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न्यायपालिका  

प्रजातंत्र की निरन्तरता के लिए आवश्यक है कि, राज्य की शक्तियों का विभाजन कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका के मध्य किया जाए। भारत में संविधान द्वारा संवैधानिक प्रजातंत्र की स्थापना की गयी है, जिसमें शक्तियों का विभाजन न केवल कार्यात्मक दृष्टि से बल्कि भौगोलिक दृष्टि से भी किया गया है। कार्यात्मक दृष्टि से शक्ति का विभाजन विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के मध्य किया गया है।

विभिन्न न्यायलय तथा आयोग

भारत की न्यायपालिका एकीकृत प्रकार की है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय स्थापित है। उच्चतम न्यायालय को अन्तिम न्याय-निर्णयन का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक राज्य या कुछ समूह पर उच्च न्यायालय गठित है। उच्च न्यायालय के तहत श्रेणीबद्ध अधीनस्थ न्यायालय हैं। कुछ राज्यों में पंचायत न्यायालय का भी गठन किया गया है। ये न्यायालय अलग-अलग नामों यथा–न्याय पंचायत, पंचायत अदालत, ग्राम कचहरी आदि से काम करते हैं। प्रत्येक राज्य में ज़िला स्तरों पर ज़िला न्यायालय स्थापित किये गये हैं। इसके अध्यक्ष ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश होते हैं, जो कि ज़िले का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी होता है। ज़िला न्यायालय मूल अधिकार क्षेत्र के प्रमुख दीवानी न्यायालय होते हैं। इन न्यायालयों में मृत्युदण्ड दिये जा सकने वाले अपराधों तक की सुनवाई होती है। इसके अधीन दीवानी न्यायालय होता है, जिसे विभिन्न राज्यों में मुंसिफ़ न्यायालय कहा जाता है। फ़ौजदारी न्यायालयों में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं। इन सबके अतिरिक्त देश में विभिन्न अधिकरण तथा आयोग भी स्थापित किये गये हैं, जो कि पारम्परिक न्यायालय भले ही न हों, परन्तु वे विधिक प्रक्रिया द्वारा अनेक विवादों को हल करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

भारतीय संविधान की रक्षिका

यद्यपि भारत में इंग्लैंण्ड की संसदीय शासन प्रणाली के आधार पर संसदीय सरकार की स्थापना की गयी है। लेकिन इंग्लैंण्ड, जहाँ संसदीय सर्वोच्चता को मान्यता दी गयी है, के विपरीत भारत में संविधान की सर्वोच्चता के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। भारत में संविधान को देश की मौलिक विधि माना जाता है और यह केन्द्र तथा राज्य सरकारों की राजनीतिक सत्ता का स्रोत तथा नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों का निर्धारक है। उच्चतम न्यायालय संविधान का रक्षक है और यह सरकार द्वारा या किसी अन्य शक्ति द्वारा संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन को रोकता है। भारत के संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार प्रदान किया गया है, जिसके द्वारा ये न्यायालय केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा बनाये गये क़ानूनों की संवैधानिकता का परीक्षण करते हैं। यदि इस परीक्षण के परिणामस्वरूप कोई क़ानून, जो विधायिका के द्वारा कार्यपालिका द्वारा निर्मित हो, संविधान के किसी प्रावधान के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायाल उसे अमान्य कर सकते हैं। इस प्रकार भारत में विधायिका या कार्यपालिका केवल उन्हीं विषयों पर क़ानून बना सकती हैं, जो कि संविधान द्वारा उन्हें सौंपे गये हैं और यदि वे इसके विपरीत क़ानून का निर्माण करते हैं, तो न्यायालय ऐसे क़ानून को असंवैधानिक निर्णीत कर उसको प्रवर्तित किये जाने से रोक सकती है।

स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना के कारण

भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना के निम्नलिखित कारण थे–

  1. भारत का संविधान लिखित है, जिसमें केन्द्र तथा राज्यों की सरकारों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन हुआ है। इस विभाजन को स्पष्ट करना स्वाभाविक है, जिसके लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना करके संविधान की व्याख्या करने का अधिकार उसे दिया गया है।
  2. संविधान में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है, लेकिन इन दोनों के मध्य विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। इन विवादों को न्यायिक ढंग से निबटाने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता थी।
  3. संविधान के भाग 3 में व्यक्तियों तथा नागरिकों को कुछ मूल अधिकार प्रत्याभूत किये गये हैं। विधायिका एवं कार्यपालिका पर यह प्रतिबन्ध अधिरोपित किया गया है कि वे ऐसा क़ानून न बनायें, जो मूलाधिकारों का उल्लंघन करें। स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना करके यह दायित्व उस पर सौंपा गया कि यदि राज्यों द्वारा मूलाधिकारों को उल्लंघन किया जाता है, तो वह मूलाधिकारों को प्रवर्तित कराये। इस प्रकार न्यायपालिका मूलाधिकारों की रक्षक है।

स्वतंत्रता से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान

भारत में न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर प्रदान करने के लिए संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान किये गये हैं, जिससे न्यायाधीशों को विधानमण्डलों या कार्यपालिका के प्रत्यक्ष प्रभाव से मुक्त रखा जा सके। संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए निम्नलिखत प्रावधान किये गये हैं–

  1. उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। लेकिन न्यायाधीशों को पद से हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त नहीं है। संविधान के अनुसार इन न्यायालयों के किसी भी न्यायाधीश को राष्ट्रपति तब तक पदमुक्त नहीं कर सकता है, जब तक संसद के दोनों सदन अपने सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से किसी न्यायाधीश को पदमुक्त करने का प्रस्ताव पारित कर दें। पदमुक्त करने की इस प्रक्रिया के कारण यह सम्भावना कम हो जाती है, कि किसी न्यायाधीश को राजनीतिक कारणों या दलीय आधार पर आसानी से पदमुक्त किया जा सके।
  2. यद्यपि उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह से नियुक्त करता है, लेकिन इन न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति को राजनीति के क्षेत्र से अलग करके यह अपेक्षा की गयी है कि राष्ट्रपति न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय भारत के मुख्य न्यायाधीश से सम्पर्क करें। 16 अक्टूबर, 1993 को उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णयों के अनुसार न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को वरीयता देना चाहिए और यदि किसी कारण से भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय को वरीयता न दी जाए, तो उस कारण की सूचना मुख्य न्यायाधीश को दी जानी चाहिए।
  3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए संविधान में यह प्रावधान करके न्यायाधीशों को आर्थिक संरक्षण प्रदान किया गया है कि न्यायाधीशों के वेतन तथा सेवा शर्तों आदि का निर्धारण संसद द्वारा किया जाएगा, लेकिन किसी भी न्यायाधीश के वेतन तथा सेवा शर्तों आदि में उसके पदावधि के दौरान कोई ऐसा परिवर्तन नहीं किया जाएगा, जिससे उसे हानि हो। इसका तात्पर्य यह है कि न्यायाधीशों के वेतन तथा सेवा शर्तों आदि में परिवर्तन करने की धमकी देकर उनसे कोई इच्छित कार्य नहीं कराया जा सकता।
  4. संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पदमुक्त होने के बाद सरकार के अधीन किसी पद को ग्रहण नहीं कर सकते हैं, या अधीनस्थ न्यायालयों में वकालत नहीं कर सकते हैं। पदमुक्त होने के बाद इस प्रकार के नियोजन की आशा से अप्रत्यक्ष रूप से न्यायाधीश की स्वतंत्रता कम होती है और वह कार्यपालिका के असर में आ जाता है। लेकिन इस संवैधानिक प्रावधान का अधिकतर उल्लंघन किया गया है और पदमुक्त न्यायाधीशों को मंत्री, राज्यपाल, राजदूत, आयोग के अध्यक्ष तथा विशेष न्यायाधिकरणों के अध्यक्ष पदों पर नियुक्त किया गया है। उदाहरण के लिए भूतपूर्व न्यायाधीश सी. सी. विश्वास को 1950 में मंत्री, पदमुक्त न्यायाधीश सैयद फजल अलि को 1952 में उड़ीसा का राज्यपाल, भूतपूर्व न्यायाधीश बी. एन. राव को 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी प्रतिनिधि, 1948 में ही भूतपूर्व न्यायाधीश वरदाचारी को आयकर जाँच अधिकरण का अध्यक्ष तथा मुम्बई उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश एम. सी. छागला को राजदूत, उच्चायुक्त तथा केन्द्रीय मंत्री पद पर नियुक्त किया गया था।
  5. उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय का अपना पृथक् संस्थापन होता है, जिसके लिए कर्मचारियों की नियुक्ति तथा उनकी सेवा शर्तें आदि को निर्धारित करने का अधिकार सम्बन्धित न्यायालयों को होता है। इस स्वतंत्रता के कारण सरकार या संसद न्यायालयों के संस्थापन के सम्बन्ध में हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त इन न्यायालयों को अपनी आन्तरिक प्रक्रिया को भी विनियामित करने का अधिकार है।
  6. न्यायालयों की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में यह प्रावधान भी किया गया है कि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के प्रशासनिक व्यय और इन न्यायालयों में कार्यरत न्यायाधीशों और अन्य कर्मचारियों को वेतन, भत्ते आदि भारत की संचित निधि से दिये जायेंगे और संसद उन पर मतदान नहीं कर सकती।
  7. उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि इन न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण के विषय में संसद में कोई चर्चा उस न्यायाधीश को हटाने के समावेदन को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रस्ताव पर ही होगी और अन्यथा नहीं।

न्यायालय की स्वतंत्रता के लिए संविधान द्वारा प्रावधान केवल सैद्धान्तिक हैं और कार्यपालिका या विधायिका द्वारा इस स्वतंत्रता का उल्लंघन निम्नलिखित प्रकार से किया गया है–

  1. न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए अध्यादेश जारी करके या विधि निर्माण करके,
  2. न्यायालय द्वारा किसी क़ानून को असंवैधानिक घोषित किये जाने पर संविधान में संशोधन करके,
  3. न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक प्रभाव को वरीयता देकर तथा
  4. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को स्थानान्तरित करके।

न्यायाधीशों को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया

उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए संविधान में अनुच्छेद 124(4) में प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान को 'महाभियोग' कहा गया है। इसके अनुसार किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा, जब तक कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत द्वारा तथा समर्थित समावेदन राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्ट्रपति ने आदेश नहीं दे दिया है। संविधान के द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी न्यायाधीश के विरुद्ध संसद के समक्ष समावेदन के रखे जाने की तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता की जाँच और साबित करने की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकती है। संसद ने इस अधिकार का प्रयोग करके न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम 1968 को अधिनियमित किया है। इस अधिनियम की धारा 3 में न्यायाधीशों के विरुद्ध समावेदन रखने की प्रक्रिया विहित की गयी है।

इस समावेदन के अनुसार किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों के द्वारा राष्ट्रपति को सम्बोधित एक प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को दिया जाना चाहिए। कम से कम 100 सदस्यों द्वारा लोकसभाध्यक्ष को नोटिस दिया जाना चाहिए। लोकसभाध्यक्ष उसके साथ संलग्न तथ्यों का परिशीलन करने के बाद यह निर्णय करता है कि वह न्यायाधीश को पदमुक्त करने की माँग को स्वीकार करे या निरस्त करे। यदि लोकसभाध्यक्ष न्यायाधीश को पदमुक्त करने की नोटिस को स्वीकार करता है, तो वह न्यायाधीश के विरुद्ध लगाये गये आरोपों की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करता है। इस समिति में एक उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, दूसरा किसी भी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधी तथा तीसरा ऐसे व्यक्ति, जो कि लोकसभाध्यक्ष की राय में प्रसिद्ध न्यायविद् हो, को शामिल किया जाता है। यदि यह समिति अपनी रिपोर्ट में न्यायाधीश पर लगाये गये आरोपों की अभिपुष्टि कर देती है तो अध्यक्ष उस रिपोर्ट को विचारार्थ संसद के समक्ष रखता है। यदि संसद दो तिहाई बहुमत से न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव पारित कर देती है तो राष्ट्रपति न्यायाधीश को उसको पद से हटाने का आदेश पारित कर सकता है। लेकिन राष्ट्रपति के इस आदेश की समीक्षा उच्चतम न्यायालय कर सकता है।

अब तक उच्चतम न्यायालय के एक मात्र न्यायाधीश न्यायूर्ति वी. रामास्वामी को पद से हटाने के लिए मई, 1993 में संसद में महाभियोग की कार्यवाही चली थी, लेकिन यह कार्यवाही आवश्यक बहुमत के अभाव में सफल न हो सकी।


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