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	<title>परजीवी कीट - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>गोविन्द राम: '{{कीट विषय सूची}} {{कीट संक्षिप्त परिचय}} परजीवी वे की...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2018-01-13T14:14:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{कीट विषय सूची}} {{कीट संक्षिप्त परिचय}} परजीवी वे की...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{कीट विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{कीट संक्षिप्त परिचय}}&lt;br /&gt;
परजीवी वे [[कीट]] हैं, जो अन्य जीवों पर निर्वाह तो करते हैं, किंतु उनका वध किए बिना ही उनसे भोजन प्राप्त करते हैं और प्राय: एक ही पोषक पर निर्भर रहते हैं। ये अपने अंडे प्राय: अपने पोषक के शरीर पर देते हैं। परजीवी कीट दो प्रकार के होते हैं-&lt;br /&gt;
एक जो कशेरुक दंडियों पर और दूसरे जो अन्य कीटों तथा उनके संबंधियों पर जीवित रहते हैं। प्रथम वर्ग के कीट ऐनोप्ल्यूरा&amp;lt;ref&amp;gt;Anopleura&amp;lt;/ref&amp;gt;, मैलोफैगा&amp;lt;ref&amp;gt;Mallophaga&amp;lt;/ref&amp;gt; और साइफोनैप्टरा&amp;lt;ref&amp;gt;Siphonaptera&amp;lt;/ref&amp;gt; गणों तथा हिप्पोबोसाइडी&amp;lt;ref&amp;gt;Hippoboscidae&amp;lt;/ref&amp;gt; वंश के अंतर्गत आते हैं। ये परजीवी अपने पोषक की तुलना में बहुत छोटे होते हैं। पोषक में इनको सहने करने की शक्ति विकसित हो जाती है और इस कारण इनका प्रभाव प्राण नाशक नहीं होता है। इनमें से अधिकतर बाह्य परजीवी हैं और पोषक के शरीर पर रहते हैं। साइफोनैप्टरा के अतिरिक्त अन्य का शरीर ऊपर नीचे से चौरस होता है और ये पोषक के शरीर से चिपके रहते हैं। इनके पैरों पर पोषक को पकड़े रहने के लिए हुक होते हैं तथा नेत्र क्षीण या लुप्त हो जाते हैं। पक्षों का भी प्राय: अभाव रहता है और यदि वे होते भी है तो बहुत छोटे होते हैं। कीटों के परजीवी इने गिने ही हैं। स्ट्रेप्सिप्टस गण के अतिरिक्त मधुमक्खी की जूँ, ब्रेउला&amp;lt;ref&amp;gt;Braula&amp;lt;/ref&amp;gt; ही केवल इनका अन्य उदाहरण है।&lt;br /&gt;
====अर्ध परजीवी====&lt;br /&gt;
अर्ध परजीवी&amp;lt;ref&amp;gt;पैरासिटॉइड-Parasitoide&amp;lt;/ref&amp;gt; का व्यवहार अपाहारी और परजीवी के मध्य का सा होता है। आरंभ में यह परजीवी की तरह रहता है, अर्थात् पोषक की अति आवश्यक इंद्रियों को नष्ट नहीं करता, किंतु बाद में इसका व्यवहार अपाहारी जैसा हो जाता है और यह अपने पोषक का भक्षण कर जाता है। यह प्राय: अपने अंडे पोषक के शरीर के ऊपर या भीतर रखता है। इसके डिंभ पोषक से स्थायी रूप से चिपके रहते है और अपना भोजन पोषक के शरीर के भीतर या बाहर से प्राप्त करते हैं। अधिकतर ये कीट द्विपक्ष वंश की टैकिनाइडी&amp;lt;ref&amp;gt;Tachyniade&amp;lt;/ref&amp;gt; और कला पक्ष के पैरासाइटिका&amp;lt;ref&amp;gt;Parasitica&amp;lt;/ref&amp;gt; वर्ग में ही पाए जाते हैं। इनके प्रौढ़ क्रियाशील होते हैं और पराश्रयी नहीं होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्धपरजीवी का आकार पोषक के आकार की तुलना में बड़ा होता है और यह अपने व्यवहार से पोषक को प्राय: सदा ही नष्ट कर देता है। पोषक अधिकतर अन्य कीट ही होते हैं, जिनके अंडों या अन्य अप्रौढ़ अवस्थाओं पर अर्ध परजीवी का आक्रमण होता है। प्रौढ़ कीट पर कभी भी आक्रमण नहीं होता है। टैकिनाइडी वंश के कीट पोषक के भीतर रहते हैं, किंतु अंडे पोषक के ऊपर, या पोषक से दूर, रखते हैं। बहुत से पराश्रयी कला पक्ष बाह्य पराश्रितों की भाँति रहते हैं, किंतु अधिकतर आंतरिक पराश्रयी हैं और अपने अंडे पोषक की त्वचा के भीतर प्रविष्ट कर देते हैं। अर्ध परजीवियों में सबसे अधिक महत्व की बात इनके श्वसन तंत्र में पाई जाती है, विशेष करके आंतरिक अर्ध परजीवियों में, जो अपने पोषक के रक्त में मिली हुई ऑक्सीजन का श्वसन करते हैं। किंतु कुछ आंतरिक अर्ध परजीवी ऐसे भी हैं। जो सीधे वायुमंडल से आक्सीजन प्राप्त करते हैं। &lt;br /&gt;
==इन्क्विलाइन ==&lt;br /&gt;
कुछ कीट दूसरे कीटों का तो भक्षण नहीं करते हैं, किंतु उनकी एकत्र की हुई सामग्री को खा जाते हैं। ऐसे कीट &amp;lt;ref&amp;gt;इन्क्विलाइन-Inquiline&amp;lt;/ref&amp;gt; कहलाते हैं। ये कीट सामाजिक कीटों के घोसलों में बहुतायत से पाए जाते हैं। &lt;br /&gt;
उदाहरण :- इनका बहुत प्रसिद्ध उदाहरण मोम का शलभ हैं, जो मधुमक्खी के छत्तों में रहता है और छत्तें को नष्ट कर देता है। &lt;br /&gt;
वोलुसिला&amp;lt;ref&amp;gt;Volucella&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक चक्कर खाने वाली मक्खी भिन-भिनाने वाली मक्खियों और बर्रों के छत्तों में रहकर उच्छिष्ट कार्बनिक मक्खी पदार्थों को खाती हैं। ऐटेल्युरा&amp;lt;ref&amp;gt;Atelura&amp;lt;/ref&amp;gt; नामक कीट चीटियों के विवरों में रहता है और जब एक चींटी दूसरी चींटी को अपना उलटी किया हुआ भोजन देने लगती है तो उसको पी लेता है। कुछ ऐसे भी कीट हैं जो अपने पोषकों को, उनके साथ रहने के बदले में, लाभ पहँचाते हैं। कुछ कंचुक पक्ष चीटियों के विवरों में आश्रय और भोजन पाते हैं और इसके बदले में अपने शरीर से स्राव निकाल कर देते हैं, जिसको पाने के लिए ये चीटियाँ बहुत लालायित रहती हैं। इस संबंध की अंतिम श्रेणी यह हैं कि चीटियाँ स्राव के बदले में अतिथि कंचुक पक्ष को वस्तुत: भोजन देती हैं। परस्पर लाभ पहुँचाने का यह एक सुंदर उदाहरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{कीट विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{जीव जन्तु}}&lt;br /&gt;
[[Category:कीट]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीव विज्ञान]][[Category:प्राणि विज्ञान]][[Category:प्राणि विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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