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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>महाराष्ट्र</title>
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		<updated>2010-05-12T10:01:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|राजधानी=मुंबई&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=96879&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=315&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=308,000&lt;br /&gt;
|ज़िले=35&lt;br /&gt;
|महानगर=मुंबई&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=मुंबई, पुणे, नागपूर, औरंगाबाद, कोल्हापूर, नासिक, शोलापूर, अमरावती, सांगली, नांदेड&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=मराठी , हिन्दी , अंग्रेजी,&lt;br /&gt;
|स्थापना=1960/05/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=गेटवे ऑफ़ इन्डिया, अजंता-एलोरा केव्स, शनिवारवाडा, लाल महल, सिंहगढ़&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=गेटवे ऑफ़ इन्डिया, मडआईलॅन्ड, अजंता-एलोरा केव्स, मुंबई चौपाटी&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:922&lt;br /&gt;
|साक्षरता=76.9&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=एस एम कृष्णा&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=अशोक चव्हाण&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.maharashtra.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन=2010/05/07&lt;br /&gt;
|emblem=maharashtra-seal.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''महाराष्ट्र / Maharashtra'''&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
प्राचीन 16 महाजनपदों में अश्मक या अस्सक का स्थान आधुनिक [[अहमदनगर]] के आसपास का माना जाता है । सम्राट [[अशोक]] के शिलालेख भी [[मुंबई]] के निकट पाए गए हैं । महाराष्‍ट्र के पहले प्रसिद्ध शासक सातवाहन (ई.पू. 230 से 225 ई.) थे जो महाराष्ट्र राज्य के संस्‍थापक थे। उन्‍होंने अपने पीछे बहुत से साहित्यिक, कलात्‍मक तथा पुरातात्विक प्रमाण छोड़े हैं। उनके शासनकाल में मानव जीवन के हर क्षेत्र में भरपूर  प्रगति हुई। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Ajanta-Caves-1.jpg|thumb|[[अजंता की गुफ़ाएँ|अजंता की गुफ़ाओं]] का विश्व प्रसिद्ध भित्ति चित्र|left]]&lt;br /&gt;
इसके बाद वाकाटक आए, जिन्‍होंने भारतीय साम्राज्‍य की स्‍थापना की। उनके शासनकाल में महाराष्‍ट्र में शिक्षा, कला तथा धर्म सभी दिशाओं में अत्यधिक विकास हुआ। उनके शासन के दौरान ही 'अजंता की गुफाओं' में उच्‍च कोटि के भित्तिचित्र बनाए गए। वाकाटको के बाद कुछ समय के लिए 'कलचुरी वंश' ने शासन किया और फिर 'चालुक्‍य' सत्‍ता में आए। इसके बाद तटवर्ती इलाकों मे 'शिलाहारों' के अलावा महाराष्‍ट्र पर 'राष्‍ट्रकूट' तथा 'यादव' शासकों का नियंत्रण रहा। यादवों ने मराठी को शासन की भाषा बनाया और दक्षिण के एक बडे भाग पर अपना आधिपत्‍य स्थापित किया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
अलाउद्दीन ख़िलजी पहला मुस्लिम शासक था जिसने अपना राज्य दक्षिण में मदुरै तक फैला लिया था । उसके बाद मुहम्मद बिन तुग़लक (1325) ने अपनी राजधानी [[दिल्ली]] से हटाकर [[दौलताबाद]] कर ली । यह स्थान पहले देवगिरि नाम से प्रसिद्ध था और अहमदनगर के पास है । बहमनी शासकों ने महाराष्‍ट्र तथा इसकी संस्‍कृति को समन्वित किया, पर शिवाजी के कुशल नेतृत्‍व में महाराष्‍ट्र का सर्वांगीण विकास हुआ और यह एक अलग पहचान के साथ उभरकर सामने आया। शिवाजी ने स्‍वराज तथा राष्‍ट्रीयता की एक नई भावना पैदा की। उनकी प्रचंड शाक्ति ने मुग़लों को भारत के इस भाग में आगे नहीं बढ़ने दिया। पेशवाओं ने दक्षिण के पठार से लेकर पंजाब पर हमला बोल कर मराठाओं का आधिपत्‍य स्‍थापित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहमनी सल्तनत के टूटने पर यह प्रदेश गोलकुण्डा के शासन में आया और उसके बाद औरंगजेब का संक्षिप्त शासन रहा। इसके बाद मराठों की शक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई और अठारहवीं सदी के अन्त तक मराठा पूरे महाराष्ट्र में फैल गये थे और उनका साम्राज्य दक्षिण में कर्नाटक के दक्षिणी सिरे तक हो गया था । 1820 तक आते आते अंग्रेजों ने पेशवाओं को हरा दिया था और यह प्रदेश भी अंग्रेजी साम्राज्य का अंग बन गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्‍वतंत्रता संग्राम में महाराष्‍ट्र सबसे आगे था। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का जन्‍म भी यहीं हुआ। मुंबई तथा महाराष्‍ट्र के अन्‍य शहरों के अनगिनत नेताओं ने पहले तिलक और बाद में महात्‍मा गांधी के मार्गदर्शन में कांग्रेस के आंदोलन को आगे बढाया। गांधी जी ने भी अपने आंदोलन का केंद्र महाराष्‍ट्र को बनाया था और गांधी युग में राष्‍ट्रवादी देश की राजधानी सेवाग्राम थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाराष्ट्र  की स्थापना के पचास साल पूरे हो गये हैं। महाराष्ट्र और गुजरात का स्थापना दिवस 1मई को मनाया जाता है कभी ये दोनों राज्य मुंबई का हिस्सा थे। जब मुंबई राज्य से महाराष्ट्र और गुजरात के गठन का प्रस्ताव आया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुंबई को अलग केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की वकालत की। उनका तर्क था कि अगर मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी बने रहना है तो यह करना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु पंडित नेहरू की नहीं चली। देश के पहले वित्तमंत्री और वित्त विशेषज्ञ चिंतामणि देशमुख ने इसका प्रखर विरोध किया और इसी मुद्दे पर केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दे दिया। मुंबई को महाराष्ट्र में रखने के लिए आंदोलन चला जिसमें कुल 80 लोगों की आहुति हुई लेकिन आखिरकार मुंबई महाराष्ट्र का हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश को आजादी के ब मध्य बाद भारत के सभी मराठी भाषी स्थानों का समीकरण करके एक राज्य बनाने को लेकर बड़ा आंदोलन चला और 1 मई, 1960 को कोंकण, मराठवाडा, पश्चिमी महाराष्ट्र, दक्षिण महाराष्ट्र, उत्तर महाराष्ट्र (खानदेश) तथा विदर्भ, सभी संभागों को जोड़ कर महाराष्ट्र राज्य की स्थापना की गई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gateway-of-India-2.jpg|thumb|भारतीय प्रवेशद्वार (गेटवे ऑफ़ इन्डिया), मुम्बई&amp;lt;br /&amp;gt; Gateway of India, Mumbai]]&lt;br /&gt;
==महाराष्ट्र राज्य का गठन==&lt;br /&gt;
देश के राज्‍यों के भाषायी पुनर्गठन के फलस्‍वरूप 1 मई, 1960 को महाराष्‍ट्र राज्‍य का प्रशासनिक प्रादुर्भाव हुआ। यह राज्‍य आसपास के मराठी भाषी क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया, जो पहले चार अलग अलग प्रशासनों के नियंत्रण में था। इनमें मूल ब्रिटिश मुंबई प्रांत में शामिल दमन तथा गोवा के बीच का ज़िला, हैदराबाद के निज़ाम की रियासत के पांच ज़िले, मध्‍य प्रांत (मध्‍य प्रदेश) के दक्षिण के आठ ज़िले तथा आसपास की ऐसी अनेक छोटी-छोटी रियासतें शामिल थी, जो समीपवर्ती ज़िलों में मिल गई थी। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
महाराष्‍ट्र  भारत के उत्तर में बसा हुआ है और भौगोलिक दृष्टि से यह राज्‍य मुख्‍यत: पठारी है। महाराष्‍ट्र पठारों का पठार है। इसके उठे हुए पश्चिमी किनारे सहाद्री पहाडियों का निर्माण करते है और समुद्र तट के समानांतर हैं तथा इसकी ढलान पूर्व तथा दक्षिण पूर्व की ओर धीरे धीरे बढ़ती है। राज्‍य के उत्तरी भाग में सतपुड़ा की पहाडियां है, जबकि अजंता तथा सतमाला पहाडियां राज्‍य के मध्‍य भाग से होकर जाती है। अरब सागर महाराष्‍ट्र की पश्चिमी सीमा का प्रहरी है, जबकि गुजरात और मध्‍य प्रदेश इसके उत्तर में हैं। राज्‍य की पूर्वी सीमा पर छत्तीसगढ है और कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश इसके दक्षिण में है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
महाराष्ट्र की जनसंख्या सन 2001 में 96,752,247 थी, विश्व में केवल ग्यारह ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या महाराष्ट्र प्रदेश से ज़्यादा है। &lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
महाराष्‍ट्र के लगभग 65 प्रतिशत श्रमिक कृषि तथा संबंधित गतिविधियों पर निर्भर है। यहां की प्रमुख फ़सलें हैं- धान, ज्‍वार, बाजरा, गेहूं, तूर (अरहर), उडद, चना और दलहन। यह राज्‍य तिलहनों का प्रमुख उत्‍पादक है और मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन प्रमुख तिलहनी फ़सलें है। महत्‍वपूर्ण नकदी फ़सलें है कपास, गन्‍ना, हल्‍दी और सब्जियां। राज्‍य में 12.90 लाख हेक्‍टेयर क्षेत्र में विभिन्‍न प्रकार के फल, जैसे आम, केला, संतरा, अंगूर, काजू आदि की फ़सलें उगाई जाती है।&lt;br /&gt;
==उद्योग==&lt;br /&gt;
महाराष्‍ट्र को पूरे देश का औद्योगिक क्षमता का केंद्र माना जाता है और राज्‍य की राजधानी मुंबई देश की वित्‍तीय तथा वाणिज्यिक गतिविधियों का केंद्र है। राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था में औद्योगिक क्षेत्र का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। खाद्य उत्‍पाद, तंबाकू और इससे बनी चीजें, सूती कपडा, कपड़े से बना सामान, काग़ज और इससे बनी चीजें, मुद्रण और प्रकाशन, रबड, प्‍लास्टिक, रसायन व रासायनिक उत्‍पाद, मशीनें बिजली की मशीन, यंत्र व उपकरण तथा परिवहन उपकरण और उनके कल पुर्जे आदि का राज्‍य के औद्योगिक उत्‍पादन में महत्‍वपूर्ण योगदान है। वर्ष 2005-06 में औद्योगिक उत्‍पादन (निर्माण) वर्ष 2004-05 के मुकाबले 8.9 प्रतिशत अधिक रहा।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
जून 2005 के अंत तक 32 बड़ी, 178 मंझोली और राज्‍य के क्षेत्र की 2,274 लघु सिंचाई परियोजनाएं पूरी हो चुकी थीं इसके अलावा 21 बडी 39 मंझोली सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण कार्य जारी है। 2004 से 2005 में राज्‍य में कुल सिंचित क्षेत्र 36.36 लाख हेक्‍टेयर था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2004-05 में महाराष्‍ट्र की कुल स्‍थापित विद्युत उत्‍पादन क्षमता 12,909 मेगावाट थी। राज्‍य में प्‍लांट लोड फैक्‍टर (पी.एल.एफ) 81.6 प्रतिशत था और बिजली उत्‍पादन 68,507 करोड किलोवाट घंटा था।&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
'''सड़क''' मार्च 2005 तक राज्‍य में सड़कों की कुल लंबाई 2.29 लाख कि.मी. थी, जिसमें राष्‍ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 4, 367 कि.मी. प्रांतीय राजमार्गों की 33,406 कि.मी., प्रमुख ज़िला सड़कों की 48,824 कि.मी., अन्‍य ज़िला सड़कों की लंबाई 44,792 कि.मी. और ग्रामीण सड़कों की कुल लंबाई 97,913 कि.मी. थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रेलवे''' महाराष्‍ट्र में 5,527 कि.मी. रेल मार्ग है। इसमें से लगभग 78.6 प्रतिशत बड़ी रेल लाइनें, 7.8 प्रतिशत मीटर गेज तथा 13.6 प्रतिशत छोटी रेल लाइनें है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उड्डयन''' राज्‍य में कुल 24 हवाई अड्डे / हवाई पट्टियां है। इनमें से 17 महाराष्‍ट्र सरकार के नियंत्रण में है। चार हवाई अड्डे अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डा प्राधिकरण / भारतीय हवाई अड्डा प्राधिकरण के नियंत्रण में हैं, ज‍बकि बाकी तीन रक्षा मंत्रालय के अधीन है। राज्‍य सरकार के नियंत्रण वाले हवाई अड्डों पर अभी व्‍यावसायिक उड़ानों की सुविधा नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''बंदरगाह''' मुम्बंई प्रमुख बंदरगाह है। राज्‍य में दो बड़े और 48 छोटे अधिसूचित बंदरगाह हैं।&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्‍थल==&lt;br /&gt;
यहां के महत्‍वपूर्ण पर्यटन केंद्र है अजंता, एलोरा, एलिफेंटा, कन्‍हेरी और कारला गुफाएं, महाबलेश्‍वर, माथेरन और पंचगनी, जवाहर, मालशेजघाट, अंबोली, चिकलधारा और पन्‍हाला पर्वतीय स्‍थल। पंढरपुर, नाशिक, शिरडी, नांदेड, औधानागनाथ, त्रयंबकेवर, तुलजापुर, गणपतिपुले, भीमशंकर, हरिहरेश्‍वर, शेगाव, कोल्‍हापुर, जेजुरी तथा अंबजोगई  धार्मिक स्‍थान है।&lt;br /&gt;
==प्रमुख नगर==&lt;br /&gt;
भारत देश में महाराष्ट्र सबसे बड़ा औद्योगिक प्रान्त है। मुंबई, पुणे, औरंगाबाद, नागपुर और नाशिक महाराष्ट्र के बडे शहरों में गिने जाते हैं। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा मराठी है और यहाँ के लोगों को महाराष्ट्रीयन कहा जाता है। पहाड़ी नगरों में 'महाबलेश्वर' और 'माथेरान' काफ़ी प्रसिद्ध है। छुट्टियों के समय इन नगरों में बहुत ही भीड़ होती है और मौसम भी बहुत सुहावना होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धार्मिक नगर'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
*धार्मिक नगरों में नाशिक के काफ़ी नज़दीक शिर्डी नगर है। इस नगर का साईं बाबा का मन्दिर बहुत ही प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
*इसी तरह मुंबई का 'महालक्ष्मी मन्दिर' और पुणे के 'दगडूशेठ गणपति मन्दिर' बहुत ही अधिक ख्याति प्राप्त हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मुंबई'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुंबई पूर्वी न्यूयॉर्क के नाम से भी विख्यात है। मुंबई में चौपाटी, गेटवे ऑफ़ इन्डिया , प्रिन्स वेल्स म्युज़ियम, एलिफ़ेन्टा केव्स और मडआईलॅन्ड बहुत ही प्रसिद्ध है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पुणे'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुणे महाराष्ट्र का संस्कृति प्रधान नगर माना जाता है। शनिवारवाडा, लाल महल, सिंहगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थान हैं। पुणे का आई॰टी॰ पार्क और लक्ष्मी रोड काफ़ी जाना माना है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''औरंगाबाद'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औरंगाबाद नगर महाराष्ट्र के मध्य भाग में स्थित है। यहां के अजंता-एलोरा केव्स विश्व प्रसिद्ध हैं। इन गुफाओं में बुद्ध के तक्षण बनाये गये हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नागपुर'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागपुर एक बहुत ही सुन्दर शहर है और यहा के संतरे पूरी दुनिया में जाने माने हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नाशिक'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाशिक एक काफ़ी सुन्दर शहर है और यहां का मौसम सुहाना है। नाशिक के कालाराम और दूसरे मन्दिर विख्यात है और लोग [[गोदावरी नदी]] में नहाना पवित्र समझते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{महाराष्ट्र प्रदेश के ज़िले}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राज्य_और_केन्द्र_शासित_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाराष्ट्र]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>हैदराबाद</title>
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		<updated>2010-05-10T12:27:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Charminar-Hyderabad-1.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
'''हैदराबाद / Hyderabad''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिण पू्र्वी भारत में स्थित हैदराबाद शहर [[आंध्र प्रदेश]] राज्य की राजधानी है। यह दक्कन के पठार पर [[मूसा नदी]] के किनारे स्थित है। हैदराबाद [[गोलकुंडा]] के कुतुबशाही सुल्तानों द्वारा बसाया गया था, जिनके शासन में [[गोलकुंडा]] ने वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, जहां केवल उत्तर में [[मग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] ही उससे आगे था।&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा का पुराना क़िला राज्य की राजधानी के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ और इसलिए लगभग 1591 में कुतुबशाही में पांचवें [[मुहम्म्द कुली कुतुबशाह]] ने पुराने गोलकुंडा से कुछ मील दूर मूसा नदी के किनारे हैदराबाद नामक नया नगर बनाया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चार खुली मेहराबों और चार मीनारों वाली भारतीय-अरबी शैली की भव्य वास्तुशिल्पीय रचना चारमीनार कुतुबशाही काल की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यह वह केंद्र है, जिसके आसपास शहर की योजना बनाई गई मक्का मस्जिद 10 हज़ार लोगो को समाहित कर सकती है। हैदराबाद अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन यह गौरव केवल कुतुबशाही के दिनों तक ही क़ायम रहा। मुग़लों ने 1685 में हैदराबाद पर विजय प्राप्त कर ली। मुग़ल आधिपत्य के परिणामस्वरूप लूटमार और विध्वंस हुआ और इसके बाद यूरोपीय शक्तियों का भारत के मामलों में हस्तक्षेप आरंभ हुआ। 1724 में दक्कन के मुग़ल सूबेदार [[आसफ़जाह]] निज़ाम-उल-मुल्क ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दक्कन का यह राज्य, जिसकी राजधानी हैदराबाद थी, हैदराबाद कहलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के दौरान, आसफ़जाहियों ने पुराने शहर के उत्तर में मूसा नदी के पार विस्तार कर पुनः शक्ति एकत्रित करना आरंभ किया। उत्तर की ओर [[सिकंदराबाद]] एक ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित हुआ, जो [[हुसैन सागर झील]] पर बने एक मील लंबे बंद (तटबंध) द्वारा हैदराबाद से जुड़ा था। यह बंद एक विहारस्थल का कार्य करता है और नगर का गौरव है। हिंदू व मुस्लिम शैलियों का सुंदर अम्मिश्रण प्रदर्शित करने वाली कई नई संरचनाएं बाद में बनाई गईं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निज़ामों के शासन में [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] भाईचारे से रहते थे, यद्यपि भारत की आज़ादी के तुरंत बाद एक कट्टर मुस्लिम गुट रज़ाकारों ने राज्य और नगर में तनाव पैदा कर दिया था।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारत में विलय==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और आख़िरकार हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 1956 में राज्य का विभाजन हुआ; इसमें तेलुगु भाषी इलाक़ों को हैदराबाद के रूप में राजधानी वाले आंध्र प्रदेश राज्य के गठन क लिए भूतपूर्व आंध्र राज्य में मिला लिया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==व्यापार और परिवहन विशेषता==&lt;br /&gt;
हैदराबाद व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बन गया है। यहां सिगरेट व कपड़ा उत्पादन होता है और सेवा उद्योगों का विस्तार किया गया है। नगर में परिवहन की भी अच्छी सुविधाएं हैं। [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]] और [[बंगलोर]] के लिए रेल व वायु सेवाएं हैं, साथ ही ऐतिहासिक स्थलों, [[अंजता]] और [[एलोरा]] से जुड़े [[औरंगाबाद]] के लिए भी टैक्सियां, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, निजी वाहन और बस व रेल सेवाएं स्थानीय परिवहन उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
आरभ में हैदराबाद में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालय थे। लेकिन 1918 में निज़ाम ने उस्मानिया विश्वाविद्यालय की स्थापना की और अब यह भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है। हैदराबाद विश्वविद्यालयों की स्थापना 1974 में हुई। एक कृषि विश्वविद्यालय और कई ग़ैर सरकारी संस्थान, जैसे अमेरिकन स्टडीज़ रिसर्च सेंटर और जर्मन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्च भी हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकुंडा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
हैदराबाद में सार्वजनिक व निजी सांस्कृतिक संगठन बड़ी संख्या में हैं, जैसे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त नाट्य, साहित्य व ललित कला अकादमियां। सार्वजनिक सभागृह रबींद्र भारती नृत्य व संगीत महोत्सवों के लिए मंच प्रदान करता है और सालारजंग संग्रहालय में दुर्लभ वस्तुओं का संगृह है, जिनमें संगेयशब, आभूषण, चित्र और फ़र्नीचर शामिल हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आमोद-प्रमोद स्थल==&lt;br /&gt;
सार्वजनिक उद्यान प्रमुख मनोरंजन सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। कई पार्कों और सिकंदराबाद में बड़े परेड ग्राउंडो में खेल व मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर व विश्वविद्यालय का वानस्पातिक उद्यान लोकप्रिय आमोद स्थल हैं। हैदराबाद फुट्बॉल और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक रेसकोर्स भी है। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हैदराबाद की जनसंख्या (2001) न॰नि॰ क्षेत्र 34,49,878 ज़िला कुल 36,86,460 है।&lt;br /&gt;
==रियासत== &lt;br /&gt;
दक्षिण-मध्य भारत का पूर्व सामंती राज्य, निज़ाम-उल-मुल्क (मीर क़मरूद्दिन) द्वारा स्थापित, जो 1713 से 1721 तक दक्कन में लगातार मुग़ल बादशाहों के सूबेदार रहे। उन्हें 1724 यह पद फिर से मिला और उन्होंने आसफ़जाह की उपाधि ग्रहण की। वस्तुतः इस समय तक वह स्वतंत्र हो गए थे। उन्होंने हैदराबाद में निज़ामशाही की स्थापना की। 1748 में उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों उर फ़्रांसीसियों  ने उत्तराधिकार के लिए हुए युद्धों में भाग लिया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश आधिपत्य==&lt;br /&gt;
अस्थायी रूप से मैसूर के शासक हैदर अली के साथ रहने के बाद 1767 में निज़ाम अली ने '''मसुलीपट्टनम की संधि''' (1768) द्वारा ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार कर लिया।1778 में उनके राज्य में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट और सहायक सेना तैनात की गई।1795 में निज़ाम अली ख़ाँ अपने कुछ क्षेत्र, जिनमें [[बरार]] के कुछ हिस्से भी शामिल थे। मराठों के हाथ हार गए। जब उन्होंने सहायता के लिए फ़्रांसीसियों की ओर देखा, तो अंग्रेज़ों ने उनके राज्य में तैनात अपनी सहायक सेना को बढ़ा दिया। [[टीपू सुल्तान]] के विरूद्ध 1792 और 1799 में अंग्रेज़ों के सहयोगी के रूप में जीत में निज़ाम को मिले क्षेत्र इस सेना का ख़र्च चलाने के लिए अंग्रेज़ों को दे दिए गए।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==निज़ाम अली का समझौता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Charminar-Hyderabad-2.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
तीन ओर (उत्तर, दक्षिण और पूर्व) से ब्रिटिश आधिपत्य वाले अथवा उन पर निर्भर क्षेत्रों से घिरे होने से निज़ाम अली ख़ां 1798 में ब्रिटिश शासन के साथ एक समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस समझौता के अनुसार उन्होंने अपना राज्य अंग्रेज़ों के संरक्षण में दे दिया। इस प्रकार वह ऐसा करने वाले पहले शासक बने, लेकिन अंदरूनी मामलों में उनकी स्वतंत्रता की पुष्टि की गई। निज़ाम अली ख़ाँ दूसरे और तीसरे मराठा युद्धों (1803-1805, 1815-1819) में अंग्रेज़ों के सहयोगी थे और निज़ाम नसीरूद्दौला व हैदराबाद का सैनिक दस्ता भारतीय ग़दर (1857-58) के दौरान ब्रिटिश शासन के वफ़ादार रहे। 1918 में निज़ाम मीर उस्मान अली को ‘हिज एक्ज़ॉल्टेड हाइनेस’ की उपाधि दी गई, यद्यपि भारत की ब्रिटिश सरकार ने कुशासन की स्थिति में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखा। हैदराबाद एक शांत, लेकिन कुछ पिछड़ा हुआ सामंती राज्य बना रहा, जबकि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन==&lt;br /&gt;
1947 में भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन होने पर निज़ाम ने भारत में शामिल होने की अपेक्षा स्वतंत्र रहना चाहा। 29 नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक साल की अवधि का यथास्थिति क़ायम रखने का समझौता किया और भारतीय सेनाएं हटा ली गईं। समस्याएं बनी रहीं, लेकिन निज़ाम ने अपनी स्वायत्ता मनवाने के प्रयास जारी रखे। भारत ने ज़ोर किया कि हैदराबाद भारत में शामिल हो जाए। निज़ाम ने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI के समक्ष गुहार की। 13 सितबर 1948 को भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण कर दिया और चार दिन के अंदर इस राज्य ने स्वतंत्र भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। कुछ समय के लिए सैनिक व अस्थाई नागरिक सरकारों के बाद राज्य में मार्च 1952 में एक लोकप्रिय सरकार व विधानसभा का गठन किया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त==&lt;br /&gt;
1 नवंबर 1956को हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त हो गया। इसे (भाषाई आधार पर) आंध्र प्रदेश, जिसने तेलगांना ज़िले लिए; और बंबई (वर्तमान मुंबई) राज्यों में विभाजित कर दिया गया। बरार को पहले ही मध्य प्रदेश में मिला लिया गया था। हैदराबाद के निज़ाम एक ऐसे मुस्लिम वंश का हिस्सा थे, जिन्होंने बहुल आबादी पर शासन किया। यह इस वंश के शासक के लिए गर्व की बात है की उनकी हिंदू प्रजा ने इन वर्षों में मराठों, [[मैसूर]] अथवा यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर मुस्लिम राजशाही को हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perorw=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Charminar-Hyderabad-3.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकुंडा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Statue-Hyderabad.jpg|[[बुद्ध]], हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha, Hyderabad&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>गोलकुंडा</title>
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		<updated>2010-05-10T12:26:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''गोलकुंडा / Golkunda&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकुंडा किला, [[हैदराबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
गोलकुंडा एक क़िला व भग्नशेष नगर है। यह [[आंध्र प्रदेश]] का एक नगर है। [[हैदाराबाद]] से पांच मील पश्चिम की ओर [[बहमनी वंश]] के सुल्तानों की राजधानी गोलकुंडा के विस्तृत खंडहर स्थित हैं। गोलकुंडा का प्राचीन दुर्ग वारंगल के हिंदू राजाओं ने बनवाया था। ये देवगिरी के यादव तथा वारंगल के ककातीय नेरशों के अधिकार में रहा था। इन राज्यवंशों के शासन के चिह्न तथा कई खंडित अभिलेख दुर्ग की दीवारों तथा द्वारों पर अंकित मिलते हैं। 1364 ई0 में वारंगल नरेश ने इस क़िले को बहमनी सुल्तान [[महमूद शाह]] के हवाले कर दिया था। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
इतिहासकार फरिश्ता लिखता है कि बहमनी वंश की अवनति के पश्चात 1511 ई0 में गोलकुंडे के प्रथम सुल्तान ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। किंतु क़िले के अन्दर स्थित जामा मसजिद के एक फारसी अभिलेख से ज्ञात होता है कि 1518 ई0 में भी गोलकुंडे का संस्थापक [[सुल्तान कुलोकुतुब]], [[महमूद शाह बहमनी]] का सामन्त था। &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
गोलकुंडे का किला 400 फुट ऊंची कणाश्म (ग्रेनाइट) की पहाड़ी पर स्थित है। इसके तीन परकोटे हैं और इसका परिमाप सात मील के लगभग है। इस पर 87 बुर्ज बने हैं। दुर्ग के अन्दर कुतुबशाही बेगमों के भवन उल्लेखनीय है। इनमें तारामती, पेमामती, हयात बख्शी  बेगम और भागमती (जो हैदराबाद या भागनगर के संस्थापक कुली कुतुब शाह की प्रेयसी थी) के महलों से अनेक मधुर आख्यायिकी का संबंध बताया जाता है। क़िले के अन्दर नौमहल्ला नामक अन्य इमारतें हैं। जिन्हें हैदराबाद के निजामों ने बनवाया था। इनकी मनोहारी बाटिकाएँ तथा सुन्दर जलाशय इनके सौंदर्य को द्विगुणित कर देते हैं। क़िले से तीन फलांग पर इब्राहिम बाग में सात कुतुबशाही सुल्तानों के मक़्बरे हैं। जिनके नाम हैं-&lt;br /&gt;
*कुली कुतुब, &lt;br /&gt;
*सुभान कुतुब, &lt;br /&gt;
*जमशेदकुली, &lt;br /&gt;
*इब्राहिम, &lt;br /&gt;
*मु॰ कुलीकुतुब, &lt;br /&gt;
*मु॰ कुतुब और &lt;br /&gt;
*अब्दुल्ला कुतुबशाह। &lt;br /&gt;
प्रेमावती व हयात बख्शी बेगमों के मक़्बरे भी इसी उद्यान के अन्दर हैं। इन मक़्बरों के आधार वर्गाकार हैं तथा इन पर गुंबदों की छतें हैं। चारों ओर वीथीकाएँ बनी हैं जिनके महाराब नुकीले हैं। ये वीथीकाएँ कई स्थानों पर दुमंजिली भी हैं। मक़्बरों के हिंदू वास्तुकला के विशिष्ट चिह्न कमल पुष्प तथा पत्र और कलियाँ, श्रंखलाएँ, प्रक्षिप्त छज्जे, स्वस्तिकाकार स्तंभशीर्ष आदि बने हुए हैं। गोलकुंडा दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वार में यदि जोर से करतल ध्वनि की जाए तो उसकी गूंज दुर्ग के सर्वोच्च भवन या कक्ष में पहुँचती है। एक प्रकार से यह ध्वनि आह्वान घंटी के समान थी। दुर्ग से डेढ़ मील पर तारामती की छतरी है। यह एक पहाड़ी पर स्थित है। देखने में यह वर्गाकार है और इसकी दो मंजिलें हैं। किंवदंती है कि तारामती, जो कुतुबशाही सुल्तानों की प्रेयसी तथा प्रसिद्ध नर्तकी थी, क़िले तथा छतरी के बीच बंधी  हुई एक रस्सी पर चाँदनी में नृत्य करती थी। सड़क के दूसरी ओर प्रेमावती की छतरी है। यह भी कुतुबशाही नरेशों की प्रेमपात्री थी। हिमायत सागर सरोवर के पास ही प्रथम निज़ाम के पितामह चिनकिलिचखाँ का मक़्बरा है।&lt;br /&gt;
==आक्रमण==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकुंडा किला, [[हैदराबाद]]&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
28 जनवरी, 1627 ई0 को [[औरंगज़ेब]] ने गोलकुंडे के क़िले पर आक्रमण किया और तभी मुग़ल सेना के एक नायक के रूप में किलिच खाँ ने भी इस आक्रमण में भाग लिया था। युद्ध में इसका एक हाथ तोप के गोले से उड़ गया था जो मक़्बरे से आधा मील दूर किस्मतपुर में गड़ा हुआ है। इसी घाव से इसका कुछ दिन बाद निधन हो गया। कहा जाता है कि मरते वक़्त भी किलिच खाँ जरा भी विचलित नहीं हुआ था और औरंगज़ेब के प्रधानमंत्री जमदातुल मुल्क असद ने, जो उससे मिलने आया था, उसे चुपचाप काफ़ी पीते देखा था। [[शिवाजी]] ने [[बीजापुर]] और गोलकुंडा के सुल्तानों को बहुत संत्रस्त किया था तथा उनके अनेक किलों को जीत लिया था। उनका आतंक बीजापुर और गोलकुंडा पर बहुत समय तक छाया रहा जिसका वर्णन हिंदी के प्रसिद्ध कवि भूषण ने किया है- '''बीजापुर गोलकुंडा आगरा दिल्ली कोट बाजे बाजे रोज दरवाजे उधरत हैं'''।&lt;br /&gt;
==प्रसिद्धि==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा पहले हीरों के लिए विख्यात था। जिनमें से [[कोहिनूर हीरा]] सबसे मशहूर है।&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]][[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक नगर]][[Category:आंध्र प्रदेश के नगर]][[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=20343</id>
		<title>हैदराबाद</title>
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		<updated>2010-05-10T12:22:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Charminar-Hyderabad-1.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
'''हैदराबाद / Hyderabad''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिण पू्र्वी भारत में स्थित हैदराबाद शहर [[आंध्र प्रदेश]] राज्य की राजधानी है। यह दक्कन के पठार पर [[मूसा नदी]] के किनारे स्थित है। हैदराबाद [[गोलकुंडा]] के कुतुबशाही सुल्तानों द्वारा बसाया गया था, जिनके शासन में [[गोलकुंडा]] ने वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, जहां केवल उत्तर में [[मग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] ही उससे आगे था।&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा का पुराना क़िला राज्य की राजधानी के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ और इसलिए लगभग 1591 में कुतुबशाही में पांचवें [[मुहम्म्द कुली कुतुबशाह]] ने पुराने गोलकुंडा से कुछ मील दूर मूसा नदी के किनारे हैदराबाद नामक नया नगर बनाया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चार खुली मेहराबों और चार मीनारों वाली भारतीय-अरबी शैली की भव्य वास्तुशिल्पीय रचना चारमीनार कुतुबशाही काल की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यह वह केंद्र है, जिसके आसपास शहर की योजना बनाई गई मक्का मस्जिद 10 हज़ार लोगो को समाहित कर सकती है। हैदराबाद अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन यह गौरव केवल कुतुबशाही के दिनों तक ही क़ायम रहा। मुग़लों ने 1685 में हैदराबाद पर विजय प्राप्त कर ली। मुग़ल आधिपत्य के परिणामस्वरूप लूटमार और विध्वंस हुआ और इसके बाद यूरोपीय शक्तियों का भारत के मामलों में हस्तक्षेप आरंभ हुआ। 1724 में दक्कन के मुग़ल सूबेदार [[आसफ़जाह]] निज़ाम-उल-मुल्क ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दक्कन का यह राज्य, जिसकी राजधानी हैदराबाद थी, हैदराबाद कहलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के दौरान, आसफ़जाहियों ने पुराने शहर के उत्तर में मूसा नदी के पार विस्तार कर पुनः शक्ति एकत्रित करना आरंभ किया। उत्तर की ओर [[सिकंदराबाद]] एक ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित हुआ, जो [[हुसैन सागर झील]] पर बने एक मील लंबे बंद (तटबंध) द्वारा हैदराबाद से जुड़ा था। यह बंद एक विहारस्थल का कार्य करता है और नगर का गौरव है। हिंदू व मुस्लिम शैलियों का सुंदर अम्मिश्रण प्रदर्शित करने वाली कई नई संरचनाएं बाद में बनाई गईं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निज़ामों के शासन में [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] भाईचारे से रहते थे, यद्यपि भारत की आज़ादी के तुरंत बाद एक कट्टर मुस्लिम गुट रज़ाकारों ने राज्य और नगर में तनाव पैदा कर दिया था।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारत में विलय==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और आख़िरकार हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 1956 में राज्य का विभाजन हुआ; इसमें तेलुगु भाषी इलाक़ों को हैदराबाद के रूप में राजधानी वाले आंध्र प्रदेश राज्य के गठन क लिए भूतपूर्व आंध्र राज्य में मिला लिया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==व्यापार और परिवहन विशेषता==&lt;br /&gt;
हैदराबाद व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बन गया है। यहां सिगरेट व कपड़ा उत्पादन होता है और सेवा उद्योगों का विस्तार किया गया है। नगर में परिवहन की भी अच्छी सुविधाएं हैं। [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]] और [[बंगलोर]] के लिए रेल व वायु सेवाएं हैं, साथ ही ऐतिहासिक स्थलों, [[अंजता]] और [[एलोरा]] से जुड़े [[औरंगाबाद]] के लिए भी टैक्सियां, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, निजी वाहन और बस व रेल सेवाएं स्थानीय परिवहन उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
आरभ में हैदराबाद में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालय थे। लेकिन 1918 में निज़ाम ने उस्मानिया विश्वाविद्यालय की स्थापना की और अब यह भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है। हैदराबाद विश्वविद्यालयों की स्थापना 1974 में हुई। एक कृषि विश्वविद्यालय और कई ग़ैर सरकारी संस्थान, जैसे अमेरिकन स्टडीज़ रिसर्च सेंटर और जर्मन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्च भी हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
हैदराबाद में सार्वजनिक व निजी सांस्कृतिक संगठन बड़ी संख्या में हैं, जैसे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त नाट्य, साहित्य व ललित कला अकादमियां। सार्वजनिक सभागृह रबींद्र भारती नृत्य व संगीत महोत्सवों के लिए मंच प्रदान करता है और सालारजंग संग्रहालय में दुर्लभ वस्तुओं का संगृह है, जिनमें संगेयशब, आभूषण, चित्र और फ़र्नीचर शामिल हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आमोद-प्रमोद स्थल==&lt;br /&gt;
सार्वजनिक उद्यान प्रमुख मनोरंजन सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। कई पार्कों और सिकंदराबाद में बड़े परेड ग्राउंडो में खेल व मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर व विश्वविद्यालय का वानस्पातिक उद्यान लोकप्रिय आमोद स्थल हैं। हैदराबाद फुट्बॉल और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक रेसकोर्स भी है। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हैदराबाद की जनसंख्या (2001) न॰नि॰ क्षेत्र 34,49,878 ज़िला कुल 36,86,460 है।&lt;br /&gt;
==रियासत== &lt;br /&gt;
दक्षिण-मध्य भारत का पूर्व सामंती राज्य, निज़ाम-उल-मुल्क (मीर क़मरूद्दिन) द्वारा स्थापित, जो 1713 से 1721 तक दक्कन में लगातार मुग़ल बादशाहों के सूबेदार रहे। उन्हें 1724 यह पद फिर से मिला और उन्होंने आसफ़जाह की उपाधि ग्रहण की। वस्तुतः इस समय तक वह स्वतंत्र हो गए थे। उन्होंने हैदराबाद में निज़ामशाही की स्थापना की। 1748 में उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों उर फ़्रांसीसियों  ने उत्तराधिकार के लिए हुए युद्धों में भाग लिया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश आधिपत्य==&lt;br /&gt;
अस्थायी रूप से मैसूर के शासक हैदर अली के साथ रहने के बाद 1767 में निज़ाम अली ने '''मसुलीपट्टनम की संधि''' (1768) द्वारा ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार कर लिया।1778 में उनके राज्य में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट और सहायक सेना तैनात की गई।1795 में निज़ाम अली ख़ाँ अपने कुछ क्षेत्र, जिनमें [[बरार]] के कुछ हिस्से भी शामिल थे। मराठों के हाथ हार गए। जब उन्होंने सहायता के लिए फ़्रांसीसियों की ओर देखा, तो अंग्रेज़ों ने उनके राज्य में तैनात अपनी सहायक सेना को बढ़ा दिया। [[टीपू सुल्तान]] के विरूद्ध 1792 और 1799 में अंग्रेज़ों के सहयोगी के रूप में जीत में निज़ाम को मिले क्षेत्र इस सेना का ख़र्च चलाने के लिए अंग्रेज़ों को दे दिए गए।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==निज़ाम अली का समझौता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Charminar-Hyderabad-2.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
तीन ओर (उत्तर, दक्षिण और पूर्व) से ब्रिटिश आधिपत्य वाले अथवा उन पर निर्भर क्षेत्रों से घिरे होने से निज़ाम अली ख़ां 1798 में ब्रिटिश शासन के साथ एक समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस समझौता के अनुसार उन्होंने अपना राज्य अंग्रेज़ों के संरक्षण में दे दिया। इस प्रकार वह ऐसा करने वाले पहले शासक बने, लेकिन अंदरूनी मामलों में उनकी स्वतंत्रता की पुष्टि की गई। निज़ाम अली ख़ाँ दूसरे और तीसरे मराठा युद्धों (1803-1805, 1815-1819) में अंग्रेज़ों के सहयोगी थे और निज़ाम नसीरूद्दौला व हैदराबाद का सैनिक दस्ता भारतीय ग़दर (1857-58) के दौरान ब्रिटिश शासन के वफ़ादार रहे। 1918 में निज़ाम मीर उस्मान अली को ‘हिज एक्ज़ॉल्टेड हाइनेस’ की उपाधि दी गई, यद्यपि भारत की ब्रिटिश सरकार ने कुशासन की स्थिति में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखा। हैदराबाद एक शांत, लेकिन कुछ पिछड़ा हुआ सामंती राज्य बना रहा, जबकि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन==&lt;br /&gt;
1947 में भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन होने पर निज़ाम ने भारत में शामिल होने की अपेक्षा स्वतंत्र रहना चाहा। 29 नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक साल की अवधि का यथास्थिति क़ायम रखने का समझौता किया और भारतीय सेनाएं हटा ली गईं। समस्याएं बनी रहीं, लेकिन निज़ाम ने अपनी स्वायत्ता मनवाने के प्रयास जारी रखे। भारत ने ज़ोर किया कि हैदराबाद भारत में शामिल हो जाए। निज़ाम ने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI के समक्ष गुहार की। 13 सितबर 1948 को भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण कर दिया और चार दिन के अंदर इस राज्य ने स्वतंत्र भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। कुछ समय के लिए सैनिक व अस्थाई नागरिक सरकारों के बाद राज्य में मार्च 1952 में एक लोकप्रिय सरकार व विधानसभा का गठन किया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त==&lt;br /&gt;
1 नवंबर 1956को हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त हो गया। इसे (भाषाई आधार पर) आंध्र प्रदेश, जिसने तेलगांना ज़िले लिए; और बंबई (वर्तमान मुंबई) राज्यों में विभाजित कर दिया गया। बरार को पहले ही मध्य प्रदेश में मिला लिया गया था। हैदराबाद के निज़ाम एक ऐसे मुस्लिम वंश का हिस्सा थे, जिन्होंने बहुल आबादी पर शासन किया। यह इस वंश के शासक के लिए गर्व की बात है की उनकी हिंदू प्रजा ने इन वर्षों में मराठों, [[मैसूर]] अथवा यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर मुस्लिम राजशाही को हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perorw=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Charminar-Hyderabad-3.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Statue-Hyderabad.jpg|[[बुद्ध]], हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha, Hyderabad&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र_प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=20342</id>
		<title>हैदराबाद</title>
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		<updated>2010-05-10T12:20:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Charminar-Hyderabad-1.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
'''हैदराबाद / Hyderabad''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिण पू्र्वी भारत में स्थित हैदराबाद शहर [[आंध्र प्रदेश]] राज्य की राजधानी है। यह दक्कन के पठार पर [[मूसा नदी]] के किनारे स्थित है। हैदराबाद [[गोलकुंडा]] के कुतुबशाही सुल्तानों द्वारा बसाया गया था, जिनके शासन में [[गोलकुंडा]] ने वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, जहां केवल उत्तर में [[मग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] ही उससे आगे था।&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा का पुराना क़िला राज्य की राजधानी के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ और इसलिए लगभग 1591 में कुतुबशाही में पांचवें [[मुहम्म्द कुली कुतुबशाह]] ने पुराने गोलकुंडा से कुछ मील दूर मूसा नदी के किनारे हैदराबाद नामक नया नगर बनाया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चार खुली मेहराबों और चार मीनारों वाली भारतीय-अरबी शैली की भव्य वास्तुशिल्पीय रचना चारमीनार कुतुबशाही काल की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यह वह केंद्र है, जिसके आसपास शहर की योजना बनाई गई मक्का मस्जिद 10 हज़ार लोगो को समाहित कर सकती है। हैदराबाद अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन यह गौरव केवल कुतुबशाही के दिनों तक ही क़ायम रहा। मुग़लों ने 1685 में हैदराबाद पर विजय प्राप्त कर ली। मुग़ल आधिपत्य के परिणामस्वरूप लूटमार और विध्वंस हुआ और इसके बाद यूरोपीय शक्तियों का भारत के मामलों में हस्तक्षेप आरंभ हुआ। 1724 में दक्कन के मुग़ल सूबेदार [[आसफ़जाह]] निज़ाम-उल-मुल्क ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दक्कन का यह राज्य, जिसकी राजधानी हैदराबाद थी, हैदराबाद कहलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के दौरान, आसफ़जाहियों ने पुराने शहर के उत्तर में मूसा नदी के पार विस्तार कर पुनः शक्ति एकत्रित करना आरंभ किया। उत्तर की ओर [[सिकंदराबाद]] एक ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित हुआ, जो [[हुसैन सागर झील]] पर बने एक मील लंबे बंद (तटबंध) द्वारा हैदराबाद से जुड़ा था। यह बंद एक विहारस्थल का कार्य करता है और नगर का गौरव है। हिंदू व मुस्लिम शैलियों का सुंदर अम्मिश्रण प्रदर्शित करने वाली कई नई संरचनाएं बाद में बनाई गईं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निज़ामों के शासन में [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] भाईचारे से रहते थे, यद्यपि भारत की आज़ादी के तुरंत बाद एक कट्टर मुस्लिम गुट रज़ाकारों ने राज्य और नगर में तनाव पैदा कर दिया था।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारत में विलय==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और आख़िरकार हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 1956 में राज्य का विभाजन हुआ; इसमें तेलुगु भाषी इलाक़ों को हैदराबाद के रूप में राजधानी वाले आंध्र प्रदेश राज्य के गठन क लिए भूतपूर्व आंध्र राज्य में मिला लिया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==व्यापार और परिवहन विशेषता==&lt;br /&gt;
हैदराबाद व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बन गया है। यहां सिगरेट व कपड़ा उत्पादन होता है और सेवा उद्योगों का विस्तार किया गया है। नगर में परिवहन की भी अच्छी सुविधाएं हैं। [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]] और [[बंगलोर]] के लिए रेल व वायु सेवाएं हैं, साथ ही ऐतिहासिक स्थलों, [[अंजता]] और [[एलोरा]] से जुड़े [[औरंगाबाद]] के लिए भी टैक्सियां, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, निजी वाहन और बस व रेल सेवाएं स्थानीय परिवहन उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
आरभ में हैदराबाद में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालय थे। लेकिन 1918 में निज़ाम ने उस्मानिया विश्वाविद्यालय की स्थापना की और अब यह भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है। हैदराबाद विश्वविद्यालयों की स्थापना 1974 में हुई। एक कृषि विश्वविद्यालय और कई ग़ैर सरकारी संस्थान, जैसे अमेरिकन स्टडीज़ रिसर्च सेंटर और जर्मन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्च भी हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
हैदराबाद में सार्वजनिक व निजी सांस्कृतिक संगठन बड़ी संख्या में हैं, जैसे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त नाट्य, साहित्य व ललित कला अकादमियां। सार्वजनिक सभागृह रबींद्र भारती नृत्य व संगीत महोत्सवों के लिए मंच प्रदान करता है और सालारजंग संग्रहालय में दुर्लभ वस्तुओं का संगृह है, जिनमें संगेयशब, आभूषण, चित्र और फ़र्नीचर शामिल हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आमोद-प्रमोद स्थल==&lt;br /&gt;
सार्वजनिक उद्यान प्रमुख मनोरंजन सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। कई पार्कों और सिकंदराबाद में बड़े परेड ग्राउंडो में खेल व मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर व विश्वविद्यालय का वानस्पातिक उद्यान लोकप्रिय आमोद स्थल हैं। हैदराबाद फुट्बॉल और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक रेसकोर्स भी है। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हैदराबाद की जनसंख्या (2001) न॰नि॰ क्षेत्र 34,49,878 ज़िला कुल 36,86,460 है।&lt;br /&gt;
==रियासत== &lt;br /&gt;
दक्षिण-मध्य भारत का पूर्व सामंती राज्य, निज़ाम-उल-मुल्क (मीर क़मरूद्दिन) द्वारा स्थापित, जो 1713 से 1721 तक दक्कन में लगातार मुग़ल बादशाहों के सूबेदार रहे। उन्हें 1724 यह पद फिर से मिला और उन्होंने आसफ़जाह की उपाधि ग्रहण की। वस्तुतः इस समय तक वह स्वतंत्र हो गए थे। उन्होंने हैदराबाद में निज़ामशाही की स्थापना की। 1748 में उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों उर फ़्रांसीसियों  ने उत्तराधिकार के लिए हुए युद्धों में भाग लिया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश आधिपत्य==&lt;br /&gt;
अस्थायी रूप से मैसूर के शासक हैदर अली के साथ रहने के बाद 1767 में निज़ाम अली ने '''मसुलीपट्टनम की संधि''' (1768) द्वारा ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार कर लिया।1778 में उनके राज्य में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट और सहायक सेना तैनात की गई।1795 में निज़ाम अली ख़ाँ अपने कुछ क्षेत्र, जिनमें [[बरार]] के कुछ हिस्से भी शामिल थे। मराठों के हाथ हार गए। जब उन्होंने सहायता के लिए फ़्रांसीसियों की ओर देखा, तो अंग्रेज़ों ने उनके राज्य में तैनात अपनी सहायक सेना को बढ़ा दिया। [[टीपू सुल्तान]] के विरूद्ध 1792 और 1799 में अंग्रेज़ों के सहयोगी के रूप में जीत में निज़ाम को मिले क्षेत्र इस सेना का ख़र्च चलाने के लिए अंग्रेज़ों को दे दिए गए।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==निज़ाम अली का समझौता==&lt;br /&gt;
तीन ओर (उत्तर, दक्षिण और पूर्व) से ब्रिटिश आधिपत्य वाले अथवा उन पर निर्भर क्षेत्रों से घिरे होने से निज़ाम अली ख़ां 1798 में ब्रिटिश शासन के साथ एक समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस समझौता के अनुसार उन्होंने अपना राज्य अंग्रेज़ों के संरक्षण में दे दिया। इस प्रकार वह ऐसा करने वाले पहले शासक बने, लेकिन अंदरूनी मामलों में उनकी स्वतंत्रता की पुष्टि की गई। निज़ाम अली ख़ाँ दूसरे और तीसरे मराठा युद्धों (1803-1805, 1815-1819) में अंग्रेज़ों के सहयोगी थे और निज़ाम नसीरूद्दौला व हैदराबाद का सैनिक दस्ता भारतीय ग़दर (1857-58) के दौरान ब्रिटिश शासन के वफ़ादार रहे। 1918 में निज़ाम मीर उस्मान अली को ‘हिज एक्ज़ॉल्टेड हाइनेस’ की उपाधि दी गई, यद्यपि भारत की ब्रिटिश सरकार ने कुशासन की स्थिति में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखा। हैदराबाद एक शांत, लेकिन कुछ पिछड़ा हुआ सामंती राज्य बना रहा, जबकि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Charminar-Hyderabad-2.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
1947 में भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन होने पर निज़ाम ने भारत में शामिल होने की अपेक्षा स्वतंत्र रहना चाहा। 29 नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक साल की अवधि का यथास्थिति क़ायम रखने का समझौता किया और भारतीय सेनाएं हटा ली गईं। समस्याएं बनी रहीं, लेकिन निज़ाम ने अपनी स्वायत्ता मनवाने के प्रयास जारी रखे। भारत ने ज़ोर किया कि हैदराबाद भारत में शामिल हो जाए। निज़ाम ने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI के समक्ष गुहार की। 13 सितबर 1948 को भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण कर दिया और चार दिन के अंदर इस राज्य ने स्वतंत्र भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। कुछ समय के लिए सैनिक व अस्थाई नागरिक सरकारों के बाद राज्य में मार्च 1952 में एक लोकप्रिय सरकार व विधानसभा का गठन किया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त==&lt;br /&gt;
1 नवंबर 1956को हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त हो गया। इसे (भाषाई आधार पर) आंध्र प्रदेश, जिसने तेलगांना ज़िले लिए; और बंबई (वर्तमान मुंबई) राज्यों में विभाजित कर दिया गया। बरार को पहले ही मध्य प्रदेश में मिला लिया गया था। हैदराबाद के निज़ाम एक ऐसे मुस्लिम वंश का हिस्सा थे, जिन्होंने बहुल आबादी पर शासन किया। यह इस वंश के शासक के लिए गर्व की बात है की उनकी हिंदू प्रजा ने इन वर्षों में मराठों, [[मैसूर]] अथवा यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर मुस्लिम राजशाही को हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perorw=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Charminar-Hyderabad-3.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Statue-Hyderabad.jpg|[[बुद्ध]], हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha, Hyderabad&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के पर्यटन स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=20341</id>
		<title>हैदराबाद</title>
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		<updated>2010-05-10T12:18:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Charminar-Hyderabad-1.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
'''हैदराबाद / Hyderabad''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिण पू्र्वी भारत में स्थित हैदराबाद शहर [[आंध्र प्रदेश]] राज्य की राजधानी है। यह दक्कन के पठार पर [[मूसा नदी]] के किनारे स्थित है। हैदराबाद [[गोलकुंडा]] के कुतुबशाही सुल्तानों द्वारा बसाया गया था, जिनके शासन में [[गोलकुंडा]] ने वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, जहां केवल उत्तर में [[मग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] ही उससे आगे था।&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा का पुराना क़िला राज्य की राजधानी के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ और इसलिए लगभग 1591 में कुतुबशाही में पांचवें [[मुहम्म्द कुली कुतुबशाह]] ने पुराने गोलकुंडा से कुछ मील दूर मूसा नदी के किनारे हैदराबाद नामक नया नगर बनाया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चार खुली मेहराबों और चार मीनारों वाली भारतीय-अरबी शैली की भव्य वास्तुशिल्पीय रचना चारमीनार कुतुबशाही काल की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यह वह केंद्र है, जिसके आसपास शहर की योजना बनाई गई मक्का मस्जिद 10 हज़ार लोगो को समाहित कर सकती है। हैदराबाद अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन यह गौरव केवल कुतुबशाही के दिनों तक ही क़ायम रहा। मुग़लों ने 1685 में हैदराबाद पर विजय प्राप्त कर ली। मुग़ल आधिपत्य के परिणामस्वरूप लूटमार और विध्वंस हुआ और इसके बाद यूरोपीय शक्तियों का भारत के मामलों में हस्तक्षेप आरंभ हुआ। 1724 में दक्कन के मुग़ल सूबेदार [[आसफ़जाह]] निज़ाम-उल-मुल्क ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दक्कन का यह राज्य, जिसकी राजधानी हैदराबाद थी, हैदराबाद कहलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के दौरान, आसफ़जाहियों ने पुराने शहर के उत्तर में मूसा नदी के पार विस्तार कर पुनः शक्ति एकत्रित करना आरंभ किया। उत्तर की ओर [[सिकंदराबाद]] एक ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित हुआ, जो [[हुसैन सागर झील]] पर बने एक मील लंबे बंद (तटबंध) द्वारा हैदराबाद से जुड़ा था। यह बंद एक विहारस्थल का कार्य करता है और नगर का गौरव है। हिंदू व मुस्लिम शैलियों का सुंदर अम्मिश्रण प्रदर्शित करने वाली कई नई संरचनाएं बाद में बनाई गईं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निज़ामों के शासन में [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] भाईचारे से रहते थे, यद्यपि भारत की आज़ादी के तुरंत बाद एक कट्टर मुस्लिम गुट रज़ाकारों ने राज्य और नगर में तनाव पैदा कर दिया था।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारत में विलय==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और आख़िरकार हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 1956 में राज्य का विभाजन हुआ; इसमें तेलुगु भाषी इलाक़ों को हैदराबाद के रूप में राजधानी वाले आंध्र प्रदेश राज्य के गठन क लिए भूतपूर्व आंध्र राज्य में मिला लिया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==व्यापार और परिवहन विशेषता==&lt;br /&gt;
हैदराबाद व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बन गया है। यहां सिगरेट व कपड़ा उत्पादन होता है और सेवा उद्योगों का विस्तार किया गया है। नगर में परिवहन की भी अच्छी सुविधाएं हैं। [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]] और [[बंगलोर]] के लिए रेल व वायु सेवाएं हैं, साथ ही ऐतिहासिक स्थलों, [[अंजता]] और [[एलोरा]] से जुड़े [[औरंगाबाद]] के लिए भी टैक्सियां, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, निजी वाहन और बस व रेल सेवाएं स्थानीय परिवहन उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
आरभ में हैदराबाद में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालय थे। लेकिन 1918 में निज़ाम ने उस्मानिया विश्वाविद्यालय की स्थापना की और अब यह भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है। हैदराबाद विश्वविद्यालयों की स्थापना 1974 में हुई। एक कृषि विश्वविद्यालय और कई ग़ैर सरकारी संस्थान, जैसे अमेरिकन स्टडीज़ रिसर्च सेंटर और जर्मन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्च भी हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
हैदराबाद में सार्वजनिक व निजी सांस्कृतिक संगठन बड़ी संख्या में हैं, जैसे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त नाट्य, साहित्य व ललित कला अकादमियां। सार्वजनिक सभागृह रबींद्र भारती नृत्य व संगीत महोत्सवों के लिए मंच प्रदान करता है और सालारजंग संग्रहालय में दुर्लभ वस्तुओं का संगृह है, जिनमें संगेयशब, आभूषण, चित्र और फ़र्नीचर शामिल हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आमोद-प्रमोद स्थल==&lt;br /&gt;
सार्वजनिक उद्यान प्रमुख मनोरंजन सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। कई पार्कों और सिकंदराबाद में बड़े परेड ग्राउंडो में खेल व मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर व विश्वविद्यालय का वानस्पातिक उद्यान लोकप्रिय आमोद स्थल हैं। हैदराबाद फुट्बॉल और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक रेसकोर्स भी है। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हैदराबाद की जनसंख्या (2001) न॰नि॰ क्षेत्र 34,49,878 ज़िला कुल 36,86,460 है।&lt;br /&gt;
==रियासत== &lt;br /&gt;
दक्षिण-मध्य भारत का पूर्व सामंती राज्य, निज़ाम-उल-मुल्क (मीर क़मरूद्दिन) द्वारा स्थापित, जो 1713 से 1721 तक दक्कन में लगातार मुग़ल बादशाहों के सूबेदार रहे। उन्हें 1724 यह पद फिर से मिला और उन्होंने आसफ़जाह की उपाधि ग्रहण की। वस्तुतः इस समय तक वह स्वतंत्र हो गए थे। उन्होंने हैदराबाद में निज़ामशाही की स्थापना की। 1748 में उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों उर फ़्रांसीसियों  ने उत्तराधिकार के लिए हुए युद्धों में भाग लिया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Charminar-Hyderabad-2.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश आधिपत्य==&lt;br /&gt;
अस्थायी रूप से मैसूर के शासक हैदर अली के साथ रहने के बाद 1767 में निज़ाम अली ने '''मसुलीपट्टनम की संधि''' (1768) द्वारा ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार कर लिया।1778 में उनके राज्य में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट और सहायक सेना तैनात की गई।1795 में निज़ाम अली ख़ाँ अपने कुछ क्षेत्र, जिनमें [[बरार]] के कुछ हिस्से भी शामिल थे। मराठों के हाथ हार गए। जब उन्होंने सहायता के लिए फ़्रांसीसियों की ओर देखा, तो अंग्रेज़ों ने उनके राज्य में तैनात अपनी सहायक सेना को बढ़ा दिया। [[टीपू सुल्तान]] के विरूद्ध 1792 और 1799 में अंग्रेज़ों के सहयोगी के रूप में जीत में निज़ाम को मिले क्षेत्र इस सेना का ख़र्च चलाने के लिए अंग्रेज़ों को दे दिए गए।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==निज़ाम अली का समझौता==&lt;br /&gt;
तीन ओर (उत्तर, दक्षिण और पूर्व) से ब्रिटिश आधिपत्य वाले अथवा उन पर निर्भर क्षेत्रों से घिरे होने से निज़ाम अली ख़ां 1798 में ब्रिटिश शासन के साथ एक समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस समझौता के अनुसार उन्होंने अपना राज्य अंग्रेज़ों के संरक्षण में दे दिया। इस प्रकार वह ऐसा करने वाले पहले शासक बने, लेकिन अंदरूनी मामलों में उनकी स्वतंत्रता की पुष्टि की गई। निज़ाम अली ख़ाँ दूसरे और तीसरे मराठा युद्धों (1803-1805, 1815-1819) में अंग्रेज़ों के सहयोगी थे और निज़ाम नसीरूद्दौला व हैदराबाद का सैनिक दस्ता भारतीय ग़दर (1857-58) के दौरान ब्रिटिश शासन के वफ़ादार रहे। 1918 में निज़ाम मीर उस्मान अली को ‘हिज एक्ज़ॉल्टेड हाइनेस’ की उपाधि दी गई, यद्यपि भारत की ब्रिटिश सरकार ने कुशासन की स्थिति में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखा। हैदराबाद एक शांत, लेकिन कुछ पिछड़ा हुआ सामंती राज्य बना रहा, जबकि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन==&lt;br /&gt;
1947 में भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन होने पर निज़ाम ने भारत में शामिल होने की अपेक्षा स्वतंत्र रहना चाहा। 29 नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक साल की अवधि का यथास्थिति क़ायम रखने का समझौता किया और भारतीय सेनाएं हटा ली गईं। समस्याएं बनी रहीं, लेकिन निज़ाम ने अपनी स्वायत्ता मनवाने के प्रयास जारी रखे। भारत ने ज़ोर किया कि हैदराबाद भारत में शामिल हो जाए। निज़ाम ने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI के समक्ष गुहार की। 13 सितबर 1948 को भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण कर दिया और चार दिन के अंदर इस राज्य ने स्वतंत्र भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। कुछ समय के लिए सैनिक व अस्थाई नागरिक सरकारों के बाद राज्य में मार्च 1952 में एक लोकप्रिय सरकार व विधानसभा का गठन किया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त==&lt;br /&gt;
1 नवंबर 1956को हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त हो गया। इसे (भाषाई आधार पर) आंध्र प्रदेश, जिसने तेलगांना ज़िले लिए; और बंबई (वर्तमान मुंबई) राज्यों में विभाजित कर दिया गया। बरार को पहले ही मध्य प्रदेश में मिला लिया गया था। हैदराबाद के निज़ाम एक ऐसे मुस्लिम वंश का हिस्सा थे, जिन्होंने बहुल आबादी पर शासन किया। यह इस वंश के शासक के लिए गर्व की बात है की उनकी हिंदू प्रजा ने इन वर्षों में मराठों, [[मैसूर]] अथवा यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर मुस्लिम राजशाही को हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perorw=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Charminar-Hyderabad-3.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Statue-Hyderabad.jpg|[[बुद्ध]], हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha, Hyderabad&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>हैदराबाद</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Charminar-Hyderabad-1.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
'''हैदराबाद / Hyderabad''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्षिण पू्र्वी भारत में स्थित हैदराबाद शहर [[आंध्र प्रदेश]] राज्य की राजधानी है। यह दक्कन के पठार पर [[मूसा नदी]] के किनारे स्थित है। हैदराबाद [[गोलकुंडा]] के कुतुबशाही सुल्तानों द्वारा बसाया गया था, जिनके शासन में [[गोलकुंडा]] ने वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया, जहां केवल उत्तर में [[मग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] ही उससे आगे था।&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
गोलकुंडा का पुराना क़िला राज्य की राजधानी के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ और इसलिए लगभग 1591 में कुतुबशाही में पांचवें [[मुहम्म्द कुली कुतुबशाह]] ने पुराने गोलकुंडा से कुछ मील दूर मूसा नदी के किनारे हैदराबाद नामक नया नगर बनाया।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चार खुली मेहराबों और चार मीनारों वाली भारतीय-अरबी शैली की भव्य वास्तुशिल्पीय रचना चारमीनार कुतुबशाही काल की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यह वह केंद्र है, जिसके आसपास शहर की योजना बनाई गई मक्का मस्जिद 10 हज़ार लोगो को समाहित कर सकती है। हैदराबाद अपने सौंदर्य और समृद्धि के लिए जाना जाता था, लेकिन यह गौरव केवल कुतुबशाही के दिनों तक ही क़ायम रहा। मुग़लों ने 1685 में हैदराबाद पर विजय प्राप्त कर ली। मुग़ल आधिपत्य के परिणामस्वरूप लूटमार और विध्वंस हुआ और इसके बाद यूरोपीय शक्तियों का भारत के मामलों में हस्तक्षेप आरंभ हुआ। 1724 में दक्कन के मुग़ल सूबेदार [[आसफ़जाह]] निज़ाम-उल-मुल्क ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दक्कन का यह राज्य, जिसकी राजधानी हैदराबाद थी, हैदराबाद कहलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के दौरान, आसफ़जाहियों ने पुराने शहर के उत्तर में मूसा नदी के पार विस्तार कर पुनः शक्ति एकत्रित करना आरंभ किया। उत्तर की ओर [[सिकंदराबाद]] एक ब्रिटिश छावनी के रूप में विकसित हुआ, जो [[हुसैन सागर झील]] पर बने एक मील लंबे बंद (तटबंध) द्वारा हैदराबाद से जुड़ा था। यह बंद एक विहारस्थल का कार्य करता है और नगर का गौरव है। हिंदू व मुस्लिम शैलियों का सुंदर अम्मिश्रण प्रदर्शित करने वाली कई नई संरचनाएं बाद में बनाई गईं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निज़ामों के शासन में [[हिंदू]] और [[मुसलमान]] भाईचारे से रहते थे, यद्यपि भारत की आज़ादी के तुरंत बाद एक कट्टर मुस्लिम गुट रज़ाकारों ने राज्य और नगर में तनाव पैदा कर दिया था।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारत में विलय==&lt;br /&gt;
भारत सरकार ने हस्तक्षेप किया और आख़िरकार हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 1956 में राज्य का विभाजन हुआ; इसमें तेलुगु भाषी इलाक़ों को हैदराबाद के रूप में राजधानी वाले आंध्र प्रदेश राज्य के गठन क लिए भूतपूर्व आंध्र राज्य में मिला लिया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==व्यापार और परिवहन विशेषता==&lt;br /&gt;
हैदराबाद व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बन गया है। यहां सिगरेट व कपड़ा उत्पादन होता है और सेवा उद्योगों का विस्तार किया गया है। नगर में परिवहन की भी अच्छी सुविधाएं हैं। [[दिल्ली]], [[कोलकाता]], [[मुंबई]], [[चेन्नई]] और [[बंगलोर]] के लिए रेल व वायु सेवाएं हैं, साथ ही ऐतिहासिक स्थलों, [[अंजता]] और [[एलोरा]] से जुड़े [[औरंगाबाद]] के लिए भी टैक्सियां, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा, निजी वाहन और बस व रेल सेवाएं स्थानीय परिवहन उपलब्ध कराती हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
आरभ में हैदराबाद में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध दो महाविद्यालय थे। लेकिन 1918 में निज़ाम ने उस्मानिया विश्वाविद्यालय की स्थापना की और अब यह भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है। हैदराबाद विश्वविद्यालयों की स्थापना 1974 में हुई। एक कृषि विश्वविद्यालय और कई ग़ैर सरकारी संस्थान, जैसे अमेरिकन स्टडीज़ रिसर्च सेंटर और जर्मन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्च भी हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-2.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
हैदराबाद में सार्वजनिक व निजी सांस्कृतिक संगठन बड़ी संख्या में हैं, जैसे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त नाट्य, साहित्य व ललित कला अकादमियां। सार्वजनिक सभागृह रबींद्र भारती नृत्य व संगीत महोत्सवों के लिए मंच प्रदान करता है और सालारजंग संग्रहालय में दुर्लभ वस्तुओं का संगृह है, जिनमें संगेयशब, आभूषण, चित्र और फ़र्नीचर शामिल हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आमोद-प्रमोद स्थल==&lt;br /&gt;
सार्वजनिक उद्यान प्रमुख मनोरंजन सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। कई पार्कों और सिकंदराबाद में बड़े परेड ग्राउंडो में खेल व मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर व विश्वविद्यालय का वानस्पातिक उद्यान लोकप्रिय आमोद स्थल हैं। हैदराबाद फुट्बॉल और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक रेसकोर्स भी है। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हैदराबाद की जनसंख्या (2001) न॰नि॰ क्षेत्र 34,49,878 ज़िला कुल 36,86,460 है।&lt;br /&gt;
==रियासत== &lt;br /&gt;
दक्षिण-मध्य भारत का पूर्व सामंती राज्य, निज़ाम-उल-मुल्क (मीर क़मरूद्दिन) द्वारा स्थापित, जो 1713 से 1721 तक दक्कन में लगातार मुग़ल बादशाहों के सूबेदार रहे। उन्हें 1724 यह पद फिर से मिला और उन्होंने आसफ़जाह की उपाधि ग्रहण की। वस्तुतः इस समय तक वह स्वतंत्र हो गए थे। उन्होंने हैदराबाद में निज़ामशाही की स्थापना की। 1748 में उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों उर फ़्रांसीसियों  ने उत्तराधिकार के लिए हुए युद्धों में भाग लिया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Charminar-Hyderabad-2.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad|thumb]]&lt;br /&gt;
==ब्रिटिश आधिपत्य==&lt;br /&gt;
अस्थायी रूप से मैसूर के शासक हैदर अली के साथ रहने के बाद 1767 में निज़ाम अली ने '''मसुलीपट्टनम की संधि''' (1768) द्वारा ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार कर लिया।1778 में उनके राज्य में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट और सहायक सेना तैनात की गई।1795 में निज़ाम अली ख़ाँ अपने कुछ क्षेत्र, जिनमें [[बरार]] के कुछ हिस्से भी शामिल थे। मराठों के हाथ हार गए। जब उन्होंने सहायता के लिए फ़्रांसीसियों की ओर देखा, तो अंग्रेज़ों ने उनके राज्य में तैनात अपनी सहायक सेना को बढ़ा दिया। [[टीपू सुल्तान]] के विरूद्ध 1792 और 1799 में अंग्रेज़ों के सहयोगी के रूप में जीत में निज़ाम को मिले क्षेत्र इस सेना का ख़र्च चलाने के लिए अंग्रेज़ों को दे दिए गए।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==निज़ाम अली का समझौता==&lt;br /&gt;
तीन ओर (उत्तर, दक्षिण और पूर्व) से ब्रिटिश आधिपत्य वाले अथवा उन पर निर्भर क्षेत्रों से घिरे होने से निज़ाम अली ख़ां 1798 में ब्रिटिश शासन के साथ एक समझौता करने पर मजबूर हो गए। इस समझौता के अनुसार उन्होंने अपना राज्य अंग्रेज़ों के संरक्षण में दे दिया। इस प्रकार वह ऐसा करने वाले पहले शासक बने, लेकिन अंदरूनी मामलों में उनकी स्वतंत्रता की पुष्टि की गई। निज़ाम अली ख़ाँ दूसरे और तीसरे मराठा युद्धों (1803-1805, 1815-1819) में अंग्रेज़ों के सहयोगी थे और निज़ाम नसीरूद्दौला व हैदराबाद का सैनिक दस्ता भारतीय ग़दर (1857-58) के दौरान ब्रिटिश शासन के वफ़ादार रहे। 1918 में निज़ाम मीर उस्मान अली को ‘हिज एक्ज़ॉल्टेड हाइनेस’ की उपाधि दी गई, यद्यपि भारत की ब्रिटिश सरकार ने कुशासन की स्थिति में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखा। हैदराबाद एक शांत, लेकिन कुछ पिछड़ा हुआ सामंती राज्य बना रहा, जबकि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन==&lt;br /&gt;
1947 में भारतीय उप महाद्वीप का विभाजन होने पर निज़ाम ने भारत में शामिल होने की अपेक्षा स्वतंत्र रहना चाहा। 29 नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के साथ एक साल की अवधि का यथास्थिति क़ायम रखने का समझौता किया और भारतीय सेनाएं हटा ली गईं। समस्याएं बनी रहीं, लेकिन निज़ाम ने अपनी स्वायत्ता मनवाने के प्रयास जारी रखे। भारत ने ज़ोर किया कि हैदराबाद भारत में शामिल हो जाए। निज़ाम ने ब्रिटेन के राजा जॉर्ज VI के समक्ष गुहार की। 13 सितबर 1948 को भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण कर दिया और चार दिन के अंदर इस राज्य ने स्वतंत्र भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया। कुछ समय के लिए सैनिक व अस्थाई नागरिक सरकारों के बाद राज्य में मार्च 1952 में एक लोकप्रिय सरकार व विधानसभा का गठन किया गया।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त==&lt;br /&gt;
1 नवंबर 1956को हैदराबाद राज्य प्रशासनिक रूप से समाप्त हो गया। इसे (भाषाई आधार पर) आंध्र प्रदेश, जिसने तेलगांना ज़िले लिए; और बंबई (वर्तमान मुंबई) राज्यों में विभाजित कर दिया गया। बरार को पहले ही मध्य प्रदेश में मिला लिया गया था। हैदराबाद के निज़ाम एक ऐसे मुस्लिम वंश का हिस्सा थे, जिन्होंने बहुल आबादी पर शासन किया। यह इस वंश के शासक के लिए गर्व की बात है की उनकी हिंदू प्रजा ने इन वर्षों में मराठों, [[मैसूर]] अथवा यूरोपीय शक्तियों के साथ मिलकर मुस्लिम राजशाही को हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perorw=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Charminar-Hyderabad-3.jpg|चार मीनार, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Charminar, Hyderabad&lt;br /&gt;
चित्र:Golkunda-Fort-Hyderabad-1.jpg|गोलकोण्डा किला, हैदराबाद&amp;lt;br /&amp;gt; Golkonda Fort, Hyderabad&lt;br /&gt;
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[[Category:आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>बीकानेर</title>
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		<updated>2010-05-08T13:56:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Junagarh-Fort-Bikaner.jpg|thumb|जूनागढ़ किला, बीकानेर&amp;lt;br /&amp;gt; Junagarh Fort, Bikaner]]&lt;br /&gt;
'''बीकानेर / Bikaner'''&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==स्थापना==&lt;br /&gt;
बीकानेर शहर, उत्तर-मध्य [[राजस्थान]] राज्य, पश्चिमोत्तर [[भारत]] में स्थित है। यह [[दिल्ली]] से 386 किमी पश्चिम में पड़ता है। यह राजस्थान का एक नगर तथा पुरानी रियासत था। यह शहर भूतपूर्व बीकानेर रियासत की राजधानी था। लगभग 1465 में राठौर जाति के एक राजपूत सरदार बीका ने अन्य राजपूत जातियों का भूभाग जीतना प्रारंभ किया। 1488 में उन्होंने बीकानेर (बीका का आवास क्षेत्र) शहर का निर्माण प्रारंभ किया। 1504 में बीका की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने उनके राज्य क्षेत्र का क्रमिक विस्तार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
यह राज्य मुग़ल बादशाहों, जिन्होंने 1526 से 1857 तक दिल्ली पर शासन किया, के प्रति निष्ठावान बना रहा। राय सिंह, जिन्होंने 1571 में बीकानेर की सरदारी पाई, बादशाह [[अकबर]] के सबसे प्रतिष्ठित सेनापतियों में से एक बन गए और बीकानेर के पहले राजा नियुक्त हुए। 18वीं शाताब्दी में मुग़लों के पतन के साथ ही बीकानेर और [[जोधपुर]] की रियासतों में बार-बार लड़ाईयाँ होती रहीं। 1818 में एक संधि हुई, जिसने ब्रिटिश वर्चस्व की स्थापना की और रियासत में ब्रिटिश सेना पुनर्व्यवस्था ले आई। 1833 में इसे राजपूताना एजेंसी में शामिल किए जाने से पहले तक स्थानीय ठाकुरों या ज़मींदारों के विद्रोही तेवर जारी रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्य की सैन्य सेवा में बीकानेरी ऊँट सवार सेना शामिल है, जिसने [[बक्सर]] विद्रोह (1900) के दौरान [[चीन]] और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मध्य-पूर्व में ख्याति अर्जित की थी। बीकानेर को, जिसका क्षेत्रफल तब 60,000 वर्ग किमी से अधिक हो गया था, 1949 में राजस्थान का अंग बनाकर तीन ज़िलों में बाँट दिया गया। महाराज बीकानेर नरेन्द्र-मंडल (चेम्बर ऑफ़ प्रिन्सेज) के आरम्भ से ही एक महत्वपूर्ण सदस्य रहे। स्वाधीनता के उपरान्त बीकानेर रियासत भारत में विलीन हो गयी। पुराना बीकानेर थोड़े उठे हुए मैदान पर स्थित है और पांच द्वारों के साथ-साथ सात किलोमीटर लंबी पंक्तिबद्ध दीवार से घिरा हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
यह जोधपुर, [[जयपुर]], दिल्ली, [[नागौर]] और [[गंगानगर]] से रेलमार्ग और सड़क मार्ग द्वारा जुडा हुआ हैं। ज़िले की सीमा जहाँ [[चूरू]], नागौर, गंगानगर, [[हनुमानगढ़]], जोधपुर व [[जैसलमेर]] की सीमा को छूती है, वहीं अन्तरराष्ट्रीय सीमा [[पाकिस्तान]] से मिलती हैं। ज़िले के दो प्राकृतिक भागों को उतरी व पश्चिमी रेगिस्तान व दक्षिणी व पूर्व अर्द्ध मरूस्थल में विभाजित किया सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि और खनिज==&lt;br /&gt;
यहाँ कोई नदी न होने के कारण मुख्यत: गहरे नलकूपों से ही सिंचाई की जाती है। [[बाजरा]], [[ज्वार]] और [[दलहन]] यहाँ की प्रमुख फ़सलें हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्योग और व्यापार== &lt;br /&gt;
प्राचीन काफिलों के मार्ग पर बीकानेर की अनुकूल स्थिति के कारण, जो पश्चिमी मध्य एशिया से आते थे, प्राचीन काल में यह मुख्य व्यापार का केन्द्र बन गया था। बीकानेर अब ऊन, चमड़ा, इमारती पत्थर, नमक और खाद्यान्न का व्यापारिक केंद्र है। बीकानेरी ऊनी शाल, कालीन और मिश्री प्रसिद्ध है, साथ ही यहाँ [[हाथीदाँत]] और लाख की हस्तनिर्मित वस्तुऐं मिलती हैं। यहाँ विद्युत और अभियांत्रिकी कार्यशालाऐं, रेलवे कार्यशालाऐं और काँच, मिट्टी के बर्तन, नमदा, रसायन, जूते और सिगरेट बनाने की औद्योगिक इकाइयाँ हैं। बीकानेर लहरदार बालू के टीलों वाले बंजर क्षेत्र में स्थित है, जहाँ ऊँटों, घोड़ों की नस्लें तैयार करना प्रमुख व्यवसाय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
यहाँ के महाविद्यालय (मेडिकल स्कूल और शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान सहित) राजस्थान विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
बीकानेर शहर की जनसंख्या (2001) 5,29,007 है। बीकानेर ज़िले की कुल जनसंख्या 16,73,562 है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
राजस्थान के मरूस्थल की गोद में बसा बीकानेर अपने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ भौगोलिक विशिष्टता के लिए विख्यात हैं। लाल पत्थर के भव्य प्रासाद, हवेलियाँ, कोलायत, गजनेर के रमणीक स्थल, राज्य अभिलेखागार, म्यूजियम, अनुपम संस्कृत पुस्तकालय व टेस्सीतोरी कर्मस्थली होने के कारण यह ज़िला ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान रखता हैं। बीकानेर में मुतात्विक दृष्टि से बीका-की-टेकरी का भव्य किला(पुराना किला), संग्रहालय, लक्ष्मीनारायण मंदिर, भंडेसर मंदिर, नागणेची जी का मंदिर, देवकृण्डसागर में प्राचीन शासकों की छतरियॉ, शिवबाडी मंदिर और लालगढ़ महल महत्वपूर्ण हैं। शहर से मात्र 32 किलोमीटर दूर स्थित गजनेर भव्य महलों की सुन्दरता और प्रवासी पक्षियों के लिये प्रसिद्ध हैं। देशनोक स्थित करणीमाता का मंदिर देवी और चूहों के लिये प्रसिद्ध हैं। राजस्थान के उतर-पश्चिम में बसा बीकानेर 27244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ हैं। बीकानेर ऊँटों के लिए प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
==ऊँटों के लिए प्रसिद्ध==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Camel-Festival-Bikaner.jpg|ऊँटों का प्रसिद्ध मेला, बीकानेर&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Festival, Bikaner|thumb]]&lt;br /&gt;
अनन्त समय से आकर्षित करता आ रहा बीकानेर एक शाही सुदृढ़ शहर है। रेगिस्तान राज्य के उत्तर में स्थित इस शहर के आसपास हालू के टीले हैं। बीकानेर का ऊँट दल रियासत काल के दौरान प्रसिद्ध युद्धकारी सेना थी अभी भी सीमा सुरक्षा बल के द्वारा वह युद्ध एवं रक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बीकानेर में अभी तक मध्ययुगीन भव्यता है जो शहर की जीवन शैली में व्यापक रूप से दिखती है। ऊँटों के देश के नाम से प्रसिद्ध, यह शहर विश्व में बेहतर ऊँटों की सवारी के लिए विख्यात है। रेगिस्तान का जहाज, जीवन का एक अविभाज्य अंग है। चाहे भरी गाड़ी खीचनी हैं, अनाज ले जाना हो या कुओं पर काम करना है, ऊँट मुख्य सहायक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुख्य स्थल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====जूनागढ़====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सुदृढ़ क़िला एक खाई से घिरा हुआ है। सम्राट अकबर की सेना के एक सेनापति राजा राय सिंह ने इस क़िले को सन् 1593 में निर्मित करवाया था। इसमें कई आकर्षक महल हैं, लाल बलुए एवं संगमरमर पत्थर से बने महल प्रांगण, छज्जों, छतरियों व खिड़कियाँ जो सभी इमारतों में फैली हुई है।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====करणीमाता का मंदिर====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे देश में अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहाँ बार-बार जाने का मन करता है। एक ऐसा ही मंदिर राजस्थान के बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जोधपुर रोड पर गाँव देशनोक की सीमा में स्थित है। यह है माँ करणी देवी का विख्यात मंदिर। यह भी एक तीरथ धाम है, लेकिन इसे चूहे वाले मंदिर के नाम से भी देश और दुनिया के लोग जानते हैं। करणी देवी साक्षात माँ जगदम्बा की अवतार थीं। अब से लगभग साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व जिस स्थान पर यह भव्य मंदिर है, वहाँ एक गुफा में रहकर माँ अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं। यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। माँ के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी इच्छानुसार उनकी मूर्ति की इस गुफा में स्थापना की गई। संगमरमर से बने मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। वहाँ पर चूहों की धमाचौकड़ी देखती ही बनती है। चूहे पूरे मंदिर प्रांगण में मौजूद रहते है। वे श्रद्धालुओं के शरीर पर कूद-फांद करते हैं, लेकिन किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरों से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर बारीक जाली लगी हुई है। इन चूहों की उपस्थिति की वजह से ही श्री करणी देवी का यह मंदिर चूहों वाले मंदिर के नाम से भी विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि किसी श्रद्धालु को यदि यहां सफेद चूहे के दर्शन होते हैं, तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। सुबह पांच बजे मंगला आरती और सायं सात बजे आरती के समय चूहों का जुलूस तो देखने लायक होता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर संगमरमर पर नक्काशी को भी विशेष रूप से देखने के लिए लोग यहाँ आते हैं। चाँदी के किवाड़, सोने के छत्र और चूहों (काबा) के प्रसाद के लिए यहाँ रखी चाँदी की बड़ी परात भी देखने लायक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====बीकानेर का क़िला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Junagarh-Fort-Bikaner-2.jpg|thumb|जूनागढ़ किला, बीकानेर&amp;lt;br /&amp;gt; Junagarh Fort, Bikaner|left]]&lt;br /&gt;
इस शहर का पुराना हिस्सा पाँच से नौ मीटर ऊँची पत्थर की दीवार से घिरा है और इसके पाँच द्वार हैं। शहर का पुराना भाग एक क़िले के ऊपर से दिखाई देता है, यहाँ बड़ी संख्या में चटकीले लाल और पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित भवन हैं। क़िले के भीतर विभिन्न कालों के महल, राजपूत शैली के लद्युचित्रों वाला एक संग्रहालय और संस्कृत व फ़ारसी पांडुलिपियों का पुस्तकालय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सूरज पोल या सूर्य द्वार====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्य द्वार क़िले का मुख्य द्वार है। इन महलों में सबसे उल्लेखनीय महल है अति सुन्दर चन्द्र महल, जिसमें शानदार चित्र, शीशे और नक्काशीदार संगमरमर की पट्टीयाँ हैं और फूल महल, जो शीशों के काम से अलंकृत है। अन्य दर्शनीय महल हैं, अनुप महल, कर्ण महल, डूंगर निवास, गंगा निवास, गज मंदिर और रंग महल। महल के अंदर बने भव्य स्तंभ, मेहराब व आलीशान चिलमन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====लाल गढ़ महल====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाराजा गंगा सिंह द्वारा अपने पिता महाराजा लाल सिंह की याद में निर्मित लाल बलुए पत्थर से बना यह महल वास्तुशिल्प का एक बेजोड़ नमूना है। महल के आर्कषण जाली का जरदोजी का काम हुआ है। खिले हुए बोगनवेलियाँ व नाचते हुए बगीचे देखने योग्य है। महल का कुछ हिस्सा एक हेरिटेज होटल व एक संग्रहालय में बदल दिया गया है जो श्री सार्दुल संग्रहालय के नाम से प्रसिद्ध है।  संग्रहालय महल के समूचे प्रथम तल में बना हुआ है और इनमें सुरक्षित पुराने चित्र व वन्य जीवन की निशानियाँ संग्रहीत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह राजस्थान के बेहतरीन संग्रहालयों मे से एक है जिसमें मिट्टी के बर्तन, हथियार, बीकानेर शैली के लघुचित्रों व सिक्कों का सबसे समृद्ध संग्रह है। हड़प्पा सभ्यता, गुप्त व कृषाण युग की उत्कृष्ट कलाकृतियाँ और अति प्राचीन काल की मूर्तियाँ यहाँ प्रदर्शित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अन्य स्थल====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''भांड़ासार जैन मंदिर''' पाँचवें तीर्थकर सुमतिनाथ जी का 15वीं सदी का आकर्षण मंदिर है।&lt;br /&gt;
*'''ऊंट शोध केंद्र''' ऊँट शोध एवं प्रजनन केन्द्र में रेगिस्तान के जहाज के साथ कुछ समय बिताऐं। यह एशिया में अपनी तरह का एक ही केन्द्र है।  &lt;br /&gt;
*'''गजनेर वन्य प्राणी अभयारण्य''' जैसलमेर मार्ग पर हरा - भरा जंगल, नीलगाय, चिंकारा, काले मृग, जंगली सूअर व शाही रेतीली तीतरों के झुंड के लिए यह एक स्वर्ग है। गजनेर महल, राजाओं की मानसून के समय की आरामगाह, झील के तट पर स्थित है और इसे हैरिटेज होटल में तब्दील कर दिया गया है। &lt;br /&gt;
*'''शिव बाड़ी मंदिर''' उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द में ड़ूंगर सिंह जी द्वारा निर्मित यह मंदिर एक टूटी - फूटी दीवार से घिरा है। इसमें सुन्दर चित्र हैं और एक पीपल का नन्दी, शिव लिंग की ओर देखता हुआ स्थित है।&lt;br /&gt;
*'''कोलायतजी''' कफिल मुनि का प्रसिद्ध तीर्थस्थल जिसमें एक मंदिर भी है। कार्तिक (अक्तूबर - नवम्बर) के महीने में लगने वाले वार्षिक मेले में लाखों श्रद्धालु पूर्णमासी के दिन कोलयता की झील में डुबकी लगाने के लिए एकत्रित होते हैं।&lt;br /&gt;
*'''कालीबंगा''' हनुमानगढ़ जिले में इस स्थान में पूर्व हड़प्पा युग व हड़प्पा सभ्यता के व्यापक अवशेष पाये गये हैं जो कि पुरातत्ववेत्ताओं के लिए अत्यधिक रुचि की चीजें हैं। यहाँ संग्रहालय भी बना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्योहारों का आनंद==&lt;br /&gt;
====ऊँट मेला (जनवरी)==== &lt;br /&gt;
ऊँटों का उत्सव, ऊँटों की दौड़, ऊँटों की कलाबाजी, नृत्य व दूध देने की प्रतिस्पर्धा का एक दर्शनीय त्योहार है, जो इस समारोह का एक हिस्सा होता है।&lt;br /&gt;
====कोलायत मेला (नवंबर)==== &lt;br /&gt;
कार्तिक के महीने में पूर्णमासी के दिन पुष्कर मेले के साथ पड़ने वाले इस मेले में भक्त कोलायात झील में डुबकी लगाते हैं। &lt;br /&gt;
====गणगौर त्यौहार (अप्रैल)====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gangaur-Festival-1.jpg|गणगौर त्योहार, बीकानेर &amp;lt;br /&amp;gt; Gangaur Festival, Bikaner|thumb]]&lt;br /&gt;
[[गणगौर]] का यह त्योहार चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से जो नवविवाहिताएँ प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं, वे चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहिता लड़कियों के लिए पति का अनुराग उत्पन्न कराने वाला और कुमारियों को उत्तम पति देने वाला है। इससे सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है। &lt;br /&gt;
====होली (मार्च)==== &lt;br /&gt;
होली से कई दिन पूर्व शुरू होने वाला रंगो का यह त्योहार विशेष रूप से दर्शनीय है। बीकानेर में [[होली]] का त्योहार नौ दिन तक मनाया जाता है। फाल्गुन माह में खेलनी सप्तमी से शुरू हुआ यह त्योहार धुलंडी के दिन तक अनवरत जारी रहता है। बीकानेर के शाकद्विपीय ब्राह्मणों के द्वारा खेलनी सप्तमी के दिन मरुनायक चौक में 'थम्ब पूजन' के साथ ही होली के त्योहार की शुरुआत हो जाती है। चूंकि शाकद्विपीय समाज के लोग बीकानेर के मंदिरों के पुजारी हैं अत: शहर के प्राचीन नागणेची मंदिर में धूमधाम से पूजा की जाती है और माँ को गुलाल अबीर से होली खेलाई जाती है। इस फागोत्सव के बाद पुरुष चंग बजाते हुए व फाग के गीत गाते हुए शहर में प्रवेश करते हैं तथा होली के प्रारम्भ की सूचना देते हैं। अगले ही दिन अष्टमी को शहर के किकाणी व्यासों के चौक में, लालाणी व्यासों के चौंक में, सुनारों की गुवाड़ में व अन्य जगहों पर भी थम्ब पूजन कर दिया जाता है और इसी के साथ ही होलकाष्टक प्रारम्भ हो जाते हैं। होलाकाष्टक का पूरा समय मस्ती, उल्लास, अल्हड़ता के बिताया जाता है। इन दिनों में विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। &lt;br /&gt;
=====होली व डोलची पानी का खेल=====&lt;br /&gt;
बीकानेर की होली का सबसे आकर्षण का केंद्र होता है पुष्करणा ब्राह्मण समाज के हर्ष व व्यास जाति के बीच खेला जाने वाला डोचली पानी का खेल। 'डोलच' चमड़े का बना एक ऐसा पात्र है जिसमें पानी भरा जाता है। इस डोलची में भरे पानी को पूरी ताक़त के साथ सामने वाले की पीठ पर मारा जाता है। बीकानेर के हर्षों के चौक में रहने वाले इस आयोजन को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। प्रेम के नीर से भरी यह डोलची जब प्यार से पीठ पर पड़ती है तो इसकी गर्जन दर्शकों को भी आह्लादित कर देती है। करीब चार सौ साल से चल रहे इस आयोजन के पीछे अपना एक समृध्द व गौरवशाली इतिहास है जो जातीय संघर्ष से जुड़ा हुआ है। हर्ष व व्यास जाति के लोग आज भी बड़ी शिद्दत व ईमानदारी से इस इतिहास को सहेजे हुए हैं। ऐसा ही एक आयोजन बीकानेर के बारहगुवाड़ चौक में ओझा व छंगाणी जाति के बीच होलिका दहन वाले दिन होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बीकानेर अभिलेखागार==&lt;br /&gt;
बीकानेर स्थित राजस्थान राज्य अभिलेखागार देश के सबसे अच्‍छे और विश्‍व के चर्चित अभिलेखागारों में से एक है। इस अभिलेखागार की स्‍थापना 1955 में हुई और यह अपनी अपार व अमूल्‍य अभिलेख निधि के लिए प्रतिष्ठित है. यहाँ संरक्षित दुर्लभ दस्‍तावेजों की सुव्‍यवस्थित व्‍यवस्‍था काबिलेतारीफ़ है। अपने समृद्ध इतिहास स्रोतों और उनके बेहतर प्रबंधन, रखरखाव के चलते ही शायद इसे देश का सबसे अच्‍छा अभिलेखागार माना जाता है। इस अभिलेखागार की तीन विशेषताऐं हैं-&lt;br /&gt;
*एक तो यहाँ उपलब्‍ध सामग्री इस लिहाज से निसंदेह रूप से यह देश के सबसे समृद्ध अभिलेखागारों में से एक है। &lt;br /&gt;
*दूसरा उपलब्‍ध सामग्री को संरक्षित सुरक्षित रखने के तौर तरीक़े और &lt;br /&gt;
*तीसरा इसका प्रबंधन। &lt;br /&gt;
इन सबका एक साथ मिलना अपने आप में बड़ी बात है।.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान_के_ऐतिहासिक_नगर]][[Category:राजस्थान_के_ऐतिहासिक_स्थान]][[Category:राजस्थान_के_नगर]][[Category:राजस्थान_के_पर्यटन_स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]][[Category:भारत के नगर]]__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[State::दिल्ली]] / Delhi&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|क़ुतुब मीनार, दिल्‍ली&amp;lt;br /&amp;gt; Qutub Minar, Delhi|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों के आकर्षण के साथ-साथ यह हमारे देश का मुख्य राजनीतिक केन्द्र भी है। &lt;br /&gt;
*समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 230 मीटर तथा फैलाव 1483 वर्ग कि.मी. क्षेत्र है। &lt;br /&gt;
*यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। &lt;br /&gt;
*पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
*इसकी सीमाएं [[उत्तर प्रदेश]], [[हरियाणा]], राजस्थान, पंजाब और चंडीगढ़ से मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली भारत की राष्ट्रीय राजधानी है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। यहाँ केन्द्र सरकार की कई प्रशासन संस्थायें हैं। औपचारिक रूप से नई दिल्ली भारत की राजधानी है। &lt;br /&gt;
*1483 वर्ग किलोमीटर (572 वर्ग मील) में फैली दिल्ली भारत का दूसरा तथा दुनिया का आठवां सबसे बड़ा महानगर है। यहाँ की जनसंख्या लगभग 1.4 करोड है। यहाँ बोली जाने वाली मुख्य भाषायें है: हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, और अंग्रेज़ी। &lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
*इतिहास के अनुसार दिल्ली को तत्कालीन शासकों ने इसके स्वरूप में कई बार परिवर्तन किया। पुरानी दिल्ली की स्थापना 17 वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा की गई थी, वहीं नई दिल्ली जिसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा करवाया गया था। प्राचीनकाल से पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया हैं तथा समय-समय पर इसका नाम भी परिवर्तित किया जाता रहा था। दिल्ली में कई राजाओं/सम्राटों के साम्राज्य के उदय तथा पतन के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं। सही मायने में दिल्ली हमारे देश के भविष्य, भूतकाल एवं वर्तमान परिस्थितियों का मेल है। &lt;br /&gt;
*भारत की राजधानी दिल्ली के संबंध विद्वानों का विश्वास है कि यहीं पर महाभारत काल में पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। &lt;br /&gt;
*ऐतिहासिक दिल्ली का निर्माण तोमर नरेश अनंगपाल ने 11वीं शताब्दी में कराया था। उसने जहां इस समय कुतुबमीनार हे वहां पर एक लाल क़िला भी बनवाया था। बाद में अजमेर के चौहान राजाओं ने इस पर कब्जा किया। लेकिन 1193 ई॰ में मौहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान से इसे छीनकर दिल्ली में हिन्दू शासन का अंत कर दिया। &lt;br /&gt;
*1193 ई॰ से 1857 ई॰ के थोड़े से अंतराल को छोड़कर मुस्लिम शासक यहाँ से राज्य करते रहे। कुछ समय के लिए [[बाबर]], [[अकबर]] और [[जहाँगीर]] ने [[आगरा]] को अपनी राजधानी बनाया था। इस लंबी अवधि में दिल्ली लूटी भी गई। &lt;br /&gt;
*1398 ई॰ में तैमूरलंग ने, 1739 ई॰ में [[नादिरशाह]] ने और 1757 ई॰ में [[अहमदशाह अब्दाली]] ने आक्रमण किया, शहर को खूब लूटा और हजारों व्यक्तियों को क़त्ल कर डाला। &lt;br /&gt;
*1803 ई॰ में दिल्ली पर अंगेजों का अधिकार हो गया और मुग़ल बादशाह नाम के शासक रह गए। 1858 ई॰ में बहादुरशाह के रंगून में कैद हो जाने के बाद नाममात्र की यह बादशाहत भी जाती रही। अंगेजों ने पहले अपने भारतीय साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता को बनाया था। 1911 ई॰ में वे राजधानी दिल्ली ले आए। अब इस राजधानी क्षेत्र का शासन प्रबंध केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में उपराज्यपाल के अधीन होता है। दिल्ली का बराबर विस्तार हो रहा है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-Gate-2.jpg|thumb|इंडिया गेट&amp;lt;br /&amp;gt; India Gate]]&lt;br /&gt;
*इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां और पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी है, जिसके किनारे यह बसा है। &lt;br /&gt;
*यह प्राचीन समय में [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान से होकर जानेवाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था। &lt;br /&gt;
*[[यमुना नदी|यमुना]] नदी के किनारे स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। यह भारत का अति प्राचीन नगर है। इसके इतिहास की शुरुआत सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है। &lt;br /&gt;
*हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। महाभारत काल में इसका नाम इन्द्रप्रस्थ था। &lt;br /&gt;
*दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। यहाँ कई प्राचीन एवं मध्यकालीन इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*1639 में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] ने दिल्ली में ही एक चाहरदीवारी से घिरे शहर का निर्माण करवाया जो कि 1679 से 1857 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। &lt;br /&gt;
*18वीं एवं 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया था। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। &lt;br /&gt;
*1911 में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को वापस दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। &lt;br /&gt;
*अंग्रेजों से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त कर नई दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया । &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का प्रवास हुआ इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। विभिन्न प्रान्तों, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तो हुआ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया। &lt;br /&gt;
*आज दिल्ली भारत का एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केन्द्र है। &lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Lotus-Temple.jpg|कमल मन्दिर (लोटस मन्दिर), दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Lotus Temple, Delhi&lt;br /&gt;
चित्र:Red-Fort.jpg|लाल किला, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Red Fort, Delhi&lt;br /&gt;
चित्र:Sansad-Bhawan.jpg|संसद भवन, दिल्ली&amp;lt;br /&amp;gt; Parliament House, Delhi&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>दिल्ली</title>
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		<updated>2010-05-06T11:27:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[State::दिल्ली]] / Delhi&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|क़ुतुब मीनार, दिल्‍ली&amp;lt;br /&amp;gt; Qutub Minar, Delhi|thumb]]&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] काल में [[पाण्डव|पाण्डवों]] द्वारा बसाया गया [[इन्द्रप्रस्थ]] नगर, दिल्ली आज हमारे देश का हृदय कहलाता है। &lt;br /&gt;
*पर्यटकों के आकर्षण के साथ-साथ यह हमारे देश का मुख्य राजनीतिक केन्द्र भी है। &lt;br /&gt;
*समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 230 मीटर तथा फैलाव 1483 वर्ग कि.मी. क्षेत्र है। &lt;br /&gt;
*यहाँ के ऐतिहासिक स्थल तथा रमणीय स्थल अपने आप में विशेष हैं। &lt;br /&gt;
*पर्यटन विकास के उद्वेश्य से यह [[आगरा]] और [[जयपुर]] से जुडा है।&lt;br /&gt;
*इसकी सीमाएं [[उत्तर प्रदेश]], [[हरियाणा]], राजस्थान, पंजाब और चंडीगढ़ से मिलती हैं।&lt;br /&gt;
*दिल्ली भारत की राष्ट्रीय राजधानी है। इसमें नई दिल्ली सम्मिलित है जो कि ऐतिहासिक पुरानी दिल्ली के बाद बसी थी। यहाँ केन्द्र सरकार की कई प्रशासन संस्थायें हैं। औपचारिक रूप से नई दिल्ली भारत की राजधानी है। &lt;br /&gt;
*1483 वर्ग किलोमीटर (572 वर्ग मील) में फैली दिल्ली भारत का दूसरा तथा दुनिया का आठवां सबसे बड़ा महानगर है। यहाँ की जनसंख्या लगभग 1.4 करोड है। यहाँ बोली जाने वाली मुख्य भाषायें है: हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, और अंग्रेज़ी। &lt;br /&gt;
==इतिहास से==&lt;br /&gt;
*इतिहास के अनुसार दिल्ली को तत्कालीन शासकों ने इसके स्वरूप में कई बार परिवर्तन किया। पुरानी दिल्ली की स्थापना 17 वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] द्वारा की गई थी, वहीं नई दिल्ली जिसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा करवाया गया था। प्राचीनकाल से पुरानी दिल्ली पर अनेक राजाओं एवं सम्राटों ने राज्य किया हैं तथा समय-समय पर इसका नाम भी परिवर्तित किया जाता रहा था। दिल्ली में कई राजाओं/सम्राटों के साम्राज्य के उदय तथा पतन के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं। सही मायने में दिल्ली हमारे देश के भविष्य, भूतकाल एवं वर्तमान परिस्थितियों का मेल है। &lt;br /&gt;
*भारत की राजधानी दिल्ली के संबंध विद्वानों का विश्वास है कि यहीं पर महाभारत काल में पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। &lt;br /&gt;
*ऐतिहासिक दिल्ली का निर्माण तोमर नरेश अनंगपाल ने 11वीं शताब्दी में कराया था। उसने जहां इस समय कुतुबमीनार हे वहां पर एक लाल क़िला भी बनवाया था। बाद में अजमेर के चौहान राजाओं ने इस पर कब्जा किया। लेकिन 1193 ई॰ में मौहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान से इसे छीनकर दिल्ली में हिन्दू शासन का अंत कर दिया। &lt;br /&gt;
*1193 ई॰ से 1857 ई॰ के थोड़े से अंतराल को छोड़कर मुस्लिम शासक यहाँ से राज्य करते रहे। कुछ समय के लिए [[बाबर]], [[अकबर]] और [[जहाँगीर]] ने [[आगरा]] को अपनी राजधानी बनाया था। इस लंबी अवधि में दिल्ली लूटी भी गई। &lt;br /&gt;
*1398 ई॰ में तैमूरलंग ने, 1739 ई॰ में [[नादिरशाह]] ने और 1757 ई॰ में [[अहमदशाह अब्दाली]] ने आक्रमण किया, शहर को खूब लूटा और हजारों व्यक्तियों को क़त्ल कर डाला। &lt;br /&gt;
*1803 ई॰ में दिल्ली पर अंगेजों का अधिकार हो गया और मुग़ल बादशाह नाम के शासक रह गए। 1858 ई॰ में बहादुरशाह के रंगून में कैद हो जाने के बाद नाममात्र की यह बादशाहत भी जाती रही। अंगेजों ने पहले अपने भारतीय साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता को बनाया था। 1911 ई॰ में वे राजधानी दिल्ली ले आए। अब इस राजधानी क्षेत्र का शासन प्रबंध केंद्र-शासित प्रदेश के रूप में उपराज्यपाल के अधीन होता है। दिल्ली का बराबर विस्तार हो रहा है। &lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
[[चित्र:India-Gate-2.jpg|thumb|इंडिया गेट&amp;lt;br /&amp;gt; India Gate]]&lt;br /&gt;
*इसके दक्षिण पश्चिम में अरावली पहाड़ियां और पूर्व में [[यमुना नदी|यमुना]] नदी है, जिसके किनारे यह बसा है। &lt;br /&gt;
*यह प्राचीन समय में [[गंगा नदी|गंगा]] के मैदान से होकर जानेवाले वाणिज्य पथों के रास्ते में पड़ने वाला मुख्य पड़ाव था। &lt;br /&gt;
*[[यमुना नदी|यमुना]] नदी के किनारे स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। यह भारत का अति प्राचीन नगर है। इसके इतिहास की शुरुआत सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है। &lt;br /&gt;
*हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में हुई खुदाई से इस बात के प्रमाण मिले हैं। महाभारत काल में इसका नाम इन्द्रप्रस्थ था। &lt;br /&gt;
*दिल्ली सल्तनत के उत्थान के साथ ही दिल्ली एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक शहर के रूप में उभरी। यहाँ कई प्राचीन एवं मध्यकालीन इमारतों तथा उनके अवशेषों को देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
*1639 में मुग़ल बादशाह [[शाहजहाँ]] ने दिल्ली में ही एक चाहरदीवारी से घिरे शहर का निर्माण करवाया जो कि 1679 से 1857 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही। &lt;br /&gt;
*18वीं एवं 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया था। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया। &lt;br /&gt;
*1911 में अंग्रेजी सरकार ने फैसला किया कि राजधानी को वापस दिल्ली लाया जाए। इसके लिए पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए नगर नई दिल्ली का निर्माण प्रारम्भ हुआ। &lt;br /&gt;
*अंग्रेजों से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त कर नई दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया । &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों का प्रवास हुआ इससे दिल्ली के स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुआ। विभिन्न प्रान्तों, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तो हुआ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लिया। &lt;br /&gt;
*आज दिल्ली भारत का एक प्रमुख राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वाणिज्यिक केन्द्र है। &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[Category:राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>सारनाथ</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
'''सारनाथ / Sarnath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सारनाथ [[काशी]] से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान [[बुद्ध]] ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने &amp;quot;धर्म चक्र प्रवर्तन&amp;quot; प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ [[सावन]] के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह [[जैन]] तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद गौरी]] ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय [[बौद्ध]] धर्म के अनुयायों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किमी दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अशोक]] के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है जो गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मप्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के लिए जगद्विख्यात है। बौद्धकाल में इसे ऋषिपत्तन (पाली-इसीपत्तन) भी कहते थे क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के केंद्र काशी के निकट होने के कारण यहाँ भी ऋषि-मुनि निवास करते थे। ऋषिपट्टन के निकट ही मृगदाव नामक मृगों के रहने का वन था। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार [[शिव]] को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है। [[चित्र:Sarnath-Stupa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था। किंतु , जैसे [[गया]] आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन [[विदिशा]] का साँची, [[अयोध्या]] का [[साकेत]] आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे। &lt;br /&gt;
==प्रमाण==&lt;br /&gt;
*गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था।  इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया।  बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। &amp;lt;ref&amp;gt; पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तीसरी शती ई॰पू॰ में [[अशोक]] ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई [[स्तूप]] और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर [[मौर्य वंश|मौर्य]] सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का [[राजुबुल|सिंह शीर्ष]] तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई॰ में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फ़ाह्यान]] इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।  &lt;br /&gt;
*6ठी शती ई॰ में [[हूण|हूणों]] ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।  &lt;br /&gt;
*7वीं शती ई॰ के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने [[वाराणसी]] और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।  &lt;br /&gt;
*युवानच्वांग ने सारनाथ में 100 हिन्दू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-2.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
*11वीं शती में महमूद ग़ज़नवी ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।  &lt;br /&gt;
*तत्पश्चात 1194 ई॰ में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।  &lt;br /&gt;
*1794 ई॰ में काशी-नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
----  &lt;br /&gt;
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई॰ में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे। &lt;br /&gt;
1854 ई॰ में भारत सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फर्ग्युसन से खरीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंधकुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] द्वारा अंकित 1588 ई॰ का एक फ़ारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें [[हुमायूँ]] के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। [[कनिंघम]] ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था किंतु कोई अवशेष न मिले&amp;lt;/ref&amp;gt;; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। &amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05&amp;lt;/ref&amp;gt; ख़ुदाइर में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-3.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
==कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई॰ में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में [[तीर्थंकर]] भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई॰ में जब पुरातत्व विभाग ने ख़ुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Sarnath-1.jpg|बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षा देते हुए भगवान बुद्ध &amp;lt;br /&amp;gt;Buddha Giving Dikha to his Disciples&lt;br /&gt;
चित्र:Chinese-Buddhist-Temple-1.jpg|सारनाथ उत्तर प्रदेश में स्थित चीनी बौद्ध मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt;Chinese Buddhist Temple in Sarnath, Uttar Pradesh&lt;br /&gt;
चित्र:Sanchi-3.jpg|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Sarnath.jpg|बुद्ध, सारनाथ&amp;lt;br /&amp;gt; Buddha, Sarnath&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]][[Category:बौद्ध दर्शन]][[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
	</entry>
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		<title>चित्र:Buddha-Sarnath.jpg</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>सारनाथ</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: /* वीथिका */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
'''सारनाथ / Sarnath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सारनाथ [[काशी]] से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान [[बुद्ध]] ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने &amp;quot;धर्म चक्र प्रवर्तन&amp;quot; प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ [[सावन]] के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह [[जैन]] तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद गौरी]] ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय [[बौद्ध]] धर्म के अनुयायों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किमी दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अशोक]] के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है जो गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मप्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के लिए जगद्विख्यात है। बौद्धकाल में इसे ऋषिपत्तन (पाली-इसीपत्तन) भी कहते थे क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के केंद्र काशी के निकट होने के कारण यहाँ भी ऋषि-मुनि निवास करते थे। ऋषिपट्टन के निकट ही मृगदाव नामक मृगों के रहने का वन था। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार [[शिव]] को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है। [[चित्र:Sarnath-Stupa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था। किंतु , जैसे [[गया]] आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन [[विदिशा]] का साँची, [[अयोध्या]] का [[साकेत]] आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे। &lt;br /&gt;
==प्रमाण==&lt;br /&gt;
*गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था।  इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया।  बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। &amp;lt;ref&amp;gt; पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तीसरी शती ई॰पू॰ में [[अशोक]] ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई [[स्तूप]] और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर [[मौर्य वंश|मौर्य]] सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का [[राजुबुल|सिंह शीर्ष]] तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई॰ में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फ़ाह्यान]] इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।  &lt;br /&gt;
*6ठी शती ई॰ में [[हूण|हूणों]] ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।  &lt;br /&gt;
*7वीं शती ई॰ के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने [[वाराणसी]] और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।  &lt;br /&gt;
*युवानच्वांग ने सारनाथ में 100 हिन्दू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-2.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
*11वीं शती में महमूद ग़ज़नवी ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।  &lt;br /&gt;
*तत्पश्चात 1194 ई॰ में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।  &lt;br /&gt;
*1794 ई॰ में काशी-नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
----  &lt;br /&gt;
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई॰ में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे। &lt;br /&gt;
1854 ई॰ में भारत सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फर्ग्युसन से खरीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंधकुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] द्वारा अंकित 1588 ई॰ का एक फ़ारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें [[हुमायूँ]] के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। [[कनिंघम]] ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था किंतु कोई अवशेष न मिले&amp;lt;/ref&amp;gt;; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। &amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05&amp;lt;/ref&amp;gt; ख़ुदाइर में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-3.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
==कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई॰ में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में [[तीर्थंकर]] भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई॰ में जब पुरातत्व विभाग ने ख़ुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Sarnath-1.jpg|बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षा देते हुए भगवान बुद्ध &amp;lt;br /&amp;gt;Buddha Giving Dikha to his Disciples&lt;br /&gt;
चित्र:Chinese-Buddhist-Temple-1.jpg|सारनाथ उत्तर प्रदेश में स्थित चीनी बौद्ध मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt;Chinese Buddhist Temple in Sarnath, Uttar Pradesh&lt;br /&gt;
चित्र:Sanchi-3.jpg|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]][[Category:बौद्ध दर्शन]][[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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		<title>सारनाथ</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
'''सारनाथ / Sarnath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सारनाथ [[काशी]] से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान [[बुद्ध]] ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने &amp;quot;धर्म चक्र प्रवर्तन&amp;quot; प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ [[सावन]] के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह [[जैन]] तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद गौरी]] ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय [[बौद्ध]] धर्म के अनुयायों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किमी दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अशोक]] के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है जो गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मप्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के लिए जगद्विख्यात है। बौद्धकाल में इसे ऋषिपत्तन (पाली-इसीपत्तन) भी कहते थे क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के केंद्र काशी के निकट होने के कारण यहाँ भी ऋषि-मुनि निवास करते थे। ऋषिपट्टन के निकट ही मृगदाव नामक मृगों के रहने का वन था। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार [[शिव]] को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है। [[चित्र:Sarnath-Stupa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था। किंतु , जैसे [[गया]] आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन [[विदिशा]] का साँची, [[अयोध्या]] का [[साकेत]] आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे। &lt;br /&gt;
==प्रमाण==&lt;br /&gt;
*गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था।  इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया।  बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। &amp;lt;ref&amp;gt; पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तीसरी शती ई॰पू॰ में [[अशोक]] ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई [[स्तूप]] और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर [[मौर्य वंश|मौर्य]] सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का [[राजुबुल|सिंह शीर्ष]] तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई॰ में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फ़ाह्यान]] इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।  &lt;br /&gt;
*6ठी शती ई॰ में [[हूण|हूणों]] ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।  &lt;br /&gt;
*7वीं शती ई॰ के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने [[वाराणसी]] और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।  &lt;br /&gt;
*युवानच्वांग ने सारनाथ में 100 हिन्दू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-2.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
*11वीं शती में महमूद ग़ज़नवी ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।  &lt;br /&gt;
*तत्पश्चात 1194 ई॰ में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।  &lt;br /&gt;
*1794 ई॰ में काशी-नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
----  &lt;br /&gt;
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई॰ में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे। &lt;br /&gt;
1854 ई॰ में भारत सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फर्ग्युसन से खरीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंधकुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] द्वारा अंकित 1588 ई॰ का एक फ़ारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें [[हुमायूँ]] के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। [[कनिंघम]] ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था किंतु कोई अवशेष न मिले&amp;lt;/ref&amp;gt;; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। &amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05&amp;lt;/ref&amp;gt; ख़ुदाइर में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-3.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
==कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई॰ में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में [[तीर्थंकर]] भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई॰ में जब पुरातत्व विभाग ने ख़ुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery width=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Buddha-Sarnath-1.jpg|बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षा देते हुए भगवान बुद्ध &amp;lt;br /&amp;gt;Buddha Giving Dikha to his Disciples&lt;br /&gt;
चित्र:Chinese-Buddhist-Temple-1.jpg|सारनाथ उत्तर प्रदेश में स्थित चीनी बौद्ध मंदिर&amp;lt;br /&amp;gt;Chinese Buddhist Temple&lt;br /&gt;
चित्र:Sanchi-3.jpg|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]][[Category:बौद्ध दर्शन]][[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
'''सारनाथ / Sarnath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
सारनाथ [[काशी]] से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान [[बुद्ध]] ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने &amp;quot;धर्म चक्र प्रवर्तन&amp;quot; प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ [[सावन]] के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह [[जैन]] तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-[[अशोक]] का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख [[स्तूप]], चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, [[मुहम्मद ग़ोरी|मुहम्मद गौरी]] ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय [[बौद्ध]] धर्म के अनुयायों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किमी दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद [[गौतम बुद्ध]] ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। &lt;br /&gt;
सम्राट [[अशोक]] के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिक तथ्य==&lt;br /&gt;
इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है जो गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मप्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के लिए जगद्विख्यात है। बौद्धकाल में इसे ऋषिपत्तन (पाली-इसीपत्तन) भी कहते थे क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के केंद्र काशी के निकट होने के कारण यहाँ भी ऋषि-मुनि निवास करते थे। ऋषिपट्टन के निकट ही मृगदाव नामक मृगों के रहने का वन था। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार [[शिव]] को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है। [[चित्र:Sarnath-Stupa.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार [[बौद्ध धर्म]] के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था। किंतु , जैसे [[गया]] आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन [[विदिशा]] का साँची, [[अयोध्या]] का [[साकेत]] आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे। &lt;br /&gt;
==प्रमाण==&lt;br /&gt;
*गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था।  इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया।  बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। &amp;lt;ref&amp;gt; पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*तीसरी शती ई॰पू॰ में [[अशोक]] ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई [[स्तूप]] और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर [[मौर्य वंश|मौर्य]] सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का [[राजुबुल|सिंह शीर्ष]] तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई॰ में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फ़ाह्यान]] इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।  &lt;br /&gt;
*6ठी शती ई॰ में [[हूण|हूणों]] ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।  &lt;br /&gt;
*7वीं शती ई॰ के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने [[वाराणसी]] और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।  &lt;br /&gt;
*युवानच्वांग ने सारनाथ में 100 हिन्दू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-2.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa]]&lt;br /&gt;
*11वीं शती में महमूद ग़ज़नवी ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।  &lt;br /&gt;
*तत्पश्चात 1194 ई॰ में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।  &lt;br /&gt;
*1794 ई॰ में काशी-नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।&lt;br /&gt;
----  &lt;br /&gt;
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई॰ में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे। &lt;br /&gt;
1854 ई॰ में भारत सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फर्ग्युसन से खरीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंधकुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् [[अकबर]] द्वारा अंकित 1588 ई॰ का एक फ़ारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें [[हुमायूँ]] के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। [[कनिंघम]] ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था किंतु कोई अवशेष न मिले&amp;lt;/ref&amp;gt;; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। &amp;lt;ref&amp;gt;आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05&amp;lt;/ref&amp;gt; ख़ुदाइर में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।  [[चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-3.jpg|thumb|साँची स्तूप&amp;lt;br /&amp;gt; Sanchi Stupa|left]]&lt;br /&gt;
==कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं==&lt;br /&gt;
सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई॰ में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में [[तीर्थंकर]] भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई॰ में जब पुरातत्व विभाग ने ख़ुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म]][[Category:बौद्ध दर्शन]][[Category:पर्यटन कोश]] [[Category:ऐतिहासिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>चित्र:Sanchi-Buddhist-Stuppa-3.jpg</title>
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		<updated>2010-05-02T07:12:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Aadarsh Adani: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>चित्र:Sarnath-Stupa.jpg</title>
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		<updated>2010-05-02T07:08:14Z</updated>

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		<author><name>Aadarsh Adani</name></author>
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