बारदोली सत्याग्रह  

बारदोली सत्याग्रह 'भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन' का सबसे संगठित, व्यापक एवं सफल आन्दोलन रहा है। यह आन्दोलन सरकार द्वारा बढ़ाये गए 30 प्रतिशत कर के विरोध में चलाया गया था। बारदोली के 'मेड़ता बन्धुओं' (कल्याण जी और कुंवर जी) तथा दयाल जी ने किसानों के समर्थन में 1922 ई. से आन्दोलन चलाया। बाद में इसका नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया। सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुके में 1920 ई. में किसानों द्वारा 'लगान' न अदायगी का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में केवल 'कुनबी-पाटीदार' जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि 'कालिपराज' (काले लोग) जनजाति के लोगों ने भी हिस्सा लिया। सरकार द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकरी ब्रूमफ़ील्ड और राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने मामले की जाँच की और बढ़ोत्तरी को ग़लत ठहरीते हुए इसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। आन्दोलन के सफल होने पर वहाँ की महिलाओं ने पटेल को 'सरदार' की उपाधि प्रदान की।

गाँधी जी का योगदान

137 गांवों एवं 87,000 जनसंख्या वाले बारदोली में किसानों की मुख्य जाति 'कुनबी-पाटीदार' 1908 ई. से कुंवर जी एवं कल्याण जी मेहता के नेतृत्व में संगठित होने लगी थी। इस संगठन ने 'पाटीदार युवक मंडल' एवं 'पटेल बन्धु' नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। पाटीदार किसानों की ज़मीन 'दुबला आदिवासी' जोता करते थे, जिन्हें 'कालिपराज' भी कहा जाता था। बारदोली सत्याग्रह के समय 'कालिपराज' आदिवासियों का नाम गांधी जी ने बदलकर 'रानीपराज' रख दिया। किसान संघर्ष एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के अन्तः संबंधों की व्याख्या बारदोली किसान संघर्ष के संदर्भ में करते हुए गांधी जी ने कहा कि 'बारदोली संघर्ष चाहे जो कुछ भी हो, यह राजस्व प्राप्ति का संघर्ष नहीं है। लेकिन इस तरह का हर संघर्ष, हर कोशिश हमें स्वराज के क़रीब पहुँचा रही है और हमें स्वराज की मंज़िल तक पहुँचाने में शायद ये संघर्ष सीधे स्वराज के लिए संघर्ष से कहीं ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकते हैं।'

आंशिक सफलता

बारदोली क्षेत्र में कालिपराज जनजाति को 'हाली पद्धति' के अन्तर्गत उच्च जातियों के यहाँ पुश्तैनी मज़दूर के रूप में कार्य करना होता था। गाँधी जी की सलाह पर बारदोली के कार्यकताओं द्वारा कालिपराजों का सम्मेलन आयोजित होता था। 1927 ई. के इस सम्मेलन की अध्यक्षता गाँधी जी ने की तथा 1927 ई. में ही कालिपराजों के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कालिपराओं को रानीपराज (बनवासी) की उपाधि दी। कांग्रेस ने अपने विरोध द्वारा लगान में की गयी 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी को अनुचित सिद्ध किया। बड़े पैमाने पर इसका विरोध हुआ। अन्त में इस सत्याग्रह को आंशिक सफलता प्राप्त हुई, जब 1927 ई. में सरकार ने कर को घटाकर 21.9 प्रतिशत करने की घोषण की।

वल्लभ भाई का नेतृत्व

4 फ़रवरी, 1928 ई. को वल्लभ भाई पटेल ने बारदोली किसान सत्याग्रह का नेतृत्व संभाला। सर्वप्रथम बढ़ी हुई लगान के विरुद्ध सरकार को पत्र लिखा गया, किन्तु सरकार द्वारा कुछ सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। परिणामस्वरूप पटेल ने किसानों को संगठित किया तथा उन्हें लगान न अदा करने के लिए कहा। दूसरी तरफ़ कांग्रेस के नरमपंथी गुट ने 'सर्वेण्ट्स ऑफ़ इण्डिया सोसाइटी' के माध्यम से सरकार द्वारा किसानों की माँग की जाँच करवाने का अनुरोध किया। 'बारदोली सत्याग्रह' नाम से एक दैनिक पत्रिका निकाली गयी। बम्बई विधान परिषद के भारतीय नेताओं ने त्यागपत्र दे दिया। ब्रिटेन की संसद में भी बहस हुई। वायसराय लॉर्ड इरविन ने भी बम्बई के गर्वनर विल्सन को मामले को शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया। उधर पटेल की गिरफ्तारी की सम्भावना को देखते हुए वैकल्पिक नेतृत्व के लिए 2 अगस्त, 1928 ई. को गाँधी जी बारदोली पहुँच गये।

आन्दोलन की सफलता

महिलाओं ने भी इस आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें बम्बई की पारसी महिला मीठूबेन पेंटिट, भक्तिवा, मनीबेन पटेल, सुपुत्री शारदाबेन शाह और शादराशाह के नाम उल्लेखनीय हैं। पटेल से बारदोली के लोग प्रभावित हुए। इसी सत्याग्रह के दौरान पटेल को वहाँ की औरतों ने सरदार की उपाधि प्रदान की थी। सरकार ने ब्रूम फ़ील्ड और मैक्सवेल को बारदोली मामलें की जाँच करने का आदेश दिया। जाँच रिपोर्ट में बढ़ी हुई 30 प्रतिशत लगान को अवैध घोषित किया गया। अतः सरकार ने लगान घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। इस प्रकार सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली किसान आन्दोलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। गाँधी जी ने इस सफलता पर कहा कि, "बारदोली संघर्ष चाहे जो कुछ भी हो, यह स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष नहीं हैं, लेकिन इस तरह का हर संघर्ष हर कोशिश हमें स्वराज के क़रीब पहुँचा रही है"।


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