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	<title>अर्थ: - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद 8 नवम्बर 2023 को 09:28 बजे</title>
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2. एक अलंकार (कुछ साहित्यशास्त्रियों के अनुसार) जिसमें एक संबद्ध उक्ति से ऐसे अनुमान का सुझाव मिलता है जो प्रस्तुत विषय से कोई संबंध नहीं रखता- या इसके ठीक विपरीत है; यह कैमुतिकन्याय या दण्डापूपन्याय से मिलता जुलता है; उदा.-हारोऽयं हरिणाक्षीणां लुठति स्तनमण्डले, मुक्तानामप्यवस्थेयं के वयं स्मरकिंङ्कराः । अमरु. 100, अभितप्तमयोऽपि मार्दवं भजते कैव कथा शरीरिषु-रघु. 8/43,'''-उत्पत्तिः''' ('''अर्थोत्पत्तिः''') स्त्रीलिंग धन प्राप्ति, &amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ|पुस्तक का नाम=संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश|लेखक=वामन शिवराम आप्टे|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=कमल प्रकाशन, [[नई दिल्ली]]-110002|संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=104-105|url=|ISBN=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम.'''-अधिकारः''' ('''अर्थाधिकार''') ([[पुल्लिंग]]) रुपये-पैसे का कार्यभार, कोषाध्यक्ष का पद, नियोक्तव्या हि. 2.'''-अधिकारिन्''' (पु.) कोषाध्यक्ष, अन्तरम् (नपुं.) 1. अन्य अभिप्राय या भिन्न अर्थ 2. दूसरा कारण या प्रयोजन-अर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एवं कु. 3/18 3. एक नई बात या परिस्थिति, नया मामला 4. विरोधी या विपरीत अर्थ, अर्थ में भेद, एन्यासः एक [[अलंकार]] जिसमें सामान्य से विशेष विशेष से सामान्य का समर्थन होता है, यह एक प्रकार का विशेष से सामान्य अनुमान है अथवा इसके विपरीत-उक्तिरथन्तिरन्यासः स्यात सामान्यविशेषयोः । (1) हनूमानब्धिमतरद् दुष्करं किं महात्मनाम्। (2) गुणवद्वस्तुसंसर्गाद्याति नीचोऽपि गौरवम्, पुष्पमालानुषङ्गेण सूत्रं शिरसि धार्यते ।। कुवल., तु. काव्य. 10 और सा. द. 709,'''-अन्वित''' ('''अर्थान्वित''') [[विशेषण]] 1. धनवान्, दौलतमंद 2. सार्थक,'''-आर्थिन्''' ('''अर्थार्थिन''') विशेषण जो अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिए या धन प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता है,'''-अलंकारः''' ('''अर्थालंकार''') (पुल्लिंग) साहित्यशास्त्र में वह [[अलंकार]] जो या तो अर्थ पर निर्भर हो, या जिसका निर्णय अर्थ से किया जाए, शब्द से नहीं (विप. शब्दालंकार),'''-आगमः''' ('''अर्थागम्''') (पुल्लिंग) 1. धन की प्राप्ति, आय 2. किसी शब्द के अभिप्राय को बतलाना,'''-आपत्तिः''' ('''अर्थापत्ति''') [[स्त्रीलिंग]] 1. परिस्थितियों के आधार पर अनुमान लगाना, अनुमानित वस्तु, फलितार्थ, ज्ञान के पाँच साधनों में से एक अथवा (मीमांसकों के अनुसार) पाँच प्रमाणों में से एक, प्रतीयमान असंगति का समाधान करने के लिए यह एक प्रकार का अनुमान है, इसका प्रसिद्ध उदाहरण है:-पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते, यहाँ देवदत्त के 'मोटेपन' और 'दिन में न खाने' की असंगति के समाधान 'वह रात्रि को अवश्य खाता होगा' अनुमान से किया जाता है; 2. एक अलंकार (कुछ साहित्यशास्त्रियों के अनुसार) जिसमें एक संबद्ध उक्ति से ऐसे अनुमान का सुझाव मिलता है जो प्रस्तुत विषय से कोई संबंध नहीं रखता- या इसके ठीक विपरीत है; यह कैमुतिकन्याय या दण्डापूपन्याय से मिलता जुलता है; उदा.-हारोऽयं हरिणाक्षीणां लुठति स्तनमण्डले, मुक्तानामप्यवस्थेयं के वयं स्मरकिंङ्कराः । अमरु. 100, अभितप्तमयोऽपि मार्दवं भजते कैव कथा शरीरिषु-रघु. 8/43,'''-उत्पत्तिः''' ('''अर्थोत्पत्तिः''') स्त्रीलिंग धन प्राप्ति, &amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ|पुस्तक का नाम=संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश|लेखक=वामन शिवराम आप्टे|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=कमल प्रकाशन, [[नई दिल्ली]]-110002|संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=104-105|url=|ISBN=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;'''-तत्त्वम्''' (नपुं.) 1. वास्तविक सच्चाई, यथार्थता, 2. किसी वस्तु की वास्तविक प्रकृति या कारण,'''-द''' (विशेषण) 1. धन देने वाला, 2. लाभ दायक, उपयोगी 3. उदार, '''-दूषणम्''' (नपुं.) 1. अतिव्यय, अपव्यय 2. अन्यायपूर्वक किसी की संपत्ति ले लेना, या किसी का उचित पावना न देना,'''-दोषः''' (पुल्लिंग) (अर्थ की दृष्टि से) साहित्यिक त्रुटि या दोष, साहित्य-रचना के चार दोषों में से एक-दूसरे तीन हैं-पद दोष, पदांश दोष और वाक्य दोष, इनकी परिभाषाओं के लिए दे. काव्य. 7,'''-निबंधन''' (विशेषण) घन के ऊपर आश्रित, '''-निश्चयः''' निर्धारण, निर्णय,'''-पतिः''' (पुल्लिंग) 1. 'धन का स्वामी',  राजा,-किंचिद्विहस्यार्थपतिंबभाषे-रघु. 1/59, 2/46, 9/3, 18/1, पंच. 1/74, 2. [[कुबेर]] की उपाधि, पर, '''-लुब्ध''' (विशेषण) 1. धन प्राप्त करने पर जुटा हुआ, लालची 2. कंजूस, '''-प्रकृतिः''' (स्त्रीलिंग) [[नाटक]] के महान् उद्देश्य का प्रमुख साधन या अवसर, (इन साधनों की संख्या पाँच हैं,-बीजं बिन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च, अर्थप्रकृतयः पञ्च ज्ञात्वा योज्या यथाविधि-सा. द. 317) '''-प्रयोगः''' (पुल्लिंग) ब्याजखोरी,'''-बंध:''' (पुल्लिंग) शब्दों का यथाक्रम रखना, रचना, पाठ, श्लोक, चरण-श. 7/5 ललितार्थबंधम् विक्रम. 2/14,'''-बुद्धि''' (विशेषण) स्वार्थी,'''-बोधः''' (पुल्लिंग) वास्तविक आशय का संकेत, '''-भेदः''' (पुल्लिंग) अर्थों में भेद-अर्थभेदेन शब्दभेदः, मात्रम्, (नपुं.)'''–त्रा''' (स्त्रीलिंग) सम्पत्ति, धन-दौलत, '''-युक्त''' (विशेषण) सार्थक, '''-लाभः''' धन की प्राप्ति, '''-लोभः''' (पुल्लिंग) लालच,&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-side-deleted&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;'''-वादः''' (पुल्लिंग) 1. किसी उद्देश्य की घोषणा, 2. निश्चयात्मक घोषणा, घोषणाविषयक प्रकथन, व्याख्यापरक टिप्पणी किसी आशय की उक्ति या कथन, वाक्य (इसमें का उचित अनुष्ठान के करने से उत्पन्न फलों वर्णन करते हुए किसी विधि की अनुशंसा की जाती है, साथ ही अपने पक्ष के समर्थन में ऐतिहासिक निर्देशन देकर यह बतलाया जाता है कि इसका उचित अनुष्ठान न करने से अनिष्ट फल मिलता है) 3. प्रशंसा, स्तुति; -अर्थवाद एषः, दोषं तु मे कंचित्कथय-उत्तर. 1, -विकल्पः 1. सचाई से इधर-उधर होना, तथ्यों का तोड़-मरोड़ 2. अपलाप वैकल्प्यम् भी, '''-वृद्धिः''' ([[स्त्रीलिंग]]) धन-संचय,'''-व्ययः''' (पुल्लिंग) धन का खर्च करना, '''°ज्ञ''' (विशेषण) रुपये-पैसे की बातों का जानकार'''-शास्त्रम्''' (नपुं.) 1. धन-विज्ञान (सार्वजनिक अर्थशास्त्र) 2. राजनीति-विज्ञान, राजनीति विषयक शास्त्र, राजनय-द. 120, इह खलु अर्थशास्त्रकारास्त्रि-विधां सिद्धिमुपवर्णयति -मुद्रा. 3. °व्यवहारिन् राजनीतिज्ञ, 3. व्यावहारिक जीवन का शास्त्र,'''-शौचम्''' रुपये-पैसे के मामले में ईमानदारी या खरापन-सर्वेषां चैव शौचानामर्थ-शौचं परं स्मृतम्-मनु. 5/106,'''-संस्थानम्''' (नपुं.) 1. धन का संचय 2. कोष, '''-संबंधः''' (पुल्लिंग) वाक्य या शब्द से अर्थ का संबंध, '''-सारः''' बहुत धन-पंच. 2/42, '''-सिद्धिः''' (स्त्रीलिंग) अभीष्ट सिद्धि, सफलता।&lt;/ins&gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;

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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''अर्थः''' (पुल्लिंग) [ऋ+थन्]  :1. आशय, प्रयोजन, लक्ष्य, उद...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अर्थः&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (&lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97&quot; title=&quot;पुल्लिंग&quot;&gt;पुल्लिंग&lt;/a&gt;) [ऋ+थन्]  :1. आशय, प्रयोजन, लक्ष्य, उद...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''अर्थः''' ([[पुल्लिंग]]) [ऋ+थन्] &lt;br /&gt;
:1. आशय, प्रयोजन, लक्ष्य, उद्देश्य, अभिलाप, इच्छा, [[समास]] के उत्तर पद के रूप में प्रायः इसी अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा निम्नांकित अर्थों में अनूदित किया जाता है:- 'के लिए' 'के निमित्त' 'की खातिर' 'के कारण' 'के बदले में'; संज्ञाओं को विशेषित करने के लिए विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त होता है-सन्तानार्थाय विधये-रघु. 1/34 तां देवता-पित्रतिथिक्रियार्था (धेनुम्) 2/16, द्विजार्था यवागूः सिद्धा., यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र-भग. 3/9; क्रिया विशेषण के रूप में भी यह इसी अर्थ में प्रयुक्त होता है, यथा'''-अर्थम्''', '''अर्थे''' या '''अर्थाय'''; '''किमर्थम्'''- किस प्रयोजन के लिए, वेलोपलक्षणार्थम्-श. 4, तदर्शनादभूच्छम्भोर्भूयान्दारार्थमादरः-कु. 6/13 गवार्थे ब्राह्मणार्थे च-पंच. 1/420, मदर्थे त्यक्तजीविताः-भग. 1/9, प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः-नल. 13/19, ऋतुपर्णस्य चार्याय-23/9; &lt;br /&gt;
:2. कारण, प्रयोजन, हेतु, साधन-अलुप्तश्च मुनेः क्रियार्थः-रघु. 2/55, साधन या हेतु &lt;br /&gt;
:3. अभिप्राय, तात्पर्य, सार्थकता, आशय-अर्थ तीन प्रकार का है:-वाच्य (अभिव्यक्त), लक्ष्य (संकेतित या गौण) और व्यंग्य (ध्वनित)-तददोषी शब्दार्थों-काव्य. 1, अर्थो वाच्यश्च लक्ष्यश्च व्यङ्ग्यचेति विधानतः-सा. द. 2&lt;br /&gt;
:4. वस्तु, विषय, [[पदार्थ]], सारांश-अर्थो हि कन्या परकीय एवं जो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जाना जा सके, ज्ञानेन्द्रिय की वस्तु '''इंद्रिय°''' हि. 1/146, कु. 7/71 इन्द्रियेभ्यः पराहा अप मनः-कठ. (ज्ञानेन्द्रियों के विषय पाँच हैं- रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द) &lt;br /&gt;
:5. &lt;br /&gt;
::(क) मामला, व्यापार, बात, कार्य, प्राक प्रतिपन्नोऽय-मर्याऽडुगराजाय-वेणी, 3, अर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एवं कु. 9/18, अर्थोऽयनुबन्धी-दश, 67, सङ्गीतार्थ: मेघ, 56, गायन-व्यापार अर्थात् समवेत गान (गायनोपकरण), सन्देशार्था:-मेघ. 5, संदेश की बातें अर्थात् संदेश &lt;br /&gt;
::(ख) हित, इच्छा (स्वार्थसाधनतत्परः-[[मनुस्मृति]] 4/196, द्वयमेवार्थ-साधनम्-रघु. 1/19, दुरापेऽर्थे 1/72, सर्वार्थ-चिन्तक: मनुस्मृति 7/121, मालविकायां न ये कश्चिदर्थ-मालवि&lt;br /&gt;
::(ग) विषय-सामग्री, विषय-सूची-त्वामवगतार्थं करिष्यति-मुद्रा. (मैं आपको विषय-सामग्री से परिचित कराऊँगा), तेन हि अस्य गृहीतार्था भवामि-विक्रम. 2, (यदि ऐसी बात है तो मुझे इस विषय की जानकारी होनी चाहिए)&lt;br /&gt;
:6. दौलत, धन, सम्पत्ति, रुपया-त्यागाय संभृतार्थानाम्-रघु. 1/7, धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः-पंच. 1/163&lt;br /&gt;
:7. धन या सांसारिक ऐश्वर्य को प्राप्त करना, जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक-अन्य तीन हैं:- धर्म, काम और [[मोक्ष]]; अर्थ, काम और धर्म मिलाकर प्रसिद्ध त्रिक बनता है, तु. कु. 5/38,-अप्यर्थकामी तस्यास्तां धर्म एव मनीषिणः-रघु. 1/25&lt;br /&gt;
:8. &lt;br /&gt;
::(क) उपयोग, हित, लाभ, भलाई, तथा हि सर्वे तस्यासन् परार्थैकफला गुणाः-रघु. 1/29, यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके-भग. 2/46, दे. व्यर्थ और निरर्थक भी &lt;br /&gt;
::(ख) उपयोग, आवश्यकता, जरूरत, प्रयोजन-करण. के साथ:- कोऽर्थः पुत्रेण जातेन-पंच. 1 (उस पुत्र के पैदा होने से क्या लाभ?) कश्च तेनार्थ:-दश. 59, कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः-पंच. 2/33, क्रूर व्यक्ति गुणों की क्या परवाह करते हैं? भर्तृ. 2/48;-योग्येनार्थः कस्य न स्याज्जनेन-शि. 18/66, नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन-भग. 3/18&lt;br /&gt;
:9. मांगना, याचना, प्रार्थना, दावा, याचिका &lt;br /&gt;
:10. कार्यवाही, अभियोग (विधि.) &lt;br /&gt;
:11. वस्तुस्थिति, याथार्थ्य, जैसा कि यथार्थ, और अर्थतः में-°तत्त्वविद् &lt;br /&gt;
:12. रीति, प्रकार, तरीका &lt;br /&gt;
:13. रोक, दूर रखना-मशकार्थो धूमः, प्रतिषेध, उन्मूलन &lt;br /&gt;
:14. [[विष्णु]] &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम.'''-अधिकारः''' ('''अर्थाधिकार''') ([[पुल्लिंग]]) रुपये-पैसे का कार्यभार, कोषाध्यक्ष का पद, नियोक्तव्या हि. 2.'''-अधिकारिन्''' (पु.) कोषाध्यक्ष, अन्तरम् (नपुं.) 1. अन्य अभिप्राय या भिन्न अर्थ 2. दूसरा कारण या प्रयोजन-अर्थोऽयमर्थान्तरभाव्य एवं कु. 3/18 3. एक नई बात या परिस्थिति, नया मामला 4. विरोधी या विपरीत अर्थ, अर्थ में भेद, एन्यासः एक [[अलंकार]] जिसमें सामान्य से विशेष विशेष से सामान्य का समर्थन होता है, यह एक प्रकार का विशेष से सामान्य अनुमान है अथवा इसके विपरीत-उक्तिरथन्तिरन्यासः स्यात सामान्यविशेषयोः । (1) हनूमानब्धिमतरद् दुष्करं किं महात्मनाम्। (2) गुणवद्वस्तुसंसर्गाद्याति नीचोऽपि गौरवम्, पुष्पमालानुषङ्गेण सूत्रं शिरसि धार्यते ।। कुवल., तु. काव्य. 10 और सा. द. 709,'''-अन्वित''' ('''अर्थान्वित''') [[विशेषण]] 1. धनवान्, दौलतमंद 2. सार्थक,'''-आर्थिन्''' ('''अर्थार्थिन''') विशेषण जो अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिए या धन प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता है,'''-अलंकारः''' ('''अर्थालंकार''') (पुल्लिंग) साहित्यशास्त्र में वह [[अलंकार]] जो या तो अर्थ पर निर्भर हो, या जिसका निर्णय अर्थ से किया जाए, शब्द से नहीं (विप. शब्दालंकार),'''-आगमः''' ('''अर्थागम्''') (पुल्लिंग) 1. धन की प्राप्ति, आय 2. किसी शब्द के अभिप्राय को बतलाना,'''-आपत्तिः''' ('''अर्थापत्ति''') [[स्त्रीलिंग]] 1. परिस्थितियों के आधार पर अनुमान लगाना, अनुमानित वस्तु, फलितार्थ, ज्ञान के पाँच साधनों में से एक अथवा (मीमांसकों के अनुसार) पाँच प्रमाणों में से एक, प्रतीयमान असंगति का समाधान करने के लिए यह एक प्रकार का अनुमान है, इसका प्रसिद्ध उदाहरण है:-पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते, यहाँ देवदत्त के 'मोटेपन' और 'दिन में न खाने' की असंगति के समाधान 'वह रात्रि को अवश्य खाता होगा' अनुमान से किया जाता है; 2. एक अलंकार (कुछ साहित्यशास्त्रियों के अनुसार) जिसमें एक संबद्ध उक्ति से ऐसे अनुमान का सुझाव मिलता है जो प्रस्तुत विषय से कोई संबंध नहीं रखता- या इसके ठीक विपरीत है; यह कैमुतिकन्याय या दण्डापूपन्याय से मिलता जुलता है; उदा.-हारोऽयं हरिणाक्षीणां लुठति स्तनमण्डले, मुक्तानामप्यवस्थेयं के वयं स्मरकिंङ्कराः । अमरु. 100, अभितप्तमयोऽपि मार्दवं भजते कैव कथा शरीरिषु-रघु. 8/43,'''-उत्पत्तिः''' ('''अर्थोत्पत्तिः''') स्त्रीलिंग धन प्राप्ति, &amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ|पुस्तक का नाम=संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश|लेखक=वामन शिवराम आप्टे|अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=कमल प्रकाशन, [[नई दिल्ली]]-110002|संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=104-105|url=|ISBN=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{seealso|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश (संकेताक्षर सूची)|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश (संकेत सूची)|संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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