राणा जगमल  

राणा जगमल मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के पुत्र और राणा सांगा के पौत्र थे। उदयसिंह अपने कनिष्ठ पुत्र जगमल को बहुत प्यार करते थे, इसीलिए उसे ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

उदयसिंह के प्रिय

राणा उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रताप जितने वीर थे, उतने ही पितृभक्त भी थे। पिता राणा उदयसिंह कनिष्ठ पुत्र जगमल को बहुत प्यार करते थे। इसी कारण वे उसे राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करना चाहते थे। 'रामायण के प्राण धन भगवान श्रीराम के राज्य त्याग व वनवास के आदर्श के सदा पुजारी रहे महाराणा प्रताप ने पिता के इस निर्णय का तनिक भी विरोध नहीं किया।

राणा उदयसिंह की मृत्यु 1572 ई. में हुई। उस समय उनकी अवस्था 42 वर्ष थी और उनकी विभिन्न रानियों से उन्हें 24 लड़के थे। उनकी सबसे छोटी रानी का लड़का जगमल था, जिससे उन्हें असीम अनुराग था। मृत्यु के समय राणा उदयसिंह ने अपने इसी पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। लेकिन राज्य दरबार के अधिकांश सरदार लोग यह नहीं चाहते थे कि राणा उदयसिंह का उत्तराधिकारी जगमल जैसा अयोग्य राजकुमार बने।

प्रताप को उत्तराधिकार

राणा उदयसिंह के काल में ही अकबर ने पहली बार सन 1566 ई. में चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की थी, जिसमें वह असफल रहा था। इसके बाद दूसरी चढ़ाई 1567 ई. में की गयी थी और वह इस क़िले पर अधिकार करने में इस बार सफल भी हो गया था। इसलिए राणा उदयसिंह की मृत्यु के समय उनके उत्तराधिकारी की अनिवार्य योग्यता चित्तौड़गढ़ को वापस लेने और अकबर जैसे शासक से युद्घ करने की चुनौती को स्वीकार करना था। राणा उदयसिंह के पुत्र जगमल में ऐसी योग्यता नहीं थी। इसलिए राज्य दरबारियों ने उसे अपना राजा मानने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप राणा उदयसिंह की अंतिम क्रिया करने के पश्चात् राज्य दरबारियों ने राणा जगमल को राजगद्दी से उतारकर महाराणा प्रताप को उसके स्थान पर बैठा दिया। इस प्रकार एक मौन क्रांति हुई और मेवाड़ का शासक राणा उदयसिंह की इच्छा से न बनकर दरबारियों की इच्छा से महाराणा प्रताप बने। इस घटना को इसी रूप में अधिकांश इतिहासकारों ने उल्लेखित किया है।

इसी घटना से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि महाराणा प्रताप और उनके पिता राणा उदयसिंह के बीच के संबंध अधिक सौहार्दपूर्ण नहीं थे। महाराणा प्रताप ने जब अपने पिता राणा उदयसिंह के द्वारा अपने छोटे भाई जगमल को अपना उत्तराधिकारी बनाते देखा तो कहा जाता है कि उस समय उन्होंने सन्न्यास लेने का मन बना लिया था, लेकिन राज्यदरबारियों की कृपा से उन्हें सत्ता मिल गयी और वह 'मेवाड़ाधिपति' कहलाए।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. राणा उदयसिंह के साथ न्याय करो (हिन्दी) उगता भारत। अभिगमन तिथि: 05 मार्च, 2015।

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