ध्रुवदेवी  

सम्राट समुद्रगुप्त के बड़े लड़के रामगुप्त की रानी ध्रुवदेवी विश्वविख्यात सुंदरी थी। उसे 'पद्मावती' भी कहा जाता था। रामगुप्त की राजसभा में पंडित 'राघव चेतन' ज्योतिष और राजनीति का विद्वान् था। एक दिन जब राजा रामगुप्त और रानी पद्मावती अपने कक्ष में बैठे हुए थे, तो अचानक राघव चेतन बिना आज्ञा लिए अंदर आ गए। रामगुप्त नाराज़ हो गए और अगले दिन उन्होंने भरी सभा में अपमानित करके उसे देश निकाला दे दिया। राघव चेतन चित्तौड़गढ़ से निकल कर सीधे दिल्ली पहुँचा। जहाँ उसने अलावादीन सिकन्दर से मुलाकात की। वह सिकन्दर की सभा का सदस्य बन गया।

राघव चेतन की चाल

एक दिन मौक़ा पाकर राघव चेतन ने सिकन्दर के समक्ष रानी पद्मावती की सुन्दरता की चर्चा की, और सिकन्दर को उकसाया की वह चित्तौड़ पर चढाई करे। सिकन्दर पद्मावती को पाने के लिए बेचैन हो गया और अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की और कूच कर दिया। चित्तौड़गढ़ में भी युद्ध की तैयारियाँ होने लगी। कुछ ही दिनों में सिकन्दर चित्तौड़ पहुँच गया और गढ़ को चरों तरफ़ से घेर लिया। लेकिन चित्तौड़ गढ़ को भेदना आसान नहीं था। कई महीनों तक भी जब गढ़ को भेदने में सिकन्दर असफल रहा तो वह बेचैन हो उठा। उसने राघव चेतन से सलाह की। राघव चेतन ने कहा, रक्षा बंधन का पर्व आने वाला है, और इसका लाभ उठाकर तुम कहला भेजो की तुम पद्मावती को अपनी बहिन मानते हो और इस पर्व पर भेंट देना चाहते हो।

सिकन्दर का संकल्प

राजा रामगुप्त ने सिकन्दर के प्रस्ताव को राजसभा में रखा। अधिकतर सभासद इसे एक धोका मानते थे और सिकन्दर के प्रस्ताव को मानना नहीं चाहते थे। परन्तु कुछ ने इस प्रस्ताव को युद्ध समाप्त करने का अच्छा अवसर मानकर इसे स्वीकार करने का तर्क दिया। अंत में राजा रामगुप्त ने प्रस्ताव मान लिया और अलावादीन सिकन्दर का क़िले में स्वागत किया गया। लेकिन रानी पद्मावती ने सिकन्दर के सामने आने से मना कर दिया। सिकन्दर ने कहा मैं अपनी बहिन का सम्मान किए बिना कैसे जा सकता हूँ। राघव चेतन ने प्रस्ताव दिया की यदि पद्मावती सामने नहीं आना चाहती, तो सिकन्दर शीशे में ही उसे देख कर उसका सम्मान कर देगा। इस बात पर राजा रामगुप्त ने पद्मावती को राजी कर लिया। पद्मावती को दर्पण में देखकर सिकन्दर भौचक रह गया और मन ही मन ठान लिया कि पद्मावती को पाकर रहेगा।

चन्द्रगुप्त की योजना

सिकन्दर वापस जाने कि तैयारियाँ करने लगा। सिकन्दर और उसके साथियों को बाहर तक छोड़ने राजा रामगुप्त उनके साथ गए। पर बाहर पहुँचते ही सिकन्दर ने राजा को बंदी बना लिया और अपने साथ ले गया। राजपूत धोका खा गए। रामगुप्त को यातनाएँ दी जाने लगीं। सिकन्दर ने माँग की कि पद्मावती उसे सौंप दी जाए। उधर चित्तौड़ गढ़ में मन्त्रनाएँ होने लगी कि राजा को कैसे छुड़वाया जाए। रामगुप्त का छोटा भाई चन्द्रगुप्त जो उस समय केवल 12 वर्ष का था, बोल उठा "सिकन्दर ने हमसे कपट किया, हमें भी कपट का सहारा लेना चाहिए।" चन्द्रगुप्त ने सुझाव दिया कि चुने हुए सैनिकों को स्त्रीवेश में भेजा जाए। चन्द्रगुप्त ने स्वयं रानी पद्मावती के छद्मवेश में शत्रु के खेमे में पहुँच कर शत्रु को मार डालने का प्रस्ताव किया। चन्द्रगुप्त का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।

रामगुप्त की रिहाई

सिकन्दर को सन्देश भेजा गया कि रानी पद्मावती अपनी 500 सखियों के साथ आयेंगी और पहले राजा रामगुप्त से मिलेगी और फिर सिकन्दर के खेमें में जायेंगी। 500 पालकियाँ सजाई गयीं। हर एक पालकी में एक युवा वीर को स्त्री-रूप में बिठाया गया। हर एक पालकी को उठाने वाले आठ कहार भी वीर सैनिक थे। चन्द्रगुप्त रानी पद्मावती के वेश में पालकी में बैठा। सिकन्दर के घेरे में पहुँच कर सबसे पहले चन्द्रगुप्त की पालकी को राजा रामगुप्त के पास ले जाया गया। रामगुप्त को छुड़वा कर क़िले की ओर भेज देने के बाद चन्द्रगुप्त की पालकी को सिकन्दर के खेमे में ले जाया गया। बाकि की 500 पालकियाँ भी सिकन्दर के 500 सरदारों के खेमों में भेज दी गयीं। जैसे ही सिकन्दर ने चन्द्रगुप्त को पद्मावती समझ कर उसका हाथ पकड़ना चाहा, चन्द्रगुप्त ने छुरे से वार कर दिया। और शंख बजा दिया। बाकि 500 युवाओं ने भी 500 सरदारों पर धावा बोल दिया। मार-काट मच गई और भयंकर युद्ध छिड़ गया। सिकन्दर के बहुत सारे सरदार और सैनिक शराब के नशे में मारे गए। इस प्रकार रामगुप्त को मुक्त करा लिया गया।

चन्द्रगुप्त ने अपने राजा कि रक्षा की और पद्मावती के सम्मान को बचाया। बाद के दिनों में चन्द्रगुप्त ने रामगुप्त को मारकर गद्दी प्राप्त की, तब उसने ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया। उससे कुमारगुप्त प्रथम उत्पन्न हुआ, जिसने बाद में 415 से 455 ई. तक शासन किया। यही चन्द्रगुप्त बाद में चन्द्रगुप्त द्वितीय मौर्य चक्रवर्ती सम्राट बना। उसने विक्रम संवत की स्थापना की।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

सिकंदर की हार (हिन्दी) Bharate Bhatu Bharati। अभिगमन तिथि: 27 मई, 2011।

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