संस्कृति के चार अध्याय -रामधारी सिंह दिनकर  

संस्कृति के चार अध्याय -रामधारी सिंह दिनकर
'संस्कृति के चार अध्याय' रचना का आवरण पृष्ठ
लेखक रामधारी सिंह दिनकर
मूल शीर्षक संस्कृति के चार अध्याय
प्रकाशक साहित्य अकादमी
प्रकाशन तिथि 1956
ISBN 81-85341-05-2
देश भारत
भाषा हिंदी
मुखपृष्ठ रचना सजिल्द
विशेष इस पुस्तक में दिनकर जी ने भारत के संस्कृतिक इतिहास को चार भागों में बाँटकर उसे लिखने का प्रयत्न किया है

संस्कृति के चार अध्याय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की एक बहुचर्चित पुस्तक है जिसे साहित्य अकादमी ने सन् 1956 में न केवल पहली बार प्रकाशित किया अपितु आगे चलकर उसे पुरस्कृत भी किया। इस पुस्तक में दिनकर जी ने भारत के संस्कृतिक इतिहास को चार भागों में बाँटकर उसे लिखने का प्रयत्न किया है। वे यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारत का आधुनिक साहित्य प्राचीन साहित्य से किन-किन बातों में भिन्न है और इस भिन्नता का कारण क्या है ? उनका विश्वास है कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रान्तियाँ हुई हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रान्तियों का इतिहास है।

भूमिका

इस पुस्तक की भूमिका पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। दिनकर जी की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति के निर्माण में आर्य एवं द्रविड़ भाषा परिवार के लोगों के साथ-साथ मध्यकालीन मुस्लिम संस्कृति एवं आधुनिक अंग्रेज़ी संस्कृति का भी महत्वपूर्ण योगदान है। आर्य, द्रविड़, मुस्लिम और अंग्रेज़ी प्रभाव को दिनकर जी भारतीय संस्कृति के चार अध्याय मानते हैं। उनकी उपरोक्त मान्यता नेहरू जी की 'भारत की खोज' अथवा डिस्कवरी ऑफ इंडिया से प्रभावित मानी जाती है। प्रस्तुत लेख में भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषताओं की चर्चा की गई है। ये विशेषतायें दिनकर जी की उर्वशी, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र और संस्कृति के चार अध्याय के अध्ययन के आधार पर विकसित की गई है।[1]

लेखक का निवेदन

भारत की संस्कृति, आरम्भ से ही, सामासिक रही है। उत्तर-दक्षिण पूर्व पश्चिम देश में जहां भी जो हिन्दू बसते है। उनकी संस्कृति एक है एवं भारत की प्रत्येक क्षेत्रीय विशेषता हमारी इसी सामासिक संस्कृति की विशेषता है। तब हिन्दू एवं मुसलमान हैं, जो देखने में अब भी दो लगते हैं। किन्तु उनके बीच भी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है जो उनकी भिन्नता को कम करती है। दुर्भाग्य की बात है कि हम इस एकता को पूर्ण रूप से समझने में समर्थ रहे है। यह कार्य राजनीति नहीं, शिक्षा और साहित्य के द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए। इस दिशा में साहित्य के भीतर कितने ही छोटे-बड़े प्रयत्न हो चुके है। वर्तमान पुस्तक भी उसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है।[2]

तमिल और संस्कृत का मेलजोल

तमिल-परंपरा के अनुसार संस्कृत और द्रविड़ भाषाएँ एक ही उद्गम से निकली हैं। इधर भाषा-तत्त्वज्ञों ने यह भी प्रमाणित किया है कि आर्यों की मूल भाषा यूरोप और एशिया के प्रत्येक भूखंड की स्थानीय विशिष्टताओं के प्रभाव में आकर परिवर्तित हो गयी, उसकी ध्वनियां बदल गयी, उच्चारण बदल गए और उसके भंडार में आर्येतर शब्दों का समावेश हो गया। भारत में संस्कृत का उच्चारण तमिल प्रभाव से बदला है, यह बात अब कितने ही विद्वान मानने लगे हैं। तमिल में र को ल और ल को र कर देने का रिवाज है। यह रीती संस्कृत में भी 'राल्योभेदः' के नियम से चलती है। काडवेल (Coldwell) का कहना है कि संस्कृत ने यह पद्धति तमिल से ग्रहण की है। बहुत प्राचीन काल में भी तमिल और संस्कृत के बीच शब्दों का आदान-प्रदान काफ़ी अधिक मात्र में हुआ है, इसके प्रमाण यथेष्ट संख्या में उपलब्ध हैं। किटेल ने अपनी कन्नड़-इंगलिश-डिक्शनरी में ऐसे कितने शब्द गिनाये है, जो तमिल-भंडार से निकल कर संस्कृत में पहुँचे थे। बदले में संस्कृत ने भी तमिल को प्रभावित किया। संस्कृत के कितने ही शब्द तो तमिल में तत्सम रूप में ही मौजूद हैं, किन्तु, कितने ही शब्द ऐसे भी हैं, जिनके तत्सम रूप तक पहुँच पाना बीहड़ भाषा-तत्त्वज्ञों का ही काम है। सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार तमिल का 'आयरम' शब्द संस्कृत के 'सहस्त्रम' का रूपांतरण है। इसी प्रकार, संस्कृत के स्नेह शब्द को तमिल भाषा ने केवल 'ने' (घी) बनाकर तथा संस्कृत के कृष्ण को 'किरूत्तिनन' बनाकर अपना लिया है। तमिल भाषा में उच्चारण के अपने नियम हैं। इन नियमों के कारण बाहर से आये हुए शब्दों को शुद्ध तमिल प्रकृति धारण कर लेनी पड़ती है।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शर्मा, डॉ. अमित कुमार। भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता (हिंदी) ब्रांड बिहार डॉट कॉम। अभिगमन तिथि: 23 सितम्बर, 2013।
  2. संस्कृति के चार अध्याय (हिंदी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 23 सितम्बर, 2013।
  3. तमिल और संस्कृत भाषा का मेलजोल (हिंदी) मेरी छोटी सी दुनिया (पुस्तक- संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ-37)। अभिगमन तिथि: 23 सितम्बर, 2013।

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