आंद्रिया देल सार्तो  

आंद्रिया देल सार्तो (1486-1530 ई.) इटली का पुनर्जागरण कालीन प्रसिद्ध चित्रकार। उसका पिता आग्नोलो दर्जी था। अनेक स्थितियों में प्रारंभिक जीवन बिताकर आंद्रिया ने स्वतंत्र चितेरे की वृत्ति आरंभ की। फ्लोरेंस के अनंत्सियाता गिरजे में उसने संत फिलिप्पी बेनित्सी के जीवन की घटनाओं का भित्तिचित्रण किया। अपनी 23 वर्ष की आयु में ही चित्रण की तक्नीक में वह इटली का सर्वोत्तम चितेरा माना जाने लगा था। कुछ लोगों के विचार में तो रफेल भी उसका मुकाबिला नहीं कर सकता था। माइकेल ऐंजेलो के भितिचित्रण अभी प्रारंभिक अवस्था में ही थे। आंद्रिया की शैली शुद्ध और सादी थी। वह एक बार चित्र लिखकर फिर दूसरी बार उसपर ब्रुश कभी नहीं फेरता था। इन भित्तिचित्रों से उसकी इतनी ख्याति हुई कि सर्वत्र से उसका बुलावा आने लगा और काम की बाढ़ आ गई। उसका प्रधान आकर्षण आकृतिचित्रण था। भित्तिचित्रों में भी उसकी चिती आकृतियाँ कुशलतम चितेरों के जोड़ की हैं।[1]

आंद्रिया के विशिष्ट भित्तिचित्र हैं-'कुमारी का जन्म', 'मागी का जलूस', 'बाप्तिस्त का भाषण', 'श्रद्धा', 'दान', 'बाप्तिस्त का शिरच्छेद', 'हिरोद की कन्या का नृत्य', 'मादोना देल साच्चो', 'अंतिम भोज'। उसके आकृतिचित्र लंदन की नैशनल गैलरी, पेरिस के लुब्र, फ्लोरेंस के उफ्फिजी गैलरी आदि के संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं। राजा फ्रांसिस प्रथम के निमंत्रण पर वह फ्रांस गया और वहाँ भी उसने अनेक चित्र लिखे। पर बीच में ही पत्नी के बुलाने से वह स्वदेश लौट गया। उसकी पत्नी लुक्रेत्सिया अत्यंत रूपवती थी और आंद्रिया उसे देखते ही उसपर आसक्त हो गया था। तब वह अन्य की विवाहिता थी, पर पति शीघ्र ही मर गया और प्रेमियों ने तत्काल परस्पर विवाह कर लिया। इस पत्नी के सौंदर्य का आंद्रिया पर इतना गहरा प्रभाव था कि उसके बनाए मदोना (मरियम) के सारे चित्र लुक्रत्सिया के रूप से ही प्रभावित थे। उसके लिखे अन्य आकृतिचित्रों में भी अधिकतर उसी की रूपरेखा उभर आई है। आँद्रिया अपने जन्म के नगर फ्लोरेंस में ही 43 वर्ष की आयु मे प्लेग से मरा। उसकी पत्नी विधवा होकर उसकी मृत्यु के 40 वर्ष बाद तक जीवित रही।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 330 |
  2. सं.ग्रं.-एच.गिन्नेस : आँद्रिया देल सार्तो, 1899; एफ.नाप : आँद्रिया देल सार्तो; बाइलेफेल्ड और लाइप्त्सिग, 1907 ।

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