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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* कॉमनवेल्थ गेम्स */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। इनका असली  नाम वीरेंदर ठाकरान है पर ग्रामीण क्षेत्र में ये धीरज के नाम से लोकप्रिय है। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपलब्धिया==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे। 1995 में इन्होने कॉमनवेल्थ कुश्ती चैम्पियनशीप में रजत पदक जीत कर भारत का नाम रोशन किया था.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]][[Category:खेलकूद कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। इनका असली  नाम वीरेंदर ठाकरान है पर ग्रामीण क्षेत्र में ये धीरज के नाम से लोकप्रिय है। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है। [[चित्र:Dheerraj.jpg|thumb|220px|धीरज ठाकरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: this is not confirm&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। इनका असली  नाम वीरेंदर ठाकरान है पर ग्रामीण क्षेत्र में ये धीरज के नाम से लोकप्रिय है। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है। [[चित्र:Dheerraj.jpg|thumb|220px|धीरज ठाकरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
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		<updated>2013-11-12T08:35:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। सन [[1995]] में धीरज पहलवान ने [[ऑस्ट्रेलिया]] में हुए [[कॉमनवेल्थ गेम्स]] में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। इनका असली  नाम वीरेंदर ठाकरान है पर ग्रामीण क्षेत्र में ये धीरज के नाम से लोकप्रिय है। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है। [[चित्र:Dheerraj.jpg|thumb|220px|धीरज ठाकरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]][[Category:खेलकूद कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>पंडित लखमीचन्द</title>
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		<updated>2013-04-15T10:52:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* शीर्षक उदाहरण 1 */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीर्षक उदाहरण 1== 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में साँग कला हरियाणवी भाषी क्षेत्रों में लोकरंजन का सर्वप्रमुख माध्यम थी ।परंतु इसके सर्वाधिक लोकप्रिय एवं ज्ञात विद्वान कवि 20वीं शदी में ही हुए हैं । साँग की इस परंपरा का प्रारम्भ 18 वीं शताब्दी में श्री किशन लाल भाट से माना जाता है । इसके बाद श्री बंसीलाल , मो॰ अलीबख्श , श्री बालकराम , मो॰ अहमद बख्श ,पं॰ नेतराम, पं॰ दीपचन्द , श्री स्वरूप चंद , श्री हरदेवा स्वामी आदि साँगी 19वीं शताब्दी तक इस परंपरा को समृद्ध करते रहे । 20 वीं शदी के प्रारम्भ में श्री बाजे भगत जो श्री हरदेवा के शिष्य थे –एक सुप्रसिद्ध साँगी हुए हैं जिन्होने साँग कला को न केवल नैतिक एवं सामाजिक ऊंचाईयों के संबंध मे ही समृद्ध किया बल्कि इसमें काव्यात्मक शुद्धता को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया । लगभग श्री बाजे भगत के समकालीन ही पं॰ लखमीचन्द हुए जो हरियाणा के सूर्यकवि एवं हरियाणवी भाषा के शेक्सपीयर के रूप में जाने जाते हैं । श्री लखमीचन्द एवं श्री बाजेभगत की परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में श्री खेमचंद ,पं ॰ मांगेराम , श्री धनपत सिंह , श्री रामकिशन व्यास के नाम सर्वविख्यात हैं । वर्तमान समय में अनेकों साँग मंडलियाँ हैं जो इन्हीं सांगियों की परंपरा को टेलीविज़न और सिनेमा के युग में जीवित रखने के लिए संघर्षरत हैं जिनमे पं॰जयनारायण , श्री महावीर स्वामी ,श्री श्योनाथ त्यागी , मो॰ काला शरीफ़ ,श्री धरमवीर साँगी आदि प्रसिद्ध हैं । अन्य साँग रागनी गायकों में मास्टर सतवीर जी , श्री रणवीर बड़वासनियाँ , श्री पालेराम दहिया श्री गुलाबसिंह खंडेराव भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शीर्षक उदाहरण 2=== हरियाणा के सूर्यकवि एवं हरियाणवी भाषा के शेक्सपीयर के रूप में विख्यात पं॰ श्री लखमीचन्द का जन्म सन 1901 में तत्कालीन रोहतक जिले के सोनीपत तहसील मे जमुना नदी के किनारे बसे जांटी नामक गाँव के साधरण गौड़ ब्रहाम्ह्ण परिवार मे हुआ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शीर्षक उदाहरण 3====श्री लखमीचंद के पिता पं॰ उमदीराम एक साधारण से किसान थे ,जो अपनी थोड़ी सी जमीन पर कृषि करके समस्त परिवार का पालन - पोषण करते थे । जब लखमीचन्द कुछ बड़े हुए तो उन्हें विद्यालय न भेजकर गोचारण का काम दिया गया । गीत संगीत की लगन उन्हें बचपन से ही थी , अतः अन्य साथी ग्वालों के साथ घूमते –फिरते उनके मुख से सुने हुए टूटे –फूटे गीतों और रागनियों को गुनगुनाकर समय यापन करते थे । आयु बढने के साथ –साथ गीत-संगीत के प्रति उनकी आसक्ति इस कदर बढ़ गई की तात्कालीन लोककला साँग देखने के लिए कई-कई दिन बिना बताए घर से गायब रहते थे । एक बार उस समय के प्रसिद्ध साँगी पं॰ दीपचन्द का साँग देखने के लिए ,तथा दूसरी बार श्री निहाल सिंह का साँग देखने के लिए वे कई दिनों के लिए घर से गायब हो गए । तब बड़ी मुश्किल से उनके घरवाले उन्हें ढूंढकर घर लाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====शीर्षक उदाहरण 4=====इन्हीं दिनों पं॰ लखमीचन्द के जीवन मे एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ सौभाग्य से तात्कालीन सुप्रसिद्ध लोककवि मानसिंह उनके गाँव में&lt;br /&gt;
एक विवाहोत्सव पर भजन गाने के लिए आमंत्रित होकर पधारे । कवि मानसिंह की मधुर कंठ-माधुरी ने किशोरायु लखमीचन्द का कुछ ऐसा मन मोहित किया कि प्रथम भेंट मे ही उन्होने श्री मानसिंह को अपना सतगुरु बना लिया और अपनी संगीत-पिपासा को शांत करने के लिए गुरु के साथ चल दिए । लगभग एक साल तक पूरी निष्ठा एवं लगन के गुरु सेवा करके घर लौटे तो वे गायन एवं वादन कि कला के साथ-साथ एक लोक –कवि भी बन चुके थे । कहते हैं कि वैसे तो मानसिंह अपने जमाने के एक साधारण कवि गायक ही थे परंतु शिष्य का लगाव और श्रद्धा इतनी गहरी थी कि गुरु प्रभाव उसी प्रकार फलदायक हुआ जिस प्रकार सीधे-साधे सकुरात का अपने शिष्य प्लूटो पर या श्री रामानन्द का कबीर पर । पं॰ लखमीचन्द का संपूर्ण जीवन गुरुमय रहा । गायन कला के पश्चात अभिनय कला में महारत अर्जित करने हेतु ये कुछ दिनों मेहंदीपुर निवासी श्रीचंद साँगी की साँग मंडली ने भी रहे तथा बाद में विख्यात साँगी सोहन कुंडलवाला के बेड़े मे भी रहे परंतु अपना गुरु श्री मानसिंह को ही स्वीकार किया । कुछ दिनों के बाद लघभग बीस साल कि आयु में पं॰ लखमीचन्द ने अपने गुरूभाई जयलाल उर्फ जैली के साथ मिलकर स्वतंत्र साँग मंडली बना ली और सारे हरियाणा में घूम--घूम कर अपने स्वयं रचित सांगो का प्रचार करने लगे तो कुछ ही दिनों में सफलता और लोकप्रियता के सोपान चढ़ गए तथा सर्वाधिक लोकप्रिय साँगी , सूर्यकवि का दर्जा हासिल कर गए । प्रारम्भ में इनके साँग श्रंगार रस से परिपूरित थे जो बाद में सामजिकता, नैतिक मूल्यों एवं अध्यात्म का चरम एहसास लिए हुए हैं । इस प्रकार इन्होने समाज के हर वर्ग मे अपनी पैठ बनाई जिस कारण आज भी इनकी कई काव्य पंक्तियाँ हरियाणवी समाज में कहावतों कोई भांति प्रयोग कि जाती हैं ।&lt;br /&gt;
श्री लखमीचन्द बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । वे केवल एक लोककवि या लोक कलाकार ही नहीं अपितु एक उदारचेता , दानी ,एवं लोक-कल्याण कि भावना से ओतप्रोत समाज-सुधारक थे । इनकी बुद्धिमत्ता एवं गायन कौशल को देखकर प्रसिद स्वतन्त्रता सेनानी एवं संस्कृत के विद्वान पं॰ टीकाराम(रोहतक निवासी ) ने इनको बहुत दिनों अपने पास ठहराया तथा संस्कृत भाषा एवं वेदों का अध्ययन कराया । श्री लखमीचन्द द्वारा रचित सांगों की संख्या बीस से अधिक है जिनमे प्रमुख हैं – नौटंकी , हूर मेनका ,भक्त पूर्णमल, मीराबाई , सेठ ताराचंद , सत्यवान-सावित्री , शाही लकड़हारा , चीर पर्व (महाभारत ) कृष्ण-जन्म ,राजा भोज – शरणदेय ,नल-दमयंती , राजपूत चापसिंह ,पद्मावत ,भूप पुरंजय आदि । सांगो के अतिरिक्त इन्होने कुछ मुक्तक पदों एवं रागनियों की रचना भी की है जिनमे भक्ति भावना , साधु सेवा ,गऊ सेवा , सामाजिकता , नैतिकता , देशप्रेम , मानवता, दानशीलता आदि भावों की सर्वोतम अभिव्यक्ति है । पं॰ जी की रचनाओं में संगीत एवं कला पक्ष सर्वाधिक रूप से मजबूत होता है । विभिन्न काव्य शिल्प रूप जैसे – अलंकार सौन्दर्य एवं विविधता , छंद –विधान की भिन्नता , भाषा में तुकबंदी एवं नाद सौन्दर्य , मुहावरों एवं लोकोक्तियों का कुशलता पूर्वक प्रयोग ,छंदो की नयी चाल आदि शिल्प एवं भाव गुण इन्हे कविश्रेष्ठ , सूर्यकवि , कविशिरोमणि जैसी उपाधियाँ देने को सार्थक सिद्ध करते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरियाणवी संस्कृति के पुरोधा और लोकनायक पं॰ लखमीचन्द का देहांत सन 1945 में मात्र 44 वर्ष की आयु मे ही हो गया । एक प्रसिद लोककवि श्री जगदीश चंद्र ने उनके जीवन संदर्भ एवं व्यक्तित्व के बारे में एक रागनी मे लिखा है –&lt;br /&gt;
माता –पिता ने तप करके वो पुत्र रूप मे पाये थे । (टेक )&lt;br /&gt;
आत्म - ज्ञान से आशा तृष्णा ना कदे पास फटकती थी ,&lt;br /&gt;
राग - भाग बैराग त्याग संतोष वीरता शक्ति थी ,&lt;br /&gt;
दया धर्म पुण्ण दान-शीलता गुरु में श्रद्धा भक्ति थी ,&lt;br /&gt;
ताल तर्ज सुरीली कविता नौ रस भरी टपकती थी ,&lt;br /&gt;
चरणों लक्ष्मी झुकती थी पर हाथ द्रव ना लाये थे ।&lt;br /&gt;
माता –पिता ने तप.......&lt;br /&gt;
सन उन्नीस सौ पैंतालीस मे देशनगर घर छोड़ गए ,&lt;br /&gt;
दो की साल ग्यास आसौज सुदी स्वर्ग लोक को दौड़ गए ,&lt;br /&gt;
तात भ्रात भार्या सूत दारा सबसे नाता तोड़ गए ,&lt;br /&gt;
कित ढूंढे जगदीश चंद्र ना कोए पता ठिकाना छोड़ गए ॥&lt;br /&gt;
माता पिता ने तप .....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पं॰ श्री लखमीचन्द 1903-1945&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>पंडित लखमीचन्द</title>
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>चित्र:Mahatma Veer Jee.jpg</title>
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		<updated>2012-11-27T08:20:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: Mahatma Ramchandra Veer ji in Panchkhand Peeth.&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Mahatma Ramchandra Veer ji in Panchkhand Peeth.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>महात्मा रामचन्द्र वीर</title>
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		<updated>2012-11-27T08:19:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* सम्मान और पुरस्कार */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma Ramchandra Veer.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=पंडित महात्मा रामचन्द्र वीर&lt;br /&gt;
|अन्य नाम= स्वामी रामचन्द्र वीर &lt;br /&gt;
|जन्म=[[अश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[विक्रम संवत]] 1966 (सन 1909)&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[विराट नगर]], [[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|अविभावक= स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी  &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान= [[आचार्य धर्मेन्द्र]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[24 अप्रैल]], [[2009]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[विराट नगर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=गोभक्त, समाज सुधारक &lt;br /&gt;
|पद=&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा पुरुस्कार&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=कर्मक्षेत्र&lt;br /&gt;
|पाठ 1=समाज सुधारक, हिन्दू नेता, स्वतंत्रता सेनानी&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 2=हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा सवास्थ्य, वज्रांग वंदना, ‘विजय पताका’ &lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज''' (जन्म- 1909 - मृत्यु- [[24 अप्रैल]], 2009) एक यशस्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। उन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले [[हिन्दू]] महात्माओं का इतिहास लिखा। 'हमारी गोमाता', 'वीर रामायण' ([[महाकाव्य]]), 'हमारा स्वास्थ्य' जैसी दर्जनों पुस्तकें लिखकर उन्होंने साहित्य सेवा में योगदान दिया। वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक-प्राणियों व गोमाता की रक्षा तथा हिन्दू हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[हिन्दी|राष्ट्रभाषा हिन्दी]] की रक्षा के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिन्दी]] की जगह [[उर्दू]] को भाषा घोषित किया, तो महात्मा वीर जी ने उसके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। [[वीर सावरकर|वीर विनायक दामोदर सावरकर]] ने उनका समर्थन किया था। पावनधाम विराट नगर के पंचखंड पिठाधीश्वर एवं विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल संत [[आचार्य धर्मेन्द्र]] उनके सुपुत्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जीवन परिचय=== &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] बादशाह [[औरंगजेब]] के दरबार में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले गोपाल दास जी की 11 वी पीढ़ी में [[आश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[संवत]] 1966 विक्रमी (सन 1909) को गोमाता की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले झुझारू धर्माचार्य महात्मा रामचन्द्र वीर का जन्म श्रीमद स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी के घर पुरातन तीर्थ विराटनगर ([[राजस्थान]])[[बैराट]] में हुआ था।&lt;br /&gt;
*महात्मा रामचन्द्र वीर ने ज्ञान की खोज में घर का त्याग तब किया जब वे न महात्मा थे न वीर। मात्र 14 वर्ष का बालक रामचन्द्र आत्मा की शांति को ढूंढता हुआ अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद के पास जा पहुंचा। &lt;br /&gt;
* 13 वर्ष की अल्पायु में ही इनके पिता ने वीर जी का विवाह कर दिया था, किन्तु अपनी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और स्वाभावगत अनमेलता के कारण यह विवाह, विवाह नहीं बन पाया, वर की आयु से 2 वर्ष बड़ी और नितांत विपरीत मन मस्तिष्क स्वभाव और आचरण वाली पत्नी के साथ दांपत्य प्रारंभ होने के पूर्व ही टूट गया। &lt;br /&gt;
* युवावस्था में महाराज जी पंडित रामचन्द्र शर्मा वीर जी के नाम से पूरे देश में विख्यात थे। इन्होंने [[कोलकाता]] और [[लाहौर]] के कांग्रेस अधिवेशनो में भाग लेकर स्वाधीनता का संकल्प लिया। सन 1932 में इन्होंने [[अजमेर]] के चीएफ़ कमिश्नर गिवाह्सों की उपस्थिति में [[ब्रिटिश साम्राज्य]] के विरुद्ध ओजस्वी भाषण देकर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया। परिणामस्वरुप इन्हें 6 माह के लिए जेल भेज दिया गया। रतलाम और महू में इनके ओजपूर्ण भाषणों के कारण ब्रिटिश प्रशासन कांप उठा था। &lt;br /&gt;
* वीर जी को गोभक्ति पिता जी से विरासत में मिली थी। वीर जी ने जब देखा देश के विभिन्न राज्यों में कसाई-खाने बनाकर गोवंश को नष्ट किया जा रहा है तो इन्होंने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगने तक अन्न और [[नमक]] न ग्रहण करने की महान प्रतिज्ञा की जिसको इन्होंने अंतिम साँस तक निभाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी 1934 में कल्याण ([[मुंबई]]) के निकटवर्ती गाँव तीस के दुर्गा मंदिर में दी जाने वाली निरीह पशुओं की बलि के विरुद्ध संघर्षरत हुए। जनजागरण व अनशन के कारण मंदिर के ट्रस्टियों ने पशुबलि रोकने की घोषणा कर दी। उन्होंने [[भुसावल]], [[जबलपुर]] तथा अन्य अनेक नगरों में पहुँच कर कुछ देवालयों में दी जाने वाली पशुबलि को घोर व् अमानवीय करार देकर इस कलंक से मुक्ति दिलाई। &lt;br /&gt;
* स्वामी रामचन्द्र वीर ने 1000 से अधिक मंदिरों में धर्म के नाम पर होने वाली पशु बलि को बंद कराया था। [[कोलकाता]] के [[कालीघाट काली मंदिर|काली मंदिर]] पर होने वाली पशुबलि का विरोध करने पर आप पर प्राणघातक हमला भी हुआ। तब स्वयं महामना पंडित [[मदन मोहन मालवीय]] ने आकर आपका अनशन तुडवाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक प्राणियों व गोमाता की रक्षा व [[हिन्दू]] हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[स्वामी श्रद्धानन्द]], [[पंडित मदन मोहन मालवीय]], [[वीर सावरकर]], भाई परमानन्द जी, [[केशव बलिराम हेडगवार]] जी के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। संघ के द्वितीय सरसंघचालक [[माधव सदाशिव गोलवालकर]] उपाख्य श्री गुरुजी, भाई [[हनुमान प्रसाद पोद्दार]], लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जैसे लोग वीर जी के तयागमय, तपस्यामय, गाय और हिन्दुओं की रक्षा के लिए किये गए संघर्ष के कारण उनके प्रर्ति आदर भाव रखते थे।&lt;br /&gt;
* गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] द्वारा प्रशंसा -उनके पशुबलि विरोधी अभियान ने विश्वकवि गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] के हृदय को द्ववित कर दिया। विश्व कवि वीर जी के इस मानवीय भावनाओ से परिपूर्ण अभियान के समर्थन में कविता लिख कर उनकी प्रशंसा की। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;महात्मा रामचंद्र वीर&lt;br /&gt;
प्रन्घत्खेर खड्गे करिते धिक्कार&lt;br /&gt;
हे महात्मा, प्राण दिते चाऊ अपनार&lt;br /&gt;
तोमर जनाई नमस्कार&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिन्दी अनुवाद- श्रीयुत रामचन्द्र शर्मा, हे महात्मा हत्यारों के निष्ठुर खड्गों को धिक्कारते हुए हिंसा के विरुद्ध तुमने अपने प्राणों की भेंट चढा देने का निश्चय किया। तुम्हें प्रणाम !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*महात्मा वीर जी ने सन 1932 से ही गोहत्या के विरुद्ध जनजागरण छेड़ दिया था। इन्होंने अनेक राज्यों में गोहत्या बंदी से सम्बन्धी कानून बनाये जाने को लेकर अनेक अनशन किये। सन 1966 में [[सर्वदलीय गोरक्षा अभियान समिति]] ने दिल्ली में व्यापक जन आन्दोलन चलाया। जिस पर  तत्कालीन सरकार ने संतो पर गोलिया चलवा कर संतो का नरसंहार किया,  गोहत्या तथा गोभाक्तो के नरसंहार के विरुद्ध पूरी के शंकराचार्य [[स्वामी निरंजन देव तीर्थ]], संत [[प्रभुदत्त ब्रह्मचारी]] व वीर जी ने अनशन किये, तब वीर जी ने पूरे 166 दिन का अनशन करके पुरे संसार तक गोरक्षा की मांग पहुचने में सफलता प्राप्त की थी.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंदी जगत और साहित्य में योगदान==&lt;br /&gt;
महात्मा वीर एक यशश्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। इन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले हिन्दू हुतात्माओं का इतिहास लिखा। हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा स्वास्थ्य, वज्रांग वंदना समेत दर्जनों पुस्तकें लिख कर साहित्य सेवा में योगदान दिया और लेखनी के माध्यम से जनजागरण किया। ‘वीर रामायण महाकाव्य’ हिन्दी साहित्य को वीरजी की अदभुत देन है। रामचंद्र वीर ने गद्य और पद्य दोनों में बहुत अच्छा लिखा, उनकी अमर कृति ‘विजय पताका’ तो मुर्दों में जान फूंक देने में सक्षम है। [[अटल बिहारी वाजपेयी]] ने अपने बाल्यकाल में इसी पुस्तक को पढकर अपना जीवन देश सेवा हेतु समर्पित किया। इसमें लेखक ने पिछले एक हज़ार वर्ष के [[भारत का इतिहास|भारत के इतिहास]] को पराजय और ग़ुलामी के इतिहास के बजाय संघर्ष और विजय का इतिहास निरूपित किया है। अपनी अधूरी आत्मकथा &amp;quot;विकट यात्रा&amp;quot; को महात्मा वीर जी ने संक्षेप में 650 पृष्ठों में समेटा है। वह भी केवल 1953 तक की कथा है। उनके पूरे जीवन वृत्तांत के लिये तो कोई महाग्रन्थ चाहिये। ऐसे एक महान लेखक और कवि का साहित्य जगत अब तक ठीक से मूल्यांकन नहीं कर पाया है। [[चित्र: Mahatma Veer.jpg|thumb|महात्मा रामचन्द्र वीर ध्यानमग्न]]&lt;br /&gt;
====रचनाएँ====&lt;br /&gt;
महात्मा रामचन्द्र वीर की अन्य प्रकाशित रचनाएँ हैं - वीर का विराट आन्दोलन, वीर रत्न मंजूषा, हिन्दू नारी, हमारी गौ माता, अमर हुतात्मा, विनाश के मार्ग (1945 में रचित), ज्वलंत ज्योति, भोजन और स्वास्थ्य वीर जी राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिंदी]] की जगह [[उर्दू]] को राजभाषा घोषित किया तो वीर जी ने उनके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। तब वीर [[विनायक दामोदर सावरकर]] ने भी उनका समर्थन किया था। जहाँ मध्यकाल में [[वाल्मीकि रामायण]] से प्रेरणा लेकर [[गोस्वामी तुलसीदास]] जी ने जन सामान्य के लिए [[अवधी भाषा]] में [[रामचरित मानस]] की रचना की, वहीं आधुनिक काल में वाल्मीकि रामायण से ही प्रेरित होकर महात्मा रामचन्द्र वीर ने हिन्दी भाषा में श्री रामकथामृत लिखकर एक नया अध्याय जोडा है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अनुपम है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;नहिं हो सकती कोई भाषा मेरे तुल्य अतुल अभिराम। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
करता हूँ मैं अति ममतामय हिन्दी माता तुझे प्रणाम।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वीर जी को उनकी साहित्य, संस्कृति व धर्म की सेवा के उपलक्ष्य में [[13 दिसंबर]] 1998 को [[कोलकाता]] के बड़ा बाज़ार लाइब्रेरी की ओर से &amp;quot;भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा&amp;quot; पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। गोरक्षा पीठाधीश्वर सांसद अवदेश नाथ जी महाराज ने उन्हें शाल व एक लाख रुपया देकर सम्मानित किया था। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने उन्हें जीवित हुतात्मा बताकर उनके पार्टी सम्मान प्रकट किया था।&lt;br /&gt;
[[चित्र: Mahatma Veer Jee.jpg|thumb|महात्मा रामचन्द्र वीर प्रसन्न मुद्रा में]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाप्रयाण==&lt;br /&gt;
वीर जी गोरक्षा के लिए संघर्ष करते हुए 24 अप्रैल, 2009 ई. को शतायु पूर्ण करते हुए [[विराट नगर]] ([[राजस्थान]]) में स्वर्ग सिधार गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.pressnote.in/print.php?pid=44762 संन्यासी स्वामी रामचन्द्र वीर को याद किया गया]&lt;br /&gt;
*[http://divyayug.mywebdunia.com/2009/07/06/1246869720000.html परम पावन श्रीमन्महात्मा रामचन्द्र &amp;quot;वीर' महाराज]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतंत्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:लेखक]] &lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<title>गुरु हनुमान</title>
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		<updated>2012-11-26T08:07:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा खिलाड़ी&lt;br /&gt;
|चित्र=Guru-Hanuman.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=गुरु हनुमान&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=गुरु हनुमान&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=विजय पाल (बचपन का नाम)&lt;br /&gt;
|जन्म=[[15 मार्च]] [[1901]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=चिड़ावा तहसील, [[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[24 मई]], [[1999]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[मेरठ]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|खेल-क्षेत्र=कुश्ती&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[द्रोणाचार्य पुरस्कार]], [[पद्मश्री]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय &lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=गुरु हनुमान, महाबली सतपाल, करतार सिंह, 1972 के ओलम्पियन प्रेमनाथ, सैफ विजेता [[धीरज ठाकरान]], सुभाष पहलवान, हंसराम पहलवान जैसे अनगिनत पहलवानों के कोच थे। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:35, 17 अगस्त 2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''गुरु हनुमान''' (जन्म: [[15 मार्च]] [[1901]] - मृत्यु: [[24 मई]], [[1999]]) [[भारत]] के महान कुश्ती प्रशिक्षक (कोच) थे। वे स्वयं भी महान पहलवान थे उन्‍होंने सम्‍पूर्ण विश्‍व में भारतीय कुश्‍ती को महत्त्वपूर्ण स्‍थान दिलाया। उनकी कुश्‍ती के क्षेत्र विशेष में उपलब्धियों के कारण इन्हें सन 1988 में [[द्रोणाचार्य पुरस्कार]] और सन 1983 में [[पद्मश्री]] से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
उनका जन्म [[राजस्थान]] के [[झुंझुनू ज़िला]] के चिड़ावा तहसील में 1901 में हुआ था। उनका बचपन का नाम विजय पाल था।&lt;br /&gt;
====पहलवानी का शौक एवं आजादी की लड़ाई में योगदान==== &lt;br /&gt;
बचपन में कमजोर सेहत का होने के कारण अक्सर ताकतवर लड़के इन्हें तंग करते थे। इसलिए उन्होंने सेहत बनाने के लिए बचपन में ही पहलवानी को अपना लिया था। कुश्ती के प्रति अपने आगाध प्रेम के चलते इन्होंने 20 साल की उम्र में [[दिल्ली]] की और प्रस्थान किया। भारतीय मल्लयुद्ध के भगवान [[हनुमान]] से प्ररित होकर इन्होंने अपना नाम हनुमान रख लिया और ताउम्र ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया। उनके अनुसार उनकी शादी तो कुश्ती से ही हुई थी। ये बात कोई अतिश्योक्ति भी नहीं थी क्योंकि जितने पहलवान उनके सानिध्य में आगे निकले है शायद किसी और गुरु को इतना सम्मान मिल पाया है। कुश्ती के प्रति उनके प्रेम के चलते मशहूर भारतीय उद्योगपति के.के बिरला ने उन्हें दिल्ली में अखाडा चलने के लिए ज़मीन दान में दे दी थी। सन 1940 में वो आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये। 1947 में [[भारत का विभाजन|भारत विभाजन]] के समय [[पाकिस्तान]] से शरणार्थियों की उन्होंने खूब सेवा की। 1947 के बाद हनुमान अखाडा दिल्ली पहलवानों का मंदिर हो गया। 1980 में इनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====कुश्ती के हनुमान एवं शिष्यों के द्रोणाचार्य===== &lt;br /&gt;
गुरु हनुमान एक गुरु ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के लिए पिता तुल्य थे। कुश्ती का जितना सूक्ष्म ज्ञान उन्हें था शायद ही किसी को हो! गुरु हनुमान ने जब ये देखा की उनके पहलवानों को बुढ़ापे में आर्थिक तंगी होती है तो उन्होंने सरकार से पहलवानों के लिए रोजगार के लिए सिफारिश की परिणामस्वरुप आज बहुत से राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतने वाले पहलवानों को भारतीय रेलवे में हाथों हाथ लिया जाता है। इस तरह उन्होंने हमेशा अपने शिष्यों की सहायता अपने बच्चो के समान की। उनका रहन सहन बिल्कुल गाँव वालों की तरह ही था। उन्होंने अपने जीवन के तमाम वर्ष एक धोती कुरते में ही गुजर दिए। भारतीय स्टाइल की कुश्ती के वे माहिर थे, उन्होंने भारतीय स्टाइल और अंतर्राष्ट्रीय स्टाइल का मेल कराकर अनेक एशियाई चैम्पियन दिए।  पहलवानों को कुश्ती की गुर सिखाने के लिए उनकी लाठी कुश्ती जगत में मशहूर थी जिसके प्रहार से उन्होंने महाबली सतपाल, करतार सिंह, 1972 के ओलम्पियन प्रेमनाथ, सैफ विजेता वीरेंदर ठाकरान (धीरज पहलवान), सुभाष पहलवान, हंसराम पहलवान जैसे अनगिनत पहलवान कुश्ती की मिसाल बने। ये उनकी लाठी का ही कमाल था जो अखाड़े के पहलवानों को 3 बजे ही कसरत करने के लिए जगा देता था। उनके अखाड़े में रहकर खिलाड़ी केवल पहलवानी ही नहीं बल्कि ब्रह्मचारी, आत्मनिर्भर और शाकाहार की ताकत सीखते थे। अपने यहाँ आने वालो को भी वो [[चाय]] के स्थान पर [[बादाम]] की लस्सी पिलाते थे। उनके शिष्य महाबली सतपाल छत्रसाल स्टेडियम में पहलवानों को अत्याधुनिक तरीके से मैट पर प्रशिक्षण देते है जिसके परिणामस्वरूप [[सुशील कुमार पहलवान|पहलवान सुशील कुमार]] और योगेश्वर दत्त एवं नरसिंह यादव जैसे पहलवान राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे है। गुरु के रूप में उनका योगदान यादगार है, कुश्ती के प्रति अपने प्रेम के चलते वो जीवन भर प्रात: 3 बजे ही उठ जाते थे।&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
कुश्ती के प्रति उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें सन 1988 में &amp;quot;[[द्रोणाचार्य पुरस्कार]]&amp;quot; से सम्मानित किया गया। उनके तीन चेले सुदेश कुमार, प्रेम नाथ, वेदप्रकाश ने 1972 कार्डिफ़ कॉमनवेल्थ खेल में स्वर्ण पदक जीता था। सतपाल पहलवान और करतार सिंह ने 1982 और 1986 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। उनके 8 चेलों ने [[भारत]] का खेल सम्मान [[अर्जुन पुरस्कार]] जीता है। &lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
वे कुँवारे थे और उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। वे [[24 मई]], 1999 को कार दुर्घटना में [[हरिद्वार]] में उनकी मृत्यु हो गयी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:कुश्ती]]&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:खेलकूद कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:द्रोणाचार्य पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म श्री]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>धीरज ठाकरान</title>
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		<updated>2012-11-26T08:06:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। सन [[1995]] में धीरज पहलवान ने [[ऑस्ट्रेलिया]] में हुए [[कॉमनवेल्थ गेम्स]] में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। इनका असली  नाम वीरेंदर ठाकरान है पर ग्रामीण क्षेत्र में ये धीरज के नाम से लोकप्रिय है। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]][[Category:खेलकूद कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
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		<title>धीरज ठाकरान</title>
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		<updated>2012-11-26T07:56:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* कुश्ती प्रेम */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। सन [[1995]] में धीरज पहलवान ने [[ऑस्ट्रेलिया]] में हुए [[कॉमनवेल्थ गेम्स]] में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं [[गुरु हनुमान]] के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
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		<title>महात्मा रामचन्द्र वीर</title>
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		<updated>2012-11-21T10:56:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जीवन परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma Ramchandra Veer.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=पंडित महात्मा रामचन्द्र वीर&lt;br /&gt;
|अन्य नाम= स्वामी रामचन्द्र वीर &lt;br /&gt;
|जन्म=[[अश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[विक्रम संवत]] 1966 (सन 1909)&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[विराट नगर]], [[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|अविभावक= स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी  &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान= [[आचार्य धर्मेन्द्र]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[24 अप्रैल]], [[2009]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[विराट नगर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=गोभक्त, समाज सुधारक &lt;br /&gt;
|पद=&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा पुरुस्कार&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=कर्मक्षेत्र&lt;br /&gt;
|पाठ 1=समाज सुधारक, हिन्दू नेता, स्वतंत्रता सेनानी&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 2=हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा सवास्थ्य, वज्रांग वंदना, ‘विजय पताका’ &lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज''' (जन्म- 1909 - मृत्यु- [[24 अप्रैल]], 2009) एक यशस्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। उन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले [[हिन्दू]] महात्माओं का इतिहास लिखा। 'हमारी गोमाता', 'वीर रामायण' ([[महाकाव्य]]), 'हमारा स्वास्थ्य' जैसी दर्जनों पुस्तकें लिखकर उन्होंने साहित्य सेवा में योगदान दिया। वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक-प्राणियों व गोमाता की रक्षा तथा हिन्दू हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[हिन्दी|राष्ट्रभाषा हिन्दी]] की रक्षा के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिन्दी]] की जगह [[उर्दू]] को भाषा घोषित किया, तो महात्मा वीर जी ने उसके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। [[वीर सावरकर|वीर विनायक दामोदर सावरकर]] ने उनका समर्थन किया था। पावनधाम विराट नगर के पंचखंड पिठाधीश्वर एवं विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल संत [[आचार्य धर्मेन्द्र]] उनके सुपुत्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जीवन परिचय=== &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] बादशाह [[औरंगजेब]] के दरबार में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले गोपाल दास जी की 11 वी पीढ़ी में [[आश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[संवत]] 1966 विक्रमी (सन 1909) को गोमाता की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले झुझारू धर्माचार्य महात्मा रामचन्द्र वीर का जन्म श्रीमद स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी के घर पुरातन तीर्थ विराटनगर ([[राजस्थान]])[[बैराट]] में हुआ था।&lt;br /&gt;
*महात्मा रामचन्द्र वीर ने ज्ञान की खोज में घर का त्याग तब किया जब वे न महात्मा थे न वीर। मात्र 14 वर्ष का बालक रामचन्द्र आत्मा की शांति को ढूंढता हुआ अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद के पास जा पहुंचा। &lt;br /&gt;
* 13 वर्ष की अल्पायु में ही इनके पिता ने वीर जी का विवाह कर दिया था, किन्तु अपनी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और स्वाभावगत अनमेलता के कारण यह विवाह, विवाह नहीं बन पाया, वर की आयु से 2 वर्ष बड़ी और नितांत विपरीत मन मस्तिष्क स्वभाव और आचरण वाली पत्नी के साथ दांपत्य प्रारंभ होने के पूर्व ही टूट गया। &lt;br /&gt;
* युवावस्था में महाराज जी पंडित रामचन्द्र शर्मा वीर जी के नाम से पूरे देश में विख्यात थे। इन्होंने [[कोलकाता]] और [[लाहौर]] के कांग्रेस अधिवेशनो में भाग लेकर स्वाधीनता का संकल्प लिया। सन 1932 में इन्होंने [[अजमेर]] के चीएफ़ कमिश्नर गिवाह्सों की उपस्थिति में [[ब्रिटिश साम्राज्य]] के विरुद्ध ओजस्वी भाषण देकर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया। परिणामस्वरुप इन्हें 6 माह के लिए जेल भेज दिया गया। रतलाम और महू में इनके ओजपूर्ण भाषणों के कारण ब्रिटिश प्रशासन कांप उठा था। &lt;br /&gt;
* वीर जी को गोभक्ति पिता जी से विरासत में मिली थी। वीर जी ने जब देखा देश के विभिन्न राज्यों में कसाई-खाने बनाकर गोवंश को नष्ट किया जा रहा है तो इन्होंने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगने तक अन्न और [[नमक]] न ग्रहण करने की महान प्रतिज्ञा की जिसको इन्होंने अंतिम साँस तक निभाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी 1934 में कल्याण ([[मुंबई]]) के निकटवर्ती गाँव तीस के दुर्गा मंदिर में दी जाने वाली निरीह पशुओं की बलि के विरुद्ध संघर्षरत हुए। जनजागरण व अनशन के कारण मंदिर के ट्रस्टियों ने पशुबलि रोकने की घोषणा कर दी। उन्होंने [[भुसावल]], [[जबलपुर]] तथा अन्य अनेक नगरों में पहुँच कर कुछ देवालयों में दी जाने वाली पशुबलि को घोर व् अमानवीय करार देकर इस कलंक से मुक्ति दिलाई। &lt;br /&gt;
* स्वामी रामचन्द्र वीर ने 1000 से अधिक मंदिरों में धर्म के नाम पर होने वाली पशु बलि को बंद कराया था। [[कोलकाता]] के [[कालीघाट काली मंदिर|काली मंदिर]] पर होने वाली पशुबलि का विरोध करने पर आप पर प्राणघातक हमला भी हुआ। तब स्वयं महामना पंडित [[मदन मोहन मालवीय]] ने आकर आपका अनशन तुडवाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक प्राणियों व गोमाता की रक्षा व [[हिन्दू]] हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[स्वामी श्रद्धानन्द]], [[पंडित मदन मोहन मालवीय]], [[वीर सावरकर]], भाई परमानन्द जी, [[केशव बलिराम हेडगवार]] जी के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। संघ के द्वितीय सरसंघचालक [[माधव सदाशिव गोलवालकर]] उपाख्य श्री गुरुजी, भाई [[हनुमान प्रसाद पोद्दार]], लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जैसे लोग वीर जी के तयागमय, तपस्यामय, गाय और हिन्दुओं की रक्षा के लिए किये गए संघर्ष के कारण उनके प्रर्ति आदर भाव रखते थे।&lt;br /&gt;
* गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] द्वारा प्रशंसा -उनके पशुबलि विरोधी अभियान ने विश्वकवि गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] के हृदय को द्ववित कर दिया। विश्व कवि वीर जी के इस मानवीय भावनाओ से परिपूर्ण अभियान के समर्थन में कविता लिख कर उनकी प्रशंसा की। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;महात्मा रामचंद्र वीर&lt;br /&gt;
प्रन्घत्खेर खड्गे करिते धिक्कार&lt;br /&gt;
हे महात्मा, प्राण दिते चाऊ अपनार&lt;br /&gt;
तोमर जनाई नमस्कार&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिन्दी अनुवाद- श्रीयुत रामचन्द्र शर्मा, हे महात्मा हत्यारों के निष्ठुर खड्गों को धिक्कारते हुए हिंसा के विरुद्ध तुमने अपने प्राणों की भेंट चढा देने का निश्चय किया। तुम्हें प्रणाम !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*महात्मा वीर जी ने सन 1932 से ही गोहत्या के विरुद्ध जनजागरण छेड़ दिया था। इन्होंने अनेक राज्यों में गोहत्या बंदी से सम्बन्धी कानून बनाये जाने को लेकर अनेक अनशन किये। सन 1966 में [[सर्वदलीय गोरक्षा अभियान समिति]] ने दिल्ली में व्यापक जन आन्दोलन चलाया। जिस पर  तत्कालीन सरकार ने संतो पर गोलिया चलवा कर संतो का नरसंहार किया,  गोहत्या तथा गोभाक्तो के नरसंहार के विरुद्ध पूरी के शंकराचार्य [[स्वामी निरंजन देव तीर्थ]], संत [[प्रभुदत्त ब्रह्मचारी]] व वीर जी ने अनशन किये, तब वीर जी ने पूरे 166 दिन का अनशन करके पुरे संसार तक गोरक्षा की मांग पहुचने में सफलता प्राप्त की थी.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंदी जगत और साहित्य में योगदान==&lt;br /&gt;
महात्मा वीर एक यशश्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। इन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले हिन्दू हुतात्माओं का इतिहास लिखा। हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा स्वास्थ्य, वज्रांग वंदना समेत दर्जनों पुस्तकें लिख कर साहित्य सेवा में योगदान दिया और लेखनी के माध्यम से जनजागरण किया। ‘वीर रामायण महाकाव्य’ हिन्दी साहित्य को वीरजी की अदभुत देन है। रामचंद्र वीर ने गद्य और पद्य दोनों में बहुत अच्छा लिखा, उनकी अमर कृति ‘विजय पताका’ तो मुर्दों में जान फूंक देने में सक्षम है। [[अटल बिहारी वाजपेयी]] ने अपने बाल्यकाल में इसी पुस्तक को पढकर अपना जीवन देश सेवा हेतु समर्पित किया। इसमें लेखक ने पिछले एक हज़ार वर्ष के [[भारत का इतिहास|भारत के इतिहास]] को पराजय और ग़ुलामी के इतिहास के बजाय संघर्ष और विजय का इतिहास निरूपित किया है। अपनी अधूरी आत्मकथा &amp;quot;विकट यात्रा&amp;quot; को महात्मा वीर जी ने संक्षेप में 650 पृष्ठों में समेटा है। वह भी केवल 1953 तक की कथा है। उनके पूरे जीवन वृत्तांत के लिये तो कोई महाग्रन्थ चाहिये। ऐसे एक महान लेखक और कवि का साहित्य जगत अब तक ठीक से मूल्यांकन नहीं कर पाया है। [[चित्र: Mahatma Veer.jpg|thumb|महात्मा रामचन्द्र वीर ध्यानमग्न]]&lt;br /&gt;
====रचनाएँ====&lt;br /&gt;
महात्मा रामचन्द्र वीर की अन्य प्रकाशित रचनाएँ हैं - वीर का विराट आन्दोलन, वीर रत्न मंजूषा, हिन्दू नारी, हमारी गौ माता, अमर हुतात्मा, विनाश के मार्ग (1945 में रचित), ज्वलंत ज्योति, भोजन और स्वास्थ्य वीर जी राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिंदी]] की जगह [[उर्दू]] को राजभाषा घोषित किया तो वीर जी ने उनके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। तब वीर [[विनायक दामोदर सावरकर]] ने भी उनका समर्थन किया था। जहाँ मध्यकाल में [[वाल्मीकि रामायण]] से प्रेरणा लेकर [[गोस्वामी तुलसीदास]] जी ने जन सामान्य के लिए [[अवधी भाषा]] में [[रामचरित मानस]] की रचना की, वहीं आधुनिक काल में वाल्मीकि रामायण से ही प्रेरित होकर महात्मा रामचन्द्र वीर ने हिन्दी भाषा में श्री रामकथामृत लिखकर एक नया अध्याय जोडा है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अनुपम है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;नहिं हो सकती कोई भाषा मेरे तुल्य अतुल अभिराम। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
करता हूँ मैं अति ममतामय हिन्दी माता तुझे प्रणाम।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वीर जी को उनकी साहित्य, संस्कृति व धर्म की सेवा के उपलक्ष्य में [[13 दिसंबर]] 1998 को [[कोलकाता]] के बड़ा बाज़ार लाइब्रेरी की ओर से &amp;quot;भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा&amp;quot; पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। गोरक्षा पीठाधीश्वर सांसद अवदेश नाथ जी महाराज ने उन्हें शाल व एक लाख रुपया देकर सम्मानित किया था। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने उन्हें जीवित हुतात्मा बताकर उनके पार्टी सम्मान प्रकट किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाप्रयाण==&lt;br /&gt;
वीर जी गोरक्षा के लिए संघर्ष करते हुए 24 अप्रैल, 2009 ई. को शतायु पूर्ण करते हुए [[विराट नगर]] ([[राजस्थान]]) में स्वर्ग सिधार गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.pressnote.in/print.php?pid=44762 संन्यासी स्वामी रामचन्द्र वीर को याद किया गया]&lt;br /&gt;
*[http://divyayug.mywebdunia.com/2009/07/06/1246869720000.html परम पावन श्रीमन्महात्मा रामचन्द्र &amp;quot;वीर' महाराज]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतंत्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:लेखक]] &lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-17T06:57:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* बाहरी कड़ियाँ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा खिलाड़ी&lt;br /&gt;
|चित्र=प्रीतम सिवाच.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=प्रीतम सिवाच &lt;br /&gt;
|पूरा नाम=प्रीतम सिवाच &lt;br /&gt;
|जन्म=[[2 अक्टूबर]] [[1974]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= झाड़सा गाँव, गुडगाँव [[हरियाणा]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=भरत सिंह ठाकरान&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=कुलदीप सिवाच &lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|खेल-क्षेत्र=हॉकी &lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[अर्जुन पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:35, 10 नवम्बर  2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''प्रीतम रानी सिवाच''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Pritam Rani Siwach'', जन्म: 2 अक्टूबर, 1974) भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान हैं। [[हरियाणा]] प्रदेश के झाड़सा गाँव (गुडगाँव) में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर [[हॉकी]] की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी कि आज सारे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी माना जाता है।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थामी उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआई ताराचंद थे। जिन्होंने इन्हें हॉकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस [[खेल]] में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|प्रीतम रानी सिवाच]]&lt;br /&gt;
[[ओलंपिक खेल|ओलंपिक खेलों]] के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के लिए प्रीतम ने [[राष्ट्रीय खेल]] हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने [[रंग]] लाना भी शुरू कर दिया। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही है। अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये [[सोनीपत]] के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। खिलाडियों की कुशलता को किस तरह निखारा जाता है उसको ये भली -भांति जानती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
* 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब।&lt;br /&gt;
* 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
* 2002 में मेनचेस्टर [[इंग्लैंड]] में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
* 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
* 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
* [[चीन]] में एशियाई खेल व अर्जेटीना में हुए विश्व कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वर्ष 1998 में इन्हें [[अर्जुन पुरस्कार]] मिलने के बाद काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन पुरस्कार मिला था। पुरस्कार मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज़्बा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने [[राष्ट्रमंडल खेल|राष्ट्रमंडल खेलों]] में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जन्म दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब [[भारत]] का [[तिरंगा]] फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की [[आंख|आंखों]] से अश्रुधारा बह रही थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6677289.cms  &lt;br /&gt;
http://in.jagran.yahoo.com/news/article/article.php?title_english=&amp;amp;cid=8&amp;amp;scid=14&amp;amp;aid=9536788  &lt;br /&gt;
http://www.jagran.com/haryana/sonipat-9771440.html&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रसिद्ध खिलाड़ी}} &lt;br /&gt;
[[Category:महिला हॉकी खिलाड़ी]] [[Category:हॉकी]]&lt;br /&gt;
[[Category:अर्जुन पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:खेलकूद कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>धीरज ठाकरान</title>
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		<updated>2012-11-16T09:29:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* कुश्ती प्रेम */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। सन [[1995]] में धीरज पहलवान ने [[ऑस्ट्रेलिया]] में हुए [[कॉमनवेल्थ गेम्स]] में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं गुरु हनुमान के अखाड़े में छोड़ा। ये भी [[गुरु हनुमान]] के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]][[Category:खेलकूद कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>महात्मा रामचन्द्र वीर</title>
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		<updated>2012-11-16T08:54:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जीवन परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma Ramchandra Veer.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=पंडित महात्मा रामचन्द्र वीर&lt;br /&gt;
|अन्य नाम= स्वामी रामचन्द्र वीर &lt;br /&gt;
|जन्म=[[अश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[विक्रम संवत]] 1966 (सन 1909)&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[विराट नगर]], [[राजस्थान]]&lt;br /&gt;
|अविभावक= स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी  &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान= [[आचार्य धर्मेन्द्र]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[24 अप्रैल]], [[2009]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[विराट नगर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=गोभक्त, समाज सुधारक &lt;br /&gt;
|पद=&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा पुरुस्कार&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=कर्मक्षेत्र&lt;br /&gt;
|पाठ 1=समाज सुधारक, हिन्दू नेता, स्वतंत्रता सेनानी&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=रचनाएँ&lt;br /&gt;
|पाठ 2=हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा सवास्थ्य, वज्रांग वंदना, ‘विजय पताका’ &lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज''' (जन्म- 1909 - मृत्यु- [[24 अप्रैल]], 2009) एक यशस्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। उन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले [[हिन्दू]] महात्माओं का इतिहास लिखा। 'हमारी गोमाता', 'वीर रामायण' ([[महाकाव्य]]), 'हमारा स्वास्थ्य' जैसी दर्जनों पुस्तकें लिखकर उन्होंने साहित्य सेवा में योगदान दिया। वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक-प्राणियों व गोमाता की रक्षा तथा हिन्दू हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[हिन्दी|राष्ट्रभाषा हिन्दी]] की रक्षा के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिन्दी]] की जगह [[उर्दू]] को भाषा घोषित किया, तो महात्मा वीर जी ने उसके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। [[वीर सावरकर|वीर विनायक दामोदर सावरकर]] ने उनका समर्थन किया था। पावनधाम विराट नगर के पंचखंड पिठाधीश्वर एवं विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल संत [[आचार्य धर्मेन्द्र]] उनके सुपुत्र हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जीवन परिचय=== &lt;br /&gt;
*[[मुग़ल]] बादशाह [[औरंगजेब]] के दरबार में अपना प्राणोत्सर्ग करने वाले गोपाल दास जी की 11 वी पीढ़ी में [[आश्विन]] [[शुक्ल पक्ष|शुक्ल]] [[प्रतिपदा]] [[संवत]] 1966 विक्रमी (सन 1909) को गोमाता की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले झुझारू धर्माचार्य महात्मा रामचन्द्र वीर का जन्म श्रीमद स्वामी भूरामल जी व श्रीमती विरधी देवी के घर पुरातन तीर्थ विराटनगर ([[राजस्थान]]) में हुआ था।&lt;br /&gt;
*महात्मा रामचन्द्र वीर ने ज्ञान की खोज में घर का त्याग तब किया जब वे न महात्मा थे न वीर। मात्र 14 वर्ष का बालक रामचन्द्र आत्मा की शांति को ढूंढता हुआ अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद के पास जा पहुंचा। &lt;br /&gt;
* 13 वर्ष की अल्पायु में ही इनके पिता ने वीर जी का विवाह कर दिया था, किन्तु अपनी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और स्वाभावगत अनमेलता के कारण यह विवाह, विवाह नहीं बन पाया, वर की आयु से 2 वर्ष बड़ी और नितांत विपरीत मन मस्तिष्क स्वभाव और आचरण वाली पत्नी के साथ दांपत्य प्रारंभ होने के पूर्व ही टूट गया। &lt;br /&gt;
* युवावस्था में महाराज जी पंडित रामचन्द्र शर्मा वीर जी के नाम से पूरे देश में विख्यात थे। इन्होंने [[कोलकाता]] और [[लाहौर]] के कांग्रेस अधिवेशनो में भाग लेकर स्वाधीनता का संकल्प लिया। सन 1932 में इन्होंने [[अजमेर]] के चीएफ़ कमिश्नर गिवाह्सों की उपस्थिति में [[ब्रिटिश साम्राज्य]] के विरुद्ध ओजस्वी भाषण देकर अपनी निर्भीकता का परिचय दिया। परिणामस्वरुप इन्हें 6 माह के लिए जेल भेज दिया गया। रतलाम और महू में इनके ओजपूर्ण भाषणों के कारण ब्रिटिश प्रशासन कांप उठा था। &lt;br /&gt;
* वीर जी को गोभक्ति पिता जी से विरासत में मिली थी। वीर जी ने जब देखा देश के विभिन्न राज्यों में कसाई-खाने बनाकर गोवंश को नष्ट किया जा रहा है तो इन्होंने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगने तक अन्न और [[नमक]] न ग्रहण करने की महान प्रतिज्ञा की जिसको इन्होंने अंतिम साँस तक निभाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी 1934 में कल्याण ([[मुंबई]]) के निकटवर्ती गाँव तीस के दुर्गा मंदिर में दी जाने वाली निरीह पशुओं की बलि के विरुद्ध संघर्षरत हुए। जनजागरण व अनशन के कारण मंदिर के ट्रस्टियों ने पशुबलि रोकने की घोषणा कर दी। उन्होंने [[भुसावल]], [[जबलपुर]] तथा अन्य अनेक नगरों में पहुँच कर कुछ देवालयों में दी जाने वाली पशुबलि को घोर व् अमानवीय करार देकर इस कलंक से मुक्ति दिलाई। &lt;br /&gt;
* स्वामी रामचन्द्र वीर ने 1000 से अधिक मंदिरों में धर्म के नाम पर होने वाली पशु बलि को बंद कराया था। [[कोलकाता]] के [[कालीघाट काली मंदिर|काली मंदिर]] पर होने वाली पशुबलि का विरोध करने पर आप पर प्राणघातक हमला भी हुआ। तब स्वयं महामना पंडित [[मदन मोहन मालवीय]] ने आकर आपका अनशन तुडवाया। &lt;br /&gt;
* वीर जी महाराज ने देश की स्वाधीनता, मूक प्राणियों व गोमाता की रक्षा व [[हिन्दू]] हितों के लिए 28 बार जेल यातनाएँ सहन की। वीर जी [[स्वामी श्रद्धानन्द]], [[पंडित मदन मोहन मालवीय]], [[वीर सावरकर]], भाई परमानन्द जी, [[केशव बलिराम हेडगवार]] जी के प्रति श्रद्धा भाव रखते थे। संघ के द्वितीय सरसंघचालक [[माधव सदाशिव गोलवालकर]] उपाख्य श्री गुरुजी, भाई [[हनुमान प्रसाद पोद्दार]], लाला हरदेव सहाय, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जैसे लोग वीर जी के तयागमय, तपस्यामय, गाय और हिन्दुओं की रक्षा के लिए किये गए संघर्ष के कारण उनके प्रर्ति आदर भाव रखते थे।&lt;br /&gt;
* गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] द्वारा प्रशंसा -उनके पशुबलि विरोधी अभियान ने विश्वकवि गुरु [[रवीन्द्रनाथ ठाकुर]] के हृदय को द्ववित कर दिया। विश्व कवि वीर जी के इस मानवीय भावनाओ से परिपूर्ण अभियान के समर्थन में कविता लिख कर उनकी प्रशंसा की। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;महात्मा रामचंद्र वीर&lt;br /&gt;
प्रन्घत्खेर खड्गे करिते धिक्कार&lt;br /&gt;
हे महात्मा, प्राण दिते चाऊ अपनार&lt;br /&gt;
तोमर जनाई नमस्कार&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हिन्दी अनुवाद- श्रीयुत रामचन्द्र शर्मा, हे महात्मा हत्यारों के निष्ठुर खड्गों को धिक्कारते हुए हिंसा के विरुद्ध तुमने अपने प्राणों की भेंट चढा देने का निश्चय किया। तुम्हें प्रणाम !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*महात्मा वीर जी ने सन 1932 से ही गोहत्या के विरुद्ध जनजागरण छेड़ दिया था। इन्होंने अनेक राज्यों में गोहत्या बंदी से सम्बन्धी कानून बनाये जाने को लेकर अनेक अनशन किये। सन 1966 में [[सर्वदलीय गोरक्षा अभियान समिति]] ने दिल्ली में व्यापक जन आन्दोलन चलाया। जिस पर  तत्कालीन सरकार ने संतो पर गोलिया चलवा कर संतो का नरसंहार किया,  गोहत्या तथा गोभाक्तो के नरसंहार के विरुद्ध पूरी के शंकराचार्य [[स्वामी निरंजन देव तीर्थ]], संत [[प्रभुदत्त ब्रह्मचारी]] व वीर जी ने अनशन किये, तब वीर जी ने पूरे 166 दिन का अनशन करके पुरे संसार तक गोरक्षा की मांग पहुचने में सफलता प्राप्त की थी.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंदी जगत और साहित्य में योगदान==&lt;br /&gt;
महात्मा वीर एक यशश्वी लेखक, कवि तथा ओजस्वी वक्ता थे। इन्होंने देश तथा धर्म के लिए बलिदान देने वाले हिन्दू हुतात्माओं का इतिहास लिखा। हमारी गोमाता, श्री रामकथामृत (महाकाव्य), हमारा स्वास्थ्य, वज्रांग वंदना समेत दर्जनों पुस्तकें लिख कर साहित्य सेवा में योगदान दिया और लेखनी के माध्यम से जनजागरण किया। ‘वीर रामायण महाकाव्य’ हिन्दी साहित्य को वीरजी की अदभुत देन है। रामचंद्र वीर ने गद्य और पद्य दोनों में बहुत अच्छा लिखा, उनकी अमर कृति ‘विजय पताका’ तो मुर्दों में जान फूंक देने में सक्षम है। [[अटल बिहारी वाजपेयी]] ने अपने बाल्यकाल में इसी पुस्तक को पढकर अपना जीवन देश सेवा हेतु समर्पित किया। इसमें लेखक ने पिछले एक हज़ार वर्ष के [[भारत का इतिहास|भारत के इतिहास]] को पराजय और ग़ुलामी के इतिहास के बजाय संघर्ष और विजय का इतिहास निरूपित किया है। अपनी अधूरी आत्मकथा &amp;quot;विकट यात्रा&amp;quot; को महात्मा वीर जी ने संक्षेप में 650 पृष्ठों में समेटा है। वह भी केवल 1953 तक की कथा है। उनके पूरे जीवन वृत्तांत के लिये तो कोई महाग्रन्थ चाहिये। ऐसे एक महान लेखक और कवि का साहित्य जगत अब तक ठीक से मूल्यांकन नहीं कर पाया है। [[चित्र: Mahatma Veer.jpg|thumb|महात्मा रामचन्द्र वीर ध्यानमग्न]]&lt;br /&gt;
====रचनाएँ====&lt;br /&gt;
महात्मा रामचन्द्र वीर की अन्य प्रकाशित रचनाएँ हैं - वीर का विराट आन्दोलन, वीर रत्न मंजूषा, हिन्दू नारी, हमारी गौ माता, अमर हुतात्मा, विनाश के मार्ग (1945 में रचित), ज्वलंत ज्योति, भोजन और स्वास्थ्य वीर जी राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए भी संघर्षरत रहे। एक राज्य ने जब [[हिंदी]] की जगह [[उर्दू]] को राजभाषा घोषित किया तो वीर जी ने उनके विरुद्ध अभियान चलाया व अनशन किया। तब वीर [[विनायक दामोदर सावरकर]] ने भी उनका समर्थन किया था। जहाँ मध्यकाल में [[वाल्मीकि रामायण]] से प्रेरणा लेकर [[गोस्वामी तुलसीदास]] जी ने जन सामान्य के लिए [[अवधी भाषा]] में [[रामचरित मानस]] की रचना की, वहीं आधुनिक काल में वाल्मीकि रामायण से ही प्रेरित होकर महात्मा रामचन्द्र वीर ने हिन्दी भाषा में श्री रामकथामृत लिखकर एक नया अध्याय जोडा है। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अनुपम है- &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;नहिं हो सकती कोई भाषा मेरे तुल्य अतुल अभिराम। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
करता हूँ मैं अति ममतामय हिन्दी माता तुझे प्रणाम।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वीर जी को उनकी साहित्य, संस्कृति व धर्म की सेवा के उपलक्ष्य में [[13 दिसंबर]] 1998 को [[कोलकाता]] के बड़ा बाज़ार लाइब्रेरी की ओर से &amp;quot;भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार राष्ट्र सेवा&amp;quot; पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। गोरक्षा पीठाधीश्वर सांसद अवदेश नाथ जी महाराज ने उन्हें शाल व एक लाख रुपया देकर सम्मानित किया था। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने उन्हें जीवित हुतात्मा बताकर उनके पार्टी सम्मान प्रकट किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==महाप्रयाण==&lt;br /&gt;
वीर जी गोरक्षा के लिए संघर्ष करते हुए 24 अप्रैल, 2009 ई. को शतायु पूर्ण करते हुए [[विराट नगर]] ([[राजस्थान]]) में स्वर्ग सिधार गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.pressnote.in/print.php?pid=44762 संन्यासी स्वामी रामचन्द्र वीर को याद किया गया]&lt;br /&gt;
*[http://divyayug.mywebdunia.com/2009/07/06/1246869720000.html परम पावन श्रीमन्महात्मा रामचन्द्र &amp;quot;वीर' महाराज]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{स्वतंत्रता सेनानी}}&lt;br /&gt;
[[Category:स्वतन्त्रता सेनानी]]&lt;br /&gt;
[[Category:लेखक]] &lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=302249</id>
		<title>गोशाला (काव्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=302249"/>
		<updated>2012-11-15T12:42:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* रचना काल */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;===रचना काल===&lt;br /&gt;
[[आचार्य धर्मेन्द्र]] ने इसका प्रथम पथ अपने विवाह के उपलक्ष्य में, जहानाबाद ([[बिहार]]) स्थित उनके सव्सुराल्या के उधन में आयोजित काव्यगोष्ठी में 20 फरवरी 1960 की संध्या में किया था। श्रोताओ में उनकी नववधू परम श्रेध्य श्रीमती प्रतिभा देवी जी भी सम्मलित थी। इसका प्रथम संस्करण 1960 में प्रकाशित हुआ था। &lt;br /&gt;
; पेश है गोशाला के कुछ अवतरण :&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;राम कृष्ण के इतिहासों का सार तत्त्व है गोशाला, स्मृतियों, वेदो, उपनिषदों में एक तत्त्व है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
धर्म स्वयं गो बनकर मानो बसता है गोशाला में, देश, धर्म एवं संस्कृत में की परिभाषा है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
किंचित अधिक सुरा पी ली तो लगा बहकने मतवाला, प्याले पर प्याले टी पीकर सूख गया पीने वाला ।। &lt;br /&gt;
पर जी भर कर गोपय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं, जितना अधिक पियो उतना ही सबल बनाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
विमुख हुए पितु-मत, बंधू सब विमुख हुए साली साला, विमुख हुआ जग, रुष्ट हुए प्रभु, खफा हुए अल्लाहताला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टूटे सब सम्बन्ध जगत से, मदिरा पीने वाले के, सहज स्नेह सम्बन्ध जोड़कर सुदृढ़ बनाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
प्रीतिभोज में चाहे कोई खूब पिला दे टी प्याला, चाहे कलश खाली कर, क्यों न पिला डाले हाला ।। &lt;br /&gt;
पर मिष्ठान अगर न हुए तो, सब कुछ व्यर्थ कहलायेगा, सहभोजों में सरस मिठाई हमें खिलाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे आगे, मेरे पीछे, दायें - बाएं गोशाला, मेरे बाहर , मेरे भीतर जो कुछ है, बस गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मैं गायो का गाय मेरी, ऐसा हो सदभाव सदा, तो सुरपुर से भी सुखकर है, मुझको मेरी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म न मेरा हिन्दू-मुस्लिम एक धर्म है गोशाला, कर्म और कर्त्तव्य, कार्यकर्म. दिनचर्या सब गोशाला ।। &lt;br /&gt;
गोभक्त की जाति वर्ण है - गो,गोबिंद - उपासक का, एक शब्द में मेरा पूरा, परिचय, केवल - गोशाला ।। &lt;br /&gt;
हूण, यवन, शक, मलेछ मिट गये पीते पीते मधुहाला, आत्मसात कर गयी सभी को मदिरालय की विष-जवाला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु आज तक किसके बल पर जाति हमारी जीवित है ? हमको अब तक जिला रही है, बंधू, हमारी गोशाला, टिड्डी दल का क्रूर असुर दल भारत पर छाया काला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुआ दनुजता का तांडव भी हृदय हिला देने वाला, गिरे वज्र मंदिरों मठों पर गोभाक्तो पर गाज गिरी ।।&lt;br /&gt;
किन्तु न झुकी पताका एवं रही सुरक्षित गोशाला, देशद्रोहियों ने अपना औ किया जाति का मुह कला ।। &lt;br /&gt;
सत्रह बार क्षमा कर रिपु को फंसा सिंह भोला भाला, अँधा कर केहरी को मधप फुला नहीं समाता था ।। &lt;br /&gt;
पर अंधी आँखों से भी, आखेट कर गयी गोशाला, अग्निपरीक्षा हुई धैर्य की हुआ पलायित मतवाला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पयपायी ने किन्तु धरम्हित अपना शीश कटा डाला टूट गए पर झुके नहीं जो, वे उन्नत शिर किनके थे ? &lt;br /&gt;
उनके - उनके, जिनको - जिनको, प्यारी थी वह गोशाला, किनने साथ देश का छोड़ा और कर लिया मुँह काला? वे जिनकी बाँहों मैं साकी औ होंठो पर थी हाला ।। &lt;br /&gt;
देश - जाती के गौरव हित जो लड़-मरे, पयपापी थे, पुत्रो के हृदय मैं प्रतिपल, रही मचलती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
कल ही तो चितौड़ दुर्ग से पड़ा असुर को था पाला, अभी कहाँ बुझ गयी है वह जौहर की जागृत ज्वाला ।। &lt;br /&gt;
विफल हो गया असुरो का छल दिव्य देवियाँ अमर हुई, हाथ मल रहे थे मद्यप औ दमक रही थी गोशाला ।। &lt;br /&gt;
गोरी औ गजनवी लुटेरा अल्लाह्धीन विषधर काला, बख्तियार, औरंगजेब रिपु - दारुण दुःख देने वाला ।। &lt;br /&gt;
हरे ! मुरारे ! गोशाला पर कितने संकट आये है, सह - सह कर सबको सहस से, खडी रही है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
दाहर, पृथ्वीराज, सरिदर्ष नर बप्पारावल से आला, राणा साँगा औ प्रताप से प्रकटे शुर लिए भाला ।। &lt;br /&gt;
छत्रसाल, गोबिंद, शिव से, वैरागी सम वीरों से, तिलक, सुभाष प्रभिर्ती पुत्रों से रही रक्षिता गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे गौरव इतिहासों के पृष्ठ - पृष्ठ पर गोशाला, मेरी प्रिय भारत माता के कण - कण मैं यह गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे तन रक्त मास मैं गोशाला ही छाई है, मिट जाऊंगा मैं उस दिन जब, नहीं रहेगी गोशाला ।। &lt;br /&gt;
हट जायेगा छंट जायेगा यह नराश्य तिमिर काला, नव - प्रभात लोटेगा भू पर, फिर स्वर्णिम स्वप्नों वाला ।। &lt;br /&gt;
स्वर्ग - लोक सा अनुभव होगा, फिर से अपना देश हमे, ग्राम - ग्राम घर - घर में जिस दिन, खुल जाएगी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:काव्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्य साहित्य]] [[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=302248</id>
		<title>गोशाला (काव्य)</title>
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		<updated>2012-11-15T12:40:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* रचना काल */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;===रचना काल===&lt;br /&gt;
[[आचार्य धर्मेन्द्र]] ने इसका प्रथम पथ अपने विवाह के उपलक्ष्य में, जहानाबाद ([[बिहार]]) स्थित उनके सव्सुराल्या के उधन में आयोजित काव्यगोष्ठी में 20 फरवरी 1960 की संध्या में किया था। श्रोताओ में उनकी नववधू परम श्रेध्य श्रीमती प्रतिभा देवी जी भी सम्मलित थी। सन 2008 की 23 जनवरी को डॉक्टर [[हरिवंश राय बच्चन]] की जन्मशती के उपलक्ष्य में संस्कृत संस्था 'परचन' ने आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज की &amp;quot;गोशाला&amp;quot; को स्वयं उनके कंठ से सुनने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया। प्रथम संस्करण 1960 में प्रकाशित हुआ था। &lt;br /&gt;
; पेश है गोशाला के कुछ अवतरण :&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;राम कृष्ण के इतिहासों का सार तत्त्व है गोशाला, स्मृतियों, वेदो, उपनिषदों में एक तत्त्व है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
धर्म स्वयं गो बनकर मानो बसता है गोशाला में, देश, धर्म एवं संस्कृत में की परिभाषा है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
किंचित अधिक सुरा पी ली तो लगा बहकने मतवाला, प्याले पर प्याले टी पीकर सूख गया पीने वाला ।। &lt;br /&gt;
पर जी भर कर गोपय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं, जितना अधिक पियो उतना ही सबल बनाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
विमुख हुए पितु-मत, बंधू सब विमुख हुए साली साला, विमुख हुआ जग, रुष्ट हुए प्रभु, खफा हुए अल्लाहताला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टूटे सब सम्बन्ध जगत से, मदिरा पीने वाले के, सहज स्नेह सम्बन्ध जोड़कर सुदृढ़ बनाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
प्रीतिभोज में चाहे कोई खूब पिला दे टी प्याला, चाहे कलश खाली कर, क्यों न पिला डाले हाला ।। &lt;br /&gt;
पर मिष्ठान अगर न हुए तो, सब कुछ व्यर्थ कहलायेगा, सहभोजों में सरस मिठाई हमें खिलाती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे आगे, मेरे पीछे, दायें - बाएं गोशाला, मेरे बाहर , मेरे भीतर जो कुछ है, बस गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मैं गायो का गाय मेरी, ऐसा हो सदभाव सदा, तो सुरपुर से भी सुखकर है, मुझको मेरी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म न मेरा हिन्दू-मुस्लिम एक धर्म है गोशाला, कर्म और कर्त्तव्य, कार्यकर्म. दिनचर्या सब गोशाला ।। &lt;br /&gt;
गोभक्त की जाति वर्ण है - गो,गोबिंद - उपासक का, एक शब्द में मेरा पूरा, परिचय, केवल - गोशाला ।। &lt;br /&gt;
हूण, यवन, शक, मलेछ मिट गये पीते पीते मधुहाला, आत्मसात कर गयी सभी को मदिरालय की विष-जवाला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु आज तक किसके बल पर जाति हमारी जीवित है ? हमको अब तक जिला रही है, बंधू, हमारी गोशाला, टिड्डी दल का क्रूर असुर दल भारत पर छाया काला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुआ दनुजता का तांडव भी हृदय हिला देने वाला, गिरे वज्र मंदिरों मठों पर गोभाक्तो पर गाज गिरी ।।&lt;br /&gt;
किन्तु न झुकी पताका एवं रही सुरक्षित गोशाला, देशद्रोहियों ने अपना औ किया जाति का मुह कला ।। &lt;br /&gt;
सत्रह बार क्षमा कर रिपु को फंसा सिंह भोला भाला, अँधा कर केहरी को मधप फुला नहीं समाता था ।। &lt;br /&gt;
पर अंधी आँखों से भी, आखेट कर गयी गोशाला, अग्निपरीक्षा हुई धैर्य की हुआ पलायित मतवाला ।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पयपायी ने किन्तु धरम्हित अपना शीश कटा डाला टूट गए पर झुके नहीं जो, वे उन्नत शिर किनके थे ? &lt;br /&gt;
उनके - उनके, जिनको - जिनको, प्यारी थी वह गोशाला, किनने साथ देश का छोड़ा और कर लिया मुँह काला? वे जिनकी बाँहों मैं साकी औ होंठो पर थी हाला ।। &lt;br /&gt;
देश - जाती के गौरव हित जो लड़-मरे, पयपापी थे, पुत्रो के हृदय मैं प्रतिपल, रही मचलती गोशाला ।। &lt;br /&gt;
कल ही तो चितौड़ दुर्ग से पड़ा असुर को था पाला, अभी कहाँ बुझ गयी है वह जौहर की जागृत ज्वाला ।। &lt;br /&gt;
विफल हो गया असुरो का छल दिव्य देवियाँ अमर हुई, हाथ मल रहे थे मद्यप औ दमक रही थी गोशाला ।। &lt;br /&gt;
गोरी औ गजनवी लुटेरा अल्लाह्धीन विषधर काला, बख्तियार, औरंगजेब रिपु - दारुण दुःख देने वाला ।। &lt;br /&gt;
हरे ! मुरारे ! गोशाला पर कितने संकट आये है, सह - सह कर सबको सहस से, खडी रही है गोशाला ।। &lt;br /&gt;
दाहर, पृथ्वीराज, सरिदर्ष नर बप्पारावल से आला, राणा साँगा औ प्रताप से प्रकटे शुर लिए भाला ।। &lt;br /&gt;
छत्रसाल, गोबिंद, शिव से, वैरागी सम वीरों से, तिलक, सुभाष प्रभिर्ती पुत्रों से रही रक्षिता गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे गौरव इतिहासों के पृष्ठ - पृष्ठ पर गोशाला, मेरी प्रिय भारत माता के कण - कण मैं यह गोशाला ।। &lt;br /&gt;
मेरे तन रक्त मास मैं गोशाला ही छाई है, मिट जाऊंगा मैं उस दिन जब, नहीं रहेगी गोशाला ।। &lt;br /&gt;
हट जायेगा छंट जायेगा यह नराश्य तिमिर काला, नव - प्रभात लोटेगा भू पर, फिर स्वर्णिम स्वप्नों वाला ।। &lt;br /&gt;
स्वर्ग - लोक सा अनुभव होगा, फिर से अपना देश हमे, ग्राम - ग्राम घर - घर में जिस दिन, खुल जाएगी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category:पद्य साहित्य]] [[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>धीरज ठाकरान</title>
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		<updated>2012-11-15T12:12:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''धीरज ठाकरान''' को [[भारत]] के प्रमुख पहलवानों में गिना जाता है। उन्होंने देश के लिए खेलते हुए कई उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। सन [[1995]] में धीरज पहलवान ने [[ऑस्ट्रेलिया]] में हुए [[कॉमनवेल्थ गेम्स]] में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया था। उनकी बहन प्रीतम ठाकरान भारतीय हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
धीरज ठाकरान का जन्म गुड़गाँव, हरियाणा के निकट झाड़सा गाँव में 1970 में हुआ था। इनके पिता का नाम भरत सिंह ठाकरान था। [[हरियाणा]] राज्य को यदि पहलवानों की भूमि कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर ज़िले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे ही एक गाँव झाड़सा में कई मशहूर पहलवान हुए हैं, जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और देश का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंद्र ठाकरान) ने भी भारत का नाम हर जगह रोशन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धीरज की सगी बहन श्रीमती [[प्रीतम सिवाच]] (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान) भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हैं। कुल मिलाकर ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये हैं।&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====&lt;br /&gt;
गाँव के हंसराम पहलवान और धीरज ठाकरान के पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने धीरज के कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं गुरु हनुमान के अखाड़े में छोड़ा। ये भी गुरु हनुमान के प्रिय शिष्यों में से एक थे। बाद में इन्होंने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की। ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कॉमनवेल्थ गेम्स==&lt;br /&gt;
सन [[1995]] में इन्होंने [[भारत]] में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 में कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 कि.ग्रा. भार में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इससे पहले वे सन [[1991]] में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीत चुके थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पहलवान}}&lt;br /&gt;
[[Category:पहलवान]][[Category:खेलकूद कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* शीर्षक उदाहरण 1 */&lt;/p&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीर्षक उदाहरण 1== अगर हरियाणा को   भूमि कहा जाये तो कोई  अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के हर  जिले में कोई नो कोई मशहूर पहलवान मिल जायेगा। ऐसे  एक गाँव झाड़सा में बहोत से मशहूर पहलवान हुए जिन्होंने हर स्तर पर अपने गाँव और  देश  का नाम रोशन किया। इनमे से एक पहलवान धीरज (वीरेंदर ठाकरान) ने भी भारत देश का नाम हर जगह रोशन किया है।  इनकी सगी बहन श्रीमती प्रीतम सिवाच (शादी से पहले प्रीतम ठाकरान के नाम से खेलती थी) भारतीय महिला होकी टीम की कप्तान और देश की प्रतिभावान खिलाडियों में एक रही हुयी है. कुल मिलाकर इस ठाकरान परिवार ने देश के लिए होनहार खिलाडी पैदा किये है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== धीरज पहलवान (विरेन्द्र ठाकरान) का जनम गुडगाँव के निकट झाड़सा गाँव में श्री भरत सिंह ठाकरान के घर सं १९७० में हुआ. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कुश्ती प्रेम====गाँव के हंसराम पहलवान और इनके पिता भरत सिंह में अच्छी दोस्ती थी। हंसराम ने उनके कुश्ती प्रेम को देखते हुए उनको स्वयं गुरु हनुमान के अखाड़े में छोड़ा। ये भी गुरु हनुमान के प्रिय शिष्यों में से एक थे. बाद में इन्होने भारतीय रेल में अपनी नोकरी की शुरुआत की. ये भारतीय रेल विभाग के उत्कृष्ठ पहलवानों में गिने जाते थे. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====कॉमनवेल्थ गेम्स===== सन १९९५ में भारत में आयोजित सैफ खेलो में स्वर्ण पदक जीता था. ऑस्ट्रेलिया में खेले गए 1995 कॉमनवेल्थ गेम्स में धीरज पहलवान ने 75 किलो भार में गोल्डजीतकर भारत का नाम रोशन किया। 1991 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में धीरज ब्रॉन्ज जीत चुके हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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		<title>धीरज ठाकरान</title>
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		<updated>2012-11-14T06:43:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: '&amp;lt;!-- सबसे पहले इस पन्ने को संजोएँ (सेव करें) जिससे आपको य...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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==शीर्षक उदाहरण 1==&lt;br /&gt;
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===शीर्षक उदाहरण 2===&lt;br /&gt;
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====शीर्षक उदाहरण 3====&lt;br /&gt;
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=====शीर्षक उदाहरण 4=====&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<title>गोशाला (काव्य)</title>
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		<updated>2012-11-12T12:02:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* शीर्षक उदाहरण 1 */&lt;/p&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीर्षक उदाहरण 1==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===रचना काल===आचार्य श्री ने इसका प्रथम पथ अपने विवाह के उपलक्ष्य में, जहानाबाद (बिहार) स्थित उनके सव्सुराल्या के उधन में आयोजित काव्यगोष्ठी में २० फरवरी १९६० की संध्या में किया था. श्रोताओ में उनकी नववधू परम श्रेध्य श्रीमती प्रतिभा देवी जी भी सम्मलित थी. सन २००८ की २३ जनवरी को डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती के उपलक्ष्य में संस्कृत संस्था 'परचन' ने आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज की &amp;quot;गोशाला&amp;quot; को स्वयं उनके कंठ से सुनने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया. प्रथम संस्करण सों १९६० में प्रकाशित हुआ था. पेश है गोशाला के कुछ अवतरण : राम कृष्ण के इतिहासों का सार तत्त्व है गोशाला, स्मृतियों, वेदो, उपनिषदों में एक तत्त्व है गोशाला ।। धर्म स्वयं गो बनकर मानो बसता है गोशाला में, देश, धर्म एवं संस्कृत में की परिभाषा है गोशाला ।। किंचित अधिक सुरा पी ली तो लगा बहकने मतवाला, प्याले पर प्याले टी पीकर सूख गया पीने वाला ।। पर जी भर कर गोपय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं, जितना अधिक पियो उतना ही सबल बनाती गोशाला ।। विमुख हुए पितु-मत, बंधू सब विमुख हुए साली साला, विमुख हुआ जग, रुष्ट हुए प्रभु, खफा हुए अल्लाहताला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टूटे सब सम्बन्ध जगत से, मदिरा पीने वाले के, सहज स्नेह सम्बन्ध जोड़कर सुदृढ़ बनाती गोशाला ।। प्रीतिभोज में चाहे कोई खूब पिला दे टी प्याला, चाहे कलश खाली कर, क्यों न पिला डाले हाला ।। पर मिष्ठान अगर न हुए तो, सब कुछ व्यर्थ कहलायेगा, सहभोजों में सरस मिठाई हमें खिलाती गोशाला ।। मेरे आगे, मेरे पीछे, दायें - बाएं गोशाला, मेरे बाहर , मेरे भीतर जो कुछ है, बस गोशाला ।। मैं गायो का गाय मेरी, ऐसा हो सदभाव सदा, तो सुरपुर से भी सुखकर है, मुझको मेरी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म न मेरा हिन्दू-मुस्लिम एक धर्म है गोशाला, कर्म और कर्त्तव्य, कार्यकर्म. दिनचर्या सब गोशाला ।। गोभक्त की जाति वर्ण है - गो,गोबिंद - उपासक का, एक शब्द में मेरा पूरा, परिचय, केवल - गोशाला ।। हूण, यवन, शक, मलेछ मिट गये पीते पीते मधुहाला, आत्मसात कर गयी सभी को मदिरालय की विष-जवाला ।। किन्तु आज तक किसके बल पर जाति हमारी जीवित है ? हमको अब तक जिला रही है, बंधू, हमारी गोशाला, टिड्डी दल का क्रूर असुर दल भारत पर छाया काला ।। हुआ दनुजता का तांडव भी हृदय हिला देने वाला, गिरे वज्र मंदिरों मठों पर गोभाक्तो पर गाज गिरी ।।&lt;br /&gt;
किन्तु न झुकी पताका एवं रही सुरक्षित गोशाला, देशद्रोहियों ने अपना औ किया जाति का मुह कला ।। सत्रह बार क्षमा कर रिपु को फंसा सिंह भोला भाला, अँधा कर केहरी को मधप फुला नहीं समाता था ।। पर अंधी आँखों से भी, आखेट कर गयी गोशाला, अग्निपरीक्षा हुई धैर्य की हुआ पलायित मतवाला ।। पयपायी ने किन्तु धरम्हित अपना शीश कटा डाला टूट गए पर झुके नहीं जो, वे उन्नत शिर किनके थे ? उनके - उनके, जिनको - जिनको, प्यारी थी वह गोशाला, किनने साथ देश का छोड़ा और कर लिया मुँह काला? वे जिनकी बाँहों मैं साकी औ होंठो पर थी हाला ।। देश - जाती के गौरव हित जो लड़-मरे, पयपापी थे, पुत्रो के हृदय मैं प्रतिपल, रही मचलती गोशाला ।। कल ही तो चितौड़ दुर्ग से पड़ा असुर को था पाला, अभी कहाँ बुझ गयी है वह जौहर की जागृत ज्वाला ।। विफल हो गया असुरो का छल दिव्य देवियाँ अमर हुई, हाथ मल रहे थे मद्यप औ दमक रही थी गोशाला ।। गोरी औ गजनवी लुटेरा अल्लाह्धीन विषधर काला, बख्तियार, औरंगजेब रिपु - दारुण दुःख देने वाला ।। हरे ! मुरारे ! गोशाला पर कितने संकट आये है, सह - सह कर सबको सहस से, खडी रही है गोशाला ।। दाहर, पृथ्वीराज, सरिदर्ष नर बप्पारावल से आला, राणा साँगा औ प्रताप से प्रकटे शुर लिए भाला ।। छत्रसाल, गोबिंद, शिव से, वैरागी सम वीरों से, तिलक, सुभाष प्रभिर्ती पुत्रों से रही रक्षिता गोशाला ।। मेरे गौरव इतिहासों के पृष्ठ - पृष्ठ पर गोशाला, मेरी प्रिय भारत माता के कण - कण मैं यह गोशाला ।। मेरे तन रक्त मास मैं गोशाला ही छाई है, मिट जाऊंगा मैं उस दिन जब, नहीं रहेगी गोशाला ।। हट जायेगा छंट जायेगा यह नराश्य तिमिर काला, नव - प्रभात लोटेगा भू पर, फिर स्वर्णिम स्वप्नों वाला ।। स्वर्ग - लोक सा अनुभव होगा, फिर से अपना देश हमे, ग्राम - ग्राम घर - घर में जिस दिन, खुल जाएगी गोशाला ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शीर्षक उदाहरण 3====&lt;br /&gt;
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=====शीर्षक उदाहरण 4=====&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>गोशाला (काव्य)</title>
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		<updated>2012-11-12T12:01:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: '&amp;lt;!-- सबसे पहले इस पन्ने को संजोएँ (सेव करें) जिससे आपको य...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>आचार्य धर्मेन्द्र</title>
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		<updated>2012-11-12T12:01:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जन्म */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आचार्य धर्मेन्द्र''' विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है। आचार्य महाराज का पूरा जीवन [[हिंदी]], हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित है। उन्होंने अपने पिता [[महात्मा रामचन्द्र वीर|महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज]] के समान उन्होंने भी अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
आठ वर्ष की आयु से आज तक आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ है। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अदबुध हैं। आचार्य धर्मेन्द्र जी अपनी पैनी भाषण कला और हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते है. वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता एवं हिन्दी कवि भी हैं। &lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
आचार्य श्री का जन्म माघकृषण सप्तमी को [[विक्रम संवत]] 1998 (इस्वी सन 9 जनवरी 1942) को [[गुजरात]] के मालवाडा में हुआ। जबकि मध्य रात्रि के बाद पाश्चात्य मान्यता के अनुसार 10वी तारीख प्रारंभ हो गयी थी। पर हिन्दू कुल श्रेष्ठ आचार्य श्री माघकृषण सप्तमी को ही अपना प्रमाणिक जन्मदिवस मानते है। पिता के आदर्शो और व्यक्तित्व का इनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि इन्होंने 13 साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। गांधीवाद का विरोध करते हुए इन्होंने 16 वर्ष की उम्र में &amp;quot;भारत के दो महात्मा&amp;quot; नामक लेख निकाला। इन्होंने सन 1959 में [[हरिवंश राय बच्चन]] की &amp;quot;मधुशाला&amp;quot; के जवाब में &amp;quot;[[गोशाला (काव्य)]]&amp;quot; नामक पुस्तक लिखी। &lt;br /&gt;
===वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा=== &lt;br /&gt;
[[जयपुर]] राज्य के पूर्वोत्तर में ऐतिहासिक तीर्थ [[विराट नगर]] के पार्श्व में पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड नामक छोटे से ग्राम में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण संत, लश्करी संप्रदाय के अनुयायी थे। गृहस्थ होते हुए भी अपने सम्प्रदाय के साधू और जनता द्वारा उन्हें साधू संतो के सामान आदर और सम्मान प्राप्त था। भगवान नरसिंह देव के उपासक इन महात्मा का नाम स्वामी गोपालदास था। गौतम गौड़ ब्राह्मणों के इस परिवार को 'स्वामी' का सम्मानीय संबोधन जो [[भारत]] में संतो और साधुओं को ही प्राप्त है, लश्करी संप्रदाय के द्वारा ही प्राप्त हुआ था, क्योंकि कठोर सांप्रदायिक अनुशासन के उस युग में चाहे जो उपाधि धारण कर लेना सरल नहीं था। मुग़ल बादशाह [[औरंगजेब]] द्वारा हिन्दुओं पर लगाये गए शमशान कर के विरोध में अपना बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे।  [[जजिया कर]] की अपमान जनक वसूली और विधर्मी सैनिकों के अत्याचारों से क्षुब्ध स्वामी गोपालदास धरम के लिए प्राणोत्सर्ग के संकल्प से प्रेरित होकर [[दिल्ली]] जा पहुंचे। उन तेजस्वी संत ने मुग़ल बादशाह के दरबार में किसी प्रकार से प्रवेश पा लिया और आततायी औरंगजेब को हिन्दुओं पर अत्याचार न करने की चेतावनी देते हुए, म्लेछो द्वारा शरीर का स्पर्श करके बंदी बनाये जाने से पूर्व ही, कृपाण से अपना पेट चीर कर देखते - देखते दरबार में ही प्राण विसर्जित कर दिए।{{?}} [[चित्र: Acharya Shri 12.jpg|thumb|आचार्य धर्मेन्द्र श्री राम कथा करते हुए ]]&lt;br /&gt;
=====गोरक्षा आन्दोलन में अनुपम योगदान=====&lt;br /&gt;
1966 में देश के सभी गोभक्त समुदायों, साधू -संतो और संस्थाओं ने मिलकर विराट सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। महात्मा रामचन्द्र वीर ने 1966 तक अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए।  जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन अनशन किया। आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेत्रत्व श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं। &lt;br /&gt;
=====श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन ===== &lt;br /&gt;
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, १९८३ में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में [[अयोध्या]], [[मथुरा]] और [[काशी]] के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री [[गुलज़ारीलाल नंदा]] भी मंच पर उपस्थित थे। पहली धर्म संसद - अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया। राम जानकी रथ यात्रा - [[विश्व हिन्दू परिषद]] ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु [[सीतामढ़ी]] से [[दिल्ली]] तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:व्यक्ति परिचय]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%9F%E0%A4%B2_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%AF%E0%A5%80&amp;diff=302038</id>
		<title>अटल बिहारी वाजपेयी</title>
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		<updated>2012-11-12T06:01:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* विद्यार्थी जीवन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अटल बिहारी वाजपेयी विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Atal-Bihari-Vajpayee.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=अटल बिहारी वाजपेयी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[25 दिसंबर]], [[1924]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=लश्कर, [[ग्वालियर]], [[मध्य प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|अविभावक=पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी, कृष्णा देवी&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=अविवाहित&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|स्मारक= &lt;br /&gt;
|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[भारतीय जनता पार्टी]], [[भारतीय जनसंघ]]&lt;br /&gt;
|पद=[[प्रधानमंत्री]], विदेश मंत्री&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल='''प्रधानमंत्री'''-16 मई 1996 – 1 जून 1996 और 19 मार्च 1998 – 19 मई 2004&lt;br /&gt;
'''विदेश मंत्री-''' 26 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गोरखी विद्यालय, विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल, रानी लक्ष्मीबाई कॉलेज, डी. ए. वी. महाविद्यालय&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातकोत्तर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[पद्म विभूषण]]&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=धर्म&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिन्दू]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2= &lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:48, 26 सितम्बर 2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''अटल बिहारी वाजपेयी''' (जन्म- [[25 दिसंबर]], [[1924]]) का नाम भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय [[प्रधानमंत्री|प्रधानमंत्रियों]] में लिया जाता है। [[नरसिम्हा राव]] के बाद [[1996]] में अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 13 दिन के लिए ही प्रधानमंत्री बने। इसके बाद [[1998]] में हुए चुनावों के माध्यम से वह दोबारा प्रधानमंत्री बने। इस कारण [[1996]] और [[1998]] के मध्य बने दो प्रधानमंत्रियों-[[एच. डी. देवगौड़ा]] तथा [[इन्द्र कुमार गुजराल]] को आगे स्थान दिया गया है। तत्पश्चात् अटल बिहारी वाजपेयी [[अक्टूबर]], [[1999]] में पुन: प्रधानमंत्री बने और यह कार्यकाल उन्होंने अत्यन्त सफलतापूर्वक पूर्ण किया। इसके पूर्व वह [[अप्रैल]] 1999 से अक्टूबर 1999 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहे।  &lt;br /&gt;
==जन्म एवं परिवार==&lt;br /&gt;
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म [[25 दिसम्बर]] (बड़ा दिन) [[1924]] को लश्कर, [[ग्वालियर]] में हुआ था, जो कि [[मध्य प्रदेश]] में है। 'शिंके का बाड़ा मुहल्ले' में जन्म लेने वाला यह बालक कितना बड़ा भाग्य लेकर पैदा हुआ। इनके [[पिता]] 'पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी' अध्यापन का कार्य करते थे और [[माता]] 'कृष्णा देवी' घरेलू महिला थीं। श्री वाजपेयी संतान क्रम में सातवें थे। इनसे बड़े तीन भाई और तीन बहनें थीं। वह बचपन से ही अंतर्मुखी स्वभाव के थे, साथ ही काफ़ी प्रतिभा सम्पन्न भी थे। अटल बिहारी वाजपेयी के बड़े भाइयों को 'अवध बिहारी वाजपेयी', 'सदा बिहारी वाजपेयी' तथा 'प्रेम बिहारी वाजपेयी' के नाम से जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====विद्यार्थी जीवन====&lt;br /&gt;
अटल बिहारी वाजपेयी के पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षण व्यवसाय से सम्बन्धित थे, इस कारण इन्हें कई स्थानों पर रहना पड़ता था। लेकिन अटलजी की आरम्भिक शिक्षा [[बड़नगर]] के 'गोरखी विद्यालय' में सम्पन्न हुई। बड़नगर में इनके पिता प्रधानाध्यापक के पद पर थे। इस विद्यालय में अटलजी ने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। वक्ता के रूप में इन्हें इसी विद्यालय से पहचान प्राप्त हुई थी। जब वह कक्षा पाँच में थे तब पाठ्येतर गतिविधियों के अंतर्गत उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था। लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण अटल जी को ग्वालियर जाना पड़ा। इनका नामांकन 'विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल' में हुआ। नौवीं कक्षा से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई अटल जी ने इसी विद्यालय से पूर्ण की। इस विद्यालय में रहते हुए उनकी वाद-विवाद सम्बन्धी प्रतिभा को उचित प्रवाह प्राप्त हुआ। वह वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में प्रथम भी आए। [[महात्मा रामचन्द्र वीर]] द्वारा रचित अमर कृति &amp;quot;विजय पताका&amp;quot; पढकर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंटरमीडिएट करने के बाद अटल जी ने 'विक्टोरिया कॉलेज'&amp;lt;ref&amp;gt; जो कि बाद में रानी लक्ष्मीबाई कॉलेज के नाम से जाना गया&amp;lt;/ref&amp;gt; में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रवेश लिया। स्नातक स्तर की शिक्षा हेतु उन्होंने तीनों विषय [[भाषा]] पर आधारित लिए जो [[संस्कृत]], [[हिन्दी]] एवं [[अंग्रेज़ी]] थे। अटल जी की साहित्यिक प्रकृति थी, जिससे वह तीनों भाषाओं के प्रति आकृष्ट हुए। कॉलेज जीवन में ही इन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना आरम्भ कर दिया था। शुरू में वह 'छात्र संगठन' से जुड़े। नारायण राव तरटे ने इन्हें काफ़ी प्रभावित किया, जो [[राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ]] के प्रमुख कार्यकर्ता थे। ग्वालियर में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में अपने दायित्वों की पूर्ति की। कॉलेज जीवन में उन्होंने कविताओं की रचना करना आरम्भ कर दिया था। इनकी साहित्यिक अभिरुचि उसी समय काफ़ी परवान चढ़ी। इनके कॉलेज में अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों का भी आयोजन होता था। इस कारण से कविता की गहराई समझने में इन्हें काफ़ी मदद मिली। [[1943]] में वाजपेयी जी कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और [[1944]] में उपाध्यक्ष भी बने। ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अटलजी [[कानपुर]] आ गए ताकि राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर सकें। वहाँ उन्होंने एम. ए. तथा एल. एल. बी. में एक साथ प्रवेश लिया। चूंकि स्नातक परीक्षा इन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी, इस कारण इन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हो रही थी। कानपुर के डी. ए. वी. महाविद्यालय से इन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
शिक्षक पिता की संतान होने के कारण अटल जी शिक्षा का महत्त्व अच्छी तरह से जानते थे। इस कारण पी. एच. डी. करने के लिए वह [[लखनऊ]] चले गए और वक़ालत की पढ़ाई स्थगित कर दी। पढ़ाई के साथ-साथ वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यों का भी सम्पादन करने लगे। लेकिन अटलजी पी. एच. डी. करने में सफलता प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि [[पत्रकारिता]] से जुड़ने के कारण इन्हें अध्ययन के लिए समय नहीं मिल रहा था। उन दिनों 'राष्ट्रधर्म' नामक समाचार पत्र [[पंडित दीनदयाल उपाध्याय]] के सम्पादन में लखनऊ से मुद्रित हो रहा था। तब श्री अटल बिहारी वाजपेयी इसके सह सम्पादक के रूप में नियुक्त किए गए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस [[समाचार पत्र]] का सम्पादकीय स्वयं लिखते थे और अख़बार का बाक़ी कार्य अटल जी एवं इनके सहायक करते थे। लेकिन सही मायने में अटल जी ही इसके सम्पादक थे। अटल जी के आने के बाद 'राष्ट्रधर्म' समाचार पत्र का प्रसार काफ़ी बढ़ गया। ऐसे में इसके लिए स्वयं की प्रेस का प्रबन्ध किया गया। इस प्रेस का नाम '''भारत प्रेस''' रखा गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ समय के बाद 'भारत प्रेस' से मुद्रित होने वाला दूसरा समाचार पत्र 'पाँचजन्य' भी प्रकाशित होने लगा। इस समाचार पत्र का सम्पादन पूर्ण रूप से अटलजी करते थे। देश आज़ाद हो गया था। कुछ समय के बाद [[30 जनवरी]] [[1948]] को [[महात्मा गांधी]] की हत्या हुई। [[नाथूराम गोडसे]] का सम्बन्ध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से होने के कारण भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को प्रतिबन्धित कर दिया। चूंकि 'भारत प्रेस' भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभाव क्षेत्र में थी, इसीलिए भारत प्रेस को बन्द कर दिया गया। लेकिन अटल जी को अब पत्रकारिता में अत्यन्त आनन्द आने लगा था। इस कारण वह [[इलाहाबाद]] चले गए और उन्होंने 'क्राइसिस टाइम्स' नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक के लिए अपनी सेवाएँ देना आरम्भ कर दिया। परन्तु 'क्राइसिस टाइम्स' का साथ 'क्राइसिस' रहने तक ही था। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर लगा प्रतिबंध हटा तो वह 'क्राइसिस टाइम्स' भी गुज़र गया। अटल जी पुन: लखनऊ लौटे और उनके सम्पादन में 'स्वदेश' नामक दैनिक पत्र निकलना आरम्भ हो गया। थोड़े ही दिनों में जहाँ 'स्वदेश' लोकप्रिय हुआ, वहीं अटल जी के सम्पादकीय भी काफ़ी सराहे गए और चर्चा का केन्द्र बने। लेकिन लगातार होने वाली हानि के कारण 'स्वदेश' को बंद कर देना पड़ा। तब अटल जी [[दिल्ली]] से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'वीर अर्जुन' का सम्पादन करने लगे। यह दैनिक एवं साप्ताहिक दोनों आधार पर प्रकाशित हो रहा था। 'वीर अर्जुन' का सम्पादन करने हुए एक पत्रकार के रूप में इन्हें काफ़ी प्रतिष्ठा और सम्मान मिला। अत: राजनेता से पूर्व अटल जी को एक कवि और पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई थी।&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ' (आर. एस. एस.) हिन्दुत्ववादी विचारधारा की प्रमुख संस्था है लेकिन भारत सरकार की नज़र में वह अलागववादी विचारधारा का पोषण कर रही थी। इस कारण आर. एस. एस. पर कई प्रकार के राजनयिक प्रतिबन्ध लगा दिए गए। ऐसे में आर. एस. एस. ने [[भारतीय जनसंघ]] का गठन किया जो राजनीतिक विचारधारा वाला दल था। भारतीय जनसंघ का जन्म संघ परिवार की राजनीतिक संस्था के रूप में हुआ, जिसके अध्यक्ष [[श्यामा प्रसाद मुखर्जी|डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी]] थे। अटल जी उस समय से ही इस संस्था के संगठनात्मक ढाँचे से जुड़ गए। तब वह अध्यक्ष के निजी सचिव के रूप में दल का कार्य देख रहे थे। इस कारण उन्हें जनसंघ के सबसे पुराने व्यक्तियों में एक माना जाता है। भारतीय जनसंघ ने सर्वप्रथम [[1952]] के आम चुनावों में भाग लिया। तब उसका चुनाव चिह्न 'दीपक' था। चुनावों में भारतीय जनसंघ को कोई विशेष क़ामयाबी प्राप्त नहीं हुई, फिर भी डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय हित में कार्य करते रहे। उस समय भी [[कश्मीर]] का मामला अत्यन्त संवेदनशील था। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अटल जी के साथ [[जम्मू-कश्मीर]] के लोगों को जागरूक करने का कार्य किया। वह [[कश्मीर]] के हिन्दुओं को अपने अधिकारों के लिए जाग्रत कर रहे थे। लेकिन सरकार ने इसे साम्प्रदायिक गतिविधि मानते हुए डॉक्टर मुखर्जी को गिरफ्तार करके जेल में ठूँस दिया। डॉक्टर मुखर्जी की [[23 जून]] [[1953]] को जेल में ही मृत्यु हो गई। तब जनसंघ के समर्थकों ने उनकी मृत्यु को एक गहरी साज़िश मानते हुए इसे हत्या क़रार दिया। &lt;br /&gt;
====दूसरा आम चुनाव====&lt;br /&gt;
अब भारतीय जनसंघ का काम अटल जी प्रमुख रूप से देखने लगे। इन पर राजनीतिक रंग पूरी तरह से हावी हो चुका था। तभी दूसरा आम चुनाव आ गया। [[1957]] के इन चुनावों में भारतीय जनसंघ को चार स्थानों पर विजय प्राप्त हुई। अटल जी पहली बार [[बलरामपुर]] सीट से विजयी होकर [[लोकसभा]] में पहुँचे। 1957 में लोकसभा चुनाव हेतु अटल जी ने तीन स्थानों से नामांकन पत्र दाख़िल किया था। बलरामपुर के अलावा उन्होंने लखनऊ और [[मथुरा]] से भी पर्चे भरे थे। बलरामपुर एक रियासत थी। जिसका आज़ादी के बाद [[उत्तर प्रदेश]] राज्य में विलय कर दिया गया था। वहाँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अच्छा दबदबा था। 'प्रताप नारायण तिवारी' ने यहाँ जनसंघ के लिए दृढ़ आधार तैयार किया था। चूंकि बलरामपुर कभी रियासत थी, इस कारण रजवाड़ों का भी यहाँ दबदबा था। रजवाड़े [[कांग्रेस]] से नाराज़ थे, क्योंकि आज़ादी के बाद वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखना चाहते थे। यही कारण है कि बलरामपुर की सीट कांग्रेस के बजाए जनसंघ की झोली में चली गई और अटल जी प्रथम बार लोकसभा में पहुँचे। वह इस चुनाव में 10 हज़ार मतों से विजय हुए थे। लेकिन अटल जी बाक़ी दो स्थानों पर हार गए। मथुरा में वह अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाए और लखनऊ में साढ़े बारह हज़ार मतों से पराजय स्वीकार करनी पड़ी। दोनों स्थानों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की विजय हुई थी। उस समय किसी भी पार्टी के लिए यह आवश्यक था कि वह कम से कम तीन प्रतिशत वोट प्राप्त करे अन्यथा उस पार्टी की मान्यता समाप्त की जा सकती थी। भारतीय जनसंघ को 6 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। इन चुनावों में 'हिन्दू महासभा' और 'रामराज्य परिषद्' जैसी पार्टियों की मान्यता समाप्त हो गई, क्योंकि उन्हें तीन प्रतिशत वोट नहीं मिले थे। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Atal-Bihari-Vajpayee-2.jpg|thumb|200px|अटल बिहारी वाजपेयी और अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर]]&lt;br /&gt;
====कश्मीर मुद्दे पर विचार==== &lt;br /&gt;
अटलजी ने [[संसद]] में पहुँचने के पश्चात् कश्मीर मुद्दे पर अपने विचार प्रकट किए और संसद ने उन्हें बेहद ध्यान से सुना। अटल जी ने कहा कि 'कश्मीर का मामला 'संयुक्त राष्ट्र संघ' में नहीं भेजा जाना चाहिए था, क्योंकि वहाँ से कोई समाधान नहीं प्राप्त होगा। भारत को अपने स्तर पर ही प्रयास करके [[पाकिस्तान]] के अधिकार वाले कश्मीर के विषय में सोचना होगा।' अटल जी का यह अनुमान आज भी सत्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर समस्या का समाधान आज तक नहीं खोजा है। अटल जी का तर्क था कि कश्मीर में पाकिस्तान हमलावर था, अत: राष्ट्र संघ को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी। कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजना एक ऐतिहासिक भूल थी। भारत को चाहिए था कि वह हमलावर को अपनी ज़मीन से हटा देता और इसके लिए आवश्यक सैनिक कार्रवाई करता। &lt;br /&gt;
====1962 के आम चुनाव====&lt;br /&gt;
अटलजी ने संसद में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। फिर [[1962]] के आम चुनाव आ गए। वह पुन: बलरामपुर की सीट से भारतीय जनसंघ के टिकट पर खड़े हुए लेकिन उन्हें इस बार पराजय का मुँह देखना पड़ा। कांग्रेसी उम्मीदवार को 1052 वोटों से विजय प्राप्त हुई। यह आश्चर्य की बात थी कि अटल जी को संसद में प्रशंसनीय कार्य करने के बाद भी जीत नसीब नहीं हुई। वैसे यह चुनाव इस कारण भी विवादास्पद रहा कि कांग्रेस प्रत्याशी ने उचित-अनुचित सभी प्रकार के पैंतरे अपनाए थे। इस चुनाव के दौरान साम्प्रदायिक सौहार्द्र भी बिगड़ा। इस कारण भयवश हज़ारों हिन्दू नारियों ने अपने मताधिकारों का प्रयोग नहीं किया। फिर भी 1962 के चुनाव में जनसंघ ने प्रगति की और संसद में उसके 14 प्रतिनिधि पहुँचने में सफल रहे। इस संख्या के आधार पर [[राज्यसभा]] के लिए जनसंघ को दो सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त हुआ। ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी और [[पंडित दीनदयाल उपाध्याय]] राज्यसभा में भेजे गए। चूंकि [[राष्ट्रपति]] ही राज्यसभा का पदेन सभापति होता है, इस कारण [[सर्वपल्ली राधाकृष्णन]] सभापति थे। उन्होंने अटल जी को राज्यसभा की प्रथम दीर्घा में बैठने को अनुप्रेरित किया। अटल जी ने राज्यसभा में भी अपने दायित्वों का निर्वहन योग्यता के साथ किया। इस कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] और प्रधानमंत्री [[पंडित जवाहरलाल नेहरू]] की मृत्यु हुई। अटलजी ने अनूठी भाषा-शैली में उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की। दोनों श्रद्धांजलियों को राज्यसभा के पटल पर सुरक्षित रखा गया। &lt;br /&gt;
====चौथे आम चुनाव====&lt;br /&gt;
चौथे आम चुनाव [[1967]] में सम्पन्न हुए। अटलजी पुन: बलरामपुर की सीट से प्रत्याशी बने। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को लगभग 32 हज़ार वोटों से हराया। अपने इस कार्यकाल में अटल जी ने यह साबित कर दिया कि वह धर्मनिरपेक्षता के पूर्ण समर्थक हैं तथा धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण नहीं चाहते। काहिरा में आयोजित हुए इस्लामी सम्मेलन के बारे में उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मज़हबी कट्टरता का पोषण नहीं होना चाहिए। ऐसे सम्मेलन विश्व बंधुत्व के आधार पर होने चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी ने मज़हबी आधार पर गुट बनाने की प्रवृत्ति को ख़तरनाक बताया और भारत सरकार को भी इस बारे में आगाह किया। धारा 370 के अंतर्गत कश्मीर को जो विशिष्ट दर्जा प्रदान किया गया था, उन्होंने उसका भी विरोध किया और धारा 370 समाप्त करने की मांग की। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत सरकार से यह मांग की कि कश्मीर में रोज़गार के साधन उपलब्ध कराए जाएँ और शिक्षा के स्तर में वृद्धि हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार विदेशी राजनीति भी अटल जी का पसंदीदा विषय थी। जब [[अमेरिका]] ने वियतनाम पर हमला किया तो उन्होंने बड़े कड़े शब्दों में निंदा की। वियतनाम को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की ख़ामोशी को भी अटल जी ने अपना निशाना बनाया। उन्होंने इस युद्ध का परिणाम भी घोषित कर दिया था। अटल जी ने कहा था कि वियतनाम की जनता अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ रही है और [[अमेरिका]] उसे युद्ध में तबाह करके अपना उपनिवेश बनाना चाहता है। अंतत: अमेरिकी फ़ौजों को वहाँ से जाना ही होगा। इस मुद्दे पर उन्होंने सटीक भविष्यवाणी की थी। उस युद्ध में वाकई अमेरिका को पराजय का सामना करना पड़ा और वियतनाम युद्ध आज भी अमेरिका के लिए एक दाग़ की भाँति है। यही नहीं, अमेरिका की जनता ने भी बाद में वियतमान युद्ध का कड़ा विरोध करना आरम्भ कर दिया था। &lt;br /&gt;
====काव्य की रचना====&lt;br /&gt;
अटल जी पाँचवी लोकसभा में भी पहुँचने में क़ामयाब रहे। सन् [[1972]] का लोकसभा चुनाव उन्होंने गृहनगर यानी ग्वालियर से लड़ा था। बलरामपुर संसदीय चुनाव का उन्होंने परित्याग कर दिया था। इस समय श्रीमती [[इंदिरा गांधी]] देश की प्रधानमंत्री थीं। लेकिन [[जून]], [[1975]] में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर विपक्ष के कई नेताओं को जेल में डाल दिया। उनमें अटल जी भी शामिल थे। उन्होंने जेल में रहते हुए समयानुकूल काव्य की रचना की और आपातकाल के यथार्थ को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया। जेल में रहते हुए ही अटल जी का स्वास्थ्य ख़राब हो गया और उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। लगभग 18 माह के बाद आपातकाल समाप्त हुआ और छठवीं लोकसभा के गठन हेतु चुनाव घोषित हुए। जब विपक्ष के नेता जेल में बंद थे, तब भी उनमें वैचारिक मंथन हुआ। &lt;br /&gt;
====विदेश मंत्री====&lt;br /&gt;
आपातकाल के कारण विपक्ष संगठित होने में सफल रहा। फिर लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुए, लेकिन इंदिरा गांधी चुनाव नहीं जीत सकीं। संगठित विपक्ष द्वारा [[मोरारजी देसाई]] के प्रधानमंत्रित्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और अटल जी विदेश मंत्री बनाए गए। उन्हें विदेशी मामलों का विशेषज्ञ भी माना जाता था। उन्होंने कई देशों की यात्राएँ कीं और [[भारत]] का पक्ष रखा। अटल जी की विदेश यात्राओं के कारण मोरारजी देसाई ने इन्हें टोका था कि कभी-कभी देश में भी रहा करो। अटल जी ने [[पाकिस्तान]] की भी यात्रा की। उन्होंने तत्कालीन फ़ौजी शासक जिया-उल-हक़ से वार्तालाप के दौरान 'फ़रक्का-गंगाजल' बंटवारे का मसौदा तय किया। इसके अतिरिक्त भारत और पाकिस्तान के मध्य रेल सेवा की बहाली भी तय की गई। अटल जी [[बांग्लादेश|बंग्लादेश]] के साथ भी [[गंगाजल]] के वितरण पर समझौते की दिशा में बढ़े। उन्होंने विदेश मंत्री के तौर पर भारतीय अणु शक्ति के सम्बन्ध में नीति स्पष्ट की और अणु ऊर्जा को भारतीय आवश्यकताओं के लिए ज़रूरी बताया। अटल जी ने [[नेपाल]] के विदेश मंत्री के साथ व्यापार और पारगमन की नई नीति के सम्बन्ध में भी चर्चा की। [[4 अक्टूबर]], [[1977]] को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में [[हिन्दी]] में सम्बोधन दिया। इसके पूर्व किसी भी भारतीय नागरिक ने राष्ट्रभाषा का प्रयोग इस मंच पर नहीं किया था। &lt;br /&gt;
====राज्यसभा के लिए चुने गए====&lt;br /&gt;
जनता पार्टी सरकार का पतन होने के पश्चात् [[1980]] में नए चुनाव हुए और इंदिरा गांधी पुन: सत्ता में आ गईं। इसके बाद [[1996]] तक अटल जी विपक्ष में रहे। 1980 में [[भारतीय जनसंघ]] के नए स्वरूप में [[भारतीय जनता पार्टी]] का गठन हुआ और इसका चुनाव चिह्न 'कमल का फूल' रखा गया। उस समय अटल जी ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् [[1984]] में आठवीं लोकसभा के चुनाव हुए। सहानुभूति की लहर कांग्रेस के साथ थी। यही कारण है कि विपक्ष के अनेक दिग्गजों को पराजय का मुँह देखना पड़ा। अटल जी भी ग्वालियर की अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। लेकिन [[1986]] में इन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया। फिर समय ने पलटा खाया और [[विश्वनाथ प्रताप सिंह]] के कारण कांग्रेस को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। &lt;br /&gt;
====लोकसभा भंग====&lt;br /&gt;
ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा को बाहर से ही समर्थन प्रदान किया। लेकिन [[13 मार्च]], [[1991]] को लोकसभा भंग हो गई और 1991 में नए चुनाव सम्पन्न हुए। सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया को दो चरणों में होना था। चुनाव के प्रथम चरण के बाद [[तमिलनाडु]] में [[राजीव गांधी]] की हत्या होने और द्वितीय चरण के मतदान में कांग्रेस को सहानुभूति का लाभ मिलने से [[पी. वी. नरसिम्हा राव]] कांग्रेस के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इनका प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल पूर्ण होने के बाद 1996 में पुन: लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए। &lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री पद==&lt;br /&gt;
1996 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। संसदीय दल के नेता के रूप में अटलजी प्रधानमंत्री बने। उन्होंने [[21 मई]], 1996 को प्रधानमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। [[31 मई]], [[1996]] को इन्हें अन्तिम रूप से बहुमत सिद्ध करना था, लेकिन विपक्ष संगठित नहीं था। इस कारण अटल जी मात्र 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने अपनी अल्पमत सरकार का त्यागपत्र [[राष्ट्रपति]] [[डॉ. शंकरदयाल शर्मा]] को सौंप दिया। &lt;br /&gt;
====कार्यवाहक प्रधानमंत्री====&lt;br /&gt;
कारगिल में युद्ध की जो स्थितियाँ बनीं, वह निश्चय ही घोर लापरवाही का कारण थीं, लेकिन सच्चाई सामने नहीं आ सकी। अगले चुनावों में एन. डी. ए. की सरकार बनी। उसने उन आरोपों की निष्पक्ष जाँच कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और सभी सवाल समय की गर्त में दफ़न हो गए। अटल जी की सरकार दूसरी बार एक मत की कमी से बहुमत के जादुई आँकड़े तक नहीं पहुँच पाई और उसका पतन हो गया। सरकार गिराने के लिए विपक्ष ने राजनीति में प्रचलित वैध-अवैध सभी पैंतरे आजमाए, लेकिन कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। अत: अप्रैल, 1999 से अक्टूबर, 1999 तक अटल जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। &lt;br /&gt;
====तीसरी बार प्रधानमंत्री==== &lt;br /&gt;
चुनाव के पश्चात एन. डी. ए. को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और 13 अक्टूबर, 1999 को राष्ट्रपति श्री [[के. आर. नारायणन]] ने अटल जी को [[प्रधानमंत्री]] के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस प्रकार अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। वह पहले के दो कार्यकाल पूर्ण नहीं कर पाए थे। भाजपा हिन्दुत्ववादी पार्टी है, लेकिन वह धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त भी स्वीकार करती है। भाजपा में अनेक मुस्लिम लोग भी सम्मिलित हैं। लेकिन भाजपा का विश्वास रहा है कि हिन्दुओं को अपनी पार्टी से जोड़कर रखना है। इस कारण वह उन संवेदनशील मुद्दों को हवा सदैव देती रही जो हिन्दुओं से सम्बन्धित थे। इसमें [[अयोध्या]] स्थित 'रामजन्म भूमि' पर मन्दिर बनाए जाने का भी मुद्दा था। यद्यपि अटल जी उस सीमा तक भाजपा के साथ माने जाते हैं, जहाँ तक हिन्दू राष्ट्र का सवाल आता है, लेकिन वह जन भावनाएँ भड़काने की नीति के समर्थक कभी भी नहीं रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अटलजी प्रधानमंत्री के रूप में यक़ीनन बेहद योग्य व्यक्ति रहे हैं और नेहरूजी ने अपने जीवनकाल में ही यह घोषणा कर दी थी तथापि [[आडवाणी लाल कृष्ण|आडवाणी जी]] को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अटल जी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। आडवाणी जी के इस अथक श्रम को निश्चय ही याद किया जाएगा कि उन्होंने अटल जी के लिए समर्थन जुटाया। भाजपा की हिन्दुत्ववादी नीति से वोट बटोरने का कार्य भी उन्होंने किया था। राजनीति में स्थायी मित्रता और शत्रुता का कोई भी स्थान नहीं होता। प्रधानमंत्री बनने के बाद अटलजी के सामने सम्पूर्ण देश और उसकी समस्याएँ थीं। वह भाजपा तक सीमित नहीं रह सकते थे। वह संवैधानिक मर्यादा से बंधे हुए थे। यों भी अटलजी नैतिक व्यक्ति रहे हैं। इसके अलावा एन. डी. ए. के प्रति भी उनका उत्तरदायित्व था। आडवाणी जी चाहते थे कि राम मन्दिर का मसला सुलझा लिया जाए। लेकिन अटल जी जानते थे कि एन. डी. ए. में शामिल अन्य दल इसके लिए तैयार नहीं होंगे। वह विवादास्पद प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते थे। वह दूरगामी परिणामों का आकलन कर रहे थे। यही कारण है कि आडवाणी जी के साथ उनके वैचारिक मतभेद हो गए।&lt;br /&gt;
====ठोस कार्य====&lt;br /&gt;
अटल जी की एन. डी. ए. सरकार ने पाँच वर्ष का कार्यकाल अवश्य पूर्ण किया, लेकिन इसके लिए अटल जी को काफ़ी पापड़ बेलने पड़े। एन. डी. ए. संयोजक [[जॉर्ज फ़र्नाडीज़]] ने भी इसमें सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया था। एन. डी. ए. के सभी घटकों का पाँच [[वर्ष]] तक एक साथ रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। अटल जी के तृतीय प्रधानमंत्रित्व काल की विशेषताओं को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है-&lt;br /&gt;
*श्री नरसिम्हा राव में आर्थिक सुधारों की जो नीति आरम्भ की थी, उसे अटल जी ने जारी रखा। उन्हें इस नीति के सकारात्मक तथ्यों का ज्ञान था। वह उसे इस कारण ख़ारिज नहीं करना चाहते थे कि वह कांग्रेस की आर्थिक नीति थी। ऐसी नीति से अर्थव्यवस्था के सुधार का लाभ इनकी सरकार को भी प्राप्त हुआ और सर्वहारा वर्ग भी आर्थिक रूप से सम्पन्न हुआ।&lt;br /&gt;
*श्री अटल जी ने संतुलित विदेश नीति का पालन करते हुए अपनी परमाणु नीति को स्पष्ट किया। अमेरिका और उसके मित्र देशों ने पोखरण परमाणु विस्फोट पर आँखें अवश्य तरेरीं लेकिन अटलजी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अगला परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। वह परमाणु बम का उपयोग तभी करेगा जब उसके विरुद्ध ऐसा किया जाएगा। भारतीय परमाणु कार्यक्रम [[चीन]] तथा पाकिस्तान के विरोधी रवैये को देखते हुए बनाया गया और सारी दुनिया भी भारत के इस भय को समझती थी। &lt;br /&gt;
*आर्थिक विकास के लिए अटलजी ने 'स्वर्णिम चतुर्भुज' योजना का आरम्भ किया। इसके अंतर्गत वह देश के महत्त्वपूर्ण शहरों को लम्बी-चौड़ी सड़कों के माध्यम से जोड़ना चाहते थे। इसका अधिकांश कार्य अटलजी के कार्यकाल में पूर्ण हुआ। इससे जहाँ आम व्यक्ति की यात्रा सुविधाजनक हुई, वहीं व्यापारिक और क़ारोबारी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिला। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की दिशा में सदैव पहल की, यद्यपि पाकिस्तान ने कभी भी अपने वादों को पूर्ण नहीं किया। कारगिल युद्ध इसका स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने पाकिस्तान के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ़ से भी बातचीत की थी। &lt;br /&gt;
*अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन के भारत आगमन पर अमेरिका के साथ भारतीय सम्बन्धों को सुधारने की दिशा में कार्य किया गया। अटलजी ने पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की रिहाई के लिए बिल क्लिंटन से वार्ता की ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या न हो सके। इस साझा प्रयास से ही नवाज शरीफ़ की रिहाई सम्भव हो सकी। &lt;br /&gt;
==विभिन्न उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
[[19 मार्च]], [[1998]] को नए चुनावों के माध्यम से अटल जी पुन: प्रधानमंत्री बने। इस समय सदन में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सदस्यों की संख्या 182 थी। तेलुगुदेशम, तृणमूल कांग्रेस और [[जयललिता]] की ए. आई. डी. एम. के. ने भाजपा को समर्थन दिया। अप्रैल [[1999]] तक अटल जी दूसरी बार प्रधानमंत्री पद पर रहे। इनका कार्यकाल इस बार 14 महीनों तक रहा। द्वितीय कार्यकाल में अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में निम्नलिखित उपलब्धियाँ हासिल प्राप्त कीं-&lt;br /&gt;
*अटलजी ने विज्ञान और तकनीक की प्रगति के साथ देश का भविष्य जोड़ा। उन्होंने परमाणु शक्ति को देश के लिए आवश्यक बताकर [[11 मई]] [[1998]] को पोखरन में पाँच परमाणु परीक्षण किए। &lt;br /&gt;
*अटल जी ने भारतीय सुरक्षा को महत्त्व दिया और देश को परमाणु बम से लैस किया। देश की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता का नारा दिया। &lt;br /&gt;
*परमाणु बम बना लेने के कारण अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन अटलजी ने प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए भारत को स्वावलम्बी राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत है और उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों की कोई भी परवाह नहीं है। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने पोखरन में '''जय जवान, जय किसान''' का नारा देकर अपने समस्त इरादे दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिए कि भारत भी एक परमाणु सम्पन्न देश है। अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखने के लिए उसे भी परमाणु बम बनाने का अधिकार है।&lt;br /&gt;
*अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में 'ब्रेन ड्रेन' (युवा प्रतिभाओं में विदेश गमन की अभिरुचि) को रोकने की ज़रूरत बताई। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे मातृभूमि की सेवा पर ध्यान दें। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने सेनाओं का मनोबल ऊँचा उठाने कार्य किया। साथ ही परमाणु कार्यक्रम की आधार शिला रखने वाली भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भी उन्होंने धन्यवाद दिया। अटलजी के लिए राष्ट्रहित दलगत राजनीति से सदैव ऊपर रहा। अटलजी को उदारमना ही कहना चाहिए कि उन्होंने विपक्ष की उपलब्धियों को भी सराहा। &lt;br /&gt;
मात्र चौदह महीनों के कार्यकाल में अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को सफल साबित कर किया। उन्हें पता था कि वह साझा सरकार के रूप में काम कर रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, इस कारण उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कर दिया था कि शायद यह कार्यकाल भी पूर्ण न हो पाए। फिर यही हुआ भी। इसके पश्चात् ए. आई. डी. एम. के. की जयललिता ने सशर्त समर्थन देना चाहा लेकिन अटलजी ने इसे स्वीकार नहीं किया और उन्हें प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उस समय कोई भी पार्टी केन्द्र में सरकार बनाने में सक्षम नहीं थी। इस कारण सितम्बर-अक्टूबर के मध्य चुनाव कराए गए और इस समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व अटलजी ने ही सम्भाला। लेकिन उसकी चर्चा करने से पूर्व उनके द्वितीय कार्यकाल में हुए कारगिल युद्ध का विवरण दिया जाना प्रासंगिक ही नहीं वरन् अत्यावश्यक भी होगा। &lt;br /&gt;
==कारगिल युद्ध==&lt;br /&gt;
{{Main|कारगिल युद्ध}}&lt;br /&gt;
कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में सामरिक महत्त्व की ऊँची चोटियाँ भारत के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। उन दुर्गम चोटियों पर शीत ऋतु में रहना काफ़ी कष्टसाध्य होता है। इस कारण भारतीय सेना वहाँ शीत ऋतु में नहीं रहती थी। इसका लाभ उठाकर पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने आतंकवादियों के साथ पाकिस्तानी सेना को भी कारगिल पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेज दिया। वस्तुत: पाकिस्तान ने सीमा सम्बन्धी नियमों का उल्लघंन किया था। लेकिन उसके पास यह सुरक्षित बहाना था कि कारगिल की चोटियों पर तो आतंकवादियों ने क़ब्ज़ा किया है, न कि पाकिस्तान की सेना ने। ऐसी स्थिति में भारतीय सेना के सामने बड़ी चुनौती थी। दुश्मन काफ़ी ऊँचाई पर था और भारतीय सेना उनके आसान निशाने पर थी। लेकिन भारतीय सेना ने अपना मनोबल क़ायम रखते हुए पाकिस्तानी फ़ौज पर आक्रमण कर दिया। इसे 'ऑपरेशन विजय' का नाम दिया गया। &lt;br /&gt;
====भारत को विजयश्री====&lt;br /&gt;
भारतीय सैनिकों ने ठान लिया था कि वे कारगिल से पाकिस्तानियों को खदेड़कर ही दम लेंगे। भारतीय सैनिकों ने विलक्षण वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सैनिकों को चारों ओर से घेर लिया। बेशक़ कारगिल युद्ध में भारत को विजयश्री प्राप्त हुई लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण भारत सरकार ने पाकिस्तानी सैनिकों को हथियारों सहित निकल भागने का मौक़ा दे दिया। पाकिस्तान को सामरिक महत्त्व की चोटियाँ ख़ाली करनी पड़ीं और भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों की ज़िन्दा वापसी को स्वीकार कर लिया। वस्तुत: युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं। भारतवर्ष ने उन्हीं नियमों का पालन किया था। लेकिन इस युद्ध में जहाँ भारत की जीत का सेहरा अटलजी के सिर पर बंधा, वहीं कई अन्य बातें भी प्रमाणित हुईं। जिन बोफ़ोर्स तोपों के नाकारा होने की बात श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में विपक्ष एवं भाजपा करती थीं, वही तोपें कारगिल युद्ध में बेहद क़ामयाब और उपयोगी साबित हुईं। सेना के उच्च अधिकारियों ने कहा कि बोफोर्स तोपों के कारण ही कारगिल में भारतीय सेना को शीघ्र क़ामयाबी मिल पाई थी वरना युद्ध लम्बा खिंच सकता था। बोफोर्स तोपों को लेकर राजीव गांधी पर जो आरोप लगे, वह इस प्रकार आंशिक रूप से धुल गए। बाद में [[न्यायपालिका]] ने भी स्वर्गीय राजीव गांधी को इस मामले में क्लीन चिट प्रदान कर दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा कि जब 1998 में पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल पर शीत काल में घुसपैठ की थी तो भारत का ख़ुफ़िया तंत्र समय पर इसका पता नहीं लगा सका। इस पर ख़ुफ़िया तंत्र ने स्पष्ट किया कि उसे इस बात की जानकारी थी और उसने सरकार को सूचित कर दिया था। तब विपक्ष ने सरकार को निशाना बनाया कि ऐसी घोर लापरवाही का उद्देश्य क्या था? क्या उद्देश्य यह था कि युद्ध जैसे हालात पैदा करने के लिए सरकार इंतज़ार कर रही थी, ताकि युद्ध में विजय का लाभ आगामी चुनावों में प्राप्त किया जा सके?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुशर्रफ़ से वार्ता==&lt;br /&gt;
{{Main|आगरा शिखर वार्ता}}&lt;br /&gt;
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ को [[आगरा]] में शिख़र वार्ता के लिए आमंत्रित किया। अटलजी चाहते थे कि वार्तालाप के माध्यम से दोनों देशों की समस्याओं का निराकरण किया जाए, लेकिन परवेज मुशर्रफ़ के व्यक्तित्व को समझने में भूल कर बैठे। परवेज मुशर्रफ़ ने शाही यात्रा का आनन्द तो उठाया लेकिन समझौते की राह हमवार नहीं हुई। परवेज मुशर्रफ़ ने भारत सरकार को पूर्व सूचना दिए बग़ैर ही आगरा के इलेक्ट्रानिक मीडिया को संभाषण जारी कर दिया, जिससे भारत की आलोचना हुई। इस संभाषण में भारत का पक्ष भी नकार दिया गया और कश्मीर के मामले को अधिक पेचीदा बनाकर पेश किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====आतंक का साया====&lt;br /&gt;
पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण भारत में अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुईं। पाकिस्तान यह अच्छी तरह से समझ चुका था कि भारत से युद्ध करके जीतना उसके लिए सम्भव नहीं है। इस कारण उसने आतंकवादियों के बल पर नई युद्ध नीति का विकास किया, जिससे कश्मीर के अवाम को सदैव परेशानियाँ भोगनी पड़ीं। अक्टूबर [[2002]] में आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर आत्मघाती हमला कर दिया। वाजपेयी सरकार का ख़ुफ़िया तंत्र इस बार भी आतंकवादियों के मंसूबों का पूर्वानुमान नहीं कर पाया। पाकिस्तान बेशर्म की भाँति मुस्कराता रहा और भारत सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्नचिह्न लग गया। इतना ही नहीं, [[13 दिसम्बर]], [[2001]] को भारत की [[संसद]] पर आतंकियों ने हमला करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। देश की राजधानी में संसद पर हमला किया जाना [[भारतीय इतिहास]] के लिए बाकई बेहद शर्म का दिन था। आतंकवादी भारी सुरक्षा के बावजूद संसद परिसर में गोला, बारूद और हथियारों सहित प्रविष्ट हो गए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था पर किया गया हमला पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का ही हिस्सा था। इस हमले के तहत् भारत सरकार ने काफ़ी शोर-शराबा मचाया और कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भी आकृष्ट किया। लेकिन जो अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर पाता, उसका साथ भला कौन देता है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत ने बेशक़ संयम से काम लिया, लेकिन आवश्यकता थी कड़े क़दम उठाने की। परन्तु अटलजी इस हमले का माक़ूल जवाब देने में विफल रहे। इस सम्बन्ध में विपक्ष चाहता था कि वाजपेयी सरकार पाकिस्तान को इसका जवाब युद्ध से दे, लेकिन सरकार ने सीमाओं पर भारी तादाद में सेनाओं की तैनाती कर दी। युद्ध के बादल अवश्य मंडराये, लेकिन बरसे नहीं। परमाणु शक्ति दोनों देशों के पास हैं। इस कारण युद्ध की आशंका दोनों देशों के निवासी भयभीत थे। वे लोग युद्ध नहीं चाहते थे। यह आतंकवादी कार्रवाई लश्करे तैयबा ने की थी, जिसका पाकिस्तान में पोषण हो रहा था। संसद पर हमला करने वाले पाँच आतंकी थे और पाँचों को ही मार गिराया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भ्रष्टाचार के आरोप==&lt;br /&gt;
एन. डी. ए. सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगे थे। इनमें सर्वाधिक चर्चित था-तहलका काण्ड। तहलका द्वारा भाजपा सदस्यों सहित सेना के अनेक अधिकारियों को घूस लेते हुए कैमरे में क़ैद करके सार्वजनिक रूप से उसका टी. वी. चैनल पर प्रदर्शन किया गया था। तब भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण और रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नाडीज़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। लेकिन बाद में जॉर्ज फ़र्नीडीज़ को पुन: रक्षा मंत्रालय दे दिया गया। इससे जॉर्ज फ़र्नाडीज़ की छवि पर ऐसा दाग़ लगा कि फिर कभी भी धुल नहीं पाया। उसकी काली छाया भाजपा और अटलजी पर भी पड़ी। संसद का सत्र आहूत किए जाने पर विपक्ष ने जॉर्ज फ़र्नाडीज़ को लेकर सदन का कई बार बहिष्कार किया। एन. डी. ए. का कार्यकाल समाप्त होने तक यही स्थिति बनी रही।&lt;br /&gt;
==चुनावों में पराजय==&lt;br /&gt;
भाजपा और एन. डी. ए. को यह प्रबल विश्वास था कि जनता उन्हें पुन: अवसर प्रदान करेगी। उन्होंने चमकदार भारत (शाइनिंग इंडिया) और भारत उदय (इंडिया राइजिंग) का चुनावी नारा दिया था। उन्हें मुग़ालता था कि एन. डी. ए. ने भारत की तस्वीर बदल दी है। एन. डी. ए. अपनी उपलब्धियाँ भी गिनाईं। एन. डी. ए. का कार्यकाल अक्टूबर [[2004]] में समाप्त होना था। लेकिन उसे लगा कि यदि चुनाव जल्दी करा लिए जाएँ तो इसका फ़ायदा उन्हें अवश्य होगा। इस कारण चुनाव अप्रैल-मई में ही करा लिए गए। लेकिन एन. डी. ए. का पूर्वानुमान ग़लत साबित हुआ। [[कांग्रेस]] ने यू.पी.ए. के रूप में बहुमत प्राप्त कर लिया। उसके बाद से अटलजी भाजपा के लिए कार्य करते रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{शासन क्रम |शीर्षक=[[भारत के प्रधानमंत्री]] |पूर्वाधिकारी=[[इन्द्र कुमार गुजराल]] |उत्तराधिकारी=[[मनमोहन सिंह|डॉ. मनमोहन सिंह]]}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}{{भारत गणराज्य}}{{भारत के प्रधानमंत्री2}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनीति कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:लोकसभा सांसद]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारतीय जनता पार्टी]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>अटल बिहारी वाजपेयी</title>
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		<updated>2012-11-12T05:59:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* विद्यार्थी जीवन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अटल बिहारी वाजपेयी विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा राजनीतिज्ञ&lt;br /&gt;
|चित्र=Atal-Bihari-Vajpayee.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=अटल बिहारी वाजपेयी&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[25 दिसंबर]], [[1924]]&lt;br /&gt;
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|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|मृत्यु कारण=&lt;br /&gt;
|अविभावक=पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी, कृष्णा देवी&lt;br /&gt;
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|क़ब्र= &lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|पार्टी=[[भारतीय जनता पार्टी]], [[भारतीय जनसंघ]]&lt;br /&gt;
|पद=[[प्रधानमंत्री]], विदेश मंत्री&lt;br /&gt;
|भाषा=&lt;br /&gt;
|जेल यात्रा=&lt;br /&gt;
|कार्य काल='''प्रधानमंत्री'''-16 मई 1996 – 1 जून 1996 और 19 मार्च 1998 – 19 मई 2004&lt;br /&gt;
'''विदेश मंत्री-''' 26 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गोरखी विद्यालय, विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल, रानी लक्ष्मीबाई कॉलेज, डी. ए. वी. महाविद्यालय&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातकोत्तर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[पद्म विभूषण]]&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=धर्म&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिन्दू]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2= &lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:48, 26 सितम्बर 2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''अटल बिहारी वाजपेयी''' (जन्म- [[25 दिसंबर]], [[1924]]) का नाम भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय [[प्रधानमंत्री|प्रधानमंत्रियों]] में लिया जाता है। [[नरसिम्हा राव]] के बाद [[1996]] में अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 13 दिन के लिए ही प्रधानमंत्री बने। इसके बाद [[1998]] में हुए चुनावों के माध्यम से वह दोबारा प्रधानमंत्री बने। इस कारण [[1996]] और [[1998]] के मध्य बने दो प्रधानमंत्रियों-[[एच. डी. देवगौड़ा]] तथा [[इन्द्र कुमार गुजराल]] को आगे स्थान दिया गया है। तत्पश्चात् अटल बिहारी वाजपेयी [[अक्टूबर]], [[1999]] में पुन: प्रधानमंत्री बने और यह कार्यकाल उन्होंने अत्यन्त सफलतापूर्वक पूर्ण किया। इसके पूर्व वह [[अप्रैल]] 1999 से अक्टूबर 1999 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री भी रहे।  &lt;br /&gt;
==जन्म एवं परिवार==&lt;br /&gt;
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म [[25 दिसम्बर]] (बड़ा दिन) [[1924]] को लश्कर, [[ग्वालियर]] में हुआ था, जो कि [[मध्य प्रदेश]] में है। 'शिंके का बाड़ा मुहल्ले' में जन्म लेने वाला यह बालक कितना बड़ा भाग्य लेकर पैदा हुआ। इनके [[पिता]] 'पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी' अध्यापन का कार्य करते थे और [[माता]] 'कृष्णा देवी' घरेलू महिला थीं। श्री वाजपेयी संतान क्रम में सातवें थे। इनसे बड़े तीन भाई और तीन बहनें थीं। वह बचपन से ही अंतर्मुखी स्वभाव के थे, साथ ही काफ़ी प्रतिभा सम्पन्न भी थे। अटल बिहारी वाजपेयी के बड़े भाइयों को 'अवध बिहारी वाजपेयी', 'सदा बिहारी वाजपेयी' तथा 'प्रेम बिहारी वाजपेयी' के नाम से जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====विद्यार्थी जीवन====&lt;br /&gt;
अटल बिहारी वाजपेयी के पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षण व्यवसाय से सम्बन्धित थे, इस कारण इन्हें कई स्थानों पर रहना पड़ता था। लेकिन अटलजी की आरम्भिक शिक्षा [[बड़नगर]] के 'गोरखी विद्यालय' में सम्पन्न हुई। बड़नगर में इनके पिता प्रधानाध्यापक के पद पर थे। इस विद्यालय में अटलजी ने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। वक्ता के रूप में इन्हें इसी विद्यालय से पहचान प्राप्त हुई थी। जब वह कक्षा पाँच में थे तब पाठ्येतर गतिविधियों के अंतर्गत उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था। लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण अटल जी को ग्वालियर जाना पड़ा। इनका नामांकन 'विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल' में हुआ। नौवीं कक्षा से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई अटल जी ने इसी विद्यालय से पूर्ण की। इस विद्यालय में रहते हुए उनकी वाद-विवाद सम्बन्धी प्रतिभा को उचित प्रवाह प्राप्त हुआ। वह वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में प्रथम भी आए। महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति &amp;quot;विजय पताका&amp;quot; पढकर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंटरमीडिएट करने के बाद अटल जी ने 'विक्टोरिया कॉलेज'&amp;lt;ref&amp;gt; जो कि बाद में रानी लक्ष्मीबाई कॉलेज के नाम से जाना गया&amp;lt;/ref&amp;gt; में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रवेश लिया। स्नातक स्तर की शिक्षा हेतु उन्होंने तीनों विषय [[भाषा]] पर आधारित लिए जो [[संस्कृत]], [[हिन्दी]] एवं [[अंग्रेज़ी]] थे। अटल जी की साहित्यिक प्रकृति थी, जिससे वह तीनों भाषाओं के प्रति आकृष्ट हुए। कॉलेज जीवन में ही इन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना आरम्भ कर दिया था। शुरू में वह 'छात्र संगठन' से जुड़े। नारायण राव तरटे ने इन्हें काफ़ी प्रभावित किया, जो [[राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ]] के प्रमुख कार्यकर्ता थे। ग्वालियर में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में अपने दायित्वों की पूर्ति की। कॉलेज जीवन में उन्होंने कविताओं की रचना करना आरम्भ कर दिया था। इनकी साहित्यिक अभिरुचि उसी समय काफ़ी परवान चढ़ी। इनके कॉलेज में अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों का भी आयोजन होता था। इस कारण से कविता की गहराई समझने में इन्हें काफ़ी मदद मिली। [[1943]] में वाजपेयी जी कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और [[1944]] में उपाध्यक्ष भी बने। ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अटलजी [[कानपुर]] आ गए ताकि राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर सकें। वहाँ उन्होंने एम. ए. तथा एल. एल. बी. में एक साथ प्रवेश लिया। चूंकि स्नातक परीक्षा इन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी, इस कारण इन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हो रही थी। कानपुर के डी. ए. वी. महाविद्यालय से इन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्यावसायिक जीवन==&lt;br /&gt;
शिक्षक पिता की संतान होने के कारण अटल जी शिक्षा का महत्त्व अच्छी तरह से जानते थे। इस कारण पी. एच. डी. करने के लिए वह [[लखनऊ]] चले गए और वक़ालत की पढ़ाई स्थगित कर दी। पढ़ाई के साथ-साथ वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यों का भी सम्पादन करने लगे। लेकिन अटलजी पी. एच. डी. करने में सफलता प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि [[पत्रकारिता]] से जुड़ने के कारण इन्हें अध्ययन के लिए समय नहीं मिल रहा था। उन दिनों 'राष्ट्रधर्म' नामक समाचार पत्र [[पंडित दीनदयाल उपाध्याय]] के सम्पादन में लखनऊ से मुद्रित हो रहा था। तब श्री अटल बिहारी वाजपेयी इसके सह सम्पादक के रूप में नियुक्त किए गए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस [[समाचार पत्र]] का सम्पादकीय स्वयं लिखते थे और अख़बार का बाक़ी कार्य अटल जी एवं इनके सहायक करते थे। लेकिन सही मायने में अटल जी ही इसके सम्पादक थे। अटल जी के आने के बाद 'राष्ट्रधर्म' समाचार पत्र का प्रसार काफ़ी बढ़ गया। ऐसे में इसके लिए स्वयं की प्रेस का प्रबन्ध किया गया। इस प्रेस का नाम '''भारत प्रेस''' रखा गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ समय के बाद 'भारत प्रेस' से मुद्रित होने वाला दूसरा समाचार पत्र 'पाँचजन्य' भी प्रकाशित होने लगा। इस समाचार पत्र का सम्पादन पूर्ण रूप से अटलजी करते थे। देश आज़ाद हो गया था। कुछ समय के बाद [[30 जनवरी]] [[1948]] को [[महात्मा गांधी]] की हत्या हुई। [[नाथूराम गोडसे]] का सम्बन्ध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से होने के कारण भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को प्रतिबन्धित कर दिया। चूंकि 'भारत प्रेस' भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभाव क्षेत्र में थी, इसीलिए भारत प्रेस को बन्द कर दिया गया। लेकिन अटल जी को अब पत्रकारिता में अत्यन्त आनन्द आने लगा था। इस कारण वह [[इलाहाबाद]] चले गए और उन्होंने 'क्राइसिस टाइम्स' नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक के लिए अपनी सेवाएँ देना आरम्भ कर दिया। परन्तु 'क्राइसिस टाइम्स' का साथ 'क्राइसिस' रहने तक ही था। जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर लगा प्रतिबंध हटा तो वह 'क्राइसिस टाइम्स' भी गुज़र गया। अटल जी पुन: लखनऊ लौटे और उनके सम्पादन में 'स्वदेश' नामक दैनिक पत्र निकलना आरम्भ हो गया। थोड़े ही दिनों में जहाँ 'स्वदेश' लोकप्रिय हुआ, वहीं अटल जी के सम्पादकीय भी काफ़ी सराहे गए और चर्चा का केन्द्र बने। लेकिन लगातार होने वाली हानि के कारण 'स्वदेश' को बंद कर देना पड़ा। तब अटल जी [[दिल्ली]] से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'वीर अर्जुन' का सम्पादन करने लगे। यह दैनिक एवं साप्ताहिक दोनों आधार पर प्रकाशित हो रहा था। 'वीर अर्जुन' का सम्पादन करने हुए एक पत्रकार के रूप में इन्हें काफ़ी प्रतिष्ठा और सम्मान मिला। अत: राजनेता से पूर्व अटल जी को एक कवि और पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई थी।&lt;br /&gt;
==राजनीतिक जीवन==&lt;br /&gt;
'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ' (आर. एस. एस.) हिन्दुत्ववादी विचारधारा की प्रमुख संस्था है लेकिन भारत सरकार की नज़र में वह अलागववादी विचारधारा का पोषण कर रही थी। इस कारण आर. एस. एस. पर कई प्रकार के राजनयिक प्रतिबन्ध लगा दिए गए। ऐसे में आर. एस. एस. ने [[भारतीय जनसंघ]] का गठन किया जो राजनीतिक विचारधारा वाला दल था। भारतीय जनसंघ का जन्म संघ परिवार की राजनीतिक संस्था के रूप में हुआ, जिसके अध्यक्ष [[श्यामा प्रसाद मुखर्जी|डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी]] थे। अटल जी उस समय से ही इस संस्था के संगठनात्मक ढाँचे से जुड़ गए। तब वह अध्यक्ष के निजी सचिव के रूप में दल का कार्य देख रहे थे। इस कारण उन्हें जनसंघ के सबसे पुराने व्यक्तियों में एक माना जाता है। भारतीय जनसंघ ने सर्वप्रथम [[1952]] के आम चुनावों में भाग लिया। तब उसका चुनाव चिह्न 'दीपक' था। चुनावों में भारतीय जनसंघ को कोई विशेष क़ामयाबी प्राप्त नहीं हुई, फिर भी डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय हित में कार्य करते रहे। उस समय भी [[कश्मीर]] का मामला अत्यन्त संवेदनशील था। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अटल जी के साथ [[जम्मू-कश्मीर]] के लोगों को जागरूक करने का कार्य किया। वह [[कश्मीर]] के हिन्दुओं को अपने अधिकारों के लिए जाग्रत कर रहे थे। लेकिन सरकार ने इसे साम्प्रदायिक गतिविधि मानते हुए डॉक्टर मुखर्जी को गिरफ्तार करके जेल में ठूँस दिया। डॉक्टर मुखर्जी की [[23 जून]] [[1953]] को जेल में ही मृत्यु हो गई। तब जनसंघ के समर्थकों ने उनकी मृत्यु को एक गहरी साज़िश मानते हुए इसे हत्या क़रार दिया। &lt;br /&gt;
====दूसरा आम चुनाव====&lt;br /&gt;
अब भारतीय जनसंघ का काम अटल जी प्रमुख रूप से देखने लगे। इन पर राजनीतिक रंग पूरी तरह से हावी हो चुका था। तभी दूसरा आम चुनाव आ गया। [[1957]] के इन चुनावों में भारतीय जनसंघ को चार स्थानों पर विजय प्राप्त हुई। अटल जी पहली बार [[बलरामपुर]] सीट से विजयी होकर [[लोकसभा]] में पहुँचे। 1957 में लोकसभा चुनाव हेतु अटल जी ने तीन स्थानों से नामांकन पत्र दाख़िल किया था। बलरामपुर के अलावा उन्होंने लखनऊ और [[मथुरा]] से भी पर्चे भरे थे। बलरामपुर एक रियासत थी। जिसका आज़ादी के बाद [[उत्तर प्रदेश]] राज्य में विलय कर दिया गया था। वहाँ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अच्छा दबदबा था। 'प्रताप नारायण तिवारी' ने यहाँ जनसंघ के लिए दृढ़ आधार तैयार किया था। चूंकि बलरामपुर कभी रियासत थी, इस कारण रजवाड़ों का भी यहाँ दबदबा था। रजवाड़े [[कांग्रेस]] से नाराज़ थे, क्योंकि आज़ादी के बाद वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखना चाहते थे। यही कारण है कि बलरामपुर की सीट कांग्रेस के बजाए जनसंघ की झोली में चली गई और अटल जी प्रथम बार लोकसभा में पहुँचे। वह इस चुनाव में 10 हज़ार मतों से विजय हुए थे। लेकिन अटल जी बाक़ी दो स्थानों पर हार गए। मथुरा में वह अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाए और लखनऊ में साढ़े बारह हज़ार मतों से पराजय स्वीकार करनी पड़ी। दोनों स्थानों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की विजय हुई थी। उस समय किसी भी पार्टी के लिए यह आवश्यक था कि वह कम से कम तीन प्रतिशत वोट प्राप्त करे अन्यथा उस पार्टी की मान्यता समाप्त की जा सकती थी। भारतीय जनसंघ को 6 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। इन चुनावों में 'हिन्दू महासभा' और 'रामराज्य परिषद्' जैसी पार्टियों की मान्यता समाप्त हो गई, क्योंकि उन्हें तीन प्रतिशत वोट नहीं मिले थे। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Atal-Bihari-Vajpayee-2.jpg|thumb|200px|अटल बिहारी वाजपेयी और अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर]]&lt;br /&gt;
====कश्मीर मुद्दे पर विचार==== &lt;br /&gt;
अटलजी ने [[संसद]] में पहुँचने के पश्चात् कश्मीर मुद्दे पर अपने विचार प्रकट किए और संसद ने उन्हें बेहद ध्यान से सुना। अटल जी ने कहा कि 'कश्मीर का मामला 'संयुक्त राष्ट्र संघ' में नहीं भेजा जाना चाहिए था, क्योंकि वहाँ से कोई समाधान नहीं प्राप्त होगा। भारत को अपने स्तर पर ही प्रयास करके [[पाकिस्तान]] के अधिकार वाले कश्मीर के विषय में सोचना होगा।' अटल जी का यह अनुमान आज भी सत्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर समस्या का समाधान आज तक नहीं खोजा है। अटल जी का तर्क था कि कश्मीर में पाकिस्तान हमलावर था, अत: राष्ट्र संघ को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी। कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजना एक ऐतिहासिक भूल थी। भारत को चाहिए था कि वह हमलावर को अपनी ज़मीन से हटा देता और इसके लिए आवश्यक सैनिक कार्रवाई करता। &lt;br /&gt;
====1962 के आम चुनाव====&lt;br /&gt;
अटलजी ने संसद में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। फिर [[1962]] के आम चुनाव आ गए। वह पुन: बलरामपुर की सीट से भारतीय जनसंघ के टिकट पर खड़े हुए लेकिन उन्हें इस बार पराजय का मुँह देखना पड़ा। कांग्रेसी उम्मीदवार को 1052 वोटों से विजय प्राप्त हुई। यह आश्चर्य की बात थी कि अटल जी को संसद में प्रशंसनीय कार्य करने के बाद भी जीत नसीब नहीं हुई। वैसे यह चुनाव इस कारण भी विवादास्पद रहा कि कांग्रेस प्रत्याशी ने उचित-अनुचित सभी प्रकार के पैंतरे अपनाए थे। इस चुनाव के दौरान साम्प्रदायिक सौहार्द्र भी बिगड़ा। इस कारण भयवश हज़ारों हिन्दू नारियों ने अपने मताधिकारों का प्रयोग नहीं किया। फिर भी 1962 के चुनाव में जनसंघ ने प्रगति की और संसद में उसके 14 प्रतिनिधि पहुँचने में सफल रहे। इस संख्या के आधार पर [[राज्यसभा]] के लिए जनसंघ को दो सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त हुआ। ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी और [[पंडित दीनदयाल उपाध्याय]] राज्यसभा में भेजे गए। चूंकि [[राष्ट्रपति]] ही राज्यसभा का पदेन सभापति होता है, इस कारण [[सर्वपल्ली राधाकृष्णन]] सभापति थे। उन्होंने अटल जी को राज्यसभा की प्रथम दीर्घा में बैठने को अनुप्रेरित किया। अटल जी ने राज्यसभा में भी अपने दायित्वों का निर्वहन योग्यता के साथ किया। इस कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति [[डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद]] और प्रधानमंत्री [[पंडित जवाहरलाल नेहरू]] की मृत्यु हुई। अटलजी ने अनूठी भाषा-शैली में उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की। दोनों श्रद्धांजलियों को राज्यसभा के पटल पर सुरक्षित रखा गया। &lt;br /&gt;
====चौथे आम चुनाव====&lt;br /&gt;
चौथे आम चुनाव [[1967]] में सम्पन्न हुए। अटलजी पुन: बलरामपुर की सीट से प्रत्याशी बने। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को लगभग 32 हज़ार वोटों से हराया। अपने इस कार्यकाल में अटल जी ने यह साबित कर दिया कि वह धर्मनिरपेक्षता के पूर्ण समर्थक हैं तथा धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण नहीं चाहते। काहिरा में आयोजित हुए इस्लामी सम्मेलन के बारे में उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मज़हबी कट्टरता का पोषण नहीं होना चाहिए। ऐसे सम्मेलन विश्व बंधुत्व के आधार पर होने चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी ने मज़हबी आधार पर गुट बनाने की प्रवृत्ति को ख़तरनाक बताया और भारत सरकार को भी इस बारे में आगाह किया। धारा 370 के अंतर्गत कश्मीर को जो विशिष्ट दर्जा प्रदान किया गया था, उन्होंने उसका भी विरोध किया और धारा 370 समाप्त करने की मांग की। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत सरकार से यह मांग की कि कश्मीर में रोज़गार के साधन उपलब्ध कराए जाएँ और शिक्षा के स्तर में वृद्धि हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार विदेशी राजनीति भी अटल जी का पसंदीदा विषय थी। जब [[अमेरिका]] ने वियतनाम पर हमला किया तो उन्होंने बड़े कड़े शब्दों में निंदा की। वियतनाम को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की ख़ामोशी को भी अटल जी ने अपना निशाना बनाया। उन्होंने इस युद्ध का परिणाम भी घोषित कर दिया था। अटल जी ने कहा था कि वियतनाम की जनता अपनी स्वाधीनता के लिए लड़ रही है और [[अमेरिका]] उसे युद्ध में तबाह करके अपना उपनिवेश बनाना चाहता है। अंतत: अमेरिकी फ़ौजों को वहाँ से जाना ही होगा। इस मुद्दे पर उन्होंने सटीक भविष्यवाणी की थी। उस युद्ध में वाकई अमेरिका को पराजय का सामना करना पड़ा और वियतनाम युद्ध आज भी अमेरिका के लिए एक दाग़ की भाँति है। यही नहीं, अमेरिका की जनता ने भी बाद में वियतमान युद्ध का कड़ा विरोध करना आरम्भ कर दिया था। &lt;br /&gt;
====काव्य की रचना====&lt;br /&gt;
अटल जी पाँचवी लोकसभा में भी पहुँचने में क़ामयाब रहे। सन् [[1972]] का लोकसभा चुनाव उन्होंने गृहनगर यानी ग्वालियर से लड़ा था। बलरामपुर संसदीय चुनाव का उन्होंने परित्याग कर दिया था। इस समय श्रीमती [[इंदिरा गांधी]] देश की प्रधानमंत्री थीं। लेकिन [[जून]], [[1975]] में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर विपक्ष के कई नेताओं को जेल में डाल दिया। उनमें अटल जी भी शामिल थे। उन्होंने जेल में रहते हुए समयानुकूल काव्य की रचना की और आपातकाल के यथार्थ को व्यंग्य के माध्यम से प्रकट किया। जेल में रहते हुए ही अटल जी का स्वास्थ्य ख़राब हो गया और उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया। लगभग 18 माह के बाद आपातकाल समाप्त हुआ और छठवीं लोकसभा के गठन हेतु चुनाव घोषित हुए। जब विपक्ष के नेता जेल में बंद थे, तब भी उनमें वैचारिक मंथन हुआ। &lt;br /&gt;
====विदेश मंत्री====&lt;br /&gt;
आपातकाल के कारण विपक्ष संगठित होने में सफल रहा। फिर लोकसभा चुनाव सम्पन्न हुए, लेकिन इंदिरा गांधी चुनाव नहीं जीत सकीं। संगठित विपक्ष द्वारा [[मोरारजी देसाई]] के प्रधानमंत्रित्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और अटल जी विदेश मंत्री बनाए गए। उन्हें विदेशी मामलों का विशेषज्ञ भी माना जाता था। उन्होंने कई देशों की यात्राएँ कीं और [[भारत]] का पक्ष रखा। अटल जी की विदेश यात्राओं के कारण मोरारजी देसाई ने इन्हें टोका था कि कभी-कभी देश में भी रहा करो। अटल जी ने [[पाकिस्तान]] की भी यात्रा की। उन्होंने तत्कालीन फ़ौजी शासक जिया-उल-हक़ से वार्तालाप के दौरान 'फ़रक्का-गंगाजल' बंटवारे का मसौदा तय किया। इसके अतिरिक्त भारत और पाकिस्तान के मध्य रेल सेवा की बहाली भी तय की गई। अटल जी [[बांग्लादेश|बंग्लादेश]] के साथ भी [[गंगाजल]] के वितरण पर समझौते की दिशा में बढ़े। उन्होंने विदेश मंत्री के तौर पर भारतीय अणु शक्ति के सम्बन्ध में नीति स्पष्ट की और अणु ऊर्जा को भारतीय आवश्यकताओं के लिए ज़रूरी बताया। अटल जी ने [[नेपाल]] के विदेश मंत्री के साथ व्यापार और पारगमन की नई नीति के सम्बन्ध में भी चर्चा की। [[4 अक्टूबर]], [[1977]] को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में [[हिन्दी]] में सम्बोधन दिया। इसके पूर्व किसी भी भारतीय नागरिक ने राष्ट्रभाषा का प्रयोग इस मंच पर नहीं किया था। &lt;br /&gt;
====राज्यसभा के लिए चुने गए====&lt;br /&gt;
जनता पार्टी सरकार का पतन होने के पश्चात् [[1980]] में नए चुनाव हुए और इंदिरा गांधी पुन: सत्ता में आ गईं। इसके बाद [[1996]] तक अटल जी विपक्ष में रहे। 1980 में [[भारतीय जनसंघ]] के नए स्वरूप में [[भारतीय जनता पार्टी]] का गठन हुआ और इसका चुनाव चिह्न 'कमल का फूल' रखा गया। उस समय अटल जी ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात् [[1984]] में आठवीं लोकसभा के चुनाव हुए। सहानुभूति की लहर कांग्रेस के साथ थी। यही कारण है कि विपक्ष के अनेक दिग्गजों को पराजय का मुँह देखना पड़ा। अटल जी भी ग्वालियर की अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। लेकिन [[1986]] में इन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया। फिर समय ने पलटा खाया और [[विश्वनाथ प्रताप सिंह]] के कारण कांग्रेस को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। &lt;br /&gt;
====लोकसभा भंग====&lt;br /&gt;
ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा को बाहर से ही समर्थन प्रदान किया। लेकिन [[13 मार्च]], [[1991]] को लोकसभा भंग हो गई और 1991 में नए चुनाव सम्पन्न हुए। सम्पूर्ण चुनाव प्रक्रिया को दो चरणों में होना था। चुनाव के प्रथम चरण के बाद [[तमिलनाडु]] में [[राजीव गांधी]] की हत्या होने और द्वितीय चरण के मतदान में कांग्रेस को सहानुभूति का लाभ मिलने से [[पी. वी. नरसिम्हा राव]] कांग्रेस के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इनका प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल पूर्ण होने के बाद 1996 में पुन: लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए। &lt;br /&gt;
==प्रधानमंत्री पद==&lt;br /&gt;
1996 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। संसदीय दल के नेता के रूप में अटलजी प्रधानमंत्री बने। उन्होंने [[21 मई]], 1996 को प्रधानमंत्री के पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। [[31 मई]], [[1996]] को इन्हें अन्तिम रूप से बहुमत सिद्ध करना था, लेकिन विपक्ष संगठित नहीं था। इस कारण अटल जी मात्र 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने अपनी अल्पमत सरकार का त्यागपत्र [[राष्ट्रपति]] [[डॉ. शंकरदयाल शर्मा]] को सौंप दिया। &lt;br /&gt;
====कार्यवाहक प्रधानमंत्री====&lt;br /&gt;
कारगिल में युद्ध की जो स्थितियाँ बनीं, वह निश्चय ही घोर लापरवाही का कारण थीं, लेकिन सच्चाई सामने नहीं आ सकी। अगले चुनावों में एन. डी. ए. की सरकार बनी। उसने उन आरोपों की निष्पक्ष जाँच कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और सभी सवाल समय की गर्त में दफ़न हो गए। अटल जी की सरकार दूसरी बार एक मत की कमी से बहुमत के जादुई आँकड़े तक नहीं पहुँच पाई और उसका पतन हो गया। सरकार गिराने के लिए विपक्ष ने राजनीति में प्रचलित वैध-अवैध सभी पैंतरे आजमाए, लेकिन कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। अत: अप्रैल, 1999 से अक्टूबर, 1999 तक अटल जी कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। &lt;br /&gt;
====तीसरी बार प्रधानमंत्री==== &lt;br /&gt;
चुनाव के पश्चात एन. डी. ए. को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और 13 अक्टूबर, 1999 को राष्ट्रपति श्री [[के. आर. नारायणन]] ने अटल जी को [[प्रधानमंत्री]] के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस प्रकार अटल जी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। वह पहले के दो कार्यकाल पूर्ण नहीं कर पाए थे। भाजपा हिन्दुत्ववादी पार्टी है, लेकिन वह धर्मनिरपेक्षता का सिद्धान्त भी स्वीकार करती है। भाजपा में अनेक मुस्लिम लोग भी सम्मिलित हैं। लेकिन भाजपा का विश्वास रहा है कि हिन्दुओं को अपनी पार्टी से जोड़कर रखना है। इस कारण वह उन संवेदनशील मुद्दों को हवा सदैव देती रही जो हिन्दुओं से सम्बन्धित थे। इसमें [[अयोध्या]] स्थित 'रामजन्म भूमि' पर मन्दिर बनाए जाने का भी मुद्दा था। यद्यपि अटल जी उस सीमा तक भाजपा के साथ माने जाते हैं, जहाँ तक हिन्दू राष्ट्र का सवाल आता है, लेकिन वह जन भावनाएँ भड़काने की नीति के समर्थक कभी भी नहीं रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अटलजी प्रधानमंत्री के रूप में यक़ीनन बेहद योग्य व्यक्ति रहे हैं और नेहरूजी ने अपने जीवनकाल में ही यह घोषणा कर दी थी तथापि [[आडवाणी लाल कृष्ण|आडवाणी जी]] को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अटल जी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। आडवाणी जी के इस अथक श्रम को निश्चय ही याद किया जाएगा कि उन्होंने अटल जी के लिए समर्थन जुटाया। भाजपा की हिन्दुत्ववादी नीति से वोट बटोरने का कार्य भी उन्होंने किया था। राजनीति में स्थायी मित्रता और शत्रुता का कोई भी स्थान नहीं होता। प्रधानमंत्री बनने के बाद अटलजी के सामने सम्पूर्ण देश और उसकी समस्याएँ थीं। वह भाजपा तक सीमित नहीं रह सकते थे। वह संवैधानिक मर्यादा से बंधे हुए थे। यों भी अटलजी नैतिक व्यक्ति रहे हैं। इसके अलावा एन. डी. ए. के प्रति भी उनका उत्तरदायित्व था। आडवाणी जी चाहते थे कि राम मन्दिर का मसला सुलझा लिया जाए। लेकिन अटल जी जानते थे कि एन. डी. ए. में शामिल अन्य दल इसके लिए तैयार नहीं होंगे। वह विवादास्पद प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते थे। वह दूरगामी परिणामों का आकलन कर रहे थे। यही कारण है कि आडवाणी जी के साथ उनके वैचारिक मतभेद हो गए।&lt;br /&gt;
====ठोस कार्य====&lt;br /&gt;
अटल जी की एन. डी. ए. सरकार ने पाँच वर्ष का कार्यकाल अवश्य पूर्ण किया, लेकिन इसके लिए अटल जी को काफ़ी पापड़ बेलने पड़े। एन. डी. ए. संयोजक [[जॉर्ज फ़र्नाडीज़]] ने भी इसमें सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया था। एन. डी. ए. के सभी घटकों का पाँच [[वर्ष]] तक एक साथ रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। अटल जी के तृतीय प्रधानमंत्रित्व काल की विशेषताओं को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है-&lt;br /&gt;
*श्री नरसिम्हा राव में आर्थिक सुधारों की जो नीति आरम्भ की थी, उसे अटल जी ने जारी रखा। उन्हें इस नीति के सकारात्मक तथ्यों का ज्ञान था। वह उसे इस कारण ख़ारिज नहीं करना चाहते थे कि वह कांग्रेस की आर्थिक नीति थी। ऐसी नीति से अर्थव्यवस्था के सुधार का लाभ इनकी सरकार को भी प्राप्त हुआ और सर्वहारा वर्ग भी आर्थिक रूप से सम्पन्न हुआ।&lt;br /&gt;
*श्री अटल जी ने संतुलित विदेश नीति का पालन करते हुए अपनी परमाणु नीति को स्पष्ट किया। अमेरिका और उसके मित्र देशों ने पोखरण परमाणु विस्फोट पर आँखें अवश्य तरेरीं लेकिन अटलजी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अगला परमाणु परीक्षण नहीं करेगा। वह परमाणु बम का उपयोग तभी करेगा जब उसके विरुद्ध ऐसा किया जाएगा। भारतीय परमाणु कार्यक्रम [[चीन]] तथा पाकिस्तान के विरोधी रवैये को देखते हुए बनाया गया और सारी दुनिया भी भारत के इस भय को समझती थी। &lt;br /&gt;
*आर्थिक विकास के लिए अटलजी ने 'स्वर्णिम चतुर्भुज' योजना का आरम्भ किया। इसके अंतर्गत वह देश के महत्त्वपूर्ण शहरों को लम्बी-चौड़ी सड़कों के माध्यम से जोड़ना चाहते थे। इसका अधिकांश कार्य अटलजी के कार्यकाल में पूर्ण हुआ। इससे जहाँ आम व्यक्ति की यात्रा सुविधाजनक हुई, वहीं व्यापारिक और क़ारोबारी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिला। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की दिशा में सदैव पहल की, यद्यपि पाकिस्तान ने कभी भी अपने वादों को पूर्ण नहीं किया। कारगिल युद्ध इसका स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने पाकिस्तान के सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ़ से भी बातचीत की थी। &lt;br /&gt;
*अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन के भारत आगमन पर अमेरिका के साथ भारतीय सम्बन्धों को सुधारने की दिशा में कार्य किया गया। अटलजी ने पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की रिहाई के लिए बिल क्लिंटन से वार्ता की ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या न हो सके। इस साझा प्रयास से ही नवाज शरीफ़ की रिहाई सम्भव हो सकी। &lt;br /&gt;
==विभिन्न उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
[[19 मार्च]], [[1998]] को नए चुनावों के माध्यम से अटल जी पुन: प्रधानमंत्री बने। इस समय सदन में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सदस्यों की संख्या 182 थी। तेलुगुदेशम, तृणमूल कांग्रेस और [[जयललिता]] की ए. आई. डी. एम. के. ने भाजपा को समर्थन दिया। अप्रैल [[1999]] तक अटल जी दूसरी बार प्रधानमंत्री पद पर रहे। इनका कार्यकाल इस बार 14 महीनों तक रहा। द्वितीय कार्यकाल में अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में निम्नलिखित उपलब्धियाँ हासिल प्राप्त कीं-&lt;br /&gt;
*अटलजी ने विज्ञान और तकनीक की प्रगति के साथ देश का भविष्य जोड़ा। उन्होंने परमाणु शक्ति को देश के लिए आवश्यक बताकर [[11 मई]] [[1998]] को पोखरन में पाँच परमाणु परीक्षण किए। &lt;br /&gt;
*अटल जी ने भारतीय सुरक्षा को महत्त्व दिया और देश को परमाणु बम से लैस किया। देश की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता का नारा दिया। &lt;br /&gt;
*परमाणु बम बना लेने के कारण अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन अटलजी ने प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए भारत को स्वावलम्बी राष्ट्र बनाने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत है और उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों की कोई भी परवाह नहीं है। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने पोखरन में '''जय जवान, जय किसान''' का नारा देकर अपने समस्त इरादे दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिए कि भारत भी एक परमाणु सम्पन्न देश है। अपनी स्वतंत्रता को क़ायम रखने के लिए उसे भी परमाणु बम बनाने का अधिकार है।&lt;br /&gt;
*अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में 'ब्रेन ड्रेन' (युवा प्रतिभाओं में विदेश गमन की अभिरुचि) को रोकने की ज़रूरत बताई। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे मातृभूमि की सेवा पर ध्यान दें। &lt;br /&gt;
*अटलजी ने सेनाओं का मनोबल ऊँचा उठाने कार्य किया। साथ ही परमाणु कार्यक्रम की आधार शिला रखने वाली भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भी उन्होंने धन्यवाद दिया। अटलजी के लिए राष्ट्रहित दलगत राजनीति से सदैव ऊपर रहा। अटलजी को उदारमना ही कहना चाहिए कि उन्होंने विपक्ष की उपलब्धियों को भी सराहा। &lt;br /&gt;
मात्र चौदह महीनों के कार्यकाल में अटलजी ने प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को सफल साबित कर किया। उन्हें पता था कि वह साझा सरकार के रूप में काम कर रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है, इस कारण उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कर दिया था कि शायद यह कार्यकाल भी पूर्ण न हो पाए। फिर यही हुआ भी। इसके पश्चात् ए. आई. डी. एम. के. की जयललिता ने सशर्त समर्थन देना चाहा लेकिन अटलजी ने इसे स्वीकार नहीं किया और उन्हें प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उस समय कोई भी पार्टी केन्द्र में सरकार बनाने में सक्षम नहीं थी। इस कारण सितम्बर-अक्टूबर के मध्य चुनाव कराए गए और इस समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व अटलजी ने ही सम्भाला। लेकिन उसकी चर्चा करने से पूर्व उनके द्वितीय कार्यकाल में हुए कारगिल युद्ध का विवरण दिया जाना प्रासंगिक ही नहीं वरन् अत्यावश्यक भी होगा। &lt;br /&gt;
==कारगिल युद्ध==&lt;br /&gt;
{{Main|कारगिल युद्ध}}&lt;br /&gt;
कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में सामरिक महत्त्व की ऊँची चोटियाँ भारत के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। उन दुर्गम चोटियों पर शीत ऋतु में रहना काफ़ी कष्टसाध्य होता है। इस कारण भारतीय सेना वहाँ शीत ऋतु में नहीं रहती थी। इसका लाभ उठाकर पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने आतंकवादियों के साथ पाकिस्तानी सेना को भी कारगिल पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेज दिया। वस्तुत: पाकिस्तान ने सीमा सम्बन्धी नियमों का उल्लघंन किया था। लेकिन उसके पास यह सुरक्षित बहाना था कि कारगिल की चोटियों पर तो आतंकवादियों ने क़ब्ज़ा किया है, न कि पाकिस्तान की सेना ने। ऐसी स्थिति में भारतीय सेना के सामने बड़ी चुनौती थी। दुश्मन काफ़ी ऊँचाई पर था और भारतीय सेना उनके आसान निशाने पर थी। लेकिन भारतीय सेना ने अपना मनोबल क़ायम रखते हुए पाकिस्तानी फ़ौज पर आक्रमण कर दिया। इसे 'ऑपरेशन विजय' का नाम दिया गया। &lt;br /&gt;
====भारत को विजयश्री====&lt;br /&gt;
भारतीय सैनिकों ने ठान लिया था कि वे कारगिल से पाकिस्तानियों को खदेड़कर ही दम लेंगे। भारतीय सैनिकों ने विलक्षण वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सैनिकों को चारों ओर से घेर लिया। बेशक़ कारगिल युद्ध में भारत को विजयश्री प्राप्त हुई लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप के कारण भारत सरकार ने पाकिस्तानी सैनिकों को हथियारों सहित निकल भागने का मौक़ा दे दिया। पाकिस्तान को सामरिक महत्त्व की चोटियाँ ख़ाली करनी पड़ीं और भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों की ज़िन्दा वापसी को स्वीकार कर लिया। वस्तुत: युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं। भारतवर्ष ने उन्हीं नियमों का पालन किया था। लेकिन इस युद्ध में जहाँ भारत की जीत का सेहरा अटलजी के सिर पर बंधा, वहीं कई अन्य बातें भी प्रमाणित हुईं। जिन बोफ़ोर्स तोपों के नाकारा होने की बात श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में विपक्ष एवं भाजपा करती थीं, वही तोपें कारगिल युद्ध में बेहद क़ामयाब और उपयोगी साबित हुईं। सेना के उच्च अधिकारियों ने कहा कि बोफोर्स तोपों के कारण ही कारगिल में भारतीय सेना को शीघ्र क़ामयाबी मिल पाई थी वरना युद्ध लम्बा खिंच सकता था। बोफोर्स तोपों को लेकर राजीव गांधी पर जो आरोप लगे, वह इस प्रकार आंशिक रूप से धुल गए। बाद में [[न्यायपालिका]] ने भी स्वर्गीय राजीव गांधी को इस मामले में क्लीन चिट प्रदान कर दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा कि जब 1998 में पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल पर शीत काल में घुसपैठ की थी तो भारत का ख़ुफ़िया तंत्र समय पर इसका पता नहीं लगा सका। इस पर ख़ुफ़िया तंत्र ने स्पष्ट किया कि उसे इस बात की जानकारी थी और उसने सरकार को सूचित कर दिया था। तब विपक्ष ने सरकार को निशाना बनाया कि ऐसी घोर लापरवाही का उद्देश्य क्या था? क्या उद्देश्य यह था कि युद्ध जैसे हालात पैदा करने के लिए सरकार इंतज़ार कर रही थी, ताकि युद्ध में विजय का लाभ आगामी चुनावों में प्राप्त किया जा सके?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुशर्रफ़ से वार्ता==&lt;br /&gt;
{{Main|आगरा शिखर वार्ता}}&lt;br /&gt;
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ को [[आगरा]] में शिख़र वार्ता के लिए आमंत्रित किया। अटलजी चाहते थे कि वार्तालाप के माध्यम से दोनों देशों की समस्याओं का निराकरण किया जाए, लेकिन परवेज मुशर्रफ़ के व्यक्तित्व को समझने में भूल कर बैठे। परवेज मुशर्रफ़ ने शाही यात्रा का आनन्द तो उठाया लेकिन समझौते की राह हमवार नहीं हुई। परवेज मुशर्रफ़ ने भारत सरकार को पूर्व सूचना दिए बग़ैर ही आगरा के इलेक्ट्रानिक मीडिया को संभाषण जारी कर दिया, जिससे भारत की आलोचना हुई। इस संभाषण में भारत का पक्ष भी नकार दिया गया और कश्मीर के मामले को अधिक पेचीदा बनाकर पेश किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====आतंक का साया====&lt;br /&gt;
पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद के कारण भारत में अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हुईं। पाकिस्तान यह अच्छी तरह से समझ चुका था कि भारत से युद्ध करके जीतना उसके लिए सम्भव नहीं है। इस कारण उसने आतंकवादियों के बल पर नई युद्ध नीति का विकास किया, जिससे कश्मीर के अवाम को सदैव परेशानियाँ भोगनी पड़ीं। अक्टूबर [[2002]] में आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर आत्मघाती हमला कर दिया। वाजपेयी सरकार का ख़ुफ़िया तंत्र इस बार भी आतंकवादियों के मंसूबों का पूर्वानुमान नहीं कर पाया। पाकिस्तान बेशर्म की भाँति मुस्कराता रहा और भारत सरकार की प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्नचिह्न लग गया। इतना ही नहीं, [[13 दिसम्बर]], [[2001]] को भारत की [[संसद]] पर आतंकियों ने हमला करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। देश की राजधानी में संसद पर हमला किया जाना [[भारतीय इतिहास]] के लिए बाकई बेहद शर्म का दिन था। आतंकवादी भारी सुरक्षा के बावजूद संसद परिसर में गोला, बारूद और हथियारों सहित प्रविष्ट हो गए। लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था पर किया गया हमला पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का ही हिस्सा था। इस हमले के तहत् भारत सरकार ने काफ़ी शोर-शराबा मचाया और कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भी आकृष्ट किया। लेकिन जो अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर पाता, उसका साथ भला कौन देता है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत ने बेशक़ संयम से काम लिया, लेकिन आवश्यकता थी कड़े क़दम उठाने की। परन्तु अटलजी इस हमले का माक़ूल जवाब देने में विफल रहे। इस सम्बन्ध में विपक्ष चाहता था कि वाजपेयी सरकार पाकिस्तान को इसका जवाब युद्ध से दे, लेकिन सरकार ने सीमाओं पर भारी तादाद में सेनाओं की तैनाती कर दी। युद्ध के बादल अवश्य मंडराये, लेकिन बरसे नहीं। परमाणु शक्ति दोनों देशों के पास हैं। इस कारण युद्ध की आशंका दोनों देशों के निवासी भयभीत थे। वे लोग युद्ध नहीं चाहते थे। यह आतंकवादी कार्रवाई लश्करे तैयबा ने की थी, जिसका पाकिस्तान में पोषण हो रहा था। संसद पर हमला करने वाले पाँच आतंकी थे और पाँचों को ही मार गिराया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भ्रष्टाचार के आरोप==&lt;br /&gt;
एन. डी. ए. सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगे थे। इनमें सर्वाधिक चर्चित था-तहलका काण्ड। तहलका द्वारा भाजपा सदस्यों सहित सेना के अनेक अधिकारियों को घूस लेते हुए कैमरे में क़ैद करके सार्वजनिक रूप से उसका टी. वी. चैनल पर प्रदर्शन किया गया था। तब भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण और रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नाडीज़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। लेकिन बाद में जॉर्ज फ़र्नीडीज़ को पुन: रक्षा मंत्रालय दे दिया गया। इससे जॉर्ज फ़र्नाडीज़ की छवि पर ऐसा दाग़ लगा कि फिर कभी भी धुल नहीं पाया। उसकी काली छाया भाजपा और अटलजी पर भी पड़ी। संसद का सत्र आहूत किए जाने पर विपक्ष ने जॉर्ज फ़र्नाडीज़ को लेकर सदन का कई बार बहिष्कार किया। एन. डी. ए. का कार्यकाल समाप्त होने तक यही स्थिति बनी रही।&lt;br /&gt;
==चुनावों में पराजय==&lt;br /&gt;
भाजपा और एन. डी. ए. को यह प्रबल विश्वास था कि जनता उन्हें पुन: अवसर प्रदान करेगी। उन्होंने चमकदार भारत (शाइनिंग इंडिया) और भारत उदय (इंडिया राइजिंग) का चुनावी नारा दिया था। उन्हें मुग़ालता था कि एन. डी. ए. ने भारत की तस्वीर बदल दी है। एन. डी. ए. अपनी उपलब्धियाँ भी गिनाईं। एन. डी. ए. का कार्यकाल अक्टूबर [[2004]] में समाप्त होना था। लेकिन उसे लगा कि यदि चुनाव जल्दी करा लिए जाएँ तो इसका फ़ायदा उन्हें अवश्य होगा। इस कारण चुनाव अप्रैल-मई में ही करा लिए गए। लेकिन एन. डी. ए. का पूर्वानुमान ग़लत साबित हुआ। [[कांग्रेस]] ने यू.पी.ए. के रूप में बहुमत प्राप्त कर लिया। उसके बाद से अटलजी भाजपा के लिए कार्य करते रहे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{शासन क्रम |शीर्षक=[[भारत के प्रधानमंत्री]] |पूर्वाधिकारी=[[इन्द्र कुमार गुजराल]] |उत्तराधिकारी=[[मनमोहन सिंह|डॉ. मनमोहन सिंह]]}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रधानमंत्री}}{{भारत गणराज्य}}{{भारत के प्रधानमंत्री2}}&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के प्रधानमंत्री]]&lt;br /&gt;
[[Category:राजनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
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[[Category:भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारतीय जनता पार्टी]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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	<entry>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-10T10:28:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा खिलाड़ी&lt;br /&gt;
|चित्र=प्रीतम सिवाच.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=प्रीतम सिवाच &lt;br /&gt;
|पूरा नाम=प्रीतम सिवाच &lt;br /&gt;
|जन्म=[[2 अक्टूबर]] [[1974]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= झाड़सा गाँव, गुडगाँव [[हरियाणा]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=भरत सिंह ठाकरान&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=कुलदीप सिवाच &lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|खेल-क्षेत्र=हॉकी &lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[अर्जुन पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:35, 10 नवम्बर  2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''प्रीतम रानी सिवाच''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Pritam Rani Siwach'', जन्म: 2 अक्टूबर, 1974) भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान हैं। [[हरियाणा]] प्रदेश के झाड़सा गाँव (गुडगाँव) में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर [[हॉकी]] की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी कि आज सारे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी माना जाता है।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थामी उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआई ताराचंद थे। जिन्होंने इन्हें हॉकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस [[खेल]] में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|प्रीतम रानी सिवाच]]&lt;br /&gt;
[[ओलंपिक खेल|ओलंपिक खेलों]] के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के लिए प्रीतम ने [[राष्ट्रीय खेल]] हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने [[रंग]] लाना भी शुरू कर दिया। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही है। अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये [[सोनीपत]] के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। खिलाडियों की कुशलता को किस तरह निखारा जाता है उसको ये भली -भांति जानती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
* 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब।&lt;br /&gt;
* 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
* 2002 में मेनचेस्टर [[इंग्लैंड]] में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
* 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
* 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
* [[चीन]] में एशियाई खेल व अर्जेटीना में हुए विश्व कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वर्ष 1998 में इन्हें [[अर्जुन पुरस्कार]] मिलने के बाद काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन पुरस्कार मिला था। पुरस्कार मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज़्बा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने [[राष्ट्रमंडल खेल|राष्ट्रमंडल खेलों]] में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जन्म दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब [[भारत]] का [[तिरंगा]] फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की [[आंख|आंखों]] से अश्रुधारा बह रही थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रसिद्ध खिलाड़ी}} &lt;br /&gt;
[[Category:महिला हॉकी खिलाड़ी]] [[Category:हॉकी]]&lt;br /&gt;
[[Category:अर्जुन पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[अर्जुन अवार्डी ]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
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|नागरिकता=भारतीय {{सूचना बक्सा खिलाड़ी&lt;br /&gt;
|चित्र=Preetam Siwach.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=प्रीतम सिवाच &lt;br /&gt;
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|अविभावक=भरत सिंह ठाकरान&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|13:35, 10 नवम्बर  2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}[[चित्र:प्रीतम सिवाच.jpg|thumb|प्रीतम सिवाच]]&lt;br /&gt;
'''प्रीतम रानी सिवाच''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Pritam Rani Siwach'', जन्म: 2 अक्टूबर, 1974) भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान हैं। [[हरियाणा]] प्रदेश के झाड़सा गाँव (गुडगाँव) में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर [[हॉकी]] की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी कि आज सारे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी माना जाता है।&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय== &lt;br /&gt;
वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थामी उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआई ताराचंद थे। जिन्होंने इन्हें हॉकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हॉकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस [[खेल]] में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
[[ओलंपिक खेल|ओलंपिक खेलों]] के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के लिए प्रीतम ने [[राष्ट्रीय खेल]] हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने [[रंग]] लाना भी शुरू कर दिया। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही है। अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये [[सोनीपत]] के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
==उपलब्धियाँ==&lt;br /&gt;
* 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का खिताब।&lt;br /&gt;
* 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
* 2002 में मेनचेस्टर [[इंग्लैंड]] में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
* 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
* 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
* [[चीन]] में एशियाई खेल व अर्जेटीना में हुए विश्व कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
वर्ष 1998 में इन्हें [[अर्जुन पुरस्कार]] मिलने के बाद काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन पुरस्कार मिला था। पुरस्कार मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज़्बा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने [[राष्ट्रमंडल खेल|राष्ट्रमंडल खेलों]] में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जन्म दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब [[भारत]] का [[तिरंगा]] फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की [[आंख|आंखों]] से अश्रुधारा बह रही थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारत के प्रसिद्ध खिलाड़ी}} &lt;br /&gt;
[[Category:महिला हॉकी खिलाड़ी]] [[Category:हॉकी]]&lt;br /&gt;
[[Category:अर्जुन पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:खेलकूद कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिया घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव (गुडगाँव) में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सारे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही है।&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है. प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड मिलने के बाद इन्हें काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। अवार्ड मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- यदि आप सम्पादन में नये हैं तो कृपया इस संदेश से नीचे सम्पादन कार्य न करें --&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301777"/>
		<updated>2012-11-09T10:25:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* नए खिलाडियों को प्रशिक्षण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;!-- सबसे पहले इस पन्ने को संजोएँ (सेव करें) जिससे आपको यह दिखेगा कि लेख बनकर कैसा लगेगा --&amp;gt;&lt;br /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही है।&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है. प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड मिलने के बाद इन्हें काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। अवार्ड मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301776</id>
		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T10:22:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड मिलने के बाद इन्हें काफी पहचान मिली। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। अवार्ड मिलने से उन्हें और प्रेरणा मिली। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T08:26:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जन्म */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- यदि आप सम्पादन में नये हैं तो कृपया इस संदेश से नीचे सम्पादन कार्य न करें --&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<updated>2012-11-09T08:25:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: Pritam during the Match&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Pritam during the Match&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T08:24:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जन्म */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;!-- सबसे पहले इस पन्ने को संजोएँ (सेव करें) जिससे आपको यह दिखेगा कि लेख बनकर कैसा लगेगा --&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:{{PAGENAME}}|thumb|{{PAGENAME}} लिंक पर क्लिक करके चित्र अपलोड करें]]&lt;br /&gt;
{{पुनरीक्षण}}&amp;lt;!-- कृपया इस साँचे को हटाएँ नहीं (डिलीट न करें)। इसके नीचे से ही सम्पादन कार्य करें। --&amp;gt;&lt;br /&gt;
'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|]][[प्रीतम मैच के दौरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- यदि आप सम्पादन में नये हैं तो कृपया इस संदेश से नीचे सम्पादन कार्य न करें --&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301764</id>
		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T08:23:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जन्म */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam.jpg|thumb|220px|right|[[प्रीतम मैच के दौरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T08:22:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* जन्म */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। [[चित्र:Pritam Thakran.jpg|thumb|220px|right|[[प्रीतम मैच के दौरान]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301762</id>
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		<updated>2012-11-09T08:11:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301761</id>
		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T08:10:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* नए खिलाडियों को प्रशिक्षण */&lt;/p&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने देश के सपने को पूरा करने के लिए ये सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====अर्जुन अवार्ड व अन्य उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवार सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम का कहना है कि उन्हें परिवार को पूरा सहयोग मिला। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। &lt;br /&gt;
=====देश के लिए स्वर्ण पदक=====&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* == */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ हमारे देश में आज से 25 साल पहले लडकिय घर से बहार भी नहीं निकलती थी उस दौर में हरियाणा प्रदेश के झाड़सा गाँव में प्रीतम ठाकरान ने एक किसान परिवार के घर जन्म लेकर होकी की स्टिक पकड़ी और ऐसी पकड़ी की सरे विश्व में उन्हें बेहतरीन खिलाडी मन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि उनकी दिली इच्छा है हॉकी के महिला वर्ग में देश को ओलंपिक पदक मिले। अपने खेल के दौरान उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका तो उन्होंने सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवार सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम का कहना है कि उन्हें परिवार को पूरा सहयोग मिला। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। उम्र पर हावी हुआ जज्बा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। &lt;br /&gt;
स्वर्ण जीतना था अद्भुत क्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301751</id>
		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T07:49:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* शीर्षक उदाहरण 3 */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====नए खिलाडियों को प्रशिक्षण==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले इस सपने को पूरा करने के प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि उनकी दिली इच्छा है हॉकी के महिला वर्ग में देश को ओलंपिक पदक मिले। अपने खेल के दौरान उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका तो उन्होंने सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवार सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम का कहना है कि उन्हें परिवार को पूरा सहयोग मिला। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व भाई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान [[धीरज ठाकरान]] ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। उम्र पर हावी हुआ जज्बा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। &lt;br /&gt;
स्वर्ण जीतना था अद्भुत क्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T07:20:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* == */&lt;/p&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
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====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शीर्षक उदाहरण 3==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले प्रीतम सिवाच ने वर्षो पहले यह सपना देखा था, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। यही वजह है कि अब इस अधूरे ख्वाब को पूरा करने के लिए प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि उनकी दिली इच्छा है हॉकी के महिला वर्ग में देश को ओलंपिक पदक मिले। अपने खेल के दौरान उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका तो उन्होंने सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवार सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम का कहना है कि उन्हें परिवार को पूरा सहयोग मिला। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी धीरज ठाकरान ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। उम्र पर हावी हुआ जज्बा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। &lt;br /&gt;
स्वर्ण जीतना था अद्भुत क्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T07:16:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* शीर्षक उदाहरण 1 */&lt;/p&gt;
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===जन्म=== &lt;br /&gt;
गुड़गांव के झाड़सा गांव में जन्मी प्रीतम सिवाच ने वर्ष 1987 में हॉकी स्टिक को हाथों में थाम था। उस समय वे सातवीं कक्षा की छात्रा थीं। वर्ष 1990 में उन्होंने पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेली, जिसमें उसे बेस्ट खिलाड़ी का खिताब मिला। प्रीतम ने 1992 में जूनियर एशिया कप में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लिया था। उनके पहले प्रशिक्षक व गुरु स्कूल के पीटीआइ ताराचंद थे। जिन्होंने ही उसे हाकी की बारीकियों से अवगत कराया। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने स्वयं भी जरूरतमंद लड़कियों को हाकी का प्रशिक्षण देना शुरू किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शीर्षक उदाहरण 3==== &lt;br /&gt;
ओलंपिक खेलों के महिला वर्ग की हॉकी में देश को पदक मिले प्रीतम सिवाच ने वर्षो पहले यह सपना देखा था, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। यही वजह है कि अब इस अधूरे ख्वाब को पूरा करने के लिए प्रीतम ने राष्ट्रीय खेल हॉकी की नई पौध तैयार करनी शुरू की है। उनकी वर्षो की इस मेहनत ने रंग लाना भी शुरू कर दिया है। आज उनसे प्रशिक्षण पाने वाले खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। प्रीतम को उम्मीद है कि वाले वर्षो में भारतीय टीम में यहा से कई लड़किया शामिल होंगी व देश को ओलंपिक मेडल दिलाने में कामयाबी हासिल करेंगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ साल से दे रही हैं प्रशिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि उनकी दिली इच्छा है हॉकी के महिला वर्ग में देश को ओलंपिक पदक मिले। अपने खेल के दौरान उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका तो उन्होंने सोनीपत के औद्योगिक क्षेत्र में लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षक के तौर पर उन्होंने साल 2004 से काम करना शुरू किया था। नए खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के इस काम में उनके पति पूर्व हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच भी पूरी मदद कर रहे हैं। प्रशिक्षण के काम को चुनौतीपूर्ण रूप में देखने वाली प्रीतम कहती हैं कि एक खिलाड़ी को अपने भीतर खुद जज्बा पैदा करना होता है, लेकिन एक प्रशिक्षक को इस जज्बे के साथ दूसरे खिलाड़ी में खेल भावना को जागृत करनी पड़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=====उपलब्धियां===== &lt;br /&gt;
सरकार करे सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम सिवाच का मानना है कि प्रदेश सरकार को खिलाड़ियों को डीएसपी के बजाय प्रशिक्षक बनाना चाहिए। जिससे वे देश के लिए खिलाड़ी तैयार कर सकें। रेलवे में वरिष्ठ अधीक्षक के पद पर तैनात प्रीतम कहती हैं कि प्रदेश सरकार उन्हें खेल अधिकारी की जिम्मेदारी तो वे उसे सहर्ष स्वीकार करेंगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवार का मिला पूरा सहयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम का कहना है कि उन्हें परिवार को पूरा सहयोग मिला। उनके पिता भरत सिंह ठाकरान व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी धीरज ठाकरान ने पूरा सहयोग दिया। वर्ष 1998 में जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के साथ वैवाहिक बंधन में बंधी तो उनके पति ने भी इस खेल में आगे बढ़ने की पूरी मदद की। अर्जुन अवार्ड से बदला जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम कहती हैं कि वर्ष 1998 में उन्हें अर्जुन अवार्ड के चुना गया। 15 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद किसी महिला खिलाड़ी को अर्जुन अवार्ड मिला था। इसके बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। अवार्ड मिलने से उन्हें महसूस हुआ कि वे खेलों के लिए बहुत कुछ कर सकती है। उम्र पर हावी हुआ जज्बा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर जज्ब हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। प्रीतम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। शादी के बाद वर्ष 2002 में जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में देश के लिए स्वर्ण जीता उस समय वे एक बच्चे की मां बन चुकी थी। इसके बाद वे चोटिल हो गई और इसी बीच उन्होंने एक लड़की को जनम दिया। इसके बाद फिर से स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने वर्ष 2008 में देश को ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कराया, लेकिन उनकी टीम वहां कोई पदक नहीं जीत सकी। &lt;br /&gt;
स्वर्ण जीतना था अद्भुत क्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतम बताती हैं कि वर्ष 2002 में मेनचेस्टर में देश के लिए स्वर्ण जीतना जीवन का अद्भुत क्षण था। राष्ट्रमण्डल खेलों में जब देश का तिरंगा फहराया गया तो उनके साथ ही पूरी टीम की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। देश के लिए पदक जीतने का जज्बा सबसे उत्तम होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपलब्धियां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1992 में पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले जूनियर एशिया कप में बेस्ट प्लेयर का खिताब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 1998 में एशियाड में देश की कप्तानी करते हुए बैंकाक में 15 वर्ष बाद प्रतियोगिता का रजत पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2002 में मेनचेस्टर इंग्लैंड में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2008 के ओलंपिक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हाकी टीम की प्रशिक्षक बनी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चाइना में एशियन गेम व अर्जेटीना में हुए व‌र्ल्ड कप में टीम को प्रशिक्षण दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;!-- कृपया इस संदेश से ऊपर की ओर ही सम्पादन कार्य करें। ऊपर आप अपनी इच्छानुसार शीर्षक और सामग्री डाल सकते हैं --&amp;gt; &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A&amp;diff=301745</id>
		<title>प्रीतम सिवाच</title>
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		<updated>2012-11-09T07:11:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: '&amp;lt;!-- सबसे पहले इस पन्ने को संजोएँ (सेव करें) जिससे आपको य...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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'''आपको नया पन्ना बनाने के लिए यह आधार दिया गया है'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीर्षक उदाहरण 1==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===शीर्षक उदाहरण 2===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====शीर्षक उदाहरण 3====&lt;br /&gt;
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=====शीर्षक उदाहरण 4=====&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2012]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=301684</id>
		<title>आचार्य धर्मेन्द्र</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=301684"/>
		<updated>2012-11-08T10:23:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आचार्य धर्मेन्द्र''' विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है। आचार्य महाराज का पूरा जीवन [[हिंदी]], हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित है। उन्होंने अपने पिता [[महात्मा रामचन्द्र वीर|महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज]] के समान उन्होंने भी अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
आठ वर्ष की आयु से आज तक आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ है। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अदबुध हैं। आचार्य धर्मेन्द्र जी अपनी पैनी भाषण कला और हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते है. वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता एवं हिन्दी कवि भी हैं। &lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
आचार्य श्री का जन्म माघकृषण सप्तमी को [[विक्रम संवत]] 1998 (इस्वी सन 9 जनवरी 1942) को [[गुजरात]] के मालवाडा में हुआ। जबकि मध्य रात्रि के बाद पाश्चात्य मान्यता के अनुसार 10वी तारीख प्रारंभ हो गयी थी। पर हिन्दू कुल श्रेष्ठ आचार्य श्री माघकृषण सप्तमी को ही अपना प्रमाणिक जन्मदिवस मानते है। पिता के आदर्शो और व्यक्तित्व का इनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि इन्होंने 13 साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। गांधीवाद का विरोध करते हुए इन्होंने 16 वर्ष की उम्र में &amp;quot;भारत के दो महात्मा&amp;quot; नामक लेख निकाला। इन्होंने सन 1959 में [[हरिवंश राय बच्चन]] की &amp;quot;मधुशाला&amp;quot; के जवाब में &amp;quot;गोशाला (काव्य)&amp;quot; नामक पुस्तक लिखी। &lt;br /&gt;
===वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा=== &lt;br /&gt;
[[जयपुर]] राज्य के पूर्वोत्तर में ऐतिहासिक तीर्थ [[विराट नगर]] के पार्श्व में पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड नामक छोटे से ग्राम में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण संत, लश्करी संप्रदाय के अनुयायी थे। गृहस्थ होते हुए भी अपने सम्प्रदाय के साधू और जनता द्वारा उन्हें साधू संतो के सामान आदर और सम्मान प्राप्त था। भगवान नरसिंह देव के उपासक इन महात्मा का नाम स्वामी गोपालदास था. गोतम गौड़ ब्राह्मणों के इस परिवार को 'स्वामी' का सम्मानीय संबोधन जो भारत में संतो और साधुओ को ही प्राप्त है, लश्करी संप्रदाय के द्वारा ही प्राप्त हुआ था, क्योंकि कठोर सांप्रदायिक अनुशासन के उस युग में चाहे जो उपाधि धारण कर लेना सरल नहीं था. मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओ पर लगाये गए शमशान कर के विरोध में अपना बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे. जजिया कर की अपमान जनक वसूली और विधर्मी सैनिको के अत्याचारों से क्षुब्ध स्वामी गोपालदास धरम के लिए प्राणोत्सर्ग के संकल्प से प्रेरित होकर दिल्ली जा पहुंचे. उन तेजस्वी संत ने मुग़ल बादशाह के दरबार में किसी प्रकार से प्रवेश पा लिया और आततायी औरंगजेब को हिन्दुओ पर अत्याचार न करने की चेतावनी देते हुए, म्लेछो द्वारा शारीर का स्पर्श करके बंदी बनाये जाने से पूर्व ही, कृपाण से अपना पेट चीर कर देखते - देखते दरबार में ही पाने प्राण विसर्जित कर दिए. [[चित्र: Acharya Shri 12.jpg|thumb|आचार्य धर्मेन्द्र श्री राम कथा करते हुए ]]&lt;br /&gt;
=====गोरक्षा आन्दोलन में अनुपम योगदान=====&lt;br /&gt;
1966 में देश के सभी गोभक्त समुदायों, साधू -संतो और संस्थाओं ने मिलकर विराट सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। महात्मा रामचन्द्र वीर ने 1966 तक अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए।  जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन अनशन किया। आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेत्रत्व श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं। &lt;br /&gt;
कुम्भ मेले के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा और जैन मुनि सुइशील कुमार भी आचार्य श्री के साथ मुलाकात की।  सिंहस्थ कुम्भ पर्व के समापन के पश्चात् उज्जयिनी नगर में १५ दिवस रूककर आचार्य श्री ने नागरिको में गोरक्षा के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण किया. इंदौर में अपने मिशन के परचार करके आचार्य श्री सहस्त्रो हस्ताक्षर युक्त अनुरोध पत्रों तथा अनेक गोभाक्तो के शिष्टमंडल के साथ पवनार आश्रम में परम्संत पूज्य विनोबा भावे जी से मिले. विनोबा जी ने शिष्टमंडल का हार्दिक स्वागत किया. बाबा को दिए व्यक्तिगत पत्र में भी आचार्य श्री ने अनुरोध किया की देश की जनता गोमाता की रक्षा के लिए अब केवल आपकी और देख रही है. अनुरोध की बाबा पर अनुकूल प्रतिक्रिया हुई. कुछ दिनों के पश्चात् खड़गपुर (बंगाल) में अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन आयोजित हुआ. आचार्य धर्मेन्द्र भी उसमे विशेष रूप से आमंत्रतित किये गए. २५०० सर्वोदय कार्यकर्ताओ के बीच उन्होंने गोरक्षा के लिए जो मार्मिक प्रवचन दिया वो एक एतिहासिक दस्तावेज है. कृषि गोसेवा संघ ने उस भाषण को पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया. जुलाई १९८० में पवनार में देशभर के गोभक्त कार्यकर्ताओ का सम्मेलन बुलाया गया. श्री गुलजारी लाल नंदा की उपसिथति उल्लेखनीय थी. पूज्य विनोभा जी की मुक्त अध्यक्षता में केंद्रीय गोरक्षा समन्वय समिति का गठन किया गया जिसके उपाध्यक्ष नंदा जी तथा महामंत्री आचार्य धर्मेन्द्र महाराज चुने गए. विनोबा जी बड़ा कदम उठाने की मानसिकता में आ गए थे. उन्होंने सरकार से मांग की पूर्व सरकार और संसद द्वारा किये गए संकल्प को पूरा करे तथा संपूर्ण गोवंश निषेध के लिए प्रभावकारी कानून बनाये. आचार्य श्री के प्रयत्नों से मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यामंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी सीमा से महाराष्ट्र के हत्याग्रहो को ले जाये जाने वाले गोवंश पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसी समय विनोबा जी ने गोहत्या के विरुद्ध एक बार फिर आमरण अनशन करने का निश्चय कर लिया था किन्तु उनके निकटवर्ती भक्तो ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. १९८१ में श्री कृषण जन्माष्टमी के पर्व पर कृषि गोसेवा संघ के आह्वान पर राजधानी दिल्ली के नगर निगम सभागार में अखिल भारतीय गोरक्षा कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ. जिसके प्रथम अध्यक्ष पद से आचार्य धर्मेन्द्र जी ने गोहत्या निषेध कानून बनाने के लिए सरकार को ६ मास का अल्टीमेटम देने का प्रस्ताव रखा जो सर्वसम्मति से स्वीकार हो गया. १९८२ की वसंत पंचमी से महाशिवरात्रि तक 'सौम्य सत्याग्रह' देश भर में क्रमिक उपवासों के रूप में सफलतापूर्वक अनेक नगरो में संपन्न हुआ. १९८३ में गोहत्या के दुःख को मन में लेकर विनोबा जी ने प्राण त्याग दिए. देह विसर्जित करने से पूर्व उन्होंने कोई भी आहार, पथ्य या औषध लेना बंद कर दिया था.&lt;br /&gt;
=====श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन ===== &lt;br /&gt;
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, १९८३ में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में [[अयोध्या]], [[मथुरा]] और [[काशी]] के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री [[गुलज़ारीलाल नंदा]] भी मंच पर उपस्थित थे। [[चित्र:  Ram Mandeer.jpg|thumb|राम मंदिर का भव्य प्रारूप]] पहली धर्म संसद - अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया। राम जानकी रथ यात्रा - [[विश्व हिन्दू परिषद्]] ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु [[सीतामढ़ी]] से [[दिल्ली]] तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की।  इस आन्दोलन में आचार्य श्री आचार्य धर्मेन्द्र देव के नाम से जाने गए. अपने क्रातिकारी भाषण कुशलता से ये पहले से ही विख्यात थे और इस आन्दोलन में आचार्य श्री, साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती जैसे फायर ब्रांड नेता भारतीय लोगो के आत्म स्वाभिमान से प्रेरित विषय को भारत भूमि के घर - घर तक ले जा रहे थे. श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन और आचार्य श्री एक दुसरे के पूरक है. भारतीय समाज को सबसे ज्यादा झकझोरने वाला कोई आन्दोलन है वो वो राम जन्मभूमि का है. यह सांस्कृतिक चेतना अधूरी ही रहती अगर इसमें आचार्य धर्मेन्द्र का मार्गदर्शन नहीं होता. राम जन्मभूमि आन्दोलन के दोरान इन्होने सारे हिन्दू समाज को जगाकर रख दिया था. &amp;quot;जो राम का नहीं वो हमारे काम का नहीं&amp;quot; प्रशिद्ध नारा परम पूज्य आचार्य जी की ही देन है.भगवान राम के नाम को हिन्दू समाज की ताकत बनाने का काम आचार्य जी ने ही किया. जय श्री राम के नारे में जो शक्ति की अनुभूति होती है वो आचार्य श्री के व्याख्यानों का ही कमाल है. सन १९९४ में इन्होने राम मंदिर बनाने के लिए 18 दिन का अनशन किया था. आचार्य जी की तर्क वितर्क के सामने मिडिया वाले भी अपने सवाल भूल जाते है. ये विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है. श्रीमद भागवत गीता का इन्होने स्वयं हिंदी में लिखा और अपनी मधुर आवाज में गया भी है. इन्होने सन्वत् २०३४ (सन १९७७ ई०) मे वज्रांग विनय स्तोत्र की रचना की। वज्रांग विनय स्तोत्र मशहूर गायक सुदेश भोंसले ने गाया है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>आचार्य धर्मेन्द्र</title>
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		<updated>2012-11-08T10:08:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आचार्य धर्मेन्द्र''' विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है। आचार्य महाराज का पूरा जीवन [[हिंदी]], हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित है। उन्होंने अपने पिता [[महात्मा रामचन्द्र वीर|महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज]] के समान उन्होंने भी अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
आठ वर्ष की आयु से आज तक आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ है। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अदबुध हैं। आचार्य धर्मेन्द्र जी अपनी पैनी भाषण कला और हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते है. वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता एवं हिन्दी कवि भी हैं। &lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
आचार्य श्री का जन्म माघकृषण सप्तमी को [[विक्रम संवत]] 1998 (इस्वी सन 9 जनवरी 1942) को [[गुजरात]] के मालवाडा में हुआ। जबकि मध्य रात्रि के बाद पाश्चात्य मान्यता के अनुसार 10वी तारीख प्रारंभ हो गयी थी। पर हिन्दू कुल श्रेष्ठ आचार्य श्री माघकृषण सप्तमी को ही अपना प्रमाणिक जन्मदिवस मानते है। पिता के आदर्शो और व्यक्तित्व का इनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि इन्होंने 13 साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। गांधीवाद का विरोध करते हुए इन्होंने 16 वर्ष की उम्र में &amp;quot;भारत के दो महात्मा&amp;quot; नामक लेख निकाला। इन्होंने सन 1959 में [[हरिवंश राय बच्चन]] की &amp;quot;मधुशाला&amp;quot; के जवाब में &amp;quot;गोशाला (काव्य)&amp;quot; नामक पुस्तक लिखी। &lt;br /&gt;
===वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा=== &lt;br /&gt;
[[जयपुर]] राज्य के पूर्वोत्तर में ऐतिहासिक तीर्थ [[विराट नगर]] के पार्श्व में पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड नामक छोटे से ग्राम में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण संत, लश्करी संप्रदाय के अनुयायी थे। गृहस्थ होते हुए भी अपने सम्प्रदाय के साधू और जनता द्वारा उन्हें साधू संतो के सामान आदर और सम्मान प्राप्त था। भगवान नरसिंह देव के उपासक इन महात्मा का नाम स्वामी गोपालदास था. गोतम गौड़ ब्राह्मणों के इस परिवार को 'स्वामी' का सम्मानीय संबोधन जो भारत में संतो और साधुओ को ही प्राप्त है, लश्करी संप्रदाय के द्वारा ही प्राप्त हुआ था, क्योंकि कठोर सांप्रदायिक अनुशासन के उस युग में चाहे जो उपाधि धारण कर लेना सरल नहीं था. मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओ पर लगाये गए शमशान कर के विरोध में अपना बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे. जजिया कर की अपमान जनक वसूली और विधर्मी सैनिको के अत्याचारों से क्षुब्ध स्वामी गोपालदास धरम के लिए प्राणोत्सर्ग के संकल्प से प्रेरित होकर दिल्ली जा पहुंचे. उन तेजस्वी संत ने मुग़ल बादशाह के दरबार में किसी प्रकार से प्रवेश पा लिया और आततायी औरंगजेब को हिन्दुओ पर अत्याचार न करने की चेतावनी देते हुए, म्लेछो द्वारा शारीर का स्पर्श करके बंदी बनाये जाने से पूर्व ही, कृपाण से अपना पेट चीर कर देखते - देखते दरबार में ही पाने प्राण विसर्जित कर दिए. [[चित्र: Acharya Shri 12.jpg|thumb|आचार्य धर्मेन्द्र श्री राम कथा करते हुए ]]&lt;br /&gt;
=====गोरक्षा आन्दोलन में अनुपम योगदान=====&lt;br /&gt;
1966 में देश के सभी गोभक्त समुदायों, साधू -संतो और संस्थाओं ने मिलकर विराट सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। महात्मा रामचन्द्र वीर ने 1966 तक अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए।  जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन अनशन किया। आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेत्रत्व श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं। &lt;br /&gt;
कुम्भ मेले के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा और जैन मुनि सुइशील कुमार भी आचार्य श्री के साथ मुलाकात की।  सिंहस्थ कुम्भ पर्व के समापन के पश्चात् उज्जयिनी नगर में १५ दिवस रूककर आचार्य श्री ने नागरिको में गोरक्षा के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण किया. इंदौर में अपने मिशन के परचार करके आचार्य श्री सहस्त्रो हस्ताक्षर युक्त अनुरोध पत्रों तथा अनेक गोभाक्तो के शिष्टमंडल के साथ पवनार आश्रम में परम्संत पूज्य विनोबा भावे जी से मिले. विनोबा जी ने शिष्टमंडल का हार्दिक स्वागत किया. बाबा को दिए व्यक्तिगत पत्र में भी आचार्य श्री ने अनुरोध किया की देश की जनता गोमाता की रक्षा के लिए अब केवल आपकी और देख रही है. अनुरोध की बाबा पर अनुकूल प्रतिक्रिया हुई. कुछ दिनों के पश्चात् खड़गपुर (बंगाल) में अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन आयोजित हुआ. आचार्य धर्मेन्द्र भी उसमे विशेष रूप से आमंत्रतित किये गए. २५०० सर्वोदय कार्यकर्ताओ के बीच उन्होंने गोरक्षा के लिए जो मार्मिक प्रवचन दिया वो एक एतिहासिक दस्तावेज है. कृषि गोसेवा संघ ने उस भाषण को पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया. जुलाई १९८० में पवनार में देशभर के गोभक्त कार्यकर्ताओ का सम्मेलन बुलाया गया. श्री गुलजारी लाल नंदा की उपसिथति उल्लेखनीय थी. पूज्य विनोभा जी की मुक्त अध्यक्षता में केंद्रीय गोरक्षा समन्वय समिति का गठन किया गया जिसके उपाध्यक्ष नंदा जी तथा महामंत्री आचार्य धर्मेन्द्र महाराज चुने गए. विनोबा जी बड़ा कदम उठाने की मानसिकता में आ गए थे. उन्होंने सरकार से मांग की पूर्व सरकार और संसद द्वारा किये गए संकल्प को पूरा करे तथा संपूर्ण गोवंश निषेध के लिए प्रभावकारी कानून बनाये. आचार्य श्री के प्रयत्नों से मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यामंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी सीमा से महाराष्ट्र के हत्याग्रहो को ले जाये जाने वाले गोवंश पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसी समय विनोबा जी ने गोहत्या के विरुद्ध एक बार फिर आमरण अनशन करने का निश्चय कर लिया था किन्तु उनके निकटवर्ती भक्तो ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. १९८१ में श्री कृषण जन्माष्टमी के पर्व पर कृषि गोसेवा संघ के आह्वान पर राजधानी दिल्ली के नगर निगम सभागार में अखिल भारतीय गोरक्षा कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ. जिसके प्रथम अध्यक्ष पद से आचार्य धर्मेन्द्र जी ने गोहत्या निषेध कानून बनाने के लिए सरकार को ६ मास का अल्टीमेटम देने का प्रस्ताव रखा जो सर्वसम्मति से स्वीकार हो गया. १९८२ की वसंत पंचमी से महाशिवरात्रि तक 'सौम्य सत्याग्रह' देश भर में क्रमिक उपवासों के रूप में सफलतापूर्वक अनेक नगरो में संपन्न हुआ. १९८३ में गोहत्या के दुःख को मन में लेकर विनोबा जी ने प्राण त्याग दिए. देह विसर्जित करने से पूर्व उन्होंने कोई भी आहार, पथ्य या औषध लेना बंद कर दिया था.&lt;br /&gt;
=====श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन ===== &lt;br /&gt;
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, १९८३ में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में [[अयोध्या]], [[मथुरा]] और [[काशी]] के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री [[गुलज़ारीलाल नंदा]] भी मंच पर उपस्थित थे। पहली धर्म संसद - अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया। राम जानकी रथ यात्रा - [[विश्व हिन्दू परिषद्]] ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु [[सीतामढ़ी]] से [[दिल्ली]] तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की।  इस आन्दोलन में आचार्य श्री आचार्य धर्मेन्द्र देव के नाम से जाने गए. अपने क्रातिकारी भाषण कुशलता से ये पहले से ही विख्यात थे और इस आन्दोलन में आचार्य श्री, साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती जैसे फायर ब्रांड नेता भारतीय लोगो के आत्म स्वाभिमान से प्रेरित विषय को भारत भूमि के घर - घर तक ले जा रहे थे. श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन और आचार्य श्री एक दुसरे के पूरक है. भारतीय समाज को सबसे ज्यादा झकझोरने वाला कोई आन्दोलन है वो वो राम जन्मभूमि का है. यह सांस्कृतिक चेतना अधूरी ही रहती अगर इसमें आचार्य धर्मेन्द्र का मार्गदर्शन नहीं होता. राम जन्मभूमि आन्दोलन के दोरान इन्होने सारे हिन्दू समाज को जगाकर रख दिया था. &amp;quot;जो राम का नहीं वो हमारे काम का नहीं&amp;quot; प्रशिद्ध नारा परम पूज्य आचार्य जी की ही देन है.भगवान राम के नाम को हिन्दू समाज की ताकत बनाने का काम आचार्य जी ने ही किया. जय श्री राम के नारे में जो शक्ति की अनुभूति होती है वो आचार्य श्री के व्याख्यानों का ही कमाल है. सन १९९४ में इन्होने राम मंदिर बनाने के लिए 18 दिन का अनशन किया था. आचार्य जी की तर्क वितर्क के सामने मिडिया वाले भी अपने सवाल भूल जाते है. ये विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है. श्रीमद भागवत गीता का इन्होने स्वयं हिंदी में लिखा और अपनी मधुर आवाज में गया भी है. इन्होने सन्वत् २०३४ (सन १९७७ ई०) मे वज्रांग विनय स्तोत्र की रचना की। वज्रांग विनय स्तोत्र मशहूर गायक सुदेश भोंसले ने गाया है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>आचार्य धर्मेन्द्र</title>
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		<updated>2012-11-08T10:06:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आचार्य धर्मेन्द्र''' विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है। आचार्य महाराज का पूरा जीवन [[हिंदी]], हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित है। उन्होंने अपने पिता [[महात्मा रामचन्द्र वीर|महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज]] के समान उन्होंने भी अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
आठ वर्ष की आयु से आज तक आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ है। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अदबुध हैं। आचार्य धर्मेन्द्र जी अपनी पैनी भाषण कला और हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते है. वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता एवं हिन्दी कवि भी हैं। &lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
आचार्य श्री का जन्म माघकृषण सप्तमी को [[विक्रम संवत]] 1998 (इस्वी सन 9 जनवरी 1942) को [[गुजरात]] के मालवाडा में हुआ। जबकि मध्य रात्रि के बाद पाश्चात्य मान्यता के अनुसार 10वी तारीख प्रारंभ हो गयी थी। पर हिन्दू कुल श्रेष्ठ आचार्य श्री माघकृषण सप्तमी को ही अपना प्रमाणिक जन्मदिवस मानते है। पिता के आदर्शो और व्यक्तित्व का इनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि इन्होंने 13 साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। गांधीवाद का विरोध करते हुए इन्होंने 16 वर्ष की उम्र में &amp;quot;भारत के दो महात्मा&amp;quot; नामक लेख निकाला। इन्होंने सन 1959 में [[हरिवंश राय बच्चन]] की &amp;quot;मधुशाला&amp;quot; के जवाब में &amp;quot;गोशाला (काव्य)&amp;quot; नामक पुस्तक लिखी। &lt;br /&gt;
===वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा=== &lt;br /&gt;
[[जयपुर]] राज्य के पूर्वोत्तर में ऐतिहासिक तीर्थ [[विराट नगर]] के पार्श्व में पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड नामक छोटे से ग्राम में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण संत, लश्करी संप्रदाय के अनुयायी थे। गृहस्थ होते हुए भी अपने सम्प्रदाय के साधू और जनता द्वारा उन्हें साधू संतो के सामान आदर और सम्मान प्राप्त था। भगवान नरसिंह देव के उपासक इन महात्मा का नाम स्वामी गोपालदास था. गोतम गौड़ ब्राह्मणों के इस परिवार को 'स्वामी' का सम्मानीय संबोधन जो भारत में संतो और साधुओ को ही प्राप्त है, लश्करी संप्रदाय के द्वारा ही प्राप्त हुआ था, क्योंकि कठोर सांप्रदायिक अनुशासन के उस युग में चाहे जो उपाधि धारण कर लेना सरल नहीं था. मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओ पर लगाये गए शमशान कर के विरोध में अपना बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे. जजिया कर की अपमान जनक वसूली और विधर्मी सैनिको के अत्याचारों से क्षुब्ध स्वामी गोपालदास धरम के लिए प्राणोत्सर्ग के संकल्प से प्रेरित होकर दिल्ली जा पहुंचे. उन तेजस्वी संत ने मुग़ल बादशाह के दरबार में किसी प्रकार से प्रवेश पा लिया और आततायी औरंगजेब को हिन्दुओ पर अत्याचार न करने की चेतावनी देते हुए, म्लेछो द्वारा शारीर का स्पर्श करके बंदी बनाये जाने से पूर्व ही, कृपाण से अपना पेट चीर कर देखते - देखते दरबार में ही पाने प्राण विसर्जित कर दिए. [[चित्र: Acharya Shri 12.jpg|thumb|आचार्य धर्मेन्द्र श्री राम कथा करते हुए ]]&lt;br /&gt;
=====गोरक्षा आन्दोलन में अनुपम योगदान=====&lt;br /&gt;
1966 में देश के सभी गोभक्त समुदायों, साधू -संतो और संस्थाओं ने मिलकर विराट सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। महात्मा रामचन्द्र वीर ने 1966 तक अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए।  जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन अनशन किया। आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेत्रत्व श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं। &lt;br /&gt;
कुम्भ मेले के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री गुलजारी लाल नंदा और जैन मुनि सुइशील कुमार भी आचार्य श्री के साथ मुलाकात की।  सिंहस्थ कुम्भ पर्व के समापन के पश्चात् उज्जयिनी नगर में १५ दिवस रूककर आचार्य श्री ने नागरिको में गोरक्षा के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण किया. इंदौर में अपने मिशन के परचार करके आचार्य श्री सहस्त्रो हस्ताक्षर युक्त अनुरोध पत्रों तथा अनेक गोभाक्तो के शिष्टमंडल के साथ पवनार आश्रम में परम्संत पूज्य विनोबा भावे जी से मिले. विनोबा जी ने शिष्टमंडल का हार्दिक स्वागत किया. बाबा को दिए व्यक्तिगत पत्र में भी आचार्य श्री ने अनुरोध किया की देश की जनता गोमाता की रक्षा के लिए अब केवल आपकी और देख रही है. अनुरोध की बाबा पर अनुकूल प्रतिक्रिया हुई. कुछ दिनों के पश्चात् खड़गपुर (बंगाल) में अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन आयोजित हुआ. आचार्य धर्मेन्द्र भी उसमे विशेष रूप से आमंत्रतित किये गए. २५०० सर्वोदय कार्यकर्ताओ के बीच उन्होंने गोरक्षा के लिए जो मार्मिक प्रवचन दिया वो एक एतिहासिक दस्तावेज है. कृषि गोसेवा संघ ने उस भाषण को पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया. जुलाई १९८० में पवनार में देशभर के गोभक्त कार्यकर्ताओ का सम्मेलन बुलाया गया. श्री गुलजारी लाल नंदा की उपसिथति उल्लेखनीय थी. पूज्य विनोभा जी की मुक्त अध्यक्षता में केंद्रीय गोरक्षा समन्वय समिति का गठन किया गया जिसके उपाध्यक्ष नंदा जी तथा महामंत्री आचार्य धर्मेन्द्र महाराज चुने गए. विनोबा जी बड़ा कदम उठाने की मानसिकता में आ गए थे. उन्होंने सरकार से मांग की पूर्व सरकार और संसद द्वारा किये गए संकल्प को पूरा करे तथा संपूर्ण गोवंश निषेध के लिए प्रभावकारी कानून बनाये. आचार्य श्री के प्रयत्नों से मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यामंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी सीमा से महाराष्ट्र के हत्याग्रहो को ले जाये जाने वाले गोवंश पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसी समय विनोबा जी ने गोहत्या के विरुद्ध एक बार फिर आमरण अनशन करने का निश्चय कर लिया था किन्तु उनके निकटवर्ती भक्तो ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. १९८१ में श्री कृषण जन्माष्टमी के पर्व पर कृषि गोसेवा संघ के आह्वान पर राजधानी दिल्ली के नगर निगम सभागार में अखिल भारतीय गोरक्षा कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ. जिसके प्रथम अध्यक्ष पद से आचार्य धर्मेन्द्र जी ने गोहत्या निषेध कानून बनाने के लिए सरकार को ६ मास का अल्टीमेटम देने का प्रस्ताव रखा जो सर्वसम्मति से स्वीकार हो गया. १९८२ की वसंत पंचमी से महाशिवरात्रि तक 'सौम्य सत्याग्रह' देश भर में क्रमिक उपवासों के रूप में सफलतापूर्वक अनेक नगरो में संपन्न हुआ. १९८३ में गोहत्या के दुःख को मन में लेकर विनोबा जी ने प्राण त्याग दिए. देह विसर्जित करने से पूर्व उन्होंने कोई भी आहार, पथ्य या औषध लेना बंद कर दिया था.&lt;br /&gt;
=====श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन ===== &lt;br /&gt;
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, १९८३ में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में [[अयोध्या]], [[मथुरा]] और [[काशी]] के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री [[गुलज़ारीलाल नंदा]] भी मंच पर उपस्थित थे। पहली धर्म संसद - अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया। राम जानकी रथ यात्रा - [[विश्व हिन्दू परिषद्]] ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु [[सीतामढ़ी]] से [[दिल्ली]] तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की। &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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		<title>आचार्य धर्मेन्द्र</title>
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		<updated>2012-11-08T10:02:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sheetalsoni: /* वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''आचार्य धर्मेन्द्र''' विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल है। आचार्य महाराज का पूरा जीवन [[हिंदी]], हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित है। उन्होंने अपने पिता [[महात्मा रामचन्द्र वीर|महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज]] के समान उन्होंने भी अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया है। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
आठ वर्ष की आयु से आज तक आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ है। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अदबुध हैं। आचार्य धर्मेन्द्र जी अपनी पैनी भाषण कला और हाजिर जवाबी के लिए जाने जाते है. वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता एवं हिन्दी कवि भी हैं। &lt;br /&gt;
==जन्म== &lt;br /&gt;
आचार्य श्री का जन्म माघकृषण सप्तमी को [[विक्रम संवत]] 1998 (इस्वी सन 9 जनवरी 1942) को [[गुजरात]] के मालवाडा में हुआ। जबकि मध्य रात्रि के बाद पाश्चात्य मान्यता के अनुसार 10वी तारीख प्रारंभ हो गयी थी। पर हिन्दू कुल श्रेष्ठ आचार्य श्री माघकृषण सप्तमी को ही अपना प्रमाणिक जन्मदिवस मानते है। पिता के आदर्शो और व्यक्तित्व का इनपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि इन्होंने 13 साल की उम्र में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। गांधीवाद का विरोध करते हुए इन्होंने 16 वर्ष की उम्र में &amp;quot;भारत के दो महात्मा&amp;quot; नामक लेख निकाला। इन्होंने सन 1959 में [[हरिवंश राय बच्चन]] की &amp;quot;मधुशाला&amp;quot; के जवाब में &amp;quot;गोशाला (काव्य)&amp;quot; नामक पुस्तक लिखी। &lt;br /&gt;
===वंश परिचय और स्वामी कुल परम्परा=== &lt;br /&gt;
[[जयपुर]] राज्य के पूर्वोत्तर में ऐतिहासिक तीर्थ [[विराट नगर]] के पार्श्व में पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड नामक छोटे से ग्राम में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण संत, लश्करी संप्रदाय के अनुयायी थे। गृहस्थ होते हुए भी अपने सम्प्रदाय के साधू और जनता द्वारा उन्हें साधू संतो के सामान आदर और सम्मान प्राप्त था। भगवान नरसिंह देव के उपासक इन महात्मा का नाम स्वामी गोपालदास था. गोतम गौड़ ब्राह्मणों के इस परिवार को 'स्वामी' का सम्मानीय संबोधन जो भारत में संतो और साधुओ को ही प्राप्त है, लश्करी संप्रदाय के द्वारा ही प्राप्त हुआ था, क्योंकि कठोर सांप्रदायिक अनुशासन के उस युग में चाहे जो उपाधि धारण कर लेना सरल नहीं था. मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओ पर लगाये गए शमशान कर के विरोध में अपना बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे. जजिया कर की अपमान जनक वसूली और विधर्मी सैनिको के अत्याचारों से क्षुब्ध स्वामी गोपालदास धरम के लिए प्राणोत्सर्ग के संकल्प से प्रेरित होकर दिल्ली जा पहुंचे. उन तेजस्वी संत ने मुग़ल बादशाह के दरबार में किसी प्रकार से प्रवेश पा लिया और आततायी औरंगजेब को हिन्दुओ पर अत्याचार न करने की चेतावनी देते हुए, म्लेछो द्वारा शारीर का स्पर्श करके बंदी बनाये जाने से पूर्व ही, कृपाण से अपना पेट चीर कर देखते - देखते दरबार में ही पाने प्राण विसर्जित कर दिए. [[चित्र: Acharya Shri 12.jpg|thumb|आचार्य धर्मेन्द्र श्री राम कथा करते हुए ]]&lt;br /&gt;
=====गोरक्षा आन्दोलन में अनुपम योगदान=====&lt;br /&gt;
1966 में देश के सभी गोभक्त समुदायों, साधू -संतो और संस्थाओं ने मिलकर विराट सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। महात्मा रामचन्द्र वीर ने 1966 तक अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए।  जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन अनशन किया। आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेत्रत्व श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं। &lt;br /&gt;
=====श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन ===== &lt;br /&gt;
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री दाऊ दयाल खन्ना ने मार्च, १९८३ में मुजफ्फरनगर में संपन्न एक हिन्दू सम्मेलन में [[अयोध्या]], [[मथुरा]] और [[काशी]] के स्थलों को फिर से अपने अधिकार में लेने हेतु हिन्दू समाज का प्रखर आह्वान किया। दो बार देश के अंतरिम प्रधानमंत्री रहे श्री [[गुलज़ारीलाल नंदा]] भी मंच पर उपस्थित थे। पहली धर्म संसद - अप्रैल, 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विज्ञान भवन (नई दिल्ली) में आयोजित पहली धर्म संसद ने जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जनजागरण यात्राएं करने का प्रस्ताव पारित किया। राम जानकी रथ यात्रा - [[विश्व हिन्दू परिषद्]] ने अक्तूबर, 1984 में जनजागरण हेतु [[सीतामढ़ी]] से [[दिल्ली]] तक राम-जानकी रथ यात्रा शुरू की। &lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
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[[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Sheetalsoni</name></author>
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