उर्दू साहित्य  

उर्दू साहित्य उर्दू भाषा की रचनाएं कहलाती हैं। इसे फ़ारसी-अरबी लिपि में लिखा जाता है। कुछ अपवादों को छोड़कर यह साहित्य मुसलमान लेखकों द्वारा लिखा गया, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के जीवन से अपनी विषय-वस्तु को लिया।

उद्गम

15वीं शताब्दी में उर्दू साहित्य ने दक्कन में शुरुआत की और यह तीन शताब्दियों तक फला-फूला। मुग़ल शासकों ने फ़ारसी लेखन को प्रोत्साहन दिया। उर्दू को सबसे पहले दरबारी संरक्षण दक्षिण भारत के गोलकुंडा (वर्तमान हैदराबाद) और बीजापुर में मिला, इसलिए इसे दक्खनी कहा गया। इस भाषा में मौजूद प्राचीनतम कृति कदमराव पदमराव एक काव्यात्मक विवरण है, जिसे निज़ामी (1421-1434) ने लिखा और इसके अलावा वजही (मृत्यु-1631) द्वारा रचित सबरस (1655) रूपक है, जो उनकी मौत के काफ़ी बाद में प्रकाशित हुई।

विकास

उर्दू साहित्य, दक्कन (मध्य भारत) में गोलकुंडा और बीजापुर के क़ुतुबशाही और आदिलशाही राजाओं के दरबार और उसके आसपास 16वीं शताब्दी में विकसित होना शुरू हुआ। 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औरंगाबाद उर्दू साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। दिल्ली व औरंगाबाद के बीच साहित्यिक एवं अभिजात्य गतिविधियों बढ़ीं और आरंभिक 18वीं शताब्दी में वली औरंगाबादी की प्रतिभा की ज़रूरत थी, जिससे दिल्ली व दक्कन के बीच का भाषाई अंतर पाटा जा सके और दिल्ली के शायरों को उर्दू लेखन को गंभीरता से लेने के लिए राज़ी किया जा सके। 18वीं शताब्दी में शायरों के दिल्ली से लखनऊ जाने के कारण लखनऊ उर्दू काव्य का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया, हालांकि दिल्ली ने अपना स्थान बनाए रखा।

स्वर्णिम काल

18वीं और 19वीं शताब्दी को शास्त्रीय उर्दू साहित्य का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस काल के महान् लेखकों में- मीर तक़ी मीर (मृत्यु- 1810), सौदा (मृत्यु-1781), ख़्वाजा मीर दर्द (मृत्यु-1784), इंशा (मृत्यु-1817), मुशाफ़ी (मृत्यु-1824), नासिख (मृत्यु-1838), आतिश (मृत्यु-1847), मोमिन (मृत्यु-1852), ज़ौक (मृत्यु-1854) और ग़ालिब (मृत्यु- 1869) शामिल हैं। सभी वर्णनात्मक और कथात्मक उदेश्यों के लिए मसनवी शैली को पसंद किया जाता था, क्योंकि इसमें बहुत स्वतंत्रता थी (केवल प्रत्येक शेर की पक्तियों का क़ाफ़िया मिलना चाहिए था)। दक्कन में सभी प्रमुख शायरों ने कम से कम एक लंबी मसनवी लिखी, लेकिन उनकी बोली से अपरिचय के कारण उन्हें उतनी प्रशंसा नहीं मिली। अत: अधिक प्रसिद्ध मसनवियां दिल्ली व लखनऊ के बाद के शायरों, जैसे मीर, मीर हसन, दया शंकर नसीम और मिर्ज़ा ज़ौक़ ने लिखीं। वर्णनात्मक मसनवियों के विषय, दैनिक जीवन की घटनाओं से बादशाहों की शिकार यात्राओं तक और प्रकृति की विभिन्न ऋतुओं के रंगों से आत्मकथात्मक निबंधों तक विस्तृत थे। कथात्मक मसनवियां अपेक्षाकृत लंबी होती हैं और उनमें हज़ारों शेर होते हैं। दक्कन में बहुत से शायरों ने फ़ारसी मसनवियों के संक्षिप्त रूपांतरण लिखे, लेकिन बहुत से अन्य रचनाकारों ने मूल रचनाएं लिखीं, जिनमें भारतीय और साथ ही फ़ारसी व अरबी रूमानियत थी।
इन मसनवियों में फ़ारसी व अरबी कविताओं से प्रेरित नायकों के नामों के अलावा बाक़ी सब कुछ स्थानीय था, कुदरती नज़ारे, शहरी जीवन, जुलूस, परंपराएं, रीति-रिवाज, सामाजिक मूल्य और पाबंदिया, यहां तक कि लोगों के रूप-रंग भी पूरी तरह भारतीय थे, हालांकि वे मुख्यत: मुसलमान और सामंती थे। अपनी लंबाई के बावजूद इन रचनाओं को बहुत लोकप्रियता मिली और कम से कम उत्तरी भारत में इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर अक्सर उसी तरह पढ़ा जाता था, जैसे कथावाचक कथाएं सुनाते हैं। मसनवी शैली का कुछ हिंदी सूफ़ी कवियों ने भी उपयोग किया। एक अन्य शैली मर्सिया है, जिसका अर्थ शोकगीत है, लेकिन उर्दू साहित्य में आमतौर पर इसका अर्थ हुसैन (मुहम्मद के पोते) के परिवार व रिश्तेदारों के कष्टों पर शोकगीत और इराक़ के कर्बला में उनकी क़ुर्बानी है। ये शोकगीत और अन्य विलाप गीत सार्वजनिक जनसमूह में पढ़े जाते हैं, ख़ासकर मुहर्रम के महीने में। दक्कन और दिल्ली में बहुत से मर्सिए लिखे गए, लेकिन यह लखनऊ था, जहां शिया मुस्लिम विशिष्ट वर्ग और शाही संरक्षण में मर्सिए को वीरगाथा काव्य की गति और विस्तार मिला।

नज़ीर अकबराबादी

एक कवि ऐसे भी हैं, जिन्हें उनके साथी कवियों द्वारा शास्त्रीय फ़ारसी-अरबी परंपराओं को न मानने वाला कहा जा सकता है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और आरंभिक 19वीं शताब्दी में लिखने वाले नज़ीर अकबराबादी (मृत्यु-1830) एक ऐसे बेहतरीन शायर थे, जिन्होंने आम और साहित्यिक भाषा में छोटी नज़्में (विभिन्न शैलियों में) लिखना चुना। उनके विषय भी ऐसी ही उदारता प्रदर्शित करते हैं। उनकी रचनाओं में विभिन्न विषयों, जैसे लोकप्रिय त्योहारों, ऋतुओं, जीवन की निस्सारता, श्रृंगारिक आनंद व आमोद-प्रमोद, नाचते भालू और कंजूस व्यापारियों पर कविताएं हैं। उनकी सूक्ष्म वर्णन की महारत किसी भी घटना को फ़ौरन जीवंत कर देती है। अपने समय के अभिजात्य कवियों और साहित्यिक इतिहासकारों द्वारा नज़रांदाज़ किए गए नज़ीर को सर्वश्रेष्ठ शायरों में से एक के रूप में सम्मान व मान्यता मिलती चली गई है।

मीर अनीस एवं मिर्ज़ा दबीर

19वीं सदी के दो महान् रचनाकार थे, मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर, जिन्होंने मिलकर मुसद्दा (छह पंक्तियों का छंद, जिसमें 'आ' और 'ब' क़ाफ़ियों था) को मर्सिए की शैली के रूप में स्थापित किया और इसमें कई नए विषय व वर्णन जोड़े, इससे यह शैली साधारण शोल रचनाओं से कहीं अधिक विस्तृत हुई। मर्सिया में लखनऊ के अनीस (मृत्यु-1874) और दबीर (मृत्यु-1871) का कोई सानी नहीं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के समकालीन ग़ालिब को शास्त्रीय रचनाकारों में अंतिम और शुरुआती आधुनिक रचनाकारों में पहला माना जाता है। उनकी रचनाओं ने आधुनिक पद्य के मानक गढ़े, उनके बाद सर सैयद अहमद ख़ाँ (मृत्यु-1898), हुसैन आज़ाद (मृत्यु-1910), हाली (मृत्यु-1914) और शिबली (मृत्यु-1914) आए। 19वीं सदी के आख़िर में तिलिस्म-ए-होशरूबा (1881-1917) जैसी विशाल कथाओं ने छोटी गद्यात्मक कहानियों, जैसे मीर अम्मान द्वारा लिखित बाग़ो-बहार (1802) और रजब अली बेग़ सुरूर द्वारा लिखित फ़साना-ए-अजायब (1831) को स्थाब दिया। उर्दू उपन्यास की शुरुआत नज़ीर अहमद (मृत्यु-1912), रतननाथ सरशार (मृत्यु-1902) और मुहम्मद हादी रूसवा (मृत्यु-1931) की रचनाओं से हुई। क़सीदा ऐसी कविताएं थीं, जो किसी उदेश्य से लिखी जाती थीं, यह उदेश्य बादशाहों और कुलीनों की तारीफ़ से भौतिक लाभ और ख़ुदा, पैग़ंबर मुहम्मद या अन्य पवित्र सस्तियों की तारीफ़ से पराभौतिक लाभ था। ये गुणगान अधिकतर ख़ासे लंबे हैं और अत्यधिक अलंकृत और अतिश्योक्तिपूर्ण हैं, इनमें शायर बहुत से क़ाफ़ियों का इस्तेमाल, और जहां तक हो सके संबद्ध विषय-वस्तुओं की खोजकर अपने कौशल का प्रदर्शन करने की प्रतिस्पर्द्धा करते दिखते हैं। अपनी शैली और भाषा के कारण वे कोशकारों के लिए विशेष महत्त्व के हैं। दक्कन में लिखे गए क़सीदों पर अधिक शोध नहीं हुआ है, लेकिन उत्तरी भारत में बहुत से कवियों को इस शैली में उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मान प्राप्त है। 18वीं सदी में सौदा और इंशा, 19वीं सदी में ज़ौक और ग़ालिब इनमें शामिल हैं। हाजू (व्यक्तिगत या कतिवाएं) उतनी ही लंबी, लेकिन कम अलंकृत और अधिक शिक्षाप्रद हैं। वे 18वीं से मध्य 19वीं सदी के बीच के काल की नैतिकता पर उपयोगी जानकारी देती हैं और तत्कालीन समाज की समस्याओं का स्पष्ट चित्रण करती हैं। ये रचनाएं किसी विशेष मीटर या छंद प्रणाली तक सीमित नहीं है। इस शैली के एक प्रसिद्ध रचनाकार सौदा हैं।

आधुनिक काल

वास्तव में उर्दू गद्य 19वीं सदी के दिल्ली कॉलेज व कलकत्ता के फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में फ़ारसी दास्तानों के अनुवाद और बाद में अलीगढ़ आंदोलन के लेखकों के साथ शुरू हुआ। आधुनिक उर्दू उपन्यास की शुरूआत प्रेमचंद (मृत्यु-1936) से हुई, जिनके 'गोदान' को शास्त्रीय रचना माना जाता है। अन्य प्रसिद्ध आधुनिक गल्प लेखन में सआदत हसन मंटो (मृत्यु-1955) की 'लद्यु कथाएं', कुर्रतुलऐन हैदर का उपन्यास 'आग का दरिया' (1960), अब्दुल्ला हुसैन का 'उदास नसलीन' (1963) राजिंदर सिंह बेदी का 'एक चादर मैली सी' (1962) और इंतिज़ार हुसैन का 'बस्ती' (1979) शामिल हैं। अल्लामा इक़बाल (मृत्यु-1838?) को 20वीं शताब्दी के श्रेष्ठतम उर्दू शायरों में से एक माना जाता है। अन्य मशहूर साहित्यिक हस्तियों में एन.एम. राशिद (मृत्यु-1982), मीराजी (मृत्यु-1949) जोश मलीहाबादी (मृत्यु-1982), फ़िराक़ गोरखपुरी (मृत्यु-1982), फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (मृत्यु-1984), मख़्दूम मुहिउद्दीन (मृत्यु-1969) और अख़्तर-उल-ईमान (1996) शामिल हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • पुस्तक- भारत ज्ञानकोश खंड-1 | पृष्ठ संख्या- 240| प्रकाशक- एन्साक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, नई दिल्ली

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