"खारवेल": अवतरणों में अंतर
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पहली सदी ई.पू. तक [[कलिंग]] का [[जैन]] राजा 'खारवेल' इस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ सम्राट बन चुका था और [[मौर्य]] शासकों का [[मगध]] कलिंग साम्राज्य का एक प्रांत बन चुका था। [[उड़ीसा]] में [[भुवनेश्वर]] के निकट उदयगिरि की पहाड़ियों में खारवेल के शासनकाल के 'स्मारक प्राप्य प्राचीन स्मारकों' में सबसे प्राचीन हैं। उपलब्ध शिलालेखों में राजा खारवेल को केवल सैन्य कौशल में ही माहिर नहीं बताया गया है बल्कि उसे साहित्य, गणित और सामाजिक विज्ञान का भी ज्ञाता बताया गया है। कला के संरक्षक के रूप में भी उसकी महान ख्याति थी और अपनी राजधानी में नृत्य और नाट्य कला को भी प्रोत्साहन देने का श्रेय उसे मिला।<ref>{{cite web |url=http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3640.html|title=भारत का इतिहास|accessmonthday=4सितम्बर |accessyear=2010 |last=|first=|authorlink=http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3640.html|format=एच टी एम एल |publisher=itihaasam.blogspot.com|language=हिन्दी }}</ref> | पहली सदी ई.पू. तक [[कलिंग]] का [[जैन]] राजा 'खारवेल' इस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ सम्राट बन चुका था और [[मौर्य वंश|मौर्य]] शासकों का [[मगध]] कलिंग साम्राज्य का एक प्रांत बन चुका था। [[उड़ीसा]] में [[भुवनेश्वर]] के निकट उदयगिरि की पहाड़ियों में खारवेल के शासनकाल के 'स्मारक प्राप्य प्राचीन स्मारकों' में सबसे प्राचीन हैं। उपलब्ध शिलालेखों में राजा खारवेल को केवल सैन्य कौशल में ही माहिर नहीं बताया गया है बल्कि उसे साहित्य, गणित और सामाजिक विज्ञान का भी ज्ञाता बताया गया है। कला के संरक्षक के रूप में भी उसकी महान ख्याति थी और अपनी राजधानी में नृत्य और नाट्य कला को भी प्रोत्साहन देने का श्रेय उसे मिला।<ref>{{cite web |url=http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3640.html|title=भारत का इतिहास|accessmonthday=4सितम्बर |accessyear=2010 |last=|first=|authorlink=http://itihaasam.blogspot.com/2009/01/blog-post_3640.html|format=एच टी एम एल |publisher=itihaasam.blogspot.com|language=हिन्दी }}</ref> | ||
<blockquote>'प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर कब्जा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.' <ref>{{cite web |url=http://www.maheshpanthi.net/uncategorized/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%98%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8/|title=मेघवंश: एक सिंहावलोकन|accessmonthday=4सितम्बर |accessyear=2010 |last=|first=|authorlink=maheshpanthi.net|format=एच टी एम एल |publisher=maheshpanthi.net|language=हिन्दी }}</ref></blockquote> | <blockquote>'प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर कब्जा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.' <ref>{{cite web |url=http://www.maheshpanthi.net/uncategorized/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%98%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8/|title=मेघवंश: एक सिंहावलोकन|accessmonthday=4सितम्बर |accessyear=2010 |last=|first=|authorlink=maheshpanthi.net|format=एच टी एम एल |publisher=maheshpanthi.net|language=हिन्दी }}</ref></blockquote> |
07:11, 9 सितम्बर 2010 का अवतरण
पहली सदी ई.पू. तक कलिंग का जैन राजा 'खारवेल' इस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ सम्राट बन चुका था और मौर्य शासकों का मगध कलिंग साम्राज्य का एक प्रांत बन चुका था। उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट उदयगिरि की पहाड़ियों में खारवेल के शासनकाल के 'स्मारक प्राप्य प्राचीन स्मारकों' में सबसे प्राचीन हैं। उपलब्ध शिलालेखों में राजा खारवेल को केवल सैन्य कौशल में ही माहिर नहीं बताया गया है बल्कि उसे साहित्य, गणित और सामाजिक विज्ञान का भी ज्ञाता बताया गया है। कला के संरक्षक के रूप में भी उसकी महान ख्याति थी और अपनी राजधानी में नृत्य और नाट्य कला को भी प्रोत्साहन देने का श्रेय उसे मिला।[1]
'प्रसिद्ध इतिहासकार के.पी. जायसवाल ने मेघवंश राजाओं को चेदीवंश का माना है. ‘भारत अंधकार युगीन इतिहास (सन 150 ई. से 350 ई. तक)’ में वे लिखते हैं, ‘ये लोग मेघ कहलाते थे. ये लोग उड़ीसा तथा कलिंग के उन्हीं चेदियों के वंशज थे, जो खारवेल के वंशधर थे और अपने साम्राज्य काल में ‘महामेघ’ कहलाते थे. भारत के पूर्व में जैन धर्म फैलाने का श्रेय खारवेल को जाता है. कलिंग राजा जैन धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव धर्म से विरोध था. अत: वैष्णव धर्मी राजा अशोक ने उस पर आक्रमण किया इसका दूसरा कारण समुद्री मार्ग पर कब्जा भी था. इसे ‘कलिंग युद्ध’ के नाम से जाना जाता है. युद्ध में एक लाख से अधिक लोग मारे जाने से व्यथित अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा पर जोर देकर बौद्ध धर्म को अन्य देशों तक फैलाया.' [2]
जिन दिनों मगध पर पुष्पमित्र राज करता था, उन्हीं दिनों कलिंग में खारवेल नाम का बहुत ही वीर और महत्वाकांक्षी राजा हुआ । खारवेल इतना बहादुर था कि दक्षिण में जिस तमिल देशों के संघ को चन्द्रगुप्त मौर्य भी अपने अधीन नहीं कर सका था, उसे खारवेल ने अपने अधीन कर लिया। खारवेल ने पाटलिपुत्र पर भी चढ़ाई की। खारवेल ने यवनों को भी परास्त किया। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में खारवेल राजा के अधीन कलिंग एक शाक्तिशाली साम्राज्य बन गया। खारवेल की मृत्यु के बाद उड़ीसा की ख्याति लुप्त हो गई।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ भारत का इतिहास (हिन्दी) (एच टी एम एल) itihaasam.blogspot.com। अभिगमन तिथि: 4सितम्बर, 2010।
- ↑ मेघवंश: एक सिंहावलोकन (हिन्दी) (एच टी एम एल) maheshpanthi.net। अभिगमन तिथि: 4सितम्बर, 2010।