृति अवशेष संगृहीत हैं। ये दोनों स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए थे।&amp;lt;ref&amp;gt;थामस वाटर्स, आन युवॉन च्वाँग्स ट्रैवेल्स इन इंडिया, भाग 1,, पृष्ठ 400&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुरातत्त्व में श्रावस्ती== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Vihara-Sravasti.jpg|जेतवन विहार के अवशेष, श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
'''श्रावस्ती के प्राचीन इतिहास''' को प्रकाश में लाने के लिए प्रथम प्रयास [[कनिंघम|जनरल कनिंघम]] ने किया। उन्होंने सन 1863 ई. में उत्खनन प्रारंभ करके लगभग एक [[वर्ष]] के कार्य में जेतवन का थोड़ा भाग साफ कराया। इसमें उनको एक [[बोधिसत्व]] की 7 फुट 4 इंच ऊँची प्रतिमा प्राप्त हुई जिस पर अंकित लेख से इसका श्रावस्ती विहार में स्थापित होना ज्ञात होता है। यह मूर्ति भिक्षुबल द्वारा कोसंबकुट्टी के विहार में स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा के अधिष्ठान पर अंकित लेख में [[तिथि]] नष्ट हो गई है, परंतु लिपिशास्त्र के आधार पर यह लेख [[कुषाण काल|कुषाण-काल]] का प्रतीत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;उल्लेखनीय है कि इसी प्रकार की [[बोधिसत्त्व]] की एक और लेखयुक्त प्रतिमा [[सारनाथ]] से मिली है जो इसी भिक्षु बल द्वारा [[कनिष्क]] के राज्यकाल के तृतीय वर्ष में स्थापित की गई थी। अत: यह प्रतिमा प्रारंभिक [[कुषाण काल|कुषाणकाल]] की प्रतीत होती है।  ब्लाक, जर्नल ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, भाग 67 (1898), प्लेट 1, पृष्ठ 274 और आगे (प्लेट के साथ)। एपिग्राफिया इंडिका, भाग 8 (1905-06), पृष्ठ 179 और आगे (प्लेट के साथ)।&amp;lt;/ref&amp;gt; [[कनिंघम]] ने इस आधार पर '''सहेत के क्षेत्र को जेतवन''' और '''महेत के क्षेत्र को श्रावस्ती''' से समीकृत किया था।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोटर्स भाग 1, पृष्ठ 377 और आगे।&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम के अनुकरण पर डब्ल्यू. सी. बेनेट ने पक्की कुटी टीले की कुछ खुदाई करवाई थी।&amp;lt;ref&amp;gt;बेनेट के उत्खनन के लिए द्रष्टव्य, गजेटियरऑफ़ दि प्राविंसऑफ़ अवध (इलाहाबाद, 1878), पृष्ठ 286&amp;lt;/ref&amp;gt; चीनी यात्रियों के यात्रा विवरणों के आधार पर इस टीले का समीकरण कनिंघम ने '''अंगुलिमाल स्तूप'''&amp;lt;ref&amp;gt;पूर्ववर्ती लेखक इसे अंगुलिमालिय स्तूप कहते हैं, जबकि इसका सही प्राकृत रूप अंगुलिमाल होना चाहिए।  जातक, (फाउसबोल संस्करण), भाग 5, पृष्ठ 466&amp;lt;/ref&amp;gt; से किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन् 1876 ई. में कनिंघम ने इन स्थानों की खुदाई पुन: आरंभ करवाई, जिसमें 16 इमारतों की नीवें प्रकाश में आईं। इनमें अधिकांश [[स्तूप]] और परवर्ती काल के मंदिर थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोटर्स, भाग 11, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; इस बार उनको यहाँ से सिक्के और मृण्मूर्तियाँ भी मिलीं। [[उत्खनन]] से यह निश्चित हुआ कि जिस स्थान पर बोधिसत्व की विशाल मूर्ति मिली थी, वहाँ कोशंब-कुट्टी नामक विहार था। उसी के उत्तर में गंधकुटी अथवा मुख्य विहार था। &lt;br /&gt;
====डब्ल्यू. होवी का उत्खनन====&lt;br /&gt;
[[कनिंघम]] के सहेत में उत्खनन के समय (1875-76) डब्ल्यू. होवी ने महेत में खुदाई की। इसमें उन्हें महेत के पश्चिम में स्थित [[शोभनाथ मन्दिर श्रावस्ती|शोभनाथ जैन मंदिर]] के खंडहरों में कुछ मूर्तियाँ मिली।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृष्ठ 83&amp;lt;/ref&amp;gt; श्री होवी ने इस क्षेत्र का गहन अन्वेषण 15 दिसम्बर 1884 से 15 मई 1885 तक किया तथा इसे क्षेत्र में बड़ी संख्या में स्मारकों का पता लगाया। अपनी रिपोर्ट में&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल (1892), प्लेट 1, अतिरिक्त संख्या (भाग 61&amp;lt;/ref&amp;gt; होवी ने कुछ स्मारकों का समीकरण चीनी यात्रियों द्वारा वर्णित स्मारकों से करने का प्रयास किया, पंरतु अधिकांश स्मारकों के विषय में प्रर्याप्त प्रमाण का अभाव है। होवी द्वारा उत्खनित वस्तुओं में कुछ निम्नलिखित हैं&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वेऑफ़ इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-8, पृष्ठ 131-132&amp;lt;/ref&amp;gt;-&lt;br /&gt;
*संवत् 1176 (1119 ई.) का एक [[शिलालेख]]।&amp;lt;ref&amp;gt;इस [[शिलालेख]] पर 18 पंक्तियों में [[देवनागरी लिपि]] एवं [[संस्कृत भाषा]] में एक लेख खुदा हुआ है। लेख भगवान [[बुद्ध]] की वंदना से प्रांरभ होता है, जिसे छोड़कर शेष संपूर्ण लेख [[छंद|छंदों]] में हैं। &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*गुप्तलिपि में अभिलिखित एक [[लाल रंग]] का बलुए पत्थर का टुकड़ा। &lt;br /&gt;
*जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों पर अंकित दो अभिलेखों के छ: टुकड़े। &lt;br /&gt;
*एक प्राचीन दवात। &lt;br /&gt;
*एक अग्निमुख नाग की काँसे की प्रतिमा&lt;br /&gt;
*कच्ची मिट्टी की दस मुहरें। ये सभी [[बौद्ध धर्म]] संबंधित हैं। &lt;br /&gt;
*कच्ची मिट्टी की 500 मुहरें। &lt;br /&gt;
*कर्नेकी (संभवत: [[कनिष्क]]) की एक [[तांबा|तांबे]] की मुद्रा। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavana-Sravasti-1.jpg|thumb|250px|left|जेतवन, श्रावस्ती&amp;lt;br /&amp;gt;Jetavana, Sravasti]]&lt;br /&gt;
====जे.पी.एच.फोगल तथा श्री दयाराम साहनी का उत्खनन====&lt;br /&gt;
होवी के उत्खनन के 23 वर्ष उपरांत [[फरवरी]]-[[अप्रैल]] 1908 ई. में जे.पी.एच.फोगल तथा री दयाराम साहनी ने उत्खनन किया। फोगल ने महेत के प्राचीर की दीवारों और उसके प्रवेश-द्वारों की खोज की तथा उसके विस्तार को निरूपित किया। महेत के प्रमुख टीलों में उन्होंने पक्की कुटी, कच्ची कुटी और शोभनाथ मंदिर की खोज की। कच्ची कुटी में विशेष रूप से [[मिट्टी]] की मूर्तियाँ, खिलौने आदि मिले, जिनका कलात्मक एवं ऐतिहासिक दोनों महत्व है। शोभनाथ मंदिर से अनेक जैन मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं। सहेत के क्षेत्र से भी अनेक विहारों, [[स्तूप|स्तूपों]] और मंदिरों की रूपरेखा स्पष्ट की गई और बुद्ध तथा बोधिसत्व की मूर्तियाँ, सिक्के, मृण्मूर्तियाँ व मुहरें निकाली गईं।&amp;lt;ref&amp;gt;विस्तार के लिए द्रष्टव्य, आर्कियोलाजिकल सर्वेऑफ़ इंडिया (एनुअल रिपोर्ट), 1907-08, पृष्ठ 117&amp;lt;/ref&amp;gt; इन वस्तुओं में सबसे महत्त्वपूर्ण [[कन्नौज]] के राजा गोविदचंद्र का एक दानपत्र है। इसी लेख के आधार पर विद्वानों ने सहेत को जेतवन से और महेत को श्रावस्ती से समीकृत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1910-11 ई. में '''विख्यात पुरातत्त्ववेत्ता सर जान मार्शल''' की अध्यक्षता में दयाराम साहनी ने इस क्षेत्र की पुन: खुदाई की। इनका मुख्य कार्यस्थल जेतवन टीला था। उस उत्खनन में कुछ [[अभिलेख]], मूर्तियाँ, बड़ी मात्रा में मुद्राएँ तथा लेखयुक्त मुहरें, साँचे, मृण्मूर्तियाँ, मृण्भांड और ईंटें आदि मिली हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;मेमायर्स ऑफ़ दि आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, संख्या 50, पृष्ठ 3&amp;lt;/ref&amp;gt; यद्यपि [[कनिंघम]] और होवी के उत्खननों में महेत और श्रावस्ती के समीकरण में कोई संदेह नहीं रह जाता फिर भी विंसेंट स्मिथ ने 1898 में एक लेख प्रकाशित करके कनिंघम के इस समीकरण पर आपत्ति प्रस्तुत की।&amp;lt;ref&amp;gt;वी.ए. स्मिथ, कौशांबी एंड श्रावस्ती, जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी (1898) पृष्ठ 527&amp;lt;/ref&amp;gt; स्मिथ के तर्क का अनुमान चीनी यात्रियों के यात्रा-विवरणों पर आधारित था। उन्होंने श्रावस्ती को [[नेपाल]] की तराई में बालापुर, कामदी और इंतावा गाँवों के मध्य में स्थित बतलाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्मिथ के अनुसार====&lt;br /&gt;
स्मिथ ने अपने एक परवर्ती लेख में बोधिसत्व के प्राप्ति-स्थान के संदर्भ में आपत्ति की जिस पर कनिंघम का सिद्धांत आधारित था। स्मिथ का यह अनुमान तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता, क्योंकि पर्याप्त साहित्यिक और [[पुरातत्त्व|पुरातात्त्विक]] प्रमाणों ने श्रावस्ती का सहेत-महेत से समीकरण प्रमाणित कर दिया है। अधिक संभव है कि स्मिथ द्वारा अन्वेषित बालापुर के भग्नावशेष सेतव्य के हों। साहित्यक प्रमाणों से भी इस बात की पुष्टि होती है। [[पालि |पालि साहित्य]]&amp;lt;ref&amp;gt;सुत्तनिपात (सारनाथ संस्करण), पृष्ठ 212-13; जी.पी. मललसेकर, डिक्शनरी आफ पालि प्रापर नेम्स, भाग दो, (लंदन 1960), पृष्ठ 1126&amp;lt;/ref&amp;gt; में सेतव्य को श्रावस्ती और [[राजगृह]] के मार्ग के बीच में स्थित कहा गया है। इस प्रकार सेतव्य, संभवत: श्रावस्ती और [[कपिलवस्तु]] के बीच कहीं स्थित रही होगी। अत: स्मिथ का यह कथन कि सेतव्या ही श्रावस्ती थी, उचित नहीं प्रतीत होता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सहेत का उत्खनन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-Sravasti.jpg|thumb|250px|जेतवन विहार के अवशेष, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
‘सहेत’ जो कि प्राचीन जेतवन विहार था, एक अत्यंत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण स्थल था। यह संपूर्ण क्षेत्र 457.2 X 152.4 मीटर विस्तृत क्षेत्र में फैला था। यह टीला मैदान से 16 फुट ऊँचाई पर स्थित था। इस पुरातात्त्विक स्थल पर बड़ी संख्या में छोटे-छोटे टीले मिले हैं। इन टीलों में 20 का उत्खनन [[कनिंघम]] ने करवाया था। श्री होवी ने भी सहेत का उत्खनन करवाया था, लेकिन किसी भी भवन का पूर्ण उत्खनन न होने से तत्कालीन [[इतिहास]] पर प्रकाश नहीं पड़ता।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट 1907-8), पृष्ठ 117&amp;lt;/ref&amp;gt; विभिन्न उत्खननों से सहेत का जेतवन से समीकरण निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है। बौद्ध-स्थल होने के कारण यहाँ विशेष रूप से मंदिर, स्तूप और विहार मिलते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख पुरातात्विक स्थल निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
==== मंदिर और मठ स्थल 19 ====&lt;br /&gt;
इसकी खोज सर्वप्रथम श्री होवी ने की थी।&amp;lt;ref&amp;gt;जर्नल आफ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, भाग 1, अतिरिक्त संख्या 1892, प्लेट 5 &amp;lt;/ref&amp;gt; उन्होंने सतह से 3 फुट नीचे इस भवन के चारों तरफ खुदाई करवाई जिससे इस मंदिर के दो बार निर्मित होने की पुष्टि होती है। निर्माण संरचना से यह भवन 10वीं शताब्दी का प्रतीत होता है, परंतु कालांतर में '''फोगल''' की अध्यक्षता में इस क्षेत्र का पुन: [[उत्खनन]] प्रारंभ हुआ, जिससे यह ज्ञात हुआ कि यह जेतवन में स्थित एक विशाल भवन था, जिसका प्रवेश-द्वार पूर्व की ओर था। {{बाँयाबक्सा|पाठ=इस नगर के अन्य प्रसिद्ध स्थानों में '''पूर्वाराम और मल्लिकाराम''' उल्लेखनीय हैं। पूर्वाराम का निर्माण नगर के धनिक सेठ मृगधर की पुत्रवधु विशाखा के द्वारा कराया गया था। यह नगर के पूर्वी दरवाजे के पास बना था। संभवत: इसीलिये इसका नाम पूर्वाराम&amp;lt;ref&amp;gt; अर्थात पूरबी मठ&amp;lt;/ref&amp;gt; पड़ा। यह दो मंज़िला भवन था, जिसमें मज़बूती लाने के लिये पत्थरों की चुनाई की गई थी। लगता है कि मल्लिकाराम इससे बड़ा विश्राम-भवन था, जिसमें ऊपर और नीचे कई कमरे थे। इसका निर्माण श्रावस्ती की मल्लिका नाम की साम्राज्ञी के द्वारा कराया गया था।|विचारक=}}इस मठ में एक मंदिर भी था। आँगनयुक्त इस मठ में बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए 24 कमरे बने हुए थे।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 119 &amp;lt;/ref&amp;gt; इस संरचना का निर्माण तीन बार इसी नींव पर हुआ था। प्रारंभिक भवन का निर्माण, जिसकी दीवार पर स्पष्ट हैं, छठी शताब्दी में हुआ था और मध्यवर्ती भवन का निर्माण [[गुप्त काल]] में हुआ था। इसका काल-निर्धारण दीवारों की निर्माण-पद्धति एवं एक कमरे से प्राप्त पकाई [[मिट्टी]] की मुहर से संभव हुआ। इस मुहर में [[बुद्ध]] को [[धर्मचक्र]]-प्रवर्तन मुद्रा में अंकित दिखाया गया है और नीचे गुप्त-लिपि में तीन पंक्तियाँ अंकित हैं। परवर्ती भवन इसी नींव पर 10वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था। श्री होवी के उत्खनन से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। &lt;br /&gt;
;अन्य उत्खनित वस्तु&lt;br /&gt;
अन्य उत्खनित वस्तुओं में बुद्ध प्रतिमाओं की संख्या अधिक है। इनमें से एक प्रतिमा अविलोकितेश्वर व [[मैत्रेय]] के साथ भूमि स्पर्श मुद्रा में है। एक अन्य मूर्ति में भगवान बुद्ध एक बंदर से कटोरा ग्रहण कर रहे हैं। यह दृश्य [[वैशाली]] की उस घटना का विवरण प्रस्तुत करता है। जिसमें [[बुद्ध]] एक [[बंदर]] से [[शहद]] ग्रहण करते हुए प्रदर्शित किए गए हैं। ये दोनों मूर्तियाँ 9वीं-10वीं शताब्दी की हैं। &lt;br /&gt;
;नवीनतम संरचना&lt;br /&gt;
इस स्थान पर नवीनतम संरचना 11वीं-12वीं शताब्दी में हुई, जो चौकोर है। इसका एक भाग 35.90 मीटर विस्तृत है। इसके आंतरिक भाग के बीच में एक खुला आँगन था, जिसके चारों ओर कक्ष बने हुए थे। कक्ष और आँगन के मध्य गलियारा भी था। इसमें बने कमरे छोटे आकार के हैं। एक कमरे में पश्चिमी दीवार ओर एक ईंट का बना 1.20 मीटर का चबूतरा था। यहीं एक कमरे से [[कन्नौज]] के शासक [[गोविन्द चन्द्र|गोविंद्रचन्द्र गहड़वाल]] का लिखित ताम्रपत्र मिला है।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स (कलकत्ता, प्रथम संस्करण, 1971), पृष्ठ 77 &amp;lt;/ref&amp;gt; इन महत्त्वपूर्ण सूचनाओं से जेतवन की सहेत से समानता निश्चित हो जाती है। साथ ही इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ [[बौद्ध धर्म]] का प्रभाव 12वीं शताब्दी तक स्थायी रहा।&lt;br /&gt;
;स्तूप &lt;br /&gt;
मठ के समीपवर्ती पूर्व और उत्तर-पूर्व कई [[स्तूप|स्तूपों]] का निर्माण हुआ, जिनमें आठ स्तूप मुख्य है। इनमें से एक स्तूप का नवीनीकरण दयाराम साहनी द्वारा किया गया यहाँ से 5वीं शताब्दी की एक लिपियुक्त मुहर मिली है जिस पर बुद्धदेव का नाम अंकित है। इन स्तूपों के उत्तर-पश्चिम एक अष्टभुजीय [[कुआँ]] स्थित था, जो आज भी वर्तमान है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 120 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====मंदिर स्थल 11 और 12====&lt;br /&gt;
ये दोनों भवन एक समान थे। इनका प्रवेश-द्वार उत्तराभिमुख था। प्रत्येक मंदिर एक केंद्रीय कक्ष से युक्त था जो अंदर से 2.10 मीटर (7 फुट) चौकोर क्षेत्र में विस्तृत था। इस कक्ष में एक 6 इंच ऊँचा ईंटों का चबूतरा था। मंदिर के दोनों किनारे के कक्ष अपेक्षाकृत बड़े थे, जिनकी भीतरी लंबाई-चौड़ाई 10 फुट X 9 फुट थी। केंद्रीय कक्ष की बनावट से ऐसा प्रतीत होता है कि उसमें बुद्ध प्रतिमा स्थापित रही होगी और किनारे के कमरों में अन्य [[देवता|देवताओं]] की प्रतिमाएँ स्थापित रही होंगी। [[कनिंघम]] का मत है कि मध्य का कमरा बुद्ध प्रतिमा से युक्त रहा होगा और किनारे के कमरे बौद्ध-भिक्षुओं के आवासगृह रहे होंगे।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 121&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gandhakuti-Jetavana-Vihara-2.jpg|thumb|250px|गंधकुटी जेतवन विहार के भिक्षु, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
====मंदिर स्थल 6 और 7====&lt;br /&gt;
अष्टभुजीय कुएँ के उत्तर दो मंदिरों के [[अवशेष]] मिले है। इनमें से मंदिर स्थल 6 का प्रवेश-द्वार उत्तर की ओर है, जबकि मंदिर स्थल 7 का प्रवेश-द्वार पूर्व की तरफ है। मंदिर स्थल-अपेक्षाकृत बड़ा है जो कि एक 3.60 मीटर वर्गाकार कमरे से युक्त था। इस मंदिर में प्रयुक्त ईंटें बड़े आकार की हैं, जिससे संभावना है कि यह मंदिर जेतवन के प्राचीन मंदिरों में से एक था। &lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 17 और 18====&lt;br /&gt;
पूर्व उल्लिखित मंदिर के पूर्व में दो स्तूप थे जिन्हें स्तूप 17 और 18 नाम दिया गया है। स्तूप स्थल 17 का मूल वर्गाकार है, उसके ऊपर वृत्ताकार अंड है। इसका व्यास 6.70 मीटर था। यह भाग बाद में जोड़ा गया प्रतीत होता है। प्रारंभिक अधिष्ठान 60 सेन्टीमीटर ऊँचा था, जो [[कुषाण काल|कुषाणकालीन]] (प्रथम शती ई.) है। स्तूप का अधोभाग कंकरीट फर्श के सतह से नीचे खुला नहीं था, लेकिन इस सरंचना की गहराई को ज्ञात करने के लिए स्तूप को शीर्ष पर खोल दिया गया तथा परवर्ती स्तर की सतह से लगभग 2.10 मीटर नीचे मध्यभाग में एक दंड गाड़ दिया गया। इस स्तूप के गर्भ में एक धातु-पात्र मिला है, जिसमें [[सोना|सोने]] के तार, मनके एवं स्फटिकतुल्य वस्तुएँ थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स (कलकत्ता, प्रथम संस्करण, 1971 ई.) पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; ये सभी वस्तुएँ तथा सतह के नीचे की संरचना [[कुषाण काल|कुषाणकालीन]] (प्रथम शती ई.) है। &lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 18====&lt;br /&gt;
इसका समीपवर्ती स्तूप स्थल 18 अपेक्षाकृत छोटा है। इसके अंड का व्यास 4.20 मीटर (14 फुट) है। उत्खनन में इस स्तूप के गर्भ से भी एक अभिलिखित मिट्टी का कटोरा मिला है, जिसमें हड्डियों के टुकड़े, पत्थर के मनके एवं मोतियाँ थीं। कटोर पर कुषाण-लिपि में ‘भदंत बुद्धदेव’ लिखा है। इस स्तूप का निर्माण भी कुषाण-काल में हुआ था, इस मंदिर सम्मुख दो चबूतरों के अवशेष भी मिलें हैं। इन चबूतरों (चंक्रम) का निर्माण उसी स्थान पर किया गया है जहाँ [[बुद्ध]] टहलते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्तूप स्थल 5====&lt;br /&gt;
जेतवन विहार में स्थित यह एक महत्त्वपूर्ण स्तूप था, जो 9.10 मीटर ऊँचा शंक्वाकार टीले से ढका था। इसका उत्खनन सर्वप्रथम [[कनिंघम]] ने करवाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, भाग 11, पृष्ठ 88&amp;lt;/ref&amp;gt; इस [[स्तूप]] के ऊपर का भाग गोलार्द्धीय स्तूप की भाँति था, जिसकी नीचे एक चौकोर कक्ष था। यह संरचना ठोस ईंटों से निर्मित थी। इसकी प्रत्येक भुजा की लंबाई 7.50 मीटर थी। स्तूप की सफाई करते समय इसके तल में दो चबूतरों का पता चला। निचला चबूतरा 24.90 X 21.30 मीटर चौड़ा था। एक अन्य परवर्ती चबूतरे के अवशेष भी मिले हैं जो 17.80 X 15 मीटर चौड़ा था। इसमें प्रयुक्त ईंटें 11 X 7&amp;lt;sup&amp;gt;1/2&amp;lt;/sup&amp;gt; X 2 इंच आकार की हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-8, पृष्ठ 122&amp;lt;/ref&amp;gt; निरीक्षण करने पर पता चला कि इसकी पूर्वी दीवार में प्रवेश-द्वार के चिन्ह थे, जिससे यह निश्चित हो गया कि वास्तव में यह एक प्रदक्षिणा पथयुक्त स्तूप था, किंतु बाद में इसे पूजागृह (मंदिर) बना दिया गया तथा कालांतर में इसके प्रवेश द्वार को बंद करके इसे स्तूप रूप में परिवर्तित कर दिया गया।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रारंभिक प्रदक्षिणा पथ युक्त स्तूप कुषाणकालीन प्रतीत होता है। जेतवन में यह सबसे लंबा स्तूप है। उत्खनन में यहाँ से कुछ मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं, जो बुद्ध के जीवनकालीन चिन्हों से युक्त है। स्तूप के ऊपरी भाग से प्राप्त वस्तुएँ 8 वीं-10वीं शताब्दी की हैं, जो परवर्ती स्तूप निर्माण का काल-क्रम निश्चित करती हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-3.jpg|thumb|250px|left|जेतवन मठ, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
====मंदिर और मठ स्थल 1====&lt;br /&gt;
इस मंदिर की अंशत: खुदाई कनिंघम ने करवाई थी। इस मठ के अवशेष अब भी द्रष्टव्य हैं। इसकी पूर्व से पश्चिम लंबाई 150 फुट तथा चौड़ाई 142 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; फुट है। जेतवन में स्थित यह एक बड़ा विहार है। जो उत्तर किनारे पर स्थित है। पूर्वाभिमुख इस मठ में एक मंदिर और और मंडपयुक्त आँगन भी था। सामान्य योजना के आधार पर निर्मित इस मठ के मध्य में आँगन में एक कुएँ के अवशेष भी मिले है। पूर्वी पंक्ति का केंद्रीय कक्ष अन्य सभी कक्षों में बड़ा था। ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी छत महाकक्ष (हाल) के मध्य स्थित चार स्तंभों पर आधारित थी। इन स्तंभों के आधार पर प्रयुक्त ईंटों के केवल अवशेष मात्र ही द्रष्टव्य हैं। बरामदे में प्रयुक्त खंभे संभवत: लकड़ी के बने थे। आँगन और कक्षों की फर्श में कंकरीट का प्रयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मठ में मंदिर और मंडप बने होने के कारण यह मठ संख्या 19 से भिन्न था। मंदिर मे प्रयुक्त ईंटें कई आकार की है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट, 1907-08, पृष्ठ 125&amp;lt;/ref&amp;gt; यथा-13 इंच X 7इंच X 2 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच, 10 इंच X 10 इंच X 2 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच X 9 इंच X 7 &amp;lt;sup&amp;gt;½&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच X 1 &amp;lt;sup&amp;gt;¾&amp;lt;/sup&amp;gt; इंच। मंडप स्थल के बाहरी भाग में एक ढलावदार बरामदा बना था। उपासना स्थल को जाने वाले पथ एवं मंडप के मध्य यह बरामदा अंतराक्षेप स्वरूप स्थित था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मंदिर स्थल 2 ====&lt;br /&gt;
मंदिर स्थल 3 से 61 मीटर उत्तर में यह मंदिर स्थित था। इसका उत्खनन सर्वप्रथम [[कनिंघम]] ने करवाया और स्थिति के आधार पर इसे गंधकुटी से समीकृत किया।&amp;lt;ref&amp;gt;कनिंघम, आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, भाग 11, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt; कनिंघम के पश्चात श्री होवी ने इस स्थल का उत्खनन किया। होवी ने सर्वप्रथम प्रवेश-कक्ष का पता लगाया और मंदिर के चारों तरफ के कंकरीट, फर्श और चाहरदीवारी को स्पष्ट किया। इस चाहरदीवारी की लंबाई पूर्व से पश्चिम 115 फुट तथा चौड़ाई एवं मोटाई क्रमश: 39 फुट और 8 फुट थी। दक्षिण और पश्चिमी तरफ से कंकरीट फर्श को हटाने पर होवी को नीचे अधिष्ठान के अवशेष मिले। इस अधिष्ठान की लंबाई एवं चौड़ाई क्रमश: 75 फुट एवं 57 फुट थी। अधिष्ठान के पूर्वी किनारे पर 15 फुट 6 इंच गहरा एवं 12 फुट चौड़ा एक प्रक्षेपण है, जो दो कक्षों में विभाजित है। ये कक्ष आपस में संबंधित नहीं हैं, अधिक संभव है कि ये सीढ़ियों से युक्त रहे हों। इस अधिष्ठान की वर्तमान ऊँचाई 7 फुट से अधिक नहीं है। &lt;br /&gt;
;गंधकुटी &lt;br /&gt;
फोगल ने कनिंघम के मत का खंडन करते हुए इस स्थान को गंधकुटी से समीकृत करने में आपत्ति की है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि उन दिनों [[बुद्ध]] के जीवन से संबंधित स्थलों पर गंधकुटी का निर्माण होता था, तो क्या कारण है कि [[उत्खनन]] में किसी भी स्थल से इसके [[अवशेष]] नहीं मिलते? साथ ही गंधकुटी से संबंधित स्थापत्य-कला का भी कोई उदाहरण ज्ञात नहीं हो पाया है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 123-124&amp;lt;/ref&amp;gt; भरहुत स्तूप&amp;lt;ref&amp;gt;बरुआ, भरहुत, भाग 2, पृष्ठ 31; रीज डेविड्स बुद्धिस्ट इंडिया, चित्र संख्या-23&amp;lt;/ref&amp;gt; में चित्रित गंधकुटी के अग्र उत्सेध का ही चित्रण किया गया है। जिससे इस भवन की निर्माण योजना एवं रूपांकन के संदर्भ में निष्कर्ष निकालना कठिन है। अत: हमें '''केवल पालि साहित्य में वर्णित उद्धरणों पर ही विश्वास''' करना चाहिए। गन्धकुटी के सन्दर्भ में एच.सी.नार्मन&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 124&amp;lt;/ref&amp;gt; ने एक निबंध प्रकाशित कर तीन मुख्य बातों पर जो दिया है-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jetavan-Monastery-6.jpg|thumb|250px|जेतवन मठ, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
*यह बुद्ध का व्यक्तिगत निवास-स्थान था। &lt;br /&gt;
*यह स्मारकों के मध्य में स्थित होता था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[जातक कथा|जातकों]] में भी गंधकुटी को मध्य में स्थित बतलाया गया है- ‘सो मज्झे गंधकुटी कारेसि’, जातक, खंड 1, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; इस पर चढ़ने के लिए एक सीढ़ी बनी होती थी। &lt;br /&gt;
*इस मंदिर में [[पुष्प|पुष्पों]] का संग्रह होता था, जो अपने सुगंध के नामानुरूप थी। &lt;br /&gt;
उपर्युक्त मत पर विचार करने से गंधकुटी का स्मारकों के मध्य स्थित होना निश्चित हो जाता है जबकि यह उत्खनित स्थल मध्य में स्थित नहीं था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[भारतवर्ष]] में किसी भी बुद्धकालीन स्थल से इस प्रकार के भवन मध्य में नहीं मिलते। भवन संख्या 1 को संभवत: इस वर्णन के आधार पर गंधकुटी से समीकृत किया जा सकता है।&amp;lt;/ref&amp;gt; जहाँ तक काल का प्रश्न है यह मंदिर [[गुप्त काल]] से पूर्ववर्ती नहीं है। अत: उपर्युक्त आधार पर मंदिर स्थल 2 का गंधकुटी से समीकरण उचित नहीं प्रतीत होता। &lt;br /&gt;
====मंदिर स्थल 3====&lt;br /&gt;
इस मंदिर का भी उत्खनन सर्वप्रथम [[कनिंघम]] ने ही किया था। पूर्वाभिमुख यह मंदिर बोधिवृक्ष से 76.20 मीटर दूरी पर स्थित है। यह वहीं स्थित है जहाँ अनाथपिंडक ने कोसंबकुट्टी का निर्माण कराया था। कनिंघम ने भी इसकी पहचान कोसंबकुट्टी से की है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 122&amp;lt;/ref&amp;gt; इस कोसम्बकुट्टी का उपयोग बुद्ध के व्यक्तिगत कार्यों के लिये किया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;कोसंबकुट्टी का वर्णन [[साहित्य]] में भी मिलता है, देखें, सुमंगलविलासिनी, भाग 2, पृष्ठ 407&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन में यहाँ से [[बोधिसत्व]] की एक प्रतिमा भी मिली जिस पर प्रथम शताब्दी ई. की [[लिपि]] में लेख अंकित है। विश्वास किया जाता है कि यह प्रतिमा कोसंबकुट्टी में बल नामक भिक्षु द्वारा [[कुषाण काल]] में स्थापित की गई थी। &lt;br /&gt;
;मंदिर स्थल 3 का परिमाण &lt;br /&gt;
इस मंदिर का परिमाण 5.75 X 5.45 मीटर क्षेत्र में था। इस परिमाण के अंदर तहखाना, मंदिर की दीवारें और मंडप स्थित थे। मंदिर की भीतरी परिधि 2.45 मीटर चौकोर थी और इसकी दीवारें 1.20 मीटर मोटी थीं। इस मंदिर के दक्षिण-पूर्व और उत्तर-पूर्व में ठोस ईंटों के बने दो चबूतरे (चंक्रम) थे। इस पर चढ़ने के लिए बीच से सीढ़ियाँ बनी थीं। दक्षिण-पूर्व वाला चबूतरा 10 फुट चोड़ा और 4 फुट ऊँचा था। पूर्व की ओर इसकी लंबाई 53 फुट थी। उत्तर-पूर्व वाले चबूतरे की लंबाई पश्चिम से पूर्व 61 फुट और चौड़ाई 5 फुट थी। मंदिर के अत्यंत समीप स्थित होने के कारण [[अभिलेख]] में वर्णित चंक्रम से इसकी समता स्थापित की जा सकती है।&amp;lt;ref&amp;gt;एम. वेंकटरम्मैया, श्रावस्ती, पृष्ठ 18&amp;lt;/ref&amp;gt; एक अन्य चंक्रम [[अवशेष]] [[बोधगया]] के [[महाबोधि मंदिर]] से मिले थे। बोधगया से प्राप्त चंक्रम छायादार थी। &lt;br /&gt;
;मंदिर स्थल 3 का उत्खनन&lt;br /&gt;
[[उत्खनन]] से प्राप्त [[बौद्ध]]-प्रतिमा पर अंकित कुषाण लिपि में&amp;lt;ref&amp;gt;एपिग्राफिया एंडिका, भाग 8 पृष्ठ 180-181&amp;lt;/ref&amp;gt; चंक्रम का वर्णन है जिसकी खोज [[कनिंघम]] ने की थी, परंतु यह निश्चित नहीं कि यह [[तथागत]] के टहलने के लिए बना वास्तविक कोसंबकुट्टी का चंक्रम था। कोशंबकुट्टी नामक यह भवन श्रावस्ती के दो प्रमुख भवनों में एक था। यह प्राय: असंभव प्रतीत होता है कि इन भवनों के विनाश के पश्चात बुद्ध की उपासना स्थल के लिए किसी और स्थान का चुनाव किया गया हो। अत: पालि-साहित्य में वर्णित कोशंबकुट्टी तथा उत्खनन में प्राप्त इस स्थल के समीकरण में किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महेत का उत्खनन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pakki-Kuti-Kachchi-Kuti-Mahet.jpg|thumb|250px|महेत, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
महेत का समीकरण प्राचीन श्रावस्ती से किया गया है। [[कनिंघम]] ने इसकी परिधि का विस्तार 17300 फुट निर्धारित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;ए. कनिंघम , ऐंश्येंट ज्योग्राफी ऑफ इंडिया, पृष्ठ 346&amp;lt;/ref&amp;gt; '''फोगल''' ने श्रावस्ती नगर का घेरा 17250 फुट तथा संपूर्ण क्षेत्रफल 40.773 एकड़ निश्चित किया है। इस नगर में ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर 12 वीं शताब्दी के बीच निरंतर परिवर्तन होते रहे। चीनी चात्रियों ने इस नगर को परित्यक्त एवं निर्जन पाया। [[कोशल|कोशल राज्य]] के पतन के पश्चात इस नगर का क्रमश: ह्रास होता गया। अत: श्रावस्ती नगर के विस्तार का कभी मौक़ा नहीं मिल पाया। इस नगर का पूर्ण विनाश 12 वीं शताब्दी ई. में [[मुसलमान|मुसलमानों]] द्वारा किया गया। इस प्रकार फोगल द्वारा उल्लिखित वर्तमान महेत का 17250 फुट का घेरा श्रावस्ती की प्राचीन सीमा से बढ़ा हुआ नहीं प्रतीत होता। &lt;br /&gt;
====विस्तार और विन्यास====&lt;br /&gt;
विस्तार और विन्यास की दृष्टि से महेत प्राचीन नगर का एक प्रमुख स्थल था। नगर का बाहरी विस्तार [[मिट्टी]] की प्राचीरों से परिवेष्टित था। प्राचीरों की ऊँचाई एक समान नहीं है। पश्चिम ओर की प्राचीरें 35 से 40 फुट ऊँची है, जबकि दक्षिण और पूर्व की प्राचीरों की ऊँचाई 25 फुट से 30 फुट है।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 84&amp;lt;/ref&amp;gt; उन्नीसवीं शताब्दी संपूर्ण क्षेत्र वनों से आच्छादित था। प्राचीरों के बीच-बीच में खुला भाग था, जिन्हें लोग दरवाज़ा कहते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;ऐसा प्रतीत होता है कि चार दरवाज़ों (पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण) को छोड़कर प्रवेश के लिए प्रयुक्त होने वाले ये वास्तविक दरवाजे नहीं थे। वरन समय-समय पर नागरिकों द्वारा सुविधानुसार बनाए गए स्थानापन्न दरवाजे थे। &amp;lt;/ref&amp;gt; इस तरह के दरवाज़ों की संख्या अट्ठाइस है, जिसमें फोगल ने ग्यारह को ही दरवाज़ा माना है, जिनमें से उत्तर और पूर्व की ओर एक-एक, दक्षिण की ओर चार और पश्चिम की ओर पाँच दरवाज़े हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त दरवाज़ों में से कुछ का नामकरण उसकी स्थिति के आधार पर किया गया है। उदाहरणार्थ- एक दरवाज़ा '''पिपरहवा''' के नाम से जाना जाता है। इसका नामकरण प्राचीर के आस-पास एक विशेष प्रकार के वृक्ष, [[पीपल]] के उगने के कारण हुआ था। अन्य मुख्य दरवाज़ों में गंगापुर, बंकी, गेलही, नौसहरा, काँदभारी एवं बाज़ार दरवाज़े हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 85-90&amp;lt;/ref&amp;gt; उत्खनन में इस स्थल से कच्ची कुटी, पक्की कुटी एवं शोभनाथ मंदिर के अवशेष मिले हैं। इन स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में मृण्मूतियाँ, मृण्भांड, मुहरें, प्रतिमाएँ एवं लोहे के उपकरण भी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====कच्ची कुटी====&lt;br /&gt;
कच्ची कुटी का उत्खनन सर्वप्रथम होवी ने किया था। तत्पश्चात फोगल ने इस खंडहर से विभिन्न काल की संरचनाओं का पता लगाया। उत्खनन के समय फोगल को टीले के ऊपरी हिस्से में आधुनिक काल का एक ईंटों का मंदिर मिला था। जिसकी उत्तरी और पश्चिमी दीवारे अब भी विद्यमान हैं। अन्य दोनों किनारे&amp;lt;ref&amp;gt; पूर्वी और उत्तरी&amp;lt;/ref&amp;gt; कच्ची चिनाई से पुनर्निर्मित हैं, जिसका निर्माण वहाँ निवास करने वाले किसी महात्मा ने करवाया था। इसी महात्मा ने पूर्ववर्ती चिनाई को खुदवाकर मंदिर का भी निर्माण करवाया था। इस वर्तमान मंदिर का प्रवेश-द्वार पूर्व तरफ से है। पूर्ववर्ती मंदिर का वास्तविक द्वार पश्चिम तरफ से था, जिसे यहाँ निवास करने वाले किसी [[साधु]] ने एक बड़े पत्थर से बंद कर दिया था। यह पत्थर (3 फुट 6 इंच X 1 फुट 6 इंच X 7 ½ फुट) एक मूर्ति की पीठिका प्रतीत होती है। संभव है यह पीठिका एवं मूर्ति पहले इसी मंदिर में स्थापित रही हों।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 91&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;कच्ची कुटी का उत्खनन&lt;br /&gt;
उत्खनन में फोगल को यहाँ से कुछ पत्थर के टुकड़े मिले थे, जो निश्चित रूप से किसी प्रतिमा के खंडित अंश हैं। यद्यपि ये टुकड़े इतने छोटे हैं कि इनको मिलाकर किसी प्रतिमा का प्रारूप तैयार करना कठिन है; फिर भी यह तो लगभग निश्चित है कि परवर्ती काल में निर्मित यह मंदिर जिसके खंडहर अभी भी वर्तमान हैं, एक प्रस्तर प्रतिमा से युक्त रहा होगा। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Shobhnath-Temple-1.jpg|thumb|250px|left|शोभनाथ मन्दिर, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
;अधिष्ठान &lt;br /&gt;
इस मंदिर का अधिष्ठान&amp;lt;ref&amp;gt; नींव&amp;lt;/ref&amp;gt; अत्यंत प्राचीन है, जिसका विस्तार पूर्व से पश्चिम 105 फुट तथा उत्तर से दक्षिण 72 फुट था। मंदिर में पहुँचने के लिए पश्चिम तरफ से 45 फुट लंबी और 14 फुट 5 इंच चौड़ी सीढ़ियाँ बनी थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 92&amp;lt;/ref&amp;gt; मंदिर के आयताकार अधिष्ठान का प्रत्येक किनारा 18 फुट से 19 फुट के प्रक्षेपण से युक्त था। इसका उत्तरी-पूर्वी किनारा पुनर्निर्मित है। 14 फुट ऊँची उत्तरी दीवारें अभी भी सुरक्षित हैं। इस दीवार का ऊपरी भाग अनालंकृत ईंटों से निर्मित भित्तिस्तंभ की पंक्तियों से सुसज्जित है, जिनमें 11 इंच विस्तृत निमग्नफलक आपस में 3 फुट 10 इंच की दूरी पर बने हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें प्रयुक्त ईंटें भिन्न आकारों की हैं। सबसे निचली परतों में डिनेटेड ईंटों का प्रयोग मिलता है। इसके ऊपर की परतों में गोलाकार ईंटों का प्रयोग मिलता है। कार्निश के नीचे 6 से 8 फुट की दूरी पर वीप-होल्स की कतारें भी मिली हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री होवी ने कच्ची कुटी के उत्खनन में दक्षिण और उत्तरी ओर की दीवारों के नींच की खुदाई करके दो कक्षों का पता लगाया।&amp;lt;ref&amp;gt;होवी ने इन दोनों कक्षों को ‘ए’ और ‘बी’ नामों से अभिहित किया है।&amp;lt;/ref&amp;gt; ये दोनों कक्ष आकार में आयताकार थे जो ऊँची ईंटों की दीवारों से परिवेष्टित थें निर्माण संरचना के आधार पर फोगल ने इन कक्षों को आवास-गृह नहीं माना है। कच्ची कुटी से '''नौशहरा और काँदभारी''' दरवाज़ों की ओर दो रास्ते जाते थे।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[उत्खनन]] में यहाँ से फोगल को 356 मृण्मूर्तियाँ एवं कुछ प्रस्तर प्रतिमाएँ मिली थी।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 95&amp;lt;/ref&amp;gt; इसमें से अधिकांश मूर्तियाँ खंडित हैं अन्य वस्तुओं में मिट्टी की मुहरें, मृण्भांड एवं लोहे के उपकरण उल्लेखनीय हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शोभनाथ का मंदिर====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Shobhnath-Temple.jpg|[[शोभनाथ मन्दिर श्रावस्ती |शोभनाथ मन्दिर]], श्रावस्ती|250px|thumb]]&lt;br /&gt;
{{Main|शोभनाथ मन्दिर श्रावस्ती}}&lt;br /&gt;
शोभनाथ का मंदिर महेत के पश्चिम में स्थित है। इस मंदिर का शोभनाथ नाम तीसवें [[तीर्थंकर]] संभवनाथ के नाम पर पड़ा। विश्वास किया जाता है कि जैनियों के तीसरे तीर्थकर संभवनाथ का जन्म श्रावस्ती में ही हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;देखें; व्यूहलर और बर्गेस ‘दि इंडियन सेक्ट जैनाज, (लंदन 1903) पृष्ठ 67 &amp;lt;/ref&amp;gt; श्री होवी ने सर्वप्रथम यहाँ 1824-25 और 1875-76 में सीमित उत्खनन करवाया था लेकिन उत्खनन से प्राप्त विवरण अत्यंत संक्षिप्त एवं संदिग्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पक्की कुटी====&lt;br /&gt;
‘महेत’ में स्थित पक्की कुटी एक महत्त्वपूर्ण स्थल है जो कच्ची कुटी से उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसका आधुनिक नाम यहाँ निवास करने वाले किसी फ़कीर (साधु) के निवास-स्थान के कारण पड़ा। [[कनिंघम]] ने इसे चीनी यात्रियों के '''अंगुलिमाल स्तूप''' से समीकृत किया है। इस खंडहर की आंशिक खुदाई श्री होवी ने की थी। कालांतर में फोगल ने इस क्षेत्र का उत्खनन करवाया जिससे ज्ञात हुआ कि इसका आकार चतुष्कोणीय था। इसका उत्तर से दक्षिण विस्तार 120 फुट तथा पूर्व से पश्चिम 77 फुट 8 इंच था। इस कुटी के पूर्वी किनारे का उत्खनन अभी नहीं हो पाया है। संभव है कि इस भवन का विस्तार और आगे तक रहा हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कुटी की आंतरिक संरचना में अनियमित ढंग की दीवारें तथा आयताकार एवं वर्गाकार कक्ष मिले हैं। इन कक्षों में दरवाज़ों एवं खिड़कियों का अभाव इस तथ्य का साक्षी है कि इस संरचना का प्रयोग आवासगृह के रूप में नहीं हो होता था। वस्तुत: यह एक [[स्तूप]] था। उत्खनन में इस स्थल से कोई भी ऐसी वस्तु नहीं मिली है, जिससे इसकी बुद्धकालीन विहार की सूचना को प्रश्रय मिले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टीले के केंद्र में वक्राकार दीवारें भी मिली हैं। श्री होवी ने उत्खनन करते समय इस कुटी के मध्य भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर एक सुरंग बना दी ताकि [[वर्षा]] से इस टीले की रक्षा हो सके। होवी की भूमि की सतह पर विभाजक दीवारों के भी अवशेष मिले हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[उत्खनन]] में पक्की कुटी से ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली, जिससे उसकी धार्मिकता प्रामाणित हो सके। चीनी यात्रियों के यात्रा विवरणों में उल्लिखत प्राचीन न्यायालय कक्ष की संरचना को होवी पक्की कुटी से समीकृत करते हैं। होवी इस संरचना को परवर्ती काल की पुनर्निर्मित संरचना मानते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स, पृष्ठ 78&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Anandabodhi-Tree-Sravasti.jpg|thumb|left|आनंद बोधि वृक्ष, श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
====स्तूप ‘ए’====&lt;br /&gt;
इस [[स्तूप]] को श्री होवी ने [[ह्वेनसांग]] द्वारा वर्णित '''अंगुलिमाल स्तूप''' से समीकृत किया है। यह पक्की कुटी से पूर्व में और कच्ची कुटी से उत्तर-पूर्व में स्थित था। होवी ने 9 फुट की परिधि में 30 इंच तक नीचे खुदाई की और पाया कि इसका आंतरिक भाग ठोस है। स्तूप के ऊपर का अंड 20 फुट परिधि में विस्तृत था। इसमें प्रयुक्त ईंटें कई आकार की हैं। सबसे बड़ी ईंटें 12 ½ इंच X 9 इंच X 2 ½ इंच आकार की हैं। इस स्तूप के बाहरी स्थल का उत्खनन फोगल ने 8 फुट नीचे तक करवाया था। इसका निचला अधिष्ठान एक आयताकार चबूतरे (72 फुट X 45 फुट) से युक्त था, जिसके पूर्व में सीढ़ियाँ थीं। ये सीढ़ियाँ 22 फुट लंबी और 14 फुट चौड़ी थीं, जो कच्ची कुटी और शोभनाथ मंदिर में प्रयुक्त सीढ़ियों के सदृश थीं। उत्तरी ओर का चबूतरा सुरक्षित था जिसकी ऊँचाई 4 फुट थी। यहाँ से प्राप्त अधिकांश ईंटें खंडित हैं। वैसे सामान्यतया ईंटों की माप 12 ½ इंच X 9 इंच X 2 ½ इंच है। चिनाई में नक़्क़ाशीदार ईंटों का सर्वथा अभाव मिलता हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया एनुअल रिपोर्टस, 1907-08, पृष्ठ 110&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
; स्तूप ‘ए’ का उत्खनन &lt;br /&gt;
कच्ची कुटी के द्वार से स्तूप की दिशा में फोगल ने 6 ½ फुट विस्तृत एक [[खत्ती]] खुदवाई थी। यहाँ से उन्हें एक निचली संरचना के [[अवशेष]] मिले थे। इस संरचना में प्रयुक्त ईंटों को चार परतों का भी पता चलता है। उत्खनन में बड़ी संख्या में छोटे मृण्भांड एवं कुछ मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं।&lt;br /&gt;
{{seealso|खत्ती}} &lt;br /&gt;
;स्तूप ‘ए’ का वैज्ञानिक उत्खनन&lt;br /&gt;
श्रावस्ती का वैज्ञानिक उत्खनन 1959-60 ई. में श्री कृष्ण कुमार सिन्हा द्वारा किया गया,&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिन्हा, एक्सकैवेशंस ऐट श्रावस्ती, (वाराणसी, 1967&amp;lt;/ref&amp;gt; जिससे यहाँ की दुर्ग संरचना तथा सुरक्षात्मक दीवार के काल-क्रम पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ा है। इनके उत्खनन से ज्ञात हुआ कि श्रावस्ती का विकास तीन कालों में हुआ था। इन कालों में यहाँ से प्राप्त वस्तुओं तथा निर्माण प्रक्रिया में अंतर दृष्टिगत होता है। &lt;br /&gt;
;प्रथम काल&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bell-Sravasti.jpg|thumb|250px|शांति [[घण्टा]], श्रावस्ती]]&lt;br /&gt;
प्रथम काल में नगर की बाहरी दीवारों का निर्माण नहीं हुआ था। उल्लेखनीय है परवर्ती काल में बाहरी दीवारें मिलती हैं। इस काल के मृण्भांड विकसित परंपरा में मिलते हैं। यहाँ से उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृण्भांड बड़ी संख्या से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राप्त कुछ मृण्भांड 600 ई. पू. के एथेनियन कलशों के समान हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;रोचक हैं कि इस तरह के मृण्भांड [[भारत]] के अन्य स्थलों से नहीं मिले हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार के मृण्भांडों को विस्तार [[भारत]]-[[पाकिस्तान]] उपमहाद्वीपीय क्षेत्र में मिलता है। इसके अतिरिक्त शीशे की पारभाषी [[चूड़ी|चूड़ियाँ]] भी मिली हैं। [[धातु]] के रूप में इस समय मुख्यत: [[ताँबा|ताँबे]] का ही प्रयोग किया जाता था, तथापि [[लोहा|लोहे]] का प्रचलन भी हो चुका था। ताँबे का प्रयोग मुख्य रूप से गृहस्थी के सामानों एवम [[आभूषण|आभूषणों]] के रूप में किया जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिन्हा, एक्सकैवेशंस ऐट श्रावस्ती, पृष्ठ 9&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
;द्वितीय काल&lt;br /&gt;
यद्यपि प्रथम काल के अंत तथा द्वितीय काल के प्रारंभ में समय की दृष्टि से कोई विशेष अंतर नहीं है तथापि दोनों की निर्मित वस्तुओं में पर्याप्त भिन्नता दिखाई देती है। द्वितीय काल में [[लोहा|लोहे]] का उपयोग प्रचुरता से मिलता है। साथ ही अस्थिनिर्मित बाणाग्र भी बड़ी संख्या में मिले हैं। इस काल की मुख्य विशेषता दुर्ग-संरचना है। मुख्य प्राचीरों के परवर्ती कालों में विस्तृत रूप से समान अंतराल पर बने दुर्ग एवम इनकी दीवारें नगर के विकास-क्रम को सिद्ध करती है। श्रावस्ती की नगरीय दीवारों की संरचना की तुलना [[कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र]] में उल्लिखित दुर्ग-संरचना से की जा सकती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अर्थशास्त्र (आर. शामशास्त्री संस्करण), मैसूर 1919, अध्याय 2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रावस्ती के इस सीमित क्षेत्र के उत्खनन से सुरक्षा प्राचीरों पर पूर्णत: प्रकाश नहीं पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन रक्षा-प्राचीरों का निर्माण हिन्द-[[यवन]] राजाओं के आक्रमण के सुरक्षार्थ किया गया था। यह घटना [[मौर्यवंश]] के पतन के पश्चात स्थानीय राज्यों के अभ्युदय के समकालिक है। द्वितीय काल में निर्मित मकानों में मिट्टी के गारे से युक्त पकी ईंटों का प्रयोग मिलता है। इस काल की निर्माण संरचना की तीन अवस्थाएँ दृष्टिगत होती हैं। श्री सिन्हा&amp;lt;ref&amp;gt;कृष्ण कुमार सिन्हा, एक्सकैवेशन्स ऐट श्रावस्ती, (वाराणसी, 1967), पृष्ठ 12 &amp;lt;/ref&amp;gt; ने इन तीनों प्रावस्थाओं का काल-क्रम निम्नलिखित रूप से निर्धारित किया है-&lt;br /&gt;
#प्रारम्भिक प्रावस्था – 275 ई. पू. से 200 ई. पू.&lt;br /&gt;
#मध्यवर्ती प्रावस्था – 200 ई. पू. से 125 ई. पू.&lt;br /&gt;
#परवर्ती प्रावस्था – 125 ई. पू. से 50 ई. पू.।&lt;br /&gt;
;तृतीय काल&lt;br /&gt;
[[उत्खनन]] से तृतीय काल के [[अवशेष]] अत्यंत सीमित क्षेत्र से मिले हैं, इससे यह प्रतीत होता है कि इस समय यह नगर विनष्ट हो चुका था। उत्खनन से परवर्ती काल में निर्मित कुछ संरचनाओं का भी पता चला है।&amp;lt;ref name= &amp;quot;उत्तर प्रदेश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Anandabodhi-Tree.jpg|आनन्दबोधी, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-1.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-4.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
चित्र:Jetavan-Monastery-5.jpg|जेतवन मठ, श्रावस्ती&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.bharatonline.com/uttar-pradesh/travel/shravasti/index.html श्रावस्ती]&lt;br /&gt;
*[http://www.indianholiday.com/uttar-pradesh/cities-in-uttar-pradesh/tours-to-shravasti/ श्रावस्ती भ्रमण]&lt;br /&gt;
*[http://www.jainteerth.com/teerth/Shravasti.asp श्री श्रावस्ती, यू.पी.]&lt;br /&gt;
*[http://www.shunya.net/Pictures/NorthIndia/Shravasti/Shravasti.htm Sravasti, Uttar Pradesh, India]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}{{बौद्ध धर्म}}{{उत्तर प्रदेश के नगर}}{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]] &lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:धार्मिक स्थल कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:चयनित लेख]]&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>दिल्ली के सड़क मार्ग</title>
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		<updated>2011-06-07T08:51:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:थल यातायात (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|right|250px|दिल्ली की बस]]&lt;br /&gt;
*उत्तरी [[भारत]] के सभी बड़े शहरों के लिए [[दिल्ली]] से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
*पुरानी दिल्ली पास स्थित कश्मीरी गेट पर मुख्य बस स्टेंण्ड है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से [[हरियाणा]], [[पंजाब]], [[राजस्थान]], [[उत्तर प्रदेश]] एवं [[हिमाचल प्रदेश]] आदि के लिए बसें उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
*निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप आया हुआ सराय काले ख़ाँ बस स्टेण्ड से [[आगरा]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[ग्वालियर]] एवं [[भरतपुर]] आदि के लिए बसें मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वर्धमान, [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और आगरा के रास्ते [[कोलकता]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते [[मुंबई]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए [[अमृतसर]] और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और [[मुरादाबाद]] के रास्ते [[लखनऊ]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]][[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:यातायात और परिवहन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:थल यातायात]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>दिल्ली के सड़क मार्ग</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97&amp;diff=169035"/>
		<updated>2011-06-07T08:50:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:यातायात और परिवहन कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|right|250px|दिल्ली की बस]]&lt;br /&gt;
*उत्तरी [[भारत]] के सभी बड़े शहरों के लिए [[दिल्ली]] से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
*पुरानी दिल्ली पास स्थित कश्मीरी गेट पर मुख्य बस स्टेंण्ड है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से [[हरियाणा]], [[पंजाब]], [[राजस्थान]], [[उत्तर प्रदेश]] एवं [[हिमाचल प्रदेश]] आदि के लिए बसें उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
*निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप आया हुआ सराय काले ख़ाँ बस स्टेण्ड से [[आगरा]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[ग्वालियर]] एवं [[भरतपुर]] आदि के लिए बसें मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वर्धमान, [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और आगरा के रास्ते [[कोलकता]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते [[मुंबई]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए [[अमृतसर]] और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और [[मुरादाबाद]] के रास्ते [[लखनऊ]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]][[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:यातायात और परिवहन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>दिल्ली के बाज़ार</title>
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		<updated>2011-06-07T08:49:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] में ख़रीददारी के लिए कई स्थल हैं। प्रमुख स्थल हैं- &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;अंबावता कॉम्पलेक्स&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह कॉम्पलेक्स बाबा खड़कसिंह मार्ग पर स्थित है। इस कॉम्पलेक्स में विभिन्न राज्यों के एम्पोरियम खुले हैं, जहाँ सरकारी दरों पर राज्यों के उत्पाद मिलते हैं। [[चाँदनी चौक]], [[कनॉट प्लेस]], [[दिल्ली हॉट]] से पुरानी कलात्मक वस्तुएँ एवं कालीन तथा [[चाँदी]] की वस्तुएँ हौज़ ख़ास गाँव से ख़रीदी जा सकती हैं। वहीं आई.एन.ए. (भारतीय राष्ट्रीय सेना) बाज़ार में खाने से सम्बन्धित वस्तुएँ जैसे [[शाक-सब्ज़ी|सब्ज़ी]], [[भारत के फल|फल]], मीट आदि मिलते हैं। दिल्‍ली में छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शोरूम भी हैं। उच्‍च वर्ग को साउथ एक्‍स और करोल बाग़ का बाज़ार पंसद आता है, वहीं टैंक रोड, सरोजिनी नगर, जनपथ, [[पालिका बाज़ार]], मॉनेस्‍ट्री, गफ़्फ़ार मार्केट आदि मध्‍यम वर्ग को लुभाता है। साउथ एक्‍स में सभी अंतर्राष्‍ट्रीय ब्रैंड के कपड़े और अन्‍य सामान मिलता है। गफ़्फ़ार मार्केट मुख्‍य रूप से बिजली के सामान के लिए जानी जाती है। चाँदनी चौक और उसके आसपास हाथ से तराशे हुए सोने चांदी के बेहतरीन जेवर मिल जाएंगे। दरियागंज में रविवार को लगने वाली किताबों की दुकानों में आपको कार्ल मार्क्‍स से लेकर [[जवाहर लाल नेहरू]] तक पर लिखी किताबें मिल सकती हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;center&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; align=&amp;quot;center&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ दिल्ली के बाज़ार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Dilli-Haat.jpg|दिल्ली हाट|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Connaught-Place-Delhi-1.jpg|कनॉट प्लेस|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Bangle-Shop-Delhi.jpg|दिल्ली के बाज़ार में चूड़ियाँ|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Jama-Masjid-Market-Delhi.jpg|जामा मस्जिद का बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Palika-Bazar-Delhi.jpg|पालिका बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|[[चित्र:Janpath-Market-Delhi.jpg|पालिका बाज़ार|100px|center]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/center&amp;gt;&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;बाज़ारों का अवकाश&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'''&amp;lt;u&amp;gt;रविवार&amp;lt;/u&amp;gt;'''- आज़ाद बाज़ार, बाबा खड़कसिंह मार्ग, [[चाँदनी चौक]], चावड़ी बाज़ार, [[कनॉट प्लेस]], हौज़ ख़ास गाँव, जनपथ बाज़ार, ख़ान मार्केट, खारी बावली, मीनाबाज़ार, नई सड़क, नेहरू प्लेस, पहाड़गंज, पालिका बाज़ार, सदर बाज़ार, सब्ज़ी मंडी, शंकर मार्केट, यशवंत प्लेस। &lt;br /&gt;
*'''&amp;lt;u&amp;gt;सोमवार&amp;lt;/u&amp;gt;'''- डिफ़ेन्स कॉलोनी, आई. एन. ए बाज़ार, करोलबाग़, लाजपत नगर, निज़ामुद्दीन, सरोजिनी नगर, दक्षिण विस्तार (साउथ एक्सटेंशन), कमला नगर, पटेल नगर।&lt;br /&gt;
*'''&amp;lt;u&amp;gt;मंगलवार&amp;lt;/u&amp;gt;'''- अरबिन्दो प्लेस, चितरंजन पार्क, ग्रेटर कैलाश, ग्रीन पार्क, हौज ख़ास, मुनिरका, न्यू फ़्रेन्ड्स कालोनी, आर. के. पुरम, वसंत विहार, मसूदपुर, वसंत कुंज, युसूफ़ सराय।&lt;br /&gt;
*'''&amp;lt;u&amp;gt;बुधवार&amp;lt;/u&amp;gt;'''- दिल्ली केंट, गोपीनाथ बाज़ार, जनकपुरी, प्रीतमपुरा, राजौरी गार्डन, तिलकनगर, रोहिणी। &lt;br /&gt;
*'''&amp;lt;u&amp;gt;शुक्रवार&amp;lt;/u&amp;gt;'''- कीर्ति नगर, मोती नगर, राजा गार्डन, सुभाष नगर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>बेगम सामरू का महल दिल्ली</title>
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		<updated>2011-06-07T08:48:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[दिल्ली]] इलेक्ट्रानिक सामान के थोक एवं फुटकर व्यापार का केन्द्र है। &lt;br /&gt;
*आजकल इसे भागीरथ बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*इसे बेगम सामरू (1753-1836) के रहने के लिए बनाया गया था, जिसने एक लालची सैनिक वाल्टर रेनहर्ड से निकाह कर लिया था। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:दिल्ली के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>बेगम सामरू का महल दिल्ली</title>
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		<updated>2011-06-07T08:47:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:पर्यटन कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[दिल्ली]] इलेक्ट्रानिक सामान के थोक एवं फुटकर व्यापार का केन्द्र है। &lt;br /&gt;
*आजकल इसे भागीरथ बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
*इसे बेगम सामरू (1753-1836) के रहने के लिए बनाया गया था, जिसने एक लालची सैनिक वाल्टर रेनहर्ड से निकाह कर लिया था। &lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>बालाथल</title>
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		<updated>2011-06-07T08:37:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:ऐतिहासिक स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[उदयपुर]] ([[राजस्थान]]) नगर से 42 किलो मीटर दक्षिण-पूर्व में वल्लभ नगर तहसील में बालाथल ग्राम स्थित है। &lt;br /&gt;
*बालाथल ग्राम के पूर्वी छोर पर एक बड़ा टीला है जो लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। &lt;br /&gt;
*इस टीले में उत्खनन का कार्य [[1993]] में वी. एन. मिश्रा के नेतृत्व में हुआ। &lt;br /&gt;
*यहाँ से हड़प्पा संस्कृति के समान ही मृदभाण्ड पाए गए हैं। अतः अनुमान है कि [[हड़प्पा]] के लोगों से इनका निकट सम्पर्क रहा होगा। &lt;br /&gt;
*इस क्षेत्र के लोगों ने पत्थर और मिट्टी की ईंटों के बड़े-बड़े मकान बनवा लिए थे। &lt;br /&gt;
*[[भारत]] के अन्य ताम्रपाषाणयुगीन स्थलों पर केवल मिट्टी के छोटे मकानों के ही प्रमाण मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ से परिष्कृत मृद्भाण्डों में प्यालियाँ और कटोरियाँ हैं। &lt;br /&gt;
*यहाँ से परवर्ती हड़प्पायुगीन लोहे के औजार भी प्रभूत मात्रा में पाये गये हैं। &lt;br /&gt;
*[[लोहा]] गलाने की भट्टियाँ भी प्राप्त हुई हैं। &lt;br /&gt;
*पुरातत्त्ववेत्ताओं ने बालाथल की ताम्रपाषाणयुगीन सभ्यता के मध्य भाग का समय 2350 ई. पू. के आसपास माना है। &lt;br /&gt;
*यदि यह मान लिया जाए तो ऐसा लगता है कि 2700 ई.पू. आस-पास बालाथल में ताम्रपाषाणुयगीन लोगों ने स्थिर जीवन शैली अपना ली होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%BE&amp;diff=169026</id>
		<title>नागार्जुनकोंडा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%BE&amp;diff=169026"/>
		<updated>2011-06-07T08:35:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:ऐतिहासिक स्थान कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[हैदराबाद]] से 100 मील दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित नागार्जुनकोंडा एक प्राचीन स्थान है। &lt;br /&gt;
*यह [[बौद्ध]] महायान के प्रसिद्ध [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|आचार्य नागार्जुन]] (द्वितीय शताब्दी) ई. के नाम पर प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*प्रथम शताब्दी में यहाँ [[सातवाहन साम्राज्य|सातवाहन]] नरेशों का राज्य था।&lt;br /&gt;
*'हाल' नामक सातवाहन राजा ने [[नागार्जुन]] के लिए श्री पर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। &lt;br /&gt;
*यह स्थान [[बौद्ध धर्म]] की महायान शाखा का भी काफ़ी समय तक प्रचार केन्द्र रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सातवाहनों के पश्चात इक्ष्वाकु नरेशों ने यहाँ राज्य किया। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु राजाओं के समय एक सुन्दर नगर था। &lt;br /&gt;
*[[कृष्णा नदी]] के तट पर स्थित तथा चतुर्दिक पर्वत मालाओं से परिवृत्त यह नगर प्राकृतिक सौन्दर्य से समंवित होने के साथ ही दुर्भेद्य दुर्ग की भाँति सुरक्षित भी था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से नौ बौद्ध [[स्तूप|स्तूपों]] के अवशेष लगभग 50 वर्ष पूर्व उत्खनित किये गये थे।&lt;br /&gt;
*ये इस नगर के प्राचीन गौरव एवं ऐश्वर्य के साक्षी हैं। &lt;br /&gt;
*उत्खनन में प्राप्त यहाँ के अवशेषों में एक स्तूप, दो चैत्य और एक विहार हैं। &lt;br /&gt;
*स्तूप के निकट [[बुद्ध]] के जीवन के दृश्यों को व्यक्त करने वाले चूने के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। &lt;br /&gt;
*[[हिन्दू धर्म]] के पुनरुत्थान से नागार्गुनकोंडा का महत्त्व घटने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा से प्राप्त अभिलेखों से यह ज्ञात होता है, कि पहली शताब्दी ई. में  [[भारत]] का [[चीन]], यूनानी जगत तथा [[लंका]] से सम्बन्ध स्थापित था। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा के एक अभिलेख से स्थविरों के संघों का ज्ञान होता है, जिन्होंने [[कश्मीर]], [[गांधार]], चीन, किरात, तोसलि, [[यवन]], ताम्रपर्णी द्वीपों में बौद्ध धर्म फैलाया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:हैदराबाद]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>नागार्जुनकोंडा</title>
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		<updated>2011-06-07T08:34:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:ऐतिहासिक स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[हैदराबाद]] से 100 मील दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित नागार्जुनकोंडा एक प्राचीन स्थान है। &lt;br /&gt;
*यह [[बौद्ध]] महायान के प्रसिद्ध [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|आचार्य नागार्जुन]] (द्वितीय शताब्दी) ई. के नाम पर प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*प्रथम शताब्दी में यहाँ [[सातवाहन साम्राज्य|सातवाहन]] नरेशों का राज्य था।&lt;br /&gt;
*'हाल' नामक सातवाहन राजा ने [[नागार्जुन]] के लिए श्री पर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। &lt;br /&gt;
*यह स्थान [[बौद्ध धर्म]] की महायान शाखा का भी काफ़ी समय तक प्रचार केन्द्र रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सातवाहनों के पश्चात इक्ष्वाकु नरेशों ने यहाँ राज्य किया। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा इक्ष्वाकु राजाओं के समय एक सुन्दर नगर था। &lt;br /&gt;
*[[कृष्णा नदी]] के तट पर स्थित तथा चतुर्दिक पर्वत मालाओं से परिवृत्त यह नगर प्राकृतिक सौन्दर्य से समंवित होने के साथ ही दुर्भेद्य दुर्ग की भाँति सुरक्षित भी था। &lt;br /&gt;
*यहाँ से नौ बौद्ध [[स्तूप|स्तूपों]] के अवशेष लगभग 50 वर्ष पूर्व उत्खनित किये गये थे।&lt;br /&gt;
*ये इस नगर के प्राचीन गौरव एवं ऐश्वर्य के साक्षी हैं। &lt;br /&gt;
*उत्खनन में प्राप्त यहाँ के अवशेषों में एक स्तूप, दो चैत्य और एक विहार हैं। &lt;br /&gt;
*स्तूप के निकट [[बुद्ध]] के जीवन के दृश्यों को व्यक्त करने वाले चूने के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। &lt;br /&gt;
*[[हिन्दू धर्म]] के पुनरुत्थान से नागार्गुनकोंडा का महत्त्व घटने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा से प्राप्त अभिलेखों से यह ज्ञात होता है, कि पहली शताब्दी ई. में  [[भारत]] का [[चीन]], यूनानी जगत तथा [[लंका]] से सम्बन्ध स्थापित था। &lt;br /&gt;
*नागार्जुनकोंडा के एक अभिलेख से स्थविरों के संघों का ज्ञान होता है, जिन्होंने [[कश्मीर]], [[गांधार]], चीन, किरात, तोसलि, [[यवन]], ताम्रपर्णी द्वीपों में बौद्ध धर्म फैलाया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:हैदराबाद]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=169024</id>
		<title>शंकरगढ़</title>
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		<updated>2011-06-07T08:32:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:ऐतिहासिक स्थान कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ [[मध्य प्रदेश]] की भूतपूर्व [[नागौर]] रियासत में उचहरा के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से मुख्यतः [[जैन]] सम्प्रदाय से सम्बन्धित अनेक ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*पुरातत्त्वविद् राखालदास बनर्जी को यहाँ से एक [[गुप्तकालीन कला और स्थापत्य|गुप्तकालीन]] मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यह मंदिर देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिर के पूर्व का निर्मित है। &lt;br /&gt;
*इसके प्रवेशद्वार की पत्थर की चौखट पर सुंदर नक्काशी की हुई है। &lt;br /&gt;
*जो गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषता है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से प्राप्त होने वाले पत्थर का इस क्षेत्र में निर्मित होने वाली अनेक मूर्तियों के बनाने में प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>शंकरगढ़</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:ऐतिहासिक स्थल (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ [[मध्य प्रदेश]] की भूतपूर्व [[नागौर]] रियासत में उचहरा के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से मुख्यतः [[जैन]] सम्प्रदाय से सम्बन्धित अनेक ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*पुरातत्त्वविद् राखालदास बनर्जी को यहाँ से एक [[गुप्तकालीन कला और स्थापत्य|गुप्तकालीन]] मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यह मंदिर देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिर के पूर्व का निर्मित है। &lt;br /&gt;
*इसके प्रवेशद्वार की पत्थर की चौखट पर सुंदर नक्काशी की हुई है। &lt;br /&gt;
*जो गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषता है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से प्राप्त होने वाले पत्थर का इस क्षेत्र में निर्मित होने वाली अनेक मूर्तियों के बनाने में प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
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{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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[[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>शंकरगढ़</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:मध्य प्रदेश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ [[मध्य प्रदेश]] की भूतपूर्व [[नागौर]] रियासत में उचहरा के निकट स्थित है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से मुख्यतः [[जैन]] सम्प्रदाय से सम्बन्धित अनेक ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*पुरातत्त्वविद् राखालदास बनर्जी को यहाँ से एक [[गुप्तकालीन कला और स्थापत्य|गुप्तकालीन]] मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*यह मंदिर देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिर के पूर्व का निर्मित है। &lt;br /&gt;
*इसके प्रवेशद्वार की पत्थर की चौखट पर सुंदर नक्काशी की हुई है। &lt;br /&gt;
*जो गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषता है। &lt;br /&gt;
*शंकरगढ़ से प्राप्त होने वाले पत्थर का इस क्षेत्र में निर्मित होने वाली अनेक मूर्तियों के बनाने में प्रयोग किया जाता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>सोनारी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:इतिहास कोश (Redirect :Category:इतिहास कोश resolved) (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*सोनारी स्थान ज़िला [[भोपाल]]  [[मध्य प्रदेश]] में [[साँची]] के निकट स्थित है, यहाँ [[अशोक]] के समय के [[स्तूप]] हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक में स्फटिक मंजूषा प्राप्त हुई है, जिसके अन्दर एक छोटे से पत्थर पर एक ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण पाया गया है। &lt;br /&gt;
*इससे तथा अन्य स्तूपों से प्राप्त प्रमाण यह सूचित करते हैं, कि यह स्थल ईसा पूर्व में भी [[बौद्ध धर्म]] से जुड़ा हुआ स्थल था। &lt;br /&gt;
*ऐसा प्रतीत होता है, कि महान् बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन प्रचारकों को भेजा गया था, उनके अवशेष इन स्तूपों में सुरक्षित रखे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक  स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=168991</id>
		<title>पौनार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=168991"/>
		<updated>2011-06-07T07:55:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:इतिहास कोश (Redirect :Category:इतिहास कोश resolved) (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] के वर्धा ज़िले के अंतर्गत पौनार को [[वाकाटक साम्राज्य|वाकाटकों]] की राजधानी माना जाता है, लेकिन इसकी उन्नति प्रायःपरवर्ती [[सातवाहन|सातवाहनों]] के समय शुरू हुई। &lt;br /&gt;
*यहाँ [[ठोस]] नींवों पर बने मकान मिले हैं। &lt;br /&gt;
*काले और लाल मृद्भाण्ड के अतिरिक्त, लाल पालिशदार मृण्पात्र और दोहत्थे कलश भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*क्षत्रपों और प्रारम्भिक कलचुरियों के सिक्के मिले हैं। विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ किसानों की बस्ती थी। &lt;br /&gt;
*ईसा की छठी शताब्दी के पश्चात यह स्थल उजड़ गया। &lt;br /&gt;
*ऐसा अनुमान है, कि दसवीं शताब्दी के आस-पास यह स्थल फिर से आबाद हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]][[Category:महाराष्ट्र_के_ऐतिहासिक_स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=168989</id>
		<title>असम का इतिहास</title>
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		<updated>2011-06-07T07:54:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:इतिहास कोश (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
विद्वानों का मत है कि 'असम' शब्द [[संस्कृत]] के 'असोमा' शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है अनुपम या अद्वितीय। किन्तु अधिकतर विद्वानों का मानना है कि यह शब्द मूल रूप से 'अहोम' से बना है। ब्रिटिश शासन में जब इस राज्य का विलय किया गया उससे पहले लगभग छह सौ वर्ष तक इस राज्य पर 'अहोम' राजाओं का शासन रहा था। आस्ट्रिक, मंगोलियन, द्रविड़ और आर्य जैसी विभिन्न जातियां प्राचीन समय से इस प्रदेश की पहाडियों और घाटियों में अलग अलग समय पर आकर रहीं और बस गयीं जिसका यहाँ की मिश्रित संस्कृति में बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।  इस राज्य के विकास में इन सभी जातियों ने अपना योगदान दिया। इस प्रकार असम राज्य में संस्कृति और सभ्यता की एक प्राचीन और समृद्ध परंपरा रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन समय में यह राज्य 'प्राग्ज्योतिष' अर्थात 'पूर्वी ज्योतिष का स्थान' कहलाता था। कालान्तर में इसका नाम 'कामरूप' पड़ गया। कामरूप राज्य का सबसे पुराना उदाहरण [[इलाहाबाद]] में [[समुद्रगुप्त]] के शिलालेख से मिलता है। इस शिलालेख में कामरूप का विवरण ऐसे सीमावर्ती देश के रूप में मिलता है, जो गुप्त साम्राज्य के अधीन था और गुप्त साम्राज्य के साथ इस राज्य के मैत्रीपूर्ण संबंध थे। चीन के विद्वान यात्री [[ह्वेनसांग]] लगभग 743 ईस्वी में राजा कुमारभास्कर वर्मन के निमंत्रण पर कामरूप में आया था। ह्वेनसांग ने कामरूप का उल्लेख 'कामोलुपा' के रूप में किया है। 11वीं शताब्दी के अरब इतिहासकार [[अलबरूनी]] की पुस्तक में भी 'कामरूप' का विवरण प्राप्त होता है। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक समस्त आर्यावर्त में पूर्वी सीमांत देश को 'प्राग्ज्योतिष' और 'कामरूप' के नाम से जाना जाता था और यहाँ के नरेश स्वयं को 'प्राग्ज्योतिष नरेश' कहलाया करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1228 में पूर्वी पहाडियों पर 'अहोम' लोगों के आने से इतिहास में मोड़ आया। उन्होंने लगभग छह सौ वर्षों तक असम राज्य पर शासन किया। 1819 में [[बदनचन्द्र]] की हत्या के बाद सन् 1826 में यह राज्य ब्रिटिश सरकार के अधिकार में आ गया। इस समय 'बर्मी' लोगों ने 'यंडाबू संधि' को मानकर असम को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असम पूर्वोत्तर दिशा में भारत का प्रहरी है और पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेशद्वार भी है। यह भूटान और बांगला देश से लगी हुई भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास है। असम की उत्तर दिशा में [[भूटान]] और [[अरुणाचल प्रदेश]], पूर्व दिशा में [[मणिपुर]], [[नागालैंड]] और अरुणाचल प्रदेश और दक्षिणी दिशा में [[मेघालय]], [[मिज़ोरम]] और [[त्रिपुरा]] राज्य हैं। असम के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता [[कुलाधर चालिहा]] का जन्म 1886 ई. में असम के शिवसागर नामक स्थान में रायबहादुर फनीधर चालिहा के घर में हुआ था।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:असम]][[Category:असम_का_इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=168986</id>
		<title>असम का इतिहास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=168986"/>
		<updated>2011-06-07T07:54:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
विद्वानों का मत है कि 'असम' शब्द [[संस्कृत]] के 'असोमा' शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है अनुपम या अद्वितीय। किन्तु अधिकतर विद्वानों का मानना है कि यह शब्द मूल रूप से 'अहोम' से बना है। ब्रिटिश शासन में जब इस राज्य का विलय किया गया उससे पहले लगभग छह सौ वर्ष तक इस राज्य पर 'अहोम' राजाओं का शासन रहा था। आस्ट्रिक, मंगोलियन, द्रविड़ और आर्य जैसी विभिन्न जातियां प्राचीन समय से इस प्रदेश की पहाडियों और घाटियों में अलग अलग समय पर आकर रहीं और बस गयीं जिसका यहाँ की मिश्रित संस्कृति में बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।  इस राज्य के विकास में इन सभी जातियों ने अपना योगदान दिया। इस प्रकार असम राज्य में संस्कृति और सभ्यता की एक प्राचीन और समृद्ध परंपरा रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन समय में यह राज्य 'प्राग्ज्योतिष' अर्थात 'पूर्वी ज्योतिष का स्थान' कहलाता था। कालान्तर में इसका नाम 'कामरूप' पड़ गया। कामरूप राज्य का सबसे पुराना उदाहरण [[इलाहाबाद]] में [[समुद्रगुप्त]] के शिलालेख से मिलता है। इस शिलालेख में कामरूप का विवरण ऐसे सीमावर्ती देश के रूप में मिलता है, जो गुप्त साम्राज्य के अधीन था और गुप्त साम्राज्य के साथ इस राज्य के मैत्रीपूर्ण संबंध थे। चीन के विद्वान यात्री [[ह्वेनसांग]] लगभग 743 ईस्वी में राजा कुमारभास्कर वर्मन के निमंत्रण पर कामरूप में आया था। ह्वेनसांग ने कामरूप का उल्लेख 'कामोलुपा' के रूप में किया है। 11वीं शताब्दी के अरब इतिहासकार [[अलबरूनी]] की पुस्तक में भी 'कामरूप' का विवरण प्राप्त होता है। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक समस्त आर्यावर्त में पूर्वी सीमांत देश को 'प्राग्ज्योतिष' और 'कामरूप' के नाम से जाना जाता था और यहाँ के नरेश स्वयं को 'प्राग्ज्योतिष नरेश' कहलाया करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1228 में पूर्वी पहाडियों पर 'अहोम' लोगों के आने से इतिहास में मोड़ आया। उन्होंने लगभग छह सौ वर्षों तक असम राज्य पर शासन किया। 1819 में [[बदनचन्द्र]] की हत्या के बाद सन् 1826 में यह राज्य ब्रिटिश सरकार के अधिकार में आ गया। इस समय 'बर्मी' लोगों ने 'यंडाबू संधि' को मानकर असम को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असम पूर्वोत्तर दिशा में भारत का प्रहरी है और पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेशद्वार भी है। यह भूटान और बांगला देश से लगी हुई भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास है। असम की उत्तर दिशा में [[भूटान]] और [[अरुणाचल प्रदेश]], पूर्व दिशा में [[मणिपुर]], [[नागालैंड]] और अरुणाचल प्रदेश और दक्षिणी दिशा में [[मेघालय]], [[मिज़ोरम]] और [[त्रिपुरा]] राज्य हैं। असम के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता [[कुलाधर चालिहा]] का जन्म 1886 ई. में असम के शिवसागर नामक स्थान में रायबहादुर फनीधर चालिहा के घर में हुआ था।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:असम]][[Category:असम_का_इतिहास]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>सदस्य वार्ता:रविन्द्र प्रसाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168974"/>
		<updated>2011-06-07T07:35:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: /* पेज देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
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== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
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==हैदर अली==&lt;br /&gt;
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==माधवराव नारायण==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Shilpi4]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:09, 18 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==पेज चैक करें==&lt;br /&gt;
कृपया [[अनंतवर्मन चोडगंग]] और [[अनन्तवर्मा चोडगंग]] के पेज चैक करें [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:गोविन्द राम]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:गोविन्द राम|गोविन्द राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:गोविन्द राम|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;  14:02, 4 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
मिर्ज़ा ग़ालिब लेख अब तक क्यों नहीं तैयार किया गया ? [[चित्र:Admin-logo.jpg|प्रशासक|link=User:आदित्य चौधरी]] [[User:आदित्य चौधरी|आदित्य चौधरी &amp;lt;sub style=&amp;quot;color:#8f30f1&amp;quot;&amp;gt;प्रशासक&amp;lt;/sub&amp;gt;]] '''.''' &amp;lt;sub&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आदित्य चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/sub&amp;gt; 22:59, 18 अप्रॅल 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==  पन्ना देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:हिना6]] देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:हिना गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:हिना गोस्वामी|हिना गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:हिना गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 16:54, 1 जून 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=168927</id>
		<title>सोनारी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=168927"/>
		<updated>2011-06-07T05:19:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: Adding category :Category:मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक  स्थान (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*सोनारी स्थान ज़िला [[भोपाल]]  [[मध्य प्रदेश]] में [[साँची]] के निकट स्थित है, यहाँ [[अशोक]] के समय के [[स्तूप]] हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक में स्फटिक मंजूषा प्राप्त हुई है, जिसके अन्दर एक छोटे से पत्थर पर एक ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण पाया गया है। &lt;br /&gt;
*इससे तथा अन्य स्तूपों से प्राप्त प्रमाण यह सूचित करते हैं, कि यह स्थल ईसा पूर्व में भी [[बौद्ध धर्म]] से जुड़ा हुआ स्थल था। &lt;br /&gt;
*ऐसा प्रतीत होता है, कि महान् बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन प्रचारकों को भेजा गया था, उनके अवशेष इन स्तूपों में सुरक्षित रखे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक  स्थान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=168925</id>
		<title>पौनार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8C%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=168925"/>
		<updated>2011-06-07T05:16:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] के वर्धा ज़िले के अंतर्गत पौनार को [[वाकाटक साम्राज्य|वाकाटकों]] की राजधानी माना जाता है, लेकिन इसकी उन्नति प्रायःपरवर्ती [[सातवाहन|सातवाहनों]] के समय शुरू हुई। &lt;br /&gt;
*यहाँ [[ठोस]] नींवों पर बने मकान मिले हैं। &lt;br /&gt;
*काले और लाल मृद्भाण्ड के अतिरिक्त, लाल पालिशदार मृण्पात्र और दोहत्थे कलश भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*क्षत्रपों और प्रारम्भिक कलचुरियों के सिक्के मिले हैं। विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ किसानों की बस्ती थी। &lt;br /&gt;
*ईसा की छठी शताब्दी के पश्चात यह स्थल उजड़ गया। &lt;br /&gt;
*ऐसा अनुमान है, कि दसवीं शताब्दी के आस-पास यह स्थल फिर से आबाद हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]][[Category:महाराष्ट्र_के_ऐतिहासिक_स्थान]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168898</id>
		<title>सदस्य वार्ता:रविन्द्र प्रसाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168898"/>
		<updated>2011-06-06T13:54:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: /* पेज देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==बाजीराव==&lt;br /&gt;
कृपया [[बालाजी बाजीराव]] पृष्ठ को सुधारें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:गोविन्द राम]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:गोविन्द राम|गोविन्द राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:गोविन्द राम|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;  14:51, 23 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज बनाये ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया भीष्म साहनी का पृष्ठ बनाये। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:58, 28 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:रबीन्द्रनाथ ठाकुर]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:54, 30 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==हैदर अली==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रवि जी, हैदर अली पेज की पहली पंक्ति में ही '''शासक''' शब्द है और आपने हैडिंग में '''शाषक''' लिखा है? कृपया ध्यान दें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 19:33, 31 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==2011==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नववर्ष आपके लिए मंगलमय हो। शुभकामनाएँ...[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:13, 1 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें	 ==&lt;br /&gt;
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भारतकोश परिवार की ओर से आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:23, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==माधवराव नारायण==&lt;br /&gt;
'स्थान', रियासत या राज्य का पता कर उसका उल्लेख अवश्य करें[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:38, 5 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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== पेज देखें ==&lt;br /&gt;
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== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>पौनार</title>
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		<updated>2011-06-06T13:47:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[महाराष्ट्र]] के वर्धा ज़िला के अंतर्गत पौनार को [[वाकाटक साम्राज्य|वाकाटकों]] की राजधानी माना जाता है, लेकिन इसकी उन्नति प्रायःपरवर्ती [[सातवाहन|सातवाहनों]] के समय शुरू हुई। &lt;br /&gt;
*यहाँ [[ठोस]] नींवों पर बने मकान मिले हैं। &lt;br /&gt;
*काले और लाल मृद्भाण्ड के अतिरिक्त, लाल पालिशदार मृण्पात्र और दोहत्थे कलश भी मिले हैं। &lt;br /&gt;
*क्षत्रपों और प्रारम्भिक कलचुरियों के सिक्के मिले हैं। विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ किसानों की बस्ती थी। &lt;br /&gt;
*ईसा की छठी शताब्दी के पश्चात यह स्थल उजड़ गया। &lt;br /&gt;
*ऐसा अनुमान है, कि दसवीं शताब्दी के आस-पास यह स्थल फिर से आबाद हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
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		<title>सोनारी</title>
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		<updated>2011-06-06T13:45:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*सोनारी स्थान ज़िला [[भोपाल]]  [[मध्य प्रदेश]] में [[साँची]] के निकट स्थित है, यहाँ [[अशोक]] के समय के [[स्तूप]] हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक में स्फटिक मंजूषा प्राप्त हुई है, जिसके अन्दर एक छोटे से पत्थर पर एक ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण पाया गया है। &lt;br /&gt;
*इससे तथा अन्य स्तूपों से प्राप्त प्रमाण यह सूचित करते हैं, कि यह स्थल ईसा पूर्व में भी [[बौद्ध धर्म]] से जुड़ा हुआ स्थल था। &lt;br /&gt;
*ऐसा प्रतीत होता है, कि महान् बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन प्रचारकों को भेजा गया था, उनके अवशेष इन स्तूपों में सुरक्षित रखे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*सोलारी स्थान ज़िला [[भोपाल]]  [[मध्य प्रदेश]] में [[साँची]] के निकट स्थित है, यहाँ [[अशोक]] के समय के [[स्तूप]] हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक में स्फटिक मंजूषा प्राप्त हुई है, जिसके अन्दर एक छोटे से पत्थर पर एक ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण पाया गया है। &lt;br /&gt;
*इससे तथा अन्य स्तूपों से प्राप्त प्रमाण यह सूचित करते हैं, कि यह स्थल ईसा पूर्व में भी [[बौद्ध धर्म]] से जुड़ा हुआ स्थल था। &lt;br /&gt;
*ऐसा प्रतीत होता है, कि महान् बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन प्रचारकों को भेजा गया था, उनके अवशेष इन स्तूपों में सुरक्षित रखे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>सोनारी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=168879"/>
		<updated>2011-06-06T13:45:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*सोनारी स्थान ज़िला [[भोपाल]]  [[मध्य प्रदेश]] में [[साँची]] के निकट स्थित है, यहाँ [[अशोक]] के समय के [[स्तूप]] हैं। &lt;br /&gt;
*इनमें से एक में स्फटिक मंजूषा प्राप्त हुई है, जिसके अन्दर एक छोटे से पत्थर पर एक ब्राह्मी लेख उत्कीर्ण पाया गया है। &lt;br /&gt;
*इससे तथा अन्य स्तूपों से प्राप्त प्रमाण यह सूचित करते हैं, कि यह स्थल ईसा पूर्व में भी [[बौद्ध धर्म]] से जुड़ा हुआ स्थल था। &lt;br /&gt;
*ऐसा प्रतीत होता है, कि महान् बौद्ध भिक्षु मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन प्रचारकों को भेजा गया था, उनके अवशेष इन स्तूपों में सुरक्षित रखे गए थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168752</id>
		<title>सदस्य वार्ता:रविन्द्र प्रसाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168752"/>
		<updated>2011-06-06T09:26:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: /* पेज देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==बाजीराव==&lt;br /&gt;
कृपया [[बालाजी बाजीराव]] पृष्ठ को सुधारें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:गोविन्द राम]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:गोविन्द राम|गोविन्द राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:गोविन्द राम|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;  14:51, 23 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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कृपया भीष्म साहनी का पृष्ठ बनाये। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:58, 28 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[वार्ता:रबीन्द्रनाथ ठाकुर]] पन्ने को देखें । [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:अश्वनी भाटिया]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:अश्वनी भाटिया|अश्वनी भाटिया]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:अश्वनी भाटिया|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:54, 30 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==हैदर अली==&lt;br /&gt;
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रवि जी, हैदर अली पेज की पहली पंक्ति में ही '''शासक''' शब्द है और आपने हैडिंग में '''शाषक''' लिखा है? कृपया ध्यान दें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 19:33, 31 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
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नववर्ष आपके लिए मंगलमय हो। शुभकामनाएँ...[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:13, 1 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
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== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
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==गणतंत्र दिवस==&lt;br /&gt;
भारतकोश परिवार की ओर से आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:23, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[सदस्य:लक्ष्मी गोस्वामी/अभ्यास3]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:लक्ष्मी गोस्वामी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt; [[User:लक्ष्मी गोस्वामी|लक्ष्मी गोस्वामी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:लक्ष्मी गोस्वामी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 17:56, 12 मार्च 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
== पेज देखें। ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%B0_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6&amp;diff=168588</id>
		<title>चेर वंश</title>
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		<updated>2011-06-06T06:45:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[ऐतरेय ब्राह्मण]] में उल्लिखित 'चेरपाद:' सम्भवत: चेरों के विषय में प्रथम जानकारी है।&lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त [[रामायण]], [[महाभारत]], [[अशोक के शिलालेख]], [[कालिदास]] के 'रघुवंश महाकाव्य' एवं 'संगम साहित्य' से भी चेरों के बारे में जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
*चेर राज्य आधुनिक कोंकण, मालाबार का तटीय क्षेत्र तथा उत्तरी त्रावनकोर एवं [[कोचीन]] तक विस्तृत था।&lt;br /&gt;
*[[अशोक]] के शिलालेखों में 'केरलपुत्र' के नाम से चर्चित चेर राज्य को 'कुडावर', 'बिल्लवर', 'कुट्टवर', 'पुरैयार', 'मलैयर' एवं 'बनारवर' आदि नामों से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
*चेरों का राजकीय चिह्न 'धनुष' था।&lt;br /&gt;
==चेर वंश के प्रमुख शासक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उदियनजेरल &lt;br /&gt;
#नेदुनजेरल आदन&lt;br /&gt;
#पलयानैशेल्केलु कुट्टवन&lt;br /&gt;
#[[धर्मपरायण कुट्टवन]]&lt;br /&gt;
#[[पेरुनजेरल इरंपोरई]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{चेर वंश}}{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]]&lt;br /&gt;
[[Category:दक्षिण भारत के साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:चेर वंश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4&amp;diff=168396</id>
		<title>गोवा का यातायात</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4&amp;diff=168396"/>
		<updated>2011-06-05T12:42:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} गोवा में 31 दिसंबर, 2008 तक 4,40,152 ड्राइविंग ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
गोवा में [[31 दिसंबर]], [[2008]] तक 4,40,152 ड्राइविंग लाइसेंस दिए गए तथा 6,59,012 वाहनों का पंजीकरण किया गया। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;सड़क मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
राज्‍य में राष्‍ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 224 किलोमीटर तथा प्रांतीय राजमार्गों की लंबाई 232 किलोमीटर है। इसके अलावा 815 किलोमीटर ज़िला मार्ग हैं।&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;रेल मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt; &lt;br /&gt;
गोवा कोंकण रेलवे के माध्‍यम से [[मुंबई]], मंगलौर और [[तिरुवनंतपुरम]] से जुड़ा है। इस रेलमार्ग पर अनेक तेज-रफ़्तार रेलगाडियाँ शुरू की गई हैं। वास्‍को दक्षिण मध्‍य रेलवे के [[बंगलौर]] और [[बेलगाँव कर्नाटक|बेलगाँव]] स्‍टेशनों से जुड़ा है। इस मार्ग का इस्‍तेमाल फिलहाल माल यातायात के लिए हो रहा है। &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;हवाई मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
डबोलिम हवाई अड्डे से मुंबई, [[दिल्ली]], तिरूवनंतपुरम, [[कोच्चि]], [[चेन्नई]], अगाती और बंगलौर के लिए नियमित विमान सेवाएँ उपलब्ध हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;बंदरगाह&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
मर्मगाव राज्‍य का प्रमुख बंदरगाह है। यहाँ मालवाहक जहाजों के लिए सुविधाएँ उपलब्‍ध हैं। इसके अलावा पणजी, तिराकोल, चपोरा बेतूल और तालपोना में भी छोटे बंदरगाह हैं, मगर इनमें से पणजी प्रमुख व्‍यस्‍त बंदरगाह है। यहाँ जहाजों के लिए हाल में ही एक पत्‍तन (पोर्ट) चालू हुआ है। अंतरीप से परिलक्षित और आधुनिक जलरोधी व घाट से सुसज्जित मर्मगाव मुंबई व कोषिकोड (भूतपूर्व कालीकट, केरल) के बीच सबसे श्रेष्ठ बंदरगाह हैं। यह लोह-अयस्क व मैंगनीज़ के निर्यात के सर्वथा अनुकूल है। वास्को द गामा शहरी क्षेत्र व मंडगाँव से गुज़रने वाली रेलवे लाइन इसे कर्नाटक में लोंडा होकर जाने वाली मुख्य दक्षिण रेलवे से जोड़ती है। उत्तर से दक्षिण को जाने वाली नई कोंकण रेलवे गोवा के अतिरिक्त आर्थिक विकास में सहायता करती है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;स्थानीय साधन&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
*'''टैक्सी'''- गोवा में बिना मीटर और मीटर वाली टैक्सियाँ पर्यटकों को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने का सबसे लोकप्रिय साधन हैं। यहाँ बिना मीटर वाली टैक्सियों में यात्री पहले से भाड़े के बारे में तय करते हैं। &lt;br /&gt;
*'''बस'''- गोवा में ज़्यादातर बसे प्राईवेट चालकों द्वारा चलाई जाती हैं। यहाँ बसों में काफ़ी भीड़ होती है। गोवा सरकार द्वारा यहाँ कदम्ब बस सर्विस चलाई जाती है जिनमें धीरे चलने वाली बसों से लेकर द्रुत सेवा की लंबी दूरी की बसें शामिल होती हैं.&lt;br /&gt;
*'''नाव'''- गोवा में यात्रियों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए नाव भी एक बेहतरीन साधन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:गोवा]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=168380</id>
		<title>आसाम का इतिहास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=168380"/>
		<updated>2011-06-05T12:32:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: असम का इतिहास को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[असम का इतिहास]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>असम का इतिहास</title>
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		<updated>2011-06-05T12:29:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} विद्वानों का मत है कि 'असम' शब्द [[संस्कृत]...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
विद्वानों का मत है कि 'असम' शब्द [[संस्कृत]] के 'असोमा' शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है अनुपम या अद्वितीय। किन्तु अधिकतर विद्वानों का मानना है कि यह शब्द मूल रूप से 'अहोम' से बना है। ब्रिटिश शासन में जब इस राज्य का विलय किया गया उससे पहले लगभग छह सौ वर्ष तक इस राज्य पर 'अहोम' राजाओं का शासन रहा था। आस्ट्रिक, मंगोलियन, द्रविड़ और आर्य जैसी विभिन्न जातियां प्राचीन समय से इस प्रदेश की पहाडियों और घाटियों में अलग अलग समय पर आकर रहीं और बस गयीं जिसका यहाँ की मिश्रित संस्कृति में बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।  इस राज्य के विकास में इन सभी जातियों ने अपना योगदान दिया। इस प्रकार असम राज्य में संस्कृति और सभ्यता की एक प्राचीन और समृद्ध परंपरा रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन समय में यह राज्य 'प्राग्ज्योतिष' अर्थात 'पूर्वी ज्योतिष का स्थान' कहलाता था। कालान्तर में इसका नाम 'कामरूप' पड़ गया। कामरूप राज्य का सबसे पुराना उदाहरण [[इलाहाबाद]] में [[समुद्रगुप्त]] के शिलालेख से मिलता है। इस शिलालेख में कामरूप का विवरण ऐसे सीमावर्ती देश के रूप में मिलता है, जो गुप्त साम्राज्य के अधीन था और गुप्त साम्राज्य के साथ इस राज्य के मैत्रीपूर्ण संबंध थे। चीन के विद्वान यात्री [[ह्वेनसांग]] लगभग 743 ईस्वी में राजा कुमारभास्कर वर्मन के निमंत्रण पर कामरूप में आया था। ह्वेनसांग ने कामरूप का उल्लेख 'कामोलुपा' के रूप में किया है। 11वीं शताब्दी के अरब इतिहासकार [[अलबरूनी]] की पुस्तक में भी 'कामरूप' का विवरण प्राप्त होता है। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी तक समस्त आर्यावर्त में पूर्वी सीमांत देश को 'प्राग्ज्योतिष' और 'कामरूप' के नाम से जाना जाता था और यहाँ के नरेश स्वयं को 'प्राग्ज्योतिष नरेश' कहलाया करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन 1228 में पूर्वी पहाडियों पर 'अहोम' लोगों के आने से इतिहास में मोड़ आया। उन्होंने लगभग छह सौ वर्षों तक असम राज्य पर शासन किया। 1819 में [[बदनचन्द्र]] की हत्या के बाद सन् 1826 में यह राज्य ब्रिटिश सरकार के अधिकार में आ गया। इस समय 'बर्मी' लोगों ने 'यंडाबू संधि' को मानकर असम को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असम पूर्वोत्तर दिशा में भारत का प्रहरी है और पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेशद्वार भी है। यह भूटान और बांगला देश से लगी हुई भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास है। असम की उत्तर दिशा में [[भूटान]] और [[अरुणाचल प्रदेश]], पूर्व दिशा में [[मणिपुर]], [[नागालैंड]] और अरुणाचल प्रदेश और दक्षिणी दिशा में [[मेघालय]], [[मिज़ोरम]] और [[त्रिपुरा]] राज्य हैं। असम के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता [[कुलाधर चालिहा]] का जन्म 1886 ई. में असम के शिवसागर नामक स्थान में रायबहादुर फनीधर चालिहा के घर में हुआ था।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:असम]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>आसाम की कृषि</title>
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		<updated>2011-06-05T12:19:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: असम की कृषि को अनुप्रेषित&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT[[असम की कृषि]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>असम की कृषि</title>
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		<updated>2011-06-05T12:19:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} *असम राज्य एक कृषि प्रधान राज्य है।  *क...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[असम]] राज्य एक [[कृषि]] प्रधान राज्य है। &lt;br /&gt;
*कृषि यहाँ की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है। &lt;br /&gt;
*[[चावल]] इस राज्य की मुख्य खाद्य फ़सल है और [[जूट]], [[चाय]], [[कपास]], तिलहन, [[गन्ना]] और [[आलू]] आदि यहाँ की नकदी फ़सलें हैं। &lt;br /&gt;
*राज्य की प्रमुख बाग़वानी फ़सलें [[संतरा]], [[केला]], अनन्नास, सुपारी, नारियल, अमरूद, आम, कटहल और [[नीबू]] आदि हैं। &lt;br /&gt;
*इन सभी की खेती छोटे स्तर पर की जाती है। &lt;br /&gt;
*इस राज्य में लगभग 39.44 लाख हेक्टयर भूमि कुल खेती योग्य भूमि है। &lt;br /&gt;
*इसमें से क़रीब 27.01 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही खेती की जाती है।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:असम]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168321</id>
		<title>सदस्य वार्ता:रविन्द्र प्रसाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE:%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=168321"/>
		<updated>2011-06-05T11:44:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: /* पेज देखें। */ नया विभाग&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==बाजीराव==&lt;br /&gt;
कृपया [[बालाजी बाजीराव]] पृष्ठ को सुधारें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:गोविन्द राम]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:गोविन्द राम|गोविन्द राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:गोविन्द राम|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;  14:51, 23 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पेज बनाये ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया भीष्म साहनी का पृष्ठ बनाये। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:58, 28 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रबीन्द्रनाथ ठाकुर ==&lt;br /&gt;
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==हैदर अली==&lt;br /&gt;
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रवि जी, हैदर अली पेज की पहली पंक्ति में ही '''शासक''' शब्द है और आपने हैडिंग में '''शाषक''' लिखा है? कृपया ध्यान दें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 19:33, 31 दिसंबर 2010 (IST)&lt;br /&gt;
==2011==&lt;br /&gt;
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नववर्ष आपके लिए मंगलमय हो। शुभकामनाएँ...[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 14:13, 1 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==व्यवस्था==&lt;br /&gt;
कृपया बतायें क्या नये पन्ने क्रमवार जाँचे जा रहे हैं? नहीं तो क्या व्यवस्था चल रही है?[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 18:14, 7 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
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== सामान्य ज्ञान ==&lt;br /&gt;
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== पेज देखें	 ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया [[प्रयोग:Shilpi2]] में भूगोल सामान्य ज्ञान एक बार देख लीजिए। इसके अलावा [[गुवाहाटी]], [[कोणार्क]], [[गांधीनगर]], [[विशाखापत्तनम]], [[~]] का पेज देखें।[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:शिल्पी गोयल]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:शिल्पी गोयल|शिल्पी गोयल]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:शिल्पी गोयल|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 09:59, 22 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==गणतंत्र दिवस==&lt;br /&gt;
भारतकोश परिवार की ओर से आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 15:23, 26 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
==माधवराव नारायण==&lt;br /&gt;
'स्थान', रियासत या राज्य का पता कर उसका उल्लेख अवश्य करें[[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:आशा चौधरी]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:आशा चौधरी|आशा चौधरी]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:आशा चौधरी|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; 11:38, 5 फ़रवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
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== सूचना बक्सा घटना क्रम ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>रसखान की अलंकार योजना</title>
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		<updated>2011-06-04T14:17:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*अलंकार शब्द का अर्थ है जो दूसरी वस्तु को अलंकृत करे- '''अलंकरोति इति अलंकार:'''। &lt;br /&gt;
*आचार्य दण्डी ने कहा है कि काव्य के सभी शोभाकारक धर्म अलंकार हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रवक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान् कात्स्यैन वक्ष्यति॥ -काव्यादर्श, 2।1&amp;lt;/ref&amp;gt; उनकी इस परिभाषा में चमत्कार उत्पन्न करने वाले सभी काव्य तत्त्वों की विशेषताओं को अलंकार मान लिया गया है। &lt;br /&gt;
*अलंकार से भामह का अभिप्राय ऐसी शब्द उक्ति से है जो वक्र अर्थात विचित्र अर्थ का विधान करने वाली हो।&amp;lt;ref&amp;gt;वक्राभिधेय शब्दोक्तिरिष्टावाचामलंकृति:। -काव्यालंकार, 1। 36&amp;lt;/ref&amp;gt; अलंकार शब्द और अर्थ में विद्यमान कवि प्रतिभोत्थित ऐसे वैचित्र्य को अलंकार कह सकते हैं, जो वाक्य-सौंदर्य को अतिशयता प्रदान करता है। इसी से सभी भारतीय काव्यशास्त्रियों ने काव्य में अलंकार के महत्त्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;
*अलंकारों के विधिवत प्रयोग से ही काव्य अलंकृत होता है। नीरस काव्य में अलंकार-योजना उक्ति वैचित्र्य मात्र हैं। अलंकार-प्रयोग में औचित्य का पूर्ण निर्वाह होना चाहिए। रसखान ने इसका ध्यान रखा है। कविवर रसखान की गणना भक्त कवियों में की जाती है। भक्ति काव्यधारा के कवियों ने अलंकारों का सन्निवेश बहुतायत से किया है। परन्तु उन्होंने अलंकारों की अपेक्षा अलंकार्य-भाव-रस को ही अधिक गौरव दिया है। रसखान की प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। उन्होंने भाव पर अधिक बल दिया है। बाहरी तड़क-भड़क और अलंकारों के बरबस विधान का प्रयास नहीं किया। उनकी रचना में आये हुए अलंकार स्वाभाविक और अभिव्यक्ति को प्रांजल बनाने में सहायक हैं। अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, प्रतीप आदि अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'''शब्दालंकार'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अनुप्रास'''&lt;br /&gt;
केवल भारतीय कवियों ने ही नहीं बल्कि पाश्चात्य कवियों ने भी अनुप्रास अलंकार का बहुत अधिक रुचि के साथ प्रयोग किया है। अनुप्रास की परिभाषा एवं स्वरूप के विषय में भी आचार्य मूलत: एकमत हैं। स्थूल रूप से, वर्णसाम्य को 'अनुप्रास' कहा गया है। आचार्य भामह के अनुसार स्वरों की विषमता होने पर भी व्यंजनों की ऐसी आवृत्ति जिसमें बहुत व्यवधान न हो और जो रस एवं भाव के अनुकूल हो, उसे 'अनुप्रास' कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;स्वरवैसादृश्ये पि व्यंजनसदृशत्वं वर्णसाम्यम्। रसाद्यनुगत: प्रकृष्टो न्यासोनुप्रास: -काव्यप्रकाश, 9।2 परवृति&amp;lt;/ref&amp;gt; अनुप्रास के प्रधानत: दो भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''छेकानुप्रास''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां एक या अनेक वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति केवल एक बार हो अर्थात एक या अनेक वर्णों का प्रयोग केवल दो बार हो, वहां छेकानुप्रास होता है। छेकानुप्रास का एक उदाहरण द्रष्टव्य है—&lt;br /&gt;
*देखौ दुरौ वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटत राधिका पायन।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 17&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मैन मनोहर बैन बजै सुसजै तन सोहत पीत पटा है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 172&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
उपर्युक्त पहली पंक्ति में 'द' और 'क' का तथा दूसरी पंक्ति में 'म' और 'ब' का प्रयोग दो बार हुआ है। इन वर्णों की आवृत्ति एक बार होने से यहाँ छेकानुप्रास है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वृत्यानुप्रास''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां वृत्तियों (उपनागरिका, परुषा और कोमला) के अनुसार एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति क्रमपूर्वक अनेक बार हो। रसखान के काव्य में अनुप्रास की बड़ी चित्ताकर्षक योजना हुई है। अनुप्रास की नियोजना से कविता सुनने में भली लगती है। उससे कविता का प्रभाव परिवर्धित हो जाता है। रसखान के कवित्त और सवैयों की वर्णयोजना भावक के मन को तरंगित करती रहती है। भावानुकूल अनुप्रास का प्रयोग सफल कवि ही कर सकते हैं। रसखान ने अपने को इस कला में पारंगत सिद्ध किया है। रसखान की कविता में वृत्यानुप्रासयुक्त अनेकानेक सुंदर सवैये और कवित्त हैं। ऐसा लगता है कि कवि शब्दों को नचाता हुआ चल रहा है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
सेष गनेस महेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सु बेद बतावैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 13&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छकि छैल छबीली छटा छहराइ के कौतुक कोटि दिखाइ रही।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 154&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यमक'''&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जहां भिन्नार्थक वर्णों (निरर्थक या सार्थक) की क्रमश: पुनरावृत्ति हो, वहां 'यमक' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 1,2,5,6,7,8,9,10,11,12, 14,37,78&amp;lt;/ref&amp;gt; 'यमक' का शाब्दिक अर्थ है जोड़ा। इस अलंकार का नाम 'यमक' इसलिए रखा गया है क्योंकि इसमें एक जैसे दो शब्द प्रयुक्त होते हैं। सार्थक वर्ण समूह की अपेक्षा निरर्थक वर्णसमूह की आवृत्ति यमक के चमत्कार में विशेष वृद्धि करती है। यमक में कहीं दोनों वर्ण समूह सार्थक होते हैं, कहीं दोनों निरर्थक एवं कहीं एक सार्थक होता है और एक निरर्थक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''श्लेष'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*जहां श्लिष्ट पदों द्वारा अनेक अर्थों का कथन किया जाय वहां श्लेष अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्लिष्टै, पदेरनेकार्थाभिधाने श्लेष ईष्यते॥ - साहित्यदर्पण, 10 । 11&amp;lt;/ref&amp;gt; श्लेष प्राय: अन्य अलंकारों का सहयोगी होकर ही काव्य में योजित होता है। भावुक कवियों के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत सीमित रूप में हुआ है। इसका कारण यह है कि श्लेष में ऐसे शब्दों का विधान होता है जो अनेक अर्थों को प्रकट करते हैं। अनेकार्थक शब्दों की योजना में प्रयास करना पड़ता है। श्लेष के द्वारा काव्य का बाह्य आवरण ही अधिक अलंकृत होता है। &lt;br /&gt;
*रसखान के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत ही कम हुआ है। रसखान निश्छल भावनाओं को व्यक्त करने वाले कवि हैं। और श्लेष भावोत्कर्ष में बहुत अधिक सहयोगी नहीं होता। फिर भी कहीं-कहीं उसकी योजना सुंदर रूप में हुई है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मन लीनो प्यारे पै छटांक नहिं देत।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहै कहा पाटी पढ़ी दल को पीछो लेत॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 150&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस दोहे में 'मन' और 'छटांक' शब्द में स्पष्ट रूप से श्लेष है। 'मन' का अर्थ है चित्त और दूसरा अर्थ है 'चालीस सेर'। इसी तरह 'छटांक' का एक अर्थ है झलक या कटांछ (कटाक्ष) और दूसरा अर्थ है सेर का सोलहवां भाग।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वक्रोक्ति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी एक अभिप्राय वाले कहे हुए वाक्य का, किसी अन्य द्वारा श्लेष अथवा काकु से, अन्य अर्थ लिए जाने को 'वक्रोक्ति' अलंकार कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यदुक्तामन्यथावाक्यमन्यथा न्येन योज्यते। श्लेषेण काक्वा वा ज्ञैया सा वक्रोक्तिरतथा द्विधा॥ - काव्यप्रकाश 9।78&amp;lt;/ref&amp;gt; वक्रोक्ति अलंकार दो प्रकार का होता है- श्लेष वक्रोक्ति और काकु बक्रोक्ति। श्लेष वक्रोक्ति में किसी शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण वक्ता के अभिप्रेत अर्थ से अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है और काकु वक्रोक्ति में कंठ ध्वनि अर्थात् बोलने वाले के लहजे में भेद होने के कारण दूसरा अर्थ कल्पित किया जाता है। वक्रोक्ति अलंकार का नियोजन एक कष्टसाध्य कर्म है, जिसके लिए प्रयास करना अनिवार्य है। भावुक कवियों ने इसका प्रयोग कम ही किया है। रसखान की रचनाओं में वक्रोक्ति की योजना नाममात्र को है, परंतु जो है, वह सहृदय के चित्त को प्रसन्न करने वाली है। दानलीला के प्रसंग में कवि की कला का चमत्कार द्रष्टव्य है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
छीर जौ चाहत चीर गहैं अजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैड़ौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
जानति हौं जिय की रसखानि सु काहेकौं एतिक बात बढ़ैहौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
गौरस के मिस जो रस चाहत सौ रस कान्हजू नेकु न पैहौ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 42&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'कान्हजू' ने गोपी के प्रति जो चेष्टा की उसका उत्तर वह बड़े वक्रतापूर्ण ढंग से देती है। यदि 'चीर' गहने से 'छीर' चाहते हो, तो लो कितना पीओगे, चखने के बहाने मक्खन मांगते हो तो लो खाओं, कितना खाओगे। परंतु [[गोपी]] [[कृष्ण]] की इन चेष्टाओं का दूसरा अर्थ लेती हुई कहती है कि मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूं, तुम गौरस (दूध, दही, घी) के बहाने 'गौरस' (इन्द्रियों का रस) चाहते हो, तो लो सुन लो कि वह रस तुम जरा-सा भी नहीं पाओगे। सवैया की अंतिम पंक्ति में वक्रोक्ति की सरस एवं नाट्यमय व्यंजना हुई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रूपक'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-3.jpg|[[रसखान]] की समाधि, [[महावन]], [[मथुरा]]|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
उपमेय पर उपमान के निषेध-रहित अभेद आरोप को रूपक कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अभेदप्राधान्ये आरोपे आरोपविषयानपह्नवे रूपकम्।  -अलंकारसर्वस्व, पृ0 34&amp;lt;/ref&amp;gt; 'आरोप' का अर्थ है- रूप देना अर्थात् दूसरे के रूप में रंग देना। यह 'आरोप' कल्पित होता है। रूपक में उपमेय को उपमान समझ लिया जाता है। उपमा में उपमेय और उपमान में सादृश्य होते हुए भी भिन्नता होती है जबकि रूपक में दोनों एक से जान पड़ते हैं। उनमें एकरूपता होती है। रूपक के तीन मुख्य भेद हैं- &lt;br /&gt;
#सांगरूपक- जहां उपमेय में उपमान का अंगों के सहित आरोप हो वहां सांगरूपक होता है। &lt;br /&gt;
#निरंगरूपक- अंगों से रहित उपमान का जहां उपमेय में आरोप होता है वहां निरंगरूपक होता है। &lt;br /&gt;
#परंपरितरूपक- जहां एक आरोप दूसरे आरोप का कारण हो वहां परंपरितरूपक होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपक अलंकार की निबंधना में भारतीय महाकवियों की विशेष प्रवृत्ति रही है। यह रसखान का भी प्रिय अलंकार है। उनके काव्य में स्थल-स्थल पर रूपकों की सुन्दर नियोजना की गई है। वे स्वाभाविक रूप से आए हैं तथा उनके द्वारा भावों की मार्मिक व्यंजना हुई है। रूपक चित्तविधायक अलंकार है। रसखान ने इसका सफल प्रयोग किया है। प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है। नायिका ने नायक को देखा और उसका मन उसके हाथ से निकल गया। वह प्रियतम के प्रति बेबस हो गई—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नैन दलालनि चौहटैं, मन-मानिक पिय हाथ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
रसखाँ ढोल बजाइ कै, बैच्यौ हिय जिय साथ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 71&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*उपरिलिखित दोहे में सांगरूपक की योजना दर्शनीय है। नैन रूपी दलालों ने मन रूपी मानिक को ढोल बजाकर बीच बाज़ार में हृदय और प्राण के सहित प्रियतम के हाथ बेच दिया। इसी से मिलती-जुलती बात [[बिहारीलाल|बिहारी]] ने भी कही है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
लोभ लगे हरि-रूप के, करी साँटि जुरि जाइ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
हौं इन बेची बीच ही, लौइन बड़ी बलाइ॥&amp;lt;ref&amp;gt;बिहारी रत्नाकर, दोहा 195&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शरीर का रूपक बाग़ के रूप में बांधती हुई नायिका के कथन में शुद्ध श्रृंगारपरक सांगरूपक की योजना चित्ताकर्षक है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बागन काहे को जाओ पिया घर बैठे ही बाग़ लगाय दिखाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
एड़ी अनार सी मौरि रही, बहियाँ दोउ चंपे की डार नवाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
छातिन में रस के निबुआ अरु घूंघट खोलि कै दाख चखाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ढांगन के रस के चसकै रति फूलन की रसखानि लुटाऊँ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 122&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस सवैये में बाहों पर चंपा की झुकी हुई डाल का, स्तनों पर सरस नीबू का और ओठों पर अंगूर का आरोप अंग-रूप से करके बाग-रूपी शरीर के मुख्य रूपक को पूर्ण किया है। इस प्रकार यहाँ पर सांगरूपक की नियोजना की गई है। निरंगरूपक के अंकन में भी रसखान ख़ूब सफल रहे हैं। नायक पर मोहित हुई नायिका कहती है—&lt;br /&gt;
खंजन नैन फंदे पिंजरा छबि, नाहि रहै थिर कैसे हूँ माई।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 81&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*यहाँ पर नायिका के खंजन रूपी नेत्रों का नायक के छवि रूपी पिंजड़े में फंस जाने का वर्णन है। 'नैन' उपमेय पर 'खंजन' उपमान का आरोप हुआ है। इसमें 'नैन' उपमेय के अंगों में खंजन उपमान के अंगों का आरोप नहीं हुआ है। यही स्थिति 'पिंजरा' और 'छवि' की भी है। निरंग रूपक का एक उदाहरण और लीजिए। नन्दकुमार को देखने के लिए [[नन्द]] के घर गई हुई [[गोपी]] लौटकर अपनी सखी से अपने अनुभव का वर्णन करती है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जोहन नन्दकुमार कौं गई नन्द के गेह।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मौहिं देखि मुसकाइ कै बरस्यौ मेह सनेह॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 93,रूपक अलंकार के और उदाहरण के लिए देखिए- सुजान रसखान, 1,16,72,74 आदि&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ 'मेह सनेह' में रूपक हे, अर्थात मेह-रूपी स्नेह की वर्षा हो गई। स्नेह की अतिशयता सूचित करने के लिए उसे मेह के रूप में चित्रित किया गया है। उपर्युक्त उद्धरणों के संदर्भ में कहा जा सकता है कि रूपक अलंकार की योजना में रसखान को अतीव सफलता मिली है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उत्प्रेक्षा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां प्रस्तुत में अप्रस्तुत की संभावना की जाय, वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;संसभावनमर्थोत्प्रेक्ष प्रकृतस्य समेन यत्।   -काव्यप्रकाश, 10 । 9&amp;lt;/ref&amp;gt; 'उत्प्रेक्षा' (उत्+प्र+ईक्षा) का शाब्दिक अर्थ है, ऊंचा देखना अर्थात् उड़ान लेना। उपमेय और उपमान को परस्पर भिन्न जानते हुए भी इस अलंकार में कल्पना की ऊंची उड़ान के सहारे उपमेय को उपमान समझने का प्रयत्न किया जाता है। 'संभावना' का तात्पर्य 'एक कोटि का प्रबल' ज्ञान है। इसमें ज्ञान पूरा निश्चायात्मक नहीं होता, बल्कि थोड़ा कम होता है। उत्प्रेक्षा रसखान के सबसे प्रिय अलंकारों में से एक है। इसके अनेक प्रयोग उनके काव्य की श्रीवृद्धि करते हैं। इसका कारण यह हे कि उत्प्रेक्षा का प्रयोग करते हुए कवि-कल्पना को उड़ान भरने की अधिक गुंजाइश रहती है। रसखान ने अपनी कवि-कल्पना का सदुपयोग करते हुए उत्प्रेक्षा अलंकार का विविध प्रसंगों में रमणीय विधान किया है। &lt;br /&gt;
*[[गोपी]] [[गोकुल]] में दहीं बेचने के लिए निकली। रास्ते में [[कृष्ण]] से उसकी भेंट हो गई। आंखें चार हुईं। वह कामाभिभूत हो गई। दान मांगते हुए कृष्ण अपनी अड़ पर डट गए। सात्विक भाव 'कंप' और संचारी भाव भय से युक्त गोपी के उस रूप की कितनी हृदयस्पर्शी उत्प्रेक्षा रसखान ने निम्नलिखित सवैये में की है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पहले दधि लै गइ गोकुल में चख चारि भए नटनागर पै।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
रसखानि करी उनि मैनमई कहें दान दै दान खरै अर पै।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
नख तैं सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भांति कँपै डरपै।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनौ दामिनि सावन के घन मैं निकसैं नहीं भीतर ही तरपै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 39&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*नख से शिख तक नीला वस्त्र लपेटे हुए भय से कांपती हुई गोपी इस प्रकार शोभित हो रही है मानो सावन के बादल के बीच में बिजली घिर गई हो और बाहर न निकल पाने के कारण वह भीतर ही भीतर चमक रही हो। नील वस्त्र से आच्छादित गौर वर्ण युवती के बिजली के समान अंगों की ऐसी ही सुन्दर कल्पना 'कामायनी' में जयशंकर प्रसाद ने भी की है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नील परिधान बीच सुकुमार&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खिला हो ज्यौं बिजली का फूल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेघ-वन-बीच गुलाबी रंग।&amp;lt;ref&amp;gt;कामायनी, पृ0 46&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अपह्नुति'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां प्रकृत का निषेध कर अप्रकृत का स्थापन किया जाय वहां 'अपह्नुति' अलंकार होता है। अपह्नुति केवल सादृश्य-सम्बन्ध में ही होती है। 'अपह्नुति' का शाब्दिक अर्थ है- छिपाना या निषेध करना। इसमें किसी सत्य बात को छिपाकर या निषेध करके उसके स्थान पर कोई झूठी बात स्थापित की जाती है। अपह्नुति की योजना में प्राय: कृत्रिमता आने की आशंका रहती हैं रसखान के काव्य में यह अलंकार बहुत ही विरल रूप में आया है। एकाध स्थलों पर इसकी चित्ताकर्षक व्यंजना हुई है। [[बांसुरी]] बजाते हुए, गौचरण का गीत गाते हुए, ग्वालों के साथ श्रीकृष्ण गोपिका की गली में आ गए। गोपिका उनकी बांसुरी की टेर को सुनकर कहती है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बांसुरी में उनि मेरोई नांव सुग्वालिनि के मिस टेरि सुनायौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
उपर्युक्त पंक्ति में अपह्नुति अलंकार की सुन्दर छटा है। यहाँ पर कृष्ण वंशी से गोपी-नाम-ध्वनि नहीं करते। वे 'सुग्वालिनि' की ध्वनि टेरते हैं। यहाँ गोपी के नाम का निषेध किया गया है और अप्रकृत 'सुग्वालिनि' नाम की स्थापना की गई है। लेकिन गोपी इस सत्य को समझती है कि उन्होंने बांसुरी में 'सुग्वालिनि' के मिस से मेरे नाम को ही सुनाया है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अतिशयोक्ति'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां उपमान द्वारा उपमेय का निगरण, असम्बन्ध में मैं सम्बन्ध की कल्पना, उपमेय का अन्यत्व अथवा कारण और कार्य का पौवपिर्य- विपर्यय वर्णित हो, वहां 'अतिशयोक्ति' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतरू परेण यत्। प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं पद्यर्थोकौ च कल्पनम्॥ कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्यय: विज्ञेया तिशयोक्ति: सा....॥ -काव्यप्रकाश, 10 । 100-101&amp;lt;/ref&amp;gt; अतिशयोक्ति का अर्थ है अतिकान्त अथवा उल्लंघन अर्थात किसी वस्तु के विषय में लोकसीमा से बढ़ा-चढ़ाकर कथन करना। काव्य में अतिशयोक्ति के आधार पर ही कवि कल्पना की मधुर उड़ानें भरते हैं। सामान्य जीवन के व्यवहार में भी अतिशयोक्ति का प्रयोग बहुलता से किया जाता है। अत: उसे मानव की स्वभाव-जन्य विशेषता कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतिशयोक्ति कवियों की परंपरा से प्राप्त अलंकार है। रसखान ने भी काव्य परंपरागत रूप में ही उसको ग्रहण किया है, जिससे उसमें नवीनता और कथन में सुंदर चमत्कार आ गया है। उनकी अतिशयोक्ति-योजना केवल वैचित्र्य-प्रदर्शन बनकर ही नहीं रह गई है, बल्कि अभिप्रेत वर्ण्य विषय में उत्कर्ष लाने को पूर्णत: समर्थ है। कवि सौन्दर्य-निकेतन [[राधा]] की अनिंद्य रूप-छटा का चित्रण करता हुआ अतिशयोक्ति करता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बासर तूँ जु कहूँ निकरै रबि को रथ माँझ अकास अरैरी।&lt;br /&gt;
रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन तें न टरे री।&lt;br /&gt;
द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौंस की आसन पाय धरै री।&lt;br /&gt;
तेरो न जात कछू दिन राति बिचारे बटोही की बाट परै री॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 48&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*नायिका गोरे रंग की है। उसके सौन्दर्य में अप्रतिम आभा ही दर्शनीय है। सखी उसे बरजती हुई कहती है कि तू दिन में घर से बाहर न निकल अन्यथा तेरे रूप को देखने के लिए [[सूर्य देवता|सूर्य]] का रथ आकाश में ही रुक जाएगा। यही स्थिति रात में भी होगी- [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] आंगन में आकर तुझे टकटकी बांधकर देखता रहेगा, वहां से 'टरेगा' नहीं (शायद यह सोचकर कि मेरा प्रतिद्वन्द्वी कहां से आ गया)। (तू पद्मगंधा है अत:) दिन में [[वायु देव|वायु]] तेरी सुगन्ध लेने आती है। रात में भी वह दिन की सी आशा से पीछे लगा है। (तुम्हारे बाहर निकलने से) तुम्हारा तो कुछ नहीं जाएगा, हां पथिक बेचारे का रास्ता रुक जाएगा। (क्योंकि समय सूचक ये [[ग्रह]] रुक जाएंगे, अपना कार्य करना बन्द कर देंगे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार हम देखते हैं कि इस सवैये में कवि ने राधा की सौन्दर्य गरिमा का लोकसीमा से बढ़ा चढ़ाकर कथन किया है। अत: यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है। रसखान ने अतिशयोक्ति का परंपरागत रूपों में प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यतिरेक'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण उपमेय का उत्कर्ष हो वहां 'व्यतिरेक' अलंकार होता है। व्यतिरेक का शाब्दिक अर्थ है आधिक्य। व्यतिरेक में कारण का होना अनिवार्य है। रसखान के काव्य में व्यतिरेक की योजना कहीं कहीं ही हुई है। किन्तु जो है, वह आकर्षक है। नायिका अपनी सखी से कह रही है कि ऐसी कोई स्त्री नहीं है जो [[कृष्ण]] के सुन्दर रूप को देखकर अपने को संभाल सके। हे सखी, मैंने 'ब्रजचन्द्र' के सलौने रूप को देखते ही लोकलाज को 'तज' दिया है क्योंकि—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;खंजन मील सरोजनि की छबि गंजन नैन लला दिन होनो। &lt;br /&gt;
भौंह कमान सो जोहन को सर बेधन प्राननि नंद को छोनो।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 72&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ नन्दलाल के दिन दिन होनहार नयन खंजन, मीन और सरोज (कमल) से भी अधिक छवि वाले बतलाए गए हैं। किन्तु उनमें एक विशिष्टता और भी हे। वह यह कि कृष्ण 'भौंह कमान' से कटाक्ष का बाण छोड़कर प्राणों को बेधते हैं। यहाँ उपमेय में उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण व्यतिरेक अलंकार है। एक अन्य उदाहरण लीजिए- नायिका में यौवनागम हो गया है। उसकी भौंहो में बांकापन तथा चितवन में तिरछापन आ गया है। साथ ही 'टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिया की।'&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ 'सुदामिनि तें दुति दूनी हिया की' में व्यतिरेक अलंकार है। क्योंकि, उपनेय नायिका के उभरे हुए वक्षस्थल की दुति बिजली से भी दूनी है- ऐसा कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पर्याय'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां एक वस्तु की अनेक वस्तुओं में अथवा अनेक वस्तुओं की एक वस्तु में क्रम से (काल-भेद से) स्थिति का वर्णन हो वहां पर्याय अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;एकमनेकस्मिन्ननेकमेकस्मिन्कमेण पर्याय:। -अलंकारसर्वस्व, पृ0 189&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*निम्नांकित पंक्तियों में कृष्ण की अनेक चेष्टाओं का वर्णन है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;काहू को माखन चाखि गयौ अरु काहू को दूध दही ढरकायौ।&lt;br /&gt;
काहूँ को चीर ले रूख चढ़यौ अरु काहू को गुंजछरा छहरायौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 104&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'जसोमति' के 'छोहरा' (कृष्ण) किसी का मक्खन खा गए तो किसी का दही ढरका दिया, किसी का 'चीर' लेकर वृक्ष पर चढ़ गए तो किसी की गुंजाफल की माला को बिखेर दिया। यहाँ कृष्ण के द्वारा की जाने वाली अनेक क्रियाओं का वर्णन है। अत यहाँ पर्याय अलंकार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विरोधमूलक अलंकार, विरोधाभास'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वस्तुत: विरोध न होने पर जहां विरोध का आभास हो वहां 'विरोधाभास' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;विरुद्धाभासत्वं विरोध:।  -काव्यालंकारसूत्र, 4।3।12&amp;lt;/ref&amp;gt; विरोध के कारण सामान्य उक्ति में भी अनोखा चमत्कार आ जाता है। इस अलंकार में विरोध केवल आभासित होता है। लेकिन विचार करने पर उसका परिहार हो जाता है। ऐसी उक्तियों के कारण काव्य-सौन्दर्य में उत्कर्ष आता है। रसखान के काव्य में विरोधाभास अलंकार की योजना नाममात्र को हुई है। इसका कारण यह है कि वे भक्त थे, काव्य उनकी तीव्र भावाभिव्यक्ति का साधन था। वह बात को बेलाग कहते थे- बहुत अधिक घुमा फिरा कर नहीं। वचन-विदग्धता के प्रदर्शन की चेष्टा उन्होंने कहीं नहीं की है। प्रेम-पन्थ बड़ा विचित्र है- कमल नाल से भी क्षीण और [[खड्ग]] की धार से भी तीक्ष्ण। अनिवार प्रेम के मार्ग के विषय में कवि का 'विरोधाभास' चमत्कार देखिए—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कमलतंतु से हीन अरु, कठिन खड़ग की धार। &lt;br /&gt;
अतिसूधौ टेढ़ौ बहुरि, प्रेम पंथ अनिवार॥&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेमवाटिका, दोहा 6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; जो सीधा है वह टेढ़ा कैसे हो सकता है? यहीं तो विरोधाभास है। प्रत्यक्षत: दोनों (सूधौ, टेढ़ौ) में विरोध दृष्टिगत होता है, परन्तु तत्त्वत विरोध है नहीं। प्रेम हो जाता है, उसमें छल-छंद रंचमात्र भी नहीं हे। वह निश्छल हृदय का प्रवाह है- इस दृष्टि से 'सूधौ' (सीधा) है। लेकिन प्रेम मार्ग पर चलना टेढ़ी खीर है, दुनिया का व्यंग्य और उपहास साथ रहता है, कठिनाइयाँ जीवन को अस्थिर कर देती हैं। इस दृष्टि से 'टेढ़ौ' (टेढ़ा) है। एक अन्य उदाहरण भी अवलोकनीय है। [[गोपी]] [[कृष्ण]] के अप्रतिम सौन्दर्य पर मुग्ध है। उनके नेत्र कटाक्ष को देखते ही उसकी लाज की गांठ खुल जाती है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है। &lt;br /&gt;
रसखानि लखें मन बूड़ि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 157&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विसंगति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां आपातत: विरोध दृष्टिगत होते हुए, कार्य और कारण का वैयाधिकरण्य वर्णित हो, वहां असंगति अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;विरुद्धत्वेनापाततो भासमानं हेतुकार्यपोर्वेयधिकरण्यमसंगति:॥ -रसगंगाधर, पृ0 589&amp;lt;/ref&amp;gt; इसमें दो वस्तुओं का वर्णन होता है- जिनमें कारण कार्यसम्बन्ध होता है। इन वस्तुओं की एकदेशीय स्थिति आवश्यक है, लेकिन वर्णन भिन्नदेशत्व का किया जाता है। रसखान के साहित्य में असंगति की योजना अत्यन्त सीमित रूप में हुई है। एक प्रभाव-व्यंजक उदाहरण अवलोकनीय है। [[गोकुल]] के ग्वाल (कृष्ण) की मनोहर चेष्टाओं पर मुग्ध हुई [[गोपी]] कहती है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह, &lt;br /&gt;
लोचन नचाइ मेरे अंगहि नचाइ गौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 194&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; यहाँ क्रिया कृष्ण के नेत्रों में होती है परन्तु प्रभाव गोपी के अंग पर होता है। उसका अंग अंग उसके लोल लोचनों के कटाक्ष में नाच उठता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एकावली'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां श्रृंखलारूप में वर्णित पदार्थों में विशेष्य विशेषण भाव सम्बन्ध हो वहां एकावली अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;सैव श्रृंखला संसर्गस्य विशेष्यविशेषणभावरूपत्वे एकावली। -रसगंगाधर, पृ0 623&amp;lt;/ref&amp;gt; इस अलंकार की योजना कवि लोग केवल चमत्कार उत्पन्न करने के लिए करते हैं। इसमें कल्पना की उड़ान का विनोदात्मक रूप होता है। निम्नांकित पंक्ति में कवि ने एकावली अलंकार का नियोजन किया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;वा रस में रसखान पगी रति रैन जगी अंखियां अनुमानै। &lt;br /&gt;
चंद पै बिम्ब औ [[बिंब]] पै कैरव कैरव पै मुकतान प्रमानै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 119&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; यहाँ पर नायिका के मुख, अधर और नेत्रों के अंगों का एक के बाद एक करके श्रृंखला रूप में वर्णन हुआ है। रात भर जागरण के कारण नायिका की आँख लाल हो गई हैं। उसके मुख पर चन्द्र पर बिंब (कुन्दरू- लाल आंखों की ललाई) है, बिंब पर कैरव (आंखों में सफ़ेद कौए) हैं और 'कैरव' पर मुक्ताएं (रात भर जागने से जंभाई लेने पर स्वत: निकल पड़ने वाली आंसू की बूँदें) हैं। रसखान ने 'एकावली' का प्रयोग एकाध स्थलों पर ही किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अन्य संसर्ग मूलक अलंकार, उदाहरण''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्य रूप से ही हुई बात को स्पष्ट करने के लिए जहां उसी सामान्य में एक अंश को उदाहरण के रूप में रखा जाता है, वहां उदाहरण अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अलंकार प्रदीप, पृ0 189&amp;lt;/ref&amp;gt; उदाहरण अलंकार की योजना रसखान ने अल्प मात्रा में की है। उनके उदाहरण सामान्य जीवन से ग्रहण किए गए हैं और सुन्दर बन पड़े हैं 'उदाहरण' के कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं— रसखानि गुबिंदहि यौं भजियै जिमि नागरि को चित गागरि मैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 8&amp;lt;/ref&amp;gt; कवि कहता है कि गोविन्द का भजन एकाग्र चित्त से करना चाहिए। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह एक उदाहरण देता है कि मन को भगवान में उसी प्रकार केन्द्रित रखना चाहिए जिस प्रकार सिर पर कई घड़े रखकर चलने वाली नागरी संतुलन बनाये रखने के लिए अपने मन को घड़े पर केन्द्रित रखती है। यहाँ कवि ने सामान्य जीवन से रमणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम हरी कौ रूप है, त्यों हरि प्रेम सरूप। &lt;br /&gt;
एक होय द्वै यौं लसैं, ज्यों सूरज औ' धूप।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेमवाटिका, 124&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; इस दोहे में कवि को इष्ट है 'प्रेम' और 'हरि' (ईश्वर) की एकरूपता प्रतिपादित करना। एक होते हुए ये दोनों कैसे शोभित होते हैं- इसको स्पष्ट करने के लिए उसने सूरज और धूप का उदाहरण प्रस्तुत किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अन्य अलंकार, अनुमान'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साधन के द्वारा साध्य के चमत्कारपूर्ण ज्ञान के वर्णन को अनुमान अलंकार कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुमानं तु विच्छित्या ज्ञानं साध्यस्य साधनात। --साहित्यदर्पण, पृ0 10। 63&amp;lt;/ref&amp;gt; अनुमान अलंकार में हेतु के द्वारा साध्य का अनुमान कराया जाता है और यह ज्ञान कवि के द्वारा कल्पित चमत्कार से पूर्ण होता है। रसखान के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत कम हुआ है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मोहनलाल कौ हाल बिलौकियै नैकु कछू किनि छवै कर सौं कर। &lt;br /&gt;
ना करिबे पर बारें हैं प्रान कहा करि हैं अब हाँ करिबे पर।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 115&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; नायिका मान कर रही है और नायक उसे प्रसन्न करने की चेष्टा कर रहा है। सखी नायिका को समझाती है कि मान करने की अवधि तो घड़ी भर की होती है और तुम इतनी देर से तीक्ष्ण नेत्रों से देख देखकर नायक के हृदय को बेध रही हो। मोहन लाला तुमसे प्रेम करने के लिए बेहाल हो रहे हैं। जरा अनुमान तो करो कि तुम्हारे 'ना' करने पर जब उनकी यह हालत है तो 'हां' करने पर क्या स्थिति होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''लोकोक्ति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां वर्णित प्रसंग में लोक-प्रसिद्ध प्रवाद ([[कहावत लोकोक्ति मुहावरे]] आदि) का कथन किया जाय, वहां 'लोकोक्ति' अलंकार होता है। रसखान के काव्य में लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दर रूप में हुआ है। कवि ने उन्हें भावों के भूषण में चमकते हुए नगीनों की तरह स्थान स्थान पर जड़ दिया है। इसके अनेक सरस उदाहरण द्रष्टव्य हैं। नायक और नायिका दोनों कालिन्दी के तीर पर मिलते हैं, मुड़-मुड़कर मुस्कराते हैं, एक दूसरे की बलैयां लेते हैं। इसे लक्ष्य करके कोई सखी कहती हे कि दोनों ने आजकल लोक-लाज को त्याग दिया है, केवल स्नेह को 'सरसा' रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि आगे क्या होगा-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;यह रसखानि दिना द्वै में बात फैलि जैहै,&lt;br /&gt;
कहाँ लौं सयानी चंदा हाथन छिपाइबौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 100&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; दो दिन में बात फैल जाती है। [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] को हाथ से नहीं छिपाया जा सकता। यह लोक-प्रसिद्धि है। लोकोक्ति अलंकार की सहायता से लक्षणा द्वारा सखी यह कहना चाहती है कि [[गोपी]] और [[कृष्ण]] की इस प्रेम-लीला को गुप्त रखना असम्भव है। [[ब्रज]] में इसकी चर्चा फैलते देर नहीं लगेगी। इसी तरह निम्नांकित उद्धरण में भी कवि ने 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी' लोकोक्ति का बड़ा ही रमणीय प्रयोग किया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;करियै उपाय बाँस डारियै कटाय, &lt;br /&gt;
नहिं उपजैगौ बाँस नाहिं बाजै फेरि बांसुरी।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 54&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर गोपियां तन्मय होकर व्याकुल हो जाती हैं। उन्हें न तो पानी का घड़ा भरने की सुधि रहती है और न पग धरने की। वे घर का ध्यान की भूलकर लम्बी-लम्बी उसांसें भरने लगती हैं। कोइर बेहाल होकर भूमि पर गिर जाती है तो कोई-कोई आंसुओं से पूरित आंखों वाली हो जाती है। कवि कहता है कि ब्रज-बनिताओं के मन का वध करने वाली बंशी कुलीनता का ध्वंस करने वाली है। इसका तो एक ही उपाय है कि बांस की कटा दिए जाएँ, इससे यह होगा कि न तो बांस उपजेंगे और न ही फिर बंशी बजेगी। कवि ने अलंकार का कितना प्रभावशाली प्रयोग किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मानवीकरण''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रभाव से हिन्दी में कुछ आधुनिक अलंकारों की चर्चा भी होने लगी है। उन्हीं में से एक अलंकार 'मानवीकरण' है। यह शब्द अंग्रेज़ी के 'परसोनिफिकेशन' का हिन्दी अनुवाद है। 'अमानव' में 'मानव' गुणों के आरोप करने की साधारण प्रवृत्ति या प्रक्रिया को 'मानवीकरण' कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;साहित्य कोष (सं0- डा. धीरेन्द्र वर्मा) पृ0 589&amp;lt;/ref&amp;gt; मानवीकरण के द्वारा वर्णनीय विषय में मार्तिकता और प्रेषणीयता लाई जाती है। हिन्दी की छायावादी कविता में मानवीकरण का बड़ा ही मनोहर एवं सशक्त प्रयोग हुआ है। प्राचीन कवियों के काव्य में भी मानवीकरण की विशेषताएं उपलब्ध हैं। सहज भावुक कवि रसखान ने भी 'मानवीकरण' अलंकार की सुन्दर योजना की है। कुछ उदाहरण देखने योग्य हैं- &lt;br /&gt;
*प्रेमी की मुस्कान पर मुग्ध नायिका कहती है— बैरिनि वाहि भई मुसकानि जु वा रसखानि के प्रान बसी है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 38&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ 'मुसकानि' चेतन प्राणी नहीं है। (न मानव ही है) फिर भी उसे 'बैरिनि' कहा गया है। बैरिणी वही हो सकती है जो चेतन हो। 'मुसकानि' का यहाँ मानवीकरण करके उक्ति में चमत्कार लाया गया है। अतएव यह 'मानवीकरण' अलंकार का उदाहरण है। &lt;br /&gt;
*वहि बाँसुरि की धुनि कान परें कुलकानि हियौ तजि भाजति है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 67&amp;lt;/ref&amp;gt; 'कुलकानि' प्राणी नहीं है जो भागे। कुलकानि की चिन्ता मानव को ही हो सकती है। जानवरों में इस प्रकार की भावना नहीं होती। अत: यहाँ 'कुलकानि' में मानव की विशेषता को चित्रित करके उसका मानवीकरण किया गया है। *मोहन में नायिका का मन अटका हुआ है तथा मन को चैन नहीं पड़ता और स्थिति यह है कि— व्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूषन भावै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 136&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ भागति भूख में मानवीकरण अलंकार है, क्योंकि अमूर्त और अचेतन 'भूख' का मानवीकरण किया गया है तथा उसमें भागने की विशेषता दिखाई गई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रसखान की कविता में विभिन्न प्रकार के शब्दगत और अर्थगत अलंकारों का प्रयोग हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि ने कहीं चमत्कार लाने के लिए अलंकारों को बरबस ठूंसने की चेष्टा नहीं की है। भाव और रस के प्रवाह पर भी उसकी दृष्टि केन्द्रित रही है। भावों और रसों की अभिव्यक्ति को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही अलंकारों की योजना की गई है। उचित स्थान पर अलंकारों का ग्रहण किया गया है। उन्हें दूर तक खींचने का व्यर्थ प्रयास नहीं किया गया है। औचित्य के अनुसार ठीक स्थान पर उनका त्याग कर दिया गया है। रसखान द्वारा प्रयुक्त अलंकार अपने 'अलंकार' नाम को सार्थक करते हैं। शब्दालंकारों में अनुप्रास और अर्थालंकारों में उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक की निबंधना में कवि ने विशेष रूचि दिखाई है। बड़ी कुशलता के साथ उनका सन्निवेश किया है, उन्हें इस विधान में पूर्ण सफलता मिली है। अलंकारों की सुन्दर योजना से उनकी कविता का कला-पक्ष निस्सन्देह निखर आया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रसखान2}}{{रसखान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:साहित्य कोश]][[Category:रसखान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>रसखान की अलंकार योजना</title>
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		<updated>2011-06-04T14:14:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} *अलंकार शब्द का अर्थ है जो दूसरी वस्तु को...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*अलंकार शब्द का अर्थ है जो दूसरी वस्तु को अलंकृत करे- '''अलंकरोति इति अलंकार:'''। &lt;br /&gt;
*आचार्य दण्डी ने कहा है कि काव्य के सभी शोभाकारक धर्म अलंकार हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रवक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान् कात्स्यैन वक्ष्यति॥ -काव्यादर्श, 2।1&amp;lt;/ref&amp;gt; उनकी इस परिभाषा में चमत्कार उत्पन्न करने वाले सभी काव्य तत्त्वों की विशेषताओं को अलंकार मान लिया गया है। &lt;br /&gt;
*अलंकार से भामह का अभिप्राय ऐसी शब्द उक्ति से है जो वक्र अर्थात विचित्र अर्थ का विधान करने वाली हो।&amp;lt;ref&amp;gt;वक्राभिधेय शब्दोक्तिरिष्टावाचामलंकृति:। -काव्यालंकार, 1। 36&amp;lt;/ref&amp;gt; अलंकार शब्द और अर्थ में विद्यमान कवि प्रतिभोत्थित ऐसे वैचित्र्य को अलंकार कह सकते हैं, जो वाक्य-सौंदर्य को अतिशयता प्रदान करता है। इसी से सभी भारतीय काव्यशास्त्रियों ने काव्य में अलंकार के महत्त्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;
*अलंकारों के विधिवत प्रयोग से ही काव्य अलंकृत होता है। नीरस काव्य में अलंकार-योजना उक्ति वैचित्र्य मात्र हैं। अलंकार-प्रयोग में औचित्य का पूर्ण निर्वाह होना चाहिए। रसखान ने इसका ध्यान रखा है। कविवर रसखान की गणना भक्त कवियों में की जाती है। भक्ति काव्यधारा के कवियों ने अलंकारों का सन्निवेश बहुतायत से किया है। परन्तु उन्होंने अलंकारों की अपेक्षा अलंकार्य-भाव-रस को ही अधिक गौरव दिया है। रसखान की प्रवृत्ति भी ऐसी ही है। उन्होंने भाव पर अधिक बल दिया है। बाहरी तड़क-भड़क और अलंकारों के बरबस विधान का प्रयास नहीं किया। उनकी रचना में आये हुए अलंकार स्वाभाविक और अभिव्यक्ति को प्रांजल बनाने में सहायक हैं। अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, प्रतीप आदि अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
'''शब्दालंकार'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अनुप्रास'''&lt;br /&gt;
केवल भारतीय कवियों ने ही नहीं बल्कि पाश्चात्य कवियों ने भी अनुप्रास अलंकार का बहुत अधिक रुचि के साथ प्रयोग किया है। अनुप्रास की परिभाषा एवं स्वरूप के विषय में भी आचार्य मूलत: एकमत हैं। स्थूल रूप से, वर्णसाम्य को 'अनुप्रास' कहा गया है। आचार्य भामह के अनुसार स्वरों की विषमता होने पर भी व्यंजनों की ऐसी आवृत्ति जिसमें बहुत व्यवधान न हो और जो रस एवं भाव के अनुकूल हो, उसे 'अनुप्रास' कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;स्वरवैसादृश्ये पि व्यंजनसदृशत्वं वर्णसाम्यम्। रसाद्यनुगत: प्रकृष्टो न्यासोनुप्रास: -काव्यप्रकाश, 9।2 परवृति&amp;lt;/ref&amp;gt; अनुप्रास के प्रधानत: दो भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''छेकानुप्रास''' &lt;br /&gt;
जहां एक या अनेक वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति केवल एक बार हो अर्थात एक या अनेक वर्णों का प्रयोग केवल दो बार हो, वहां छेकानुप्रास होता है। छेकानुप्रास का एक उदाहरण द्रष्टव्य है—&lt;br /&gt;
*देखौ दुरौ वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटत राधिका पायन।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 17&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मैन मनोहर बैन बजै सुसजै तन सोहत पीत पटा है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 172&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
उपर्युक्त पहली पंक्ति में 'द' और 'क' का तथा दूसरी पंक्ति में 'म' और 'ब' का प्रयोग दो बार हुआ है। इन वर्णों की आवृत्ति एक बार होने से यहाँ छेकानुप्रास है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वृत्यानुप्रास''' &lt;br /&gt;
जहां वृत्तियों (उपनागरिका, परुषा और कोमला) के अनुसार एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति क्रमपूर्वक अनेक बार हो। रसखान के काव्य में अनुप्रास की बड़ी चित्ताकर्षक योजना हुई है। अनुप्रास की नियोजना से कविता सुनने में भली लगती है। उससे कविता का प्रभाव परिवर्धित हो जाता है। रसखान के कवित्त और सवैयों की वर्णयोजना भावक के मन को तरंगित करती रहती है। भावानुकूल अनुप्रास का प्रयोग सफल कवि ही कर सकते हैं। रसखान ने अपने को इस कला में पारंगत सिद्ध किया है। रसखान की कविता में वृत्यानुप्रासयुक्त अनेकानेक सुंदर सवैये और कवित्त हैं। ऐसा लगता है कि कवि शब्दों को नचाता हुआ चल रहा है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
सेष गनेस महेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सु बेद बतावैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 13&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छकि छैल छबीली छटा छहराइ के कौतुक कोटि दिखाइ रही।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 154&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''यमक'''&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
जहां भिन्नार्थक वर्णों (निरर्थक या सार्थक) की क्रमश: पुनरावृत्ति हो, वहां 'यमक' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 1,2,5,6,7,8,9,10,11,12, 14,37,78&amp;lt;/ref&amp;gt; 'यमक' का शाब्दिक अर्थ है जोड़ा। इस अलंकार का नाम 'यमक' इसलिए रखा गया है क्योंकि इसमें एक जैसे दो शब्द प्रयुक्त होते हैं। सार्थक वर्ण समूह की अपेक्षा निरर्थक वर्णसमूह की आवृत्ति यमक के चमत्कार में विशेष वृद्धि करती है। यमक में कहीं दोनों वर्ण समूह सार्थक होते हैं, कहीं दोनों निरर्थक एवं कहीं एक सार्थक होता है और एक निरर्थक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''श्लेष'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*जहां श्लिष्ट पदों द्वारा अनेक अर्थों का कथन किया जाय वहां श्लेष अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्लिष्टै, पदेरनेकार्थाभिधाने श्लेष ईष्यते॥ - साहित्यदर्पण, 10 । 11&amp;lt;/ref&amp;gt; श्लेष प्राय: अन्य अलंकारों का सहयोगी होकर ही काव्य में योजित होता है। भावुक कवियों के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत सीमित रूप में हुआ है। इसका कारण यह है कि श्लेष में ऐसे शब्दों का विधान होता है जो अनेक अर्थों को प्रकट करते हैं। अनेकार्थक शब्दों की योजना में प्रयास करना पड़ता है। श्लेष के द्वारा काव्य का बाह्य आवरण ही अधिक अलंकृत होता है। &lt;br /&gt;
*रसखान के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत ही कम हुआ है। रसखान निश्छल भावनाओं को व्यक्त करने वाले कवि हैं। और श्लेष भावोत्कर्ष में बहुत अधिक सहयोगी नहीं होता। फिर भी कहीं-कहीं उसकी योजना सुंदर रूप में हुई है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मन लीनो प्यारे पै छटांक नहिं देत।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहै कहा पाटी पढ़ी दल को पीछो लेत॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 150&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस दोहे में 'मन' और 'छटांक' शब्द में स्पष्ट रूप से श्लेष है। 'मन' का अर्थ है चित्त और दूसरा अर्थ है 'चालीस सेर'। इसी तरह 'छटांक' का एक अर्थ है झलक या कटांछ (कटाक्ष) और दूसरा अर्थ है सेर का सोलहवां भाग।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वक्रोक्ति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी एक अभिप्राय वाले कहे हुए वाक्य का, किसी अन्य द्वारा श्लेष अथवा काकु से, अन्य अर्थ लिए जाने को 'वक्रोक्ति' अलंकार कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;यदुक्तामन्यथावाक्यमन्यथा न्येन योज्यते। श्लेषेण काक्वा वा ज्ञैया सा वक्रोक्तिरतथा द्विधा॥ - काव्यप्रकाश 9।78&amp;lt;/ref&amp;gt; वक्रोक्ति अलंकार दो प्रकार का होता है- श्लेष वक्रोक्ति और काकु बक्रोक्ति। श्लेष वक्रोक्ति में किसी शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण वक्ता के अभिप्रेत अर्थ से अन्य अर्थ ग्रहण किया जाता है और काकु वक्रोक्ति में कंठ ध्वनि अर्थात् बोलने वाले के लहजे में भेद होने के कारण दूसरा अर्थ कल्पित किया जाता है। वक्रोक्ति अलंकार का नियोजन एक कष्टसाध्य कर्म है, जिसके लिए प्रयास करना अनिवार्य है। भावुक कवियों ने इसका प्रयोग कम ही किया है। रसखान की रचनाओं में वक्रोक्ति की योजना नाममात्र को है, परंतु जो है, वह सहृदय के चित्त को प्रसन्न करने वाली है। दानलीला के प्रसंग में कवि की कला का चमत्कार द्रष्टव्य है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
छीर जौ चाहत चीर गहैं अजू लेउ न केतिक छीर अचैहौ। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैड़ौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
जानति हौं जिय की रसखानि सु काहेकौं एतिक बात बढ़ैहौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
गौरस के मिस जो रस चाहत सौ रस कान्हजू नेकु न पैहौ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 42&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'कान्हजू' ने गोपी के प्रति जो चेष्टा की उसका उत्तर वह बड़े वक्रतापूर्ण ढंग से देती है। यदि 'चीर' गहने से 'छीर' चाहते हो, तो लो कितना पीओगे, चखने के बहाने मक्खन मांगते हो तो लो खाओं, कितना खाओगे। परंतु [[गोपी]] [[कृष्ण]] की इन चेष्टाओं का दूसरा अर्थ लेती हुई कहती है कि मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूं, तुम गौरस (दूध, दही, घी) के बहाने 'गौरस' (इन्द्रियों का रस) चाहते हो, तो लो सुन लो कि वह रस तुम जरा-सा भी नहीं पाओगे। सवैया की अंतिम पंक्ति में वक्रोक्ति की सरस एवं नाट्यमय व्यंजना हुई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रूपक'''&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-3.jpg|[[रसखान]] की समाधि, [[महावन]], [[मथुरा]]|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
उपमेय पर उपमान के निषेध-रहित अभेद आरोप को रूपक कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अभेदप्राधान्ये आरोपे आरोपविषयानपह्नवे रूपकम्।  -अलंकारसर्वस्व, पृ0 34&amp;lt;/ref&amp;gt; 'आरोप' का अर्थ है- रूप देना अर्थात् दूसरे के रूप में रंग देना। यह 'आरोप' कल्पित होता है। रूपक में उपमेय को उपमान समझ लिया जाता है। उपमा में उपमेय और उपमान में सादृश्य होते हुए भी भिन्नता होती है जबकि रूपक में दोनों एक से जान पड़ते हैं। उनमें एकरूपता होती है। रूपक के तीन मुख्य भेद हैं- &lt;br /&gt;
#सांगरूपक- जहां उपमेय में उपमान का अंगों के सहित आरोप हो वहां सांगरूपक होता है। &lt;br /&gt;
#निरंगरूपक- अंगों से रहित उपमान का जहां उपमेय में आरोप होता है वहां निरंगरूपक होता है। &lt;br /&gt;
#परंपरितरूपक- जहां एक आरोप दूसरे आरोप का कारण हो वहां परंपरितरूपक होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपक अलंकार की निबंधना में भारतीय महाकवियों की विशेष प्रवृत्ति रही है। यह रसखान का भी प्रिय अलंकार है। उनके काव्य में स्थल-स्थल पर रूपकों की सुन्दर नियोजना की गई है। वे स्वाभाविक रूप से आए हैं तथा उनके द्वारा भावों की मार्मिक व्यंजना हुई है। रूपक चित्तविधायक अलंकार है। रसखान ने इसका सफल प्रयोग किया है। प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है। नायिका ने नायक को देखा और उसका मन उसके हाथ से निकल गया। वह प्रियतम के प्रति बेबस हो गई—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नैन दलालनि चौहटैं, मन-मानिक पिय हाथ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
रसखाँ ढोल बजाइ कै, बैच्यौ हिय जिय साथ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 71&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*उपरिलिखित दोहे में सांगरूपक की योजना दर्शनीय है। नैन रूपी दलालों ने मन रूपी मानिक को ढोल बजाकर बीच बाज़ार में हृदय और प्राण के सहित प्रियतम के हाथ बेच दिया। इसी से मिलती-जुलती बात [[बिहारीलाल|बिहारी]] ने भी कही है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
लोभ लगे हरि-रूप के, करी साँटि जुरि जाइ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
हौं इन बेची बीच ही, लौइन बड़ी बलाइ॥&amp;lt;ref&amp;gt;बिहारी रत्नाकर, दोहा 195&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*शरीर का रूपक बाग़ के रूप में बांधती हुई नायिका के कथन में शुद्ध श्रृंगारपरक सांगरूपक की योजना चित्ताकर्षक है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बागन काहे को जाओ पिया घर बैठे ही बाग़ लगाय दिखाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
एड़ी अनार सी मौरि रही, बहियाँ दोउ चंपे की डार नवाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
छातिन में रस के निबुआ अरु घूंघट खोलि कै दाख चखाऊँ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ढांगन के रस के चसकै रति फूलन की रसखानि लुटाऊँ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 122&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस सवैये में बाहों पर चंपा की झुकी हुई डाल का, स्तनों पर सरस नीबू का और ओठों पर अंगूर का आरोप अंग-रूप से करके बाग-रूपी शरीर के मुख्य रूपक को पूर्ण किया है। इस प्रकार यहाँ पर सांगरूपक की नियोजना की गई है। निरंगरूपक के अंकन में भी रसखान ख़ूब सफल रहे हैं। नायक पर मोहित हुई नायिका कहती है—&lt;br /&gt;
खंजन नैन फंदे पिंजरा छबि, नाहि रहै थिर कैसे हूँ माई।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 81&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*यहाँ पर नायिका के खंजन रूपी नेत्रों का नायक के छवि रूपी पिंजड़े में फंस जाने का वर्णन है। 'नैन' उपमेय पर 'खंजन' उपमान का आरोप हुआ है। इसमें 'नैन' उपमेय के अंगों में खंजन उपमान के अंगों का आरोप नहीं हुआ है। यही स्थिति 'पिंजरा' और 'छवि' की भी है। निरंग रूपक का एक उदाहरण और लीजिए। नन्दकुमार को देखने के लिए [[नन्द]] के घर गई हुई [[गोपी]] लौटकर अपनी सखी से अपने अनुभव का वर्णन करती है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जोहन नन्दकुमार कौं गई नन्द के गेह।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मौहिं देखि मुसकाइ कै बरस्यौ मेह सनेह॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 93,रूपक अलंकार के और उदाहरण के लिए देखिए- सुजान रसखान, 1,16,72,74 आदि&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ 'मेह सनेह' में रूपक हे, अर्थात मेह-रूपी स्नेह की वर्षा हो गई। स्नेह की अतिशयता सूचित करने के लिए उसे मेह के रूप में चित्रित किया गया है। उपर्युक्त उद्धरणों के संदर्भ में कहा जा सकता है कि रूपक अलंकार की योजना में रसखान को अतीव सफलता मिली है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उत्प्रेक्षा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां प्रस्तुत में अप्रस्तुत की संभावना की जाय, वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;संसभावनमर्थोत्प्रेक्ष प्रकृतस्य समेन यत्।   -काव्यप्रकाश, 10 । 9&amp;lt;/ref&amp;gt; 'उत्प्रेक्षा' (उत्+प्र+ईक्षा) का शाब्दिक अर्थ है, ऊंचा देखना अर्थात् उड़ान लेना। उपमेय और उपमान को परस्पर भिन्न जानते हुए भी इस अलंकार में कल्पना की ऊंची उड़ान के सहारे उपमेय को उपमान समझने का प्रयत्न किया जाता है। 'संभावना' का तात्पर्य 'एक कोटि का प्रबल' ज्ञान है। इसमें ज्ञान पूरा निश्चायात्मक नहीं होता, बल्कि थोड़ा कम होता है। उत्प्रेक्षा रसखान के सबसे प्रिय अलंकारों में से एक है। इसके अनेक प्रयोग उनके काव्य की श्रीवृद्धि करते हैं। इसका कारण यह हे कि उत्प्रेक्षा का प्रयोग करते हुए कवि-कल्पना को उड़ान भरने की अधिक गुंजाइश रहती है। रसखान ने अपनी कवि-कल्पना का सदुपयोग करते हुए उत्प्रेक्षा अलंकार का विविध प्रसंगों में रमणीय विधान किया है। &lt;br /&gt;
*[[गोपी]] [[गोकुल]] में दहीं बेचने के लिए निकली। रास्ते में [[कृष्ण]] से उसकी भेंट हो गई। आंखें चार हुईं। वह कामाभिभूत हो गई। दान मांगते हुए कृष्ण अपनी अड़ पर डट गए। सात्विक भाव 'कंप' और संचारी भाव भय से युक्त गोपी के उस रूप की कितनी हृदयस्पर्शी उत्प्रेक्षा रसखान ने निम्नलिखित सवैये में की है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पहले दधि लै गइ गोकुल में चख चारि भए नटनागर पै।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
रसखानि करी उनि मैनमई कहें दान दै दान खरै अर पै।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
नख तैं सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भांति कँपै डरपै।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनौ दामिनि सावन के घन मैं निकसैं नहीं भीतर ही तरपै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 39&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*नख से शिख तक नीला वस्त्र लपेटे हुए भय से कांपती हुई गोपी इस प्रकार शोभित हो रही है मानो सावन के बादल के बीच में बिजली घिर गई हो और बाहर न निकल पाने के कारण वह भीतर ही भीतर चमक रही हो। नील वस्त्र से आच्छादित गौर वर्ण युवती के बिजली के समान अंगों की ऐसी ही सुन्दर कल्पना 'कामायनी' में जयशंकर प्रसाद ने भी की है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नील परिधान बीच सुकुमार&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खिला हो ज्यौं बिजली का फूल&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेघ-वन-बीच गुलाबी रंग।&amp;lt;ref&amp;gt;कामायनी, पृ0 46&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अपह्नुति'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहां प्रकृत का निषेध कर अप्रकृत का स्थापन किया जाय वहां 'अपह्नुति' अलंकार होता है। अपह्नुति केवल सादृश्य-सम्बन्ध में ही होती है। 'अपह्नुति' का शाब्दिक अर्थ है- छिपाना या निषेध करना। इसमें किसी सत्य बात को छिपाकर या निषेध करके उसके स्थान पर कोई झूठी बात स्थापित की जाती है। अपह्नुति की योजना में प्राय: कृत्रिमता आने की आशंका रहती हैं रसखान के काव्य में यह अलंकार बहुत ही विरल रूप में आया है। एकाध स्थलों पर इसकी चित्ताकर्षक व्यंजना हुई है। [[बांसुरी]] बजाते हुए, गौचरण का गीत गाते हुए, ग्वालों के साथ श्रीकृष्ण गोपिका की गली में आ गए। गोपिका उनकी बांसुरी की टेर को सुनकर कहती है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बांसुरी में उनि मेरोई नांव सुग्वालिनि के मिस टेरि सुनायौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
उपर्युक्त पंक्ति में अपह्नुति अलंकार की सुन्दर छटा है। यहाँ पर कृष्ण वंशी से गोपी-नाम-ध्वनि नहीं करते। वे 'सुग्वालिनि' की ध्वनि टेरते हैं। यहाँ गोपी के नाम का निषेध किया गया है और अप्रकृत 'सुग्वालिनि' नाम की स्थापना की गई है। लेकिन गोपी इस सत्य को समझती है कि उन्होंने बांसुरी में 'सुग्वालिनि' के मिस से मेरे नाम को ही सुनाया है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अतिशयोक्ति'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहां उपमान द्वारा उपमेय का निगरण, असम्बन्ध में मैं सम्बन्ध की कल्पना, उपमेय का अन्यत्व अथवा कारण और कार्य का पौवपिर्य- विपर्यय वर्णित हो, वहां 'अतिशयोक्ति' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतरू परेण यत्। प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं पद्यर्थोकौ च कल्पनम्॥ कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्यय: विज्ञेया तिशयोक्ति: सा....॥ -काव्यप्रकाश, 10 । 100-101&amp;lt;/ref&amp;gt; अतिशयोक्ति का अर्थ है अतिकान्त अथवा उल्लंघन अर्थात किसी वस्तु के विषय में लोकसीमा से बढ़ा-चढ़ाकर कथन करना। काव्य में अतिशयोक्ति के आधार पर ही कवि कल्पना की मधुर उड़ानें भरते हैं। सामान्य जीवन के व्यवहार में भी अतिशयोक्ति का प्रयोग बहुलता से किया जाता है। अत: उसे मानव की स्वभाव-जन्य विशेषता कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतिशयोक्ति कवियों की परंपरा से प्राप्त अलंकार है। रसखान ने भी काव्य परंपरागत रूप में ही उसको ग्रहण किया है, जिससे उसमें नवीनता और कथन में सुंदर चमत्कार आ गया है। उनकी अतिशयोक्ति-योजना केवल वैचित्र्य-प्रदर्शन बनकर ही नहीं रह गई है, बल्कि अभिप्रेत वर्ण्य विषय में उत्कर्ष लाने को पूर्णत: समर्थ है। कवि सौन्दर्य-निकेतन [[राधा]] की अनिंद्य रूप-छटा का चित्रण करता हुआ अतिशयोक्ति करता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;बासर तूँ जु कहूँ निकरै रबि को रथ माँझ अकास अरैरी।&lt;br /&gt;
रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन तें न टरे री।&lt;br /&gt;
द्यौस निस्वास चल्यौई करै निसि द्यौंस की आसन पाय धरै री।&lt;br /&gt;
तेरो न जात कछू दिन राति बिचारे बटोही की बाट परै री॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 48&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*नायिका गोरे रंग की है। उसके सौन्दर्य में अप्रतिम आभा ही दर्शनीय है। सखी उसे बरजती हुई कहती है कि तू दिन में घर से बाहर न निकल अन्यथा तेरे रूप को देखने के लिए [[सूर्य देवता|सूर्य]] का रथ आकाश में ही रुक जाएगा। यही स्थिति रात में भी होगी- [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] आंगन में आकर तुझे टकटकी बांधकर देखता रहेगा, वहां से 'टरेगा' नहीं (शायद यह सोचकर कि मेरा प्रतिद्वन्द्वी कहां से आ गया)। (तू पद्मगंधा है अत:) दिन में [[वायु देव|वायु]] तेरी सुगन्ध लेने आती है। रात में भी वह दिन की सी आशा से पीछे लगा है। (तुम्हारे बाहर निकलने से) तुम्हारा तो कुछ नहीं जाएगा, हां पथिक बेचारे का रास्ता रुक जाएगा। (क्योंकि समय सूचक ये [[ग्रह]] रुक जाएंगे, अपना कार्य करना बन्द कर देंगे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार हम देखते हैं कि इस सवैये में कवि ने राधा की सौन्दर्य गरिमा का लोकसीमा से बढ़ा चढ़ाकर कथन किया है। अत: यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है। रसखान ने अतिशयोक्ति का परंपरागत रूपों में प्रयोग किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यतिरेक'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहां उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण उपमेय का उत्कर्ष हो वहां 'व्यतिरेक' अलंकार होता है। व्यतिरेक का शाब्दिक अर्थ है आधिक्य। व्यतिरेक में कारण का होना अनिवार्य है। रसखान के काव्य में व्यतिरेक की योजना कहीं कहीं ही हुई है। किन्तु जो है, वह आकर्षक है। नायिका अपनी सखी से कह रही है कि ऐसी कोई स्त्री नहीं है जो [[कृष्ण]] के सुन्दर रूप को देखकर अपने को संभाल सके। हे सखी, मैंने 'ब्रजचन्द्र' के सलौने रूप को देखते ही लोकलाज को 'तज' दिया है क्योंकि—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;खंजन मील सरोजनि की छबि गंजन नैन लला दिन होनो। &lt;br /&gt;
भौंह कमान सो जोहन को सर बेधन प्राननि नंद को छोनो।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 72&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ नन्दलाल के दिन दिन होनहार नयन खंजन, मीन और सरोज (कमल) से भी अधिक छवि वाले बतलाए गए हैं। किन्तु उनमें एक विशिष्टता और भी हे। वह यह कि कृष्ण 'भौंह कमान' से कटाक्ष का बाण छोड़कर प्राणों को बेधते हैं। यहाँ उपमेय में उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण व्यतिरेक अलंकार है। एक अन्य उदाहरण लीजिए- नायिका में यौवनागम हो गया है। उसकी भौंहो में बांकापन तथा चितवन में तिरछापन आ गया है। साथ ही 'टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिनि ते दुति दूनी हिया की।'&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*यहाँ 'सुदामिनि तें दुति दूनी हिया की' में व्यतिरेक अलंकार है। क्योंकि, उपनेय नायिका के उभरे हुए वक्षस्थल की दुति बिजली से भी दूनी है- ऐसा कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पर्याय'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहां एक वस्तु की अनेक वस्तुओं में अथवा अनेक वस्तुओं की एक वस्तु में क्रम से (काल-भेद से) स्थिति का वर्णन हो वहां पर्याय अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;एकमनेकस्मिन्ननेकमेकस्मिन्कमेण पर्याय:। -अलंकारसर्वस्व, पृ0 189&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*निम्नांकित पंक्तियों में कृष्ण की अनेक चेष्टाओं का वर्णन है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;काहू को माखन चाखि गयौ अरु काहू को दूध दही ढरकायौ।&lt;br /&gt;
काहूँ को चीर ले रूख चढ़यौ अरु काहू को गुंजछरा छहरायौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 104&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
*'जसोमति' के 'छोहरा' (कृष्ण) किसी का मक्खन खा गए तो किसी का दही ढरका दिया, किसी का 'चीर' लेकर वृक्ष पर चढ़ गए तो किसी की गुंजाफल की माला को बिखेर दिया। यहाँ कृष्ण के द्वारा की जाने वाली अनेक क्रियाओं का वर्णन है। अत यहाँ पर्याय अलंकार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विरोधमूलक अलंकार, विरोधाभास'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वस्तुत: विरोध न होने पर जहां विरोध का आभास हो वहां 'विरोधाभास' अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;विरुद्धाभासत्वं विरोध:।  -काव्यालंकारसूत्र, 4।3।12&amp;lt;/ref&amp;gt; विरोध के कारण सामान्य उक्ति में भी अनोखा चमत्कार आ जाता है। इस अलंकार में विरोध केवल आभासित होता है। लेकिन विचार करने पर उसका परिहार हो जाता है। ऐसी उक्तियों के कारण काव्य-सौन्दर्य में उत्कर्ष आता है। रसखान के काव्य में विरोधाभास अलंकार की योजना नाममात्र को हुई है। इसका कारण यह है कि वे भक्त थे, काव्य उनकी तीव्र भावाभिव्यक्ति का साधन था। वह बात को बेलाग कहते थे- बहुत अधिक घुमा फिरा कर नहीं। वचन-विदग्धता के प्रदर्शन की चेष्टा उन्होंने कहीं नहीं की है। प्रेम-पन्थ बड़ा विचित्र है- कमल नाल से भी क्षीण और [[खड्ग]] की धार से भी तीक्ष्ण। अनिवार प्रेम के मार्ग के विषय में कवि का 'विरोधाभास' चमत्कार देखिए—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कमलतंतु से हीन अरु, कठिन खड़ग की धार। &lt;br /&gt;
अतिसूधौ टेढ़ौ बहुरि, प्रेम पंथ अनिवार॥&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेमवाटिका, दोहा 6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; जो सीधा है वह टेढ़ा कैसे हो सकता है? यहीं तो विरोधाभास है। प्रत्यक्षत: दोनों (सूधौ, टेढ़ौ) में विरोध दृष्टिगत होता है, परन्तु तत्त्वत विरोध है नहीं। प्रेम हो जाता है, उसमें छल-छंद रंचमात्र भी नहीं हे। वह निश्छल हृदय का प्रवाह है- इस दृष्टि से 'सूधौ' (सीधा) है। लेकिन प्रेम मार्ग पर चलना टेढ़ी खीर है, दुनिया का व्यंग्य और उपहास साथ रहता है, कठिनाइयाँ जीवन को अस्थिर कर देती हैं। इस दृष्टि से 'टेढ़ौ' (टेढ़ा) है। एक अन्य उदाहरण भी अवलोकनीय है। [[गोपी]] [[कृष्ण]] के अप्रतिम सौन्दर्य पर मुग्ध है। उनके नेत्र कटाक्ष को देखते ही उसकी लाज की गांठ खुल जाती है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है। &lt;br /&gt;
रसखानि लखें मन बूड़ि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 157&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विसंगति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां आपातत: विरोध दृष्टिगत होते हुए, कार्य और कारण का वैयाधिकरण्य वर्णित हो, वहां असंगति अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;विरुद्धत्वेनापाततो भासमानं हेतुकार्यपोर्वेयधिकरण्यमसंगति:॥ -रसगंगाधर, पृ0 589&amp;lt;/ref&amp;gt; इसमें दो वस्तुओं का वर्णन होता है- जिनमें कारण कार्यसम्बन्ध होता है। इन वस्तुओं की एकदेशीय स्थिति आवश्यक है, लेकिन वर्णन भिन्नदेशत्व का किया जाता है। रसखान के साहित्य में असंगति की योजना अत्यन्त सीमित रूप में हुई है। एक प्रभाव-व्यंजक उदाहरण अवलोकनीय है। [[गोकुल]] के ग्वाल (कृष्ण) की मनोहर चेष्टाओं पर मुग्ध हुई [[गोपी]] कहती है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;पिचका चलाइ और जुवती भिजाइ नेह, &lt;br /&gt;
लोचन नचाइ मेरे अंगहि नचाइ गौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 194&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; यहाँ क्रिया कृष्ण के नेत्रों में होती है परन्तु प्रभाव गोपी के अंग पर होता है। उसका अंग अंग उसके लोल लोचनों के कटाक्ष में नाच उठता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एकावली'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां श्रृंखलारूप में वर्णित पदार्थों में विशेष्य विशेषण भाव सम्बन्ध हो वहां एकावली अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;सैव श्रृंखला संसर्गस्य विशेष्यविशेषणभावरूपत्वे एकावली। -रसगंगाधर, पृ0 623&amp;lt;/ref&amp;gt; इस अलंकार की योजना कवि लोग केवल चमत्कार उत्पन्न करने के लिए करते हैं। इसमें कल्पना की उड़ान का विनोदात्मक रूप होता है। निम्नांकित पंक्ति में कवि ने एकावली अलंकार का नियोजन किया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;वा रस में रसखान पगी रति रैन जगी अंखियां अनुमानै। &lt;br /&gt;
चंद पै बिम्ब औ [[बिंब]] पै कैरव कैरव पै मुकतान प्रमानै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 119&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; यहाँ पर नायिका के मुख, अधर और नेत्रों के अंगों का एक के बाद एक करके श्रृंखला रूप में वर्णन हुआ है। रात भर जागरण के कारण नायिका की आँख लाल हो गई हैं। उसके मुख पर चन्द्र पर बिंब (कुन्दरू- लाल आंखों की ललाई) है, बिंब पर कैरव (आंखों में सफ़ेद कौए) हैं और 'कैरव' पर मुक्ताएं (रात भर जागने से जंभाई लेने पर स्वत: निकल पड़ने वाली आंसू की बूँदें) हैं। रसखान ने 'एकावली' का प्रयोग एकाध स्थलों पर ही किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अन्य संसर्ग मूलक अलंकार, उदाहरण''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्य रूप से ही हुई बात को स्पष्ट करने के लिए जहां उसी सामान्य में एक अंश को उदाहरण के रूप में रखा जाता है, वहां उदाहरण अलंकार होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अलंकार प्रदीप, पृ0 189&amp;lt;/ref&amp;gt; उदाहरण अलंकार की योजना रसखान ने अल्प मात्रा में की है। उनके उदाहरण सामान्य जीवन से ग्रहण किए गए हैं और सुन्दर बन पड़े हैं 'उदाहरण' के कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं— रसखानि गुबिंदहि यौं भजियै जिमि नागरि को चित गागरि मैं।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 8&amp;lt;/ref&amp;gt; कवि कहता है कि गोविन्द का भजन एकाग्र चित्त से करना चाहिए। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह एक उदाहरण देता है कि मन को भगवान में उसी प्रकार केन्द्रित रखना चाहिए जिस प्रकार सिर पर कई घड़े रखकर चलने वाली नागरी संतुलन बनाये रखने के लिए अपने मन को घड़े पर केन्द्रित रखती है। यहाँ कवि ने सामान्य जीवन से रमणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;प्रेम हरी कौ रूप है, त्यों हरि प्रेम सरूप। &lt;br /&gt;
एक होय द्वै यौं लसैं, ज्यों सूरज औ' धूप।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेमवाटिका, 124&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; इस दोहे में कवि को इष्ट है 'प्रेम' और 'हरि' (ईश्वर) की एकरूपता प्रतिपादित करना। एक होते हुए ये दोनों कैसे शोभित होते हैं- इसको स्पष्ट करने के लिए उसने सूरज और धूप का उदाहरण प्रस्तुत किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अन्य अलंकार, अनुमान'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साधन के द्वारा साध्य के चमत्कारपूर्ण ज्ञान के वर्णन को अनुमान अलंकार कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुमानं तु विच्छित्या ज्ञानं साध्यस्य साधनात। --साहित्यदर्पण, पृ0 10। 63&amp;lt;/ref&amp;gt; अनुमान अलंकार में हेतु के द्वारा साध्य का अनुमान कराया जाता है और यह ज्ञान कवि के द्वारा कल्पित चमत्कार से पूर्ण होता है। रसखान के काव्य में इस अलंकार का प्रयोग बहुत कम हुआ है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;मोहनलाल कौ हाल बिलौकियै नैकु कछू किनि छवै कर सौं कर। &lt;br /&gt;
ना करिबे पर बारें हैं प्रान कहा करि हैं अब हाँ करिबे पर।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 115&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; नायिका मान कर रही है और नायक उसे प्रसन्न करने की चेष्टा कर रहा है। सखी नायिका को समझाती है कि मान करने की अवधि तो घड़ी भर की होती है और तुम इतनी देर से तीक्ष्ण नेत्रों से देख देखकर नायक के हृदय को बेध रही हो। मोहन लाला तुमसे प्रेम करने के लिए बेहाल हो रहे हैं। जरा अनुमान तो करो कि तुम्हारे 'ना' करने पर जब उनकी यह हालत है तो 'हां' करने पर क्या स्थिति होगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''लोकोक्ति'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहां वर्णित प्रसंग में लोक-प्रसिद्ध प्रवाद ([[कहावत लोकोक्ति मुहावरे]] आदि) का कथन किया जाय, वहां 'लोकोक्ति' अलंकार होता है। रसखान के काव्य में लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दर रूप में हुआ है। कवि ने उन्हें भावों के भूषण में चमकते हुए नगीनों की तरह स्थान स्थान पर जड़ दिया है। इसके अनेक सरस उदाहरण द्रष्टव्य हैं। नायक और नायिका दोनों कालिन्दी के तीर पर मिलते हैं, मुड़-मुड़कर मुस्कराते हैं, एक दूसरे की बलैयां लेते हैं। इसे लक्ष्य करके कोई सखी कहती हे कि दोनों ने आजकल लोक-लाज को त्याग दिया है, केवल स्नेह को 'सरसा' रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम कि आगे क्या होगा-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;यह रसखानि दिना द्वै में बात फैलि जैहै,&lt;br /&gt;
कहाँ लौं सयानी चंदा हाथन छिपाइबौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 100&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt; दो दिन में बात फैल जाती है। [[चंद्र देवता|चन्द्रमा]] को हाथ से नहीं छिपाया जा सकता। यह लोक-प्रसिद्धि है। लोकोक्ति अलंकार की सहायता से लक्षणा द्वारा सखी यह कहना चाहती है कि [[गोपी]] और [[कृष्ण]] की इस प्रेम-लीला को गुप्त रखना असम्भव है। [[ब्रज]] में इसकी चर्चा फैलते देर नहीं लगेगी। इसी तरह निम्नांकित उद्धरण में भी कवि ने 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी' लोकोक्ति का बड़ा ही रमणीय प्रयोग किया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;करियै उपाय बाँस डारियै कटाय, &lt;br /&gt;
नहिं उपजैगौ बाँस नाहिं बाजै फेरि बांसुरी।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 54&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर गोपियां तन्मय होकर व्याकुल हो जाती हैं। उन्हें न तो पानी का घड़ा भरने की सुधि रहती है और न पग धरने की। वे घर का ध्यान की भूलकर लम्बी-लम्बी उसांसें भरने लगती हैं। कोइर बेहाल होकर भूमि पर गिर जाती है तो कोई-कोई आंसुओं से पूरित आंखों वाली हो जाती है। कवि कहता है कि ब्रज-बनिताओं के मन का वध करने वाली बंशी कुलीनता का ध्वंस करने वाली है। इसका तो एक ही उपाय है कि बांस की कटा दिए जाएँ, इससे यह होगा कि न तो बांस उपजेंगे और न ही फिर बंशी बजेगी। कवि ने अलंकार का कितना प्रभावशाली प्रयोग किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मानवीकरण''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रभाव से हिन्दी में कुछ आधुनिक अलंकारों की चर्चा भी होने लगी है। उन्हीं में से एक अलंकार 'मानवीकरण' है। यह शब्द अंग्रेज़ी के 'परसोनिफिकेशन' का हिन्दी अनुवाद है। 'अमानव' में 'मानव' गुणों के आरोप करने की साधारण प्रवृत्ति या प्रक्रिया को 'मानवीकरण' कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;साहित्य कोष (सं0- डा. धीरेन्द्र वर्मा) पृ0 589&amp;lt;/ref&amp;gt; मानवीकरण के द्वारा वर्णनीय विषय में मार्तिकता और प्रेषणीयता लाई जाती है। हिन्दी की छायावादी कविता में मानवीकरण का बड़ा ही मनोहर एवं सशक्त प्रयोग हुआ है। प्राचीन कवियों के काव्य में भी मानवीकरण की विशेषताएं उपलब्ध हैं। सहज भावुक कवि रसखान ने भी 'मानवीकरण' अलंकार की सुन्दर योजना की है। कुछ उदाहरण देखने योग्य हैं- &lt;br /&gt;
*प्रेमी की मुस्कान पर मुग्ध नायिका कहती है— बैरिनि वाहि भई मुसकानि जु वा रसखानि के प्रान बसी है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 38&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ 'मुसकानि' चेतन प्राणी नहीं है। (न मानव ही है) फिर भी उसे 'बैरिनि' कहा गया है। बैरिणी वही हो सकती है जो चेतन हो। 'मुसकानि' का यहाँ मानवीकरण करके उक्ति में चमत्कार लाया गया है। अतएव यह 'मानवीकरण' अलंकार का उदाहरण है। &lt;br /&gt;
*वहि बाँसुरि की धुनि कान परें कुलकानि हियौ तजि भाजति है।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 67&amp;lt;/ref&amp;gt; 'कुलकानि' प्राणी नहीं है जो भागे। कुलकानि की चिन्ता मानव को ही हो सकती है। जानवरों में इस प्रकार की भावना नहीं होती। अत: यहाँ 'कुलकानि' में मानव की विशेषता को चित्रित करके उसका मानवीकरण किया गया है। *मोहन में नायिका का मन अटका हुआ है तथा मन को चैन नहीं पड़ता और स्थिति यह है कि— व्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूषन भावै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 136&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ भागति भूख में मानवीकरण अलंकार है, क्योंकि अमूर्त और अचेतन 'भूख' का मानवीकरण किया गया है तथा उसमें भागने की विशेषता दिखाई गई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रसखान की कविता में विभिन्न प्रकार के शब्दगत और अर्थगत अलंकारों का प्रयोग हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि ने कहीं चमत्कार लाने के लिए अलंकारों को बरबस ठूंसने की चेष्टा नहीं की है। भाव और रस के प्रवाह पर भी उसकी दृष्टि केन्द्रित रही है। भावों और रसों की अभिव्यक्ति को उत्कृष्ट बनाने के लिए ही अलंकारों की योजना की गई है। उचित स्थान पर अलंकारों का ग्रहण किया गया है। उन्हें दूर तक खींचने का व्यर्थ प्रयास नहीं किया गया है। औचित्य के अनुसार ठीक स्थान पर उनका त्याग कर दिया गया है। रसखान द्वारा प्रयुक्त अलंकार अपने 'अलंकार' नाम को सार्थक करते हैं। शब्दालंकारों में अनुप्रास और अर्थालंकारों में उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक की निबंधना में कवि ने विशेष रूचि दिखाई है। बड़ी कुशलता के साथ उनका सन्निवेश किया है, उन्हें इस विधान में पूर्ण सफलता मिली है। अलंकारों की सुन्दर योजना से उनकी कविता का कला-पक्ष निस्सन्देह निखर आया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रसखान2}}{{रसखान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:साहित्य कोश]][[Category:रसखान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95&amp;diff=168048</id>
		<title>रसखान के मुक्तक</title>
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		<updated>2011-06-04T13:31:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{tocright}} {{पुनरीक्षण}} मुक्तक काव्य तारतम्य के बंधन से मु...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
मुक्तक काव्य तारतम्य के बंधन से मुक्त होने के कारण (मुक्तेन मुक्तकम्) मुक्तक कहलाता है और उसका प्रत्येक पद स्वत: पूर्ण होता है। 'मुक्तक' वह स्वच्छंद रचना है जिसके रस का [[उद्रेक]] करने के लिए अनुबंध की आवश्यकता नहीं।&amp;lt;ref&amp;gt;आधुनिक हिन्दी काव्य में छंद योजना, पृ0 21&amp;lt;/ref&amp;gt; वास्तव में मुक्तक काव्य का महत्त्वपूर्ण रूप है, जिसमें काव्यकार प्रत्येक छंद में ऐसे स्वतंत्र भावों की सृष्टि करता है, जो अपने आप में पूर्ण होते हैं। &lt;br /&gt;
====मुक्तक==== &lt;br /&gt;
मुक्तक काव्य के प्रणेता को अपने भावों को व्यक्त करने के लिए अन्य सहायक छंदों की आवश्यकता अधिक नहीं होती। प्रबंध काव्य की अपेक्षा मुक्तक रचना के लिए कथा की आवश्यकता अधिक होती है, क्योंकि काव्य रूप की दृष्टि से मुक्तक में न तो किसी वस्तु का वर्णन ही होता है और न वह गेय है। यह जीवन के किसी एक पक्ष का अथवा किसी एक दृश्य का या प्रकृति के किसी पक्ष विशेष का चित्र मात्र होता है। इसी से काव्यकार को प्रबंध काव्य की अपेक्षा सफल मुक्तकों की सृष्टि के लिए अधिक कौशल की आवश्यकता पड़ती है। पूर्वा पर प्रसंगों की परवाह किये बिना सूक्ष्म एवं मार्मिक खंड दृश्य अथवा अनुभूति को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करने वाली उस रचना को मुक्तक काव्य के नाम से अभिहित किया जाता है- जिसमें न तो कथा का व्यापक प्रवाह रहता है और न ही उसमें क्रमानुसार किसी कथा को सजाकर वर्णन करने का आग्रह होता है, बल्कि मुक्तक काव्य में सूक्ष्मातिसूक्ष्म मार्मिक भावों की अभिव्यक्ति होती है जो स्वयं में पूर्ण तथा अपेक्षाकृत लघु रचना होती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुक्तक के प्रकार====&lt;br /&gt;
विषय के आधार पर मुक्तक को तीन वर्गों में बांटा गया है- श्रृंगार परक, वीर रसात्मक तथा नीति परक। स्वरूप के आधार पर मुक्तक के गीत, प्रबंध मुक्तक, विषयप्रधान, संघात मुक्तक, एकार्थ प्रबंध तथा मुक्तक प्रबंध आदि भेद किये जा सकते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;दरबारी संस्कृति और हिन्दी मुक्तक, पृ0 42&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====रसखान द्वारा प्रयुक्त मुक्तक====&lt;br /&gt;
[[रसखान]] का उद्देश्य किसी खंड काव्य या महाकाव्य की रचना न था। प्रेमोमंग के इस कवि को तो अपने मार्मिक उद्गारों की अभिव्यक्ति करनी थी। उसके लिए मुक्तक से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता था। रसखान ने अपने कोमल मार्मिक भावों-रूपी पुष्पों से मुक्तक-रूपी गुलदस्ते को सज़ा दिया। रसखान ने श्रृंगार मुक्तक तथा स्वतंत्र मुक्तक के रूप में ही काव्य की रचना की।&amp;lt;ref&amp;gt;हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ0 275&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====श्रृंगार मुक्तक====&lt;br /&gt;
श्रृंगार परकमुक्तकों के अंतर्गत ऐहिकतापरक रचनाएं आती हैं जिनमें अधिकतर नायक-नायिका की श्रृंगारी चेष्टाएं, भाव भंगिमा तथा संकेत स्थलों का सरल वर्णन होता है। मिलन काल की मधुर क्रीड़ा तथा वियोग के क्षणों में बैठे आंसू गिराना अथवा विरह की उष्णता से धरती और आसमान को जलाना आदि अत्युक्तिपूर्ण रचनाएं श्रृंगार मुक्तक के अंतर्गत ही होती है। नायक-नायिकाओं की संयोग-वियोग अवस्थाओं तथा विभिन्न ऋतुओं का वर्णन श्रृंगारी मुक्तककारों ने किया है। रसखान के काव्य में श्रृंगार के दर्शन होते हैं। उन्होंने श्रृंगार-मुक्तक में सुन्दर पद्यों की रचना की है। &lt;br /&gt;
मोहन के मन भाइ गयौ इक भाइ सौ ग्वालिन गोधन गायौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ताकों लग्यौ चट, चौहट सो दुरि औचक गात सौं गात छुवायौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
रसखानि लही इनि चातुरता रही जब लौं घर आयौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
नैन नचाइ चितै मुसकाइ सु ओट ह्वै जाइ अँगूठा दिखायौ।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान 101&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:raskhan-2.jpg|[[रसखान]] के दोहे, [[महावन]], [[मथुरा]]|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
अखियाँ अखियाँ सौं सकाइ मिलाइ हिलाइ रिझाइ हियो हरिबो।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
बतियाँ चित चौरन चेटक सी रस चारू चरित्रन ऊचरिबौ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
रसखानि के प्रान सुधा भरिबो अधरान पै त्यों अधरा अधिबौ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
इतने सब मैन के मोहनी जंत्र पै मन्त्र बसीकर सी करिबौ॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान 120&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नवरंग अनंग भरी छबि सों वह मूरति आँखि गड़ी ही रहै।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बतियां मन की मन ही में रहै, घतिया उन बीच अड़ी ही रहै।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
तबहूँ रसखानि सुजान अली नलिनी दल बूँद पड़ी ही रहै।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
जिय की नहिं जानत हौं सजनी रजनी अँसुवान लड़ी ही रहै।&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान 127&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====स्वतन्त्र मुक्तक====&lt;br /&gt;
कोष मुक्तक की भांति ही स्वतंत्र मुक्तक विशुद्ध मुक्तक काव्य का एक अंग अथवा भेद है। जिसके लिए न तो संख्या का बंधन है और न एक प्रकार के छंदों का ही। बल्कि कवि की लेखनी से तत्काल निकले प्रत्येक फुटकर छंद को स्वतंत्र मुक्तक की संज्ञा दी जा सकती है। स्वतंत्र मुक्तक काव्य के लिए प्रेम श्रृंगार, नीति तथा वीर रस आदि कोई भी विषय चुना जा सकता है। रसखान ने अधिकांश रचना स्वतंत्र मुक्तक के रूप में की। उन्होंने भक्ति एवं श्रृंगार संबंधी मुक्तक लिखे।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौ गुंज की माल गरे पहिरौंगी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
भाव तो वोहि मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरान धरौंगी॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान 86&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसखान द्वारा रचित कवित्त सवैये मुक्तक रचना की विभिन्न कसौटियों पर पूर्णंरूप से खरे उतरते हैं। प्रत्येक छंद अपने में एक इकाई है। चार पंक्तियों में संपूर्ण चित्र का निर्माण बड़ी कुशलता से किया गया है। चित्रात्मकता, भावातिरेक और उक्ति वैदग्ध का यह सामंजस्य अत्यंत दुर्लभ है।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
वा छबि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज कोटी।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथसों ले गयौ माखन रोटी॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 21&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसखान की रचनाओं के अनुशीलन से यह स्पष्टतया सिद्ध होता है कि वे मुक्तक रचनाओं के कवि हैं। वस्तुत: कृष्ण-भक्त कवियों की यह एक अवेक्षणीय विशेषता रही है कि उन्होंने प्रबंध रचना में रूचि नहीं दिखाई। इसका मूल कारण यह था कि उनकी दृष्टि भगवान [[कृष्ण]] की सौंदर्य मूर्ति पर ही केन्द्रित थी, शक्ति और शील पर नहीं। रसखान स्वभाव से ही सौंदर्योपासक और प्रेमी जीव थे। अत: उनमें भी इस प्रवृत्ति का पाया जाना सर्वथा स्वाभाविक था। अपने प्रेम विह्वल चित्र के भावों की प्रवाहमयी और प्रेमोत्पादक व्यंजना के लिए मुक्तक का माध्यम ही अधिक उपयुक्त था। रसखान में अपनी स्वानुभूति की मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए मुक्तक के इस माध्यम का असाधारण सफलता के साथ प्रयोग किया है। मुक्तक के लिए प्रौढ़, प्रांजल तथा समासयुक्त भाषा आवश्यक है। मुक्तक के छोटे से कलेवर में भावों का सागर भरने के लिए इस प्रकार की भाषा को उत्तम कहा गया है। [[रसखान]] की भाषा मृदुल, मंजुल, और गति पूर्ण होते हुए भी बोझिल नहीं है। उसमें व्यक्त एक-एक चित्र अमर है। सानुप्रास शब्दों से भाषा की गतिपूर्ण लय में आंतरिक संगीत ध्वनित होता है। आवेग की तीव्रता के द्वारा कोमल प्रभाव की अभिव्यंजना होती है। साधारण मुक्तक काव्य की गीतात्मकता में हृदय को झंकृत कर देने की शक्ति है। रसखान के मुक्तकों की सबसे बड़ी विशेषता है, भाव एवं अभिव्यंजना की एकतानता, जो उन्हें गीति काव्य के निकट ला देती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|=प्रारम्भिक |प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रसखान2}}{{रसखान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]][[Category:साहित्य कोश]][[Category:रसखान]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=168020</id>
		<title>रसखान की छंद योजना</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=168020"/>
		<updated>2011-06-04T13:14:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: /* संबंधित लेख */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
==छंदोयोजना==&lt;br /&gt;
छंद वह बेखरी (मानवोच्चरित ध्वनि) है, जो प्रत्यक्षीकृत निरंतर तरंग भंगिमा से आह्लाद के साथ भाव और अर्थ को अभिव्यंजना कर सके। [[भाषा]] के जन्म के साथ-साथ ही कविता और छंदो का संबंध माना गया है। छंदों द्वारा अनियंत्रित वाणी नियंत्रित तथा ताल युक्त हो जाती है। गद्य की अपेक्षा छंद अधिक काल तक सजाज में प्रचलित रहता है। जो भाव छंदोबद्ध होता है उसे अपेक्षाकृत अधिक अमरत्व मिलता है। भाव को प्रेषित करने के साथ-साथ छंद में मुग्ध करने की शक्ति होती है। छंद के द्वारा कल्पना का रूप सजग होकर मन के सामने प्रत्यक्ष हो जाता है। &lt;br /&gt;
छंद की व्यंजना शक्ति भी गद्य की अपेक्षा अधिक होती है। उसके माध्यम से थोड़े शब्दों में बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं। छंद की सीमा में बंधकर भाव उसी प्रकार अधिक वेगवान और प्रभावशाली हो जाता है जिस प्रकार तटों के बंधन से सरिता। छंद के आवर्तन में ऐसा आह्लाद होता है, जो तुरंत मर्म को स्पर्श करता है। स्थिर कथा को वेग देकर चित्त में प्रवेश कराने का श्रेय छंद को ही है। छंद भावों का परिष्कार कर कोमलता का निर्माण करता है। छंदों के अनेक भेदोपभेद मिलते हैं। [[रसखान]] ने भक्तिकाल की गेय-पद परंपरा से हटकर सवैया, कवित्त और दोहों को ही अपनी रचना के उपयुक्त समझकर अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====सवैया छंद====&lt;br /&gt;
इस छंद की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डा. नगेन्द्र का विचार है कि सवैया शब्द सपाद का अपभ्रंश रूप है। इसमें छंद के अंतिम चरण को सबसे पूर्व तथा अंत में पढ़ा जाता था अर्थात एक पंक्ति दो बार और तीन पंक्तियां एक बार पढ़ी जाती थीं। इस प्रकार वस्तुत: चार पंक्तियों का पाठ पांच पंक्तियों का-सा हो जाता था। पाठ में 'सवाया' होने से यह छंद सवैया कहलाया। [[संस्कृत]] के किसी छंद से भी इसका मेल नहीं हे। अत: यह जनपद-साहित्य का ही छंद बाद के कवियों ने अपनाया होगा, ऐसा अनुमान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;रीति काव्य की भूमिका तथा देव और उनकी कविता, पृ0 236&amp;lt;/ref&amp;gt; यदि यह अनुमान सत्य हो तो [[प्राकृत]], अपभ्रंश आदि में यह छंद अवश्य मिलना चाहिए जो [[हिन्दी]] में रूपांतरित हो गया है। किन्तु ऐसे किसी छंद के दर्शन नहीं होते। यह संभव है कि तेईस वर्णों वाले संस्कृत के उपजाति छंद के 14 भेदों में से किसी एक का परिवर्तित रूप सवैया बन गया हो। सवैया 22 अक्षरों से लेकर 28 अक्षरों तक का होता है। उपजाति भी 22 अक्षरों का छंद है। अक्षरों का लघु-गुरु भाव-सवैया में भी परिवर्तन ग्रहण करता है। वैदिक छंदों का भी लौकिक संस्कृत छंदों तक आते बड़ा रूप परिवर्तन हुआ। हो सकता है कि उपजाति का परिवर्तित रूप सवैया हो जो सवाया बोलने से सवैया कहलाया। 'प्राकृतपेंगलम्' में भी सवैयों का रूप मिलता है किन्तु वहाँ उसे सवैया संज्ञा नहीं दी गई। 'प्राकृतपेंगलम्' का रचनाकाल संवत 1300 के आस-पास माना जाता है। अत: सवैया के प्रयोग का अनुमान 13वीं शताब्दी से लगाया जा सकता है। भक्तिकाल में गेय पदों का व्यवहार विशेष रूप से होने लगा। &lt;br /&gt;
*[[सूरदास]] के आविर्भाव तक हिन्दी में सवैयों का प्रचलन नहीं हुआ। &lt;br /&gt;
*[[जगनिक]] के [[आल्हाखण्ड|आल्हा]] खंड में कुछ सवैये अवश्य प्राप्त हैं, किन्तु उनकी भाषा से यही अनुमान होता है किये बाद में क्षेपक रूप में आए। प्रामाणिक रूप से इस छंद का प्रयोग [[अकबर]] के काल से प्रारंभ होता है। &lt;br /&gt;
*[[नरोत्तमदास|पं. नरोत्तमदास]] का 'सुदामा चरित्र' सवैयों और दोहों में ही लिखा गया है। &lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास]] ने '[[कवितावली]]' में इन्हीं छंदों का आश्रय लिया है। &lt;br /&gt;
*[[केशव कवि|केशवदास]] की 'रामचंद्रिका' में भी सवैये काफ़ी मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान ने भक्ति काल की पद परंपरा से हटकर सवैया छंद को अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====घनाक्षरी====&lt;br /&gt;
घनाक्षरी या कवित्त के प्रथम दर्शन भक्तिकाल में होते हैं। हिन्दी में घनाक्षरी वृत्तों का प्रचलन कब से हुआ, इस विषय में निश्चित रूप से कहना कठिन है। &lt;br /&gt;
*[[चंदबरदाई]] के [[पृथ्वीराज रासों]] में दोहा तथा छप्पय छंदों की प्रचुरता है। सवैया और घनाक्षरी का वहाँ भी प्रयोग नहीं मिलता। प्रामाणिक रूप से घनाक्षरी का प्रयोग [[अकबर]] के काल में मिलता है। घनाक्षरी छंद में मधुर भावों की अभिव्यक्ति उतनी सफलता के साथ नहीं हो सकती जितनी ओजपूर्ण भावों की। &lt;br /&gt;
*रसखान ने छंद की प्रवृत्ति का विचार न करते हुए श्रृंगार तथा भक्ति रस के लिए इस छंद का प्रयोग किया और लय तथा शब्दावली के आधार पर इसे भावानुकूल बना लिया।&lt;br /&gt;
====सोरठा====&lt;br /&gt;
यह अर्द्ध सम मात्रिक छंद है। दोहा छंद का उलटा होता है। इसमें 25-23 मात्राएं होती हैं। रसखान के काव्य में चार&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77,98,123,152&amp;lt;/ref&amp;gt; सोरठे मिलते हैं। &lt;br /&gt;
प्रीतम नंदकिशोर, जा दिन ते नैननि लग्यौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मनभावन चित चोर, पलक औट नहि सहि सकौं॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान के काव्य में कवित्त, सवैया, दोहा, सोरठा आदि छंद प्रयुक्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*इनके अतिरिक्त एक धमार सारंग, राग पद में भी मिलता है। &lt;br /&gt;
*रसखान के छंद कोमल कांत पदावली से युक्त हैं। उनमें संगीतात्मकता है। दोहा जैसे छोटे छंद में गूढ़ तथ्यों का निरूपण उनकी प्रतिभा का परिचायक है। छंदों में अंत्यानुप्रास का सफल निर्वाह हुआ है। साथ ही छंद, भाव तथा रसानुकूल हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छंद और शब्द स्वरूप विपर्यय==&lt;br /&gt;
काव्य में सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए तथा छंदानुरोध पर प्राय: कवि शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा करते हैं रसखान ने भी काव्य चमत्कार एवं छंद की मात्राओं के अनुरोध पर शब्दों के स्वरूप को बदला है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#झलकैयत, तुलैयत, ललचैयत, लैयत&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 61&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से झलकाना, तुलाना, ललचाना, लाना शब्दों से। &lt;br /&gt;
#पग पैजनी बाजत पीरी कछौटी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 21&amp;lt;/ref&amp;gt;-कृष्ण की वय की लघुता के आग्रह, स्वाभाविकता एवं सौंदर्य लाने के लिए कछौटा से कछौटी। &lt;br /&gt;
#टूटे छरा बछरादिक गौधन&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर तथा बछरा से शब्द साम्य के लिए छल्ला से छरा। &lt;br /&gt;
#मोल छला के लला ने बिकेहौं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला के आग्रह से छला। &lt;br /&gt;
#मीन सी आंखि मेरी अंसुवानी रहैं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 74&amp;lt;/ref&amp;gt;- आंसुओं से भरी रहने के अर्थ में माधुर्य लाने के लिए आंसू से अंसुवानी। &lt;br /&gt;
#मान की औधि घरी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 115&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंद की मात्रा के आग्रह से अवधि से औधि। &lt;br /&gt;
#पांवरिया, भांवरिया, डांवरिया, सांवरिया, बावरिया&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 141&amp;lt;/ref&amp;gt;- पौरी, भौंरी, सांवरे, बावरी आदि से छंदानुरोध पर पांवरिया, भांवरिया बना लिया गया। &lt;br /&gt;
#लकुट्टनि, भृकुट्टनि, उघुट्टनि, मुकुट्टनि&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 165&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से लकुटी, भृकुटी, मुकुट आदि शब्दों से बनाया। &lt;br /&gt;
#हम हैं वृषभानपुरा की लली&amp;lt;ref&amp;gt;दानलीला, 3&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला (पुत्र) के जोड़ पर पुत्री के अर्थ में लली शब्द का प्रयोग हुआ है। &lt;br /&gt;
#फोरि हौ मटूकी माट&amp;lt;ref&amp;gt; दानलीला, 6&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर मटुकी से मटूकी। &lt;br /&gt;
#ज्ञानकर्म 'रु'&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेम वाटिका, 12&amp;lt;/ref&amp;gt; उपासना, सब अहमिति को मूल- यहाँ छंदानुरोध पर अरु से 'रु' किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसखान के काव्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ उन्होंने छांदिक सौंदर्य के लिए शब्दों के रूप में परिवर्तन किया है। किंतु इस शब्द-विपर्यय में कहीं भी अस्वाभाविकता के दर्शन नहीं होते। न ही शब्द नट की कला की भांति रूप बदलते हैं। कहीं-कहीं तो उन्होंने शब्दों को इस प्रकार संजोया है कि स्वाभाविकता के दर्शनों के साथ भाव-सौंदर्य भी दिखाई देता है। '''मोर, पंखा, मुरली, बनमाल लखें हिय को हियरा उमह्यौरी''', यहाँ मसृणता लाने के लिए '''हियरा''' शब्द का प्रयोग किया गया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रसखान छंद योजना में पूर्ण सफल हैं। अंत्यानुप्रास के सुंदर स्वरूप को भी उन्होंने अपने छंदों में स्थान दिया है। साथ ही उनमें [[संगीत]] की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:रसखान]]&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=168007</id>
		<title>रसखान की छंद योजना</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=168007"/>
		<updated>2011-06-04T13:05:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
==छंदोयोजना==&lt;br /&gt;
छंद वह बेखरी (मानवोच्चरित ध्वनि) है, जो प्रत्यक्षीकृत निरंतर तरंग भंगिमा से आह्लाद के साथ भाव और अर्थ को अभिव्यंजना कर सके। [[भाषा]] के जन्म के साथ-साथ ही कविता और छंदो का संबंध माना गया है। छंदों द्वारा अनियंत्रित वाणी नियंत्रित तथा ताल युक्त हो जाती है। गद्य की अपेक्षा छंद अधिक काल तक सजाज में प्रचलित रहता है। जो भाव छंदोबद्ध होता है उसे अपेक्षाकृत अधिक अमरत्व मिलता है। भाव को प्रेषित करने के साथ-साथ छंद में मुग्ध करने की शक्ति होती है। छंद के द्वारा कल्पना का रूप सजग होकर मन के सामने प्रत्यक्ष हो जाता है। &lt;br /&gt;
छंद की व्यंजना शक्ति भी गद्य की अपेक्षा अधिक होती है। उसके माध्यम से थोड़े शब्दों में बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं। छंद की सीमा में बंधकर भाव उसी प्रकार अधिक वेगवान और प्रभावशाली हो जाता है जिस प्रकार तटों के बंधन से सरिता। छंद के आवर्तन में ऐसा आह्लाद होता है, जो तुरंत मर्म को स्पर्श करता है। स्थिर कथा को वेग देकर चित्त में प्रवेश कराने का श्रेय छंद को ही है। छंद भावों का परिष्कार कर कोमलता का निर्माण करता है। छंदों के अनेक भेदोपभेद मिलते हैं। [[रसखान]] ने भक्तिकाल की गेय-पद परंपरा से हटकर सवैया, कवित्त और दोहों को ही अपनी रचना के उपयुक्त समझकर अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====सवैया छंद====&lt;br /&gt;
इस छंद की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डा. नगेन्द्र का विचार है कि सवैया शब्द सपाद का अपभ्रंश रूप है। इसमें छंद के अंतिम चरण को सबसे पूर्व तथा अंत में पढ़ा जाता था अर्थात एक पंक्ति दो बार और तीन पंक्तियां एक बार पढ़ी जाती थीं। इस प्रकार वस्तुत: चार पंक्तियों का पाठ पांच पंक्तियों का-सा हो जाता था। पाठ में 'सवाया' होने से यह छंद सवैया कहलाया। [[संस्कृत]] के किसी छंद से भी इसका मेल नहीं हे। अत: यह जनपद-साहित्य का ही छंद बाद के कवियों ने अपनाया होगा, ऐसा अनुमान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;रीति काव्य की भूमिका तथा देव और उनकी कविता, पृ0 236&amp;lt;/ref&amp;gt; यदि यह अनुमान सत्य हो तो [[प्राकृत]], अपभ्रंश आदि में यह छंद अवश्य मिलना चाहिए जो [[हिन्दी]] में रूपांतरित हो गया है। किन्तु ऐसे किसी छंद के दर्शन नहीं होते। यह संभव है कि तेईस वर्णों वाले संस्कृत के उपजाति छंद के 14 भेदों में से किसी एक का परिवर्तित रूप सवैया बन गया हो। सवैया 22 अक्षरों से लेकर 28 अक्षरों तक का होता है। उपजाति भी 22 अक्षरों का छंद है। अक्षरों का लघु-गुरु भाव-सवैया में भी परिवर्तन ग्रहण करता है। वैदिक छंदों का भी लौकिक संस्कृत छंदों तक आते बड़ा रूप परिवर्तन हुआ। हो सकता है कि उपजाति का परिवर्तित रूप सवैया हो जो सवाया बोलने से सवैया कहलाया। 'प्राकृतपेंगलम्' में भी सवैयों का रूप मिलता है किन्तु वहाँ उसे सवैया संज्ञा नहीं दी गई। 'प्राकृतपेंगलम्' का रचनाकाल संवत 1300 के आस-पास माना जाता है। अत: सवैया के प्रयोग का अनुमान 13वीं शताब्दी से लगाया जा सकता है। भक्तिकाल में गेय पदों का व्यवहार विशेष रूप से होने लगा। &lt;br /&gt;
*[[सूरदास]] के आविर्भाव तक हिन्दी में सवैयों का प्रचलन नहीं हुआ। &lt;br /&gt;
*[[जगनिक]] के [[आल्हाखण्ड|आल्हा]] खंड में कुछ सवैये अवश्य प्राप्त हैं, किन्तु उनकी भाषा से यही अनुमान होता है किये बाद में क्षेपक रूप में आए। प्रामाणिक रूप से इस छंद का प्रयोग [[अकबर]] के काल से प्रारंभ होता है। &lt;br /&gt;
*[[नरोत्तमदास|पं. नरोत्तमदास]] का 'सुदामा चरित्र' सवैयों और दोहों में ही लिखा गया है। &lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास]] ने '[[कवितावली]]' में इन्हीं छंदों का आश्रय लिया है। &lt;br /&gt;
*[[केशव कवि|केशवदास]] की 'रामचंद्रिका' में भी सवैये काफ़ी मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान ने भक्ति काल की पद परंपरा से हटकर सवैया छंद को अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====घनाक्षरी====&lt;br /&gt;
घनाक्षरी या कवित्त के प्रथम दर्शन भक्तिकाल में होते हैं। हिन्दी में घनाक्षरी वृत्तों का प्रचलन कब से हुआ, इस विषय में निश्चित रूप से कहना कठिन है। &lt;br /&gt;
*[[चंदबरदाई]] के [[पृथ्वीराज रासों]] में दोहा तथा छप्पय छंदों की प्रचुरता है। सवैया और घनाक्षरी का वहाँ भी प्रयोग नहीं मिलता। प्रामाणिक रूप से घनाक्षरी का प्रयोग [[अकबर]] के काल में मिलता है। घनाक्षरी छंद में मधुर भावों की अभिव्यक्ति उतनी सफलता के साथ नहीं हो सकती जितनी ओजपूर्ण भावों की। &lt;br /&gt;
*रसखान ने छंद की प्रवृत्ति का विचार न करते हुए श्रृंगार तथा भक्ति रस के लिए इस छंद का प्रयोग किया और लय तथा शब्दावली के आधार पर इसे भावानुकूल बना लिया।&lt;br /&gt;
====सोरठा====&lt;br /&gt;
यह अर्द्ध सम मात्रिक छंद है। दोहा छंद का उलटा होता है। इसमें 25-23 मात्राएं होती हैं। रसखान के काव्य में चार&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77,98,123,152&amp;lt;/ref&amp;gt; सोरठे मिलते हैं। &lt;br /&gt;
प्रीतम नंदकिशोर, जा दिन ते नैननि लग्यौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मनभावन चित चोर, पलक औट नहि सहि सकौं॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान के काव्य में कवित्त, सवैया, दोहा, सोरठा आदि छंद प्रयुक्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*इनके अतिरिक्त एक धमार सारंग, राग पद में भी मिलता है। &lt;br /&gt;
*रसखान के छंद कोमल कांत पदावली से युक्त हैं। उनमें संगीतात्मकता है। दोहा जैसे छोटे छंद में गूढ़ तथ्यों का निरूपण उनकी प्रतिभा का परिचायक है। छंदों में अंत्यानुप्रास का सफल निर्वाह हुआ है। साथ ही छंद, भाव तथा रसानुकूल हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छंद और शब्द स्वरूप विपर्यय==&lt;br /&gt;
काव्य में सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए तथा छंदानुरोध पर प्राय: कवि शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा करते हैं रसखान ने भी काव्य चमत्कार एवं छंद की मात्राओं के अनुरोध पर शब्दों के स्वरूप को बदला है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#झलकैयत, तुलैयत, ललचैयत, लैयत&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 61&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से झलकाना, तुलाना, ललचाना, लाना शब्दों से। &lt;br /&gt;
#पग पैजनी बाजत पीरी कछौटी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 21&amp;lt;/ref&amp;gt;-कृष्ण की वय की लघुता के आग्रह, स्वाभाविकता एवं सौंदर्य लाने के लिए कछौटा से कछौटी। &lt;br /&gt;
#टूटे छरा बछरादिक गौधन&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर तथा बछरा से शब्द साम्य के लिए छल्ला से छरा। &lt;br /&gt;
#मोल छला के लला ने बिकेहौं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला के आग्रह से छला। &lt;br /&gt;
#मीन सी आंखि मेरी अंसुवानी रहैं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 74&amp;lt;/ref&amp;gt;- आंसुओं से भरी रहने के अर्थ में माधुर्य लाने के लिए आंसू से अंसुवानी। &lt;br /&gt;
#मान की औधि घरी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 115&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंद की मात्रा के आग्रह से अवधि से औधि। &lt;br /&gt;
#पांवरिया, भांवरिया, डांवरिया, सांवरिया, बावरिया&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 141&amp;lt;/ref&amp;gt;- पौरी, भौंरी, सांवरे, बावरी आदि से छंदानुरोध पर पांवरिया, भांवरिया बना लिया गया। &lt;br /&gt;
#लकुट्टनि, भृकुट्टनि, उघुट्टनि, मुकुट्टनि&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 165&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से लकुटी, भृकुटी, मुकुट आदि शब्दों से बनाया। &lt;br /&gt;
#हम हैं वृषभानपुरा की लली&amp;lt;ref&amp;gt;दानलीला, 3&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला (पुत्र) के जोड़ पर पुत्री के अर्थ में लली शब्द का प्रयोग हुआ है। &lt;br /&gt;
#फोरि हौ मटूकी माट&amp;lt;ref&amp;gt; दानलीला, 6&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर मटुकी से मटूकी। &lt;br /&gt;
#ज्ञानकर्म 'रु'&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेम वाटिका, 12&amp;lt;/ref&amp;gt; उपासना, सब अहमिति को मूल- यहाँ छंदानुरोध पर अरु से 'रु' किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसखान के काव्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ उन्होंने छांदिक सौंदर्य के लिए शब्दों के रूप में परिवर्तन किया है। किंतु इस शब्द-विपर्यय में कहीं भी अस्वाभाविकता के दर्शन नहीं होते। न ही शब्द नट की कला की भांति रूप बदलते हैं। कहीं-कहीं तो उन्होंने शब्दों को इस प्रकार संजोया है कि स्वाभाविकता के दर्शनों के साथ भाव-सौंदर्य भी दिखाई देता है। '''मोर, पंखा, मुरली, बनमाल लखें हिय को हियरा उमह्यौरी''', यहाँ मसृणता लाने के लिए '''हियरा''' शब्द का प्रयोग किया गया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रसखान छंद योजना में पूर्ण सफल हैं। अंत्यानुप्रास के सुंदर स्वरूप को भी उन्होंने अपने छंदों में स्थान दिया है। साथ ही उनमें [[संगीत]] की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के कवि}}{{रसखान2}}&lt;br /&gt;
{{रसखान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रसखान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>रसखान की छंद योजना</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=167992"/>
		<updated>2011-06-04T12:51:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{tocright}} {{पुनरीक्षण}} ==छंदोयोजना== छंद वह बेखरी (मानवोच्च...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
==छंदोयोजना==&lt;br /&gt;
छंद वह बेखरी (मानवोच्चरित ध्वनि) है, जो प्रत्यक्षीकृत निरंतर तरंग भंगिमा से आह्लाद के साथ भाव और अर्थ को अभिव्यंजना कर सके। [[भाषा]] के जन्म के साथ-साथ ही कविता और छंदो का संबंध माना गया है। छंदों द्वारा अनियंत्रित वाणी नियंत्रित तथा ताल युक्त हो जाती है। गद्य की अपेक्षा छंद अधिक काल तक सजाज में प्रचलित रहता है। जो भाव छंदोबद्ध होता है उसे अपेक्षाकृत अधिक अमरत्व मिलता है। भाव को प्रेषित करने के साथ-साथ छंद में मुग्ध करने की शक्ति होती है। छंद के द्वारा कल्पना का रूप सजग होकर मन के सामने प्रत्यक्ष हो जाता है। &lt;br /&gt;
छंद की व्यंजना शक्ति भी गद्य की अपेक्षा अधिक होती है। उसके माध्यम से थोड़े शब्दों में बहुत-सी बातें कही जा सकती हैं। छंद की सीमा में बंधकर भाव उसी प्रकार अधिक वेगवान और प्रभावशाली हो जाता है जिस प्रकार तटों के बंधन से सरिता। छंद के आवर्तन में ऐसा आह्लाद होता है, जो तुरंत मर्म को स्पर्श करता है। स्थिर कथा को वेग देकर चित्त में प्रवेश कराने का श्रेय छंद को ही है। छंद भावों का परिष्कार कर कोमलता का निर्माण करता है। छंदों के अनेक भेदोपभेद मिलते हैं। [[रसखान]] ने भक्तिकाल की गेय-पद परंपरा से हटकर सवैया, कवित्त और दोहों को ही अपनी रचना के उपयुक्त समझकर अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====सवैया छंद====&lt;br /&gt;
इस छंद की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डा. नगेन्द्र का विचार है कि सवैया शब्द सपाद का अपभ्रंश रूप है। इसमें छंद के अंतिम चरण को सबसे पूर्व तथा अंत में पढ़ा जाता था अर्थात एक पंक्ति दो बार और तीन पंक्तियां एक बार पढ़ी जाती थीं। इस प्रकार वस्तुत: चार पंक्तियों का पाठ पांच पंक्तियों का-सा हो जाता था। पाठ में 'सवाया' होने से यह छंद सवैया कहलाया। [[संस्कृत]] के किसी छंद से भी इसका मेल नहीं हे। अत: यह जनपद-साहित्य का ही छंद बाद के कवियों ने अपनाया होगा, ऐसा अनुमान किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;रीति काव्य की भूमिका तथा देव और उनकी कविता, पृ0 236&amp;lt;/ref&amp;gt; यदि यह अनुमान सत्य हो तो [[प्राकृत]], अपभ्रंश आदि में यह छंद अवश्य मिलना चाहिए जो [[हिन्दी]] में रूपांतरित हो गया है। किन्तु ऐसे किसी छंद के दर्शन नहीं होते। यह संभव है कि तेईस वर्णों वाले संस्कृत के उपजाति छंद के 14 भेदों में से किसी एक का परिवर्तित रूप सवैया बन गया हो। सवैया 22 अक्षरों से लेकर 28 अक्षरों तक का होता है। उपजाति भी 22 अक्षरों का छंद है। अक्षरों का लघु-गुरु भाव-सवैया में भी परिवर्तन ग्रहण करता है। वैदिक छंदों का भी लौकिक संस्कृत छंदों तक आते बड़ा रूप परिवर्तन हुआ। हो सकता है कि उपजाति का परिवर्तित रूप सवैया हो जो सवाया बोलने से सवैया कहलाया। 'प्राकृतपेंगलम्' में भी सवैयों का रूप मिलता है किन्तु वहाँ उसे सवैया संज्ञा नहीं दी गई। 'प्राकृतपेंगलम्' का रचनाकाल संवत 1300 के आस-पास माना जाता है। अत: सवैया के प्रयोग का अनुमान 13वीं शताब्दी से लगाया जा सकता है। भक्तिकाल में गेय पदों का व्यवहार विशेष रूप से होने लगा। &lt;br /&gt;
*[[सूरदास]] के आविर्भाव तक हिन्दी में सवैयों का प्रचलन नहीं हुआ। &lt;br /&gt;
*[[जगनिक]] के [[आल्हाखण्ड|आल्हा]] खंड में कुछ सवैये अवश्य प्राप्त हैं, किन्तु उनकी भाषा से यही अनुमान होता है किये बाद में क्षेपक रूप में आए। प्रामाणिक रूप से इस छंद का प्रयोग [[अकबर]] के काल से प्रारंभ होता है। &lt;br /&gt;
*[[नरोत्तमदास|पं. नरोत्तमदास]] का 'सुदामा चरित्र' सवैयों और दोहों में ही लिखा गया है। &lt;br /&gt;
*[[तुलसीदास]] ने '[[कवितावली]]' में इन्हीं छंदों का आश्रय लिया है। &lt;br /&gt;
*[[केशव कवि|केशवदास]] की 'रामचंद्रिका' में भी सवैये काफ़ी मिलते हैं। &lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान ने भक्ति काल की पद परंपरा से हटकर सवैया छंद को अपनाया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
====घनाक्षरी====&lt;br /&gt;
घनाक्षरी या कवित्त के प्रथम दर्शन भक्तिकाल में होते हैं। हिन्दी में घनाक्षरी वृत्तों का प्रचलन कब से हुआ, इस विषय में निश्चित रूप से कहना कठिन है। &lt;br /&gt;
*[[चंदबरदाई]] के [[पृथ्वीराज रासों]] में दोहा तथा छप्पय छंदों की प्रचुरता है। सवैया और घनाक्षरी का वहाँ भी प्रयोग नहीं मिलता। प्रामाणिक रूप से घनाक्षरी का प्रयोग [[अकबर]] के काल में मिलता है। घनाक्षरी छंद में मधुर भावों की अभिव्यक्ति उतनी सफलता के साथ नहीं हो सकती जितनी ओजपूर्ण भावों की। &lt;br /&gt;
*रसखान ने छंद की प्रवृत्ति का विचार न करते हुए श्रृंगार तथा भक्ति रस के लिए इस छंद का प्रयोग किया और लय तथा शब्दावली के आधार पर इसे भावानुकूल बना लिया।&lt;br /&gt;
====सोरठा====&lt;br /&gt;
यह अर्द्ध सम मात्रिक छंद है। दोहा छंद का उलटा होता है। इसमें 25-23 मात्राएं होती हैं। रसखान के काव्य में चार&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77,98,123,152&amp;lt;/ref&amp;gt; सोरठे मिलते हैं। &lt;br /&gt;
प्रीतम नंदकिशोर, जा दिन ते नैननि लग्यौ।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
मनभावन चित चोर, पलक औट नहि सहि सकौं॥&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 77&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इस प्रकार रसखान के काव्य में कवित्त, सवैया, दोहा, सोरठा आदि छंद प्रयुक्त हुए हैं। &lt;br /&gt;
*इनके अतिरिक्त एक धमार सारंग, राग पद में भी मिलता है। &lt;br /&gt;
*रसखान के छंद कोमल कांत पदावली से युक्त हैं। उनमें संगीतात्मकता है। दोहा जैसे छोटे छंद में गूढ़ तथ्यों का निरूपण उनकी प्रतिभा का परिचायक है। छंदों में अंत्यानुप्रास का सफल निर्वाह हुआ है। साथ ही छंद, भाव तथा रसानुकूल हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छंद और शब्द स्वरूप विपर्यय==&lt;br /&gt;
काव्य में सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए तथा छंदानुरोध पर प्राय: कवि शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा करते हैं रसखान ने भी काव्य चमत्कार एवं छंद की मात्राओं के अनुरोध पर शब्दों के स्वरूप को बदला है—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#झलकैयत, तुलैयत, ललचैयत, लैयत&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 61&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से झलकाना, तुलाना, ललचाना, लाना शब्दों से। &lt;br /&gt;
#पग पैजनी बाजत पीरी कछौटी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 21&amp;lt;/ref&amp;gt;-कृष्ण की वय की लघुता के आग्रह, स्वाभाविकता एवं सौंदर्य लाने के लिए कछौटा से कछौटी। &lt;br /&gt;
#टूटे छरा बछरादिक गौधन&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर तथा बछरा से शब्द साम्य के लिए छल्ला से छरा। &lt;br /&gt;
#मोल छला के लला ने बिकेहौं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 44&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला के आग्रह से छला। &lt;br /&gt;
#मीन सी आंखि मेरी अंसुवानी रहैं&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 74&amp;lt;/ref&amp;gt;- आंसुओं से भरी रहने के अर्थ में माधुर्य लाने के लिए आंसू से अंसुवानी। &lt;br /&gt;
#मान की औधि घरी&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 115&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंद की मात्रा के आग्रह से अवधि से औधि। &lt;br /&gt;
#पांवरिया, भांवरिया, डांवरिया, सांवरिया, बावरिया&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 141&amp;lt;/ref&amp;gt;- पौरी, भौंरी, सांवरे, बावरी आदि से छंदानुरोध पर पांवरिया, भांवरिया बना लिया गया। &lt;br /&gt;
#लकुट्टनि, भृकुट्टनि, उघुट्टनि, मुकुट्टनि&amp;lt;ref&amp;gt;सुजान रसखान, 165&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदाग्रह से लकुटी, भृकुटी, मुकुट आदि शब्दों से बनाया। &lt;br /&gt;
#हम हैं वृषभानपुरा की लली&amp;lt;ref&amp;gt;दानलीला, 3&amp;lt;/ref&amp;gt;- लला (पुत्र) के जोड़ पर पुत्री के अर्थ में लली शब्द का प्रयोग हुआ है। &lt;br /&gt;
#फोरि हौ मटूकी माट&amp;lt;ref&amp;gt; दानलीला, 6&amp;lt;/ref&amp;gt;- छंदानुरोध पर मटुकी से मटूकी। &lt;br /&gt;
#ज्ञानकर्म 'रु'&amp;lt;ref&amp;gt;प्रेम वाटिका, 12&amp;lt;/ref&amp;gt; उपासना, सब अहमिति को मूल- यहाँ छंदानुरोध पर अरु से 'रु' किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रसखान के काव्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ उन्होंने छांदिक सौंदर्य के लिए शब्दों के रूप में परिवर्तन किया है। किंतु इस शब्द-विपर्यय में कहीं भी अस्वाभाविकता के दर्शन नहीं होते। न ही शब्द नट की कला की भांति रूप बदलते हैं। कहीं-कहीं तो उन्होंने शब्दों को इस प्रकार संजोया है कि स्वाभाविकता के दर्शनों के साथ भाव-सौंदर्य भी दिखाई देता है। '''मोर, पंखा, मुरली, बनमाल लखें हिय को हियरा उमह्यौरी''', यहाँ मसृणता लाने के लिए '''हियरा''' शब्द का प्रयोग किया गया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रसखान छंद योजना में पूर्ण सफल हैं। अंत्यानुप्रास के सुंदर स्वरूप को भी उन्होंने अपने छंदों में स्थान दिया है। साथ ही उनमें [[संगीत]] की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है।&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
	</entry>
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		<title>मुम्बई की जलवायु</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81&amp;diff=167970"/>
		<updated>2011-06-04T12:35:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[मुंबई]] की जलवायु गर्म और आर्द्र है। यहाँ चार ॠतुएं हैं। &lt;br /&gt;
*दिसंबर से फ़रवरी तक सर्दी और मार्च से मई तक गर्मी का महीना रहता है। &lt;br /&gt;
*दक्षिण-पश्चिम में मॉनसूनी हवाओं द्वारा होने वाली [[वर्षा]] जून से सितंबर तक होती है और इसके बाद उत्तर मॉनसून काल आता है, जो अक्टूबर-नवंबर तक रहता है। &lt;br /&gt;
*इस काल में मौसम फिर से गर्म हो जाता है। &lt;br /&gt;
*औसत मासिक तापमान मई में 33 डिग्री से. से जनवरी में 19 डिग्री से. तक होता है। &lt;br /&gt;
*औसत वार्षिक वर्षा 1,800 मिमी है, जिसमें से औसतन 610 मिमी. वर्षा सिर्फ़ जुलाई के महीने में होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:मुम्बई]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>दिल्ली के बाग़-बग़ीचे</title>
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		<updated>2011-06-04T12:20:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+दिल्ली के बाग़-बग़ीचों की सूची &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
*अजमल ख़ान पार्क&lt;br /&gt;
*बुद्ध जयंती पार्क &lt;br /&gt;
*सेंट्रल पार्क&lt;br /&gt;
*इंडियागेट चिल्ड्रन पार्क&lt;br /&gt;
*ज़िला पार्क (हिरण पार्क) &lt;br /&gt;
*जहाँपनाह सिटी फोरेस्ट &lt;br /&gt;
*जनक पार्क&lt;br /&gt;
*कालकाजी ज़िला पार्क&lt;br /&gt;
*कमला नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*लोदी गार्डन&lt;br /&gt;
*महाराजा सूरजमल पार्क&lt;br /&gt;
*महावीर जयंती पार्क&lt;br /&gt;
*महिला पार्क &lt;br /&gt;
*मोतिया खान पार्क&lt;br /&gt;
*मुग़ल गार्डन &lt;br /&gt;
*नांगिया पार्क&lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय गुलाब बगीचा&lt;br /&gt;
*नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*नेताजी सुभाष पार्क&lt;br /&gt;
*ओखला पार्क&lt;br /&gt;
*क्यूडिशिया गार्डन &lt;br /&gt;
*रोज़ गार्डन&lt;br /&gt;
*रौशनाआरा गार्डन &lt;br /&gt;
*सत्य पार्क&lt;br /&gt;
*शास्त्री पार्क &lt;br /&gt;
*शिवाजी पार्क&lt;br /&gt;
*श्री नागेश पार्क &lt;br /&gt;
*सुंदर नर्सरी&lt;br /&gt;
*टैगोर पार्क&lt;br /&gt;
*तालकटोरा गार्डन&lt;br /&gt;
*तिमैया पार्क&lt;br /&gt;
*यमुना नदी के सामने पार्क&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
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[[Category:दिल्ली]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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	<entry>
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		<title>दिल्ली की बाग़-बग़ीचे</title>
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		<updated>2011-06-04T12:05:28Z</updated>

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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<updated>2011-06-04T12:05:28Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+दिल्ली के बाग़-बग़ीचों की सूची &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
*अजमल ख़ान पार्क&lt;br /&gt;
*बुद्ध जयंती पार्क &lt;br /&gt;
*सेंट्रल पार्क&lt;br /&gt;
*इंडियागेट चिल्ड्रन पार्क&lt;br /&gt;
*ज़िला पार्क (हिरण पार्क) &lt;br /&gt;
*जहाँपनाह सिटी फोरेस्ट &lt;br /&gt;
*जनक पार्क&lt;br /&gt;
*कालकाजी ज़िला पार्क&lt;br /&gt;
*कमला नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*लोदी गार्डन&lt;br /&gt;
*महाराजा सूरजमल पार्क&lt;br /&gt;
*महावीर जयंती पार्क&lt;br /&gt;
*महिला पार्क &lt;br /&gt;
*मोतिया खान पार्क&lt;br /&gt;
*मुग़ल गार्डन &lt;br /&gt;
*नांगिया पार्क&lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय गुलाब बगीचा&lt;br /&gt;
*नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*नेताजी सुभाष पार्क&lt;br /&gt;
*ओखला पार्क&lt;br /&gt;
*क्यूडिशिया गार्डन &lt;br /&gt;
*रोज़ गार्डन&lt;br /&gt;
*रौशनाआरा गार्डन &lt;br /&gt;
*सत्य पार्क&lt;br /&gt;
*शास्त्री पार्क &lt;br /&gt;
*शिवाजी पार्क&lt;br /&gt;
*श्री नागेश पार्क &lt;br /&gt;
*सुंदर नर्सरी&lt;br /&gt;
*टैगोर पार्क&lt;br /&gt;
*तालकटोरा गार्डन&lt;br /&gt;
*तिमैया पार्क&lt;br /&gt;
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		<title>दिल्ली के बाग़-बग़ीचे</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+दिल्ली के बाग़-बग़ीचों की सूची &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
*अजमल ख़ान पार्क&lt;br /&gt;
*बुद्ध जयंती पार्क &lt;br /&gt;
*सेंट्रल पार्क&lt;br /&gt;
*इंडियागेट चिल्ड्रन पार्क&lt;br /&gt;
*ज़िला पार्क (हिरण पार्क) &lt;br /&gt;
*जहाँपनाह सिटी फोरेस्ट &lt;br /&gt;
*जनक पार्क&lt;br /&gt;
*कालकाजी ज़िला पार्क&lt;br /&gt;
*कमला नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*लोदी गार्डन&lt;br /&gt;
*महाराजा सूरजमल पार्क&lt;br /&gt;
*महावीर जयंती पार्क&lt;br /&gt;
*महिला पार्क &lt;br /&gt;
*मोतिया खान पार्क&lt;br /&gt;
*मुग़ल गार्डन &lt;br /&gt;
*नांगिया पार्क&lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय गुलाब बगीचा&lt;br /&gt;
*नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*नेताजी सुभाष पार्क&lt;br /&gt;
*ओखला पार्क&lt;br /&gt;
*क्यूडिशिया गार्डन &lt;br /&gt;
*रोज़ गार्डन&lt;br /&gt;
*रौशनाआरा गार्डन &lt;br /&gt;
*सत्य पार्क&lt;br /&gt;
*शास्त्री पार्क &lt;br /&gt;
*शिवाजी पार्क&lt;br /&gt;
*श्री नागेश पार्क &lt;br /&gt;
*सुंदर नर्सरी&lt;br /&gt;
*टैगोर पार्क&lt;br /&gt;
*तालकटोरा गार्डन&lt;br /&gt;
*तिमैया पार्क&lt;br /&gt;
*यमुना नदी के सामने पार्क &lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>साँचा:दिल्ली बाग-बगीचे सूची</title>
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		<updated>2011-06-04T11:54:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: हिना गोस्वामी (वार्ता) द्वारा किए बदलाव 167930 को पूर्व&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:25%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
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'''दिल्ली के बाग़-बग़ीचों की सूची '''&lt;br /&gt;
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|}&lt;br /&gt;
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|&lt;br /&gt;
*अजमल ख़ान पार्क&lt;br /&gt;
*बुद्ध जयंती पार्क &lt;br /&gt;
*सेंट्रल पार्क&lt;br /&gt;
*इंडियागेट चिल्ड्रन पार्क&lt;br /&gt;
*ज़िला पार्क (हिरण पार्क) &lt;br /&gt;
*जहाँपनाह सिटी फोरेस्ट &lt;br /&gt;
*जनक पार्क&lt;br /&gt;
*कालकाजी ज़िला पार्क&lt;br /&gt;
*कमला नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*लोदी गार्डन&lt;br /&gt;
*महाराजा सूरजमल पार्क&lt;br /&gt;
*महावीर जयंती पार्क&lt;br /&gt;
*महिला पार्क &lt;br /&gt;
*मोतिया खान पार्क&lt;br /&gt;
*मुग़ल गार्डन &lt;br /&gt;
*नांगिया पार्क&lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय गुलाब बगीचा&lt;br /&gt;
*नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*नेताजी सुभाष पार्क&lt;br /&gt;
*ओखला पार्क&lt;br /&gt;
*क्यूडिशिया गार्डन &lt;br /&gt;
*रोज़ गार्डन&lt;br /&gt;
*रौशनाआरा गार्डन &lt;br /&gt;
*सत्य पार्क&lt;br /&gt;
*शास्त्री पार्क &lt;br /&gt;
*शिवाजी पार्क&lt;br /&gt;
*श्री नागेश पार्क &lt;br /&gt;
*सुंदर नर्सरी&lt;br /&gt;
*टैगोर पार्क&lt;br /&gt;
*तालकटोरा गार्डन&lt;br /&gt;
*तिमैया पार्क&lt;br /&gt;
*यमुना नदी के सामने पार्क &lt;br /&gt;
|}&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:दिल्ली के साँचे]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>साँचा:दिल्ली बाग-बगीचे सूची</title>
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		<updated>2011-06-04T11:53:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+दिल्ली के बाग़-बग़ीचों की सूची &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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*अजमल ख़ान पार्क&lt;br /&gt;
*बुद्ध जयंती पार्क &lt;br /&gt;
*सेंट्रल पार्क&lt;br /&gt;
*इंडियागेट चिल्ड्रन पार्क&lt;br /&gt;
*ज़िला पार्क (हिरण पार्क) &lt;br /&gt;
*जहाँपनाह सिटी फोरेस्ट &lt;br /&gt;
*जनक पार्क&lt;br /&gt;
*कालकाजी ज़िला पार्क&lt;br /&gt;
*कमला नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*लोदी गार्डन&lt;br /&gt;
*महाराजा सूरजमल पार्क&lt;br /&gt;
*महावीर जयंती पार्क&lt;br /&gt;
*महिला पार्क &lt;br /&gt;
*मोतिया खान पार्क&lt;br /&gt;
*मुग़ल गार्डन &lt;br /&gt;
*नांगिया पार्क&lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय गुलाब बगीचा&lt;br /&gt;
*नेहरू पार्क&lt;br /&gt;
*नेताजी सुभाष पार्क&lt;br /&gt;
*ओखला पार्क&lt;br /&gt;
*क्यूडिशिया गार्डन &lt;br /&gt;
*रोज़ गार्डन&lt;br /&gt;
*रौशनाआरा गार्डन &lt;br /&gt;
*सत्य पार्क&lt;br /&gt;
*शास्त्री पार्क &lt;br /&gt;
*शिवाजी पार्क&lt;br /&gt;
*श्री नागेश पार्क &lt;br /&gt;
*सुंदर नर्सरी&lt;br /&gt;
*टैगोर पार्क&lt;br /&gt;
*तालकटोरा गार्डन&lt;br /&gt;
*तिमैया पार्क&lt;br /&gt;
*यमुना नदी के सामने पार्क &lt;br /&gt;
|}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>श्राद्ध करने का स्थान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=167920"/>
		<updated>2011-06-04T11:41:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (2|206-207)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि कर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए [[श्राद्ध]] से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। याज्ञवल्क्य&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्य (1|227)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षिप्त रूप से कहा है कि श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख (परा. मा. 1|2, पृ. 303; श्रा. प्र. पृ. 140; स्मृतिच., श्रा., पृ. 385)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है–'बैलों, [[हाथी|हाथियों]] एवं घोड़ों की पाठ पर, ऊँची भूमि या दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।' कूर्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्म पुराण (2|22|17)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है–वन, पुण्य पर्वत, तीर्थस्थान, मन्दिर–इनके निश्चित स्वामी नहीं होते और ये किसी की वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं हैं। यम ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई किसी अन्य की की भूमि पर अपने पितरों का श्राद्ध करता है तो उस भूमि के स्वामी के पितरों के द्वारा वह श्राद्ध-कृत्य नष्ट कर दिया जाता है। अत: व्यक्ति को पवित्र स्थानों, नदी-तटों और विशेषत: अपनी भूमि पर, पर्वत के पास के लता-कुंजों एवं पर्वत के ऊपर ही श्राद्ध करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोगजाश्वादिपृष्ठेषु कृत्रिमायां तथा भूवि। न कुर्याच्छ्राद्धमेतेषु पारक्यासु च भूमिषु।। शंख (परा. मा. 1|2, पृ. 303; श्रा. प्र., पृ. 140; स्मृतिच., श्रा. पृ. 395)। अटव्य: पर्वता: पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च। सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न ह्येतेषु परिग्रह:।। कूर्म. (2|22|17)। अपरार्क (पृ. 471), कल्पतरु (श्राद्ध, पृ. 115) एवं श्रा. प्र. (पृ. 148) ने ऐसा ही श्लोक यम से उद्धृत किया है–यम: परकीयप्रदेशेषु पितृणां निर्वपेत्तु य:। तदभूमिस्वामिपितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते।।......तस्माच्छ्राद्धनि देयानि पुण्येष्वायातनेषु च। नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ च प्रयत्नत:। उपह्वरनिकुंजेषु तथा पर्वतसानुषु।। अपरार्क (पृ. 471), कल्परु (श्राद्ध, पृ. 115)। मिलाइए कूर्म. (2|22|16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र (अध्याय 85)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कई पवित्र स्थलों का उल्लेख किया है और जोड़ा है–'इनमें एवं अन्य तीर्थों, बड़ी नदियों, सभी प्राकृतिक बालुका-तटों, झरनों के निकट, पर्वतों, कुंजों, वनों, निकुंजों एवं गोबर से लिपे सुन्दर स्थलों पर (श्राद्ध करना चाहिए)'। शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख (14|27-29)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि जो भी कुछ पवित्र वस्तु [[गया]], प्रभास, [[पुष्कर]], [[प्रयाग]], नैमिष वन ([[सरस्वती नदी]] पर), [[गंगा]], [[यमुना नदी|यमुना]] एवं पयोष्णी पर, अमरकंटक, [[नर्मदा नदी|नर्मदा]], [[काशी]], [[कुरुक्षेत्र]], भृगुतुंग, [[हिमालय]], सप्तवेणी, [[ऋषिकेश]] में दी जाती है, वह अक्षय होती है। ब्रह्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण (220|5-7)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी नदीतीरों, तालाबों, पर्वतशिखरों एवं पुष्कर जैसे पवित्र स्थलों को श्राद्ध के लिए उचित स्थान माना है। वायु पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायु पुराण (अध्याय 77)&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण (22)&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी श्राद्ध के लिए पूत स्थलों, देशों, पर्वतों की लम्बी सूचियाँ पायी जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{श्राद्ध}}                                             &lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:हिन्दू कर्मकाण्ड]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>श्राद्ध करने का स्थान</title>
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		<updated>2011-06-04T11:40:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (2|206-207)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि कर्...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
मनु&amp;lt;ref&amp;gt;मनु (2|206-207)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने व्यवस्था दी है कि कर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। याज्ञवल्क्य&amp;lt;ref&amp;gt;याज्ञवल्क्य (1|227)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने संक्षिप्त रूप से कहा है कि श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख (परा. मा. 1|2, पृ. 303; श्रा. प्र. पृ. 140; स्मृतिच., श्रा., पृ. 385)&amp;lt;/ref&amp;gt; का कथन है–'बैलों, [[हाथी|हाथियों]] एवं घोड़ों की पाठ पर, ऊँची भूमि या दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।' कूर्म पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;कूर्म पुराण (2|22|17)&amp;lt;/ref&amp;gt; में आया है–वन, पुण्य पर्वत, तीर्थस्थान, मन्दिर–इनके निश्चित स्वामी नहीं होते और ये किसी की वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं हैं। यम ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई किसी अन्य की की भूमि पर अपने पितरों का श्राद्ध करता है तो उस भूमि के स्वामी के पितरों के द्वारा वह श्राद्ध-कृत्य नष्ट कर दिया जाता है। अत: व्यक्ति को पवित्र स्थानों, नदी-तटों और विशेषत: अपनी भूमि पर, पर्वत के पास के लता-कुंजों एवं पर्वत के ऊपर ही श्राद्ध करना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;गोगजाश्वादिपृष्ठेषु कृत्रिमायां तथा भूवि। न कुर्याच्छ्राद्धमेतेषु पारक्यासु च भूमिषु।। शंख (परा. मा. 1|2, पृ. 303; श्रा. प्र., पृ. 140; स्मृतिच., श्रा. पृ. 395)। अटव्य: पर्वता: पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च। सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न ह्येतेषु परिग्रह:।। कूर्म. (2|22|17)। अपरार्क (पृ. 471), कल्पतरु (श्राद्ध, पृ. 115) एवं श्रा. प्र. (पृ. 148) ने ऐसा ही श्लोक यम से उद्धृत किया है–यम: परकीयप्रदेशेषु पितृणां निर्वपेत्तु य:। तदभूमिस्वामिपितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते।।......तस्माच्छ्राद्धनि देयानि पुण्येष्वायातनेषु च। नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ च प्रयत्नत:। उपह्वरनिकुंजेषु तथा पर्वतसानुषु।। अपरार्क (पृ. 471), कल्परु (श्राद्ध, पृ. 115)। मिलाइए कूर्म. (2|22|16)।&amp;lt;/ref&amp;gt; विष्णुधर्मसूत्र&amp;lt;ref&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र (अध्याय 85)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने कई पवित्र स्थलों का उल्लेख किया है और जोड़ा है–'इनमें एवं अन्य तीर्थों, बड़ी नदियों, सभी प्राकृतिक बालुका-तटों, झरनों के निकट, पर्वतों, कुंजों, वनों, निकुंजों एवं गोबर से लिपे सुन्दर स्थलों पर (श्राद्ध करना चाहिए)'। शंख&amp;lt;ref&amp;gt;शंख (14|27-29)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने लिखा है कि जो भी कुछ पवित्र वस्तु [[गया]], प्रभास, [[पुष्कर]], [[प्रयाग]], नैमिष वन ([[सरस्वती नदी]] पर), [[गंगा]], [[यमुना नदी|यमुना]] एवं पयोष्णी पर, अमरकंटक, [[नर्मदा नदी|नर्मदा]], [[काशी]], [[कुरुक्षेत्र]], भृगुतुंग, [[हिमालय]], सप्तवेणी, [[ऋषिकेश]] में दी जाती है, वह अक्षय होती है। ब्रह्मपुराण&amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्मपुराण (220|5-7)&amp;lt;/ref&amp;gt; ने भी नदीतीरों, तालाबों, पर्वतशिखरों एवं पुष्कर जैसे पवित्र स्थलों को श्राद्ध के लिए उचित स्थान माना है। वायु पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;वायु पुराण (अध्याय 77)&amp;lt;/ref&amp;gt; एवं मत्स्य पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;मत्स्य पुराण (22)&amp;lt;/ref&amp;gt; में भी श्राद्ध के लिए पूत स्थलों, देशों, पर्वतों की लम्बी सूचियाँ पायी जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{श्राद्ध}}                                             &lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]] [[Category:हिन्दू कर्मकाण्ड]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=167911</id>
		<title>मुम्बई की संरचना</title>
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		<updated>2011-06-04T11:30:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{पुनरीक्षण}} *मुम्बई के पुराने हिस्से ज़्यादा निर्...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
*[[मुम्बई]] के पुराने हिस्से ज़्यादा निर्मित हैं, लेकिन अधिक समृद्ध क्षेत्रों, जैसे मालाबार हिल में कुछ हरियाली है। &lt;br /&gt;
*यहाँ कई खुले मैदान व पार्क हैं। मुम्बई में लगातार शहरीकरण के इतिहास के कारण शहर के कई हिस्सों में झुग्गी बस्तियाँ बन गईं हैं। &lt;br /&gt;
*इस शहर में अनेक कारख़ानों, बढ़ते यातायात और निकट स्थित तेलशोधनशालाओं के कारण वायु एवं जल प्रदूषण ख़तरे के स्तर तक बढ़ गया है। &lt;br /&gt;
*शहर के दक्षिणी हिस्से में वित्तीय ज़िला (पुराने फ़ोर्ट बंबई के आसपास) स्थित है। &lt;br /&gt;
*सुदूर दक्षिण (कोलाबा के आसपास) और पश्चिम में नेताजी सुभाष चंद्र रोड (मॅरीन ड्राइव) तथा मालाबार हिल आवासी क्षेत्र हैं। &lt;br /&gt;
*फ़ोर्ट क्षेत्र के उत्तर में प्रमुख व्यापारिक ज़िला है, जो धीरे-धीरे वाणिज्यिक आवासीय क्षेत्र में शामिल हो रहा है। &lt;br /&gt;
*अधिकांश पुराने कारख़ाने इसी क्षेत्र में स्थित हैं। &lt;br /&gt;
*सुदूर उत्तर में आवासीय क्षेत्र हैं और उनके बाद हाल ही में विकसित औद्योगिक क्षेत्र और झुग्गी बस्तियों के इलाक़े हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*यहाँ आवास मुख्यतः निजी स्वामित्व वाले हैं, हालाँकि सार्वजनिक वित्त निगमों के ज़रिये सरकार द्वारा निर्मित कुछ सार्वजनिक आवास भी हैं। &lt;br /&gt;
*मुम्बई अत्यधिक भीड़-भाड़ वाला नगर है और अत्यधिक समृद्ध लोगों के अलावा बाक़ी लोगों के आवास के लिए कमी रहती है, इसी कारण वाणिज्यिक और औद्योगिक उद्यमों को मध्य स्तरीय व्यावसायिक, तकनीकी या प्रबंधकीय कर्मचारियों को आकर्षित करने में लगातार परेशानी हो रही है। &lt;br /&gt;
*आंतरिक क्षेत्र से अकुशल श्रमिकों का लगातार प्रवास हो रहा है और इस नगर में बेघर व निर्धन लोगों की संख्या बढ़ रही है। &lt;br /&gt;
*नगर के योजनाकार इसे रोकना चाहते हैं और उन्होंने उद्यमों को बंदरगाह के दूसरी ओर इससे लगे नगर नवी मुंबई में स्थापित करने का प्रयास किया है। &lt;br /&gt;
*इसके लिए नगर में औद्योगिक इकाइयों के विकास और पुरानी इकाइयों के विस्तार पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। &lt;br /&gt;
*लेकिन उद्यमियों द्वारा अपने उद्योग को देश के किसी अन्य हिस्से में ले जाने की धमकी के कारण इस प्रतिबंध का बड़े पैमाने पर उल्लंघन हो रहा है। &lt;br /&gt;
*मुम्बई का वास्तुशिल्प अलंकृत गॉथिक शैली का है, जो 18वीं और 19वीं शताब्दियों की विशेषता थी। &lt;br /&gt;
*यहाँ समकालीन अन्य रुपांकन (डिज़ाइन) भी है। &lt;br /&gt;
*पुराने प्रशासनिक और वाणिज्यिक भवनों के साथ गगनचुंबी व कॉन्क्रीट से बनी बहुमंज़िला इमारतें हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>मुम्बई की जलवायु</title>
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		<updated>2011-06-04T11:14:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: '{{tocright}} {{पुनरीक्षण}} ====&amp;lt;u&amp;gt;जलवायु&amp;lt;/u&amp;gt;==== *मुंबई की जलवायु गर्...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;जलवायु&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
*[[मुंबई]] की जलवायु गर्म और आर्द्र है। यहाँ चार ॠतुएं हैं। &lt;br /&gt;
*दिसंबर से फ़रवरी तक सर्दी और मार्च से मई तक गर्मी का महीना रहता है। &lt;br /&gt;
*दक्षिण-पश्चिम में मॉनसूनी हवाओं द्वारा होने वाली [[वर्षा]] जून से सितंबर तक होती है और इसके बाद उत्तर मॉनसून काल आता है, जो अक्टूबर-नवंबर तक रहता है। &lt;br /&gt;
*इस काल में मौसम फिर से गर्म हो जाता है। &lt;br /&gt;
*औसत मासिक तापमान मई में 33 डिग्री से. से जनवरी में 19 डिग्री से. तक होता है। &lt;br /&gt;
*औसत वार्षिक वर्षा 1,800 मिमी है, जिसमें से औसतन 610 मिमी. वर्षा सिर्फ़ जुलाई के महीने में होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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		<title>दिल्ली के सड़क मार्ग</title>
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		<updated>2011-06-04T10:56:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;हिना गोस्वामी: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Delhi-Bus.jpg|thumb|right|250px|दिल्ली की बस]]&lt;br /&gt;
*उत्तरी [[भारत]] के सभी बड़े शहरों के लिए [[दिल्ली]] से सीधी बस सेवा उपलब्ध है। &lt;br /&gt;
*पुरानी दिल्ली पास स्थित कश्मीरी गेट पर मुख्य बस स्टेंण्ड है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से [[हरियाणा]], [[पंजाब]], [[राजस्थान]], [[उत्तर प्रदेश]] एवं [[हिमाचल प्रदेश]] आदि के लिए बसें उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
*निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप आया हुआ सराय काले ख़ाँ बस स्टेण्ड से [[आगरा]], [[मथुरा]], [[वृन्दावन]], [[ग्वालियर]] एवं [[भरतपुर]] आदि के लिए बसें मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वर्धमान, [[वाराणसी]], [[इलाहाबाद]], [[कानपुर]] और आगरा के रास्ते [[कोलकता]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से [[सूरत]], [[अहमदाबाद]], [[उदयपुर]], [[अजमेर]] और [[जयपुर]] के रास्ते [[मुंबई]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
*राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से [[जालंधर]], [[लुधियाना]] और [[अंबाला]] होते हुए [[अमृतसर]] और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और [[मुरादाबाद]] के रास्ते [[लखनऊ]] से जुड़ी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{दिल्ली}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]][[Category:दिल्ली]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>हिना गोस्वामी</name></author>
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