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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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	<subtitle>सदस्य द्वारा योगदान</subtitle>
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		<title>कौरव</title>
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		<updated>2010-04-29T12:07:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कौरव / Kaurav'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म-कथा==&lt;br /&gt;
*[[युधिष्ठर]] के जन्म होने पर [[धृतराष्ट्र]] की पत्नी [[गान्धारी]] के हृदय में भी पुत्रवती होने की लालसा जागी। &lt;br /&gt;
*गान्धारी ने [[वेदव्यास]] जी से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। &lt;br /&gt;
*गर्भ धारण के पश्चात दो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी जब पुत्र का जन्म नही हुआ तो क्षोभवश गान्धारी ने अपने पेट में मुक्का मार कर अपना गर्भ गिरा दिया। योगबल से वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल जान लिया। वे गान्धारी के पास आकर बोले, ,गान्धारी तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र सौ कुण्ड तैयार कर के उनमें घृत भरवा दो।' गान्धारी ने उनकी आज्ञानुसार सौ कुण्ड बनवा दिये। &lt;br /&gt;
*वेदव्यास ने गान्धारी के गर्भ से निकले मांसपिण्ड पर अभिमन्त्रित जल छिड़का जिसे उस पिण्ड के अँगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गये। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गान्धारी के बनवाये सौ कुण्डों में रखवा दिया और उन कुण्डों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश दे अपने आश्रम चले गये। &lt;br /&gt;
*दो वर्ष बाद सबसे पहले कुण्ड से [[दुर्योधन]] की उत्पत्ति हुई। &lt;br /&gt;
*दुर्योधन के जन्म के दिन ही [[कुन्ती]] के पुत्र [[भीम]] का भी जन्म हुआ। दुर्योधन जन्म लेते ही गधे की तरह रेंकने लगा। ज्योतिषियों से इसका लक्षण पूछे जाने पर उन लोगों ने [[धृतराष्ट्र]] को बताया,'राजन! आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसे त्याग देना ही उचित है। किन्तु पुत्र मोह के कारण धृतराष्ट्र उसका त्याग नहीं कर सके। &lt;br /&gt;
*फिर उन कुण्डों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं [[दु:शला]] नामक एक कन्या का जन्म हुआ। &lt;br /&gt;
*गान्धारी गर्भ के समय धृतराष्ट्र की सेवा में असमर्थ हो गयी थी अतएव उनकी सेवा के लिये एक दासी रखी गई। धृतराष्ट्र के सहवास से उस दासी का भी [[युयुत्स]] नामक एक पुत्र हुआ। युवा होने पर सभी राजकुमारों का विवाह यथा योग्य कन्याओं से कर दिया गया। &lt;br /&gt;
*दु:शला का विवाह [[जयद्रथ]] के साथ हुआ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
{{महाभारत}}&lt;br /&gt;
{{महाभारत2}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>सुदास</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुदास'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अश्विनी कुमारों ने अपने रथ में भरकर सुदास नामक राजा के पास धन तथा अन्न पहुँचाया था। सुदास के लिए [[इन्द्र]] ने शत्रुओं को कुशा के समान काट डाला।&amp;lt;ref&amp;gt;[[ॠग्वेद]] 1।46।6, ॠग्वेद 1।63।6, [[ऐतरेय ब्राह्मण]], 1।2।1, 5।2।4&amp;lt;/ref&amp;gt; क्षत्रिय यजमान को यज्ञ के अवसर पर क्या भक्षण करना चाहिए, इसका ज्ञान वसिष्ठ ने सुदास को दिया था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;ऐतरेय ब्राह्मण, 8।21।&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; इन्द्र-सम्बन्धी महाभिषेक द्वारा वसिष्ठ ने पिजवन पुत्र सुदास का अभिषेक किया। इससे सुदास महाबली वन समुद्र पर्यंत [[पृथ्वी]] को जीतता हुआ परिभ्रमण करने लगा और उसने [[अश्वमेध यज्ञ]] किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;दे॰ युक्ताश्व, ऐतरेय ब्राह्मण, 7।34&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:वैदिक साहित्य]][[Category:पौराणिक_कोश]]&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>सुषेण</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुषेण / Sushen'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुषेण नाम दो व्यक्तियों के लिए पाया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सुषेण कर्ण का बेटा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सुषेण [[कर्ण]] का बेटा था, जिसका वध उत्तमौजा के हाथों हुआ। उत्तमौजा ने उसका मस्तक काट डाला था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत, कर्णपर्व, 75।13&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''सुषेण वैद्य'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वानर-सेना में सुषेण एक वैद्य था। उसने [[मेघनाद]] वध के संदर्भ में घायल [[लक्ष्मण]] की चिकित्सा की थी।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, 92।15-26&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>सुषेण</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुषेण / Sushen'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुषेण नाम दो व्यक्तियों के लिए पाया जाता है।&lt;br /&gt;
'''सुषेण कर्ण का बेटा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*सुषेण [[कर्ण]] का बेटा था, जिसका वध उत्तमौजा के हाथों हुआ। उत्तमौजा ने उसका मस्तक काट डाला था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत, कर्णपर्व, 75।13&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''सुषेण वैद्य'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वानर-सेना में सुषेण एक वैद्य था। उसने [[मेघनाद]] वध के संदर्भ में घायल [[लक्ष्मण]] की चिकित्सा की थी।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, 92।15-26&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कथा साहित्य]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>सुमित्रा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुमित्रा / Sumitra'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाराज [[दशरथ]] की कई रानियाँ थीं। महारानी [[कौशल्या]] पट्टमहिषी थीं। महारानी [[कैकेयी]] महाराज को सर्वाधिक प्रिय थीं और शेष में श्री सुमित्रा जी ही प्रधान थीं। महाराज दशरथ प्राय: कैकेयी के महल में ही रहा करते थे। सुमित्रा जी महारानी कौसल्या के सन्निकट रहना तथा उनकी सेवा करना अपना धर्म समझती थीं। पुत्रेष्टि-यज्ञ समाप्त होने पर [[अग्नि]] के द्वारा प्राप्त चरू का आधा भाग तो महाराज ने कौशल्या जी को दियां शेष का आधा कैकेयी को प्राप्त हुआ। चतुर्थांश जो शेष था, उसके दो भाग करके महाराज ने एक भाग कौशल्या तथा दूसरा कैकेयी के हाथों पर रख दिया। दोनों रानियों ने उसे सुमित्रा जी को प्रदान किया। समय पर माता सुमित्रा ने दो पुत्रों को जन्म दिया। कौशल्या जी के दिये भाग के प्रभाव से [[लक्ष्मण]] जी श्री[[राम]] के और कैकेयी जी द्वारा दिये गये भाग के प्रभाव से [[शत्रुघ्न]]जी श्री [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] जी के अनुगामी हुए। वैसे चारों कुमारों को रात्रि में निद्रा माता सुमित्रा ही कराती थीं। अनेक बार माता कौसल्या श्री राम को अपने पास सुला लेतीं। रात्रि में जगने पर वे रोने लगते। माता रात्रि में ही सुमित्रा के भवन में पहुँचकर कहतीं- 'सुमित्रा! अपने राम को लो। इन्हें तुम्हारी गोद के बिना निद्रा ही नहीं आतीं देखो, इन्होंने रो-रोकर आँखे लाल कर ली हैं।' श्री राम सुमित्रा की गोद में जाते  ही सो जाते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम का वनवास== &lt;br /&gt;
पिता से वनवास की आज्ञा पाकर श्री राम ने माता कौशल्या से तो आज्ञा ली, किन्तु सुमित्रा के समीप वे स्वयं नहीं गये। वहाँ उन्होंने केवल लक्ष्मण को भेज दिया। माता-कौशल्या श्री राम को रोककर कैकेयी का विरोध नहीं कर सकती थीं, किंतु सुमित्रा जी के सम्बन्ध में यह बात नहीं थी। यदि न्याय का पक्ष लेकर वे अड़ जातीं तो उनका विरोध करने का साहस किसी में नहीं था। लक्ष्मण द्वारा श्री राम के साथ वन जाने के लिये आज्ञा माँगने पर माता सुमित्रा जी ने जो उपदेश दिया है, वह उनके विशाल हृदय का सुन्दर परिचय है-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही॥&lt;br /&gt;
अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥&lt;br /&gt;
जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हारा काजु कछु नाहीं॥&lt;br /&gt;
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥&lt;br /&gt;
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥&lt;br /&gt;
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥&lt;br /&gt;
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोई करेहु इहइ उपदेसू॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार माता सुमित्रा ने लक्ष्मण को जीवन के सर्वोत्तम उपदेश के साथ अपना आशीर्वाद भी दिया। माता सुमित्रा का ही वह आदर्श हृदय था कि प्राणाधिक पुत्र को उन्होंने कह दिया कि 'लक्ष्मण! तुम श्री [[राम]] को [[दशरथ]], [[सीता]] को मुझे तथा वन को [[अयोध्या]] जानकर सुखपूर्वक श्रीराम के साथ वन जाओ।'&lt;br /&gt;
==गौरवमय हृदय==&lt;br /&gt;
दूसरी बार माता सुमित्रा के गौरवमय हृदय का परिचय वहाँ मिलता है, जब लक्ष्मण रणभूमि में आहत होकर मूर्छित पड़े थे। यह समाचार जानकर माता सुमित्रा की दशा विचित्र हो गयी। उन्होंने कहा-'लक्ष्मण! मेरा पुत्र! श्री राम के लिये युद्ध में लड़ता हुआ गिरा। मैं धन्य हो गयी। लक्ष्मण ने मुझे पुत्रवती होने का सच्चा गौरव प्रदान किया।' महर्षि [[वसिष्ठ]] ने न रोका होता तो सुमित्रा जी ने अपने छोटे पुत्र [[शत्रुघ्न]] को भी [[लंका]] जाने की आज्ञा दे दी थी- '''तात जाहु कपि संग।''' और शत्रुघ्न भी जाने के लिये तैयार हो गये थे। लक्ष्मण को आज्ञा देते हुए माता सुमित्रा ने कहा था- '''राम सीय सेवा सुचि ह्वै हौ, तब जानिहौं सही सुत मेरे।''' इस सेवा की [[अग्नि]] में तप कर लक्ष्मण जब लौटे तभी उन्होंने उनको हृदय से लगाया। सुमित्रा-जैसा त्याग का अनुपम आदर्श और कहीं मिलना असम्भव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>सुन्दर काण्ड वा. रा.</title>
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		<updated>2010-04-29T11:14:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुन्दर काण्ड / Sundar Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्दरकाण्ड में [[हनुमान]]जी द्वारा समुद्रलंघन करके [[लंका]] पहुँचना, सुरसा-वृत्तान्त, लंकापुरी वर्णन, [[रावण]] के अन्त:पुर में प्रवेश तथा वहाँ का सरस वर्णन, अशोकवाटिका में प्रवेश तथा हनुमान के द्वारा [[सीता]] का दर्शन, सीता-रावण-संवाद, सीता को राक्षसियों के तर्जन की प्राप्ति, सीता-त्रिजटा-संवाद, स्वप्न-कथन, शिंशपा वृक्ष में अवलीन हनुमान का नीचे उतरना तथा सीता से अपने को राम का दूत बताना, राम की अंगूठी सीता को दिखाना, “मैं केवल एक मास तक जीवित रहूँगी उसके पश्चात नहीं” ऐसा सन्देश सीता के द्वारा हनुमान को देना, लंका के चैत्य-प्रासादों को उखाड़ना तथा राक्षसों को मारना आदि हनुमान जी कृत्य वर्णित हैं।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इस काण्ड में अक्षकुमार का वध, हनुमान का [[मेघनाद]] के साथ युद्ध, मेघनाद के द्वारा ब्रह्मास्त्र से हनुमान का बन्धनपूर्वक रावण के दरबार में प्रवेश, रावण-हनुमान-संवाद, [[विभीषण]] के द्वारा दूतवध न करने का परामर्श, हनुमान की पूँछ जलाने की आज्ञा, लंका-दहन, हनुमानजी का सीता-दर्शन के पश्चात प्रत्यावर्तन, समाचार-कथन, दधिमुख-वृत्तान्त, हनुमान के द्वारा सीता से ली गई काञ्चनमणि राम को समर्पित करना, तथा सीता की दशा आदि का वर्णन किया गया है। इस काण्ड में 68 सर्ग हैं। इनमें 2,855 श्लोक दृष्टिगत होते है। धार्मिक दृष्टि से काण्ड का पारायण समाज में बहुधा प्रचलित है। बृहद्धर्मपुराण में [[श्राद्ध]] तथा देवकार्य में इसके पाठ का विधान है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;श्राद्धेषु देवकार्येषु पठेत् सुन्दरकाण्डम्॥(बृहद्धर्मपुराण-पूर्वखण्ड 26.12)&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; सुन्दरकाण्ड में हनुमच्चरित का प्रतिपादन होने से हनुमान जी के भक्त इस काण्ड का श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं। वास्तव में सुन्दरकाण्ड में सब कुछ रमणीय प्रतीत होता है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सुन्दरे सुन्दरी सीता सुन्दरे सुन्दर: कपि:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सुन्दरे सुन्दरो राम: सुन्दरे किन्न सुन्दरम्॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
कदाचित विरहप्रपीडित राम को सीता का शुभ सन्देश तथा सीता को राम का सन्देश मिलने के कारण राम तथा सीता दोनों मनोरम हो गये। इसी प्रकार हनुमान जी भी राम का कार्य करने के कारण अत्यन्त प्रफुल्लित हुए। अतएव इस काण्ड का नाम वाल्मीकि ने सुन्दर रखा होगा। रामायण की तिलक टीका के अन्त में प्रकारान्तर से यही भाव स्पष्ट किया गया है-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
सुन्दरे सुन्दरीं सीतामक्षतां मारुतेर्मुखात्।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रुत्वा ह्रष्टस्तथैवाऽस्तु स राम: सततं ह्रदि॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;रामायण-सुन्दरकाण्ड-तिलक टीका, पृ॰ 712&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt; इस प्रकार सुन्दरकाण्ड रामायण का प्राण है। अत: इसकी महत्ता स्वयं ख्यापित है।&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B5&amp;diff=17397</id>
		<title>सुग्रीव</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B5&amp;diff=17397"/>
		<updated>2010-04-29T11:14:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सुग्रीव / Sugriva'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बाली]] और सुग्रीव दोनों सगे भाई थे। दोनों भाइयों में बड़ा प्रेम था। बाली बड़ा था, इसलिये वही वानरों का राजा था। एक बार एक राक्षस रात्रि में [[किष्किन्धा]] में आकर बाली को युद्ध के लिये चुनौती देते हुए घोर गर्जना करने लगा। बलशाली बाली अकेला ही उस से युद्ध करने के लिये निकल पड़ा। भ्रातृप्रेम के वशीभूत होकर सुग्रीव भी उसकी सहायता के लिये बाली के पीछे-पीछे चल पड़े। वह राक्षस एक बड़ी भारी गुफ़ा में प्रविष्ट हो गया। बाली अपने छोटे भाई सुग्रीव को गुफ़ा के द्वार पर अपनी प्रतीक्षा करने का निर्देश देकर राक्षस को मारने के लिये गुफ़ा के भीतर चला गया। एक मास के बाद गुफ़ा के द्वार से रक्त की धारा निकली। सुग्रीव ने अपने बड़े भाई बाली को राक्षस के द्वारा मारा गया जानकर गुफ़ा के द्वार को एक बड़ी शिला से बन्द कर दिया और किष्किन्धा लौट आये। मन्त्रियों ने राज्य को राजा से विहीन जानकर सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया। राक्षस को मार कर किष्किन्धा लौटने पर जब बाली ने सुग्रीव को राज्यसिंहासन पर राजा के रूप में देखा तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने सुग्रीव पर प्राणघातक मुष्टिक प्रहार किया। प्राण रक्षा के लिये सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर जाकर छिप गये। बाली ने सुग्रीव का धन-स्त्री आदि सब कुछ छीन लिया। धन-स्त्री के हरण होने पर सुग्रीव दुखी होकर अपने [[हनुमान]] आदि चार मन्त्रियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
[[सीता]] जी का हरण हो जाने पर भगवान श्री [[राम]] अपने भाई [[लक्ष्मण]] के साथ उन्हें खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर आये। श्री [[हनुमान]] जी श्री राम-लक्ष्मण को आदरपूर्वक सुग्रीव के पास ले आये और अग्नि के साक्षित्व में श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई। भगवान श्री राम ने एक ही बाण से बाली का वध करके सुग्रीव को निर्भय कर दिया। बाली के मरने पर सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बने और [[अंगद]] को युवराज पद मिला। तदनन्तर सुग्रीव ने असंख्य वानरों को सीता जी की खोज में भेजा। श्री हनुमान जी ने सीता जी का पता लगाया। समस्त वानर-भालू श्री राम के सहायक बने। [[लंका]] में वानरों और राक्षसों का भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में सुग्रीव ने अपनी वानरी सेना के साथ विशेष शौर्य का प्रदर्शन करके सच्चे मित्र धर्म का निर्वाह किया। अन्त में भगवान श्री राम के हाथों [[रावण]] की मृत्यु हुई और भगवान श्री राम अपने भाई लक्ष्मण, पत्नी सीता और मित्रों के साथ [[अयोध्या]] लौटे। अयोध्या में भगवान श्री राम ने गुरुदेव [[वसिष्ठ]] को सुग्रीव आदि का परिचय देते हुए कहा-&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥'''&lt;br /&gt;
'''मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥'''&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान श्री राम का यह कथन उनके हृदय में सुग्रीव के प्रति अगाध स्नेह और आदर का परिचायक है। थोड़े दिनों तक अयोध्या में रखने के बाद भगवान ने सुग्रीव को विदा कर दिया। इन्होंने भगवान की लीलाओं का चिन्तन और कीर्तन करते हुए बहुत दिनों तक राज्य किया और जब भगवान ने अपनी लीला का संवरण किया, तब सुग्रीव भी उनके साथ [[साकेत]] पधारे। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[वाल्मीकि रामायण]] में ही लिखा गया है कि [[शूरसेन]] प्रदेश का नाम [[शत्रुघ्न]] तथा उनके पुत्रों का इससे संबंध होने से पहिले ही प्रसिद्ध हो चुका था । सुग्रीव ने सीता जी की खोज के लिए वानर सेना को जिन प्रदेशों में जाने के लिए कहा था, उनमें 'शूरसेन' का भी नामोल्लेख हुआ है । [[वाल्मीकि]]-[[रामायण]] में इस संबंध में संकेत पाया जाता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{हनुमान}}&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>साकेत</title>
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		<updated>2010-04-29T11:14:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''साकेत / Saket'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अयोध्या]] के निकट, पूर्व-बौद्धकाल में बसा हुआ नगर जो अयोध्या का एक उपनगर था।  [[वाल्मीकि रामायण]] से ज्ञात होता है कि श्री[[राम]] के स्वर्गारोहण के पश्चात अयोध्या उजाड़ हो गई थी। जान पड़ता है कि कालांतर में, इस नगरी के, [[गुप्त काल|गुप्तकाल]] में फिर से बसने के पूर्व ही साकेत नामक उपनगर स्थापित हो गया था।  वाल्मीकि रामायण तथा [[महाभारत]] के प्राचीन भाग में साकेत का नाम नहीं है।  बौद्ध साहित्य में अधिकतर, अयोध्या के उल्लेख के बजाय सर्वत्र साकेत का ही उल्लेख मिलता है, यद्यपि दोनों नगरियों का साथ-साथ वर्णन भी है (&amp;lt;ref&amp;gt; राइस डेवीज-बुद्धिस्ट इंडिया, पृ0 39&amp;lt;/ref&amp;gt;)। गुप्तकाल में साकेत तथा अयोध्या दोनों ही का नाम मिलता है।  इस समय तक अयोध्या पुन: बस गई थी और [[चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य|चंद्रगुप्त द्वितीय]] ने यहाँ अपनी राजधानी भी बनाई थी।  कुछ लोगों के मत में [[बौद्ध काल]] में साकेत तथा अयोध्या दोनों पर्यायवाची नाम थे किंतु यह सत्य नहीं जान पड़ता।  अयोध्या की प्राचीन बस्ती इस समय भी रही होगी किंतु उजाड़ होने के कारण उसका पूर्व गौरव विलुप्त हो गया था।  &lt;br /&gt;
*वेबर के अनुसार साकेत नाम के कई नगर थे (&amp;lt;ref&amp;gt;इंडियन एंटिक्वेरी, 2,208&amp;lt;/ref&amp;gt;) &lt;br /&gt;
*[[कनिंघम]] ने साकेत का अभिज्ञान [[फ़ाह्यान]] के शाचे और [[हुएन-सांग|युवानच्वांग]] की विशाखा नगरी से किया है किंतु अब यह अभिज्ञान अशुद्ध प्रमाणित हो चुका है। सब बातों का निष्कर्ष यह जान पड़ता है कि अयोध्या की रामायण-कालीन बस्ती के उजड़ जाने के पश्चात बौद्ध काल के प्रारंभ में (6ठी-5वीं शती ई॰पू॰) साकेत नामक अयोध्या का एक उपनगर बस गया था जो गुप्तकाल तक प्रसिद्ध रहा और हिन्दू धर्म के उत्कर्ष काल में अयोध्या की बस्ती फिर से बस जाने के पश्चात धीरे-धीरे उसी का अंग बन कर अपना पृथक् अस्तित्व खो बैठा।  &lt;br /&gt;
*ऐतिहासिक दृष्टि से साकेत का सर्वप्रथम उल्लेख बौद्ध [[जातक कथा|जातककथाओं]] में मिलता है। नंदियमिग जातक में साकेत को [[कौशल|कोसल]]-राज की राजधानी बताया गया है। &lt;br /&gt;
*महावग्ग &amp;lt;ref&amp;gt;महावग्ग 7,11 &amp;lt;/ref&amp;gt;में साकेत को [[श्रावस्ती]] से 6 कोस दूर बताया गया है। &lt;br /&gt;
*[[पतंजलि]] ने द्वितीय शती ई॰पू॰ में साकेत में ग्रीक (यवन) आक्रमणकारियों का उल्लेख करते हुए उनके द्वारा साकेत के आक्रांत होने का वर्णन किया है, &amp;lt;ref&amp;gt;'अरूनद् यवन: साकेतम् अरूनद् यवनों मध्यमिकाम्'।&amp;lt;/ref&amp;gt; अधिकांश विद्वानों के मत में पंतजलि ने यहाँ [[मिलिंद (मिनांडर)|मेनेंडर (बौद्ध साहित्य का मिलिंद)]] के भारत-आक्रमण का उल्लेख किया है। &lt;br /&gt;
*[[कालिदास]] ने  [[रघुवंश]] में &amp;lt;ref&amp;gt;रघुवंश 5,31&amp;lt;/ref&amp;gt; रघु की राजधानी को साकेत कहा है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामविनन्द्य सत्वौ, गुरुप्रदेयाधिकनि:स्पृहोऽर्थी नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च'&amp;lt;ref&amp;gt;रघु0 13,62&amp;lt;/ref&amp;gt; में राम की राजधानी के निवासियों को साकेत नाम से अभिहित किया गया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'यां सैकतोत्संगसुखोचितानाम्'&amp;lt;ref&amp;gt;रघु0 13,79&amp;lt;/ref&amp;gt; में साकेत के उपवन का उल्लेख है जिसमें लंका से लौटने के पश्चात श्रीराम को ठहराया गया था-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'साकेतोपवनमुदारमध्युवास'&amp;lt;ref&amp;gt;रघु0 14,13&amp;lt;/ref&amp;gt; में साकेत की पुरनारियों का वर्णन है-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'प्रासादवातायनदृश्यबंधै: साकेतनार्योऽन्चजलिभि: प्रणेमु:' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त उद्धरणों से जान पड़ता है कि कालिदास ने अयोध्या और साकेत को एक  नगरी माना है।  यह स्थिति [[गुप्त काल]] अथवा कालिदास के समय में वास्तविक रूप में रही होगी क्योंकि इस समय तक अयोध्या की नई बस्ती फिर से बस चुकी थी और बौद्धकाल का साकेत इसी में सम्मिलित हो गया था।  कालिदास ने अयोध्या का तो अनेक स्थानों पर उल्लेख किया ही है। आनुषांगिक रूप से, इस तथ्य से कालिदास का समय गुप्त काल ही सिद्ध होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक_कोश]][[Category:रामायण]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=17395</id>
		<title>सांकाश्य</title>
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		<updated>2010-04-29T11:14:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''सांकाश्य / Sankashya'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारत में पंचाल जनपद का प्रसिद्ध नगर जो वर्तमान संकिसा बसंतपुर (ज़िला [[एटा]], [[उत्तर प्रदेश]] है। यह फर्रुख़ाबाद के निकट स्थित है। सांकाश्य का सर्वप्रथम उल्लेख संभवत: [[वाल्मीकि रामायण]] &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि आदि॰ 71, 16-19&amp;lt;/ref&amp;gt; में है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सुधन्वा का वध==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
जहाँ सांकाश्य-नरेश सुधन्वा का [[जनक]] की राजधानी [[मिथिला]] पर आक्रमण करने का उल्लेख है। सुधन्वा [[सीता]] से विवाह करने का इच्छुक था। जनक के साथ युद्ध में सुधन्वा मारा गया तथा सांकाश्य  के राज्य का शासक जनक ने अपने भाई कुशध्वज को बना दिया। [[उर्मिला]] इन्हीं कुशध्वज की पुत्री थी, ‘कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागत: पुरात्, सुधन्व्रा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधक:। निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम् सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्’। [[महाभारत]] काल में सांकाश्य की स्थिति पूर्व [[पंचाल]] देश में थी और यह नगर पंचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। &lt;br /&gt;
== बुद्ध का आगमन==&lt;br /&gt;
[[गौतम बुद्ध]] के जीवन काल में सांकाश्य ख्याति प्राप्त नगर था। पाली कथाओं के अनुसार यहीं बुद्ध त्रयस्त्रिंश स्वर्ग से अवतरित होकर आए थे। इस स्वर्ग में वे अपनी माता तथा तैंतीस देवताओं को अभिधम्म की शिक्षा देने गए थे। [[पालि भाषा|पाली]] दंतकथाओं के अनुसार बुद्ध तीन सीढ़ियों द्वारा स्वर्ग से उतरे थे और उनके साथ [[ब्रह्मा]] और शक भी थे। इस घटना से संबन्ध होने के कारण बौद्ध, सांकाश्य को पवित्र तीर्थ मानते थे और इसी कारण यहाँ अनेक [[स्तूप]] एवं विहार आदि का निर्माण हुआ था। यह उनके जीवन की चार आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक मानी जाती है। सांकाश्य ही में बुद्ध ने अपने प्रमुख शिष्य आन्नद के कहने से स्त्रियों की प्रव्रज्या पर लगाई हुई रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर स्त्रियों के लिए भी बौद्ध संघ का द्वार खोल दिया था। पालिग्रंथ अभिधानप्पदीपिका में संकस्स (सांकाश्य) की उत्तरी भारत के बीस प्रमुख नगरों में गणना की गई है। पाणिनी ने &amp;lt;ref&amp;gt;पाली कथाओं 4,2,80&amp;lt;/ref&amp;gt; में सांकाश्य की स्थिति इक्षुमती नदी पर कहीं है जो संकिसा के पास बहने वाली ईखन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== फ़ाह्यान द्वारा उल्लेख==&lt;br /&gt;
5वीं शती में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान]] ने संकिसा के जनपद के संख्यातीत [[बौद्ध विहार|बौद्ध विहारों]] का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि यहाँ इतने अधिक विहार थे कि कोई मनुष्य एक-दो दिन ठहर कर तो उनकी गिनती भी नहीं कर सकता था। संकिसा के [[संघाराम]] में उस समय छ: या सात सौ भिक्षुओं का निवास था। युवानच्वांग ने 7वीं शती में सांकाश्य में स्थित एक 70 फुट ऊँचे स्तम्भ का उल्लेख किया है जिसे राजा [[अशोक]] ने बनवाया था। इसका रंग बैंजनी था। यह इतना चमकदार था कि जल से भीगा सा जान पड़ता था। स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की विशाल प्रतिमा जटित थी जिसका मुख राजाओं द्वारा बनाई हुई सीढ़ियों की ओर था। इस स्तम्भ पर चित्र-विचित्र रचनायें बनी थीं जो बौद्धों के विश्वास के अनुसार केवल साधु पुरुषों को ही दिखलाई देती थीं। चीनी-यात्री ने इस स्तम्भ का जो वर्णन किया है वह वास्तव में अद्भुत है। यह स्तम्भ सांकाश्य की खुदाई में अभी तक नहीं मिला है। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
विषहरी देवी के मन्दिर के पास जो स्तम्भ-शीर्ष रखा है वह सम्भवत: एक विशाल हाथी की प्रतिमा है न कि सिंह की ओर इस प्रकार इसका [[अशोक स्तम्भ]] का शीर्ष होना संदिग्ध है। युवांगच्वांग ने सांकाश्य का नाम कपित्थ भी लिखा है। संकिसा के उत्तर की ओर एक स्थान कारेवर तथा नागताल नाम से प्रसिद्ध है। प्राचीन किंवदंती के अनुसार कारेवर एक विशाल सर्प का नाम था। लोग उसकी पूजा करते थे और इस प्रकार उसकी कृपा से आसपास का क्षेत्र सुरक्षित रहता था। ताल के चिन्ह आज भी हैं। इसकी परिक्रमा बौद्ध यात्री करते हैं। &lt;br /&gt;
==ज्ञान-प्राप्ति का स्थान==&lt;br /&gt;
जैन मतावलंबी सांकाश्य को तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ की ज्ञान-प्राप्ति का स्थान मानते हैं। संकिसा ग्राम आजकल एक ऊँचे टीले पर स्थित है। इसके आसपास अनेक टीले हैं, जिन्हें कोटपाकर, कोटमुझा, कोटद्वारा, ताराटीला, गौंसरताल आदि नामों से अभिहित किया जाता है। इसका उत्खनन होने पर इस स्थान से अनेक बहुमूल्य प्राचीन अवशेषों के प्राप्त होने की आशा है। प्राचीन सांकाश्य पर्याप्त बड़ा नगर रहा होगा क्योंकि इसकी नगर-भित्ति के अवशेष जो आज भी वर्तमान हैं, प्राय: 4 मील के घेरे में हैं।&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>सम्पाती</title>
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		<updated>2010-04-29T11:13:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''संपाती / सम्पाती / Sampati'''&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*संपाती नामक गृध्र [[जटायु]] का बड़ा भाई था। वृत्तासुर-वध के उपरांत अत्यधिक गर्व हो जाने के कारण दोनों भाई आकाश में उड़कर [[सूर्य देवता|सूर्य]] की ओर चले। उन दोनों का उद्देश्य सूर्य का विंध्याचल तक पीछा करना था। सूर्य के ताप से जटायु के पंख जलने लगे तो संपाती ने उसे अपने पंखों से छिपा लिया। अत: जटायु तो बच गया किंतु संपाती के पर जल गये और उड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी। वह विंध्य पर्वत पर जा गिरा। जब [[सीता]] को ढूंढ़ने में असफल [[हनुमान]], [[अंगद]] आदि उस पर्वत पर बातें कर रहे थे तब जटायु का नाम सुनकर संपाति ने सविस्तार जटायु के विषय में जानना चाहा। यह जानकर कि वह [[रावण]] द्वारा मारा गया है, उन्हें बताया कि पूर्वकाल में जब पंख जलने पर वह विंध्य पर्वत पर गिरा था तब वह छ: दिन अचेत रहा, तदुपरांत वह निशाकर नाम के महामुनि की गुफ़ा में गया। निशाकर का उन दोनों भाइयों से अपार प्रेम था। निशाकर ने संपाती से कहा कि वह बहुत जल गया है, भविष्य में उसके पंख और उसका सौदर्य लौट जायेंगे किंतु अभी ठीक नहीं होगा क्योंकि बिना पंख के वहां पर्वत पर रहने से वह भविष्य में उत्पन्न होनेवाले [[दशरथ]]-पुत्र [[राम]] की खोयी हुई पत्नी का मार्ग बतायेगा तथा इसी प्रकार के अनेक अन्य उपकार भी कर पावेगा। संपाती ने दिव्य दृष्टि से सीता को रावण की नगरी में देखा तथा वानरों का पथ-निर्देशन किया, तभी देखते-देखते उसके दो लाल पंख निकल आये।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड,सर्ग 56-58 तथा 61, 62, 63&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*संपाती के पुत्र का नाम सुपार्श्व था। पंख जल जाने के कारण संपाती उड़ने में असमर्थ था, अत: सुपार्श्व उसके लिए भोजन जुटाया करता था। एक शाम सुपार्श्व बिना मांस लिये अपने पिता के पास पहुंचा तो भूखे संपाती को बहुत गुस्सा आया। उसने मांस न लाने का कारण पूछा तो सुपार्श्व ने बतलाया-'कोई काला राक्षस सुंदरी नारी को लिये चला जा रहा था। वह स्त्री 'हा [[राम]], हा [[लक्ष्मण]]!' कहकर विलाप कर रही थी। यह देखने में मैं इतना उलझ गया कि मांस लाने का ध्यान नहीं रहा।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 59&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*संपाति [[जटायु]] का भाई था। [[हनुमान]] जब [[सीता]] को ढूंढ़ने जा रहा था तब मार्ग में [[गरुड़]] के समान विशाल पक्षी से उसका परिचय हुआ। उसका परिचय प्राप्त कर वानरों ने जटायु की दु:खद मृत्यु का समाचार उसे दिया। उसी ने वानरों को [[लंका]]पुरी जाने के लिए उत्साहित किया था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत, वनपर्व, 282-46-57 तक &amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>शूर्पणखा</title>
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		<updated>2010-04-29T11:11:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''शूर्पणखा / Shurpnakha'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[लंका]] के राजा [[रावण]] की बहन शुर्पणखा [[पंचवटी]] में [[राम]] को देखकर मुग्ध हो गयी और उसने राम से विवाह का प्रस्ताव किया। &lt;br /&gt;
*राम ने उसे अपने भाई [[लक्ष्मण]] से सम्बन्ध स्थापित करने का परामर्श दिया। &lt;br /&gt;
*वह लक्ष्मण के पास गयी और लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर उसके नाक-कान काट दिए। &lt;br /&gt;
*शूर्पणखा अत्यन्त कुपित और अपमानित होकर रावण के पास गयी। &lt;br /&gt;
*फलत: [[सीता हरण]] और [[राम रावण युद्ध]] की घटनाएँ घटित हुई। &lt;br /&gt;
*'[[रामायण]]' , '[[रामचरितमानस]]', 'रामचन्द्रिका', 'साकेत', 'साकेत सन्त', पंचवटी' आदि रामकथा- सम्बन्धी काव्य-ग्रन्थों में शूर्पणखा का प्रसंग वर्णित हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शूर्पणखा रामायण में==&lt;br /&gt;
शूर्पणखा रावण की बहन तथा दानवों के राजा कालका के पुत्र विद्युज्जिह्व की पत्नी थी। समस्त संसार पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से रावण ने अनेक युद्ध किये, अनेक दैत्यों को मारा। उन्हीं दैत्यों में विद्युज्जिह्व भी मारा गया। शूर्पणखा बहुत दुखी हुई। रावण ने उसे आश्वस्त करते हुए अपने भाई खर के पास रहने के लिए भेज दिया। वह [[दंडकारण्य]] में रहने लगी। एक बार [[राम]] और [[सीता]] कुटिया में बैठे थे। अचानक शूर्पणखा (बूढ़ी कुरुप तथा डरावनी राक्षसी) ने वहां प्रवेश किया। वह राम को देखकर मुग्ध हो गयी तथा उनका परिचय जानकर उसने अपने विषय में इस प्रकार बतलाया-'मैं इस प्रदेश में स्वेच्छाचारिणी राक्षसी हूं। मुझसे सब भयभीत रहते हैं। विश्रवा का पुत्र बलवान रावण मेरा भाई है। मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूं।' राम ने उसे बतलाया कि उसका विवाह हो चुका है तथा उसका छोटा भाई लक्ष्मण अविवाहित है, अत: वह उसके पास जाय। लक्ष्मण से उसे फिर राम के पास भेजा। शूर्पणखा ने राम से पुन: विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा-'मैं [[सीता]] को अभी खाये लेती हूं-तब सौत न रहेगी और हम विवाह कर लेंगे।' जब वह सीता की ओर झपटी तो राम के आदेशानुसार लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। वह क्रुद्ध होकर अपने भाई [[खर]] के पास गयीं खर ने चौदह राक्षसों को राम-हनन के निमित्त भेजा क्योंकि शूर्पणखा राम, लक्ष्मण और सीता का लहू पीना चाहती थी। राम ने उन चौदहों को मार डाला तो शूर्पणखा पुन: रोती हुई अपने भाई खर के पास गयी। खर ने क्रुद्ध होकर अपने सेनापति [[दूषण]] को चौदह हजार सैनिकों को तैयार करने का आदेश दिया। सेना तैयार होने पर खर तथा दूषण ने युद्ध के लिए प्रस्थान किया। जब सेना राम के आश्रम में पहुंची तो राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वह सीता को लेकर किसी दुर्गम पर्वत कंदरा में चला जाय तथा स्वयं युद्ध के लिए तैयार हो गये। मुनि और गंधर्व भी यह युद्ध देखते गये। राम ने अकेले होने पर भी शत्रुदल के शस्त्रों को छिन्न-भिन्न करना प्रारंभ कर दिया। अनेकों राक्षस प्रभावशाली बाणों से मारे गये, शेष डर कर भाग गये। दूषण, त्रिशिरा तथा अनेक राक्षसों के मारे जाने पर खर स्वयं राम से युद्ध करने गया। युद्ध में राम का धनुष खंडित हो गया, कवच कटकर नीचे गिर गया। तदनंतर राम ने महर्षि [[अगस्त्य]] का दिया हुआ शत्रुनाशक धनुष धारण किया। [[इन्द्र]] के दिये अमोघ बाण से राम ने खर को जलाकर नष्ट कर दिया। इस प्रकार केवल तीन मुहूर्त में राम ने खर, दूषण, त्रिशिरा तथा चौदह हजार राक्षसों को मार डाला।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, अरण्य कांड, 17-30।, उत्तर कांड, 12।1-2, 24।23-42&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>शबरी</title>
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		<updated>2010-04-29T11:11:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भक्तिमती शबरी / Shabri'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शबरी का जन्म भील कुल में हुआ था। वह भीलराज की एकमात्र कन्या थीं उसका विवाह एक पशु स्वभाव के क्रूर व्यक्ति से निश्चय हुआ। अपने विवाह के अवसर पर अनेक निरीह पशुओं को बलि के लिये लाया गया देखकर शबरी का हृदय दया से भर गया। उसके संस्कारों में दया, अहिंसा और भगवद्धक्ति थी। विवाह की रात्रि में शबरी पिता के अपयश की चिन्ता छोड़कर बिना किसी को बताये जंगल की ओर चल पड़ी। रात्रि भर वह जी-तोड़कर भागती रही और प्रात:काल महर्षि [[मतंग]] के आश्रम में पहुँची। त्रिकालदर्शी ऋषि ने उसे संस्कारी बालिका समझकर अपने आश्रम में स्थान दिया। उन्होंने शबरी को गुरुमन्त्र देकर नाम –जप की विधि भी समझायी। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
महर्षि मतंग ने सामाजिक बहिष्कार स्वीकार किया, किन्तु शरणागता शबरी का त्याग नहीं किया। महर्षि का अन्त निकट था। उनके वियोग की कल्पना मात्र से शबरी व्याकुल हो गयी। महर्षि ने उसे निकट बुलाकर समझाया- बेटी! धैर्य से कष्ट सहन करती हुई साधना में लगी रहनां प्रभु [[राम]] एक दिन तेरी कुटिया में अवश्य आयेंगे। प्रभु की दृष्टि में कोई दीन-हीन और अस्पृश्य नहीं है। वे तो भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं।' शबरी का मन अप्रत्याशित आनन्द से भर गया और महर्षि की जीवन-लीला समाप्त हो गयी।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
शबरी अब वृद्धा हो गयी थी।'प्रभु आयेंगे' गुरुदेव की यह वाणी उसके कानों में गूँजती रहती थी और इसी विश्वास पर वह कर्मकाण्डी ऋषियों के अनाचार शान्ति से सहती हुई अपनी साधना में लगी रही। वह नित्य भगवान के दर्शन की लालसा से अपनी कुटिया को साफ करती, उनके भोग के लिये फल लाकर रखती। आख़िर शबरी की प्रतीक्षा पूरी हुई। अभी वह भगवान के भोग के लिये मीठे-मीठे फलों का चखकर और उन्हें धोकर दोनों में सजा ही रही थी कि अचानक एक वृद्ध ने उसे सूचना दी- 'शबरी! तेरे राम भ्राता सहित आ रहे हैं।' वृद्ध के शब्दों ने शबरी में नवीन चेतना का संचार कर दिया। वह बिना लकुट लिये हड़बड़ी में भागी। श्री राम को देखते ही वह निहाल हो गयी और उनके चरणों में लोट गयी। देह की सुध भूलकर वह श्री राम के चरणों को अपने अश्रुजल से धोने लगी। किसी तरह भगवान श्री राम ने उसे उठाया। अब वह आगे-आगे उन्हें मार्ग दिखाती अपनी कुटिया की ओर चलने लगी। कुटिया में पहुँच कर उसने भगवान का चरण धोकर उन्हें आसन पर बिठाया। फलों के दोने उनके सामने रखकर वह स्नेहसिक्त वाणी में बोली- 'प्रभु! मैं आपको अपने हाथों से फल खिलाऊँगी। खाओगे न भीलनी के हाथ के फल? वैसे तो नारी जाति ही अधम है और मैं तो अन्त्यज, मूढ और गँवार हूँ। 'कहते-कहते शबरी की वाणी रूक गयी और उसके नेत्रों से अश्रुजल छलक पड़े। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री राम ने कहा-'बूढ़ी माँ! मैं तो एक भक्ति का ही नाता मानता हूँ। जाति-पाति, कुल, धर्म सब मेरे सामने गौण हैं। मुझे भूख लग रही है, जल्दी से मुझे फल खिलाकर तृप्त कर दो।' शबरी भगवान को फल खिलाती आती थी और वे बार-बार माँगकर खाते जाते थे। महर्षि मतंग की वाणी आज सत्य हो गयी और पूर्ण हो गयी शबरी की साधना। उसने भगवान को [[सीता]] की खोज के लिये [[सुग्रीव]] से मित्रता करने की सलाह दी और स्वयं को योगाग्नि में भस्म करके सदा के लिये श्री राम के चरणों में लीन हो गयी। श्री राम-भक्ति की अनुपम पात्र शबरी धन्य है।&lt;br /&gt;
==रामायण से==&lt;br /&gt;
सीता को ढूंढ़ते हुए राम शबरी के आश्रम में पहुंचे। शबरी ने उनका आतिथ्य-सत्कार किया तथा कहा-'मैं जिन ऋषियों की सेवा करती थी, आपके [[चित्रकूट]] पर्वत पर पहुंचते ही वे सब असाधारण विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग चले गये तथा कह गये कि आप यहाँ पर आयेंगे और मैं आप लोगों का सत्कार करके अविनाशी लोक प्राप्त करूंगी। अत: मैंने यहाँ उत्पन्न होनेवाले फल-फूल आपके लिए एकत्र कर रखे हैं।' राम से आज्ञा प्राप्त करके शबरी ने अग्निकुण्ड में प्रवेश कर अपनी काया होम कर दी तथा स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, अरण्य कांड, सर्ग 74, 11-35&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>शत्रुघ्न</title>
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		<updated>2010-04-29T11:11:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''शत्रुघ्न / Shatrughna'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[वाल्मीकि]] [[रामायण]] में वर्णित है कि अयोध्या के राजा [[दशरथ]] के तीन पत्नी थीं- [[कौशल्या]], [[कैकई]] और [[सुमित्रा]] । कौशल्या से [[राम]] , कैकई से [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] और सुमित्रा से [[लक्ष्मण]] एवं शत्रुघ्न पुत्र थे । शत्रुघ्न ने मधुपुरी [[मथुरा]] के शासक [[लवण]] को मार कर [[मथुरा|मधुपुरी]] को फिर से बसाया । शत्रुघ्न कम से कम बारह वर्ष तक मथुरा नगरी एवं प्रदेश के शासक रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चरित्र==&lt;br /&gt;
श्री शत्रुघ्न जी का चरित्र अत्यन्त विलक्षण है। ये मौन सेवाव्रती हैं। बचपन से श्री [[भरत]] जी का अनुगमन तथा सेवा ही इनका मुख्य व्रत था। ये मितभाषी, सदाचारी, सत्यवादी, विषय-विरागी तथा भगवान श्री [[राम]] के दासानुदास हैं। जिस प्रकार श्री [[लक्ष्मण]] जी हाथ में धनुष लेकर श्री राम की रक्षा करते हुए उनके पीछे चलते थे, उसी प्रकार श्री शत्रुघ्न जी भी श्री भरत जी के साथ रहते थे।&lt;br /&gt;
जब श्री भरत जी के मामा युधाजित श्री भरत जी को अपने साथ ले जा रहे थे, तब श्री शत्रुघ्न जी भी उनके साथ ननिहाल चले गये। इन्होंने माता-पिता, भाई, नवविवाहिता पत्नी सबका मोह छोड़कर श्री भरत जी के साथ रहना और उनकी सेवा करना ही अपना कर्तव्य मान लिया था। भरत जी के साथ ननिहाल से लौटने पर पिता के मरण और लक्ष्मण, [[सीता]] सहित श्री राम के वनवास का समाचार सुनकर इनका हृदय दु:ख और शोक से व्याकुल हो गया। उसी समय इन्हें सूचना मिली कि जिस क्रूरा पापिनी के षड्यन्त्र से श्री राम का वनवास हुआ, वह वस्त्राभूषणों से सज-धजकर खड़ी है, तब ये क्रोध से व्याकुल हो गये। ये [[मन्थरा]] की चोटी पकड़कर उसे आँगन में घसीटने लगे। इनके लात के प्रहार से उसका कूबर टूट गया और सिर फट गया उसकी दशा देखकर श्री भरत जी को दया आ गयी और उन्होंने उसे छुड़ा दिया। इस घटना से श्री शत्रुघ्न जी की श्री राम के प्रति दृढ़ निष्ठा और भक्ति का परिचय मिलता है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
[[चित्रकूट]] से श्री राम को पादुकाएँ लेकर लौटते समय जब श्री शत्रुघ्न जी श्री राम से मिले, तब इनके तेज स्वभाव को जानकर भगवान श्री राम ने कहा- 'शत्रुघ्न! तुम्हें मेरी और सीता की शपथ है, तुम माता [[कैकेयी]] की सेवा करना, उन पर कभी भी क्रोध मत करना'।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
श्री शत्रुघ्न जी का शौर्य भी अनुपम था। सीता-वनवास के बाद एक दिन ऋषियों ने भगवान श्री राम की सभा में उपस्थित होकर [[लवणासुर]] के अत्याचारों का वर्णन किया और उसका वध करके उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। श्री शत्रुघ्न जी ने भगवान श्री राम की आज्ञा से वहाँ जाकर प्रबल पराक्रमी लवणासुर का वध किया और [[मथुरा|मधुरापुरी]] बसाकर वहाँ बहुत दिनों तक शासन किया। &lt;br /&gt;
भगवान श्री राम के परमधाम पधारने के समय [[मथुरा]] में अपने पुत्रों का राज्यभिषेक करके श्री शत्रुघ्न जी [[अयोध्या]] पहुँचे। श्री राम के पास आकर और उनके चरणों में प्रणाम करके इन्होंने विनीत भाव से कहा- 'भगवन! मैं अपने दोनों पुत्रों को राज्यभिषेक करके आपके साथ चलने का निश्चय करके ही यहाँ आया हूँ। आप अब मुझे कोई दूसरी आज्ञा न देकर अपने साथ चलने की अनुमति प्रदान करें।' भगवान श्री राम ने शत्रुघ्न जी की प्रार्थना स्वीकार की और वे श्री रामचन्द्र के साथ ही [[साकेत]] पधारे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
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		<title>विभीषण</title>
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		<updated>2010-04-29T11:10:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''श्री रामभक्त विभीषण / Vibhishan'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि [[विश्रवा]] को असुर कन्या [[कैकसी]]  के संयोग से तीन पुत्र हुए- &lt;br /&gt;
*[[रावण]], &lt;br /&gt;
*[[कुम्भकर्ण]] और &lt;br /&gt;
*विभीषण। &lt;br /&gt;
विभीषण विश्रवा के सबसे छोटे पुत्र थे। बचपन से ही इनकी धर्माचरण में रूचि थी। ये भगवान के परम भक्त थे। तीनों भाइयों ने बहुत दिनों तक कठोर तपस्या करके श्री [[ब्रह्मा]] जी को प्रसन्न किया। ब्रह्मा ने प्रकट होकर तीनों से वर माँगने के लिये कहा- &lt;br /&gt;
*[[रावण]] ने अपने महत्वाकांक्षी स्वभाव के अनुसार श्री ब्रह्मा जी से त्रैलोक्य विजयी होने का वरदान माँगा, &lt;br /&gt;
*[[कुम्भकर्ण]] ने छ: महीन की नींद माँगी और &lt;br /&gt;
*विभीषण ने उनसे भगवद्भक्ति की याचना की। सबको यथायोग्य वरदान देकर श्री ब्रह्मा जी अपने लोक पधारे। तपस्या से लौटने के बाद रावण ने अपने सौतेले भाई [[कुबेर]] से सोने की की [[लंका]] पुरी को छीनकर उसे अपनी राजधानी बनाया और ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव के प्रभाव से त्रैलोक्य विजयी बना। ब्रह्मा जी की सृष्टि में जितनी भी शरीर धारी प्राणी थे, सभी रावण के वश में हो गये। विभीषण भी रावण के साथ लंका में रहने लगे।&lt;br /&gt;
==कथा==&lt;br /&gt;
रावण ने जब [[सीता]] जी का हरण किया, तब विभीषण परायी स्त्री के हरण को महापाप बताते हुए सीता जी को श्री [[राम]] को लौटा देने की उसे सलाह दी। किन्तु रावण ने उस पर कोई ध्यान न दिया। श्री [[हनुमान]] जी सीता की खोज करते हुए लंका में आये। उन्होंने श्री रामनाम से अंकित विभीषण का घर देखा। घर के चारों ओर [[तुलसी]] के वृक्ष लगे हुए थे। सूर्योदय के पूर्व का समय था, उसी समय श्री राम-नाम का स्मरण करते हुए विभीषण जी की निद्रा भंग हुईं। राक्षसों के नगर में श्री रामभक्त को देखकर हनुमान जी को आश्चर्य हुआ। दो रामभक्तों का परस्पर मिलन हुआ। श्री हनुमान जी का दर्शन करके विभीषण भाव विभोर हो गये। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि श्री रामदूत के रूप में श्री राम ने ही उनको दर्शन देकर कृतार्थ किया है। श्री हनुमान जी ने उनसे पता पूछकर अशोक वाटिका में माता सीता का दर्शन देकर कृतार्थ किया है। श्री हनुमान जी ने उनसे पता पूछकर अशोकवाटिका में माता सीता का दर्शन किया। अशोकवाटिका विध्वंस और अक्षयकुमार के वध के अपराध में रावण हनुमान जी को प्राणदण्ड देना चाहता था। उस समय विभीषण ने ही उसे दूत को अवध्य बताकर हनुमान जी को कोई और दण्ड देने की सलाह दी। रावण ने हनुमान जी की पूँछ में आग लगाने की आज्ञा दी और विभीषण के मन्दिर को छोड़कर सम्पूर्ण लंका जलकर राख हो गयी। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
भगवान श्री राम ने लंका पर चढ़ाई कर दी। विभीषण ने पुन: सीता को वापस करके युद्ध की विभीषिका को रोकने की रावण से प्रार्थना की। इस पर रावण ने इन्हें लात मारकर निकाल दिया। ये श्री राम के शरणागत हुए। रावण सपरिवार मारा गया। भगवान श्री राम ने विभीषण को लंका का नरेश बनाया और अजर-अमर होने का वरदान दिया। विभीषण जी सप्त चिंरजीवियों में एक हैं और अभी तक विद्यमान हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>लव कुश</title>
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		<updated>2010-04-29T11:10:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''लव कुश / Lav Kush'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*लव और कुश [[राम]] तथा [[सीता]] के जुड़वां बेटे थे। &lt;br /&gt;
*उनका जन्म तथा पालन [[वाल्मीकि]] आश्रम में हुआ था। &lt;br /&gt;
*जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] का राज्यभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। &lt;br /&gt;
*अत: दक्षिण कोसल प्रदेश में कुश और उत्तर कोसल में लव का [[अभिषेक]] किया गया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 107&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
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[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>लक्ष्मण</title>
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		<updated>2010-04-29T11:10:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''श्री लक्ष्मण / Laxman'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*लक्ष्मण [[दशरथ]] तथा [[सुमित्रा]] के पुत्र थे। वह [[राम]] के छोटे भाई थे। राम के वनगमन के विषय में सुनकर वह भी राम के साथ चौदह वर्षों के लिए वन गये थे। लक्ष्मण जी शेषावतार थे। किसी भी अवस्था में भगवान श्री राम का वियोग इन्हें सह्य नहीं था। इसलिये ये सदैव छाया की भाँति श्री राम का ही अनुगमन करते थे। श्री राम के चरणों की सेवा ही इनके जीवन का मुख्य व्रत था। श्री राम की तुलना में संसार के सभी सम्बन्ध इनके लिये गौण थे। इनके लिये श्री राम ही माता-पिता, गुरु, भाई सब कुछ थे और उनकी आज्ञा का पालन ही इनका मुख्य धर्म था। इसलिये जब भगवान श्री राम [[विश्वामित्र]] की यज्ञ-रक्षा के लिये गये तो लक्ष्मण जी भी उनके साथ गये। भगवान श्री राम जब सोने जाते थे तो ये उनका पैर दबाते और भगवान के बार-बार आग्रह करने पर ही स्वयं सोते तथा भगवान के जागने के पूर्व ही जग जाते थे। अबोध शिशु की भाँति इन्होंने भगवान श्री राम के चरणों को ही दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और भगवान ही इनकी अनन्य गति बन गये। भगवान श्री राम के प्रति किसी के भी अपमान सूचक शब्द को ये कभी बरदाश्त नहीं करते थे। जब महाराज [[जनक]] ने धनुष के न टूटने के क्षोभ में धरती को वीर-विहीन कह दिया, तब भगवान के उपस्थित रहते हुए जनक जी का यह कथन श्री लक्ष्मण जी को बाण-जैसा लगा। ये तत्काल कठोर शब्दों में जनक जी का प्रतिकार करते हुए बोले- भगवान श्री राम के विद्यमान रहते हुए जनक ने जिस अनुचित वाणी का प्रयोग किया है, वह मेरे हृदय में शूल की भाँति चुभ रही है। जिस सभा में [[रघुवंश]] का कोई भी वीर मौजूद हो, वहाँ इस प्रकार की बातें सुनना और कहना उनकी वीरता का अपमान है। यदि श्री राम आदेश दें तो मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गेंद की भाँति उठा सकता हूँ, फिर जनक के इस सड़े धनुष की गिनती ही क्या है।' इसी प्रकार जब श्री [[परशुराम]]जी ने धनुष तोड़ने वाले को ललकारा तो ये उनसे भी भिड़ गये। &lt;br /&gt;
*भगवान श्री राम के प्रति श्री लक्ष्मण की अनन्य निष्ठा का उदाहरण भगवान के वनगमन के समय मिलता है। ये उस समय देह-गेह, सगे-सम्बन्धी, माता और नव-विवाहिता पत्नी सबसे सम्बन्ध तोड़कर भगवान के साथ वन जाने के लिये तैयार हो जाते हैं। वन में ये निद्रा और शरीर के समस्त सुखों का परित्याग करके श्री राम-[[सीता|जानकी]] की जी-जान से सेवा करते हैं। ये भगवान की सेवा में इतने मग्न हो जाते हैं कि माता-पिता, पत्नी, भाई तथा घर की तनिक भी सुधि नहीं करते।&lt;br /&gt;
==लक्ष्मण मूर्च्छा==&lt;br /&gt;
*'सीता-हरण' के संदर्भ में राम-[[रावण]] युद्ध हुआ। [[लंका]] में युद्ध प्रांरभ हुआ तो राक्षसों से वानर-सेना अधिक शक्तिशाली जान पड़ती थी। तभी अचानक [[मेघनाद]] ने अंतर्धान होकर माया के प्रभाव से अपने को छिपा लिया और राम तथा लक्ष्मण को बाणों से बेध डाला। वे बाण राम और लक्ष्मण को लगकर सर्प बन जाते थे। वे दोनों शर-शैया पर मूर्च्छित होकर पड़े हुए थे तभी राम और लक्ष्मण को मरा हुआ जानकर मेघनाद ने यह सूचना रावण को दी। रावण ने दासी त्रिजटा के साथ विमान में सीता को भेजा। वह मूर्च्छित राम तथा लक्ष्मण को देखकर विलाप करने लगी। त्रिजटा उसे अशोकवाटिका में ले गयी तथा समझाने लगी कि यदि राम न रहे होते तो पुष्पक विमान हमें लेकर न उड़ता, क्योंकि यह विधवा स्त्रियों का वहन नहीं करता है, अत: वे मात्र अचेत होंगे। &lt;br /&gt;
*उधर राम तो मूर्च्छा से जाग उठे, किन्तु लक्ष्मण की गहन मूर्च्छा को देखकर सब चिंतित एवं निराश होने लगे। [[विभीषण]] ने सबको सांत्वना दी। वे सब संजीवनी बूटी की खोज में [[हनुमान]] को भेज ही रहे थे कि विनतानंद पक्षिराज [[गरुड़]] ने प्रकट होकर राम-लक्ष्मण का स्पर्श किया जिससे वे पूर्ण स्वस्थ हो गये। उन्होंने यह भी बताया कि मेघनाद के बाण वास्तव में कद्रु के पुत्र नाग हैं। उनको स्वस्थ देखकर आधी रात में ही वानरों ने बहुत शोर मचाया तथा गरुड़ ने विदा ली।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 45 से 50 तक&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*पुन: युद्ध करते समय रावण ने लक्ष्मण पर शक्ति का प्रहार किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 101, श्लोक 34-36&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*लक्ष्मण मूर्च्छित हो गया। लक्ष्मण की ऐसी दशा देखकर राम विलाप करने लगे। [[सुषेण]] ने कहा-'लक्ष्मण के मुंह पर मृत्यु-चिह्न नहीं है।'&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 102, श्लोक 15-39&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सुषेण ने हनुमान से कहा कि वह औषधि पर्वत से विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी तथा संधानी औषधियों को ले आये। हनुमान तुरंत पवन वेग से उडकर गया और औषधियों को न पहचान पाने के कारण पर्वत-शिखर ही उठा लाया। सुषेण ने औषधि पीसकर लक्ष्मण की नाक में डाली और वह तुरंत ठीक हो गया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, 101।34-36।,102।15-39। &amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पउम चरित से== &lt;br /&gt;
*लक्ष्मण ने मध्यप्रदेश में क्षेत्रांजलिपुर के राजा के विषय में सुना कि जो उसकी शक्ति को सह लेगा, उसी से वह अपनी कन्या का विवाह कर देगा। लक्ष्मण ने भाई की अनुज्ञा मानकर राजा से प्रहार करने को कहा। शक्ति सहकर उसने शत्रुदमन राजा की कन्या जितपद्मा को प्राप्त किया। जितपद्मा को समझा-बुझाकर राम, सीता तथा लक्ष्मण नगर से चले गये। &lt;br /&gt;
*राम-रावण युद्ध में विभीषण को रावण से बचाने के कारण लक्ष्मण रावण के मुख्य शत्रु रूप में सामने आया। रावण ने शक्ति के प्रहार से उसे युद्ध-क्षेत्र में गिरा दिया। राम रावण से विशेष रुष्ट हो गया, किंतु भाई के निर्जीव शरीर को देखकर रुष्ट हो गया, किंतु भाई के निर्जीव शरीर को देखकर विलाप करने लगा। [[जामवन्त|जांबवान]] ने कहा -'लक्ष्मण मृत नहीं हैं, उनके लिए शीघ्र उपाय करना होगा।' लक्ष्मण नारायण का रूप था। रावण से युद्ध करते हुए उसे महाचक्र की प्राप्ति हुई थी। चक्र से ही उसने रावण को मारा था। तदुपरांत राम-लक्ष्मण सीता को प्राप्त करके [[लंका]] में छ: वर्ष तक रहें पूर्वसमर्पित तथा परिणीत समस्त कन्याओं को लक्ष्मण ने वहीं बुलवा लिया। लक्ष्मण का राज्याभिषेक हुआ। राम ने राज्याभिषेक करवाना स्वीकार नहीं किया। &lt;br /&gt;
*एक बार रत्नचूल और मणिचूल नामक देवों ने राम-लक्ष्मण के पारस्परिक प्रेम की परीक्षा लेने के लिए राम के भवन में यह मायानिर्मित शब्द का प्रसार किया कि 'राम मर गये हैं।' इस शब्द को सुनकर शोकातुर लक्ष्मण ने प्राण त्याग दिये। दोनों देव अपने कृत्य में पापबोध करते हुए देवलोक चले गये।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;पउम चरित, 38।61।62।, 73।-77।,110। &amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्री लक्ष्मण जी ने अपने चौदह वर्ष के अखण्ड ब्रह्मचर्य और अद्भुत चरित्र-बल पर [[लंका]] में [[मेघनाद]] जैसे शक्तिशाली योद्धा पर विजय प्राप्त किया। ये भगवान की कठोर–से–कठोर आज्ञा का पालन करने में भी कभी नहीं हिचकते। भगवान की आज्ञा होने पर आँसुओं को भीतर-ही-भीतर पीकर इन्होंने श्री जानकी जी को वन में छोड़ने में भी संकोच नहीं किया। इनका आत्मत्याग भी अनुपम है। जिस समय तापस वेशधारी काल की श्री राम से वार्ता चल रही थी तो द्वारपाल के रूप में उस समय श्री लक्ष्मण ही उपस्थित थे। किसी को भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। उसी समय [[दुर्वासा]] ऋषि का आगमन होता है और वे श्री राम का तत्काल दर्शन करने की इच्छा प्रकट करते हैं। दर्शन न होने पर वे शाप देकर सम्पूर्ण परिवार को भस्म करने की बात करते हैं। श्री लक्ष्मण जी ने अपने प्राणों की परवाह न करके उस समय दुर्वासा को श्री राम से मिलाया और बदलें में भगवान से परित्याग का दण्ड प्राप्त कर अद्भुत आत्मत्याग किया। श्री राम के अनन्य सेवक श्रीलक्ष्मण धन्य हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>लंका</title>
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		<updated>2010-04-29T11:10:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''लंका / Lanka'''&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*मय दानव किन्तु दूसरी परम्परा के अनुसार [[विश्वकर्मा]] द्वारा निर्मित, [[चित्रकूट]] पर्वत के बीच समुद्रों से घिरी [[कुबेर]] की स्वर्ग नगरी, जिसे बाद में [[रावण]] ने अपने पराक्रम से छीन लिया था। &lt;br /&gt;
*यद्यपि आधुनिक लंका में इसका किंचित मात्र भी उल्लेख नहीं प्राप्त होता है किन्तु [[राम]]-कथा के प्रसंग में '[[वाल्मीकि रामायण]]' से लेकर आज तक लिखे गये समस्त राम-काव्यों में इसका प्रयोग मिलता है। &lt;br /&gt;
*इस प्रदेश का ऐतिहासिक व्यक्तित्व सिंहल द्वीप आदि के रूप में सर्वथा काल्पनिक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>रामलीला</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''रामलीला / Ramlila'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[दशहरा]] उत्सव में रामलीला भी महत्वपूर्ण है। रामलीला में [[राम]], [[सीता]] और [[लक्ष्मण]] की जीवन का वृत्तांत का वर्णन किया जाता है। रामलीला नाटक का मंचन देश के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। यह देश में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। बंगाल और मध्य भारत के अलावा दशहरा पर्व देश के अन्य राज्यों में क्षेत्रीय विषमता के बावजूद एक समान उत्साह और शौक़ से मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
==वीथिका रामलीला==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery widths=&amp;quot;145px&amp;quot; perrow=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-1.jpg|[[गणेश]] जी के वेश में &amp;lt;br /&amp;gt;कलाकार रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Performance of Ganesha in Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-2.jpg|दशानन [[रावण]], रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-3.jpg|रामजन्म,रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Rambirth, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-4.jpg|छप्पन भोग, रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Chhappan Bhog, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Sita-Haran-Ramlila-Mathura-5.jpg|[[सीता]] हरण रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Kidnapping of Sita, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-6.jpg|[[दशहरा]], रामलीला मैदान [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Dussera, Ramlila Ground, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-7.jpg|[[राम]] रावण युद्ध रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ram Ravana Battle, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-9.jpg|[[रावण]] दहन, रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana Dahan, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-10.jpg|रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-11.jpg|रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ravana-Ramlila-Mathura-12.jpg|[[रावण]], रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ravana, Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
चित्र:Ramlila-Mathura-13.jpg|रामलीला, [[मथुरा]]&amp;lt;br /&amp;gt; Ramlila, Mathura&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>भगीरथ</title>
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		<updated>2010-04-29T11:07:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भगीरथ / Bhagirath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा [[सगर]] के बाद अंशुमान राजा हुए। उनके पुत्र का नाम [[दिलीप]] था। दिलीप को राज्य-भार सौंप, [[गंगा नदी|गंगा]] को [[पृथ्वी]] पर लाने की चिंता में ग्रस्त उन्होंने तपस्या करते हुए शरीर त्याग किया। दिलीप गंगा को पृथ्वी पर लाने का कोई मार्ग न सोच पाये और बीमार होकर स्वर्ग सिधार गये। दिलीप के घर भगीरथ नामक पुत्र का जन्म हुआ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन और पिता का तप था। उन्होंने तप में मन लगा दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वर==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
भगीरथ पुत्रहीन थे। उन्होंने राज्यभार अपने मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं गौकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या करने लगे। [[ब्रह्मा]] के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वर माँगे—एक तो यह कि गंगा जल चढ़ाकर भस्मीभूत पितरों को स्वर्ग प्राप्त करवा पायें और दूसरा यह कि उनको कुल की सुरक्षा करने वाला पुत्र प्राप्त हो। ब्रह्मा  ने उन्हें दोनों वर दिये, साथ ही यह भी कहा कि गंगा का वेग इतना अधिक है कि पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती। [[शिव|शंकर]] भगवान की सहायता लेनी होगी। ब्रह्मा के [[देवता|देवताओं]] सहित चले जाने के उपरान्त भगीरथ ने पैर के अंगूठों पर खड़े होकर एक वर्ष तक तपस्या की। शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया। गंगा को अपने वेग पर अभिमान था। उन्होंने सोचा था कि उनके वेग से शिव पाताल में पहुँच जायेंगे। शिव ने यह जानकर उन्हें अपनी जटाओं में ऐसे समा लिया कि उन्हें वर्षों तक शिव-जटाओं से निकलने का मार्ग नहीं मिला। &lt;br /&gt;
==धरती पर गंगा का अवतरण==&lt;br /&gt;
भगीरथ ने फिर से तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर उसे बिंदुसर की ओर छोड़ा। वे सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा की ओर; सुचक्षु, सीता और महानदी [[सिन्धु नदी|सिंधु]] पश्चिम की ओर बढ़ी। सातवीं धारा राजा भगीरथ की अनुगामिनी हुई। राजा भगीरथ गंगा में स्नान करके पवित्र हुए और अपने दिव्य रथ पर चढ़कर चल दिये। गंगा उनके पीछे-पीछे चलीं। मार्ग में अभिमानिनी गंगा के जल से जह्नुमुनि की यज्ञशाला बह गयी। क्रुद्ध होकर मुनि ने सम्पूर्ण गंगा जल पी लिया। इस पर चिंतित समस्त देवताओं ने जह्नुमुनि का पूजन किया तथा गंगा को उनकी पुत्री कहकर क्षमा-याचना की। जह्नु ने कानों के मार्ग से गंगा को बाहर निकाला। तभी से गंगा जह्नुसुता जान्हवी भी कहलाने लगीं। भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा समुद्र तक पहुँच गयीं। भगीरथ उन्हें रसातल ले गये तथा पितरों की भस्म को गंगा से सिंचित कर उन्हें पाप-मुक्त कर दिया। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा—“हे भगीरथ, जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देववत माने जायेंगे तथा गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी नाम से विख्यात होगी। साथ ही वह तीन धाराओं में प्रवाहित होगी, इसलिए त्रिपथगा कहलायेगी।’’&amp;lt;ref&amp;gt;[[वाल्मीकि रामायण]], [[बाल काण्ड वा॰ रा॰|बाल काण्ड]], सर्ग 42, श्लोक 1-25, सर्ग 43, 1-43, सर्ग 44, श्लोक 1-6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत के अनुसार==&lt;br /&gt;
भगीरथ अंशुमान का पौत्र तथा दिलीप का पुत्र था। उसे जब विदित हुआ कि उसके पितरों को (सगर के साठ हजार पुत्रों को) सदगति तब मिलेगी जब वे गंगाजल का स्पर्श प्राप्त कर लेंगे, तो अत्यंत अधीरता से अपना राज्य मन्त्री को सौंपकर वह [[हिमालय]] पर चला गया। वहाँ तपस्या से उसने गंगा को प्रसन्न किया। गंगा ने कहा कि वह तो सहर्ष पृथ्वी पर अवतरित हो जायेगी, पर उसके पानी के वेग को शिव ही थाम सकते हैं, अन्य कोई नहीं। अत: भगीरथ ने पुन: तपस्या प्रारम्भ की। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा का वेग थामने की स्वीकृति दे दी। गंगा भूतल पर अवतरित होने से पूर्व हिमालय में शिव की जटाओं पर उतरी, वहाँ वेग शान्त होने पर वह पृथ्वी पर अवतरित हुई तथा भगीरथ का अनुसरण करते हुए सूखे समुद्र तक पहुँची, जिसका जल [[अगस्त्य]] मुनि ने पी लिया था। उस समुद्र को भरकर गंगा ने पाताल स्थित सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया। गंगा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का स्पर्श करने के कारण त्रिपथगा कहलायी। गंगा को भगीरथ ने अपनी पुत्री बना लिया।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
राजा भगीरथ ने सौ [[अश्वमेध यज्ञ|अश्वमेध यज्ञ]] का अनुष्ठान किया था। उनके महान यज्ञ में [[इन्द्र]] सोमपान कर मदमस्त हो गये थे। भगीरथ ने गंगा के किनारे दो स्वर्ण घाट बनवाये थे। उन्होंने रथ में  बैठी अनेक सुन्दर कन्याएँ धन-धान्य सहित, ब्राह्मणों को दानस्वरूप दी थी। गंगा उनकी पुत्री होने के कारण भागीरथी कहलायी। राजा भगीरथ के संकल्प कालिक जलप्रवाह से आक्रांत होकर गंगा राजा की गोद में जा बैठी। भगीरथ की पुत्री होने के नाते जो गंगा भागीरथी कहलायी थी, वही गंगा राजा के उरु (जंघा) पर बैठने के कारण उर्वशी नाम से विख्यात हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]], 108, 109।– द्रोणपर्व, 60।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
राजा सगर की दो रानियाँ थीं—सुमति तथा केशिनी। दोनों ने अर्जमुनि को प्रसन्न किया। सुमति ने साठ हजार पुत्र माँगे और केशिनी ने एक पुत्र माँगा। इस प्रकार केशिनी के पुत्र का नाम पंचजन्य ([[असमंजस]]) पड़ा। उससे क्रमश: अंशुमान, दिलीप, भगीरथ-पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र का जन्म हुआ। भगीरथ ने तप से गंगा को प्रसन्न किया। फिर प्तपस्या से सदाशिव को प्रसन्न किया कि वे पृथ्वी पर उतरती हुई गंगा का वेग ग्रहण कर लें। शिव की जटाओं में गंगा विलीन हो गयी। तपस्या से सदाशिव को प्रसन्न किया तो उन्होंने अपनी जटाओं को निचोड़ा जिससे तीन बूंद जल दिखलायी दिया। एक बूंद धारा बनकर पाताल की ओर चली गयी, दूसरी आकाश की ओर और तीसरी भागीरथी के रूप में भगीरथ के पीछे-पीछे वहाँ पहुँची, जहाँ सगर के साठ सहस्त्र पुत्रों की भस्म थी। जल के स्पर्श से वे मुक्त  हो गये। दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे किन्तु वे तपोभूमि में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। उनकी आकांक्षा की पूर्ति उनके पुत्र भगीरथ ने की।&amp;lt;ref&amp;gt;[[शिव पुराण]], 11।22&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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	<entry>
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		<title>रघु</title>
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		<updated>2010-04-29T11:06:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''रघु / Raghu'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[अयोध्या]] के [[इक्ष्वाकु वंश]] के एक प्रसिद्ध राजा जो राजा [[दिलीप]] के पुत्र थे। मान्यता है कि दिलीप को नंदिनी गाय की सेवा के प्रसाद से ये पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। ये बचपन से ही अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। रघु के बाल्यकाल में ही उनके पिता ने [[अश्वमेध यज्ञ]] का घोड़ा छोड़ा था। [[इन्द्र]] ने उस घोड़े को पकड़ लिया, परंतु उसे रघु के हाथों पराजित होना पड़ा। &lt;br /&gt;
*रघु बड़े प्रतापी राजा थे। गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने अपने राज्य में शांति स्थापित की और दिग्विजय करके चारों दिशाओं में राज्य का विस्तार किया। एक बार इन्होंने दिग्विजय करके अपने गुरु [[वसिष्ठ]] की आज्ञा से विश्वजित यज्ञ किया और उसमें अपनी संपूर्ण संपत्ति दान कर दी। इसके बाद ही [[विश्वामित्र]] के शिष्य कौत्स ने आकर गुरु दक्षिणा चुकाने के लिए राजा रघु से धन की मांग की। इस पर रघु ने [[कुबेर]] पर आक्रमण करके उसे राज्य में सोने की वर्षा करने के लिए बाध्य किया और कौत्स को इच्छानुसार धन दिया।&lt;br /&gt;
*'आज मैं कृतार्थ हुआ! आप-जैसे तपोनिष्ठ, वेदज्ञ ब्रह्मचारी के स्वागत से मेरा गृह पवित्र हो गया। आपके गुरुदेव श्री वरतन्तु मुनि अपने तेज से साक्षात [[अग्निदेव]] के समान हैं। उनके आश्रम का जल निर्मल एवं पूर्ण तो है? वर्षा वहाँ ठीक समय पर होती है न? आश्रम के नीवार समय पर पकते हैं तो? आश्रम के, मृग एवं तरू पूर्ण प्रसन्न हैं न? आपका अध्ययन पूर्ण हो गया होगा। अब आपके गृहस्थाश्रम में प्रवेश का समय है। मुझे कृपापूर्वक कोई सेवा सूचित करें। मैं इसमें सौभाग्य मानूँगा।' ब्राह्मणकुमार कौत्स का महाराज रघु ने स्वागत किया था। महाराज के कुशल-प्रश्न शिष्टाचार मात्र नहीं थे। उनका तात्पर्य इन्द्र, [[वरुण]], [[अग्नि]], [[वायु]], वनदेवता, पृथ्वी-सबको वे दण्डधर शासित कर सकते थे। तपोमूर्ति ऋषियों के आश्रम में विघ्न करने का साहस किसी देवता को भी नहीं करना चाहिये। &lt;br /&gt;
*'आप-जैसे धर्मज्ञ एवं प्रजावत्सल नरेश के राज्य में सर्वज्ञ मंगल सहज स्वाभाविक है। आश्रम में सर्वत्र कुशल है। मैंने गुरुदेव से अध्ययन के अनन्तर गुरु-दक्षिणा माँगने का आग्रह किया। वे मेरी सेवा से ही सन्तुष्ट थे, पर मेरे बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने चौदह कोटि स्वर्ण-मुद्राएँ माँगीं; क्योंकि मैंने उनसे चतुर्दश विद्याओं का अध्ययन किया है। नरेन्द्र! आपका मंगल हो। मैं आपको कष्ट नहीं दूँगा। पक्षी होने पर भी चातक सर्वस्व अर्पितकर सहज शुभ्र बने घनों से याचना नहीं करता। आप अपने त्याग से परमोज्ज्वल हैं। मुझे अनुमति दें।' कौत्स ने देखा था कि महाराज के शरीर पर एक भी आभूषण नहीं है। मिट्टी के पात्रों में उस चक्रवर्ती ने अतिथि को अर्घ्य एवं पाद्य निवेदित किया था। यज्ञान्त में महाराज ने सर्वस्व दान कर दिया था। राजमुकुट और राजदण्ड के अतिरिक्त उनके समीप कुछ नहीं था।&lt;br /&gt;
*'आप पधारे हैं तो मुझ पर दया करके तीन दिन मेरी अग्निशाला में चतुर्थ अग्नि की भाँति सुपूजित होकर निवास करें!' रघु के यहाँ से सुयोग्य वेदज्ञ ब्राह्मण निराश लौटे, यह कैसे सहा जाय। कौत्स को महाराज की प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी। &lt;br /&gt;
*'मैं आज रथ में शयन करूँगा। उसे शस्त्रों से सुसज्जित कर दो! कुबेर ने कर नहीं दिया है।' यज्ञ के अवसर पर सम्पूर्ण नरेश कर दे चुके थे। सम्पूर्ण कोष दान हो चुका। अतिथि की याचना पूरी किये बिना भवन में प्रवेश भी अनुचित जान पड़ा। कुबेर तो दूसरे [[देवता|देवताओं]] के समान स्वर्ग में नहीं रहते। उनकी अलका (निवास) [[हिमालय]] पर ही तो है। तब वे भी चक्रवर्ती के एक सामन्त ही हैं। कर देना चाहिये उन्हें। महाराज ने प्रात: अलका पर आक्रमण का निश्चय किया। &lt;br /&gt;
*'देव! को्षागार में स्वर्ण-वर्षा हो रही है।' ब्राह्म मुहूर्त में महाराज नित्यकर्म से निवृत्त होकर रथ पर बैठे। उन्होंने शंखध्वनि की। इतने में दौड़ते हुए कोषाध्याक्ष ने निवेदन किया। वह कोषागार के प्रात: पूजन को गये थें कुबेर ने इस प्रकार कर दिया। &lt;br /&gt;
*'यह द्रव्य आपके निमित्त आया है। ब्राह्मण के निमित्त प्राप्त द्रव्य में से मैं या मेरी प्रजा कोई अंश कैसे ले सकती है।' महाराज का आग्रह ठीक ही था। &lt;br /&gt;
*'मैं ब्राह्मण हूँ। 'शिल' या 'कण' मेरी विहित वृत्ति है। गुरु दक्षिणा की चौदह कोटि मुद्राओं से अधिक एक का भी स्पर्श मेरे लिये लोभ तथा पाप है। ब्रह्मचारी कौत्स का कहना भी उचित ही था। आज के युग में, जब मनुष्य दूसरों के स्वत्व का हरण करने को नित्य सोत्साह उद्यत है, यह त्यागमय विवाद कैसे समझ सकेगा वह। ब्रह्मचारी चौदह कोटि मुद्रा ले गये। शेष ब्राह्मणों को दान हो गयीं।&lt;br /&gt;
*रघु अपने कुल में सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं। इन्हीं की महत्ता के कारण इक्ष्वाकु वंश का नाम '[[इक्ष्वाकु|रघु वंश]]' हो गया। रघु के पुत्र [[अज]], अज के पुत्र [[दशरथ]] और दशरथ के पुत्र [[राम]] [[अयोध्या]] के नरेश हुए। रघु के वंशज होने के कारण ही राम को राघव, रघुवर, रघुनाथ आदि भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*महाकवि [[कालिदास]] ने [[रघुवंश]] में [[पुराण|पुराणों]] की वंशावली को कुछ उलट-पुलट दिया है। पुराणों के अनुसार खट्वांग के पुत्र दीर्घबाहु थे और उनके महाराज रघु। रघु के पुत्र अज और अज के महाराज दशरथ हुए। महाराज रघु परम पराक्रमी, अमित यशस्वी तथा पुत्र के समान प्रजा की रक्षा करने वाले थे। उनके नाम पर ही सूर्यवंशीय क्षत्रियों का कुल रघुवंशी कहलाया। भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री [[राम]] इसी महिमामय कुल में अवतीर्ण हुए।      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
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		<title>युद्ध काण्ड वा. रा.</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''युद्ध काण्ड / लंका काण्ड / Yudha Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युद्धकाण्ड में वानरसेना का पराक्रम, रावणकुम्भकर्णादि राक्षसों का अपना पराक्रम-वर्णन, [[विभीषण]]-तिरस्कार, विभीषण का [[राम]] के पास गमन, विभीषण-शरणागति, समुद्र के प्रति क्रोध, नलादि की सहायता से सेतुबन्धन, शुक-सारण-प्रसंग, सरमावृत्तान्त, [[रावण]]-[[अंगद]]-संवाद, [[मेघनाद]]-पराजय, [[कुम्भकर्ण]] आदि राक्षसों का राम के साथ युद्ध-वर्णन, कुम्भकर्णादि राक्षसों का वध, मेघनाद वध, राम-रावण युद्ध, रावण वध, [[मंदोदरी]] विलाप, विभीषण का शोक, राम के द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक, [[लंका]] से सीता का आनयन, सीता की शुद्धि हेतु [[अग्नि]]-प्रवेश, [[हनुमान]], [[सुग्रीव]], अंगद आदि के साथ राम, [[लक्ष्मण]] तथा सीता का [[अयोध्या]] प्रत्यावर्तन, राम का राज्याभिषेक तथा [[भरत]] का युवराज पद पर आसीन होना, सुग्रीवादि वानरों का किष्किन्धा तथा विभीषण का लंका को लौटना, रामराज्य वर्णन और [[रामायण]] पाठ श्रवणफल कथन आदि का निरूपण किया गया है। इस काण्ड में 128 सर्ग तथा सबसे अधिक 5,692 श्लोक प्राप्त होते हैं। शत्रु के जय, उत्साह और लोकापवाद के दोष से मुक्त होने के लिए युद्ध काण्ड का पाठ करना चाहिए। इसे बृहद्धर्मपुराण में लंका काण्ड भी कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;शत्रोर्जये समुत्साहे जनवादे विगर्हिते।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
लंकाकाण्डं पठेत् किं वा श्रृणुयात् स सुखी भवेत्॥(बृहद्धर्मपुराण 26…13)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>मेघनाद</title>
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		<updated>2010-04-29T11:06:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मेघनाद / Meghnad'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*इन्द्रजित [[रावण]] का बेटा था। &lt;br /&gt;
*इसे मेघनाद के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
*उसने [[राम]] की सेना से मायावी युद्ध किया था। कभी अंतर्धान हो जाता, कभी प्रकट हो जाता। &lt;br /&gt;
*[[विभीषण]] प्रज्ञास्त्र द्वारा उन दोनों को होश में लाया तथा [[सुग्रीव]] ने अभिमन्त्रित विशल्या नामक औषधि से उन्हें स्वस्थ किया। &lt;br /&gt;
*विभीषण ने [[कुबेर]] की आज्ञा से गुह्यक जल श्वेतपर्वत से लाकर दिया, जिससे नेत्र धोकर अदृश्य को भी देखा जा सकता था। सभी प्रमुख योद्धाओं ने जल का प्रयोग किया तथा इन्द्रजित को मार डाला। &lt;br /&gt;
*जब मेघनाद का जन्म हुआ तो वह मेघ गर्जन के समान जोर से रोया, इसी से उसका नाम मेघनाद रखा गया। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 12, श्लोक 29-32&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*रावण के पुत्र मेघनाद को इन्द्रजित भी कहते है, क्योंकि एक बार उसने [[इन्द्र]] को परास्त कर दिया था। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 44, श्लोक 36, सर्ग 45|22&amp;lt;/ref&amp;gt; *कथा निम्न प्रकार है—देवलोक पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से [[रावण]] ने [[देवता|देवताओं]] से युद्ध किया। उस भयानक युद्ध में देवताओं और राक्षसों के अनेक सैनिक मारे गये। अंत में मेघनाद ने अपनी माया से चारों ओर अंधकार फैलाकर इन्द्र को बंदी बना लिया। मेघनाद इन्द्र को लेकर [[लंका]]पुरी चला गया। इससे परेशान होकर सब देवता [[ब्रह्मा]] को लेकर मेघनाद के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने इन्द्र को छोड़ने के लिए कहा और बदले में मेघनाद को वर दिया कि &lt;br /&gt;
#वह इन्द्रजित कहलायेगा, &lt;br /&gt;
#उसे अनेक सिद्धियां प्राप्त होंगी &lt;br /&gt;
#युद्ध से पूर्व यज्ञ करने पर [[अग्नि]] से उसके लिए घोड़े सहित रथ निकलेगा, जिन पर बैठा वह अजेय रहेगा किंतु यदि कभी यज्ञ पूरा नहीं हो पाया तो वह युद्ध में मारा जायेगा। [[ब्रह्मा]] की प्रेरणा से इन्द्र ने वैष्णव यज्ञ किया, तभी वह देवलोक का अधिपति बनने का अधिकारी हुआ। देवता-गण उसे लेकर देवलोक चले गये। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 28-29, सर्ग 30, 1-18&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मेघनाद ने निकुंभिला के स्थान पर जाकर अग्निष्टोम, अश्वमेघ आदि सात यज्ञ करके [[शिव]] से अनेक वर प्राप्त किये थे। सबसे अंतिम माहेश्वर यज्ञ रह गया था। उन यज्ञों के फलस्वरुप उसे तामसी नामक माया की प्राप्ति हुई थी, जो कभी भी अंधकार फैला सकती थी। साथ ही आकाशगामी दिव्य रथ भी प्राप्त हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt; बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 25, श्लोक 7-10&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मेघनाद को ब्रह्मा के वरदान से ‘ब्रह्माशिर’ नाम का अस्त्र और इच्छानुसार चलने वाले घोड़े प्राप्त थे। वह जिस सिद्धि को प्राप्त करने निकुंभिलादेवी के मंदिर में गया था, उसे सिद्ध करने के उपरांत देवताओं समेत इन्द्र भी उसे जीतने में असमर्थ हो जाते। ब्रह्मा ने उससे कहा था— 'हे इन्द्रजित, यदि तुम्हारा कोई शत्रु निकुंभिला में तुम्हारे यज्ञ समाप्त करने से पूर्व युद्ध करेगा तो तुम मार डाले जाओगे।'&amp;lt;ref&amp;gt;	बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 85, श्लोक 11-15&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*सब वीर राक्षसों को नष्टप्राय देखकर रावण ने मेघनाद को युद्ध करने के लिए कहा। मेघनाद ने युद्ध में जाने से पूर्व [[अग्नि]] में राक्षसी हवन किया। लाल पगड़ी बांधकर कई हजार राक्षसियां इन्द्रजित की रक्षा में व्यस्त हो गयीं। उस यज्ञ में सरपत के स्थान पर शस्त्र बिछाये गये थे। बहेड़े की लकड़ी, लाल वस्त्र और काले लोहे की स्त्रुवा लायी गयी थीं। शरपत्रों से अग्नि प्रज्वलित करके एक जीवित काले बकरे का गला पकड़ा और अग्नि में छोड़ दिया। धूम्ररहित अग्नि ने प्रज्वलित होकर विजय की सूचना दी। सुवर्ण अग्नि ने स्वयं प्रकट होकर दाहिनी ओर बढ़कर इन्द्रजित की दी हुई हवि को स्वीकार किया। हवन समाप्ति के उपरंत देवताओं, दानवों और राक्षसों को तृप्त किया गया।&amp;lt;ref&amp;gt; बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 80, श्लोक 1-11&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*मायावी सीता को मरा जानकर [[हनुमान]] की आज्ञा से वानरों ने युद्ध बंद कर दिया। मेघनाद निकुंभिलादेवी के स्थान पर गया। वहां उसने हवन किया। मांस और रुधिर की आहुति से अग्नि प्रज्वलित हो गयी। मेघनाद को ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि निकुंभिलादेवी के मंदिर यज्ञ समाप्त करने के उपरांत समस्त देवता एंव इन्द्र भी उसे पराजित न कर पायेंगे— किंतु यदि किसी शत्रु ने यज्ञ में विघ्न डाला तो वह मारा जायेगा।  &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, 82|24-28|-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 85, श्लोक 11-15&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*मेघनाद विशाल भयानक वटवृक्ष के पास भूतों को बलि देकर युद्ध में जाता था, इसी से वह अदृश्य होकर युद्ध कर पाता था। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 87, श्लोक 4-5&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*[[विभीषण]] ने [[लक्ष्मण]] और [[राम]] को मेघनाद की मायावी शक्ति के साथ यह बताया कि ब्रह्मा ने अनेक वर देते हुए यह भी कहा था कि 'यदि तुम्हारा कोई शत्रु निकुंभिला में तुम्हारे यज्ञ समाप्त करने से पूर्व युद्ध करेगा तो तुम मार डाले जाओगे।' अतः लक्ष्मण ने मेघनाद के यज्ञ विघ्न डाला। ससैन्य लक्ष्मण को युद्धार्थ आया देखकर मेघनाद को लेकर एक भयानक वट-वृक्ष के पास पहुंचा और बोला कि मेघनाद इसी स्थान पर भूतों को बलि चढ़ाकर जाता है, इसी से  वह अदृश्य होकर युद्ध करने में समर्थ रहता है। लक्ष्मण वहां प्रतीक्षा करते रहे। जब मेघनाद आया तो दोनों में युद्ध छिड़ गया। भयंकर युद्ध के बाद लक्ष्मण ने उसके घोड़े और सारथी को मार डाला। मेघनाद [[लंका]]पुरी गया तथा दूसरा रथ लेकर फिर युद्ध-कामना के साथ लौटा। दोनों का युद्ध पुनः आरंभ हुआ। अंत में लक्ष्मण ने मेघनाद को मार डाला।  &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 86 से 91,&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
                                                      &lt;br /&gt;
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{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%9A&amp;diff=17381</id>
		<title>मारीच</title>
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		<updated>2010-04-29T11:06:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मारीच / Marich'''&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*यह [[लंका]] के राजा [[रावण]] का मामा, सुण्ड एवं [[ताड़का]] का पुत्र था। &lt;br /&gt;
*सुबाहु का भाई था। &lt;br /&gt;
*सुबाहु-वध के अवसर पर [[राम]] ने उसे अपने बाण से लंका पहुँचा दिया था। [[सीता]]-हरण के अवसर पर रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली। &lt;br /&gt;
*मारीच कंचन का मृग बनकर सीता-हरण का कारण बना। &lt;br /&gt;
*इसी अवसर पर राम ने उसे अपने बाण से मारा था। &lt;br /&gt;
*राम-रावण युद्ध का सामान्यत: यह भी एक कारण समझा जाता है। &lt;br /&gt;
*'तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपट मृग भयऊ' ('रामचरितमानस') &lt;br /&gt;
==मारीच वाल्मीकि रामायण में==&lt;br /&gt;
एक बार [[अयोध्या]] में [[गाधि]]-पुत्र मुनिवर [[विश्वामित्र]] पधारे। उमका सुचारू आतिध्य कर [[दशरथ]] ने अपेक्षित आज्ञा जानने की उन्होंने एक व्रत की दीक्षा ली है। इससे पूर्व भी वे अनेक व्रतो की दीक्षा लेते रहे किंतु समाप्ति के अवसर पर उनकी यज्ञवेदी पर रुधिर , मांस इत्यादि फेंककर मारीच और [[सुबाहु]] नामक दो राक्षस विघ्न उत्पन्न करते है। व्रत के, नियमानुसार वे किसी को शाप नहीं दे सकते, अतः उनका नाश करने के लिए वे दशरथी [[राम]] को साथ ले जाना चाहते है। राम की आयु पंद्रह वर्ष थी। दशरथ के शंका करने पर के वह अभी बालक ही है, विश्वामित्र ने उन्हें सुरक्षित रखने का आश्वासन दिया तथा राम और [[लक्ष्मण]] को साथ ले गये। मार्ग में उन्होंने राम को ‘बला-अतिचला’ नामक दो विद्याएं सिखायीं, जिमसे भूख, प्यास, थकान, रोग का अनुभव तथा असावधानता में शत्रु का वार इत्यादि नहीं हो पाता।  &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 18, 36-53,  सर्ग, 19 से 22 तक,  वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 40, श्लोक 1-30,वाल्मीकि रामायण, बाल अरण्य कांड, सर्ग 38, श्लोक 1-22&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==यज्ञ की निविघ्नता==                                       &lt;br /&gt;
यज्ञ की निविघ्नता के लिए राम और लक्ष्मण ने छः दिन तक रात-दिन पहरा देने का निश्चय किया। विश्वामित्र का यज्ञ सिद्धाश्रम में चल रहा था। पांच दिन और रात बीतने के उपरांत अचानक उन्होंने देखा कि यज्ञ वेदी पर सब ओर से आग जलने लगी है— पुरोहित भी जलने लगा है और रुधिर की वर्षा हो रही है। आकाश में मारीच और सुबाहु को देख राम-लक्ष्मण ने युद्ध आरंभ किया। मारीच के अतिरिक्त सभी राक्षस तथा उनके साथियों को मार डाला तथा राम ने मारीच को मानवास्त्र के द्वारा उड़ाकर सौ [[योजन]] दूर एक समुन्द्र में फेंक दिया, जहां वह छाती पर लगे मानवास्त्र के कारण बेहोश होकर जा गिरा। लक्ष्मण ने आग्नेय शास्त्र से सुबाहु को घायल कर दिया तथा वायव्य अस्त्र से शेष राक्षसों को उड़ा दिया। &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 29,30,&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==राम वनवास में मारीच==&lt;br /&gt;
राम के वनवास के दिनों में मारीच ने [[सीता]] को लुभाने के लिए वनवास इन्द्रधनुषी रंग में एक अनुपम सुंदर मृग का रूप धारण कर लिया। उसके शरीर पर रुपहले बिंदु दिखलायी पड़ रहे थे। उसके सींग मणि के थे। उस सुनहरे-रुपहले मृग को देखकर सीता अत्यंत चमत्कृत हुई। उन्होंने राम से अनुरोध किया कि वे मृग पकड़कर ला दें। लक्ष्मण ने कहा—'मुझे लगता है, यह कोई मायावी मृग है या मारीच है क्योंकि मारीच ने इस प्रकार से कई बार लोगों को ठगा है।' पर सीता नहीं मानीं। वे मृग को जीवित पकड़वाना चाहती थीं और वनवास की अवधि के बाद [[अयोध्या]] भी ले जाना चाहती थीं। राम ने लक्ष्मण से सीता का ध्यान रखने के लिए कहा और स्वंय मृग का पीछा किया। वह कभी छुपता, कभी दीखता, अंत में राम ने [[ब्रह्मा]] द्वारा निर्मित बाण छोड़ा, जिसके लगने से वह हिरण मारा गया तथा उसका मायावी रूप नष्ट हो गया। मारीच ने मरने से पुर्व जोर से पुकारा— 'हा लक्ष्मण! हा सीते!' सीता ने आवाज सुनी तो व्याकुल होकर लक्ष्मण को उधर जाने के लिए कहा। लक्ष्मण के यह कहने पर कि यह राम की आवाज नहीं है, सीता ने यहाँ तक भी कहा— 'तू राम का नाश होने पर मुझे अपनी भार्या बनाना चाहता है, इसीलिए [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] ने तुझे अकेले हमारे साथ भेजा है।' लक्ष्मण को जाना पड़ा। उसके जाते ही [[रावण]] संन्यासी वेश में सीता के पास पहुंचा। सीता ने उसे ब्राह्मण जानकर सत्कार किया। रावण ने सीता से उसका परिचय प्राप्त किया तथा अपना परिचय देकर उसे पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट की। सीता बहुत क्रुद्ध हुई। सीता के अमित विरोध करने पर भी रावण ने जबरदस्ती उसे गोद में उठाकर अपने विमान बैठाया और [[लंका]] की ओर उड़ चला। मार्ग में [[जटायु]] ने सीता को बचाने का प्रयास किया। उसने रावण का रथ, सारथी इत्यादि को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। रावण भी घायल हुआ किंतु रावण ने उसके पंख और पैर काट डाले और उसे तड़पता हुआ छोड़कर आगे बढ़ा। सीता के विरोध करने पर रावण ने उसके बाल पकड़कर खींचे और गोद में उठाकर लंका की ओर उड़ चला। बिलखती हुई सीता ने मार्ग पांच वानरों को बैठा देखा। उसने अपनी ओढ़नी में कुछ मांगलिक आभूषण बांधकर उनकी ओर फेंक दिये कि शायद वे ही राम तक उसका समाचार पहुंचा दें। रावण सीता को लेकर लंका पहुंचा। उसने एक वर्ष के लिए सीता को [[अशोक वाटिका]] में राक्षसियों के निरीक्षण में रख दिया, जिससे वह राम को भुलाकर रावण से विवाह करने के लिए तैयार हो जाये। &amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि रामायण, बाल अरण्य कांड, सर्ग 42 से 56&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>भरत (दशरथ पुत्र)</title>
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		<updated>2010-04-29T11:06:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;'''भरत / Bharat'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[वाल्मीकि रामायण]] में वर्णित है कि [[अयोध्या]] के राजा [[दशरथ]] की तीन पत्नी थीं- [[कौशल्या]], [[कैकई]] और [[सुमित्रा]] । कौशल्या से [[राम]] , कैकई से भरत और सुमित्रा से [[लक्ष्मण]] एवं [[शत्रुघ्न]] पुत्र थे ।&lt;br /&gt;
==आदर्श चरित्र==&lt;br /&gt;
श्री भरत जी का चरित्र समुद्र की भाँति अगाध है, बुद्धि की सीमा से परे है। लोक-आदर्श का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण अन्यत्र मिलना कठिन है। भ्रातृ प्रेम की तो ये सजीव मूर्ति थे। ननिहाल से अयोध्या लौटने पर जब इन्हें माता से अपने पिता के स्वर्गवास का समाचार मिलता है, तब ये शोक से व्याकुल होकर कहते हैं- 'मैंने तो सोचा था कि पिता जी श्री राम का [[अभिषेक]] करके यज्ञ की दीक्षा लेंगे, किन्तु मैं कितना बड़ा अभागा हूँ कि वे मुझ बड़े भइया श्री राम को सौंपे बिना स्वर्ग सिधार गये। जब श्री राम ही मेरे पिता और बड़े भाई हैं, जिनका मैं परम प्रिय दास हूँ। उन्हें मेरे आने की शीघ्र सूचना दें। मैं उनके चरणों में प्रणाम करूँगा। अब वे ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं।' जब कैकेयी ने श्री भरत को श्री राम वनवास की बात बतायी, तब वे महान दु:ख से संतप्त हो गये। उन्होंने कैकेयी से कहा- 'मैं समझता हूँ, लोभ के वशीभूत होने के कारण तू अब तक यह न जान सकी कि मेरा श्री रामचन्द्र के साथ भाव कैसा है। इसी कारण तूने राज्य के लिये इतना बड़ा अनर्थ कर डाला। मुझे जन्म देने से अच्छा तो यह था कि तू बाँझ ही होती। कम-से-कम मुझ जैसे कुलकंलक का तो जन्म नहीं होता। यह वर माँगने से पहले तेरी जीभ कट कर गिरी क्यों नहीं!'&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
इस प्रकार कैकेयी को नाना प्रकार से बुरा-भला कहकर श्री भरत जी कौशल्या जी के पास गये और उन्हें सान्त्वना दी। इन्होंने गुरु [[वसिष्ठ]] की आज्ञा से पिता की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न की। सबके बार-बार आग्रह के बाद भी इन्होंने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया और दल-बल के साथ श्री राम को मनाने के लिये [[चित्रकूट]] चल दिये। श्रृंगवेरपुर में पहुँचकर इन्होंने निषादराज को देखकर रथ का परित्याग कर दिया और श्री रामसखा [[गुह]] से बड़े प्रेम से मिले। [[प्रयाग]] में अपने आश्रम पर पहुँने पर श्री [[भारद्वाज]] इनका स्वागत करते हुए कहते हैं- 'भरत! सभी साधनों का परम फल श्री [[सीता]][[राम]] का दर्शन है और उसका भी विशेष फल तुम्हारा दर्शन है। आज तुम्हें अपने बीच उपस्थित पाकर हमारे साथ तीर्थराज प्रयाग भी धन्य हो गये।'&lt;br /&gt;
श्री भरत को दल-बल के साथ चित्रकूट में आता देखकर श्री [[लक्ष्मण]] को इनकी नीयत पर शंका होती है। उस समय श्री राम ने उनका समाधान करते हुए कहा- 'लक्ष्मण! भरत पर सन्देह करना व्यर्थ है। भरत के समान शीलवान भाई इस संसार में मिलना दुर्लभ है। अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या [[ब्रह्मा]], [[विष्णु]] और [[शिव|महेश]] का भी पद प्राप्त करके श्री भरत को मद नहीं हो सकता।' चित्रकूट में भगवान श्री राम से मिलकर पहले श्री भरत उनसे अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं, किन्तु जब देखते हैं कि उनकी रूचि कुछ और है तो भगवान की चरण-पादुका लेकर अयोध्या लौट आते हैं। नन्दिग्राम में तपस्वी जीवन बिताते हुए ये श्रीराम के आगमन की चौदह वर्ष तक प्रतीक्षा करते हैं। भगवान को भी इनकी दशा का अनुमान है। वे वनवास की अवधि समाप्त होते ही एक क्षण भी विलम्ब किये बिना अयोध्या पहुँचकर इनके विरह को शान्त करते हैं। श्री रामभक्ति और आदर्श भ्रातृप्रेम के अनुपम उदाहरण श्री भरत धन्य हैं। &lt;br /&gt;
==कथा पउमचरिय से==&lt;br /&gt;
*राम और सीता का विवाह देखकर भरत उदास रहने लगा। उसका विवाह जनक के भाई कनक की कन्या सुभद्रा से हुआ। &lt;br /&gt;
*राम के दक्षिणाप गमन के उपरांत भरत का राज्यकार्य अथवा गृहस्थ में मन नहीं लगता था। कैकेयी की प्रेरणा से वह राम, सीता और लक्ष्मण को वापस लौटाने के लिए गया किंतु वे लोग वापस नहीं आये। [[जैन]] मुनियों के उपदेशानुसार उसने निश्चय किया कि राम के वापस लौटने तक वह राज्य को संभालेगा तदुपरांत प्रव्रज्या ले लेगा।&lt;br /&gt;
*राम, लक्ष्मण और सीता आदि के पुनरागमन के उपरांत भरत तथा कैकेयी ने दीक्षा ली।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;पउमचरिय, 28, 31। 32।, 83-84।–&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%A5&amp;diff=17379</id>
		<title>भगीरथ</title>
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		<updated>2010-04-29T11:05:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भगीरथ / Bhagirath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा [[सगर]] के बाद अंशुमान राजा हुए। उनके पुत्र का नाम [[दिलीप]] था। दिलीप को राज्य-भार सौंप, [[गंगा नदी|गंगा]] को [[पृथ्वी]] पर लाने की चिंता में ग्रस्त उन्होंने तपस्या करते हुए शरीर त्याग किया। दिलीप गंगा को पृथ्वी पर लाने का कोई मार्ग न सोच पाये और बीमार होकर स्वर्ग सिधार गये। दिलीप के घर भगीरथ नामक पुत्र का जन्म हुआ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन और पिता का तप था। उन्होंने तप में मन लगा दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वर==&lt;br /&gt;
भगीरथ पुत्रहीन थे। उन्होंने राज्यभार अपने मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं गौकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या करने लगे। [[ब्रह्मा]] के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वर माँगे—एक तो यह कि गंगा जल चढ़ाकर भस्मीभूत पितरों को स्वर्ग प्राप्त करवा पायें और दूसरा यह कि उनको कुल की सुरक्षा करने वाला पुत्र प्राप्त हो। ब्रह्मा  ने उन्हें दोनों वर दिये, साथ ही यह भी कहा कि गंगा का वेग इतना अधिक है कि पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती। [[शिव|शंकर]] भगवान की सहायता लेनी होगी। ब्रह्मा के [[देवता|देवताओं]] सहित चले जाने के उपरान्त भगीरथ ने पैर के अंगूठों पर खड़े होकर एक वर्ष तक तपस्या की। शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया। गंगा को अपने वेग पर अभिमान था। उन्होंने सोचा था कि उनके वेग से शिव पाताल में पहुँच जायेंगे। शिव ने यह जानकर उन्हें अपनी जटाओं में ऐसे समा लिया कि उन्हें वर्षों तक शिव-जटाओं से निकलने का मार्ग नहीं मिला। &lt;br /&gt;
==धरती पर गंगा का अवतरण==&lt;br /&gt;
भगीरथ ने फिर से तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर उसे बिंदुसर की ओर छोड़ा। वे सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा की ओर; सुचक्षु, सीता और महानदी [[सिन्धु नदी|सिंधु]] पश्चिम की ओर बढ़ी। सातवीं धारा राजा भगीरथ की अनुगामिनी हुई। राजा भगीरथ गंगा में स्नान करके पवित्र हुए और अपने दिव्य रथ पर चढ़कर चल दिये। गंगा उनके पीछे-पीछे चलीं। मार्ग में अभिमानिनी गंगा के जल से जह्नुमुनि की यज्ञशाला बह गयी। क्रुद्ध होकर मुनि ने सम्पूर्ण गंगा जल पी लिया। इस पर चिंतित समस्त देवताओं ने जह्नुमुनि का पूजन किया तथा गंगा को उनकी पुत्री कहकर क्षमा-याचना की। जह्नु ने कानों के मार्ग से गंगा को बाहर निकाला। तभी से गंगा जह्नुसुता जान्हवी भी कहलाने लगीं। भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा समुद्र तक पहुँच गयीं। भगीरथ उन्हें रसातल ले गये तथा पितरों की भस्म को गंगा से सिंचित कर उन्हें पाप-मुक्त कर दिया। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा—“हे भगीरथ, जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देववत माने जायेंगे तथा गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी नाम से विख्यात होगी। साथ ही वह तीन धाराओं में प्रवाहित होगी, इसलिए त्रिपथगा कहलायेगी।’’&amp;lt;ref&amp;gt;[[वाल्मीकि रामायण]], [[बाल काण्ड वा॰ रा॰|बाल काण्ड]], सर्ग 42, श्लोक 1-25, सर्ग 43, 1-43, सर्ग 44, श्लोक 1-6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत के अनुसार==&lt;br /&gt;
भगीरथ अंशुमान का पौत्र तथा दिलीप का पुत्र था। उसे जब विदित हुआ कि उसके पितरों को (सगर के साठ हजार पुत्रों को) सदगति तब मिलेगी जब वे गंगाजल का स्पर्श प्राप्त कर लेंगे, तो अत्यंत अधीरता से अपना राज्य मन्त्री को सौंपकर वह [[हिमालय]] पर चला गया। वहाँ तपस्या से उसने गंगा को प्रसन्न किया। गंगा ने कहा कि वह तो सहर्ष पृथ्वी पर अवतरित हो जायेगी, पर उसके पानी के वेग को शिव ही थाम सकते हैं, अन्य कोई नहीं। अत: भगीरथ ने पुन: तपस्या प्रारम्भ की। शिव ने प्रसन्न होकर गंगा का वेग थामने की स्वीकृति दे दी। गंगा भूतल पर अवतरित होने से पूर्व हिमालय में शिव की जटाओं पर उतरी, वहाँ वेग शान्त होने पर वह पृथ्वी पर अवतरित हुई तथा भगीरथ का अनुसरण करते हुए सूखे समुद्र तक पहुँची, जिसका जल [[अगस्त्य]] मुनि ने पी लिया था। उस समुद्र को भरकर गंगा ने पाताल स्थित सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया। गंगा स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का स्पर्श करने के कारण त्रिपथगा कहलायी। गंगा को भगीरथ ने अपनी पुत्री बना लिया।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
राजा भगीरथ ने सौ [[अश्वमेध यज्ञ|अश्वमेध यज्ञ]] का अनुष्ठान किया था। उनके महान यज्ञ में [[इन्द्र]] सोमपान कर मदमस्त हो गये थे। भगीरथ ने गंगा के किनारे दो स्वर्ण घाट बनवाये थे। उन्होंने रथ में  बैठी अनेक सुन्दर कन्याएँ धन-धान्य सहित, ब्राह्मणों को दानस्वरूप दी थी। गंगा उनकी पुत्री होने के कारण भागीरथी कहलायी। राजा भगीरथ के संकल्प कालिक जलप्रवाह से आक्रांत होकर गंगा राजा की गोद में जा बैठी। भगीरथ की पुत्री होने के नाते जो गंगा भागीरथी कहलायी थी, वही गंगा राजा के उरु (जंघा) पर बैठने के कारण उर्वशी नाम से विख्यात हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]] [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]], 108, 109।– द्रोणपर्व, 60।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव पुराण के अनुसार==&lt;br /&gt;
राजा सगर की दो रानियाँ थीं—सुमति तथा केशिनी। दोनों ने अर्जमुनि को प्रसन्न किया। सुमति ने साठ हजार पुत्र माँगे और केशिनी ने एक पुत्र माँगा। इस प्रकार केशिनी के पुत्र का नाम पंचजन्य ([[असमंजस]]) पड़ा। उससे क्रमश: अंशुमान, दिलीप, भगीरथ-पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र का जन्म हुआ। भगीरथ ने तप से गंगा को प्रसन्न किया। फिर प्तपस्या से सदाशिव को प्रसन्न किया कि वे पृथ्वी पर उतरती हुई गंगा का वेग ग्रहण कर लें। शिव की जटाओं में गंगा विलीन हो गयी। तपस्या से सदाशिव को प्रसन्न किया तो उन्होंने अपनी जटाओं को निचोड़ा जिससे तीन बूंद जल दिखलायी दिया। एक बूंद धारा बनकर पाताल की ओर चली गयी, दूसरी आकाश की ओर और तीसरी भागीरथी के रूप में भगीरथ के पीछे-पीछे वहाँ पहुँची, जहाँ सगर के साठ सहस्त्र पुत्रों की भस्म थी। जल के स्पर्श से वे मुक्त  हो गये। दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे किन्तु वे तपोभूमि में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। उनकी आकांक्षा की पूर्ति उनके पुत्र भगीरथ ने की।&amp;lt;ref&amp;gt;[[शिव पुराण]], 11।22&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BF&amp;diff=17378</id>
		<title>बालि</title>
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		<updated>2010-04-29T11:03:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''बालि / Bali'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*बालि और [[सुग्रीव]] को वानरश्रेष्ठ ऋक्ष राजा का पुत्र भी कहा जाता हे तथा सुग्रीव को [[इन्द्र]]-पुत्र भी कहा गया है।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 57&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*बालि सुग्रीव का बड़ा भाई था। वह पिता और भाई का अत्यधिक प्रिय था। पिता की मृत्यु  के बाद बालि ने राज्य सम्हाला। स्त्री के कारण से उसका दुंदुभी के पुत्र मायावी से बैर हो गया। एक बार अर्धरात्रि में [[किष्किंधा]] के द्वार पर आकर मायावी ने युद्ध के लिए ललकारा। बालि तथा सुग्रीव उससे लड़ने के लिए गये। दोनों को आता देखकर वह वन की ओर भागा तथा एक बिल में छिप गया। बालि सुग्रीव को बिल के पास खड़ा करके स्वयं बिल में घुस गया। सुग्रीव ने एक वर्ष तक प्रतीक्षा की, तदुपरांत बिल से आती हुई लहू की धारा देखकर वह भाई को मरा जानकर बिल को पर्वत शिखर से ढककर अपने नगर में लौट आया। मन्त्रियों के आग्रह पर उसने राज्य संभाल लिया। उधर बालि ने मायावी को एक वर्ष में ढूंढ़ निकाला। कुटुंब सहित उसे मारकर जब वह लौटा तो बिल पर रखे पर्वत-शिखर को देखकर उसने सुग्रीव को आवाज दी किंतु कोई उत्तर नहीं मिला। जैसे-तैसे शिखर हटाकर जब वह अपनी नगरी में पहुंचा तो सुग्रीव को राज्य करते देखा। उसे निश्चय हो गया कि वह राज्य के लोभ से बालि को बिल में बंद कर आया था, अत: उसने सुग्रीव को निर्वासित कर दिया तथा उसकी पत्नी रूमा को अपने पास रख लिया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 9,10&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*[[पृथ्वी]] तल के समस्त वीर योद्धाओं को परास्त करता हुआ रावण बालि से युद्ध करने के लिए गया। उस समय बालि सन्ध्या के लिए गया हुआ था। वह प्रतिदिन समस्त समुद्रों के तट पर जाकर सन्ध्या करता था। बालि के मन्त्री तार के बहुत समझाने पर भी रावण बालि से युद्ध करने की इच्छा से ग्रस्त रहा। वह सन्ध्या में लीन बालि के पास जाकर अपने पुष्पक विमान से उतरा तथा पीछे से जाकर उसको पकड़ने की इच्छा से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। बालि ने उसे देख लिया था किंतु उसने ऐसा नहीं जताया तथा सन्ध्या करता रहा। रावण की पदचाप से जब उसने जान लिया कि वह निकट है तो तुरंत उसने रावण को पकड़कर बगल में दबा लिया और आकाश में उड़ने लगा। बारी-बारी में उसने सब समुद्रों के किनारे सन्ध्या की। राक्षसों ने भी उसका पीछा किया। रावण ने स्थान-स्थान पर नोचा और काटा किंतु बालि ने उसे नहीं छोड़ा। सन्ध्या समाप्त करके किष्किंधा के उपवन में उसने रावण को छोड़ा तथा उसके आने का प्रयोजन पूछा। रावण बहुत थक गया था किंतु उसे उठाने वाला बालि तनिक भी शिथिल नहीं था। उससे प्रभावित होकर रावण ने [[अग्नि]] को साक्षी बनाकर उससे मित्रता की।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 34&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*[[सीता हरण]] के पश्चात [[राम]] से मित्रता होने पर भी सुग्रीव को राम की शक्ति पर इतना विश्वास नहीं था कि वह शक्तिशाली वानरराज बालि को मार सकेंगे, अत: राम ने सुग्रीव के कहने पर अपने बल की परीक्षा दी। एक बाण से राम ने एक साथ ही सात साल वृक्षों को भेद दिया तथा अपने पांव के अंगूठे की एक ठोकर से दुंदुभी के सूखे कंकाल को दस योजन दूर फेंक दिखाया। सुग्रीव बहुत प्रसन्न हुआ तथा राम-[[लक्ष्मण]] समेत बालि से युद्ध करने गया। सुग्रीव के ललकारने पर बालि निकल आया तथा उसने सुग्रीव को मार भगाया। सुग्रीव ने बहुत दुखी होकर राम से पूछा कि उसने बालि को मारा क्यों नहीं। राम के यह बताने पर कि दोनों भाई एक-से लग रहे थे, अत: राम को यह भय रहा कि कहीं बाण सुग्रीव के न लग जाय। राम ने सुग्रीव का गजपुष्पी लता पहनकर फिर से युद्ध के लिए प्रेरित किया। बालि ने जब फिर से सुग्रीव की ललकार सुनी और लड़ने के लिए बाहर निकला तब तारा ने बहुत मना किया पर वह नहीं माना। युद्ध में जब सुग्रीव कुछ दुर्बल पड़ने लगा तो पेड़ों के झुरमुट में छिपे राम ने बालि को अपने बाण से मार डाला। मरते हुए बालि ने पहले तो राम को बहुत बुरा-भला कहा, क्योंकि इस प्रकार छिपकर मारना क्षत्रियों का धर्म नहीं है किंतु जब राम ने बालि को समझाया कि बालि ने सुग्रीव की पत्नी को हरकर अधर्म किया है तथा जिस प्रकार वनैले पशुओं को घेरकर छल से मारना अनुचित नहीं है, उसी प्रकार पापी व्यक्ति को दंड देना भी धर्मोचित हे। बालि ने सुग्रीव और राम से यह वादा लेकर कि वह तारा तथा [[अंगद]] का ध्यान रखेंगे, सुखपूर्वक देह का त्याग किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड,सर्ग 11 से 18&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*राम-लक्ष्मण सीता को ढूंढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। वहां पांच वानर बैठे हुए थे। उनमें सुग्रीव तथा [[हनुमान]] भी थे। राम की सुग्रीव से मैत्री हो गयी। राम ने सुग्रीव के भाई बालि का वध करने का प्रण किया तथा सुग्रीव ने राम का साथ देने का निश्चय किया। सुग्रीव तथा बालि का मल्लयुद्ध हो रहा था। हनुमान ने सुग्रीव की पहचान के लिए उसे माला पहना दी थी। राम ने छुपकर छाती पर बाण से प्रहार किया। वह मारा गया। सुग्रीव ने बालि की मृत्यु के उपरांत उसकी पत्नी तारा तथा किष्किंधापुरी को प्राप्त किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;महाभारत,वनपर्व, 280 1 से 39&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*आदित्यराज के दो पुत्र थें उनमें से बालि को राजा, सुग्रीव को युवराज बनाकर आदित्यराज ने दीक्षा का अंगीकरण किया। रावण ने बालि के पास दूत भेजा कि वह अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह रावण से कर दे। बालि के न मानने पर रावण ने उस पर आक्रमण कर दिया। बालि ने अनुभव किया कि मात्र उसके कारण इतने लोगों का संहार होगा, अत: उसने राज्य सुग्रीव को सौंप दिया तथा स्वयं प्रव्रज्या ग्रहण की। सुग्रीव ने श्रीप्रभा रावण को सौंप दी। युद्ध का शमन हो गया। बालि अष्टापद पर्वत पर घोर तपस्या करने लगा। एक बार रावण विमान में जा रहा था कि बालि के तपोबल से उसका विमान अष्टापद पर्वत के पास रुक गया। विमान के अवरोध का कारण जानकर रावण बहुत क्रुद्ध हुआ। उसने समस्त पर्वत समुद्र में डुबा देने की इच्छा से उखाड़कर सिर पर रख लिया। बालि ने पांव के अंगूठे से जरा-सा दबाया कि रावण पर्वत के नीचे दबकर कराहने लगा। पांव का दबाव ढीला करके बालि ने उसे मुक्त कर दिया। तदनंतर अपने कुकर्म का प्रायश्चित्त करके रावण जिनेश्वर का भक्त बन गया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;पउम चरित, 9।&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>बाल काण्ड वा. रा.</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''बाल काण्ड / Baal Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काण्ड में प्रथम सर्ग ‘मूलरामायण’के नाम से प्रख्यात है। इसमें [[नारद]] से [[वाल्मीकि]] संक्षेप में सम्पूर्ण रामकथा का श्रवण करते हैं। द्वितीय सर्ग में क्रौञ्चमिथुन का प्रसंग और प्रथम आदिकाव्य की पक्तियाँ ‘मा निषाद’ का वर्णन है। तृतीय सर्ग में [[रामायण]] के विषय तथा चतुर्थ में रामायण की रचना तथा [[लव कुश]] के गान हेतु आज्ञापित करने का प्रसंग वर्णित है। इसके पश्चात रामायण की मुख्य विषयवस्तु का प्रारम्भ [[अयोध्या]]-वर्णन से होता है। [[दशरथ]] का यज्ञ, तीन रानियों से चार पुत्रों का जन्म, [[विश्वामित्र]] का [[राम]]-[[लक्ष्मण]] को ले जाकर बला तथा अतिबला विद्याएँ प्रदान करना, राक्षसों का वध, [[जनक]] के धनुषयज्ञ में जाकर [[सीता]] का विवाह आदि वृतान्त वर्णित हैं। बाल काण्ड में 77 सर्ग तथा 2280 श्लोक प्राप्त होते हैं:-&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
बालकाण्डे तु सर्गाणां कथिता सप्तसप्तति:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्लोकानां द्वे सहस्त्रे च साशीति शतकद्वयम्॥&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण- बालकाण्ड 77 सर्गान्त में अमृतकतकटीका, पृ॰ 527&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
रामायण के बालकाण्ड का महत्व धार्मिक दृष्टि से भी है। बृहद्धर्मपुराण में लिखा है कि अनावृष्टि, महापीडा और ग्रहपीडा से दु:खित व्यक्ति इस काण्ड के पाठ से मुक्त हो सकते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;अनावृष्टिर्महापीडाग्रहपीडाप्रपीडिता:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आदिकाण्डं पठेयुर्ये ते मुच्यन्ते ततो भयात्॥ बृहद्धर्मपुराण-पूर्वखण्ड 26.9&amp;lt;/ref&amp;gt; अत: उक्त कार्यों हेतु इस काण्ड का पारायण भी प्रचलित है।&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>बाणासुर</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''बाणासुर / Banasur'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*बलि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था। बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप [[शिव]] से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किये थे। अत: वह गर्वोन्मत्त हो उठा था। उसके एक सहस्त्र बांहें थीं। वह शोणितपुर पर राज्य करता था। उसकी एक सुंदरी कन्या थी, जिसका नाम [[उषा]] था। [[प्रद्युम्न]] का पुत्र [[अनिरूद्ध]] उस कन्या पर आसक्त हो गया तथा गुप्त रूप से उससे मिलता रहा। बाणसुर को विदित हुआ तो उसने दोनों को कारागार में डाल दिया। [[नारद]] ने श्री[[कृष्ण]] से जाकर कहा-'आपके पौत्र अनिरूद्ध को बाणासुर विशेष कष्ट दे रहा है।' श्रीकृष्ण ने [[बलराम]] तथा प्रद्युम्न के साथ बाणासुर पर आक्रमण किया। [[महादेव]] बाणासुर की रक्षा के निमित्त वहां पहुंचे किंतु सबको परास्त कर तथा बाणासुर की समस्त बांहें काटकर और उसे मारकर श्रीकृष्ण, उषा और अनिरूद्ध को धन-धान्य सहित लेकर [[द्वारका]] पहुंचे। &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, [[सभा पर्व महाभारत|सभापर्व]], 38 ।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*बाणासुर बलि के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ था। वह स्कंद को खेलता देख [[शिव]] की ओर आकृष्ट हुआ। उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। शिव ने वर मांगने को कहा तो उसने ये वर मांगे- &lt;br /&gt;
#[[पार्वती]] उसे पुत्र-रूप में ग्रहण करें, वह स्कंद का छोटा भाई माना जाने लगा। &lt;br /&gt;
#वह शिव से आरक्षित रहेगा &lt;br /&gt;
#उसे अपने समान वीर से युद्ध करने का अवसर मिले। शिव ने कहा-'अपने स्थान पर स्थापित तुम्हारा ध्वज जब खंडित होकर गिर जायेगा तभी तुम्हें युद्ध का अवसर मिलेगा।' बाणासुर की एक सहस्त्र भुजाएं थीं। उसने अपने मन्त्री कुंभांड को समस्त घटनाओं के विषय में बताया तो वह चिंतित हो उठा। तभी [[इन्द्र]] के वज्र से उसकी ध्वजा टूटकर नीचे गिर गयी। बाणासुर की कन्या [[उषा]] ने वन में [[शिव]]-[[पार्वती]] को रमण करते देखा तो वह भी कामविमोहित होकर प्रिय-मिलन की इच्छा करने लगी। पार्वती ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह अपने प्रिय के साथ पार्वती की भांति ही रमण कर पायेगी। स्वप्नदर्शन से वह अनिरूद्ध पर आसक्त हो गयी। चित्रलेखा ने अनिरूद्ध का अपहरण किया तथा उसी की सहायता से उषा का अनिरूद्ध से गांधर्व विवाह हो गया। बाणासुर को ज्ञात हुआ तो उसने अनिरूद्ध को नागपाश से आबद्ध कर लिया। आर्या देवी की आराधना से अनिरूद्ध उन पाशों से मुक्त हो गया। इधर [[नारद]] से समस्त समाचार जानकर श्री[[कृष्ण]] यादववंशियों सहित बाणासुर के नगर की ओर बढ़े। नगर को चारों ओर से [[अग्नि]] ने घेर रखा था। [[अंगिरा]] उसकी सुरक्षा में थें [[गरुड़]] ने हजारों मुख धारण करके [[गंगा नदी|गंगा]] से पानी लिया तथा अग्नि पर छिड़ककर उसे बुझा दिया। कृष्ण ने शिव पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया। शिव की जृंभा से ज्वाला निकलकर दिशाओं को दग्ध करने लगी। [[पृथ्वी]] भयभीत होकर [[ब्रह्मा]] की शरण में गयी। ब्रह्मा ने शिव से कहा-'[[विष्णु]] और तुम अभिन्न हो। एक ही के दो रूप हो। तुम्हारी सलाह से ही असुरों का नाश आरंभ किया गया था। अब तुम असुरों को प्रश्रय क्यों दे रहे हो?' शिव ने योग बल से अपना और विष्णु का एकत्व जाना, अत: पृथ्वी पर विष्णु से युद्ध करने का निश्चय कर लिया। बाणासुर तथा कृष्ण का युद्ध हुआ। बाणासुर को बचाने के लिए पार्वती दोनों के मध्य जा खड़ी हुईं। वे मात्र कृष्ण को नग्न रूप में दीख पड़ रही थीं, शेष सबके लिए अदृश्य थीं। कृष्ण ने आंखे मूंद ली। देवी की प्रार्थना पर कृष्ण ने बाणासुर को जीवित रहने दिया किंतु उसके मद को नष्ट करने के लिए एक सहस्त्र हाथों में से दो को छोड़कर शेष काट डाले। शिव ने बीच-बचाव किया। पुत्रवत बाणासुर को शिव ने चार वर प्रदान किये-&lt;br /&gt;
#अजर-अमरत्व, &lt;br /&gt;
#शिव-भक्ति में विभोर नाचने वालों को पुत्र-प्राप्ति, &lt;br /&gt;
#बांहे कटने के कष्ट से मुक्ति तथा &lt;br /&gt;
#महाकाल नाम की ख्याति। &lt;br /&gt;
*अत: बाणासुर महाकाल कहलाने लगा।  &amp;lt;ref&amp;gt;ब्रह्म पुराण,206 ।  हरिवंश पुराण, विष्णुपर्व, 116-126&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<title>पंचवटी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''पंचवटी / Panchvati'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*एक वन जो दण्डकारण्य में स्थित था। &lt;br /&gt;
*यह स्थान [[गोदावरी नदी|गोदावरी]] के पास है। &lt;br /&gt;
*[[लक्ष्मण]] ने यहीं [[शूर्पणखा]] के नाक, कान काटे थे। &lt;br /&gt;
*यहाँ [[राम]] का बनाया हुआ एक मन्दिर खण्डहर रूप में विद्यमान है। &lt;br /&gt;
*पंचवटी का वर्णन 'रामचरितमानस' 'रामचन्द्रिका' , 'साकेत', 'पंचवटी' एवं 'साकेत-सन्त' आदि प्राय: सभी रामकथा सम्बन्धी काव्यों में मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
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		<title>निमि</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''निमि / Nimi'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*ये महाराज [[इक्ष्वाकु]] के पुत्र थे और महर्षि [[गौतम]] के आश्रम के समीप वैजयन्त नामक नगर बसाकर वहाँ का राज्य करते थे। &lt;br /&gt;
*एक बार निमि जी एक सहस्त्र वर्षीय यज्ञ करने के लिये श्री [[वसिष्ठ]] जी को वरण किया। लेकिन उस समय श्री वसिष्ठ जी [[इन्द्र]] का यज्ञ कर रहे थे। निमि जी क्षण भंगुर शरीर विचार करके गौतमादि अन्य होताओं को पुनः वरण करके यज्ञ करने लगे जब श्री वसिष्ठ जी को पता चला कि दूसरों से यज्ञ करा रहे हैं तो इन्होंने शाप दे दिया कि ये शरीर से रहित हो जांय।&lt;br /&gt;
* लोभ-वश वसिष्ठ जी ने श्राप दिया है ऐसा जानकर निमि जी ने भी वसिष्ठ जी को देह से रहित होने का श्राप दे दिया। परिणामत: दोनों ही भस्म हो गये। &lt;br /&gt;
*यज्ञ समाप्ति पर देवताओं ने प्रसन्न होकर निमि जी को पुनः जीवित होने का वरदान दे रहे थे लेकिन नश्वर शरीर होने के कारण निमि जी ने कहा मैं पलकों में निवास करूँ ऐसा वरदान मांगा। तभी से पलकें गिरने लगीं। &lt;br /&gt;
*ऋषियों ने एक विशेष उपचार से यज्ञ समाप्ति तक निमि का शरीर सुरक्षित रखा।&lt;br /&gt;
*निमि के कोई सन्तान नहीं थी। अतएव ऋषियों ने अरणि से उनका शरीर मन्थन किया, जिससे इनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ।&lt;br /&gt;
*जन्म लेने के कारण ‘जनक’ विदेह होने के कारण ‘बैदेह’ और मन्थन से उत्पन्न होने के कारण उसी बालक का नाम ‘मिथिल’ हुआ। उसी ने मिथिलापुरी बसाईं। इसी कुल में श्री शीरध्वज जनक के यहाँ आदि शक्ति [[सीता]] ने अवतार लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
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		<title>नल</title>
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		<updated>2010-04-29T11:02:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''नल / Nal'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
दक्षिण में समुद्र के किनारे पहुंचकर [[राम]] ने समुद्र की आराधना की। प्रसन्न होकर वरुणालय ने [[सगर]]पुत्रों से संबंधित होकर अपने को [[इक्ष्वाकु]]वंशीय बतलाकर राम की सहायता करने का वचन दियां उसने कहा-'सेना में नल नामक [[विश्वकर्मा]] का पुत्र है। वह अपने हाथ से मेरे जल में जो कुछ भी छोड़ेगा वह तैरता रहेगा, डूबेगा नहीं।' इस प्रकार समुद्र पर पुल बना जो 'नलसेतु' नाम से विख्यात है। &amp;lt;ref&amp;gt;[[महाभारत]], [[वन पर्व महाभारत|वनपर्व]], अध्याय 283, श्लोक 24 से 45 तक&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>दशरथ</title>
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		<updated>2010-04-29T11:02:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Incomplete}}&lt;br /&gt;
'''दशरथ / Dashrath'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[वैवस्वत मनु|वैवस्वत]] मनु के वंश में अनेक शूरवीर, पराक्रमी, प्रतिभाशाली तथा यशस्वी राजा हुये जिनमें से राजा दशरथ भी एक थे।&lt;br /&gt;
*[[कौशल]] प्रदेश, जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी, पवित्र [[सरयू नदी]] के तट पर स्थित है। सुन्दर एवं समृद्ध [[अयोध्या]] नगरी इस प्रदेश की राजधानी है। &lt;br /&gt;
*राजा दशरथ वेदों के मर्मज्ञ, धर्मप्राण, दयालु, रणकुशल, और प्रजापालक थे। उनके राज्य में प्रजा कष्टरहित, सत्यनिष्ठ एवं ईश्‍वरभक्‍त थी। उनके राज्य में किसी का किसी के भी प्रति द्वेषभाव का सर्वथा अभाव था। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी [[कौशल्या]] के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि श्यामवर्ण, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अद्‍भुत सौन्दर्यशाली था। उस शिशु को देखने वाले ठगे से रह जाते थे। इसके पश्चात शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। इस प्रकार क्रमशः [[राम]], [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]], [[लक्ष्मण]] और [[शत्रुघ्न]] का जन्म हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
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&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=17371</id>
		<title>ताड़का</title>
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		<updated>2010-04-29T11:00:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{incomplete}}&lt;br /&gt;
'''ताड़का / Tadka'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[मारीच]]-[[सुबाहु]] की माता, सुकेतु नामक यक्ष की पुत्री, जो [[अगस्त्य]] ऋषि के शाप से राक्षसी हो गयी थी। &lt;br /&gt;
*यह [[सरयू]] के निकट ताड़का वन में रहकर ऋषियों के यज्ञों में बाधा डालती थी। &lt;br /&gt;
*अत्याचार से पीड़ित होकर [[विश्वामित्र]] उसके वध के लिए [[राम]]-[[लक्ष्मण]] को [[दशरथ]] से माँगकर ले गये। &lt;br /&gt;
*स्त्री जानकर राम उसे मारने में संकोच कर रहे थे, किन्तु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर उन्होंने उसे मार डाला। &lt;br /&gt;
*इसका दूसरा नाम 'सुकेतुसुता' भी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4&amp;diff=17370</id>
		<title>जामवन्त</title>
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		<updated>2010-04-29T11:00:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''जांबवान /जामवन्त / Jamvant / Jambvan'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*जांबवान का जन्म [[अग्नि]] द्वारा एक गंधर्व कन्या के गर्भ से हुआ था। &lt;br /&gt;
*देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता के लिए उसका जन्म हुआ था। &lt;br /&gt;
*वानर सेना में [[अंगद]], [[सुग्रीव]], परपंजद पनस, [[सुषेण]] (तारा के पिता), कुमुद, गवाक्ष, केसरी, शतबली, द्विविद, मैंद, [[हनुमान]], [[नील]], [[नल]], शरभ, गवय आदि थे। जांबवान का नाम विशेष उल्लेखनीय है। &lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 24 से 30&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>जनक</title>
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		<updated>2010-04-29T11:00:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''जनक / Janak'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
*जनक [[सीता]] के पिता थे। &lt;br /&gt;
*जनक अपने अध्यात्म तथा तत्त्वज्ञान के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। &lt;br /&gt;
*जनक के पूर्वज [[निमि]] कहे जाते हैं। &lt;br /&gt;
*निमि ने एक बृहत यज्ञ का आयोजन करके [[वसिष्ठ]] को पौरोहित्य के हेतु आमन्त्रित किया,किन्तु वसिष्ठ उस समय [[इन्द्र]] के यज्ञ में संलग्न थे। अत: वे असमर्थ रहे। &lt;br /&gt;
*निमि ने [[गौतम]] आदि ऋषियों की सहायता से यज्ञ आरम्भ करा दिया। &lt;br /&gt;
*वसिष्ठ ने उन्हें शाप दे दिया। किन्तु प्रत्युत्तर में निमि ने भी शाप दिया। &lt;br /&gt;
*परिणामत: दोनों ही भस्म हो गये। &lt;br /&gt;
*ऋषियों ने एक विशेष उपचार से यज्ञसमाप्ति तक निमि का शरीर सुरक्षित रखा। &lt;br /&gt;
*निमि के कोई सन्तान नहीं थी। अतएव ऋषियों ने अरणि से उनका शरीर मन्थन किया, जिससे इनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ। &lt;br /&gt;
*शरीर मन्थन से उत्पन्न होने के कारण जनक को मिथि भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*मृतदेह से उत्पन्न होने के कारण यही पुत्र जनक, विदेह होने के कारण ‘वैदेह’ और मन्थन से उत्पन्न होने के कारण उसी बालक का नाम ‘मिथिल’ हुआ।  &lt;br /&gt;
*इसी आधार पर इन्होंने मिथिलापुरी बसायी। इसी कुल में श्री शीरध्वज जनक के यहाँ आदि शक्ति [[सीता]] ने अवतार लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिव-धनुष==&lt;br /&gt;
*राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। [[शिव]]-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। [[दक्ष]] यज्ञ विनष्ट होने के अवसर पर रुष्टमना शिव ने इसी धनुष को टंकार कर कहा था कि देवताओं ने उन्हें यज्ञ में भाग नहीं दिया, इसलिए वे धनुष से सबका मस्तक काट लेंगे। देवताओं ने बहुत स्तुति की तो भोलानाथ ने प्रसन्न होकर यह धनुष उन्हीं देवताओं को दे दिया। देवताओं ने राजा जनक के पूर्वजों के पास वह धनुष धरोहरस्वरूप रखा था।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, बाल कांड, 66।5-12&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
*एक बार राजा जनक ने एक यज्ञ किया। [[विश्वामित्र]] तथा मुनियों ने [[राम]] और [[लक्ष्मण]] को भी उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि उन दोनों को शिव-धनुष के दर्शन करने का अवसर भी प्राप्त होगा।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;बाल्मीकि रामायण, बाल कांड, 31।5-14&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विदेह==&lt;br /&gt;
*एक बार राजा जनक ने अपनी यौगिक क्रियाओं से स्थूल शरीर का त्याग कर दिया। स्वर्गलोक से एक विमान उनकी आत्मा को लेने के लिए आया। देव लोक के रास्ते से जनक कालपुरी पहुंचे जहां बहुत से पापी लोग विभिन्न नरकों से प्रताड़ित किये जा रहे थे । उन लोगों ने जब जनक को छूकर जाती हुई हवा में सांस ली तो उन्हें अपनी प्रताड़नाओं का शमन होता अनुभव हुआ और नरक की अग्नि का ताप शीतलता में बदलने लगा। जब जनक वहां से जाने लगे तब नरक के वासियों ने उनसे रुकने की प्रार्थना की। जनक सोचने लगे-'यदि ये नरकवासी मेरी उपस्थिति से कुछ आराम अनुभव करते हैं तो मैं इसी कालपुरी में रहूंगा- यही मेरा स्वर्ग होगा।' &lt;br /&gt;
*ऐसा सोचते हुए वे वहीं रूक गये तब काल विभिन्न प्रकार के पापियों को उनके कर्मानुसार दंड देने के विचार से वहां पहुंचे और जनक को वहां देखकर उन्होंने पूछा-'आप यहाँ नरक में क्या कर रहे हैं?'&lt;br /&gt;
*जनक ने अपने ठहरने का कारण बताते हुए कहा कि वे वहां से तभी प्रस्थान करेंगे जब काल उन सबको मुक्त कर देगा। काल ने प्रत्येक पापी के विषय में बताया कि उसे क्यों प्रताड़ित किया जा रहा है। जनक ने काल से उनकी प्रताड़ना से मुक्ति की युक्ति पूछी। काल ने कहा-'तुम्हारे कुछ पुण्य इनको दे दें तो इनकी मुक्ति हो सकती है।' जनक ने अपने पुण्य उनके प्रति दे दिये। उनके मुक्त होने के बाद जनक ने काल से पूछा-'मैंने कौन सा पाप किया था कि मुझे यहाँ आना पड़ा?'&lt;br /&gt;
*काल ने कहा-'हे राजन! संसार में किसी भी व्यक्ति के तुम्हारे जितने पुण्य नहीं हैं, पर एक छोटा-सा पाप तुमने किया था। एक बार एक गाय को घास खाने से रोकने के कारण तुम्हें यहाँ आना पड़ा। अब पाप का फल पा चुके सो तुम स्वर्ग जा सकते हो।' विदेह (जनक) ने काल को प्रणाम कर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;पद्म पुराण, 30-39।&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
*इसी कारण जनक को विदेह कहा जाता है।                                               &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81&amp;diff=17368</id>
		<title>जटायु</title>
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		<updated>2010-04-29T11:00:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''भक्तराज जटायु / Jatayu'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
प्रजापति [[कश्यप]] जी की पत्नी [[विनता]] के दो पुत्र हुए- [[गरुड़]] और [[अरुण देवता|अरुण]]। अरुण जी [[सूर्य देवता|सूर्य]] के सारथी हुए। [[सम्पाती]] और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य-मण्डल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लम्बी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आये, किन्तु सम्पाती उड़ते ही गये। सूर्य के सन्निकट पहुँचने पर सूर्य के प्रखर ताप से सम्पाती के पंख जल गये और वे समुद्र तट पर गिर कर चेतना शून्य हो गये। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और [[त्रेता युग|त्रेता]] में श्री [[सीता]] जी की खोज करने वाले बन्दरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।&lt;br /&gt;
==रामायण के अनुसार==&lt;br /&gt;
जटायु [[पंचवटी]] में आकर रहने लगे। एक दिन आखेट के समय महाराज [[दशरथ]] से इनका परिचय हुआ और ये महाराज के अभिन्न मित्र बन गये। वनवास के समय जब भगवान श्री [[राम]] पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब जटायु से उनका परिचय हुआ। भगवान श्री राम अपने पिता के मित्र जटायु का सम्मान अपने पिता के समान ही करते थे। भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता जी के कहने पर कपट-मृग [[मारीच]] को मारने के लिये गये और [[लक्ष्मण]] भी [[सीता]] जी के कटुवाक्य से प्रभावित होकर श्री राम को खोजने के लिये निकल पड़े। आश्रम को सूना देखकर [[रावण]] ने [[सीता]] जी का हरण कर लिया और बलपूर्वक उन्हें रथ में बैठाकर आकाश मार्ग से [[लंका]] की ओर चला। &lt;br /&gt;
{{high left}}&lt;br /&gt;
भगवान [[राम|श्रीराम]] ने जटायु के शरीर को अपनी गोद में रख लिया। उन्होंने पक्षिराज के शरीर की धूल को अपनी जटाओं से साफ किया। जटायु ने उनके मुख-कमल का दर्शन करते हुए उनकी गोद में अपना शरीर छोड़ दिया। राम-[[लक्ष्मण]] ने उसका दाह-संस्कार, पिंडदान तथा जलदान किया।&lt;br /&gt;
{{Table close}}&lt;br /&gt;
सीता जी के करुण विलाप को सुनकर जटायु ने रावण को ललकारा और उसके केश पकड़ कर उसे भूमि पर पटक दिया। गृध्रराज जटायु का रावण से भयंकर संग्राम हुआ और अन्त में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और रावण सीता जी को लेकर लंका की ओर चला गया। भगवान श्री राम सीता जी को खोजते हुए जटायु के पास आये। जटायु मरणासन्न थे। वे श्री राम के चरणों का ध्यान करते हुए उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने श्री राम से कहा- 'राघव! राक्षसराज रावण ने मेरी यह दशा की है। वह दुष्ट सीता जी को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया है। मैंने तुम्हारे दर्शनों के लिये ही अब तक अपने प्राणों को रोक रखा था। अब मुझे अन्तिम विदा दो।'&lt;br /&gt;
भगवान श्रीराम के नेत्र भर आये। उन्होंने जटायु से कहा- 'तात! मैं आपके शरीर को अजर-अमर तथा स्वस्थ कर देता हूँ, आप अभी संसार में रहें। जटायु बोले- श्रीराम! मृत्यु के समय तुम्हारा नाम मुख से निकल जाने पर अधम प्राणी भी मुक्त हो जाता है। आज तो साक्षात तुम स्वयं मेरे पास हो। अब मेरे जीवित रहने से कोई लाभ नहीं है।' भगवान श्री राम ने जटायु के शरीर को अपनी गोद में रख लिया। उन्होंने पक्षिराज के शरीर की धूल को अपनी जटाओं से साफ किया। जटायु ने उनके मुख-कमल का दर्शन करते हुए उनकी गोद में अपना शरीर छोड़ दिया। राम-लक्ष्मण ने उसका दाह-संस्कार, पिंडदान तथा जलदान किया। इन्होंने परोपकार के बल पर भगवान का सायुज्य प्राप्त किया और भगवान ने इनकी अन्त्येष्टि क्रिया को अपने हाथों से सम्पन्न किया। पक्षिराज जटायु के सौभाग्य की महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता है। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, अरण्य कांड, सर्ग 69, श्लोक 9-38&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पउम चरित के अनुसार==&lt;br /&gt;
राम, सीता तथा लक्ष्मण दंडकारण्य में थे। उन्होंने देखा- कुछ मुनि आकाश से नीचे उतरे। उन तीनों ने मुनियों को प्रणाम किया तथा उनका आतिथ्य किया। पार ने के समय जल, रत्न, पुष्प आदि की वृष्टि हुई। वहां पर बैठा हुआ एक गीध उनके चरणोदक में लोट गया। फलस्वरूप उसकी जटायें आदि रत्न के समान प्रकाशमान हो गयीं। साधुओं ने बताया कि पूर्वकाल में दंडक नामक एक राजा था किसी मुनि के संसर्ग से उसके मन में भवित का उदय हुआ। उसके राज्य में एक परिव्राजक था। वह दूसरों को कष्ट देनें के लिए उद्यत रहता था। एक बार वह अंत:पुर में रानी से बातचीत कर रहा था राजा ने उसे देखा तो दुश्चरित्र जानकर उसके दोष से सभी श्रमणों को यंत्रों में पिलवाकर मरवा डाला। एक श्रमण बाहर गया हुआ था। लौटने पर समाचार ज्ञात हुआ तो उसके शरीर से ऐसी क्रोधाग्नि निकली कि जिससे समस्त स्थान भस्म हो गया। राजा के नामानुसार इस स्थान का नाम दंडकारगय रखा गया। मुनियों ने उस दिव्य 'जटायु' (गीध) की सुरक्षा का भार सीता और राम को सौंप दिया। उसके पूर्व जन्म के विषय में बताकर उसे धर्मोपदेश भी दिया। रत्नाभ जटाएं हो जाने के कारण वह 'जटायु' नाम से विख्यात हुआ। &lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;पउम चारित, 41 ।-&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>खर दूषण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%A3&amp;diff=17367"/>
		<updated>2010-04-29T10:59:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{incomplete}}&lt;br /&gt;
'''खर दूषण / Khar Dushan'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*मेघप्रभ के पुत्र खर दूषण ने [[रावण]] की अनुपस्थिती में उसकी बहन चंद्रनखा का अपहरण कर लिया। &lt;br /&gt;
*उस समय रावण अपनी कन्या अवली के विवाह में व्यस्त था। &lt;br /&gt;
*लौटने पर समस्त समाचार जानकर रावण खर दूषण को मारने के लिए उद्धत हुआ किंतु [[मंदोदरी]] ने समझा-बुझाकर उसे शांत कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>कौशल्या</title>
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		<updated>2010-04-29T10:58:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कौशल्या / Kaushalya'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''तथ्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कथावस्तु की दृष्टि से राम काव्य में कौशल्या का अन्य प्रमुख पात्रों की तुलना में अधिक महत्त्व नहीं है। वे [[दशरथ]] की अग्रमहिषी एवं [[राम]] जैसे आदर्श पुत्र की माता हैं। उनका सर्वप्रथम उल्लेख [[वाल्मीकि रामायण]] में पुत्र-प्रेम की आकांक्षिणी के रूप में मिलता है। [[वाल्मीकि]] की परम्परा में रचित काव्यों और नाटकों में कौशल्या सर्वत्र अग्रमहिषी के रूप ही चित्रित हैं, केवल [[आनन्द-रामायण]] में दशरथ एवं कौशल्या के विवाह का वर्णन विस्तार से हुआ है। &lt;br /&gt;
*गुणभद्रकृत 'उत्तर-पुराण' में कौशल्या की माता का नाम सुबाला तथा पुष्पदत्त के 'पउम चरिउ' में कौशल्या का दूसरा नाम अपराजिता दिया गया है। रामकथा में अवतार के प्रभाव के फलस्वरूप पुराणों में [[कश्यप]] और [[अदिति]] के दशरथ और कौशल्या के रूप में अवतार लेने का वर्णन हुआ है। &lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
*परिस्थितिवश कौशल्या जीवनभर दु:खी रहती हैं। अपने वास्तविक अधिकार से वंचित होकर उनका जीवन करुण और दयनीय हो जाता है। अत: उन्हें क्षीणकाया, खिन्नमना, उपवासपरायणा, क्षमाशीला, त्यागशीला, सौम्य, विनीत, गंभीर प्रशांत, विशालहृदया तथा पति-सेवा-परायणा  आदर्श महिला के रूप में चित्रित किया गया है। अपने निरपराध पुत्र के वनवास पर वे अपने इन गुणों का और भी अधिक विकास करती हुई देखी जाती हैं। इस अवसर पर अनेक कवियों ने उनके मातृ-हृदय की भूरि-भूरि सराहना की है। इस अन्याय का समाचार सुनकर वाल्मीकि की कौशल्या का संयम और धैर्य टूट जाता है और सांकेतिक शब्दावली का प्रयोग करके वे राम को पिता से विद्रोह करने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं। &lt;br /&gt;
*अध्यात्म-रामायण में उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट तथा राम को वन जाने से रोकते हुए चित्रित करके उनके मन की द्विविधा का वर्णन किया गया है तथा उनके हृदय में प्रेम-भावना और बृद्धि का परस्पर संघर्ष दिखाया गया है परन्तु तुलसीदास ने इस प्रसंग के वर्णन में कौशल्या के चरित्र को बहुत ऊँचा उठा दिया है। उन्होंने बड़ी कुशलता से कौशल्या का अन्तर्द्वन्द्व चित्रित करते हुए कर्तव्य-कर्म और विवेक-बुद्धि की विजय का जो चित्रण किया है, वह अकेला ही तुलसीदास की महत्ता को प्रमाणित करने में सक्षम है। इस प्रसंग के अतिरिक्त अन्यत्र भी तुलसी ने कौशल्या के चरित्र की महनीयता चित्रित की है। [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] को राजमुकुट धारण करने का उपदेश तथा वनयात्रा में भरत-शत्रुघ्न से रथ पर चढ़ने का तर्कपूर्ण अनुरोध उनके हृदय की विशालता, बिना किसी भेदभाव के चारों पुत्रों के प्रति उनके मातृ-हृदय का सहज वात्सल्य तथा सभी अयोध्यावासियों के प्रति हार्दिक ममत्व का प्रमाण देता है। &lt;br /&gt;
*मानस में कौशल्या के चरित्र में उच्च बुद्धिमत्ता का भी चित्रण हुआ है। जब वे [[चित्रकूट]] में सीता की माता को विषम परिस्थिति में धैर्य धारण करने को कहती हैं, उनके कथन में एक दार्शनिक दृष्टि के साथ-साथ गहरी आत्मानुभूति के दर्शन होते हैं परन्तु मानस से भिन्न 'गीतावली' में तुलसी दास कृष्ण-काव्य की यशोदा की भाँति कौशल्या को एक स्नेहमयी माता के वात्सल्य-वियोग की करुणामूर्ति के रूप में चित्रित करते हैं। मानस में कौशल्या का चरित्र जितना गम्भीर और धैर्यनिष्ठ है, गीतावली में उतना ही संवेद्य और तरल बन जाता है। जब राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ चले जाते हैं, कौशल्या उनके लिए अत्यंत चिन्ताकुल होती हैं। उनकी व्यथा क्रमश: राम-वन-गमन, चित्रकूट से लौटने तथा वनवासी की अवधि समाप्ति के पूर्व के अवसरों पर करुण से करुणतर चित्रित की गयी हैं।&lt;br /&gt;
*आधुनिक युग में कौशल्या के चरित्र का मातृ-पक्ष मानस से कहीं अधिक विस्तारपूर्वक बलदेवप्रसाद मिश्र के 'कोशल-किशोर' में उभरा है, किन्तु वह राम की युवा अवस्था तक की घटनाओं तक ही सीमित रह गया है। मैथिली शरण गुप्त के 'साकेत' में भी कौशल्या का पुत्र-प्रेम स्वाभाविक रूप में चित्रित किया गया है, किन्तु चरित्र-चित्रण की सम्पूर्णता तथा प्रभाव-समाष्टि उसमें नहीं मिलती। उनकी तुलना में साकेतकार ने कैकेयी पर अधिक ध्यान दिया है परन्तु कौशल्या के चरित्र में आदिकवि से प्रारम्भ होकर तुलसीदास के द्वारा जिस आदर्श की परिणति हुई है, वही वस्तुत: लोकमत में प्रतिष्ठित होकर रह गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;(सहायक ग्रन्थ- रामकथा: डा॰ कामिल बुल्के तथा तुलसीदास: डा॰ माताप्रसाद गुप्त, हिन्दी परिषद, विश्वविद्यालय, इलाहाबाद।)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथाओं में कौशल्या==&lt;br /&gt;
दक्षिण [[कौशल|कोसल]]राज ने अपनी पुत्री का विवाह [[अयोध्या]] के युवराज [[दशरथ]] से सुनिश्चित किया। अचानक एक दिन राजकुमारी कौशल्या राजभवन से अदृश्य हो गयीं। उधर अयोध्या से महाराज [[अज]] प्रस्थान कर चुके थे। वे सदल-बल [[सरयू नदी]] के मार्ग से नौका द्वारा कोसल की यात्रा कर रहे थें अकस्मात भयानक आँधी आयीं बहुत-सी नौकाएँ डूब गयीं। महाराज ने देखा कि युवराज जिस नौका से चल रहे थे उसका पता नहीं है। वास्तव में [[रावण]] ने जब अपने भाग्य पर विचार किया, तक उसे पता चला कि दशरथ और कौशल्या के द्वारा उत्पन्न पुत्र उसका वध करेगा। इसलिये उसने कौशल्या का हरण करके और उन्हें पेटिका में बन्द करके दक्षिण सागर में अपने एक परिचित महामत्स्य को दे दिया था। महामत्स्य पेटिका को अपने मुख में रखता था। अकस्मात दूसरे महामत्स्य ने उस पर आक्रमण किया। इसलिये मत्स्य ने वह पेटिका गंगासागर के किनारे भूमि पर छोड़ दी। भीतर से कौशल्या जी पेटिका खोलकर बाहर आ गयीं। संयोग से दशरथ जी भी बहते हुए वहीं पहुँचे। वहीं उनका कौशल्या जी से साक्षात्कार हुआ। परस्पर परिचय के बाद उन्होंने अग्नि प्रज्वलित करके कौशल्या जी से विवाह कर लिया और अयोध्या लौट आये।&lt;br /&gt;
== पुत्र राम का जन्म== &lt;br /&gt;
आरम्भ से ही कौशल्या जी धार्मिक थीं। वे निरन्तर भगवान की पूजा करती थीं, अनेक व्रत रखती थीं और नित्य ब्राह्मणों को दान देती थीं। महाराज दशरथ ने अनेक विवाह किये। सबसे छोटी महारानी [[कैकेयी]] ने उन्हें अत्यधिक आकर्षित किया। महर्षि [[वसिष्ठ]] के आदेश से श्रृंगी ऋषि आमन्त्रित हुए। पुत्रेष्टि यज्ञ में प्रकट होकर [[अग्निदेव]] ने चरू प्रदान किया। चरू का आधा भाग कौशल्या जी को प्राप्त हुआ। पातिव्रत्य, धर्म, साधुसेवा, भगवदाराधना सब एक साथ सफल हुई। भगवान [[राम]] ने माता कौशल्या की गोद को विश्व के लिये वन्दनीय बना दिया। भगवान की विश्वमोहिनी मूर्ति के दर्शन से उनके सारे कष्ट परमानन्द में बदल गये।&lt;br /&gt;
==राजतिलक== &lt;br /&gt;
'मेरा राम आज युवराज होगा' माता कौशल्या का हृदय यह सोचकर प्रसन्नता से उछल रहा था। उन्होंने पूरी रात भगवान की आराधना में व्यतीत की। प्रात: ब्रह्म महूर्त में उठकर वे भगवानु की पूजा में लग गयीं। पूजा के बाद उन्होंने पुष्पांजलि अर्पित कर भगवान को प्रणाम किया। इसी समय [[राम|रघुनाथ]] ने आकर माता के चरणों में मस्तक झुकाया। कौशल्या जी ने श्री राम को उठाकर हृदय से लगाया और कहा- 'बेटा! कुछ कलेऊ तो कर लो। अभिषेक में अभी बहुत विलम्ब होगा।'&lt;br /&gt;
==वनवास==&lt;br /&gt;
'मेरा अभिषेक तो हो गया माँ! पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष के लिये वन का राज्य दिया है।' श्रीराम ने कहा। 'राम! तुम परिहास तो नहीं कर रहे हो। महाराज तुम्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते हैं। किस अपराध से उन्होंने तुम्हें वन दिया है? मैं तुम्हें आदेश देती हूँ कि तुम वन नहीं जाओंगे, क्योंकि माता पिता से दस गुना बड़ी है; परन्तु यदि इसमें छोटी माता [[कैकेयी]] की भी इच्छा सम्मिलित है तो वन का राज्य तुम्हारे लिये सैकड़ों [[अयोध्या]] के राज्य से भी बढ़कर है।' माता कौशल्या ने हृदय पर पत्थर रखकर राघवेन्द्र को वन जाने का आदेश दिया। उनके दु:ख का कोई पार नहीं था।&lt;br /&gt;
==पिता का दुःख== &lt;br /&gt;
'कौसल्ये! मैं तुम्हारा अपराधी हूँ, अपने पति को क्षमा कर दो।' महाराज दशरथ ने करुण स्वर में कहा। 'मेरे देव मुझे क्षमा करें।' पति के दीन वचन सुनकर कौशल्या जी उनके चरणों में गिर पड़ीं। 'स्वामी दीनतापूर्वक जिस स्त्री से प्रार्थना करता है, उस स्त्री के धर्म का नाश होता है। पति ही स्त्री के लिये लोक और परलोक का एकमात्र स्वामी है।' इस तरह कौशल्या जी ने महाराज को अनेक प्रकार से सान्त्वना दी। श्रीराम के वियोग में महाराज दशरथ ने शरीर त्याग दिया। माता कौशल्या सती होना चाहती थीं, किन्तु श्री [[भरत]] के स्नेह ने उन्हें रोक दिया। चौदह वर्ष का समय एक-एक पल युग की भाँति बीत गया। श्रीराम आये। आज भी वह माँ के लिये शिशु ही तो थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>कैकेयी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कैकेयी / Kaikeyi'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
[[अयोध्या]] के महाराज [[दशरथ]] की पत्नी कैकेयी के चरित्र की कल्पना आदि कवि [[वाल्मीकि]] की कथागत शिल्पयोजना की कुशलता का प्रमाण है। यद्यपि पौराणिक एवं अन्य [[रामायण]] के ऐतिहासिक साक्ष्यों से कैकेयी कैकयनरेश की पुत्री ठहरती हैं, किन्तु इसके लिए प्रमाणों का सर्वथा अभाव है। सम्पूर्ण राम कथा में कैकेयी की महत्ता का कारण उनकी वस्तुनिष्ठा है, आदर्शवादिता नहीं। उनका महत्त्व इस दृष्टि से नहीं है कि वे [[भरत दशरथ पुत्र|भरत]] सदृश आदर्शनिष्ठ पुत्र की माता हैं, अपितु इसलिए कि वे मुख्य कथा को अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए एक अप्रत्याशित मोड़ देती हैं।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
वाल्मीकि रामायण में कैकेयी स्वाभिमानिनी, सौंदर्यवती एवं सांसारिक लिप्सा के प्रति आकर्षित रमणी के रूप में आती हैं। वाल्मीकि उन्हें प्रारम्भ से ही इस रूप में चित्रित करते हैं कि अपने स्वार्थपूर्ण अधिकार की प्राप्ति के लिए वे स्वभावत: [[राम]] को वन भेजने जैसा क्रूर कर्म करने में भी संकोच नहीं करतीं [[मन्थरा]] द्वारा प्रेरणा तथा उत्तेजना पाना वस्तुत: प्रासंगिक मात्र है। वस्तुस्थिति को समझकर वे सौभाग्यमद से गर्वित, क्रोधाग्नि से तिलमिलाती हुई कोप- भवन में प्रविष्ट हो जाती हैं सम्पूर्ण अयोध्या को शोक- संतप्त करने का कारण बनकर भी उन्हें पश्चात्ताप नहीं होता और वे अन्त तक वस्तुनिष्ठ ही बनी रहती हैं। उनके चरित्र को वाल्मीकि ने नायक-विरोधी कथागत तत्त्वों से निर्मित किया है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
कैकेयी के विवाह आदि के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण के अनन्तर राम-कथाकाव्यों में कहीं-कहीं किंचित् भिन्नता मिलती है। &lt;br /&gt;
*'पउम चरिउ' (पुष्पदत्त) में कैकेयी को ही 'अग्रमहिषी' कहा गया है। दशरथ की प्रथम विवाहित रानी वे ही थीं। &lt;br /&gt;
*'दशरथ जातक' में कहा गया है कि दशरथ अपनी राजमहिषी की मृत्यु के अनन्तर दूसरी रानी से विवाह करते हैं, जिससे भरत का जन्म होता है। &lt;br /&gt;
*'पद्म पुराण' में भरत की माता का नाम 'सुरूपा' मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तुलसीदास के मतानुसार==&lt;br /&gt;
वाल्मीकि रामायण की परम्परा में लिखे गये काव्यों और नाटकों में कैकेयी को राम-वनवास के लिए दोषी ठहराया गया है। उनके लिए असहिष्णु, कलंकिनी  आदि न जाने कितने सम्बोधनों का प्रयोग करके उनकी निन्दा की गयी है। इसी दिशा में उनके कलंक को दूर करने के लिए 'अध्यात्म रामायण' में सम्भवत: सर्वप्रथम सरस्वती के प्रेरणा की कल्पना की गयी है। [[तुलसीदास]] उसी आदर्श को लेकर सम्पूर्ण रामायण में उनके चरित्र को कलुषित होने से बचाने का प्रयत्न करते हैं किन्तु फिर भी तुलसी की दृष्टि में उनका चरित्र सम्पूर्णत: धुल नहीं पाता। उनके साथ कवि की सहानुभूति कभी नहीं जुड़ पाती। अत: अयोध्यावासियों के मुँह से उनके लिए 'पापिन' 'कलंकिनी' आदि अनेक सम्बोधनों का प्रयोग तो वे करवाते ही हैं, साथ ही स्वयं भी अवसर पाकर 'कुटिल' 'नीच' कहने में संकोच नहीं करते। तुलसी की कैकेयी अन्त तक एकान्त-नीरव, भयावह एंव ग्लानियुक्त ही बनी रहती है। कवि उन्हें पश्चात्ताप करने का अवसर भी नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुलसीदास के अनन्तर लिखे गये राम- साहित्य में कैकेयी के चरित्र-निर्माण की ओर कोई कवि सजग नहीं हो सका। आधुनिक युग में [[मैथिलीशरण गुप्त]] ने अपने 'साकेत' में जनजीवन की जागरण तथा युग-युग से पीड़ित भारतीय नारी के उत्थान की भावना से प्रेरित होकर कैकेयी के चिर-लांछित4, निन्दित और दु:खपर्यवसायी चरित्र को उज्जवल करने का प्रयत्न किया है। मैथिलीशरण गुप्त ने उनके निन्दित कार्य का कारण न तो दैवी प्रभाव बताया है और न मन्थरा अथवा स्वयं उसके प्रभाव की कुटिलता: वरन् उन्होंने कैकेयी को सरल स्वभाव, सहज वात्सल्यमयी, वाल्सल्य की साक्षात् प्रतिमा माता के रूप में चित्रित करते हुए दिखाया है कि जब उनके मन में यह सन्देह पैदा हो जाता है कि राज्याभिषेक के अवसर पर न बुलाने का कारण उनके चरित्र पर सन्देह करना है, तभी उनका आत्माभिमान जाग उठता है और वह आवेशयुक्त होकर सारा विवेक खो बैठती हैं। इस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त की कैकेयी वाल्मीकि की कैकेयी की भाँति यथार्थवादी वस्तुनिष्ठ स्वभाव की नारी नहीं हैं, वरन् अत्यन्त भावनाशील, संवेदनशील और भावप्रवण नारी हैं, जिसका वात्सल्य उन्हें अन्धा और विवेकहीन बना देता है। [[चित्रकूट]] की सभा में उनके व्यक्तित्व की सराहनीय विशेषताओं का उद्घाटन होता है और उन्हें अपने कृत्य पर पश्चात्ताप होता है और वे 'रघुकुल की अभागिन रानी' के रूप में अपना दोष भी स्वीकार करती हैं। वे क्षमा-याचना के ही सबल तर्को का प्रयोग नहीं करतीं, अपितु राम के पुन: प्रत्यागमन के लिए अपने अधिकार एवं विनय के प्रयोग से भी पीछे नहीं हटतीं। इस दृष्टि से कैकेयी के चरित्र का स्वाभाविक विकास 'साकेत' में उपलब्ध होता है। राम-काव्य के अन्य कवियों ने कैकेयी के चरित्र—चित्रण में किसी उल्लेखनीय विशेषता का संकेत नहीं किया है। &amp;lt;ref&amp;gt;रामकथा: डा॰ कामिल बुल्के, हिन्दी परिषद्, विश्वविद्यालय, इलाहाबाद: तुलसीदास: डा॰ माताप्रसाद गुप्त, हिन्दी परिषद् , विश्वविद्यालय, इलाहाबाद।) --- यो0 प्र0 सिंह&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कैकेयी को प्राप्त वरदान==&lt;br /&gt;
पुरातन काल की बात है, एक बार देवासुर संग्राम में [[इन्द्र]] की सहायता के लिए दशरथ और कैकेयी गये। वैजयंत नामक नगर में संबर नाम से विख्यात, अनेक मायाओं का ज्ञाता तिमिध्वज रहता थां उसने इन्द्र को युद्ध के लिए चुनौती दी थी। रात को सोये हुए घायल सैनिकों को बिछौनों से खींचकर दैत्य लोग मार डालते थे। भयंकर युद्ध करते हुए दशरथ भी घायल होकर अचेत हो गये। राजा के अचेत होने पर कैकेयी उन्हें रणक्षेत्र से बाहर ले आयी थी, अत: प्रसन्न होकर दशरथ ने दो वरदान देने का वादा किया था। &lt;br /&gt;
==मंथरा की चाल==  &lt;br /&gt;
एक दिन महारानी कैकेयी की दासी [[मंथरा]] दौड़ती हुई आयी। उसने महारानी से कहा-'रानी! कल प्रात: महाराज ने श्री[[राम]] को युवराज बनाने की घोषणा की है। आप बड़ी भोली हैं। आप समझती हैं कि आपको महाराज सबसे अधिक चाहते हैं। यहाँ चुपचाप सब हो गया और आपको पता तक नहीं।''तेरे मुख में घी-शक्कर! अहा, मेरा राम कल युवराज होगा। यह मंगल समाचार सुनाने के लिये मैं तुम्हें यह हार पुरस्कार में प्रदान करती हूँ।' कैकयी जी ने प्रसन्नता से कहा।&lt;br /&gt;
मन्थरा ने कुटिलता से कहा- 'अपना हार रहने दीजिये। कौन [[भरत]] युवराज हो गये, जो आप उपहार देने चली हैं। राजा आप से अधिक प्रेम करते हैं। इसलिये कौशल्या आप से ईर्ष्या करती हैं। अवसर पाकर उन्होंने अपने पुत्र को युवराज बनाने हेतु महाराज को तैयार कर लिया। राम राजा होंगे और आपको कौशल्या की दासी बनना पड़ेगा। मेरा क्या मैं तो दासी हूँ और दासी ही रहूँगी।'&lt;br /&gt;
==कैकेयी का कोपभवन== &lt;br /&gt;
भाववश कैकेयी ने मन्थरा की बातों का विश्वास कर लिया और कोपभवन के एकान्त में महाराज दशरथ से श्रीराम के लिये चौदह वर्ष का वनवास और भरत के लिये राज्य का वरदान माँग लिया। राम को बुलाकर कैकेयी ने अपने दो वर मांगने की बात बतलायी। राम सहर्ष वनगमन की तैयारी में लग गये।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड, सर्ग 9,  श्लोक 11-66, सर्ग 10, 11, 12, 18, 19&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;उन्होंने अपना समस्त धन ब्राह्मण और निर्धन लोगों में बांट दिया तथा वनगमन के लिए उद्यत हुए। दशरथ ने उन्हें विदा करते हुए कहा कि मेरा समस्त कोष तथा सेना राम के साथ बन जायेगी। इस पर क्रुद्ध होकर कैकेयी ने कहा कि धनविहीन राज्य भरत नहीं लेंगे, अत: दशरथ को मन मारकर चुप रहना पड़ा।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 19-36 तक&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;अयोध्या की प्रजा राम को छोड़ने बहुत दूर तक गयी। सबसे पहला पड़ाव तमसा नदी के तट पर पड़ा। वहां जब सब लोग सो गए तब राम ने उन्हें सोता छोड़कर, सुमंत के रथ में सीता और लक्ष्मण समेत प्रस्थान किया।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड सर्ग 46-48&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt; श्रीराम के वियोग में महाराज दशरथ ने शरीर छोड़ दिया। कैकेयी बड़े ही उत्साह से भरत के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं। भरत को आया जानकर वे बड़े ही उत्साह से आरती सजाकर स्वागत के लिये बढ़ीं। किंतु जिस भरत पर उनकी सम्पूर्ण आशाएँ केन्द्रित थीं, उन्हींने उनको दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। भरत ने उन्हें माँ कहना भी छोड़ दिया। जिन कौशल्या से वे प्रतिशोध लेना चाहती थीं, भरत की दृष्टि में उन्हीं कौशल्या का स्थान माँ से भी ऊँचा हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पउम चरिउ का वर्णन==&lt;br /&gt;
कैकेयी दशरथ की पत्नी थी। उसके दो पुत्र हुए-भरत तथा [[शत्रुघ्न]]। अपने विवाह के समय स्वयंवर के शेष राजाओं से [[दशरथ]] का संग्राम हुआ था, जिसमें कैकेयी ने सारथी का कार्य किया था। अत: दशरथ ने उसे वर देने का निश्चय किया था। दशरथ राम को राज्य सौंपकर प्रव्रज्या लेना चाहते थे। भरत को भी विरक्ति का उद्बोधन हुआ, उस समय दशरथ से कैकेयी ने भरत के लिए राज्य मांगा। कैकेयी दुश्चिंता में थी कि पति भी जा रहे हैं और पुत्र भी प्रब्रज्या लेना चाहता है। फलत: राम-[[लक्ष्मण]] को बुलाकर दशरथ ने अपने पूर्वप्रदत्त वर के अनुसार भरत का राज्याभिषेक करने की सूचना दे दी। भरत को भी तैयार किया कि वह राज्य ग्रहण करे। राम तथा लक्ष्मण सीता सहित परिजनों से आज्ञा लेकर प्रवास पर चले गये।&amp;lt;balloon title=&amp;quot;पउम चरिउ, 31-32।-&amp;quot; style=color:blue&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राम की चरण-पादुका==&lt;br /&gt;
जब [[भरत]] जी [[राम]] की चरण-पादुका लेकर अयोध्या के लिये विदा होने लगे तो एकान्त में कैकेयी ने श्रीराम से कहा-'आप क्षमाशील हैं। करुणासागर हैं। मेरे अपराधों को क्षमा कर दें। मेरा हृदय अपने पाप से दग्ध हो रहा है।'&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
'आपने कोई अपराध नहीं किया है। सम्पूर्ण संसार की निन्दा और अपयश लेकर भी आपने मेरे और देवताओं के कार्य को पूर्ण किया है। मैं आपसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ।' राम ने कैकेयी को समझाया। वनवास से लौटने पर राम सबसे पहले कैकेयी के भवन में गये। पहले उन्हीं का आदर किया। कैकेयी जी का प्रेम धन्य है, उन्होंने सदा के लिये कलंक का टीका स्वीकार कर श्रीराम के काज में सहयोग दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
(सहायक ग्रन्थ-                                                       &lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]] &lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>कैकसी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कैकसी / Kaikasi'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कैकसी [[रावण]] की मां का नाम था। &lt;br /&gt;
*[[लंका]] में सेना सहित [[राम]] के आगमन का समाचार जानकर वृद्धा कैकसी ने रावण को समझाने का पर्याप्त प्रयत्न किया कि वह [[सीता-हरण]] के कारण राम जैसे सशक्त व्यक्ति को शत्रु बनाकर अपनी मृत्यु को आमन्त्रित कर रहा है, पर रावण नहीं माना। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 34, श्लोक 20-25&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>कुम्भकर्ण</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कुंभकर्ण / Kumbhakarn'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुंभकर्ण [[रावण]] का भाई तथा [[विश्ववा]] का पुत्र था। कुंभकर्ण की ऊंचाई छह सौ धनुष तथा मोटाई सौ धनुष थी। उसके नेत्र गाड़ी के पहिये के बराबर थे। &amp;lt;ref&amp;gt;	बाल्मीकि रामायण सर्ग 65, श्लोक 41&amp;lt;/ref&amp;gt;उसका विवाह वेरोचन की कन्या 'व्रज्रज्वाला' से हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 12, श्लोक सं0 22,23&amp;lt;/ref&amp;gt; वह जन्म से ही अत्यधिक बलवान थां उसने जन्म लेते ही कई हजार प्रजा जनों को खा डाला थां उसे बेहद भूख लगती थी और वह मनुष्य और पशुओं को खा जाता था। उससे डरकर प्रजा [[इन्द्र]] की शरण में गयी कि यदि यही स्थिति रही तो [[पृथ्वी]] ख़ाली हो जायेगी। इन्द्र से कुंभकर्ण का युद्ध हुआ। उसने [[ऐरावत]] हाथी के दांत को तोड़कर उससे इन्द्र पर प्रहार किया। उससे इन्द्र जलने लगा। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 61, श्लोक 12 से 28 तक&amp;lt;/ref&amp;gt; कुंभकर्ण ने घोर तपस्या से [[ब्रह्मा]] को प्रसन्न कर लिया अत: जब वे उसे वर देने के लिए जाने लगे तो इन्द्र तथा अन्य सब देवताओं ने उनसे वर न देने की प्रार्थना की क्योंकि कुंभकर्ण से सभी लोग परेशान थे। ब्रह्मा बहुत चिंतित हुए। उन्होंने [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] से कुंभकर्ण की जिह्वा पर प्रतिष्ठित होने के लिए कहा। फलस्वरूप ब्रह्मा के यह कहने पर कि कुंभकर्ण वर मांगे- उसने अनेक वर्षों तक सो पाने का वर मांगा। ब्रह्मा ने वर दिया कि वह निरंतर सोता रहेगा। छह मास के बाद केवल एक दिन के लिए जागेगा। भूख से व्याकुल वह उस दिन पृथ्वी पर चक्कर लगाकर लोगों का भक्षण करेगा। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, उत्तर कांड, सर्ग 10, श्लोक 36-49&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==रामायण में कुंभकर्ण==&lt;br /&gt;
[[राम]] की सेना से युद्ध करने के लिए कुंभकर्ण को जगाया गया था। वह अत्यंत भूखा था। उसने वानरों को खाना प्रारंभ किया। उसका मुंह पाताल की तरह गहरा था। वानर कुंभकर्ण के गहरे मुंह में जाकर उसके नथुनों और कानों से बाहर निकल आते थे। अंततोगत्वा राम युद्धक्षेत्र में उतरे। उन्होंने पहले बाणों से हाथ, फिर पांव काटकर कुंभकर्ण को पंगु बना दिया। तदनंतर उसे अस्त्रों से मार डाला। उसके शव के गिरने से [[लंका]] का बाहरी फाटक और परकोटा गिर गया। &amp;lt;ref&amp;gt;बाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, सर्ग 66,67&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
कुंभपुर के महोदर नामक राजा की कन्या तडित्माला से कुंभकर्ण का विवाह हुआ। कुंभपुर में उसके सुंदर कानों को देखकर किसी व्यक्ति ने उसे प्रेम से बुलाया था इस लिए वह 'कुंभकर्ण' नाम से प्रसिद्ध हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;पउम चरित 8।55-60।–&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>किष्किन्धा काण्ड वा. रा.</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''किष्किन्धा काण्ड / Kishkindha Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस काण्ड में पम्पासरोवर पर स्थित [[राम]] से [[हनुमान]]जी का मिलन, [[सुग्रीव]] से मित्रता, सुग्रीव द्वारा [[बालि]] का वृत्तान्त-कथन, [[सीता]] की खोज के लिए सुग्रीव की प्रतिज्ञा, वालि-सुग्रीव युद्ध, राम के द्वारा वालि का वध, सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा वालिपुत्र [[अंगद]] को युवराज पद, वर्षा ॠतु वर्णन, शरद ॠतु वर्णन, सुग्रीव तथा हनुमान जी के द्वारा वानरसेना का संगठन, सीतान्वेषण हेतु चारों दिशाओं में वानरों का गमन, हनुमान का [[लंका]]-गमन, सम्पाति-वृत्तान्त, [[जाम्बवन्त]] का हनुमान को समुद्र-लंघन हेतु प्रेरित करना तथा हनुमानजी का महेन्द्र पर्वत पर आरोहण आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है। किष्किन्धाकाण्ड में 67 सर्ग तथा 2,455 श्लोक हैं। धार्मिक दृष्टि से इस काण्ड का पाठ मित्रलाभ तथा नष्टद्रव्य की खोज हेतु करना उचित है।&amp;lt;ref&amp;gt;मित्रलाभे तथा नष्टद्रव्यस्य च गवेषणे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रुत्वा पठित्वा कैष्किन्ध्यं काण्डं तत्तत्फलं लभेत्॥(बृहद्धर्मपुराण-पूर्वखण्ड 36…12)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>उत्तर काण्ड वा. रा.</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''उत्तर काण्ड / Uttar Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरकाण्ड में [[राम]] के राज्याभिषेक के अनन्तर कौशिकादि महर्षियों का आगमन, महर्षियों के द्वारा राम को [[रावण]] के पितामह, पिता तथा रावण का जन्मादि वृत्तान्त सुनाना, सुमाली तथा माल्यवान के वृत्तान्त, रावण, [[कुम्भकर्ण]], [[विभीषण]] आदि का जन्म-वर्णन, रावणादि सभी भाइयों को [[ब्रह्मा]] से वरदान-प्राप्ति, रावण-पराक्रम-वर्णन के प्रसंग में कुबेरादि [[देवता|देवताओं]] का घर्षण, रावण सम्बन्धित अनेक कथाएँ, [[सीता]] के पूर्वजन्म रूप वेदवती का वृत्तान्त, वेदवती को रावण को शाप, सहस्त्रबाहु अर्जुन के द्वारा नर्मदा अवरोध तथा रावण का बन्धन, रावण का [[बालि]] से युद्ध और बालि की काँख में रावण का बन्धन, सीता-परित्याग, सीता का वाल्मीकि आश्रम में निवास, [[निमि]], [[नहुष]], [[ययाति]] के चरित, शत्रुघ्न द्वारा [[लवणासुर]] वध, [[शम्बूक]] वध तथा ब्राह्मण पुत्र को जीवन प्राप्ति, भार्गव चरित, वृत्रासुर वध प्रसंग, किंपुरुषोत्पत्ति कथा, राम का अश्वमेध यज्ञ, वाल्मीकि के साथ राम के पुत्र [[लव कुश]] का [[रामायण]] गाते हुए [[अश्वमेध यज्ञ]] में प्रवेश, राम की आज्ञा से वाल्मीकि के साथ आयी सीता का राम से मिलन, सीता का रसातल में प्रवेश, [[भरत]], [[लक्ष्मण]] तथा [[शत्रुघ्न]] के पुत्रों का पराक्रम वर्णन, [[दुर्वासा]]-राम संवाद, राम का सशरीर स्वर्गगमन, राम के भ्राताओं का स्वर्गगमन, तथा [[देवता|देवताओं]] का राम का पूजन विशेष आदि वर्णित है। इस काण्ड में 111 सर्ग तथा 3,432 श्लोक प्राप्त होते हैं। बृहद्धर्मपुराण के अनुसार इस काण्ड का पाठ आनन्दात्मक कार्यों, यात्रा आदि में किया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;य: पठेच्छृणुयाद् वापि काण्डमभ्युदयोत्तरम्।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
आनन्दकार्ये यात्रायां स जयी परतोऽत्र वा॥(बृहद्धर्मपुराण 26…14)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>अहिल्या</title>
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		<updated>2010-04-29T10:56:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अहल्या / Ahalya'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[गौतम]] अपनी पत्नी अहल्या के साथ तप करते थे। एक दिन गौतम की अनुपस्थिति में [[इन्द्र]] ने मुनिवेश में आकर अहल्या से संभोग की इच्छा प्रकट की। अहल्या यह जानकर कि इन्द्र स्वयं आए हैं और उसे चाहते हैं- इस अधम कार्य के लिए उद्यत हो गयी। जब इन्द्र लौट रहे थे तब गौतम वहां पहुंचे। गौतम के शाप से इन्द्र के अंडकोश नष्ट हो गये और अहल्या अपना शरीर त्याग, केवल हवा पीती हुई सब प्राणियों से अदृश्य होकर कई हज़ार वर्ष के लिए उसी आश्रम में राख के ढेर पर लेट गयी। गौतम ने कहा कि इस स्थिति से उसे मोक्ष तभी मिलेगा जब दाशरथी राम यहाँ आकर उसका आतिथ्य ग्रहण करेंगे। गौतम स्वयं हिमवान् के एक शिखर पर चले गये और तपस्या करने लगे। &lt;br /&gt;
*इन्द्र ने स्वर्ग में पहुंचकर समस्त [[देवता|देवताओं]] को यह बात बतायी, साथ ही यह भी कहा कि ऐसा अधम काम करके गौतम को श्राप देने के लिए बाध्य कर, इन्द्र ने गौतम के तप को क्षीण कर दिया है। इन्द्र का अंडकोष नष्ट हो गया था। अत: देवताओं ने मेष (भेड़ा) का अंडकोष इन्द्र को प्रदान किया। तभी से इन्द्र मेषवृण कहलाए तथा वृषहीन भेड़ा अर्पित करना पुष्कल-फलदायी माना जाने लगा। वनवास के दिनों में [[राम]]-[[लक्ष्मण]] ने, तपोबल से प्रकाशमान, आश्रम में अहल्या को ढूंढ़कर उसके चरण-स्पर्श किए। अहल्या उनका आतिथ्य-सत्कार कर शापमुक्त हो गयी तथा गौतम के साथ सानंद विहार करने लगी। &amp;lt;balloon title=&amp;quot;वाल्मीकि रामायण, बाल कांड, सर्ग 48-4-33, 49-1.24&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
*[[ब्रह्मा]] ने एक अनुपम सुंदरी कन्या का निर्माण किया जिसे पोषण के लिए गौतम को दे दिया। उसके युवती होने पर गौतम निर्विकार भाव से उसे लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचा। अनेक अन्य देवता भी उसे भार्या-रूप में प्राप्त करना चाहते थे। ब्रह्मा ने सबसे कहा कि [[पृथ्वी]] की दो बार परिक्रमा करके जो सबसे पहले आयेगा उसी को अहल्या दी जायेगी। सब देवता परिक्रमा के लिए चले गये और गौतम ने अर्धप्रसूता [[कामधेनु]] की दो प्रदक्षिणाएं कीं। उसका महत्त्व सात द्वीपों से युक्त पृथ्वी की प्रदक्षिणा के समान ही माना जाता है। ब्रह्मा ने अहल्या से उसका विवाह कर दिया। &lt;br /&gt;
*एक दिन इन्द्र गौतम का रूप धारण् कर उसके अंत:पुर में पहुंच गया। अहल्या तथा अन्य रक्षक उसे गौतम ही समझते रहे, तभी गौतम और उनके शिष्य वहां पहुंचे। गौतम ने रुष्ट होकर अहल्या को सूखी नदी होने का शाप दिया, साथ ही कहा कि गौतमी से मिल जाने पर वह पूर्ववत् हो जायेगी। इन्द्र को भी पाप शमन के निमित्त गौतमी में स्नान करना पड़ा। 'गौतमी-स्नान' के उपरांत वह सहस्त्राक्ष हो गया। &amp;lt;balloon title=&amp;quot;ब्रह्म पुराण, 87&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>असमंजस</title>
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		<updated>2010-04-29T10:55:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''असमंजस / Asmanjas'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[इक्ष्वाकु]] वंश मे एक राजा [[सगर]] हुए थे। राजा सगर की बड़ी रानी का एक बेटा था, उनका नाम असमंजस था। उन्होंने अपने पुत्र असमंजस को निर्वासन का दण्ड़ दिया था। असमंजस राह मे खेलते हुए बालकों को उठाकर सरयू मे फेंक दिया करता था तथा डूबते बच्चों को देखकर प्रसन्न होता था। राजा सगर को जब मालूम पड़ा तो तो उन्होंने असमंजस को उसकी पत्नी समेत राज्य से निर्वासित कर दिया। असमंजस हाथ में कुदाल लेकर वन और पर्वतों पर घूमने लगा। असमंजस का पुत्र था अंशुमान। राजा सगर की छोटी रानियों के बहुत से बेटे थे। कहा जाता है कि ये साठ हजार थे। सगर के ये पुत्र बहुत बलवान और चतुर थे और तरह-तरह की विद्याओं को जानते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>अरण्य काण्ड वा. रा.</title>
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		<updated>2010-04-29T10:55:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अरण्य काण्ड / Aranay Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरण्यकाण्ड में [[राम]], [[सीता]] तथा [[लक्ष्मण]] दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं। जंगल में तपस्वी जनों, मुनियों तथा ॠषियों के आश्रम में विचरण करते हुए राम उनकी करुण-गाथा सुनते हैं। मुनियों आदि को राक्षसों का भी भीषण भय रहता है। इसके पश्चात राम पञ्चवटी में आकर आश्रम में रहते हैं, वहीं शूर्पणखा से मिलन होता है। शूर्पणखा के प्रसंग में उसका नाक-कान विहीन करना तथा उसके भाई [[खर दूषण]] तथा त्रिशिरा से युद्ध और उनका संहार वर्णित है। इसके बाद [[शूर्पणखा]] [[लंका]] जाकर [[रावण]] से अपना वृतान्त कहती है और अप्रतिम सुन्दरी सीता के सौन्दर्य का वर्णन करके उन्हें अपहरण करने की प्रेरणा देती है। रावण-[[मारीच]] संवाद, मारीच का स्वर्णमय, कपटमृग बनना, मारीच वध, सीता का रावण द्वारा अपहरण, सीता कि छुड़ाने के लिए जटायु का युद्ध, गृध्रराज [[जटायु]] का रावण के द्वारा घायल किया जाना, अशोकवाटिका में सीता को रखना, श्रीराम का विलाप, सीता का अन्वेषण, राम-जटायु-संवाद तथा जटायु को मोक्ष प्राप्ति, कबन्ध की आत्मकथा, उसका वध तथा दिव्यरूप प्राप्ति, शबरी के आश्रम में राम का गमन, ॠष्यमूक पर्वत तथा पम्पा सरोवर के तट पर राम का गमन आदि प्रसंग अरण्यकाण्ड में उल्लिखित हैं। बृहद्धर्मपुराण के अनुसार इस काण्ड का पाठ उसे करना चाहिए जो वन, राजकुल, [[अग्नि]] तथा जलपीड़ा से युक्त हो। इसके पाठ से अवश्य मंगल प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;वने राजकुले वह्निजलपीडायुतो नर:।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पठेदारण्यकं काण्डं श्रृणुयाद् वा स मंगली॥(बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्ड 26.11&amp;lt;/ref&amp;gt; अरण्यकाण्ड में 75 सर्ग हैं जिनमें 2,440 श्लोक गणना से प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%B5%E0%A4%BE._%E0%A4%B0%E0%A4%BE.&amp;diff=17357</id>
		<title>अयोध्या काण्ड वा. रा.</title>
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		<updated>2010-04-29T10:55:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''अयोध्या काण्ड / Ayodhaya Kand'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अयोध्याकाण्ड में राजा [[दशरथ]] द्वारा [[राम]] को युवराज बनाने का विचार, राम के राज्यभिषेक की तैयारियाँ, राम को राजनीति का उपदेश, श्रीराम का [[अभिषेक]] सुनकर [[मन्थरा]] का [[कैकेयी]] को उकसाना, कैकेयी का कोपभवन में प्रवेश, राजा से कैकेयी का वरदान माँगना, राजा की चिन्ता, [[भरत]] को राज्यभिषेक तथा राम को चौदह वर्ष का वनवास, श्रीराम का [[कौशल्या]], दशरथ तथा माताओं से अनुज्ञा लेकर [[लक्ष्मण]] तथा [[सीता]] के साथ वनगमन, कौसल्या तथा [[सुमित्रा]] के निकट विलाप करते हुए दशरथ का प्राणत्याग, भरत का आगमन, तथा राम को लेने [[चित्रकूट]] गमन, राम-भरत-संवाद, जाबालि-राम-संवाद, राम-[[वसिष्ठ]]-संवाद, भरत का लौटना, राम का अत्रि के आश्रम गमन, तथा [[अनुसूया]] का सीता को पातिव्रत धर्म का उपदेश आदि कथानक वर्णित है। अयोध्याकाण्ड में 119 सर्ग हैं तथा इन सर्गों में सम्मिलित रूपेण श्लोकों की संख्या 4,286 है। इस काण्ड का पाठ पुत्रजन्म, विवाह तथा गुरुदर्शन हेतु किया जाना चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;पुत्रजन्म विवाहादौ गुरुदर्शन एव च।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
पठेच्च श्रृणुयाच्चेव द्वितीयं काण्डमुत्तमम्॥(बृहद्धर्मपुराण-पूर्वखण्ड 26.10)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{रामायण}}&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:रामायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=17356</id>
		<title>गांधारी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80&amp;diff=17356"/>
		<updated>2010-04-29T10:52:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''गांधारी / Gandhari'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गान्धारी गान्धार देश के सुबल नामक राजा की कन्या थी। इसीलिए इसका नाम गान्धारी पड़ा। &lt;br /&gt;
*गान्धारी [[धृतराष्ट्र]] की पत्नी और [[दुर्योधन]] आदि की माता थीं। &lt;br /&gt;
*[[शिव]] के वरदान से गांधारी के 100 पुत्र हुए, जो [[कौरव]] कहलाये। &lt;br /&gt;
*गान्धारी पतिव्रता के रूप में आदर्श थीं। &lt;br /&gt;
*पति के अन्धा होने के कारण विवाहोपरांत ही गान्धारी ने आँखों पर पट्टी बाँध ली थीं तथा उसे आजन्म बाँधे रहीं। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] के अनन्तर गान्धारी अपने पति के साथ वन में गयीं। वहाँ दावाग्नि में वे भस्म हो गयीं। &lt;br /&gt;
==महाभारत से==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
गांधार राज सुबल की पुत्री का नाम गांधारी था। उसने [[शिव]] को प्रसन्न करके सौ पुत्र पाने का वरदान प्राप्त किया था। [[भीष्म]] की प्रेरणा से [[धृतराष्ट्र]] का विवाह उसके साथ किया गया। गांधारी ने जब सुना कि उसका भावी पति अंधा है तो उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली जिससे कि पतिव्रत धर्म का पालन कर पाये। महर्षि [[व्यास]] अत्यंत थके हुए तथा भूखे थे। गांधारी ने उनका सत्कार किया। प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को अपने पति के अनुरूप सौ पुत्र प्राप्त करने का वरदान दिया। गर्भाधान के उपरांत दो वर्ष बीत गये। [[कुंती]] ने एक पुत्र प्राप्त भी कर लिया किंतु गांधारी ने संतान को जन्म नहीं दिया अत: क्रोध और ईर्ष्या के वशीभूत उसने अपने उदर पर प्रहार किया जिससे लोहे के समान कठोर मांसपिंड निकला। व्यास जी के प्रकट होने पर गांधारी ने उन्हें सब कुछ कह सुनाया। व्यास ने गुप्त स्थान पर घी से भरे हुए एक सौ एक मटके रखवा दिये। मांस-पिंड को शीतल जल से धोने पर उसके एक सौ एक खंड हो गये। प्रत्येक खंड एक-एक मटके में दो वर्ष के लिए रख दिया गया। उसके बाद ढक्कन खोलने पर प्रत्येक मटके से एक-एक बालक प्रकट हुआं अंतिम मटके से एक कन्या हुई जिसका नाम [[दु:शला]] रखा गया तथा उसका विवाह [[जयद्रथ]] से हुआ। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
पहला मटका खोलने पर जो बालक प्रकट हुआ उसका नाम [[दुर्योधन]] हुआ। उसने जन्म लेते ही गदहे की तरह बोलना प्रारंभ किया तथा प्रकृति में अपशकुन प्रकट हुए। पंडितों ने कहा कि इस बालक का परित्याग कर देने से [[कौरव]]-वंश की रक्षा हो सकती है अन्यथा अनर्थ होगा, किंतु मोह वश गांधारी तथा धृतराष्ट्र ने उसका परित्याग नहीं किया। उसी दिन कुंती के घर में [[भीम]] ने जन्म लिया। धृतराष्ट्र की एक वैश्य जाति की सेविका थी जिससे धृतराष्ट्र को युयुत्सुकरण नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
[[महाभारत]] में विजय प्राप्त करने के उपरांत [[पांडव]] पुत्रविहीना गांधारी के सम्मुख जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे। वह उन्हें देखते ही कोई शाप न दे दें, इस बात का भी भय था। अत: उन लोगों ने श्री[[कृष्ण]] को तैयार करके उनके पास भेजा। कृष्ण गांधारी के क्रोध का शमन कर आये। तदुपरांत पांडव धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर गांधारी के दर्शन करने गये। गांधारी उन्हें शाप देने के लिए उद्यत हुईं किंतु महर्षि [[व्यास]] ने उनकी मन:स्थिति जानकर उन्हें समझाया कि कौरवों के प्रतिदिन प्रणाम करने पर वह आशीष देती थीं कि जहां धर्म वहीं जय है फिर धर्म के जीतने पर उन्हें इस प्रकार क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। गांधारी ने कहा कि भीम ने दुर्योधन के साथ अधर्म युद्ध किया था। उसने नाभि के नीचे गदा से प्रहार किया जो कि नियम-विरूद्ध था, अत: उस संदर्भ में वह उन्हें कैसे क्षमा कर दे? [[भीम]] ने अपने इस अपराध के लिए क्षमा-याचना की, साथ ही याद दिलाया कि उसने भी [[द्यूत क्रीड़ा]], [[चीर हरण]] आदि में अधर्म का प्रयोग किया था। गांधारी ने पुन: कहा- 'तुमने [[दु:शासन]] का रक्तपान किया।' भीम ने कहा- '[[सूर्य देवता|सूर्य]] पुत्र [[यम]] जानते हैं कि रक्त मेरे दांत के अंदर नहीं गया, मेरे हाथ रक्तरंजित थे। वह कर्म केवल त्रास उत्पन्न करने के लिए किया था। [[द्रौपदी]] के केश खींचे जाने पर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी।' गांधारी ने कहा- 'तुम मेरे किसी भी एक कम अपराधी पुत्र को जीवित छोड़ देते तो हम दोनों के बुढ़ापे का सहारा रहता।' गांधारी ने [[युधिष्ठिर]] को पुकारा, वह कौरवों का वध करने का अपराध स्वीकारते हुए गांधारी के चरण-स्पर्श करने लगे। गांधारी ने आंख पर बंधी पट्टी से ही उनके पैर की कोर देखी और उनके नाखून काले पड़ गये। यह देखकर [[अर्जुन]] भयभीत होकर [[कृष्ण]] के पीछे छिप गया। उसके छिपने की चेष्टा जानकर गांधारी का क्रोध ठंडा पड़ गया। तदुपरांत कुंती के दर्शन किये। कुंती पांडवों के क्षत-विक्षत शरीरों पर हाथ फेरती और देखती ही रह गयी। द्रौपदी [[अभिमन्यु]] इत्यादि वीरगति को प्राप्त हुए अपने बेटों को याद कर रोती रही। उन सबके बिना राज्य भला किस काम का। गांधारी ने दोनों को धीरज बंधाया। जो होना था, हो गया। उसके लिए शोक करने से क्या लाभ? तदनंतर [[वेदव्यास]] जी के वरदान से गांधारी को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई जिससे वह कौरवों का संपूर्ण विनाश-स्थल देखने में समर्थ हो गयीं। गांधारी युद्ध-क्षेत्र में पड़े कौरव-पांडव बंधुओं, सैनिकों के शव तथा उनसे चिपटकर रोती उनकी पत्नियों और माताओं का विलाप देख-देखकर श्रीकृष्ण को संबोधित कर रोने लगीं। उन दु:खिताओं में [[उत्तरा]] भी थी, कौरवों की पत्नियां भी थीं, [[दु:शला]] भी थी, जो अपने पति [[जयद्रथ]] का सिर खोजने के लिए इधर-उधर भटक रही थी। [[भूरिश्रवा]] की पत्नियां विलाप कर रही थीं। [[शल्य]], [[भगदत्त]], [[भीष्म]], [[द्रोण]] को देख गांधारी सिसकती रहीं, विलाप करती रहीं। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[द्रुपद]] की रानियां और पुत्र वधुएं उसकी जलती चिता की परिक्रमा ले रही थीं। रोते-रोते गांधारी अचानक क्रुद्ध हो उठीं। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा-'मेरे पतिव्रत में बल है तो शाप देती हूं कि यादव वंशी समस्त लोग परस्पर लड़कर मर जायेंगे। तुम्हारा वंश नष्ट हो जायेगा, तुम अकेले जंगल में अशोभनीय मृत्यु प्राप्त करोगे क्योंकि कौरव-पांडवों का युद्ध रोक लेने में एकमात्र तुम ही समर्थ थे और तुमने उन्हें रोका नहीं। तुम्हारे देखते-देखते [[कुरु वंश]] का नाश हो गया।' श्रीकृष्ण ने मुस्कराकर कहा,'जो कुछ आप कह रही हैं, यथार्थ है- यह सब तो पूर्व निश्चित है, ऐसा ही होगा।' &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]], अध्याय 109, 114 115, [[स्त्री पर्व महाभारत|स्त्रीपर्व]] 21-25, [[शल्य पर्व महाभारत|शल्यपर्व]] 63&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
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[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
	</entry>
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		<title>गांडीव धनुष</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''गांडीव धनुष / Gandeeva'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वज्र की गांठ को गांडी कहा गया है। उससे बना धनुष 'गांडीव' कहलाया। अन्य अनेक अक्षय शस्त्रों की भांति अपनी शक्ति के वर्धन के लिए दैत्यों ने इसका भी निर्माण किया था किंतु देवताओं ने उन्हें परास्त कर अक्षय शस्त्रों को प्राप्त कर लिया। &lt;br /&gt;
*[[अर्जुन]] को गांडीव धनुष अत्यधिक प्रिय था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि जो व्यक्ति उसे गांडीव किसी और को देने के लिए कहेगा, उसे वह मार डालेगा। युद्ध में एक बार [[कर्ण]] ने [[युधिष्ठिर]] को परास्त कर दिया। युधिष्ठिर को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। अर्जुन को जब युधिष्ठिर नहीं दीखे तो उनको देखने के लिए वह शिविर में गया। युधिष्ठिर घायल, दुखी, क्रुद्ध हो कर्ण पर खीजे हुए थे। अत: उन्होंने अर्जुन को लानत दी कि वह अब तक भी कर्ण को नहीं मार पाया। यह भी कहा कि वह गांडीव धनुष किसी और को दे दे। &lt;br /&gt;
*प्रतिज्ञानुसार अर्जुन ने तलवार निकाल ली किंतु [[कृष्ण]] ने अर्जुन की मन:स्थिति समझाकर उसे शांत किया और कहा कि बड़े व्यक्ति का अपमान कर देना ही उसके वध के समान है अत: अर्जुन ने युधिष्ठिर को अपमानसूचक बातें कहकर उसे मृतवत मानकर अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह किया- फिर क्षमा-याचना कर बड़े भाई को प्रणाम करके वह युद्ध करने चला गया। &amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, खांडववन, [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योगपर्व]], अध्याय 98, श्लोक 19 से 22 तक, [[कर्ण पर्व महाभारत|कर्णपर्व]], 69-71&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका-टिप्पणी==&lt;br /&gt;
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==अन्य लिंक==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nikhil</name></author>
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		<title>कृष्ण संदर्भ</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AD&amp;diff=17354"/>
		<updated>2010-04-29T10:50:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nikhil: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''कृष्ण संदर्भ / Krishna References'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छान्दोग्य उपनिषद==&lt;br /&gt;
कृष्ण- एक बार आंगिरस ऋषि ने देवकी के पुत्र [[कृष्ण]] को यज्ञदर्शन सुनाया था। फलस्वरूप कृष्ण शेष समस्त विधाओं के प्रति तृष्णाहीन हो गये थे।(छा.उ., अध्याय 3,खंड 17, श्लोक 6)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण का मातृपरक नाम 'देवकीपुत्र' [[छान्दोग्य उपनिषद#तेरहवें खण्ड से उन्नीसवें खण्ड तक|छान्दोग्य उप निषद् (3,17,6)]] में पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विभिन्न प्रसंग== &lt;br /&gt;
{{Tocright}} &lt;br /&gt;
वे अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त ब्रह्म थे।  मूलत: वे नारायण थे।  वे स्वयंभू तथा संपूर्ण जगत के प्रपितामह थे।  द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी रचण, [[अश्विनीकुमार]] नासिकास्थान, [[चंद्र देवता|चंद्र]] और [[सूर्य देवता|सूर्य]] नेत्र तथा विभिन्न [[देवता]] विभिन्न देहयष्टियां हैं।  वे (ब्रह्म रूप) ही प्रलयकाल के अंत में [[ब्रह्मा]] के रूप में स्वयं प्रकट हुए तथा सृष्टि का विस्तार किया।  [[रुद्र]] इत्यादि की सृष्टि करने के उपरांत वे लोकहित के लिए अनेक रूप धारण करके प्रकट होते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के रूप में वही अव्यक्त नारायण व्यक्त रूप धारण करके अवतरित हुए।  वे [[वसुदेव]] के पुत्र हुए।  [[कंस]] के भय से वसुदेव उन्हें [[नंद]] गोप के यहाँ छोड़ आये।  वहीं पलकर वे बड़े हुए।  [[यशोदा]] (नंद की पत्नी) से उन्हें अद्भुत वात्सल्य की उपलब्धि हुई।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(1) शिशुरूप में वे एक बार छकड़े  नीचे सो रहे थे।  यशोदा उन्हें वहां छोड़ यमुना तट गयी थी।  बाल-लीला का प्रदर्शन करते हुए रोते हुए कृष्ण ने अपने पांव के अंगूठे से छकड़े को धक्का दिया तो वह उलट गया। उस पर रखे समस्त मटके चूर-चूर हो गये।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(2) देवताओं के देखते-देखते उन्होंने [[पूतना-वध|पूतना]] को मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(3) वे अपने बड़े भाई संकर्षण ([[बलदेव]]) के साथ खेलते-कूदते बड़े हुए।  सात वर्ष की अवस्था में गोचारण के लिए जाया करते थे।  एक बार मक्खन चुराकर खाने के दंडस्वरूप मां (यशोदा) ने उन्हें ऊखल में बांध दिया।  कृष्ण ने उस ऊखल को [[यमल तथा अर्जुन]] नामक दो वृक्षों के बीच में फंसाकर इतने जोर से खींचा कि वे दोनों वृक्ष भूमिसात हो गये।  इस प्रकार उन वृक्षो पर रहनेवाले दो राक्षसों को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(4) वे दोनों भाई ग्वालोचित वेशधारी वन में पिपिहरी तथा [[बांसुरी]] बजाकर आमोद-प्रमोद के साथ गायों को चराते थे।  कृष्ण पीले और बलराम नीले वस्त्र धारण करते थे।  वे पत्तों के मुकुट पहन लेते।  कभी-कभी रस्सी का [[यज्ञोपवीत]] भी धारण कर लेते थे।  वे गोप बालकों के आकर्षण का केंद्रबिंदु थे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(5) उन्होंने [[कदम्ब]]वन के पास हृद (कुण्ड) में रहने वाले [[कालिय नाग|कालिया नाग]] के मस्तक पर नृत्यक्रीड़ा की थी तथा अन्यत्रा जाने का आदेश दिया था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(6) गोपाल बालकों द्वारा किये सर्वभूत स्त्रष्ट ईश्वर स्वरूप को प्रकट किया तथा [[गिरिराज]] को समर्पित होने वाली खीर वे स्वयं खा गये। तब से [[गोपगण]] उनकी पूजा करने लगे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(7) जब [[इन्द्र]] ने वर्षा की थी तब श्रीकृष्ण ने गौओं की रक्षा के निमित्त एक सप्ताह तक [[गोवर्धन]] पर्वत को अपने हाथ पर उठाए रखा था।  इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें गोविंद नाम दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;   &lt;br /&gt;
(8) श्रीकृष्ण ने पशुओं की हितकामना से वृक्ष रूप-धारी [[अरिष्ट नामक दैत्य]] का संहार किया।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(9) ब्रजनिवासी [[केशी नामक दैत्य]] का संहार किया।  उस दैत्य का शरीर घोड़े जैसा और बल दस हजार हाथियों के समान था।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(10) [[कंस]] के दरबार में रहने वाले चाणूर नामक मल्ल को उन्होंने मार डाला।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(11) कंस के भाई तथा सेनापति शत्रुनाशक का भी उन्होंने नाश कर डाला।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(12) कंस के [[कुवलयापीड़]] नामक हाथी को भी उन्होंने मार गिराया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(13) कंस को मारकर उन्होंने [[उग्रसेन]] का राज्याभिषेक कर दिया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(14) [[उज्जयिनी]] में दोनों भाइयों ने वेद विद्याध्ययन किया। धनुर्विद्या सीखने वे सांदीपनि के पास गये।  [[सांदीपनि]] ने गुरु-दक्षिणा में अपने पुत्र को वापस मांगा, जिसे कोई समुद्री जंतु खा गया था।  श्रीकृष्ण ने समुद्र में रहने वाले उस दैत्य का संहार कर दिया तथा गुरुपुत्र को पुनर्जीवनदान दिया जो कि वर्षों पूर्व यमलोक में जा चुका था। कृष्ण के कृपाप्रसाद से उसने पूर्ववत् अपना शरीर धारण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(15)श्रीकृष्ण ने [[नरकासुर]] (भौमासुर) को मार डाला।&lt;br /&gt;
(16) श्रीकृष्ण ने [[उषा अनिरूद्ध]] का मिलन करवाया, [[बाणासुर]] को मारा।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(17) उन्होंने रूक्मी को पराजित करके [[रुक्मिणी]] का हरण किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(18) इन्द्र को परास्त करके [[परिजात वृक्ष]] का अपहरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाभारत- उद्योगपर्व, द्रोणपर्व==&lt;br /&gt;
स्वयंवर में गांधारराज की राजकुमारी को प्राप्त किया था।  विवाहोपरांत उनके रथ में अच्छी नस्ल के घोड़ो की तरह से राजाओं को जोता गया था।  द्यूतक्रीड़ा के उपरांत [[पांडव|पांडवों]] के वनवास काल में [[कौरव|कौरवों]]-पांडवों के [[महाभारत|युद्ध]] की संभावना देख श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए उनकी सभा में गये।  कृष्ण के साथ [[धृतराष्ट्र]], [[गांधारी]], [[विदुर]], [[सात्यकि]] इत्यादि सभी इस मत के थे कि पांडवों का राज्य उन्हें लौटा देना चाहिए तथा उनसे संधि कर, शांति स्थापित करनी चाहिए; किंतु [[दुर्योधन]] उसके लिए तैयार न था।  उसने [[शकुनि]] तथा [[कर्ण]] से सलाह करके कृष्ण को बंदी बना लेने का निश्चय किया।  सात्यकि को विदित हुआ तो उसने सभासदों के सम्मुख ही कृष्ण को इस तथ्य की सूचना दी।  &lt;br /&gt;
कृष्ण ने क्रुद्ध होकर अपना विश्व रूप (विराट् रूप) प्रदर्शित किया।  कृष्ण की दाहिनी बांह पर [[अर्जुन]], वायीं बांह पर [[बलराम|हलधर]], वक्ष पर [[शिव]] तथा अंग-प्रत्यंग पर विभिन्न देवी-देवता साक्षात् दिखलायी दिए।  कृष्ण के अट्टहास से भूमंडल कांप उठा।  शरीर से ज्वाला प्रस्फुटित हुई तथा सब ओर अनेक देवता और योद्धाओं के दर्शन होने लगे। ऐसे रूप के दर्शन दे, कृष्ण ने वहां से प्रस्थान किया।  [[महाभारत]] युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन के सारथी का कार्यभार संभाला था।  [[अभिमन्यु]] की मृत्यु के उपरांत कृष्ण ने अपने-आप स्वीकार किया कि अर्जुन (नर) नारायण (श्रीकृष्ण) का आधा शरीर है। युद्ध में पांडवों की विजय के उपरांत वे लोग कृष्ण सहित [[कुरुक्षेत्र]] में रहे।  जब तक [[सूर्य देवता|सूर्य]] उत्तरायण नहीं हो गया, [[भीष्म]] पितामह नित्य ही उन्हें दान, धर्म, कर्तव्य का उपदेश देते रहे। उनके स्वर्गारोहण उपरांत पांडवों को [[हस्तिनापुर]] छोड़ते हुए कृष्ण अपने माता-पिता के दर्शन करने [[द्वारका|द्वारकापुरी]] चले गये।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, उद्योगपर्व, 130-131, [[द्रोण पर्व महाभारत|द्रोणपर्व]] 79)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण इस प्रकार क्रीड़ा करते हैं जैसे मनुष्य खिलौनें से क्रीड़ा करता है।  संपूर्ण चराचर भूत नारायण से उद्भूत है। पानी के बुद्बुद्वत् उसी में लीन हो जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(म0भा0, सभापर्व, अध्याय 38)&lt;br /&gt;
==हरिवंश पुराण==&lt;br /&gt;
कृष्ण और बलराम ने अनुभव किया कि [[ब्रज]]भूमि की वनश्री बच्चों की क्रीड़ा , गोपों की फल-सब्जी बेचने के लिए उपज तथा गौओं के क्षारयुक्त मल इत्यादि से नष्ट हो गयी है। इस कारण से उन्होंने निश्चय किया कि [[गोवर्धन]] पर्वत से युक्त [[कदम्ब]] इत्यादि वृक्षों से अपूरित [[वृन्दावन]] में जाकर रहना चाहिए।  कृष्ण ने अपने रोम-रोम से भयानक भेड़ियों को उत्पन्न किया।  उनको देखकर गोप-[[गोपी|गोपांगनाएं]] तथा गायें अत्यंत त्रस्त होकर ब्रजभूमि छोड़ने के लिए तुरंत तैयार हो गये।  लोग वृन्दावन में जा बसे।&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
(हरिवंश [[पुराण]], विष्णुपर्व ।8-9)&lt;br /&gt;
==श्रीमद भागवत==&lt;br /&gt;
कंस की कारागार में वसुदेव के यहाँ भगवान ने कृष्ण-रूप में अवतार लिया।  दस वर्ष तक बलराम के साथ ऐसे रहे कि उनकी कीर्ति वृन्दावन से बाहर नही गयी।  वे गाय चराते तथा बांसुरी बजाकर सबको रिझाते थे।  खेल-खेल में उन्होंने अनेक असुरों का संहार किया, कंस को उठाकर पटक दिया।  कृष्ण ने अपनी शक्ति योगमाया से भौमासुर की लाई राजकन्याओं से एक ही मुहूर्त में अलग-अलग महलों में विधिवत् पाणिग्रहण संस्कार संपादित किया।  एक बार नंद ने कार्तिक शुक्ल एकादशी का उपवास किया तथा रात्रि में [[यमुना नदी|यमुना]] में स्नान करने लगे। वह असुरों की वेला थी।  अत: एक असुर उन्हें पकड़कर वरुण के पास ले गया।  कृष्ण वरुण के पास गये तथा नंद बाबा को वापस ले आये।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
नारद ने कंस को जाकर बताया कि कृष्ण वसुदेव का बेटा है तथा बलराम [[रोहिणी]] का।  वे दोनों छिपाकर नंद के यहाँ रखे गये हैं।  कंस ने कृष्ण को अपनी भावी मृत्यु का कारण मानकर वसुदेव तथा देवकी को पुन: कैद कर लिया।  श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें कैद से छुड़ाया। [[यदु]]वंशियों को [[ययाति]] का शाप था कि वे कभी शासन नहीं कर पायेंगे। अत: कृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन से शासन ग्रहण करने का अनुरोध किया।  कृष्ण और बलराम ने नंद से कहा-&amp;quot;पिताजी, आपका वात्सल्य अपूर्व है।  आपने तथा यशोदा ने अपने बालकों के समान ही हमें स्नेह दिया।  आप ब्रज जाइए। हम लोग भी यहाँ का काम निपटाकर आपसे मिलने आयेंगे।&amp;quot; वे दोनों [[अवंती]]पुर (उज्जैन) निवासी गुरुवर संदीपनि के गुरुकुल में रहकर उनकी सेवा करने लगे।  चौंसठ दिन में उन दोनों ने [[चौंसठ कलाएँ|चौंसठ कलाओं]] में निपुणता प्राप्त की तथा संदीपनि को गुरु-दक्षिणास्वरूप उसका मृत पुत्र पुन: लौटाकर वे दोनों मथुरा लौट गये।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 3।3।-,10।28।-,10।44।–)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के अनेक विवाह हुए थे। (कुछ को विशेष प्रसिद्धि नहीं प्राप्त हुई, वे यहाँ उल्लिखित हैं।) उनकी श्रुतकीर्ति नामक बूआ का विवाह केकय देश में हुआ था।  उनकी कन्या का नाम था भद्रा जिसका विवाह उसके भाई सन्तर्दन आदि ने कृष्ण से कर दिया था।  मद्र देश की राजकुमारी सुलक्षणा को कृष्ण ने स्वयंवर में हर लिया था।  इनके अतिरिक्त [[भौमासुर]] को मारकर अनेक सुंदरियों को वे कैद से छुड़ा लाये थे।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10।56, 57, 58)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक बार सूर्य-ग्रहण के अवसर पर भारत के विभिन्न प्रांतों की जनता कुरुक्षेत्र पहुंची। वहां वसुदेव, कृष्ण और बलराम से नंद, यशोदा, गोप-गोपियों आदि का सम्मिलन हुआ।  कृष्ण ने [[गोपी|गोपियों]] आदि को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दियां  उन्हीं दिनों वसुदेव के यज्ञोत्सव का आयोजन था।  उस संदर्भ में नंद बाबा, यशोदा तथा पांडव-परिवार के अधिकांश सदस्य तीन माह तक द्वारका में ठहरे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0 10 । 82-84)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
एक बार कृष्ण अपने दो भक्तों पर विशेष प्रसन्न हुए। उनमें से एक तो मिथिला निवासी गृहस्थी ब्राह्मण श्रुतदेव था और दूसरा मिथिला का राजा बहुलाश्व था।  श्रीकृष्ण ने दो रूप धारण करके एक ही समय में दोनों को दर्शन दिए तथा दोनों भक्तों ने भगवत्स्वरूप प्राप्त किया।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, ।10।86।13-)&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मा]] की प्रार्थना पर [[विष्णु]] ने हंस का रूप धारण करके सनकादि के चित्त तथा गुणों के अनैक्य के विषय में उपदेश दिया था।  यदुवंशियों के संहार के उपरांत जरा नामक व्याध को निमिंत्त बनाकर श्रीकृष्ण ने स्वधाम में प्रवेश कियां  उन्हें अपने धाम में प्रवेश करते कोई भी देवता देख नहीं पाया।  श्रीकृष्ण की कृपा से उनके शरीर पर प्रहार करने वाला व्याध सदेह स्वर्ग चला गया। &lt;br /&gt;
नश्वर शरीर के त्यागोपरांत वसुदेव, अर्जुन आदि बहुत दुखी हुए।  सब उनकी अलौकिक लीलाओं को स्मरण करते रहे।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(श्रीमद् भा0, 11।13।15-42/- 11 । 30/-)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी भागवत==&lt;br /&gt;
कृष्ण-कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे।  कश्यप ने वरुण से [[कामधेनु]] मांगी थी फिर लौटायी नहीं, अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए। देवी भागवत में [[दिति]] और [[अदिति]] को [[दक्ष]] कन्या माना गया है।  अदिति का पुत्र [[इन्द्र]] था जिसने मां की प्रेरणा से दिति के गर्भ के 49 भाग कर दिए थे जो मरूत हुए।  अदिति से रुष्ट होकर दिति ने शाप दिया था-'जिस प्रकार गुप्त रूप से तूने मेरा गर्भ नष्ट करने का प्रयत्न करवाया है उसी प्रकार पृथ्वी पर जन्म लेकर तू बार-बार मृतवत्सा होगी।' फलत: उसने [[देवकी]] के रूप में जन्म लिया।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
विष्णु ने देवताओं की रक्षा करने के निमित्त [[भृगु]] की पत्नी ([[शुक]] की मां) का हनन किया था अत: भृगु के शापवश उन्होंने पृथ्वी पर बार-बार जन्म लिया।  [[नर-नारायण]] अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए।  अप्सराएं राजकुमारियों के रूप में जन्मीं तथा कृष्ण की पत्नियां हुई।&lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
दैत्य [[मधु]] का पुत्र [[लवण]] ब्राह्मणों को अनेक प्रकार से पीड़ित कर रहा था।  [[लक्ष्मण]] के भाई [[शत्रुघ्न]] ने उस दैत्य को मारकर [[मथुरा]] नामक नगरी की स्थापना की।  कालांतर में [[सूर्यवंश]] क्षीण हो गया।  [[ययाति]] कुलोत्पन्न यादवों ने मथुरा पर अधिकार कर लिया।  यादवराज [[शूरसेन]] के पुत्र का नाम वसुदेव था।  वह वरुण के शाप तथा कश्यप के अंश से उत्पन्न हुआ था।  शूरसेन की मृत्यु के उपरांत [[उग्रसेन]] को राज्य की प्राप्ति हुई।  उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था।  देवक राजा की कन्या का नाम [[देवकी]] था।  उसका जन्म वरुण के शाप तथा अदिति के अंश से हुआ था।  देवक ने उसका विवाह [[वसुदेव]] से कर दिया।  विवाह होते ही आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस को मार डालेगी।  कंस ने देवकी के बाल पकड़कर उसे मारने के लिए खड्ग उठा लिया।  वसुदेव के वीर साथियों से [[कंस]] का युद्ध होने लगा।  यादवों ने कंस को समझा-बुझाकर शांत किया कि अपनी बहन पर हाथ उठाना उचित नहीं है।  हो सकता है, किसी शत्रु ने ही यह आकाशवाणी रची हो।  वसुदेव ने कहा कि वह अपनी प्रत्येक संतान कंस को अर्पित कर देगा।  इस शर्त पर कंस ने उसे छोड़ दिया।  &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
वसुदेव देवकी को लेकर अपने घर चला गया।  प्रथम पुत्र उत्पन्न होने पर वसुदेव पुत्र सहित कंस के पास पहुंचा। कंस ने 'प्रथम बालक से नहीं, अष्टम बालक से भय है' कहकर बालक उसे लौटा दिया, किंतु तभी [[नारद]] ने वहां पहुंचकर कंस को समझाया कि गिनती कहां से शुरू करके किस बालक को अष्टम माना जायेगा, नहीं कहा जा सकता।  यह सुनकर कंस ने बालक को शिला पर पटककर मार डाला।  इसी प्रकार देवकी के छह पुत्र मारे गये। वे छहों शापवश जन्मते ही नष्ट हो गये।  पूर्वकाल में ब्रह्मा अपनी कन्या के प्रति कामुक हो उठे थे। रमण करते हुए ब्रह्मा को देख महर्षि मरीचि के (उर्णा नामक पत्नी के गर्भ से उत्पन्न) छह पुत्रों ने उनका परिहास किया था।  इससे रुष्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दिया था।  फलत: पहले वे [[कालनेमि]] के पुत्र हुए, फिर हिरण्यकशिपु के पुत्र हुए।  दूसरे जन्म में ज्ञान विच्युत न होने के कारण ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा था कि हवे मनवांछित देवता अथवा [[गंधर्व]] हो जायें ! वर पाकर वे लोग तो प्रसन्न हुए।  हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्रों को ब्रह्मा का प्रिय  जान क्रोधावेश में कहा-&amp;quot;तुम पाताल में जाकर निद्रा में पड़े रहोगे। पृथ्वी पर षड्गर्क नाम से प्रसिद्ध होगे।  देवकी के गर्भ से जन्म लेकर कालनेमि के वंश से उत्पन्न कंस के हाथों मारे जाओगे।&amp;quot; देवकी के सातवें गर्भ में अनंत देव आये।  योगमाया ने योग-बल से इस गर्भ का आकर्षण करके उसे [[रोहिणी]] के गर्भ में स्थापित किया।  भौतिक दृष्टि से देवकी का गर्भपात मान लिया गया।  तदनंतर विष्णु के अंशावतार कृष्ण ने अष्टम् पुत्र के रूप में जन्म लिया।  योगमाया ने स्वेच्छा से यशोदा के गर्भ में प्रवेश किया। अन्य पात्रों के जन्म के मूलांश की &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''तालिका निम्नलिखित है:'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| border=&amp;quot;1&amp;quot; cellpadding=&amp;quot;10&amp;quot;&lt;br /&gt;
! मूलांश	&lt;br /&gt;
! कृष्ण-कथा के पात्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[हिरण्यकशिपु]]&lt;br /&gt;
|[[शिशुपाल]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|विप्रचित्त	&lt;br /&gt;
|[[जरासंध]] &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|[[प्रह्लाद]]	&lt;br /&gt;
|[[शल्य]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|खर&lt;br /&gt;
|[[लंबक तथा धेनुक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वाराह और किशोर&lt;br /&gt;
|[[चाणूर और मुष्टिक]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|दिति पुत्र अरिष्ट&lt;br /&gt;
|कुवलय नामक&amp;lt;br /&amp;gt;कंस का हाथी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[यम]], [[रुद्र]], काम और क्रोध-चारों के अंश से [[अश्वत्थामा]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमि का भार-हरण करने की प्रार्थना सुनकर हरि ने देवताओं को दो बाल दिये थे; एक काला-कृष्ण, दूसरा सफेद-[[बलराम]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0 भा0, 4 । 20-25) &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण परमात्मा है। उनके सोलहवें अंश का एक अंश, सौ करोड़ सूर्यों के प्रकाश से युक्त एक बालक होकर, मूलशक्ति प्रसूत डिंब में स्थापित था डिंब के दो भागों में विभक्त होने पर भूखा-प्यासा वह बालक रोने लगा।  कालांतर में पूर्व संस्कार के बल से वह परम पुरुष श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न होकर हंसने लगा।  श्रीकृष्ण उस बालक को आशीर्वाद देकर त्रैलोक्य चले गये।  कृष्ण के आशीर्वाद से वह ज्ञानयुक्त हुआ।  उसने विराट रूप धारण किया, उसी के नाभिकमल से ब्रह्मा ने जन्म लिया तथा सृष्टि की रचना की।  सृष्टि के संहार के लिए ब्रह्मा के ललाट से एकादश रुद्र उत्पन्न हुए।  उस बालक के क्षुद्रांश से ही विष्णु ने उत्पन्न होकर सृष्टि का पालन किया ।  श्रीकृष्ण को चतुर्भुज नारायण से भिन्न माना गया है।  कृष्ण ही ब्रह्मा, विष्णु , [[शिव|महेश]] के कारणभूत हैं।  [[राधा]] सर्वशक्तिमति देवी हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(दे0भा0, 8/3)&lt;br /&gt;
==शिव पुराण==&lt;br /&gt;
[[दुर्वासा]] कृष्ण की परीक्षा लेने गये।  पर्याप्त आतिथ्य पाकर उन्होंने अपने रथ को कृष्ण तथा उनकी पत्नी [[रुक्मिणी]] से खिंचवाने की इच्छा प्रकट की।  कृष्ण और रुक्मिणी के सहर्ष रथ खींचने से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कृष्ण को 'पायस' दी और कहा कि वे अपने बदन पर लगा लें। जहां-जहां यह लगेगी, वहां किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं लग पायेगा।  कृष्ण ने वैसा ही किया।&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
(शि0पु0, 44 ।7। 26) &lt;br /&gt;
==महाभारत के प्रमुख पात्र श्रीकृष्ण==&lt;br /&gt;
===मंगलाचरण===&lt;br /&gt;
[[महाभारत]] धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकों प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष है। यह विविध कथारूपी रत्नों का रत्नाकर तथा अज्ञान के अन्धकारको विनष्ट करने वाला सूर्य है। इस ग्रन्थके मुख्य विषय तथा इस महायुद्ध के महानायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं।  नि:शस्त्र होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण ही महाभारत के प्रधान योद्धा हैं।  इसलिये सम्पूर्ण महाभारत भगवान् वासुदेव के ही नाम, रूप लीला और धामका संकीर्तन है। नारायण के नाम से इस ग्रन्थ के मंगलाचरण में व्यासजी ने सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्ण की ही वन्दना की है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी स्वयंवर===&lt;br /&gt;
महाभारत के [[आदि पर्व महाभारत|आदिपर्व]] में भगवान् श्रीकृष्ण का प्रथम दर्शन [[द्रौपदी]]-स्वयंवर के अवसर पर होता है।  अब [[अर्जुन]] के लक्ष्यवेध करने पर द्रौपदी उनके गले में जयमाला डालती है। तब [[कौरव]]पक्ष के लोग तथा अन्य राजा मिलकर द्रौपदी को पाने के लिये युद्धकी योजना बनाते हैं उस समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनको समझाते हुए कहा कि 'इन लोगों ने द्रौपदी को धर्मपूर्वक प्राप्त किया है, अत: आप लोगों को अकारण उत्तेजित नहीं होना चाहिये।' भगवान् श्रीकृष्ण को धर्म का पक्ष लेते हुए देखकर सभी लोग शान्त हो गये और द्रौपदी के साथ [[पाण्डव]] सकुशल अपने निवास पर चले गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===प्रथम पूजनीय===&lt;br /&gt;
धर्मराज [[युधिष्ठर]] के [[राजसूययज्ञ]] में जब यह प्रश्र उपस्थित हुआ कि यहाँ सर्वप्रथम किसकी पूजा की जाय तो उस समय महात्मा [[भीष्म]] ने कहा कि 'वासुदेव ही इस विश्व के उत्पत्ति एवं प्रलयस्वरूप हैं और इस चराचर जगत् का अस्तित्व उन्हीं से है।  वासुदेव ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता और समस्त प्राणियों के अधीश्वर हैं, अतएव वे ही प्रथम पूजनीय हैं।' भीष्म के इस कथन पर चेदिराज शिशुपाल ने श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा का विरोध करते हुए उनकी कठोर निन्दा की और भीष्म पितामह को भी खरी-खोटी सुनायी।  भगवान् श्री कृष्ण धैर्यपूर्वक उसकी कठोर बातों को सहते रहे और जब वह सीमा पार करने लगा, तब उन्होंने सुदर्शन चक्र के द्वारा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।  सबके देखते-देखते शिशुपाल के शरी रसे एक दिव्य तेज निकला और भगवान् श्रीकृष्ण में समा गया।  इस अलौकिक घटना से यह सिद्ध होता है। कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, भगवान् के हाथों मरकर वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;
===द्रौपदी===&lt;br /&gt;
पाण्डवों के एकमात्र रक्षक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही थे, उन्हीं की कृपा और युक्ति से ही [[भीम|भीमसेन]] के द्वारा जरासन्ध मारा गया और युधिष्ठिर का राजसूययज्ञ सम्पन्न हुआ।  राजसूय यज्ञ का दिव्य सभागार भी मय दानव ने भगवान् श्रीकृष्ण के आदेश से ही बनाया।  द्यूत में पराजित हुए पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी जब भरी सभा में [[दु:शासन]] के द्वारा नग्न की जा रही थी, तब उसकी करुण पुकार सुनकर उस वनमाली ने वस्त्रावतार धारण किया।  शाक का एक पत्ता खाकर भक्तभयहारी भगवान् ने दुर्वासा के कोप से पाण्डवों की रक्षा की।&lt;br /&gt;
===शान्तिदूत===&lt;br /&gt;
युद्ध को रोकने के लिये श्रीकृष्ण शान्तिदूत बने, किंतु [[दुर्योधन]] के अहंकार के कारण युद्धारम्भ हुआ और राजसूययज्ञके अग्रपूज्य भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने।  संग्राम भूमि में उन्होंने अर्जु नके माध्यम से विश्व को [[गीता]] रूपी दुर्लभ रत्न प्रदान किया।  भीष्म, [[द्रोणाचार्य|द्रोण]], [[कर्ण]] और अश्वत्थामा-जैसे महारथियों के दिव्यास्त्रों से उन्होंने पाण्डवों की रक्षा की।  युद्धका अन्त हुआ और युधिष्ठिर का धर्मराज्य स्थापित हुआ।  पाण्डवों का एकमात्र वंशधर उत्तरा का पुत्र [[परीक्षित]] अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से मृत उत्पन्न हुआ, किंतु भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही उसे जीवनदान मिला।  अन्त में [[गांधारी|गान्धारी]] के शाप को स्वीकार करके महाभारत के महानायक भगवान श्रीकृष्णने उद्दण्ड यादवकुल के परस्पर गृहयुद्ध में संहा रके साथ अपनी मानवी लीला का संवरण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद में कृष्ण==&lt;br /&gt;
[[वेद|ऋग्वेद]] में कृष्ण नाम का उल्लेख दो रूपों में मिलता है—एक कृष्ण आंगिरस, जो सोमपान के लिए अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं (ऋग्वेद 8।85।1-9) और दूसरे कृष्ण नाम का एक असुर, जो अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ अंशुमती तटवर्ती प्रदेश में रहता था और इन्द्र द्वारा पराभूत हुआ था। कृष्ण सम्बन्धी इन दोनों सन्दर्भो में परस्पर सम्बन्ध है अथवा नहीं, इस विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों की स्तुति में कक्षिवान ऋषि द्वारा उन्हे कृष्ण के पौत्र विष्णापु के ज़िलाने का श्रेय दिया गया है(ऋग्वेद 1।116।7,23)।  कृष्ण के पुत्र विश्वक (विश्वकाय) ने भी एक सूक्त में सनतान के लिए अश्विनीकुमारों का आवाहन किया है और दूरस्थ विष्णापु को लाने की प्रार्थना की है (ऋग्वेद 8।86।1-5)। ऐसा जान पड़ता है कि कदाचित विष्णापु किसी प्रकार आहत हो गया था और कृष्ण आंगिरस और उनके पुत्र ने उसके जीवन के लिए आरोग्य के देवता [[अश्विनीकुमार|अश्विनीकुमारों]] से प्रार्थना की थी। &lt;br /&gt;
----&lt;br /&gt;
कृष्णासुर के सम्बन्ध में भी उल्लेख है कि उसकी गर्भवती स्त्रियों का [[इन्द्र]] ने वध किया था (ऋग्वेद 1।101।1) ऋग्वेद के एक छंद में गायों के उद्धारकर्ता और स्वामी का उल्लेख है और विष्णु को उस लोक का अधिपति कहा गया है। परन्तु भागवत धर्म के उपास्य कृष्ण की कथा से इन सन्दर्भों का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं जान पड़ता।  [[छान्दोग्य उपनिषद]] में देवकीपुत्र कृष्ण को घोर [[आंगिरस]] का शिष्य कहा गया है और बताया गया है कि गुरु ने उन्हें यज्ञ की एक ऐसी सरल रीति बतायी थी जिसकी दक्षिणा, तप,दान, आर्जव,अहिंसा, और सत्य थी। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण की ज्ञान-पिपासा सदा के लिए शान्त हो गयी।(छान्दोग्य उपनिषद 3।17।4-6)।  कृष्ण आंगिरस का उल्लेख कौशीतकी ब्राह्मण में भी मिलता है (30।9)।  कृष्ण-सम्बन्धी यह सन्दर्भ उन्हें गीता के उपदेष्टा और भागवत धर्म के पूज्य कृष्ण के निकट ले जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बौद्ध साहित्य==&lt;br /&gt;
[[बौद्ध]] साहित्य में कृष्ण का उल्लेख दो स्थलों पर मिलता है-एक घत [[जातक कथा|जातक]] में वर्णित देवगब्भा और उपसागर के बलवान, पराक्रमी, उद्धत और क्रीड़ाप्रिय पुत्र वासुदेव कण्ह की कथा के रूप में और दूसरा महाउमग्ग जातक के कामासक्त वासुदेव कण्ह के सन्दर्भ में। घत जातक के वासुदेव कण्ह पुत्रशोक में दुखी चित्रित किये  गये हैं जिससे ऋग्वेद के आंगिरस कृष्ण के सन्दर्भ से उनका सूत्र जोड़ा जा सकता है।  महाउमग्ग, जातक में वासुदेव कण्ह द्वारा कामासक्त होकर चाण्डाल कन्या जाम्बवती को महिषी बनाने का उल्लेख हुआ है।&lt;br /&gt;
==अनेक वृत्तान्त==&lt;br /&gt;
===निपुण बलवान योद्धा=== &lt;br /&gt;
महाभारत में कृष्ण सम्बन्धी अनेक वृत्तान्त मिलते हैं।  भारत युद्ध में उनके पराक्रम, ऐश्वर्य और नीतिनैपुण्य के साथ उनके देवत्व का भी समन्वय पाया जाता है। सभापर्व में भीष्म द्वारा उनकी प्रशंसा समस्त [[वेद]]-[[वेदान्त]] के ज्ञाता तथा राजनीति में निपुण बलवान योद्धा के रूप में की गयी है।  [[उद्योग पर्व महाभारत|उद्योग पर्व]] में कहा गया है कि अर्जुन वज्रपाणि इन्द्र की अपेक्षा कृष्ण को अधिक पराक्रमी समझकर उन्हें युद्ध में अपनी ओर मिलाने में अपना सौभाग्य मानते हैं।  इसी स्थल पर कृष्ण के पराक्रम का वर्णन करते हुए उनके द्वारा दस्युओं के संहार, दुर्धर्ष राजाओं के विनाश, रुक्मिणी के हरण, नगजित के पुत्रों की पराजय, सुदर्शनराजा की मुक्ति, पाण्डय के संहार, [[काशी]] नगरी के उद्धार, निषादों के राजा एकलव्य के वध, उग्रसेन के पुत्र सुनाम की मृत्यु आदि कार्यो का वर्णन किया गया है। देवताओं के द्वारा उन्हें अवध्यता का वरदान मिला था। उन्होंने बाल्यावस्था में ही इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा के समान बली, [[यमुना नदी|यमुना]] के वन में रहने वाले हयराज को मार डाला था तथा वृष [[प्रलंब]], नरग, जृम्भ, मुर, [[कंस]] आदि का संहार किया था, [[वरुण|जल देवता]] [[वरुण]] को पराजित किया था तथा पाताल वासी पंचजन को मारकर [[पान्चजन्य]] प्राप्त किया था। अपनी प्रिय पत्नी [[सत्यभामा]] की प्रसन्नता के लिए वे अमरावती से [[पारिजात]] लाये थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===वासुदेव===&lt;br /&gt;
महाभारत में प्राप्त कृष्ण सम्बन्धी इन सन्दर्भों से उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व की सूचना मिलती है और ज्ञात होता है कि वे [[वृष्णि संघ|वृष्णि]] वंशीय [[सात्वत]] जाति के पूज्य पुरुष थे। यह भी संकेत मिलता है कि महाभारत और पुराणों में वर्णित कृष्ण के चरित्र और किन्हीं ऐतिहासिक वासुदेव कृष्ण सम्बन्धी कथा में कुछ अन्तर अवश्य रहा होगा, क्योंकि महाभारत और [[पुराण|पुराणों]] में अनेक स्थलों पर इस बात पर बल दिया गया है कि यही कृष्ण वास्तविक वासुदेव हैं, यही द्वितीय वासुदेव हैं। द्वितीय वासुदेव कहने का अभिप्राय यह था कि कुछ अन्य राजा भी अपने को द्वितीय वासुदेव के नाम से प्रसिद्ध करने का यत्न करते थे।  पौण्ड्र राजा पुरुषोत्तम और करवीरपुर के राजा श्रृगाल इसी प्रकार के व्यक्ति थे, जिन्हें मारकर कृष्ण ने सिद्ध किया कि उनका वासुदेवत्व मिथ्या है तथा वे ही स्चयं एकमात्र वासुदेव हैं।&lt;br /&gt;
===पुराणों में कृष्ण===&lt;br /&gt;
[[महाभारत]], [[हरिवंश पुराण]] तथा [[विष्णु पुराण]], [[वायु पुराण]], [[वामन पुराण]], [[भागवत पुराण]] आदि पुराणों में कृष्ण की तुलना में इन्द्र की हीनता सिद्ध करने के लिए अनेक कथाएँ दी गयी हैं; परन्तु फिर भी [[गोवर्धन]] धारण के प्रसंग में उनके इन्द्र द्वारा अभिषिक्त होने और 'उपेन्द्र' नाम से स्वीकृत होने का उल्लेख हुआ है। पुराणों में विविध कथाओं के माध्यम से उत्तरोत्तर कृष्ण की महत्ता और उसी अनुपात में इन्द्र की हीनता प्रमाणित की गयी है। महाभारत में कृष्ण के ऐश्वर्य और देवत्व का प्रचुर वर्णन है परन्तु उनके लालित्य और माधुर्य का कोई संकेत नहीं मिलता। महाभारत उनके गोप जीवन और [[गोपी]] प्रेम के सम्बन्ध में सर्वथा मौन है। [[सभा पर्व महाभारत|सभा पर्व]] के उस प्रसंग में भी, जिसे प्रक्षिप्त कहा जाता है और जिसमें शिशुपाल कृष्ण की निन्दा करते हुए उनके द्वारा पूतना, बकासुर, केशी, वत्सासुर और कंस के वध तथा गोवर्द्धन धारण किये जाने का उल्लेख करता है, गोपियों से उनके प्रेम का कोई संकेत नहीं किया गया है।  इससे यह स्पष्ट सूचित होता है कि गोपाल कृष्ण का ललित और मधुर चरित मूलत: महाभारत के कृष्ण के चरित से भिन्न था।  पुराणों में वर्णित कृष्ण सम्बन्धी ललित कथाएँ उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि पाती गयी हैं।  उदाहरण के लिए हरिवंश में जिसे 'वास्तव में महाभारत का परिशिष्ट कहा जाता है, उनके गोपाल रूप सम्बन्धी सन्दर्भ अतयन्त संक्षिप्त है।  उनकी तुलना में उनके ऐश्वर्य रूप की भोग-विलास सम्बन्धी अनेक कथाएँ कहीं अधिक विस्तार से वर्णित हैं।  विष्णु पुराण में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। किन्तु भागवत, [[पद्म पुराण]] , [[ब्रह्म वैवर्त पुराण]] तथा कुछ अन्य पुराणों में, जिन्हें परवर्ती कहा जा सकता है, गोपालकृष्ण सम्बन्धी कथन अधिक विस्तृत होने लगे हैं। पुराणों के भोग-ऐश्वर्य सम्बन्धी आख्यानों और गोप-गोपी लीला सम्बन्धी मधुर कथाओं में वातावरण का बहुत अन्तर पाया जाता है। यदि एक में घोर भौतिकता, विलासिता और नग्न ऐन्द्रियता है तो दूसरे में भावात्मक कोमलता, हार्दिक उत्फुल्लता, सूक्ष्म अनुभूति और अलौकिकता की ओर उन्मुख उदात्तता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शूरसेन प्रदेश===&lt;br /&gt;
अनुमान है कि गोपाल कृष्ण मूलत: [[शूरसेन]] प्रदेश के सात्वत वृष्णिवंशी पशुपालक क्षत्रियों के कुल देवता थे और उनके क्रीड़ा कौतुक की मनोरंजक कथाएँ मौखिक रूप में लोक-प्रचलित थीं। इन कथाओं के लोक-प्रचलित होने के प्रमाण कुछ पाषाण मूर्तियों और शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चित्रों में मिले है।  मथुरा में प्राप्त एक खण्डित शिलापट्ट में वसुदेव नवजात कृष्ण को एक सूप में सिर पर रखकर यमुना पार करते हुए दिखाये गये हैं। 5वीं शताब्दी ईसवी के एक दूसरे खण्डित शिलापट्ट में [[कालिय नाग|कालिय-दमन]] का दृश्य दिखाया गया है।  यह छठी शताब्दी ईस्वी की अनुमान की गयी है। बंगाल के पहाड़पुर नामक स्थान में छठी शताब्दी की कुछ मृण्मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें [[धेनुकासुर वध]], [[यमलार्जुन उद्धार]] तथा [[मृष्टिक चाणूर]] के साथ मल्ल-युद्ध के दृश्य दिखाये गये हैं।  यहीं पर एक अन्य मूर्ति मिली है जिसमें कृष्ण को किसी गोपी के साथ प्रसिद्ध मुद्रा में खड़े दिखाया गया है।  अनुमान किया गया है कि यह गोपी सम्भवत: [[राधा]] का सबसे प्राचीन मूर्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करती है। राजस्थान के मण्डोर तथा बीकानेर के पास सूरतगढ़ में क्रमश: द्वारपाटों पर उत्कीर्ण गोवर्द्धन –धारण, नवनीत-चौर्य, [[शकटभंजन]] और कालिय-दमन के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं तथा गोवर्द्धन-धारण और दान-लीला का दृश्यांकन प्रस्तुत करने वाले कुछ सुन्दर मिट्टी के खिलौने प्राप्त हुए हैं। मण्डोर के चित्र चौथी-पाँचवी शताब्दी ईस्वी के अनुमान किये गये हैं।  दक्षिण भारत के बादामी के पहाड़ी किले पर कृष्ण-जन्म, पूतना-वध, शकट-भंजन, कंस-वध आदि के अनेक दृश्य गुफ़ाओं में उत्कीर्ण मिले हैं। जो छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाते हैं&amp;lt;balloon title=&amp;quot;(दे0 आर्केलाजिकल सर्वे रिपोर्ट 1926-27, 1905-6 तथा 1928-29 ई॰)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;।&lt;br /&gt;
==काव्य में कृष्ण==&lt;br /&gt;
काव्य में गोपाल कृष्ण की लीला का पहला सन्दर्भ प्रथम शताब्दी ईसवी में रचित [[अश्वघोष]] के बुद्धिचरित' (1-5) में मिलता है। अनुमानत: प्रथम शताब्दी ईस्वी में हाल [[सातवाहन]] द्वारा संगृहीत 'गाहासत्तसई' (गाथा सप्तशती) में कई गाथाएँ कृष्ण, राधा, गोपी, [[यशोदा]] आदि से सम्बद्ध मिलती हैं &amp;lt;balloon title=&amp;quot;(दे0 'गाहासत्तसई' 1।29, 5।47, 2।12, 2।14)&amp;quot; style=&amp;quot;color:blue&amp;quot;&amp;gt;*&amp;lt;/balloon&amp;gt;। इन गाथाओं में कृष्ण द्वारा नारियों के गौरवहरण, मुखमारूत से राधिका के गोरज के अपनयन आदि के उल्लेख हुए हैं।  इन उल्लेखों से सूचित होता है कि कृष्ण के गोपी-प्रेमसम्बन्धी प्रसंग कम से कम पहली शताब्दी ईस्वी के पहले से ही लोक-प्रचलित थे।  यह अवश्य द्रष्टव्य है कि'गाहासत्तसई' में भक्ति भावना का कोई संकेत नहीं मिलता, उसका वातावरण सर्वथा लौकिक श्रृंगार का ही है परन्तु इससे भिन्न दक्षिण के आलवार सन्तों द्वारा रचित गीत पूर्णतया भक्ति भावना से प्रेरित और अनुप्राणित हैं।  इन सन्तों का समय पाँचवीं से नवीं शताब्दी ईसवी अनुमान किया गया है।  आलवार सन्तों के इन गीतों में विष्णु , नारायण अथवा वासुदेव तथा उनके अवतारों-[[राम]] और कृष्ण के प्रति अपूर्व भक्ति –भाव प्रकट किया गया है।  इनमें गोपाल-कृष्ण की ललित लीला के ऐसे अनेक प्रसंग वर्णित हैं जो उत्तर भारत के मध्यकालीन कृष्ण भक्ति- काव्य के प्रिय विषय रहे हैं।  इन गीतों में कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से सम्बद्ध एक नाप्पित्राय नामक गोपी का प्रमुख रूप समें वर्णन है। उसे कृष्ण की प्रियतमा और विष्णु की अर्द्धागिनी [[लक्ष्मी]] का अवतार कहा गया है। अनुमान है कि यह गोपी उत्तर भारत की कृष्णकथा में प्रयुक्त राधा ही है। राधाकृष्ण कथा की प्राचीनता की दृष्टि से तमिल साहित्य का यह प्रमाण महत्त्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
===राधा के प्रेम सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
आठवीं शंताब्दी में रचित भट्टानारायण के 'वेणीसंहार' नामक-नाटक में नांदीश्लोक में तथा वाकपति राज द्वारा लिखित प्राकृत महाकाव्य 'गउडवहो' के मंगलाचरण में कृष्ण की स्तुति उनके राधा और गोपी-प्रेम तथा यशोदा के वात्सल्यभाजन होने की स्पष्ट सूचना देती है। 'गउडवहो' में उन्हें 'विष्णुस्वरूप' और 'लक्ष्मीपति' भी कहा गया है। नवीं शताब्दी ईसवी के 'ध्वन्यालोक' में उद्धृत दो [[श्लोक|श्लोकों]] में कृष्ण और राधा के मधुर प्रेम के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं।  दसवीं शताब्दी के त्रिविक्रम भट्ट रचित 'नलचम्पू' के एक श्लोक में परम पुरुष कृष्ण के साथ राधा के अनुराग का संकेत प्राप्त होता है। दसवीं शताब्दी की ही बल्लभदेव द्वारा रचित 'शिशुपालवध' की टीका तथा सोमदेवपूरि के 'यशस्यतिलकचम्पू' में भी राधा के प्रिय कृष्ण का जिस रूप में उल्लेख मिलता है उससे कृष्ण के गोपीवल्लभ रूप की सूचना प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;
===प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ===&lt;br /&gt;
'कवीन्द्रवचन समुच्चय' नामक कवितासंग्रह भी दसवीं शताब्दी का माना गया है।  इसमें संकलित अनेक श्लोकों में कृष्ण की गोपी और राधा सम्बन्धी प्रेम क्रीड़ाओं का सन्दर्भ मिलता है जिनसे कृष्ण के यशोदा के वात्सल्य-भाजन, गोपियों के कान्त, गोपों के सृहृद् तथा राधा के अनन्य प्रेमभाजन व्यक्तित्व की सूचना मिलती है। इन सभी सन्दर्भो में कृष्ण के दक्षिण और धृष्ट नायकत्व के भी स्पष्ट संकेत हैं। दशवीं शताब्दी तक राधा और कृष्ण के प्रति पूज्यभाव भी विकसित हो चुका था। इसका प्रमाण मालवाधीश वाक्पति मुंजपरमार के एक अभिलेख से भी मिलता है जिसमें श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनका विष्णु रूप में वर्णन है और साथ ही उन्हे राधा के विरह में पीड़ित कहा गया है। दशवीं शताब्दी के आसपास रचित श्रीमद्भागवत में कृष्णचरित का व्यापक वर्णन है इसमें उनके सभी स्वरूपों का वर्णन और संकेत है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
कृष्ण के व्यक्तित्व के लालित्य और माधुर्य के साथ उनके दैवत रूप की प्रतिष्ठा 12वीं शताब्दी तक और अधिक दृढ़ता के साथ हो गयी थी। इसका प्रमाण लीलाशुक द्वारा रचित 'कृष्णकर्णामृतस्तोत्र' ईश्वरपुरी द्वारा रचित 'श्रीकृष्णलीलामृत ' का श्रृगांर रस निश्चित रूप से माधुर्य भक्ति है। इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' में राधा-माधव के जिस उद्दाम श्रृंगार का वर्णन किया गया है, उसकी मूल प्रेरणा भी धार्मिक है। कृष्ण के व्यक्तित्व में इस प्रकार जिस लोकरंजनकारी लालित्य का उदात्तीकरण वैष्णव भक्ति के विकास में होता गया उसी की चरम परिणति हम परवर्ती साहित्य में पाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===असंख्य कथा प्रसंग===&lt;br /&gt;
बारहवीं शताब्दी के बाद कृष्ण-काव्य मृक्तकों के अतिरिक्त प्रबन्धों के रूप में भी प्राप्त होता है। 'सदुक्तिकर्णामृत' नामक एक मुक्तक संग्रह 13वीं शताब्दी के प्रारम्भ का हैं। जिसमें गोपाल कृष्ण की लीला से सम्बद्ध साठ श्लोक हैं। इन श्लोकों में गोपाल कृष्ण के शैशव, कैशोर और यौवन की ललित लीलाओं का ही वर्णन मिलता है। 13वी-14वी शताब्दी में रचित बोपदेव की 'हरिलीला' तथा वेदान्तदेशिककी 'यादवाभ्युदय' नामक रचनाएँ तथा पन्द्रहवीं शताब्दी की 'ब्रजबिहारी' (श्रीधरस्वामी), 'गोपलीला' (रामचन्द्र भट्ट), ' हरिचरित'-काव्य (चतुर्भुज), 'हरिविलास'-काव्य (ब्रजलोलिम्बराज), 'गोपालचरित' (पद्मनाभ), 'मुरारिविजय'- नाटक (कृष्ण भट्ट) और 'कंस-निधन' महाकाव्य (श्रीराम) आदि अनेक काव्य और नाटक गोपालकृष्ण के मधुर, ललित और पूज्य चरित का चित्रण करते हैं। 16वीं शताब्दी से कृष्णभक्ति आन्दोलन सम्पूर्ण उत्तर भारत में व्याप्त हो गया और कृष्ण-काव्य आधुनिक भाषाओं में रचा जाने लगा।  इस काव्य का मूलाधार श्रीमद्भागवत था, परन्तु साथ ही कवियों ने लोक में प्रचलित कृष्णसम्बन्धी उन असंख्य कथा प्रसंगों का भरपूर उपयोग किया जिनमें कृष्ण का चरित वात्सल्य, सख्य और माधुर्यव्यंजक लीलाओं से समन्वित रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सूरदास==&lt;br /&gt;
हिन्दी का कृष्ण-भक्ति काव्य यद्यपि [[सूरदास]] से प्रारम्भ होता है परन्तु इससे पहले 15वीं शताब्दी में [[विद्यापति]] ने अपने पदों में कृष्ण के श्रृंगारी रूप का जो वर्णन किया था उसकी प्रकृति भले ही लौकिक श्रृंगार की रही हो, उसका उपयोग भक्तों ने माधुर्य भक्ति के सन्दर्भों में ही किया। विद्यापति और हिन्दी के रीतिकालीन राधाकृष्ण सम्बन्धी श्रृंगार –काव्य के बीच हिन्दी भक्तिकाव्य का एक लम्बा व्यवधान है जिसमें कृष्ण का व्यक्तित्व कवियों ने अत्यन्त कुशलता के साथ् मानव और अतिमानव के परस्पर विरोधी तत्त्वों से निर्मित कर चित्रित किया है। कृष्ण के इस चरित-चित्रण में बड़ी विलक्षणता है। एक ओर उन्हें विष्णु का अवतार, ब्रह्मा-विष्णु और महेश से परे तथा साक्षात् सच्चिदानन्द ब्रह्म कहा गया है, तो दूसरी ओर उनकी शैशव, बाल्य और किशोरकाल की अत्यन्त मानवीय और स्वाभाविक लीला का मनोहर वर्णन किया गया है। हिन्दी कृष्ण-काव्य के रचयिताओं में कृष्ण का सम्यक् चरित्र-चित्रण वास्तव में सूरदास ने ही किया किन्तु सूरदास का चरित्र-चित्रण वस्तुत: भावांत्मक है। प्रधान रूप से उन्होंने कृष्ण को वात्सल्य, सख्य और माधुर्य का आलम्बन बनाया है और इन भावों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण करते हुए दैन्य और विस्मय के भावों के सहारे उनके प्रति पूज्य भावना व्यक्त की है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
कृष्ण के चरित्र-चित्रण में सूर की अन्य विशेषता यह है कि यद्यपि वे नन्द-यशोदा, गोप-गोपी, आदि के साथ राग-रंग में आचूल मग्न रहते हैं, फिर भी उनके व्यवहार से व्यंजित होता है कि वास्तव में वे भावातीत और वीतराग हैं। कृष्ण के मथुरा और द्वारका-प्रवास तथा उनके प्रति ब्रजवासियों और विशेषकर गोपियों के विरह-भाव का वर्णन करते हुए सूरदास ने कृष्ण के इस विलक्षण व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है।  इसके द्वारा हमें गीता के योगिराज कृष्ण की अनासक्ति का व्यावहारिक परिचय मिलता है।&lt;br /&gt;
---- &lt;br /&gt;
सूरदास के अतिरिक्त अन्य कृष्ण-भक्त कवियों ने कृष्ण के सम्पूर्ण चरित का चित्रण नहीं किया।  बहुत थोड़े से कवियों ने कृष्ण के बाल्य और किशोरकाल के जीवन का परिचय दिया। अधिकांश कवि उनके माधुर्यपूर्ण चरित की ओर ही झुके और राधा और गोपियों के साथ उनके प्रेम सम्बन्धों के चित्रण में ही निमग्न रहें कृष्ण के प्रेमी और प्रेमपात्र दोनों रूपों के चित्रण में अनेक कवियों ने तन्मयता प्रदर्शित की, परन्तु सूरदास ने उनमें वीतरागत्व और अनासक्ति के संकेतों तथा अन्य उपायों द्वारा जिस आध्यात्मिकता की उच्च काव्यमयी व्यंजना की थी, वह कोई अन्य कवि नहीं कर सका।  सूरदास ने कृष्ण के असुर-संहारी रूप का भी विशद वर्णन किया था।  यद्यपि उनके वर्णन में कृष्ण की वीरता और पराक्रम के स्थान पर उनके विस्मयकारी क्रीडा-कौतक की ही प्रधानता है, परन्तु उनका उद्देश्य जिस अलौकिक की व्यंजना करना था उसे परवर्ती कवि नहीं समझ सके। इस कारण उन्होंने कृष्ण-चरित के इस पक्ष की प्राय: उपेक्षा ही की।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण के सहज मानवीय श्रृंगारी रूप को सूरदास ने उनके प्रति दैन्य भावना व्यक्त करके तथा उनके अलौकिक कृत्यों के वर्णयन द्वारा विस्मय की व्यंजना करके उनके चरित में जिस उदात्तता का सन्निवेश किया था, परवर्ती कवियों ने उसे विस्मृत कर दिया और श्रीकृष्ण का चरित लगभग पूर्ण रूप में इहलौकिक हो गया और उसमें मानव व्यक्तित्व की संकुचित एकांगिता ही शेष रह गयी।  फलत: जीवन की व्याख्या की कसौटी पर कसने पर वह अत्यन्त कल्पित और अयथार्थ लगता है, जैसे राग-रंग और आनन्द-विहार में लिप्त जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो। वास्तव में तथ्य यही है कि कृष्ण-चरित जीवन के वास्तविक चित्रण अथवा आदर्श चित्रण के रूप में रचा ही नहीं गया, उनका चरित वास्तव में परब्रह्म की लीलामात्र हैं जिसका प्रयोजन लीलानन्द के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं। उसका उद्देश्य अखण्ड आनन्द में जीवन की आध्यात्मिक परिपूर्णता की व्यंजना करना ही हैं भक्त कवियों ने उस आनन्द का रूप स्त्री-आनन्द रूप में परम पुरुष हैं और उनकी परा शक्ति रूप प्रकृति स्वरूपा राधा हैं जिनके संयोग से ही परम आनंद की परिपूर्णता सिद्ध होती है।&lt;br /&gt;
{{कृष्ण}}&lt;br /&gt;
[[Category:महाभारत]]&lt;br /&gt;
[[Category:पौराणिक कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Nikhil</name></author>
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