खगोल विज्ञान  

खगोल विज्ञान विज्ञान का प्राचीनतम विज्ञान है, जिसका अध्ययन सूर्य, और चंद्र और दृश्य ग्रहों के साथ शुरू हुआ। आधुनिक खगोलवेत्ता अभी भी खगोलीय वस्तुओं की स्थिति, चमक, अगति तथा अन्य पर्यवेक्षण योग्य विशेषताओं के अध्ययन तथा खगोलीय मेकानिक्स के नियमों के आधार पर उनकी गति के बारे में भविष्यवाणी करने में लगे हैं। खगोल भौतिकी शास्त्रीय खगोल विज्ञान से 19वीं-20वीं सदी में उत्पन्न हुई है जो क्वांटम मेकनिक्स, सापेक्षता का सिद्धांत और अणु, परमाणु, नाभिकीय और आरंभिक कणीय भौतिकी के उपयोग द्वारा पर्यवेक्षित खगोलीय घटनाओं की व्याख्या करता है। खगोल भौतिकवेत्ता ब्रह्मांड के संघटकों को तापमान, दाब, घनत्व और रासायनिक बनावट के रूप में चरित्र चित्रित करते हैं।

परिभाषा

यद्यपि खगोल वेत्ता शब्द अभी भी उपयोग होता है किन्तु वास्तविकता में सभी खगोलवेत्ताओं का प्रशिक्षण खगोल भौतिकी में होता है। आधुनिक खगोल विज्ञान का वृहद् लक्ष्य एक सम्मिलित समग्र सिद्धांत का विकास करना है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति, विकास और संभावित घनत्व की व्याख्या कर सके। दूसरे शब्दों में, प्रयास का ऐसा क्षेत्र जिसे कास्मोलॉजी या ब्रह्मांडिकी के नाम से जाना जाए।

खगोलिकी का विषय

खगोलिकी ब्रह्मांड में अवस्थित आकाशीय पिंडों की ज्योति, रचना और उनके व्यवहार का अध्ययन खगोलिकी का विषय है। अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है उसमें लगभग 19 अरब आकाश गंगाएं होने का अनुमान है और प्रत्येक आकाश गंगा में लगभग 10 अरब तारे हैं। आकाश गंगा का व्यास लगभग एक लाख प्रकाशवर्ष है। हमारी पृथ्वी पर आदिम जीव 2 अरब साल पहले पैदा हुआ, और आदमी का धरती पर अवतण 10-20 लाख साल पहले हुआ।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति

वैज्ञानिकों के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महापिंड के विस्फोट से हुई है। सूर्य एक औसत तारा है जिसके नौ मुख्य ग्रह हैं, उनमें से पृथ्वी भी एक है। इस ब्रह्मांड में हर एक तारा सूर्य सदृश है। बहुत-से तारे तो ऐसे हैं जिनके सामने अपना सूर्य रेणु (कण) के बराबर भी नहीं ठहरता है। जैसे सूर्य के ग्रह हैं और उन सबको मिलाकर हम सौरपरिवार के नाम से पुकारते हैं, उसी प्रकार हरेक तारे का अपना अपना परिवार है। बहुत से लोग समझते हैं कि सूर्य स्थिर है, लेकिन संपूर्ण सौर परिवार भी स्थानीय नक्षत्र प्रणाली के अंतर्गत प्रति सेकेंड 13 मील की गति से घूम रहा है। स्थानीय नक्षत्र प्रणाली आकाश गंगा के अंतर्गत प्रति सेकेंड 200 मील की गति से चल रही है और संपूर्ण आकाश गंगा दूरस्थ बाह्य ज्योर्तिमालाओं के अंतर्गत प्रति सेकेंड 100 मील की गति से विभिन्न दिशाओं में घूम रही है।

चंद्रमा और पृथ्वी

चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिस पर मानव के क़दम पहुँच चुके हैं। इस ब्रह्मांड में जो सबसे विस्मयकारी दृश्य है। वह है आकाश गंगा (गलैक्सी) का दृश्य। रात्रि के खुले (जब चंद्रमा न दिखाई दे) आकाश में प्रत्येक मनुष्य इन्हें नंगी आँखों से देख सकता है। देखने में यह हलके सफेद धुएँ जैसी दिखाई देती है, जिसमें असंख्य तारों का बहुल्य है। यह आकाश गंगा टेढ़ी-मेढ़ी होकर बही है। इसका प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर है। पर प्रात:काल होने से थोड़ा पहले इसका प्रवाह पर्वोत्तर से पश्चिम और दक्षिण की ओर होता है। देखने में आकाश गंगा के तारे परस्पर सटे से लगते हैं, पर यह दृष्टि भ्रम है। परस्पर सटे हुए तारों के बीच की दूरी अरबों मील हो सकती है। जब सटे हुए तारों का यह हाल है तो दूर दूर स्थित तारों के बीच की दूरी ऐसी गणनातीत है जिसे कह पाना मुश्किल है। अतएव ताराओं के बीच तथा अन्य लंबी दूरियाँ प्रकाशवर्ष में मापी जाती हैं। एक प्रकाशवर्ष वह दूरी है जो दूरी प्रकाश एक लाख छियासी हज़ार मील प्रति सेकेंड की गति से एक वर्ष में तय करता है। उदाहरण के लिये सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सवा नौ करोड़ मील है, प्रकाश यह दूरी सवा आठ मिनट में तय करता है। अत: पृथ्वी से सूर्य की दूरी सवा आठ प्रकाश मिनट हुई। जिन तारों से प्रकाश आठ हज़ार वर्षों में आता है, उनकी दूरी हमने पौने सैंतालिस पद्म मील आँकी है। लेकिन तारे तो इतनी इतनी दूरी पर हैं कि उनसे प्रकाश के आने में लाखों, करोड़ों, अरबों वर्ष लग जाता है। इस स्थिति में हमें इन दूरियों को मीलों में व्यक्त करना संभव नहीं होगा, और न कुछ समझ में ही आएगा। अतएव प्रकाशवर्ष की इकाई का वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया है।

मान लीजिए, ब्रह्मांड के किसी और नक्षत्रों आदि के बाद बहुत दूर दूर तक कुछ नहीं है- लेकिन यह बात अंतिम नहीं हो सकती है- और मान लीजिए उसके बाद कुछ है तो तुरंत यह प्रश्न सामने आ जाता है कि वह कुछ कहाँ तक है और उसके बाद क्या है? इसीलिए हमने इस ब्रह्मांड को अनादि और अनंत माना। इसके अतिरिक्त अन्य शब्दों में ब्रह्मांड की विशालता, व्यापकता व्यक्त करना संभव नहीं है।

अंतरिक्ष में कुछ स्थानों पर दूरदर्शी से गोल गुच्छे दिखाई देते हैं। इन्हें स्टार क्लस्टर या ग्लीट्र्यूलर स्टार अर्थात्‌ तारा गुच्छ कहते हैं। इसमें बहुत से तारे होते हैं जो बीच में घने रहते हैं और किनारे विरल होते हैं। दूरदर्शी से आकाश में देखने पर कहीं कहीं कुछ धब्बे दिखाई देते हैं। ये बादल के समान बड़े सफेद धब्बे से दिखाई देते हैं। इन धब्बों को ही नीहारिका कहते हैं। इस ब्रह्मांड में असंख्य नीहारिकाएँ हैं। उनमें से कुछ ही हम देख पाते हैं।

इस अपरिमित ब्रह्मांड का अति क्षुद्र अंश हम देख पाते हैं। आधुनिक घोषणाओं के कारण जैसे जैसे दूरबीन की क्षमता बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ब्रह्मांड के इस दृश्यमान क्षेत्र की सीमा बढ़ती जाती है, पर यह निर्विवाद सत्य है कि ब्रह्मांड की पूरी थाह मानव क्षमता की कल्पना के भी परे है।

खगोल भौतिकी

खगोल भौतिकी का आधुनिक युग जर्मन भौतिकविद् किरचाक से आरंभ हुआ। सूर्य के वातावरण में सोडियम, लौह, मैग्नेशियम, कैल्शियम तथा अनेक अन्य तत्वों का उन्होंने पता लगाया। हमारे देश में स्वर्गीय प्रोफेसर मेघनाद साहा ने सूर्य और तारों के भौतिक तत्वों के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने वर्णक्रमों के अध्ययन से खगोलीय पिंडों के वातावरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण खोजें की हैं। वर्तमान में भारत के दो प्रख्यात वैज्ञानिक डा. एस. चंद्रशेखर और डा. जयंत विष्णु नारलीकर भी ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में उलझे हुए हैं।

बहुत पहले निकोलस कॉपरनिकस, टाइको ब्राहे और मुख्यत: कैप्लर ने खगोल विद्या में महत्वपर्णू कार्य किया था। कैप्लर ने ग्रहों के गति के संबंध में जिन तीन नियमों का प्रतिपादन किया है वे ही खगोल भौतिकी की आधारशिला बने हुए हैं। खगोल विद्या में न्यूटन का कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण और शानदार रहा है।

ब्रह्मांड विद्या के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों घोषणाओं के फलस्वरूप महत्त्वपूर्ण बातें समाने आई हैं। विख्यात वैज्ञानिक हवल ने अपने निरीक्षणों से ब्रह्मांडविद्या की एक नई प्रक्रिया का पता लगाया। हबल ने सुदूर स्थित आकाश गंगाओं से आने वाले प्रकाश का परीक्षण किया और बताया कि पृथ्वी तक आने में प्रकाश तरंगों का कंपन बढ़ जाता है। यदि इस प्रकाश का वर्णपट प्राप्त करें तो वर्णपट का झुकाव लाल रंग की ओर अधिक होता है। इस प्रक्रिया को डोपलर प्रभाव कहते हैं। ध्वनि संबंधी डोपलर प्रभाव से बहुत लोग परिचित होंगे। जब हम प्रकाश के संदर्भ में डोपलर प्रभाव को देखते हैं तो दूर से आने वाले प्रकाश का झुकाव नीले रंग की ओर होता है और दूर जाने वाले प्रकाश स्रोत के प्रकाश का झुकाव लाल रंग की ओर होता है। इस प्रकार हबल के निरीक्षणों से यह मालूम हुआ कि आकाश गंगाएं हमसे दूर जा रही हैं। हबल ने यह भी बताया कि उनकी पृथ्वी से दूर हटने की गति, पृथ्वी से उनकी दूरी के अनुपात में है। माउंट पोलोमर वेधशाला में स्थित 200 इंच व्यास वाले लेंस की दूरबीन से खगोल शास्त्रियों ने आकाश गंगाओं के दूर हटने की प्रक्रिया को देखा है।

दूरबीन से ब्रह्मांड को देखने पर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम इस ब्रह्मांड के केंद्रबिंदु हैं और बाकी चीज़ें हमसे दूर भागती जा रही हैं। यदि अन्य आकाश गंगाओं में प्रेक्षक भेजे जाएँ तो वे भी यही पायेंगे कि इस ब्रह्मांड के केंद्र बिंदु हैं, बाकी आकाश गंगाएं हमसे दूर भागती जा रही हैं। अब जो सही चित्र हमारे सामने आता है, वह यह है कि ब्रह्मांड का समान गति से विस्तार हो रहा है। और इस विशाल प्रारूप का कोई भी बिंदु अन्य वस्तुओं से दूर हटता जा रहा है।

हबल के अनुसंधान के बाद ब्रह्मांड के सिद्धांतों का प्रतिपादन आवश्यक हो गया था। यह वह समय था जब कि आइन्सटीन का सापेक्षवाद का सिद्धांत अपनी शैशवावस्था में था। लेकिन फिर भी आइन्सटीन के सिद्धांत को सौरमंडल संबंधी निरीक्षणों पर आधारित निष्कर्षों की व्याख्या करने में न्यूटन के सिद्धांतों से अधिक सफलता प्राप्त हुई थी। न्यूटन के अनुसार दो पिंडों के बीच की गुरु त्वाकर्षण शक्ति एक दूसरे पर तत्काल प्रभाव डालती है लेकिन आइन्सटीन ने यह साबित कर दिया कि पारस्परिक गुरु त्वाकर्षण की शक्ति की गति प्रकाश की गति के समान तीव्र नहीं हो सकती है। आखिर यहाँ पर आइन्सटीन ने न्यूटन के पत्र को ग़लत प्रमाणित किया। लोगों को आइन्सटीन का ही सिद्धांत पसंद आया। ब्रह्मांड की उत्पत्ति की तीन धारणाएँ प्रस्तुत हैं-

  1. स्थिर अवस्था का सिद्धांत
  2. विस्फोट सिद्धांत (बिग बंग सिद्धांत)
  3. दोलन सिद्धांत।

इन धारणाओं में दूसरी धारणा की महत्ता अधिक है। इस धारणा के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महापिंड के विस्फोट से हुई है और इसी कारण आकाश गंगाएं हमसे दूर भागती जा रही है। इस ब्रह्मांड का उलटा चित्र आप अपने सामने रखिए तब आपको ब्रह्मांड प्रसारित न दिखाई देकर सकुंचित होता हुआ दिखाई देगा और आकाश गंगाएं भागती हुई न दिखाई देकर आती हुई प्रतीत होगी। अत: कहने का तात्पर्य यह है कि किसी समय कोई महापिंड रहा होगा और उसी के विस्फोट होने के कारण आकाश गंगाएं भागती हुई हमसे दूर जा रही हैं। क्वासर और पल्सर नामक नए तारों की खोज से भी विस्फोट सिद्धांत की पुष्टि हो रही है।[1]

खगोलीय यांत्रिकी

खगोलीय यांत्रिकी में आकाशीय पिंडों की गतियों के गणितीय सिद्धांतों का विवेचन किया जाता है। न्यूटन द्वारा प्रिंसिपिया में उपस्थापित गुरुत्वाकर्षण नियम तथा तीन गतिनियम खगोलीय यांत्रिकी के मूल आधार हैं। इस प्रकार इसमें विचारणीय समस्या द्वितीय वर्ण के सामान्य अवकल समीकरणों के एक वर्ग के हल करने तक सीमित हो जाती है।

17वीं शताब्दी के प्रारंभ में जोहैन केप्लर ने ग्रहगति के तीन प्रसिद्ध अनुभूतिमूलक नियमों का निर्माण किया, जिनके साथ उसका नाम जुड़ा है। ये नियम न्यूटन के गुरु त्वाकर्षण तथा गति के तीन आधारभूत नियमों के दो कायों पर प्रयोग के उपफल हैं तथा इस प्रकार ये न्यूटन की प्राक्‌कल्पना (hypothesis) को पुष्ट करते हैं। न्यूटन के तीन गतिनियम सदा एक जड़ता प्रणाली के संदर्भ में हैं, जिसका प्राय: पर्याप्त सूक्ष्मता के साथ आकाशगंगा के सापेक्ष स्थिर प्रणाली से एकात्म स्थापित किया जा सकता है। दो कायों के प्रश्नों को तीन कायों के प्रश्नों तक तथा व्यापक रूप में ‘न’ (n) कायों के प्रश्नों तक विस्तृत करने में बहुत कठिनाई उपस्थित होती है। दो कायों के प्रश्नों के विपरीत ‘न’ कायों के प्रश्न, यदि न दो से अधिक हो तो, हल नहीं होते। सौर परिवार, जिसमें सूर्य तथा नवग्रह हैं, और अधिकांश ग्रह उपग्रहोंवाले हैं, एक बहुकायिक प्रश्न प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा की संहति तीन कायों के प्रश्न का उदाहरण है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. खगोल विज्ञान (हिन्दी) (पी.एच.पी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 2 जनवरी, 2012।
  2. खगोलीय यांत्रिकी (हिन्दी) (पी.एच.पी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 2 जनवरी, 2012।

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