रक्तचाप  

(अंग्रेज़ी:Blood Pressure) रक्तचाप रक्त का वह दबाव है जो रक्तवाहिनियों की दीवारों पर पड़ता है। उच्च रक्तचाप, जिसे अतिरुधिरतनाव कहते हैं, धमनीगत रोग है। हृदय, जिसका अन्य अंगों से धमनियों द्वारा संबंध होता है, स्पंदन द्वारा रक्त का परिसंचरण कर, शारीरिक अंगों का पोषण करता हैं। धमनियाँ अपने लचीलेपन द्वारा रुधिर को आगे बढ़ाती हैं, परंतु चिंता, क्रोध, अतिपरिश्रम तथा अन्य मानसिक परिवर्तनों के कारण यह लचीलापन कम हो जाता है, जिससे रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इसके फलस्वरूप धमनियों की दीवार पर रक्त का दबाव बढ़ जाता है। इसी को 'उच्च रक्तचाप' कहते हैं। इस अवस्था में सिर घूमना, पलकों का भारीपन, चेहरे पर लाली, मानसिक विकृति, अरुचि, थकावट, क्षुधानाश इत्यादि लक्षण प्रकट होते हैं। इसी समय रक्तचाप का मापन करना चाहिए।

प्रकार

रक्तचाप निम्नलिखित दो प्रकार का होता हैं :

  • प्रकुंचन रक्तचाप अधिकतम रक्तचाप होता है, जो हृदय के आकुंचन काल के समय उत्पन्न होता है।
  • अनुशिथिलन रक्तचाप न्यूनतम रक्तचाप है, जो हृदय के प्रसार काल में उत्पन्न होता है।

प्रकुंचन रक्तचाप

प्रकुंचन रक्तचाप आयु के अनुसार निम्नलिखित होता है:

  • बाल्यावस्था 75 से 90 मिलीमीटर
  • किशोरावस्था 90 से 110 मिलीमीटर
  • युवावस्था 100 से 120 मिलीमीटर
  • प्रौढ़ावस्था 120 से 130 मिलीमीटर
  • वृद्धावस्था 140 से 150 मिलीमीटर
आयु के अनुसार रक्तचाप

आयु के अनुसार प्रकुंचन रक्तचाप निकालने के लिए सामान्यत: आयु में 90 जोड़ देते हैं। 160 से अधिक रक्तचाप विकृति का सूचक है। युवा व्यक्तियों में औसत अनुशिथिलन रक्तचाप 80 मिलीमीटर होता है और 40 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों में लगभग 90 मिलीमीटर होता है। भावावेश के कारण हृदय की गति तीव्र होने से रक्तचाप बढ़ता है। सब व्यक्तियों का रक्तचाप एक सा नहीं होता। एक ही व्यक्ति का रक्तचाप भी समय समय पर बदलता है। स्त्रियों का रक्तचाप पुरुषों से कुछ कम होता है। भारी शरीर वाले व्यक्ति का रक्तचाप हलके भार वाले व्यक्ति से कुछ कम रहता है। कसरत करते समय रक्तचाप कुछ बढ़ जाता है।

कुछ व्यक्तियों का रक्तचाप सामान्य रक्तचाप से कम रहता है। इसका किसी रोग से संबंध नहीं है। ऐसे व्यक्ति उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों से अधिक दीर्घजीवी पाए गए हैं, क्योंकि इनमें उस अति रुधिर तनाव की संभावना नहीं रहती, जिससे उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों की बहुधा मृत्यु होती है।

रक्तचाप मापन यंत्र

1896 ई. में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. रिगरोसी ने रुधिरदाबमापी यंत्र का आविष्कार किया था। इस यंत्र में एक पंप होता है, जिससे रबर की एक नलिका लगी रहती है। यह नलिका आगे चलकर दो भागों में विभक्त हो जाती है, जिससे एक भाग का संबंध पारदयंत्र से रहता है। बाहुबंधक समरूप से बाहु पर कस कर बाँध दिया जाता है और पंप से हवा भरी जाती है। उसी समय कोहुनी के सामने के भाग में स्टेथस्कोप रखकर प्रत्येक स्पंदन के समय की ध्वनि सुनी जाती है। जब बाहुबंधक में वायु का दबाव धमनीगत रक्तचाप से अधिक हो जाता है, तब धमनी दब जाती है और ध्वनि सुनाई नहीं देती, इसके फलस्वरूप पारदयंत्र में भी कंपन नहीं दिखता। अब पंप के पेंच को ढीला करके बाहुबंधक से वायु धीरे धीरे निकाली जाती है। इस समय जैसे ही स्टेथस्कोप से ध्वनि सुनाई दे पारदयंत्र पर लगे पैमाने पर पारे का पाठ्यांक देखा जाता है। यही पाठ्यांक प्रकुंचन रक्तचाप होता है। अधिक वायु निकालने से ध्वनि तीव्रतर होती जाती है, फिर अस्पष्ट हो जाती है तथा अंत में बंद हो जाती है। ध्वनि के एकदम बंद होने के पूर्व अस्पष्ट ध्वनि के समय पारदयंत्र के पाठ्यांक को देख लिया जाता है। यही पाठ्यांक अनुशिथिलन रक्तचाप होता है।

रक्तचाप में परिवर्तन

मलबंध, भावावेश, शारीरिक और मानसिक परिश्रम की अधिकता, रक्तवाहिनियों में रक्त की कमी, हृदय की शक्ति तथा रक्त वाहनियों के परिधीय प्रतिरोध में कमी, रक्त की सांद्रता, रक्तवाहिनियों की प्रत्यास्थता, रक्तवाहिनियों का आयतन, श्वास संबंधी परिणाम तथा शीत एवं उष्णता की कमी बेशीं से रक्तचाप में परिवर्तन होता है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

चौबे, प्रियकुमार “खण्ड 10”, हिन्दी विश्वकोश, 1967 (हिन्दी), भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी, पृष्ठ सं 20।

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=रक्तचाप&oldid=157590" से लिया गया