गोथिक कला  

गोविन्द देव मन्दिर वृन्दावन में गोथिक कला की झलक

गोथिक कला से अभिप्राय तिकोने मेहराबों वाली यूरोपीय शैली से है, जिससे इमारत के विशाल होने का आभास होता है। यह मध्ययुगीन यूरोपीय वास्तु की एक शैली है, जो संभवत: जर्मन गोथ जाति के प्रभाव से आविर्भूत हुई थी। इस शैली की इमारतें यद्यपि क्लासिकल शैली के सौंदर्य से विरहित थीं और पतले, ऊँचे अनेक शिखरों से मंडित होती थीं। इस शैली का बोलबाला प्राय: 12वीं से 15वीं सदी तक बना रहा और अंत में पुनर्जागरण काल में इसका स्थान क्लासिकल शैली ने लिया।

विस्तार तथा विकास

वास्तु की दृष्टि से इस शैली की इमारतों में छरहरे ऊँचे खंभे सुंदर, कोणयुक्त मेहराबों को सिर से धारण करते हैं। बाहर की ओर से इनकी दीवारें पुश्तों से संपुष्ट की होती हैं। यूरोप के सैकड़ों गिरजाघर इसी शैली में बने हैं और इसी शैली में भारत के भी अधिकतर गिर्जे निर्मित हैं। नीचे स्तंभों की परंपरा से प्रस्तुत और ऊपर शूल शिखरों से व्याप्त गोथिक शैली की इमारतें सुदर्शन हैं। कालांतर में इस शैली में अलंकरण की व्यवस्था बढ़ती गई और इस शैली में निर्मित इमारतों की ज्यामितिक डिज़ाइनें वृत्ताकार तथा त्रिभुजाकार आवृत्तियाँ धारण करती गई। फूल-पौधों, लतावल्लरियों और पशु-पक्षियों की आकृतियों की आकृति संपदा बढ़ती गई और मानवेतर रूपों की अभिव्यक्ति विशेष आग्रह से की जाने लगी।[1]

काँच के टुकड़ों का उपयोग

गोथिक शैली की इमारतों में, विशेषकर गिरजाघरों के दरवाज़ों और खिड़कियों में रंगीन काँच के टुकड़ों का उपयोग होने लगा, जिनमें रंगों की विविधता विशेष आग्रह से प्रयुक्त हुई और गिरजाघरों का अंतरंग उनके योग से चमत्कृत हो उठा। उन्हीं काँच के टुकड़ों की सहायता से मानव आकृतियाँ भी बनाई जाने लगीं और संतों के चित्र रूपायित होने लगे। इस शैली की इमारतों के बहिरंग पर अनंत मूर्तियों का भी निर्माण होने लगा। न केवल वास्तु के उपकरणों में बल्कि चित्रण कला में भी इस शैली का उपयोग हुआ और इसी के माध्यम से तत्कालीन ग्रंथ चित्रित किए जाने लगे और साथ ही भित्तिचित्र लिखे जाने लगे।

रंगों का इस्तेमाल

इस शैली में अधिकतर तेज रंगों का इस्तेमाल हुआ और चित्रों में स्वर्णधूलि अथवा रत्नों तक का उपयोग करने से चित्रकार न चूके। मूर्तिकला में भी पत्थर, लकड़ी, गजदंत आदि के माध्यम से इस शैली का विकास हुआ। तब के धातुओं में ढले अनेक अभिप्राय आज भी यूरोप के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। काष्ठकारिता और धातुकारिता, विशेषकर स्वर्णकारिता में यह शैली गहरे पैठी और आभिजात्य जीवन में अलंकरण का विशेष मान इसने प्रतिष्ठित किया। तत्कालीन आसनों, शैया तल्पों, पर्यटकों आदि की हजारों गोथिक शैली में निर्मित साज सज्जा मध्य काल के प्रासादों में प्रस्तुत हुई।[1]

प्रभाव

इस शिल्प का एक विशिष्ट केंद्र वेनिस नगर में स्थापित हुआ, जहाँ की काँच की वर्ण शैली अन्यत्र दुष्प्राप्य थी। वहीं अधिकतर कलाबत्तू आदि में भी इस शैली का उपयोग हुआ और दीवारों के पर्दे तो उस शैली में इतने अभिराम बने कि, यद्यपि वे आज मिट चुके हैं, भित्तिचित्रों में उनके रूप, कलाबत्तू और मखमल के सहज आभास आज भी उत्पन्न कर देते हैं। उस शैली के लेखों की मर्यादा पिछले युगों में फिर कभी नहीं प्राप्त की जा सकी। उस मध्य युग को साधारणत: यूरोपीय इतिहास में "अंधकार युग" कहा गया है, पर नि:संदेह कला के क्षेत्र में इस गोथिक वास्तुशैली ने, तक्षण, चित्रण, तंतुवाय संबधी चटख रंगों ने उसे प्रभूत आलोकित किया।


इन्हें भी देखें: अमरावती मूर्तिकला, कुषाणकालीन मूर्तिकला, गांधार मूर्तिकला शैली एवं पाल मूर्तिकला शैली


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 गोथिक कला (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 11 अप्रैल, 2014।

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