शकुंतला दुष्यंत  

शकुंतला दुष्यंत एक पौराणिक प्रेमकथा है। महाभारत काल में उपजी यह प्रेम कथा बहुत मार्मिक है। महाकवि कालिदास की अमर रचना अभिज्ञान शाकुंतलम में इसका उल्लेख किया गया है।

शकुंतला-दुष्यंत कथा

शकुंतला और दुष्यंत का विवाह

एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वह शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था। कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये। पुकार लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकलकर कहा, “हे राजन! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है।” उस कन्या को देखकर महाराज दुष्यंत ने पूछा, “बालिके! आप कौन हैं?” बालिका ने कहा, “मेरा नाम शकुंतला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ।” उस कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले, “महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं?” उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुंतला ने कहा, “वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की। इसीलिये मेरा नाम शकुंतला पड़ा। उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वह मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला- ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।” शकुंतला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, “शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देखकर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।” शकुंतला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया।

दुर्वासा ऋषि का शाप

कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुंतला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुंतला से बोले, “प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा कराकर अपने राजभवन में ले जाउँगा।” इतना कहकर महाराज ने शकुंतला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये। एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुंतला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले, “बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।” दुर्वासा ऋषि के शाप को सुनकर शकुंतला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुंतला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित होकर दुर्वासा ऋषि ने कहा, “अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिह्न होगा तो उस चिह्न को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।”

शकुंतला का हस्तिनापुर जाना

महाराज दुष्यंत के सहवास से शकुंतला गर्भवती हो गई थी। कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुंतला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया। इस पर महर्षि कण्व ने कहा, “पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है।” इतना कहकर महर्षि ने शकुंतला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया। मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुंतला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिह्न थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई। महाराज दुष्यंत के पास पहुँचकर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुंतला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, “महाराज! शकुंतला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें।” महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुंतला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुंतला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे। शकुंतला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सबके सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।

शकुंतला-दुष्यंत का पुत्र भरत

दुष्यंत का पश्चाताप

जिस मछली ने शकुंतला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट से अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुंतला का स्मरण हो आया और वह अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुंतला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला। कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पाकर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वह आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वह वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुंतला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुंतला का ही पुत्र था। उस बालक को देखकर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वह उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुंतला की सखी चिल्ला उठी, “हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बनकर आपको डस लेगा।” यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है। सखी को ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा। सखी ने प्रसन्न होकर समस्त वृतान्त शकुंतला को सुनाया। शकुंतला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुंतला को पहचान लिया। उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुंतला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये।



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