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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>सूर्यवंश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{बहुविकल्प|बहुविकल्पी शब्द=सूर्य|लेख का नाम=सूर्य (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
*क्षत्रियों के दो प्रधान वंशों में से एक जिसका आरम्भ [[इक्ष्वाकु]] से माना जाता है, जिन्होंने त्रेता युग में अयोध्या में राज किया। &lt;br /&gt;
*पुराने जमाने में हमारे यहाँ क्षत्रियों के दो ख़ानदान बहुत प्रसिद्ध थे। एक [[चन्द्रवंश]], दूसरा सूर्यवंश, राम सूर्य वंशी थे। &lt;br /&gt;
*सूर्य वंशी राजाओं का इतिहास [[पुराण|पुराणों]] में मिलता है। &lt;br /&gt;
*[[अयोध्या]] उनकी राजधानी थी और राज्य का नाम [[महाजनपद|कोशल]] था। &lt;br /&gt;
*यह अयोध्या [[सरयू नदी]] के तट तीर्थ के रूप में विद्यमान है। इसको राजा युवनाश्व ने बसाया। &lt;br /&gt;
*ये [[मांधाता]] के पुत्र थे। भगवान [[राम]] सूर्यवंश में उत्पन्न हुए। &lt;br /&gt;
*यह वंश राजा [[इक्ष्वाकु]] से शु्रू हुआ। &lt;br /&gt;
*[[भागवत]] के अनुसार सूर्यवंश के आदिपुरुष इक्ष्वाकु थे जिन्होंने [[युग|त्रेतायुग]] में अयोध्या में राज किया। &lt;br /&gt;
*इससे पहले [[कश्यप]] थे। कश्यप के पुत्र [[सूर्य देवता|सूर्य]] और सूर्य के पुत्र के पुत्र [[वैवस्वत मनु|वैवश्वत मनु]] हुए। इन्हीं वैवश्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु थे। इसी वंश में बाद में [[दशरथ]], [[राम]], [[लव कुश|लव-कुश]] आदि का जन्म हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूर्यवंश का वंश वृक्ष==&lt;br /&gt;
{{:सूर्यवंश वृक्ष}}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
{{पौराणिक वंश}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक वंश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=134719</id>
		<title>राजपूत काल</title>
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		<updated>2011-03-14T00:05:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''राजपूतों''' के इतिहास के बारे में अभिलेखों एवं समकालीन तथा बाद के कुछ साहित्यों से जानकारी मिलती है। अभिलेखों में [[ग्वालियर]] एवं [[ऐहोल]] अभिलेख तथा साहित्य में नयचन्द्रसूरि का 'हम्मीर महाकाव्य', पद्मगुप्त का 'नवसाहसांकचरित', हलायुध की 'पिंगलसूत्रवृति', 'कुमारपाल चरित', 'वर्ण रत्नाकार' एवं [[पृथ्वीराजरासो]] आदि प्रमुख है।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==राजपूतों की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
'''इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति के विषय में''' विद्धानों के दो मत प्रचलित हैं- एक का मानना है कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी है, जबकि दूसरे का मानना है कि, राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय है। [[हर्षवर्धन]] की मृत्यु के उपरान्त जिन महान शक्तियों का उदय हुआ था, उनमें अधिकांश [[राजपूत]] वर्ग के अन्तर्गत ही आते थे।ऐजेन्ट टोड ने 12वीं शताब्दी के उत्तर [[भारत]] के इतिहास को 'राजपूत काल' भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीन काल एवं मध्य काल को 'संधि काल' भी कहा है। इस काल के महत्त्वपूर्ण राजपूत वंशों में [[राष्ट्रकूट वंश]], [[चालुक्य वंश]], [[चौहान वंश]], [[चंदेल वंश]], [[परमार वंश]] एवं [[गहड़वाल वंश]] आदि आते हैं।&lt;br /&gt;
==साम्राज्य विस्तार==&lt;br /&gt;
[[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर पहले [[पाल वंश]] का अधिकार था, बाद में [[सेन वंश]] का अधिकार हुआ। उत्तरकालीन पाल शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण 'महीपाल' था। जिसने उत्तरी [[भारत]] में [[महमूद ग़ज़नवी]] के आक्रमण के समय क़रीब पचास वर्षों तक राज किया। इस काल में उसने अपने राज्य का विस्तार बंगाल के अलावा [[बिहार]] में भी किया। उसने कई नगरों का निर्माण किया तथा कई पुराने धार्मिक भवनों की मरम्मत करवाई, जिनमें से कुछ [[नालन्दा]] तथा [[बनारस]] में थे। उसकी मृत्यु के बाद [[कन्नौज]] के गहड़वालों ने बिहार से धीरे-धीरे पालों के अधिकार को समाप्त कर दिया और बनारस को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। इसी दौरान चौहान अपने साम्राज्य का विस्तार [[अजमेर]] से लेकर [[गुजरात]] की ओर कर रहे थे। वे [[दिल्ली]] और [[पंजाब]] की ओर भी बढ़ रहे थे। इस प्रयास में उन्हें गहड़वालों का सामना करना पड़ा। इन्हीं आपसी संघर्षों के कारण राजपूत पंजाब से ग़ज़नवियों को बाहर निकालने में असफल रहे। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर ग़ज़नवियों ने [[उज्जैन]]  पर भी आक्रमण किया।&lt;br /&gt;
==राजपूत का अर्थ==&lt;br /&gt;
[[राजपूत]] शब्द [[संस्कृत]] के 'राजपुत्र' का अपभ्रंश है। सामान्यत: इसका अर्थ होता है, 'राजा का पुत्र' या शाही परिवार के किसी व्यक्ति का 'राजपुत्र'। सम्भवतः प्राचीन काल में इस शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में न करके राजपरिवार के सदस्यों के लिए किया जाता था, पर हर्ष की मृत्यु के बाद राजपूत या राजपुत्र शब्द का प्रयोग जाति के रूप में होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहासकारों के मत==&lt;br /&gt;
'''डॉ. गौरी शंकर ओझा''' राजपूतों की उत्पत्ति प्राचीन क्षत्रिय जाति से मानते हैं। [[राजतरंगिणी]] में 36 क्षत्रिय कुलों का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से उत्पन्न बताते हैं। यह अनुश्रति [[पृथ्वीराजरासो]] (चन्द्ररबरदाई कृत) के वर्णन पर आधारित है। पृथ्वीराजरासो के अतिरिक्त 'नवसाहसांक' चरित, 'हम्मीररासो', 'वंश भास्कर' एवं 'सिसाणा' अभिलेख में भी इस अनुश्रति का वर्णन मिलता है। कथा का संक्षिप्त रूप् इस प्रकार है- 'जब पृथ्वी दैत्यों के आतंक से आक्रांत हो गयी, तब महर्षि वशिष्ठ ने दैत्यों के विनाश के लिए [[माउंट आबू|आबू पर्वत]] पर एक अग्निकुण्ड का निर्माण कर [[यज्ञ]] किया। इस यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- [[गुर्जर प्रतिहार वंश|प्रतिहार]], [[परमार वंश|परमार]], [[चौहान वंश|चौहान]] एवं [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] की उत्पत्ति हुई। [[भारत]] में अन्य राजपूत वंश इन्ही की संतान हैं। 'दशरथ शर्मा', 'डॉ. गौरी शंकर ओझा' एवं 'सी.वी. वैद्य' इस कथा को मात्र काल्पनिक मानते हैं।&lt;br /&gt;
==विदेशी जाति का मत==&lt;br /&gt;
'''विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में''' महत्त्वपूर्ण स्थान 'कर्नल जेम्स टॉड' का है। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों ([[राजपूत]] एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विलियम क्रुक ने''' 'कर्नल जेम्स टॉड' के मत का समर्थन किया है। 'वी.ए. स्मिथ' के अनुसार [[शक]] तथा [[कुषाण]] जैसी विदेशी जातियां [[भारत]] आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भारतीय इतिहासकारों में''' 'ईश्वरी प्रसाद' एवं 'डी.आर. भंडारकर' ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर तथा [[कनिंघम]] के अनुसार राजपूत विदेशी थे।&lt;br /&gt;
इन तमाम विद्वानों के तर्को के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि [[राजपूत]] क्षत्रियों के वंशज थे, फिर भी उनमें विदेशी रक्त का मिश्रण अवश्य था। अतः वे न तो पूर्णतः विदेशी थे, न तो पूर्णत भारतीय।&lt;br /&gt;
==राजपूत समाज का मुख्य आधार==&lt;br /&gt;
'''राजपूत राज्यों में भी सामंतवादी व्यवस्था''' का प्रभाव था। [[राजपूत]] समाज का मुख्य आधार वंश था। हर वंश अपने को एक योद्धा का वंशज बताता था, जो वास्तविक भी हो सकता था और काल्पनिक भी। अलग-अलग वंश अलग-अलग क्षेत्रों पर शासन करते थे। इनके राज्यों के अंतर्गत 12, 24, 48 या 84 ग्राम आते थे। राजा इन ग्रामों की भूमि अपने सरदारों में बाँट देता था, जो फिर इसी तरह अपने हिस्से की भूमि को राजपूत योद्धाओं को, अपने परिवारों और घोड़ों के रख-रखाव के लिए बाँट देते थे। राजपूतों की प्रमुख विशेषता अपनी भूमि, परिवार और अपने मान-सम्मान के साथ लगाव था। हर राजपूत राज्य का राजा अधिकतर अपने भाइयों की सहायता से शासन करता था। यद्यपि सारी भूमि पर राजा का ही अधिकार था। भूमि पर नियंत्रण को सम्मान की बात समझने के कारण विद्रोह अथवा उत्तराधिकारी के न होने जैसी विशेष स्थितियों में ही राजा ज़मीन वापस ले लेता था।&lt;br /&gt;
==अनुशासनहीनता==&lt;br /&gt;
'''राजपूतों की समाज व्यवस्था के लाभ भी थे''' और नुक़सान भी। लाभ तो यह था कि राजपूतों में भाईचारे और समानता की भावना व्याप्त थी, पर दूसरी ओर इसी भावना के कारण उनमें अनुशासन लाना कठिन था। उनकी दूसरी कमज़ोरी आपसी संघर्ष था, जो पुश्तों तक चलता था। पर उनकी मूल कमज़ोरी यह थी कि, वे अपने ही अलग गुट बनाते और दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे। वे भाईचारे की भावना में ग़ैर राजपूतों को शामिल नहीं करते थे। इससे शासन करने वाले राजपूतों और आम जनता, जो अधिकतर राजपूत नहीं थी, के बीच अन्तर बढ़ता गया। आज भी राजपूत [[राजस्थान]] की आबादी के कुल छ्ह प्रतिशत के लगभग हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में भी राजपूतों तथा उनके द्वारा शासित प्रदेशों की पूरी आबादी के बीच यही अनुपात रहा होगा।&lt;br /&gt;
==धार्मिक स्वतंत्रता==&lt;br /&gt;
'''उस काल में अधिकतर राजपूत''' राजा [[हिन्दू]] थे, यद्यपि कुछ [[जैन धर्म]] के भी समर्थक थे। वे [[ब्राह्मण]] और मन्दिरों को बड़ी मात्रा में धन और भूमि का दान करते थे। वे वर्ण व्यवस्था तथा ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों के पक्ष में थे। इसलिए कुछ राजपूती राज्यों में तो [[भारत]] की स्वतंत्रता और भारतीय संघ में उनके विलय तक ब्राह्मणों से अपेक्षाकृत कम लगान वसूल किया जाता था। इन विशेषाधिकारों के बदले ब्राह्मण राजपूतों को प्राचीन [[सूर्यवंश|सूर्य]] और [[चन्द्रवंश|चन्द्रवंशी]] क्षत्रियों के वंशज मानने को तैयार थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुर्जर प्रतिहार वंश</title>
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		<updated>2011-02-20T12:32:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'प्रतिहार वंश' को [[गुर्जर प्रतिहार वंश]] इसलिए कहा गया, क्योंकि ये [[गुर्जर|गुर्जरों]] की ही एक शाखा थे, जिनकी उत्पत्ति [[गुजरात]] व दक्षिण-पश्चिम [[राजस्थान]] में हुई थी। प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें [[श्रीराम]] के अनुज [[लक्ष्मण]] का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था। [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]] कवि 'पम्प' ने [[महिपाल]] को 'गुर्जर राजा' कहा है। 'स्मिथ' [[ह्वेनसांग]] के वर्णन के आधार पर उनका मूल स्थान [[माउंट आबू|आबू पर्वत]] के उत्तर-पश्चिम में स्थित भीनमल को मानते हैं। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार उनका मूल स्थान [[अवन्ति]] था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक==&lt;br /&gt;
*[[नागभट्ट प्रथम]] (730 - 756 ई.)&lt;br /&gt;
*[[वत्सराज]] (783 - 795 ई.)&lt;br /&gt;
*[[नागभट्ट द्वितीय]] (795 - 833 ई.)&lt;br /&gt;
*[[मिहिरभोज]] (भोज प्रथम) (836 - 889 ई.)&lt;br /&gt;
*[[महेन्द्र पाल]] (890 - 910 ई.)&lt;br /&gt;
*[[महिपाल]] (914 - 944 ई.)&lt;br /&gt;
*[[भोज द्वितीय]]&lt;br /&gt;
*विनायकपाल&lt;br /&gt;
*महेन्द्रपाल द्वितीय&lt;br /&gt;
*[[देवपाल (प्रतिहार वंश)|देवपाल]] (940 - 955 ई.)&lt;br /&gt;
*महिपाल द्वितीय&lt;br /&gt;
*विजयपाल&lt;br /&gt;
*राज्यपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर}}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राजवंश]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रतिहार साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>सदस्य वार्ता:Bhinmal</title>
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		<updated>2011-01-29T21:52:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: /* स्वागत */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==स्वागत==&lt;br /&gt;
भिनमाल जी, भारतकोश पर आपका स्वागत है। भारतकोश पर संपादन कार्य शुरू करने पर भारतकोश टीम की ओर से आपको शुभकामनाएँ ! यदि आपको संपादन करने में कोई परेशानी हो तो मेरे वार्ता पन्ने पर संपर्क करें। [[चित्र:nib4.png|35px|top|link=User:गोविन्द राम]]&amp;lt;span class=&amp;quot;sign&amp;quot;&amp;gt;[[User:गोविन्द राम|गोविन्द राम]] | &amp;lt;small&amp;gt;[[सदस्य वार्ता:गोविन्द राम|वार्ता]]&amp;lt;/small&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;  18:30, 28 जनवरी 2011 (IST)&lt;br /&gt;
::धन्यवाद :)[[सदस्य:Bhinmal|Bhinmal]] 03:22, 30 जनवरी 2011 (IST)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>भारत का इतिहास</title>
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		<updated>2011-01-27T21:40:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: /* गुर्जर प्रतिहार राजवंश */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{इतिहास}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:bharat-name.jpg|100px]] में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। इसके पश्चात एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300 ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। हड़प्पा की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की कुल्ली संस्कृति और राजस्थान तथा पंजाब की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'भारत का इतिहास' रोमिला थापर) पृष्ठ संख्या-19&amp;lt;/ref&amp;gt; जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण [[केरल]] से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। जिसका आधार [[अफ़्रीक़ा]] के प्राचीन मानव से जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) का मिलना है। &amp;lt;ref&amp;gt;देखें: '''शोध ग्रंथ''' {{cite book |last=वेल्स|first=स्पेन्सर|url =http://books.google.ca/books?id=WAsKm-_zu5sC&amp;amp;lpg=PP1&amp;amp;dq=The%20Journey%20of%20Man&amp;amp;pg=PP1#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=true |title=अ जेनेटिक ओडिसी|year=2002|publisher=प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रॅस, न्यू जर्सी, सं.रा.अमरीका|language=अंग्रेज़ी||id=ISBN 0-691-11532-X}} &amp;lt;/ref&amp;gt; यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत==&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास जानने के स्त्रोत को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता हैं-&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
साहित्यिक साक्ष्य, विदेशी यात्रियों का विवरण, पुरातत्त्व सम्बन्धी साक्ष्य&lt;br /&gt;
====साहित्यिक साक्ष्य====&lt;br /&gt;
साहित्यिक साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जाता सकता है- &lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य। &lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है। &lt;br /&gt;
*ब्राह्मण ग्रन्थों में - &lt;br /&gt;
[[वेद]], [[उपनिषद]], [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण]], [[स्मृतियाँ|स्मृति ग्रन्थ]] आते हैं।&lt;br /&gt;
*ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में [[जैन]] तथा [[बौद्ध]] ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक ग्रन्थ, जीवनी, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धर्म-ग्रन्थ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही [[भारत]] के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म''' - ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वेद'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{main|वेद}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेद एक महत्त्वपूर्ण ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ है। वेद शब्द का अर्थ ‘ज्ञान‘ महतज्ञान अर्थात ‘पवित्र एवं आध्यात्मिक ज्ञान‘ है। यह शब्द [[संस्कृत]] के ‘विद्‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेदों के संकलनकर्ता 'कृष्ण द्वैपायन' थे। कृष्ण द्वैपायन को वेदों के पृथक्करण-व्यास के कारण 'वेदव्यास' की संज्ञा प्राप्त हुई। वेदों से ही हमें आर्यो के विषय में प्रारम्भिक जानकारी मिलती है। कुछ लोग वेदों को अपौरूषेय अर्थात दैवकृत मानते है। वेदों की कुल संख्या चार है-&lt;br /&gt;
*[[ऋग्वेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[सामवेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[यजुर्वेद]]- इसमें यागानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है।&lt;br /&gt;
*[[अथर्ववेद]]- यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vedic-Tradition-1.jpg|120px|left]]&lt;br /&gt;
=====ग्रंथों की प्रकृति=====&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद, इन चारों वेदों को 'संहिता' कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*इनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद के सम्मिलित संग्रह को 'वेदत्रयी' कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*उपर्युक्त चारों वेदों में से प्रत्येक के एक-एक उपवेद भी है। &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद' है, सामवेद का उपवेद 'गन्धर्ववेद' है, जो संगीत से संबद्व है। &lt;br /&gt;
*यजुर्वेद का उपवेद 'धनुर्वेद' है, जो युद्व कलाओं का वर्णन करता है।&lt;br /&gt;
*अथर्ववेद का उपवेद 'शिल्पवेद' है। &lt;br /&gt;
*इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण उपवेद है 'आयुर्वेद' है। &lt;br /&gt;
*इसके आठ भाग हैं- शल्य, शालक्य, काय-चिकित्सा, भूत विद्या, कुमारभृत्य, अंगदतन्त्र, रसायन और वाजीकरण। &lt;br /&gt;
*एक मान्यता के अनुसार आयुर्वेद के जन्मदाता प्रजापति ([[ब्रह्मा]]), धनुर्वेद के जन्मदाता [[विश्वामित्र]], गन्धर्व के जन्मदाता [[नारद]] तथा शिल्पवेद के जन्मदाता [[विश्वकर्मा]] थे। &lt;br /&gt;
*इन ग्रन्थों से प्राचीन भारत में प्रचलित विभिन्न विधाओं का ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vedic-Tradition-2.jpg|120px|left]]&lt;br /&gt;
====ब्राह्मण ग्रंथ====&lt;br /&gt;
{{main|ब्राह्मण साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। यहां पर 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा प्रस्तुत की गयी है। यह ग्रंथ अधिकतर गद्य में लिखे हुए हैं। इनमें उत्तरकालीन समाज तथा संस्कृति के सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण होते हैं।&lt;br /&gt;
==आरण्यक==&lt;br /&gt;
{{main|आरण्यक साहित्य}}&lt;br /&gt;
आरयण्कों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों यथा, आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का वर्णन होता है। इन ग्रंथों को आरयण्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन ग्रंथों का मनन अरण्य अर्थात वन में किया जाता था। ये ग्रन्थ अरण्यों (जंगलों) में निवास करने वाले संन्यासियों के मार्गदर्शन के लिए लिखे गए थै। आरण्यकों में ऐतरेय आरण्यक, शांखायन्त आरण्यक, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक तथा तवलकार आरण्यक (इसे जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण भी कहते हैं) मुख्य हैं। ऐतरेय तथा शांखायन ऋग्वेद से, बृहदारण्यक शुक्ल यजुर्वेद से, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तवलकार आरण्यक सामवेद से सम्बद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। आरण्यक ग्रन्थों में प्राण विद्या की महिमा का प्रतिपादन विशेष रूप से मिलता है। इनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी हैं, जैसे- तैत्तिरीय आरण्यक में [[कुरु]], [[पंचाल]], [[काशी]], [[विदेह]] आदि [[महाजनपद|महाजनपदों]] का उल्लेख है।&lt;br /&gt;
==उपनिषद==&lt;br /&gt;
{{main|उपनिषद}}&lt;br /&gt;
उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। लेकिन शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों  पर स्पना भाष्य लिखा है, उनको प्रमाणिक माना गया है।ये हैं - ईश, केन, माण्डूक्य, मुण्डक, तैत्तिरीय, ऐतरेय, प्रश्न, छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद। इसके अतिरिक्त श्वेताश्वतर  और कौषीतकि उपनिषद भी महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार 103 उपनिषदों में से केवल 13 उपनिषदों को ही प्रामाणिक माना गया है। भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' मुण्डोपनिषद से लिया गया है। उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें [[प्रश्नोपनिषद|प्रश्न]], [[माण्डूक्योपनिषद|माण्डूक्य]], [[केनोपनिषद|केन]], [[तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय]], [[ऐतरेयोपनिषद|ऐतरेय]], [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्य]], [[बृहदारण्यकोपनिषद|बृहदारण्यक]] और [[कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद|कौषीतकि उपनिषद]] गद्य में हैं तथा [[केनोपनिषद|केन]], [[ईशावास्योपनिषद|ईश]], [[कठोपनिषद|कठ]] और [[श्वेताश्वतरोपनिषद|श्वेताश्वतर उपनिषद]] पद्य में हैं।&lt;br /&gt;
==वेदांग==&lt;br /&gt;
{{main|वेदांग}}&lt;br /&gt;
वेदों के अर्थ को अच्छी तरह समझने में वेदांग काफ़ी सहायक होते हैं। वेदांग शब्द से अभिप्राय है- 'जिसके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को समझने में सहायता मिले'। वेदांगो की कुल संख्या 6 है, जो इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#शिक्षा - वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य 'प्रातिशाख्य' है। &lt;br /&gt;
#कल्प - वैदिक कर्मकाण्डों को सम्पन्न करवाने के लिए निश्चित किए गये विधि नियमों का प्रतिपादन '[[कल्पसूत्र]]' में किया गया है।&lt;br /&gt;
#व्याकरण - इसके अन्तर्गत समासों एवं सन्धि आदि के नियम, नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग आदि के नियम बताये गये हैं। [[पाणिनि]] की [[अष्टाध्यायी]] प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।&lt;br /&gt;
#निरूक्त - शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र 'निरूक्त' कहलातें है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघण्टु‘ की व्याख्या हेतु [[यास्क]] ने 'निरूक्त' की रचना की थी, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।&lt;br /&gt;
#छन्द - वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
#ज्योतिष - इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसकें प्राचीनतम आचार्य 'लगध मुनि' है।&lt;br /&gt;
ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। &lt;br /&gt;
*धर्मशास्त्र में चार साहित्य आते हैं- 1- धर्म सूत्र, 2- स्मृति, 3- टीका एवं 4- निबन्ध ।&lt;br /&gt;
=====&amp;lt;u&amp;gt;आर्यों के आदि स्थल सूची&amp;lt;/u&amp;gt;=====&lt;br /&gt;
{{आदिकाल सूची1}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृतियां==&lt;br /&gt;
{{main|स्मृतियाँ}}&lt;br /&gt;
स्मृतियों को 'धर्म शास्त्र' भी कहा जाता है- 'श्रस्तु वेद विज्ञेयों धर्मशास्त्रं तु वैस्मृतिः।' स्मृतियों का उदय सूत्रों को बाद हुआ। मनुष्य के पूरे जीवन से सम्बधित अनेक क्रिया-कलापों के बारे में असंख्य विधि-निषेधों की जानकारी इन स्मृतियों से मिलती है। सम्भवतः [[मनुस्मृति]] (लगभग 200 ई.पूर्व. से 100 ई. मध्य) एवं [[याज्ञवल्क्य स्मृति]] सबसे प्राचीन हैं। उस समय के अन्य महत्त्वपूर्ण स्मृतिकार थे- [[नारद]], [[पराशर]], [[बृहस्पति]], [[कात्यायन]], [[गौतम]], संवर्त, हरीत, [[अंगिरा]] आदि, जिनका समय सम्भवतः 100 ई. से लेकर 600 ई. तक था। मनुस्मृति से उस समय के [[भारत]] के बारे में राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी मिलती है। [[नारद स्मृति]] से [[गुप्त वंश]] के संदर्भ में जानकारी मिलती है। मेधातिथि, मारूचि, कुल्लूक भट्ट, गोविन्दराज आदि टीकाकारों ने 'मनुस्मृति' पर, जबकि विश्वरूप, अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि ने 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर भाष्य लिखे हैं।&lt;br /&gt;
==महाकाव्य==&lt;br /&gt;
'[[रामायण]]' एवं '[[महाभारत]]', भारत के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं। यद्यपि इन दोनों महाकाव्यों के रचनाकाल के विषय में काफ़ी विवाद है, फिर भी कुछ उपलब्ध साक्ष्यों के आधर पर इन महाकाव्यों का रचनाकाल चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य माना गया है।&lt;br /&gt;
====रामायण====&lt;br /&gt;
{{main|रामायण}}&lt;br /&gt;
रामायण की रचना [[बाल्मीकि|महर्षि बाल्मीकि]] द्वारा पहली एवं दूसरी शताब्दी के दौरान [[संस्कृत|संस्कृत भाषा]] में की गयी । बाल्मीकि कृत रामायण में मूलतः 6000 श्लोक थे, जो कालान्तर में 12000 हुए और फिर 24000 हो गये । इसे 'चतुर्विशिति साहस्त्री संहिता' भ्री कहा गया है। बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- [[बाल काण्ड वा. रा.|बालकाण्ड]], [[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्याकाण्ड]], [[अरण्य काण्ड वा. रा.|अरण्यकाण्ड]], [[किष्किन्धा काण्ड वा. रा.|किष्किन्धाकाण्ड]], [[सुन्दर काण्ड वा. रा.|सुन्दरकाण्ड]], [[युद्ध काण्ड वा. रा.|युद्धकाण्ड]] एवं [[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तराकाण्ड]] नामक सात काण्डों में बंटा हुआ है। रामायण द्वारा उस समय की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है। रामकथा पर आधारित ग्रंथों का अनुवाद सर्वप्रथम [[भारत]] से बाहर [[चीन]] में किया गया। भूशुण्डि रामायण को 'आदिरामायण' कहा जाता है।   	&lt;br /&gt;
====महाभारत====&lt;br /&gt;
{{main|महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[व्यास|महर्षि व्यास]] द्वारा रचित [[महाभारत]] महाकाव्य [[रामायण]] से बृहद है। इसकी रचना का मूल समय ईसा पूर्व चौथी शताब्दी माना जाता है। महाभारत में मूलतः 8800 श्लोक थे तथा इसका नाम 'जयसंहिता' (विजय संबंधी ग्रंथ) था। बाद में श्लोकों की संख्या 24000 होने के पश्चात यह वैदिक जन [[भरत (दुष्यंत पुत्र)|भरत]] के वंशजों की कथा होने के कारण ‘भारत‘ कहलाया। कालान्तर में [[गुप्त काल]] में श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख होने पर यह 'शतसाहस्त्री संहिता' या 'महाभारत' केहलाया। महाभारत का प्रारम्भिक उल्लेख 'आश्वलाय गृहसूत्र' में मिलता है। वर्तमान में इस महाकाव्य में लगभग एक लाख श्लोकों का संकलन है। महाभारत महाकाव्य 18 पर्वो- [[आदि पर्व महाभारत|आदि]], [[सभा पर्व महाभारत|सभा]], [[वन पर्व महाभारत|वन]], [[विराट पर्व महाभारत|विराट]], [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग]], [[भीष्म पर्व महाभारत|भीष्म]], [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोण]], [[कर्ण पर्व महाभारत|कर्ण]], [[शल्य पर्व महाभारत|शल्य]], [[सौप्तिक पर्व महाभारत|सौप्तिक]], [[स्त्री पर्व महाभारत|स्त्री]], [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्ति]], [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन]], [[आश्वमेधिक पर्व महाभारत|अश्वमेघ]], [[आश्रमवासिक पर्व महाभारत|आश्रमवासी]], [[मौसल पर्व महाभारत|मौसल]], [[महाप्रास्थानिक पर्व महाभारत|महाप्रास्थानिक]] एवं [[स्वर्गारोहण पर्व महाभारत|स्वर्गारोहण]] में विभाजित है। महाभारत में ‘हरिवंश‘ नाम परिशिष्ट है। इस महाकाव्य से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
=====&amp;lt;u&amp;gt;महाजनपद सूची&amp;lt;/u&amp;gt;=====&lt;br /&gt;
{{महाजनपद सूची1}}&lt;br /&gt;
==पुराण==&lt;br /&gt;
{{main|पुराण}}&lt;br /&gt;
प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रंथ को [[पुराण]] कहते हैं। सम्भवतः 5वीं से 4थी शताब्दी ई.पू. तक पुराण अस्तित्व में आ चुके थे। [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] में पुराणों के पांच लक्षण बताये ये हैं। यह हैं- सर्प, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित। कुल पुराणों की संख्या 18 हैं- 1. [[ब्रह्म पुराण]] 2. [[पद्म पुराण]] 3. [[विष्णु पुराण]] 4. [[वायु पुराण]] 5. [[भागवत पुराण]] 6. [[नारद पुराण|नारदीय पुराण]], 7. [[मार्कण्डेय पुराण]] 8. [[अग्नि पुराण]] 9. [[भविष्य पुराण]] 10. [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]], 11. [[लिंग पुराण]] 12. [[वराह पुराण]] 13. [[स्कन्द पुराण]] 14. [[वामन पुराण]] 15. [[कूर्म पुराण]] 16. [[मत्स्य पुराण]] 17. [[गरुड़ पुराण]] और 18. [[ब्रह्माण्ड पुराण]]&lt;br /&gt;
इन पुराणों में विष्णु, मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड, तथा भागवत पुराण सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्व के हैं क्योंकि इनमें राजाओं की वंशावलियां पायी जाती हैं। अठारह पुराणों में सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक मत्स्य पुराण है। इसके द्वारा [[सातवाहन वंश]] के विषय में विशेष जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त विष्णु पुराण से [[मौर्य वंश]] एवं [[गुप्त वंश]] की एवं वायु पुराण से [[शुंग वंश]] एवं [[गुप्त वंश]] के विषय में विशेष जानकारी मिलती है। इस प्रकार पुराणों से हमें शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, सातवाहन एवं गुप्त वंश के विषय में ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
मार्कण्डेय पुराण मुख्यतः देवी [[दुर्गा]] से संबधित है। इसी में 'दुर्गा सप्तशती' नामक अंश शामिल है। अग्नि पुराण में तांत्रिक पद्धति का उल्लेख है। इसी पुराण में [[गणेश]] पूजा का प्रथम बार उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य==&lt;br /&gt;
{{main|बौद्ध साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[बौद्ध साहित्य]] को ‘[[त्रिपिटक]]‘ कहा जाता है। महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरान्त आयोजित विभिन्न बौद्ध संगीतियों में संकलित किये गये त्रिपिटक (संस्कृत त्रिपिटक) सम्भवतः सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ हैं। वुलर एवं रीज डेविड्ज महोदय ने ‘पिटक‘ का शाब्दिक अर्थ टोकरी बताया है। त्रिपिटक हैं। &lt;br /&gt;
[[सुत्तपिटक]], [[विनयपिटक]] और [[अभिधम्मपिटक]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जैन साहित्य==&lt;br /&gt;
{{main|जैन साहित्य}}&lt;br /&gt;
ऐतिहसिक जानकारी हेतु [[जैन साहित्य]] भी [[बौद्ध साहित्य]] की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक उपलब्ध जैन साहित्य [[प्राकृत]] एवं [[संस्कृत]] भाषा में मिलतें है। जैन साहित्य, जिसे ‘आगम‘ कहा जाता है, इनकी संख्या 12 बतायी जाती है। आगे चलकर इनके 'उपांग' भी लिखे गये । आगमों के साथ-साथ जैन ग्रंथों में 10 प्रकीर्ण, 6 छंद सूत्र, एक नंदि सूत्र एक अनुयोगद्वार एवं चार मूलसूत्र हैं। इन आगम ग्रंथों की रचना सम्भवतः श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यो द्वारा [[महावीर|महावीर स्वामी]] की मृत्यु के बाद की गयी। &lt;br /&gt;
==लौकिक साहित्य==&lt;br /&gt;
इस प्रकार के साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं समसामयिक साहित्य आते हैं, ऐसे साहित्य को धर्मेत्तर साहित्य भी कहते हैं इस प्रकार की कृतियों से तत्कालीन भारतीय समाज के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को जानने में काफ़ी मदद मिलती है। ऐसी रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्र का किया जाता है। व्याकरण के पितामह आचार्य पाणिनि का अष्टाध्यायी, विशाखदत्त का [[मुद्राराक्षस]], [[पतंजलि|महर्षि पतंजलि]] का [[महाभाष्य]], [[कालिदास]] का [[मालविकाग्निमित्रम्]], [[बाणभट्ट]] का [[हर्षचरित]], [[भास]] का [[स्वप्नवासवदत्तम]], शूद्रक  [[मृच्छकटिकम]], [[कल्हण]] का [[राजतरंगिणी]] आदि साहित्य से विभिन्न ऐतिहासिक जनकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत का प्रारम्भिक इतिहास ‘संगम साहित्य‘ से ज्ञात होता है। &lt;br /&gt;
*सुदूर दक्षिण के [[पल्लव वंश|पल्लव]] और [[चोल वंश|चोल]] शासको का इतिहास नन्दिकक्लम्बकम, कलिंगत्तुपर्णि, चोल चरित आदि से प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विदेशियों के विवरण==&lt;br /&gt;
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारियाँ मिलती है। इनको तीन भागों में बांट सकते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;यूनानी-रोमन लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;, &amp;lt;u&amp;gt;चीनी लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;, &amp;lt;u&amp;gt;अरबी लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
====यूनानी-रोमन लेखक====&lt;br /&gt;
*यूनानी लेखकों को तीन भागों में बांटा जा सकता है- &lt;br /&gt;
#[[सिकन्दर]] के पूर्व के [[यूनानी]] लेखक &lt;br /&gt;
#सिकन्दर के समकालीन यूनानी लेखक &lt;br /&gt;
#सिकन्दर के बाद के लेखक&lt;br /&gt;
*टेसियस और हेरोडोटस [[यूनान]] और [[रोम]] के प्राचीन लेखकों में से हैं। टेसियस 'ईरानी राजवैद्य' था, उसने भारत के विषय में समस्त जानकारी ईरानी अधिकारियों से प्राप्त की थी। हेरोडोटस, जिसे 'इतिहास का पिता' कहा जाता है, ने 5वी. शताब्दी में ई.पू. में ‘हिस्टोरिका‘ नामक पुस्तक की रचना की थी, जिसमें भारत और [[फ़ारस]] के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।&lt;br /&gt;
*नियार्कस, आनेसिक्रिटस और अरिस्टोवुलास ये सभी लेखक [[सिकन्दर]] के समकालीन। इन लेखकों द्वारा जो भी विवरण तत्कालीन भारतीय इतिहास से जुड़ा है वह अपने में प्रमाणिक है।&lt;br /&gt;
*सिकन्दर के बाद के लेखकों में महत्त्वपूर्ण था [[मेगस्थनीज]] जो यूनानी राजा [[सेल्यूकस]] का राजदूत था। उसने [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] के दरबार में करीब 14 वर्षो तक समय व्यतीत किया। उसने ‘इण्डिका ‘ नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें तत्कालीन मौर्यवंशीय समाज एवं संस्कृति का विवरण दिया था। डाइमेकस, सीरियन नरेश अन्तियोकस का राजदूत था जो [[बिन्दुसार]] के राजदरबार में काफ़ी दिनों तक रहा। डायोनिसियस [[मिस्र]] नरेश 'टॉलमी फिलाडेल्फस' के राजदूत के रूप में काफ़ी दिनों तक [[अशोक|सम्राट अशोक]] के राज दरबार में रहा था।&lt;br /&gt;
*अन्य पुस्तकों में 'पेरीप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी', लगभग 150 ई. के आसपास टॉलमी का भूगोल, [[प्लिनी]] का 'नेचुरल हिस्टोरिका' (ई. की प्रथम सदी) महत्त्वपूर्ण है। ‘पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी‘ ग्रंथ जिसकी रचना 80 से 115 ई. के बीच हुई है, में भारतीय बन्दरगाहों एवं व्यापारिक वस्तुओं का विवरण मिलता है। प्लिनी के ‘नेचुरल हिस्टोरिका‘ से भारतीय पशु, पेड़-पौधों एवं खनिज पदार्थो की जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
====चीनी लेखक====&lt;br /&gt;
चीनी लेखकों के विवरण से भी भारतीय इतिहास पर प्रचुर प्रभाव पड़ता है सभी चीनी लेखक यात्री [[बौद्ध]] मतानुयायी थे और वे इस धर्म के विषय में कुछ विषय जानकारी के लिए ही [[भारत]] आये थे। चीनी बौद्ध यात्रियों में से प्रमुख थे- &lt;br /&gt;
[[फ़ाह्यान]], [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]], [[इत्सिंग]], मल्वानलिन, चाऊ-जू-कुआ आदि।&lt;br /&gt;
*मल्वानलिन ने [[हर्षवर्धन|हर्ष]] के पूर्व अभियान एवं 'चाऊ-जू-कुआ' ने [[चोल साम्राज्य|चोलकालीन]] इतिहास पर प्रकाश डाला।&lt;br /&gt;
====अरबी लेखक====&lt;br /&gt;
पूर्व मध्यकालीन भारत के समाज और संस्कृति के विषयों में हमें सर्वप्रथम अरब व्यापारियों एवं लेखकों से विवरण प्राप्त होता है। इन व्यापारियों और लेखकों में मुख्य हैं- &lt;br /&gt;
[[अलबेरूनी]], [[सुलेमान]] और [[अलमसूदी]]।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त विदेशी यात्रियों के विवरण के अतिरिक्त कुछ फारसी लेखकों के विवरण भी प्राप्त होते है जिनसे भारतीय इतिहास के अध्ययन में काफ़ी सहायता मिलती है। इसमें महत्त्वपूर्ण हैं- &lt;br /&gt;
#फिरदौसी (940-1020 ई.) कृतशाहनामा, (Book of Kings) &lt;br /&gt;
#रशदुद्वीन कृत 'जमीएत अल तवारीख़' अली अहमद कृत ‘चाचनामा‘ मिनहाज-उल-सिराज कृत ‘तबकात-ए-नासिरी‘, जियाउद्वीन बरनी कृत ‘तारीख-ए-फिरोजशाही एवं [[अबुल फ़ज़ल]] कृत ‘अकबरनामा‘ आदि।&lt;br /&gt;
#यूरोपीय यात्रियों में 13 वी शताब्दी में वेनिस (इटली) से आये से सुप्रसिद्व यात्री मार्कोपोलों द्वारा दक्षिण के पाण्ड्य राज्य के विषय में जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुरातत्व==&lt;br /&gt;
पुरातात्विक साक्ष्य के अंतर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियां चित्रकला आदि आते हैं।&lt;br /&gt;
{{राज्य सीमा मानचित्र सूची1}}&lt;br /&gt;
====अभिलेख====&lt;br /&gt;
इतिहास निमार्ण में सहायक पुरातत्त्व सामग्री में अभिलेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये अभिलेख अधिकांशतः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं पात्रों, मूर्तियों, गुहाओं आदि में खुदे हुए मिलते हैं। यद्यपि प्राचीनतम अभिलेख मध्य एशिया के ‘बोगजकोई‘ नाम स्थान से करीब 1400 ई.पू. में पाये गये जिनमें अनेक वैदिक देवताओं - [[इन्द्र]], मित्र, [[वरुण देवता|वरूण]], नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अपने यथार्थ रूप में अभिलेख हमें सर्वप्रथम [[अशोक]] के शासन काल में ही मिलतें हैं।''' एक अभिलेख, जो [[हैदराबाद]] में 'मास्की' नामक स्थान पर स्थित है, में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त 'गुर्जरा', [[मध्य प्रदेश]], 'पानगुड्इया',मध्य प्रदेश से प्राप्त लेखों में भी अशोक का नाम मिलता है। अन्य अभिलेखों में उसको देवताओं का प्रिय ‘प्रियदर्शी‘ राजा कहा गया है। अशोक के अभिलेख मुख्यतः [[ब्राह्मी लिपि|ब्राह्यी]], [[खरोष्ठी]] तथा आरमाइक लिपियों में मिलतें हैं जिसमें अधिकांश ब्राह्यी में खुदे हुए हैं। इस लिपि को बांयी से दायीं ओर लिखा जाता है। पश्चिमोत्तर प्रान्त में प्रयुक्त होने वाली ‘खरोष्ठी लिपि‘ दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी। [[पाकिस्तान]] और [[अफ़ग़ानिस्तान]], में पाये गये अशोक के अभिलेखों में प्रयुक्त लिपि आरमाइक व यूनानी थी।&lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
अशोक के बाद अभिलेखों की परम्परा से जुड़े अन्य अभिलेख इस प्रकार हैं- [[खारवेल]] का [[हाथीगुम्फ़ा शिलालेख|खारवेल का हाथीगुम्फा]], [[शक]] क्षत्रप प्रथम रुद्रदामान का जूनागढ़ अभिलेख, [[सातवाहन]] नरेश पुलुमावी का नासिक गुहालेख, हरिषेण द्वारा लिखित [[समुद्रगुप्त]] का [[प्रयाग]] स्तम्भ लेख, मालव नरेश यशोवर्मन का मन्दसौर अभिलेख, [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] नरेश पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख, [[चालुक्य वंश||प्रतिहार]] नरेश भोज का [[ग्वालियर]] अभिलेख, [[स्कन्दगुप्त]] का [[भितरी]] तथा जूनागढ़ लेख, [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] के शासक विजय सेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादि। कुछ गैर सरकारी अभिलेख हैं जैसे यवन राजदूत हेलियाडोरस का बेसनगर, [[विदिशा]] से प्राप्त गरुड़ स्तम्भ लेख। इससे द्वितीय शताब्दी ई.पू. में भारत में भागवत धर्म के विकसित होने के साक्ष्य मिलते हैं। [[मध्य प्रदेश]] के एरण से प्राप्त वराह प्रतिमा पर [[हूण]] राजा तोरमाण के लेखों का विवरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रायें====&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास अध्ययन में मुद्राओं की अतीव महत्ता है। भारत की प्राचीनतम मुद्राएं छठी शती ई.पू. में प्रचलित हुई। इन पर लेख नहीं होते थे। कुछ प्रतीक जैसे पर्वत, वृक्ष, पक्षी, मानव, पुष्प, जयामितीय आकृति आदि अंकित रहते थे। इन्हें आहत मुद्रा (पंच मार्क्ड क्वायन्स) कहा जाता था। सर्वप्रथम भारत में शासन करने वाले यूनानी शासकों की मुद्राओं पर लेख एवं तिथियां उत्कीर्ण मिलती हैं। सर्वाधिक मुद्राएं उत्तर [[मौर्य काल]] में मिलती हैं जो प्रधानतः सीसे, पोटीन, ताबें, कांसे, चांदी और सोने की होती हैं। [[कुषाण|कुषाणों]] के समय में सर्वाधिक शुद्ध सुवर्ण मुद्राएं प्रचलन में थे, पर सर्वाधिक सुवर्ण मुद्राएं [[गुप्त काल]] में जारी की गयी। समुद्रगुप्त की कुछ मुद्राओं पर 'यूप' पर '[[अश्वमेध यज्ञ]]' और कुछ पर [[वीणा]] बजाते हुए दिखाया गया है। [[कनिष्क]] की मुद्राओं से यह पता चलता है कि वह [[बौद्ध धर्म]] का अनुयायी था। सातवाहन नरेश शातकर्णि की एक मुद्रा पर जलपोत का चित्र उत्कीर्ण है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि उसने समुद्र विजय की थी। [[चन्द्रगुप्त द्वितीय]] की व्याघ्रशैली की मुद्राओं से उसकी पश्चिमी भारत के शकों की विजय सूचित होती है।&lt;br /&gt;
====स्मारक एवं भवन====&lt;br /&gt;
इतिहास निर्माण में भारतीय स्थापत्यकारों, वास्तुकारों और चित्रकारों ने अपने हथियार, छेनी, कन्नी, और तूलिका के द्वारा विशेष योगदान दिया। इनके द्वारा निर्मित प्राचीन इमारतें, मंदिर मूर्तियों के अवशेषों से भारत की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का ज्ञान होता है। खुदाई में मिले महत्त्वपूर्ण अवशेषों में [[हड़प्पा|हडप्पा सभ्यता]], [[पाटलिपुत्र]] की खुदाई में [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] के समय लकड़ी के बने राजप्रसाद के ध्वंसावशेष, [[कौशाम्बी]] की खुदाई से महाराज उदयन के राजप्रसाद एवं घोषितराम [[बिहार]] के अवशेष अंतरजीखेड़ा में खुदाई से लोहे के प्रयोग के साक्ष्य, [[पांडिचेरी]] के अरिकामेडु में खुदाई से रोमन मुद्राओं, बर्तन आदि के अवशेषों से तत्कालीन इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है। उस समय मंदिर निर्माण की प्रचलित [[नागर शैली|नागर शैलियों]] में ‘ नागर शैली‘ उत्तर भारत में प्रचलित थी जबकि [[द्रविड़ शैली]] दक्षिण भारत में प्रचलित थी। [[दक्षिणापथ]] में निर्मित वे मंदिर जिसमें नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का समावेश है उसे ‘वेसर शैली‘ कहा गया है। 8वीं शताब्दी में जावा में निर्मित बोराबुदुर मंदिर से बौद्ध धर्म की पहचान शाखा के प्रचलित होने का प्रमाण मिलता है।&lt;br /&gt;
====मूर्तियां====&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण [[कुषाण काल]] से आरम्भ होता है। कुषाणें, गुप्त शासकों एवं उत्तर गुप्तकाल में निर्मित मूर्तियों के विकास में जनसामान्य की धार्मिक भावनाओं का विशेष योगदान रहा है। कुषाणकालीन मूर्तियों एवं गुप्तकालीन मूर्तियों में व्याप्त मूलभूत अंतर इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
*कुषाणकालीन मूर्तियां विदेशी प्रभाव से ओतप्रोत हैं वहीं पर गुप्तकालीन मूर्तियां स्वाभविकता से ओत-प्रोत हैं। &lt;br /&gt;
*भरहुत, [[बोधगया]], सांची और अमरावती में मिली मूर्तियां, मूर्तिकला में जनसामान्य के जीवन की अति सजीव झांकी प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
{{इन्हेंभीदेखें|मूर्ति कला मथुरा}}&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्रकला]] से हमें उस समय के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। [[अजंता]] के चित्रों में मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। चित्रों में ‘माता और शिशु‘ या ‘मरणशील राजकुमारी‘ जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक पराकाष्ठा का पूर्ण प्रमाण मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाषाण काल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Stone-Tools-mohenjo-daro.jpg|thumb|अस्त्र, [[मोहनजोदाड़ो]] 3000 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
{{main|भारत का इतिहास पाषाण काल}}&lt;br /&gt;
समस्त इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा एकता है-&lt;br /&gt;
#प्राक्इतिहास या प्रागैतिहासिक काल(Prehistoric Age), &lt;br /&gt;
#आद्य ऐतिहासिक काल(Proto-historic Age)&lt;br /&gt;
#ऐतिहासिक काल(Historic Age)&lt;br /&gt;
==भारत की आदिम (प्रारंभिक) जातियां==&lt;br /&gt;
{{main|भारत की आदिम जातियाँ}}&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक काल में [[भारत]] में कितने प्रकार की जातियां निवास करती थीं, उनमें आपसी सम्बन्घ किस स्तर के थे, आदि प्रश्न अत्यन्त ही विवादित हैं। फिर भी नवीनतम सर्वाधिक मान्यताओं में 'डॉ. बी.एस. गुहा' का मत है। भारतवर्ष की प्रारम्भिक जातियों को छः भागों में विभक्त किया जा सकता है। - &lt;br /&gt;
1. नीग्रिटों 2. प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाईड 3. मंगोलायड 4. भूमध्य सागरीय 5. पश्चिमी ब्रेकी सेफल 6. नॉर्डिक&lt;br /&gt;
==सिधु घाटी (सैंधव/हड़प्पा) सभ्यता==&lt;br /&gt;
{{main|सिंधु घाटी सभ्यता}}&lt;br /&gt;
आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व [[पाकिस्तान]] के 'पश्चिमी पंजाब प्रांत' के 'माण्टगोमरी ज़िले' में स्थित 'हरियाणा' के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की जमीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों का निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हे तब हुआ जब 1856 ई. में 'जॉन विलियम ब्रन्टम' ने कराची से [[लाहौर]] तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====विशेष इमारतें====&lt;br /&gt;
सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्त्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्त्वपूर्ण थे - &lt;br /&gt;
दुर्ग, रक्षा-प्राचीर, निवासगृह, चबूतरे, अन्नागार आदि । &lt;br /&gt;
====दुर्ग====&lt;br /&gt;
नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक 'दुर्ग' का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। ह्वीलर द्वारा इस टीले को 'माउन्ट ए-बी' नाम प्रदान किया गया है। दुर्ग के चारों ओर करीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एव रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। दुर्ग का मुख्य प्रवेश मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊंचे 'एफ' नामक टीले पर पकी ईटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास करीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद हैं, जिसमें लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेंहू एवं भूसी के अवशेष मिलतें हैं। इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिलें है, प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं करीब दो कमरे अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये मकान आकार में 17x7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों को दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य करीब 7 मीटर चौड़ा एक रास्ता बना था। प्रत्येक अन्नागार करीब 15.24 मीटर लम्बा एवं 6.10 मीटर चौड़ा हैं। &lt;br /&gt;
====हड़प्पा लिपि====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा लिपि}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई। [[सिंधु लिपि]] में लगभग 64 मूल चिन्ह एवं 205 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। यह लिपि चित्रात्मक थी। यह लिपि अभी तक गढ़ी नहीं जा सकी है। इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में करीब 17 चिन्ह हैं। [[कालीबंगा]] के उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के ठीकरों पर उत्कीर्ण चिन्ह अपने पार्श्ववर्ती दाहिने चिन्ह को काटते हैं। इसी आधार पर 'ब्रजवासी लाल' ने यह निष्कर्ष निकाला है - 'सैंधव लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर को लिखी जाती थी।'&lt;br /&gt;
====मृण्मूर्तियां====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की मृण्मूर्तियां}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मृण्मूर्तियों का निर्माण मिट्टी से किया गया है। इन मृण्मूर्तियों पर मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, बकरा, बाघ, सुअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, बतख एवं कबूतर की मृणमूर्तियां मिली है। मानव मृण्मूर्तियां ठोस है पर पशुओं की खोखली। नर एवं नारी मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां ठोस हैं, पर पशुओ की खोखली। नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है। &lt;br /&gt;
====हड़प्पा सभ्यता के नगरों की विशेषताएं====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा संस्कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी- इसकी नगर योजना। इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थलों के नगर निर्माण में समरूपता थी। नगरों के भवनो के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे।&lt;br /&gt;
====हडप्पा जनजीवन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:King-priest-mohenjo-daro.jpg|thumb|प्रधान अनुष्ठानकर्ता [[मोहनजोदाड़ो]] 2000 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा समाज और संस्कृति}}&lt;br /&gt;
हडप्प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को देखने से ऐसा लगता है कि यह सभ्यता किसी केन्द्रीय शक्ति से संचालित होती थी। वैसे यह प्रश्न अभी विवाद का विषय बना हुआ है, फिर भी चूंकि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग के हाथ में था। &lt;br /&gt;
*ह्नीलर ने सिंधु प्रदेश के लोगों के शासन को 'मध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन' कहा और उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया। &lt;br /&gt;
*स्टुअर्ट पिग्गॉट महोदय ने कहा 'मोहनजोदाड़ों का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक' था। &lt;br /&gt;
*मैके के अनुसार ‘मोहनजोदड़ों का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथों था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सैंधव-सभ्यता का विनाश==&lt;br /&gt;
सैधव-सभ्यता के पतन के संदर्भ में ह्नीलर का मत पूरी तरह से अमान्य हो चुका है। हरियूपिया का उल्लेख जो [[ऋग्वेद]] में प्राप्त है उस ह्नीलर ने हड़प्पा मान लिया और किले को पुर और आर्या के देवता [[इंद्र]] को पुरंदर (किले को नष्ट करने वाला) मानकर यह सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया कि सैंधव नगरों का पतन आर्यो के आक्रमण के कारण् हुआ था। ध्यातव्य है कि ह्नीलर का यह सिद्धान्त तभी खंडित हो जाता है जब सिंधु-सभ्यता को नागरीय सभ्यता घोषित किया जाता है। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त नर कंकाल किसी एक की समय के नहीं है जिनमें व्यापक नरसंहर द्योतित हो रहा है।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ सैधव-सभ्यता के पतन के विषय में इतिहासकारों के मत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! मत&lt;br /&gt;
! इतिहासकार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1- प्रशासनिक शिथिलता के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ।&lt;br /&gt;
| जॉन मार्शल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- जलवायु में हुए परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|ऑरेल स्टाइन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- सिंधु सभ्यता बाढ़ के कारण नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- भू तात्विक परिवर्तन के कारण सभ्यता नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|एम.आर.साहनी, आर.एल.राइक्स, जॉर्ज एफ.डेल्स, एच.टी.लैम्ब्रिक     &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- मोहनजोदाड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या कर दी गयी।&lt;br /&gt;
|डी.डी. कोसाम्बी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- सैंधव सभ्यता विदेशी आक्रमण व आर्यों के आक्रमण से नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|गार्डन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच.गार्डन, स्टुअर्ड पिग्ग्ट&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रागैतिहासिक काल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dancing-girl-mohenjo-daro.jpg|thumb|नृत्यांगना [[मोहनजोदाड़ो]] 2500 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
भारत का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच [[सिंधु घाटी]] में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष [[मोहन जोदड़ो]] (मुअन-जो-दाड़ो) और [[हड़प्पा]] में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में [[आर्य|आर्यों]] का प्रवेश बाद में हुआ।  आर्यों ने पाया कि इस देश में उनसे पूर्व के जो लोग निवास कर रहे थे, उनकी सभ्यता यदि उनसे श्रेष्ठ नहीं तो किसी रीति से निकृष्ट भी नहीं थी। आर्यों से पूर्व के लोगों में सबसे बड़ा वर्ग [[द्रविड़ निवासी|द्रविड़ों]] का था। आर्यों द्वारा वे क्रमिक रीति से उत्तर से दक्षिण की ओर खदेड़ दिये गए। जहाँ दीर्घ काल तक उनका प्रधान्य रहा। बाद में उन्होंने आर्यों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। उनसे विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लिये और अब वे महान भारतीय राष्ट्र के अंग हैं। द्रविड़ों के अलावा देश में और मूल जातियाँ थी, जिनमें से कुछ का प्रतिनिधित्व [[मुण्डा]], कोल, [[भील]] आदि जनजातियाँ करती हैं जो मोन-ख्मेर वर्ग की भाषाएँ बोलती हैं। भारतीय आर्यों का प्राचीनतम साहित्य हमें [[वेद|वेदों]] में विशेष रूप से [[ॠग्वेद]] में मिलता है, जिसका रचनाकाल कुछ विद्वान तीन हज़ार ई. पू. मानते हैं। वेदों में हमें उस काल की सभ्यता की एक झाँकी मिलती है। आर्यों ने इस देश को कोई राजनीतिक एकता प्रदान नहीं की। यद्यपि उन्होंने उसे एक पुष्ट दर्शन और धर्म प्रदान किया, जो [[हिन्दू धर्म]] के नाम से प्रख्यात है और कम से कम चार हज़ार वर्ष से अक्षुण्ण है।&lt;br /&gt;
{{seealso|आर्य|आर्यावर्त|सोम रस|वेद}}&lt;br /&gt;
==महाजनपद युग==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महाजनपद}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''प्राचीन भारतीयों ने कोई तिथि क्रमानुसार इतिहास नहीं सुरक्षित रखा है।''' सबसे प्राचीन सुनिश्चित तिथि जो हमें ज्ञात है, 326 ई. पू. है, जब मक़दूनिया के राजा [[सिकन्दर]] ने भारत पर आक्रमण किया। इस तिथि से पहले की घटनाओं का तारतम्य जोड़ कर तथा साहित्य में सुरक्षित ऐतिहासिक अनुश्रुतियों का उपयोग करके भारत का इतिहास सातवीं शताब्दी ई. पू. तक पहुँच जाता है। इस काल में भारत [[क़ाबुल]] की घाटी से लेकर गोदावरी तक [[सोलह महाजनपद|षोडश जनपदों]] में विभाजित था।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
इन राज्यों मे आपस में बराबर लड़ाई होती रहती थी। छठीं शताब्दी ई. पू. के मध्य में [[बिम्बिसार]] तथा [[अजातशत्रु]] के राज्य काल में [[मगध]] ने [[काशी]]  तथा [[कोशल]] पर अधिकार करने के बाद अपनी सीमाओं का विस्तार आरम्भ किया। इन्हीं दोनों मगध राजाओं के राज्यकाल में वर्धमान [[महावीर]] ने [[जैन धर्म]] तथा [[बुद्ध|गौतम बुद्ध]] ने [[बौद्ध धर्म]] का उपदेश दिया। बाद के काल में मगध राज्य का विस्तार जारी रहा और चौथी शताब्दी ई. पू. के अंत में नन्द राजाओं के शासनकाल में उसका विस्तार [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] से लेकर [[पंजाब]] में [[व्यास नदी]] के तट तक सारे उत्तरी भारत में हो गया।&lt;br /&gt;
{{seealso|ब्राह्मण|अंधक संघ|कृष्ण|ब्रज}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मौर्य और शुंग==&lt;br /&gt;
{{main|मौर्य काल|मौर्य साम्राज्य| शुंग}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chanakya.jpg|thumb|250px|[[चाणक्य]]]]&lt;br /&gt;
यूनानी इतिहासकारों के द्वारा वर्णित 'प्रेसिआई' देश का राजा इतना शक्तिशाली था कि [[सिकन्दर]] की सेनाएँ व्यास पार करके प्रेसिआई देश में नहीं घुस सकीं और सिकन्दर, जिसने 326 ई. में पंजाब पर हमला किया, पीछे लौटने के लिए विवश हो गया। वह सिंधु के मार्ग से पीछे लौट गया। इस घटना के बाद ही मगध पर [[चंद्रगुप्त मौर्य]] (लगभग 322 ई. पू.-298 ई. पू.) ने पंजाब में सिकन्दर जिन यूनानी अधिकारियों को छोड़ गया था, उन्हें निकाल बाहर किया और बाद में एक युद्ध में सिकन्दर के सेनापति [[सेल्युकस]] को हरा दिया। सेल्युकस ने [[हिन्दूकुश]] तक का सारा प्रदेश वापस लौटा कर चन्द्रगुप्त मौर्य से संधि कर ली। चन्द्रगुप्त ने सारे उत्तरी भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसने सम्भ्वतः दक्षिण भी विजय कर लिया। वह अपने इस विशाल साम्राज्य पर अपनी राजधानी [[पाटलिपुत्र]] से शासन करता था। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र वैभव और समृद्धि में सूसा और एकबताना नगरियों को भी मात करती थी। '''उसका पौत्र [[अशोक]] था, जिसने [[कलिंग]] ([[उड़ीसा]]) को जीता। उसका साम्राज्य [[हिमालय]] के पादमूल से लेकर दक्षिण में [[पन्नार नदी]] तक तथा उत्तर पश्चिम में हिन्दूकुश से लेकर उत्तर-पूर्व में [[असम|आसाम]] की सीमा तक विस्तृत था।''' उसने अपने विशाल साम्राज्य के समय साधनों को मनुष्यों तथा पशुओं के कल्याण कार्यों तथा बौद्ध धर्म के प्रसार में लगाकर अमिट यश प्राप्त किया। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भिक्षुओं को [[मिस्र]], मक़दूनिया तथा कोरिन्थ (प्राचीन [[यूनान]] की विलास नगरी) जैसे दूर-दराज स्थानों में भेजा और वहाँ लोकोपकारी कार्य करवाये। उसके प्रयत्नों से बौद्ध धर्म विश्वधर्म बन गया। परन्तु उसकी युद्ध से विरत रहने की शान्तिपूर्ण नीति ने उसके वंश की शक्ति क्षीण कर दी और लगभग आधी शताब्दी के बाद [[पुष्यमित्र शुंग|पुष्यमित्र]] ने उसका उच्छेद कर दिया। पुष्यमित्र ने [[शुंगवंश]] (लगभग 185 ई. पू.- 73 ई. पू.) की स्थापना की, जिसका उच्छेद कराव वंश (लगभग  73 ई. पू.-28 ई. पू.) ने कर दिया।&lt;br /&gt;
{{seealso|अशोक के शिलालेख|अशोक|बुद्ध|बौद्ध दर्शन|बौद्ध धर्म|फ़ाह्यान|पाटलिपुत्र|तक्षशिला}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शक, कुषाण और सातवाहन==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|शक साम्राज्य|कुषाण साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:RabatakInscription.jpg|thumb|130px|[[राबाटक लेख]]]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:kanishk.jpg|thumb|100px|left|[[कनिष्क]]]]&lt;br /&gt;
मौर्यवंश के पतन के बाद मगध की शक्ति घटने लगी और [[सातवाहन]] राजाओं के नेतृत्व में मगध साम्राज्य दक्षिण से अलग हो गया। सातवाहन वंश को [[आन्ध्र वंश]] भी कहते हैं और उसने 50 ई. पू. से 225 ई. तक राज्य किया। भारत में एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के अभाव में बैक्ट्रिया और पार्थिया के राजाओं ने उत्तरी भारत पर आक्रमण शुरू कर दिये। इन आक्रमणकारी राजाओं में [[मिलिंद (मिनांडर)|मिनाण्डर]] सबसे विख्यात है। इसके बाद ही [[शक]] राजाओं के आक्रमण शुरू हो गये और [[महाराष्ट्र]], [[सौराष्ट्र]] तथा [[मथुरा]] शक क्षत्रपों के शासन  में आ गये। इस तरह भारत की जो राजनीतिक एकता भंग हो गयी थी, वह ईस्वीं पहली शताब्दी में [[कुजुल कडफ़ाइसिस]] द्वारा [[कुषाण वंश]] की शुरूआत से फिर स्थापित हो गयी। इस वंश ने तीसरी शताब्दी ईस्वीं के मध्य तक उत्तरी भारत पर राज्य किया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kambojika-2.jpg|thumb|130px|[[कम्बोजिका]]]]&lt;br /&gt;
'''इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा [[कनिष्क]] (लगभग 120-144 ई.) था, जिसकी राजधानी [[पुरुषपुर]] अथवा [[पेशावर]] थी। उसने [[बौद्ध धर्म]] ग्रहण कर लिया और [[अश्वघोष]], [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|नागार्जुन]] तथा [[चरक]] जैसे भारतीय विद्वानों को संरक्षण दिया।''' कुषाणवंश का अज्ञात कारणों से तीसरी शताब्दी के मध्य तक पतन हो गया। इसके बाद भारतीय इतिहास का अंधकार युग आरम्भ होता है। जो चौथी शताब्दी के आरम्भ में [[गुप्तवंश]] के उदय से समाप्त हुआ।&lt;br /&gt;
{{seealso|राबाटक लेख|कुषाण|कनिष्क|कम्बोजिका|कल्हण}} &lt;br /&gt;
==गुप्त==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गुप्त साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Xuanzang.jpg|thumb|80px|[[ह्वेन त्सांग]]]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Udaygiri-Caves-Vidisha-1.jpg|thumb|left|[[वराह अवतार]] भित्ति मू्र्तिकला, गुप्त काल, [[उदयगिरि गुफ़ाएँ]]]]&lt;br /&gt;
लगभग 320 ई. पू. में चन्द्रगुप्त ने गुप्तवंश को प्रचलित किया और [[पाटलिपुत्र]] को फिर से अपनी राजधानी बनाया। गुप्त वंश में एक के बाद एक चार महान शक्तिशाली राजा हुए, जिन्होंने सारे उत्तरी भारत में अपना साम्राज्य विस्तृत कर लिया और दक्षिण के कई राज्यों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उन्होंने हिन्दू धर्म को राज्य धर्म बनाया, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रति सहिष्णुता बरती और ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, वास्तुकला और चित्रकला की उन्नति की। इसी युग में [[कालिदास]], [[आर्यभट्ट]] तथा [[वराहमिहिर]] हुए। [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण|पुराणों]] तथा मनुसंहिता को भी इसी युग में वर्तमान रूप प्राप्त हुआ। चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाह्यान]] ने 401 से 410 ई. के बीच भारत की यात्रा की और उसने उस काल का रोचक वर्णन किया है। उसका मत है कि उस काल में देश में पूरा रामराज्य था। '''स्वाभाविक रूप से गुप्त युग को भारतीय इतिहास का 'स्वर्णयुग' माना जाता है''' और उसकी तुलना एथेन्स के परीक्लीज युग से की जाती है। (पेरीक्लीज (लगभग 492-529 ई. पू.) एथेन्स का महान राजनेता तथा सेनापति था। उसके शासनकाल (460-429 ई. पू.) में एथेन्स उन्नति के शिखर पर पहुँच गया)। आंतरिक विघटन तथा हूणों के आक्रमणों के फलस्वरूप छठी शताब्दी में गुप्त वंश का पतन हो गया। परन्तु सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ में [[हर्षवर्धन]] ने एक दूसरा साम्राज्य खड़ा कर दिया, जिसकी राजधानी [[कन्नौज]] थी। यह साम्राज्य सारे उत्तरी भारत में विस्तृत था। दक्षिण में चालुक्य राजा [[पुलकेशी द्वितीय]] ने उसका साम्राज्य [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] तट से आगे बढ़ने से रोक दिया था। चीनी यात्री [[हुएनसांग]] उसके राज्यकाल में भारत आया था और उसने अपनी यात्रा वर्णन में लिखा है कि हर्षवर्धन बड़ा प्रतापी और शक्तिशाली राजा है। वह 646 ई. में निस्संतान मर गया और उसके बाद सारे उत्तरी भारत में फिर से अव्यवस्था फैल गयी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kirti-Stambh-Chittorgarh.jpg|thumb|100px|कीर्ति स्तम्भ, चित्तौड़गढ़]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गुर्जर प्रतिहार राजवंश==&lt;br /&gt;
{{main|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल [[गुर्जर]] सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे  गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे ''kiu-che-lo'' बोलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
|work=Persian Texts in Translation&lt;br /&gt;
|publisher=The Packard Humanities Institute&lt;br /&gt;
|accessdate=2007-05-31&lt;br /&gt;
|archiveurl = http://web.archive.org/web/20070929130741/http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90 &amp;lt;!-- Bot retrieved archive --&amp;gt; |archivedate = 2007-09-29}}&amp;lt;/ref&amp;gt;६ से १२ वीं सदी में [[गुर्जर]] कई जगह सत्ता में थे।[[गुर्जर प्रतिहार वंश]] की सत्ता कन्नौज से लेकर [[बिहार]], उत्तर प्रदेश, [[महाराष्ट्र]] और [[गुजरात]] तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है।12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भुरि-भुरि प्रशन्शा की है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;अरब लेखको के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयन्कर शत्रु थे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजपूत एवं अन्य राजवंश==&lt;br /&gt;
[[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य]] के विघटन के बाद उत्तर [[भारत]] में कई राजपूत राज्यों की नींव पड़ी।। इनमें पंजाब का हिन्दूशाही राजवंश, [[अजमेर]] का [[चौहान वंश]], [[कन्नौज]] का [[गहड़वाल वंश]] तथा मगध और बंगाल का [[पाल वंश]] था। दक्षिण में भी [[सातवाहन वंश]] के पतन के बाद इसी प्रकार सत्ता का विघटन हो गया। [[उड़ीसा]] के [[गंग वंश]] जिसने पुरी का प्रसिद्ध [[जगन्नाथ मंदिर पुरी|जगन्नाथ मन्दिर]] बनवाया, [[वातापी कर्नाटक|वातापी]] के [[चालुक्य वंश]], जिसके राज्यकाल में [[अजन्ता की गुफ़ाएँ|अजन्ता]] के कुछ गुफ़ा चित्र बने तथा कांची के [[पल्लव वंश]] ने, जिसकी स्मृति उस काल में बनवाये गये कुछ प्रसिद्ध मन्दिरों में सुरक्षित है, दक्षिण को आपस में बांट लिया और परस्पर युद्धों में एक दूसरे का नाश कर दिया। इसके बाद [[मान्यखेट]] अथवा [[मालखड़]] के [[राष्ट्रकूट वंश]] का उदय हुआ, जिसका उच्छेद पुर के चालुक्य वंश की एक नवीन शाखा ने कर दिया। जिसने [[कल्याणी कर्नाटक|कल्याणी]] को अपनी राजधानी बनाया। उसका उच्छेद [[देवगिरि]] के यादवों तथा द्वारसमुद्र के [[होयसल वंश]] ने कर दिया। सुदूर दक्षिण में चेर, पांड्य और चोल राज्यों का उदय हुआ, जिनमें से अंतिम राज्य सबसे अधिक चला। इस तरह सारे भारत में अनैक्य व्याप्त हो गया।&lt;br /&gt;
====राजपूत राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|राजपूत काल}} &lt;br /&gt;
[[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य]] के विघटन के बाद उत्तर भारत में कई राजपूत राज्यों की नींव पड़ी। इनमें सबसे प्रमुख कन्नौज के गहदवाल, [[मालवा]] के [[परमार वंश|परमार]] तथा [[अजमेर]] के [[चौहान वंश|चौहान]] थे। देश के अन्य क्षेत्रों में और भी छोटे-छोटे राज्य थे। जैसे आधुनिक [[जबलपुर]] के निकट कलचुरी, [[बुंदेलखण्ड]] में [[चंदेल वंश|चंदेल]], [[गुजरात]] में [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] तथा [[दिल्ली]] में [[तोमर वंश|तोमर]] वंशों का शासन था। [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर पहले [[पाल वंश]] का अधिकार था, बाद में [[सेन वंश]] का अधिकार हुआ।&lt;br /&gt;
{{see also|पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज रासो}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पाल साम्राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|पाल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[हर्षवर्धन|हर्ष]] के समय के बाद से उत्तरी भारत के प्रभुत्व का प्रतीक [[कन्नौज]] माना जाता था। बाद में यह स्थान [[दिल्ली]] ने प्राप्त कर लिया। पाल साम्राज्य की नींव 750 ई0 में 'गोपाल' नामक राजा ने डाली। बताया जाता है कि उस क्षेत्र में फैली अशान्ति को दबाने के लिए कुछ प्रमुख लोगों ने उसको राजा के रूप में चुना। इस प्रकार राजा का निर्वाचन एक अभूतपूर्व घटना थी।  इसका अर्थ शायद यह है कि गोपाल उस क्षेत्र के सभी महत्त्वपूर्ण लोगों का समर्थन प्राप्त करने में सफल हो सका और इससे उसे अपनी स्थिति मज़बूत करन में काफ़ी सहायता मिली। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====राष्ट्रकूट साम्राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|राष्ट्रकूट साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
जब उत्तरी भारत में पाल और प्रतिहार वंशों का शासन था, दक्कन में राष्टूकूट राज्य करते थे। इस वंश ने भारत को कई योद्धा और कुशल प्रशासक दिए हैं। इस साम्राज्य की नींव 'दन्तिदुर्ग' ने डाली। दन्तिदुर्ग ने 750 ई0 में चालुक्यों के शासन को समाप्त कर आज के [[शोलापुर ज़िला|शोलापुर]] के निकट अपनी राजधानी 'मान्यखेट' अथवा 'मानखेड़' की नींव रखी। शीघ्र ही [[महाराष्ट्र]] के उत्तर के सभी क्षेत्रों पर राष्ट्रकूटों का आधिपत्य हो गया। गुजरात और मालवा के प्रभुत्व के लिए इन्होंने प्रतिहारों से भी लोहा लिया। यद्यपि इन हमलों के कारण राष्ट्रकूट अपने साम्राज्य का विस्तार गंगा घाटी तक नहीं कर सके तथापि इनमें उन्हें बहुत बड़ी मात्रा में धन राशि मिली और उनकी ख्याति बढ़ी। वंगी (वर्तमान [[आंध्र प्रदेश]]) के पूर्वी चालुक्यों और दक्षिण में [[कांची]] के [[पल्लव वंश|पल्लवों]] तथा [[मदुरई]] के पांड्यों के साथ भी राष्ट्रकूटों का बराबर संघर्ष चलता रहा।&lt;br /&gt;
==चोल साम्राज्य &amp;lt;small&amp;gt;नौवीं से बारहवीं शताब्दी&amp;lt;/small&amp;gt;==&lt;br /&gt;
{{main|चोल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
चोल साम्राज्य का अभ्युदय नौवीं शताब्दी में हुआ और दक्षिण प्राय:द्वीप का अधिकांश भाग इसके अधिकार में था। चोल शासकों ने [[श्रीलंका]] पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और [[मालदीव]] द्वीपों पर भी इनका अधिकार था। कुछ समय तक इनका प्रभाव [[कलिंग]] और [[तुंगभद्रा नदी|तुंगभद्र]] दोआब पर भी छाया था। इनके पास शक्तिशाली नौसेना थी और ये दक्षिण पूर्वी [[एशिया]] में अपना प्रभाव क़ायम करने में सफल हो सके। चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का निःसन्देह सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। अपनी प्रारम्भिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के बाद क़रीब दो शताब्दियों तक अर्थात बारहवीं ईस्वी के मध्य तक चोल शासकों ने न केवल एक स्थिर प्रशासन दिया, वरन कला और साहित्य को बहुत प्रोत्साहन दिया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि चोल काल दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' था। &lt;br /&gt;
====भव्य मन्दिरों का निर्माण====&lt;br /&gt;
{{main|भारत की वास्तुकला का इतिहास}}&lt;br /&gt;
आठवीं शताब्दी के बाद और विशेषकर दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच का काल मन्दिर निर्माण कला का चरमोत्कर्ष माना जा सकता है। आज हम जिन भव्यों मन्दिरों को देखते हैं, उनमें से अधिकतर उसी काल में बनाये गए थे। इस काल की मन्दिर निर्माण कला की मुख्य शैली 'नागर' नाम से जानी जाती है। यद्यपि इस शैली के मन्दिर सारे भारत में पाए जाते हैं तथापि इनके मुख्य केन्द्र उत्तर भारत और दक्कन में थे।&lt;br /&gt;
{{see also|खजुराहो|मूर्ति कला मथुरा}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इस्लाम का प्रवेश==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|इस्लाम धर्म}}&lt;br /&gt;
इस बीच 712 ई. में भारत में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। [[मुहम्मद-इब्न-क़ासिम]] के नेतृत्व में [[मुसलमान]] अरबों ने [[सिंध]] पर हमला कर दिया और वहाँ के [[ब्राह्मण]] राजा दाहिर को हरा दिया। इस तरह भारत की भूमि पर पहली बार [[इस्लाम]] के पैर जम गये और बाद की शताब्दियों के [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]] राजा उसे फिर हटा नहीं सके। परन्तु सिंध पर अरबों का शासन वास्तव में निर्बल था और 1176 ई. में [[शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी]] ने उसे आसानी से उखाड़ दिया। इससे पूर्व सुबुक्तगीन के नेतृत्व में मुसलमानों ने हमले करके [[पंजाब]] छीन लिया था और ग़ज़नी के [[महमूद ग़ज़नवी|सुल्तान महमूद]] ने 997 से 1030 ई. के बीच भारत पर सत्रह हमले किये और हिन्दू राजाओं की शक्ति कुचल डाली, फिर भी हिन्दू राजाओं ने मुसलमानी आक्रमण का जिस अनवरत रीति से प्रबल विरोध किया, उसका महत्व कम करके नहीं आंकना चाहिए।&lt;br /&gt;
{{seealso|चंगेज़ ख़ाँ|महमूद ग़ज़नवी}}&lt;br /&gt;
==संघर्ष का युग &amp;lt;small&amp;gt;लगभग 1000 ई0 से 1200 ई0 तक&amp;lt;/small&amp;gt;==&lt;br /&gt;
पश्चिम के साथ-साथ मध्य [[एशिया]] तथा उत्तर [[भारत]] में भी 1000 ई. तथा 1200 ई. के बीच तेज़ी के साथ परिवर्तन हुए। इन्हीं परिवर्तनों के परिणमस्वरूप इस काल के अन्त में उत्तर भारत में तुर्कों के आक्रमण हुए। नौवीं शताब्दी के अन्त तक अब्बासी ख़लिफ़ों का पतन आरम्भ हो गया था। उनका साम्राज्य अब छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था, जिन पर [[मुसलमान]] तुर्कों का शासन था। तुर्क, अब्बासी साम्राज्य में महल रक्षकों तथा पेशेवर सैनिकों के रूप में आए थे। लेकिन शीघ्र ही इतने शक्तिशाली बन गए कि नियुक्ति पर भी उनका अधिकार हो गया। जैसे-जैसे केन्द्रीय सरकार की शक्ति कम होती गई, प्रान्तीय शासक अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे, यद्यपि कुछ समय तक इस पर एकता का पर्दा पड़ा रहा, क्योंकि सफल सरदारों को, जो किसी क्षेत्र में अपना अधिकार जमाने में सफल हो जाते थे, ख़लीफ़ा ही औपचारिक रूप से 'अमीर-उल-उमरा' (सेनापतियों का सेनापति) की पदवी देता था। ये शासक पहले 'अमीर' की, पर बाद में 'सुल्तान' की पदवी ग्रहण करने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक के बाद एक साम्राज्य स्थापित होते गए और उतनी ही जल्दी उनका पतन होता गया। इन्होंने एक नयी प्रकार की युद्धनीति शुरू की। जिसमें प्रमुख भूमिका भारी अस्त्रशस्त्रों से लैस घुड़सवार सैनिकों की होती थी, जो तेज़ी से आगे-पीछे सरक सकते थे और घोड़े की पीठ से ही तीरों की बौछार कर सकते थे। यह लोहे की रक़ाबों से ही सम्भव था। 'लोहे की रक़ाबों' तथा एक नए तरह की 'लगाम' के कारण युद्धनीति में इस तरह का परिवर्तन आया। इसी बीच [[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर-प्रतिहारों]] के साम्राज्य के विघटन से उत्तरी भारत कई छोट-छोटे राज्यों में बंट गया जिनके शासकों के पास इस नई युद्ध नीति के महत्व को समझने तथा उसका मुक़ाबला करने के न तो साधन थे और न ही इच्छा थी। &lt;br /&gt;
====महमूद ग़ज़नवी====&lt;br /&gt;
{{main|महमूद ग़ज़नवी}}&lt;br /&gt;
यह यमीनी वंश का तुर्क सरदार ग़ज़नी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था । उसका जन्म सं. 1028 वि. (ई. 971) में हुआ, 27 वर्ष की आयु में सं. 1055 (ई. 998) में वह शासनाध्यक्ष बना था । महमूद बचपन से भारतवर्ष की अपार समृद्धि और धन-दौलत के विषय में सुनता रहा था । उसके पिता ने एक बार हिन्दू शाही राजा जयपाल के राज्य को लूट कर प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त की थी, महमूद भारत की दौलत को लूटकर मालामाल होने के स्वप्न देखा करता था । उसने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और यहाँ की अपार सम्पत्ति को वह लूट कर ग़ज़नी ले गया था । उसके आक्रमण और लूटमार के काले कारनामों से तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों के पन्ने भरे हुए है । &lt;br /&gt;
==पृथ्वीराज चौहान और ग़ोरी==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पृथ्वीराज चौहान|मुहम्मद ग़ोरी}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|thumb|क़ुतुब मीनार]]&lt;br /&gt;
[[फ़ारस]] तथा पश्चिम एशिया के दूसरे राज्यों की तरह मुसलमानों को भारत में शीघ्रता से सफलता नहीं मिली। यद्यपि सिंध पर अरब मुसलमानों का शीघ्रता से क़ब्ज़ा हो गया, परन्तु वहाँ से वे लगभग चार शताब्दियों तक आगे नहीं बढ़ पाये। '''उत्तर-पश्चिम के मुसलमान आक्रमणकारियों को भी भारत ने लगभग तीन शताब्दियों तक रोके रखा'''। शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी का [[दिल्ली]] जीतने का पहला प्रयास विफल हुआ और [[पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज]] ने 1190 ई. में [[तराइन का युद्ध|तराईन]] की पहली लड़ाई में उसे हरा दिया। वह 1193 ई. में तराईन की दूसरी लड़ाई में ही पृथ्वीराज को हराने में सफल हुआ। इस विजय के बाद शहाबुद्दीन और उसके सेनापतियों ने उत्तरी भारत के दूसरे हिन्दू राजाओं को भी हरा दिया और वहाँ मुसलमानी शासन स्थापित कर दिया। इस तरह तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली के सुल्तानों की अधीनता में उत्तरी भारत की राजनीतिक एकता फिर से स्थापित हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तैमूर==&lt;br /&gt;
{{main|तैमूर लंग}}&lt;br /&gt;
दक्षिण एक और शताब्दी तक स्वतंत्र रहा, किन्तु [[अलाउद्दीन ख़िलजी|सुल्तान ख़िलजी]] के राज्यकाल में दक्षिण भी दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया और इस तरह चौदहवीं शताब्दी में कुछ काल के लिए सारे भारत का शासन फिर से एक केन्द्रीय सत्ता के अंतर्गत आ गया। परन्तु [[दिल्ली सल्तनत]] का शीघ्र ही पतन शुरू हो गया और 1336 ई. में दक्षिण में हिन्दुओं का एक विशाल राज्य स्थापित हुआ, जिसकी राजधानी [[विजय नगर साम्राज्य]] थी। बंगाल (1338 ई.), [[जौनपुर]] (1393 ई.), [[गुजरात]] तथा दक्षिण के मध्यवर्ती भाग में भी [[बहमनी सल्तनत]] (1347 ई.) के नाम से स्वतंत्र मुसलमानी राज्य स्थापित हो गया। 1398 ई. में [[तैमूर]] ने भारत पर हमला किया और दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे लूटा। उसके हमले से दिल्ली की सल्तनत जर्जर हो गयी।&lt;br /&gt;
{{seealso|तैमूर लंग|विजय नगर साम्राज्य|बहमनी वंश|चंगेज़ ख़ाँ|अलाउद्दीन ख़िलजी}}&lt;br /&gt;
==मुग़ल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Akbar.jpg|thumb|100px|[[अकबर]]]]&lt;br /&gt;
{{main|मुग़ल काल}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal-03.jpg|thumb|left|100px|[[ताजमहल]]]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की सल्तनत वास्तव में कमज़ोर थी, क्योंकि सुल्तानों ने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने का कोई प्रयास नहीं किया। वे धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त कट्टर थे और उन्होंने बलपूर्वक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया। इससे हिन्दू प्रजा उनसे कोई सहानुभूति नहीं रखती थी। इसक फलस्वरूप 1526 ई. में [[बाबर]] ने आसानी से दिल्ली की सल्तनत को उखाड़ फैंका। उसने [[पानीपत]] की  [[पानीपत युद्ध प्रथम |पहली लड़ाई]] में अन्तिम सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हरा दिया और [[मुग़ल वंश]] की प्रतिष्ठित किया, जिसने 1526 से 1858 ई. तक भारत पर शासन किया। तीसरा [[मुग़ल]] बादशाह [[अकबर]] असाधारण रूप से योग्य और दूरदर्शी शासक था। उसने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने की कोशिश की और विशेष रूप से युद्ध प्रिय राजपूत राजाओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। '''अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता तथा मेल-मिलाप की नीति बरती, हिन्दुओं पर से [[जज़िया]] उठा लिया और राज्य के ऊँचे पदों पर बिना भेदभाव के सिर्फ योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ कीं'''।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मराठा==&lt;br /&gt;
{{main|मराठा साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chatrapati Shivaji-2.jpg|thumb|left|100px|[[शिवाजी]]]]&lt;br /&gt;
राजपूतों और मुग़लों के योग से उसने अपना साम्राज्य [[कन्दहार]] से [[आसाम]] की सीमा तक तथा [[हिमालय]] की तलहटी से लेकर दक्षिण में [[अहमदनगर]] तक विस्तृत कर दिया। उसके पुत्र [[जहाँगीर]] जहाँ पौत्र [[शाहजहाँ]] कि राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार जारी रहा। शाहजहाँ ने [[ताजमहल]] का निर्माण कराया, परन्तु कन्दहार उसके हाथ से निकल गया। अकबर के प्रपौत्र औरंगज़ेब के राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार अपने चरम शिखर पर पहुँच गया और कुछ काल के लिए सारा भारत उसके अंतर्गत हो गया। परन्तु [[औरंगज़ेब]] ने जान-बूझकर अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति त्याग दी और हिन्दुओं को अपने विरुद्ध कर लिया। उसने हिन्दुस्तान का शासन सिर्फ मुसलमानों के हित में चलाने की कोशिश की और हिन्दुओं को ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाने का असफल प्रयास किया। इससे राजपूताना, [[बुंदेलखण्ड]] तथा [[पंजाब]] के हिन्दू उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। [[महाराष्ट्र]] में [[शिवाजी]] ने 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु से पूर्व ही एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य स्थापित कर दिया। औरंगज़ेब अन्तिम शक्तिशाली मुग़ल बादशाह था। उसके उत्तराधिकारी अत्यन्त निर्बल और अयोग्य थे, उनके वज़ीर विश्वासघाती थे। फ़ारस के [[नादिरशाह]] ने मुग़ल बादशाहत पर सबसे सांघातिक प्रहार किया। उसने 1739 ई. में भारत पर चढ़ाई की और दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे निर्दयता से पूरी तरह लूटा। उसके हमले से मुग़ल साम्राज्य पूरी तरह जर्जर हो गया और इसके बाद शीघ्रता से उसका विघटन हो गया। [[अवध]], [[अखण्डित बंगाल]] तथा दक्षिण के मुसलमान सूबेदारों ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। राजपूत राजा भी अर्द्ध-स्वतंत्र हो गये। [[पेशवा बाजीराव प्रथम]] के नेतृत्व में [[मराठा|मराठों]] ने [[मुग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] के खंडहरों पर हिन्दू पद पादशाह की स्थापना का प्रयास किया।&lt;br /&gt;
{{seealso|शिवाजी|तानाजी|अहिल्याबाई होल्कर|जाटों का इतिहास}}&lt;br /&gt;
==अंग्रेज़==&lt;br /&gt;
[[फ़िरंगी]] लोग '''समुद्री मार्गों से भारत की ज़मीन पर पैर जमा चुके थे'''। [[अकबर]] से लेकर [[औरंगज़ेब]] तक '''मुग़ल बादशाहों ने भारत के इस नये मार्ग का महत्व नहीं समझा'''। इनमें से कोई इन नवांगतुकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अनुमान नहीं लगा सका और उनके जंगी बेड़े का मुक़ाबला करने के लिए एक शक्तिशाली भारतीय जंगी बेड़ा तैयार करने की आवश्यकता को अनुभव नहीं कर सका। इस तरह भारतीयों की ओर से किसी प्रतिरोध का सामना किये बग़ैर सबसे पहले [[पुर्तग़ाली]] भारत पहुँचे। उसके बाद [[डच]], [[अंग्रेज़]], [[फ्राँसीसी]] आये। सोलहवीं शताब्दी में इन फिरंगियों में आपस में लड़ाइयाँ होती रही, जो अधिकांश समुद्र में हुई। डच और अंग्रेजों ने मिलकर सबसे पहले पुर्तग़ालियों की सामुद्रिक शक्ति को समाप्त किया। इसके बाद डच लोगों को पता चला कि उनके लिए भारत की अपेक्षा मसाले वाले द्वीपों से व्यापार करना अधिक लाभदायी है। इस तरह भारत में सिर्फ अंग्रेज़ और फ्राँसीसी लोगों के बीच प्रतिद्वन्द्विता हुई।&lt;br /&gt;
{{seealso|वास्को द गामा}}&lt;br /&gt;
==ईस्ट इंडिया कम्पनी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tipu-Sultan.jpg|thumb|100px|[[टीपू सुल्तान]]]]&lt;br /&gt;
अठारहवीं शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों की [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] ने बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) तथा कलकत्ता (कोलकाता) पर क़ब्ज़ा कर लिया। उधर फ्राँसीसियों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने [[माहे]], [[पुदुचेरी|पांडिचेरी]] तथा [[चंद्रानगर]] पर क़ब्ज़ा कर लिया। उन्हें अपनी सेनाओं में भारतीय सिपाहियों को भरती करने की भी इजाज़त मिल गयी। वे इन भारतीय सिपाहियों का उपयोग न केवल अपनी आपसी लड़ाइयों में करते थे बल्कि इस देश के राजाओं के विरुद्ध भी करते थे। इन राजाओं की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और कमज़ोरी ने इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जाग्रत कर दिया और उन्होंने कुछ देशी राजाओं के विरुद्ध दूसरे देशी राजाओं से संधियाँ कर लीं। 1744-49 ई. में मुग़ल बादशाह की प्रभुसत्ता की पूर्ण उपेक्षा करके उन्होंने आपस में [[कर्नाटक]] की दूसरी लड़ाई छेड़ी। एक साल के बाद कर्नाटक की दूसरी लड़ाई शुरू हुई। जिसमें फ्राँसीसी गवर्नर [[डूप्ले]] ने पहली लड़ाई से सबक़ लेते हुए न केवल कर्नाटक के प्रशासन पर, बल्कि [[निज़ामशाही वंश|निज़ाम]] के राज्य पर भी [[फ़्राँस]] का राजनीतिक नियत्रंण स्थापित करने की कोशिश की। परन्तु अंग्रेजों ने उसकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होने दी। अंग्रेजों को बंगाल में भारी सफलता मिली थी। बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के केवल पचास वर्ष बाद 1757 ई. में राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने [[नवाब सिराजुद्दौला]] के विरुद्ध विश्वासघातपूर्ण राजद्रोहात्मक षड़यंत्र रचकर [[प्लासी]] की लड़ाई जीत ली और बंगाल को एक प्रकार से अपनी मुट्ठी में कर लिया। उन्होंने बंगाल की गद्दी पर एक कठपुतली नवाब [[मीर ज़ाफ़र]] को बिठा दिया। इसके बाद एक के बाद, तेज़ी से कई घटनाएँ घटीं।&lt;br /&gt;
{{seealso|मैसूर युद्ध|टीपू सुल्तान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पानीपत== &lt;br /&gt;
{{मुख्य|पानीपत}}&lt;br /&gt;
[[अहमद शाह अब्दाली]] ने 1748 से 1760 ई. के बीच भारत पर चढ़ाइयाँ कीं और 1761 ई. में [[पानीपत]] की [[पानीपत युद्ध तृतीय|तीसरी लड़ाई]] जीत कर मुग़ल साम्राज्य का फ़ातिहा पढ़ दिया। उसने दिल्ली पर दख़ल करके उसे लूटा। पानीपत की तीसरी लड़ाई में सबसे अधिक क्षति मराठों को उठानी पड़ी। कुछ समय के लिए उनकी बाढ़ रुक गयी और इस प्रकार वे मुग़ल बादशाहों की जगह ले लेने का मौका खो बैठे। यह लड़ाई वास्तव में मुग़ल साम्राज्य के पतन की सूचक है। इसने भारत में मुग़ल साम्राज्य के स्थान पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना में मदद की। अब्दाली को पानीपत में जो फ़तह मिली, उससे न तो वह स्वयं कोई लाभ उठा सका और न उसका साथ देने वाले मुसलमान सरदार। इस लड़ाई से वास्तविक फ़ायदा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उठाया। इसके बाद कम्पनी को एक के बाद दूसरी सफलताएँ मिलती गयीं। &lt;br /&gt;
{{अंग्रेज़ गवर्नर जनरल और वायसराय सूची1}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रेग्युलेटिंग एक्ट==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|रेग्युलेटिंग एक्ट}}&lt;br /&gt;
बंगाल के साधनों से बलशाली होकर अंग्रेजों ने 1760 ई. में वाण्डीवाश की लड़ाई में फ्राँसीसियों को हरा दिया और 1762 ई. में उनसे [[पांडेचेरी]] ले लिया। इस प्रकार उन्होंने भारत में फ्राँसीसियों की राजनीतिक शक्ति समाप्त कर दी। 1764 ई. में अंग्रजों ने बक्सर की लड़ाई में [[बहादुर शाह प्रथम|बादशाह बहादुर शाह]] और [[शुजाउद्दौला|अवध के नवाब]] की सम्मिलित सेना को हरा दिया और 1765 ई. में बादशाह से बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली। इसके फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कम्पनी को पहली बार बंगाल, उड़ीसा तथा बिहार के प्रशासन का क़ानूनी अधिकार मिल गया। कुछ इतिहासकार इसे भारत में ब्रिटिश राज्य का प्रारम्भ मानते हैं। 1773 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक [[रेग्युलेटिंग एक्ट]] पास करके भारत में ब्रिटिश प्रशासन को व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया। इस एक्ट के अंतर्गत भारत में कम्पनी क्षेत्रों का प्रशासन गवर्नर-जनरल के अधीन कर दिया गया। उसकी सहायता के लिए चार सदस्यों की कॉउंसिल गठित की गयी। एक्ट में बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल का पद प्रदान किया गया और कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की भी स्थापना की गयी। [[वारेन हेस्टिंग्स]], जो उस समय बंगाल का गवर्नर था, 1773 ई. में पहला गवर्नर-जनरल बनाया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1773 ई. से 1947 ई. तक का काल, जब भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और भारत स्वाधीन हुआ, दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहला, कम्पनी का शासनकाल, जो 1858 ई. तक चला और दूसरा, 1858 से 1947 ई. तक का काल, जब भारत का शासन सीधे ब्रिटेन द्वारा होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गवर्नर-जनरलों का समय==&lt;br /&gt;
कम्पनी के शासन काल में भारत का प्रशासन एक के बाद एक बाईस [[गवर्नर-जनरल|गवर्नर-जनरलों]] के हाथों मे रहा। इस काल के भारतीय इतिहास की सबसे उल्लेखनीय घटना यह है कि कम्पनी युद्ध तथा कूटनीति के द्वारा भारत में अपने साम्राज्य का उत्तरोत्तर विस्तार करती रही। [[मैसूर]] के साथ [[मैसूर युद्ध|चार लड़ाइयाँ]], मराठों के साथ तीन, बर्मा ([[म्यांमार]]) तथा [[सिख|सिखों]] के साथ दो-दो लड़ाइयाँ तथा सिंध के अमीरों, गोरखों तथा [[अफ़ग़ानिस्तान]] के साथ एक-एक लड़ाई छेड़ी गयी। इनमें से प्रत्येक लड़ाई में कम्पनी को एक या दूसरे देशी राजा की मदद मिली। उसने जिन फ़ौजों से लड़ाई की उनमें से अधिकांश भारतीय सिपाही थे और लड़ाई का ख़र्च पूरी तरह भारतीय करदाता को उठाना पड़ा। इन लड़ाइयों के फलस्वरूप 1857 ई. तक सारे भारत पर सीधे कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हो गया। दो-तिहाई भारत पर देशी राज्यों का शासन बना रहा। परन्तु उन्होंने कम्पनी का सार्वभौम प्रभुत्व स्वीकार कर लिया और अधीनस्थ तथा आश्रित मित्र राजा के रूप में अपनी रियासत का शासन चलाते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग़दर- प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tatya-Tope.jpg|thumb|100px|[[तात्या टोपे]]]]&lt;br /&gt;
इस काल में [[सती प्रथा]] का अन्त कर देने के समान कुछ सामाजिक सुधार के भी कार्य किये गये। [[राजा राममोहन राय]] ने [[सती प्रथा]] जैसी अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण [[लॉर्ड विलियम बैंण्टिक]] 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सका। अंग्रेज़ी के माध्यम से पश्चिम शिक्षा के प्रसार की दिशा में क़दम उठाये गये, अंग्रेज़ी देश की राजभाषा बना दी गयी, सारे देश में समान ज़ाब्ता दीवानी और ज़ाब्ता फ़ौजदारी क़ानून लागू कर दिया गया, परन्तु शासन स्वेच्छाचारी बना रहा और वह पूरी तरह अंग्रेज़ों के हाथों में रहा। 1833  के [[चार्टर एक्ट]] के विपरीत ऊँचे पदों पर भारतीयों को नियुक्त नहीं किया गया। भाप से चलने वाले जहाज़ों और रेलगाड़ियों का प्रचलन, ईसाई मिशनरियों द्वारा आक्षेपजनक रीति से [[ईसाई धर्म]] का प्रचार, [[लार्ड डलहौज़ी]] द्वारा ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके अथवा कुशासन के आधार पर कुछ पुरानी देशी रियासतों की ज़ब्ती तथा ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सिपाहियों की शिकायतें; इन सब कारणों ने मिलकर सारे भारत में एक गहरे असंतोष की आग धधका दी, जो 1857-58 ई. में ग़दर के रूप में भड़क उठी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तिम मुग़ल [[बहादुर शाह ज़फ़र]], [[लक्ष्मीबाई|झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], [[तात्या टोपे|तांत्या टोपे]] (रामचंन्द्र पांडुरंग), [[बिहार]] के बाबू कुँवरसिंह, [[महाराष्ट्र]] से [[नाना साहब|नाना साहिब]], इस प्रथम क्रान्ति के प्रयास के नायक थे किन्तु प्रयास विफल हो गया। अधिकांश देशी राजाओं ने अपने को ग़दर से अलग रखा। कम्पनी को बलपूर्वक ग़दर को कुचल देने में सफलता मिली, परन्तु ग़दर के बाद ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारत पर कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया। भारत का शासन अब सीधे ब्रिटेन के द्वारा किया जाने लगा।&lt;br /&gt;
{{seealso|झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|तात्या टोपे|राजा राममोहन राय|सती प्रथा}}&lt;br /&gt;
==भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासन का दूसरा काल (1858-1947 ई.) आरम्भ हुआ। इस काल का शासन एक के बाद इकत्तीस गवर्नर-जनरलों के हाथों में रहा। गवर्नर-जनरल को अब [[वाइसराय]] (ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि) कहा जाने लगा। [[लार्ड कैनिंग]] पहला वाइसराय तथा गवर्नर-जनरल नियुक्त हुआ। इस काल के भारतीय इतिहास की सबसे प्रमुख घटना है—भारत में राष्ट्रवादी भावना का उदय और 1947 ई. में भारत की स्वाधीनता के रूप में अंतिम विजय। 1857 ई. में कलकत्ता ([[कोलकाता]]), मद्रास ([[चेन्नई]]) तथा बम्बई ([[मुम्बई]]) में विश्वविद्यालयों की स्थापना के बाद शिक्षा का प्रसार होने लगा तथा 1869 ई. में स्वेज़ नहर खुलने के बाद [[इंग्लैण्ड]] तथा [[यूरोप]] से निकट सम्पर्क स्थापित हो जाने से भारत में नये मध्यवर्ग का विकास हुआ। यह मध्य वर्ग पश्चिमी दर्शन शास्त्र, राजनीति शास्त्र तथा अर्थशास्त्र के विचारों से प्रभावित था और ब्रिटिश शासन में भारतीयों को जो नीचा दर्जा मिला हुआ था, उससे रुष्ट था। ब्रिटिश में स्थापित शान्ति के फलस्वरूप यह वर्ग सारे भारत को एक देश तथा समस्त भारतीयों को एक क़ौम मानने लगा और ब्रिटेन की भाँति संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना उसका लक्ष्य बन गया। वह एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस करने लगा जो समस्त भारतीय राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सके। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके फलस्वरूप 1885 ई. में बम्बई में [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] की स्थापना हुई जिसमें देश के समस्त भागों से 71 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1883 ई. में कलकत्ता में हुआ, जिसमें सारे देश से निर्वाचित 434 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अधिवेशन में माँग की गयी कि भारत में केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधानमंडलों का विस्तार किया जाये और उसके आधे सदस्य निर्वाचित भारतीय हों। कांग्रेस हर साल अपने अधिवेशनों में अपनी माँगें दोहराती रही। [[लार्ड डफ़रिन]] ने कांग्रेस पर व्यंग्य करते हुए उसे ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था बताया जिसे सिर्फ़ ख़ुर्दबीन से देखा जा सकता है। [[लार्ड लैन्सडाउन]] ने उसके प्रति पूर्ण उपेक्षा की नीति बरती, [[लार्ड कर्ज़न]] ने उसका खुलेआम मज़ाक उड़ाया तथा [[लार्ड मिन्टो द्वितीय]] ने 1909 के इंडियन कॉउंसिल एक्ट द्वारा स्थापित विधानमंडलों में मुसलमानों को अनुचित रीति से अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देकर उन्हें फोड़ने तथा कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश की, फिर भी कांग्रेस जिन्दा रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रारम्भिक सफलता==&lt;br /&gt;
कांग्रेस को पहली मामूली सफलता 1909 में मिली, जब इंग्लैण्ड में भारतमंत्री के निर्देशन में काम करने वाली भारत परिषद में दो भारतीय सदस्यों की नियुक्ति पहली बार की गयी, वाइसराय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में पहली बार एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति की गयी तथा इंडियन काउंसिल एक्ट के द्वारा केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधानमंडलों का विस्तार कर दिया गया तथा उनमें निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों का अनुपात पहले से अधिक बढ़ा दिया गया। इन सुधारों के प्रस्ताव लार्ड मार्ले ने हालाँकि भारत में संसदीय संस्थाओं की स्थापना करने का कोई इरादा होने से इन्कार किया, फिर भी एक्ट में जो व्यवस्थाएँ की गयीं थी, उनका उद्देश्य उसी दिशा में आगे बढ़ने के सिवा और कुछ नहीं हो सकता था। 1911 ई. में लार्ड कर्जन के द्वारा 1905 ई. में किया बंगाल का विभाजन रद्द कर दिया गया और भारत ने ब्रिटेन का पूरा साथ दिया। भारत ने युद्ध को जीतने के लिए ब्रिटेन की फ़ौजों से, धन से तथा समाग्री से मदद की। भारत आशा करता था कि इस राजभक्ति प्रदर्शन के बदले युद्ध से होने वाले लाभों में उसे भी हिस्सा मिलेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वैधशासन प्रणाली==&lt;br /&gt;
भारत के लिए स्वशासन की माँग करने में पहली बार भारतीय मुसलमान भी हिन्दुओं के साथ संयुक्त हो गये और अगस्त 1917 ई. में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारत में ब्रिटेश शासन की नीति है कि शासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों को अधिकारिक स्थान दिया जाय तथा स्वायत्त शासन का क्रमिकरूप से विकास किया जाय, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत में उत्तरदायी सरकार की उत्तरोत्तर स्थापना हो सके। इस घोषणा के अनुसार 1919 का गवर्नमेण्ट आफ इंडिया एक्ट पास किया गया। इस एक्ट के द्वारा विधान मंडलों का विस्तार कर दिया गया और अब उनके बहुसंख्य सदस्य भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि होने लगे। एक्ट के द्वारा केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के कार्यों का विभाजन कर दिया गया और प्रान्तों में द्वैधशासन प्रणाली लागू करके कार्यपालिका को आंशिक रीति से विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बना दिया गया। इस एक्ट के द्वारा भारत ने सुनिश्चित रीति से प्रगति की। भारतीय के इतिहास में पहली बार एक ऐसी संस्था की स्थापना की गयी, जिसके द्वारा ब्रिटिश भारत के निर्वाचित प्रतिनिधि सरकारी आधार पर एकत्र हो सकते थे। पहली बार उनका बहुमत स्थापित कर दिया गया और अब वे सरकार के कार्यों की  निर्भयतापूर्वक आलोचना कर सकते थे।&lt;br /&gt;
==असहयोग और सत्याग्रह==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|असहयोग आंदोलन}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhagat-Singh.gif|thumb|200px|100px|[[भगतसिंह|सरदार भगतसिंह]]]]&lt;br /&gt;
इन सुधारों से पुराने कांग्रेसजन संतुष्ट हो गये, परन्तु नव युवकों का दल, जिसे [[मोहनदास करमचंद गाँधी]] के रूप में एक नया नेता मिल गया था, संतुष्ट नहीं हुआ। इन सुधारों के अंतर्गत केन्द्रीय कार्यपालिका को केन्द्रीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया गया था और वाइसराय को बहुत अधिक अधिकार प्रदान कर दिये गये थे। अतएव उसने इन सुधारों को अस्वीकृत कर दिया। उसके मन में जो आशंकाएँ थीं, वे ग़लत नहीं थी, यह 1919 के एक्ट के बाद ही पास किये गये [[रौलट एक्ट]] जैसे दमनकारी क़ानूनों तथा [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकांण्ड जैसे दमनमूलक कार्यों से सिद्ध हो गया। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक में [[ऊधमसिंह]] ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। [[चंद्रशेखर आज़ाद]], [[राजगुरु]], [[सुखदेव]] और [[भगतसिंह]] जैसे महान क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए। कांग्रेस ने 1920 ई. में अपने नागपुर अधिवेशन में अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य की स्थापना घोषित कर दी और अपनी माँगों को मनवाने के लिए उसने अहिंसक असहयोंग की नीति अपनायी। चूंकि ब्रिटिश सरकार ने उसकी माँगें स्वीकार नहीं की और दमनकारी नीति के द्वारा वह [[असहयोग आंदोलन]] को दबा देने में सफल हो गयी। इसलिए कांग्रेस ने दिसम्बर 1929 ई. में लाहौर अधिवेशन में अपना लक्ष्य पूर्ण स्वीधीनता निश्चित किया और अपनी माँग का मनवाने के लिए उसने 1930 में [[नमक सत्याग्रह]] आंदोलन शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वितीय विश्वयुद्ध==&lt;br /&gt;
सरकार ने पहले की तरह आंदोलन को दबाने के लिए दमन और समझौते के दोनों रास्ते अख़्तियार किये और 1935 का गवर्नेण्ट आफ इंडिया एक्ट पास किया। इस एक्ट के द्वारा ब्रिटश भारत तथा देशी रियासतों के लिए सम्मिलित रूप से एक संघीय शासन का प्रस्ताव किया, केन्द्र में एक प्रकार के द्वैध शासन की स्थापना की गयी तथा प्रान्तों को स्वशासन प्रदान कर दिया गया। एक्ट का प्रान्तों से सम्बन्धित भाग लागू कर दिया गया तथा अप्रैल 1937 ई. में प्रान्तीय स्वशासन का श्रीगणेश कर दिया गया। परन्तु एक्ट के संघ सरकार से सम्बन्धित भाग के लागू होने से पहले ही सितम्बर 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया जो 1945 ई. तक जारी रहा। यह विश्वव्यापी युद्ध था और ब्रिटेन को अपने सारे साधन उसमें झोंक देने पड़े। भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया और भारत के पास जन और धन की जो विशाल शक्ति थी उससे लाभ उठाकर तथा [[संयुक्त राज्य अमरीका|अमरीका]] की सहायता से [[ब्रिटेन]] युद्ध जीत गया। [[गाँधी जी]] के अमित प्रभाव तथा अहिंसा में उनकी दृढ़ निष्ठा के कारण भारत ने यद्यपि ब्रिटिश सम्बन्ध को बनाये रखा, फिर भी यह स्पष्ट हो गया कि भारत अब ब्रिटिश साम्राज्य की अधीनता में नहीं रहना चाहता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्प्रदायिक दंगे== &lt;br /&gt;
कुछ ब्रिटिश अफ़सरों ने भारत को स्वाधीन होने से रोकने के लिए अंतिम दुर्राभ संधि की और मुसलमानों की भारत विभाजन करके पाकिस्तान की स्थापना की माँग का समर्थन करना शुरू कर दिया। इसके फलस्वरूप अगस्त 1946 ई. में सारे देश में भयानक सम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये, जिन्हें वाइसराय [[लार्ड वेवेल]] अपने समस्त फ़ौजी अनुभवों तथा साधनों बावजूद रोकन में असफल रहा। यह अनुभव किया गया कि भारत का प्रशासन ऐसी सरकार के द्वारा चलाना सम्भव नहीं है। जिसका नियंत्रण मुध्य रूप से अंग्रेजों के हाथों में हो। अतएव सितम्बर 1946 ई. में लार्ड वेवेल ने [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] के नेतृत्व में भारतीय नेताओं की एक अंतरिम सरकार गठित की। ब्रिटिश अधिकारियों की कृपापात्र होने के कारण मुस्लिम लीग के दिमाग़ काफ़ी ऊँचे हो गये थे। उसने पहले तो एक महीने तक अंतरिम सरकार से अपने को अलग रखा, इसके बाद वह भी उसमें सम्मिलित हो गयी।&lt;br /&gt;
==स्वाधीनता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Newspaper-15-August-1947.jpg|thumb|15 अगस्त 1947 का अख़बार&amp;lt;br /&amp;gt; Newspaper Of 15th August 1947]]&lt;br /&gt;
भारत का संविधान बनाने के लिए एक भारतीय संविधान सभा का आयोजन किया गया। 1947 ई. के शुरू में [[लार्ड वेवेल]] के स्थान पर [[लार्ड माउंटबेटेन]] वाइसराय नियुक्त हुआ। उसे पंजाब में भयानक सम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। जिनको भड़काने में वहाँ के कुछ ब्रिटिश अफसरों का हाथ था। वह प्रधानमंत्री [[एटली]] के नेतृत्व में ब्रिटेन की सरकार को यह समझाने में सफल हो गया कि भारत का भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन करके उसे स्वाधीनता प्रदान करने से शान्ति की स्थापना सम्भव हो सकेगी और ब्रिटेन भारत में अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित रख सकेगा। 3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार की ओर से यह घोषणा कर दी गयी कि भारत का; भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन करके उसे स्वाधीनता प्रदान कर दी जायगी। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने 15 अगस्त 1947 को इंडिपेडंस आफ इंडिया  एक्ट पास कर दिया। इस तरह भारत उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त, [[बलूचिस्तान]], [[सिंध]], [[पश्चिमी पंजाब]], [[बांग्ला देश|पूर्वी बंगाल]] तथा [[पश्चिम बंगाल]] के मुस्लिम बहुल भागों से रहित हो जाने के बाद, सात शताब्दियों की विदेशी पराधीनता के बाद स्वाधीनता के एक नये पथ पर अग्रसर हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गांधी जी की हत्या==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mahatma-Gandhi-1.jpg|thumb|100px|[[महात्मा गाँधी]]]]&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महात्मा गाँधी}}&lt;br /&gt;
स्वाधीन भारत को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, वे सरल नहीं थीं। उसे सबसे पहले साम्प्रदायिक उन्माद को शान्त करना था। भारत ने जानबूझकर धर्म निरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया। उसने आश्वासन दिया कि जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान को निर्गमन करने के बजाय भारत में रहना पसंद किया है उनको नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्रदान किये जायेंगे। हालाँकि पाकिस्तान जानबूझकर अपने यहाँ से हिन्दुओं को निकाल बाहर करने अथवा जिन हिन्दुओं ने वहाँ रहने का फैसला किया था, उनको एक प्रकार से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देने की नीति पर चल रहा था। लॉर्ड माउंटबेटेन को स्वाधीन भारत का पहला गवर्नर जनरल बनाये रखा गया और [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] तथा अंतरिम सरकार में उनके कांग्रसी सहयोगियों ने थोड़े से हेरफेर के साथ पहले भारतीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया। इस मंत्रिमंडल में सरदार पटेल तथा [[मौलाना अबुलकलाम आज़ाद]] का तो सम्मिलित कर लिया गया था, परन्तु नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को छोड़ दिया गया। 30 जनवरी 1948 ई. को [[नाथूराम गोडसे]] नामक हिन्दू ने [[राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी]] की हत्या कर दी। सारा देश शोक के सागर में डूब गया। नौ महीने के बाद, पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्नाहकी भी मृत्यु हो गयी। उसी वर्ष लार्ड माउंटबेटेन ने भी अवकाश ग्रहण कर लिया और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के प्रथम और अंतरिम गवर्नर जनरल नियुक्त हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रियासतों का विलय==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sardar-Vallabh-Bhai-Patel.jpg|thumb|100px|[[सरदार बल्लभ भाई पटेल]]]]&lt;br /&gt;
अधिकांश देशी रियासतों ने , जिनके सामने भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव रखा गया था, भारत में विलय के पक्ष में निर्णय लिया, परन्तु, दो रियासतों—[[कश्मीर]] तथा [[हैदराबाद रियासत|हैदराबाद]] ने कोई निर्णय नहीं किया। पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर की रियासत पर अधिकार करने का प्रयास किया, परन्तु अक्टूबर 1947 ई. में कश्मीर के महाराज ने भारत में विलय की घोषणा कर दी और भारतीय सेनाओं को वायुयानों से भेजकर [[श्रीनगर]] सहित कश्मीरी घाटी तक जम्मू की रक्षा कर ली गयी। पाकिस्तानी आक्रमणकारियों ने रियासत के उत्तरी भाग पर अपना क़ब्ज़ा बनाये रखा और इसके फलस्वरूप पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया। भारत ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिस क्षेत्र पर जिसका क़ब्ज़ा था, उसी के आधार पर युद्ध विराम कर दिया। वह आज तक इस सवाल का कोई निपटारा नहीं कर सका है। हैदराबाद के [[निज़ामशाही वंश|निज़ाम]] ने अपनी रियासत को स्वतंत्रता का दर्जा दिलाने का षड़यंत्र रचा, परन्तु भारत सरकार की पुलिस कार्रवाई के फलस्वरूप वह 1948 ई. में अपनी रियासत भारत में विलयन करने के लिए मजबूर हो गये। रियासतों के विलय में तत्कालीन गृहमंत्री [[सरदार पटेल|सरदार बल्लभ भाई पटेल]] की मुख्य भूमिका रही।&lt;br /&gt;
{{seealso|सरदार पटेल}}&lt;br /&gt;
==संघ राज्यों का विलय== &lt;br /&gt;
[[भारतीय संविधान सभा]] के द्वारा 26 नवम्बर 1949 में संविधान पास किया गया। भारत का संविधान अधिनियम 26 जनवरी 1950 को लागू कर दिया गया। इस संविधान में भारत को लौकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था और संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी थी। [[राजेन्द्र प्रसाद|डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] को पहला राष्ट्रपति चुना गया और बहुमत पार्टी के नेता के रूप  में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधान मंत्री का पद ग्रहण किया। इस पद पर वे 27 मई 1964 ई. में, अपनी मृत्यु तक बने रहे। नवोदित भारतीय गणराज्य के लिए उनका दीर्घकालीन प्रधानमंत्रित्व बड़ा लाभदायी सिद्ध हुआ। उससे प्रशासन तथा घरेलू एवं विदेश नीतियों में निरंतरता बनी रही। पंडित नेहरू ने वैदेशिक मामलों में गुट-निरपेक्षता की नीति अपनायी और [[चीन]] से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये। [[फ्राँस]] ने 1951 ई. में [[चंद्रनगर]] शान्तिपूर्ण रीति से भारत का हस्तांतरित कर दिया। 1956 ई. में उसने अन्य फ्रेंच बस्तियाँ ([[पुदुचेरी|पांडिचेरी]], [[कारीकल]], [[माहे]] तथा [[युन्नान]]) भी भारत को सौंप दीं। [[पुर्तग़ाल]] ने फ्राँस का अनुसरण करने और शान्तिपूर्ण रीति से अपनी पुर्तग़ाली बस्तियाँ ([[गोवा]], [[दमन और दीव]]) छोड़ने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप 1961 ई. में भारत को बलपूर्वक इन बस्तियों को लेना पड़ा&amp;lt;ref&amp;gt;1975 ई. में पुर्तग़ाली शासन ने वास्तविकता को समझकर इसको वैधानिक मान्यता दे दी है।&amp;lt;/ref&amp;gt;। इस तरह भारत का एकीकरण पूरा हो गया।&lt;br /&gt;
{{इतिहास तिथि क्रम सूची1}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.shangrilagifts.org/hp/indus.html  Comparison of Indus Valley Harappan]&lt;br /&gt;
*[http://ancientscripts.com/indus.html  Indus Script]&lt;br /&gt;
*[http://vimitihas.wordpress.com/2008/08/16/sindhu_sabhyata सिंधुघाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/content/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%83-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%81-%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE  विलुप्त होती सिन्धु घाटी की सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/node/20398 सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://incredible-india.biz/hn/history/ivc सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
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|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>प्रतिहार साम्राज्य</title>
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		<title>गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य</title>
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&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''गुर्जर प्रतिहार''' वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई0 में की थी। उसने [[राम]] के भाई [[लक्ष्मण]] को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को [[सूर्यवंश]] की शाखा सिद्ध किया।अधिकतर [[गुर्जर]] सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अन्कित सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;आज भी राजस्थान मे गुर्जर सम्मान से ''मिहिर'' कहे जाते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
विद्वानो के मानना है कि इन गुर्जरो ने भारतवर्ष को लगभग ३०० साल तक अरब-आक्रन्ताओ से सुरक्षित रखकर ''प्रतिहार'' (रक्षक) की भुमिका निभायी थी, अत: प्रतिहार नाम से जाने जाने लगे।&amp;lt;ref&amp;gt;New image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. p. 2&amp;lt;/ref&amp;gt;।रेजर के शिलालेख पर प्रतिहारो ने स्पष्ट रूप से गुर्जर-वन्श के होने की पूष्टि की है।&amp;lt;ref&amp;gt;Rama Shankar Tripathi (1999). History of ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 318.&amp;lt;/ref&amp;gt;नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया। साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र [[वत्सराज]] इस वंश का प्रथम शासक था, जिसने सम्राट की पदवी धारण की, यद्यपि उसने राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से बुरी तरह हार खाई। वत्सराज के पुत्र [[नागभट्ट द्वितीय]] ने 816 ई0 के लगभग गंगा की घाटी पर हमला किया, और [[कन्नौज]] पर अधिकार कर लिया। वहाँ के राजा को गद्दी से उतार दिया और वह अपनी राजधानी कन्नौज ले आया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि नागभट्ट द्वितीय भी राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ, तथापि नागभट्ट के वंशज कन्नौज तथा आसपास के क्षेत्रों पर 1018-19 ई0 तक शासन करते रहे। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि [[मिहिरभोज]] के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई0) 50 वर्ष तक शासन किया और गुर्जर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में [[भारत]] आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में राजी की सैनिक शक्ति और सुव्यवस्थित शासन की बड़ी प्रशंसा की है। अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, जो 'कर्पूरमंजरी' नाटक के रचयिता महाकवि राजेश्वर का शिष्य और संरक्षक था। महेन्द्र का पुत्र महिपाल भी राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय से बुरी तरह पराजित हुआ। राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन शीघ्र ही महिपाल ने पुनः उसे हथिया लिया। परन्तु महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के राजाओं–भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई0 तक अपने राज्य को क़ायम रखा।देवपाल के शासन के अन्तिम दिनों में [[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार]] साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। राज्यपाल बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ। बाद में उसने महमूद गज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे आसपास के गुर्जर राजा बहुत ही नाराज़ हुए। महमूद गज़नवी के लौट जाने पर कालिंजर के चन्देल राजा गण्ड के नेतृत्व में गुर्जर राजाओं ने कन्नौज के राज्यपाल को पराजित कर मार डाला और उसके स्थान पर त्रिलोचनपाल को गद्दी पर बैठाया। महमूद के दौबारा आक्रमण करने पर कन्नौज फिर से उसके अधीन हो गया। त्रिलोचनपाल बाड़ी में शासन करने लगा। उसकी हैसियत स्थानीय सामन्त जैसी रह गयी। कन्नौज में [[गहड़वाल वंश]] अथवा [[राठौर वंश]] का उदभव होने पर उसने 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में बाड़ी के गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए उखाड़ दिया। गुर्जर-प्रतिहार वंश के आन्तरिक प्रशासन के बारे में कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इतिहास में इस वंश का मुख्य योगदान यह है कि इसने 712 ई0 में सिंध विजय करने वाले अरबों को आगे नहीं बढ़ने दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यवस्थापक, शक्तिशाली शासक राजा भोज==== &lt;br /&gt;
जैसा कि ऊपर बताया गया है, गुर्जर प्रतिहार वंश के आरम्भिक शासक वत्सराज तथा नागभट्ट द्वितीय, पाल और राष्ट्रकूट शासकों से पराजित हो गए थे, और इस प्रकार इनकी स्थिति कमज़ोर हो गई थी। प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक व्यवस्थापक, उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। हमें यह पता नहीं है कि भोज कब सिंहासन पर बैठा। उसके प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें पता इसलिए नहीं है क्योंकि नागभट्ट द्वितीय तथा राष्ट्रकूट शासक गोपाल तृतीय से पराजित होने के बाद प्रतिहार साम्राज्य का लगभग विघटन हो गया थां भोज ने धीरे धीरे फिर साम्राज्य की स्थापनी की। उसने कन्नौज पर 836 ई0 तक पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और जो गुर्जर प्रतिहार वंश के अंत तक उसकी राजधानी बना रहा। राजा भोज ने गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि (राजस्थान) पर भी पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन एक बार फिर गुर्जर प्रतिहारों को पाल तथा राष्ट्रकूटों का सामना करना पड़ा। भोज देवपाल से पराजित हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि कन्नौज उसके हाथ से गया नहीं। अब पूर्वी क्षेत्र में भोज पराजित हो गया, तब उसने मध्य [[भारत]] तथा दक्कन की ओर अपना ध्यान लगा दिया। गुजरात और मालवा पर विजय प्राप्त करने के अपने प्रयास में उसका फिर राष्ट्रकूटों से संघर्ष छिड़ गया। नर्मदा के तट पर एक भीषण युद्ध हुआ। लेकिन भोज मालवा के अधिकतर क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में सफल रहा। सम्भव है कि उसने गुजरात के कुछ हिस्सों पर भी शासन किया हो। [[हरियाणा]] के [[करनाल]] ज़िले में प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार भोज ने [[सतलुज नदी|सतलज नदी]] के पूर्वी तट पर कुछ क्षेत्रों को भी अपने अधीन कर लिया था। इस अभिलेख में भोज देव के शक्तिशाली और शुभ शासनकाल में एक स्थानीय मेले में कुछ घोड़ों के व्यापारियों द्वारा घोड़ों की चर्चा की गई है। इससे पता चलता है कि प्रतिहार शासकों और मध्य एशिया के बीच काफ़ी व्यापार चलता था। अरब यात्रियों ने बताया कि गुर्जर प्रतिहार शासकों के पास भारत में सबसे अच्छी अश्व सेना थी। मध्य एशिया तथा अरब के साथ भारत के व्यापार में घोड़ों का प्रमुख स्थान था। देवपाल की मृत्यु और उसके परिणामस्वरूप पाल साम्राज्य की कमज़ोरी का लाभ उठाकर भोज ने पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्भाग्यवश हमें भोज के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। भोज का नाम कथाओं में अवश्य प्रसिद्ध है। सम्भवतः उसके समसामयिक लेखक भोज के प्रारम्भिक जीवन की रोमांचपूर्ण घटनाओं, खोए हुए राज्य को फिर से प्राप्त करने के साहस, तथा कन्नौज की विजय से अत्यनत प्रभावित थे। किंतु भोज [[विष्णु]] का भक्त था और उसने 'आदिवराह' की पदवी ग्रहण की थी जो उसके सिक्कों पर भी अंकित है। कुछ समय बाद कन्नौज पर शासन करने वाले [[परमार वंश]] के राजा भोज, और [[गुर्जर प्रतिहार वंश|प्रतिहार वंश]] के इस राजा भोज में अन्तर करने के लिए इसे कभी-कभी 'मिहिर भोज' भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोज की मृत्यु सम्भवतः 885 ई0 में हुई। उसके बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम सिंहासन पर बैठा। महेन्द्रपाल ने लगभग 908-09 तक राज किया और न केवल भोज के राज्य को बनाए रखा वरन [[मगध]] तथा उत्तरी बंगाल तक उसका विस्तार किया। [[काठियावाड़]], पूर्वी पंजाब और [[अवध]] में भी इससे सम्बन्धित प्रमाण मिले हैं। महेन्द्रपाल ने [[कश्मीर]] नरेश से भी युद्ध किया पर हार कर उसे भोज द्वारा विजित [[पंजाब]] के कुछ क्षेत्रों को कश्मीर नरेश को देना पड़ा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अल मसूदी के अनुसार====&lt;br /&gt;
इस प्रकार प्रतिहार नौवीं शताब्दी के मध्य से लेकिर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात एक सौ वर्षों तक उत्तरी भारत में शक्तिशाली बने रहे। बग़दाद निवासी अल मसूदी 915-16 में गुजरात आया था और उसने प्रतिहार शासकों, उनके साम्राज्य के विस्तार, और उनकी शक्ति की चर्चा की है। वह गुर्जर-प्रतिहार राज्य को अल-जुआर ([[गुर्जर]] का अपभ्रंश) और शासक को 'बौरा' पुकारता है। जो शायद आदिवराह का ग़लत उच्चारण है। यद्यपि यह पदवी राजा भोज की थी, जिसका इस समय तक देहान्त हो चुका था। अल मसूदी कहता है कि जुआर राज्य में 1,800,000 गाँव और शहर थे। इसकी लम्बाई 2,000 किलोमीटर थी और इतनी ही इसकी चौड़ाई थी। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक अंग में सात लाख से लेकर नौ लाख सैनिक थे। अल मसूदी कहता है कि उत्तर की सेना से यह नरेश मुलतान के शासक और उसके मित्रों से युद्ध करता है, दक्षिण की सेना से राष्ट्रकूटों से तथा पूर्व की सेना से पालों से संघर्ष करता है। इसके पास युद्ध के लिए प्रशिक्षित केवल 2,000 हाथी थे लेकिन अश्व सेना देश में सबसे अच्छी थी। &lt;br /&gt;
प्रतिहार शासक साहित्य तथा ज्ञान को बहुत प्रोत्साहित करते थे। महान संस्कृत कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महीपाल के दरबार में रहता था। प्रतिहारों ने कई सुन्दर भवनों और मन्दिरों का निर्माण कर कन्नौज की शोभा बढ़ाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठवीं-नौवीं शताब्दी के दौरान कई भारतीय विद्वान बग़दाद के ख़लीफ़ों के दरबार में गए। इन्होंन अरब में भारतीय विज्ञान, विशेषकर गणित, बीजगणित तथा चिकित्सा शास्त्र का प्रचार किया। हमें उन राजाओं के नाम का पता नहीं जो अपने दूतों और इन विद्वानों को बग़दाद भेजते थे। प्रतिहार [[सिंध]] के अरब शासकों के शत्रु के रूप में जाने जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि इस काल में भी भारत और पश्चिम एशिया के बीच विद्वानों और वस्तुओं का आदान-प्रदान जारी रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने 915 और 918 ई0 के मध्य में एक बार फिर कन्नौज पर धावा बोल दिया। इससे प्रतिहार साम्राज्य कमज़ोर पड़ गया और सम्भवतः गुजरात पर राष्ट्रकूटों का अधिकार स्थापित हो गया क्योंकि अल मसूदी कहता है कि प्रतिहार साम्राज्य की समुद्र तक पहुँच नहीं थी। गुजरात, समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार का केन्द्र था तथा उत्तरी भारत से पश्चिम एशिया को जाने वाली वस्तुओं का प्रमुख द्वार था। गुजरात के हाथ से निकल जाने से प्रतिहारों को और भी धक्का लगा। महीपाल के बाद प्रतिहार साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन हो गया। एक और राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तृतीय ने 963 ई0 में उत्तरी भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को पराजित कर दिया। इसके शीघ्र बाद प्रतिहार साम्राज्य का विघटन हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
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&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]] [[Category:इतिहास कोश]] &lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य</title>
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		<updated>2011-01-27T21:35:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
'''गुर्जर प्रतिहार''' वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई0 में की थी। उसने [[राम]] के भाई [[लक्ष्मण]] को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को [[सूर्यवंश]] की शाखा सिद्ध किया।अधिकतर [[गुर्जर]] सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अन्कित सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;आज भी राजस्थान मे गुर्जर सम्मान से ''मिहिर'' कहे जाते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
विद्वानो के मानना है कि इन गुर्जरो ने भारतवर्ष को लगभग ३०० साल तक अरब-आक्रन्ताओ से सुरक्षित रखकर ''प्रतिहार'' (रक्षक) की भुमिका निभायी थी, अत: प्रतिहार नाम से जाने जाने लगे।&amp;lt;ref&amp;gt;New image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. p. 2&amp;lt;/ref&amp;gt;।रेजर के शिलालेख पर प्रतिहारो ने स्पष्ट रूप से गुर्जर-वन्श के होने की पूष्टि की है।&amp;lt;ref&amp;gt;Rama Shankar Tripathi (1999). History of ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 318.&amp;lt;/ref&amp;gt;नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया। साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र [[वत्सराज]] इस वंश का प्रथम शासक था, जिसने सम्राट की पदवी धारण की, यद्यपि उसने राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से बुरी तरह हार खाई। वत्सराज के पुत्र [[नागभट्ट द्वितीय]] ने 816 ई0 के लगभग गंगा की घाटी पर हमला किया, और [[कन्नौज]] पर अधिकार कर लिया। वहाँ के राजा को गद्दी से उतार दिया और वह अपनी राजधानी कन्नौज ले आया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि नागभट्ट द्वितीय भी राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ, तथापि नागभट्ट के वंशज कन्नौज तथा आसपास के क्षेत्रों पर 1018-19 ई0 तक शासन करते रहे। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि [[मिहिरभोज]] के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई0) 50 वर्ष तक शासन किया और गुर्जर साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में [[भारत]] आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में राजी की सैनिक शक्ति और सुव्यवस्थित शासन की बड़ी प्रशंसा की है। अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, जो 'कर्पूरमंजरी' नाटक के रचयिता महाकवि राजेश्वर का शिष्य और संरक्षक था। महेन्द्र का पुत्र महिपाल भी राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय से बुरी तरह पराजित हुआ। राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन शीघ्र ही महिपाल ने पुनः उसे हथिया लिया। परन्तु महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के राजाओं–भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई0 तक अपने राज्य को क़ायम रखा।देवपाल के शासन के अन्तिम दिनों में [[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार]] साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। राज्यपाल बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ। बाद में उसने महमूद गज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे आसपास के गुर्जर राजा बहुत ही नाराज़ हुए। महमूद गज़नवी के लौट जाने पर कालिंजर के चन्देल राजा गण्ड के नेतृत्व में गुर्जर राजाओं ने कन्नौज के राज्यपाल को पराजित कर मार डाला और उसके स्थान पर त्रिलोचनपाल को गद्दी पर बैठाया। महमूद के दौबारा आक्रमण करने पर कन्नौज फिर से उसके अधीन हो गया। त्रिलोचनपाल बाड़ी में शासन करने लगा। उसकी हैसियत स्थानीय सामन्त जैसी रह गयी। कन्नौज में [[गहड़वाल वंश]] अथवा [[राठौर वंश]] का उदभव होने पर उसने 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में बाड़ी के गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए उखाड़ दिया। गुर्जर-प्रतिहार वंश के आन्तरिक प्रशासन के बारे में कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इतिहास में इस वंश का मुख्य योगदान यह है कि इसने 712 ई0 में सिंध विजय करने वाले अरबों को आगे नहीं बढ़ने दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====व्यवस्थापक, शक्तिशाली शासक राजा भोज==== &lt;br /&gt;
जैसा कि ऊपर बताया गया है, गुर्जर प्रतिहार वंश के आरम्भिक शासक वत्सराज तथा नागभट्ट द्वितीय, पाल और राष्ट्रकूट शासकों से पराजित हो गए थे, और इस प्रकार इनकी स्थिति कमज़ोर हो गई थी। प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक व्यवस्थापक, उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। हमें यह पता नहीं है कि भोज कब सिंहासन पर बैठा। उसके प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें पता इसलिए नहीं है क्योंकि नागभट्ट द्वितीय तथा राष्ट्रकूट शासक गोपाल तृतीय से पराजित होने के बाद प्रतिहार साम्राज्य का लगभग विघटन हो गया थां भोज ने धीरे धीरे फिर साम्राज्य की स्थापनी की। उसने कन्नौज पर 836 ई0 तक पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और जो गुर्जर प्रतिहार वंश के अंत तक उसकी राजधानी बना रहा। राजा भोज ने गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि (राजस्थान) पर भी पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन एक बार फिर गुर्जर प्रतिहारों को पाल तथा राष्ट्रकूटों का सामना करना पड़ा। भोज देवपाल से पराजित हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि कन्नौज उसके हाथ से गया नहीं। अब पूर्वी क्षेत्र में भोज पराजित हो गया, तब उसने मध्य [[भारत]] तथा दक्कन की ओर अपना ध्यान लगा दिया। गुजरात और मालवा पर विजय प्राप्त करने के अपने प्रयास में उसका फिर राष्ट्रकूटों से संघर्ष छिड़ गया। नर्मदा के तट पर एक भीषण युद्ध हुआ। लेकिन भोज मालवा के अधिकतर क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में सफल रहा। सम्भव है कि उसने गुजरात के कुछ हिस्सों पर भी शासन किया हो। [[हरियाणा]] के [[करनाल]] ज़िले में प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार भोज ने [[सतलुज नदी|सतलज नदी]] के पूर्वी तट पर कुछ क्षेत्रों को भी अपने अधीन कर लिया था। इस अभिलेख में भोज देव के शक्तिशाली और शुभ शासनकाल में एक स्थानीय मेले में कुछ घोड़ों के व्यापारियों द्वारा घोड़ों की चर्चा की गई है। इससे पता चलता है कि प्रतिहार शासकों और मध्य एशिया के बीच काफ़ी व्यापार चलता था। अरब यात्रियों ने बताया कि गुर्जर प्रतिहार शासकों के पास भारत में सबसे अच्छी अश्व सेना थी। मध्य एशिया तथा अरब के साथ भारत के व्यापार में घोड़ों का प्रमुख स्थान था। देवपाल की मृत्यु और उसके परिणामस्वरूप पाल साम्राज्य की कमज़ोरी का लाभ उठाकर भोज ने पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्भाग्यवश हमें भोज के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। भोज का नाम कथाओं में अवश्य प्रसिद्ध है। सम्भवतः उसके समसामयिक लेखक भोज के प्रारम्भिक जीवन की रोमांचपूर्ण घटनाओं, खोए हुए राज्य को फिर से प्राप्त करने के साहस, तथा कन्नौज की विजय से अत्यनत प्रभावित थे। किंतु भोज [[विष्णु]] का भक्त था और उसने 'आदिवराह' की पदवी ग्रहण की थी जो उसके सिक्कों पर भी अंकित है। कुछ समय बाद कन्नौज पर शासन करने वाले [[परमार वंश]] के राजा भोज, और [[गुर्जर प्रतिहार वंश|प्रतिहार वंश]] के इस राजा भोज में अन्तर करने के लिए इसे कभी-कभी 'मिहिर भोज' भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोज की मृत्यु सम्भवतः 885 ई0 में हुई। उसके बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम सिंहासन पर बैठा। महेन्द्रपाल ने लगभग 908-09 तक राज किया और न केवल भोज के राज्य को बनाए रखा वरन [[मगध]] तथा उत्तरी बंगाल तक उसका विस्तार किया। [[काठियावाड़]], पूर्वी पंजाब और [[अवध]] में भी इससे सम्बन्धित प्रमाण मिले हैं। महेन्द्रपाल ने [[कश्मीर]] नरेश से भी युद्ध किया पर हार कर उसे भोज द्वारा विजित [[पंजाब]] के कुछ क्षेत्रों को कश्मीर नरेश को देना पड़ा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अल मसूदी के अनुसार====&lt;br /&gt;
इस प्रकार प्रतिहार नौवीं शताब्दी के मध्य से लेकिर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात एक सौ वर्षों तक उत्तरी भारत में शक्तिशाली बने रहे। बग़दाद निवासी अल मसूदी 915-16 में गुजरात आया था और उसने प्रतिहार शासकों, उनके साम्राज्य के विस्तार, और उनकी शक्ति की चर्चा की है। वह गुर्जर-प्रतिहार राज्य को अल-जुआर ([[गुर्जर]] का अपभ्रंश) और शासक को 'बौरा' पुकारता है। जो शायद आदिवराह का ग़लत उच्चारण है। यद्यपि यह पदवी राजा भोज की थी, जिसका इस समय तक देहान्त हो चुका था। अल मसूदी कहता है कि जुआर राज्य में 1,800,000 गाँव और शहर थे। इसकी लम्बाई 2,000 किलोमीटर थी और इतनी ही इसकी चौड़ाई थी। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक अंग में सात लाख से लेकर नौ लाख सैनिक थे। अल मसूदी कहता है कि उत्तर की सेना से यह नरेश मुलतान के शासक और उसके मित्रों से युद्ध करता है, दक्षिण की सेना से राष्ट्रकूटों से तथा पूर्व की सेना से पालों से संघर्ष करता है। इसके पास युद्ध के लिए प्रशिक्षित केवल 2,000 हाथी थे लेकिन अश्व सेना देश में सबसे अच्छी थी। &lt;br /&gt;
प्रतिहार शासक साहित्य तथा ज्ञान को बहुत प्रोत्साहित करते थे। महान संस्कृत कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महीपाल के दरबार में रहता था। प्रतिहारों ने कई सुन्दर भवनों और मन्दिरों का निर्माण कर कन्नौज की शोभा बढ़ाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठवीं-नौवीं शताब्दी के दौरान कई भारतीय विद्वान बग़दाद के ख़लीफ़ों के दरबार में गए। इन्होंन अरब में भारतीय विज्ञान, विशेषकर गणित, बीजगणित तथा चिकित्सा शास्त्र का प्रचार किया। हमें उन राजाओं के नाम का पता नहीं जो अपने दूतों और इन विद्वानों को बग़दाद भेजते थे। प्रतिहार [[सिंध]] के अरब शासकों के शत्रु के रूप में जाने जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि इस काल में भी भारत और पश्चिम एशिया के बीच विद्वानों और वस्तुओं का आदान-प्रदान जारी रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने 915 और 918 ई0 के मध्य में एक बार फिर कन्नौज पर धावा बोल दिया। इससे प्रतिहार साम्राज्य कमज़ोर पड़ गया और सम्भवतः गुजरात पर राष्ट्रकूटों का अधिकार स्थापित हो गया क्योंकि अल मसूदी कहता है कि प्रतिहार साम्राज्य की समुद्र तक पहुँच नहीं थी। गुजरात, समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार का केन्द्र था तथा उत्तरी भारत से पश्चिम एशिया को जाने वाली वस्तुओं का प्रमुख द्वार था। गुजरात के हाथ से निकल जाने से प्रतिहारों को और भी धक्का लगा। महीपाल के बाद प्रतिहार साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन हो गया। एक और राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तृतीय ने 963 ई0 में उत्तरी भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को पराजित कर दिया। इसके शीघ्र बाद प्रतिहार साम्राज्य का विघटन हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]] [[Category:इतिहास कोश]] &lt;br /&gt;
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		<title>सुलेमान</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*9 वी. शताब्दी में [[भारत]] आने वाले अरबी यात्री सुलेमान [[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर प्रतिहार]] एवं [[पाल साम्राज्य|पाल]] शासकों के तत्कालीन आर्थिक, राजनीतिक एवं समाजिक दशा का वर्णन करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<title>चन्देल वंश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[जेजाकभुक्ति]] के प्रारम्भिक शासक [[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार]] शासकों के सामंत थे। इन्होने [[खजुराहो]] को अपनी राजधानी बनाया। '''नन्नुक''' इस वंश का पहला राजा था। उसके अतिरिक्त अन्य सामंत थे- वाक्पति, जयशक्ति (सम्भवतः इसके नाम पर ही बुन्देलखण्ड का नाम जेजाक भुक्ति पड़ा) विजय शक्ति, राहिल एवं हर्ष।&lt;br /&gt;
*[[यशोवर्मन]]&lt;br /&gt;
*[[धंगदेव]]&lt;br /&gt;
*[[गंडदेव]]&lt;br /&gt;
*[[विद्याधर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्याधर के बाद अन्य चन्देल शासक निम्नलिखित थे। -&lt;br /&gt;
*विजयपाल (1030 से 1050 ई.), &lt;br /&gt;
*देववर्मन (1050 से 1060ई.), &lt;br /&gt;
*[[कीर्तिवर्मन]] (1060 से 1100ई.), &lt;br /&gt;
*सल्लक्षण वर्मन (1100 से 1115 ई.), &lt;br /&gt;
*जयवर्मन, &lt;br /&gt;
*पृथ्वी वर्मन आदि। &lt;br /&gt;
*मदन वर्मन (1129 से 1163 ई.) चंदेल वंश का अन्य पराक्रमी राजा हुआ। &lt;br /&gt;
*परर्माददेव पर 1173 ई. में चालुक्यों से भिलसा को छीन लिया । &lt;br /&gt;
*1203 ई. में [[कुतुबुद्दीन ऐबक]] ने परार्माददेव को पराजित कर [[कालिंजर]] पर अधिकार कर लिया और अंततः 1305 ई. में चन्देल राज्य [[दिल्ली]] में मिल गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>राजपूत काल</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य]] के विघटन के बाद उत्तर [[भारत]] में कई राजपूत राज्यों की नींव पड़ी। इनमें सबसे प्रमुख कन्नौज के गहदवाल, [[मालवा]] के [[परमार वंश|परमार]] तथा [[अजमेर]] के [[चौहान वंश|चौहान]] थे। देश के अन्य क्षेत्रों में और भी छोटे-छोटे राज्य थे। जैसे आधुनिक [[जबलपुर]] के निकट कलचुरी, [[बुंदेलखण्ड]] में [[चंदेल वंश|चंदेल]], [[गुजरात]] में [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] तथा [[दिल्ली]] में [[तोमर वंश|तोमर]] वंशों का शासन था। [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर पहले [[पाल वंश]] का अधिकार था, बाद में [[सेन वंश]] का अधिकार हुआ। उत्तरकालीन पाल शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण 'महीपाल' था। जिसने उत्तरी [[भारत]] में महमूद के आक्रमण के समय क़रीब पचास वर्षों तक राज किया। इस काल में उसने अपने राज्य का विस्तार बंगाल के अलावा [[बिहार]] में भी किया। उसने कई नगरों का निर्माण किया तथा कई पुराने धार्मिक भवनों की मरम्मत करवाई, जिनमें से कुछ [[नालन्दा]] तथा [[बनारस]] में थे। उसकी मृत्यु के बाद कन्नौज के गहदवालों ने बिहार से धीरे-धीरे पालों के अधिकार को समाप्त कर दिया और बनारस को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। इसी दौरान चौहान अपने साम्राज्य का विस्तार अजमेर से लेकर गुजरात की ओर कर रहे थे। वे दिल्ली और पंजाब की ओर भी बढ़ रहे थे। इस प्रयास में उन्हें गहदवालों का सामना करना पड़ा। इन्हीं आपसी संघर्षों के कारण राजपूत पंजाब से ग़ज़नवियों को बाहर निकालने में असफल रहे। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर ग़ज़नवियों ने [[उज्जैन]]  पर भी आक्रमण किया। &lt;br /&gt;
==राजपूत समाज का मुख्य आधार==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इन राज्यों में भी सामंतवादी व्यवस्था का प्रभाव था। राजपूत समाज का मुख्य आधार वंश था। हर वंश अपने को एक योद्धा का वंशज बताता था, जो वास्तविक भी हो सकता था और काल्पनिक भी। अलग-अलग वंश अलग-अलग क्षेत्रों पर शासन करते थे। इनके राज्यों के अंतर्गत 12, 24, 48 या 84 ग्राम आते थे। राजा इन ग्रामों की भूमि अपने सरदारों में बाँट देता था जो फिर इसी तरह अपने हिस्से की भूमि को राजपूत योद्धाओं को, अपने परिवारों और घोड़ों के रख-रखाव के लिए बाँट देते थे। राजपूतों की प्रमुख विशेषता अपनी भूमि, परिवार और अपने मान-सम्मान के साथ लगाव था। हर राजपूत राज्य का राजा अधिकतर अपने भाइयों की सहायता से शासन करता था। यद्यपि सारी भूमि पर राजा का ही अधिकार था। भूमि पर नियंत्रण को सम्मान की बात समझने के कारण विद्रोह अथवा उत्तराधिकारी के न होने जैसी विशेष स्थितियों में ही राजा ज़मीन वापस ले लेता था। &lt;br /&gt;
==अनुशासनहीनता==&lt;br /&gt;
राजपूतों की समाज व्यवस्था के लाभ भी थे और नुक़सान भी। लाभ तो यह था कि राजपूतों में भाईचारे और समानता की भावना व्याप्त थी, पर दूसरी ओर इसी भावना के कारण उनमें अनुशासन लाना कठिन था। उनकी दूसरी कमज़ोरी आपसी संघर्ष था, जो पुश्तों तक चलता था। पर उनकी मूल कमज़ोरी यह थी कि वे अपने ही अलग गुट बनाते और दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे। वे भाईचारे की भावना में ग़ैर राजपूतों को शामिल नहीं करते थे। इससे शासन करने वाले राजपूतों और आम जनता, जो अधिकतर राजपूत नहीं थी, के बीच अन्तर बढ़ता गया। आज भी राजपूत [[राजस्थान]] की आबादी के कुल दस प्रतिशत हैं। ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में भी राजपूतों तथा उनके द्वारा शासित प्रदेशों की पूरी आबादी के बीच यही अनुपात रहा होगा। &lt;br /&gt;
==धार्मिक स्वतंत्रता==&lt;br /&gt;
उस काल में अधिकतर राजपूत राजा [[हिन्दू]] थे यद्यपि कुछ [[जैन धर्म]] के भी समर्थक थे। वे [[ब्राह्मण]] और मन्दिरों को बड़ी मात्रा में धन और भूमि का दान करते थे। वे वर्ण व्यवस्था तथा ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों के पक्ष में थे। इसलिए कुछ राजपूती राज्यों में तो [[भारत]] की स्वतंत्रता और भारतीय संघ में उनके विलय तक ब्राह्मणों से अपेक्षाकृत कम लगान वसूल किया जाता था। इन विशेषाधिकारों के बदले ब्राह्मण राजपूतों को प्राचीन [[सूर्यवंश|सूर्य]] और [[चन्द्रवंश|चन्द्रवंशी]] क्षत्रियों के वंशज मानने को तैयार थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=111989</id>
		<title>भारत का इतिहास</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8&amp;diff=111989"/>
		<updated>2011-01-27T21:12:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य 6th century&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{इतिहास}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:bharat-name.jpg|100px]] में मानवीय कार्यकलाप के जो प्राचीनतम चिह्न अब तक मिले हैं, वे 4,00,000 ई. पू. और 2,00,000 ई. पू. के बीच दूसरे और तीसरे हिम-युगों के संधिकाल के हैं और वे इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि उस समय पत्थर के उपकरण काम में लाए जाते थे। इसके पश्चात एक लम्बे अरसे तक विकास मन्द गति से होता रहा, जिसमें अन्तिम समय में जाकर तीव्रता आई और उसकी परिणति 2300 ई. पू. के लगभग सिन्धु घाटी की आलीशान सभ्यता (अथवा नवीनतम नामकरण के अनुसार हड़प्पा संस्कृति) के रूप में हुई। हड़प्पा की पूर्ववर्ती संस्कृतियाँ हैं: बलूचिस्तानी पहाड़ियों के गाँवों की कुल्ली संस्कृति और राजस्थान तथा पंजाब की नदियों के किनारे बसे कुछ ग्राम-समुदायों की संस्कृति।&amp;lt;ref&amp;gt;पुस्तक 'भारत का इतिहास' रोमिला थापर) पृष्ठ संख्या-19&amp;lt;/ref&amp;gt; जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण [[केरल]] से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। जिसका आधार [[अफ़्रीक़ा]] के प्राचीन मानव से जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) का मिलना है। &amp;lt;ref&amp;gt;देखें: '''शोध ग्रंथ''' {{cite book |last=वेल्स|first=स्पेन्सर|url =http://books.google.ca/books?id=WAsKm-_zu5sC&amp;amp;lpg=PP1&amp;amp;dq=The%20Journey%20of%20Man&amp;amp;pg=PP1#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=true |title=अ जेनेटिक ओडिसी|year=2002|publisher=प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी प्रॅस, न्यू जर्सी, सं.रा.अमरीका|language=अंग्रेज़ी||id=ISBN 0-691-11532-X}} &amp;lt;/ref&amp;gt; यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत==&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास जानने के स्त्रोत को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता हैं-&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
साहित्यिक साक्ष्य, विदेशी यात्रियों का विवरण, पुरातत्त्व सम्बन्धी साक्ष्य&lt;br /&gt;
====साहित्यिक साक्ष्य====&lt;br /&gt;
साहित्यिक साक्ष्य के अन्तर्गत साहित्यिक ग्रन्थों से प्राप्त ऐतिहासिक वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। साहित्यिक साक्ष्य को दो भागों में विभाजित किया जाता सकता है- &lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य। &lt;br /&gt;
धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेत्तर साहित्य की चर्चा की जाती है। &lt;br /&gt;
*ब्राह्मण ग्रन्थों में - &lt;br /&gt;
[[वेद]], [[उपनिषद]], [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण]], [[स्मृतियाँ|स्मृति ग्रन्थ]] आते हैं।&lt;br /&gt;
*ब्राह्मणेत्तर ग्रन्थों में [[जैन]] तथा [[बौद्ध]] ग्रन्थों को सम्मिलित किया जाता है। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक ग्रन्थ, जीवनी, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धर्म-ग्रन्थ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही [[भारत]] के धर्म प्रधान देश होने के कारण यहां प्रायः तीन धार्मिक धारायें- वैदिक, जैन एवं बौद्ध प्रवाहित हुईं। वैदिक धर्म ग्रन्थ को ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ भी कहा जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्राह्मण धर्म''' - ग्रंथ के अन्तर्गत वेद, उपनिषद्, महाकाव्य तथा स्मृति ग्रंथों को शामिल किया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वेद'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{main|वेद}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेद एक महत्त्वपूर्ण ब्राह्मण धर्म-ग्रंथ है। वेद शब्द का अर्थ ‘ज्ञान‘ महतज्ञान अर्थात ‘पवित्र एवं आध्यात्मिक ज्ञान‘ है। यह शब्द [[संस्कृत]] के ‘विद्‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। वेदों के संकलनकर्ता 'कृष्ण द्वैपायन' थे। कृष्ण द्वैपायन को वेदों के पृथक्करण-व्यास के कारण 'वेदव्यास' की संज्ञा प्राप्त हुई। वेदों से ही हमें आर्यो के विषय में प्रारम्भिक जानकारी मिलती है। कुछ लोग वेदों को अपौरूषेय अर्थात दैवकृत मानते है। वेदों की कुल संख्या चार है-&lt;br /&gt;
*[[ऋग्वेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[सामवेद]]- यह ऋचाओं का संग्रह है।&lt;br /&gt;
*[[यजुर्वेद]]- इसमें यागानुष्ठान के लिए विनियोग वाक्यों का समावेश है।&lt;br /&gt;
*[[अथर्ववेद]]- यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vedic-Tradition-1.jpg|120px|left]]&lt;br /&gt;
=====ग्रंथों की प्रकृति=====&lt;br /&gt;
*ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद, इन चारों वेदों को 'संहिता' कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*इनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद के सम्मिलित संग्रह को 'वेदत्रयी' कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*उपर्युक्त चारों वेदों में से प्रत्येक के एक-एक उपवेद भी है। &lt;br /&gt;
*ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद' है, सामवेद का उपवेद 'गन्धर्ववेद' है, जो संगीत से संबद्व है। &lt;br /&gt;
*यजुर्वेद का उपवेद 'धनुर्वेद' है, जो युद्व कलाओं का वर्णन करता है।&lt;br /&gt;
*अथर्ववेद का उपवेद 'शिल्पवेद' है। &lt;br /&gt;
*इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण उपवेद है 'आयुर्वेद' है। &lt;br /&gt;
*इसके आठ भाग हैं- शल्य, शालक्य, काय-चिकित्सा, भूत विद्या, कुमारभृत्य, अंगदतन्त्र, रसायन और वाजीकरण। &lt;br /&gt;
*एक मान्यता के अनुसार आयुर्वेद के जन्मदाता प्रजापति ([[ब्रह्मा]]), धनुर्वेद के जन्मदाता [[विश्वामित्र]], गन्धर्व के जन्मदाता [[नारद]] तथा शिल्पवेद के जन्मदाता [[विश्वकर्मा]] थे। &lt;br /&gt;
*इन ग्रन्थों से प्राचीन भारत में प्रचलित विभिन्न विधाओं का ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Vedic-Tradition-2.jpg|120px|left]]&lt;br /&gt;
====ब्राह्मण ग्रंथ====&lt;br /&gt;
{{main|ब्राह्मण साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[यज्ञ|यज्ञों]] एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। यहां पर 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा प्रस्तुत की गयी है। यह ग्रंथ अधिकतर गद्य में लिखे हुए हैं। इनमें उत्तरकालीन समाज तथा संस्कृति के सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण होते हैं।&lt;br /&gt;
==आरण्यक==&lt;br /&gt;
{{main|आरण्यक साहित्य}}&lt;br /&gt;
आरयण्कों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों यथा, आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का वर्णन होता है। इन ग्रंथों को आरयण्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन ग्रंथों का मनन अरण्य अर्थात वन में किया जाता था। ये ग्रन्थ अरण्यों (जंगलों) में निवास करने वाले संन्यासियों के मार्गदर्शन के लिए लिखे गए थै। आरण्यकों में ऐतरेय आरण्यक, शांखायन्त आरण्यक, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक तथा तवलकार आरण्यक (इसे जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण भी कहते हैं) मुख्य हैं। ऐतरेय तथा शांखायन ऋग्वेद से, बृहदारण्यक शुक्ल यजुर्वेद से, मैत्रायणी उपनिषद आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तवलकार आरण्यक सामवेद से सम्बद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। आरण्यक ग्रन्थों में प्राण विद्या की महिमा का प्रतिपादन विशेष रूप से मिलता है। इनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी हैं, जैसे- तैत्तिरीय आरण्यक में [[कुरु]], [[पंचाल]], [[काशी]], [[विदेह]] आदि [[महाजनपद|महाजनपदों]] का उल्लेख है।&lt;br /&gt;
==उपनिषद==&lt;br /&gt;
{{main|उपनिषद}}&lt;br /&gt;
उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। प्रमुख उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर, बृहदारण्यक, कौषीतकि, मुण्डक, प्रश्न, मैत्राणीय आदि। लेकिन शंकराचार्य ने जिन 10 उपनिषदों  पर स्पना भाष्य लिखा है, उनको प्रमाणिक माना गया है।ये हैं - ईश, केन, माण्डूक्य, मुण्डक, तैत्तिरीय, ऐतरेय, प्रश्न, छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद। इसके अतिरिक्त श्वेताश्वतर  और कौषीतकि उपनिषद भी महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार 103 उपनिषदों में से केवल 13 उपनिषदों को ही प्रामाणिक माना गया है। भारत का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' मुण्डोपनिषद से लिया गया है। उपनिषद गद्य और पद्य दोनों में हैं, जिसमें [[प्रश्नोपनिषद|प्रश्न]], [[माण्डूक्योपनिषद|माण्डूक्य]], [[केनोपनिषद|केन]], [[तैत्तिरीयोपनिषद|तैत्तिरीय]], [[ऐतरेयोपनिषद|ऐतरेय]], [[छान्दोग्य उपनिषद|छान्दोग्य]], [[बृहदारण्यकोपनिषद|बृहदारण्यक]] और [[कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद|कौषीतकि उपनिषद]] गद्य में हैं तथा [[केनोपनिषद|केन]], [[ईशावास्योपनिषद|ईश]], [[कठोपनिषद|कठ]] और [[श्वेताश्वतरोपनिषद|श्वेताश्वतर उपनिषद]] पद्य में हैं।&lt;br /&gt;
==वेदांग==&lt;br /&gt;
{{main|वेदांग}}&lt;br /&gt;
वेदों के अर्थ को अच्छी तरह समझने में वेदांग काफ़ी सहायक होते हैं। वेदांग शब्द से अभिप्राय है- 'जिसके द्वारा किसी वस्तु के स्वरूप को समझने में सहायता मिले'। वेदांगो की कुल संख्या 6 है, जो इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#शिक्षा - वैदिक वाक्यों के स्पष्ट उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ। वैदिक शिक्षा सम्बंधी प्राचीनतम साहित्य 'प्रातिशाख्य' है। &lt;br /&gt;
#कल्प - वैदिक कर्मकाण्डों को सम्पन्न करवाने के लिए निश्चित किए गये विधि नियमों का प्रतिपादन '[[कल्पसूत्र]]' में किया गया है।&lt;br /&gt;
#व्याकरण - इसके अन्तर्गत समासों एवं सन्धि आदि के नियम, नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग आदि के नियम बताये गये हैं। [[पाणिनि]] की [[अष्टाध्यायी]] प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।&lt;br /&gt;
#निरूक्त - शब्दों की व्युत्पत्ति एवं निर्वचन बतलाने वाले शास्त्र 'निरूक्त' कहलातें है। क्लिष्ट वैदिक शब्दों के संकलन ‘निघण्टु‘ की व्याख्या हेतु [[यास्क]] ने 'निरूक्त' की रचना की थी, जो भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रंथ माना जाता है।&lt;br /&gt;
#छन्द - वैदिक साहित्य में मुख्य रूप से गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, वृहती आदि छन्दों का प्रयोग किया गया है। पिंगल का छन्दशास्त्र प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
#ज्योतिष - इसमें ज्योतिष शास्त्र के विकास को दिखाया गया है। इसकें प्राचीनतम आचार्य 'लगध मुनि' है।&lt;br /&gt;
ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मशास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। &lt;br /&gt;
*धर्मशास्त्र में चार साहित्य आते हैं- 1- धर्म सूत्र, 2- स्मृति, 3- टीका एवं 4- निबन्ध ।&lt;br /&gt;
=====&amp;lt;u&amp;gt;आर्यों के आदि स्थल सूची&amp;lt;/u&amp;gt;=====&lt;br /&gt;
{{आदिकाल सूची1}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृतियां==&lt;br /&gt;
{{main|स्मृतियाँ}}&lt;br /&gt;
स्मृतियों को 'धर्म शास्त्र' भी कहा जाता है- 'श्रस्तु वेद विज्ञेयों धर्मशास्त्रं तु वैस्मृतिः।' स्मृतियों का उदय सूत्रों को बाद हुआ। मनुष्य के पूरे जीवन से सम्बधित अनेक क्रिया-कलापों के बारे में असंख्य विधि-निषेधों की जानकारी इन स्मृतियों से मिलती है। सम्भवतः [[मनुस्मृति]] (लगभग 200 ई.पूर्व. से 100 ई. मध्य) एवं [[याज्ञवल्क्य स्मृति]] सबसे प्राचीन हैं। उस समय के अन्य महत्त्वपूर्ण स्मृतिकार थे- [[नारद]], [[पराशर]], [[बृहस्पति]], [[कात्यायन]], [[गौतम]], संवर्त, हरीत, [[अंगिरा]] आदि, जिनका समय सम्भवतः 100 ई. से लेकर 600 ई. तक था। मनुस्मृति से उस समय के [[भारत]] के बारे में राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी मिलती है। [[नारद स्मृति]] से [[गुप्त वंश]] के संदर्भ में जानकारी मिलती है। मेधातिथि, मारूचि, कुल्लूक भट्ट, गोविन्दराज आदि टीकाकारों ने 'मनुस्मृति' पर, जबकि विश्वरूप, अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि ने 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर भाष्य लिखे हैं।&lt;br /&gt;
==महाकाव्य==&lt;br /&gt;
'[[रामायण]]' एवं '[[महाभारत]]', भारत के दो सर्वाधिक प्राचीन महाकाव्य हैं। यद्यपि इन दोनों महाकाव्यों के रचनाकाल के विषय में काफ़ी विवाद है, फिर भी कुछ उपलब्ध साक्ष्यों के आधर पर इन महाकाव्यों का रचनाकाल चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य माना गया है।&lt;br /&gt;
====रामायण====&lt;br /&gt;
{{main|रामायण}}&lt;br /&gt;
रामायण की रचना [[बाल्मीकि|महर्षि बाल्मीकि]] द्वारा पहली एवं दूसरी शताब्दी के दौरान [[संस्कृत|संस्कृत भाषा]] में की गयी । बाल्मीकि कृत रामायण में मूलतः 6000 श्लोक थे, जो कालान्तर में 12000 हुए और फिर 24000 हो गये । इसे 'चतुर्विशिति साहस्त्री संहिता' भ्री कहा गया है। बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण- [[बाल काण्ड वा. रा.|बालकाण्ड]], [[अयोध्या काण्ड वा. रा.|अयोध्याकाण्ड]], [[अरण्य काण्ड वा. रा.|अरण्यकाण्ड]], [[किष्किन्धा काण्ड वा. रा.|किष्किन्धाकाण्ड]], [[सुन्दर काण्ड वा. रा.|सुन्दरकाण्ड]], [[युद्ध काण्ड वा. रा.|युद्धकाण्ड]] एवं [[उत्तर काण्ड वा. रा.|उत्तराकाण्ड]] नामक सात काण्डों में बंटा हुआ है। रामायण द्वारा उस समय की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है। रामकथा पर आधारित ग्रंथों का अनुवाद सर्वप्रथम [[भारत]] से बाहर [[चीन]] में किया गया। भूशुण्डि रामायण को 'आदिरामायण' कहा जाता है।   	&lt;br /&gt;
====महाभारत====&lt;br /&gt;
{{main|महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[व्यास|महर्षि व्यास]] द्वारा रचित [[महाभारत]] महाकाव्य [[रामायण]] से बृहद है। इसकी रचना का मूल समय ईसा पूर्व चौथी शताब्दी माना जाता है। महाभारत में मूलतः 8800 श्लोक थे तथा इसका नाम 'जयसंहिता' (विजय संबंधी ग्रंथ) था। बाद में श्लोकों की संख्या 24000 होने के पश्चात यह वैदिक जन [[भरत (दुष्यंत पुत्र)|भरत]] के वंशजों की कथा होने के कारण ‘भारत‘ कहलाया। कालान्तर में [[गुप्त काल]] में श्लोकों की संख्या बढ़कर एक लाख होने पर यह 'शतसाहस्त्री संहिता' या 'महाभारत' केहलाया। महाभारत का प्रारम्भिक उल्लेख 'आश्वलाय गृहसूत्र' में मिलता है। वर्तमान में इस महाकाव्य में लगभग एक लाख श्लोकों का संकलन है। महाभारत महाकाव्य 18 पर्वो- [[आदि पर्व महाभारत|आदि]], [[सभा पर्व महाभारत|सभा]], [[वन पर्व महाभारत|वन]], [[विराट पर्व महाभारत|विराट]], [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग]], [[भीष्म पर्व महाभारत|भीष्म]], [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोण]], [[कर्ण पर्व महाभारत|कर्ण]], [[शल्य पर्व महाभारत|शल्य]], [[सौप्तिक पर्व महाभारत|सौप्तिक]], [[स्त्री पर्व महाभारत|स्त्री]], [[शान्ति पर्व महाभारत|शान्ति]], [[अनुशासन पर्व महाभारत|अनुशासन]], [[आश्वमेधिक पर्व महाभारत|अश्वमेघ]], [[आश्रमवासिक पर्व महाभारत|आश्रमवासी]], [[मौसल पर्व महाभारत|मौसल]], [[महाप्रास्थानिक पर्व महाभारत|महाप्रास्थानिक]] एवं [[स्वर्गारोहण पर्व महाभारत|स्वर्गारोहण]] में विभाजित है। महाभारत में ‘हरिवंश‘ नाम परिशिष्ट है। इस महाकाव्य से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
=====&amp;lt;u&amp;gt;महाजनपद सूची&amp;lt;/u&amp;gt;=====&lt;br /&gt;
{{महाजनपद सूची1}}&lt;br /&gt;
==पुराण==&lt;br /&gt;
{{main|पुराण}}&lt;br /&gt;
प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रंथ को [[पुराण]] कहते हैं। सम्भवतः 5वीं से 4थी शताब्दी ई.पू. तक पुराण अस्तित्व में आ चुके थे। [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] में पुराणों के पांच लक्षण बताये ये हैं। यह हैं- सर्प, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित। कुल पुराणों की संख्या 18 हैं- 1. [[ब्रह्म पुराण]] 2. [[पद्म पुराण]] 3. [[विष्णु पुराण]] 4. [[वायु पुराण]] 5. [[भागवत पुराण]] 6. [[नारद पुराण|नारदीय पुराण]], 7. [[मार्कण्डेय पुराण]] 8. [[अग्नि पुराण]] 9. [[भविष्य पुराण]] 10. [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]], 11. [[लिंग पुराण]] 12. [[वराह पुराण]] 13. [[स्कन्द पुराण]] 14. [[वामन पुराण]] 15. [[कूर्म पुराण]] 16. [[मत्स्य पुराण]] 17. [[गरुड़ पुराण]] और 18. [[ब्रह्माण्ड पुराण]]&lt;br /&gt;
इन पुराणों में विष्णु, मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड, तथा भागवत पुराण सर्वाधिक ऐतिहासिक महत्व के हैं क्योंकि इनमें राजाओं की वंशावलियां पायी जाती हैं। अठारह पुराणों में सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक मत्स्य पुराण है। इसके द्वारा [[सातवाहन वंश]] के विषय में विशेष जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त विष्णु पुराण से [[मौर्य वंश]] एवं [[गुप्त वंश]] की एवं वायु पुराण से [[शुंग वंश]] एवं [[गुप्त वंश]] के विषय में विशेष जानकारी मिलती है। इस प्रकार पुराणों से हमें शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, सातवाहन एवं गुप्त वंश के विषय में ज्ञान होता है।&lt;br /&gt;
मार्कण्डेय पुराण मुख्यतः देवी [[दुर्गा]] से संबधित है। इसी में 'दुर्गा सप्तशती' नामक अंश शामिल है। अग्नि पुराण में तांत्रिक पद्धति का उल्लेख है। इसी पुराण में [[गणेश]] पूजा का प्रथम बार उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य==&lt;br /&gt;
{{main|बौद्ध साहित्य}}&lt;br /&gt;
[[बौद्ध साहित्य]] को ‘[[त्रिपिटक]]‘ कहा जाता है। महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के उपरान्त आयोजित विभिन्न बौद्ध संगीतियों में संकलित किये गये त्रिपिटक (संस्कृत त्रिपिटक) सम्भवतः सर्वाधिक प्राचीन धर्मग्रंथ हैं। वुलर एवं रीज डेविड्ज महोदय ने ‘पिटक‘ का शाब्दिक अर्थ टोकरी बताया है। त्रिपिटक हैं। &lt;br /&gt;
[[सुत्तपिटक]], [[विनयपिटक]] और [[अभिधम्मपिटक]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जैन साहित्य==&lt;br /&gt;
{{main|जैन साहित्य}}&lt;br /&gt;
ऐतिहसिक जानकारी हेतु [[जैन साहित्य]] भी [[बौद्ध साहित्य]] की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक उपलब्ध जैन साहित्य [[प्राकृत]] एवं [[संस्कृत]] भाषा में मिलतें है। जैन साहित्य, जिसे ‘आगम‘ कहा जाता है, इनकी संख्या 12 बतायी जाती है। आगे चलकर इनके 'उपांग' भी लिखे गये । आगमों के साथ-साथ जैन ग्रंथों में 10 प्रकीर्ण, 6 छंद सूत्र, एक नंदि सूत्र एक अनुयोगद्वार एवं चार मूलसूत्र हैं। इन आगम ग्रंथों की रचना सम्भवतः श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यो द्वारा [[महावीर|महावीर स्वामी]] की मृत्यु के बाद की गयी। &lt;br /&gt;
==लौकिक साहित्य==&lt;br /&gt;
इस प्रकार के साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं समसामयिक साहित्य आते हैं, ऐसे साहित्य को धर्मेत्तर साहित्य भी कहते हैं इस प्रकार की कृतियों से तत्कालीन भारतीय समाज के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को जानने में काफ़ी मदद मिलती है। ऐसी रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्र का किया जाता है। व्याकरण के पितामह आचार्य पाणिनि का अष्टाध्यायी, विशाखदत्त का [[मुद्राराक्षस]], [[पतंजलि|महर्षि पतंजलि]] का [[महाभाष्य]], [[कालिदास]] का [[मालविकाग्निमित्रम्]], [[बाणभट्ट]] का [[हर्षचरित]], [[भास]] का [[स्वप्नवासवदत्तम]], शूद्रक  [[मृच्छकटिकम]], [[कल्हण]] का [[राजतरंगिणी]] आदि साहित्य से विभिन्न ऐतिहासिक जनकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत का प्रारम्भिक इतिहास ‘संगम साहित्य‘ से ज्ञात होता है। &lt;br /&gt;
*सुदूर दक्षिण के [[पल्लव वंश|पल्लव]] और [[चोल वंश|चोल]] शासको का इतिहास नन्दिकक्लम्बकम, कलिंगत्तुपर्णि, चोल चरित आदि से प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विदेशियों के विवरण==&lt;br /&gt;
विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी हमें भारतीय इतिहास की जानकारियाँ मिलती है। इनको तीन भागों में बांट सकते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;यूनानी-रोमन लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;, &amp;lt;u&amp;gt;चीनी लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;, &amp;lt;u&amp;gt;अरबी लेखक&amp;lt;/u&amp;gt;&lt;br /&gt;
====यूनानी-रोमन लेखक====&lt;br /&gt;
*यूनानी लेखकों को तीन भागों में बांटा जा सकता है- &lt;br /&gt;
#[[सिकन्दर]] के पूर्व के [[यूनानी]] लेखक &lt;br /&gt;
#सिकन्दर के समकालीन यूनानी लेखक &lt;br /&gt;
#सिकन्दर के बाद के लेखक&lt;br /&gt;
*टेसियस और हेरोडोटस [[यूनान]] और [[रोम]] के प्राचीन लेखकों में से हैं। टेसियस 'ईरानी राजवैद्य' था, उसने भारत के विषय में समस्त जानकारी ईरानी अधिकारियों से प्राप्त की थी। हेरोडोटस, जिसे 'इतिहास का पिता' कहा जाता है, ने 5वी. शताब्दी में ई.पू. में ‘हिस्टोरिका‘ नामक पुस्तक की रचना की थी, जिसमें भारत और [[फ़ारस]] के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।&lt;br /&gt;
*नियार्कस, आनेसिक्रिटस और अरिस्टोवुलास ये सभी लेखक [[सिकन्दर]] के समकालीन। इन लेखकों द्वारा जो भी विवरण तत्कालीन भारतीय इतिहास से जुड़ा है वह अपने में प्रमाणिक है।&lt;br /&gt;
*सिकन्दर के बाद के लेखकों में महत्त्वपूर्ण था [[मेगस्थनीज]] जो यूनानी राजा [[सेल्यूकस]] का राजदूत था। उसने [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] के दरबार में करीब 14 वर्षो तक समय व्यतीत किया। उसने ‘इण्डिका ‘ नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें तत्कालीन मौर्यवंशीय समाज एवं संस्कृति का विवरण दिया था। डाइमेकस, सीरियन नरेश अन्तियोकस का राजदूत था जो [[बिन्दुसार]] के राजदरबार में काफ़ी दिनों तक रहा। डायोनिसियस [[मिस्र]] नरेश 'टॉलमी फिलाडेल्फस' के राजदूत के रूप में काफ़ी दिनों तक [[अशोक|सम्राट अशोक]] के राज दरबार में रहा था।&lt;br /&gt;
*अन्य पुस्तकों में 'पेरीप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी', लगभग 150 ई. के आसपास टॉलमी का भूगोल, [[प्लिनी]] का 'नेचुरल हिस्टोरिका' (ई. की प्रथम सदी) महत्त्वपूर्ण है। ‘पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी‘ ग्रंथ जिसकी रचना 80 से 115 ई. के बीच हुई है, में भारतीय बन्दरगाहों एवं व्यापारिक वस्तुओं का विवरण मिलता है। प्लिनी के ‘नेचुरल हिस्टोरिका‘ से भारतीय पशु, पेड़-पौधों एवं खनिज पदार्थो की जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
====चीनी लेखक====&lt;br /&gt;
चीनी लेखकों के विवरण से भी भारतीय इतिहास पर प्रचुर प्रभाव पड़ता है सभी चीनी लेखक यात्री [[बौद्ध]] मतानुयायी थे और वे इस धर्म के विषय में कुछ विषय जानकारी के लिए ही [[भारत]] आये थे। चीनी बौद्ध यात्रियों में से प्रमुख थे- &lt;br /&gt;
[[फ़ाह्यान]], [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]], [[इत्सिंग]], मल्वानलिन, चाऊ-जू-कुआ आदि।&lt;br /&gt;
*मल्वानलिन ने [[हर्षवर्धन|हर्ष]] के पूर्व अभियान एवं 'चाऊ-जू-कुआ' ने [[चोल साम्राज्य|चोलकालीन]] इतिहास पर प्रकाश डाला।&lt;br /&gt;
====अरबी लेखक====&lt;br /&gt;
पूर्व मध्यकालीन भारत के समाज और संस्कृति के विषयों में हमें सर्वप्रथम अरब व्यापारियों एवं लेखकों से विवरण प्राप्त होता है। इन व्यापारियों और लेखकों में मुख्य हैं- &lt;br /&gt;
[[अलबेरूनी]], [[सुलेमान]] और [[अलमसूदी]]।&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त विदेशी यात्रियों के विवरण के अतिरिक्त कुछ फारसी लेखकों के विवरण भी प्राप्त होते है जिनसे भारतीय इतिहास के अध्ययन में काफ़ी सहायता मिलती है। इसमें महत्त्वपूर्ण हैं- &lt;br /&gt;
#फिरदौसी (940-1020 ई.) कृतशाहनामा, (Book of Kings) &lt;br /&gt;
#रशदुद्वीन कृत 'जमीएत अल तवारीख़' अली अहमद कृत ‘चाचनामा‘ मिनहाज-उल-सिराज कृत ‘तबकात-ए-नासिरी‘, जियाउद्वीन बरनी कृत ‘तारीख-ए-फिरोजशाही एवं [[अबुल फ़ज़ल]] कृत ‘अकबरनामा‘ आदि।&lt;br /&gt;
#यूरोपीय यात्रियों में 13 वी शताब्दी में वेनिस (इटली) से आये से सुप्रसिद्व यात्री मार्कोपोलों द्वारा दक्षिण के पाण्ड्य राज्य के विषय में जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुरातत्व==&lt;br /&gt;
पुरातात्विक साक्ष्य के अंतर्गत मुख्यतः अभिलेख, सिक्के, स्मारक, भवन, मूर्तियां चित्रकला आदि आते हैं।&lt;br /&gt;
{{राज्य सीमा मानचित्र सूची1}}&lt;br /&gt;
====अभिलेख====&lt;br /&gt;
इतिहास निमार्ण में सहायक पुरातत्त्व सामग्री में अभिलेखों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये अभिलेख अधिकांशतः स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं पात्रों, मूर्तियों, गुहाओं आदि में खुदे हुए मिलते हैं। यद्यपि प्राचीनतम अभिलेख मध्य एशिया के ‘बोगजकोई‘ नाम स्थान से करीब 1400 ई.पू. में पाये गये जिनमें अनेक वैदिक देवताओं - [[इन्द्र]], मित्र, [[वरुण देवता|वरूण]], नासत्य आदि का उल्लेख मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अपने यथार्थ रूप में अभिलेख हमें सर्वप्रथम [[अशोक]] के शासन काल में ही मिलतें हैं।''' एक अभिलेख, जो [[हैदराबाद]] में 'मास्की' नामक स्थान पर स्थित है, में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त 'गुर्जरा', [[मध्य प्रदेश]], 'पानगुड्इया',मध्य प्रदेश से प्राप्त लेखों में भी अशोक का नाम मिलता है। अन्य अभिलेखों में उसको देवताओं का प्रिय ‘प्रियदर्शी‘ राजा कहा गया है। अशोक के अभिलेख मुख्यतः [[ब्राह्मी लिपि|ब्राह्यी]], [[खरोष्ठी]] तथा आरमाइक लिपियों में मिलतें हैं जिसमें अधिकांश ब्राह्यी में खुदे हुए हैं। इस लिपि को बांयी से दायीं ओर लिखा जाता है। पश्चिमोत्तर प्रान्त में प्रयुक्त होने वाली ‘खरोष्ठी लिपि‘ दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी। [[पाकिस्तान]] और [[अफ़ग़ानिस्तान]], में पाये गये अशोक के अभिलेखों में प्रयुक्त लिपि आरमाइक व यूनानी थी।&lt;br /&gt;
	&lt;br /&gt;
अशोक के बाद अभिलेखों की परम्परा से जुड़े अन्य अभिलेख इस प्रकार हैं- [[खारवेल]] का [[हाथीगुम्फ़ा शिलालेख|खारवेल का हाथीगुम्फा]], [[शक]] क्षत्रप प्रथम रुद्रदामान का जूनागढ़ अभिलेख, [[सातवाहन]] नरेश पुलुमावी का नासिक गुहालेख, हरिषेण द्वारा लिखित [[समुद्रगुप्त]] का [[प्रयाग]] स्तम्भ लेख, मालव नरेश यशोवर्मन का मन्दसौर अभिलेख, [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] नरेश पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख, [[चालुक्य वंश||प्रतिहार]] नरेश भोज का [[ग्वालियर]] अभिलेख, [[स्कन्दगुप्त]] का [[भितरी]] तथा जूनागढ़ लेख, [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] के शासक विजय सेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादि। कुछ गैर सरकारी अभिलेख हैं जैसे यवन राजदूत हेलियाडोरस का बेसनगर, [[विदिशा]] से प्राप्त गरुड़ स्तम्भ लेख। इससे द्वितीय शताब्दी ई.पू. में भारत में भागवत धर्म के विकसित होने के साक्ष्य मिलते हैं। [[मध्य प्रदेश]] के एरण से प्राप्त वराह प्रतिमा पर [[हूण]] राजा तोरमाण के लेखों का विवरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रायें====&lt;br /&gt;
भारतीय इतिहास अध्ययन में मुद्राओं की अतीव महत्ता है। भारत की प्राचीनतम मुद्राएं छठी शती ई.पू. में प्रचलित हुई। इन पर लेख नहीं होते थे। कुछ प्रतीक जैसे पर्वत, वृक्ष, पक्षी, मानव, पुष्प, जयामितीय आकृति आदि अंकित रहते थे। इन्हें आहत मुद्रा (पंच मार्क्ड क्वायन्स) कहा जाता था। सर्वप्रथम भारत में शासन करने वाले यूनानी शासकों की मुद्राओं पर लेख एवं तिथियां उत्कीर्ण मिलती हैं। सर्वाधिक मुद्राएं उत्तर [[मौर्य काल]] में मिलती हैं जो प्रधानतः सीसे, पोटीन, ताबें, कांसे, चांदी और सोने की होती हैं। [[कुषाण|कुषाणों]] के समय में सर्वाधिक शुद्ध सुवर्ण मुद्राएं प्रचलन में थे, पर सर्वाधिक सुवर्ण मुद्राएं [[गुप्त काल]] में जारी की गयी। समुद्रगुप्त की कुछ मुद्राओं पर 'यूप' पर '[[अश्वमेध यज्ञ]]' और कुछ पर [[वीणा]] बजाते हुए दिखाया गया है। [[कनिष्क]] की मुद्राओं से यह पता चलता है कि वह [[बौद्ध धर्म]] का अनुयायी था। सातवाहन नरेश शातकर्णि की एक मुद्रा पर जलपोत का चित्र उत्कीर्ण है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि उसने समुद्र विजय की थी। [[चन्द्रगुप्त द्वितीय]] की व्याघ्रशैली की मुद्राओं से उसकी पश्चिमी भारत के शकों की विजय सूचित होती है।&lt;br /&gt;
====स्मारक एवं भवन====&lt;br /&gt;
इतिहास निर्माण में भारतीय स्थापत्यकारों, वास्तुकारों और चित्रकारों ने अपने हथियार, छेनी, कन्नी, और तूलिका के द्वारा विशेष योगदान दिया। इनके द्वारा निर्मित प्राचीन इमारतें, मंदिर मूर्तियों के अवशेषों से भारत की प्राचीन सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का ज्ञान होता है। खुदाई में मिले महत्त्वपूर्ण अवशेषों में [[हड़प्पा|हडप्पा सभ्यता]], [[पाटलिपुत्र]] की खुदाई में [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] के समय लकड़ी के बने राजप्रसाद के ध्वंसावशेष, [[कौशाम्बी]] की खुदाई से महाराज उदयन के राजप्रसाद एवं घोषितराम [[बिहार]] के अवशेष अंतरजीखेड़ा में खुदाई से लोहे के प्रयोग के साक्ष्य, [[पांडिचेरी]] के अरिकामेडु में खुदाई से रोमन मुद्राओं, बर्तन आदि के अवशेषों से तत्कालीन इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती है। उस समय मंदिर निर्माण की प्रचलित [[नागर शैली|नागर शैलियों]] में ‘ नागर शैली‘ उत्तर भारत में प्रचलित थी जबकि [[द्रविड़ शैली]] दक्षिण भारत में प्रचलित थी। [[दक्षिणापथ]] में निर्मित वे मंदिर जिसमें नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का समावेश है उसे ‘वेसर शैली‘ कहा गया है। 8वीं शताब्दी में जावा में निर्मित बोराबुदुर मंदिर से बौद्ध धर्म की पहचान शाखा के प्रचलित होने का प्रमाण मिलता है।&lt;br /&gt;
====मूर्तियां====&lt;br /&gt;
प्राचीन काल में मूर्तियों का निर्माण [[कुषाण काल]] से आरम्भ होता है। कुषाणें, गुप्त शासकों एवं उत्तर गुप्तकाल में निर्मित मूर्तियों के विकास में जनसामान्य की धार्मिक भावनाओं का विशेष योगदान रहा है। कुषाणकालीन मूर्तियों एवं गुप्तकालीन मूर्तियों में व्याप्त मूलभूत अंतर इस प्रकार है- &lt;br /&gt;
*कुषाणकालीन मूर्तियां विदेशी प्रभाव से ओतप्रोत हैं वहीं पर गुप्तकालीन मूर्तियां स्वाभविकता से ओत-प्रोत हैं। &lt;br /&gt;
*भरहुत, [[बोधगया]], सांची और अमरावती में मिली मूर्तियां, मूर्तिकला में जनसामान्य के जीवन की अति सजीव झांकी प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
{{इन्हेंभीदेखें|मूर्ति कला मथुरा}}&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्रकला]] से हमें उस समय के जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। [[अजंता]] के चित्रों में मानवीय भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। चित्रों में ‘माता और शिशु‘ या ‘मरणशील राजकुमारी‘ जैसे चित्रों से गुप्तकाल की कलात्मक पराकाष्ठा का पूर्ण प्रमाण मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाषाण काल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Stone-Tools-mohenjo-daro.jpg|thumb|अस्त्र, [[मोहनजोदाड़ो]] 3000 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
{{main|भारत का इतिहास पाषाण काल}}&lt;br /&gt;
समस्त इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा एकता है-&lt;br /&gt;
#प्राक्इतिहास या प्रागैतिहासिक काल(Prehistoric Age), &lt;br /&gt;
#आद्य ऐतिहासिक काल(Proto-historic Age)&lt;br /&gt;
#ऐतिहासिक काल(Historic Age)&lt;br /&gt;
==भारत की आदिम (प्रारंभिक) जातियां==&lt;br /&gt;
{{main|भारत की आदिम जातियाँ}}&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक काल में [[भारत]] में कितने प्रकार की जातियां निवास करती थीं, उनमें आपसी सम्बन्घ किस स्तर के थे, आदि प्रश्न अत्यन्त ही विवादित हैं। फिर भी नवीनतम सर्वाधिक मान्यताओं में 'डॉ. बी.एस. गुहा' का मत है। भारतवर्ष की प्रारम्भिक जातियों को छः भागों में विभक्त किया जा सकता है। - &lt;br /&gt;
1. नीग्रिटों 2. प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाईड 3. मंगोलायड 4. भूमध्य सागरीय 5. पश्चिमी ब्रेकी सेफल 6. नॉर्डिक&lt;br /&gt;
==सिधु घाटी (सैंधव/हड़प्पा) सभ्यता==&lt;br /&gt;
{{main|सिंधु घाटी सभ्यता}}&lt;br /&gt;
आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व [[पाकिस्तान]] के 'पश्चिमी पंजाब प्रांत' के 'माण्टगोमरी ज़िले' में स्थित 'हरियाणा' के निवासियों को शायद इस बात का किंचित्मात्र भी आभास नहीं था कि वे अपने आस-पास की जमीन में दबी जिन ईटों का प्रयोग इतने धड़ल्ले से अपने मकानों का निर्माण में कर रहे हैं, वह कोई साधारण ईटें नहीं, बल्कि लगभग 5,000 वर्ष पुरानी और पूरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष हैं। इसका आभास उन्हे तब हुआ जब 1856 ई. में 'जॉन विलियम ब्रन्टम' ने कराची से [[लाहौर]] तक रेलवे लाइन बिछवाने हेतु ईटों की आपूर्ति के इन खण्डहरों की खुदाई प्रारम्भ करवायी। खुदाई के दौरान ही इस सभ्यता के प्रथम अवशेष प्राप्त हुए, जिसे इस सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता‘ का नाम दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====विशेष इमारतें====&lt;br /&gt;
सिंधु घाटी प्रदेश में हुई खुदाई कुछ महत्त्वपूर्ण ध्वंसावशेषों के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा की खुदाई में मिले अवशेषों में महत्त्वपूर्ण थे - &lt;br /&gt;
दुर्ग, रक्षा-प्राचीर, निवासगृह, चबूतरे, अन्नागार आदि । &lt;br /&gt;
====दुर्ग====&lt;br /&gt;
नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक 'दुर्ग' का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। ह्वीलर द्वारा इस टीले को 'माउन्ट ए-बी' नाम प्रदान किया गया है। दुर्ग के चारों ओर करीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एव रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। दुर्ग का मुख्य प्रवेश मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊंचे 'एफ' नामक टीले पर पकी ईटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास करीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद हैं, जिसमें लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेंहू एवं भूसी के अवशेष मिलतें हैं। इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिलें है, प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं करीब दो कमरे अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये मकान आकार में 17x7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों को दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य करीब 7 मीटर चौड़ा एक रास्ता बना था। प्रत्येक अन्नागार करीब 15.24 मीटर लम्बा एवं 6.10 मीटर चौड़ा हैं। &lt;br /&gt;
====हड़प्पा लिपि====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा लिपि}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा लिपि का सर्वाधिक पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था पर स्पष्टतः यह लिपि 1923 तक प्रकाश में आई। [[सिंधु लिपि]] में लगभग 64 मूल चिन्ह एवं 205 से 400 तक अक्षर हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। यह लिपि चित्रात्मक थी। यह लिपि अभी तक गढ़ी नहीं जा सकी है। इस लिपि में प्राप्त सबसे बड़े लेख में करीब 17 चिन्ह हैं। [[कालीबंगा]] के उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के ठीकरों पर उत्कीर्ण चिन्ह अपने पार्श्ववर्ती दाहिने चिन्ह को काटते हैं। इसी आधार पर 'ब्रजवासी लाल' ने यह निष्कर्ष निकाला है - 'सैंधव लिपि दाहिनी ओर से बायीं ओर को लिखी जाती थी।'&lt;br /&gt;
====मृण्मूर्तियां====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की मृण्मूर्तियां}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मृण्मूर्तियों का निर्माण मिट्टी से किया गया है। इन मृण्मूर्तियों पर मानव के अतिरिक्त पशु पक्षियों में बैल, भैंसा, बकरा, बाघ, सुअर, गैंडा, भालू, बन्दर, मोर, तोता, बतख एवं कबूतर की मृणमूर्तियां मिली है। मानव मृण्मूर्तियां ठोस है पर पशुओं की खोखली। नर एवं नारी मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां ठोस हैं, पर पशुओ की खोखली। नर एवं नारी- मृण्मूर्तियां में सर्वाधिक नारी मृण्मूर्तियां मिली है। &lt;br /&gt;
====हड़प्पा सभ्यता के नगरों की विशेषताएं====&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना}}&lt;br /&gt;
हड़प्पा संस्कृति की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी- इसकी नगर योजना। इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थलों के नगर निर्माण में समरूपता थी। नगरों के भवनो के बारे में विशिष्ट बात यह थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे।&lt;br /&gt;
====हडप्पा जनजीवन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:King-priest-mohenjo-daro.jpg|thumb|प्रधान अनुष्ठानकर्ता [[मोहनजोदाड़ो]] 2000 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
{{main|हड़प्पा समाज और संस्कृति}}&lt;br /&gt;
हडप्प्पा संस्कृति की व्यापकता एवं विकास को देखने से ऐसा लगता है कि यह सभ्यता किसी केन्द्रीय शक्ति से संचालित होती थी। वैसे यह प्रश्न अभी विवाद का विषय बना हुआ है, फिर भी चूंकि हडप्पावासी वाणिज्य की ओर अधिक आकर्षित थे, इसलिए ऐसा माना जाता है कि सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग के हाथ में था। &lt;br /&gt;
*ह्नीलर ने सिंधु प्रदेश के लोगों के शासन को 'मध्यम वर्गीय जनतंन्त्रात्मक शासन' कहा और उसमें धर्म की महत्ता को स्वीकार किया। &lt;br /&gt;
*स्टुअर्ट पिग्गॉट महोदय ने कहा 'मोहनजोदाड़ों का शासन राजतन्त्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक' था। &lt;br /&gt;
*मैके के अनुसार ‘मोहनजोदड़ों का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथों था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सैंधव-सभ्यता का विनाश==&lt;br /&gt;
सैधव-सभ्यता के पतन के संदर्भ में ह्नीलर का मत पूरी तरह से अमान्य हो चुका है। हरियूपिया का उल्लेख जो [[ऋग्वेद]] में प्राप्त है उस ह्नीलर ने हड़प्पा मान लिया और किले को पुर और आर्या के देवता [[इंद्र]] को पुरंदर (किले को नष्ट करने वाला) मानकर यह सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया कि सैंधव नगरों का पतन आर्यो के आक्रमण के कारण् हुआ था। ध्यातव्य है कि ह्नीलर का यह सिद्धान्त तभी खंडित हो जाता है जब सिंधु-सभ्यता को नागरीय सभ्यता घोषित किया जाता है। मोहनजोदाड़ो से प्राप्त नर कंकाल किसी एक की समय के नहीं है जिनमें व्यापक नरसंहर द्योतित हो रहा है।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ सैधव-सभ्यता के पतन के विषय में इतिहासकारों के मत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! मत&lt;br /&gt;
! इतिहासकार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1- प्रशासनिक शिथिलता के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ।&lt;br /&gt;
| जॉन मार्शल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|2- जलवायु में हुए परिवर्तन के कारण यह सभ्यता नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|ऑरेल स्टाइन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3- सिंधु सभ्यता बाढ़ के कारण नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4- भू तात्विक परिवर्तन के कारण सभ्यता नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|एम.आर.साहनी, आर.एल.राइक्स, जॉर्ज एफ.डेल्स, एच.टी.लैम्ब्रिक     &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|5- मोहनजोदाड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या कर दी गयी।&lt;br /&gt;
|डी.डी. कोसाम्बी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|6- सैंधव सभ्यता विदेशी आक्रमण व आर्यों के आक्रमण से नष्ट हुई।&lt;br /&gt;
|गार्डन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच.गार्डन, स्टुअर्ड पिग्ग्ट&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रागैतिहासिक काल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dancing-girl-mohenjo-daro.jpg|thumb|नृत्यांगना [[मोहनजोदाड़ो]] 2500 ई.पू.]]&lt;br /&gt;
भारत का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच [[सिंधु घाटी]] में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष [[मोहन जोदड़ो]] (मुअन-जो-दाड़ो) और [[हड़प्पा]] में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में [[आर्य|आर्यों]] का प्रवेश बाद में हुआ।  आर्यों ने पाया कि इस देश में उनसे पूर्व के जो लोग निवास कर रहे थे, उनकी सभ्यता यदि उनसे श्रेष्ठ नहीं तो किसी रीति से निकृष्ट भी नहीं थी। आर्यों से पूर्व के लोगों में सबसे बड़ा वर्ग [[द्रविड़ निवासी|द्रविड़ों]] का था। आर्यों द्वारा वे क्रमिक रीति से उत्तर से दक्षिण की ओर खदेड़ दिये गए। जहाँ दीर्घ काल तक उनका प्रधान्य रहा। बाद में उन्होंने आर्यों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। उनसे विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लिये और अब वे महान भारतीय राष्ट्र के अंग हैं। द्रविड़ों के अलावा देश में और मूल जातियाँ थी, जिनमें से कुछ का प्रतिनिधित्व [[मुण्डा]], कोल, [[भील]] आदि जनजातियाँ करती हैं जो मोन-ख्मेर वर्ग की भाषाएँ बोलती हैं। भारतीय आर्यों का प्राचीनतम साहित्य हमें [[वेद|वेदों]] में विशेष रूप से [[ॠग्वेद]] में मिलता है, जिसका रचनाकाल कुछ विद्वान तीन हज़ार ई. पू. मानते हैं। वेदों में हमें उस काल की सभ्यता की एक झाँकी मिलती है। आर्यों ने इस देश को कोई राजनीतिक एकता प्रदान नहीं की। यद्यपि उन्होंने उसे एक पुष्ट दर्शन और धर्म प्रदान किया, जो [[हिन्दू धर्म]] के नाम से प्रख्यात है और कम से कम चार हज़ार वर्ष से अक्षुण्ण है।&lt;br /&gt;
{{seealso|आर्य|आर्यावर्त|सोम रस|वेद}}&lt;br /&gt;
==महाजनपद युग==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महाजनपद}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''प्राचीन भारतीयों ने कोई तिथि क्रमानुसार इतिहास नहीं सुरक्षित रखा है।''' सबसे प्राचीन सुनिश्चित तिथि जो हमें ज्ञात है, 326 ई. पू. है, जब मक़दूनिया के राजा [[सिकन्दर]] ने भारत पर आक्रमण किया। इस तिथि से पहले की घटनाओं का तारतम्य जोड़ कर तथा साहित्य में सुरक्षित ऐतिहासिक अनुश्रुतियों का उपयोग करके भारत का इतिहास सातवीं शताब्दी ई. पू. तक पहुँच जाता है। इस काल में भारत [[क़ाबुल]] की घाटी से लेकर गोदावरी तक [[सोलह महाजनपद|षोडश जनपदों]] में विभाजित था।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
इन राज्यों मे आपस में बराबर लड़ाई होती रहती थी। छठीं शताब्दी ई. पू. के मध्य में [[बिम्बिसार]] तथा [[अजातशत्रु]] के राज्य काल में [[मगध]] ने [[काशी]]  तथा [[कोशल]] पर अधिकार करने के बाद अपनी सीमाओं का विस्तार आरम्भ किया। इन्हीं दोनों मगध राजाओं के राज्यकाल में वर्धमान [[महावीर]] ने [[जैन धर्म]] तथा [[बुद्ध|गौतम बुद्ध]] ने [[बौद्ध धर्म]] का उपदेश दिया। बाद के काल में मगध राज्य का विस्तार जारी रहा और चौथी शताब्दी ई. पू. के अंत में नन्द राजाओं के शासनकाल में उसका विस्तार [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] से लेकर [[पंजाब]] में [[व्यास नदी]] के तट तक सारे उत्तरी भारत में हो गया।&lt;br /&gt;
{{seealso|ब्राह्मण|अंधक संघ|कृष्ण|ब्रज}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मौर्य और शुंग==&lt;br /&gt;
{{main|मौर्य काल|मौर्य साम्राज्य| शुंग}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chanakya.jpg|thumb|250px|[[चाणक्य]]]]&lt;br /&gt;
यूनानी इतिहासकारों के द्वारा वर्णित 'प्रेसिआई' देश का राजा इतना शक्तिशाली था कि [[सिकन्दर]] की सेनाएँ व्यास पार करके प्रेसिआई देश में नहीं घुस सकीं और सिकन्दर, जिसने 326 ई. में पंजाब पर हमला किया, पीछे लौटने के लिए विवश हो गया। वह सिंधु के मार्ग से पीछे लौट गया। इस घटना के बाद ही मगध पर [[चंद्रगुप्त मौर्य]] (लगभग 322 ई. पू.-298 ई. पू.) ने पंजाब में सिकन्दर जिन यूनानी अधिकारियों को छोड़ गया था, उन्हें निकाल बाहर किया और बाद में एक युद्ध में सिकन्दर के सेनापति [[सेल्युकस]] को हरा दिया। सेल्युकस ने [[हिन्दूकुश]] तक का सारा प्रदेश वापस लौटा कर चन्द्रगुप्त मौर्य से संधि कर ली। चन्द्रगुप्त ने सारे उत्तरी भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसने सम्भ्वतः दक्षिण भी विजय कर लिया। वह अपने इस विशाल साम्राज्य पर अपनी राजधानी [[पाटलिपुत्र]] से शासन करता था। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र वैभव और समृद्धि में सूसा और एकबताना नगरियों को भी मात करती थी। '''उसका पौत्र [[अशोक]] था, जिसने [[कलिंग]] ([[उड़ीसा]]) को जीता। उसका साम्राज्य [[हिमालय]] के पादमूल से लेकर दक्षिण में [[पन्नार नदी]] तक तथा उत्तर पश्चिम में हिन्दूकुश से लेकर उत्तर-पूर्व में [[असम|आसाम]] की सीमा तक विस्तृत था।''' उसने अपने विशाल साम्राज्य के समय साधनों को मनुष्यों तथा पशुओं के कल्याण कार्यों तथा बौद्ध धर्म के प्रसार में लगाकर अमिट यश प्राप्त किया। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भिक्षुओं को [[मिस्र]], मक़दूनिया तथा कोरिन्थ (प्राचीन [[यूनान]] की विलास नगरी) जैसे दूर-दराज स्थानों में भेजा और वहाँ लोकोपकारी कार्य करवाये। उसके प्रयत्नों से बौद्ध धर्म विश्वधर्म बन गया। परन्तु उसकी युद्ध से विरत रहने की शान्तिपूर्ण नीति ने उसके वंश की शक्ति क्षीण कर दी और लगभग आधी शताब्दी के बाद [[पुष्यमित्र शुंग|पुष्यमित्र]] ने उसका उच्छेद कर दिया। पुष्यमित्र ने [[शुंगवंश]] (लगभग 185 ई. पू.- 73 ई. पू.) की स्थापना की, जिसका उच्छेद कराव वंश (लगभग  73 ई. पू.-28 ई. पू.) ने कर दिया।&lt;br /&gt;
{{seealso|अशोक के शिलालेख|अशोक|बुद्ध|बौद्ध दर्शन|बौद्ध धर्म|फ़ाह्यान|पाटलिपुत्र|तक्षशिला}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शक, कुषाण और सातवाहन==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|शक साम्राज्य|कुषाण साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:RabatakInscription.jpg|thumb|130px|[[राबाटक लेख]]]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:kanishk.jpg|thumb|100px|left|[[कनिष्क]]]]&lt;br /&gt;
मौर्यवंश के पतन के बाद मगध की शक्ति घटने लगी और [[सातवाहन]] राजाओं के नेतृत्व में मगध साम्राज्य दक्षिण से अलग हो गया। सातवाहन वंश को [[आन्ध्र वंश]] भी कहते हैं और उसने 50 ई. पू. से 225 ई. तक राज्य किया। भारत में एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के अभाव में बैक्ट्रिया और पार्थिया के राजाओं ने उत्तरी भारत पर आक्रमण शुरू कर दिये। इन आक्रमणकारी राजाओं में [[मिलिंद (मिनांडर)|मिनाण्डर]] सबसे विख्यात है। इसके बाद ही [[शक]] राजाओं के आक्रमण शुरू हो गये और [[महाराष्ट्र]], [[सौराष्ट्र]] तथा [[मथुरा]] शक क्षत्रपों के शासन  में आ गये। इस तरह भारत की जो राजनीतिक एकता भंग हो गयी थी, वह ईस्वीं पहली शताब्दी में [[कुजुल कडफ़ाइसिस]] द्वारा [[कुषाण वंश]] की शुरूआत से फिर स्थापित हो गयी। इस वंश ने तीसरी शताब्दी ईस्वीं के मध्य तक उत्तरी भारत पर राज्य किया। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kambojika-2.jpg|thumb|130px|[[कम्बोजिका]]]]&lt;br /&gt;
'''इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा [[कनिष्क]] (लगभग 120-144 ई.) था, जिसकी राजधानी [[पुरुषपुर]] अथवा [[पेशावर]] थी। उसने [[बौद्ध धर्म]] ग्रहण कर लिया और [[अश्वघोष]], [[नागार्जुन बौद्धाचार्य|नागार्जुन]] तथा [[चरक]] जैसे भारतीय विद्वानों को संरक्षण दिया।''' कुषाणवंश का अज्ञात कारणों से तीसरी शताब्दी के मध्य तक पतन हो गया। इसके बाद भारतीय इतिहास का अंधकार युग आरम्भ होता है। जो चौथी शताब्दी के आरम्भ में [[गुप्तवंश]] के उदय से समाप्त हुआ।&lt;br /&gt;
{{seealso|राबाटक लेख|कुषाण|कनिष्क|कम्बोजिका|कल्हण}} &lt;br /&gt;
==गुप्त==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गुप्त साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Xuanzang.jpg|thumb|80px|[[ह्वेन त्सांग]]]]&lt;br /&gt;
[[चित्र:Udaygiri-Caves-Vidisha-1.jpg|thumb|left|[[वराह अवतार]] भित्ति मू्र्तिकला, गुप्त काल, [[उदयगिरि गुफ़ाएँ]]]]&lt;br /&gt;
लगभग 320 ई. पू. में चन्द्रगुप्त ने गुप्तवंश को प्रचलित किया और [[पाटलिपुत्र]] को फिर से अपनी राजधानी बनाया। गुप्त वंश में एक के बाद एक चार महान शक्तिशाली राजा हुए, जिन्होंने सारे उत्तरी भारत में अपना साम्राज्य विस्तृत कर लिया और दक्षिण के कई राज्यों पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उन्होंने हिन्दू धर्म को राज्य धर्म बनाया, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रति सहिष्णुता बरती और ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, वास्तुकला और चित्रकला की उन्नति की। इसी युग में [[कालिदास]], [[आर्यभट्ट]] तथा [[वराहमिहिर]] हुए। [[रामायण]], [[महाभारत]], [[पुराण|पुराणों]] तथा मनुसंहिता को भी इसी युग में वर्तमान रूप प्राप्त हुआ। चीनी यात्री [[फ़ाह्यान|फाह्यान]] ने 401 से 410 ई. के बीच भारत की यात्रा की और उसने उस काल का रोचक वर्णन किया है। उसका मत है कि उस काल में देश में पूरा रामराज्य था। '''स्वाभाविक रूप से गुप्त युग को भारतीय इतिहास का 'स्वर्णयुग' माना जाता है''' और उसकी तुलना एथेन्स के परीक्लीज युग से की जाती है। (पेरीक्लीज (लगभग 492-529 ई. पू.) एथेन्स का महान राजनेता तथा सेनापति था। उसके शासनकाल (460-429 ई. पू.) में एथेन्स उन्नति के शिखर पर पहुँच गया)। आंतरिक विघटन तथा हूणों के आक्रमणों के फलस्वरूप छठी शताब्दी में गुप्त वंश का पतन हो गया। परन्तु सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ में [[हर्षवर्धन]] ने एक दूसरा साम्राज्य खड़ा कर दिया, जिसकी राजधानी [[कन्नौज]] थी। यह साम्राज्य सारे उत्तरी भारत में विस्तृत था। दक्षिण में चालुक्य राजा [[पुलकेशी द्वितीय]] ने उसका साम्राज्य [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] तट से आगे बढ़ने से रोक दिया था। चीनी यात्री [[हुएनसांग]] उसके राज्यकाल में भारत आया था और उसने अपनी यात्रा वर्णन में लिखा है कि हर्षवर्धन बड़ा प्रतापी और शक्तिशाली राजा है। वह 646 ई. में निस्संतान मर गया और उसके बाद सारे उत्तरी भारत में फिर से अव्यवस्था फैल गयी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kirti-Stambh-Chittorgarh.jpg|thumb|100px|कीर्ति स्तम्भ, चित्तौड़गढ़]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गुर्जर प्रतिहार राजवंश==&lt;br /&gt;
{{main|गुर्जर प्रतिहार वंश}}&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल [[गुर्जर]] सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे  गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे ''kiu-che-lo'' बोलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
|work=Persian Texts in Translation&lt;br /&gt;
|publisher=The Packard Humanities Institute&lt;br /&gt;
|accessdate=2007-05-31&lt;br /&gt;
|archiveurl = http://web.archive.org/web/20070929130741/http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90 &amp;lt;!-- Bot retrieved archive --&amp;gt; |archivedate = 2007-09-29}}&amp;lt;/ref&amp;gt;६ से १२ वीं सदी में [[गुर्जर]] कई जगह सत्ता में थे।[[गुर्जर प्रतिहार वंश]] की सत्ता कन्नौज से लेकर [[बिहार]], उत्तर प्रदेश, [[महाराष्ट्र]] और [[गुजरात]] तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है।12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भुरि-भुरि प्रशन्शा की है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;अरब लेखको के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयन्कर शत्रु थे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजपूत एवं अन्य राजवंश==&lt;br /&gt;
[[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य]] के विघटन के बाद उत्तर [[भारत]] में कई राजपूत राज्यों की नींव पड़ी।। इनमें पंजाब का हिन्दूशाही राजवंश, [[अजमेर]] का [[चौहान वंश]], [[कन्नौज]] का [[गहड़वाल वंश]] तथा मगध और बंगाल का [[पाल वंश]] था। दक्षिण में भी [[सातवाहन वंश]] के पतन के बाद इसी प्रकार सत्ता का विघटन हो गया। [[उड़ीसा]] के [[गंग वंश]] जिसने पुरी का प्रसिद्ध [[जगन्नाथ मंदिर पुरी|जगन्नाथ मन्दिर]] बनवाया, [[वातापी कर्नाटक|वातापी]] के [[चालुक्य वंश]], जिसके राज्यकाल में [[अजन्ता की गुफ़ाएँ|अजन्ता]] के कुछ गुफ़ा चित्र बने तथा कांची के [[पल्लव वंश]] ने, जिसकी स्मृति उस काल में बनवाये गये कुछ प्रसिद्ध मन्दिरों में सुरक्षित है, दक्षिण को आपस में बांट लिया और परस्पर युद्धों में एक दूसरे का नाश कर दिया। इसके बाद [[मान्यखेट]] अथवा [[मालखड़]] के [[राष्ट्रकूट वंश]] का उदय हुआ, जिसका उच्छेद पुर के चालुक्य वंश की एक नवीन शाखा ने कर दिया। जिसने [[कल्याणी कर्नाटक|कल्याणी]] को अपनी राजधानी बनाया। उसका उच्छेद [[देवगिरि]] के यादवों तथा द्वारसमुद्र के [[होयसल वंश]] ने कर दिया। सुदूर दक्षिण में चेर, पांड्य और चोल राज्यों का उदय हुआ, जिनमें से अंतिम राज्य सबसे अधिक चला। इस तरह सारे भारत में अनैक्य व्याप्त हो गया।&lt;br /&gt;
====राजपूत राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|राजपूत काल}} &lt;br /&gt;
[[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य]] के विघटन के बाद उत्तर भारत में कई राजपूत राज्यों की नींव पड़ी। इनमें सबसे प्रमुख कन्नौज के गहदवाल, [[मालवा]] के [[परमार वंश|परमार]] तथा [[अजमेर]] के [[चौहान वंश|चौहान]] थे। देश के अन्य क्षेत्रों में और भी छोटे-छोटे राज्य थे। जैसे आधुनिक [[जबलपुर]] के निकट कलचुरी, [[बुंदेलखण्ड]] में [[चंदेल वंश|चंदेल]], [[गुजरात]] में [[चालुक्य वंश|चालुक्य]] तथा [[दिल्ली]] में [[तोमर वंश|तोमर]] वंशों का शासन था। [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर पहले [[पाल वंश]] का अधिकार था, बाद में [[सेन वंश]] का अधिकार हुआ।&lt;br /&gt;
{{see also|पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज रासो}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पाल साम्राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|पाल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[हर्षवर्धन|हर्ष]] के समय के बाद से उत्तरी भारत के प्रभुत्व का प्रतीक [[कन्नौज]] माना जाता था। बाद में यह स्थान [[दिल्ली]] ने प्राप्त कर लिया। पाल साम्राज्य की नींव 750 ई0 में 'गोपाल' नामक राजा ने डाली। बताया जाता है कि उस क्षेत्र में फैली अशान्ति को दबाने के लिए कुछ प्रमुख लोगों ने उसको राजा के रूप में चुना। इस प्रकार राजा का निर्वाचन एक अभूतपूर्व घटना थी।  इसका अर्थ शायद यह है कि गोपाल उस क्षेत्र के सभी महत्त्वपूर्ण लोगों का समर्थन प्राप्त करने में सफल हो सका और इससे उसे अपनी स्थिति मज़बूत करन में काफ़ी सहायता मिली। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====राष्ट्रकूट साम्राज्य====&lt;br /&gt;
{{main|राष्ट्रकूट साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
जब उत्तरी भारत में पाल और प्रतिहार वंशों का शासन था, दक्कन में राष्टूकूट राज्य करते थे। इस वंश ने भारत को कई योद्धा और कुशल प्रशासक दिए हैं। इस साम्राज्य की नींव 'दन्तिदुर्ग' ने डाली। दन्तिदुर्ग ने 750 ई0 में चालुक्यों के शासन को समाप्त कर आज के [[शोलापुर ज़िला|शोलापुर]] के निकट अपनी राजधानी 'मान्यखेट' अथवा 'मानखेड़' की नींव रखी। शीघ्र ही [[महाराष्ट्र]] के उत्तर के सभी क्षेत्रों पर राष्ट्रकूटों का आधिपत्य हो गया। गुजरात और मालवा के प्रभुत्व के लिए इन्होंने प्रतिहारों से भी लोहा लिया। यद्यपि इन हमलों के कारण राष्ट्रकूट अपने साम्राज्य का विस्तार गंगा घाटी तक नहीं कर सके तथापि इनमें उन्हें बहुत बड़ी मात्रा में धन राशि मिली और उनकी ख्याति बढ़ी। वंगी (वर्तमान [[आंध्र प्रदेश]]) के पूर्वी चालुक्यों और दक्षिण में [[कांची]] के [[पल्लव वंश|पल्लवों]] तथा [[मदुरई]] के पांड्यों के साथ भी राष्ट्रकूटों का बराबर संघर्ष चलता रहा।&lt;br /&gt;
==चोल साम्राज्य &amp;lt;small&amp;gt;नौवीं से बारहवीं शताब्दी&amp;lt;/small&amp;gt;==&lt;br /&gt;
{{main|चोल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
चोल साम्राज्य का अभ्युदय नौवीं शताब्दी में हुआ और दक्षिण प्राय:द्वीप का अधिकांश भाग इसके अधिकार में था। चोल शासकों ने [[श्रीलंका]] पर भी विजय प्राप्त कर ली थी और [[मालदीव]] द्वीपों पर भी इनका अधिकार था। कुछ समय तक इनका प्रभाव [[कलिंग]] और [[तुंगभद्रा नदी|तुंगभद्र]] दोआब पर भी छाया था। इनके पास शक्तिशाली नौसेना थी और ये दक्षिण पूर्वी [[एशिया]] में अपना प्रभाव क़ायम करने में सफल हो सके। चोल साम्राज्य दक्षिण भारत का निःसन्देह सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। अपनी प्रारम्भिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के बाद क़रीब दो शताब्दियों तक अर्थात बारहवीं ईस्वी के मध्य तक चोल शासकों ने न केवल एक स्थिर प्रशासन दिया, वरन कला और साहित्य को बहुत प्रोत्साहन दिया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि चोल काल दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' था। &lt;br /&gt;
====भव्य मन्दिरों का निर्माण====&lt;br /&gt;
{{main|भारत की वास्तुकला का इतिहास}}&lt;br /&gt;
आठवीं शताब्दी के बाद और विशेषकर दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच का काल मन्दिर निर्माण कला का चरमोत्कर्ष माना जा सकता है। आज हम जिन भव्यों मन्दिरों को देखते हैं, उनमें से अधिकतर उसी काल में बनाये गए थे। इस काल की मन्दिर निर्माण कला की मुख्य शैली 'नागर' नाम से जानी जाती है। यद्यपि इस शैली के मन्दिर सारे भारत में पाए जाते हैं तथापि इनके मुख्य केन्द्र उत्तर भारत और दक्कन में थे।&lt;br /&gt;
{{see also|खजुराहो|मूर्ति कला मथुरा}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इस्लाम का प्रवेश==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|इस्लाम धर्म}}&lt;br /&gt;
इस बीच 712 ई. में भारत में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। [[मुहम्मद-इब्न-क़ासिम]] के नेतृत्व में [[मुसलमान]] अरबों ने [[सिंध]] पर हमला कर दिया और वहाँ के [[ब्राह्मण]] राजा दाहिर को हरा दिया। इस तरह भारत की भूमि पर पहली बार [[इस्लाम]] के पैर जम गये और बाद की शताब्दियों के [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]] राजा उसे फिर हटा नहीं सके। परन्तु सिंध पर अरबों का शासन वास्तव में निर्बल था और 1176 ई. में [[शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी]] ने उसे आसानी से उखाड़ दिया। इससे पूर्व सुबुक्तगीन के नेतृत्व में मुसलमानों ने हमले करके [[पंजाब]] छीन लिया था और ग़ज़नी के [[महमूद ग़ज़नवी|सुल्तान महमूद]] ने 997 से 1030 ई. के बीच भारत पर सत्रह हमले किये और हिन्दू राजाओं की शक्ति कुचल डाली, फिर भी हिन्दू राजाओं ने मुसलमानी आक्रमण का जिस अनवरत रीति से प्रबल विरोध किया, उसका महत्व कम करके नहीं आंकना चाहिए।&lt;br /&gt;
{{seealso|चंगेज़ ख़ाँ|महमूद ग़ज़नवी}}&lt;br /&gt;
==संघर्ष का युग &amp;lt;small&amp;gt;लगभग 1000 ई0 से 1200 ई0 तक&amp;lt;/small&amp;gt;==&lt;br /&gt;
पश्चिम के साथ-साथ मध्य [[एशिया]] तथा उत्तर [[भारत]] में भी 1000 ई. तथा 1200 ई. के बीच तेज़ी के साथ परिवर्तन हुए। इन्हीं परिवर्तनों के परिणमस्वरूप इस काल के अन्त में उत्तर भारत में तुर्कों के आक्रमण हुए। नौवीं शताब्दी के अन्त तक अब्बासी ख़लिफ़ों का पतन आरम्भ हो गया था। उनका साम्राज्य अब छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था, जिन पर [[मुसलमान]] तुर्कों का शासन था। तुर्क, अब्बासी साम्राज्य में महल रक्षकों तथा पेशेवर सैनिकों के रूप में आए थे। लेकिन शीघ्र ही इतने शक्तिशाली बन गए कि नियुक्ति पर भी उनका अधिकार हो गया। जैसे-जैसे केन्द्रीय सरकार की शक्ति कम होती गई, प्रान्तीय शासक अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे, यद्यपि कुछ समय तक इस पर एकता का पर्दा पड़ा रहा, क्योंकि सफल सरदारों को, जो किसी क्षेत्र में अपना अधिकार जमाने में सफल हो जाते थे, ख़लीफ़ा ही औपचारिक रूप से 'अमीर-उल-उमरा' (सेनापतियों का सेनापति) की पदवी देता था। ये शासक पहले 'अमीर' की, पर बाद में 'सुल्तान' की पदवी ग्रहण करने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक के बाद एक साम्राज्य स्थापित होते गए और उतनी ही जल्दी उनका पतन होता गया। इन्होंने एक नयी प्रकार की युद्धनीति शुरू की। जिसमें प्रमुख भूमिका भारी अस्त्रशस्त्रों से लैस घुड़सवार सैनिकों की होती थी, जो तेज़ी से आगे-पीछे सरक सकते थे और घोड़े की पीठ से ही तीरों की बौछार कर सकते थे। यह लोहे की रक़ाबों से ही सम्भव था। 'लोहे की रक़ाबों' तथा एक नए तरह की 'लगाम' के कारण युद्धनीति में इस तरह का परिवर्तन आया। इसी बीच [[प्रतिहार साम्राज्य|गुर्जर-प्रतिहारों]] के साम्राज्य के विघटन से उत्तरी भारत कई छोट-छोटे राज्यों में बंट गया जिनके शासकों के पास इस नई युद्ध नीति के महत्व को समझने तथा उसका मुक़ाबला करने के न तो साधन थे और न ही इच्छा थी। &lt;br /&gt;
====महमूद ग़ज़नवी====&lt;br /&gt;
{{main|महमूद ग़ज़नवी}}&lt;br /&gt;
यह यमीनी वंश का तुर्क सरदार ग़ज़नी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था । उसका जन्म सं. 1028 वि. (ई. 971) में हुआ, 27 वर्ष की आयु में सं. 1055 (ई. 998) में वह शासनाध्यक्ष बना था । महमूद बचपन से भारतवर्ष की अपार समृद्धि और धन-दौलत के विषय में सुनता रहा था । उसके पिता ने एक बार हिन्दू शाही राजा जयपाल के राज्य को लूट कर प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त की थी, महमूद भारत की दौलत को लूटकर मालामाल होने के स्वप्न देखा करता था । उसने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और यहाँ की अपार सम्पत्ति को वह लूट कर ग़ज़नी ले गया था । उसके आक्रमण और लूटमार के काले कारनामों से तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों के पन्ने भरे हुए है । &lt;br /&gt;
==पृथ्वीराज चौहान और ग़ोरी==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|पृथ्वीराज चौहान|मुहम्मद ग़ोरी}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Qutub Minar Delhi.jpg|thumb|क़ुतुब मीनार]]&lt;br /&gt;
[[फ़ारस]] तथा पश्चिम एशिया के दूसरे राज्यों की तरह मुसलमानों को भारत में शीघ्रता से सफलता नहीं मिली। यद्यपि सिंध पर अरब मुसलमानों का शीघ्रता से क़ब्ज़ा हो गया, परन्तु वहाँ से वे लगभग चार शताब्दियों तक आगे नहीं बढ़ पाये। '''उत्तर-पश्चिम के मुसलमान आक्रमणकारियों को भी भारत ने लगभग तीन शताब्दियों तक रोके रखा'''। शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी का [[दिल्ली]] जीतने का पहला प्रयास विफल हुआ और [[पृथ्वीराज चौहान|पृथ्वीराज]] ने 1190 ई. में [[तराइन का युद्ध|तराईन]] की पहली लड़ाई में उसे हरा दिया। वह 1193 ई. में तराईन की दूसरी लड़ाई में ही पृथ्वीराज को हराने में सफल हुआ। इस विजय के बाद शहाबुद्दीन और उसके सेनापतियों ने उत्तरी भारत के दूसरे हिन्दू राजाओं को भी हरा दिया और वहाँ मुसलमानी शासन स्थापित कर दिया। इस तरह तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में दिल्ली के सुल्तानों की अधीनता में उत्तरी भारत की राजनीतिक एकता फिर से स्थापित हो गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तैमूर==&lt;br /&gt;
{{main|तैमूर लंग}}&lt;br /&gt;
दक्षिण एक और शताब्दी तक स्वतंत्र रहा, किन्तु [[अलाउद्दीन ख़िलजी|सुल्तान ख़िलजी]] के राज्यकाल में दक्षिण भी दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया और इस तरह चौदहवीं शताब्दी में कुछ काल के लिए सारे भारत का शासन फिर से एक केन्द्रीय सत्ता के अंतर्गत आ गया। परन्तु [[दिल्ली सल्तनत]] का शीघ्र ही पतन शुरू हो गया और 1336 ई. में दक्षिण में हिन्दुओं का एक विशाल राज्य स्थापित हुआ, जिसकी राजधानी [[विजय नगर साम्राज्य]] थी। बंगाल (1338 ई.), [[जौनपुर]] (1393 ई.), [[गुजरात]] तथा दक्षिण के मध्यवर्ती भाग में भी [[बहमनी सल्तनत]] (1347 ई.) के नाम से स्वतंत्र मुसलमानी राज्य स्थापित हो गया। 1398 ई. में [[तैमूर]] ने भारत पर हमला किया और दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे लूटा। उसके हमले से दिल्ली की सल्तनत जर्जर हो गयी।&lt;br /&gt;
{{seealso|तैमूर लंग|विजय नगर साम्राज्य|बहमनी वंश|चंगेज़ ख़ाँ|अलाउद्दीन ख़िलजी}}&lt;br /&gt;
==मुग़ल==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Akbar.jpg|thumb|100px|[[अकबर]]]]&lt;br /&gt;
{{main|मुग़ल काल}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tajmahal-03.jpg|thumb|left|100px|[[ताजमहल]]]]&lt;br /&gt;
दिल्ली की सल्तनत वास्तव में कमज़ोर थी, क्योंकि सुल्तानों ने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने का कोई प्रयास नहीं किया। वे धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त कट्टर थे और उन्होंने बलपूर्वक हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का प्रयास किया। इससे हिन्दू प्रजा उनसे कोई सहानुभूति नहीं रखती थी। इसक फलस्वरूप 1526 ई. में [[बाबर]] ने आसानी से दिल्ली की सल्तनत को उखाड़ फैंका। उसने [[पानीपत]] की  [[पानीपत युद्ध प्रथम |पहली लड़ाई]] में अन्तिम सुल्तान [[इब्राहीम लोदी]] को हरा दिया और [[मुग़ल वंश]] की प्रतिष्ठित किया, जिसने 1526 से 1858 ई. तक भारत पर शासन किया। तीसरा [[मुग़ल]] बादशाह [[अकबर]] असाधारण रूप से योग्य और दूरदर्शी शासक था। उसने अपनी विजित हिन्दू प्रजा का हृदय जीतने की कोशिश की और विशेष रूप से युद्ध प्रिय राजपूत राजाओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। '''अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता तथा मेल-मिलाप की नीति बरती, हिन्दुओं पर से [[जज़िया]] उठा लिया और राज्य के ऊँचे पदों पर बिना भेदभाव के सिर्फ योग्यता के आधार पर नियुक्तियाँ कीं'''।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मराठा==&lt;br /&gt;
{{main|मराठा साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Chatrapati Shivaji-2.jpg|thumb|left|100px|[[शिवाजी]]]]&lt;br /&gt;
राजपूतों और मुग़लों के योग से उसने अपना साम्राज्य [[कन्दहार]] से [[आसाम]] की सीमा तक तथा [[हिमालय]] की तलहटी से लेकर दक्षिण में [[अहमदनगर]] तक विस्तृत कर दिया। उसके पुत्र [[जहाँगीर]] जहाँ पौत्र [[शाहजहाँ]] कि राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार जारी रहा। शाहजहाँ ने [[ताजमहल]] का निर्माण कराया, परन्तु कन्दहार उसके हाथ से निकल गया। अकबर के प्रपौत्र औरंगज़ेब के राज्यकाल में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार अपने चरम शिखर पर पहुँच गया और कुछ काल के लिए सारा भारत उसके अंतर्गत हो गया। परन्तु [[औरंगज़ेब]] ने जान-बूझकर अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति त्याग दी और हिन्दुओं को अपने विरुद्ध कर लिया। उसने हिन्दुस्तान का शासन सिर्फ मुसलमानों के हित में चलाने की कोशिश की और हिन्दुओं को ज़बर्दस्ती मुसलमान बनाने का असफल प्रयास किया। इससे राजपूताना, [[बुंदेलखण्ड]] तथा [[पंजाब]] के हिन्दू उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए। [[महाराष्ट्र]] में [[शिवाजी]] ने 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु से पूर्व ही एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य स्थापित कर दिया। औरंगज़ेब अन्तिम शक्तिशाली मुग़ल बादशाह था। उसके उत्तराधिकारी अत्यन्त निर्बल और अयोग्य थे, उनके वज़ीर विश्वासघाती थे। फ़ारस के [[नादिरशाह]] ने मुग़ल बादशाहत पर सबसे सांघातिक प्रहार किया। उसने 1739 ई. में भारत पर चढ़ाई की और दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे निर्दयता से पूरी तरह लूटा। उसके हमले से मुग़ल साम्राज्य पूरी तरह जर्जर हो गया और इसके बाद शीघ्रता से उसका विघटन हो गया। [[अवध]], [[अखण्डित बंगाल]] तथा दक्षिण के मुसलमान सूबेदारों ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। राजपूत राजा भी अर्द्ध-स्वतंत्र हो गये। [[पेशवा बाजीराव प्रथम]] के नेतृत्व में [[मराठा|मराठों]] ने [[मुग़ल काल|मुग़ल साम्राज्य]] के खंडहरों पर हिन्दू पद पादशाह की स्थापना का प्रयास किया।&lt;br /&gt;
{{seealso|शिवाजी|तानाजी|अहिल्याबाई होल्कर|जाटों का इतिहास}}&lt;br /&gt;
==अंग्रेज़==&lt;br /&gt;
[[फ़िरंगी]] लोग '''समुद्री मार्गों से भारत की ज़मीन पर पैर जमा चुके थे'''। [[अकबर]] से लेकर [[औरंगज़ेब]] तक '''मुग़ल बादशाहों ने भारत के इस नये मार्ग का महत्व नहीं समझा'''। इनमें से कोई इन नवांगतुकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अनुमान नहीं लगा सका और उनके जंगी बेड़े का मुक़ाबला करने के लिए एक शक्तिशाली भारतीय जंगी बेड़ा तैयार करने की आवश्यकता को अनुभव नहीं कर सका। इस तरह भारतीयों की ओर से किसी प्रतिरोध का सामना किये बग़ैर सबसे पहले [[पुर्तग़ाली]] भारत पहुँचे। उसके बाद [[डच]], [[अंग्रेज़]], [[फ्राँसीसी]] आये। सोलहवीं शताब्दी में इन फिरंगियों में आपस में लड़ाइयाँ होती रही, जो अधिकांश समुद्र में हुई। डच और अंग्रेजों ने मिलकर सबसे पहले पुर्तग़ालियों की सामुद्रिक शक्ति को समाप्त किया। इसके बाद डच लोगों को पता चला कि उनके लिए भारत की अपेक्षा मसाले वाले द्वीपों से व्यापार करना अधिक लाभदायी है। इस तरह भारत में सिर्फ अंग्रेज़ और फ्राँसीसी लोगों के बीच प्रतिद्वन्द्विता हुई।&lt;br /&gt;
{{seealso|वास्को द गामा}}&lt;br /&gt;
==ईस्ट इंडिया कम्पनी==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tipu-Sultan.jpg|thumb|100px|[[टीपू सुल्तान]]]]&lt;br /&gt;
अठारहवीं शताब्दी के शुरू में अंग्रेजों की [[ईस्ट इंडिया कम्पनी]] ने बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) तथा कलकत्ता (कोलकाता) पर क़ब्ज़ा कर लिया। उधर फ्राँसीसियों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने [[माहे]], [[पुदुचेरी|पांडिचेरी]] तथा [[चंद्रानगर]] पर क़ब्ज़ा कर लिया। उन्हें अपनी सेनाओं में भारतीय सिपाहियों को भरती करने की भी इजाज़त मिल गयी। वे इन भारतीय सिपाहियों का उपयोग न केवल अपनी आपसी लड़ाइयों में करते थे बल्कि इस देश के राजाओं के विरुद्ध भी करते थे। इन राजाओं की आपसी प्रतिद्वन्द्विता और कमज़ोरी ने इनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जाग्रत कर दिया और उन्होंने कुछ देशी राजाओं के विरुद्ध दूसरे देशी राजाओं से संधियाँ कर लीं। 1744-49 ई. में मुग़ल बादशाह की प्रभुसत्ता की पूर्ण उपेक्षा करके उन्होंने आपस में [[कर्नाटक]] की दूसरी लड़ाई छेड़ी। एक साल के बाद कर्नाटक की दूसरी लड़ाई शुरू हुई। जिसमें फ्राँसीसी गवर्नर [[डूप्ले]] ने पहली लड़ाई से सबक़ लेते हुए न केवल कर्नाटक के प्रशासन पर, बल्कि [[निज़ामशाही वंश|निज़ाम]] के राज्य पर भी [[फ़्राँस]] का राजनीतिक नियत्रंण स्थापित करने की कोशिश की। परन्तु अंग्रेजों ने उसकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होने दी। अंग्रेजों को बंगाल में भारी सफलता मिली थी। बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के केवल पचास वर्ष बाद 1757 ई. में राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने [[नवाब सिराजुद्दौला]] के विरुद्ध विश्वासघातपूर्ण राजद्रोहात्मक षड़यंत्र रचकर [[प्लासी]] की लड़ाई जीत ली और बंगाल को एक प्रकार से अपनी मुट्ठी में कर लिया। उन्होंने बंगाल की गद्दी पर एक कठपुतली नवाब [[मीर ज़ाफ़र]] को बिठा दिया। इसके बाद एक के बाद, तेज़ी से कई घटनाएँ घटीं।&lt;br /&gt;
{{seealso|मैसूर युद्ध|टीपू सुल्तान}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पानीपत== &lt;br /&gt;
{{मुख्य|पानीपत}}&lt;br /&gt;
[[अहमद शाह अब्दाली]] ने 1748 से 1760 ई. के बीच भारत पर चढ़ाइयाँ कीं और 1761 ई. में [[पानीपत]] की [[पानीपत युद्ध तृतीय|तीसरी लड़ाई]] जीत कर मुग़ल साम्राज्य का फ़ातिहा पढ़ दिया। उसने दिल्ली पर दख़ल करके उसे लूटा। पानीपत की तीसरी लड़ाई में सबसे अधिक क्षति मराठों को उठानी पड़ी। कुछ समय के लिए उनकी बाढ़ रुक गयी और इस प्रकार वे मुग़ल बादशाहों की जगह ले लेने का मौका खो बैठे। यह लड़ाई वास्तव में मुग़ल साम्राज्य के पतन की सूचक है। इसने भारत में मुग़ल साम्राज्य के स्थान पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना में मदद की। अब्दाली को पानीपत में जो फ़तह मिली, उससे न तो वह स्वयं कोई लाभ उठा सका और न उसका साथ देने वाले मुसलमान सरदार। इस लड़ाई से वास्तविक फ़ायदा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उठाया। इसके बाद कम्पनी को एक के बाद दूसरी सफलताएँ मिलती गयीं। &lt;br /&gt;
{{अंग्रेज़ गवर्नर जनरल और वायसराय सूची1}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रेग्युलेटिंग एक्ट==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|रेग्युलेटिंग एक्ट}}&lt;br /&gt;
बंगाल के साधनों से बलशाली होकर अंग्रेजों ने 1760 ई. में वाण्डीवाश की लड़ाई में फ्राँसीसियों को हरा दिया और 1762 ई. में उनसे [[पांडेचेरी]] ले लिया। इस प्रकार उन्होंने भारत में फ्राँसीसियों की राजनीतिक शक्ति समाप्त कर दी। 1764 ई. में अंग्रजों ने बक्सर की लड़ाई में [[बहादुर शाह प्रथम|बादशाह बहादुर शाह]] और [[शुजाउद्दौला|अवध के नवाब]] की सम्मिलित सेना को हरा दिया और 1765 ई. में बादशाह से बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर ली। इसके फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कम्पनी को पहली बार बंगाल, उड़ीसा तथा बिहार के प्रशासन का क़ानूनी अधिकार मिल गया। कुछ इतिहासकार इसे भारत में ब्रिटिश राज्य का प्रारम्भ मानते हैं। 1773 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक [[रेग्युलेटिंग एक्ट]] पास करके भारत में ब्रिटिश प्रशासन को व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया। इस एक्ट के अंतर्गत भारत में कम्पनी क्षेत्रों का प्रशासन गवर्नर-जनरल के अधीन कर दिया गया। उसकी सहायता के लिए चार सदस्यों की कॉउंसिल गठित की गयी। एक्ट में बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल का पद प्रदान किया गया और कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की भी स्थापना की गयी। [[वारेन हेस्टिंग्स]], जो उस समय बंगाल का गवर्नर था, 1773 ई. में पहला गवर्नर-जनरल बनाया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1773 ई. से 1947 ई. तक का काल, जब भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और भारत स्वाधीन हुआ, दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहला, कम्पनी का शासनकाल, जो 1858 ई. तक चला और दूसरा, 1858 से 1947 ई. तक का काल, जब भारत का शासन सीधे ब्रिटेन द्वारा होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गवर्नर-जनरलों का समय==&lt;br /&gt;
कम्पनी के शासन काल में भारत का प्रशासन एक के बाद एक बाईस [[गवर्नर-जनरल|गवर्नर-जनरलों]] के हाथों मे रहा। इस काल के भारतीय इतिहास की सबसे उल्लेखनीय घटना यह है कि कम्पनी युद्ध तथा कूटनीति के द्वारा भारत में अपने साम्राज्य का उत्तरोत्तर विस्तार करती रही। [[मैसूर]] के साथ [[मैसूर युद्ध|चार लड़ाइयाँ]], मराठों के साथ तीन, बर्मा ([[म्यांमार]]) तथा [[सिख|सिखों]] के साथ दो-दो लड़ाइयाँ तथा सिंध के अमीरों, गोरखों तथा [[अफ़ग़ानिस्तान]] के साथ एक-एक लड़ाई छेड़ी गयी। इनमें से प्रत्येक लड़ाई में कम्पनी को एक या दूसरे देशी राजा की मदद मिली। उसने जिन फ़ौजों से लड़ाई की उनमें से अधिकांश भारतीय सिपाही थे और लड़ाई का ख़र्च पूरी तरह भारतीय करदाता को उठाना पड़ा। इन लड़ाइयों के फलस्वरूप 1857 ई. तक सारे भारत पर सीधे कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हो गया। दो-तिहाई भारत पर देशी राज्यों का शासन बना रहा। परन्तु उन्होंने कम्पनी का सार्वभौम प्रभुत्व स्वीकार कर लिया और अधीनस्थ तथा आश्रित मित्र राजा के रूप में अपनी रियासत का शासन चलाते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग़दर- प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tatya-Tope.jpg|thumb|100px|[[तात्या टोपे]]]]&lt;br /&gt;
इस काल में [[सती प्रथा]] का अन्त कर देने के समान कुछ सामाजिक सुधार के भी कार्य किये गये। [[राजा राममोहन राय]] ने [[सती प्रथा]] जैसी अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव था, जिसके कारण [[लॉर्ड विलियम बैंण्टिक]] 1829 में सती प्रथा को बन्द कराने में समर्थ हो सका। अंग्रेज़ी के माध्यम से पश्चिम शिक्षा के प्रसार की दिशा में क़दम उठाये गये, अंग्रेज़ी देश की राजभाषा बना दी गयी, सारे देश में समान ज़ाब्ता दीवानी और ज़ाब्ता फ़ौजदारी क़ानून लागू कर दिया गया, परन्तु शासन स्वेच्छाचारी बना रहा और वह पूरी तरह अंग्रेज़ों के हाथों में रहा। 1833  के [[चार्टर एक्ट]] के विपरीत ऊँचे पदों पर भारतीयों को नियुक्त नहीं किया गया। भाप से चलने वाले जहाज़ों और रेलगाड़ियों का प्रचलन, ईसाई मिशनरियों द्वारा आक्षेपजनक रीति से [[ईसाई धर्म]] का प्रचार, [[लार्ड डलहौज़ी]] द्वारा ज़ब्ती का सिद्धांत लागू करके अथवा कुशासन के आधार पर कुछ पुरानी देशी रियासतों की ज़ब्ती तथा ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सिपाहियों की शिकायतें; इन सब कारणों ने मिलकर सारे भारत में एक गहरे असंतोष की आग धधका दी, जो 1857-58 ई. में ग़दर के रूप में भड़क उठी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तिम मुग़ल [[बहादुर शाह ज़फ़र]], [[लक्ष्मीबाई|झांसी की रानी लक्ष्मीबाई]], [[तात्या टोपे|तांत्या टोपे]] (रामचंन्द्र पांडुरंग), [[बिहार]] के बाबू कुँवरसिंह, [[महाराष्ट्र]] से [[नाना साहब|नाना साहिब]], इस प्रथम क्रान्ति के प्रयास के नायक थे किन्तु प्रयास विफल हो गया। अधिकांश देशी राजाओं ने अपने को ग़दर से अलग रखा। कम्पनी को बलपूर्वक ग़दर को कुचल देने में सफलता मिली, परन्तु ग़दर के बाद ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारत पर कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया। भारत का शासन अब सीधे ब्रिटेन के द्वारा किया जाने लगा।&lt;br /&gt;
{{seealso|झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|तात्या टोपे|राजा राममोहन राय|सती प्रथा}}&lt;br /&gt;
==भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासन का दूसरा काल (1858-1947 ई.) आरम्भ हुआ। इस काल का शासन एक के बाद इकत्तीस गवर्नर-जनरलों के हाथों में रहा। गवर्नर-जनरल को अब [[वाइसराय]] (ब्रिटिश सम्राट का प्रतिनिधि) कहा जाने लगा। [[लार्ड कैनिंग]] पहला वाइसराय तथा गवर्नर-जनरल नियुक्त हुआ। इस काल के भारतीय इतिहास की सबसे प्रमुख घटना है—भारत में राष्ट्रवादी भावना का उदय और 1947 ई. में भारत की स्वाधीनता के रूप में अंतिम विजय। 1857 ई. में कलकत्ता ([[कोलकाता]]), मद्रास ([[चेन्नई]]) तथा बम्बई ([[मुम्बई]]) में विश्वविद्यालयों की स्थापना के बाद शिक्षा का प्रसार होने लगा तथा 1869 ई. में स्वेज़ नहर खुलने के बाद [[इंग्लैण्ड]] तथा [[यूरोप]] से निकट सम्पर्क स्थापित हो जाने से भारत में नये मध्यवर्ग का विकास हुआ। यह मध्य वर्ग पश्चिमी दर्शन शास्त्र, राजनीति शास्त्र तथा अर्थशास्त्र के विचारों से प्रभावित था और ब्रिटिश शासन में भारतीयों को जो नीचा दर्जा मिला हुआ था, उससे रुष्ट था। ब्रिटिश में स्थापित शान्ति के फलस्वरूप यह वर्ग सारे भारत को एक देश तथा समस्त भारतीयों को एक क़ौम मानने लगा और ब्रिटेन की भाँति संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना उसका लक्ष्य बन गया। वह एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस करने लगा जो समस्त भारतीय राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सके। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके फलस्वरूप 1885 ई. में बम्बई में [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] की स्थापना हुई जिसमें देश के समस्त भागों से 71 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन 1883 ई. में कलकत्ता में हुआ, जिसमें सारे देश से निर्वाचित 434 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अधिवेशन में माँग की गयी कि भारत में केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधानमंडलों का विस्तार किया जाये और उसके आधे सदस्य निर्वाचित भारतीय हों। कांग्रेस हर साल अपने अधिवेशनों में अपनी माँगें दोहराती रही। [[लार्ड डफ़रिन]] ने कांग्रेस पर व्यंग्य करते हुए उसे ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था बताया जिसे सिर्फ़ ख़ुर्दबीन से देखा जा सकता है। [[लार्ड लैन्सडाउन]] ने उसके प्रति पूर्ण उपेक्षा की नीति बरती, [[लार्ड कर्ज़न]] ने उसका खुलेआम मज़ाक उड़ाया तथा [[लार्ड मिन्टो द्वितीय]] ने 1909 के इंडियन कॉउंसिल एक्ट द्वारा स्थापित विधानमंडलों में मुसलमानों को अनुचित रीति से अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देकर उन्हें फोड़ने तथा कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश की, फिर भी कांग्रेस जिन्दा रही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रारम्भिक सफलता==&lt;br /&gt;
कांग्रेस को पहली मामूली सफलता 1909 में मिली, जब इंग्लैण्ड में भारतमंत्री के निर्देशन में काम करने वाली भारत परिषद में दो भारतीय सदस्यों की नियुक्ति पहली बार की गयी, वाइसराय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में पहली बार एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति की गयी तथा इंडियन काउंसिल एक्ट के द्वारा केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधानमंडलों का विस्तार कर दिया गया तथा उनमें निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों का अनुपात पहले से अधिक बढ़ा दिया गया। इन सुधारों के प्रस्ताव लार्ड मार्ले ने हालाँकि भारत में संसदीय संस्थाओं की स्थापना करने का कोई इरादा होने से इन्कार किया, फिर भी एक्ट में जो व्यवस्थाएँ की गयीं थी, उनका उद्देश्य उसी दिशा में आगे बढ़ने के सिवा और कुछ नहीं हो सकता था। 1911 ई. में लार्ड कर्जन के द्वारा 1905 ई. में किया बंगाल का विभाजन रद्द कर दिया गया और भारत ने ब्रिटेन का पूरा साथ दिया। भारत ने युद्ध को जीतने के लिए ब्रिटेन की फ़ौजों से, धन से तथा समाग्री से मदद की। भारत आशा करता था कि इस राजभक्ति प्रदर्शन के बदले युद्ध से होने वाले लाभों में उसे भी हिस्सा मिलेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वैधशासन प्रणाली==&lt;br /&gt;
भारत के लिए स्वशासन की माँग करने में पहली बार भारतीय मुसलमान भी हिन्दुओं के साथ संयुक्त हो गये और अगस्त 1917 ई. में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारत में ब्रिटेश शासन की नीति है कि शासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों को अधिकारिक स्थान दिया जाय तथा स्वायत्त शासन का क्रमिकरूप से विकास किया जाय, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत में उत्तरदायी सरकार की उत्तरोत्तर स्थापना हो सके। इस घोषणा के अनुसार 1919 का गवर्नमेण्ट आफ इंडिया एक्ट पास किया गया। इस एक्ट के द्वारा विधान मंडलों का विस्तार कर दिया गया और अब उनके बहुसंख्य सदस्य भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि होने लगे। एक्ट के द्वारा केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के कार्यों का विभाजन कर दिया गया और प्रान्तों में द्वैधशासन प्रणाली लागू करके कार्यपालिका को आंशिक रीति से विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बना दिया गया। इस एक्ट के द्वारा भारत ने सुनिश्चित रीति से प्रगति की। भारतीय के इतिहास में पहली बार एक ऐसी संस्था की स्थापना की गयी, जिसके द्वारा ब्रिटिश भारत के निर्वाचित प्रतिनिधि सरकारी आधार पर एकत्र हो सकते थे। पहली बार उनका बहुमत स्थापित कर दिया गया और अब वे सरकार के कार्यों की  निर्भयतापूर्वक आलोचना कर सकते थे।&lt;br /&gt;
==असहयोग और सत्याग्रह==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|असहयोग आंदोलन}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Bhagat-Singh.gif|thumb|200px|100px|[[भगतसिंह|सरदार भगतसिंह]]]]&lt;br /&gt;
इन सुधारों से पुराने कांग्रेसजन संतुष्ट हो गये, परन्तु नव युवकों का दल, जिसे [[मोहनदास करमचंद गाँधी]] के रूप में एक नया नेता मिल गया था, संतुष्ट नहीं हुआ। इन सुधारों के अंतर्गत केन्द्रीय कार्यपालिका को केन्द्रीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया गया था और वाइसराय को बहुत अधिक अधिकार प्रदान कर दिये गये थे। अतएव उसने इन सुधारों को अस्वीकृत कर दिया। उसके मन में जो आशंकाएँ थीं, वे ग़लत नहीं थी, यह 1919 के एक्ट के बाद ही पास किये गये [[रौलट एक्ट]] जैसे दमनकारी क़ानूनों तथा [[जलियाँवाला बाग़]] हत्याकांण्ड जैसे दमनमूलक कार्यों से सिद्ध हो गया। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक में [[ऊधमसिंह]] ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। [[चंद्रशेखर आज़ाद]], [[राजगुरु]], [[सुखदेव]] और [[भगतसिंह]] जैसे महान क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए। कांग्रेस ने 1920 ई. में अपने नागपुर अधिवेशन में अपना ध्येय पूर्ण स्वराज्य की स्थापना घोषित कर दी और अपनी माँगों को मनवाने के लिए उसने अहिंसक असहयोंग की नीति अपनायी। चूंकि ब्रिटिश सरकार ने उसकी माँगें स्वीकार नहीं की और दमनकारी नीति के द्वारा वह [[असहयोग आंदोलन]] को दबा देने में सफल हो गयी। इसलिए कांग्रेस ने दिसम्बर 1929 ई. में लाहौर अधिवेशन में अपना लक्ष्य पूर्ण स्वीधीनता निश्चित किया और अपनी माँग का मनवाने के लिए उसने 1930 में [[नमक सत्याग्रह]] आंदोलन शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==द्वितीय विश्वयुद्ध==&lt;br /&gt;
सरकार ने पहले की तरह आंदोलन को दबाने के लिए दमन और समझौते के दोनों रास्ते अख़्तियार किये और 1935 का गवर्नेण्ट आफ इंडिया एक्ट पास किया। इस एक्ट के द्वारा ब्रिटश भारत तथा देशी रियासतों के लिए सम्मिलित रूप से एक संघीय शासन का प्रस्ताव किया, केन्द्र में एक प्रकार के द्वैध शासन की स्थापना की गयी तथा प्रान्तों को स्वशासन प्रदान कर दिया गया। एक्ट का प्रान्तों से सम्बन्धित भाग लागू कर दिया गया तथा अप्रैल 1937 ई. में प्रान्तीय स्वशासन का श्रीगणेश कर दिया गया। परन्तु एक्ट के संघ सरकार से सम्बन्धित भाग के लागू होने से पहले ही सितम्बर 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया जो 1945 ई. तक जारी रहा। यह विश्वव्यापी युद्ध था और ब्रिटेन को अपने सारे साधन उसमें झोंक देने पड़े। भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया और भारत के पास जन और धन की जो विशाल शक्ति थी उससे लाभ उठाकर तथा [[संयुक्त राज्य अमरीका|अमरीका]] की सहायता से [[ब्रिटेन]] युद्ध जीत गया। [[गाँधी जी]] के अमित प्रभाव तथा अहिंसा में उनकी दृढ़ निष्ठा के कारण भारत ने यद्यपि ब्रिटिश सम्बन्ध को बनाये रखा, फिर भी यह स्पष्ट हो गया कि भारत अब ब्रिटिश साम्राज्य की अधीनता में नहीं रहना चाहता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्प्रदायिक दंगे== &lt;br /&gt;
कुछ ब्रिटिश अफ़सरों ने भारत को स्वाधीन होने से रोकने के लिए अंतिम दुर्राभ संधि की और मुसलमानों की भारत विभाजन करके पाकिस्तान की स्थापना की माँग का समर्थन करना शुरू कर दिया। इसके फलस्वरूप अगस्त 1946 ई. में सारे देश में भयानक सम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गये, जिन्हें वाइसराय [[लार्ड वेवेल]] अपने समस्त फ़ौजी अनुभवों तथा साधनों बावजूद रोकन में असफल रहा। यह अनुभव किया गया कि भारत का प्रशासन ऐसी सरकार के द्वारा चलाना सम्भव नहीं है। जिसका नियंत्रण मुध्य रूप से अंग्रेजों के हाथों में हो। अतएव सितम्बर 1946 ई. में लार्ड वेवेल ने [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] के नेतृत्व में भारतीय नेताओं की एक अंतरिम सरकार गठित की। ब्रिटिश अधिकारियों की कृपापात्र होने के कारण मुस्लिम लीग के दिमाग़ काफ़ी ऊँचे हो गये थे। उसने पहले तो एक महीने तक अंतरिम सरकार से अपने को अलग रखा, इसके बाद वह भी उसमें सम्मिलित हो गयी।&lt;br /&gt;
==स्वाधीनता==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Newspaper-15-August-1947.jpg|thumb|15 अगस्त 1947 का अख़बार&amp;lt;br /&amp;gt; Newspaper Of 15th August 1947]]&lt;br /&gt;
भारत का संविधान बनाने के लिए एक भारतीय संविधान सभा का आयोजन किया गया। 1947 ई. के शुरू में [[लार्ड वेवेल]] के स्थान पर [[लार्ड माउंटबेटेन]] वाइसराय नियुक्त हुआ। उसे पंजाब में भयानक सम्प्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। जिनको भड़काने में वहाँ के कुछ ब्रिटिश अफसरों का हाथ था। वह प्रधानमंत्री [[एटली]] के नेतृत्व में ब्रिटेन की सरकार को यह समझाने में सफल हो गया कि भारत का भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन करके उसे स्वाधीनता प्रदान करने से शान्ति की स्थापना सम्भव हो सकेगी और ब्रिटेन भारत में अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षित रख सकेगा। 3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार की ओर से यह घोषणा कर दी गयी कि भारत का; भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन करके उसे स्वाधीनता प्रदान कर दी जायगी। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने 15 अगस्त 1947 को इंडिपेडंस आफ इंडिया  एक्ट पास कर दिया। इस तरह भारत उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त, [[बलूचिस्तान]], [[सिंध]], [[पश्चिमी पंजाब]], [[बांग्ला देश|पूर्वी बंगाल]] तथा [[पश्चिम बंगाल]] के मुस्लिम बहुल भागों से रहित हो जाने के बाद, सात शताब्दियों की विदेशी पराधीनता के बाद स्वाधीनता के एक नये पथ पर अग्रसर हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गांधी जी की हत्या==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mahatma-Gandhi-1.jpg|thumb|100px|[[महात्मा गाँधी]]]]&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महात्मा गाँधी}}&lt;br /&gt;
स्वाधीन भारत को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, वे सरल नहीं थीं। उसे सबसे पहले साम्प्रदायिक उन्माद को शान्त करना था। भारत ने जानबूझकर धर्म निरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया। उसने आश्वासन दिया कि जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान को निर्गमन करने के बजाय भारत में रहना पसंद किया है उनको नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्रदान किये जायेंगे। हालाँकि पाकिस्तान जानबूझकर अपने यहाँ से हिन्दुओं को निकाल बाहर करने अथवा जिन हिन्दुओं ने वहाँ रहने का फैसला किया था, उनको एक प्रकार से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देने की नीति पर चल रहा था। लॉर्ड माउंटबेटेन को स्वाधीन भारत का पहला गवर्नर जनरल बनाये रखा गया और [[पंडित जवाहर लाल नेहरू]] तथा अंतरिम सरकार में उनके कांग्रसी सहयोगियों ने थोड़े से हेरफेर के साथ पहले भारतीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया। इस मंत्रिमंडल में सरदार पटेल तथा [[मौलाना अबुलकलाम आज़ाद]] का तो सम्मिलित कर लिया गया था, परन्तु नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को छोड़ दिया गया। 30 जनवरी 1948 ई. को [[नाथूराम गोडसे]] नामक हिन्दू ने [[राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी]] की हत्या कर दी। सारा देश शोक के सागर में डूब गया। नौ महीने के बाद, पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्नाहकी भी मृत्यु हो गयी। उसी वर्ष लार्ड माउंटबेटेन ने भी अवकाश ग्रहण कर लिया और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के प्रथम और अंतरिम गवर्नर जनरल नियुक्त हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रियासतों का विलय==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sardar-Vallabh-Bhai-Patel.jpg|thumb|100px|[[सरदार बल्लभ भाई पटेल]]]]&lt;br /&gt;
अधिकांश देशी रियासतों ने , जिनके सामने भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव रखा गया था, भारत में विलय के पक्ष में निर्णय लिया, परन्तु, दो रियासतों—[[कश्मीर]] तथा [[हैदराबाद रियासत|हैदराबाद]] ने कोई निर्णय नहीं किया। पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर की रियासत पर अधिकार करने का प्रयास किया, परन्तु अक्टूबर 1947 ई. में कश्मीर के महाराज ने भारत में विलय की घोषणा कर दी और भारतीय सेनाओं को वायुयानों से भेजकर [[श्रीनगर]] सहित कश्मीरी घाटी तक जम्मू की रक्षा कर ली गयी। पाकिस्तानी आक्रमणकारियों ने रियासत के उत्तरी भाग पर अपना क़ब्ज़ा बनाये रखा और इसके फलस्वरूप पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया। भारत ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिस क्षेत्र पर जिसका क़ब्ज़ा था, उसी के आधार पर युद्ध विराम कर दिया। वह आज तक इस सवाल का कोई निपटारा नहीं कर सका है। हैदराबाद के [[निज़ामशाही वंश|निज़ाम]] ने अपनी रियासत को स्वतंत्रता का दर्जा दिलाने का षड़यंत्र रचा, परन्तु भारत सरकार की पुलिस कार्रवाई के फलस्वरूप वह 1948 ई. में अपनी रियासत भारत में विलयन करने के लिए मजबूर हो गये। रियासतों के विलय में तत्कालीन गृहमंत्री [[सरदार पटेल|सरदार बल्लभ भाई पटेल]] की मुख्य भूमिका रही।&lt;br /&gt;
{{seealso|सरदार पटेल}}&lt;br /&gt;
==संघ राज्यों का विलय== &lt;br /&gt;
[[भारतीय संविधान सभा]] के द्वारा 26 नवम्बर 1949 में संविधान पास किया गया। भारत का संविधान अधिनियम 26 जनवरी 1950 को लागू कर दिया गया। इस संविधान में भारत को लौकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था और संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी थी। [[राजेन्द्र प्रसाद|डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] को पहला राष्ट्रपति चुना गया और बहुमत पार्टी के नेता के रूप  में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधान मंत्री का पद ग्रहण किया। इस पद पर वे 27 मई 1964 ई. में, अपनी मृत्यु तक बने रहे। नवोदित भारतीय गणराज्य के लिए उनका दीर्घकालीन प्रधानमंत्रित्व बड़ा लाभदायी सिद्ध हुआ। उससे प्रशासन तथा घरेलू एवं विदेश नीतियों में निरंतरता बनी रही। पंडित नेहरू ने वैदेशिक मामलों में गुट-निरपेक्षता की नीति अपनायी और [[चीन]] से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये। [[फ्राँस]] ने 1951 ई. में [[चंद्रनगर]] शान्तिपूर्ण रीति से भारत का हस्तांतरित कर दिया। 1956 ई. में उसने अन्य फ्रेंच बस्तियाँ ([[पुदुचेरी|पांडिचेरी]], [[कारीकल]], [[माहे]] तथा [[युन्नान]]) भी भारत को सौंप दीं। [[पुर्तग़ाल]] ने फ्राँस का अनुसरण करने और शान्तिपूर्ण रीति से अपनी पुर्तग़ाली बस्तियाँ ([[गोवा]], [[दमन और दीव]]) छोड़ने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप 1961 ई. में भारत को बलपूर्वक इन बस्तियों को लेना पड़ा&amp;lt;ref&amp;gt;1975 ई. में पुर्तग़ाली शासन ने वास्तविकता को समझकर इसको वैधानिक मान्यता दे दी है।&amp;lt;/ref&amp;gt;। इस तरह भारत का एकीकरण पूरा हो गया।&lt;br /&gt;
{{इतिहास तिथि क्रम सूची1}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.shangrilagifts.org/hp/indus.html  Comparison of Indus Valley Harappan]&lt;br /&gt;
*[http://ancientscripts.com/indus.html  Indus Script]&lt;br /&gt;
*[http://vimitihas.wordpress.com/2008/08/16/sindhu_sabhyata सिंधुघाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/content/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%83-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%81-%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE  विलुप्त होती सिन्धु घाटी की सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.indiawaterportal.org/node/20398 सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
*[http://incredible-india.biz/hn/history/ivc सिंधु घाटी सभ्यता]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{इतिहास साँचे सूची}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=111988</id>
		<title>राजस्थान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=111988"/>
		<updated>2011-01-27T20:35:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: संदर्भ&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=342239 sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26°34′22″N 73°50′20″E﻿&lt;br /&gt;
|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[जयपुर]], [[अजमेर]], [[उदयपुर]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[हिन्दी भाषा]], [[राजस्थानी भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[जयपुर]], [[भरतपुर]], [[जोधपुर]],  [[जैसलमेर]],  [[उदयपुर]], [[बीकानेर]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[जयपुर]], [[जोधपुर]], [[बीकानेर]], [[माउण्ट आबू]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[प्रभु राव]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[अशोक गहलोत]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|14:00, 29 मार्च 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजस्थान [[भारत]] का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, [[रणथम्भौर]] एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की [[संस्कृति]] [[सिंधु घाटी सभ्यता]] जैसी थी।१२ वी शदी तक राजस्थान के अधिकान्श भाग पर [[गुर्जर|गुर्जरो]] का राज्य रहा है। गुजरात तथा राजस्थान का अधिकान्श भाग गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Desa, videsa me? Gurjara kya hai? tatha kya the?: Gurjara itihasa|authors=Mulatanasi?ha Varma|publisher=Akhila Bharatiya Gurjara Samaja Sudhara Sabha|year=1984|}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Sekhava?i pradesa ka pracina itihasa|author=	Surajanasi?ha Shekhavata|publisher=Sri Sardula Ejyukesana ?ras?a|year=1989|page=94}}&amp;lt;/ref&amp;gt;गुर्जर प्रतिहारो ने ३०० सालो तक पुरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओ से बचाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;बाद में जब राजपूतो ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो यह क्षेत्र ब्रिटिश्काल मे राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाने लगा।12वीं शताब्दी के बाद मेवाड़ पर गुहिलोतो ने राज्य किया।मेवाड़ अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - [[भरतपुर]], जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Udaipur.jpg|thumb|250px|left|[[सिटी पैलेस काम्‍पलेक्‍स उदयपुर|सिटी पैलेस]], [[उदयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Udaipur]]&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेज़ी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्त्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्त्वपूर्ण मेले हैं [[हरियाली तीज|तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का अलवर|सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*[[अजमेर]], [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौड़गढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
*[[ब्यावर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|thumb|250px|left|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur]]&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मक़बरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रूप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है।  इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। [[चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|thumb|250px|[[जल महल जयपुर|जल महल]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur]] 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रूप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है।  [[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, [[माउंट आबू]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb|left]] राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajasthan-Man.jpg|thumb|[[माउंट आबू]] में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu]]&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरूपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Fort.jpg|thumb|250px|left|[[जैसलमेर क़िला|जैसलमेर का क़िला]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaisalmer Fort, Jaisalmer]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरूप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|thumb|250px|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|एल्बर्ट हॉल संग्रहालय]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Albert Hall Museum, Jaipur]]&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरूप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रूप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यावसायिकृत स्वरूप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gadisagar-Lake-Jaisalmer-2.jpg|thumb|250px|left|[[गडसीसर जलाशय एवं टीला की पोल जैसलमेर|गडसीसर सरोवर]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gadisagar Lake, Jaisalmer]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से [[चित्रकला]] के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रूप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रूप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Desert-2.jpg|thumb|250px|ऊँट सवारी, [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Safari, Jaisalmer]] &lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khwaja-Garib-Nawaz-Dargah.jpg|left|thumb|250px|ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Khwaja Garib Nawaz Dargah, Ajmer]]&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरूप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरूप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Alwar.jpg|thumb|250px|[[सिटी पैलेस अलवर|सिटी पैलेस]], [[अलवर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Alwar]]&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer.jpg|left|thumb|250px|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
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{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: /* इतिहास */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=rajasthan Map.jpg&lt;br /&gt;
|स्थानीय भाषाओं में नाम=राजस्थान&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=56,473,122&lt;br /&gt;
|जनसंख्या घनत्व=165&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=342239 sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26°34′22″N 73°50′20″E﻿&lt;br /&gt;
|ज़िले=33&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[जयपुर]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[जयपुर]], [[अजमेर]], [[उदयपुर]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[हिन्दी भाषा]], [[राजस्थानी भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1956/11/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[जयपुर]], [[भरतपुर]], [[जोधपुर]],  [[जैसलमेर]],  [[उदयपुर]], [[बीकानेर]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[जयपुर]], [[जोधपुर]], [[बीकानेर]], [[माउण्ट आबू]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:921&lt;br /&gt;
|साक्षरता=61.03&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=46 °C&lt;br /&gt;
|शरद=8 °C&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[प्रभु राव]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[अशोक गहलोत]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=200&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://www.rajasthan.gov.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|14:00, 29 मार्च 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Rajasthan-logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
राजस्थान [[भारत]] का एक प्रान्त है। यहाँ की राजधानी [[जयपुर]] है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में [[गुजरात]], दक्षिण-पूर्व में [[मध्यप्रदेश]], उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में [[उत्तर प्रदेश]] और [[हरियाणा]] है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। जयपुर राज्य की राजधानी है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरूस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, [[माउंट आबू]] और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, [[रणथम्भौर]] एवम् सरिस्का हैं और [[भरतपुर]] के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उध्यान है, जो पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी।&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की [[संस्कृति]] [[सिंधु घाटी सभ्यता]] जैसी थी।१२ वी शदी तक राजस्थान के अधिकान्श भाग पर [[गुर्जर|गुर्जरो]] का राज्य रहा है। गुजरात तथा राजस्थान का अधिकान्श भाग गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Desa, videsa me? Gurjara kya hai? tatha kya the?: Gurjara itihasa|authors=Mulatanasi?ha Varma|publisher=Akhila Bharatiya Gurjara Samaja Sudhara Sabha|year=1984|}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Sekhava?i pradesa ka pracina itihasa|author=	Surajanasi?ha Shekhavata|publisher=Sri Sardula Ejyukesana ?ras?a|year=1989|page=94}}&amp;lt;/ref&amp;gt;  गुर्जर प्रतिहारो ने ३०० सालो तक पुरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओ से बचाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;गुर्जर प्रतिहारो ने ३०० सालो तक पुरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओ से बचाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;बाद में जब राजपूतो ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो यह क्षेत्र ब्रिटिश्काल मे राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाने लगा।12वीं शताब्दी के बाद मेवाड़ पर गुहिलोतो ने राज्य किया।मेवाड़ अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं - [[भरतपुर]], जयपुर, [[बूंदी]], [[मारवाड़]], [[कोटा]],  और [[अलवर]]। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Udaipur.jpg|thumb|250px|left|[[सिटी पैलेस काम्‍पलेक्‍स उदयपुर|सिटी पैलेस]], [[उदयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Udaipur]]&lt;br /&gt;
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग [[स्वतंत्रता आंदोलन]] में भाग लेने के लिए [[महात्मा गाँधी]] के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन 1935 में अंग्रेज़ी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में मत्स्य संघ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुई। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गई। सन 1949 तक [[बीकानेर]], जयपुर, [[जोधपुर]] और [[जैसलमेर]] जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य का नाम दिया गया। सन 1958 में [[अजमेर]], आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पडता है जबकि उत्तर में [[पंजाब]], उत्तर पूर्व में [[हरियाणा]], पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
राज्य में वर्ष 2006-07 में कुल कृषि योग्य क्षेत्र 217 लाख हेक्टेयर था और वर्ष (2007-08) में अनुमानित खाद्यान उत्पादन 155.10 लाख टन रहा। राज्य की मुख्य फ़सलें हैं। चावल, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, गेहूं, तिलहन, दालें कपास और तंबाकू। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षो में सब्जियों और संतरा तथा माल्टा जैसे नींबू प्रजाति के फलों के उत्पादन में काफ़ी वृद्धि हुई है। यहाँ की अन्य फ़सलें है लाल मिर्च, सरसों, मेथी, ज़ीरा, और हींग।&lt;br /&gt;
==उद्योग और खनिज==&lt;br /&gt;
राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है। राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी ([[उदयपुर]]) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारखाना शामिल है। मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था। मुख्य उद्योग हैं :वस्त्र, ऊनी कपडे, चीनी, सीमेंट, काँच, सोडियम संयंत्र, आक्सीजन, वनस्पति रंग, कीटनाशक, जस्ता, उर्वरक, रेल के डिब्बे, बॉल बियरिंग, पानी व बिजली के मीटर, टेलीवीजन सेट, सल्फ्यूरिक एसिड, सिंथेटिक धागे तथा तापरोधी ईंटें आदि। बहुमूल्य और कम मूल्य के रत्नों के अलावा कास्टिक सोडा, कैलशियम कार्बाइड, नाइलोन तथा टायर आदि अन्य महत्त्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयां हैं। राज्य में जिंक कंसंट्रेट, पन्ना, गार्नेट, जिप्सम, खनिज चांदी, एस्बेस्टस, फैल्सपार तथा अभ्रक के प्रचुर भंडार हैं। राज्य में नमक, रॉक फास्फेट, मारबल तथा लाल पत्थर भी काफ़ी मात्रा में मिलता है। सीतापुर (जयपुर) में देश पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क बनाया गया है जिसने काम करना प्रारंभ कर दिया है।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*मार्च 2007 के अंत तक राज्य में विभिन्न प्रमुख, मध्यम और छोटी सिचाई परियोजनाओं के माध्यम से 34.85 लाख हेक्टेयर की सिंचाई संभाव्यता का सृजन किया गया (2007-08) और 92,200 हेक्टेयर (आईजीएनपी और सीएडी के अलावा) की अतिरिक्त सिंचाई संभाव्यता का सृजन मार्च 2007 तक किया गया है। &lt;br /&gt;
*राज्य में संस्थापित विद्युत क्षमता दिसम्बर 2007 तक 6335.33 मेगावॉट हो गई है, जिसमें से 4000 मेगावॉट राज्य की अपनी परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाती है, 521.85 मेगावॉट सहयोगी परियोजनाओं से तथा 1813.18 मेगावॉट केन्द्रीय विद्युत उत्पादन स्टेशनों से आबंटित की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
*सडकें: मार्च 2006 में राजस्थान में सड़को की कुल लंबाई 1,58,250 कि.मी. है।&lt;br /&gt;
*रेलवे: जोधपुर, बीकानेर, [[सवाई माधोपुर]], कोटा और भरतपुर राज्य के प्रमुख रेलवे जंक्शन है।&lt;br /&gt;
==उड्डयन== &lt;br /&gt;
[[दिल्ली]] और [[मुंबई]] से जयपुर, जोधपुर तथा उदयपुर के लिए नियमित विमान सेवाएं हैं।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
राजस्थान मेलों और उत्सवों की धरती है। [[होली]], [[दीपावली]], [[विजय दशमी|विजयदशमी]], [[क्रिसमस]] जैसे प्रमख राष्ट्रीय त्योहारों के अलावा अनेक देवी-देवताओं, संतो और लोकनायकों तथा नायिकाओं के जन्मदिन मनाए जाते है। यहाँ के महत्त्वपूर्ण मेले हैं [[हरियाली तीज|तीज]], [[गणगौर]](जयपुर), अजमेर शरीफ और गलियाकोट के वार्षिक उर्स, बेनेश्वर (डूंगरपुर) का जनजातीय कुंभ, श्री महावीर जी (सवाई माधोपुर मेला), रामदेउरा (जैसलमेर), जंभेश्वर जी मेला(मुकाम-बीकानेर), [[कार्तिक पूर्णिमा]] और पशु-मेला ([[पुष्कर]]-अजमेर) और श्याम जी मेला ([[सीकर]]) आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
राज्य में पर्यटन के प्रमुख केंद्र हैं:&lt;br /&gt;
*जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, [[बीकानेर]], माउंट आबू, &lt;br /&gt;
*अलवर में [[सरिस्का अलवर|सरिस्का बाघ विहार]], &lt;br /&gt;
*भरतपुर में केवलादेव [[राष्ट्रीय पक्षी विहार]], &lt;br /&gt;
*[[अजमेर]], [[जैसलमेर]], [[पाली]], [[चित्तौड़गढ़]] आदि।&lt;br /&gt;
*[[ब्यावर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजस्थानी कला==&lt;br /&gt;
इतिहास के साधनों में शिलालेख, पुरालेख और साहित्य के समानान्तर कला भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके द्वारा हमें मानव की मानसिक प्रवृतियों का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता वरन् निर्मितियों में उनका कौशल भी दिखलाई देता है। यह कौशल तत्कालीन मानव के विज्ञान तथा तकनीक के साथ-साथ समाज, धर्म, आर्थिक और राजनीतिक विषयों का तथ्यात्मक विवरण प्रदान करने में इतिहास का स्रोत बन जाता है। इसमें स्थापत्या, मूर्ति, चित्र, मुद्रा, वस्राभूषण, श्रृंगार-प्रसाधन, घरेलु उपकरण इत्यादि जैसे कई विषय समाहित है जो पुन: विभिन्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Amber-Fort-Jaipur-2.jpg|thumb|250px|left|[[आमेर का क़िला जयपुर|आमेर का क़िला]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Amber Fort, Jaipur]]&lt;br /&gt;
====स्थापत्य कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान में प्राचीन काल से ही हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा मध्यकाल से मुस्लिम धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर, स्तम्भ, मठ, मस्जिद, मक़बरे, समाधियों और छतरियों का निर्माण किया जाता रहा है। इनमें कई भग्नावेश के रूप में तथा कुछ सही हालत में अभी भी विद्यमान है।  इनमें कला की दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन देवालयों के भग्नावशेष हमें चित्तौड़ के उत्तर में नगरी नामक स्थान पर मिलते हैं। प्राप्त अवशेषों में [[वैष्णव]], [[बौद्ध]] तथा [[जैन]] धर्म की तक्षण कला झलकती है। तीसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवी शताब्दी तक स्थापत्य की विशेषताओं को बतलाने वाले उपकरणों में देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की कई मूर्तियां, [[बौद्ध]], [[स्तूप]], विशाल प्रस्तर खण्डों की चाहर दीवारी का एक बाड़ा, 36 फुट और नीचे से 14 फुल चौड़ दीवर कहा जाने वाला 'गरुड़ स्तम्भ' यहाँ भी देखा जा सकता है। [[चित्र:Jal-Mahal-Jaipur.jpg|thumb|250px|[[जल महल जयपुर|जल महल]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jal Mahal, Jaipur]] 1567 ई. में [[अकबर]] द्वारा [[चित्तौड़]] आक्रमण के समय इस स्तम्भ का उपयोग सैनिक शिविर में प्रकाश करने के लिए किया गया था। गुप्तकाल के पश्चात् कालिका मन्दिर के रूप में विद्यमान चित्तौड़ का प्राचीन 'सूर्य मन्दिर' इसी ज़िले में छोटी सादड़ी का भ्रमरमाता का मन्दिर कोटा में, बाड़ौली का शिव मन्दिर तथा इनमें लगी मूर्तियाँ तत्कालीन कलाकारों की तक्षण कला के बोध के साथ जन-जीवन की अभिक्रियाओं का संकेत भी प्रदान करती हैं। चित्तौड़ ज़िले में स्थित मेनाल, [[डूंगरपुर]] ज़िले में अमझेरा, उदयपुर में डबोक के देवालय अवशेषों की [[शिव]], [[पार्वती देवी|पार्वती]], [[विष्णु]], [[महावीर]], भैरव तथा नर्तकियों का शिल्प इनके निर्माण काल के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का क्रमिक इतिहास बतलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवीं शताब्दी से राजस्थान की शिल्पकला में राजपूत प्रशासन का प्रभाव हमें शक्ति और भक्ति के विविध पक्षों द्वारा प्राप्त होता है। जयपुर ज़िले में स्थित आभानेरी का मन्दिर (हर्षत माता का मंदिर), जोधपुर में ओसिया का सच्चियां माता का मन्दिर, जोधपुर संभाग में किराडू का मंदिर, इत्यादि और भिन्न प्रांतों के प्राचीन मंदिर कला के विविध स्वरों की अभिव्यक्ति संलग्न राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले स्थापत्य के नमूने हैं। उल्लेखित युग में निर्मित चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथंभोर, गागरोन, अचलगढ़, गढ़ बिरली (अजमेर का तारागढ़) जालोर, जोधपुर आदि के दुर्ग-स्थापत्य कला में राजपूत स्थापत्य शैली के दर्शन होते हैं। सुरक्षा प्रेरित शिल्पकला इन दुर्गों की विशेषता कही जा सकती है जिसका प्रभाव इनमें स्थित मन्दिर शिल्प-मूर्ति लक्षण एवं भवन निर्माण में आसानी से परिलक्षित है। &lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====मुद्रा कला====&lt;br /&gt;
राजस्थान के प्राचीन प्रदेश मेवाड़ में मज्झमिका (मध्यमिका) नामधारी चित्तौड़ के पास स्थित नगरी से प्राप्त ताम्रमुद्रा इस क्षेत्र को शिविजनपद घोषित करती है। तत्पश्चात् छठी-सातवीं शताब्दी की स्वर्ण मुद्रा प्राप्त हुई। जनरल [[कनिंघम]] को [[आगरा]] में मेवाड़ के संस्थापक शासक गुहिल के सिक्के प्राप्त हुए तत्पश्चात ऐसे ही सिक्के औझाजी को भी मिले। इसके उर्ध्वपटल तथा अधोवट के चित्रण से मेवाड़ राजवंश के शैवधर्म के प्रति आस्था का पता चलता है।  [[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, [[माउंट आबू]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb|left]] राणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) सिक्कों में ताम्र मुद्राएं तथा रजत मुद्रा का उल्लेख जनरल कनिंघम ने किया है। इन पर उत्कीर्ण विक्रम सम्वत् 1510, 1512, 1523 आदि तिथियों 'श्री कुभंलमेरु महाराणा श्री कुभंकर्णस्य', 'श्री एकलिंगस्य प्रसादात' और 'श्री' के वाक्यों सहित भाले और डमरु का बिन्दु चिन्ह बना हुआ है। यह सिक्के वर्गाकृति के जिन्हें 'टका' पुकारा जाता था। यह प्रभाव सल्तनत कालीन मुद्रा व्यवस्था को प्रकट करता है जो कि मेवाड़ में राणा सांगा तक प्रचलित रही थी। सांगा के पश्चात् शनै: शनै: मुग़लकालीन मुद्रा की छाया हमें मेवाड़ और राजस्थान के तत्कालीन अन्यत्र राज्यों में दिखलाई देती है। सांगा कालीन (1509-1528 ई.) प्राप्त तीन मुद्राएं ताम्र तथा तीन पीतल की है। इनके उर्ध्वपटल पर नागरी अभिलेख तथा नागरी अंकों में तिथि तथा अधोपटल पर 'सुल्तान विन सुल्तान' का अभिलेख उत्कीर्ण किया हुआ मिलता है। प्रतीक चिन्हों में [[स्वास्तिक]], [[सूर्य देवता|सूर्य]] और [[चन्द्र देवता|चन्द्र]] प्रदर्शित किये गए हैं। इस प्रकार सांगा के उत्तराधिकारियों राणा रत्नसिंह द्वितीय, राणा विक्रमादित्य, बनवीर आदि की मुद्राओं के संलग्न मुग़ल-मुद्राओं का प्रचलन भी मेवाड़ में रहा था जो टका, रुप्य आदि कहलाती थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Rajasthan-Man.jpg|thumb|[[माउंट आबू]] में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu]]&lt;br /&gt;
परवर्ती काल में आलमशाही, मेहताशाही, चांदोडी, स्वरूपशाही, भूपालशाही, उदयपुरी, चित्तौड़ी, भीलवाड़ी त्रिशूलिया, फींतरा आदि कई मुद्राएं भिन्न-भिन्न समय में प्रचलित रहीं वहां सामन्तों की मुद्रा में भीण्डरीया पैसा एवं सलूम्बर का ठींगला व पदमशाही नामक ताम्बे का सिक्का जागीर क्षेत्र में चलता था। ब्रिटीश सरकार का 'कलदार' भी व्यापार-वाणिज्य में प्रयुक्त किया जाता रहा था। जोधपुर अथवा [[मारवाड़]] प्रदेश के अन्तर्गत प्राचीनकाल में 'पंचमार्क' मुद्राओं का प्रचलन रहा था। ईसा की दूसरी शताब्दी में यहाँ बाहर से आए क्षत्रपों की मुद्रा 'द्रम' का प्रचलन हुआ जो लगभग सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान में आर्थिक आधार के साधन-रुप में प्रतिष्ठित हो गई। [[बाँसवाड़ा]] ज़िले के सरवानियां गाँव से 1911 ई. में प्राप्त वीर दामन की मुद्राएं इसका प्रमाण हैं। प्रतिहार तथा चौहान शासकों के सिक्कों के अलावा मारवाड़ में 'फदका' या 'फदिया' मुद्राओं का उल्लेख भी हमें प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजस्थान के अन्य प्राचीन राज्यों में जो सिक्के प्राप्त होते हैं वह सभी उत्तर मुग़लकाल या उसके पश्चात् स्थानीय शासकों द्वारा अपने-अपने नाम से प्रचलित कराए हुए मिलते हैं। इनमें जयपुर अथवा ढुंढ़ाड़ प्रदेश में झाड़शाही रामशाही मुहर मुग़ल बादशाह के के नाम वाले सिक्को में मुम्मदशाही, [[प्रतापगढ़]] के सलीमशाही बांसवाड़ा के लछमनशाही, बून्दी का हाली, कटारशाही, झालावाड़ का मदनशाही, जैसलमैर में अकेशाही व ताम्र मुद्रा - 'डोडिया' अलवर का रावशाही आदि मुख्य कहे जा सकते हैं। मुद्राओं को ढ़ालने वाली टकसालों तथा उनके ठप्पों का भी अध्ययन अपेक्षित है। इनसे तत्कालीन मुद्रा-विज्ञान पर वृहत प्रकाश डाला जा सकता है। मुद्राओं पर उल्लेखित विवरणों द्वारा हमें सत्ता के क्षेत्र विस्तार, शासकों के तिथिक्रम ही नहीं मिलते वरन् इनसे राजनीतिक व्यवहारों का अध्ययन भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
====मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Fort.jpg|thumb|250px|left|[[जैसलमेर क़िला|जैसलमेर का क़िला]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Jaisalmer Fort, Jaisalmer]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में काले, सफेद, भूरे तथा हल्के सलेटी, हरे, गुलाबी पत्थर से बनी मूर्तियों के अतिरिक्त पीतल या धातु की मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। गंगा नगर ज़िले के कालीबंगा तथा उदयपुर के निकट आहड़-सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी से बनाई हुई खिलौनाकृति की मूर्तियां भी मिलती हैं। किन्तु आदिकाल से शास्रोक्य मूर्ति कला की दृष्टि से ईसा पूर्व पहली से दूसरी शताब्दी के मध्य निर्मित जयपुर के लालसोट नाम स्थान पर 'बनजारे की छतरी' नाम से प्रसिद्ध चार वेदिका स्तम्भ मूर्तियों का लक्षण द्रष्टत्य है। पदमक के धर्मचक्र, मृग, मत्स, आदि के अंकन मरहुत तथा अमरावती की कला के समानुरुप हैं। राजस्थान में गुप्त शासकों के प्रभावस्वरूप गुप्त शैली में निर्मित मूर्तियों, [[आभानेरी]], कामवन तथा कोटा में कई स्थलों पर उपलब्ध हुई हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert-Hall-Museum-Jaipur.jpg|thumb|250px|[[अल्‍बर्ट हॉल जयपुर|एल्बर्ट हॉल संग्रहालय]], [[जयपुर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Albert Hall Museum, Jaipur]]&lt;br /&gt;
गुप्तोतर काल के पश्चात् राजस्थान में सौराष्ट्र शैली, महागुर्जन शैली एवं महामास शैली का उदय एवं प्रभाव परिलक्षित होता है जिसमें महामास शैली केवल राजस्थान तक ही सीमित रही। इस शैली को मेवाड़ के गुहिल शासकों, जालौर व मण्डोर के प्रतिहार शासकों और शाकम्भरी (सांभर) के चौहान शासकों को संरक्षण प्रदान कर आठवीं से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक इसे विकसित किया। 15वीं शताब्दी राजस्थान में मूर्तिकला के विकास का स्वर्णकाल था जिसका प्रतीक विजय स्तम्भ (चित्तौड़) की मूर्तियाँ है। सोलहवीं शताब्दी का प्रतिमा शिल्प प्रदर्शन जगदीश मंदिर उदयपुर में देखा जा सकता है। यद्यपि इसके पश्चात् भी मूर्तियाँ बनी किंतु उस शिल्प वैचिञ्य कुछ भी नहीं है किंतु अठाहरवीं शताब्दी के बाद परम्परावादी शिल्प में पाश्चात्य शैली के लक्षण हमें दिखलाई देने लगते हैं। इसके फलस्वरूप मानव मूर्ति का शिल्प का प्रादूर्भाव राजस्थान में हुआ।&lt;br /&gt;
====धातु मूर्ति कला====&lt;br /&gt;
धातु मूर्ति कला को भी राजस्थान में प्रयाप्त प्रश्रय मिला। पूर्व मध्य, मध्य तथा उत्तरमध्य काल में जैन मूर्तियों का यहाँ बहुतायत में निर्माण हुआ। सिरोही ज़िले में वसूतगढ़ पिण्डवाड़ा नामक स्थान पर कई धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जिसमें शारदा की मूर्ति शिल्प की दृष्टि से द्रस्टव्य है। भरतपुर, जैसलमेर, उदयपुर के ज़िले इस तरह के उदाहरण से परिपूर्ण है। अठाहरवीं शताब्दी से मूर्तिकला ने शनै: शनै: एक उद्योग का रूप लेना शुरु कर दिया था। अत: इनमें कलात्मक शैलियों के स्थान पर व्यावसायिकृत स्वरूप झलकने लगा। इसी काल में चित्रकला के प्रति लोगों का रुझान दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
====चित्रकला====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gadisagar-Lake-Jaisalmer-2.jpg|thumb|250px|left|[[गडसीसर जलाशय एवं टीला की पोल जैसलमेर|गडसीसर सरोवर]], [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Gadisagar Lake, Jaisalmer]]&lt;br /&gt;
राजस्थान में यों तो अति प्राचीन काल से [[चित्रकला]] के प्रति लोगों में रुचि रही थी। मुकन्दरा की पहाड़ियों व अरावली पर्वत श्रेणियों में कुछ शैल चित्रों की खोज इसका प्रमाण है। कोटा के दक्षिण में चम्बल के किनारे, माधोपुर की चट्टानों से, आलनिया नदी से प्राप्त शैल चित्रों का जो ब्योरा मिलता है उससे लगता है कि यह चित्र बगैर किसी प्रशिक्षण के मानव द्वारा वातावरण प्रभावित, स्वाभाविक इच्छा से बनाए गए थे। इनमें मानव एवं जावनरों की आकृतियों का आधिक्य है। कुछ चित्र शिकार के कुछ यन्त्र-तन्त्र के रूप में ज्यामितिक आकार के लिए पूजा और टोना टोटका की दृष्टि से अंकित हैं। कोटा के जलवाड़ा गाँव के पास विलास नदी के कन्या दाह ताल से बैला, हाथी, घोड़ा सहित घुड़सवार एवं हाथी सवार के चित्र मिलें हैं। यह चित्र उस आदिम परम्परा को प्रकट करते हैं आज भी राजस्थान में 'मांडला' नामक लोक कला के रूप में घर की दीवारों तथा आंगन में बने हुए देखे जा सकते हैं। इस प्रकार इनमें आदिम लोक कला के दर्शन सहित तत्कालीन मानव की आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jaisalmer-Desert-2.jpg|thumb|250px|ऊँट सवारी, [[जैसलमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Camel Safari, Jaisalmer]] &lt;br /&gt;
कालीबंगा और आहड़ की खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर किया गया अलंकरण भी प्राचीनतम मानव की लोक कला का परिचय प्रदान करता है। ज्यामितिक आकारों में चौकोर, गोल, जालीदाल, घुमावदार, त्रिकोण तथा समानान्तर रेखाओं के अतिरिक्त काली व सफेद रेखाओं से फूल-पत्ती, पक्षी, खजूर, चौपड़ आदि का चित्रण बर्तनों पर पाया जाता है। उत्खनित-सभ्यता के पश्चात् मिट्टी पर किए जाने वाले लोक अलंकरण कुम्भकारों की कला में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं किन्तु चित्रकला का चिन्ह ग्याहरवी शदी के पूर्व नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;
सर्वप्रथम वि.सं. 1117/1080 ई. के दो सचित्र ग्रंथ जैसलमेर के जैन भण्डार से प्राप्त होते हैं।  औघनिर्युक्ति और दसवैकालिक सूत्रचूर्णी नामक यह हस्तलिखित ग्रन्थ जैन दर्शन से सम्बन्धित है। इसी प्रकार ताड़ एवं भोज पत्र के ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए बनाये गए लकड़ी के पुस्तक आवरण पर की गई चित्रकारी भी हमें तत्कालीन काल के दृष्टान्त प्रदान करती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Khwaja-Garib-Nawaz-Dargah.jpg|left|thumb|250px|ख्वाज़ा ग़रीब नवाज़ की दरगाह, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt; Khwaja Garib Nawaz Dargah, Ajmer]]&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी तक निर्मित ऐसी कई चित्र पट्टिकाएं हमें राजस्थान के जैन भण्डारों में उपलब्ध हैं। इन पर जैन साधुओं, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि चित्रित हैं। अजमेर, पाली तथा आबू ऐसे चित्रकारों के मुख्य केन्द्र थे। तत्पशात् आहड़ एवं चित्तौड़ में भी इस प्रकार के सचित्र ग्रंथ बनने आरम्भ हुए। 1260-1317 ई. में लिखा गया 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि' नामक ग्रन्थ मेवाड़ शैली (आहड़) का प्रथम उपलब्ध चिन्ह है, जिसके द्वारा राजस्थानी कला के विकास का अध्ययन कर सकते हैं। ग्याहरवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक के उपलब्ध सचित्र ग्रंथों में निशिथचूर्णि, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, नेमिनाथ चरित्र, कला सरित्सागर, कल्पसूत्र (1483/1426 ई.) कालक कथा, सुपासनाचरियम् (1485-1428 ई.) रसिकाष्टक (1435/1492 ई.) तथा गीत गोविन्द आदि हैं। 15वीं शदी तक मेवाड़ शैली की विशेषता में सवाचश्म्, गरुड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र, घुमावदार व लम्बी उंगलियां, गुड्डिकार जनसमुदाय, चेहरों पर जकड़न, अलंकरण बाहुल्य, लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग कहे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेवाड़ के अनुरुप मारवाड़ में भी चित्रकला की परम्परा प्राचीन काल से पनपती रही थी। किंतु महाराणा मोकल से राणा सांगा (1421-1528 ई.) तक मेवाड़-मारवाड़ कला के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरूप साम्य दिखलाई होता है। राव मालदेव (1531-1462 ई.) ने पुन: मारवाड़ शैली को प्रश्य प्रदान कर चित्रकारों को इस ओर प्रेरित किया। इस शैली का उदाहरण 1591 ई. में चित्रित ग्रन्थ उत्तराध्ययन सूत्र है। मारवाड़ शैली के भित्तिचित्रों मे जोधपुर के चोखेला महल को छतों के अन्दर बने चित्र दृष्टव्य हैं। राजस्थान में मुग़ल प्रभाव के परिणाम स्वरूप सत्रहवीं शती से मुग़ल शैली और राजस्थान की परम्परागत राजपूत शैली के समन्वय ने कई प्रांतीय शेलियों को जन्म दिया, इनमें मेवाड़ और मारवाड़ के अतिरिक्त [[बूंदी]], [[कोटा]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]], [[किशनगढ़]] और [[नाथद्वारा]] शैली मुख्य है।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
मुग़ल प्रभाव के फलत: चित्रों के विषय अन्त:पुर की रंगरेलियाँ, स्रियों के स्नान, होली के खेल, शिकार, बाग-बगीचे, घुड़सवारी, हाथी की सवारी आदि रहे। किन्तु इतिहास के पूरक स्रोत की दृष्चि से इनमें चित्रित समाज का अंकन एवं घटनाओं का चित्रण हमें सत्रहवीं से अठारहवी शताब्दी के अवलोकन की विस्तृत सामग्री प्रदान करता है। उदाहरणत: मारवाड़ शैली में उपलब्ध 'पंचतंत्र' तथा 'शुकनासिक चरित्र' में कुम्हार, धोबी, नाई, मजदूर, चिड़ीमार, लकड़हारा, भिश्ती, सुनार, सौदागर, पनिहारी, ग्वाला, माली, किसान आदि से सम्बन्धित जीवन-वृत का चित्रण मिलता है। किशनगढ़ शैली में [[राधा]] [[कृष्ण]] की प्रेमाभिव्यक्ति के चित्रण मिलते हैं। इस क्रम में बनीठनी का एकल चित्र प्रसिद्ध है। किशनगढ़ शैली में कद व चेहरा लम्बा नाक नुकीली बनाई जाती रही वही विस्तृत चित्रों में दरबारी जीवन की झाँकियों का समावेश भी दिखलाई देता है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:City-Palace-Alwar.jpg|thumb|250px|[[सिटी पैलेस अलवर|सिटी पैलेस]], [[अलवर]]&amp;lt;br /&amp;gt; City Palace, Alwar]]&lt;br /&gt;
मुग़ल शैली का अधिकतम प्रभाव हमें जयपुर तथा अलवर के चित्रों में मिलता है। बारामासा, राग माला, भागवत आदि के चित्र इसके उदाहरण हैं। 1671 ई. से मेवाड़ में पुष्टि मार्ग से प्रभावित श्रीनाथ जी के धर्म स्थल नाथद्वारा की कलम का अलग महत्व है। यद्यपि यहाँ के चित्रों का विषय कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित रहा है फिर भी जन-जीवन की अभिक्रियाओं का चित्रण भी हमें इनमें सहज दिख जाता  है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश प्रभाव के फलत: राजस्थान में पोट्रेट भी बनने शुरु हुए। यह पोट्रेट तत्कालीन रहन-सहन को अभिव्यक्त करने में इतिहास के अच्छे साधन हैं। चित्रकला के अन्तर्गत भित्ति चित्रों का आधिक्य हमें अठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से दिखलाई देता है, किन्तु इसके पूर्व भी मन्दिरों और राज प्रासादों में ऐसे चित्रांकन की परम्परा विद्यमान थी। चित्तौड़ के प्राचीन महलों में ऐसे भित्ति चित्र उपलब्ध हैं जो सौलहवीं सदी में बनाए गए थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्रहवीं शताब्दी के चित्रणों में मोजमाबाद (जयपुर), उदयपुर के महलों तथा अम्बामाता के मंदिर, नाडोल के जैन मंदिर, आमेर (जयपुर) के निकट मावदूमशाह की क़ब्र के मुख्य गुम्बद के चित्र, जूनागढ़ (बीकानेर), मारोठ के मान मन्दिर गिने जा सकते हैं। अठाहरवीं शताब्दी के चित्रणों में कृष्ण विलास (उदयपुर) आमेर महल की भोजनशाला, ग़लता के महल, पुण्डरीक जी की हवेली (जयपुर) सूरजमल की छतरी (भरतपुर), झालिम सिंह की हवेली (कोटा) और मोती महल (नाथद्वारा) के भित्ति चित्र मुख्य हैं। यह चित्र आलागीला पद्धति या टेम्परा से बनाए गए थे। शेख़ावटी, जैसलमेर एवं बीकानेर की हवेलियों में इस प्रकार के भित्ति चित्र अध्ययनार्थ अभी भी देखे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपड़ो पर की जाने वाली कला में छपाई की चित्रकारी भी कला के इतिहास सहित इतिहास के अन्य अंगों पर प्रकाश डालने में समर्थ हो सकती है। यद्यपि वस्र रंगाई, छपाई, तथा कढ़ाई चित्रकला से प्रत्यक्ष सम्बन्धित नहीं हैं, किन्तु काल विशेष में अपनाई जाने वाली इस तकनीक, विद्या का अध्ययन कलागत तकनीकी इतिहास की उपादेय सामग्री बन सकती है। चाँदी और सोने की जरी का काम किए वस्र शामियाने, हाथी, घोड़े तथा बैल की झूले आदि इस अध्ययन के साधन हैं।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer.jpg|left|thumb|250px|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धातु एवं काष्ठ कला====&lt;br /&gt;
इसके अन्तर्गत तोप, बन्दूक, तलवार, म्यान, छुरी, कटारी, आदि अस्र-शस्र भी इतिहास के स्रोत हैं। इनकी बनावट इन पर की गई खुदाई की कला के साथ-साथ इन पर प्राप्त सन् एवं अभिलेख हमें राजनीतिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी ही तोप का उदाहरण हमें जोधपुर दुर्ग में देखने को मिला जबकि राजस्थान के संग्रहालयों में अभिलेख वाली कई तलवारें प्रदर्शनार्थ भी रखी हुई हैं। पालकी, काठियाँ, बैलगाड़ी, रथ, लकड़ी की टेबल, कुर्सियाँ, कलमदान, सन्दूक आदि भी मनुष्य की अभिवृत्तियों का दिग्दर्शन कराने के साथ तत्कालीन कलाकारों के श्रम और दशाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने में हमारे लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत सामग्री है।&lt;br /&gt;
====लोककला====&lt;br /&gt;
अन्तत: लोककला के अन्तर्गत वाद्य यंत्र, लोक संगीत और नाट्य का हवाला देना भी आवश्यक है। यह सभी सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहरें हैं जो इतिहास का अमूल्य अंग हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक राजस्थान में लोगों का मनोरंजन का साधन लोक नाट्य व नृत्य रहे थे। रास-लीला जैसे नाट्यों के अतिरिक्त प्रदेश में ख्याल, रम्मत, रासधारी, नृत्य, भवाई, ढाला-मारु, तुर्रा-कलंगी या माच तथा आदिवासी गवरी या गौरी नृत्य नाट्य, घूमर, अग्नि नृत्य, कोटा का चकरी नृत्य, डीडवाणा पोकरण के तेराताली नृत्य, मारवाड़ की कच्ची घोड़ी का नृत्य, पाबूजी की फड़ तथा कठपुतली प्रदर्शन के नाम उल्लेखनीय हैं। पाबूजी की फड़ चित्रांकित पर्दे के सहारे प्रदर्शनात्मक विधि द्वारा गाया जाने वाला गेय-नाट्य है। लोक बादणें में नगाड़ा ढ़ोल-ढ़ोलक, मादल, रावण हत्था, पूंगी, बसली, सारंगी, तदूरा, तासा, थाली, झाँझ पत्तर तथा खड़ताल आदि हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
{{top}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान}}&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}{{राज्य और के. शा. प्र.2}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>चालुक्य वंश</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==वातापी का चालुक्य वंश==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चालुक्य वंश छठी शताब्दी ई. के मध्य दक्षिणी [[भारत]] में उत्कर्ष को प्राप्त था। इसके मूल के बारे में ठीक से कुछ पता नहीं है। चालुक्य नरेशों का दावा था कि क्षत्रिय हैं और कभी [[अयोध्या]] पर शासन करते थे। [[गुर्जर|गुर्जरों]] की एक शाखा चापस के एक अभिलेख में चालुक्य नरेश पुलकेशी के उल्लेख से कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने यह अर्थ निकाला है कि चालुक्य, जो सोलंकी के नाम से विख्यात हैं, गुर्जरों से सम्बद्ध थे और [[राजपूताना]] से दक्षिण में आकर बसे थे। जो हो इतना तो निश्चित है कि चालुक्यों के नेता पुलकेशी प्रथम ने 550 ई. में एक राज्य की स्थापना की। जिसकी राजधानी वातापी थी। जो आज [[बीजापुर]] ज़िले में '[[वातापी कर्नाटक|वातापी]]' के नाम से विख्यात है। पुलकेशी प्रथम ने अपने को दिग्विजयी राजा घोषित करने के लिए [[अश्वमेध यज्ञ]] भी किया। उसके वंश ने, जो [[वातापी कर्नाटक|वातापी]] के चालुक्य के नाम से प्रसिद्ध हैं, तेरह वर्षों के व्यवधान (642-655) को छोड़कर 550 से लेकर 757 ई. तक राज किया। &lt;br /&gt;
==शासकों के नाम==&lt;br /&gt;
इस वंश के नरेशों के नाम हैं—&lt;br /&gt;
*[[पुलकेशी प्रथम]] (550-66 ई.), &lt;br /&gt;
*[[कीर्तिवर्मा प्रथम]] (लगभग 566 से 97 ई.), &lt;br /&gt;
*[[मंगलेश]] (लगभग 597-608), &lt;br /&gt;
*[[पुलकेशी द्वितीय]] (लगभग 609-42), &lt;br /&gt;
*व्यवधान ( लगभग 642-55), &lt;br /&gt;
*[[विक्रमादित्य प्रथम]] ( 655-80), &lt;br /&gt;
*[[विनयादित्य]] (680-96), &lt;br /&gt;
*[[विजयादित्य]] (696-733), &lt;br /&gt;
*[[विक्रमादित्य द्वितीय]] (733-746), और &lt;br /&gt;
*[[कीर्तिवर्मा द्वितीय]] (746-57)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कुशल शासक==&lt;br /&gt;
शुरू के इन नौ चालुक्य नरेशों में चौथा पुलकेशी द्वितीय सबसे ज़्यादा प्रख्यात है। उसने 34 वर्ष (608-42) तक शासन किया। उसका राज्य विस्तार उत्तर में [[नर्मदा नदी]] से लेकर दक्षिण में [[कावेरी नदी]] तक हो गया। किन्तु 642 ई. में वह पल्लव नरेश नरसिंह वर्मा के द्वारा पराजित हुआ और शायद मारा गया। इसके बाद अगले तेरह सालों तक चालुक्य वंश पराभव को प्राप्त रहा। 655 ई. में पुलकेशी के पुत्र विक्रमादित्य प्रथम ने चालुक्य शक्ति फिर से प्रतिष्ठित की। पल्लवों के साथ चालुक्यों का संघर्ष जारी रहा और 740 ई. में चालुक्य नरेश विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लवों की राजधानी [[कांची]] पर अधिकार कर लिया। लेकिन उसके पुत्र और उत्तराधिकारी कीर्तिवर्मा द्वितीय को राष्ट्रकूटों के नेता दंतिदुर्ग ने 753 ई. में सिंहासन-च्युत कर दिया। चालुक्यों की शक्ति पर यह दूसरा ग्रहण था। &lt;br /&gt;
==कल्याणी का चालुक्य वंश==&lt;br /&gt;
दो शताब्दियों के बाद चालुक्यवंश पुनः उत्कर्ष को प्राप्त हुआ जब तैल या तैलपने, जो अपने को वातापी के सातवें चालुक्य नरेश विजयादित्य का वंशज कहता था, 973 ई. में राष्ट्रकूट नरेश द्वितीय को परास्त कर दिया और कल्याणी को अपनी राजधानी बनाकर नये चालुक्य वंश की स्थापना की और यह नया वंश कल्याणी का चालुक्य वंश नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह नया वंश 973 से 1200 ई. तक सत्तासीन रहा और इसमें 12 राजा हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नये शासकों के नाम==&lt;br /&gt;
इनके नाम हैं—&lt;br /&gt;
*[[तैल चालुक्य|तैल या तैलप]] (973-97), &lt;br /&gt;
*[[सत्याश्रय]] (997-1008), &lt;br /&gt;
*[[विक्रमादित्य पंचम]] (1008-14), &lt;br /&gt;
*[[अय्यन द्वितीय]] (1015), &lt;br /&gt;
*[[जयसिंह जगदेकमल्ल]] (1015-42), &lt;br /&gt;
*[[सोमेश्वर प्रथम]] (1042-68), &lt;br /&gt;
*[[सोमेश्वर द्वितीय]] (1068-1076), &lt;br /&gt;
*[[विक्रमादित्य षष्ठ]] (1076-1127), &lt;br /&gt;
*[[सोमेश्वर तृतीय]] (1127-38), &lt;br /&gt;
*[[तैलप तृतीय]] (1151-56), और &lt;br /&gt;
*[[सोमेश्वर चतुर्थ]] (1184-1200)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आक्रमण==&lt;br /&gt;
कल्याणी के इस चालुक्य राज्य का एक लम्बे अर्से तक तंजोर के चोलवंशी शासकों से संघर्ष चलता रहा। सत्याश्रय को चोल नरेश राजराज ने परास्त किया और चालुक्य राज्य को रौंद डाला। लेकिन सोमेश्वर प्रथम ने इस अपमान का बदला ने केवल चोल नरेश राजधिराज को कोप्पम के युद्ध में करारी हार देकर ले लिया वरन् इस युद्ध में उसने राजाधिराज का वंध कर दिया। &lt;br /&gt;
==ग्रन्थ==&lt;br /&gt;
सातवें नरेश विक्रमादित्य षष्ठ ने, जो विक्रम के नाम से भी विख्यात है, कांची पर अधिकार कर लिया और प्रसिद्ध कवि विल्हण को संरक्षत्व प्रदान किया। विल्हण ने विक्रमादित्य के जीवन पर 'विक्रमांक-चरित' नामक सुविख्यात ग्रंथ लिखा है। याज्ञवल्क्यस्मृति की 'मिताक्षरा' व्याख्या के लेखक प्रसिद्ध विधिवेत्ता विज्ञानेश्वर चालुक्यों की राजधानी कल्याणी में ही रहते थे। [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] को छोड़कर शेष [[भारत]] में 'मिताक्षरों' को हिन्दू क़ानून का सबसे अधिकारिक ग्रंथ माना जाता है।&lt;br /&gt;
==पतन==&lt;br /&gt;
विक्रमादित्य षष्ठ की मृत्यु के बाद से कल्याणी के चालुक्यों की शक्ति का पतन शुरू हो गया। ग्यारहवें राजा तैलप तृतीय के शासन काल में चालुक्य राज्य का अधिकांश भाग उसके प्रधान सेनापति बिज्जल कलचूरि ने हड़प लिया। चालुक्य राज्य शनै-शनै इतना कमज़ोर हो गया कि 21वीं शती में बारहवें राजा सोमेश्वर चतुर्थ का शासन समाप्त होने तक उसके राज्य का पश्चिमी भाग तो देवगिरि के यादवों ने छीन लिया और दक्षिणी भाग द्वारसमुद्र के होयसलों के नियंत्रण में आ गया। वातापी और कल्याणी चालुक्य नरेशों ने स्वयं कट्टर हिन्दू होने पर भी [[बौद्ध]] और [[जैन धर्म]] को प्रश्रय दिया। इनके शासन काल में यज्ञ-प्रधान हिन्दू धर्म पर विशेष बल दिया गया। चालुक्य राजाओं ने हिन्दू देवताओं के अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{चालुक्य राजवंश}}&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:दक्षिण भारत के साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:चालुक्य साम्राज्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुर्जर</title>
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		<updated>2011-01-27T20:10:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गुर्जर समाज, प्राचीन एवम् राज्य करने वाले समाज में से एक है।गुर्जर अभिलेखो के अनुसार ये सुर्यवन्श या रघुवन्श से सम्बन्ध रखते है।प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Some aspects of ancient Indian culture|author=Devadatta Ramakrishna Bhandarkar|publisher=Asian Educational Services|year=1989|id=ISBN 81-206-0457-1, ISBN 978-81-206-0457-5|url=http://books.google.co.in/books?id=gUAvuYu-otEC&amp;amp;pg=PA64&amp;amp;dq|page=64}}&amp;lt;/ref&amp;gt;७ वी से १० वी शताब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर  सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;राजस्थान मे आज भी गुर्जरो को सम्मान से ''मिहिर'' बोलते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।सन्स्क्रत के विद्वानो के अनुसार, ''गुर्जर'' शुद्ध सन्स्कर्त शब्द है, जिसका अर्थ ''शत्रु का नाश करने वाला अर्थाथ शत्रु विनाशक'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| last =Indirā Gāndhī Rāshṭrīya Mānava Saṅgrahālaya&lt;br /&gt;
| first =Kulbhushan Warikoo, Sujit Som&lt;br /&gt;
| title =Gujjars of Jammu and Kashmir&lt;br /&gt;
|url=http://books.google.com/?id=zxtuAAAAMAAJ&amp;amp;q=gurjar+in+ramayan&amp;amp;dq=gurjar+in+ramayan&amp;amp;cd=4&lt;br /&gt;
| publisher=Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya&lt;br /&gt;
| page =4&lt;br /&gt;
|quote=&amp;quot;Gurjar&amp;quot; is a sanskrit word which has been explained thus:&lt;br /&gt;
Gur+Ujjar;'Gur' means 'enemy' and 'ujjar' means 'destroyer'.The word means &amp;quot;Destroyer of the enemy&amp;quot;.&lt;br /&gt;
| date =2000*&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| author =India. Office of the Registrar General&lt;br /&gt;
| title =Census of India, Volume 20, Part 6, Issue 27&lt;br /&gt;
| url=http://books.google.com/?id=CsjUAAAAMAAJ&amp;amp;cd=4&amp;amp;dq=Gurjar+origin&amp;amp;q=gurjar#search_anchor&lt;br /&gt;
| publisher=Manager of Publications&lt;br /&gt;
|year=1961&lt;br /&gt;
| page =7&lt;br /&gt;
|quote=These people used to enjoy a title of 'Gorjan' (Leader of masses).In sanskrit the word Gurjar was used and now-a-days Gujjar is used in place of Gurjar which predicts the qualities of a warrior community.&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे ''दहाडता गुर्जर'' कह कर सम्बोदित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=481|quote=With the ''roaring [[Gujar]]'' an ephithet in the Kupadvanj Rashtrakutta grant of AD 910...}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुर्जर साम्राज्य ==&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे  गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
|work=Persian Texts in Translation&lt;br /&gt;
|publisher=The Packard Humanities Institute&lt;br /&gt;
|accessdate=2007-05-31&lt;br /&gt;
|archiveurl = http://web.archive.org/web/20070929130741/http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90 &amp;lt;!-- Bot retrieved archive --&amp;gt; |archivedate = 2007-09-29}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बन्गाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी।१२वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भुरि-भुरि प्रशन्शा की है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;अरब लेखको के अनुसार गुर्जर उन्के सबसे भयन्कर शत्रु थे तथा उन्होने ये भी कहा है की अगर गुर्जर नही होते तो वो भारत पे १२ वी शदी से पहले ही अधिकार कर लेते।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य</title>
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		<updated>2011-01-27T20:09:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: संदर्भ&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{tocright}}&lt;br /&gt;
देवपाल के शासन के अन्तिम दिनों में [[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर प्रतिहार]] साम्राज्य की शक्ति बढ़ने लगी।विद्वानो का मानना है कि इन [[गुर्जर|गुर्जरो]] ने भारतवर्ष को लगभग ३०० साल तक अरब-आक्रन्ताओ से सुरक्षित रखकर ''प्रतिहार'' (रक्षक) की भुमिका निभायी थी, अत: प्रतिहार नाम से जाने जाने लगे।&amp;lt;ref&amp;gt;New image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. p. 2&amp;lt;/ref&amp;gt;।रेजर के शिलालेख पर प्रतिहारो ने स्पष्ट रूप से गुर्जर-वन्श के होने की पूष्टि की है।&amp;lt;ref&amp;gt;Rama Shankar Tripathi (1999). History of ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 318.&amp;lt;/ref&amp;gt;ये पाल वंश से कुछ समय पहले ही शक्तिशाली बने। आरम्भ में सम्भवतः ये केवल स्थानीय अधिकारी थे, लेकिन कालान्तर में उन्होंने मध्य तथा पूर्वी राजस्थान के कई क्षेत्रों पर अपना अधिकार प्राप्त कर लिया। इनकी ख्याति तब बढ़ी जब इन्होंने राजस्थान और गुजरात में सिंध के अरबी शासकों के आक्रमण का विरोध किया। गुजरात के एक युद्ध में 738 ई0 में [[चालुक्य राजवंश|चालुक्यों]] ने 'म्लच्छों' को निर्णायक रूप से पराजित किया। बताया जाता है कि इसके बाद अरब कभी भी गुजरात में अपना प्रभाव क़ायम नहीं कर सके। इस युद्ध में भाग लेने वाला एक मुख्य व्यक्ति दन्तिदुर्ग था जो बादामी के चालुक्यों का एक सामंत था और जो इस समय दक्षिण में शासक बन बैठा था। बाद में दन्तिदुर्ग ने चालुक्यों को पराजित कर राष्ट्रकूट साम्राज्य की नींव डाली।&lt;br /&gt;
====व्यवस्थापक, शक्तिशाली शासक राजा भोज==== &lt;br /&gt;
जैसा कि ऊपर बताया गया है, प्रतिहार वंश के आरम्भिक शासक वत्सराज तथा नागभट्ट द्वितीय, पाल और राष्ट्रकूट शासकों से पराजित हो गए थे, और इस प्रकार इनकी स्थिति कमज़ोर हो गई थी। प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक व्यवस्थापक, उस वंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। हमें यह पता नहीं है कि भोज कब सिंहासन पर बैठा। उसके प्रारम्भिक जीवन के बारे में हमें पता इसलिए नहीं है क्योंकि नागभट्ट द्वितीय तथा राष्ट्रकूट शासक गोपाल तृतीय से पराजित होने के बाद प्रतिहार साम्राज्य का लगभग विघटन हो गया थां भोज ने धीरे धीरे फिर साम्राज्य की स्थापनी की। उसने कन्नौज पर 836 ई0 तक पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और जो प्रतिहार वंश के अंत तक उसकी राजधानी बना रहा। राजा भोज ने गुर्जरात्र अथवा मध्य और पूर्वी राजस्थान पर भी पुनः अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन एक बार फिर प्रतिहारों को पाल तथा राष्ट्रकूटों का सामना करना पड़ा। भोज देवपाल से पराजित हुआ लेकिन ऐसा लगता है कि कन्नौज उसके हाथ से गया नहीं। अब पूर्वी क्षेत्र में भोज पराजित हो गया, तब उसने मध्य [[भारत]] तथा दक्कन की ओर अपना ध्यान लगा दिया। गुजरात और मालवा पर विजय प्राप्त करने के अपने प्रयास में उसका फिर राष्ट्रकूटों से संघर्ष छिड़ गया। नर्मदा के तट पर एक भीषण युद्ध हुआ। लेकिन भोज मालवा के अधिकतर क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में सफल रहा। सम्भव है कि उसने गुजरात के कुछ हिस्सों पर भी शासन किया हो। [[हरियाणा]] के [[करनाल]] ज़िले में प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार भोज ने [[सतलुज नदी|सतलज नदी]] के पूर्वी तट पर कुछ क्षेत्रों को भी अपने अधीन कर लिया था। इस अभिलेख में भोज देव के शक्तिशाली और शुभ शासनकाल में एक स्थानीय मेले में कुछ घोड़ों के व्यापारियों द्वारा घोड़ों की चर्चा की गई है। इससे पता चलता है कि प्रतिहार शासकों और मध्य एशिया के बीच काफ़ी व्यापार चलता था। अरब यात्रियों ने बताया कि प्रतिहार शासकों के पास भारत में सबसे अच्छी अश्व सेना थी। मध्य एशिया तथा अरब के साथ भारत के व्यापार में घोड़ों का प्रमुख स्थान था। देवपाल की मृत्यु और उसके परिणामस्वरूप पाल साम्राज्य की कमज़ोरी का लाभ उठाकर भोज ने पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्भाग्यवश हमें भोज के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। भोज का नाम कथाओं में अवश्य प्रसिद्ध है। सम्भवतः उसके समसामयिक लेखक भोज के प्रारम्भिक जीवन की रोमांचपूर्ण घटनाओं, खोए हुए राज्य को फिर से प्राप्त करने के साहस, तथा कन्नौज की विजय से अत्यनत प्रभावित थे। किंतु भोज [[विष्णु]] का भक्त था और उसने 'आदिवराह' की पदवी ग्रहण की थी जो उसके सिक्कों पर भी अंकित है। कुछ समय बाद कन्नौज पर शासन करने वाले [[परमार वंश]] के राजा भोज, और [[गुर्जर प्रतिहार वंश|प्रतिहार वंश]] के इस राजा भोज में अन्तर करने के लिए इसे कभी-कभी 'मिहिर भोज' भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोज की मृत्यु सम्भवतः 885 ई0 में हुई। उसके बाद उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम सिंहासन पर बैठा। महेन्द्रपाल ने लगभग 908-09 तक राज किया और न केवल भोज के राज्य को बनाए रखा वरन [[मगध]] तथा उत्तरी बंगाल तक उसका विस्तार किया। [[काठियावाड़]], पूर्वी पंजाब और [[अवध]] में भी इससे सम्बन्धित प्रमाण मिले हैं। महेन्द्रपाल ने [[कश्मीर]] नरेश से भी युद्ध किया पर हार कर उसे भोज द्वारा विजित [[पंजाब]] के कुछ क्षेत्रों को कश्मीर नरेश को देना पड़ा। &lt;br /&gt;
====अल मसूदी के अनुसार====&lt;br /&gt;
इस प्रकार प्रतिहार नौवीं शताब्दी के मध्य से लेकिर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात एक सौ वर्षों तक उत्तरी भारत में शक्तिशाली बने रहे। बग़दाद निवासी अल मसूदी 915-16 में गुजरात आया था और उसने प्रतिहार शासकों, उनके साम्राज्य के विस्तार, और उनकी शक्ति की चर्चा की है। वह गुर्जर-प्रतिहार राज्य को अल-जुआर ([[गुर्जर]] का अपभ्रंश) और शासक को 'बौरा' पुकारता है। जो शायद आदिवराह का ग़लत उच्चारण है। यद्यपि यह पदवी राजा भोज की थी, जिसका इस समय तक देहान्त हो चुका था। अल मसूदी कहता है कि जुआर राज्य में 1,800,000 गाँव और शहर थे। इसकी लम्बाई 2,000 किलोमीटर थी और इतनी ही इसकी चौड़ाई थी। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक अंग में सात लाख से लेकर नौ लाख सैनिक थे। अल मसूदी कहता है कि उत्तर की सेना से यह नरेश मुलतान के शासक और उसके मित्रों से युद्ध करता है, दक्षिण की सेना से राष्ट्रकूटों से तथा पूर्व की सेना से पालों से संघर्ष करता है। इसके पास युद्ध के लिए प्रशिक्षित केवल 2,000 हाथी थे लेकिन अश्व सेना देश में सबसे अच्छी थी। &lt;br /&gt;
प्रतिहार शासक साहित्य तथा ज्ञान को बहुत प्रोत्साहित करते थे। महान संस्कृत कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महीपाल के दरबार में रहता था। प्रतिहारों ने कई सुन्दर भवनों और मन्दिरों का निर्माण कर कन्नौज की शोभा बढ़ाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठवीं-नौवीं शताब्दी के दौरान कई भारतीय विद्वान बग़दाद के ख़लीफ़ों के दरबार में गए। इन्होंन अरब में भारतीय विज्ञान, विशेषकर गणित, बीजगणित तथा चिकित्सा शास्त्र का प्रचार किया। हमें उन राजाओं के नाम का पता नहीं जो अपने दूतों और इन विद्वानों को बग़दाद भेजते थे। प्रतिहार [[सिंध]] के अरब शासकों के शत्रु के रूप में जाने जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता है कि इस काल में भी भारत और पश्चिम एशिया के बीच विद्वानों और वस्तुओं का आदान-प्रदान जारी रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने 915 और 918 ई0 के मध्य में एक बार फिर कन्नौज पर धावा बोल दिया। इससे प्रतिहार साम्राज्य कमज़ोर पड़ गया और सम्भवतः गुजरात पर राष्ट्रकूटों का अधिकार स्थापित हो गया क्योंकि अल मसूदी कहता है कि प्रतिहार साम्राज्य की समुद्र तक पहुँच नहीं थी। गुजरात, समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार का केन्द्र था तथा उत्तरी भारत से पश्चिम एशिया को जाने वाली वस्तुओं का प्रमुख द्वार था। गुजरात के हाथ से निकल जाने से प्रतिहारों को और भी धक्का लगा। महीपाल के बाद प्रतिहार साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन हो गया। एक और राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तृतीय ने 963 ई0 में उत्तरी भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को पराजित कर दिया। इसके शीघ्र बाद प्रतिहार साम्राज्य का विघटन हो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राजवंश]] [[Category:इतिहास कोश]] &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुर्जर प्रतिहार वंश</title>
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		<updated>2011-01-27T16:33:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: संदर्भ&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''गुर्जर प्रतिहार''' वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई0 में की थी। उसने [[राम]] के भाई [[लक्ष्मण]] को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को [[सूर्यवंश]] की शाखा सिद्ध किया।अधिकतर [[गुर्जर]] सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा गुर्जरो के शिलालेखो पर अन्कित सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;आज भी राजस्थान मे गुर्जर सम्मान से ''मिहिर'' कहे जाते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
विद्वानो के मानना है कि इन गुर्जरो ने भारतवर्ष को लगभग ३०० साल तक अरब-आक्रन्ताओ से सुरक्षित रखकर ''प्रतिहार'' (रक्षक) की भुमिका निभायी थी, अत: प्रतिहार नाम से जाने जाने लगे।&amp;lt;ref&amp;gt;New image of Rajasthan. Directorate of Public Relations, Govt. of Rajasthan. 1966. p. 2&amp;lt;/ref&amp;gt;।रेजर के शिलालेख पर प्रतिहारो ने स्पष्ट रूप से गुर्जर-वन्श के होने की पूष्टि की है।&amp;lt;ref&amp;gt;Rama Shankar Tripathi (1999). History of ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 318.&amp;lt;/ref&amp;gt;नागभट्ट प्रथम बड़ा वीर था। उसने सिंध की ओर से होने से अरबों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया। साथ ही दक्षिण के चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के आक्रमणों का भी प्रतिरोध किया और अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखा। नागभट्ट के भतीजे का पुत्र [[वत्सराज]] इस वंश का प्रथम शासक था, जिसने सम्राट की पदवी धारण की, यद्यपि उसने राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से बुरी तरह हार खाई। वत्सराज के पुत्र [[नागभट्ट द्वितीय]] ने 816 ई0 के लगभग गंगा की घाटी पर हमला किया, और [[कन्नौज]] पर अधिकार कर लिया। वहाँ के राजा को गद्दी से उतार दिया और वह अपनी राजधानी कन्नौज ले आया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि नागभट्ट द्वितीय भी राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय से पराजित हुआ, तथापि नागभट्ट के वंशज कन्नौज तथा आसपास के क्षेत्रों पर 1018-19 ई0 तक शासन करते रहे, जबकि [[महमूद गज़नवी]] ने कन्नौज पर क़ब्ज़ा करके प्रतिहार राजा को बाड़ी भाग जाने के लिए विवश किया। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज प्रथम था, जो कि [[मिहिरभोज]] के नाम से भी जाना जाता है और जो नागभट्ट द्वितीय का पौत्र था। भोज प्रथम ने (लगभग 836-86 ई0) 50 वर्ष तक शासन किया और प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सतलुज तक हो गया। अरब व्यापारी सुलेमान इसी राजा भोज के समय में [[भारत]] आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में राजी की सैनिक शक्ति और सुव्यवस्थित शासन की बड़ी प्रशंसा की है। अगला सम्राट महेन्द्रपाल था, जो 'कर्पूरमंजरी' नाटक के रचयिता महाकवि राजेश्वर का शिष्य और संरक्षक था। महेन्द्र का पुत्र महिपाल भी राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय से बुरी तरह पराजित हुआ। राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन शीघ्र ही महिपाल ने पुनः उसे हथिया लिया। परन्तु महिपाल के समय में ही गुर्जर-प्रतिहार राज्य का पतन होने लगा। उसके बाद के राजाओं–भोज द्वितीय, विनायकपाल, महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, महिपाल द्वितीय और विजयपाल ने जैसे-तैसे 1019 ई0 तक अपने राज्य को क़ायम रखा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महमूद गजनवी के हमले के समय कन्नौज का शासक राज्यपाल था। राज्यपाल बिना लड़े ही भाग खड़ा हुआ। बाद में उसने महमूद गज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे आसपास के गुर्जर राजा बहुत ही नाराज़ हुए। महमूद गज़नवी के लौट जाने पर कालिंजर के चन्देल राजा गण्ड के नेतृत्व में गुर्जर राजाओं ने कन्नौज के राज्यपाल को पराजित कर मार डाला और उसके स्थान पर त्रिलोचनपाल को गद्दी पर बैठाया। महमूद के दौबारा आक्रमण करने पर कन्नौज फिर से उसके अधीन हो गया। त्रिलोचनपाल भाग कर बाड़ी में शासन करने लगा। उसकी हैसियत स्थानीय सामन्त जैसी रह गयी। कन्नौज में [[गहड़वाल वंश]] अथवा [[राठौर वंश]] का उदभव होने पर उसने 11वीं शताब्दी के द्वितीय चतुर्थांश में बाड़ी के गुर्जर-प्रतिहार वंश को सदा के लिए उखाड़ दिया। गुर्जर-प्रतिहार वंश के आन्तरिक प्रशासन के बारे में कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इतिहास में इस वंश का मुख्य योगदान यह है कि इसने 712 ई0 में सिंध विजय करने वाले अरबों को आगे नहीं बढ़ने दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=आधार1&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के राजवंश}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत_के_राजवंश]][[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>गुजरात</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4&amp;diff=111981"/>
		<updated>2011-01-27T15:11:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: संदर्भ&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राज्य&lt;br /&gt;
|Image=Gujarat-Map.jpg&lt;br /&gt;
|राजधानी=[[गांधीनगर]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=50,671,017&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=196024sqkm&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=23.2167°N 72.6833°E&lt;br /&gt;
|ज़िले=26&lt;br /&gt;
|सबसे बड़ा नगर=[[अहमदाबाद]]&lt;br /&gt;
|बड़े नगर=[[जूनागढ़]], [[जामनगर]], [[राजकोट]], [[भावनगर]], [[गांधीनगर]], [[वडोदरा]]&lt;br /&gt;
|राजभाषा(एँ)=[[गुजराती भाषा]], [[मराठी भाषा]], [[हिन्दी भाषा]]&lt;br /&gt;
|स्थापना=1960/05/01&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=[[सोमनाथ ज्योतिर्लिंग|सोमनाथ]], [[गिरनार]], [[पालीताना]], [[पावागढ़]]&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=[[अहमदपुर मांडती]], [[चारबाड़ उभारत]], [[तीथल]]&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=1000:920&lt;br /&gt;
|साक्षरता=69.14&lt;br /&gt;
|राज्यपाल=[[डॉ. कमला बेनीवाल]]&lt;br /&gt;
|मुख्यमंत्री=[[नरेंद्र मोदी]]&lt;br /&gt;
|विधान सभा सदस्य संख्या=182&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=[http://gujaratindia.com/index.htm अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|16:21, 4 अप्रॅल 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
|emblem=Gujarat Logo.jpg&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
*गुजरात पश्चिमी [[भारत]] का एक प्रान्त है। इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा [[पाकिस्तान]] से लगी है। &lt;br /&gt;
*[[राजस्थान]] और [[मध्य प्रदेश]] इसके उत्तर एवं उत्तर-पूर्व में स्थित हैं। [[महाराष्ट्र]] इसके पूर्व में है। [[अरब सागर]] इसकी पश्चिमी-दक्षिणी सीमा बनाता है। इसकी दक्षिणी सीमा पर दादरा एवं नगर-हवेली हैं। &lt;br /&gt;
*इस प्रांत की राजधानी [[गांधीनगर]] है। गांधीनगर प्रांत के प्रमुख व्यवसायिक केन्द्र [[अहमदाबाद]] के समीप स्थित है। गुजरात का क्षेत्रफल 1,96,077 किलोमीटर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नामोत्पत्ति==&lt;br /&gt;
गुजरात नाम, गुर्जरत्रा से आया है। [[गुर्जर|गुर्जरो]] का साम्राज्य ६ठीं से १२वीं सदी तक गुर्जरत्रा या गुर्जरभुमि के नाम से जाना जाता था। गुर्जर एक समुदाय है|&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो का सम्बन्ध सूर्यवन्श या रघुवन्श से बताया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Some aspects of ancient Indian culture|author=Devadatta Ramakrishna Bhandarkar|publisher=Asian Educational Services|year=1989|id=ISBN 8120604571, ISBN 9788120604575|url=http://books.google.co.in/books?id=gUAvuYu-otEC&amp;amp;pg=PA64&amp;amp;dq|page=64}}&amp;lt;/ref&amp;gt;कुछ विद्वान इन्हे मध्य-एशिया से आये आर्य भी बताते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
गुजरात का इतिहास ईस्वी पूर्व लगभग 2,000 साल पुराना है। यह भी मान्यता है कि भगवान [[कृष्ण]] [[मथुरा]] छोड़कर [[सौराष्ट्र]] के पश्चिमी तट पर जा बसे थे, जो [[द्वारिका]] अर्थात 'प्रवेशद्वार' कहलाया। बाद के वर्षों में [[मौर्य]], [[गुप्त]], [[प्रतिहार]] तथा अन्य अनेक राजवंशों ने इस प्रदेश पर शासन किया। चालुक्य, सोलंकी राजाओं का शासन काल गुजरात के लिए प्रगति और समृध्दि का युग था। [[महमूद ग़ज़नवी]] की लूटपाट के बाद भी चालुक्य राजाओं ने यहाँ के लोगों की समृद्धि और भलाई का पूरा ध्यान रखा। इस गौरवपूर्ण काल के पश्चात गुजरात को मुसलमानों, मराठों और ब्रिटिश शासन के दौरान बुरे दिनों का सामना करना पड़ा। आजादी से पहले आज का गुजरात  मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित था-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dwarkadhish-Temple-Dwarka-Gujarat-2.jpg|thumb|220px|[[द्वारिकाधीश मंदिर द्वारिका|द्वारिकाधीश मन्दिर]], [[द्वारका]], गुजरात&amp;lt;br /&amp;gt; Dwarkadhish Temple, Dwarka, Gujarat|left]]&lt;br /&gt;
#एक ब्रिटिश क्षेत्र और &lt;br /&gt;
#दूसरा देसी रियासतें। &lt;br /&gt;
राज्यों के पुनर्गठन के कारण सौराष्ट्र के राज्यों और [[कच्छ]] के केंद्र शासित प्रदेश के साथ पूर्व ब्रिटिश गुजरात को मिलाकर द्विभाषी [[मुंबई]] राज्य का गठन हुआ। पहली मई, 1060 को वर्तमान गुजरात राज्य अस्तित्व में आया। गुजरात [[भारत]] के पश्चिमी तट पर स्थित है। इसके पश्चिम में [[अरब सागर]], उत्तर में [[पाकिस्तान]] तथा उत्तर-पूर्वी सीमा पर [[राजस्थान]], दक्षिण-पूर्वी सीमा पर [[मध्य प्रदेश]] और दक्षिण में [[महाराष्ट्र]] है।&lt;br /&gt;
==कृषि==&lt;br /&gt;
*गुजरात कपास, तंबाकू और मूंगफली का उत्पादन करने वाला देश का प्रमुख राज्य है। &lt;br /&gt;
*यह कपड़ा, तेल और साबुन जैसे महत्त्वपूर्ण अद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध करता है। &lt;br /&gt;
*अन्य महत्त्वपूर्ण नकदी फ़सलें हैं - इसबगोल, धान, गेहूं और बाजरा। &lt;br /&gt;
*गुजरात के वनों में उपलब्ध वृक्षों की जातियां हैं- सागवान, खैर, हलदरियो, सादाद और बांस।&lt;br /&gt;
==उद्योग==&lt;br /&gt;
{{राज्य मानचित्र|float=right}}&lt;br /&gt;
राज्य के औद्योगिक ढांचे में धीरे-धीरे विविधता आती जा रही है। यहाँ रसायन,पेट्रो-रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि उद्योगों का विकास रहा है।&lt;br /&gt;
* 2004 के अंत में राज्य में पंजीकृत फैक्टरियों की संख्या 21,536 (अस्थाई) थी जिनमें औसतन 9.27 लाख दैनिक मजदूरों को रोजगार मिला हुआ था। &lt;br /&gt;
*मार्च, 2005 तक राज्य में 2.99 लाख लघु औद्योगिक इकाइयों का पंजीकरण हो चुका था। &lt;br /&gt;
*गुजरात औद्योगिक विकास निगम को ढांचागत सुविधाओं के साथ औद्योगिक संपदाओं के विकास की भूमिका सौंपी गई है। *दिसंबर, 2005 तक गुजरात औद्योगिक विकास निगम ने 237 औद्योगिक संपदाएं स्थापित की थी।&lt;br /&gt;
==सिंचाई और बिजली==&lt;br /&gt;
*राज्य में भूतलीय जल तथा भूमिगत जल द्वारा कुल सिंचाई क्षमता 64.48 लाख हेक्टेयर आंकी गई है जिसमें सरदार सरोवर (नर्मदा) परियोजना की 17.92 लाख हेक्टेयर क्षमता भी शामिल है। &lt;br /&gt;
*राज्य में जून 2005 तक कुल सिंचाई क्षमता 40.34 लाख हेक्टेयर क्षमता भी शामिल है। &lt;br /&gt;
*राज्य में जून 2007 तक कुल सिंचाई क्षमता 42.26 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई थी। &lt;br /&gt;
*जून 2007 तक अधिकतम उपयोग क्षतमा 37.33 लाख हेक्टेयर आंकी गई।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Garba-Dance.jpg|thumb|250px|left|[[गरबा नृत्य]], गुजरात &amp;lt;br /&amp;gt;Garba-Dance., Gujarat]]&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
*2005-06 के अंत में सड़कों की कुल लंबाई (गैर योजना, सामुदायिक, शहरी और परियोजना सड़कों के अलावा) लगभग 74,038 किलोमीटर थी।&lt;br /&gt;
*राज्य के [[अहमदाबाद]] स्थित मुख्य हवाई अड्डे से [[मुंबई]], [[दिल्ली]] और अन्य शहरों के लिए दैनिक विमान सेवा उपलब्ध है। अहमदाबाद हवाई अड्डे को अब अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा मिल गया हैं। अन्य हवाई अड्डे [[वडोदरा]], [[भावनगर]], [[भुज]], [[सूरत]], [[जामनगर]], [[कांदला]], [[केशोद]], [[पोरबंदर]] और [[राजकोट]] में है।&lt;br /&gt;
*गुजरात में कुल 40 बंदरगाह हैं। कांदला राज्य का प्रमुख बंदरगाह है। वर्ष 2004-05 के दौरान गुजरात के मंझोले और छोटे बंदरगाहों से कुल 971.28 लाख टन माल ढोया गया जबकि कांदला बंदरगाह से 415.51 लाख टन माल ढोया गया।&lt;br /&gt;
==त्योहार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Nageshwar-Mahadev-Gujarat-1.jpg|thumb|नंगेश्वर महादेव, [[द्वारका]], गुजरात&amp;lt;br /&amp;gt; Nageshwar Mahadev, Dwarka, Gujarat]]&lt;br /&gt;
*भाद्रपद्र (अगस्त-सितंबर) मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी के दिन तरणेतर गांव में भगवान [[शिव]] की स्तुति में तरणेतर मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*भगवान [[कृष्ण]] द्वारा [[रुक्मणी]] से विवाह के उपलक्ष्य में चैत्र (मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष की नवमी को पोरबंदर के पास माधवपुर में माधवराय मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*उत्तरी गुजरात के बांसकांठा ज़िले में हर वर्ष मां अंबा को समर्पित अंबा जी मेला आयेजित किया जाता हैं। &lt;br /&gt;
*राज्य का सबसे बड़ा वार्षिक मेला [[द्वारका]] और डाकोर में भगवान कृष्ण के जन्मदिवस [[कृष्ण जन्माष्टमी|जन्माष्टमी]] के अवसर पर बड़े हर्षोल्लास से आयोजित होता है। &lt;br /&gt;
*इसके अतिरिक्त गुजरात में [[मकर संक्राति]], [[नवरात्र]], डांगी दरबार, शामला जी मेले तथा भावनाथ मेले का भी आयोजन किया जाता हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन स्थल==&lt;br /&gt;
*[[गिर पर्वत|गिर]] के जंगल में लायन सेंक्चुरी स्थित है।&lt;br /&gt;
*[[सोमनाथ मंदिर]] भी स्थित है।&lt;br /&gt;
*राज्य में द्वारका, सोमनाथ, पालीताना के निकट [[शत्रुंजय पहाड़ी]], पावागढ़, अंबाजी भद्रेश्वर, शामलाजी, तरंगा और [[गिरनार]] जैसे धार्मिक स्थलों के अलावा [[महात्मा गाँधी]] की जन्मभूमि पोरबंदर तथा पुरातत्त्व और वास्तुकला की दृष्टि से उल्लेखनीय पाटन, सिद्धपुर, घुरनली, दभेई, बाडनगर, मोधेरा, लाथल और अमहदाबाद जैसे स्थान भी हैं। &lt;br /&gt;
*अहमदपुर मांडती, चारबाड़ उभारत और तीथल के सुंदर समुद्री तट, सतपुड़ा पर्वतीय स्थल, गिर वनों के शेरों का अभयारण्य और कच्छ में जंगली गधों का अभयारण्य भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://gujaratindia.com/index.htm अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
*[http://www.bharatonline.com/gujarat/index.html गुजरात]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गुजरात के ज़िले}}&lt;br /&gt;
{{गुजरात के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{राज्य और के. शा. प्र.}}&lt;br /&gt;
{{भारत गणराज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:गुजरात]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश]][[Category:राज्य संरचना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=111980</id>
		<title>राजपूताना</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=111980"/>
		<updated>2011-01-27T14:58:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''राजपूताना''', यह '''रजवाड़ा''' भी कहलाता है।ये प्रारम्भ मे [[गुर्जर|गुर्जरो]] का देश था तथा '''गुर्जरत्रा''' (गुर्जरो से रक्षित देश), '''गुर्जरदेश''', '''गुर्जरधरा''' आदि नामो से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;Sir Jivanji Jamshedji Modi (1930). Dr. Modi memorial volume: papers on Indo-Iranian and other subjects. Fort Printing Press. p. 521&amp;lt;/ref&amp;gt;गुर्जरो का साम्राज्य यहा १२ वी शदी तक रहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;R.C. Majumdar (1994). Ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 263&amp;lt;/ref&amp;gt;गुर्जरो के बाद यहा राजपूतो की राजनैतिक सत्ता आयी तथा ब्रिटिशकाल मे यह ''राजपूताना'' (राजपूतो का देश) नाम से जाने जाना लगा। &amp;lt;ref&amp;gt;John Keay (2001). India: a history. Grove Press. pp. 231–232&amp;lt;/ref&amp;gt;इस प्रदेश का आधुनिक नाम [[राजस्थान]] है, जो उत्तर [[भारत]] के पश्चिमी भाग में अरावली की पहाड़ियों के दोनों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा अत्यल्प और वह भी विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से होती है। यह मुख्यत: वर्तमान [[राजस्थान]] राज्य की भूतपूर्व रियासतों का समूह है, जो [[भारत]] का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।&lt;br /&gt;
====भौगोलिक स्थिति====&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
3,43,328 वर्ग किमी. क्षेत्रफल वाले इस इलाक़े के दो भौगोलिक खण्ड हैं, '''अरावली पर्वत श्रृंखला का पश्चिमोत्तर क्षेत्र'''-जो अनुपजाऊ व ज़्यादातर रेतीला है। इसमें थार के रेगिस्तान का एक हिस्सा शामिल है और '''पर्वत श्रृंखला का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र'''-जो सामान्यत: ऊँचा तथा अधिक उपजाऊ है। इस प्रकार समस्त क्षेत्र एक ऐसे सघन अवरोध का निर्माण करता है, जिसमें उत्तर भारत के मैदान और प्रायद्वीपीय भारत के मुख्य पठार के मध्य स्थित पहाड़ी और पठारी क्षेत्र सम्मिलित हैं। &lt;br /&gt;
====राजस्थान का उदय====&lt;br /&gt;
'''राजपूताना''' में 23 राज्य, एक सरदारी, एक जागीर और [[अजमेर]]-[[मेवाड़]] का ब्रिटिश ज़िला शामिल थे। शासक राजकुमारों में अधिकांश राजपूत थे। ये राजपूताना के ऐतिहासिक क्षेत्र के क्षत्रिय थे, जिन्होंने सातवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में प्रवेश करना आरम्भ किया। [[जोधपुर]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]] और [[उदयपुर]] सबसे बड़े राज्य थे। 1947 में विभिन्न चरणों में इन राज्यों का एकीकरण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान राज्य अस्तित्व में आया। दक्षिण-पूर्व राजपूताना के कुछ पुराने क्षेत्र मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में और कुछ क्षेत्र अब [[गुजरात]] का हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
====इतिहास====&lt;br /&gt;
'''भारत''' में मुसलमानों का राज्य स्थापित होने के पूर्व [[राजस्थान]] में कई शक्तिशाली राजपूत जातियों के वंश शासन कर रहे थे और उनमें सबसे प्राचीन चालुक्य और राष्ट्रकूट थे। इसके उपरान्त [[कन्नौज]] के राठौरों (राष्ट्रकूट), [[अजमेर]] के चौहानों, अन्हिलवाड़ के सोलंकियों, [[मेवाड़]] के गहलोतों या सिसोदियों और जयपुर के कछवाहों ने इस प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। राजपूत जातियों में फूट और परस्पर युद्धों के फलस्वरूप वे शक्तहीन हो गए। यद्यपि इनमें से अधिकांश ने बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में मुसलमान आक्रमणकारियों का वीरतापूर्वक सामना किया, तथापि प्राय: सम्पूर्ण राजपूताने के राजवंशों को [[दिल्ली]] सल्तनत की सर्वोपरी सत्ता स्वीकार करनी पड़ी।&lt;br /&gt;
====राणा सांगा की पराजय==== &lt;br /&gt;
'''फिर भी मुसलमानों''' की यह प्रभुसत्ता राजपूत शासकों को सदेव खटकती रही और जब कभी दिल्ली सल्तनत में दुर्बलता के लक्षण दृष्टिगत होते, वे अधीनता से मुक्त होने को प्रयत्नशील हो उठते। 1520 ई. में [[बाबर]] के नेतृत्व में मुग़लों के आक्रमण के समय राजपूताना दिल्ली के सुल्तानों के प्रभाव से मुक्त हो चला था और मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने बाबर के दिल्ली पर अधिकार का विरोध किया। 1526 ई. में खानवा के युद्ध में राणा की पराजय हुई और [[मुग़ल|मुग़लों]] ने दिल्ली के सुल्तानों का राजपूताने पर नाममात्र को बचा प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया।&lt;br /&gt;
====मुग़लों की अधीनता====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मुग़ल}}&lt;br /&gt;
किन्तु राजपूतों का विरोध शान्त न हुआ। [[अकबर]] की राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदर्शिता का प्रभाव इन पर अवश्य पड़ा और मेवाड़ के अतिरिक्त अन्य सभी राजपूत शासक मुग़लों के समर्थक और भक्त बन गए। अन्त में [[जहाँगीर]] के शासनकाल में मेवाड़ ने भी मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली। [[औरंगज़ेब]] के सिंहासनारूढ़ होने तक राजपूताने के शासक मुग़लों के स्वामिभक्त बने रहे। परन्तु औरंगज़ेब की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के कारण दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। बाद में एक समझौते के फलस्वरूप राजपूताने में शान्ति स्थापित हुई। &lt;br /&gt;
====अंग्रेज़ों की शरण====&lt;br /&gt;
'''प्रतापी मुग़लों''' के पतन से भी राजपूताने के राजपूत शासकों का कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि 1756 ई. के लगभग राजपूतों में मराठों का शक्ति विस्तार आरम्भ हो गया। 18वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में [[भारत]] की अव्यवस्थित राजनीतिक दशा में उलझनें तथा मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से त्रस्त होने के कारण राजपूताने के शासकों का इतना मनोबल गिर गया कि उन्होंने अपनी सुरक्षा हेतु [[अंग्रेज़ों|अंग्रेज़ों]] की शरण ली।&lt;br /&gt;
====भारतीय संघ====&lt;br /&gt;
'''भारतीय गणतंत्र''' की स्थापना के उपरान्त कुछ राजपूत रियासतें मार्च, 1948 ई. में और कुछ एक वर्ष बाद भारतीय संघ में सम्मिलित हो गईं। इस प्रदेश का आधुनिक नाम [[राजस्थान]] और इसकी राजधानी [[जयपुर]] है। राजप्रमुख (अब राज्यपाल) का निवास तथा विधानसभा की बैठकें भी जयपुर में ही होती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
:*(पुस्तक 'भारत ज्ञानकोश') पृष्ठ संख्या-59&lt;br /&gt;
:*(पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश') पृष्ठ संख्या-400&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=111979</id>
		<title>राजपूताना</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE&amp;diff=111979"/>
		<updated>2011-01-27T14:53:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: सन्दर्भ जोडा&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''राजपूताना''', यह '''रजवाड़ा''' भी कहलाता है।ये प्रारम्भ मे [[गुर्जरो|गुर्जर]] का देश था तथा '''गुर्जरत्रा''' (गुर्जरो से रक्षित देश), '''गुर्जरदेश''', '''गुर्जरधरा''' आदि नामो से जाना जाता था।गुर्जरो का साम्राज्य यहा १२ वी शदी तक रहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;R.C. Majumdar (1994). Ancient India. Motilal Banarsidass Publ.. p. 263&amp;lt;ref/&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Sir Jivanji Jamshedji Modi (1930). Dr. Modi memorial volume: papers on Indo-Iranian and other subjects. Fort Printing Press. p. 521&amp;lt;ref/&amp;gt;गुर्जरो के बाद यहा राजपूतो की राजनैतिक सत्ता आयी तथा ब्रिटिशकाल मे यह ''राजपूताना'' (राजपूतो का देश) नाम से जाने जाना लगा। &amp;lt;ref&amp;gt;John Keay (2001). India: a history. Grove Press. pp. 231–232&amp;lt;ref/&amp;gt;इस प्रदेश का आधुनिक नाम [[राजस्थान]] है, जो उत्तर [[भारत]] के पश्चिमी भाग में अरावली की पहाड़ियों के दोनों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग मरुस्थल है। यहाँ वर्षा अत्यल्प और वह भी विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से होती है। यह मुख्यत: वर्तमान [[राजस्थान]] राज्य की भूतपूर्व रियासतों का समूह है, जो [[भारत]] का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।&lt;br /&gt;
====भौगोलिक स्थिति====&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
3,43,328 वर्ग किमी. क्षेत्रफल वाले इस इलाक़े के दो भौगोलिक खण्ड हैं, '''अरावली पर्वत श्रृंखला का पश्चिमोत्तर क्षेत्र'''-जो अनुपजाऊ व ज़्यादातर रेतीला है। इसमें थार के रेगिस्तान का एक हिस्सा शामिल है और '''पर्वत श्रृंखला का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र'''-जो सामान्यत: ऊँचा तथा अधिक उपजाऊ है। इस प्रकार समस्त क्षेत्र एक ऐसे सघन अवरोध का निर्माण करता है, जिसमें उत्तर भारत के मैदान और प्रायद्वीपीय भारत के मुख्य पठार के मध्य स्थित पहाड़ी और पठारी क्षेत्र सम्मिलित हैं। &lt;br /&gt;
====राजस्थान का उदय====&lt;br /&gt;
'''राजपूताना''' में 23 राज्य, एक सरदारी, एक जागीर और [[अजमेर]]-[[मेवाड़]] का ब्रिटिश ज़िला शामिल थे। शासक राजकुमारों में अधिकांश राजपूत थे। ये राजपूताना के ऐतिहासिक क्षेत्र के क्षत्रिय थे, जिन्होंने सातवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में प्रवेश करना आरम्भ किया। [[जोधपुर]], [[जैसलमेर]], [[बीकानेर]], [[जयपुर]] और [[उदयपुर]] सबसे बड़े राज्य थे। 1947 में विभिन्न चरणों में इन राज्यों का एकीकरण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप राजस्थान राज्य अस्तित्व में आया। दक्षिण-पूर्व राजपूताना के कुछ पुराने क्षेत्र मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में और कुछ क्षेत्र अब [[गुजरात]] का हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
====इतिहास====&lt;br /&gt;
'''भारत''' में मुसलमानों का राज्य स्थापित होने के पूर्व [[राजस्थान]] में कई शक्तिशाली राजपूत जातियों के वंश शासन कर रहे थे और उनमें सबसे प्राचीन चालुक्य और राष्ट्रकूट थे। इसके उपरान्त [[कन्नौज]] के राठौरों (राष्ट्रकूट), [[अजमेर]] के चौहानों, अन्हिलवाड़ के सोलंकियों, [[मेवाड़]] के गहलोतों या सिसोदियों और जयपुर के कछवाहों ने इस प्रदेश के भिन्न-भिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। राजपूत जातियों में फूट और परस्पर युद्धों के फलस्वरूप वे शक्तहीन हो गए। यद्यपि इनमें से अधिकांश ने बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में मुसलमान आक्रमणकारियों का वीरतापूर्वक सामना किया, तथापि प्राय: सम्पूर्ण राजपूताने के राजवंशों को [[दिल्ली]] सल्तनत की सर्वोपरी सत्ता स्वीकार करनी पड़ी।&lt;br /&gt;
====राणा सांगा की पराजय==== &lt;br /&gt;
'''फिर भी मुसलमानों''' की यह प्रभुसत्ता राजपूत शासकों को सदेव खटकती रही और जब कभी दिल्ली सल्तनत में दुर्बलता के लक्षण दृष्टिगत होते, वे अधीनता से मुक्त होने को प्रयत्नशील हो उठते। 1520 ई. में [[बाबर]] के नेतृत्व में मुग़लों के आक्रमण के समय राजपूताना दिल्ली के सुल्तानों के प्रभाव से मुक्त हो चला था और मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने बाबर के दिल्ली पर अधिकार का विरोध किया। 1526 ई. में खानवा के युद्ध में राणा की पराजय हुई और [[मुग़ल|मुग़लों]] ने दिल्ली के सुल्तानों का राजपूताने पर नाममात्र को बचा प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया।&lt;br /&gt;
====मुग़लों की अधीनता====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|मुग़ल}}&lt;br /&gt;
किन्तु राजपूतों का विरोध शान्त न हुआ। [[अकबर]] की राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदर्शिता का प्रभाव इन पर अवश्य पड़ा और मेवाड़ के अतिरिक्त अन्य सभी राजपूत शासक मुग़लों के समर्थक और भक्त बन गए। अन्त में [[जहाँगीर]] के शासनकाल में मेवाड़ ने भी मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली। [[औरंगज़ेब]] के सिंहासनारूढ़ होने तक राजपूताने के शासक मुग़लों के स्वामिभक्त बने रहे। परन्तु औरंगज़ेब की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के कारण दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। बाद में एक समझौते के फलस्वरूप राजपूताने में शान्ति स्थापित हुई। &lt;br /&gt;
====अंग्रेज़ों की शरण====&lt;br /&gt;
'''प्रतापी मुग़लों''' के पतन से भी राजपूताने के राजपूत शासकों का कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि 1756 ई. के लगभग राजपूतों में मराठों का शक्ति विस्तार आरम्भ हो गया। 18वीं शताब्दी के अन्तिम दशकों में [[भारत]] की अव्यवस्थित राजनीतिक दशा में उलझनें तथा मराठों एवं पिण्डारियों की लूटमार से त्रस्त होने के कारण राजपूताने के शासकों का इतना मनोबल गिर गया कि उन्होंने अपनी सुरक्षा हेतु [[अंग्रेज़ों|अंग्रेज़ों]] की शरण ली।&lt;br /&gt;
====भारतीय संघ====&lt;br /&gt;
'''भारतीय गणतंत्र''' की स्थापना के उपरान्त कुछ राजपूत रियासतें मार्च, 1948 ई. में और कुछ एक वर्ष बाद भारतीय संघ में सम्मिलित हो गईं। इस प्रदेश का आधुनिक नाम [[राजस्थान]] और इसकी राजधानी [[जयपुर]] है। राजप्रमुख (अब राज्यपाल) का निवास तथा विधानसभा की बैठकें भी जयपुर में ही होती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
:*(पुस्तक 'भारत ज्ञानकोश') पृष्ठ संख्या-59&lt;br /&gt;
:*(पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश') पृष्ठ संख्या-400&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>राजपूत</title>
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		<updated>2011-01-27T14:24:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''राजपूत''', ([[संस्कृत]] शब्द '''राजपुत्र''', अर्थात् (राजा का पुत्र) पैतृक गौत्रों के लगभग 1.2 करोड़ संगठित भू-स्वामी, जो मुख्यत: मध्य और उत्तर [[भारत]], विशेषकर भूतपूर्व [[राजपूताना]] (राजपूतों की भूमि) में बसे हैं। राजपूत स्वयं को क्षत्रिय वर्ग का वंशज या सदस्य मानते हैं, लेकिन भारत में वे विभिन्न रजवाड़ों, जैसे गहलौत, कछवाहा से लेकर साधारण किसानों तक अत्यन्त विविध सामाजिक वर्गीकरण से सम्बन्धित है। ज़्यादातर इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि धर्मनिरपेक्ष सत्ता की प्राप्ति के बाद विजित राजपूत दल को स्वयं को राजपूत मानने का हक़ मिल जाता था। सम्भवत: मध्य एशिया के आक्रमणकारी और स्थानीय क़बीलाई लोगों के पैतृक गोत्रों का राजपूतों में इसी तरह से अंतमिश्रण हुआ है। '''पश्चिमोत्तर में कई मुस्लिम राजपूत भी हैं'''। एक समय में राजपूतों ने सामान्यत: पर्दा प्रथा अपना ली थी। उनके स्वभाव में अपने पूर्वजों के प्रति असीम गर्व और निजी प्रतिष्ठा के प्रति गहरा सम्मान शामिल है। वे अनुलोम विवाह (कन्या का विवाह उसके सामाजिक दर्जे से ऊँचे दर्जे में) करना पसन्द करते हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
====इतिहास====&lt;br /&gt;
'''राजपूतों का उदभव काल''' उत्तर और पश्चिमोत्तर [[भारत]] में पाँचवीं शताब्दी के मध्य से '''श्वेत हूणों (हेफ़्थलाइटों)''' और सम्बद्ध जनजातियों के प्रभाव के कारण भारतीय समाज के विघटन से जुड़ा प्रतीत होता है। गुप्त साम्राज्य के विघटन (छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में) के बाद आक्रमणकारी सम्भवत: तत्कालीन समाज में घुलमिल गए, जिसका परिणाम पश्चिमोत्तर भारतीय समाज का वर्तमान स्वरूप है। सातवीं शताब्दी में सम्राट [[हर्षवर्धन]] की मृत्यु से लेकर 12वीं शताब्दी के अन्त में मुसलमानों की [[भारत]] विजय तक के लगभग 500 वर्षों के काल में भारतवर्ष के इतिहास में राजपूतों ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यह शब्द राजपुत्र का अपभ्रंश है। जनजातीय प्रमुखों और अभिजातों को हिन्दुओं के दूसरे वर्ण में, क्षत्रिय के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि उनके अनुयायी, जैसे '''जाट और अहीर''' जनजातियों के आधार पर कृषक वर्ग में शामिल हो गए।  कुछ आक्रमणकारियों के पुजारी ब्राह्मण (सर्वोत्तम जाति) बन गए। कुछ देशी जनजातियों, जैसे राजस्थान के राठौर और मध्य भारत के चन्देल और बुन्देलों ने राजपूतों का दर्जा प्राप्त कर लिया। &lt;br /&gt;
====राजपूतों की शाखाएँ====&lt;br /&gt;
'''पश्चात्यकालीन ग्रन्थों में राजपूतों की 36 शाखाओं का उल्लेख मिलता है।''' राजपूत सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी तथा अजमेर के निकट अग्नि-कुण्ड से उत्पत्ति का दावा करने वालों की श्रेणी में शामिल हैं। राजपूतों की मांस (गौमांस छोड़कर) खाने की आदत और अन्य गुण उनके विदेशी और आदिवासी मूल की ओर संकेत करते हैं। राजपूतों में '''परिहार, चौहान (चाहमान), सोलंकी (चालुक्य), परमार, तोमर, कलचुरि, गहड़वाल (गाहड़वाल, गहरवार या राठौर), राष्ट्रकूट और गुहिलोत (सिसोदिया) सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं'''। वीरता, उदारता, स्वातंत्रय प्रेम, देशभक्ति जैसे सदगुणों के साथ उनमें मिथ्या कुलाभिमान तथा एकताबद्ध होकर कार्य करने की क्षमता के अभाव के दुर्गुण भी थे। मुसलमानों के आक्रमण के समय राजपूत हिन्दू धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के रक्षक बनकर सामने आते रहे। &lt;br /&gt;
====जनश्रुतियाँ====&lt;br /&gt;
'''राजपूतों की उत्पत्ति के''' सम्बन्ध में किंचित विवाद है और यह इस कारण और भी जटिल हो गया है कि प्रारम्भ में राजन्य वर्ग और युद्धोपजीवी लोगों को क्षत्रिय कहा जाता था और राजपूत (राजपुत्र) शब्द का प्रयोग सातवीं शताब्दी के उपरान्त ही प्रचलित हुआ। जनश्रुतियों के अनुसार राजपूत उन सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी (सोमवंशी) क्षत्रियों के वंशज हैं, जिनकी यशोगाथा [[रामायण]] और [[महाभारत]] में वर्णित है। किन्तु अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुहिलोत या सिसोदिया शाखा, जिसमें मेवाड़ के स्वनामधन्य राणा हुए और जो अपने को रामचन्द्र जी का वंशज मानती हैं, वस्तुत: एक ब्राह्मण द्वारा प्रवर्तित हुई थी। इसी प्रकार गुर्जर-प्रतीहार शाखा भी, जो अपने को रामचन्द्र जी के लघु भ्राता [[लक्ष्मण]] का वंशज मानती है, कुछ अभिलेखों के अनुसार गुर्जरों से आरम्भ हुई थी, जिन्हें विदेशी माना जाता है और [[हूण|हूणों]] के साथ अथवा उनके कुछ ही बाद [[भारत]] में आकर [[गुजरात]] में बस गये थे। आभिलेखिक प्रमाणों से शकों और भारतीय राज्यवंशों में वैवाहिक सम्बन्ध सिद्ध होते हैं।&lt;br /&gt;
====विभिन्न नस्ल====&lt;br /&gt;
'''शकों के उपरान्त जितनी''' भी विदेशी जातियाँ पाँचवीं और छठी शताब्दियों में [[भारत]] आईं, उनकों हिन्दुओं ने नष्ट न करके शकों और कुषाणों की भाँति अपने में आत्मसात् कर लिया। तत्कालीन [[हिन्दू]] समाज में उनकी स्थिति उनके पेशे के अनुसार निर्धारित हुई और उनमें से शस्त्रोपजीवी तथा शासक वर्ग क्षत्रिय माना जाकर राजपूत कहलाने लगा। इसी प्रकार भारत की मूल निवासी जातियों में '''गोंड, भर, कौल''' आदि के कुछ परिवारों ने अपने बाहुबल से छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए। इनकी शक्ति और सत्ता में वृद्धि होने से तथा क्षत्रियोचित्त शासनकर्मी होने के फलस्वरूप इनकी भी गणना क्षत्रियों में होने लगी और वे भी राजपूत कहलाये। '''चंदेलों''' के गोंड राज परिवारों से, गहड़वालों के भरों से और राठौरों के गहड़वालों से घनिष्ठ वैवाहिक सम्बन्ध थे। सत्य यह है कि हिन्दू समाज में शताब्दियों तक जाति का निर्धारण जन्म और पेशे दोनों से होता रहा है। इस सिद्धान्त के अनुसार क्षत्रियों अथवा राजपूतों का वर्ग वस्तुत: देश का शस्त्रोपजीवी तथा शासक वर्ग था, जो हिन्दू धर्म और कर्मकाण्ड में आस्था रखता था। इसी कारण राजपूतों के अंतर्गत विभिन्न नस्लों के लोग मिलते हैं।&lt;br /&gt;
====मुग़लों की अधीनता====&lt;br /&gt;
{{highright}}जनश्रुतियों के अनुसार राजपूत उन सूर्यवंशी एवं चन्द्रवंशी (सोमवंशी) क्षत्रियों के वंशज हैं, जिनकी यशोगाथा [[रामायण]] और [[महाभारत]] में वर्णित है। किन्तु अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुहिलोत या सिसोदिया शाखा, जिसमें मेवाड़ के स्वनामधन्य राणा हुए और जो अपने को रामचन्द्र जी का वंशज मानती हैं, वस्तुत: एक ब्राह्मण द्वारा प्रवर्तित हुई थी।{{highclose}} &lt;br /&gt;
'''नौवीं और दसवीं शताब्दी में''' राजपूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे। 800 ई. से राजपूत वंशों का उत्तर [[भारत]] में प्रभुत्व था और बहुत से छोटे-छोटे राजपूत राज्य हिन्दू भारत पर मुस्लिम आधिपत्य के रास्तें में प्रमुख बाधा थे। पूर्वी [[पंजाब]] और [[गंगा]] घाटी में मुस्लिम विजय के बाद भी राजपूतों ने [[राजस्थान]] के दुर्गों और मध्य भारत के वन्य प्रदेशों में अपनी स्वतंत्रता क़ायम रखी। [[दिल्ली]] के सुल्तान [[अलाउद्दीन खिलजी]] (शासनकाल,1296-1316) ने पूर्वी राजस्थान में चित्तौड़गढ़ और [[रणथम्भौर]] के दो महान राजपूत दुर्गों को जीत लिया, लेकिन वह अपने नियंत्रण में नहीं रख सके। [[मेवाड़]] के राजपूत राज्य ने [[राणा सांगा]] के नेतृत्व में अपनी प्रभुत्ता बनाए रखने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें [[मुग़ल]] बादशाह [[बाबर]] ने खानवा (1527) में पराजित कर दिया। बाबर के पोते [[अकबर]] ने चित्तौड़गढ़ और रणथम्भौर के क़िले जीत लिए (1568-69) और मेवाड़ को छोड़कर सभी राजस्थानी राजकुमारों के साथ एक समझौता किया। मुग़ल साम्राज्य की प्रभुता स्वीकार कर, ये राजकुमार दरबार तथा बादशाह की विशेष परिषद में नियुक्त कर लिए गए और उन्हें प्रान्तीय शासकों के पद व सेना की कमानें सौंपी गईं। हालाँकि बादशाह [[औरंगज़ेब]] (शासनकाल, 1658-1707) की असहिष्णुता से इस व्यवस्था को नुक़सान पहुँचा, लेकिन इसके बावजूद 18वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य का पतन होने तक यह क़ायम रही। &lt;br /&gt;
====शक्ति का नष्ट होना====&lt;br /&gt;
'''राजपूतों ने मुसलमान आक्रमाणियों से''' शताब्दियों तक वीरतापूर्वक युद्ध किया। यद्यपि उनमें परस्पर एकता के अभाव के कारण [[भारत]] पर अन्तत: मुसलमानों का राज्य स्थापित हो गया, तथापि उनके तीव्र विरोध के फलस्वरूप इस कार्य में मुसलमानों को बहुत समय लगा। दीर्घकाल तक मुसलमानों का विरोध और उनसे युद्ध करते रहने के कारण राजपूत शिथिल हो गए और उनकी देशभक्ति, वीरता तथा आत्म-बलिदान की भावनाएँ कुंठित हो गईं। यही कारण है कि भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के विरुद्ध किसी भी महत्त्वपूर्ण राजपूत राज्य अथवा शासक ने कोई युद्ध नहीं किया। इसके विपरीत 1817 और 1820 ई. के बीच सभी राजपूत राजाओं ने स्वेच्छा से अंग्रेज़ों की सर्वोपरि सत्ता स्वीकार करके अपनी तथा अपने राज्य की सुरक्षा का भार उन पर छोड़ दिया। '''स्वतंत्रता (1947) के बाद राजस्थान के राजपूत राज्यों का भारतीय संघ के राजस्थान राज्य में विलय कर दिया गया'''।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>गुर्जर</title>
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		<updated>2011-01-27T14:16:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गुर्जर समाज, प्राचीन एवम् राज्य करने वाले समाज में से एक है।गुर्जर अभिलेखो के अनुसार ये सुर्यवन्श या रघुवन्श से सम्बन्ध रखते है।प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Some aspects of ancient Indian culture|author=Devadatta Ramakrishna Bhandarkar|publisher=Asian Educational Services|year=1989|id=ISBN 81-206-0457-1, ISBN 978-81-206-0457-5|url=http://books.google.co.in/books?id=gUAvuYu-otEC&amp;amp;pg=PA64&amp;amp;dq|page=64}}&amp;lt;/ref&amp;gt;७ वी से १० वी शताब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर  सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;राजस्थान मे आज भी गुर्जरो को सम्मान से ''मिहिर'' बोलते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।सन्स्क्रत के विद्वानो के अनुसार, ''गुर्जर'' शुद्ध सन्स्कर्त शब्द है, जिसका अर्थ ''शत्रु का नाश करने वाला अर्थाथ शत्रु विनाशक'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| last =Indirā Gāndhī Rāshṭrīya Mānava Saṅgrahālaya&lt;br /&gt;
| first =Kulbhushan Warikoo, Sujit Som&lt;br /&gt;
| title =Gujjars of Jammu and Kashmir&lt;br /&gt;
|url=http://books.google.com/?id=zxtuAAAAMAAJ&amp;amp;q=gurjar+in+ramayan&amp;amp;dq=gurjar+in+ramayan&amp;amp;cd=4&lt;br /&gt;
| publisher=Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya&lt;br /&gt;
| page =4&lt;br /&gt;
|quote=&amp;quot;Gurjar&amp;quot; is a sanskrit word which has been explained thus:&lt;br /&gt;
Gur+Ujjar;'Gur' means 'enemy' and 'ujjar' means 'destroyer'.The word means &amp;quot;Destroyer of the enemy&amp;quot;.&lt;br /&gt;
| date =2000*&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| author =India. Office of the Registrar General&lt;br /&gt;
| title =Census of India, Volume 20, Part 6, Issue 27&lt;br /&gt;
| url=http://books.google.com/?id=CsjUAAAAMAAJ&amp;amp;cd=4&amp;amp;dq=Gurjar+origin&amp;amp;q=gurjar#search_anchor&lt;br /&gt;
| publisher=Manager of Publications&lt;br /&gt;
|year=1961&lt;br /&gt;
| page =7&lt;br /&gt;
|quote=These people used to enjoy a title of 'Gorjan' (Leader of masses).In sanskrit the word Gurjar was used and now-a-days Gujjar is used in place of Gurjar which predicts the qualities of a warrior community.&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे ''दहाडता गुर्जर'' कह कर सम्बोदित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=481|quote=With the ''roaring [[Gujar]]'' an ephithet in the Kupadvanj Rashtrakutta grant of AD 910...}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुर्जर साम्राज्य ==&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे  गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
|work=Persian Texts in Translation&lt;br /&gt;
|publisher=The Packard Humanities Institute&lt;br /&gt;
|accessdate=2007-05-31&lt;br /&gt;
|archiveurl = http://web.archive.org/web/20070929130741/http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90 &amp;lt;!-- Bot retrieved archive --&amp;gt; |archivedate = 2007-09-29}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बन्गाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी।१२वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भुरि-भुरि प्रशन्शा की है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;अरब लेखको के अनुसार गुर्जर उन्के सबसे भयन्कर शत्रु थे तथा उन्होने ये भी कहा है की अगर गुर्जर नही होते तो वो भारत पे १२ वी शदी से पहले ही अधिकार कर लेते।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%B0&amp;diff=111970</id>
		<title>गुर्जर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%B0&amp;diff=111970"/>
		<updated>2011-01-27T14:11:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: 'गुर्जर समाज, प्राचीन एवम् राज्य करने वाले समाज में स...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;गुर्जर समाज, प्राचीन एवम् राज्य करने वाले समाज में से एक है।गुर्जर अभिलेखो के अनुसार ये सुर्यवन्श या रघुवन्श से सम्बन्ध रखते है।प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Some aspects of ancient Indian culture|author=Devadatta Ramakrishna Bhandarkar|publisher=Asian Educational Services|year=1989|id=ISBN 81-206-0457-1, ISBN 978-81-206-0457-5|url=http://books.google.co.in/books?id=gUAvuYu-otEC&amp;amp;pg=PA64&amp;amp;dq|page=64}}&amp;lt;/ref&amp;gt;७ वी से १० वी शताब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर  सुर्यदेव की कलाकर्तिया भी इनके सुर्यवन्शी होने की पुष्टि करती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book|title=Sun-worship in ancient India|author=Lālatā Prasāda Pāṇḍeya|publisher=Motilal Banarasidass|year=1971|page=245}}&amp;lt;/ref&amp;gt;राजस्थान मे आज भी गुर्जरो को सम्मान से ''मिहिर'' बोलते है, जिसका अर्थ ''सुर्य'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=	Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=479}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Śri Śaṅkara Bhagavatpādācārya's Saundaryalaharī|author=Chandrasekharendra Saraswati (Jagatguru Sankaracharya of Kamakoti)|coauthor=Śaṅkarācārya, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=2001|page=339}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे।कुछ जानकार इन्हे विदेशी भी बताते है क्योन्कि गुर्जरो का नाम एक अभिलेख मे श्वेत हूणों के साथ मिलता है, परन्तु गुर्जर तथा श्वेत हूणो के आपस मे सम्बन्ध का कोई एतिहासिक प्रमाण नही मिलता।उल्लखनिय है कि हूणो का वर्णन महाभारत के भिष्म-पर्व मे भी मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्स्क्रत के विद्वानो के अनुसार, ''गुर्जर'' शुद्द सन्स्कर्त शब्द है, जिसका अर्थ ''शत्रु का नाश करने वाला अर्थाथ शत्रु विनाशक'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| last =Indirā Gāndhī Rāshṭrīya Mānava Saṅgrahālaya&lt;br /&gt;
| first =Kulbhushan Warikoo, Sujit Som&lt;br /&gt;
| title =Gujjars of Jammu and Kashmir&lt;br /&gt;
|url=http://books.google.com/?id=zxtuAAAAMAAJ&amp;amp;q=gurjar+in+ramayan&amp;amp;dq=gurjar+in+ramayan&amp;amp;cd=4&lt;br /&gt;
| publisher=Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya&lt;br /&gt;
| page =4&lt;br /&gt;
|quote=&amp;quot;Gurjar&amp;quot; is a sanskrit word which has been explained thus:&lt;br /&gt;
Gur+Ujjar;'Gur' means 'enemy' and 'ujjar' means 'destroyer'.The word means &amp;quot;Destroyer of the enemy&amp;quot;.&lt;br /&gt;
| date =2000*&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite book&lt;br /&gt;
| author =India. Office of the Registrar General&lt;br /&gt;
| title =Census of India, Volume 20, Part 6, Issue 27&lt;br /&gt;
| url=http://books.google.com/?id=CsjUAAAAMAAJ&amp;amp;cd=4&amp;amp;dq=Gurjar+origin&amp;amp;q=gurjar#search_anchor&lt;br /&gt;
| publisher=Manager of Publications&lt;br /&gt;
|year=1961&lt;br /&gt;
| page =7&lt;br /&gt;
|quote=These people used to enjoy a title of 'Gorjan' (Leader of masses).In sanskrit the word Gurjar was used and now-a-days Gujjar is used in place of Gurjar which predicts the qualities of a warrior community.&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य मे ''दहाडता गुर्जर'' कह कर सम्बोदित किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Gazetteer of the Bombay Presidency, Volume 9, Part 1|author=Bombay (India : State)|publisher=Govt. Central Press|year=1901|page=481|quote=With the ''roaring [[Gujar]]'' an ephithet in the Kupadvanj Rashtrakutta grant of AD 910...}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ इतिहासकर कुषाणो को गुर्जर बताते है तथा कनिष्क के रबाटक शिलालेख पर अन्कित 'गुसुर' को गुर्जर का ही एक रूप बताते है।उनका मानना है कि गुशुर या गुर्जर लोग विजेता के रूप मे भारत मे आये क्योन्कि गुशुर का अर्थ ''उच्च कुलिन'' होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Bharatiya Samantvaad|author=Ramsharan Sharma|coauthor=Ramsharan Sharmaramsharan Sharma|publisher=Rajkamal Prakashan Pvt Ltd|id=ISBN	8171782825, ISBN 978-81-7178-282-6|url=http://books.google.co.in/books?id=HPa5TwBTd8oC&amp;amp;pg=PA94&amp;amp;dq}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गुर्जर साम्राज्य ==&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे भीनमाल गुर्जर सम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी।भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे  गुर्जर सम्राज्य का उल्लेख किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
|work=Persian Texts in Translation&lt;br /&gt;
|publisher=The Packard Humanities Institute&lt;br /&gt;
|accessdate=2007-05-31&lt;br /&gt;
|archiveurl = http://web.archive.org/web/20070929130741/http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90 &amp;lt;!-- Bot retrieved archive --&amp;gt; |archivedate = 2007-09-29}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी।मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बन्गाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी।१२वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए।अरब आक्रान्तो ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रसाशन की अपने अभिलेखो मे भुरि-भुरि प्रशन्शा की है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इतिहासकार बताते है कि मुगल काल से पहले तक लगभग पुरा राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भुमि के नाम से जाना जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;अरब लेखको के अनुसार गुर्जर उन्के सबसे भयन्कर शत्रु थे तथा उन्होने ये भी कहा है की अगर गुर्जर नही होते तो वो भारत पे १२ वी शदी से पहले ही अधिकार कर लेते।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India: a history|author=John Keay|publisher=Grove Press|year=2001|id=ISBN 0-8021-3797-0, ISBN 978-0-8021-3797-5|url=http://books.google.co.in/books?id=3aeQqmcXBhoC&amp;amp;pg=PA195&amp;amp;dq|page=95}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८ वी शदी म भी गुर्जरो के कुछ छोटे छोटे राज्य थे।दादरी के गुर्जर राजा, दरगाही सिन्ह के अधीन १३३ ग्राम थे।मेरठ का राजा गुर्जर नैन सिन्ह था तथा उसने परिक्शित गढ का पुन्रनिर्माण करवाया था। भारत गजीटेयर के अनुसार १८५७ की क्रान्ति मे, गुर्जर तथा मुसलमान् रजपुत, ब्रिटिश के बहुत बुरे दुश्मन साबित हुए।गुर्जरो का १८५७ की क्रान्ति मे भी अहम योगदान रहा है।कोटवाल धानसिन्ह गुर्जर १८५७ की क्रान्ति का शहीद था&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्त्रोत ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=आधार1&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111948</id>
		<title>पुष्कर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111948"/>
		<updated>2011-01-27T13:44:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;पुष्कर मेला — ऊँटों के व्यापार का बड़ा केन्द्र &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Ajmer.jpg|thumb|250px|पुष्कर, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Pushkar, Ajmer]]&lt;br /&gt;
[[राजस्थान]] के शहर [[अजमेर]] में कई [[अजमेर पर्यटन|पर्यटन स्थल]] है जिनमें से ये एक है। [[पद्म पुराण]] के अनुसार सृष्टि के आदि में पुष्कर तीर्थ स्थान में [[वज्रनाभ]] नामक एक राक्षस रहता था। वह बालकों को मार दिया करता था। उसी समय [[ब्रह्मा]] जी के मन में [[यज्ञ]] करने की इच्छा हुई। वे भगवान [[विष्णु]] की नाभि से निकले, और उस स्थान पर आए जहाँ पर वज्रनाभ रहता था। वहाँ अपने हाथ के कमल को फैंककर उन्होंने वज्रनाभ को मार डाला। ब्रह्मा जी के हाथ पर कमल गिरा था, वहाँ पर सरोवर बन गया, उसे ही पुष्कर सरोवर कहते हैं। ब्रह्मा इसी स्थल पर उतरे तथा यज्ञ का आयोजन हुआ, परन्तु यह सफल नहीं हो सका, क्योंकि उनकी पत्नी [[सावित्री देवी|सावित्री]] वहाँ पर उपस्थित नहीं थीं। [[नारद]] को सावित्री को बुलाने के लिए भेजा गया। सावित्री ने विधिपूर्वक आने की तैयारी की। सावित्री के आने में देर होने से ब्रह्मा को यह चिन्ता हुई कि यदि उनकी पूजा का शुभ क्षण निकल गया, तो फिर यह पूजा कहीं अन्यत्र न हो सकेगी। शुभ क्षण बीतने के भय से व्याकुल ब्रह्मा ने [[इन्द्र]] से आग्रह किया कि वे उनके लिए &amp;quot;कहीं से भी पत्नी&amp;quot; का प्रबन्ध करें। एक युवा [[गुर्जर]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; बाला [[गायत्री]] को यज्ञ में पूजा के लिए लाया गया। इसी बीच में सावित्री वहाँ पर पहुँच गईं, तो वह यह सब देखकर रुष्ट हो गईं कि ब्रह्मा जी के साथ पत्नी के रूप में एक अन्य स्त्री बैठी हुई है। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दे दिया कि पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा इस क्षेत्र को छोड़कर कहीं पर भी नहीं होगी। सावित्री फिर रत्नागिरी पर्वत पर चलीं गईं, जहाँ पर ब्रह्मा ने दूसरा यज्ञ किया। इसी पर्वत के शिखर पर सावित्री का एक मन्दिर भी है।आज भी पुष्कर मे पुजारी गुर्जर समुदाय से होते है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अजमेर]] से पुष्कर की दूरी लगभग नौ किलोमीटर है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को &amp;quot;तीर्थराज&amp;quot; कहा जाता है, उसी प्रकार से इस तीर्थ को &amp;quot;पुष्करराज&amp;quot; कहा जाता है। पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। पुष्कर सरोवर तीन हैं - &lt;br /&gt;
#ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर &lt;br /&gt;
#मध्य (बूढ़ा) पुष्कर &lt;br /&gt;
#कनिष्क पुष्कर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान [[विष्णु]] और कनिष्क पुष्कर के देवता [[रुद्र]] हैं। पुष्कर का मुख्य मन्दिर ब्रह्माजी का मन्दिर है। जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। मन्दिर में चतुर्मुख ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री एवं बायीं ओर गायत्री का मन्दिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियाँ हैं, तो एक छोटे से मन्दिर में नारद जी की मूर्ति। एक मन्दिर में हाथी पर बैठे [[कुबेर]] तथा नारद की मूर्तियाँ हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-1.jpg|thumb|250px|left|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
पुष्कर में [[सरस्वती नदी]] के स्नान का सर्वाधिक महत्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। पुष्कर स्नान कार्तिक पूर्णिमा को सर्वाधिक पुण्यप्रद माना जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष दो विशाल मेलों का आयोजन किया जाता हैं। &lt;br /&gt;
*कार्तिक शुक्ल [[एकादशी]] से [[पूर्णिमा]] तक यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*दूसरा मेला [[वैशाख]] शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक रहता है।&lt;br /&gt;
मेलों के रंग [[राजस्थान]] में देखते ही बनते हैं। ये मेले मरुस्थल के गाँवों के कठोर जीवन में एक नवीन उत्साह भर देते हैं। लोग रंग–बिरंगे परिधानों मे सज–धजकर जगह–जगह पर नृत्य गान आदि समारोहों में भाग लेते हैं। यहाँ पर काफ़ी मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है। लोग इस मेले को श्रद्धा, आस्था और विश्वास का प्रतीक मानते हैं। &lt;br /&gt;
पुष्कर मेला थार मरुस्थल का एक लोकप्रिय व [[रंग|रंगों]] से भरा मेला है। यह [[कार्तिक]] [[शुक्लपक्ष|शुक्ल]] एकादशी को प्रारम्भ हो कार्तिक पूर्णिमा तक पाँच दिन तक आयोजित किया जाता है। मेले का समय पूर्ण चन्द्रमा पक्ष, [[अक्टूबर]]–[[नवम्बर]] का होता है। पुष्कर झील भारतवर्ष में पवित्रतम स्थानों में से एक है। प्राचीनकाल से लोग यहाँ पर प्रतिवर्ष कार्तिक मास में एकत्रित हो भगवान ब्रह्मा की पूजा उपासना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुष्कर क्षेत्र के विशेष आकर्षण== &lt;br /&gt;
*पुष्कर झील [[राजस्थान]] के [[अजमेर]] नगर से ग्यारह किमी. उत्तर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*मान्यता के अनुसार इसका निर्माण भगवान ब्रह्मा ने करवाया था, तथा इसमें बावन स्नान घाट हैं। इन घाटों में वराह, ब्रह्म व गव घाट महत्त्वपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
*वराह घाट भगवान विष्णु ने [[वराह अवतार]] (जंगली सूअर) लिया था। &lt;br /&gt;
*पौराणिक [[सरस्वती नदी]] [[कुरुक्षेत्र]] के समीप लुप्त हो जाने के बाद यहाँ पुनः प्रवाहित होती है। ऐसी मान्यता है कि [[राम|श्रीराम]] ने यहाँ पर स्नान किया था। लघु पुष्कर के गव कुंड स्थान पर लोग अपेन दिवंगत पुरखों के लिए अनुष्ठान करते हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान ब्रह्मा का समर्पित पुष्कर में पाँच मन्दिर हैं — ब्रह्मा मन्दिर, सावित्री मन्दिर, बद्रीनारायण मन्दिर, वराह मन्दिर व शिवआत्मेश्वरी मन्दिर। &lt;br /&gt;
==देश का इकलौता ब्रह्मा मन्दिर== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Camel-Fair.jpg|thumb|250px|ऊँट मेला, पुष्कर&amp;lt;br /&amp;gt;Camel Fair, Pushkar]]&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मवैवर्त पुराण]] में उल्लिखित है कि अपने मानस पुत्र [[नारद]] द्वारा सृष्टिकर्म करने से इन्कार किए जाने पर ब्रह्मा ने उन्हें रोषपूर्वक शाप दे दिया कि—&amp;quot;तुमने मेरी आज्ञा की अवहेलना की है, अतः मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जाएगा और तुम गन्धर्व योनि को प्राप्त करके कामिनियों के वशीभूत हो जाओगे।&amp;quot; तब नारद ने भी दुःखी पिता ब्रह्मा को शाप दिया—&amp;quot;तात! आपने बिना किसी कारण के सोचे - विचारे मुझे शाप दिया है। अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि तीन कल्पों तक लोक में आपकी पूजा नहीं होगी और आपके मंत्र, श्लोक कवच आदि का लोप हो जाएगा।&amp;quot; तभी से ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होती है। मात्र पुष्कर क्षेत्र में ही वर्ष में एक बार उनकी पूजा–अर्चना होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूरे [[भारत]] में केवल एक यही ब्रह्मा का मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण [[ग्वालियर]] के महाजन गोकुल प्राक् ने [[अजमेर]] में करवाया था। ब्रह्मा मन्दिर की लाट [[लाल रंग]] की है तथा इसमें ब्रह्मा के वाहन [[हंस]] की आकृतियाँ हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा देवी गायत्री तथा सावित्री यहाँ मूर्तिरूप में विद्यमान हैं। हिन्दुओं के लिए पुष्कर एक पवित्र तीर्थ व महान पवित्र स्थल है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में इसकी देख–रेख की व्यवस्था सरकार ने सम्भाल रखी है। अतः तीर्थस्थल की स्वच्छता बनाए रखने में भी काफ़ी मदद मिली है। यात्रियों की आवास व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। हर तीर्थयात्री, जो यहाँ आता है, यहाँ की पवित्रता और सौंदर्य की मन में एक याद संजोए जाता है। &lt;br /&gt;
==पुष्कर का प्रसिद्ध ऊँट मेला==&lt;br /&gt;
पुष्कर मेले का एक रोचक अंग ऊँटों का क्रय–विक्रय है। निस्संदेह अन्य पशुओं का भी व्यापार किया जाता है, परन्तु ऊँटों का व्यापार ही यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है। मीलों दूर से ऊँट व्यापारी अपने पशुओं के साथ में पुष्कर आते हैं। पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार यहाँ पर होता है। यह सम्भवतः ऊँटों का संसार भर में सबसे बड़ा मेला होता है। इस दौरान लोग ऊँटों की सवारी कर ख़रीददारों का अपनी ओर लुभाते हैं।&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-2.jpg&lt;br /&gt;
|height =250&lt;br /&gt;
|alt =पुष्कर झील&lt;br /&gt;
|caption=	[[अजमेर]] की [[पुष्कर झील]] का विहंगम दृश्य &amp;lt;br /&amp;gt;Panoramic View Of Pushkar Lake, Ajmer &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:अजमेर के पर्यटन स्थल]][[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्व_और_त्योहार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111936</id>
		<title>पुष्कर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111936"/>
		<updated>2011-01-27T13:40:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;पुष्कर मेला — ऊँटों के व्यापार का बड़ा केन्द्र &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Ajmer.jpg|thumb|250px|पुष्कर, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Pushkar, Ajmer]]&lt;br /&gt;
[[राजस्थान]] के शहर [[अजमेर]] में कई [[अजमेर पर्यटन|पर्यटन स्थल]] है जिनमें से ये एक है। [[पद्म पुराण]] के अनुसार सृष्टि के आदि में पुष्कर तीर्थ स्थान में [[वज्रनाभ]] नामक एक राक्षस रहता था। वह बालकों को मार दिया करता था। उसी समय [[ब्रह्मा]] जी के मन में [[यज्ञ]] करने की इच्छा हुई। वे भगवान [[विष्णु]] की नाभि से निकले, और उस स्थान पर आए जहाँ पर वज्रनाभ रहता था। वहाँ अपने हाथ के कमल को फैंककर उन्होंने वज्रनाभ को मार डाला। ब्रह्मा जी के हाथ पर कमल गिरा था, वहाँ पर सरोवर बन गया, उसे ही पुष्कर सरोवर कहते हैं। ब्रह्मा इसी स्थल पर उतरे तथा यज्ञ का आयोजन हुआ, परन्तु यह सफल नहीं हो सका, क्योंकि उनकी पत्नी [[सावित्री देवी|सावित्री]] वहाँ पर उपस्थित नहीं थीं। [[नारद]] को सावित्री को बुलाने के लिए भेजा गया। सावित्री ने विधिपूर्वक आने की तैयारी की। सावित्री के आने में देर होने से ब्रह्मा को यह चिन्ता हुई कि यदि उनकी पूजा का शुभ क्षण निकल गया, तो फिर यह पूजा कहीं अन्यत्र न हो सकेगी। शुभ क्षण बीतने के भय से व्याकुल ब्रह्मा ने [[इन्द्र]] से आग्रह किया कि वे उनके लिए &amp;quot;कहीं से भी पत्नी&amp;quot; का प्रबन्ध करें। एक युवा [[गुर्जर]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; बाला [[गायत्री]] को यज्ञ में पूजा के लिए लाया गया। इसी बीच में सावित्री वहाँ पर पहुँच गईं, तो वह यह सब देखकर रुष्ट हो गईं कि ब्रह्मा जी के साथ पत्नी के रूप में एक अन्य स्त्री बैठी हुई है। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दे दिया कि पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा इस क्षेत्र को छोड़कर कहीं पर भी नहीं होगी। सावित्री फिर रत्नागिरी पर्वत पर चलीं गईं, जहाँ पर ब्रह्मा ने दूसरा यज्ञ किया। इसी पर्वत के शिखर पर सावित्री का एक मन्दिर भी है।आज भी पुष्कर मे पुजारी गुर्जर समुदाय से होते है।ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अजमेर]] से पुष्कर की दूरी लगभग नौ किलोमीटर है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को &amp;quot;तीर्थराज&amp;quot; कहा जाता है, उसी प्रकार से इस तीर्थ को &amp;quot;पुष्करराज&amp;quot; कहा जाता है। पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। पुष्कर सरोवर तीन हैं - &lt;br /&gt;
#ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर &lt;br /&gt;
#मध्य (बूढ़ा) पुष्कर &lt;br /&gt;
#कनिष्क पुष्कर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान [[विष्णु]] और कनिष्क पुष्कर के देवता [[रुद्र]] हैं। पुष्कर का मुख्य मन्दिर ब्रह्माजी का मन्दिर है। जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। मन्दिर में चतुर्मुख ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री एवं बायीं ओर गायत्री का मन्दिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियाँ हैं, तो एक छोटे से मन्दिर में नारद जी की मूर्ति। एक मन्दिर में हाथी पर बैठे [[कुबेर]] तथा नारद की मूर्तियाँ हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-1.jpg|thumb|250px|left|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
पुष्कर में [[सरस्वती नदी]] के स्नान का सर्वाधिक महत्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। पुष्कर स्नान कार्तिक पूर्णिमा को सर्वाधिक पुण्यप्रद माना जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष दो विशाल मेलों का आयोजन किया जाता हैं। &lt;br /&gt;
*कार्तिक शुक्ल [[एकादशी]] से [[पूर्णिमा]] तक यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*दूसरा मेला [[वैशाख]] शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक रहता है।&lt;br /&gt;
मेलों के रंग [[राजस्थान]] में देखते ही बनते हैं। ये मेले मरुस्थल के गाँवों के कठोर जीवन में एक नवीन उत्साह भर देते हैं। लोग रंग–बिरंगे परिधानों मे सज–धजकर जगह–जगह पर नृत्य गान आदि समारोहों में भाग लेते हैं। यहाँ पर काफ़ी मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है। लोग इस मेले को श्रद्धा, आस्था और विश्वास का प्रतीक मानते हैं। &lt;br /&gt;
पुष्कर मेला थार मरुस्थल का एक लोकप्रिय व [[रंग|रंगों]] से भरा मेला है। यह [[कार्तिक]] [[शुक्लपक्ष|शुक्ल]] एकादशी को प्रारम्भ हो कार्तिक पूर्णिमा तक पाँच दिन तक आयोजित किया जाता है। मेले का समय पूर्ण चन्द्रमा पक्ष, [[अक्टूबर]]–[[नवम्बर]] का होता है। पुष्कर झील भारतवर्ष में पवित्रतम स्थानों में से एक है। प्राचीनकाल से लोग यहाँ पर प्रतिवर्ष कार्तिक मास में एकत्रित हो भगवान ब्रह्मा की पूजा उपासना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुष्कर क्षेत्र के विशेष आकर्षण== &lt;br /&gt;
*पुष्कर झील [[राजस्थान]] के [[अजमेर]] नगर से ग्यारह किमी. उत्तर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*मान्यता के अनुसार इसका निर्माण भगवान ब्रह्मा ने करवाया था, तथा इसमें बावन स्नान घाट हैं। इन घाटों में वराह, ब्रह्म व गव घाट महत्त्वपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
*वराह घाट भगवान विष्णु ने [[वराह अवतार]] (जंगली सूअर) लिया था। &lt;br /&gt;
*पौराणिक [[सरस्वती नदी]] [[कुरुक्षेत्र]] के समीप लुप्त हो जाने के बाद यहाँ पुनः प्रवाहित होती है। ऐसी मान्यता है कि [[राम|श्रीराम]] ने यहाँ पर स्नान किया था। लघु पुष्कर के गव कुंड स्थान पर लोग अपेन दिवंगत पुरखों के लिए अनुष्ठान करते हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान ब्रह्मा का समर्पित पुष्कर में पाँच मन्दिर हैं — ब्रह्मा मन्दिर, सावित्री मन्दिर, बद्रीनारायण मन्दिर, वराह मन्दिर व शिवआत्मेश्वरी मन्दिर। &lt;br /&gt;
==देश का इकलौता ब्रह्मा मन्दिर== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Camel-Fair.jpg|thumb|250px|ऊँट मेला, पुष्कर&amp;lt;br /&amp;gt;Camel Fair, Pushkar]]&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मवैवर्त पुराण]] में उल्लिखित है कि अपने मानस पुत्र [[नारद]] द्वारा सृष्टिकर्म करने से इन्कार किए जाने पर ब्रह्मा ने उन्हें रोषपूर्वक शाप दे दिया कि—&amp;quot;तुमने मेरी आज्ञा की अवहेलना की है, अतः मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जाएगा और तुम गन्धर्व योनि को प्राप्त करके कामिनियों के वशीभूत हो जाओगे।&amp;quot; तब नारद ने भी दुःखी पिता ब्रह्मा को शाप दिया—&amp;quot;तात! आपने बिना किसी कारण के सोचे - विचारे मुझे शाप दिया है। अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि तीन कल्पों तक लोक में आपकी पूजा नहीं होगी और आपके मंत्र, श्लोक कवच आदि का लोप हो जाएगा।&amp;quot; तभी से ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होती है। मात्र पुष्कर क्षेत्र में ही वर्ष में एक बार उनकी पूजा–अर्चना होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूरे [[भारत]] में केवल एक यही ब्रह्मा का मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण [[ग्वालियर]] के महाजन गोकुल प्राक् ने [[अजमेर]] में करवाया था। ब्रह्मा मन्दिर की लाट [[लाल रंग]] की है तथा इसमें ब्रह्मा के वाहन [[हंस]] की आकृतियाँ हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा देवी गायत्री तथा सावित्री यहाँ मूर्तिरूप में विद्यमान हैं। हिन्दुओं के लिए पुष्कर एक पवित्र तीर्थ व महान पवित्र स्थल है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में इसकी देख–रेख की व्यवस्था सरकार ने सम्भाल रखी है। अतः तीर्थस्थल की स्वच्छता बनाए रखने में भी काफ़ी मदद मिली है। यात्रियों की आवास व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। हर तीर्थयात्री, जो यहाँ आता है, यहाँ की पवित्रता और सौंदर्य की मन में एक याद संजोए जाता है। &lt;br /&gt;
==पुष्कर का प्रसिद्ध ऊँट मेला==&lt;br /&gt;
पुष्कर मेले का एक रोचक अंग ऊँटों का क्रय–विक्रय है। निस्संदेह अन्य पशुओं का भी व्यापार किया जाता है, परन्तु ऊँटों का व्यापार ही यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है। मीलों दूर से ऊँट व्यापारी अपने पशुओं के साथ में पुष्कर आते हैं। पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार यहाँ पर होता है। यह सम्भवतः ऊँटों का संसार भर में सबसे बड़ा मेला होता है। इस दौरान लोग ऊँटों की सवारी कर ख़रीददारों का अपनी ओर लुभाते हैं।&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-2.jpg&lt;br /&gt;
|height =250&lt;br /&gt;
|alt =पुष्कर झील&lt;br /&gt;
|caption=	[[अजमेर]] की [[पुष्कर झील]] का विहंगम दृश्य &amp;lt;br /&amp;gt;Panoramic View Of Pushkar Lake, Ajmer &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:अजमेर के पर्यटन स्थल]][[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्व_और_त्योहार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111935</id>
		<title>पुष्कर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0&amp;diff=111935"/>
		<updated>2011-01-27T13:37:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: about maa gayatri&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;पुष्कर मेला — ऊँटों के व्यापार का बड़ा केन्द्र &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Ajmer.jpg|thumb|250px|पुष्कर, [[अजमेर]]&amp;lt;br /&amp;gt;Pushkar, Ajmer]]&lt;br /&gt;
[[राजस्थान]] के शहर [[अजमेर]] में कई [[अजमेर पर्यटन|पर्यटन स्थल]] है जिनमें से ये एक है। [[पद्म पुराण]] के अनुसार सृष्टि के आदि में पुष्कर तीर्थ स्थान में [[वज्रनाभ]] नामक एक राक्षस रहता था। वह बालकों को मार दिया करता था। उसी समय [[ब्रह्मा]] जी के मन में [[यज्ञ]] करने की इच्छा हुई। वे भगवान [[विष्णु]] की नाभि से निकले, और उस स्थान पर आए जहाँ पर वज्रनाभ रहता था। वहाँ अपने हाथ के कमल को फैंककर उन्होंने वज्रनाभ को मार डाला। ब्रह्मा जी के हाथ पर कमल गिरा था, वहाँ पर सरोवर बन गया, उसे ही पुष्कर सरोवर कहते हैं। ब्रह्मा इसी स्थल पर उतरे तथा यज्ञ का आयोजन हुआ, परन्तु यह सफल नहीं हो सका, क्योंकि उनकी पत्नी [[सावित्री देवी|सावित्री]] वहाँ पर उपस्थित नहीं थीं। [[नारद]] को सावित्री को बुलाने के लिए भेजा गया। सावित्री ने विधिपूर्वक आने की तैयारी की। सावित्री के आने में देर होने से ब्रह्मा को यह चिन्ता हुई कि यदि उनकी पूजा का शुभ क्षण निकल गया, तो फिर यह पूजा कहीं अन्यत्र न हो सकेगी। शुभ क्षण बीतने के भय से व्याकुल ब्रह्मा ने [[इन्द्र]] से आग्रह किया कि वे उनके लिए &amp;quot;कहीं से भी पत्नी&amp;quot; का प्रबन्ध करें। एक युवा [[गुर्जर]]&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; So Brahma married Gayatri to start the yajna in time.&amp;lt;ref name=&amp;quot;bansal&amp;quot;/&amp;gt; बाला [[गायत्री]] को यज्ञ में पूजा के लिए लाया गया। इसी बीच में सावित्री वहाँ पर पहुँच गईं, तो वह यह सब देखकर रुष्ट हो गईं कि ब्रह्मा जी के साथ पत्नी के रूप में एक अन्य स्त्री बैठी हुई है। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दे दिया कि पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा इस क्षेत्र को छोड़कर कहीं पर भी नहीं होगी। सावित्री फिर रत्नागिरी पर्वत पर चलीं गईं, जहाँ पर ब्रह्मा ने दूसरा यज्ञ किया। इसी पर्वत के शिखर पर सावित्री का एक मन्दिर भी है।आज भी पुष्कर मे पुजारी गुर्जर समुदाय से होते है।ref&amp;gt;{{cite web|title=पुष्करः स्था के सरोवर में डुब|author=|url=http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-131595.html}}&amp;lt;/ref&amp;gt; So Brahma married Gayatri to start the yajna in time.&amp;lt;ref name=&amp;quot;bansal&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अजमेर]] से पुष्कर की दूरी लगभग नौ किलोमीटर है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को &amp;quot;तीर्थराज&amp;quot; कहा जाता है, उसी प्रकार से इस तीर्थ को &amp;quot;पुष्करराज&amp;quot; कहा जाता है। पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। पुष्कर सरोवर तीन हैं - &lt;br /&gt;
#ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर &lt;br /&gt;
#मध्य (बूढ़ा) पुष्कर &lt;br /&gt;
#कनिष्क पुष्कर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान [[विष्णु]] और कनिष्क पुष्कर के देवता [[रुद्र]] हैं। पुष्कर का मुख्य मन्दिर ब्रह्माजी का मन्दिर है। जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। मन्दिर में चतुर्मुख ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री एवं बायीं ओर गायत्री का मन्दिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियाँ हैं, तो एक छोटे से मन्दिर में नारद जी की मूर्ति। एक मन्दिर में हाथी पर बैठे [[कुबेर]] तथा नारद की मूर्तियाँ हैं। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-1.jpg|thumb|250px|left|[[पुष्कर झील]]&amp;lt;br /&amp;gt; Pushkar Lake]]&lt;br /&gt;
पुष्कर में [[सरस्वती नदी]] के स्नान का सर्वाधिक महत्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। पुष्कर स्नान कार्तिक पूर्णिमा को सर्वाधिक पुण्यप्रद माना जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष दो विशाल मेलों का आयोजन किया जाता हैं। &lt;br /&gt;
*कार्तिक शुक्ल [[एकादशी]] से [[पूर्णिमा]] तक यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। &lt;br /&gt;
*दूसरा मेला [[वैशाख]] शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक रहता है।&lt;br /&gt;
मेलों के रंग [[राजस्थान]] में देखते ही बनते हैं। ये मेले मरुस्थल के गाँवों के कठोर जीवन में एक नवीन उत्साह भर देते हैं। लोग रंग–बिरंगे परिधानों मे सज–धजकर जगह–जगह पर नृत्य गान आदि समारोहों में भाग लेते हैं। यहाँ पर काफ़ी मात्रा में भीड़ देखने को मिलती है। लोग इस मेले को श्रद्धा, आस्था और विश्वास का प्रतीक मानते हैं। &lt;br /&gt;
पुष्कर मेला थार मरुस्थल का एक लोकप्रिय व [[रंग|रंगों]] से भरा मेला है। यह [[कार्तिक]] [[शुक्लपक्ष|शुक्ल]] एकादशी को प्रारम्भ हो कार्तिक पूर्णिमा तक पाँच दिन तक आयोजित किया जाता है। मेले का समय पूर्ण चन्द्रमा पक्ष, [[अक्टूबर]]–[[नवम्बर]] का होता है। पुष्कर झील भारतवर्ष में पवित्रतम स्थानों में से एक है। प्राचीनकाल से लोग यहाँ पर प्रतिवर्ष कार्तिक मास में एकत्रित हो भगवान ब्रह्मा की पूजा उपासना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुष्कर क्षेत्र के विशेष आकर्षण== &lt;br /&gt;
*पुष्कर झील [[राजस्थान]] के [[अजमेर]] नगर से ग्यारह किमी. उत्तर में स्थित है। &lt;br /&gt;
*मान्यता के अनुसार इसका निर्माण भगवान ब्रह्मा ने करवाया था, तथा इसमें बावन स्नान घाट हैं। इन घाटों में वराह, ब्रह्म व गव घाट महत्त्वपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
*वराह घाट भगवान विष्णु ने [[वराह अवतार]] (जंगली सूअर) लिया था। &lt;br /&gt;
*पौराणिक [[सरस्वती नदी]] [[कुरुक्षेत्र]] के समीप लुप्त हो जाने के बाद यहाँ पुनः प्रवाहित होती है। ऐसी मान्यता है कि [[राम|श्रीराम]] ने यहाँ पर स्नान किया था। लघु पुष्कर के गव कुंड स्थान पर लोग अपेन दिवंगत पुरखों के लिए अनुष्ठान करते हैं। &lt;br /&gt;
*भगवान ब्रह्मा का समर्पित पुष्कर में पाँच मन्दिर हैं — ब्रह्मा मन्दिर, सावित्री मन्दिर, बद्रीनारायण मन्दिर, वराह मन्दिर व शिवआत्मेश्वरी मन्दिर। &lt;br /&gt;
==देश का इकलौता ब्रह्मा मन्दिर== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pushkar-Camel-Fair.jpg|thumb|250px|ऊँट मेला, पुष्कर&amp;lt;br /&amp;gt;Camel Fair, Pushkar]]&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मवैवर्त पुराण]] में उल्लिखित है कि अपने मानस पुत्र [[नारद]] द्वारा सृष्टिकर्म करने से इन्कार किए जाने पर ब्रह्मा ने उन्हें रोषपूर्वक शाप दे दिया कि—&amp;quot;तुमने मेरी आज्ञा की अवहेलना की है, अतः मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जाएगा और तुम गन्धर्व योनि को प्राप्त करके कामिनियों के वशीभूत हो जाओगे।&amp;quot; तब नारद ने भी दुःखी पिता ब्रह्मा को शाप दिया—&amp;quot;तात! आपने बिना किसी कारण के सोचे - विचारे मुझे शाप दिया है। अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि तीन कल्पों तक लोक में आपकी पूजा नहीं होगी और आपके मंत्र, श्लोक कवच आदि का लोप हो जाएगा।&amp;quot; तभी से ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होती है। मात्र पुष्कर क्षेत्र में ही वर्ष में एक बार उनकी पूजा–अर्चना होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूरे [[भारत]] में केवल एक यही ब्रह्मा का मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण [[ग्वालियर]] के महाजन गोकुल प्राक् ने [[अजमेर]] में करवाया था। ब्रह्मा मन्दिर की लाट [[लाल रंग]] की है तथा इसमें ब्रह्मा के वाहन [[हंस]] की आकृतियाँ हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा देवी गायत्री तथा सावित्री यहाँ मूर्तिरूप में विद्यमान हैं। हिन्दुओं के लिए पुष्कर एक पवित्र तीर्थ व महान पवित्र स्थल है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान समय में इसकी देख–रेख की व्यवस्था सरकार ने सम्भाल रखी है। अतः तीर्थस्थल की स्वच्छता बनाए रखने में भी काफ़ी मदद मिली है। यात्रियों की आवास व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। हर तीर्थयात्री, जो यहाँ आता है, यहाँ की पवित्रता और सौंदर्य की मन में एक याद संजोए जाता है। &lt;br /&gt;
==पुष्कर का प्रसिद्ध ऊँट मेला==&lt;br /&gt;
पुष्कर मेले का एक रोचक अंग ऊँटों का क्रय–विक्रय है। निस्संदेह अन्य पशुओं का भी व्यापार किया जाता है, परन्तु ऊँटों का व्यापार ही यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है। मीलों दूर से ऊँट व्यापारी अपने पशुओं के साथ में पुष्कर आते हैं। पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार यहाँ पर होता है। यह सम्भवतः ऊँटों का संसार भर में सबसे बड़ा मेला होता है। इस दौरान लोग ऊँटों की सवारी कर ख़रीददारों का अपनी ओर लुभाते हैं।&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image =चित्र:Pushkar-Lake-Ajmer-2.jpg&lt;br /&gt;
|height =250&lt;br /&gt;
|alt =पुष्कर झील&lt;br /&gt;
|caption=	[[अजमेर]] की [[पुष्कर झील]] का विहंगम दृश्य &amp;lt;br /&amp;gt;Panoramic View Of Pushkar Lake, Ajmer &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
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|पूर्णता= &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:अजमेर के पर्यटन स्थल]][[Category:राजस्थान]][[Category:राजस्थान के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्व_और_त्योहार]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>माउंट आबू</title>
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		<updated>2011-01-27T13:13:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Mount-Abu-Rajasthan.jpg&lt;br /&gt;
|विवरण=माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है।&lt;br /&gt;
|राज्य=[[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=सिरोही ज़िला&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=यह शहर सड़क द्वारा [[उदयपुर]] से 185 किमी., [[डबौक]] से 210 किमी., [[जयपुर]] से 505 किमी., [[जैसलमेर]] से 620 किमी., [[दिल्ली]] से 760 किमी. और [[मुंबई]] से 765 किमी. दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|यातायात=बिना मीटर की टैक्सी, ऑटो रिक्शा, साईकिल रिक्शा &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=[[महाराणा प्रताप हवाई अड्डा]], [[डबौक]] में 210 किमी है।  &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=आबू रोड रेलवे स्टेशन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=माउंट आबू&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=&lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[माउंट आबू पर्यटन]]&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=राजस्थानी शिल्प का सामान, चांदी के आभूषण, संगमरमर पत्थर से बनी मूर्तियाँ &lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=02974&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?f=q&amp;amp;source=s_q&amp;amp;hl=en&amp;amp;geocode=&amp;amp;q=Mount+Abu,+Rajasthan&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=58.350507,114.169922&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;hq=&amp;amp;hnear=Mount+Abu,+Sirohi,+Rajasthan&amp;amp;ll=24.537129,72.737732&amp;amp;spn=1.84886,3.56781&amp;amp;z=9 गूगल मानचित्र], [http://maps.google.co.in/maps?f=d&amp;amp;source=s_d&amp;amp;saddr=24.593334,72.7034&amp;amp;daddr=SH+27+to:SH+27+to:Unknown+road&amp;amp;geocode=%3BFbCregEd7pNWBA%3BFXicewEdzpRXBA%3BFQy9dwEdvI9nBA&amp;amp;hl=en&amp;amp;mra=dme&amp;amp;mrcr=0&amp;amp;mrsp=0&amp;amp;sz=10&amp;amp;via=1,2&amp;amp;sll=24.605821,73.289795&amp;amp;sspn=0.923947,1.783905&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;ll=24.67697,73.267822&amp;amp;spn=1.846794,3.56781&amp;amp;z=9 महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, डबौक]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=फ़रवरी से जून और सितंबर से दिसंबर&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=कब जाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख सूची&lt;br /&gt;
|लेख का नाम=माउंट आबू&lt;br /&gt;
|पर्यटन=माउंट आबू पर्यटन&lt;br /&gt;
|ज़िला=माउंट आबू ज़िला&lt;br /&gt;
|प्रवास=माउंट आबू प्रवास&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
माउंट आबू को [[राजस्थान]] का स्‍वर्ग भी माना जाता है। समुद्र तल से 1220 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि की पहाड़ियों]] पर बसे माउंट आबू की भौगोलिक स्थित और वातावरण राजस्थान के अन्य शहरों से भिन्न व मनोरम है। यह स्थान राज्य के अन्य हिस्सों की तरह गर्म नहीं है। माउंट आबू [[हिन्दू]] और [[जैन]] धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ का ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक ख़ूबसूरती पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mount-Abu.jpg|thumb|left|अंग्रेज़ी शासन के प्रतिनिधि का मुख्यालय, माउंट आबू&amp;lt;br /&amp;gt;Headquarters of British Agent, Mount Abu ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
===गुर्जर तथा अर्बुदा-पर्वत===&lt;br /&gt;
अर्बुदा (माउन्ट आबू) क्षेत्र के आस पास मध्यकाल मे गुर्जरो का निवास रहा है। बहुत से शिलालेखो जैसे ''धनपाल की तिलकमन्जरी'', मे गुर्जरो तथा अर्बुदा पहाड का उल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Tilakamañjarī of Dhanapāla: a critical and cultural study|author=Sudarśana Śarmā|publisher=Parimal Publications|year=2002|page=214}}&amp;lt;/ref&amp;gt;६वी शदी के बाद इन गुर्जरो ने राजस्थान तथा गुजरात के विभिन्न भागो मे अपना राज्य स्थापित किया था।इस कारण ब्रिटिशकाल से पहले, गुजरात तथा राजस्थान को सम्मिलित रुप से गुर्जरदेश या गुर्जरत्रा (गुर्जर से रक्षित देश) कहा जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पुराण तथा अर्बुदा-पर्वत===&lt;br /&gt;
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दू धर्म के तैंतीस करोड़ देवी देवता इस पवित्र पर्वत पर भ्रमण करते हैं। यह भी कहा जाता है कि महान संत [[वशिष्ठ]] ने पृथ्वी से असुरों के विनाश के लिए यहाँ यज्ञ का आयोजन किया था। जैन धर्म के चौबीसवें र्तीथकर भगवान [[महावीर]] भी यहाँ आए थे। उसके बाद से माउंट आबू जैन अनुयायियों के लिए एक पवित्र और पूज्यनीय तीर्थस्थल बना गया।पुराणो मे इस क्षेत्र को ''अर्बुदारण्य'' कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अंग्रेज़-काल===&lt;br /&gt;
एसा कहा जाता है कि सिरोही के महाराजा ने  माउंट आबू को राजपूताना मुख्यालय के लिए अंग्रेज़ों को पट्टे पर दे दिया। ब्रिटिश शासन में माउंट आबू मैदानी इलाकों की गर्मियों से बचने के लिए अंग्रेज़ों का पसंदीदा स्थान रहा था। माउंट आबू शुरू से ही साधु संतों का निवास स्थान रहा है। &lt;br /&gt;
जैन वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण-स्वरूप दो प्रसिद्ध संगमरमर के बने मंदिर जो दिलवाड़ा या देवलवाड़ा मंदिर कहलाते हैं इस पर्वतीय नगर के जगत् प्रसिद्ध स्मारक हैं। विमलसाह के मंदिर को एक अभिलेख के अनुसार राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलसाह ने बनवाया था। इस मंदिर पर 18 करोडत्र रुपया व्यय हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक जीवन==&lt;br /&gt;
माउंट आबू के सांस्कृतिक जीवन की झलक त्योहारों और उत्सवों पर ही देखने को मिलती है। प्रतिवर्ष जून में होने वाले समर फेस्टीवल यानी ग्रीष्म महोत्सव में तो यहाँ जैसे पूरा राजस्थान ही सिमट आता है। रंग-बिरंगी परंपरागत वेशभूषा में आए लोक कलाकारों द्वारा लोक नृत्य और संगीत की रंगारंग झांकी प्रस्तुत की जाती है। घूमर, गैर और धाप जैसे लोक नृत्यों के साथ डांडिया नृत्य देख सैलानी झूम उठते हैं। तीन दिन चलने वाले इस महोत्सव के दौरान नक्की झील में बोट रेस का आयोजन भी किया जाता है। शामे कव्वाली और आतिशबाजी इस फेस्टिवल का ख़ास हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वायु मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
निकटतम हवाई अड्डा [[उदयपुर]] यहाँ से 185 किमी. दूर है। उदयपुर से माउंट आबू पहुंचने के लिए बस या टैक्सी की सेवाएं ली जा सकती हैं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;रेल मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
नज़दीकी रेलवे स्टेशन आबू रोड 28 किमी. की दूरी पर है जो [[अहमदाबाद]], [[दिल्ली]], [[जयपुर]] और [[जोधपुर]] से जुड़ा है। माउंट आबू की पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में [[भिन्नमाल]] स्थित है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सड़क मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
माउंट आबू देश के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है। दिल्ली के [[कश्मीरी गेट]] बस अड्डे से माउंट आबू के लिए सीधी बस सेवा है। राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम की बसें दिल्ली के अलावा अनेक शहरों से माउंट आबू के लिए अपनी सेवाएं मुहैया कराती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|माउंट आबू पर्यटन}}&lt;br /&gt;
माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। माउंट आबू को राजस्थान का स्‍वर्ग भी माना जाता है। माउंट आबू में अनेक पर्यटन स्थल हैं। माउंट आबू हिन्दू और जैन धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। माउंट आबू के ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक ख़ूबसूरती पर्यटको को अपनी ओर खींचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Nakki-Jheel-Mount-Abu-Rajasthan.jpg|[[नक्की झील माउंट आबू|नक्की झील]], माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Nakki Jheel, Mount-Abu&lt;br /&gt;
चित्र:Abu-Badd.jpg|आबू बाद, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Abu Badd, Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Mount-Abu-2.jpg|माउंट आबू से [[गुरु शिखर माउंट आबू|गुरु शिखर]] के लिए रास्ता &amp;lt;br /&amp;gt; Enroute to Guru Shikar, Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Rajasthan-Man.jpg|माउंट आबू में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Mount-Abu-1.jpg|माउंट आबू की वेधशाला &amp;lt;br /&amp;gt; Observatory at Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Abu-Badd-1.jpg |आबू बाद, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Abu Badd, Mount Abu &lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान_के_पर्यटन_स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:माउंट आबू]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन_कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%82%E0%A4%9F_%E0%A4%86%E0%A4%AC%E0%A5%82&amp;diff=111916</id>
		<title>माउंट आबू</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%82%E0%A4%9F_%E0%A4%86%E0%A4%AC%E0%A5%82&amp;diff=111916"/>
		<updated>2011-01-27T13:10:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: /* इतिहास */ add tilakmanjari etc&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Mount-Abu-Rajasthan.jpg&lt;br /&gt;
|विवरण=माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है।&lt;br /&gt;
|राज्य=[[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|ज़िला=सिरोही ज़िला&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=यह शहर सड़क द्वारा [[उदयपुर]] से 185 किमी., [[डबौक]] से 210 किमी., [[जयपुर]] से 505 किमी., [[जैसलमेर]] से 620 किमी., [[दिल्ली]] से 760 किमी. और [[मुंबई]] से 765 किमी. दूरी पर स्थित है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|यातायात=बिना मीटर की टैक्सी, ऑटो रिक्शा, साईकिल रिक्शा &lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=[[महाराणा प्रताप हवाई अड्डा]], [[डबौक]] में 210 किमी है।  &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=आबू रोड रेलवे स्टेशन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=माउंट आबू&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=&lt;br /&gt;
|क्या देखें=[[माउंट आबू पर्यटन]]&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=&lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=राजस्थानी शिल्प का सामान, चांदी के आभूषण, संगमरमर पत्थर से बनी मूर्तियाँ &lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=02974&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=लगभग सभी&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?f=q&amp;amp;source=s_q&amp;amp;hl=en&amp;amp;geocode=&amp;amp;q=Mount+Abu,+Rajasthan&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=58.350507,114.169922&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;hq=&amp;amp;hnear=Mount+Abu,+Sirohi,+Rajasthan&amp;amp;ll=24.537129,72.737732&amp;amp;spn=1.84886,3.56781&amp;amp;z=9 गूगल मानचित्र], [http://maps.google.co.in/maps?f=d&amp;amp;source=s_d&amp;amp;saddr=24.593334,72.7034&amp;amp;daddr=SH+27+to:SH+27+to:Unknown+road&amp;amp;geocode=%3BFbCregEd7pNWBA%3BFXicewEdzpRXBA%3BFQy9dwEdvI9nBA&amp;amp;hl=en&amp;amp;mra=dme&amp;amp;mrcr=0&amp;amp;mrsp=0&amp;amp;sz=10&amp;amp;via=1,2&amp;amp;sll=24.605821,73.289795&amp;amp;sspn=0.923947,1.783905&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;ll=24.67697,73.267822&amp;amp;spn=1.846794,3.56781&amp;amp;z=9 महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, डबौक]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=फ़रवरी से जून और सितंबर से दिसंबर&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=कब जाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख सूची&lt;br /&gt;
|लेख का नाम=माउंट आबू&lt;br /&gt;
|पर्यटन=माउंट आबू पर्यटन&lt;br /&gt;
|ज़िला=माउंट आबू ज़िला&lt;br /&gt;
|प्रवास=माउंट आबू प्रवास&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
माउंट आबू को [[राजस्थान]] का स्‍वर्ग भी माना जाता है। समुद्र तल से 1220 मीटर की ऊंचाई पर स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। [[नीलगिरि पहाड़ियाँ|नीलगिरि की पहाड़ियों]] पर बसे माउंट आबू की भौगोलिक स्थित और वातावरण राजस्थान के अन्य शहरों से भिन्न व मनोरम है। यह स्थान राज्य के अन्य हिस्सों की तरह गर्म नहीं है। माउंट आबू [[हिन्दू]] और [[जैन]] धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ का ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक ख़ूबसूरती पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mount-Abu.jpg|thumb|left|अंग्रेज़ी शासन के प्रतिनिधि का मुख्यालय, माउंट आबू&amp;lt;br /&amp;gt;Headquarters of British Agent, Mount Abu ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
===गुर्जर तथा अर्बुदा-पर्वत===&lt;br /&gt;
अर्बुदा (माउन्ट आबू) क्षेत्र के आस पास मध्यकाल मे गुर्जरो का निवास रहा है। बहुत से शिलालेखो जैसे ''धनपाल की तिलकमन्जरी'', मे गुर्जरो तथा अर्बुदा पहाड का उल्लेख मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=Tilakamañjarī of Dhanapāla: a critical and cultural study|author=Sudarśana Śarmā|publisher=Parimal Publications|year=2002|page=214}}&amp;lt;/ref&amp;gt;६वी शदी के बाद इन गुर्जरो ने राजस्थान तथा गुजरात के विभिन्न भागो मे अपना राज्य स्थापित किया था।इस कारण ब्रिटिशकाल से पहले, गुजरात तथा राजस्थान को सम्मिलित रुप से गुर्जरदेश या गुर्जरत्रा (गुर्जर से रक्षित देश) कहा जाता था।ref&amp;gt;{{cite book|title=The History and Culture of the Indian People: The classical age|author=Ramesh Chandra Majumdar|coauthor=Achut Dattatrya Pusalker, A. K. Majumdar, Dilip Kumar Ghose, Vishvanath Govind Dighe, Bharatiya Vidya Bhavan|publisher=Bharatiya Vidya Bhavan|year=1977|page=153}}&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पुराण तथा अर्बुदा-पर्वत===&lt;br /&gt;
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दू धर्म के तैंतीस करोड़ देवी देवता इस पवित्र पर्वत पर भ्रमण करते हैं। यह भी कहा जाता है कि महान संत [[वशिष्ठ]] ने पृथ्वी से असुरों के विनाश के लिए यहाँ यज्ञ का आयोजन किया था। जैन धर्म के चौबीसवें र्तीथकर भगवान [[महावीर]] भी यहाँ आए थे। उसके बाद से माउंट आबू जैन अनुयायियों के लिए एक पवित्र और पूज्यनीय तीर्थस्थल बना गया।पुराणो मे इस क्षेत्र को ''अर्बुदारण्य'' कहा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अंग्रेज़-काल===&lt;br /&gt;
एसा कहा जाता है कि सिरोही के महाराजा ने  माउंट आबू को राजपूताना मुख्यालय के लिए अंग्रेज़ों को पट्टे पर दे दिया। ब्रिटिश शासन में माउंट आबू मैदानी इलाकों की गर्मियों से बचने के लिए अंग्रेज़ों का पसंदीदा स्थान रहा था। माउंट आबू शुरू से ही साधु संतों का निवास स्थान रहा है। &lt;br /&gt;
जैन वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण-स्वरूप दो प्रसिद्ध संगमरमर के बने मंदिर जो दिलवाड़ा या देवलवाड़ा मंदिर कहलाते हैं इस पर्वतीय नगर के जगत् प्रसिद्ध स्मारक हैं। विमलसाह के मंदिर को एक अभिलेख के अनुसार राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री विमलसाह ने बनवाया था। इस मंदिर पर 18 करोडत्र रुपया व्यय हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सांस्कृतिक जीवन==&lt;br /&gt;
माउंट आबू के सांस्कृतिक जीवन की झलक त्योहारों और उत्सवों पर ही देखने को मिलती है। प्रतिवर्ष जून में होने वाले समर फेस्टीवल यानी ग्रीष्म महोत्सव में तो यहाँ जैसे पूरा राजस्थान ही सिमट आता है। रंग-बिरंगी परंपरागत वेशभूषा में आए लोक कलाकारों द्वारा लोक नृत्य और संगीत की रंगारंग झांकी प्रस्तुत की जाती है। घूमर, गैर और धाप जैसे लोक नृत्यों के साथ डांडिया नृत्य देख सैलानी झूम उठते हैं। तीन दिन चलने वाले इस महोत्सव के दौरान नक्की झील में बोट रेस का आयोजन भी किया जाता है। शामे कव्वाली और आतिशबाजी इस फेस्टिवल का ख़ास हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;
==यातायात और परिवहन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Camel-Cart-Mount-Abu.jpg|ऊँट गाड़ी, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Camel Cart, Mount Abu|thumb]]&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;वायु मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
निकटतम हवाई अड्डा [[उदयपुर]] यहाँ से 185 किमी. दूर है। उदयपुर से माउंट आबू पहुंचने के लिए बस या टैक्सी की सेवाएं ली जा सकती हैं।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;रेल मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
नज़दीकी रेलवे स्टेशन आबू रोड 28 किमी. की दूरी पर है जो [[अहमदाबाद]], [[दिल्ली]], [[जयपुर]] और [[जोधपुर]] से जुड़ा है। माउंट आबू की पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में [[भिन्नमाल]] स्थित है।&lt;br /&gt;
====&amp;lt;u&amp;gt;सड़क मार्ग&amp;lt;/u&amp;gt;====&lt;br /&gt;
माउंट आबू देश के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है। दिल्ली के [[कश्मीरी गेट]] बस अड्डे से माउंट आबू के लिए सीधी बस सेवा है। राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम की बसें दिल्ली के अलावा अनेक शहरों से माउंट आबू के लिए अपनी सेवाएं मुहैया कराती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|माउंट आबू पर्यटन}}&lt;br /&gt;
माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। माउंट आबू को राजस्थान का स्‍वर्ग भी माना जाता है। माउंट आबू में अनेक पर्यटन स्थल हैं। माउंट आबू हिन्दू और जैन धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। माउंट आबू के ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक ख़ूबसूरती पर्यटको को अपनी ओर खींचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
{{Panorama&lt;br /&gt;
|image= चित्र:Mount-Abu-Panorama-1.jpg&lt;br /&gt;
|height= 200&lt;br /&gt;
|alt= माउंट आबू&lt;br /&gt;
|caption= हिमालयन पीक से माउंट आबू का विहंगम दृश्य  &amp;lt;br /&amp;gt; Panoramic View of Mount Abu from the Himalayan Peak.&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery perrow=&amp;quot;3&amp;quot; widths=&amp;quot;200&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Nakki-Jheel-Mount-Abu-Rajasthan.jpg|[[नक्की झील माउंट आबू|नक्की झील]], माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Nakki Jheel, Mount-Abu&lt;br /&gt;
चित्र:Abu-Badd.jpg|आबू बाद, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Abu Badd, Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Mount-Abu-2.jpg|माउंट आबू से [[गुरु शिखर माउंट आबू|गुरु शिखर]] के लिए रास्ता &amp;lt;br /&amp;gt; Enroute to Guru Shikar, Mount Abu &lt;br /&gt;
चित्र:Rajasthan-Man.jpg|माउंट आबू में राजस्थानी ग्रामीण &amp;lt;br /&amp;gt; A Rajasthani at Mount Abu &lt;br /&gt;
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चित्र:Abu-Badd-1.jpg |आबू बाद, माउंट आबू &amp;lt;br /&amp;gt; Abu Badd, Mount Abu &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>भिन्नमाल</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: /* राजधानी भिन्नमाल */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भिलमाल / श्रीमाल'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[माउंट आबू|आबू]] पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|युवानच्वांग]] ने भिन्नमाल को सम्भवतः पिलोमोलो नाम से अभिहित किया है और इस नगर को गुर्जर देश की राजधानी बताया है।भिन्नमाल गुर्जरो के साम्राज्य की प्रथम राजधानी थी। भिन्नमाल का एक अन्य नाम [[श्रीमाल]] भी प्रचलित है। 12वीं-13वीं शती में रचित [[प्रभावकचरित]] नामक ग्रंथ में [[प्रभाचंद्र]] ने [[श्रीमाल]] को गुर्जर देश का प्रमुख नगर कहा है- '''अस्ति-गुर्जरदेशोऽन्यसज्जराजन्यदुर्जरः तत्र श्रीमालमित्यस्ति पुरं मुखमिव क्षितेः''' इस ग्रंथ में यहाँ के तत्कालीन राजा [[श्रीवर्मन]] का उल्लेख है। &lt;br /&gt;
==राजधानी भिन्नमाल==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे गुर्जरो ने भीनमाल को अपने सम्राज्य की राजधानी बनाया था।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Vincent A. Smith&amp;quot;&amp;gt;The Gurjaras of Rajputana and Kanauj, Vincent A. Smith, The Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, (Jan., 1909), pp. 53-75 &amp;lt;/ref&amp;gt;भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे गुर्जरो के सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे ''kiu-che-lo'' बोलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
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| last =Campbell&lt;br /&gt;
| first =James MacNabb&lt;br /&gt;
| coauthors=Reginald Edward Enthoven&lt;br /&gt;
| title =Gazetteer of the Bombay Presidency&lt;br /&gt;
| year =1901&lt;br /&gt;
| publisher=Govt. Central Press&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;/ref&amp;gt;ये [[गुर्जर]] स्वयं को विशुद्ध [[क्षत्रिय]] और [[राम|श्रीराम]] के प्रतिहार [[लक्ष्मण]] का वंशज मानते थे। भिन्नमाल और [[कन्नौज]] के गुर्जर-प्रतिहार राजा बहुत प्रतापी और यशस्वी हुए हैं। भिन्नमाल के राजाओं में [[वत्सराज]] (775-800 ई0) पहला प्रतापी राजा था। इसने [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] तक अपनी विजय पताका फहराई और वहाँ के [[पाल वंश|पालवंशीय राजा धर्मपाल]] को युद्ध में पराजित किया। [[मालवा]] पर भी इसका शासन स्थापित हो गया था। वत्सराज को [[राष्ट्रकूट वंश|राष्ट्रकूट]] नरेश राजध्रुव से पराजित होना पड़ा, अतः उसका [[महाराष्ट्र]]-विजय का स्वप्न साकार न हो सका। वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को [[मुंगेर]] की लड़ाई में हराया और उसके द्वारा नियुक्त कन्नौज के शासक [[चक्रायुध]] से कन्नौज को छीन लिया। उसके प्रभुत्व का विस्तार [[काठियावाड़]] से बंगाल तक और कन्नौज से [[आन्ध्र प्रदेश]] तक स्थापित था। उसने [[सिंध प्रांत|सिंध]] के अरबों को भी पश्चिमी [[भारत]] में अग्रसर होने से रोका। किन्तु अपने पिता की भाँति नागभट्ट को भी राष्ट्रकूट नरेश से हार माननी पड़ी। इस समय राष्ट्रकूट का शासक [[गोविन्द तृतीय]] था। [[नागभट्ट]] के पौत्र [[मिहिरभोज]] (836-890 ई.) ने उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों के समाप्त होते हुए प्रभुत्व को सम्भाला। इसने अपने विस्तृत राज्य का भली-भाँति शासन प्रबन्ध करने के लिए, अपनी राजधानी भिन्नमाल से हटाकर कन्नौज में स्थापित की। इस प्रकार भिन्नमाल को लगभग 100 वर्षों तक प्रतापी गुर्जर-प्रतिहारों की राजधानी बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भिन्नमाल में इनके शासनकाल के अनेक ऐतिहासिक अवशेष स्थित हैं। अनुमान है कि इनका समय 7वीं शती का उत्तरार्घ और 8वीं शती का पूर्वार्ध था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाकवि माघ==&lt;br /&gt;
[[शिशुपाल]] वध की कई प्राचीन हस्तलिपियों में [[महाकवि माघ]] का भिन्नमाल या भिन्नमालव से सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''इति श्री भिन्नमालववास्तव्यदत्तकसूनोर्महावैयाकरणस्य माघस्य कृतो शिशुपालवधे महाकाव्ये'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
माघ के पितामह [[सुप्रभदेव]] श्रीमालनरेश वर्मलात या वर्मल के [[महामात्य]] थे। ऐतिहासिक किंवदन्तियों से भी यही सूचित होता है कि संस्कृत के महाकवि माघ भिन्नमाल के ही निवासी थे। भिन्नमाल का रूपान्तर [[भिलमाल]] भी प्रचलित है।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
* ऐतिहासिक स्थानावली से पेज संख्या 667-668 | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 &lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:राजस्थान के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
	</entry>
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		<title>भिन्नमाल</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: add about ancient gurjars and bhinmal as their earliest capital&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भिलमाल / श्रीमाल'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[माउंट आबू|आबू]] पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|युवानच्वांग]] ने भिन्नमाल को सम्भवतः पिलोमोलो नाम से अभिहित किया है और इस नगर को गुर्जर देश की राजधानी बताया है।भिन्नमाल गुर्जरो के साम्राज्य की प्रथम राजधानी थी। भिन्नमाल का एक अन्य नाम [[श्रीमाल]] भी प्रचलित है। 12वीं-13वीं शती में रचित [[प्रभावकचरित]] नामक ग्रंथ में [[प्रभाचंद्र]] ने [[श्रीमाल]] को गुर्जर देश का प्रमुख नगर कहा है- '''अस्ति-गुर्जरदेशोऽन्यसज्जराजन्यदुर्जरः तत्र श्रीमालमित्यस्ति पुरं मुखमिव क्षितेः''' इस ग्रंथ में यहाँ के तत्कालीन राजा [[श्रीवर्मन]] का उल्लेख है। &lt;br /&gt;
==राजधानी भिन्नमाल==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
इतिहास के अनुसार ५वी शदी मे गुर्जरो ने भीनमाल को अपने सम्राज्य की राजधानी बनाया था।भरुच का सम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था|चीनी यात्री ह्वेन्सान्ग अपने लेखो मे गुर्जरो के सम्राज्य का उल्लेख करता है तथा इसे ''kiu-che-lo'' बोलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web&lt;br /&gt;
|url=http://persian.packhum.org/persian/index.jsp?serv=pf&amp;amp;file=80201011&amp;amp;ct=90&lt;br /&gt;
|title=Juzr or Jurz.&lt;br /&gt;
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| last =Campbell&lt;br /&gt;
| first =James MacNabb&lt;br /&gt;
| coauthors=Reginald Edward Enthoven&lt;br /&gt;
| title =Gazetteer of the Bombay Presidency&lt;br /&gt;
| year =1901&lt;br /&gt;
| publisher=Govt. Central Press&lt;br /&gt;
| isbn =8120606515&lt;br /&gt;
| pages =2&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;/ref&amp;gt;ये [[गुर्जर]] स्वयं को विशुद्ध [[क्षत्रिय]] और [[राम|श्रीराम]] के प्रतिहार [[लक्ष्मण]] का वंशज मानते थे। भिन्नमाल और [[कन्नौज]] के गुर्जर-प्रतिहार राजा बहुत प्रतापी और यशस्वी हुए हैं। भिन्नमाल के राजाओं में [[वत्सराज]] (775-800 ई0) पहला प्रतापी राजा था। इसने [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] तक अपनी विजय पताका फहराई और वहाँ के [[पाल वंश|पालवंशीय राजा धर्मपाल]] को युद्ध में पराजित किया। [[मालवा]] पर भी इसका शासन स्थापित हो गया था। वत्सराज को [[राष्ट्रकूट वंश|राष्ट्रकूट]] नरेश राजध्रुव से पराजित होना पड़ा, अतः उसका [[महाराष्ट्र]]-विजय का स्वप्न साकार न हो सका। वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को [[मुंगेर]] की लड़ाई में हराया और उसके द्वारा नियुक्त कन्नौज के शासक [[चक्रायुध]] से कन्नौज को छीन लिया। उसके प्रभुत्व का विस्तार [[काठियावाड़]] से बंगाल तक और कन्नौज से [[आन्ध्र प्रदेश]] तक स्थापित था। उसने [[सिंध प्रांत|सिंध]] के अरबों को भी पश्चिमी [[भारत]] में अग्रसर होने से रोका। किन्तु अपने पिता की भाँति नागभट्ट को भी राष्ट्रकूट नरेश से हार माननी पड़ी। इस समय राष्ट्रकूट का शासक [[गोविन्द तृतीय]] था। [[नागभट्ट]] के पौत्र [[मिहिरभोज]] (836-890 ई.) ने उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों के समाप्त होते हुए प्रभुत्व को सम्भाला। इसने अपने विस्तृत राज्य का भली-भाँति शासन प्रबन्ध करने के लिए, अपनी राजधानी भिन्नमाल से हटाकर कन्नौज में स्थापित की। इस प्रकार भिन्नमाल को लगभग 100 वर्षों तक प्रतापी गुर्जर-प्रतिहारों की राजधानी बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भिन्नमाल में इनके शासनकाल के अनेक ऐतिहासिक अवशेष स्थित हैं। अनुमान है कि इनका समय 7वीं शती का उत्तरार्घ और 8वीं शती का पूर्वार्ध था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाकवि माघ==&lt;br /&gt;
[[शिशुपाल]] वध की कई प्राचीन हस्तलिपियों में [[महाकवि माघ]] का भिन्नमाल या भिन्नमालव से सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''इति श्री भिन्नमालववास्तव्यदत्तकसूनोर्महावैयाकरणस्य माघस्य कृतो शिशुपालवधे महाकाव्ये'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
माघ के पितामह [[सुप्रभदेव]] श्रीमालनरेश वर्मलात या वर्मल के [[महामात्य]] थे। ऐतिहासिक किंवदन्तियों से भी यही सूचित होता है कि संस्कृत के महाकवि माघ भिन्नमाल के ही निवासी थे। भिन्नमाल का रूपान्तर [[भिलमाल]] भी प्रचलित है।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;br /&gt;
* ऐतिहासिक स्थानावली से पेज संख्या 667-668 | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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|आधार=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:राजस्थान के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bhinmal</name></author>
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		<title>भिन्नमाल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=111730"/>
		<updated>2011-01-27T09:19:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Bhinmal: it's Gurjar, not other way around&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भिलमाल / श्रीमाल'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[माउंट आबू|आबू]] पहाड़ से 50 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|युवानच्वांग]] ने भिन्नमाल को सम्भवतः पिलोमोलो नाम से अभिहित किया है और इस नगर को गुर्जर देश की राजधानी बताया है। भिन्नमाल का एक अन्य नाम [[श्रीमाल]] भी प्रचलित है। 12वीं-13वीं शती में रचित [[प्रभावकचरित]] नामक ग्रंथ में [[प्रभाचंद्र]] ने [[श्रीमाल]] को गुर्जर देश का प्रमुख नगर कहा है- '''अस्ति-गुर्जरदेशोऽन्यसज्जराजन्यदुर्जरः तत्र श्रीमालमित्यस्ति पुरं मुखमिव क्षितेः''' इस ग्रंथ में यहाँ के तत्कालीन राजा [[श्रीवर्मन]] का उल्लेख है। सातवीं शती ई. में [[गुर्जर प्रतिहार वंश|गुर्जर-प्रतिहार]] की शक्ति का विकास दक्षिणी मारवाड़ में प्रारम्भ हुआ था। &lt;br /&gt;
==राजधानी भिन्नमाल==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
राजाओं ने अपनी राजधानी भिन्नमाल में बनाई। ये [[गुर्जर]] स्वयं को विशुद्ध [[क्षत्रिय]] और [[राम|श्रीराम]] के प्रतिहार [[लक्ष्मण]] का वंशज मानते थे। भिन्नमाल और [[कन्नौज]] के गुर्जर-प्रतिहार राजा बहुत प्रतापी और यशस्वी हुए हैं। भिन्नमाल के राजाओं में [[वत्सराज]] (775-800 ई0) पहला प्रतापी राजा था। इसने [[पश्चिम बंगाल|बंगाल]] तक अपनी विजय पताका फहराई और वहाँ के [[पाल वंश|पालवंशीय राजा धर्मपाल]] को युद्ध में पराजित किया। [[मालवा]] पर भी इसका शासन स्थापित हो गया था। वत्सराज को [[राष्ट्रकूट वंश|राष्ट्रकूट]] नरेश राजध्रुव से पराजित होना पड़ा, अतः उसका [[महाराष्ट्र]]-विजय का स्वप्न साकार न हो सका। वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को [[मुंगेर]] की लड़ाई में हराया और उसके द्वारा नियुक्त कन्नौज के शासक [[चक्रायुध]] से कन्नौज को छीन लिया। उसके प्रभुत्व का विस्तार [[काठियावाड़]] से बंगाल तक और कन्नौज से [[आन्ध्र प्रदेश]] तक स्थापित था। उसने [[सिंध प्रांत|सिंध]] के अरबों को भी पश्चिमी [[भारत]] में अग्रसर होने से रोका। किन्तु अपने पिता की भाँति नागभट्ट को भी राष्ट्रकूट नरेश से हार माननी पड़ी। इस समय राष्ट्रकूट का शासक [[गोविन्द तृतीय]] था। [[नागभट्ट]] के पौत्र [[मिहिरभोज]] (836-890 ई.) ने उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों के समाप्त होते हुए प्रभुत्व को सम्भाला। इसने अपने विस्तृत राज्य का भली-भाँति शासन प्रबन्ध करने के लिए, अपनी राजधानी भिन्नमाल से हटाकर कन्नौज में स्थापित की। इस प्रकार भिन्नमाल को लगभग 100 वर्षों तक प्रतापी गुर्जर-प्रतिहारों की राजधानी बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भिन्नमाल में इनके शासनकाल के अनेक ऐतिहासिक अवशेष स्थित हैं। अनुमान है कि इनका समय 7वीं शती का उत्तरार्घ और 8वीं शती का पूर्वार्ध था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाकवि माघ==&lt;br /&gt;
[[शिशुपाल]] वध की कई प्राचीन हस्तलिपियों में [[महाकवि माघ]] का भिन्नमाल या भिन्नमालव से सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''इति श्री भिन्नमालववास्तव्यदत्तकसूनोर्महावैयाकरणस्य माघस्य कृतो शिशुपालवधे महाकाव्ये'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
माघ के पितामह [[सुप्रभदेव]] श्रीमालनरेश वर्मलात या वर्मल के [[महामात्य]] थे। ऐतिहासिक किंवदन्तियों से भी यही सूचित होता है कि संस्कृत के महाकवि माघ भिन्नमाल के ही निवासी थे। भिन्नमाल का रूपान्तर [[भिलमाल]] भी प्रचलित है।&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
* ऐतिहासिक स्थानावली से पेज संख्या 667-668 | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 &lt;br /&gt;
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|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{राजस्थान के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजस्थान के धार्मिक स्थल]]&lt;br /&gt;
[[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bhinmal</name></author>
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