करुण रस  

भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में प्रतिपादित आठ नाट्यरसों में श्रृंगार और हास्य के अनन्तर तथा रौद्र से पूर्व करुण रस की गणना की गई है। ‘रौद्रात्तु करुणो रस:’ कहकर 'करुण रस' की उत्पत्ति 'रौद्र रस' से मानी गई है और उसका वर्ण कपोत के सदृश है [1] तथा देवता यमराज बताये गये हैं [2] भरत ने ही करुण रस का विशेष विवरण देते हुए उसके स्थायी भाव का नाम ‘शोक’ दिया है[3] और उसकी उत्पत्ति शापजन्य क्लेश विनिपात, इष्टजन-विप्रयोग, विभव नाश, वध, बन्धन, विद्रव अर्थात् पलायन, अपघात, व्यसन अर्थात् आपत्ति आदि विभावों के संयोग से स्वीकार की है। साथ ही करुण रस के अभिनय में अश्रुपातन, परिदेवन अर्थात् विलाप, मुखशोषण, वैवर्ण्य, त्रस्तागात्रता, नि:श्वास, स्मृतिविलोप आदि अनुभावों के प्रयोग का निर्देश भी कहा गया है। फिर निर्वेद, ग्लानि, चिन्ता, औत्सुक्य, आवेग, मोह, श्रम, भय, विषाद, दैन्य, व्याधि, जड़ता, उन्माद, अपस्मार, त्रास, आलस्य, मरण, स्तम्भ, वेपथु, वेवर्ण्य, अश्रु, स्वरभेद आदि की व्यभिचारी या संचारी भाव के रूप में परिगणित किया है [4]

  • धनंजय [5], विश्वनाथ [6] आदि संस्कृत आचार्यों ने करुण रस के उत्पादक विविध कारणों को संक्षिप्त करके ‘दृष्ट-नाश’ और ‘अनिष्ट-आप्ति’ इन दो संज्ञाओं में निबद्ध कर दिया है, जिनका आधार उक्त ‘नाट्यशास्त्र’ में ही मिल जाता है।
  • धनंजय - ‘इष्टनाशादनिष्टाप्तौ शोकात्मा करुणोऽनुतम्’ [7]
  • विश्वनाथ - ‘इष्टनाशादनिष्टाप्ते: करुणाख्यो रसो भवेत’ [8]
  • हिन्दी के अधिकांश काव्याचार्यों ने इन्हीं को स्वीकार करते हुए करुण रस का लक्षण रूढ़िगत रूप में प्रस्तुत किया है।
  • चिन्तामणि[9] के अनुसार

‘इष्टनाश कि अनिष्ट की, आगम ते जो होइ।
दु:ख सोक थाई जहाँ, भाव करुन सोइ’ [10]

‘विनठे ईठ अनीठ सुनि, मन में उपजत सोग।
आसा छूटे चार विधि, करुण बखानत लोग’ [12]

  • कुलपति मिश्र ने ‘रसरहस्य’ [13] में भरतमुनि के नाट्य के अनुरूप विभावों का उल्लेख किया है और केशवदास ने ‘रसिकप्रिया’ में ‘प्रिय के बिप्रिय करन’ को ही करुण की उत्पत्ति का कारण माना है।
  • जहाँ तक करुण रस के देवता का प्रश्न है, हिन्दी के कवियों ने अधिकतर ‘यम’ के स्थान पर ‘वरुण’ को मान्यता प्रदान की है और इस प्रकार भरत से लेकर विश्वनाथ तक की परम्परा से भिन्न पथ का अनुसरण किया है। करुण रस के उद्दीपन-विभाव का निरूपण प्राय: ‘साहित्यदर्पण’ के ‘दाहादिकावस्था भवेदुद्दीपनम्’ [14] के प्रभावों से किया गया है।
स्थायी भाव
करुण रस की परिव्याप्ति और परिसीमन का निर्धारण एक जटिल प्रश्न है। यद्यपि करुण का स्थायी भाव शोक माना गया है, पर शोक तभी सम्भव है, जब उसके मूल में ‘राग’ या ‘रति’ किसी न किसी रूप में निहित हो। आदिकाव्य ‘वाल्मीकि रामायण’ से सम्बद्ध क्रोंचवध की कथा में ही इसका सूत्र मिलता है। जिस क्रोंच - मिथुन में से एक के वध का परिणाम ‘शोक’ के ‘श्लोकत्व’ में घटित हुआ, वह ‘काममोहित’ था। इस आधार पर कुछ काव्य - चिन्तकों ने करुण का क्षेत्र अन्य रसों की अपेक्षा अत्यन्त व्यापक बताया है और श्रृंगारादि रसों को उसी की परिधि में समाविष्ट करने की चेष्टा की है। इसका सबसे अधिक श्रेय ‘उत्तररामचरित’ के रचयिता भवभूति को है। इन्हीं ने काव्य में करुण रस की

महत्ता और व्याप्ति का मुक्त उदघोष किया है -
‘एको रस: करुण एवं निमित्तभेदाद्भिन्न: पृथक्पृथगिव श्रयते विवर्तान्।
आवर्तबुदबुद-तरंगमयान्वकारानम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समग्रम्’ [15]

मानव हृदय को सुख की अपेक्षा दु:ख अधिक तलस्पर्शी एवं द्रवणशील अनुभूति प्रदान करता है तथा वह अधिक गम्भीर एवं स्थायी आत्मिक एकता उत्पन्न करने की क्षमता रखता है, कदाचित् इसी आधार पर उक्त स्थापना की मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की जा सकती है। एक ओर जहाँ करुण को इतनी व्यापक महत्ता प्रदान की जाती है, वहीं दूसरी ओर आचार्यों ने उसकी सीमाओं का भी निर्देश श्रृंगारादि अन्य रसों की तुलना में सूक्ष्म रीति से किया है।

अनुभाव और संचारी भाव

अनुभावों और संचारियों की दृष्टि से विप्रलम्भ श्रृंगार करुण के सबसे निकट पड़ता है, इसीलिए भरतमुनि से लेकर वर्तमान काल तक काव्य के तत्त्वज्ञों को दोनों का मौलिक अन्तर स्पष्ट करने की ओर विशेष ध्यान देना पड़ा है। ‘नाट्यशास्त्र’ में करुण को निरपेक्ष और विप्रलम्भ को सापेक्ष कहकर दोनों का पार्थक्य प्रदर्शित किया गया है -

‘करुणस्तु....निरपेक्षभाव औत्सुक्यचिन्तासमुत्य:।
सापेक्षभावों विप्रलम्भकृत:। एवमन्य: करुण: अन्यश्च विप्रलम्भ:’ [16]

उक्त उद्धृत अंश के साथ भरतमुनि ने ‘एवमेष सर्वभावसंयुक्त: श्रृंगारो भवति’ अर्थात् ‘इस प्रकार यह श्रृंगार सब भावों से संयुक्त होता है’; यह टिप्पणी जोड़कर स्पष्ट निर्देश कर दिया कि वे करुण की तुलना में श्रृंगार को अधिक व्यापक भाव भूमि पर आधारित मानते थे। जो करुण इष्टनाश से उत्पन्न होता है, वह तो विप्रलम्भ से सरलता से पृथक् किया जा सकता है, क्योंकि नायक - नायिका, दोनों की सत्ता ‘रति’ की स्थिति के लिए अनिवार्य है। यदि दोनों में से किसी का अवसान हो जाता है तो ‘रति’ की स्थिति ही नहीं होती, अत: ऐसी दशा में केवल करुण ही सम्भव है। परन्तु अनिष्टप्राप्ति से उत्पन्न होने वाला करुण विप्रलम्भ से तब तक अलग नहीं जा सकता, जब तक ‘रति’ और ‘शोक’ की सम्मिलित स्थिति में किसी एक की प्रधानता व्यक्त नहीं हो जाती।

  • ‘रत्यनालिंगित शोक’ की विशेष स्थिति को मानते हुए मिश्र रस के रूप में ‘करुण श्रृंगार’ और ‘करुण वात्सल्य’ की भी कल्पना की गई है[17]
  • कृष्ण काव्य में 'भ्रमरगीत' के प्रसंग में गोपी - विरह, यशोदा - विलाप और ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम’ के चतुर्थ अंक में कण्व के आश्रम से शकुन्तला की विदाई तथा ऐसे ही अन्य स्थल शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार करुण रस के अन्तर्गत न आते हुए भी न्यूनाधिक करुण प्रभाव उत्पन्न करते हैं। उर्मिला - विरह तथा राम वन गमन की स्थिति भी समानान्तर ही है, कदाचित इसीलिए इनके वर्णन में कवियों ने ‘करुणा’ या ‘करुण रस’ का स्पष्ट प्रयोग किया है।
मैथिलीशरण गुप्त -

‘करुणे, क्यों रोती है? उत्तर में और अधिक तू रोई। मेरी विभूति है जो, उसको भवभूति क्यों कहे कोई?’ [18]

तुलसीदास -

‘मुख मुखाहि लोचन स्रवहि सोक न हृदय समाइ।
मनहूँ करुन रस कटकई उत्तरी अवध बजाइ’ [19]

  • रामचन्द्र शुक्ल ने ऐसे ही स्थलों को ध्यान में रखकर करुण और विप्रलम्भ का अन्तर बताते हुए लिखा है कि वियोग में प्रिय के अपने से बिछुड़ने की विह्वलता प्रधान होती है, किन्तु शोक में अपने कष्ट की भावना उतना काम नहीं करती, जितना प्रिय के कष्ट की चेतना जी को जलाती है। इसमें भी भाव की प्रधानता और अप्रधानता के आधार पर ही करुण और श्रृंगार के बीच अन्तर करने की पुष्टि होती है।
  • केशवदास ने वियोग श्रृंगार के चार भेदों में एक करुण भी रखा है, जो इस बात का प्रमाण है कि दोनों की सीमा एक बिन्दु पर मिल जाती है। करुण रस के साथ जो इससे भी महत्त्वपूर्ण समस्या सम्बद्ध रही है, वह है दु:ख के द्वारा आनन्द की उपलब्धि की।
काव्यशास्त्र में रस
  • करुण के द्वारा प्रत्यक्ष तो दु:ख की अनुभूति होती है, परन्तु भारतीय काव्यशास्त्र में रसों को आनन्दोत्पादक माना गया है। अत: सैद्धान्तिक दृष्टि से करुण रस की निष्पत्ति से भी भाव को आनन्द की ही उपलब्धि होनी चाहिए। करुण काव्य से दु:ख की अनुभूति होती ही नहीं, यह कहना प्रत्यक्ष अनुभव का विरोधी समझकर आचार्यों ने विविध प्रकार के तर्कों से इसका समाधान करने का यत्न किया है। कुछ विद्वान् करुण प्रसंगों से आनन्द की उपलब्धि सम्भव मानते हैं, और कुछ इसके विरोधी हैं।
  • संस्कृत काव्यशास्त्र में इस विवाद का मूल पर्याप्त प्राचीन है, इधर पाश्चात्य नाटकों में प्राप्त ट्रेजिडी की समस्या तथा तत्सम्बन्धी प्राचीन ग्रीक मनीषियों के मतों पर भी इसी के साथ विचार किया जाने लगा है। ‘ध्वन्यालोक’ [20] में आनन्दवर्धन [21] ने न केवल करुण में ‘माधुर्य’ एवं ‘आर्दता’ की स्थिति मानी है, वरन् उसे श्रृंगार और विप्रलम्भ से उत्तरोत्तर अधिक प्रकर्षमय भी बताया है, जिससे व्यंजित होता है कि वे करुण रस को श्रृंगार से भी अधिक तृप्तिकर अथवा आनन्ददायक मानते थे।
  • मुक्तिवाद के प्रतिपादक भट्टनायक ने कहा है कि रसदशा में सत्त्वोद्रेक होने से भावक के लिए भाव के क्षेत्र में ‘स्व’ और ‘पर’ का भेद समाप्त हो जाता है, जिसके फलस्वरूप भाव के सात्त्विक आस्वादन से उसे आनन्द की उपलब्धि होती है। करुण रस में भी यही बात चरितार्थ होती है। *मधुसूदन सरस्वती ने ‘भक्तिरसायन’ में सांख्यदर्शन के आधार पर करुण आदि दु:खात्मक रसों में शुद्ध सत्त्व की स्थिति न मानकर गुणों में तारतम्य स्थापित किया है। उनकी दृष्टि से सतोगुण उद्रेकशून्य होता है, जबकि ‘क्रोध’ और ‘शोक’ में रजोगुण और तमोगुण की प्रधानता रहती है, जिससे इनमें न्यूनाधिक उद्रेक अवश्य मिलता है। इसी कारण रौद्र रस और उससे उत्पन्न करुण रस विशुद्ध आनन्द की सृष्टि नहीं कर सकते। पर इसी के साथ अनुभूति लौकिक और अलौकिक रूप को भी स्वीकार करते हैं, जो रस सिद्धान्त और उसके आनन्दवाद का मूल आधार है। *अभिनव गुप्त ने रस दशा की अलौकिक अनुभूति और उसकी विलक्षणता का सूक्ष्म विवेचन करते हुए हृदय की मुक्त-दशा से आनन्द की प्राप्ति मानी है, जो उनके विचार से सभी रसों में अनिवार्य रूप से रहती है, अन्यथा रस-निष्पत्ति ही असम्भव है। विश्वनाथ ने केवल सचेतस् व्यक्तियों को करुण रस के प्रति आकर्षित होने में सक्षम बताया है और करुण की रसात्मकता को सीमित किया है।
  • भोज ने धनंजय और विश्वनाथ के ही तर्क के आधार पर ‘दु:खदातापि सुखं जनयति’ का प्रतिपादन किया। जिस प्रकार रति में नखक्षतादि कष्टदायक होते हुए भी सुखसंवृद्धि के साधन होते हैं, उनके विचार से उसी प्रकार करुण रस में भी दु:खद वस्तुएँ सुखानुभूति उत्पन्न करती हैं। *रामचन्द्र गुणचन्द्र ने अपने ‘नाट्यदर्पण’ में इसी बात को ‘पानक रस’ का उदाहरण देकर प्रतिपादित किया है, जिसमें सुखास्वाद की तरह तीक्ष्ण आस्वाद भी रुचिकर लगता है - ‘पानकरसमाधुर्यमिव च तीक्ष्णास्वादेन, सुखास्वादेन सुतराँ सुखानि स्वदन्ते।’ [22]
रसों का वर्ग विभाजन
  • कदाचित इसी समस्या से प्रेरित होकर अनेक आचार्यों ने रसों को दो भागों में विभाजित कर दिया।
  1. श्रृंगार, वीर, हास्य, अद्भुत और शान्त, ये पाँच रस अनुकूल वेदनीय होने के नाते सुखात्मक वर्ग में रखे गए तथा
  2. करुण, रौद्र, वीभत्स और भयानक, ये चार रस प्रतिकूल वेदनीय होने से दु:खात्मक वर्ग में माने गए।
  • रसों के इस वर्ग विभाजन का मूल स्रोत काफ़ी पुराना है, यद्यपि सर्वाधिक प्रसिद्धि इसके लिए रामचन्द्र गुणचन्द्र को ही मिली। उनके ‘नाट्यदर्पण’ की 109वीं कारिका है - ‘सुखदु:खात्मक को रस:।’
  • ‘नाट्यशास्त्र’ की ‘अभिनव भारती’ टीका में भी कहा गया है - ‘सुख-दु:खस्वभावो रस:’, अर्थात् रस सुख-दु:ख स्वभाव वाले होते हैं। यह ‘नाट्यदर्पण’ से पहले की रचना है।
  • हरिपाल के ‘संगीतसुधाकर’, रुद्रभट्ट के ‘रसकलिका’, धनंजय के ‘दशरूपक’ आदि अनेक ग्रन्थों में भी करुण रस को दु:खात्मक मानकर उसकी आनन्दात्मकता पर विचार किया गया है। रसिकों को उसमें उत्तरोत्तर प्रवृत्ति होती है, इसके करुण रस में स्थिर आनन्द का प्रमाण माना गया है, यथा -

‘अत्रोत्तरोत्तरारसिकानां प्रवृत्तय:। यदि वा लौकिककरणवद्दु:खात्मकत्वमेवेह स्यात्तदा न कश्चित्तत्र प्रवर्तेत’ [23]। इस समस्या पर अनेक आधुनिक मराठी विद्वानों ने भी विचार किया है।

  • द. के. केलकर ने अपने ‘काव्यालोचन’ नामक ग्रन्थ में करुण की दु:खात्मकता के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किया कि यदि अश्रुपात आदि दु:खबोधक अनुभाव आनन्द के व्यंजक माने जाएँ तो, इनकी उपस्थिति रति आदि सुखदशाओं में भी होनी चाहिए, जो नहीं होती। अत: ये दु:ख के ही लक्षण हैं, और करुण दु:खात्मक रस ही है। उन्होंने एक मौलिक प्रश्न यह भी उठाया है कि आनन्द को ही क्यों इतनी प्रमुखता दी जाये, दु:ख भी प्रमुख है। करुण के नियतिकृत, व्यक्तिगत और आदर्शात्मक, ये तीन रूप मानते हुए, उन्होंने आनन्द की उपलब्धि केवल आदर्शात्मक करुण से ही सम्भव मानी।
  • आगरकर और जोग आदि विचारकों ने भी लगभग ऐसी ही धारणाएँ व्यक्त की हैं। दा. न. आपटे ने मन के अणु और विभु, दो भेद माने और कहा कि अणुरूप मन निरन्तर आनन्दलीन रहता है। केवल विभुरूप मन दु:खादि लौकिक दशाओं से सम्पृक्त होता है। आधुनिक मनोविज्ञान इन भेदों को स्वीकार नहीं करता। अत: इन पर आधारित करुण रस की व्याख्या भी मान्य नहीं हो सकती।
  • दि. के. बेडेकर ने रसों के पूर्वोल्लिखित सुख-दु:खात्मक विभाजन को ‘देवासुर कथा’ की पौराणिक परिकल्पना पर आधारित बताया, जिसके अनुसार करुण रस आसुरी रसों की कोटि में आता है। पर उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि ‘आधुनिक साहित्य में करुण रस रौद्र का ऐसा अनुचर नहीं है। वह स्वतंत्र है। व्यक्तित्व का गौरव और श्रेष्ठ व्यक्तियों में छिपे किसी दोष के कारण उदात्त व्यक्ति को जो दारुण व्यथा सहनी पड़ी, वह आज की करुण कथाओं का विषय है’।
  • मराठी साहित्य के एक अन्य विवेचक वामन मल्हार जोशी ने करुण रस की आधुनिक व्याख्या करते हुए उससे आनन्द की सृष्टि सम्भव मानी है। बाटवे व्यक्ति-भेद के आधार पर ही करुण में आनन्द की स्थिति मानते हैं। उसी प्रकार जिस तरह विश्वनाथ ने सचेतस व्यक्तियों को ही करुण से आनन्द पाने में सक्षम बताया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि आधुनिक रस-विवेचकों ने करुण रस के आनन्दप्रद होने की प्राचीन स्थापना का सर्वथा तिरस्कार नहीं किया है।
  • ट्रेजिडी को लेकर यूरोपीय समीक्षकों द्वारा जो समाधान करुण दृश्यों के प्रभाव के सम्बन्ध में व्यक्त किये गए, उनके मूल में प्राय: अरस्तू[24] का ‘कैथासिस’ सिद्धान्त किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है। ‘कैथासिस’ का अर्थ है, 'मनोरेचन'। भयद एवं कारुणिक दृश्यों के देखने से अन्तर्मन के विकारों का रेचन हो जाता है, और वह अन्तत: चित्तवृत्ति के लिए स्वस्थ होता है।
  • शेक्सपीयर[25] के प्रसिद्ध दु:खान्त नाटकों की व्याख्या बहुधा इसी दृष्टिकोण से की जाती रही है। निश्चय ही मनोरेचन का सिद्धान्त करुण भावों के विवेचन में एक महत्त्वपूर्ण विचार-कोण प्रस्तुत करता है।
  • हीगेल[26] ने मनुष्य और ईश्वर के सम्बन्ध की रहस्यात्मकता तथा मानव आचरण की नैतिक भावना को ट्रेजिडी का मूल माना। कारुणिक और दु:खद घटनाएँ मानव जीवन को परिचालित करने वाली किसी महान् रहस्यमयी शक्ति का बोध कराती हैं। अतएव साहित्य में करुण दृश्यों का चित्रण हीगेल के मत से एक उद्देश्य विशेष को भी व्यक्त करता है और यह उद्देश्य नैराश्य का प्रसार न होकर जीवन के प्रति श्रद्धा और विश्वास का प्रसार है।
  • शापेनहावर [27], नीत्शे [28] आदि दार्शनिकों तथा ड्राइडन [29], एडिसन [30], डि. क्विसी [31] आदि समीक्षकों ने ट्रेजिडी की समस्या पर पर्याप्त विचार प्रस्तुत किए हैं, जिनका स्वतंत्र महत्त्व है।

करुण रस के भेद

साधन, आलम्बन धर्म-अपचय, मन-वचन, क्रिया तथा प्रभाव की मात्रा को आधार मानकर करुण रस के अनेक भेद काव्यशास्त्र में मिलते हैं। साधन के आधार पर ‘द्रष्टजन्य’, ‘स्मृत अनिष्टजन्य’ तथा ‘श्रुत अनिष्टजन्य’ आदि भेद मिलते हैं, जो मूलत: करुण रस के उत्पादक कारणों के ही, ‘इष्टनाश’ और ‘अनिष्टप्राप्ति’ समानान्तर हैं। स्मृत और श्रुत केवल अनिष्टबोध के प्रकार को व्यक्त करते हैं, जिनके और भी प्रकार हो सकते हैं। ‘रसतरंगिणी’ में भानुदत्त ने करुण के आलम्बन को दृष्टि में रखकर ‘स्वनिष्ठ’ और ‘परनिष्ठ’ नामक दो भेद किये हैं। जब, शाप, बन्धन, क्लेश, अनिष्ट आदि अपने अर्थात् आश्रय से ही सम्बद्ध हों, दूसरे शब्दों में जब आश्रय ही स्वयं करुण रस का आलम्बन हो तो, उसे स्वनिष्ठ करुण कहा जायेगा, पर जब उक्त वस्तुओं का सम्बन्ध अपने से पृथक् आलम्बन से हो तो वह परनिष्ठ करुण होगा।

  • आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इनके स्थान पर ‘करुणाजनक’ और ‘करुणाजनित’ शब्दों का प्रयोग वांछित माना है[32]
  • भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में करुण के तीन भेद मिलते हैं -
  1. धर्मोपघातज[33],
  2. अपचयोद्भव,
  3. शोककृत।

इनमें अन्तिम शोककृत सबसे अधिक प्रभावशाली होता है। भावप्रकाशकार ने मन, वचन और क्रिया से अभिव्यक्ति लक्षित करके करुण को मानस, वाचिका और कर्म तीन प्रकार का माना है। इन्हें अनुभाव-भेद कहा जा सकता है।

  • मात्रा के अनुसार किये गए करुण के पाँच भेद उक्त भेदों की अपेक्षा हिन्दी में अधिक प्रसिद्ध हैं -
  1. करुण,
  2. अतिकरुण,
  3. महाकरुण,
  4. लघुकरुण,
  5. सुखकरुण।
  • रीतिकालीन आचार्य कवि देव ने अपने ‘शब्दरसायन’ के अन्तर्गत इन भेदों का उल्लेख किया है -

‘करुना अतिकरुना अरु महाकरुन लघु हेत।
एक कहत हैं पाँच में, दु:ख में सुखहिं समेत’[34]

  • गुलाबराय ने अपने ‘नवरस’ नामक ग्रन्थ में इन पर विचार करते हुए लिखा है कि ‘प्रथम तीन भेदों में तो करुणा की मात्रा उत्तरोत्तर उच्च होती जाती है, पर लघुकरुण में कुछ कम हो जाती है। यहाँ वह केवल चिन्ता के रूप में रहती है। अनिष्ट का नाम रहता है, पर आशा नहीं टूटती। चित्त दुबिधा में रहता है। अनिष्ट निवारण का पूरी तरह प्रयत्न होता रहता है। सुखकरुण वह करुण है, जो हर्ष में बदलने वाला हो, किन्तु वहाँ पिछले वियोगजन्य करुण का प्रबल आवेग हर्ष को प्रभावित कर मनुष्य को रुला देता है। हर्ष के आँसू इसी प्रकार के होते हैं’ [35]
  • संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, कदाचित् इसीलिए आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इस भेदों को निस्सार बताया है। वे किसी न किसी दूसरे रस में इनके अन्तर्भाव के पक्ष में हैं। रसास्वाद में स्तरभेद इन्हें अभीष्ट नहीं, यद्यपि आनन्दवर्धन आदि आचार्यों तक ने रसों में प्रकर्ष-भेद माना है। ये भेद निश्चय ही करुण रस की अनुभूति के विभिन्न स्तरों को व्यक्त करते हैं और उन्हें सर्वथा निराधार या असिद्ध नहीं कहा जा सकता। – ज.गु.
वीरकाव्य में करुण रस

हिन्दी साहित्य के वीरकाव्य में करुण रस की अभिव्यक्ति बहुत कम हुई है, यद्यपि मृत्यु और अनिष्ट की परिस्थितियों आई हैं। कहीं-कहीं रसाभाव के रूप में करुण रस आया है। मान कवि में कहीं करुणा का दर्शन होता है (राजविलास, 1।37)। यत्र-तत्र आभास भर मिलता है। भक्ति साहित्य के आशा - उल्लास में करुण को अधिक अवसर नहीं था, यद्यपि कृष्ण के मथुरा जाने का प्रसंग अपने आप में करुण है और सूरदास जैसे कवि ने अत्यधिक भावात्मक शैली में अंकित भी किया है। वस्तुत: इस अवसर पर यशोदा तथा गोपियों के मन में कृष्ण के विषय में आशंका का भाव करुणा की सृष्टि करता है। आगे गोपियों की वियोग श्रृंगार की सघन मनोदशा यत्र-तत्र करुण जान पड़ती है। राधा का चित्न अपनी वियोग व्यथा में मौन तथा करुण है।

  • तुलसीदास के कथा-काव्य में करुण रस को अवसर मिला है। कैकेयी के वरदानों को सुनकर दशरथ के मन की करुणा का चित्रण तुलसी ने किया है। इसके अन्तर्गत कवि ने राजा के मन के आशंका, मोह, विषय, दैन्य, जड़ता, उन्माद, त्रास, स्तम्भ, मूर्च्छा आदि अनेक संचारियों का सहज और सूक्ष्म अंकन किया है। इस करुणा के प्लावन में सारी अयोध्या नगरी बह जाती है। राम वन गमन और बाद में दशरथ मरण की परिस्थितियाँ करुण रस के अनुकूल हैं और कवि ने इसका विशद वर्णन किया है। सुमंत्र का अयोध्या वापस आना, दशरथ का समाचार पाना, उनका मरण, भरत का अयोध्या आना आदि ऐसे प्रसंग हैं।
  • इन करुण प्रसंगों को तुलसी ने ‘कवितावली’ तथा ‘गीतावली’ में भी चित्रित किया है।
  • सूफ़ी प्रेमी कवियों ने विषयों के वर्णन के अन्तर्गत करुण परिस्थितियों का अवश्य अंकन किया है, उदाहरण के लिए जायसी का ‘नागमति वियोग’ लिया जा सकता है। रीतिकाल के कवि इसका समुचित निर्वाह नहीं कर सके, उनके उदाहरण कमज़ोर हैं। मुक्तकों में यह सम्भव भी नहीं था।
  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘हरिश्चन्द्र’ नाटक में इसकी सफल अवतारणा की है। भारतेन्दु ने तथा इस युग के कई कवि और लेखकों ने देश-दुर्दशा पर भी करुण रस की कविता की है।
  • आधुनिक महाकाव्यों तथा प्रबन्धकाव्यों में यत्र-तत्र इसका वर्णन मिलता है। छायावादी कवियों में महादेवी वर्मा के काव्य में करुणा का विशेष उल्लेख किया जाता है, पर यह भावाभिव्यक्ति वियोग श्रृंगार के अन्तर्गत आती है।[36]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कपोत: करुणश्चैव
  2. करुणो यमदैवत:
  3. अथ करुणो नाम शोकस्थायिभावप्रभाव:
  4. नाट्यशास्त्र 6।61, भरतमुनि
  5. 10 शती ईस्वी
  6. 14 शती ईस्वी
  7. दशरूपक, 4।81,धनंजय
  8. साहित्य दर्पण: 3।222,विश्वनाथ
  9. 17 शती ईसा पूर्व.
  10. कविकुलकल्पतरु, 8
  11. 17 शती ईसा पूर्व.
  12. शब्द रसायन, 3 देव
  13. 1670 ई.
  14. साहित्यदर्पण, 3।223
  15. उत्तररामचरित, 3।47
  16. नाट्यशास्त्र, 6।45
  17. आनन्दप्रकाश दीक्षित : काव्य में रस, अप्र. थीसिस, पृ. 437, 38
  18. ‘साकेत’, 9
  19. रामचरितमानस: 2।56
  20. ध्वन्यालोक 2।8
  21. 9 शती ईसा उत्त.
  22. नाट्यदर्पण पृष्ठ 159
  23. धनिक कृत व्याख्या : दशरूपक, 4।44,45
  24. 4 शती. ई. पूर्व
  25. 1564-1616
  26. 1770-1831 ई.
  27. 1778-1830 ई.
  28. 1844-1900 ई.
  29. 1631-1700 ई.
  30. 1672-1719 ई.
  31. 1785-1859 ई.
  32. काव्य में रस : अप्र. थीसिस, पृष्ठ 433, 34
  33. अध्याय 6।78
  34. शब्दरसायन पृष्ठ 38
  35. नवरस पृष्ठ 441
  36. वर्मा, धीरेंद्र हिन्दी साहित्यकोश, भाग-1, मई 2007 (हिन्दी), वाराणसी: ज्ञानमण्डल प्रकाशन, 15।

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