चिचिंडा  

चिचिंडा

चिचिंडा तेज़ी से बढ़ने वाली तुरई कुल (कुकुरबिटेसी) की दो लताओं (ट्रिकोसेंथीज़ एंगूइना और टी. कुकुमेरोइडीज) में से एक। यह दक्षिण-पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया में मूल रूप से पाया जाता है, लेकिन अपने खाने योग्य और अजीब आकार के फलों के कारण विश्व भर में पैदा किया जाता है।

फल

चिचिंडे के एक पौधे में दो या तीन शाखित प्रतान होते हैं। इसके फूल सफ़ेद रंग के होते हैं, जिनकी पंखुड़ियों पर लंबी धारियाँ होती हैं। 'ट्रिकोसेंथीज़ एंगूइना' में लंबे हल्के धारीदार हरे फल लगते हैं। अक्सर ये फल 1.5 से 2 मीटर तक लंबे रहते हैं, जो प्रत्येक सिरे पर पतले होते हैं। 'टी. कुकुमेरोइडीज' के 5 से 8 से.मी. लंबे अंडाकर फल होते हैं, जिन्हें सुखाने के बाद साबुन के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

मृदा

चिचिंडा की अधिक पैदावार लेने के लिए जीवांश युक्त दोमट रेतीली भूमि अच्छी रहती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। इसके उपरांत 2-3 बार हैरो या देसी हल चलाया जाता है। पाटा लगाकर मिट्टी भुरभुरी एवं समतल बना ली जाती है।[1]

बुवाई

उत्तरी भारत में चिचिंडे को वर्षा कालीन फ़सल के रूप में उगाया जाता है। अत: वहाँ पर इसे जून के अंत तक बो देते हैं। दक्षिण भारत में इसे अप्रैल से जुलाई तक या अक्तूबर से नवम्बर तक बोते है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1.5 से 2. 5 मीटर रखकर थामलों में 75-90 से.मी. की दूरी पर उगाते हैं। प्रत्येक थामले में दो या तीन बीज बो देते हैं। 8-10 दिन में बीज उग जाते हैं।

आमतौर पर वर्षा कालीन फ़सल की सिंचाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यदि अधिक समय तक वर्षा न हो तो आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। शुष्क मौसम में पांचवें दिन सिंचाई करनी चाहिए। दक्षिण भारत में चिचिंडे की पूर्ण फ़सल अवधी में कई सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है, जिन्हें 15-20 दिन के अंतर पर दिया जाता है।

खरपतवार नियंत्रण

चिचिंडे में खरपतवार नियंत्रण हेतु धान के पुवाल की पलवार करने की सिफ़ारिश की जाती है और समय-समय पर निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों से खेत को साफ रखना चाहिए।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चिचिंडा कि उन्नत आर्गनिक जैविक खेती खीरा या कद्दू वर्गीय सब्जियां (हिन्दी) आर्गेनिक भाग्योदय। अभिगमन तिथि: 05 अगस्त, 2014।

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