डच  

यूरोपीय देश 'नीदरलैण्ड' (जिसे पहले 'हॉलैण्ड' के नाम से जाना जाता था) में रहने वाले लोगों को डच कहा जाता है। डच लोगों ने भारत के इतिहास में अपनी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत में इनका सबसे प्रमुख उद्देश्य मसालों का व्यापार करना था। डचों ने भी भारत में पुर्तग़ालियों से काफ़ी लम्बे समय संघर्ष किया, और पुर्तग़ालियों की शक्ति को काफ़ी हद तक कमज़ोर कर दिया। डचों ने 'इण्डोनेशिया' को अपना प्राथमिक केन्द्र बनाया था।

डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी

दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाज़ारों में सीधा प्रवेश प्राप्त करना ही डचों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। डच लोग हॉलैण्ड के निवासी थे। भारत में 'डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी' की स्थापना 1602 ई. में की गई। वैसे 1596 ई. में भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक 'कारनोलिस डेहस्तमान' था। 20 मार्च, 1602 ई. को एक राजकीय घोषणा के आधार पर 'युनाइटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ़ द नीदरलैण्ड' की स्थापना की गई। इस कम्पनी की देखरेख के लिए 17 व्यक्तियों का बोर्ड बनाया गया। डच सरकार ने सनद बोर्ड को 21 वर्षों के लिए युद्ध करने, सन्धि करने, प्रदेशों पर अधिकार करने तथा क़िलेबन्दी करने का अधिकार प्रदान किया। स्थापना के समय कम्पनी की पूँजी 65,00,000 गिल्डर थी।

पुर्तग़ालियों से संघर्ष

डचों का पुर्तग़ालियों से संघर्ष हुआ और धीरे-धीरे डचों ने भारत के सभी महत्त्वपूर्ण मसाला उत्पादन के क्षेत्रों पर अधिकार कर पुर्तग़ालियों की शक्ति को कमज़ोर कर दिया। डचों ने 'मसाला द्वीप पुंज' (इण्डोनेशिया) को अपना प्रारम्भिक केन्द्र बनाया। 1605 ई. में डचों ने पुर्तग़ालियों से 'अवायना' ले लिया तथा धीरे-धीरे मसाला द्वीप पुंज (इंडोनेशिया) में उनको हराकर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। उन्होंने जकार्ता को जीतकर 1619 ई. में इसके खंडहरों पर 'बटेविया' नामक नगर बसाया। 1639 ई. में उन्होंने गोवा पर घेरा डाला और 1641 ई. में मलक्का पर अधिकार कर लिया। जबकि 1658 ई. में 'सीलोन' की अंतिम पुर्तग़ाली बस्ती पर अधिकार जमा लिया। डचों ने गुजरात में कोरोमंडल समुद्र तट, बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं।

महत्त्वपूर्ण कोठियाँ

भारत में डचों ने निम्नलिखित स्थानों पर अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की थीं-

  1. मसुलीपट्टम - 1605 ई.
  2. पुलीकट - 1610 ई.
  3. विमलीपट्टम - 1614 ई.
  4. सूरत - 1616 ई.
  5. चिनसुरा - 1653 ई.
  6. कासिम बाज़ार, कड़ा, पटना, बालसोर, नागपट्टम - 1658 ई.
  7. कोचीन - 1663 ई.

कारखाने की स्थापना

डचों ने भारत में अपना पहला कारख़ाना 1605 ई. में मछलीपट्टम में खोला। मछलीपट्टम से डच लोग 'नील' का निर्यात करते थे। डच लोग भारत से मुख्यतः मसालों, नील, कच्चे रेशम, शीशा, चावल व अफीम का व्यापार करते थे। डचों ने मसालों के स्थान पर भारतीय कपड़ों को अधिक महत्व दिया। ये कपड़े कोरोमण्डल तट, बंगाल और गुजरात से निर्यात किए जाते थे। भारत से भारतीय वस्तु बनाने का श्रेय डचों का जाता है। पुलीकट में निर्मित डच फ़ैक्ट्री का नाम 'गोल्ड्रिया' रखा गया। गोल्ड्रिया भारत में डचों की एकमात्र क़िलाबन्द बस्ती थी। पुलीकट से डच अपने स्वर्ण सिक्के 'पगोडा' को ढालते थे। 1627 ई. में बंगाल में प्रथम डच फ़ैक्ट्री 'पीपली' में स्थापित की गई। 1653 ई. में हुगली के निकट चिनसुरा में डचों ने अपनी कोठी स्थापित की। चिनसुरा के डच क़िले को 'गुस्तावुस फ़ोर्ट' के नाम से जाना जाता है। 1617 ई. में सूरत में नियुक्त डच फ़ैक्ट्री के प्रभारी 'वान खेस्तेजन' ने 1618 ई. में मुग़ल शाहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ) से एक व्यापारिक सन्धि कर भड़ौच, बम्बई, अहमदाबाद, आगरा और बुरहानपुर में डच फ़ैक्ट्री की स्थापना की। 1680 ई. में स्थापित पोर्टोनोवा एक समृद्ध कपड़ा उत्पादन केन्द्र था।

पतन

डचों का भारत में अन्तिम रूप से पतन 1759 ई. में अंग्रेंज़ों एवं डचों के मध्य हुए 'बेदारा के युद्ध' से हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइब ने किया था। डचों के पतन के कारणों में अंग्रेज़ों की तुलना में नौ-शक्ति का कमज़ोर होना, मसालों के द्वीपों पर अधिक ध्यान देना, बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति, अत्यधिक केन्द्रीयकरण की नीति आदि को गिना जाता है।


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