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	<title>भूक्षरण - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;बर्फ &quot; to &quot;बर्फ़ &quot;</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''भूक्षरण''' प्राकृतिक कारणों से पृथ्वी-पृष्ठ के कुछ अ...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''भूक्षरण''' प्राकृतिक कारणों से पृथ्वी-पृष्ठ के कुछ अंशों के स्थानांतरण को कहते हैं। इसका मुख्य कारण [[ताप]] का परिवर्तन, वायु, [[जल]] तथा हिम आदि हैं। समुद्रतट पर लहरों और ज्वार-भाटा की क्रिया के कारण [[पृथ्वी ग्रह|पृथ्वी]] के भाग टूटकर [[समुद्र]] में विलीन होते जाते हैं। [[मिट्टी]] तथा कोमल चट्टानों का भी इन क्रियाओं से धीरे-धीरे अपक्षय होता रहता है। [[वर्षा]] और तुषार भी इस क्रिया में सहायक होते हैं।&lt;br /&gt;
==मिट्टी का कटाव==&lt;br /&gt;
वर्षा के जल में घुली हुई [[गैस|गैसों]] की रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप कड़ी चट्टानों का अपक्षय होता है। ऐसा जल भूमि में घुसकर अधिक विलेय पदार्थों के कुछ अंश को भी घुला लेता है और इस प्रकार अलग हुए [[पदार्थ|पदार्थों]] को बहा ले जाता है। वर्षा, पिघली हुई ठोस बर्फ और तुषार निरंतर भूमि का क्षरण करते हैं। इस प्रकार टूटे हुए अंश नालों या छोटी नदियों से बड़ी नदियों में और इनसे समुद्र में पहुँचते रहते हैं। नदियों का अथवा अन्य बहता हुआ जल किनारों तथा जल की भूमि को काटकर, मिट्टी को ऊँचे स्थानों से नीचे की ओर बहा ले जाता है। ऐसी मिट्टी बहुत बड़े परिणाम में समुद्र तक पहुँच जाती है और समुद्र पाटने का काम करती है। समुद्र में गिरने वाले जल में मिट्टी के सिवाय विभिन्न प्रकार के घुले हुए [[लवण]] भी होते हैं।&lt;br /&gt;
==चट्टानों का टूटना==&lt;br /&gt;
दिन में [[धूप]] से तप्त चट्टानों में पड़ी दरारें फैल जाती हैं तथा उनमें अड़े पत्थर नीचे सरक जाते हैं। रात में ठंड पड़ने या वर्षा होने पर चट्टानें सिकुड़ती है और दरारों में पड़े पत्थरों के कारण दरारें और बड़ी हो जाती है। शीतप्रधान देशों में इन्हीं दरारों तथा भूमि के अंदर रिक्त स्थानों में जल भर जाता है। अधिक शीत पड़ने पर जल हिम में परिवर्तित हो जाता है और तब उन स्थानों या दरारों को फाड़कर तोड़ देता है। इन क्रियाओं के बार-बार दोहराए जाने से चट्टानों के टुकड़े-टुकड़े हो जाते है। इन टुकड़ों को जल और वायु अन्य स्थान पर ले जाते हैं। जिन प्रदेशों में दिन और रात के [[ताप]] में अधिक परिवर्तन होता है, वहाँ की [[मिट्टी]] निरंतर प्रसार और आकुंचन के कारण ढ़ीली हो जाती है एवं वायु अथवा जल द्वारा अन्य स्थानों पर पहुँच जाती है।&lt;br /&gt;
==जल, वायु व हिम द्वारा क्षरण==&lt;br /&gt;
शुष्क प्रांतों में, जहाँ भूमि वनस्पति से ढंकी नहीं होती, वायु अपार बालु को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाती है। इस प्रकार सहारा मरुभूमि की रेत, एक ओर [[सागर]] पार सिसिली द्वीप तक और दूसरी ओर नाइजीरिया के समुद्र तट तक पहुँच जाती है। वायु द्वारा उड़ाया हुआ बालू ढूहों अथवा ऊँची चट्टानों के कोमल भागों को काटकर उनकी आकृति में परिवर्तन कर देता है। जल में बहा हुआ [[पदार्थ]] सदा ऊँचे स्थान से नीचे को ही जाता है, किंतु वायु द्वारा उड़ाई हुई मिट्टी नीचे स्थान से ऊँचे स्थानों को भी जा सकती है। गतिशील हिम जिन चट्टानों पर से होकर जाता है उनका क्षरण करता है और इस प्रकार मुक्त हुए पदार्थ को अपने साथ लिए जाता है। वायु तथा नदियों के कार्य की तुलना में ध्रुव प्रदेश को छोड़कर [[पृथ्वी ग्रह|पृथ्वी]] के अन्य भागों में हिम की क्रिया अल्प होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भूगोल शब्दावली}}&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:भूगोल शब्दावली]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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