नौचन्दी मेला  

नौचन्दी मेला
नौचन्दी मेला, मेरठ
विवरण यह मेला प्रति वर्ष लगता है और यह ऐतिहासिक हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है।
समय चैत्र मास के नवरात्रि त्यौहार से एक सप्ताह पहले से (अमूमन अप्रैल में), लगभग होली के एक सप्ताह बाद लगता है और एक माह तक चलता है।
स्थान मेरठ, उत्तर प्रदेश
अन्य जानकारी नौचन्दी यानी नव चंडी। इसी नाम से यहाँ एक मंदिर भी है। बगल में ही बाले मियां की मजार है। जहाँ मंदिर में रोजाना भजन-कीर्तन होते हैं वहीं मजार में कव्वाली व कवि सम्मलेन।
नौचन्दी मेला उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध मेलों में से एक है। यह मेला मेरठ में प्रति वर्ष लगता है। यहां का ऐतिहासिक नौचंदी मेला हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। हजरत बाले मियां की दरगाह एवं नवचण्डी देवी (नौचन्दी देवी) का मंदिर एक दूसरे के निकट ही स्थित हैं। मेले के दौरान मंदिर के घण्टों के साथ अजान की आवाज़ एक सांप्रदायिक अध्यात्म की प्रतिध्वनि देती है। यह मेला चैत्र मास के नवरात्रि त्यौहार से एक सप्ताह पहले से, लगभग होली के एक सप्ताह बाद लगता है और एक माह तक चलता है।
नौचन्दी मेला

इतिहास

नौचन्दी मेले का स्वरूप पौराणिक मेरठ के इतिहास से जुड़ा है। मुग़ल काल से चले आ रहे नौचंदी मेले ने शहर के कई स्वतंत्रता आंदोलनों को महसूस किया। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की जहां नौचंदी गवाह बनी। वहीं शहादत के दर्द को भी मेले ने करीब से महसूस किया।

स्वतंत्रता संग्राम का गवाह

अत्याचार और बगावत के सुरों को भी इस नौचंदी ने खूब सुना। यहीं नहीं 1857 का संग्राम देखने का गौरव भी नौचंदी से अछूता नहीं रहा। आजादी की मूरत बनी नौचंदी ने शहर के कई उतार चढ़ाव देखे, लेकिन मेले की रौनक कभी कम न हुई। देश आजाद हुआ तो बंटवारे का वक्त आया। शहर में क्या समूचे देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ा। किंतु चाहे शासन मुग़लों का रहा हो या अंग्रेज़ी हुकूमत या फिर स्वतंत्रता संग्राम या सांप्रदायिक दंगे, आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि शहर में नौचंदी के मेले का आयोजन न हुआ हो।[1]

मेरठ की शान

अप्रैल के महीने में लगने वाला नौचन्दी मेला मेरठ की शान है। इन दिनों में यह मेला अपने पूरे शबाब पर होता है। यह शहर के अंदर नौचन्दी मैदान में लगता है। हर तरफ से आने जाने के साधन सिटी बसें, टम्पू व रिक्शा उपलब्ध हैं। इसकी एक खासियत और है कि यह रात को लगता है। दिन में तो नौचन्दी मैदान सूना पड़ा रहता है।
नौचन्दी मेला

नौचन्दी अथवा नव चंडी

नौचन्दी यानी नव चंडी। इसी नाम से यहाँ एक मंदिर भी है। बगल में ही बाले मियां की मजार है। जहाँ मंदिर में रोजाना भजन-कीर्तन होते हैं वहीं मजार में कव्वाली व कवि सम्मलेन। इसके अलावा एक बड़े मेले में जो कुछ होना चाहिए वो सब यहाँ है। भरपूर मनोरंजन, खाना-खुराक, भीड़-भाड़, सुरक्षा-व्यवस्था सब कुछ। पहले दूर दूर के गावों से लोग यहाँ आते थे। इन दिनों हर तरफ़ नौचन्दी ही नौचन्दी रहती थी। सभी सपरिवार प्रोग्राम बनाते थे नौचन्दी जाने का। दो साल पहले मैं भी गया था- साइकिल से। अब रात को अपने गाँव में कोई वाहन तो चलता नहीं। लेकिन पिछले कुछ सालों से यह मेला हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ रहा है। हर साल कुछ न कुछ बवाल हो ही जाता है। गाँव वाले तो अब कम ही जाते हैं - माहौल खराब है। फिर भी मेला, मेला है। भारतीयता की पहचान है। एक बात और, इस नाम से एक ट्रेन भी चलती है- नौचन्दी एक्सप्रेस। मेरठ से मुरादाबाद, लखनऊ के रास्ते इलाहाबाद तक। मेरठ से सहारनपुर तक लिंक के रूप में चलती है। मेरठ को राजधानी से जोड़ने वाली एकमात्र ट्रेन। तो अगर अगले दस-पंद्रह दिनों में हरिद्वार या आगे जाने का प्रोग्राम हो तो इस मेले को भी देख सकते हैं।[2]

इंडो-पाक मुशायरा

इंडो-पाक मुशायरा इस मेले की जान हुआ करता था। इंडो-पाक मुशायरे में हिंदुस्तान के साथ पड़ोसी मुल्क के शायरों को भी न्यौता दिया जाता था। बताया जाता है कि नौचंदी दिन का मेला देहात और रात को शहर का होता था। दिन में दूर-दराज के लोग इस मेले में खरीदारी करने आते थे, जबकि रात होते यहां शहरवासियों का जमावड़ा लग जाता था। इन सालों में नौचंदी के स्वरूप में आई तब्दीली पर दु:ख जाहिर करते हुए कई लोग कहते हैं कि अब नौचंदी मेला बस एक औपचारिकता भर रह गया है। अधिकांश लोग रात में वहां जाना पसंद नहीं करते। अब मेले में सुधार की बहुत गुंजाइश है।

संस्कृति की संपूर्ण झलक

देश के कोने-कोने से व्यापारी आकर यहां भिन्न-भिन्न तरीके के उत्पाद बेचते थे। इससे न केवल शहर के लोगों को अपनी संस्कृति का बोध होता था, बल्कि देश को आर्थिक लाभ भी होता था। अंग्रेज़ हुकूमत के दौरान यहां बहुत बड़ा पशु मेला भी लगता था। इस मेले में अरबी घोड़ों का व्यापार किया जाता था। सेना अपने घोड़े अधिकांश इस मेले से ही खरीदती थी।

सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक

कहा तो यह भी जाता है कि शहर में जब-जब सांप्रदायिक दंगे हुए, तब-तब नौचंदी मेले ने ही हिन्दू-मुस्लिम के दिलों की कड़वाहट दूर की। दंगों के बाद भी दोनों ही पक्ष के लोग नौचंदी मेले में एक साथ देखे गए। शहर में नौचंदी मेला 350 साल से लग रहा है। सन् 1672 में नौचंदी मेले की शुरुआत शहर स्थित मां नवचंडी के मंदिर से हुई थी। शुरुआत में इसका नाम नवचंडी मेला था, जो बाद में नौचंदी के नाम से जाना गया। वरिष्ठ लेखक और इतिहासकार धर्मवीर दिवाकर के अनुसार- "नवरात्र के नौवें दिन यहां मेला भरना शुरू हुआ था। धीरे- धीरे मेला बड़ा होता गया और इसका स्वरूप एक दिन से निकल कर दिनों में तब्दील हो गया। पुराने समय समय में नौचंदी मेला मेरठ ही नहीं, बल्कि पूरे देश की शान हुआ करता था। मेले में हिन्दू-मुस्लिम की सहभागिता से शहर का सांप्रदायिक सौहार्द बना रहता था।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नौचंदी मेले का इतिहास 350 साल पुराना (हिंदी) inextlive.jagran.com। अभिगमन तिथि: 11 मार्च, 2018।
  2. मेरठ की शान है नौचन्दी मेला (हिन्दी) मुसाफिर हूँ यारों। अभिगमन तिथि: 30 जनवरी, 2015।

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