<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC</id>
	<title>असीरगढ़ - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;action=history"/>
	<updated>2026-06-12T17:34:37Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=654997&amp;oldid=prev</id>
		<title>आदित्य चौधरी: Text replacement - &quot;आंखे&quot; to &quot;आँखें&quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=654997&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2021-02-04T05:23:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replacement - &amp;quot;आंखे&amp;quot; to &amp;quot;आँखें&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;05:23, 4 फ़रवरी 2021 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l24&quot;&gt;पंक्ति 24:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 24:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;आंखें &lt;/del&gt;तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान् सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;आँखेंं &lt;/ins&gt;तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान् सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-1.jpg|thumb|550px|center|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-1.jpg|thumb|550px|center|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख प्रगति&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख प्रगति&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>आदित्य चौधरी</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=598649&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot; महान &quot; to &quot; महान् &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=598649&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2017-06-30T14:15:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replacement - &amp;quot; महान &amp;quot; to &amp;quot; महान् &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;14:15, 30 जून 2017 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l24&quot;&gt;पंक्ति 24:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 24:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;महान &lt;/del&gt;सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;महान् &lt;/ins&gt;सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-1.jpg|thumb|550px|center|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-1.jpg|thumb|550px|center|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख प्रगति&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख प्रगति&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=595467&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;पश्चात &quot; to &quot;पश्चात् &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=595467&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2017-06-23T07:43:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replacement - &amp;quot;पश्चात &amp;quot; to &amp;quot;पश्चात् &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;07:43, 23 जून 2017 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l2&quot;&gt;पंक्ति 2:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 2:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;असीरगढ़ क़िला [[बुरहानपुर]] से लगभग 20 किमी. की दूरी पर उत्तर दिशा में [[सतपुड़ा पर्वतश्रेणी|सतपुड़ा पहाड़ियों]] के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फ़ुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह क़िला आज भी अपने वैभवशाली अतीत की गुणगाथा का गान मुक्त कंठ से कर रहा है। इसकी तत्कालीन अपराजेयता स्वयं सिद्ध होती है। इसकी गणना विश्व विख्यात उन गिने चुने क़िलों में होती है, जो दुर्भेद और अजेय, माने जाते थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;असीरगढ़ क़िला [[बुरहानपुर]] से लगभग 20 किमी. की दूरी पर उत्तर दिशा में [[सतपुड़ा पर्वतश्रेणी|सतपुड़ा पहाड़ियों]] के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फ़ुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह क़िला आज भी अपने वैभवशाली अतीत की गुणगाथा का गान मुक्त कंठ से कर रहा है। इसकी तत्कालीन अपराजेयता स्वयं सिद्ध होती है। इसकी गणना विश्व विख्यात उन गिने चुने क़िलों में होती है, जो दुर्भेद और अजेय, माने जाते थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==इतिहास==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==इतिहास==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इतिहासकारों ने इसका 'बाब-ए-दक्खन' (दक्षिण द्वार) और 'कलोद-ए-दक्खन' (दक्षिण की कुँजी) के नाम से उल्लेख किया है, क्योंकि इस क़िले पर विजय प्राप्त करने के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात &lt;/del&gt;दक्षिण का द्वार खुल जाता था, और विजेता का सम्पूर्ण [[ख़ानदेश]] क्षेत्र पर अधिपत्य स्थापित हो जाता था। इस क़िले की स्थापना कब और किसने की यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार स्पष्ट एवं सही राय रखने में विवश रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस क़िले का [[महाभारत]] के वीर योद्धा गुरु [[द्रोणाचार्य]] के पुत्र [[अश्वत्थामा]] की अमरत्व की गाथा से संबंधित करते हुए उनकी [[पूजा]] स्थली बताते हैं। बुरहानपुर के 'गुप्तेश्वर  महादेव मंदिर' के समीप से एक सुंदर सुरंग है, जो असीरगढ़ तक लंबी है। ऐसा कहा जाता है कि, पर्वों के दिन अश्वत्थामा [[ताप्ती नदी]] में स्नान करने आते हैं, और बाद में 'गुप्तेश्वर' की पूजा कर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.burhanpurlive.com/old/Asirgarh.php |title=असीरगढ |accessmonthday=16 जून |accessyear= 2011|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इतिहासकारों ने इसका 'बाब-ए-दक्खन' (दक्षिण द्वार) और 'कलोद-ए-दक्खन' (दक्षिण की कुँजी) के नाम से उल्लेख किया है, क्योंकि इस क़िले पर विजय प्राप्त करने के &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात् &lt;/ins&gt;दक्षिण का द्वार खुल जाता था, और विजेता का सम्पूर्ण [[ख़ानदेश]] क्षेत्र पर अधिपत्य स्थापित हो जाता था। इस क़िले की स्थापना कब और किसने की यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार स्पष्ट एवं सही राय रखने में विवश रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस क़िले का [[महाभारत]] के वीर योद्धा गुरु [[द्रोणाचार्य]] के पुत्र [[अश्वत्थामा]] की अमरत्व की गाथा से संबंधित करते हुए उनकी [[पूजा]] स्थली बताते हैं। बुरहानपुर के 'गुप्तेश्वर  महादेव मंदिर' के समीप से एक सुंदर सुरंग है, जो असीरगढ़ तक लंबी है। ऐसा कहा जाता है कि, पर्वों के दिन अश्वत्थामा [[ताप्ती नदी]] में स्नान करने आते हैं, और बाद में 'गुप्तेश्वर' की पूजा कर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.burhanpurlive.com/old/Asirgarh.php |title=असीरगढ |accessmonthday=16 जून |accessyear= 2011|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====क़िले का नामकरण====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====क़िले का नामकरण====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;कुछ इतिहासकार इसे [[रामायण]] काल का बताते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार 'मोहम्मद कासिम' के कथनानुसार इसका 'आशा अहीर' नामक एक व्यक्ति ने निर्माण कराया था। आशा अहीर के पास हज़ारों की संख्या में पशु थे। उनकी सुरक्षा हेतु ऐसे ही सुरक्षित स्थान की आवश्यकता थी। कहते हैं, वह इस स्थान पर आठवीं शताब्दी में आया था। इस समय यहाँ हज़रत नोमान चिश्ती नाम के एक तेजस्वी सूफ़ी संत निवास करते थे। आशा अहीर उनके पास आदरपूर्वक उपस्थित हुआ और निवेदन किया कि उसके व परिवार की सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें, ताकि वह क़िले पर अपने परिवार सहित रह सके। इस तरह वह हज़रत नोमान की आज्ञा एवं आशीर्वाद पाकर, इस स्थान पर ईट मिट्टी, चूना और पत्थरों की दीवार बनाकर रहने लगा। इस तरह आशा अहीर के नाम से यह क़िला असीरगढ़ नाम से प्रसिद्ध हो गया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;कुछ इतिहासकार इसे [[रामायण]] काल का बताते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार 'मोहम्मद कासिम' के कथनानुसार इसका 'आशा अहीर' नामक एक व्यक्ति ने निर्माण कराया था। आशा अहीर के पास हज़ारों की संख्या में पशु थे। उनकी सुरक्षा हेतु ऐसे ही सुरक्षित स्थान की आवश्यकता थी। कहते हैं, वह इस स्थान पर आठवीं शताब्दी में आया था। इस समय यहाँ हज़रत नोमान चिश्ती नाम के एक तेजस्वी सूफ़ी संत निवास करते थे। आशा अहीर उनके पास आदरपूर्वक उपस्थित हुआ और निवेदन किया कि उसके व परिवार की सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें, ताकि वह क़िले पर अपने परिवार सहित रह सके। इस तरह वह हज़रत नोमान की आज्ञा एवं आशीर्वाद पाकर, इस स्थान पर ईट मिट्टी, चूना और पत्थरों की दीवार बनाकर रहने लगा। इस तरह आशा अहीर के नाम से यह क़िला असीरगढ़ नाम से प्रसिद्ध हो गया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l12&quot;&gt;पंक्ति 12:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 12:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==अकबर की कूटनीतिक चाल==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==अकबर की कूटनीतिक चाल==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;तत्पश्चात &lt;/del&gt;बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की फ़ौज क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;तत्पश्चात् &lt;/ins&gt;बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की फ़ौज क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात &lt;/del&gt;[[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&quot;। अकबर के शासनकाल के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात &lt;/del&gt;यह क़िला सन् 1760 ई. से सन् 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात &lt;/del&gt;यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन् 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात् &lt;/ins&gt;[[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&quot;। अकबर के शासनकाल के &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात् &lt;/ins&gt;यह क़िला सन् 1760 ई. से सन् 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात् &lt;/ins&gt;यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन् 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-3.jpg|thumb|250px|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-3.jpg|thumb|250px|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=312843&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot; साफ &quot; to &quot; साफ़ &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=312843&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2013-01-29T14:10:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot; साफ &amp;quot; to &amp;quot; साफ़ &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;14:10, 29 जनवरी 2013 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l19&quot;&gt;पंक्ति 19:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 19:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो स्रोत दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो स्रोत दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;साफ &lt;/del&gt;दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से नमाज़ पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;साफ़ &lt;/ins&gt;दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से नमाज़ पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Mughal-Topi-Asirgarh-Fort.jpg|thumb|250px|left|मुग़ल टोपी, असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Mughal-Topi-Asirgarh-Fort.jpg|thumb|250px|left|मुग़ल टोपी, असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====अश्वत्थामा से सम्बन्ध====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====अश्वत्थामा से सम्बन्ध====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=268787&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;फौज&quot; to &quot;फ़ौज&quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=268787&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2012-04-09T13:05:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;फौज&amp;quot; to &amp;quot;फ़ौज&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;13:05, 9 अप्रैल 2012 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l12&quot;&gt;पंक्ति 12:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 12:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==अकबर की कूटनीतिक चाल==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==अकबर की कूटनीतिक चाल==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और तत्पश्चात बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;फौज &lt;/del&gt;क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और तत्पश्चात बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;फ़ौज &lt;/ins&gt;क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &amp;quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&amp;quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला सन् 1760 ई. से सन् 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन् 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &amp;quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&amp;quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला सन् 1760 ई. से सन् 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन् 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=260068&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot; सन &quot; to &quot; सन् &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=260068&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2012-03-06T14:01:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot; सन &amp;quot; to &amp;quot; सन् &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;14:01, 6 मार्च 2012 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l14&quot;&gt;पंक्ति 14:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 14:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और तत्पश्चात बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &amp;quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&amp;quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &amp;quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&amp;quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की फौज क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;सम्राट [[अकबर]] असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और तत्पश्चात बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा &amp;quot;यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया&amp;quot; है। इस पर अकबर ने कहा कि &amp;quot;राजनीति में सब कुछ जायज है।&amp;quot; फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का [[सोना]], [[चाँदी]], [[हीरा|हीरे]], [[मोती|मोतियों]] से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की फौज क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर [[मुग़ल]] शासन का ध्वज फहराने लगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====फ़रिश्ता का कथन====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन &lt;/del&gt;1760 ई. से &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन &lt;/del&gt;1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन &lt;/del&gt;1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन् &lt;/ins&gt;1760 ई. से &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन् &lt;/ins&gt;1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;सन् &lt;/ins&gt;1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-3.jpg|thumb|250px|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;[[चित्र:Asirgarh-Fort-3.jpg|thumb|250px|असीरगढ़ क़िला]]&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=257135&amp;oldid=prev</id>
		<title>फ़ौज़िया ख़ान 29 फ़रवरी 2012 को 10:56 बजे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=257135&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2012-02-29T10:56:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&lt;/p&gt;
&lt;a href=&quot;https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;amp;diff=257135&amp;amp;oldid=222610&quot;&gt;बदलाव दिखाएँ&lt;/a&gt;</summary>
		<author><name>फ़ौज़िया ख़ान</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=222610&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;पुरातत्व&quot; to &quot;पुरातत्त्व&quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=222610&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2011-10-03T06:41:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;पुरातत्व&amp;quot; to &amp;quot;पुरातत्त्व&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;06:41, 3 अक्टूबर 2011 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l21&quot;&gt;पंक्ति 21:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 21:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==स्थापत्य एवं प्रसिद्धि==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पुरातत्व &lt;/del&gt;विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल [[अंगूर]] की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर [[शिव]] का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। [[कनिष्क]] के भी इस ओर आने के उल्लेख [[इतिहास]] में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी [[मुग़ल]] कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पुरातत्त्व &lt;/ins&gt;विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{प्रचार}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{प्रचार}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=190025&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;नमाज &quot; to &quot;नमाज़ &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=190025&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2011-07-28T10:25:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;नमाज &amp;quot; to &amp;quot;नमाज़ &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;10:25, 28 जुलाई 2011 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l17&quot;&gt;पंक्ति 17:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 17:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो स्रोत दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो स्रोत दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें साफ दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;नमाज &lt;/del&gt;पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें साफ दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;नमाज़ &lt;/ins&gt;पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====अश्वत्थामा से सम्बन्ध====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====अश्वत्थामा से सम्बन्ध====&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उत्तरी कोने की मेहराब में [[बुरहानपुर]] की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह [[संस्कृत]] का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट [[अकबर]] ने एक शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर [[लोहा|लोहे]] का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर [[महाभारत]] कालीन [[अश्वत्थामा]] का [[पूजा]] स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;mcc&amp;quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=183127&amp;oldid=prev</id>
		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;स्त्रोत&quot; to &quot;स्रोत&quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC&amp;diff=183127&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2011-07-12T13:23:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;स्त्रोत&amp;quot; to &amp;quot;स्रोत&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;13:23, 12 जुलाई 2011 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l15&quot;&gt;पंक्ति 15:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति 15:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &amp;quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&amp;quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला सन 1760 ई. से सन 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को [[ग्वालियर]] के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और [[बुरहानपुर]] पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात [[फ़ारूक़ी वंश]] का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार [[फ़रिश्ता]] लिखता है कि, &amp;quot;अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था&amp;quot;। अकबर के शासनकाल के पश्चात यह क़िला सन 1760 ई. से सन 1819 ई. तक [[मराठा|मराठों]] के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात यह क़िला [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] के आधिपत्य में आ गया। सन 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;==भूगोलीय संरचना==&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;स्त्रोत &lt;/del&gt;दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र [[रंग]] को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;स्रोत &lt;/ins&gt;दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।&amp;lt;ref name=&quot;mcc&quot;/&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;====भीतरी जटिल संरचना====  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें साफ दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से नमाज पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस दरवाज़े के सामने एक [[काला रंग|काली]] चट्टान है, जिस पर [[अकबर]], [[शहज़ादा दानियाल|दानियाल]], [[औरंगज़ेब]] और [[शाहजहाँ]] के चार शिलालेख [[फ़ारसी भाषा]] में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें साफ दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से नमाज पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर [[अरबी भाषा]] का एक शिलालेख है, जिसमें [[फ़ारूक़ी वंश]] के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
	</entry>
</feed>