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	<title>अपि - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-06-11T07:37:50Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''अपि''' (अव्य.) [कई बार भागुरि के मतानुसार 'अ' का लोप-वष्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2023-10-11T07:14:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अपि&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (अव्य.) [कई बार भागुरि के मतानुसार &amp;#039;अ&amp;#039; का लोप-वष्...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''अपि''' (अव्य.) [कई बार भागुरि के मतानुसार 'अ' का लोप-वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्ग-पिधा, पिधानम् आदि) &lt;br /&gt;
:1. ([[संज्ञा]] और धातुओं के साथ प्रयुक्त होकर) निकट या ऊपर रखना, की ओर ले जाना, तक पहुँचाना, सामीप्य सन्निकटता आदि। &lt;br /&gt;
:2. (पृथक् क्रि. वि. या संधी अव्य. के रूप में) और, भी, एवम्, पुनश्च, इसके अलावा, इसके अतिरिक्त-अपनी ओर से अपनी बारी आने पर-; '''अपि अपि, अपि च''' भी, और भी,-अपि स्तुहि, अपि सिंच-सिद्धा. '''न नापि न चैव, न वापि, नापि वा, न चापि''' न-न, &lt;br /&gt;
:3. 'भी' 'अति' 'बहुत' शब्दों के अर्थ पर बल देने के लिए भी बहुधा इसका प्रयोग होता है, अद्यापि-आज भी, अब भी, यद्यपि अगर्चे, चाहे, तथापि-तो भी, कई बार केवल 'तथापि शब्द के प्रयोग से ही 'यद्यपि' का अध्याहार कर लिया जाता है। &lt;br /&gt;
:4. अगर्चे (भी, चाहे)-चाहे ऊपर 'ढका हुआ; चाहे वल्कल वस्त्र में &lt;br /&gt;
:5. (वाक्य) के आरम्भ में प्रयुक्त होकर 'प्रश्न सूचक') &lt;br /&gt;
:6. आशा, प्रत्याशा (आयः विधिलिङ् के साथ) 2 मुझे आशा है कि [[ब्राह्मण]] बालक जी उठेगा। विशे. इस अर्थ में 'अपि' बहुधा 'नाम' के साथ जुड़ कर निम्नांकित भाव प्रकट करता है- &lt;br /&gt;
::::(क) संभावना 'शक्यता' &lt;br /&gt;
::::(ख) शायद, संभवतः &lt;br /&gt;
::::(ग) 'क्या ही अच्छा हो यदि', 'मेरी आंतरिक इच्छा या आशा है, तदपि, शायद, सम्भवतः -क्या ही अच्छा होता यदि मैं पुरूरवा होता। &lt;br /&gt;
:7. (प्रश्नवाचक शब्दों के साथ जुड़ कर 'अनिश्चितता' के अर्थ को बतलाता है) कोई, कुछ, '''कोपि'''-कोई, '''किमपि'''-कुछ, '''कुत्रापि'''-कहीं; इस शब्द को 'अज्ञात' 'अवर्णनीय' 'अनभिधेय' अर्थ में भी प्रयुक्त किया जाता है।&lt;br /&gt;
:8. (संख्यावाचक शब्दों के पश्चात् प्रयुक्त होने पर 'कास्य' और 'समस्तता' का अर्थ होता है)-चारों वर्णों का।&lt;br /&gt;
:9. (यह शब्द कभी-कभी 'संदेह', 'अनिश्चितता' और 'शंक भी प्रकट करता है)-अपि चौरो भवेत्-गण शायद वहाँ चोर है। &lt;br /&gt;
:10. (विधिलिङ् के साथ 'संभावना' अर्थ होता है)-अपि स्तुयाद्विष्णुम्।&lt;br /&gt;
:11. घृणा, निन्दा-अपि जायां त्यजसि जातु गणिकामाधत्से गर्हितमेतत्-सिद्धा., लज्जा की बात है, धिक्कार हैं-धिग्जाल्मं देवदत्तमपि सिंचेत्पलांडुम्।&lt;br /&gt;
:12. लोट् लकार के साथ प्रयुक्त होकर 'वक्ता की उदासीनता' प्रकट करता है और दूसरे को यथारुचि कार्य करने देता है-अपि स्तुहि-सिद्धा. (आप चाहें तो) स्तुति करें,-अपि स्तुह्यपि सेधास्मांस्तथ्यमुक्तं नराशन-भट्टि. 8/82 &lt;br /&gt;
:13. कभी विस्मयादि द्योतक अव्यय के रूप में भी प्रयुक्त होता है। &lt;br /&gt;
:14. 'इसलिए', 'फलतः' (अतएव) के अर्थ में कभी-कभी ही प्रयुक्त होता है। &lt;br /&gt;
:15. सब के साथ प्रयुक्त होकर 'अध्याहार' के भाव को प्रकट करता है-उदा.-सर्पिषोऽपि स्यात्,-यहाँ (बिन्दुरपि-जरा सा, एक बूंद) जैसा कोई शब्द अध्याहृत किया जाता है, संभवतः 'एक बूँद घी' अभिप्रेत है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ|पुस्तक का नाम=संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश|लेखक=वामन शिवराम आप्टे|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=कमल प्रकाशन, [[नई दिल्ली]]-110002|संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=70|url=|ISBN=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश (संकेताक्षर सूची)|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश (संकेत सूची)|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:संस्कृत हिन्दी शब्दकोश]][[Category:संस्कृत शब्दकोश]][[Category:भाषा कोश]][[Category:शब्द संदर्भ कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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