उर्वशी पुरुरवा  

उर्वशी पुरुरवा

उर्वशी पुरुरवा (अंग्रेज़ी: Urvashi Pururava) हिंदुओं की पौराणिक कथाओं में बहुत सी प्रेरणादायक और रोचक कहानियों की भरमार है। ऐसी ही एक कहानी महाभारत में है, जो कि उर्वशी नामक अप्सरा और पुरूरवा नामक राजा की है।

प्रेमकथा

उर्वशी स्वर्गलोक की मुख्य अप्सरा थी। वह देवों के राजा इन्द्र की कृपापात्र थीं। वह उनके दरबार में प्रत्येक संध्या नृत्य किया करती थीं। वह सुन्दर थीं। उर्वशी सभी देवताओं की महिला मित्र के रूप में ही जानी-मानी जाती थी। एक बार जब उर्वशी स्वर्ग में इन्द्र के दरबार में बोर हो गई तो उसने कुछ अलग करने के लिए पृथ्वी पर उतरने का निर्णय लिया। वह तथा उसकी अन्य सखी अप्सरा, चित्रलेखा दोनों पृथ्वी पर भ्रमण के लिए गयीं। वहाँ एक असुर की दृष्टि उन पर जा पड़ी और उसने उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें एक रथ में लिये चला जा रहा था और वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं। पुरूरवा ने इसे सुन लिया और उस राक्षस का पीछा किया। पुरुरवा सिंह के समान निर्भीक था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के असुर पर आक्रमण कर दिया। अन्ततः उसने असुर को तलवार के घाट उतार दिया। पुरूरवा चंद्र वंश के पहले राजा थे, जो कि बुध और इला के पुत्र थे। पुरूरवा एक वीर योद्धा थे।[1]

उर्वशी पुरुरवा के प्रेम में पड़ गयी और पुरुरवा उस सुन्दर अप्सरा का रसिक, उसका प्रेमी बन गया। किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोक लौटना पड़ा और पुरुरवा उसके लिए बेचैन रहने लगा। पुरुरवा की समझ में न आया कि वह क्या करे। उसने अपने बचपन के मित्र राजविदूषक को अपनी व्यथा कह सुनायी। एक दिन वह अपने उद्यान में बैठा उससे उर्वशी के सम्बन्ध में बातें कर रहा था कि उर्वशी उसके पीछे आ खड़ी हुई, यद्यपि वह दिखलाई नहीं पड़ रही थी। उसने पुरुरवा को अपने उपस्थित होने का ज्ञान कराया और दोनों परस्पर आलिंगन में बँध गये। ठीक उसी समय स्वर्गलोक से एक दूत आया और उसने उर्वशी को देवराज इन्द्र का सन्देश सुनाया। इन्द्र ने उसे आज्ञा दी थी कि वह तत्काल स्वर्गलोक पहुँचकर एक विशेष नृत्यनाटिका में भाग ले। लाचार हो उर्वशी को लौट जाना पड़ा।

भरत मुनि द्वारा शाप

उर्वशी का मन नृत्य-नाटिका में न लग पाया। एक नाटक के दौरान उर्वशी देवी लक्ष्मी की भूमिका निभा रही थी और उसने पुरुषोतम (विष्णु का नाम) के बजाय पुरुरवा का नाम लिया। इससे इस नाटक को कराने वाले ऋषि भरत नाराज हो गए और उन्होने उर्वशी को शाप दे दिया- ‘‘तुमने मेरी नाटिका में चित्त नहीं रमाया। तुम पृथ्वी पर जाकर वहाँ पुरुरवा के साथ मनुष्य की भाँति ही रहो।’’ उर्वशी पुरुरवा से प्रेम तो करती थी। किन्तु मृत्युलोक में नहीं रहना चाहती थी। अत: वह देवराज इन्द्र के पास पहुँचकर निवेदन करने लगीं कि वह उसको शाप-मुक्त कर दें। इन्द्र को अपनी प्रिय अप्सरा पर दया आयी। वह बोले, ‘‘उर्वशी, तुम पृथ्वी पर जाओ, किन्तु तुम अधिक दिन वहाँ नहीं रहोगी।’’

शर्तें

उर्वशी पुरुरवा के साथ जीवन बिताने को तैयार हो गई, लेकिन उसकी कुछ शर्तें थी। पहली तो यह कि वह दो मेमने साथ लेकर आएगी और राजा को उनकी देखभाल करनी होगी। दूसरी शर्त है कि जब तक वो पृथ्वी पर रहेगी तब तक वो केवल घी का ही सेवन करेगी। तीसरी थी कि वे एक दूसरे को नग्नावस्था में केवन यौन संबंध बनाते समय ही देखेंगे। जिस दिन उसकी शर्तें नहीं मानी जायेगी, वह उसे छोड़कर वापस स्वर्ग चली जाएगी। पुरुरवा ने ये शर्तें मान ली और वे दोनों एक साथ गंधमदन गार्डन में रहने लगे। एक वर्ष बाद उर्वशी ने पुरुरवा के पुत्र को जन्म दिया।

देवताओं की साजिश

उर्वशी को अपने दो मेमनो से इतना प्रेम था कि सोते-जागते समय वह उन्हें अपने पलँग से बाँधकर रखा करती थीं। उधर स्वर्गलोक के संगीतकारों, गन्धर्वों को उसके बिना अपनी कला अधूरी लग रही थी। उन्हें पुरुरवा के साथ उर्वशी की शर्त के बारे में ज्ञात था। अत: मध्यरात्रि को वे एक मेमना चुरा कर ले गये। उन्होंने जान बूझकर आवाज की, जिससे उर्वशी जाग गयी। उसने पुरुरवा को कुहनी मारकर कहा, ‘‘इधर आप निद्रा-मग्न हैं, उधर गन्धर्व मेरा मेमना चुराये लिये जा रहे हैं।’’ किन्तु पुरुरवा ने उबासी लेकर करवट बदल ली। अगले दिन उर्वशी कुपित बनी रही। पुरुरवा उसे मना न पाया। कुछ दिनों के उपरान्त एक रात को गन्धर्व फिर आये। उर्वशी फिर चिल्लायी, ‘‘गन्धर्व मेरा मेमना चुराये लिये जा रहे हैं!’’ इस बार पुरुरवा तत्काल उठ खड़ा हुआ और उसने गन्धर्वों का पीछा किया। शीघ्रता में उसके रात्रिकालीन वस्त्र शरीर से छूट गये। देखते-ही-देखते गन्धर्वों ने बिजली चमकाने की व्यवस्था की। उर्वशी ने उसे निवस्त्र देखा लिया और अन्तर्धान हो गयी। इस समय उर्वशी के पेट में पुरुरवा का बच्चा था। उसने उसे एक साल बाद कुरुक्षेत्र में मिलने को कहा, जहाँ उसने उसका पुत्र उसे सौंप दिया। इसके बाद और भी कई स्थितियाँ पैदा हुई, जब उर्वशी पृथ्वी पर आई और उसने बाद में पुरुरवा के और भी बच्चों को जन्म दिया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. उर्वशी और पुरुरवा (हिंदी) www.hindisamay.com। अभिगमन तिथि: 15 जुलाई, 2017।

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