वैष्णो देवी  

वैष्णों देवी मंदिर

माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में माता वैष्णों देवी

निर्बलों को बल, नेत्रहीनों को नेत्र, विद्याहीनों को विद्या, धनहीनों को धन, संतानहीनों को संतान देकर अपने भक्तों के सभी कार्यों को पूर्ण करने वाली पूरे जगत में माता रानी और वैष्णवी के नाम से जानी जाने वाली शेरावाली माता वैष्णों देवी का जागृत और पवित्र मंदिर भारत के जम्मू कश्मीर राज्य की हसीन वादियों में उधमपुर ज़िले में कटरा से 12 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिमी हिमालय के त्रिकुटा पर्वत पर गुफ़ा में विराजित है। यह एक दुर्गम यात्रा है। किंतु माता के भक्तों की आस्था और विश्वास की शक्ति सब कुछ संभव कर देती है। नवरात्रों के दौरान माँ वैष्णों देवी के दर्शन की विशेष मान्यता है। इन नौ दिनों तक क्या देश क्या विदेश, लाखों लोग माँ वैष्णों देवी के दर्शन करने को आते हैं। वैसे कहते भी हैं कि पहाड़ों वाली माता वैष्णों देवी सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उसके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। ऐसा ही सच्चा दरबार है - माता वैष्णों देवी का। माता के भक्त मानते हैं कि माता जब बुलाती है तो भक्त किसी न किसी बहाने से उसके दरबार पहुँच ही जाता है। जो बिना बुलाए जाता है, वह कितना ही चाह ले, माता के दर्शन नहीं कर पाता है। व्यावहारिक दृष्टि से माता वैष्णों देवी ज्ञान, वैभव और बल का सामूहिक रूप है, क्योंकि यहाँ आदिशक्ति के तीन रूप हैं - पहली महासरस्वती, जो ज्ञान की देवी हैं, दूसरी महालक्ष्मी, जो धन-वैभव की देवी और तीसरी महाकाली या दुर्गा, जो शक्ति स्वरूपा मानी जाती है। जीवन के धरातल पर भी श्रेष्ठ और सफल बनने और ऊंचाईयों को छूने के लिए विद्या, धन और बल ही ज़रूरी होता है, जो मेहनत और परिश्रम के द्वारा ही संभव है। माता की इस यात्रा से भी जीवन के सफर में आने वाली कठिनाईयों और संघर्षों का सामना कर पूरे विश्वास के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है।[1] माँ वैष्णों देवी का यह प्रसिद्ध दरबार हिन्दू धर्मावलम्बियों का एक प्रमुख तीर्थस्थल होने के साथ - साथ 51 शक्तिपीठों में से एक मानी जाती है, जहाँ दूर - दूर से लाखों श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं। यह उत्तरी भारत में सबसे पूजनीय पवित्र स्थलों में से एक है। माँ वैष्णों देवी के गुफा में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती पिंडी रूप में स्थापित हैं, भूगर्भशास्त्री भी इस गुफा को कई अरब साल पुरानी बताते हैं। माता की ये गुफा त्रिकुटा पर्वत में उत्तरी जम्मू से 61 किमी की दूरी पर है। वैष्णों देवी की इस पवित्र यात्रा के दौरान भक्तगण देवामाई, बाण गंगा, चरण पादुका, गर्भ जून गुफा, भैरव मंदिर आदि तीर्थों के भी दर्शन का लाभ उठाते हैं। मंदिर, समुद्रतल से लगभग 6500 किलोमीटर की ऊंचाई पर है और कटरा से लगभग 12 किलोमीटर (7.45 मील) की दूरी पर स्थित है। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ - स्थल है। इस मंदिर की देख-रेख श्री माता वैष्णों देवी तीर्थ मंडल द्वारा की जाती है। तीर्थ - यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए उधमपुर से कटरा तक एक रेल संपर्क बनाया जा रहा है।

पौराणिक कथाएँ

यूं तो जगत माता वैष्णों देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य द्प हैं-

प्रथम कथा
वैष्णों देवी, कटरा

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुटा नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण 'वैष्णवी' नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ कि भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी। जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे, तब उन्होंने समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतु कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो।[2] जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त की, तब माँ ने नवरात्र मनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा माँ वैष्णों देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णों देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगीं।

द्वितीय कथा
बाणगंगा
चरण पादुका, वैष्णों देवी, कटरा
अर्धक्वाँरी मंदिर, वैष्णों देवी, कटरा

इसी प्रकार एक अन्य पुरातन कथा मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्त पंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरी सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा क़स्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में माँ वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णों कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णों देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस - पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रूपी माँ वैष्णों देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर - पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रूपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान-बूझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इसमें स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते - भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी गुफा के बाहर थे और उन्होंने भैरवनाथ से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी। जब वीर लंगूर निढाल होने लगा, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णों देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा अथवा भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णों देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादि हैं। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख़ माँगी। माता वैष्णों देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णों देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णों देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से 'पिंडों' की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी माँ वैष्णों देवी की पूजा करते आ रहे हैं।[2]

दर्शनीय स्थान

वैष्णों देवी का एक दृश्य
  • माता का भवन- माता वैष्णों देवी का पवित्र स्थान माता रानी के भवन के रूप में जाना जाता है। यहां पर 30 मीटर लंबी गुफा के अंत में महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा की पाषाण पिण्डी हैं। इस गुफा में सदा ठंडा जल प्रवाहित होता रहता है। कालान्तर में सुविधा की दृष्टि से माता के दर्शन हेतु अन्य गुफा भी बनी हैं। माता वैष्णों देवी के दर्शन के पूर्व माता से संबंधित अनेक दर्शनीय स्थान हैं।
  • भूमिका मन्दिर- कटरा से लगभग दो कि.मी. दूर पैदल जानेवाली सड़क पर ऐतिहासिक भूमिका मन्दिर है। इसी स्थान से माता वैष्णों देवी की कलियुग की विशेष भूमिका बंधती है। कहा जाता है कि लगभग 700 वर्ष पूर्व यही पर पं. बाबा श्रीधर जी को देवी के कन्या रूप में साक्षात दर्शन हुए। पं. जी ने कन्या की आज्ञानुसार यहां समष्टि भण्डारा दिया।
  • चरण पादुका- यह वैष्णों देवी दर्शन के क्रम में पहला स्थान है। जहां माता वैष्णों देवी के चरण चिह्न एक शिला पर दिखाई देते हैं। इसी स्थान पर महाशक्ति ने रूक कर पीछे की ओर देखा था कि भैरवनाथ आ रहा है या नहीं, रुकने से इस स्थान पर माता के 'चरण चिह्न' बन गए।
  • बाणगंगा- भैरवनाथ से दूर भागते हुए माता वैष्णों देवी ने एक बाण भूमि पर चलाया था, जहाँ से जल की धारा फूट पड़ी थी। यही स्थान 'बाणगंगा' के नाम से प्रसिद्ध है। यह कटरा से ढाई किलोमीटर तथा समुद्रतल से 2800 फीट है, वैष्णों देवी आने वाले श्रद्धालु यहां स्नान कर स्वयं का पवित्र कर आगे बढ़ते हैं। यह नदी समाखल क्षेत्र के 200 फुट ऊंचे पहाड़ के बीच से निकलती है जो समाखल तलाब से जुङी है। समाखल क्षेत्र अर्द्धकुमारा से पांच किलोमीटर दूर कटरा शहर और वैष्णों देवी मंदिर के मध्य में है।
  • अर्द्धकुमारा या गर्भजून- यह माता वैष्णों देवी की यात्रा का बीच का पड़ाव है, यहां पर एक संकरी गुफा है, जिसके लिए मान्यता है कि इसी गुफा में बैठकर माता ने 9 माह तप कर शक्ति प्राप्त की थी। इस गुफा में गुजरने से हर भक्त जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
  • हाथी मत्था- आदिकुमारी से आगे क्रमश: पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढ़ाई के रूप में प्रारम्भ हो जाती है, इसी कारण इसे 'हाथी मत्था के समान' माना गया है।
  • सांझी छत- यह वैष्णोंदेवी दर्शन यात्रा का ऐसा स्थान है, जो ऊंचाई पर स्थित होने से त्रिकूट पर्वत और उसकी घाटियों का नैसर्गिक सौंदर्य दिखाई देता है। इसे 'दिल्ली वाली छबील' भी कहा जाता है।
  • भैरव मंदिर- यह मंदिर मातारानी के भवन से भी लगभग डेढ़ किलोमीटर अधिक ऊंचाई पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि माता द्वारा भैरवनाथ को दिए वरदान के अनुसार यहां के दर्शन किए बिना वैष्णों देवी की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है।
  • वैदिक ग्रंथों में त्रिकूट पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा महाभारत में भी अर्जुन द्वारा जम्मू क्षेत्र में वास करने वाली माता आदिशक्ति की आराधना का वर्णन है। मान्यता है कि 14वीं सदी में श्रीधर ब्राह्मण ने इस गुफा को खोजा था।[2]
  • देवामाई- जम्मू से लगभग 4 किलोमीटर दूर कटरा मार्ग पर नुमाई नामक गांव पड़ता है। नुमाई से देवामाई तक जाने के लिए पगडण्डी मार्ग है। इस स्थान को वैष्णों देवी यात्रा में दूसरा दर्शन कहा गया है, यहाँ पर माता की मूर्ति के अतिरिक्त छोटा त्रिशूल भी है। जिन दिनों पैदल यात्रा होती थी, उन दिनों देवामाई में बहुत चहल पहल रहती थी। अब तो बहुत कम यात्री देवामाई तक जा पाते हैं, इस स्थान का नाम वैष्णों माता की एक पुजारिन 'माई देवा' के नाम पर रखा गया, जिसने आयुपर्यन्त नियम, श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक देवी की आराधना की थी।
  • चिन्तामणि मन्दिर - कटरा में 'चिन्तामणि मन्दिर' दर्शनीय है और बस स्टैण्ड से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर रघुनाथ मन्दिर स्वामी नित्यानंद जी का बनवाया हुआ है। यहाँ पर भगवान राम और हनुमान जी की विशालकाय मूर्तियाँ है। भगवान आशुतोष का मन्दिर और स्वामी नित्यानंद जी की समाधि भी बनी है।
  • रघुनाथ मंदिर- वैष्णों देवी यात्रा का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं दर्शनीय जम्मू में स्थित रघुनाथ मंदिर है। राम यंत्र के आधार पर निर्मित इस मन्दिर में लगभग सभी देवी-देवताओं के पन्द्रह विशाल मन्दिर है। यह मन्दिर महाराज रणवीर सिंह द्वारा 1856 ई. में बनवाया गया।

उत्सव-पर्व

माता वैष्णों देवी में वर्ष भर में अनेक प्रमुख उत्सव पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाएं जाते हैं।

  • नवरात्रि- माता वैष्णों देवी में चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रियों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। इस काल में यहां पर यज्ञ, रामायण पाठ, देवी जागरण आयोजित होते हैं। नवरात्रों के दौरान माँ वैष्णों देवी के दर्शन करने की विशेष मान्यता है। इस दौरान पूरे नौ दिनों तक प्रतिदिन देश और विदेशों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कई बार तो श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि कटरा के पर्ची काउंटर से यात्रा की पर्ची देने पर रोक लगानी पड़ती है।
  • दीपावली- दीपावली के अवसर पर भी माता का भवन दीपों से जगमगा जाता है। यह उत्सव अक्टूबर - नवम्बर में मनाया जाता है। इसी माह में जम्मू से कुछ दूर 'भीरी मेले' का आयोजन होता है।
  • माघ मास में श्रीपंचमी के दिन महासरस्वती की पूजा भी बड़ी श्रद्धा और भक्ति से की जाती है।
  • जनवरी में ही 'लोहड़ी का पर्व' और अप्रैल माह में 'वैशाखी का पर्व' यहां बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। जिनमें स्नान, नृत्य और देवी पूजा का आयोजन होता है।
  • पूजा का समय- माता वैष्णों देवी की नियमित पूजा होती है। यहां विशेष पूजा का समय सुबह 4:30 से 6:00 बजे के बीच होता है। इसी प्रकार संध्या पूजा सांय 6:00 बजे से 7:30 बजे तक होती है।[1]

कैसे पहुँचें माँ वैष्णों के दरबार

माँ वैष्णों देवी के दर्शन करने के इच्छुक श्रद्धालुओं का पहला पड़ाव जम्मू होता है। जम्मू तक आप बस, टैक्सी, ट्रेन या फिर हवाई जहाज़ से पहुँच सकते हैं। जम्मू ब्रॉड गेज लाइन द्वारा जुड़ा है। गर्मियों में वैष्णों देवी जाने वाले यात्रियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है इसलिए रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष यात्रियों की सुविधा के लिए दिल्ली से जम्मू के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाती हैं। जम्मू, भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग 1 A से जुड़ा है। इसलिए यदि आप बस या टैक्सी से भी जम्मू पहुँचना चाहते हैं तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी। उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों से जम्मू के लिए आपको आसानी से सीधी बस और टैक्सी मिल सकती है। माँ के भवन तक, यात्रा की शुरुआत का बेस कैंप कटरा होता है, जो कि जम्मू ज़िले का एक गाँव है। जम्मू से कटरा की दूरी लगभग 50 किमी है। कटरा और जम्मू के बीच बस और टैक्सी सेवा चलती है। कटरा समुद्रतल से 2500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। कटरा तक आप आसानी से बस या टैक्सी द्वारा पहुँच सकते हैं। जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए भी कई बसें मिल जाएँगी, जिनसे आप लगभग 2 घंटे में कटरा पहुँच सकते हैं। यदि आप टैक्सी से कटरा पहुँचना चाहते हैं तो आप 500 से 1000 रुपए खर्च कर टैक्सी से कटरा तक की यात्रा कर सकते हैं, जो कि लगभग 1 घंटे में आपको कटरा तक पहुँचा देगी।[3]

वैष्णों देवी यात्रा का प्रारम्भ

कटरा से साँझीछत का एक दृश्य

माँ वैष्णों देवी यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है। अधिकांश यात्री यहां आराम करके अपनी यात्रा की शुरुआत करते हैं। कटरा से क्रमश: अर्द्धकुमारी मंदिर और माँ के मुख्य मंदिर तक की दूरी लगभग 8 और 12 किलोमीटर है। माँ के पवित्र गुफा से भैरवनाथ की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। माँ के दर्शन के लिए रात-भर यात्रियों की चढ़ाई का सिलसिला चलता रहता है। कटरा से ही माता के दर्शन के लिए नि:शुल्क 'यात्रा पर्ची' मिलती है। यह पर्ची लेने के बाद ही आप कटरा से माँ वैष्णों के दरबार तक की चढ़ाई की शुरुआत कर सकते हैं। यह पर्ची लेने के तीन घंटे बाद आपको चढ़ाई शुरू होने से पहले 'बाण गंगा चैक पॉइंट' पर ऐन्ट्री करानी पड़ती है और वहाँ सामान की चैकिंग कराने के बाद ही आप चढ़ाई प्रारंभ कर सकते हैं। यदि आप यात्रा पर्ची लेने के तीन घंटे बाद तक चैक पोस्ट पर एन्ट्री नहीं कराते हैं तो आपकी यात्रा पर्ची रद्द हो सकती है। अत: हमेशा ध्यान रखें कि यात्रा प्रारंभ करते समय ही यात्रा पर्ची लें। जो लोग कठिन चढ़ाई करने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए बाण गंगा से पालकी, और घोड़े की सुविधा है। अब तो मंदिर प्रशासन द्वारा अर्द्धकुंवारी मंदिर से माता के मुख्य द्वार तक बैट्री चालित ऑटो भी चलाया जा रहा है। जिसमें एक बार में पांच-छह यात्री आराम से यात्रा कर सकते हैं। माता की गुफा के दर्शन हेतु कुछ भक्त पैदल चढ़ाई करते हैं और कुछ इस कठिन चढ़ाई को आसान बनाने के लिए पालकी, घोड़े या पिट्ठू किराए पर लेते हैं। छोटे बच्चों को चढ़ाई पर उठाने के लिए आप किराए पर स्थानीय लोगों को बुक कर सकते हैं, जो निर्धारित शुल्क पर आपके बच्चों को पीठ पर बैठाकर चढ़ाई करते हैं। एक व्यक्ति के लिए कटरा से भवन (माँ वैष्णों देवी की पवित्र गुफा) तक की चढ़ाई का पालकी, पिट्ठू या घोड़े का किराया 250 से 350 रुपए तक होता है। इसके अलावा छोटे बच्चों को साथ बैठाने या ओवरवेट व्यक्ति को बैठाने का आपको अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा। चढ़ाई के दौरान रास्ते भर में जगह-जगह पर जलपान और भोजन करने की व्यवस्था है। जिसका भुगतान करके आप यह सुविधा ले सकते हैं। कम समय में माँ के दर्शन के इच्छुक यात्री हेलिकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं। लगभग 2200 से 3500 रुपए खर्च कर दर्शनार्थी कटरा से 'साँझीछत' (भैरवनाथ मंदिर से कुछ किमी की दूरी पर स्थित) तक हेलिकॉप्टर से पहुँच सकते हैं। कटरा और मुख्य भवन तक की चढ़ाई के दौरान कुछ स्थानों पर अपना सामान रखने के लिए निशुल्क 'क्लॉक रूम' की सुविधा भी उपलब्ध है।[3]

पहुचने के संसाधन

  • वायु मार्ग- माता वैष्णों देवी के दर्शन हेतु सबसे पास हवाई अड्डे जम्मू और श्रीनगर के हैं।
  • रेलमार्ग- रेल मार्ग से वैष्णों देवी पहुंचने के लिए जम्मूतवी, पठानकोट और अमृतसर प्रमुख रेलवे स्टेशन है। जहां से कटरा सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।
  • सड़क मार्ग- वैष्णों देवी के दर्शन हेतु श्रीनगर, जम्मू, अमृतसर से कटरा पहुंचा जा सकता है। जम्मू से कटरा- 48 किलोमीटर, कटरा से वैष्णों देवी- पैदल 13 किलोमीटर, दिल्ली से कुल दूरी- 663 किमी है।

ठहरने का स्थान

माता के भवन में पहुँचने वाले यात्रियों के लिए जम्मू, कटरा, भवन के आसपास के स्थानों स्थानों पर माँ वैष्णों देवी मंदिर प्रशासन द्वारा संचालित कई धर्मशालाएँ व होटल हैं, जिनमें विश्राम करके आप अपनी यात्रा की थकान को मिटा सकते हैं, जिनकी पूर्व बुकिंग कराके आप परेशानियों से बच सकते हैं। आप चाहें तो प्राइवेट होटलों में भी रुक सकते हैं।

आसपास के दर्शनीय स्थल

कटरा व जम्मू के नज़दीक कई दर्शनीय स्थल ‍व हिल स्टेशन हैं, जहाँ जाकर आप जम्मू की ठंडी हसीन वादियों का लुत्फ उठा सकते हैं। जम्मू में अमर महल, बहू फोर्ट, मंसर लेक, रघुनाथ टेंपल आदि देखने लायक़ स्थान हैं। जम्मू से लगभग 112 किमी की दूरी पर 'पटनी टॉप' एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। सर्दियों में यहाँ आप स्नो फॉल का भी मज़ा ले सकते हैं। कटरा के नजदीक शिव खोरी, झज्झर कोटली, सनासर, बाबा धनसार, मानतलाई, कुद, बटोट आदि कई दर्शनीय स्थल हैं।[4]

इन बातों का रखें ख्याल

  • वैसे तो माँ वैष्णों देवी के दर्शनार्थ वर्ष-भर श्रद्धालु जाते हैं परंतु यहाँ जाने का बेहतर मौसम गर्मी है। इस स्थान पर तापमान दिसम्बर से जनवरी के बीच शून्य से नीचे हो जाता है और बर्फबारी भी होती है। इसलिए यात्रा के लिए उचित समय को चुनें।
  • सर्दियों में भवन का न्यूनतम तापमान -3 से -4 डिग्री तक चला जाता है और इस मौसम से चट्टानों के खिसकने का ख़तरा भी रहता है। अत: इस मौसम में यात्रा करने से बचें।
  • ब्लड प्रेशर के मरीज़ चढ़ाई के लिए सीढि़यों का उपयोग ‍न करें।
  • भवन ऊँचाई पर स्थित होने से यहाँ तक की चढ़ाई में आपको उल्टी व जी मचलाने संबंधी परेशानियाँ हो सकती हैं, जिनसे बचने के लिए अपने साथ आवश्यक दवाइयाँ ज़रूर रखें।
  • चढ़ाई के वक़्त जहाँ तक हो सके, कम से कम सामान अपने साथ ले जाएँ ताकि चढ़ाई में आपको कोई परेशानी न हो।
  • पैदल चढ़ाई करने में छड़ी आपके लिए बेहद मददगार सिद्ध होगी।
  • ट्रैकिंग शूज चढ़ाई में आपके लिए बहुत आरामदायक होंगे।
  • माँ का जयकारा आपके रास्ते की सारी मुश्किलें हल कर देगा।

श्री वैष्णों माता जी की आरती

जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता।
द्वार तुम्हारे जो भी आता, बिन माँगे सब कुछ पा जाता॥ मैया जय वैष्णवी माता।
तू चाहे जो कुछ भी कर दे, तू चाहे तो जीवन दे दे।
राजा रंक बने तेरे चेले, चाहे पल में जीवन ले ले॥ मैया जय वैष्णवी माता।
मौत-ज़िंदगी हाथ में तेरे, मैया तू है लाटां वाली।
निर्धन को धनवान बना दे, मैया तू है शेरां वाली॥ मैया जय वैष्णवी माता।
पापी हो या हो पुजारी, राजा हो या रंक भिखारी।
मैया तू है जोता वाली, भवसागर से तारण हारी॥ मैया जय वैष्णवी माता।
तू ने नाता जोड़ा सबसे, जिस-जिस ने जब तुझे पुकारा।
शुद्ध हृदय से जिसने ध्याया, दिया तुमने सबको सहारा॥ मैया जय वैष्णवी माता।
मैं मूरख अज्ञान अनारी, तू जगदम्बे सबको प्यारी।
मन इच्छा सिद्ध करने वाली, अब है ब्रज मोहन की बारी॥ मैया जय वैष्णवी माता।
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया।
पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया॥
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया।
सुआ चोली तेरे अंग विराजे, केसर तिलक लगाया।
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शंकर ध्यान लगाया।
नंगे पांव पास तेरे अकबर सोने का छत्र चढ़ाया।
ऊंचे पर्वत बन्या शिवाली नीचे महल बनाया॥
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया।
सतयुग, द्वापर, त्रेता, मध्ये कलयुग राज बसाया।
धूप दीप नैवेद्य, आरती, मोहन भोग लगाया।
ध्यानू भक्त मैया तेरा गुणभावे, मनवांछित फल पाया॥
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी, तेरा पार न पाया।

माता वैष्णों देवी- वास्तु ‍की दृष्टि से

वैष्णो देवी का सिक्का

माँ वैष्णों देवी भवन के पूर्व में त्रिकुट पर्वत की ऊँचाई है। मंदिर के अंदर माँ की पिंडी के आगे पश्चिम दिशा में चरण गंगा है, जहाँ हमेशा जल प्रवाहित होता रहता है। भवन के बाहर सामने पश्चिम दिशा में पर्वत में काफ़ी ढलान है, जहाँ पर पर्वत का पानी निरंतर बहता रहता है। माता वैष्णों देवी के दरबार में महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली तीनों भव्य पिंडियों के रूप में विराजमान हैं। पूर्व दिशा में ऊँचाई होना और पश्चिम दिशा में ढलान व पानी का स्रोत होना अच्छा नहीं माना जाता है, परंतु देखने में आया है कि ज़्यादातर वो स्थान, जो धार्मिक कारणों से प्रसिद्ध हैं, चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित हों, उन स्थानों की भौगोलिक स्थिति में काफ़ी समानताएँ देखने को मिलती हैं। ऐसे स्थानों पर पूर्व की तुलना में पश्चिम में ढलान होती है और दक्षिण दिशा हमेशा उत्तर दिशा की तुलना में ऊँची रहती है। उदाहरण के लिए ज्योर्तिलिंग महाकालेश्वर उज्जैन, पशुपतिनाथ मंदिर मंदसौर इत्यादि। वह घर जहाँ पश्चिम दिशा में भूमिगत पानी का स्रोत जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआँ, बोरवेल इत्यादि होता है। उस भवन में निवास करने वालों में धार्मिकता दूसरों की तुलना में ज़्यादा ही होती है।[5]

फेंगशुई के सिद्धांत
  • किसी भवन के पीछे की ओर ऊँचाई हो, मध्य में भवन हो तथा आगे की ओर नीचा होकर वहाँ जल हो, वह भवन प्रसिद्धि पाता है और सदियों तक बना रहता है। इस सिद्धांत में किसी दिशा विशेष का महत्त्व नहीं होता है।
  • माँ वैष्णों देवी भवन के पूर्व में त्रिकुट पर्वत की ऊँचाई है। मंदिर के अंदर माँ की पिंडी के आगे पश्चिम दिशा में चरण गंगा है, जहाँ हमेशा जल प्रवाहित होता रहता है। भवन के बाहर सामने पश्चिम दिशा में पर्वत में काफ़ी ढलान है, जहाँ पर पर्वत का पानी निरंतर बहता रहता है।
  • इस प्रकार माता वैष्णों देवी का दरबार वास्तु एवं फेंगशुई दोनों के सिद्धांतों के अनुकूल होने से माता का यह दरबार विश्व में प्रसिद्ध है। इन्हीं विशेषताओं के कारण ही यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। यहाँ खूब चढ़ावा आता है और भक्तों की मनोकामना भी पूर्ण होती है।[5]
वास्तु के सिद्धांत-
  • त्रिकुट पर्वत पर स्थित माँ का भवन (मंदिर) पश्चिममुखी है, जो समुद्र तल से लगभग 4800 फुट ऊँचाई पर है। माँ के भवन के पीछे पूर्व दिशा में पर्वत काफ़ी ऊँचाई लिए हुए हैं और भवन के ठीक सामने पश्चिम दिशा में पर्वत काफ़ी गहराई लिए हुए हैं, जहाँ त्रिकुटा पर्वत का जल निरंतर बहता रहता है।
  • भवन की उत्तर दिशा के ठीक अंतिम छोर पर पर्वत में एकदम उतार होने के कारण काफ़ी गहराई है। यह उत्तर दिशा में विस्तृत गहराई पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती गई है। भवन के दक्षिण दिशा में पर्वत काफ़ी ऊँचाई लिए हुए है, जहाँ दरबार से ढाई किलोमीटर दूर भैरवजी का मंदिर है, समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 6583 फुट है और यह ऊँचाई लगभग पश्चिम नैऋत्य तक है, जहाँ पर हाथी मत्था है।
  • गुफा का पुराना प्रवेश द्वार, जो कि काफ़ी सँकरा (तंग) है। लगभग दो गज तक लेटकर या काफ़ी झुककर आगे बढ़ना पड़ता है, तत्पश्चात् लगभग बीस गज लंबी गुफा है। गुफा के अंदर टखनों की ऊँचाई तक शुद्ध जल प्रवाहित होता है, जिसे चरण गंगा कहते हैं। वास्तु का सिद्धांत है कि जहाँ पूर्व में ऊँचाई हो और पश्चिम में निरंतर जल हो या जल का प्रवाह हो वह स्थान धार्मिक रूप से ज़्यादा प्रसिद्धि पाता है।
  • भवन के उत्तर - ईशान कोण वाले भाग में सन् 1977 में दो नई गुफाएँ बनाई गईं, इनमें से एक गुफा में से लोग दर्शन करने अंदर आते हैं और दूसरी गुफा से बाहर निकल जाते हैं। इन दोनों गुफाओं के फर्श का ढाल भी उत्तर दिशा की ओर ही है। ये दोनों ही गुफाएँ भवन में ऐसे स्थान पर बनीं, जिस कारण इस स्थान की वास्तुनुकूलता बहुत बढ़ गई है। फलस्वरूप इस मंदिर की प्रसिद्धि में चार चाँद लगे हैं, इन गुफाओं के बनने के बाद इस स्थान पर दर्शन करने वालों की संख्या पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई है और वैभव भी बहुत बढ़ गया है।[5]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 माता वैष्णोंदेवी (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) आधारशिला। अभिगमन तिथि: 01 जनवरी, 2011।
  2. 2.0 2.1 2.2 आशाओं का आसरा - माँ वैष्णोंदेवी भवन (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 01 जनवरी, 2011।
  3. 3.0 3.1 वैष्णों देवी की यात्रा (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) मेरी सखी डॉट इन। अभिगमन तिथि: 01 जनवरी, 2011।
  4. वैष्णों देवी की यात्रा (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 01 जनवरी, 2011।
  5. 5.0 5.1 5.2 वैष्णों देवी की यात्रा (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 01 जनवरी, 2011।

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