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कश्मीरी साहित्य  

कश्मीरी साहित्य कश्मीरी भाषा का रचना संसार है। सम्भवत: शैव सिद्धों ने पहले कश्मीरी को शैव दर्शन का लोक सुलभ माध्यम बनाया और बाद में धीरे-धीरे इसका लोक साहित्य भी लिखित रूप धारण करता गया। किन्तु राष्ट्रीय और सांस्कृतिक आश्रय से निरंतर वंचित रहने के कारण इसकी क्षमताओं का भरपूर विकास दीर्घ काल तक रुका ही रहा। कश्मीरी साहित्य में साहित्यिक सृजनशीलता की शुरुआत श्रीकान्त आचार्य की कृति 'महानाय प्रकाश' से मानी जाती है।

परम्पराएँ

कश्मीरी साहित्य में तीन प्रमुख परम्पराएँ निहित हैं-

  1. शैव (त्रिकशास्त्र जैसी परंपराओं से भिन्न)
  2. भक्ति
  3. कश्मीर में सूफ़ी ऋषि कहे जाने वाले इस्लामी अध्यात्मवादियों द्वारा संप्रेषित व उपदेशिक परंपरा।

इन परम्पराओं की विषयगत व भाषाई पृष्ठभूमि तथा इतिहास या कालक्रम प्रामाणिकता कश्मीरी साहित्य की साहित्यिक सृजनशीलता से परिलक्षित होती है। श्रीकांत आचार्य की कृति 'महानाय प्रकाश'[1] से इसका आरंभ माना जाता है, जो गूढ़ तांत्रिक मत का शास्त्र है। सर्वगोचर देसी भाषा[2] में इसकी रचना का प्रयास हुआ था। लेकिन प्रमुख स्रोत शैव रहस्यवादी 'लल्लेश्वरी'[3] की 'वाक' नाम से ज्ञात रचना है, जो मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित और संचारित हुई है।[4]

विद्वान

लल्ल के 'वाक' विभिन्न लिंगों, धर्मों व पीढ़ियों के विद्वत और सामान्य कश्मीरियों के प्रबंधों का अभिन्न अंग हैं। पश्चिमी और स्थानीय विद्वानों ने इसकी कई भिन्न-भिन्न व्याख्याएं की हैं। उनके कनिष्ठ समकालीन और कश्मीर के एक रहस्यवादी सिद्ध संत शेख़ नूरुद्दीन[5] ने 'श्रुख' नामक उपदेशात्मक छंदों की रचना की, जो 'वाक' से कुछ अलग है। अवंत भट्ट (लगभग 1446) का महाकाव्य 'बाणासुर कथा' हरिवंशपुराण की पौराणिक कथा पर आधारित है। इसी काल में साहब कौल (जन्म-1629 ई.) और मिर्ज़ा अकमालु दीनबेग़ ख़ां बदख़्शी (1642- 1717 ई.) भी हुए थे।

मध्यकालीन विद्वान

मध्य काल (1500-1717 ई.) में भाषाई और विषयगत फ़ारसीकरण, लॉल गीतों की रचयिता हब्बा ख़ातून (16वीं शताब्दी) और 'वाक' के निपुण रचयिता ख़्वाजा हबीबुल्ला नौशहरी (1555-1617 या 1618 ई.) की कृतियों में स्पष्ट हुआ। महिला अध्यात्मवादी रूपा भवानी (1621-1721 ई.) ने अत्यंत संस्कृतनिष्ठ वाकों की रचना की, जिनमें गूढ़ रहस्यवादी अनुभवों का उल्लेख है। एक अन्य कवयित्री अरनिमाल (मृत्यु-1800 ई.) ने लॉल को विषादपूर्ण स्वर प्रदान किया, जो हब्बा ख़ातून के लॉल की विषयासक्ति और भावप्रवण भावातिरेक से मुक्त है। मध्य काल में फ़ारसी भाषा के साहित्य की 'ग़ज़ल' और 'मसनवी' जैसी शैलियां और फ़ारसी के साहित्यिक विधान संस्थापित हो गए। साहित्यिक प्रतिमानों व शैलियों के सम्मिलन वाली दो समानांतर प्रवृत्तियां थीं। वेदांतिक दर्शन से प्रभावित लाक्षणिक सूफ़ी (रहस्यवादी) काव्य और भक्ति काव्य। रहस्यवादी अज़ीज़ दरवेश (मृत्यु-1819 ई.), मसनवी के माहिर महमूद गमी (1765-1855 ई.), वलीउल्लाह मट्टू (मृत्यु-1859 ई.), रसूल मीर (मृत्यु-1870 ई.) और कश्मीरी की मसनवी परंपरा की उत्कृष्ट रचना 'गुलरेज़' के रचयिता मक़बूल शाह क्रालवारी (1820-1875 ई.) की कृतियों में सूफ़ी प्रभाव परिलक्षित होता है। परमानंद (1791-1874 ई.), लछमन रैना (1812-1898?) और प्रकाशराम (1819-1885 ई.) की उपदेशात्मक कविताओं, भजनों, स्तुतियों में तथा कृष्णा राज़दान के नवीन एवं निपुणतापूर्ण रचित भजनों में भक्ति प्रभाव दिखाई देता है।[4]

आधुनिक विद्वान

आधुनिक काल (1900-1947 ई.) में धीरे-धीरे भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन घाटी में पहुंचे। 1930 के दशक में कश्मीरियों की पहचान और सामाजिक-राजनीतिक सशक्तिकरण की मांग, शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला (1905-1982 ई.) के राजनीतिक नेतृत्व में एक सशक्त आवाज़ बन गई। फ़ारसी भाषा की प्रधानता कम हो रही थी और राज्य के डोगरा शासक महाराजा प्रताप सिंह (1885-1925 ई.) के प्रयासों के कारण उर्दू ने धीरे-धीरे दरबारी भाषा का स्थान ले लिया। आधुनिक कवि अहमद महजूर (1885-1952 ई.), मूर्धन्य एवं आध्यात्मिक जिंदां कौल 'मास्टरजी' (1884-1965 ई.) और क्रांतिकारी विचारक अब्दुल अहद आज़ाद (1903 ई.), हालांकि अपने विचारों व शैलियों में काफ़ी भिन्नता रखते थे, लेकिन इस त्रिमूर्ति ने उस धारा का मार्ग प्रशस्त किया, जो आधुनिक काल की विशेषता है।

महजूर ने गीतात्मक लय, विषयगत परिवर्तन, 'मास्टरजी' ने भव्यता आत्मविश्लेषण एवं आज़ाद ने नए सामाजिक और वैचारिक प्रगतिवाद की शुरुआत की, जो उस समय तक कश्मीरी साहित्य में लगभग अज्ञात था। यह नया प्रभाव ग़ुलाम हसन आरिफ़ (जन्म-1910 ई.), अब्दुल ज़रगर (1908ई.), मीर ग़ुलाम रसूल नज़्की (1910-1998 ई.) दीनानाथ वली अलमस्त (1910 ई.), ग़ुलाम नबी दिलसोज़ (1916-1941 ई.) और ग़ुलाम अहमद फाज़िल (1914-?) जैसे साहित्यकारों की कृतियों में दृष्टिगोचर हुआ। इन्होंने तथा अन्य युवा कवियों ने साहित्यिक सृजनात्मकता और विचारों में आधुनिक धारा को सशक्त लिया।

साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रयास

पुनर्जागरण विभाजन के बाद (1947-1980) कश्मीर की सीमाओं से परे शुरू हुए और बाद में घाटी में भी पहुंचे संघर्ष का परिणाम था। इन आक्रमणों के परिणामस्वरूप कई साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रयासों की शुरुआत हुई, जो प्राथमिक रूप से कश्मीरियों को संगठित करने के लिए थीं। लेखकों, अभिनेताओं और चित्रकारों के सांस्कृतिक मंच के गठन, रेडियो कश्मीर की स्थापना (1948), जिसने कश्मीरी भाषा में कई विधाओं को स्थापित करने का अभूतपूर्ण अवसर प्रदान किया। इसी का परिणाम बाद में 'जम्मू-कश्मीर अकैडमी ऑफ़ आर्ट, कल्चर ऐंड लैंग्वेजेज़' की स्थापना था। समस्याओं से भरे निराशा व अनिश्चितता के काल के इस संदर्भ में कई अन्य लेखकों और कलाकारों की भांति दीनानाथ नादिम (1916-1988) ने चुनौती को स्वीकारा और नवजागृति आंदोलन के रचनाकार बन गए। नादिम ने अतुलनीय शैलीगत प्रवीणता, देसी ध्वनियों और तालों के प्रति रुचि तथा काल्पनिक व वर्णनात्मक उल्लेखों के प्रति सहज प्रवृत्ति व प्रवीणता का प्रदर्शन किया। वह उस काल के सर्वाधिक परिवर्तनकारी और आत्मविश्लेषक कवि थे, जिसे उनके नाम पर अब 'नादिम युग' कहा जाता है।[4]

प्रगतिशील लेखक आंदोलन

1930 के दशक में उपमहाद्वीप के साहित्य परिदृश्य में व्याप्त प्रगतिशील लेखक आंदोलन की विचारधाराओं, विषय-वस्तुगत प्रयोगों और सामाजिक यर्थार्थवाद का सशक्त, व्यापक और लगातार प्रभाव 1940 के दशक के उत्तरार्ध में कश्मीर पहुंचा। नादिम व उनके युवा समकालीन इस आंदोलन के सक्रिय भागीदार थे। इनमें माहिर गज़लकार मुहम्मद अमीन कामिल (1924 ई.) और अब्दुल रहमान राही (1925 ई.) शामिल थे, जो शुरू में दीनानाथ नादिम से काफ़ी हद तक प्रभावित थे और बाद में नई धारा के कवि बन गए। नूर महम्मद रोशन और गुलाब नबी फिराक में नादिम के प्रतिमानों से कुछ परिवर्तन दिखाई देता है। काव्य प्रयोग कुछ कवियों की कृतियों में जारी रहे, जिसमें गुलाब नबी फ़िराक़, अर्जुन देवे मजबूद, मोतीलाल साक़ी (1936-1999 ई.) चमनलाल चमन (1936) और गुलाब नबी आरिज़ (1916-1965 ई.) उल्लेखनीय हैं।

साहित्यिक गद्य का विकास

कश्मीरी भाषा में साहित्यिक गद्य का विकास 1940 के दशक में हुआ। आरंभिक गंभीर प्रयोग पुनर्जागरण के साथ ही शुरू हुए। इससे पहले का गद्य मुख्यत: 'लुककथा', लोककथा संग्रह था। साथ ही 'बाइबिल' से संबंधित पुस्तकों, जैसे- 'न्यू टेस्टामेंट' (लगभग 1821), 'पेंटाट्युक' (1927) और 'जोशुआ ऐंड किंग्स' (1835) के कई अनुवाद शारदा लिपि में और 'न्यू टेस्टामेंट' (1884) का अनुवाद नस्तालिक लिपि में उपलब्ध था।

नई शैली में रचना

सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और वैचारिक संघर्ष ने इस काल में नई तथा विकासशील शैली की विषयवस्तु की रचना की, जिसमें कहानियां भी शामिल थीं। इस शैली की शुरुआत 1950 में सोमनाथ जुत्शी और दीनानाथ नादिम ने की थी। मोहिउद्दीन हजानी ने नाटकों, नंदलाल कौल ने पौराणिक नाटकों, अमीन कामिल व अख़्तर मोहिउद्दीन ने उपन्यासों और दीनानाथ नादिम ने गीतिनाट्य की रचना की। 1940 में कवि महजूर ने 'गश' (प्रकाश) पत्रिका से साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत की; आलोचनात्मक और तर्कमूलक गद्य अभी भी शैशवावस्था में है। आलोचनात्मक गद्य के आरंभिक प्रयास 'कॉंगपोश' (केसर का फूल) में 1947 में और समय-समय पर प्रकाशित अल्पजीवी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।[4]

1990 के दशक में कश्मीर घाटी और सीमावर्ती क्षेत्र में आतंकवाद की तीव्रता तथा इसके प्रभाव ने पुनर्जागरण के दौरान कश्मीरी भाषा में आई गति को रोक दिया। घाटी में और अन्यत्र बसे मुठ्टी भर समकालीन कश्मीरी लेखकों की रचनओं का आलोचनात्मक अध्ययन और विवेचन किया जाना शेष है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 13वीं शताब्दी
  2. सबको समझ में आने वाली देशी भाषा
  3. लल्ला आरिफ; 1335?
  4. 4.0 4.1 4.2 4.3 भारत ज्ञानकोश, खण्ड-1 |लेखक: इंदु रामचंदानी |प्रकाशक: एंसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली और पॉप्युलर प्रकाशन, मुम्बई |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 339 |
  5. 1377-1438, इन्हें 'नुंद रयोश' या 'सहजानंद' भी कहा जाता है

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