योग दर्शन  

'योग' आर्य जाति की प्राचीनतम विद्या है, जिसमें विवाद को प्रश्रय नहीं मिला है। योग ही सर्वोत्तम मोक्षोपाय है। भव ताप सन्तप्त जीव को ईश्वर से मिलाने में योग ही भक्ति और ज्ञान का प्रधान साधन है। चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है- 'योगश्चित्तवृत्ति-निरोध:।' यद्यपि उपलब्ध योगसूत्रों के रचयिता महर्षि पतञ्जलि माने जाते हैं, किन्तु योग पतञ्जलि से भी प्राचीन अध्यात्म-प्रक्रिया है। संहिताओं, ब्राह्मणों तथा उपनिषदों में अनेकत्र इसका संकेत एवं विवेचन उपलब्ध है। योग सांख्य-अभिमत तत्त्व को स्वीकारता है, परन्तु ईश्वर की सत्ता मानकर उसे छब्वीसवाँ तत्त्व मानता है। इसीलिए योग को सेश्वर सांख्य भी कहा जाता है। योग दर्शन सूत्र रूप है। इन सूत्रों के रचयिता महर्षि पतञ्जलि हैं। इन्होंने 195 सूत्रों में सम्पूर्ण योग दर्शन को विभाजित किया है।

‘योग’ अत्यन्त व्यापक विषय है। वेद, उपनिषद, भागवत आदि पुराण, रामायण, महाभारत, आयुर्वेद, अलंकार आदि ऐसा कोई भी शास्त्र नहीं है, जिसमें 'योग' का उल्लेख न मिलता हो। पतंजलि कृत दर्शन में योग की व्यापक चर्चा होने के कारण उनका शास्त्र 'योग दर्शन' के नाम से विभूषित हुआ। योग की अनेक शाखा-प्रशाखाएँ हैं। विश्लेषण के आधार भिन्न-भिन्न होने से वह अनेकविध नामों से पुकारा जाने लगा। 'योगसिद्धान्तचन्द्रिका' के रचयिता नारायणतीर्थ ने ‘योग’ को क्रिया योग, चर्या योग, कर्म योग, हठ योग, मन्त्र योग, ज्ञान योग, अद्वैत योग, लक्ष्य योग, ब्रह्म योग, शिव योग, सिद्धि योग, वासना योग, लय योग, ध्यान योग तथा प्रेमभक्ति योग द्वारा साध्य माना है एवं अनेक योगों से ध्रुवीकृत योग अर्थात समाधि को राजयोग नाम से अभिहित किया है।[1]

  • योग-साहित्य को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. पातंजलि योग-साहित्य तथा
  2. पातंजलितर योग-साहित्य

सांख्य- योग के समान तन्त्र होने की पुष्टि

भारतीय दर्शन में न्याय वैशेषिक की भाँति सांख्य-योग को समान तन्त्र कहते हैं। शास्त्रीय सिद्धान्तों में विभिन्नता की अपेक्षा समानता अधिक होने के कारण दो शास्त्रों को ‘समानतन्त्र’ की संज्ञा प्रदान की जाती है। यही कारण है कि व्यासभाष्य के प्रत्येक पाद की समाप्ति पर व्यासदेव ने योग को ‘सांख्यप्रवचन योगशास्त्र’ कहा है।[2] आचार्य विज्ञानभिक्षु ने योगवार्त्तिक में सांख्य-योग के ‘समानतन्त्र’ होने की स्थान-स्थान पर पुष्टि की है। इसके कुछ प्रमुख प्रकरण अधोलिखित हैं –

सांख्य तथा योग दोनों दर्शनों में बुद्धि और पुरुष में अनादि स्वस्वामिभावसम्बन्ध को स्थापित किया गया है। पुरुषार्थवती बुद्धि प्रतिबिम्बविधया पुरुष का विषय बनती है। विषयप्रयोग और विवेकख्याति ये दो पुरुषार्थ बुद्धि के कहे जाते हैं। पुरुषार्थशून्य बुद्धि में पुरुष का विषय बनने की क्षमता नहीं है। योग के इस सिद्धान्त को विज्ञानभिक्षु समानतन्त्र सांख्य से परिपुष्ट करते हैं-

'अत एव पुरुषार्थवत्येव बुद्धि: पुरुषस्य विषय इति सांख्यसिद्धान्त:'[3]

योग का अर्थ

'योग' शब्द समाध्यर्थक युज् धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है समाधि। पतञ्जलि का योगलक्षण है- 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:' अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोकना। चित्त से अभिप्राय अन्त:करण अर्थात्‌ मन, बुद्धि, अहंकार है। सत्त्वादिगुणों के तर-तमभाव से 'चित्तवृत्ति' में तारतम्य उत्पन्न होता है। उस कारण वह 'बहिर्मुख' और 'अन्तर्मुख' भी होता रहता है।

चित्त

चित्त सत्त्वप्रधान प्रकृति-परिणाम है। चित्त प्राकृत होने से जड़ और प्रतिक्षण परिणामशाली है। इस चित्त की 5 भूमियाँ या अवस्थायें होती हैं- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।

वृत्तियाँ

चित्त की वृत्तियाँ भी प्रमुखतया पाँच हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। चित्त की समस्त अवस्थाओं का अन्तर्भाव इन्हीं पाँचों वृत्तियों में हो जाता है। योगसिद्धि में चित्तवृत्तियों के साथ ही उनके संस्कारों का भी निरोध आवश्यक है। अत: चित्त की स्थूल वृत्तियों और सूक्ष्म-संस्कारों के निरोध होने पर ही योग की पूर्णता सिद्ध होती है।

योग का सिद्धान्त

योग का सिद्धान्त है कि इन्द्रिय रूप प्रणालिका के माध्यम से चित्त घट, पट आदि बाह्य विषयों के साथ उपरक्त होता है। घट, पट आदि विषयोपराग से चित्त की तदाकारा चित्तवृत्ति बनती है। इसे चित्त का विषयाकार परिणाम भी कहते हैं। चित्त की घट, पटादि विषय वाली वृत्ति का स्वरूप है - 'अयं घट:, अयं पट:।' विषयोपराग के पश्चात् चित्तवृत्ति बनती है। अत: चित्तवृत्ति के प्रति विषयोपराग को 'करण' (प्रमाण) कहते हैं और 'अयं घट' आदि वृत्ति को 'प्रमा'। इस प्रमा का आधार बुद्धि है। अत: बुद्धिनिष्ठ होने से इस प्रमा को 'बौद्धप्रमा' भी कहते हैं। बौद्धप्रमा के पश्चात् 'घटमहं जानामि' अर्थात मैं घट को जान रहा हू:- यह दूसरे प्रकार की प्रमा होती है। इस दूसरे प्रकार की प्रमा की उत्पत्ति का कारण पहले वाली प्रमा है। अत: द्वितीय प्रमा के प्रति प्रथम प्रमा को 'करण' (साधन), कहते हैं। पुरुषनिष्ठ होने से द्वितीय प्रमा को 'पौरुषेयबोध' कहते हैं। चक्षुरादि को घट, पट आदि के पौरुषेय बोध रूप मुख्य प्रमा को साक्षात 'करण' नहीं माना जा सकता है। योगशास्त्र की भाँति सांख्यशास्त्र में भी स्वीकृत दो प्रकार की प्रमाओं का स्मरण कराते हुए विज्ञानभिक्षु लिखते हैं–

‘.......प्रमाद्वयं च सांख्ये सूत्रितम्-द्वयोरेकतरस्य,
वाऽप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्ति: प्रमेति’।[4]

  • सांख्य में प्रतिपादित चौबीस तत्त्व योग के द्वितीय पाद के अट्ठारहवें एवं उन्नीसवें सूत्रों में वर्णित हुए हैं। इसे स्पष्ट करते हुए विज्ञानभिक्षु लिखते हैं-

‘तदेवं सांख्यशास्त्रे प्रपञ्चितानि चतुर्विशतितत्त्वानि,
अत्र संक्षेपत: सूत्रद्वयेनोक्तनि’। [5]

  • योगशास्त्र में परिणामशील महदादि तत्त्वों को कार्य तथा कारण के भेद से जो सत और असत रूप में वर्णित किया गया है, वह उनके नित्यानित्य उभय रूप होने के कारण है। ऐसे ही सांख्यानुसारी मत को इंगित करते हुए विज्ञानभिक्षु लिखते हैं-

‘.... प्रकृत्यादीनां ... नित्यानित्योभयरूपत्वस्थापनात्तेषां,
सद-सद्रूपत्वं सिद्धान्तितम् ‘‘सदसदख्यातिर्बाधाबाधाभ्यामि’’
ति सांख्यसूत्रानुसारात्’ ।[6]

  • योग दर्शन के अनुसार सुख-दु:ख आदि का भोग किसे होता है? इस विषय पर विचार करते हुए विज्ञानभिक्षु बतलाते हैं कि अंश भेद से सुख-दु:खादि का भोग बुद्धि और पुरुष दोनों को होता है। अन्तर इतना है कि बुद्धिपक्ष में भोग 'वास्तविक' है और पुरुष पक्ष में 'औपाधिक'। पुरुष में औपाधिक भोग की जन्मदात्री 'अविद्या' है। अत: पुरुष पक्ष में सुख दु:खादि भोग को 'गौण' कहा गया है। योग की भाँति सांख्य दर्शन में समर्थित उक्त मान्यता के सांख्यसूत्रों को उद्धृत करते हुए विज्ञानभिक्षु लिखते हैं –

‘तत्रैव गौणो भोग: सांख्ये प्रोक्त: ‘‘चिदवसानो भोग’’ इति।
स च पुरुषस्यैव न बुद्धे: ‘‘पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावाद्’’
इति ‘सांख्यवाक्यात्’। [7]

सांख्य-योग दोनों दर्शनों में कारण को ‘धर्मी’ तथा कार्य को ‘धर्म’ संज्ञा प्रदान करते हुए समस्त तत्त्वों को विश्लेषित किया गया है। महतादि तत्त्वों के आविर्भाव-क्रम से उनका 'धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध' बदलता जाता है। उदाहरण के रूप में प्रकृति रूप धर्मी से आविर्भूत महत रूप धर्म तब धर्मी रूप में परिवर्तित हो जाता है। जब वह अहंकार रूप धर्म का अभिव्यक्ति कारण बनता है। लौकिक जगत् में जैसे एक पिता का पुत्र अपने पुत्र का पिता बन जाता है। इस प्रकार 'धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध' पर अवलम्बित घट, पट आदि तत्त्वों की कार्य-कारण-परम्परा अनादि और अनन्त है। योग शास्त्र में वर्णित तत्त्वों को काल भेद से अनागत, वर्तमान तथा अतीत तीन लक्षण भेद वाला बतलाया गया है। अभिव्यक्ति से पूर्व घट-धर्म (कार्य) अपनी कारण भूता मृत्तिका में ‘अनागतलक्षण’ से अवस्थित रहता है, अभिव्यक्ति के पश्चात् ‘वर्तमान लक्षण’ वाला कहलाता है और खण्डित हो जाने पर ‘अतीत लक्षण’ से अन्वित रहता है। ‘लक्षण’ शब्द से यहाँ घट-पटादि पदार्थ की तत-तत काल से सम्बन्धित स्थिति, दशा, अवस्था अथवा परिणति का अवबोध होता है। आज का प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक मृत्तिका-धर्मी (कारण) के घट-धर्म (कार्य) की ‘वर्तमान’ अवस्था (लक्षण) को तो स्वीकार करता है, किन्तु प्रत्यक्षानर्ह अनागत और अतीतकालिक घट-धर्म को शशश्रृंग की भाँति अवास्तविक (अलीक) मानता है। इसी भ्रान्ति को निरस्त करने हेतु विज्ञानभिक्षु ने योगिजन द्वारा प्रत्यक्ष योग्य अनागत और अतीतकालिक घटादि की सद्रूपता तथा योगिजन द्वारा भी प्रत्यक्षानर्ह शशश्रृंगादि की असद्रूपता को वर्णित किया है। साधारणजन को अनागत और अतीतकालिक घटादि धर्म का प्रत्यक्ष इसलिये नहीं होता है, क्योंकि उसका रूप स्फुट न होने से उसमें ‘सूक्ष्मता’ निहित रहती है और प्रत्यक्ष के बाधक घटकों में पदार्थगत सूक्ष्मता भी एक बाधक घटक है। यह सिद्धान्त सांख्य-योग दोनों दर्शनों में वर्णित हुआ है। स्वयं विज्ञानभिक्षु लिखते हैं –

‘त्रयमप्येतद्वस्तु स्वरूपसत्... न चानुपलम्भो बाधक: योगिप्रत्यक्षसिद्धस्य
सौक्ष्म्येणानुपलम्भोपपत्ते:। तथा च सांख्यसूत्रम् - ‘‘सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धि:’’
इति’। [8]

  • आकाशादि क्रम से महाभूत की उत्पत्ति श्रुति शास्त्र में जिस प्रकार वर्णित हुई है, उसी प्रकार योग के समानतन्त्र सांख्य में भी प्रतिपादित हुई है। स्वयं विज्ञानभिक्षु लिखते हैं-

‘श्रुतौ चाकाशादिक्रमेण महाभूतोत्पत्तिसिद्धेरिति समानतन्त्रन्यायेन

च सांख्येऽपीत्थमेव सिद्धान्त उन्नीयते’। [9]

इस प्रकार विज्ञानभिक्षु ने दोनों दर्शनों के ऐसे अनेक सन्दर्भों को उल्लिखित किया है, जिससे उनका समातन्त्रत्व सिद्ध हो सके।

सांख्य-योग में अन्तर

सांख्य-योग के समानतन्त्रत्व की पुष्टि हेतु विज्ञानभिक्षु ने जहाँ दोनों दर्शनों के समान सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला है, वहीं उनके अन्तर को भी योगवार्त्तिक में स्पष्ट किया है। विज्ञानभिक्षु का मत है कि सांख्य के समान योग में ‘अविद्या‘ शब्द का अर्थ ‘अविवेक’ नहीं है अपितु वैशेषिक आदि शास्त्रों के समान ‘अविद्या’ शब्द का अर्थ विशिष्ट ज्ञान है। स्वयं विज्ञानभिक्षु लिखते हैं- ‘अस्मिंश्च दर्शने सांख्यानामिवाविवेको नाविद्याशब्दार्थ:, किन्तु वैशेषिकादिवद् विशिष्टज्ञानमेवेति सांख्यसूत्राभ्यामवगन्तव्यम्’ [10] यहाँ अविद्या को विशिष्ट ज्ञान कहने का अभिप्राय उसके अभाव रूप (विद्या भाव रूप) का निषेध कर उसे विद्याविरोधी ज्ञानविशेष के रूप में स्थापित करना है। इस प्रकार विज्ञानभिक्षु ने सांख्य-योग में विद्यमान सैद्धान्तिक अन्तरों को भी स्थान-स्थान पर योगवार्त्तिक में प्रदर्शित किया है।

न्यायवैशेषिक सिद्धान्तों का खण्डन

योगवार्त्तिक में विज्ञानभिक्षु न्याय-वैशेषिक-सिद्धान्तों का भी यथावसर खण्डन करते चलते हैं। वे न्याय-वैशेषिक की पूर्वपक्ष स्थानीय मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में सांख्य योगाभिमत उत्तरपक्ष को प्रस्तुत करते हैं। इसके लिये योगवार्त्तिक के अधोलिखित वाक्य अवलोकनीय हैं-

  1. हि वैशेषिकादिवत् नित्येच्छाऽऽदिमान् रचत, एवेश्वरस्त्वयाऽप्यभ्युपगम्यते (1/24)।
  2. वैशेषिकैस्त्र्यणुकशब्देनोच्यते य: परिणामविशेष:, स एवात्राणीयानित्युक्: कार्येषु परमसूक्ष्मत्वाभावादिति (1/43)।
  3. तथेतरेतरसाहाय्येनोत्पादितावयविन: कार्यकारणाभेदेन, चारम्भवादाद्विशेष: (2/18)
  4. विशिष्यते व्यावर्त्यते द्रव्यान्तरादेभिरिति विशेषणानि विशेषगुणा:, वैशेषिकशास्त्रोक्ता: तै: कालत्रयेऽप्यसंबद्धा (चितिशाक्ति:) इत्यर्थ:। तेन संयोगसंख्यापरिमाणादिसत्त्वेऽप्यक्षति: (2/20)।
  5. ये तु वैशेषिकादयो ज्ञानाश्रयमात्मानं मन्यन्ते ते, श्रुतिस्मृतिविरोधनोपेक्षणीया: (2/20)।
  6. न वैशेषिकाणामिवोत्पत्तिकारणमस्मन्मते (2/28)।
  7. वैशेषिकोक्तपरमाणवोऽप्यस्माभिरभ्युपगम्यन्ते। ते चास्मद्दर्शने गुणशब्दवाच्या इत्येव विशेष: (3/52)।
  8. न हि नैयायिकानामिवास्माकम्, अन्त:करणभेदेनैकदाऽनवहितनानाशरीराधिष्ठानं न संभवेदिति (4/5)।
  9. ये तु वैशेषिकाश्चित्तम् अण्वेव सर्वदाऽभ्युपगचछन्ति, तन्मत एकदा, पञ्चेन्द्रियै: पञ्चवृत्त्यनुपपत्ति: (4।10)।
  10. एतेन चित्तनित्यत्वाभ्युपगमिनामपि न्यायवैशेषिकाणामुत्तरोत्तरज्ञानेन, पूर्वपूर्वज्ञानग्रहणकल्पना परास्ता (4।21)।

पतञ्जलिप्रोक्त योग के सिद्धान्त

पाशुपतयोग, महेश्वरयोग (नाकुलीयदर्शन, शैवदर्शन, प्रत्यभिज्ञादर्शन तथा रसेश्वरदर्शन भेद से चतुर्विध) तन्त्रयोग उनके अनेक शाखाओं से पतञ्जलिप्रोक्त योग पृथक् है। यहाँ पतञ्जलि द्वारा प्रवर्तित योग-सिद्धान्तों को ही विश्लेषित किया जा रहा है-

‘योग-विमर्श’

किसी भी शास्त्र का असन्दिग्ध यथार्थ ज्ञान तभी हो सकता है जब उस शास्त्रविशेष के अध्येता को उस शास्त्र के पारिभाषिक शब्दों का अर्थ ज्ञात रहे। जब एक शब्द अनेक शास्त्रों में भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है, तभी भ्रान्तिबीज का उदय होता है। इसी भ्रान्तिबीज को उन्मूलित करते हैं तत्-तत् शास्त्रों के पारिभाषिक शब्द। इस प्रकार अनेक अर्थों का वाचक शब्द जब किसी शास्त्रविशेष में किसी अर्थविशेष में प्रयुक्त होता है, तब वह शब्द ‘पारिभाषिक शब्द’ की संज्ञा को धारण करता है। उदाहरण के लिये ‘योग’ शब्द को ही लिया जाय। ‘योग’ शब्द- वेदान्त में ‘जीवात्मा-परमात्मा के संयोग’ अर्थ में, व्याकरणशास्त्र में ’शब्द-व्युत्पत्ति’ अर्थ में, आयुर्वेद में ‘भेषज’ अर्थ में, ज्योतिष में ‘नक्षत्रों के सम्बन्ध-विशेष’, ‘समय-विभाग’, ‘रवि-चन्द्र के योगाधीन विष्कम्भादि’ अर्थ में, नारद पञ्चरात्र में ‘देवतानुसन्धान’ अर्थ में, योगाचार बौद्ध में ‘पर्यनुयोग’ अर्थ में, व्यवहारशास्त्र में ‘छल’ अर्थ में, मनुस्मृति में ‘कपट’ अर्थ में, गणितशास्त्र में ‘अङ्क-जोड़: अर्थ में, देवीभागवत में ‘प्रेम’ अर्थ में, अलंकारशास्त्र में ‘कामुक-कामिनी-सम्मिलन’ अर्थ में, हेमचन्द्र शास्त्र में ‘धन’ अर्थ में, इसी प्रकार उपाय, सङ्गति, वपुस्धैर्य अर्थ में-प्रयुक्त हुआ है।

पतञ्जलिसम्मत ‘योग’ शब्द का अर्थ

पतञ्जलि के अनुसार ‘योग’ शब्द का अर्थ ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ है। दूसरे शब्दो में चित्त के वृत्त्यात्मक व्यापार को निरुद्ध करना, समुद्र में उत्पन्न होने वाली असंख्या तरङ्गों की भाँति चित्त में उठने वाली दिशाहीन असंख्य वृत्तियों के प्रवाह को नियन्त्रित करना, चित्त को योगसम्मत ध्येय पदार्थ का चिन्तन करने हेतु योग्य बनाना, चित्त को उसकी सहज प्राप्त क्षिप्त-मूढ-विक्षिप्त भूमियों से ऊपर उठाकर एकाग्र तथा निरुद्ध भूमि में क्रमश: अवस्थित करना, चित्त-नदी की संसाराभिमुखी धारा को मोक्षाभिमुखी बनाना, ध्येय-चिन्तन के अनभ्यासी चित्त को ध्येय तत्त्व-चिन्तन का अभ्यासी बनाना, बाह्य विषयों की प्राप्ति के प्रति सहज उद्वेलित रागात्मक चित्त में विषय-वैराग्य का बीज रोपित करना, चित्त की बन्धनकारी अविद्या-रज्जु को विद्या-शस्त्र द्वारा छिन्न करना, चित्त को चरिताधिकार (कर्तव्यशून्य) बनाकर ख्याति प्राप्त पुरुष को उसके स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित करना, वृत्तिनिरोध के शास्त्रसम्मत साधना-क्रम से सम्प्रज्ञात तथा असम्प्रज्ञात को प्राप्त करना- ‘योग’ है।

‘योग’ शब्द की व्याकरणसम्मत निरुक्ति-

व्याकरणशास्त्र में ‘योग’ शब्द की निष्पत्ति दो धातुओं से की गई है। ‘युजिरयोगे’ धातु से निष्पन्न ‘योग’ शब्द ‘संयोग’ अर्थ का बोध कराता है और ‘युज् समाधौ’ धातु से निर्मित ‘योग’ शब्द ‘समाधि’ अर्थ का वाचक है। पतंजलिप्रोक्त योग में ‘संयोग’ अर्थ की अन्विति नहीं बैठती है। क्योंकि अग्नि से वियुक्त स्फुलिङ्ग की भाँति संसारावस्था में परमात्मा से विमुक्त हुआ जीव मोक्षावस्था में समुद्र में विलीन जलधारा की भाँति परमात्मा से विमुक्त हुआ जीव मोक्षावस्था में समुद्र में विलीन जलधारा की भाँति परमात्मा से संयुक्त हो जाता है- यह आध्यात्मिक पक्ष योगशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय नहीं है। पतञ्जलिप्रोक्त ‘योग’ शब्द समाध्यर्थक होने से वह सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि के द्वारा साधक पुरुष को कैवल्यावस्था में ‘स्वस्वरूपावस्थित होने का प्रतिपादन करता है। पतञ्जलि और व्यासदेवकृत ‘योग’ लक्षणों में प्रातीतिक विसङ्गति- योग के प्रारम्भिक अध्येता ऐसा मानते हैं कि पतञ्जलि और व्यासदेव ने योग के दो पृथक् लक्षण किये हैं। उनके अनुसार पतञ्जलि ने योग का ‘योगाश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ लक्षण किया है और व्यासदेव ने ‘योग: समाधि:’ द्वारा योग को लक्षित किया है। अत: दोनों के योगलक्षणों में एकरूपता नहीं है। किन्तु बात ऐसी नहीं है। योग के उक्त दोनों लक्षणों में केवल शाब्दिक अन्तर है। दोनों की आत्मा एक है। दोनों का मूलभूत तत्त्व एक है। ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ योग की पूर्वावस्था है और ‘समाधि’ योग की परावस्था है। चित्तवृत्तिनिरोध साधनावस्था है तो समाधि सिद्धावस्था है। शब्दान्तर में वृत्तिनिरोधात्मक योग की एक विशिष्ट अवस्था को समाधि कहते हैं। अत: योग के उक्त लक्षणों में विसङ्गति नहीं है। पतञ्जलि के ‘योगाश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ सूत्र में ‘योग:’ लक्ष्य पद है और ‘चित्तवृत्तिनिरोध:’ लक्षण पद है।

चित्त - विमर्श

सांख्य में अनुल्लिखित ‘चित्त’ योग में उल्लिखित – सांख्य में ‘चित्त’ नाम से किसी तत्त्व का उल्लेख नहीं मिलता है।[11] प्रकृति के आद्य कार्य के लिये ‘महत्’ शब्द का उल्लेख सांख्यकारिका संख्या आठ, बाईस तथा छप्पन में हुआ है। तथा तेईस, पैंतिस, छत्तीस तथा सैंतिसवीं कारिकाओं में ‘बुद्धि’ शब्द मिलता है। सङ्गति इस प्रकार है कि महत् और बुद्धि इन दोनों पदों से एक ही तत्त्व गृहीत होता है। ये दोनों पर्याय शब्द हैं। प्रकृति के आद्य कार्य की ‘महत्’ संज्ञा तीन दृष्टियों से अन्वर्थ है- प्रकृतिजात तत्त्वों में अग्रतम होने से, त्रयोदश करणों में प्रधानतम होने से तथा पुरुष के विषयज्ञान का प्रमुख आधार होने से। यही ‘महत्’ अध्यवसायात्मिका वृत्ति से अपने को लक्षित करने के कारण ‘बुद्धि’ संज्ञा का धारक बन गया। क्रियाभेद से नामभेद होता है। जैसे क्रियाभेद से एक ही व्यक्ति नर्तक, गायक, पाठक, वाचक आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है वैसे ही क्रियाभेद से एक ही तत्त्व की महत् तथा बुद्धि संज्ञा पड़ी। सांख्यसम्मत सृष्टि में ‘अहंकार’ से आविर्भूत ‘मन’ तत्त्व के किसी दूसरे नाम से सम्बन्धित कारिका भी नहीं मिलती है। इस प्रकार सांख्यदर्शन में ‘चित्त’ पद का उल्लेख नहीं हुआ है। जबकि योगदर्शन में ‘चित्त’ पद का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। इसके लिये पातञ्जल योग के ½, 33, 37, 3/19, 11, 12, 19, 32, 4/4, 5, 15, 16, 17, 18, 23 तथा 26 – ये सभी सूत्र अवलोकनीय हैं। योग के तीन सूत्र विचारणीय हैं। एक सूत्र[12] में ‘मन’, दूसरे सूत्र[13] में चित्त और बुद्धि दोनों पदों का प्रयोग मिलता है। गुणपर्व से सम्बन्धित तीसरे सूत्र[14] के व्यासभाष्य में मन और महत् नाम से दो तत्त्व मिलते हैं। अत: योग में भी ‘चित्त’ नाम से कौन सा तत्त्व गृहीत किया जाय और सांख्य-योग की प्रातीतिक उक्त विसंगति को कैसे दूर किया जाय-यह विचारणीय है।

बुद्धि, चित्त और मन की एकरूपता- एक ओर पतञ्जलि के सूत्रों में सर्वाधिक संख्या ‘चित्त’ पद के प्रयोग वाले सूत्रों की है तो दूसरी ओर गुणपर्व नाम से योग के परिगणित तत्त्वों में ‘चित्त’ पद का उल्लेख नहीं मिलता है। जब कि सम्पूर्ण योग-साधना चित्तावलिम्बत है।[15] फिर भी योगशास्त्र के अनुशीलन से तीनों पदों की एकरूपता अध्योलिखित प्रकार से वर्णित की जा सकती है-

  1. योग के चतुर्थ पाद के तेईसवें सूत्र[16] की पर्यालोचना करने से प्रतीत होता है कि पतञ्जलि ने ‘चित्त’ पद से जिस तत्त्व को गृहीत किया है उसी की वृत्ति को ‘बुद्धि’ नाम से विश्लेषित किया है। ‘बुद्धि’ शब्द का अर्थ ज्ञान है। अत: चित्त की ज्ञानात्मक वृत्ति के लिये यहाँ ‘बुद्धि’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जब कि सांख्य में ‘बुद्धि’ शब्द से एक तत्त्व वर्णित हुआ है। यहाँ क्रिया-क्रियावान् का अभेद चरितार्थ होता है। अत: सांख्य का ‘बुद्धि’ तत्त्व योग में ‘चित्त’ नाम का वाहक बना। योग के प्रथम पाद के सैंतिसवें सूत्र में प्रयुक्त ‘मन’ पद से भी ‘चित्त’ तत्त्व ही गृहीत होता है। ‘मनस: स्थितिनिबन्धनी’ सूत्रार्द्ध की व्याख्या व्यासदेव के अनुसार है-

चित्तं स्थितौ निबध्नन्ति।’ इसी सूत्र के वार्त्तिक में ‘मनश्चित्तयोरेकतेति बोध्यम्’ वाक्य द्वारा विज्ञानभिक्षु ने चित्त और मन की एकरूपता का उद्घोष कर अवशिष्ट सन्देह को भी दूर कर दिया।

  1. प्रकारान्तर से विषय-सङ्गति इस प्रकार लगाई जा सकती है- सांख्य में ‘बुद्धि’ शब्द का ही प्रयोग हुआ है और ‘पुरि शेते इति पुरुष:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार बुद्धिरूप पुर में जो शयन करता है, उसे ‘पुरुष’ कहते हैं। इस प्रकार बुद्धि-पुरुष की मान्यता पर सांख्य की तत्त्वमीमांसा प्रतिष्ठित हुई है। योग की साधना ‘चित्त-चिति’ की मान्यता पर स्थापित हुई है। चिति अथवा चित् शब्द का अर्थ पुरुष है। चित्त के समानान्तर चित् (चिति) पद का प्रयोग योग में मिलता है। चित्त को चितिशक्ति के तात्कालिक आविधिक ज्ञान का साधन माना जाता है। ‘चित्’ से ’करण’ अर्थ में ‘क्त’ प्रत्यय करने से ‘चित्त’ पद निष्पन्न होता है। श्रीमद्भागवत के टीकाकार श्रीधर स्वामी लिखते हैं कि अधिभूत रूप से जो ‘महान्’ संज्ञा वाला है, वही अध्यात्म रूप से ‘चित्त’ संज्ञा को धारण करता है। इस प्रकार सांख्य का ‘बुद्धि’ तत्त्व योग में ‘चित्त’ नाम से व्यवहृत हुआ है।
  2. योग-साधना के लिये उपयुक्त चित्त-भूमि- चित्त-भूमि पाँच प्रकार की है। इनका स्वरूप क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र तथा निरुद्ध नाम से रेखङ्कित किया गया है। जिस प्रकार बीज-वपन की आधारभूता भूमि की उर्वरक शक्ति के तारतम्य से उसके फलागत में भी वैचित्र्य परिलक्षित होता है, उसी प्रकार चित्त रूप भूमि सत्त्वादि गुणों की पारिमाणिक भिन्नता से पृथक्-पृथक् स्वरूप वाली वृत्तियों को उत्पन्न करती है। गुण-गुणी, आश्रय-आश्रयी तथा कार्य-कारण, का यह अटूट सिद्धान्त है। योग-साधना चित्त की एकाग्र-भूमि से प्रारम्भ होती है और निरुद्ध भूमि में समाप्त होती है ।चित्त की प्रथम तीन भूमियाँ योगाभ्यास के लिये सर्वथा अनुपयुक्त हैं।

वृत्ति – विमर्श

जिसके निरोधार्थ योग-साधना प्रशस्त होती है, वह चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की है। वृत्तियों के नाम हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा तथा स्मृति। ये क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेद से पाँच प्रकार की हैं। प्रत्येक वृत्ति के अवान्तर भेद हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम भेद से प्रमाण के तीन भेद हैं। भ्रमज्ञान को विपर्यय कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश भेद से विपर्यय पाँच प्रकार का है। विकल्प वृत्ति के वस्तु, क्रिया और अभाव तीन भेद हैं। निद्रा वृत्ति के सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी तीन रूप हैं। भावित स्मर्तव्या तथा अभावित स्मर्तव्या भेद से ‘स्मृति’ के दो भेद हैं। स्थानाभाव के कारण विषय विस्तार सम्भव नहीं है। एक शब्द में ‘वृतुवर्तने’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय करके निष्पन्न ‘वृत्ति’ पद सांख्य-योग शास्त्र में चित्त आदि तेरह करणों के अपने-अपने विशिष्ट परिणामों का अभिधायक है।

निरोध-विमर्श

‘नि’ उपसर्गपूर्वक ‘रुध्’ धातु से ’घञ्’ प्रत्यय करके ‘निरोध’ शब्द निष्पन्न होता है। ‘निरोध’ शब्द का साधारण अर्थ है- अवबाधा। अवबाधा की परिणति नाश है। अत: ‘नाश’ भी निरोधी पर का वाच्यार्थ है। योग दर्शन में ‘निरोध’ शब्द ‘नाश’ अर्थ में नहीं अपि तु ‘अवस्था विशेष’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इससे किसी धर्मी-सापेक्ष धर्म की अतीतावस्था गृहीत होती है। चित्त-धर्मी के वृत्ति-धर्म को निरुद्ध किया जाता है।

  • योगसम्मत ‘निरोध’ यदि अभावस्वरूप होता तो अभावात्मक फल का कारण बनता। किन्तु वह स्वयं भावात्मक है अत: भावरूप कैवल्य-प्राप्ति का सोपान है। नियम है कि भाव की परिणति भावमूलक और अभाव की परिणति अभावमूलक होती है। कैवल्य पुरुष की उपाधिशून्य सर्वोच्च भावात्मक अवस्था, स्वस्वरूपावस्थिति है। अत: सिद्धान्तित होता है कि ‘निरोध’ अभावमूलक नहीं है, अपितु भावमूलक क्रिया की एक विशिष्ट अवस्था है। ‘निरोध’ पद वृत्ति-निरोध की आत्यन्तिक अतीतावस्था को, उसकी पूर्वकालिक वर्तमान अवस्था की भाँति, द्योतित करता है।

योग का सिद्धान्त है कि कार्य (जैसे घट) अपने कारण (जैसे मृत्तिका) में अनागत, वर्तमान तथा अतीत तीनों कालों में भावरूप से निहित रहता है।[17] उसकी अनागत और अतीत स्थिति अनुमानगम्य है। उसकी ‘मध्य’ की वर्तमान अवस्था का ही प्रत्यक्ष होता है।

  • ‘निरोध’ को रेखाङ्कित करते हुए विज्ञानभिक्षु योगवार्त्तिक में लिखते हैं- ‘निरोध’ लय रूप है। वह अधिकरण की एक विशिष्ट अवस्था है।[18] इन्धनरहित अग्नि के उपशम की भाँति व्यापाररहित चित्तवृत्तियों का अपने कारण में लय होना ‘निरोध’ है।[19]

योग-भेद-विमर्श

योग के लक्षणसूत्र ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ के लक्षणगत चित्त, वृत्ति और निरोध तीनों पदों की व्याख्या के पश्चात् लक्ष्यभूत ‘योग’ पद विवेच्य है। योग दो प्रकार का है- सम्प्रज्ञात योग तथा असम्प्रात योग। ये ‘समाधि’ नाम से भी कहे जाते हैं।

सम्प्रज्ञात तथा उसके भेद-

प्रभेद- क्षिप्त, मूढ तथा विक्षिप्त भूमियों से अतिक्रान्त चित्त जब एकाग्रभूमि में प्रविष्ट होता है तब उसकी ध्येयाभिमुखता, ध्येयप्रखरता, ध्येयप्रवणता, ध्येयपरायणता घनीभूत हो जाती है। व्युत्थित वृत्तियों से पराङ्मुख चित्त ध्येयानुसन्धानशील बन जाता है। चित्त की व्युत्थित वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं। चित्त एकाग्रवृत्तिक होता है। अत: चित्त की एकाग्रभूमि को रेखाङ्कित करते हुए हरिहरानन्द आरण्य लिखते हैं- सर्वदा अभीष्ट विषय में चित्त की स्थितिशील अवस्था को ‘एकाग्रभमि’ कहते हैं।[20]

‘सम्प्रज्ञात’ शब्द से ही सुस्पष्ट है कि जिसमें ध्येय विषय का सम्यक् एवं प्रकृष्ट रूप से अपरोक्षज्ञान होता है, उसे ‘सम्प्रज्ञात’ कहते हैं।[21] सम्प्रज्ञात योग में चित्त की ध्येयविषयिणी एकाग्रवृत्ति चित्त को विषय की सम्यक् अवाप्ति होती है, अत: इसे समापत्ति भी कहते हैं।

पतञ्जलि ने सम्प्रज्ञात-भेद के दो आधार माने हैं- इस विषयाधारित तथा दूसरा विषयसाक्षात्कारक्रमाधारित। योगसम्भव तत्त्वों को ग्रहीतृ, ग्रहण तथा ग्रह्य इन तीन वर्गों में विभक्त कर पतञ्जलि ने सम्प्रज्ञात के विषयाधारित तीन भेद किये हैं और सम्प्रज्ञात को ‘समापत्ति’ नाम से पुकारा है। सम्प्रज्ञात के ये तीन भेद हैं- ग्रहीतृसमापत्ति, ग्रहणसमापत्ति तथा ग्राह्यसमापत्ति। अभिजात मणि की निर्भ्रान्त प्रतिबिम्बाकारता की भाँति चित्त की सम्यक् ध्येयाकारता को बोधित करने हेतु पतञ्जलि ने ‘समापत्ति’ शब्द को ‘सम्प्रज्ञात’ के पर्याय रूप में प्रयुक्त किया है।[22] जिस प्रकार धनुर्विज्ञान में लक्ष्यभेदानुसन्धान स्थूल से सूक्ष्म की ओर अभिमुख होता है उसी प्रकार योग में एकाग्रभूमिक चित्त का विषय-साक्षात्काराभ्यास स्थूल की ओर अग्रसारित होता है। अत: विषयसाक्षात्कारक्रमाधारित सम्प्रज्ञात के चार भेद योगसूत्र में वर्णित है।[23] उनके नाम हैं- वितर्क, विचार, आनन्द तथा अस्मिता। इसमें योगरहस्य यह है कि एकाग्रता की क्रमिक प्रगाढता से साधक ध्यान के विषयभूत किसी एक स्थूल ध्येय पदार्थ में ही कार्य से कारण की उत्तरोत्तर शृंखला के आद्य प्रकृति तत्त्व को साक्षात्कृत करता है। एक ही स्थूल पदार्थ को ध्यान का आलम्बन बनाकर वितर्क से अस्मितासम्प्रज्ञात तक पहुँच जाता है। अत: सम्प्रज्ञात के विषयाधारित वितर्कादि भेदों में चित्त की एकाग्रवृत्ति का विषयगत भेद नहीं होता है। अन्यथा विषयभेद से एकाग्रता-भङ्ग (पूर्वपूर्वोपासना त्याग) का अनभिप्रेत प्रसङ्ग उपस्थित होगा।[24] योगसूत्र के व्यासभाष्य आदि ग्रन्थों में वितर्कादि के सवितर्क-निर्वितर्क आदि प्रभेदों को भी विस्तारपूर्वक विश्लेषित किया गया है।

असम्प्रज्ञात और उसके भेद-

एकाग्रभूमिक सम्प्रज्ञात के विजित होने पर योगी विरुद्धभूमिक असम्प्रज्ञात में प्रवेश करता है। ‘न तत्र किञ्चिद् प्रज्ञायते इति असम्प्रज्ञात:’- इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसमें कोई भी ज्ञानात्मक वृत्ति विद्यमान नहीं रहती है अर्थात् सम्प्रज्ञात काल की सर्वोच्च सत्त्वपुरुषख्यातिपरक अन्तिम वृत्ति भी निरुद्ध हो जाती है- निरोध-संस्कार शेष रह जाता है- उसे असम्प्रज्ञात योग कहते हैं।[25]

असम्प्रज्ञात के दो भेद हैं-

भवप्रत्यय तथा उपायप्रत्यय।[26] इनमें से उपायप्रत्यय असम्प्रज्ञात मुमुक्षार्थी के लिये उपादेय है।[27] अविद्यामूलक भवप्रत्यय असम्प्रज्ञात संसार में परिसमाप्त होता है। ‘भवन्ति जायन्ते जन्तवोऽस्यामिति भवोऽविद्या’- इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘भव’ शब्द का अर्थ ‘अविद्या’ है। अविद्यावश किसी भी अनात्मभूत ध्येय पदार्थ का आत्मत्वेन चिन्तन करते रहने से भी उसके पराकाष्ठा काल में साधक का निरुद्धभूमिक चित्त ‘सर्ववृत्ति-निरोध’ स्थिति वाला हो जाता है। परिणामत: उनका सर्ववृत्तिनिरोधात्मक संस्कार शेष चित्त अपने उपास्य में लीन हो जाता है और कैवल्यसम अवस्था का अनुभव करता है। किन्तु मृद्भाव को प्राप्त मण्डूक के वर्षाकाल में प्रादुर्भाव की भाँति एक निश्चित अवधि के पश्चात् उनकी संसारापत्ति होती है।[28] ऐसे भवप्रत्यय साधक उपासना के विषयभेद से दो प्रकार के हैं- विदेहलीन और प्रकृतिलीन। [29] विदेहलीन साधकों का उपास्य महाभूत तथा इन्द्रियाँ होती हैं। प्रकृतिलीन साधक पञ्वतन्मात्र, अहंकार, महत् तथा प्रकृति में से किसी जड़ तत्त्व की आत्मत्वेन उपासना करते हैं। इसके विपरीत उपायप्रत्यय असम्प्रज्ञात प्रज्ञज्ञमूलक[30] होने से आत्यन्तिक और ऐकान्तिक कैवल्य-प्राप्ति का कारण है।

योग के सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञज्ञत इन दो भेदों को उनके स्वरूप के अनुसार सबीज-निर्बीज, सालम्बन-निरालम्बन तथा सवस्तुक-निर्वस्तुक रूप में भी वर्णित किया गया है। सम्प्रज्ञात में ध्येय रूप बीज विद्यमान रहता है। चित्त की ध्येयाकाराकारित प्रकृष्ट एकाग्रवृत्ति बनी रहती है। अत: सालम्बन अथवा सवस्तुक सम्प्रज्ञात को ‘सबीज’ नाम से अभिहित किया गया है। असम्प्रज्ञात में उक्त ध्येयाकाराकारित वृत्ति भी निरुद्ध हो जाती है। इसमें ध्येयरूप वृत्यात्मक बीज विद्यमान नहीं रहता है। अत: निरालम्बन अथवा निर्वस्तुक असम्प्रज्ञात को ‘निर्बीज’ योग कहा गया है।

योग-प्राप्ति साधन- विमर्श

योग का स्वरूप जानने के पश्चात् उसकी प्राप्ति के ‘साधन’ के विषय में जिज्ञासा होती है। अत: योगसूत्र में समाधि-पाद के पश्चात् साधन-पाद की अवतारणा हुई। योग-साधन भी पृथक्-पृथक् उपदिष्ट हैं। साधकों की तीन श्रेणियाँ हैं।– योगारूढ़ युञ्जान तथा आरुरुक्षु। इन्हें उत्तम, मध्यम तथा मन्द अधिकारी नाम से क्रमश: पुकारा गया हे।[31]

उत्तमाधिकारी हेतु ‘अभ्यास-वैराग्य’-

पूर्वजन्मीय योगाभ्यास से सम्पोषित उत्तमाधिकारी का एकाग्र-चित्त पूर्व की क्षिप्तादि भूमियों को बहुत पीछे छोड़ चुका होता है। ऐसे साधकों में सन्न्यासाश्रम के परमहंस संन्यासी आते हैं। जडभरतादि इसी श्रेणी के साधक रहे। ऐसे साधकों के लिये योग-प्राप्ति का साधन ‘अभ्यास-वैराग्य’ बतलाया गया है।[32] एकाग्र चित्त को ध्येयालम्बित प्रशान्तवाही स्थिति प्रदान करने हेतु सम्पादित ‘यत्न’ ‘अभ्यास’ कहलाता है।[33] यह अभ्यास परिपक्वता की दृढभूमि को तब संस्पर्शित करता है जब दीर्घकाल तब बिना किसी व्यवधान के पूर्ण आस्था के साथ सम्पादित किया जाता है।[34] ऐसा दृढभूमिक अभ्यास ही साधक के चित्त को ‘सम्प्रज्ञात’ योग के अनुकूल बनाता है। अभ्यास वैराग्यमूलक होता है। चित्त को एक ओर से वियुक्त करके ही उसे दूसरी ओर संयुक्त किया जा सकता है। अत: अभ्यास-वैराग्य में अविनाभाव सम्बन्ध है। वैराग्य के दो भेद हैं- अपर वैराग्य और पर वैराग्य। अपरवैराग्ययुक्त अभ्यास से सम्प्रज्ञात योग की प्राप्ति होती है। इसमें बुद्धि-पुरुष-भेद-विषयिकी प्रकृष्टा वृत्ति उदित होती है। सर्ववृत्ति निरोधरूप असम्प्रज्ञात के लिये यह प्रकृष्टा वृत्ति बाधारूपिणी है। अत: परवैराग्ययुक्त अभ्यास द्वारा विवेकख्यात्यात्मक प्रकृष्टा वृत्ति के प्रति अलंबुद्धि (हेयु बुद्धि) जागरित की जाती है।[35] परिणामत: साधक का चित्त सर्ववृत्तिनिरोधात्मक असम्प्रज्ञात में प्रतिष्ठित होता है। अत: परवैराग्य को असम्प्रज्ञात का साक्षात् साधन कहा गया है।

मध्यमाधिकारी हेतु ‘क्रियायोग’-

योग का मध्यम अधिकारी वह है जिसमें योग-प्रवणता तो समय-समय पर परिलक्षित होती है किन्तु उत्तमाधिकारी जैसी चैत्तिक स्थिरता उसमें नहीं रहती है। परिणामस्वरूप उसका योग प्रदीप-तैलधारावत् अखंडित नहीं होता है। ऐसे मध्यम अधिकारियों के लिये योग-प्राप्ति का क्रियायोग साधन उपदिष्ट हुआ है। ‘क्रियायोग’ से तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान की क्रियाएँ गृहीत होती हैं।[36] मन्दाधिकारी हेतु ‘अष्टाङ्ग-योग’- अत्यन्त विक्षिप्त चित्त वाले गृहस्थादि को योग का मन्द अधिकारी कहा गया है। इन्होंने अभी तक योग-साधना प्रारम्भ ही नहीं की होती है। अत: मन्द अधिकारियों के लिये योग-प्राप्ति का साधन ‘अष्टाङ्ग-योग’ है। इसमें अभ्यास-वैराग्य तथा क्रियायोग साधन भी अन्तर्मुक्त हैं। योग के यम, नियम आदि आठ अङ्ग[37] अपने भेद-प्रभेदों के साथ योगशास्त्र में विस्तारपूर्वक वर्णित हुए हैं।

विभूतिविमर्श

किसी भी क्रिया के दो फल होते हैं- एक गौण फल तथा दूसरा मुख्य फल। उदाहरण के लिये भक्षण-क्रिया को ही लें। स्वादिष्ट भोजन का क्षुधा-शान्ति तात्कालिक गौण फल है तथा रसपरिपाक द्वारा शरीर-संवर्धन मुख्य फल है। इसी प्रकार यम, नियमादि योगसाधनपरक क्रियाओं से भी प्राप्यमाण मुख्य फल से पूर्व आनुषङ्गिक फल प्राप्त होते हैं। ये ‘विभूति’ नाम से योगसूत्र के तृतीय पाद में मुख्यत: विवेचित हुए हैं। तथा उनका मुख्य फल ‘कैवल्य’ नाम से चतुर्थपाद में वर्णित हुआ है।

‘विभूति’ शब्द का वाच्यार्थ ‘सामर्थ्यविशेष’ है। इसे ‘सिद्धि’ भी कहते हैं। अन्य क्रियाओं की भाँति योग-साधना कोई तात्कालिक क्रियाकलाप नहीं है। यह तो दीर्घकालीन संयमाभ्यास का मधुरफल, साधना की परिपक्वता का परिचायक है। किन्तु इन मोहक विभूतियों में आत्मविस्मृत होने वाला साधक योग के मुख्य फल तक नहीं पहुँच पाता है। अत: विभूतिसम्पन्न साधक को आत्मनिरीक्षणार्थ पतञ्जलि ने सचेत किया है।[38]

कैवल्यविमर्श

‘कैवल्य’ योग का चरम फल है। ‘केवल’ शब्द से ‘ष्यञ्’ प्रत्यय करके ‘कैवल्य’ पद की निष्पत्ति होती है। एक शब्द में इसका अर्थ ‘पूर्ण पृथक्ता’ अथवा ‘अत्यन्त भिन्नता’ है। यहाँ प्रकृति से आत्मा का पार्थक्य अभिप्रेत है। मूलत: पृथक् दो पदार्थों की अभेद-प्रतीति अविद्यावश होती है। अत: विद्या से अभेद-प्रतीति छिन्न होती है, ऐसा सिद्धान्त है। किसी भी वस्तु के प्रातीतिक धर्म को ‘औपाधिक धर्म’ कहते हैं। उदाहरण के लिये जल में गन्ध की प्रतीति उसका औपाधिक धर्म है, जो उसे पृथ्वी से प्राप्त होता है। किसी भ वस्तु के औपाधिक धर्म की निवृत्ति तो सम्भव है किन्तु वास्तविक स्वरूप की नहीं।

योग में बुद्धि- पुरुष का सर्वोपाधिवर्जितभाव ‘कैवल्य’ है। स्फटिक के निकट स्थित जपाकुसुम के हटा लेने पर जैसे स्फटिक, औपाधिक रक्तिमतारहित, अपने श्वेतिम रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है वैसे ही पुरुष के स्वरूप को आच्छादित करने वाली अविद्या जब विद्या द्वारा नष्ट हो जाती है वैसे ही पुरुष के स्वरूप को आच्छादित करने वाली अविद्या जब विद्या द्वारा नष्ट हो जाती है तब वह अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।[39] योगसम्मत कैवल्य ‘स्वस्वरूपावस्थिति’ रूप से जैसे पुरुषपक्ष में कहा गया है वैसे ही पुरुषार्थशून्यता रूप से वह बुद्धिपक्ष में भी उपचरित होता है।[40] इस प्रकार सत्त्व-पुरुष का शुद्धिसाम्य रूप ‘कैवल्य’ निष्पन्न होता है।[41]

योग के कतिपय प्रमुख सिद्धान्त

योगसूत्र में समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य नाम से उल्लिखित चार पादों में वर्णित उक्त चार विषयों के अतिरिक्त उन्हीं के पूरक रूप में कुछ अन्य बिन्दुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। इनसे योग के कतिपय प्रमुख सिद्धान्तों को स्थापित किया गया है।

योग की चतुर्व्यूहात्मक संरचना-

योग-प्रासाद हेय, हेयहेतु, हान तथा हानोपाय के चतुर्भुज स्तम्भों पर अवलम्बित हैं। ऐसा ही चतुर्भुज रोग, रोगहेतु, आरोग्य तथा आरोग्योपाय नाग से आयुर्वेद शास्त्र में रेखाङ्कित हुआ है। इनसे दोनों शास्त्रों का प्रतिपाद्य विषय व्याख्यापित हुआ है। योगशास्त्र में दु:ख् की त्याज्यता[42] त्याज्य दु:ख की प्राप्ति की कारणता[43] त्याज्य दु:ख की निवृत्ति की साधनता[44] तथा दु:ख-निवृत्ति की स्वरूपता[45] को पतञ्जलि ने सूत्राङ्कित किया है।

जड़ पदार्थों की पारिणामिक अवस्था-

‘परिणाम’ शब्द पदार्थगत तात्विक विशिष्ट अवस्था का वाचक है। इससे पदार्थगत परिवर्तन द्योतित होता है। पदार्थगत परिवर्तन दो प्रकार से होता है- एक तात्त्विक परिवर्तन तथा दूसरा अतात्त्विक परिवर्तन। योग में पदार्थगत परिवर्तन ‘परिणाम’ शब्द से वर्णित हुआ है और वेदान्त में पदार्थगत अतात्त्विक परिवर्तन ‘विवर्त: नाम से विश्लेषित हुआ है। ब्रह्मवादी वेदान्ती जगत् को ब्रह्म का ‘विवर्त’ (अतात्त्विक रूप) मानते हैं और प्रकृतिवादी सांख्य-योग जगत् को प्रकृति का परिणाम (तात्त्विक रूप) कहते हैं।

  • सांख्य-योग के अनुसार चेतन तत्त्व पुरुष को छोड़कर प्रकृति-साम्राज्य परिणाम की अटूट शृंखला से आबद्ध है। परिणाम आद्य कारणरूपा प्रकृति का स्वभाव है, स्वरूप है। कालसम्बन्धी अतीतता और अनागतता से भी जड पदार्थनिष्ठ ‘परिणाम’ का सिद्धान्त बाधित नहीं होता है। प्रत्येक जड पदार्थ वैकलिक परिणाम से अचित रहता है। अत: पतञ्जलि ने भूतेन्द्रियों में धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम तथा अवस्थापरिणाम को सूत्राङ्कित किया है।[46] तथा योगयुक्त चित्त में निरोधपरिणाम, [47] समाधिपरिणाम[48] तथा एकाग्रतापरिणाम[49] की विवेचना हुई हैं।
स्फोट की मान्यता-

यद्यपि ‘स्फोट’ व्याकरणशास्त्र का मुख्य सिद्धान्त है किन्तु योग में ‘सर्वभूतरुतज्ञान’[50] विषयक सिद्धि के प्रकरण में शब्द, अर्थ तथा ज्ञान का स्वरूप प्रतिपादित करते हुए टीकाकारों ने योगाभिमत स्फोट पर भी प्रकाश डाला है। ‘स्फुटति व्यक्तीभर्वाते अर्थोऽस्मादिति स्फोट:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिससे अर्थ स्फुट होता है, उसे स्फोट कहते हैं। कर्म एवं तज्जनित फलविषयक मान्यता- अटूट नियम है कि कर्म से तदनुरूप फल प्राप्त होता है। मोक्ष से पूर्व संसार के अन्तराल में प्राणिमात्र स्वकृत कर्मों के अनुसार जन्म-जमान्तरपर्यन्त फलों को भोगता रहता है। अत: दार्शनिकों ने प्राणी को कर्मजनित संस्कारों का पुञ्जमात्र कहा है। कर्मजनित संस्कार को कर्मवासना भी कहते हैं। पतञ्जलिने इसी को ‘कर्माशय’ नाम से अभिहित किया है। क्लेशमूलक कर्माशय, जो वर्तमान जीवन में फल प्रदान करता है, दृष्ट-जन्मवेदनीय कहा गया है तथा तद्भिन्न कर्माशय, जो अग्रिम जन्मों में फल प्रदान करता हा, अदृष्टजन्मवेदनीय कहा गया है।[51] कर्मजनित फल तीन प्रकार का है[52] जाति, आयु तथा भोग। यहाँ ‘जाति’ शब्द का अर्थ जन्म (किसी योनि की देहप्राप्ति) है। देहधारण की अल्प या दीर्ष अवधि को ‘आयु’ कहते हैं। सुख-दु:ख भोग के दो पक्ष कहे गये हैं। इनमें से दृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय आयु और भोग रूप द्विविपाक का आरम्भक है। जबकि अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय से जाति, आयु तथा भोग तीनों फल प्राप्त होते हैं। अत: इसे त्रिविपाकारम्भी कहा गया है। यह बतलाना अप्रासङ्गिक न होगा कि नारायणतीर्थ ने उक्त विषयों के अतिरिक्त योगसिद्धान्तचन्द्रिका में कुछ नवीन विषयों पर भी योग के अध्येताओं का ध्यान आकृष्ट किया है। पुरुषविशेष ईश्वर की स्थापना के प्रसङ्ग में ‘अवतारवाद’, यथाभिमतध्यानाद्वा (1/39) सूत्र के प्रसङ्ग में तीर्थभावना, देवभावना, लोकभावना वर्णभावना आदि विषयों का संयोजन किया है।

योग दर्शन में सूत्र

योगदर्शन में चार पाद हैं, जिनकी सूत्रसंख्या 195 है।

प्रथम समाधि पाद

प्रथम समाधिपाद में समाधि के रूप तथा भेद, चित्त एवं उनकी वृत्तियों का वर्णन हैं। प्रथम पाद में 'योग' का लक्षण 'योग: चित्तवृत्तिनिरोध:' बताया है। तदन्तर 'समाधि' का सविस्तार निरूपण किया है। इसीलिए इस प्रथम पाद को 'समाधिपाद' के नाम से कहा गया है। इस पाद में सूत्रसंख्या (51) इक्यावन है।

द्वितीय साधन पाद

द्वितीय साधनपाद में क्रियायोग, क्लेश तथा अष्टांग योग वर्णित हैं। द्वितीय पाद में व्युत्थित चित्त को समाहित करने हेतु 'तप:स्वाध्याय' और 'ईश्वर-प्रणिधान' रूप क्रियायोग के द्वारा यम-नियमादि पाँच साधनों को बताया गया है। ये सब बहिरंग साधन हैं। इस पाद में सूत्रसंख्या (55) पचपन है।

तृतीय विभूति पाद

तृतीय विभूतिपाद में धारणा, ध्यान और समाधि के अनन्तर योग के अनुष्ठान से उत्पन्न विभूतियों का वर्णन है। तृतीय पाद में 'धारणा', 'ध्यान' और 'समाधि' रूप तीन अन्तरंग-साधनों को बताया गया है। इस साधनों से अवतान्तर फलों के रूप में अनेक विभूतियाँ प्राप्त होती हैं, इसलिये इस पाद को 'विभूतिपाद' के नाम से जाना गया है। इस पाद में सूत्रसंख्या (55) पचपन है।

चतुर्थ कैवल्य पाद

चतुर्थ कैवल्य पाद में समाधिसिध्दि, विज्ञानवादनिराकरण और कैवल्य का निर्णय किया गया है। चतुर्थ पाद में 'जन्म', औषधि, मंत्र, तप और समाधि से प्राप्त होने वाली पाँच सिद्धियों का सविस्तार वर्णन किया गया है। तदनन्तर प्रस्तुत शास्त्र का मुख्य प्रयोजन 'कैवल्य' प्राप्ति बताई गई है। इसलिये इस पाद को 'कैवल्य पाद' के नाम से कहा गया है। इस पाद में सूत्रसंख्या (34) चौतीस है।

समाधि के भेद

योगदर्शन में समाधि के दो भेद माने गये हैं-

  1. सम्प्रज्ञात समाधि
  2. असम्प्रज्ञात समाधि।

सम्प्रज्ञात समाधि

'एकाग्रता' चित्त की वह अविचल अक्षुब्ध अवस्था है, जब ध्येय वस्तु के ऊपर चित्त चिरकाल तक रहता है। इस योग का नाम सम्प्रज्ञात समाधि है, क्योंकि इस अवस्था में चित्त के समाहित होने के लिए कोई न कोई आलम्बन बना रहता है। योग शास्त्र में चित्त की 'एकाग्र' और 'निरुद्ध' इन दो अवस्थाओं का ही विचार किया गया है। 'चित्त' जब सम्पूर्णतया निरुद्ध हो जाता है, तब तीन गुणों से उत्पन्न होने वाली शांत, घोर, और मूढ़ वृत्तियों का उदय उसमें नहीं होता है। 'सम्प्रज्ञात' समाधि में ध्येयपदार्थ का स्वरूप अच्छी प्रकार से समझ में आ जाता है। इस समाधि में ध्यान करने वाले का 'चित्त', वृत्तरहित न होकर ध्येय वस्तुविषयक 'वृत्ति' बनी रहती है। इसलिये इस समाधि को - 'सबीज समाधि' कहा गया है। अन्त:करण की एक विशेष प्रकार की भावना को ही 'समाधि' शब्द से कहा जाता है। समस्त वृत्तियों का लय होकर केवल संस्कारमात्र शेष रहने वाले चित्त के निरोध को असम्प्रज्ञात समाधि कहा जाता है। पर-वैराग्य के सतत अभ्यास करने से यह समाधि हुआ करती है। पर-वैराग्य में चिनतनीय कोई वस्तु नहीं होती, और इस समाधि में कोई ध्येय वस्तु नहीं होती।

वैराग्य और अभ्यास की दृढ़ता के कारण 'चित्त', निर्विषय हो जाता है, तब उससे 'वृत्तियों' की उत्पत्ति का होना बन्द हो जाता है। वृत्तिरहित हुआ 'चित्त', मृतवत् पड़ा रहता है। इस समाधि में संसार के बीजभूत संस्कारों का ही नाश हो जाने से इसे 'निर्बीज समाधि' के नाम से भी कहा जाता है।

असम्प्रज्ञात समाधि

निरुद्ध दशा में असम्प्रज्ञात समाधि का उदय होता है, जब चित्त की समस्त वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं। यहाँ कोई भी आलम्बन नहीं रहता। अत: इसे असम्प्रज्ञात समाधि कहा जाता है। असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था-पूर्णतया प्राप्त होने पर 'आत्मा' अर्थात् 'द्रष्टा' केवल 'चैतन्य' स्वरूप से ही स्थित रहता है। 'आत्मा' स्वभावत: निर्वि कार होने पर भी विकार 'चित्त' में हुआ करते हैं। उस कारण (आत्मा), चित्त की तत्तद्वृत्तियों की सरूपता को प्राप्त हुआ सा अविद्यादोष के कारण प्रतीत होता है। यद्यपि निरोध करने योग्य वृत्तियाँ असंख्य हैं, तथापि पाँच ही वृत्तियाँ मुख्य हैं। अज्ञ मनुष्य में ये पाँच वृत्तियाँ क्लेशकारण हुआ करती हैं। किन्तु जीवनमुक्त के लिए वे वृत्तियाँ क्लेशकारक नहीं होतीं। उपायप्रत्यय और भवप्रत्यय के भेद से 'असम्प्रज्ञात' योग (समाधि) दो प्रकार का होता है। समाधि के अभ्यास में किसी प्रकार के विक्षेप तथा उपद्रव से बाधा न होने के लिये 'ईश्वर' का चिन्तन सतत करते रहना चाहिए। प्राणायाम का अभ्यास करते रहना चाहिए। 'सबीज समाधि' में चित्त की प्रज्ञा 'सत्य' का ही ग्रहण करता है, विपरीत ज्ञान रहता ही नहीं। इसीलिये उस प्रज्ञा को 'ऋतंभरा प्रज्ञा' कहा गया है। इस प्रज्ञा से क्रमश: पर-वैराग्य के द्वारा 'निर्बीज समाधि' का लाभ होता है। उस अवस्था में 'आत्मा' केवल अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है। तब 'पुरुष' को 'मुक्त' समझना चाहिए। ध्येय वस्तु का ज्ञान बने रहने के कारण पूर्व समाधि को 'सम्प्रज्ञात' और ध्येय, ध्यान, ध्याता के एकाकार हो जाने से द्वितीय समाधि को 'असम्प्रज्ञात' कहा जाता है। योग दर्शन का चरमलक्ष्य है आत्म-दर्शन।

योग दर्शन में ईश्वर

योग दर्शन में ईश्वर का स्थान महत्त्वपूर्ण है। योग में जो पुरुष-विशेष क्लेश, कर्मविपाक तथा आशय से असम्पृक्त रहता है, वह ईश्वर कहलाता है- 'क्लेशकर्म-विपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:'। योग के आचार्यों ने ईश्वरसिद्धि में श्रुति-शब्द प्रमाण को सर्वोत्कृष्ट माना है। सांख्य के साथ सिद्धान्तसाम्य होने पर भी योग ईश्वर को मानता है। इस ईश्वर की उपयोगिता योग-साधन में मौलिक है, क्योंकि ईश्वर-प्राणिधान से ही समाधि की सिद्धि होती है। ईश्वर गुरुओं का भी गुरु है, अत: तारक ज्ञान का दाता साक्षात् ईश्वर ही है।

पतञ्जलि योगदर्शन

पतञ्जलि योग दर्शन के स्थूल रूप का यही परिचय है। पतञ्जलि योग-सूत्र पर 'व्यासभाष्य' अत्यन्त प्रमाणिक ग्रन्थ है। योग-सूत्रों के गूढ़ रहस्यों को व्यक्त करने में यह भाष्य अत्यन्त उपयोगी है। योग-सूत्रों की अनेक टीकाएँ हैं, जिनमें भोज कृत 'राजमार्तण्ड' (भोजवृत्ति), भावावेश की 'वृत्ति', रामानन्द यति की 'मणिप्रभा', अनन्त पण्डित की 'योगचन्द्रिका', सदाशिवेन्द्र का 'योगसुधारक' और नागोजि भट्ट की 'लघ्वी' और 'बृहती' वृत्तियाँ प्रसिद्ध हैं। वाचस्पति मिश्र ने व्यास पर 'तत्त्ववैशारदी' टीका लिखकर योग के तत्त्वों को सरल एवं सुबोध बनाया है। इस टीका में योगसूत्र तथा व्यासभाष्य के पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत परिष्कार किया गया है।

योगसूत्र पर लिखी गई टीकाएँ एवं वृत्तियाँ

पतंजलि के योगशास्त्र में निगूढ योग सिद्धान्तों को व्याख्यापित करने हेतु, जो व्याख्याएं लिखी गईं, उन्हें टीका-ग्रन्थों एवं वृत्ति-ग्रन्थों के रूप में विभक्त किया जा सकता है। योगसूत्र पर सबसे पहला व्याख्याग्रन्थ व्यासदेव का है, जो व्याख्याकार के नाम से ‘व्यासभाष्य’ तथा विषय के नाम से 'योगभाष्य' कहलाता है। इसके पश्चात् व्यासभाष्य पर अनेक टीकाएँ लिखी गईं। इतना ही नहीं, योग-सूत्र में आये प्रत्येक शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने हेतु आत्मकेन्द्रित करने वाले अनेक वृत्तिकारों ने वृत्तिग्रन्थ लिखकर पतंजलि योग-साहित्य की अभिवृद्धि की। योगसूत्र पर लिखी गई व्याख्याओं का विवरण अधोलिखित है-

योगसूत्र पर लिखी गई व्याख्याओं का विवरण
व्याख्याकार टीकाएँ और व्याख्याएँ आधारित भाष्य
1- व्यासदेव योगभाष्यम् योगसूत्र पर आधारित भाष्य
2- वाचस्पति मिश्र तत्त्ववैशारदी व्यासभाष्य की टीका
3- राघवानन्दसरस्वती पातञ्जलरहस्यम् तत्त्ववैशारदी की टीका
4- विज्ञानभिक्षु योगवार्त्तिकम् व्यासभाष्य की टीका
5- हरिहरानन्दङ्कर योगभाष्यविवरणम् व्यासभाष्य की टीका
6- नारायणतीर्थ योगसिद्धान्तचन्द्रिका व्यासभाष्य पर आधारित स्वतंत्र टीका
7- भोजदेव राजमार्तण्ड: योगसूत्र की वृत्ति
8- नारायणतीर्थ सूत्रार्थबोधिनी योगसूत्र की वृत्ति
9- नागोजीभट्ट योगसूत्रवृत्ति लघ्वी एवं बृहती वृत्ति
10- रामानन्दयति मणिप्रभा योगसूत्र की वृत्ति
11- अनन्तदेवपण्डित पदचन्द्रिका योगसूत्र की वृत्ति
12- सदाशिवेन्द्र सरस्वती योगसुधाकर: योगसूत्र की वृत्ति
13- बलदेवमिश्र योगप्रदीपिका योगसूत्र की वृत्ति
14- हरिहरानन्छ योगकारिका सरल टीका सहित
15- सत्यदेव योगरहस्य योगसूत्र की स्वतन्त्र टीका
  • योगसूत्र पर लिखे गये यहाँ तक के संस्कृत मूल के समस्त ग्रन्थ प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त योग के उपलब्ध अप्रकाशित वृत्तिग्रन्थ अधोलिखित हैं, जो पाण्डुमातृकाओं के रूप में संस्कृत के प्राच्य-विद्या-प्रतिष्ठानों में संरक्षित हैं-
क्रम व्याख्याकार अप्रकाशित वृत्तिग्रन्थ
1 षिमानन्द योगसूत्रवृति:
2 भवदेवमिश्र योगसूत्रवृत्ति:
3 सुरेन्द्रतीर्थ योगसूत्रवृत्ति:
4 श्रीगोपालमिश्र योगसूत्रविवरणम्
5 पुरुषोत्तमतीर्थ योगसूत्रवृत्ति:
6 वृत्तिकार का नाम ज्ञात नहीं योगसूत्रवृत्ति:

योग दर्शन का महत्त्व

मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्कर्ष में योग अत्यन्त उपयोगी दर्शन है। भारतीयों ने इस दर्शन का अनुशीलन विज्ञान की भाँति किया है और इसे उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचाया है। काय और चित्त के मलों से मुक्त कर पुरुष की आध्यात्मिक समुन्नति में उपयोग करने की शिक्षा योग से ही मिलती है। आज पाश्चात्य मनोविज्ञानिकों तथा चिकित्सकों का भी ध्यान योग की ओर आकृष्ट हुआ है, जिससे उसका विपुल प्रचार पाश्चात्त्य जगत् में भी हो रहा है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. निदिध्यासनञ्चैकतानतादिरूपो राजयोगापरपर्याय: समाधि:। तत्साधनं तु क्रियायोग:, चर्यायोग:, कर्मयोगो, हठयोगो, मन्त्रयोगो, ज्ञानयोग:, अद्वैतयोगो, लक्ष्ययोगो, ब्रह्मयोग:, शिवयोग:, सिद्धियोगो, वासनायोगो, लययोगो, ध्यानयोग:, प्रेमभक्तियोगश्च - योगसिद्धान्तचन्द्रिका पृ. सं. 2।
  2. इति श्रीपातञ्जले सांख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये प्रथम: समाधिपाद:- व्यासभाष्य 1/51 ।
  3. (योगवार्त्तिक 1/4)।
  4. (योगवार्तिक 1/7)
  5. (योगवार्त्तिक 2/19)
  6. (योगवार्त्तिक 3/12)
  7. (योगवार्त्तिक 3/35)
  8. (योगवार्त्तिक 4/12)
  9. (योगवार्त्तिक 4/14)
  10. (योगवार्त्तिक 2/5)
  11. प्रकृतेर्महांस्ततोऽहङ्कारस्तस्माद् गणश्च षोडशक:। तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्च भूतानि ॥ - सांख्यकारिका 22
  12. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनस: स्थितिनिबन्धनी-योगसूत्र 1/35।
  13. चिन्तान्तरदृशयत्वे बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग: स्मृतिसङ्करश्च- योगसूत्र 4/21।
  14. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि- योगसूत्र 2/19।
  15. योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: - योगसूत्र 1/1।
  16. द्रष्ट्टदृश्योपरकक्तं चित्तं सर्वार्थम् – योगसूत्र 4/23।
  17. निरोध: (धर्म:) त्रिलक्षण: त्रिभिरध्वभिरतीतानागतादिकालभेदैर्युक्त....... अनागतो निरोधरूपो धर्मो वर्तमानभूतोऽतीतो भविष्यतीति त्रिलक्षणवियुक्त: भास्वती 3/9 ।
  18. निरोध:..... लयाख्याऽधिकरणस्यैवावस्थाविशेषोऽभावस्यास्मन्मतेऽधिकरणावस्थाविशेषरूपत्वात्- योगवार्त्तिक 1/1।
  19. निरोध: उपशमो निरिन्धनाग्निवत् स्वकारणे लय: - योगसिद्धान्तचन्द्रिका 1/2
  20. अभीष्टविषये सदैव स्थितिशीला चित्तावस्था एकाग्रभूमि:- भास्वती 1/ 2।
  21. सम्यक्ज्ञाकत्वेन योग: सम्प्रज्ञातनामा भवति – योगवार्त्तिक 1। 2 ।
  22. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्ति: - योगसूत्र 1/43।
  23. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञात:- योगसूत्र 1/17 ।
  24. तत्र पूर्वपूर्वभूमिकात्यागेनोत्तरोत्तरभूम्यारोह एकत्रैवालम्बने कार्य: अन्यथा पूर्वपूर्वोपासनातगदोषापत्ते: नागेशमट्टीय बृहत्योगसूत्रवृत्ति 1/17
  25. तस्यापि निरोधे सर्ववृत्तिनिरोधान्निर्बीज: समाधि: - योगसूत्र 1/51।
  26. स खल्वयं द्विविध उपायप्रत्ययो भवप्रत्ययश्च- व्यासभाष्य 1/19 ।
  27. तयोर्मध्य उपायप्रत्ययो योगिनां मोक्षमाणानां भवति- तत्त्ववैशारदी 1/20
  28. यथा वर्षातिपातिमृद्भावमुपगतो मण्डूकदेह: पुनरम्भोदवारिधारावसेकान्मण्डूकदेहभावमनुभवति- तत्त्ववैशारदी 1/19।
  29. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्- योगसूत्र 1/19।
  30. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्- योगसूत्र 1/20।
  31. तत्र मन्दमध्यमोत्तमभेदेन त्रिविधा योगाधिकारिणो भवन्त्यारुरुक्षुयुञ्जानयोगारूढरूपा: - योगसारसंग्रह पृ. सं. 37 ।
  32. अभ्यासवैराग्याभ्यां तत्रिरोध:- योगसूत्र 1/12 ।
  33. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास: - योगसूत्र 1/13 ।
  34. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि:- योगसूत्र 1/14
  35. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् – योगसूत्र 1/16 ।
  36. तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:- योगसूत्र 2/1।
  37. यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टाङ्गानि- योगसूत्र 2/29।
  38. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् – योगसूत्र 3/51।
  39. तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम्- योगसूत्र 1/3।
  40. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसव: कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्ति:- योगसूत्र 4/34।
  41. सत्त्वपुरुषयो: शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्- योगसूत्र 3/55
  42. हेयं दु:खमनागतम्- योगसूत्र 2/16
  43. द्रष्ट्टश्ययो: संयोगो हेयहेतु: - योगसूत्र 2/17।
  44. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपाय:- योगसूत्र 2/26 ।
  45. तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशे: कैवल्यम् 2/25।
  46. एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता: - योगसूत्र 3/13।
  47. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणाम:- योगसूत्र 3/9।
  48. सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणाम: - योगसूत्र 3/11
  49. तत: पुन: शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम: - योगसूत्र 3/12।
  50. शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्त प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम्- योगसूत्र 3/17
  51. क्लेशमूल: कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीय: - योगसूत्र 2/12 ।
  52. सति मूले तद्वियाको जात्यायुर्भौगा: - योगसूत्र 2/13।

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