<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE</id>
	<title>अमरीकी भाषा - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;action=history"/>
	<updated>2026-06-28T07:26:52Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=629717&amp;oldid=prev</id>
		<title>यशी चौधरी 30 मई 2018 को 12:19 बजे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=629717&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2018-05-30T12:19:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;12:19, 30 मई 2018 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l3&quot;&gt;पंक्ति 3:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 3:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;तुलनात्मक व्याकरण के और बहुधा अन्य व्योरेवार ग्रंथों के अभाव मे इन भाषाओं के विषय में विशेष विवरण नहीं दिया जा सकता। इनमें क्लिक और महाप्राण ध्वनियाँ मिलती हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इन मूल निवासियों की जातियाँ इधर-उधर आती जाती और एक दूसरे पर आधिपत्य जमाती रही हैं, इसीलिए भाषा संबंधी सामान्य लक्षणों के साथ विशेषताओं और अपवादों का बड़ा भारी मिश्रण मिलता है। कभी कभी कोई कोई बोली इतनी अधिक प्रभावशाली रही कि उसने विजित जातियों की बोलियों को बिलकुल नष्ट ही कर दिया। कोलंबस के आगमन के पहले दक्षिणी अमरीका में इंका नाम के साम्राज्य की राजभाषा कुइचुआ थी। स्पेनी विजेताओं ने इसी का प्रयोग मूल निवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रचार के निमित किया। इसी प्रकार विस्तृत क्षेत्र में होने के कारण, गुअर्नी तुपी का भी प्रयोग ईसाई पादरियों ने धर्मप्रचार के लिए किया। करीब और अरोवक भाषाएँ भी पारस्परिक जय-पराजय से प्रभावित हैं। अरोवक जाति पर करीब जाति ने विजय प्राप्त कर ली और उसके पुरूष वर्ग को या तो बीन बीनकर मार डाला या दूर भगा दिया । स्त्रियों को रख लिया। ये बराबर अरोवक ही बोलती रहीं। बाद की पीढ़ियाँ भी इसी प्रकार दोनों भाषाएँ आज तक बोलती चली आ रहीं हैं। और पुरुष वर्ग की करीब भाषा पर स्त्री वर्ग की अरोवक भाषा का प्रभाव पड़ता दिखाई देता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;तुलनात्मक व्याकरण के और बहुधा अन्य व्योरेवार ग्रंथों के अभाव मे इन भाषाओं के विषय में विशेष विवरण नहीं दिया जा सकता। इनमें क्लिक और महाप्राण ध्वनियाँ मिलती हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इन मूल निवासियों की जातियाँ इधर-उधर आती जाती और एक दूसरे पर आधिपत्य जमाती रही हैं, इसीलिए भाषा संबंधी सामान्य लक्षणों के साथ विशेषताओं और अपवादों का बड़ा भारी मिश्रण मिलता है। कभी कभी कोई कोई बोली इतनी अधिक प्रभावशाली रही कि उसने विजित जातियों की बोलियों को बिलकुल नष्ट ही कर दिया। कोलंबस के आगमन के पहले दक्षिणी अमरीका में इंका नाम के साम्राज्य की राजभाषा कुइचुआ थी। स्पेनी विजेताओं ने इसी का प्रयोग मूल निवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रचार के निमित किया। इसी प्रकार विस्तृत क्षेत्र में होने के कारण, गुअर्नी तुपी का भी प्रयोग ईसाई पादरियों ने धर्मप्रचार के लिए किया। करीब और अरोवक भाषाएँ भी पारस्परिक जय-पराजय से प्रभावित हैं। अरोवक जाति पर करीब जाति ने विजय प्राप्त कर ली और उसके पुरूष वर्ग को या तो बीन बीनकर मार डाला या दूर भगा दिया । स्त्रियों को रख लिया। ये बराबर अरोवक ही बोलती रहीं। बाद की पीढ़ियाँ भी इसी प्रकार दोनों भाषाएँ आज तक बोलती चली आ रहीं हैं। और पुरुष वर्ग की करीब भाषा पर स्त्री वर्ग की अरोवक भाषा का प्रभाव पड़ता दिखाई देता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;यद्यपि इन भाषाओं के बारे में अभी विशेष अनुसंधान नहीं हो पाया है, तब भी मोटे तौर पर इनको कई परिवारों में बाँटा जा सकता है। अनुमान है कि इन परिवारों की संख्या सौ सवा सौ के लगभग है। प्राय: इन सभी भाषाओं में एक सामान्य लक्षण प्रश्लिष्ट योगात्मक के रूप में पाया जाता है। इनमें बहुधा पूरा-पूरा वाक्य ही एक लंबे शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह संस्कृति की तरह विभिन्न पदों को जोड़कर समास के रूप में नही होता, बल्कि प्रत्येक पद का एक-एक प्रधान अक्षर या ध्वनि लेकर सबको एक साथ मिला दिया जता है। चेरोकी भाषा के पद नधोलिनिन (हमारे लिए डोंगी लाओ) में इसी प्रकार तीन शब्द नतेन (लाओ), अमोरतोल (नाव, डोंगी), और निन (हमको) मिले हुए हैं। कभी-कभी इस प्रकार के एक दर्जन शब्दों तक के ध्वनि या वर्णसंकलन एक पद के रूप में संगठित मिलते हैं और उन सभी शब्दों का पदार्थ एक साथ वाक्यार्थ के रूप में श्रोता को मालूम हो जाता है। स्वतंत्र शब्दों का प्रयोग इन भाषाओं में बहुत कम है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=194 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;यद्यपि इन भाषाओं के बारे में अभी विशेष अनुसंधान नहीं हो पाया है, तब भी मोटे तौर पर इनको कई परिवारों में बाँटा जा सकता है। अनुमान है कि इन परिवारों की संख्या सौ सवा सौ के लगभग है। प्राय: इन सभी भाषाओं में एक सामान्य लक्षण प्रश्लिष्ट योगात्मक के रूप में पाया जाता है। इनमें बहुधा पूरा-पूरा वाक्य ही एक लंबे शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह संस्कृति की तरह विभिन्न पदों को जोड़कर समास के रूप में नही होता, बल्कि प्रत्येक पद का एक-एक प्रधान अक्षर या ध्वनि लेकर सबको एक साथ मिला दिया जता है। चेरोकी भाषा के पद नधोलिनिन (हमारे लिए डोंगी लाओ) में इसी प्रकार तीन शब्द नतेन (लाओ), अमोरतोल (नाव, डोंगी), और निन (हमको) मिले हुए हैं। कभी-कभी इस प्रकार के एक दर्जन शब्दों तक के ध्वनि या वर्णसंकलन एक पद के रूप में संगठित मिलते हैं और उन सभी शब्दों का पदार्थ एक साथ वाक्यार्थ के रूप में श्रोता को मालूम हो जाता है। स्वतंत्र शब्दों का प्रयोग इन भाषाओं में बहुत कम है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=194&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;-95 &lt;/ins&gt;|url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;ये सभी जातियाँ जंगली नहीं हैं। इन जातियों में से कुछ ने साम्राज्य स्थापित किए। मेक्सिको के साम्राज्य का अंत १६वीं सदी में यूरोपवालों ने वहाँ पहुँचकर किया। वहाँ की मय और नहुअत्ल भाषाएँ सुसंस्कृत हैं और उनमें साहित्य भी मिलता है। इन भाषाओं का वर्गीकरण प्राय: भौगोलिक आधार पर किया जाता है जो शास्त्रीय भले न हो, सुविधाजनक अवश्य है:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;ये सभी जातियाँ जंगली नहीं हैं। इन जातियों में से कुछ ने साम्राज्य स्थापित किए। मेक्सिको के साम्राज्य का अंत १६वीं सदी में यूरोपवालों ने वहाँ पहुँचकर किया। वहाँ की मय और नहुअत्ल भाषाएँ सुसंस्कृत हैं और उनमें साहित्य भी मिलता है। इन भाषाओं का वर्गीकरण प्राय: भौगोलिक आधार पर किया जाता है जो शास्त्रीय भले न हो, सुविधाजनक अवश्य है:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>यशी चौधरी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=629710&amp;oldid=prev</id>
		<title>यशी चौधरी: ''''अमरीकी भाषाएँ''' - इनके अंतर्गत अमरीका महाद्वीप के...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=629710&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2018-05-30T12:01:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अमरीकी भाषाएँ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; - इनके अंतर्गत अमरीका महाद्वीप के...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''अमरीकी भाषाएँ''' - इनके अंतर्गत अमरीका महाद्वीप के सभी (उत्तरी, दक्षिणी और मध्य) भागों के मूल निवासियों द्वारा बोली जानेवाली भाषाएँ आती हैं। ईसवी 15वीं सदी के अंत में यूरोप से एक जहाज भारतवर्ष की खोज करता हुआ, भ्रम से चक्कर खाकर अमरीका पहुँच गया और तभी से यहाँ के मूल निवासियों का नाम 'इंडियन' पड़ गया। अनुमान है कि कोलंबस के समय अमरीका के समस्त मूल निवासियों की संख्या चार पाँच करोड़ रही होगी, जो अब घटते घटते डेढ़ करोड़ रह गई है। इन लोगों में लिखने का कोई रिवाज नहीं था। विशेष घटनाओं की याद, रंग बिंरगी रस्सियों में गाँठें बाँधकर रखी जाती थी। पत्थरों, घोंघों तथा चमड़े आदि पर भी भाँति-भाँति के चित्र और निशान भी है तो उसे मूल निवासी बताते नहीं। तथापि नहुअत्ल और मय भाषाओं में अब लिपि मिलती है। मय भाषा की पुस्तकों में साथ ही साथ स्पेनी भाषा में अनुवाद भी मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुलनात्मक व्याकरण के और बहुधा अन्य व्योरेवार ग्रंथों के अभाव मे इन भाषाओं के विषय में विशेष विवरण नहीं दिया जा सकता। इनमें क्लिक और महाप्राण ध्वनियाँ मिलती हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इन मूल निवासियों की जातियाँ इधर-उधर आती जाती और एक दूसरे पर आधिपत्य जमाती रही हैं, इसीलिए भाषा संबंधी सामान्य लक्षणों के साथ विशेषताओं और अपवादों का बड़ा भारी मिश्रण मिलता है। कभी कभी कोई कोई बोली इतनी अधिक प्रभावशाली रही कि उसने विजित जातियों की बोलियों को बिलकुल नष्ट ही कर दिया। कोलंबस के आगमन के पहले दक्षिणी अमरीका में इंका नाम के साम्राज्य की राजभाषा कुइचुआ थी। स्पेनी विजेताओं ने इसी का प्रयोग मूल निवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रचार के निमित किया। इसी प्रकार विस्तृत क्षेत्र में होने के कारण, गुअर्नी तुपी का भी प्रयोग ईसाई पादरियों ने धर्मप्रचार के लिए किया। करीब और अरोवक भाषाएँ भी पारस्परिक जय-पराजय से प्रभावित हैं। अरोवक जाति पर करीब जाति ने विजय प्राप्त कर ली और उसके पुरूष वर्ग को या तो बीन बीनकर मार डाला या दूर भगा दिया । स्त्रियों को रख लिया। ये बराबर अरोवक ही बोलती रहीं। बाद की पीढ़ियाँ भी इसी प्रकार दोनों भाषाएँ आज तक बोलती चली आ रहीं हैं। और पुरुष वर्ग की करीब भाषा पर स्त्री वर्ग की अरोवक भाषा का प्रभाव पड़ता दिखाई देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि इन भाषाओं के बारे में अभी विशेष अनुसंधान नहीं हो पाया है, तब भी मोटे तौर पर इनको कई परिवारों में बाँटा जा सकता है। अनुमान है कि इन परिवारों की संख्या सौ सवा सौ के लगभग है। प्राय: इन सभी भाषाओं में एक सामान्य लक्षण प्रश्लिष्ट योगात्मक के रूप में पाया जाता है। इनमें बहुधा पूरा-पूरा वाक्य ही एक लंबे शब्द द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह संस्कृति की तरह विभिन्न पदों को जोड़कर समास के रूप में नही होता, बल्कि प्रत्येक पद का एक-एक प्रधान अक्षर या ध्वनि लेकर सबको एक साथ मिला दिया जता है। चेरोकी भाषा के पद नधोलिनिन (हमारे लिए डोंगी लाओ) में इसी प्रकार तीन शब्द नतेन (लाओ), अमोरतोल (नाव, डोंगी), और निन (हमको) मिले हुए हैं। कभी-कभी इस प्रकार के एक दर्जन शब्दों तक के ध्वनि या वर्णसंकलन एक पद के रूप में संगठित मिलते हैं और उन सभी शब्दों का पदार्थ एक साथ वाक्यार्थ के रूप में श्रोता को मालूम हो जाता है। स्वतंत्र शब्दों का प्रयोग इन भाषाओं में बहुत कम है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=194 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सभी जातियाँ जंगली नहीं हैं। इन जातियों में से कुछ ने साम्राज्य स्थापित किए। मेक्सिको के साम्राज्य का अंत १६वीं सदी में यूरोपवालों ने वहाँ पहुँचकर किया। वहाँ की मय और नहुअत्ल भाषाएँ सुसंस्कृत हैं और उनमें साहित्य भी मिलता है। इन भाषाओं का वर्गीकरण प्राय: भौगोलिक आधार पर किया जाता है जो शास्त्रीय भले न हो, सुविधाजनक अवश्य है:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
देशनाम भाषानाम&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ग्रीनलैंड एस्किमो&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
उत्तरी अमरीका कनाडा अथबक्सी (समूह)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
संयुक्त राज्य अल्गोनकी (आदि)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
नहुअत्ल (प्राचीन)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेक्सिको अज्ऱतेक (वर्तमान)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
युकतन समय&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
उत्तरी प्रदेश करीब, अरोवक&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
मध्य प्रदेश गुअर्नी तुपी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
दक्षिणी अमेरिका पश्चिमी प्रदेश अरौकन, कुइचुआ&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(पेरू और चिली)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
दक्षिणी प्रदेश चको, तियरादेलफूगो&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
दक्षिणी प्रदेश पेरू और चिली की भाषा चको, तियरादेलफूगी हैं। इनमें से तियरादेलफूगो भाषा और उसके बोलनेवाले लोग संसार में सबसे अधिक संस्कृतहीन माने जाते हैं। एस्किमो के बारे में कुछ विद्वानों का मत है कि यह उराल-अल्ताई परिवार की है।&amp;lt;ref&amp;gt;सं.ग्रं.-बाबूराम सक्सेना : सामान्य भाषाविज्ञान; मेइए : ले लांग दु मांद (पेरिस)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा कोश]][[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यशी चौधरी</name></author>
	</entry>
</feed>